कहानी- सिर्फ़ एहसास है ये…3 (Story Series- Sirf Ehsaas Hai Ye… 3)

मैंने पलकें हल्के से खोलीं, तो उनकी एकटक ख़ुद को निहारती आंखों में प्यार का ब्रह्मांड देखा. जाने कितनी आकाशगंगाएं समेटे वो आंखें बस खोई…

मैंने पलकें हल्के से खोलीं, तो उनकी एकटक ख़ुद को निहारती आंखों में प्यार का ब्रह्मांड देखा. जाने कितनी आकाशगंगाएं समेटे वो आंखें बस खोई हुई थीं. बहुत हौले से मेरे चेहरे पर झुके और कांपते होंठों से माथे पर एक चुंबन अंकित कर दिया. ये रोमांच लहू में तेज़ी से दौड़ने लगा और थोड़ी देर में ही मुझे इतनी गर्मी लगने लगी कि मैंने रजाई फेंक दी और खड़ी हो गई.

दीदी की शादी को एक साल हुआ था और भैया की शादी को दो. मम्मी-पापा भी शायद वर्षों से कहीं घूमने नहीं निकले थे. अति व्यस्त रुटीनी जीवनचर्या से निकालनेवाला ये सफ़र सबके लिए रिश्ते मज़बूत करने का बहाना बन गया. …मेरे और दोस्त के लिए भी. उन्हें एक-दूसरे में खोया देखकर मैं रूह के सानिध्य की लालसा लिए दोस्त का हाथ थाम लेती. आख़िर जो देखने आए थे, वो देखने में तो केवल हमारी रुचि थी. तो अक्सर हम अकेले ही निकलते और सबकी सोकर उठनेवाली अंगड़ाई तक हमारी एक ट्रिप ख़त्म भी हो जाती. मैं उनके साथ उड़ती रहती, बहती रहती. पहाड़ों के चप्पे-चप्पे से वाकिफ़ दोस्त का सारा ज्ञान समेटकर आंचल में भरती रहती. घाटी के साथ उनके मन की गहराइयों में उतरती रहती.
“आपने शादी क्यों नहीं की?”
“यायावर शादी नहीं करते. न ज़िंदगी का ठिकाना है, न ज़िंदगी जीने की सुविधाओं का. कौन लड़की मेरे साथ दर-दर भटकती भला.”
“आपको कभी किसी रूह के हमसफ़र की कमी महसूस नहीं होती.”
“तुमसे ये किसने कहा कि विवाह कर लेने से ही रूह का हमसफ़र मिल जाता है. और होने को वो कोई भी हो सकता है. क्या तुम मेरी रूह की हमसफ़र नहीं हो?”
ऐसे प्रश्न-प्रतिप्रश्नों पर हम देर तक एक हाथों में हाथ लिए होंठों से कुछ कहने की कोशिश करते, फिर एक-दूसरे की आंखों में शब्दों के परे का संवाद पढ़ मुस्कुरा देते.
“आपने कभी किसी से प्यार किया है?”
“हूं.”
“अरे! मुझे कैसे दिखाई नहीं दिया! बताइए न कौन है वो?” मैं उत्साह में कूद पड़ी, तो उनकी आंखें खो सी गईं.
“दिखता कैसे? वो तो एहसास है. एहसास दिखाई नहीं देते, सिर्फ़ महसूस किए जाते हैं, हवा की तरह, ईश्वर की तरह, ख़ुशबू की तरह…”
सबसे ऊंचे शिखर पर पहुंच हवा को बांहों में भरने के लिए दोनों बांहें फैलाकर देर तक खड़ी रहती, तो वे मुझे कंधों से पकड़े खड़े रहते. पत्थरों, चट्टानों पर पांव रखकर नदी पार करती, तो वे एक हाथ से एक कंधे से समेटकर दूसरे से दूसरी बांह मज़बूती से पकड़े रहते. वे दूर घाटी में उतरकर मेरे अक्वैरियम के लिए रंग-बिरंगे नायाब पत्थर चुनते और हरबेरियम फाइल के लिए फूल-पत्ते. अलग तरह के कलेक्शन बनाने का शौक था मेरा और उनका एकमात्र शौक था मेरा हर शौक पूरा करना. मेरी हर ख़्वाहिश पत्थर की लकीर थी उनके लिए.
मनोविज्ञान की उक्ति है- लड़का प्रेयसी में अनगिनत चीज़ें चाह सकता है, पर लड़की प्रेमी में बस इतना चाहती है कि वो उसे टूटकर चाहे. लौटने के बाद साल बीतना पता ही न चला. मेरे मन का विस्तार पूरी प्रकृति में फैल गया था. नदी अपने सागर से मिलने को आतुर प्रेमिका हो गई. हवाएं देवदारों को बांहों में समेटने को लहराती नायिका और लता अपने प्रियतम वृक्ष से लिपटी प्रेयसी. और दोस्त! वो सपनों के राजकुमार, जिसके एक स्पर्श से सोती सुंदरी जाग जाती है, जो उसे दुनिया के सारे कांटों से बचाकर रखता है और उसकी पलकों पर सजे हर ख़्वाब को हकीक़त में बदलता है.
… घाटी में उठनेवाले बवंडर की सांय-सांय की ध्वनियां दिल में भी बवंडर उठाने लगी थीं. इस तूफानी रात घर में अकेले होना दिल में रोमांच बनकर धड़क रहा था कि फोन की घंटी बज उठी थी. मम्मी का चिंता में डूबा स्वर था, “बेटा, लैंड-स्लाइड के कारण रास्ता बंद हो गया है. हम रात में नहीं पहुंच पाएंगे…” फोन कट गया था और डोरबेल बज उठी थी. इतनी रात में कौन हो सकता है! धड़कते दिल से दरवाज़े के बगलवाली ‌खिड़की खोली, तो देखा दोस्त. वो रात मेरे जीवन की सबसे ख़ूबसूरत रात बन गई.
दो-तीन घंटे हम हमेशा की तरह पूरे साल की अपनी-अपनी उपलब्धियां बतियाते रहे. खतों में लिख चुके होते थे, फिर भी आमने-सामने बैठकर बतियाने का आनंद ही कुछ और होता था. उन्होंने मुझे बर्फ में खिलनेवाले नायाब सफ़ेद कमल के बारे में बताया था. बस, मैं मचल गई.
“तूफानी बर्फीली रात, स्वर्ण-कमल के खिलने की ऋतु और आप का साथ, आज मुझे हर हाल में उस सरोवर तक चलना ही चलना है. प्लीज़, प्लीज़, प्लीज़!!”
मैं उनके गले में झूल गई. वो मेरा चेहरा अपने हाथों में पकड़कर कुछ देर देखते रहे फिर बहुत ही भावुक स्वर में बोले, “तुम जानती हो कि मैं तुम्हारी किसी बात को मना नहीं कर सकता.”
हम ऐसे तूफानी मौसम में पहने जानेवाले कपड़ों में पैक होकर निकल पड़े. गिरती बर्फ में सीधे तनकर खड़ा स्वर्ण कमल देख मैं विभोर हो गई. उनका कैमरा शायद कमल की हर प्रकार की फोटो ले रहा था और मैं उसे ऐसे अपलक देखे जा रही थी जैसे सदियों तक देखना चाहती हूं. उन्होंने बताया था कि ये बीस साल में एक बार खिलता है. बरसों से संजोई ख़्वाहिश पूरी होने की ख़ुशी मेरे रोम-रोम को आह्लादित किए जाती थी. महसूस हो रहा था कि वो मुझे एकटक देख रहे हैं और मेरी ये ख़ुशी उन्हें आह्लादित किए जाती है. लौटते समय मेरे पैर कांपते देख बहुत सालों बाद, शायद बीना आंटी के टोकने के बाद पहली बार उन्होंने मुझे बांहों में उठा लिया.

