काव्य- कैनवास के रंग (Kavay- Canvas Ke Rang)

चित्र में रंग भर, मंत्रमुग्ध-सादेख रहा था, कैनवास कोअंदर ही अंदर मेरा दंभमुझे शाबाशी दे रहा थाऔर जैसे पूछ रहा थाक्या कोई है, तेरे जैसा…

चित्र में रंग भर, मंत्रमुग्ध-सा
देख रहा था, कैनवास को
अंदर ही अंदर मेरा दंभ
मुझे शाबाशी दे रहा था
और जैसे पूछ रहा था
क्या कोई है, तेरे जैसा कलाकार
कितने ही नाम, कौंध गए ज़ेहन में मेरे
पर हर नाम मुझे, स्वयं से छोटा ही लगा
तभी एक रंगबिरंगी तितली
कहीं से आकर बैठ गई कैनवास पर
पलभर में हो गए जैसे
कैनवास के रंग फीके
अब मेरा दंभ, मुझसे ही
नज़रें चुरा रहा था… 

– रेनू मंडल

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रेनू मंडल
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Published by
Usha Gupta

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