कहानी- बोझ (Short Story- Bojh)

 

रिया भौंचक्की रह गई… वह अपनी धुंधली आंखों से कभी शेखर को, कभी कमला जी को देख रही थी. जो रिश्ता उसके लिए बोझ से ज़्यादा कभी कुछ नहीं रहा, आज उसी रिश्ते ने उसके आंसुओं को अपनी हथेलियों पर ले लिया था. उसका मन आत्मग्लानि से भर उठा.

”शेखर, क्या मम्मी का यहां आकर रहना ज़रूरी है? मेरठ में उन्होंने पूरा जीवन बिताया, अब इस उम्र में? वहां उनका अपना एक दायरा है. और महेश भी तो है न वहां उनकी देखभाल के लिए.”

“महेश? रिया वह स़िर्फ एक नौकर है. पापा के देहांत के बाद मम्मी कितनी अकेली हो गई हैं. ऐसे में उन्हें अपनों की ज़रूरत है. और हमारे सिवा…”

“वो तो ठीक है, पर उनकी लाइफ़स्टाइल बिल्कुल अलग है. सुबह जल्दी उठो, नॉनवेज मत खाओ, स़िर्फ साड़ी पहनो… प्लीज़ शेखर, एक-दो दिन की बात हो तो झेल भी लिया जाए, पर हमेशा के लिए…?”

“इसका मतलब मेरी मम्मी तुम्हारे लिए बोझ हैं, जिन्हें तुम्हें झेलना पड़ेगा? अगर यही बात तुम्हारी भाभी तुम्हारी मम्मी के लिए कहें तो?”

“मेरी मम्मी ने कभी भाभी पर अपनी मर्ज़ी नहीं थोपी. उन्हें अपने तरी़के से ज़िंदगी जीने की पूरी आज़ादी दी है. पर तुम्हारी मम्मी? रिया ये मत करो, वो मत करो… देखो शेखर, मैं एक बात तुम्हें अभी से क्लीयर कर देती हूं. मम्मी के आने के बाद मैं वैसे ही रहूंगी जैसे रहती आ रही हूं. तुम्हें अच्छा लगे या बुरा.” रिया की इस बात पर शेखर ने कोई जवाब नहीं दिया.

शाम को शेखर ऑफ़िस से जल्दी लौट आया. “रिया तुम जल्दी से तैयार हो जाओ, मम्मी को लेने स्टेशन चलना है.”

“मैं तो तैयार हूं.”

“इन कपड़ों में?”

“क्या बुरा है इनमें?” रिया का इशारा अपनी जीन्स की ओर था.

“मैं तो तुम्हें पहले ही कह चुकी थी शेखर. तुम इतने हिप्पोके्रट क्यों हो? तुम्हें जब मम्मी की गैरमौजूदगी में इस ड्रेस से कोई प्रॉब्लम नहीं, तो अब अचानक…?”

“प्लीज़ रिया, मैं तुम्हें कैसे समझाऊं? तुम बात को ग़लत ढंग से देख रही हो. मैंने कभी तुम्हारी फ्रीडम में बाधक बनना नहीं चाहा. लेकिन परिवार के अन्य सदस्यों की ख़ुशियों का ध्यान भी तो रखना होता है. और छोटे होने के नाते हमारा कर्त्तव्य बनता है कि हम अपने बड़ों के विचारों को भी सम्मान दें, आउटडेटेड कहकर उन्हें परिवार से ही काटें नहीं.”

“शेखर, तुम ये सब इसलिए कह रहे हो, क्योंकि सवाल तुम्हारी मम्मी का है. पर मैं जैसी हूं, वैसी ही रहूंगी. मुझे दो चेहरे रखने की आदत नहीं.”

“ठीक है. जो मन में आए, करो.” कहकर शेखर ने ग़ुस्से में कार की चाभी उठाई और बाहर निकल गया. पीछे से रिया भी आ गई.

