रंग तरंग- दिल और दिमाग़ के बीच आर्टिफिशियल हार्ट  (Satire- Dil Aur Dimag Ke Bich Artificial Heart)

ज़रा सोचिए, जिस इंसान को यह पता चलेगा कि उसने उस डॉक्टर से पेस मेकर लगवाया है जो डुप्लीकेट पेस मेकर लगाता है, तो उसका दिल नहीं टूटेगा. उसे तो यह सोच कर ही दोबारा हार्ट अटैक आ जाएगा कि बड़ी मुश्किल से किसी तरह नकली दिल लगवाने का जुगाड़ किया था, अब वह डुप्लीकेट निकल गया, तो उसे रिप्लेस करने के लिए पैसे और खून कौन देगा..? इस बार तो मेडिक्लेम वाले भी हाथ खिंच लेंगे. कहीं ऐसा न हो पुराने क्लेम की फाइल फिर से ओपन कर दें.

जब से मैंने सुना कि एक डॉक्टर ने हज़ारों मरीज़ों को नक़ली आर्टिफ़िशियल दिल लगा दिया, तब से मेरा दिमाग़ चकराया हुआ है. चकराया क्या हिल सा गया है. मैं कुछ सोच-समझ नहीं पा रहा हूं. इस चक्कर में दिन में कई बार सीने पर हाथ रख कर हार्ट बीट्स चेक करता हूं, धड़क तो रहा है.
यक़ीनन इसके बाद इश्क़ पर से मेरा भरोसा उठ सा गया है. मुझे अब इस बात में कोई सार नज़र नहीं आता कि अपने महबूब या आशिक़ को देख कर दिल की धड़कन बढ़ जाती है. सच पूछिए तो अब यह सब बड़ी वाहियात बातें लगने लगी हैं. अपना वाला दिल सही सलामत चलता रहे, मेडिकल टर्म में धड़कता रहे, वही बहुत है. भगवान न करे हार्ट बीट लिमिट क्रॉस करे और आर्टिफिशियल की नौबत आए.
खैर मामला नकली आर्टिफिशियल दिल का हो, तो सच यह है कि बड़ा ख़राब ज़माना आ गया है. मतलब आज के ज़माने में लोगों का दीन-ईमान नहीं बचा. लाहौल विला कूवत ऐसे लोगों को ख़ुदा कभी माफ़ नहीं करेगा, जिन्होंने अनजाने ही हमारे जज़्बातों की दुनिया लूट ली. यह हाल तो तब है, जब अभी मेरे सीने में असली दिल है ,आई मीन प्योर गोल्ड हार्ट.
मेरी बात को समझने की कोशिश करिए यानी अब मुझे आपको बताना ही पड़ेगा कि यह ख़ालिस असली दिल, मेरा मतलब ‘प्योर गोल्ड हार्ट क्या होता है.
चलिए मुद्दे को एक्सप्लेन करता हूं. ज्वेलरी और आर्टिफिशियल ज्वेलरी तो हम सभी जानते हैं, जैसे जो प्योर गोल्ड नहीं ख़रीद पाते या जो लोग शुद्ध सोने के जेवर ख़रीदते भी हैं, तो वे झपटमारों के चक्कर में उसे लॉकर के हवाले करके उस जैसा दूसरा आइटम पहनते हैं, जो गोल्ड तो नहीं होता, लेकिन दिखता हूबहू सोना है. उसे आर्टिफिशियल ज्वेलरी कहते हैं.
आप आर्टिफिशियल ज्वेलरी को नकली सोना नहीं कह सकते. एक तरफ सोना, तो खरा सोना है, तो दूसरी तरफ़ आर्टिफिशियल ज्वेलरी का अपना बाज़ार है, जो धड़ल्ले से चल रहा है.
भरोसा न हो तो आप किसी मोहतरमा जिसने आर्टिफिशियल ज्वेलरी पहनी हो, उसे कहकर तो देखिए कि “इसने नकली सोना पहना है…” यक़ीन मानिए इतना कहते ही आप किसी को मुंह दिखाने के काबिल नहीं रहेंगे. आपको वहीं खड़े-खड़े कुछ इस तरह से धो दिया जाएगा जैसे आप निपट अनपढ़-अनाड़ी क़िस्म के इंसान हैं. जिसे दीन-दुनिया का कुछ पता ही नहीं है. बड़े-बड़े जलसे और सभा-सोसायटी में ऐसी ज्वेलरी को बड़ी नफ़ासत के साथ उजागर किया जाता है.
जैसे महिलाएं एक-दूसरे से पूछती नज़र आती हैं, “बहन बड़ा ख़ूबसूरत लग रहा है ये हार कब बनवाया?” और तब जो उसे पहने होती है वह भी बड़ी नफ़ासत से हंसते हुए कहती है, “अरे कहां अभी कल ही चांदनी चौक से लाई हूं, ज़्यादा महंगा नहीं हैं.”