यह भी पढ़ें: पहला अफेयर: धुंध के पार (Pahla Affair: Dhundh Ke Paar)

मैंने बांहें उनके गले में डाल दीं, पलकें मुंदने लगीं और शरीर में रोमांच की सिहरन दौड़ गई. वो इसे ठंड का प्रकोप समझ घबरा गए. घर लाकर उन्होंने मुझे बिस्तर पर लिटाया, रजाइयां उढ़ाई, सिगड़ी जलाई और मेरे बूट्स उतारकर मेरे तलवे रगड़ने लगे. मेरे बहुत क़रीब थे वो. कभी तलवे सहलाते और कभी हथेलियां. उनके स्पर्श से जो स्पंदन मुझमें जागा, उसने मुझे सातवें आसमान पर पहुंचा दिया. मैंने पलकें हल्के से खोलीं, तो उनकी एकटक ख़ुद को निहारती आंखों में प्यार का ब्रह्मांड देखा. जाने कितनी आकाशगंगाएं समेटे वो आंखें बस खोई हुई थीं. बहुत हौले से मेरे चेहरे पर झुके और कांपते होंठों से माथे पर एक चुंबन अंकित कर दिया. ये रोमांच लहू में तेज़ी से दौड़ने लगा और थोड़ी देर में ही मुझे इतनी गर्मी लगने लगी कि मैंने रजाई फेंक दी और खड़ी हो गई. उन्होंने मुस्कुराकर मुझे देखा और सिर पर हाथ फेर दिया, “डरा ही दिया था. ज़िद्दी लड़की.”

भावना प्रकाश

अधिक कहानी/शॉर्ट स्टोरीज़ के लिए यहां पर क्लिक करें – SHORT STORIES

Share
Published by
Usha Gupta

Recent Posts

कहानी- सिर्फ़ एहसास है ये…5 (Story Series- Sirf Ehsaas Hai Ye… 5)

और प्यार? पापा की परिभाषा में आकर्षण! नहीं, आकर्षण तो जाड़ों की धूप की तरह…

कहानी- सिर्फ़ एहसास है ये…4 (Story Series- Sirf Ehsaas Hai Ye… 4)

“तुम मेरी रूह की हमसफ़र हो, तुम मस्तिष्क से मेरी समवयस्क भी हो, और ये…

कहानी- सिर्फ़ एहसास है ये…2 (Story Series- Sirf Ehsaas Hai Ye… 2) 

  धीरे-धीरे मेरे प्रश्न पकते गए और साथ में उनके उत्तर भी. मैं उनकी भेजी…

कहानी- सिर्फ़ एहसास है ये…1 (Story Series- Sirf Ehsaas Hai Ye… 1)

साल में एक बार आते और मेरी सारी अटपटी ख़्वाहिशों का पिटारा भरकर जाते. घाटी…

कहानी- बंधन और मुक्ति 5 (Story Series- Bandhan Aur Mukti 5)

"प्रेम का अविरल झरना तेरे आंगन में बह रहा है और अपने मन को सूखा…

कहानी- बंधन और मुक्ति 4 (Story Series- Bandhan Aur Mukti 4)

सुहासिनी की आंखों में प्रश्न को गहराया देख बात आगे बढ़ाई थी उन्होंने, “शाश्वत को…

© Merisaheli