स्टेशन पर दोनों बिल्कुल शांत खड़े थे, पर दोनों के मन के भीतर उथल-पुथल मची हुई थी. ‘कुछ न कुछ तो ज़रूर कहेंगी. वैसे आज मैं साड़ी ही पहन लेती तो ठीक रहता. नहीं, अगर आज पहन लेती, तो रोज़ पहनना पड़ता. न बाबा, मुझे नहीं बनना बहनजी. और फिर क्यों रहूं उनके मुताबिक? मेरी मर्ज़ी, मेरा घर है. अगर कुछ कहा तो करारा जवाब दूंगी. नहीं, कुछ नहीं कहूंगी, वरना बेवजह शेखर से झगड़ा होगा. चुप ही रहूंगी. सुनो सबकी, करो मन की. हां, यही ठीक रहेगा.’ रिया के भीतर विचारों के भंवर घेरा बना रहे थे.

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शेखर का भी यही हाल था. ‘रिया को देखते ही मम्मी अपसेट हो जाएंगी. रिया ने जान-बूझकर ऐसा किया है. वह क्यों नहीं समझती कि…’ शेखर की विचार शृंखला को ट्रेन की सीटी की आवाज़ ने तोड़ दिया. ट्रेन से उतरने पर रिया ने जब कमलाजी के पांव छुए तो शेखर का पूरा ध्यान उनके चेहरे के आते-जाते रंगों पर था, पर अपेक्षा से बिल्कुल विपरीत उन्होंने कुछ नहीं कहा.

अगले दिन सुबह-सुबह किचन में खटर-पटर की आवाज़ सुनकर रिया की आंख खुली.

“क्या ढूंढ़ रही हैं आप?”

“रिया, चीनी और चायपत्ती का डिब्बा नहीं मिल रहा.”

“इतनी सुबह! मम्मी, अभी तो स़िर्फ छह ही बजे हैं.”

“सुबह हो चुकी है बेटा. देर से उठना अच्छा नहीं है. तुम देर से उठोगी, तो शेखर भी देर से उठेगा. कितना वज़न बढ़ गया है उसका. मोटापा अपने साथ ढेरों बीमारियां भी लाता है. अब जाकर उसे उठाओ.”

‘ओ़फ्! कितना बोलती हैं सुबह-सुबह. अभी से इतना भाषण. पता नहीं, आगे क्या होगा.’ रिया रैक से चीनी का डिब्बा उतारते हुए सोचने लगी.

“डिब्बा मुझे दो, तुम शेखर को उठाओ.”

“उठो शेखर.” रिया ने शेखर को इतनी तेज़ी से झकझोरा कि शेखर हड़बड़ा गया.

“क्या हुआ?”

“ये तुम अपनी मम्मी से पूछो.”

“रिया बेटा, इधर तो आओ.”

“ओह गॉड! तुम्हारी मम्मी एक पल सांस भी लेती हैं या नहीं. चलो तुम उठो, नहीं तो थोड़ी देर में आवाज़ लगा-लगाकर सारी कॉलोनी को जगा देंगी.”

रिया और शेखर कमरे से बाहर आ गए.

“रिया शेखर टिफिन में क्या लेकर जाएगा? मैं तैयारी शुरू कर देती हूं.”

“शेखर खाना लेकर नहीं जाते. ऑफ़िस में ही कुछ मंगाकर खा लेते हैं.”

“क्यों शेखर, ये शौक़ कब से लगा लिया? रोज़ बाहर का खाना?”

“क्या करूं? ऑफ़िस नौ बजे निकलना होता है, कामवाली बाई तब तक आती नहीं.”

“बाई? रिया ने जॉब कर ली है?”

“नहीं-नहीं, वो मुझसे खाना अच्छा नहीं बनता. वैसे भी मुझे कुकिंग में कोई दिलचस्पी नहीं है.” रिया ने सफ़ाई दी.

“कोई बात नहीं, मैं तुम्हें खाना बनाना सिखा दूंगी.” और कमलाजी उठकर किचन में चली गईं.

“देखो शेखर, अपनी मम्मी को समझा दो, मुझे कुछ भी सीखना नहीं है. मैं जितना जानती हूं, मेरे लिए उतना ही काफ़ी है. तुम मुझे ऑफ़िस जाते हुए संजना के घर ड्रॉप कर देना.”

“तुम्हारा दिमाग़ तो ठीक है! मम्मी को कैसा लगेगा? तुम घर पर ही रहो.”