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और तब पूछने वाली कहेगी, “हाय सच्ची!.. एकदम असली लग रहे हैं. मैं तो भरोसा नहीं कर सकती कि ये आर्टिफिशियल है. सुन अगली बार जाना, तो मेरे लिए भी लेती आना.“ जबकि दोनों को पता है कि वह आर्टिफिशियल ज्वेलरी है. लेकिन उस ज्वेलरी को नकली सोना कहना आर्टिफिशियल ज्वेलरी की तौहीन से ज़्यादा, पहननेवाले की तौहीन है.
और अब अगर आप इस आर्टिफिशियल ज्वेलरी को नकली सोना कह दें, तो यक़ीन मानिए किसी ख़ूबसूरत निगाह से क़त्ल हो जाएंगे. इसके बाद तो आगे के लिए अपनी लाइफ में किसी से भी रोमांस का स्कोप ख़त्म समझिए. आप लेडीज के बीच एक बेवकूफ़ इंसान की तरह फेमस हो जाएंगे, जिसे ज़िंदगी की समझ ही नहीं है.
ज़रा ठहरिए, मैं शायराना निगाहोंवाले क़त्ल की बात नहीं कर रहा हूं, यह वह खून है, जो लाल आंखों से घूर कर कर किया जाता है. यह क़त्ल क्राइम पेट्रोल के क़त्ल से कतई कम नहीं है, बस फ़र्क़ इतना है कि क़त्ल होनेवाले को अपने भीतर ख़ुद के मर जाने का एहसास पैदा हो जाता है, जबकि क़ातिल बेगुनाह ही रहता है.
मुझे यक़ीन है अब आप आर्टिफिशियल और नकली के फ़र्क़ को समझ चुके होंगे.
चलिए आगे बढ़ता हूं… नक़ली क्या है इसे समझने के लिए नोट पर आइए. जैसे चूरनवाला नोट, नकली नोट है, ठीक वैसे ही जैसे जिस नोट पर गांधीजी का चित्र न हो या फिर सिल्वर धागा न दिखे, वह नक़ली होता है. ऐसा नोट किसी भी हाल में नहीं चलता है. मुझे भरोसा है अब आप आर्टिफिशियल और नकली के फ़र्क़ को समझ गए होंगे.
चलिए इस फ़र्क़ को समझ लेने के बाद अब मैं इस दिल आर्टिफिशियल हार्ट और नकली दिल की कहानी पर आता हूं.
हम सभी जानते हैं जब इंसान का असली दिल धोखा देने लगता है, तो उसे पेस मेकर लगा देते हैं. असली दिल मतलब आदमी के शरीर में वह हृदय, जो पूरे शरीर में खून पंप करता है. वैसे जो प्यार-मोहब्बत में तड़पता है, शायरी करता है, वह भी असली दिल ही है, जो दिखाई नहीं देता. यह बात मुझे लिखनी पड़ेगी, वरना मेरे बहुत से शायर भाइयों का दिल टूट जाएगा.
खैर पेस मेकर का मतलब आर्टिफिशियल दिल होता है, नकली दिल नहीं. यह वह आर्टिफिशियल दिल है, जो असली पंपिंग करनेवाले दिल का काम कर शरीर में खून भेजता है, जिससे हार्ट अटैक के बाद भी इंसान का काम चलता रहे.
अभी हाल ही में हुआ यह कि किसी महान डॉक्टर ने हज़ारों मरीज़ में इस आर्टिफिशियल दिल का डुप्लीकेट नकली दिल लगा दिया. आई मीन नकली पेस मेकर लगा दिया. डुप्लीकेट तो आप सब जानते ही हैं जैसे कॉमेडी शो के कलाकार, जो असली हीरो एफोर्ड नहीं कर पाते, वे कॉमेडी शो में बड़े हीरो के डुप्लीकेट ले आते हैं पब्लिक को हंसाने के लिए.
अब गंभीरता से सोचिए इंसान की जान जोख़िम में डालते हुए हमारे देश के कलाकार लोगों ने आर्टिफिशियल हार्ट (पेस मेकर) का डुप्लीकेट नकली दिल बना डाला. भला यह भी कोई बात हुई. गोया इंसान का  दिल न हुआ डॉक्टर ने इसे खिलौना समझ लिया. मुझे इस मोड़ पर
संजीव कुमार याद आ रहे हैं, “खिलौना जान कर तुम तो मेरा दिल तोड़ जाते हो.“

