कहानी- विजय-यात्रा 1 (Story Series- Vijay-Yatra 1)

उनके जीवन के बारे में सुना तो पहले भी था, पर सुनने और महसूस करने में अंतर होता है. उनकी कहानियां न सिर्फ़ उनके दर्द का आईना थीं, बल्कि दशकों के समाज की विसंगतियों और धीरे-धीरे आनेवाले सकारात्मक परिवर्तनों की गवाह भी. और इस गवाही का प्रयोग भविष्य में आनेवाले और सकारात्मक परिवर्तनों की उम्मीद जगाने, उनकी प्रेरणा बनने के लिए बख़ूबी किया गया था.

 

 

 

मेरी मित्र सुजाता का फोन आया कि उसके यहां गेट टुगेदर है, तो मुझे जैसे दर्द बांटकर मन हल्का करने का बहाना मिल गया. कैब में बैठकर भी मेरा मन खीझे जा रहा था. जब कोई व्यवसायी, किसी सीधे-सादे ग्राहक को ढगता है, तो वो केवल उसके धन को ही नहीं, भरोसे को भी लूटकर ले जाता है.
कितनी ख़ुश थीं दादी जब उनकी अनुपम कहानियों के संग्रह, जीवन और समाज के अनबूझे पहलुओं के सुंदर से आईने को प्रकाशित करवाने के उनके वर्षों से संजोए ख़ामोश सपने को जानते ही मैंने उसे पूरा करने का वादा किया था.
कहने को ‘अच्छी’ दादी केवल क्रेच की आया हैं, जिन्होंने मुझे भी पाला है और मेरे बच्चों को भी, पर मेरे लिए वो क्या हैं, ये मैं ही जानती हूं.
किसी के भी आंसू पोंछने को हर पल तत्पर, पचासी की उम्र में भी क्रेच की केयर टेकर के रूप में काम करते हुए परायों की ज़िंदगी में अपनापन घोलनेवाली दादी सोशल मीडिया पर सक्रिय हैं और उनके पाले हर उम्र के बच्चे उनके फॉलोअर. हज़ारों की प्रेरणा और मानसिक संबल हैं वो. मैं गौरव महसूस कर रही थी कि उनकी एकमात्र अभिलाषा का पता मुझे चला.
उनके जीवन के बारे में सुना तो पहले भी था, पर सुनने और महसूस करने में अंतर होता है. उनकी कहानियां न सिर्फ़ उनके दर्द का आईना थीं, बल्कि दशकों के समाज की विसंगतियों और धीरे-धीरे आनेवाले सकारात्मक परिवर्तनों की गवाह भी. और इस गवाही का प्रयोग भविष्य में आनेवाले और सकारात्मक परिवर्तनों की उम्मीद जगाने, उनकी प्रेरणा बनने के लिए बख़ूबी किया गया था.
जैसे-जैसे उनके जीवन के पन्ने मेरे सामने उनकी नज़र से खुलते गए मैं भावुक होती गई. पांच साल की उम्र में मां को, पंद्रह की उम्र में पिता को, फिर शादी के कुछ साल बाद ही पति को खो देने की पीड़ा, ससुराल द्वारा बरसों की सेवा और त्याग के पुरस्कार स्वरूप ‘मनहूस’ की उपाधि देते हुए घर से निकाल दिया जाना… फिर नितांत अकेले आत्मसम्मान की रक्षा करते हुए सम्मानजनक नौकरी पाने का संघर्ष…

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मैं पढ़ती गई, रोती गई. फिर उनकी कहानियों के लिए प्रकाशक ढूंढ़ने में जुट गई. नेट पर कई सेल्फ पब्लिशिंग हाउसेस से बात करने के बाद मैंने एक ऐसे प्रकाशन हाउस को चुन लिया, जिसके मार्केटिंग मैंनेजर ने मुझे प्रकाशन की बारीकियां और अपनी ख़ूबियां सबसे अच्छे तरीक़े से समझाई थीं. कई पन्नो की मेल सरसरी तौर पर पढ़कर और कई फोन कॉल्स पर सब कुछ समझकर ऑनलाइन सहमति पत्र पर हस्ताक्षर कर पेशगी रकम दे दी.
लेकिन पेशगी रकम देते ही परिदृश्य बदल गया. पहले दिन में दस बार मैं फोन अटेंड करती थी कि क्या सोचा? और अब दिन में दस बार फोन करती थी कि कवर डिज़ाइनिंग टीम सम्पर्क क्यों नहीं कर रही, फ़ार्मेटिंग करनेवाले का नंबर बता दीजिए, मैं ही बात कर लूं… पहले तो मेरे फोन उठते ही नहीं, उठते तो हर बार नए बहाने, पर मैं भी ठहरी जुनूनी. कुछ ठान लिया, तो बात दिमाग़ में अटक ही जाना मेरे स्वभाव का हिस्सा है. तो काम रगड़-घिस कर आगे बढ़ रहा था.

अगला भाग कल इसी समय यानी ३ बजे पढ़ें…

भावना प्रकाश

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