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“शेखर, तुम मुझसे ऐसे कैसे बात कर रहे हो? देखो मम्मी ने आते ही अपनी हुकूमत चलानी शुरू कर दी है. अगर तुम घर में शांति चाहते हो, तो मेरा तुम्हारी मम्मी से दूर रहना ही ठीक है, वरना फिर तुम्हीं कहोगे कि मैंने तुम्हारी मम्मी की इन्सल्ट…”

“आगे कुछ कहने की ज़रूरत नहीं है. तुम्हें जहां जाना है, जाओ.” शेखर ने झुंझलाकर कहा और निकल गया. उसके जाते ही रिया भी घर से निकल गई. शाम को जब वह लौटी, तो कमलाजी घर के बाहर बेचैनी से घूम रही थीं.

“रिया इतनी देर कर दी. फ़ोन ही कर देती, मुझे चिंता हो रही थी.”

“मम्मी, मैं बच्ची नहीं हूं, जो कहीं खो जाती.” रिया के शब्दों की चुभन कमलाजी को तड़पा गई.

रात को खाना खाते समय कमलाजी की चुप्पी से शेखर सब समझ गया.

“मम्मी, कल संडे है. मंदिर चलेंगी?” शेखर ने पूछा.

“ज़रूर चलूंगी, कहां है? घर से ज़्यादा दूर है?” और फिर बातों का सिलसिला शुरू हो गया. शेखर जानता था, जब भी मम्मी का मन अशांत होता, तो पापा उन्हें मंदिर ले जाते थे और मंदिर से लौटते ही वह कहतीं, ‘मैं अपनी सारी परेशानियां ईश्‍वर को उसके घर जाकर दे आई हूं, अब वही जानें.’

दूसरे दिन शेखर सुबह-सुबह उठ गया. उसने जागते ही पूछा, “रिया, तुम भी चलोगी न?”

“नहीं.” रिया ने करवट बदलते हुए कहा और सो गई.

शेखर और कमलाजी मंदिर से लौटकर आए, तो शालू बाई बर्तन साफ़ कर रही थी.

“शालू, तू बस बर्तन साफ़ कर ले. आज खाना मैं बनाऊंगी.”

“क्या बात करती हो आंटी? सच? चलो, आज मेरा आदमी ख़ुश हो जाएगा.” शालू के हाथ जल्दी-जल्दी बर्तनों पर चलने लगे.

“रिया, तुम्हें खाने में क्या पसंद है?”

“मुझे? आप शेखर से पूछ लें.”

“चलो, ठीक है.” कमलाजी पूरे उत्साह से खाना बनाने में जुट गईं.

लंच के व़क़्त पहला कौर खाते ही शेखर बोला, “मम्मी, आज बहुत दिनों बाद इतना अच्छा खाना खा रहा हूं, वरना शालू की बनाई सब्ज़ी में तेल ज़्यादा और सब्ज़ी कम नज़र आती है.”

“क्यों रिया, क्या शेखर सही कह रहा है?”

“नहीं तो. ऐसा कुछ नहीं है.” रिया ने भावहीन चेहरे से कुछ इस तरह कहा कि खाने की बात वहीं ख़त्म हो गई.

“शेखर सुबह जल्दी उठ जाना. कल से हम सब सुबह थोड़ी दूर घूम आया करेंगे.”

“मैं तो बिल्कुल नहीं जाऊंगी.” रिया ने हाथ खड़े कर दिए.

सुबह शेखर जल्दी उठ गया. पार्क में घूमते हुए वह इंतज़ार करता रहा कि मम्मी शायद कुछ कहें, पर ऐसा कुछ नहीं हुआ. फिर यह रोज़ का सिलसिला बन गया.

एक दिन कमलाजी बोलीं, “रिया मैं सोच रही थी कि शालू से खाना बनवाने के बजाय, क्यों न हम दोनों मिलकर…”

“नहीं मम्मी, बिल्कुल नहीं. कल आपको ही लगेगा कि मैंने घर का सारा काम आप पर डाल दिया. प्लीज़ जैसे चल रहा है, वैसे ही चलने दीजिए. और हां, आज मैं शॉपिंग करने जा रही हूं, आप मेरा इंतज़ार मत करना.”

शाम को जब रिया लौटी, तो उसके हाथों में कई बैग्स थे.

“कुछ लाई हो?”

“हां, अपने लिए कुछ कपड़े.”

“लाओ, मैं भी देखूं.” कमलाजी ने उत्सुकतावश रिया के हाथों से बैग्स ले लिए. वे एक-एक कर कपड़ों को देखने लगीं. हर कपड़े पर लगा प्राइसटैग उनकी आंखों में विस्मय भरने लगा.