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ज़रा सोचिए, जिस इंसान को यह पता चलेगा कि उसने उस डॉक्टर से पेस मेकर लगवाया है जो डुप्लीकेट पेस मेकर लगाता है, तो उसका दिल नहीं टूटेगा. उसे तो यह सोच कर ही दोबारा हार्ट अटैक आ जाएगा कि बड़ी मुश्किल से किसी तरह नकली दिल लगवाने का जुगाड़ किया था, अब वह डुप्लीकेट निकल गया, तो उसे रिप्लेस करने के लिए पैसे और खून कौन देगा..? इस बार तो मेडिक्लेम वाले भी हाथ खिंच लेंगे. कहीं ऐसा न हो पुराने क्लेम की फाइल फिर से ओपन कर दें.
चलिए इसके आगे बात की गहराई में उतरते हैं. आप जानते हैं दिल और दिमाग़ के बीच आर्टिफिशियल दिल लगाया जाता है अर्थात पेस मेकर लगाने के दौरान इंसान के दिल और दिमाग़ में जो संघर्ष चलता है, इसे वही समझ सकता है, जो इस पेस मेकर को लगवाने के दौर से गुज़रा हो. ऐसे पेशेंट को डॉक्टर साफ़ बता देता है, “देख लीजिए या तो पेस मेकर लगेगा या फिर कुछ दिन में कभी भी दी एंड हो सकता है.” पॉलिसी बाज़ार के एड की तरह.
तब बिस्तर पर पड़ा मरीज़ जिस कि बॉडी में एंजियोग्राफ़ी की निडिल पड़ी है उसे जीते जी यमराज के दर्शन होने लगते हैं. उसे लगता है यदि इस मौक़े पर उसे यमराज से कोई बचा सकता है, तो वह अभी धरती पर भगवान स्वरूप मौजूद यह डॉक्टर है.
वह ऐसी स्थिति में रोते-गिड़गिड़ाते डॉक्टर के चरण पकड़ लेता है और कहता है, “डॉक्टर साहब, बस इस बार बचा लीजिए. भगवान क़सम खा कर कहता हूं, अब ज़िंदगी में कोई बुरा काम नहीं करूंगा, कोई बेईमानी नहीं करूंगा, किसी को धोखा नहीं दूंगा, कभी किसी को नहीं सताऊंगा, पत्नीव्रता बन कर रहूंगा, सपने में भी कोई चक्कर नहीं चलाऊंगा इत्यादि मतलब अचानक उसके भीतर सदाचार के लेसन हिलोरें मारने लगते हैं.

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तब वह मन में कहता है, “हे प्रभु, बस अबकी बार बचा लो. यह समझो इसके बाद यह जीवन आपको समर्पित है. रात-दिन आपकी पूजा करूंगा. ध्यान-अर्चना करूंगा. मतलब किसी भी इंसान के भीतर ऐसी परिस्थिति में दिव्य आत्मा का उदित हो जाना स्वाभाविक है. भले ठीक होने के कुछ दिन बाद इंसान अपनी फ़ितरत के कारण अपने ओरिजनल फार्म में लौट आए.
ऐसे में वह कहता है, ” प्रभु आपको जो कुछ डालना हो,  फटाफट मेरे सीने में डाल दो, बस किसी तरह मुझे बचा लो.”
अब आप समझ सकते हैं ऐसी इमोशनल हालत में अगर कोई डॉक्टर मरीज़ के साथ छल करे, उसे धोखा दे, उसके सीने में आर्टिफिशियल हार्ट की जगह  डुप्लीकेट आर्टिफिशियल हार्ट लगा दे, तो कितनी बड़ी दिल टूटने की बात है…
खैर मैं अभी भी इस डॉक्टर के फेवर में खड़ा हूं. अगर यह डुप्लीकेट आर्टिफिशियल हार्ट की टेकनीक सफल साबित हो जाए, तो उसमें भी कोई हर्ज नहीं है. उसे इस डुप्लीकेट पेस मेकर का पेटेंट करा लेना चाहिए और पूरी ईमानदारी के साथ अब जीवन में नेक काम करते हुए इस डुप्लीकेट पेस मेकर को सस्ते दामों में गरीब लोगों को उपलब्ध कराना चाहिए.

नोट- यह रचना किसी डॉक्टर या मेडिकल प्रोफेशन का मज़ाक उड़ाने के लिए नहीं लिखी गई है और मेरा दृढ़ विश्वास है कि किसी एक व्यक्ति या घटना से पूरा समाज ग़लत नहीं होता है. मैं मेडिकल प्रोफेशन और डॉक्टर्स का सम्मान करता हूं.

– मुरली मनोहर श्रीवास्तव

Photo Courtesy: Freepik

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Usha Gupta

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