व्यंग्य- डाॅगी कल्चर (Satire Sto...

व्यंग्य- डाॅगी कल्चर (Satire Story- Doggy Culture)

तुम समझती क्यूं नहीं, मैं आधुनिक युग के डाॅगी कल्चर की बातें कर रहा हूं. जहां यह डाॅगी भी घर के फैमिली मेंबर की तरह रहते हैं. जो अपने यहां के सर्वहारा कुत्तों की तरह होमलेस नहीं होते हैं. यहां के डाॅगी हमारे यहां के देसी कुत्तों की तरह बदतमीज़ और बददिमाग़ भी नहीं होते कि किसी को नए फैशन के या अलग डिज़ाइन के कपड़ों में भी देख लें, तो भौंक-भौंक कर उसका हाल बेहाल कर दें.

सिंगापुर के सन्टोसा के समुद्रतट पर शर्माजी अपनी पत्नी के साथ पहुंचे, तो वहां छुट्टी का दिन होने के कारण अच्छी-ख़ासी भीड़ थी. सिंगापुर में रहनेवाले यूरोपियन और विदेशी लोग अपने-अपने परिवार, जिसमें कुत्ते भी शामिल थे, सब एक साथ मिलजुल कर स्नान कर रहे थे. शर्माजी वहीं बैठ पानी में स्नान करती बालाओं के साथ, स्नान करते कुत्ते को देखने में ऐसे व्यस्त थे कि होश ही नहीं रहा कि उनकी नज़रों की हरकतें, बगल में बैठी पत्नी के दिमाग़ पर कुछ ऐसा असर डाल रहा था कि वह कभी भी करारी चोट कर सकती थी. पत्नी के मूड का पता चलते ही उनका तनावरहीत दृश्याअवलोकन, तनावपूर्ण हो गया. वह पत्नी की तरफ़ देखकर सूखी हंसी हंसते हुए बोले, ‘‘कैसे ऊन के गोले जैसे मुलायम बालोंवाले डॅागी यहां स्नान कर रहे हैं. जितने ही प्यारे-प्यारे डाॅगी है, उतने ही प्यार और अदा से उनकी मालकिन, उन्हे मुलायम तौलिया से सुखा भी रही है. जानवरों के प्रति अद्भूत प्रेम का ऐसा अनूठा उदाहरण देख मन तृप्त हो गया.’’
“वो तो मैं देख ही रही हूं कि किस कदर ऊन का गोला बनने को बेहाल हो. ऐसा प्यार तो कभी पटना में जानवरों के प्रति दिखा नहीं. घर आए चूहें, बिल्लियों और कुत्ते के पीछे लट्ठ लेकर ऐसे पड़े रहते हो, जैसे आंतकवादियों के पीछे हमारे देश के जवान लगे रहते हैं. अगर ग़लती से भी कोई जानवर तुम्हारे आसपास आ जाए, तो उसकी खैर नहीं. फिर यहां आकर अचानक यह पशु प्रेम कहां से उमड़ा? कही फिरंगी बालाओं का रंग तो नहीं चढ़ गया?’’
‘‘तुम महिलाओं की भी ग़ज़ब फ़ितरत होती है. किसी महिला पात्र के पक्ष में पति के मुंह से दो शब्द निकले नहीं कि उसका चरित्र ही संदेह के घेरे में लाकर खड़ा कर देती हो. तुम समझती क्यूं नहीं, मैं आधुनिक युग के डाॅगी कल्चर की बातें कर रहा हूं. जहां यह डाॅगी भी घर के फैमिली मेंबर की तरह रहते हैं. जो अपने यहां के सर्वहारा कुत्तों की तरह होमलेस नहीं होते हैं. यहां के डाॅगी हमारे यहां के देसी कुत्तों की तरह बदतमीज़ और बददिमाग़ भी नहीं होते कि किसी को नए फैशन के या अलग डिज़ाइन के कपड़ों में भी देख लें, तो भौंक-भौंक कर उसका हाल बेहाल कर दें. जिनका जीवन ही बिल्लियों और गिलहरियों पर भौंकने और एक अदद टाट के टुकड़े पर गुज़र जाती है, उनकी तुलना तुम इन विदेशी नस्ल के डाॅगी से कर रही हो.