“इतने महंगे? रिया, अभी तुम्हारी नई गृहस्थी है. कुछ सोच-समझकर ख़र्च करो. इस तरह तो तुम…” कमलाजी कुछ कहते-कहते रुक गईं.

“मम्मी, अब वो पुराना समय नहीं रहा कि अपनी इच्छाओं को मारकर आनेवाली जनरेशन के लिए पैसे बचाए जाएं. और फिर हम कमाते क्यों हैं? अच्छा खाओ, अच्छा पहनो और लाइफ़ को भरपूर जियो. कल किसने देखा है?”

“ठीक कह रही हो रिया. जीवन तो भरपूर जीने के लिए ही है. पर ये फिज़ूलख़र्ची? ये मैं इसलिए नहीं कह रही, क्योंकि मैं सास हूं. मेरी जगह तुम्हारी मम्मी होतीं, तो वे भी यही कहतीं. शेखर ऐसा करता, तो मैं उसे भी टोकती. रिया, तुम्हें जीवन का अनुभव नहीं है. शेखर बता रहा था कि हर महीने बीस हज़ार रुपए तो बैंक लोन की किश्त जाती है. बेटा, कर्ज़ लेकर सुविधाएं जुटाना अक्लमंदी नहीं. तुम समझदार हो, इस घर और शेखर की पूरी ज़िम्मेदारी तुम्हारे ऊपर है. जैसा चाहोगी वैसा ही तुम्हारा घर बनेगा. फिर बुरे व़क़्त के लिए भी कुछ पैसे हमेशा पास में होने चाहिए.”

“तो आप चाहती हैं कि हमारा बुरा व़क़्त आए?” रिया का यह विष बाण कमलाजी के मन में धंस गया.

ऑफ़िस से लौटकर आने के बाद अपनी मां की नम आंखों को देखकर शेखर भांप गया कि आज घर में ज़रूर कुछ हुआ है.

“मम्मी, क्या हुआ? तबीयत ठीक नहीं है क्या?”

“नहीं बेटा, ऐसी कोई बात नहीं है. बस अब यहां मेरा मन नहीं लगता. मुझे मेरठ वापस जाना है. तू मेरा रिज़र्वेशन करवा दे.”

“क्या हुआ मम्मी?” शेखर घबरा गया. “रिया ने कुछ कहा या मुझसे कोई ग़लती हो गई? आप तो हमेशा के लिए आई थीं न.”

“मेरे बच्चे, ऐसा मैंने कब कहा कि मैं यहां हमेशा रहने के लिए आई हूं. मैं तो तुम दोनों की गृहस्थी देखना चाहती थी. तुम दोनों यहां ठीक हो, ख़ुश हो, देख लिया. बस, अब जाना चाहती हूं. वहां घर सूना पड़ा है.”

“मम्मी, आप ही तो कहा करती थीं कि घर तो घर के लोगों से बनता है, वरना ईंट-गारे की दीवारों को तो स़िर्फ मकान कहते हैं. मम्मी, वहां कौन है? आप कहीं नहीं जाएंगी.” शेखर की आवाज़ अपराधबोध से थरथरा गई. वह ख़ुद को बहुत असहाय महसूस कर रहा था. जिस मां ने जीवनभर उस पर अपनी ममता लुटाई, आज उसी मां का वह ख़याल नहीं रख पाया. उसका मन कर रहा था कि वह चीख-चीखकर रिया से लड़े, लेकिन उससे भी क्या हासिल होगा.

“तू परेशान मत हो शेखर. मैं एक-दो महीने में फिर आ जाऊंगी.”

“सच?”

“हां बेटा.” कमलाजी ने शेखर के सिर पर हाथ फेरा. उनकी ज़िद के कारण शेखर ने रिज़र्वेशन करवा दिया.

“रिया, तुमने मम्मी से क्या कहा?”

“मैं क्यों कुछ कहूंगी? पर मैं उनके इशारों पर अपनी ज़िंदगी नहीं चलाऊंगी. शेखर, हम बच्चे नहीं हैं. क्या हम अपना भला-बुरा नहीं समझते? फिर क्यों मम्मी हमेशा ये प्रूव करने में लगी रहती हैं कि मैं मैच्योर नहीं हूं. उनका हर मामले में दख़लअंदाज़ी करने का नेचर ही सारी समस्या की जड़ है और इस उम्र में उनको हैंडल करना बहुत ही मुश्किल है.”

