कहानी- बंधन और मुक्ति 4 (Story Series- Bandhan Aur Mukti 4)

सुहासिनी की आंखों में प्रश्न को गहराया देख बात आगे बढ़ाई थी उन्होंने, “शाश्वत को मुक्ति चाहिए बेटा और सुकेश को बंधन. जिसे बंधन चाहिए…

सुहासिनी की आंखों में प्रश्न को गहराया देख बात आगे बढ़ाई थी उन्होंने, “शाश्वत को मुक्ति चाहिए बेटा और सुकेश को बंधन. जिसे बंधन चाहिए उसे बांध ले और जिसे मुक्ति चाहिए उसे मुक्त कर दे. तुम दोनों की ही नहीं बंटी की भी भलाई इसी में है.”

इस बार जब सुकेश टूर से लौटे, तो सुहासिनी ने उनके सीने पर सिर रख दिया, पर आंखों में आंसू आ गए. जाने कैसे समझ गए सुकेश.

“… नहीं बनना मुझे फौजी मम्मा, मुझे प्रोफेसर बनना है. मुझे फोटोवाले पापा की तरह नहीं ‘अपने पापा’ की तरह बनना है.”
एक दिन बंटी ने अपना दिल खोला तो अवाक सुहासिनी के मन में झंझावात छोड़ गया. उसके अपने पापा फोटोवाले पापा थे उसके लिए और सुकेश अपने पापा?
पर ग़लत क्या कह रहा है बंटी उसे ‘अपने पापा’ कहकर. बंटी को ज़िंदगी तो सुकेश ने ही दी है. अगर उनका सावधान, बुद्धिमान और संवेदनशील साथ न होता, तो उस तूफानी आधी रात में ही जाने क्या हो गया होता.
व्हीलचेयर ख़रीदकर रखना, पांच मिनट में पहुंच सकनेवाली एम्बुलेंस के लिए और पास के अस्पताल में बात करके रखना और उसकी प्राथमिक चिकित्सा ख़ुद सीखना जैसे ज़रूरी काम उसकी तबियत के बारे में जानते ही पहले से करके रख लिए थे उन्होंने.
सुकेश ने ही पाला है उसे. अपनी सारी ममता उड़ेली है उस पर, बल्कि उनके एकाकी जीवन में वही तो एक रस है. फिर वो उनकी परछाईं बने तो आश्चर्य क्या!
अब कैसे प्रेरित करे वो बंटी को ‘उसके पापा’ का सपना पूरा करने के लिए. तो क्या वो अपने प्यार शाश्वत के प्रति अपना कोई कर्तव्य नहीं निभाएगी? शाश्वत ने उसे टूटकर प्यार किया. उसका हर सपना पूरा किया. पर क्या वो शाश्वत का एक सपना भी पूरा नहीं कर पाएगी?
इसी उहापोह में बैठी थी कि सासू मां ने फिर उसका हाथ कोमलता से अपने हाथ में ले लिया, “अंतिम संस्कार में एक रिवाज़ होता है, जो मेरे बेटे के साथ नहीं हो सका.” सुहासिनी की आंखें कुछ आश्चर्य के साथ सासू मां पर टिक गईं.
“ये अब क्यों बता रही हैं!”
“मृतक का पुत्र उसकी खोपड़ी पर वार करके उसे तोड़ देता है. इसके पीछे कारण ये है कि आत्मा का मोहभंग हो जाए और वो मुक्त हो सके. बंटी को अब ये रिवाज़ पूरा करने दे.”
सुहासिनी की आंखों में प्रश्न को गहराया देख बात आगे बढ़ाई थी उन्होंने, “शाश्वत को मुक्ति चाहिए बेटा और सुकेश को बंधन. जिसे बंधन चाहिए उसे बांध ले और जिसे मुक्ति चाहिए उसे मुक्त कर दे. तुम दोनों की ही नहीं बंटी की भी भलाई इसी में है.”

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इस बार जब सुकेश टूर से लौटे, तो सुहासिनी ने उनके सीने पर सिर रख दिया, पर आंखों में आंसू आ गए. जाने कैसे समझ गए सुकेश. उसका चेहरा अपने हाथों में लेकर हटाया और दोनों अंगूठों से बड़ी कोमलता से आंसू पोंछ दिए.
“मैंने सिर्फ़ प्यार किया है और बदले में सिर्फ़ प्यार ही चाहिए, कर्तव्यबोध नहीं.” मुस्कुराकर इतना बोलकर चले गए थे वो. और सुहासिनी सोचती रह गई थी कि उनके स्पर्श से मिलनेवाली ये पुलक सच है या पलकों में आनेवाले आंसू.


भावना प्रकाश

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Usha Gupta

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