कहानी- बंधन और मुक्ति 3 (Story Series- Bandhan Aur Mukti 3)

‘बस, हो गए पूरे सात जनम के वादे?’ नहीं, नहीं, ये वो क्या करने चली थी? शाश्वत से बेवफ़ाई. अचानक वही हवा, जो चंद मिनटों…

बस, हो गए पूरे सात जनम के वादे?’ नहीं, नहीं, ये वो क्या करने चली थी? शाश्वत से बेवफ़ाई. अचानक वही हवा, जो चंद मिनटों पहले दुलराती-सी महसूस हो रही थी, लगा कि अपने पूरे वेग के साथ यादों का सैलाब बहा लाई है. वो डूब रही है और सांस घुटने लगी है. फौज में तो उसे जाना ही था, तो अंतरंग पलों में अक्सर उसे बांहों में भरकर कहता, “मेरी देह न रहे, तो दुखी मत होना. जब मेरी याद आएगी, तो ख़ुशबू बनकर, हवा बनकर आ जाऊंगा.”

“नहीं, ये केवल निश्छल और निस्वार्थ स्नेह है. देख नहीं रही हूं क्या कि आप समाज सेवा का कोई मौक़ा छोड़ते नहीं, इसीलिए आपके लिए आदर है मेरे दिल में, मगर पति-पत्नी के रिश्ते में कुछ स्वार्थ भी होते हैं. वो समर्पण मैं दे नहीं पाऊंगी. और तो और मैं ये भी बर्दाश्त नहीं कर सकती कि मेरे बेटे के आगे से इनका नाम हट जाए. मैं उनके सपनों के लिए जीना चाहती हूं…” कहते हुए आवाज़ भर्रा आई थी और पलकें रुंध गईं थीं, पर सुकेश का उत्तर सुनकर अवाक रह गई थी.
“निश्छल स्नेह ही तो प्रेम की नींव है. मेरा स्नेह प्रेम में बदल चुका है. ऐसा मेरा दिल कहता है. आपके आदर को प्रेम में बदलने की प्रतीक्षा कर लूंगा.”
“और अगर ये बदलाव मेरे दिल में न आया तो?”
“मैं आपसे कोई अपेक्षा नहीं रखूंगा. बेटे के नाम के आगे उसके पिता का ही नाम होगा. और कुछ?” अवाक-सी रह गई थी सुहासिनी. प्रेम और त्याग की इस प्रतिमा से कुछ भी कहने को शब्द नहीं थे उसके पास.
सुकेश के प्रोत्साहन और प्रयत्नों से इस शहर में भी विद्यार्थी मिल गए और उसके संगीत की कक्षाएं चल निकलीं. सब घड़ी की सुइयों की तरह यंत्रवत से अपनी-अपनी ज़िम्मेदारियां निभाने लगे. लेकिन बाहर से पूर्ण और ख़ुशहाल दिखनेवाले परिवार के र‌थ के दोनों पहियों का तन्हा सफ़र मां की अनुभवी नज़रों से छिपा न था. वो समय-समय पर इशारों में समझाती रहतीं.
कुछ साल बाद पदोन्नति के बाद से सुकेश की नौकरी टूरिंग हो गई. उनके एक हफ़्ते के लिए बाहर जाने पर सुहासिनी ने पहली बार अपने दिल की कचोट को महसूस किया. और तभी से दिल में एक लड़ाई-सी छिड़ गई. सुकेश के घर में न होने का एहसास यूं मन को कचोटने लगता. नज़रें कार्निश पर रखी पूरे परिवार की तस्वीर में उनकी आंखों का अकेलापन देखकर आकुल होने लगती. उनके लौटनेवाले दिन हाथों ने जैसे बिना इजाज़त ख़ुद ही सिंगार कर कर दिया था उसका.
सुकेश लौटे तो अपलक देखते रह गए उसे और उसके दिल की धड़कन सातवें आसमान पर पहुंच गई. मौसम भी बहुत बेईमान था उस दिन. तय कर लिया था कि आज बरखा के मंद झकोरों के साथ अपने जज़्बात की फुहारें भी बरसा देगी सुकेश पर. सुर्ख रंग की जार्जेट की साड़ी पहनकर ख़ुद को आईने में निहार रही थी कि हवा के झोंके से बदन में सिहरन दौड़ गई. सारी खिडकियां खोलकर हाथ फैलाकर शीतल मंद पवन को महसूस कर रही थी कि शाश्वत की तस्वीर धड़ाम से ज़मीन पर आ गिरी और कांच पूरे घर में फैल गया.
कांच समेटने के लिए पहले तस्वीर उठाई, तो लगा शाश्वत व्यंग्य से मुस्कुरा रहा है.
‘बस, हो गए पूरे सात जनम के वादे?’ नहीं, नहीं, ये वो क्या करने चली थी? शाश्वत से बेवफ़ाई. अचानक वही हवा, जो चंद मिनटों पहले दुलराती-सी महसूस हो रही थी, लगा कि अपने पूरे वेग के साथ यादों का सैलाब बहा लाई है. वो डूब रही है और सांस घुटने लगी है. फौज में तो उसे जाना ही था, तो अंतरंग पलों में अक्सर उसे बांहों में भरकर कहता, “मेरी देह न रहे, तो दुखी मत होना. जब मेरी याद आएगी, तो ख़ुशबू बनकर, हवा बनकर आ जाऊंगा.”
तो क्या ये हवा?…

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उसके बाद से तो जैसे दिल कुरुक्षेत्र बन गया. सुकेश के साथ अकेले होने पर दिल उसकी आंखों में ख़ामोश इंतज़ार पढ़कर बंधने लगता, एक पीर उमड़ने लगती पर नजदीकियां बढ़ते ही शाश्वत की यादें कदम पीछे करने को बाध्य कर देतीं.
… उसे लेकर कितना पज़ेसिव था शाश्वत. किसी और के साथ नजदीकियां बर्दाश्त नहीं कर सकता था वो.
जाने कितनी ही बार सुकेश की निस्वार्थ देखभाल और ख़ामोश प्यार ने उसे अंदर तक झिंझोड़ दिया. पर क्या करे वो. शाश्वत का प्यार उसके मन में प्यार की उमंग जगाता था और सुकेश का प्यार ग्लानि. इस ग्लानि ने जितनी बार उसे सुकेश की ओर धकेला शाश्वत की किसी याद ने, किसी बात ने कदम वापस धकेल दिए.


भावना प्रकाश

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Usha Gupta

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