“बस करो रिया, प्रॉब्लम तुममें है. तुम स़िर्फ और स़िर्फ अपने बारे में सोचती हो. तुम कभी यह नहीं मानती कि तुमसे कभी ग़लती हो सकती है. तुम्हारा यही ईगो तुम्हें…” शेखर आगे कुछ कहता, उससे पहले ही कमलाजी की आवाज़ ने उसे चुप करा दिया.

“शेखर, रिया की भाभी का फ़ोन है.”

रिया ने तुरंत कमरे से बाहर निकलकर फ़ोन उठा लिया.

“रिया, कब से तुम्हारा मोबाइल ट्राई कर रही हूं. ख़ैर, मैंने तुम्हें ये बताने के लिए फ़ोन किया है कि मैं और तुम्हारे भैया दो दिन बाद दुबई जा रहे हैं.”

“बधाई हो भाभी. कितने दिनों के लिए जा रहे हो आप लोग? मम्मी का ध्यान रखना.”

“मम्मी? वो हमारे साथ नहीं जा रहीं. इनकी कंपनी किस-किस का ख़र्च उठाएगी. मम्मी यहीं रहेंगी. उनके लिए मैंने एक नौकरानी का इंतजाम कर

दिया है.”

“ये कैसे हो सकता है भाभी?”

“रिया, अब तो निर्णय हो चुका है. और हम भी कब तक उन्हें अपने साथ बांधे घूमेंगे? वैसे भी हमें दो साल बाद तो वापस इंडिया आना ही है.”

“दो साल? भाभी…”

“रिया, मैं तुमसे बाद में बात करती हूं. दरवाज़े पर कोई है.” फ़ोन कट गया, पर रिया बुत बनी फ़ोन को हाथ में लिए खड़ी रही.

“क्या हुआ रिया? अभी तो तुम भाभी को बधाई दे रही थी और अब…”

“शेखर, भैया-भाभी दुबई जा रहे हैं और मम्मी अकेली रहेंगी.”

“ये कैसे हो सकता है रिया? अभी दो महीने पहले ही तो उन्हें हार्टअटैक हुआ था. उन्हें तो बहुत केयर की ज़रूरत है.”

“यही तो. मुझे भैया पर बहुत ग़ुस्सा आ रहा है. भाभी को छोड़ो, पर भैया को तो मम्मी का ख़याल होना चाहिए. मम्मी अकेली कैसे रहेगी?” रिया रुआंसी हो गई.

“रिया, तुम्हारी मम्मी अकेली कहां हैं? तुम रहोगी न उनके साथ. शेखर, तुम कल ही पूना जाकर रिया की मम्मी को ले आओ.”

“यहां?” रिया भौंचक्की रह गई.

“और नहीं तो क्या? वह यहीं रहेंगी, तुम दोनों के पास. रिया, जब तुम छोटी थी और तुम्हें उनकी ज़रूरत थी, तो वे तुम्हारे पास थीं. आज उन्हें बच्चों की ज़रूरत है तो तुम्हें उनके साथ होना चाहिए. क्यों शेखर?”

“हां मम्मी, आप बिल्कुल ठीक कह रही हैं. मैं कल ही मम्मी को लेने जाता हूं. भैया के वापस आने तक वे हमारे पास ही रहेंगी.”

रिया अपनी धुंधली आंखों से कभी शेखर को, तो कभी कमलाजी को देख रही थी. जो रिश्ता उसके लिए बोझ से ज़्यादा कुछ नहीं था, आज उसी रिश्ते ने उसके आंसुओं को अपनी हथेलियों पर ले लिया था. उसका मन आत्मग्लानि से भर उठा.

“मम्मी, शेखर मेरी मम्मी को तभी लेने जाएंगे, जब आप वादा करेंगी कि आप अब हमेशा हमारे साथ रहेंगी. हमारे साथ नहीं, बल्कि हम आपके साथ रहेंगे, क्योंकि ये घर आपका है और हम…” रिया आगे कुछ नहीं कह पाई और रोने लगी.

“मेरी बच्ची, हम सब हमेशा साथ-साथ रहेंगे.” उन्होंने रिया को गले से लगा लिया.

डॉ. ऋतु सारस्वत

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Usha Gupta :
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