कहानी – मेरी प्रेरणा

      मयूर पटेल
क्यों इंसान बेवजह गड़े मुर्दे उखाड़ता है? नियति तो उसके साथ सदैव भला ही करती है, तभी तो वक़्त बड़े से बड़ा ज़ख़्म भर देता है. फिर भी इंसान मूर्खतावश पुराने ज़ख़्मों को बेवजह कुरेदकर अपने घावों को हरा करता रहता है. क्या यह मेरी पत्नी अंजलि के प्रति मेरा विश्‍वासघात नहीं?

 

अनगिनत विचार मन के गर्भ में जन्म लेते हैं. उनमें से अधिकतर पानी के बुलबुलों के समान वापस गर्भ में समा जाते हैं, पर कुछ विचार धीरे-धीरे एक आकार ग्रहण करने लगते हैं. वक़्त के साथ भावनाएं उनसे जुड़ने लगती हैं और कब ये कोमल भावनाएं एक प्रेम का रूप अख़्तियार कर लेती हैं, पता ही नहीं चलता. ऐसे ही एक विचार ने जन्म लिया था

मेरे मन में भी, जब उसे पहली बार देखा था. मेरी छोटी बहन के कॉलेज का वार्षिक महोत्सव था. रात दस बजे मैं उसे लेने गया था. कॉलेज के गेट पर वह बहन के साथ खड़ी थी.
“भइया, यह मेरी सहेली है. इसे भी घर छोड़ दोगे न?” मैंने एक भरपूर नज़र उस पर डाली थी. दुधिया-सी रंगत लिए गोरे चेहरे पर बड़ी-बड़ी हिरनी-सी आंखें. कार की पिछली सीट पर वह बैठी हुई थी और न चाहते हुए भी बार-बार मेरी नज़रें कार के रिव्यू मिरर की ओर उठ रही थीं. ऐसा लग रहा था, मानो कॉलेज से उसके घर तक का कई किलोमीटर लंबा फासला चंद मिनटों में तय हो गया हो. उस रात नींद में मैं उसी के सपने देखता रहा था.
दो दिनों तक मैंने मन पर संयम रखा. तीसरे दिन ऑफिस से उठकर बहन को घर छोड़ने के बहाने उसके कॉलेज पहुंच गया. अब ऐसा अक्सर होने लगा था. अब बहन हंसकर मुझे छेड़ते हुए कहती, “क्यों भइया, पहले तो आप मुझे कभी कॉलेज लेने नहीं आते थे, फिर अब ऐसा क्या हो गया? अचानक मुझ पर इतनी मेहरबानी क्यों?” मैं झूठमूठ आंखें तरेरकर कहता, “क्या अपनी छोटी बहन का ख़्याल रखना मेरा फर्ज़ नहीं है?”
“यह तुम मेरा ख़्याल रख रहे हो या फिर किसी और के ख़्यालों में खोए हुए हो. वैसे तुम्हें बता दूं, वह भी हर रोज़ मुझसे बहाने से तुम्हारे बारे में पूछती रहती है.” कहते हुए बहन हंस पड़ती. बहन मेरी भावनाओं से वाकिफ़ थी, इसलिए अक्सर उसे घर पर बुला लेती थी और उस दिन बहन के जन्मदिन पर वह आई, तो मैंने कुछ एकांत लम्हे चुराकर उसके समक्ष अपने प्रेम का इज़हार कर दिया था. उसने भी सहर्ष इस बात को स्वीकारा था कि वह भी मुझे चाहने लगी थी. उसका प्यार पाकर मेरी दुनिया ही बदल गई थी. मैं एक इंजीनियर था, पर लेखन मेरा शौक़ ही नहीं, बल्कि जुनून था. विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में मेरी कहानियां अक्सर प्रकाशित होती रहती थीं. उन दिनों सफल प्रेम की अनुभूति प्रेरणा बनकर मेरे काग़ज़ों पर उतरने लगी थी, जिन्हें पाठकों की भूरि-भूरि प्रशंसा मिल रही थी.


