नज़्म- मुहब्बत (Nazam- Mohabbat…)

मुहब्बत इस जहां के जर्रे जर्रे में समाई है मुहब्बत संत सूफी पीर पैगम्बर से आई है कोई ताकत मिटा पाई नहीं जड़ से मुहब्बत…

मुहब्बत इस जहां के जर्रे जर्रे में समाई है
मुहब्बत संत सूफी पीर पैगम्बर से आई है
कोई ताकत मिटा पाई नहीं जड़ से मुहब्बत को
मुहब्बत देवताओं से अमर वरदान लाई है

मुहब्बत बहन की राखी है भाई की कलाई है
मुहब्बत बाप के आंगन से बेटी की विदाई है
मुहब्बत आमिना मरियम यशोदा की दुहाई है
मुहब्बत बाइबिल गीता और कुरान से आई है

मुहब्बत दो दिलों की दूरियों में भी समाई है
ये नफ़रत के मरीज़ों की बड़ी बेहतर शिफ़ाई है
मुहब्बत टूटते रिश्तों के जुड़ने की इकाई है
मुहब्बत मीरा की भक्ति है ग़ालिब की रूबाई है

मुहब्बत झील की गहराई पर्वत की ऊंचाई है
मुहब्बत इश्क ए दरिया का समंदर में मिलाई है
मुहब्बत आसमां में कहकशां बन कर के छाई है
मुहब्बत ढूंढ़ कर धरती पे हर जन्नत को लाई है…

अखिलेश तिवारी ‘डॉली’

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Usha Gupta

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