मैं अपनी रंगीन दुनिया में मस्त था. एक रविवार को उसके साथ लॉन्ग ड्राइव पर गया था. रास्ते में कॉफी शॉप पर बैठकर हम दोनों कॉफी पीते हुए भविष्य के सतरंगी सपने बुन रहे थे, तभी उसके भाई ने हम दोनों को देख लिया था. वह काफ़ी घबरा गई थी. अगले कई दिनों तक वह कॉलेज नहीं आई, तो बहन उसके घर गई थी. वह परेशान थी. उसने बहन को बताया कि घर में उसे काफ़ी डांट-फटकार पड़ी थी. उसने बहन से अनुरोध किया कि मैं उसके घरवालों से विवाह की बात करूं.
मैं उसके लिए बहुत परेशान और फ़िक्रमंद था. मैंने अपनी मम्मी को सब कुछ बताया, तो वह बोली थीं, “रवि, हम लोग तुमसे पहले तुम्हारी बहन का विवाह करना चाहते हैं.” इस पर बहन बोली थी, “नहीं मम्मी, इन हालात में हमें पहले भइया का साथ देना चाहिए.” मम्मी-पापा ने उसके घरवालों से शादी की बात की, पर उसके घरवालों को विजातीय लड़का मंज़ूर न था. तब हमने अपने परिवार की मान-मर्यादा और ख़ुशियों की ख़ातिर अपने रास्ते अलग करने का निर्णय लिया था. कुछ चाहतें बारिश की उन बूंदों की तरह होती हैं, जिन्हें चाहकर भी मुट्ठी में कैद नहीं किया जा सकता. उसके सुखमय भविष्य की कामना करते हुए मैं उससे अलग हो गया और उसके विवाह से पूर्व ही एक वर्ष के लिए लंदन चला गया.
लंदन से लौटकर मेरे घरवालों ने मेरा विवाह कर दिया. पत्नी के असीम प्रेम ने मेरी ज़िंदगी के सूनेपन को ख़ुशियों से भर दिया. फिर भी जीवन में एक कसक है. ऐसा लगता है मानो कहीं कुछ खो गया है, शायद मेरी प्रेरणा.
मैंने एक गहरी निःश्‍वास ली और ख़ामोश हो गया. मैं अपने एक कलीग की शादी में देहरादून आया था. वहीं मुझे मेरे कॉलेज का मित्र जतिन मिला था. उससे मिलकर मैं बहुत प्रसन्न था. जतिन के आग्रह पर मैं एक दिन उसके घर ठहरने के लिए राज़ी हो गया था. शाम के समय हम दोनों घूमते हुए सहस्रधारा चले आए थे. मौसम बहुत ख़ुशगवार था. पहाड़ों पर उड़ते हुए बादल और ढलते सूरज की रश्मियों की लुका-छिपी का खेल चल रहा था. जीवन की आपाधापी से दूर कितने ही पर्यटक वहां बैठकर पहाड़ों से गिरते झरनों के सौंदर्य का आनंद ले रहे थे. कितनी ही देर तक हम दोनों कॉलेज की, फ्रेंड्स की बातें करते रहे. ज़िंदगी के सुखों और अभावों को बांटते-बांटते भावावेश में मैं अपनी ज़िंदगी के कुछ पन्ने उसके साथ साझा कर बैठा था.
“शादी के बाद क्या तुमने लिखना छोड़ दिया?” जतिन मुझसे पूछ रहा था.
“नहीं, लिखना तो बदस्तूर जारी है, बल्कि पहले से भी ज़्यादा अब लिख रहा हूं.” मैंने बताया.
“इसका अर्थ, तुम्हारी प्रेरणा तुम्हारे आसपास ही कहीं है.” जतिन ने मेरे कंधे पर हाथ रख मुझे तसल्ली दी और उठते हुए बोला, “चलो रवि, अब घर चलते हैं. काफ़ी देर हो गई है. मेरी वाइफ प्रतीक्षा कर रही होगी.” मैं जतिन के साथ कार में बैठकर उसके घर आया. दरवाज़ा खुला. सामने खड़ी शख़्सियत पर नज़र पड़ते ही मैं बुरी तरह चौंका. मैं कभी ख़्वाब में भी नहीं सोच सकता था कि जतिन की पत्नी के रूप में मैं उसे देखूंगा. मुझे देख उसके चेहरे पर भी हैरत के साथ घबराहट के भाव दिखाई दिए.
“इससे मिलो तनु, मेरा दोस्त रवि.” जतिन ने अपनी पत्नी से मेरा परिचय कराते हुए कहा. मैंने तुरंत हाथ जोड़कर उसे अभिवादन किया, जिससे उसने राहत महसूस की.
जतिन बोला, “हम दोनों बीटेक सेकंड ईयर तक साथ-साथ थे, फिर अचानक पिताजी के स्वर्गवास के कारण पढ़ाई छोड़ मैं देहरादून आ गया. मैंने उनका बिज़नेस संभाल लिया और यह इंजीनियर बन गया. तनु, कॉलेज में हम दोनों की जोड़ी करन-अर्जुन के नाम से जानी जाती थी. आज इतने दिनों बाद इससे मिलकर बहुत अच्छा लग रहा है.” जतिन कॉलेज की बातें कर रहा था. तनु तन्मयता से सुन रही थी.
शायद यह उसका मेरे प्रति विश्‍वास था, जो वह धीरे-धीरे सहज हो रही थी, पर मैं ऊपर से मुस्कुराते हुए भी अंदर से बेहद असहज था. सच तो यह है कि जतिन से आंखें मिलाने की हिम्मत नहीं हो रही थी मेरी. तभी जतिन का बिज़नेस पार्टनर उससे कुछ आवश्यक बातें करने आ गया. तनु डिनर की तैयारी में जुट गई और मैं बाहर लॉन में आकर बैठ गया. पिछले दो घंटे से मैं अपनी प्रणयगाथा जतिन को सुनाता रहा था व मेरी प्रेयसी और कोई नहीं, मेरे ही मित्र की पत्नी थी. इस बात से आत्मग्लानि का तीव्र एहसास मन को व्यथित कर रहा था.
क्यों इंसान बेवजह गड़े मुर्दे उखाड़ता है? नियति तो उसके साथ सदैव भला ही करती है, तभी तो वक़्त बड़े से बड़ा ज़ख़्म भर देता है. फिर भी इंसान मूर्खतावश पुराने ज़ख़्मों को बेवजह कुरेदकर अपने घावों को हरा करता रहता है. क्या यह मेरी पत्नी अंजलि के प्रति मेरा विश्‍वासघात नहीं? अपने वैवाहिक जीवन को सफल व ख़ुशहाल बनाने के लिए पूरी ईमानदारी व पारदर्शिता से एक आदर्श पति का परिचय देते हुए अपने अफेयर के बारे में मैंने अंजलि को सब कुछ बता दिया था. सब कुछ सुनकर वह बिल्कुल भी विचलित नहीं हुई थी, न ही अपने वैवाहिक जीवन के प्रति आशंकित और भयभीत हुई थी. उसके अटूट प्रेम, विश्‍वास और सुलझे हुए व्यक्तित्व ने मेरी ज़िंदगी को ख़ुशियों से भर दिया था. यही नहीं, यह उसके प्रोत्साहन का ही नतीजा था कि लेखन के क्षेत्र में मेरा काफ़ी नाम हो गया था.

मुझे स्मरण हो आई पिछले वर्ष की एक घटना. पिछले वर्ष प्रकाशित मेरे एक नॉवेल को पढ़कर मेरी एक सहकर्मी जीना सीख गई थी. उसने घर आकर अंजलि और मुझे बताया था कि उसने घरवालों की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ प्रेम विवाह किया था, लेकिन शादी के दो माह पश्‍चात् एक कार एक्सीडेंट में उसके पति की मृत्यु हो गई. उसकी दुनिया उजड़ गई थी. जीने की इच्छा ही समाप्त हो गई थी. आर्थिक रूप से तो वह सक्षम थी, पर मानसिक रूप से स्वयं को असहाय महसूस कर रही थी. उस बुरे वक़्त में कोई उसकी मदद के लिए नहीं आया. पुरानी यादों में घिरे रहने के कारण वह डिप्रेशन की शिकार होती जा रही थी. ऐसे में ही एक दिन उसके पड़ोस में रहनेवाले एक बुज़ुर्ग ने उसे मेरा नॉवेल दिया, जिसे पढ़कर न केवल उसमें जीने की इच्छा जागृत हुई, अपितु उसने पुनर्विवाह भी कर लिया. अब वह बहुत ख़ुश थी और मेरे प्रति आभारी भी.
उस घटना को याद कर मेरा मन और भी विचलित हो उठा. तो क्या जीवन में आगे बढ़ने का संदेश देनेवाला लेखक स्वयं अपने मन की कमज़ोरियों का शिकार है? क्या लेखकों के दो रूप होते हैं? अपने भीतर कुछ और… और काग़ज़ों पर कुछ और. लेखक तो समाज का बेहद ज़िम्मेदार व्यक्ति होता है. उसकी रचनाएं समाज का आईना होती हैं. अपनी लेखनी के दम पर वह ऐसी कालजयी रचनाओं का सृजन कर सकता है, जो वर्षों लोगों का मार्गदर्शन कर सकें. और ऐसा वह तभी कर सकता है, जब वह पारदर्शिता से काम ले. उसकी कथनी और करनी में अंतर न हो. आत्ममंथन के उन क्षणों में मुझे इस यथार्थ की अनुभूति हुई कि बीता हुआ समय इतिहास होता है, जो कभी वापस नहीं आता. आनेवाला कल एक रहस्य है. स़िर्फ वर्तमान ही सत्य है. अपने बीते हुए कल से, व्यर्थ की उन स्मृतियों से मेरा मन अब ऊपर उठ चुका था. अब मेरा मन हृदय की गहराइयों से इस सत्य को स्वीकार कर रहा था कि अंजलि ही मेरा आज है. मेरा सत्य है. उसका प्रेम मेरी अंतरात्मा में रचा-बसा हुआ है. वही मेरी प्रेरणा है. अपनी कमज़ोरियों पर इंसान काबू पा ले, तो उसमें आत्मविश्‍वास जाग जाता है. मैं उठकर अंदर चला आया. अब मुझे जतिन से आंख मिलाने में तनिक भी संकोच नहीं हो रहा था. देर रात तक मैं जतिन और तनु से सहजता से बातें करता रहा और अगली सुबह अपनी अंजलि, अपनी प्रेरणा के पास पहुंचने के लिए जतिन के घर से निकल पड़ा.

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Meri Saheli Team :
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