Satire Story

इनका जीवन ही एसी में सोने और कार में घूमने से शुरू होता है. देख ही रही हो न, इन्हें कितने प्यारे-प्यारे नामों से बुलाया जा रहा है. कुछ डाॅगी ने तो कपड़े भी पहन रखे हैं और बच्चों की तरह. कई इन सुंदरियों के गोद में चिपके हुए हैं, तो कई कंधों पर लटके हुए हैं.”
‘‘इन चोंचलों से क्या होता है. कुत्ता तो कुता ही रहेगा, चाहे किसी देश का हो. यहां की फिरंगी बालाएं ख़ुद कपड़े पहनने से तो रहीं, कुत्ते को ही पहनाकर ख़ुश हो लेती हैं, यही बहुत है. जहां तक बच्चों का सवाल है, इनकी फ़ितरत ही नहीं होती है अपने बच्चे को गोद में बैठाने की, पर पशु प्रेम के नाम पर कुत्ते को ज़रूर गोद में बैठाएंगी.’’

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‘‘तुम्हे समझाना बेकार है. तुम्हे इन डॅागियों की जानकारी ही नहीं हैं, वरना इतने प्यारे-प्यारे नामों वाले इन डाॅगियों को कम से कम कुत्ता कहकर अपमानित नहीं करती.”
अब उनकी पत्नी का संयम जवाब देने लगा था, “अब लो सुनो इनकी बात… कुत्ता को कुता न कहूं, तो और क्या कहूं जी! जहां तक मेरी जानकारियों का सवाल है, उसे तो तुम चुनौती दो ही मत. क्योंकि तुम्हे शायद पता नहीं, जितना कुत्ता यहां बालाओं की गोद में नज़र आ रहा है, उससे दोगुने कुत्ते तो मेरे नाना आदित्य बाबू के घर के दरवाज़े पर बैठे नज़र आते थे.’’
‘‘भला वो क्यों? क्या तुम्हारे नानाजी, कुत्तों का व्यापार करते थे?’’
‘‘चुप करो, यह उनका पशु प्रेम था. वह आसपास रहने वाले उन सर्वहारा कुत्तों को बचाने के लिए बहुत काम करते थे. यहां तक की उनके लिए लंगर चलवाते थे, ताकि उन्हे घूरे पर अपना भोजन खोजना ना पड़े. उनके घर से पचास-पचास कोस तक लोग उनके कुत्ता प्रेम की चर्चा करते थे.’’
‘‘तब तो लोग अपने बच्चों को यह भी कहते होंगे कि सो जा, नहीं तो आदित्य बाबू के कुत्तें भौंकने लगेंगे.’’
‘‘जी नहीं ऐसा कुछ नहीं कहते थे. वह शुरू से ही बेज़ुबानों की देखभाल करते थे, इसलिए लोग उनका सम्मान करते थे. तुम मेरा मज़ाक उड़ाने की कोशिश मत करो, क्योंकि तुम्हारी अपनी ही सारी जानकारियां आधी-अधूरी है.’’
‘‘और तुम्हारी जानकारियां सिर्फ़ उन लावारिस और सर्वहारा देसी कुत्तों तक सीमित है.”
‘‘ख़बरदार जो मेरे नानाजी के कुत्तों को तुमने लावरिस और सर्वहारा कहा. तुम्हे पता भी है मेरे नानाजी जिस किसी भी कुत्ते को घर में पालते थे, वे सभी काफ़ी बढ़िया नस्ल के कुत्ते होते थे. पूरी तरह उच्चवर्गीय. उनकी धीमी गुर्राहट और सधी चाल में उच्चवर्गीय रोब देख, लोगो के पसीने छूट जाते थे. उनकी एक ख़ासियत और होती थी कि जैसा उनके पालनहार का स्वभाव होता, वही स्वभाव वे कुत्ते भी अपना लेते थे. वहां एक-दो कुत्ते नहीं थे. घर के ज़्यादातर सदस्यों ने अपनी-अपनी पसंद के हिसाब से अपने लिए कुत्ते पाल रखे थे.”
‘‘फिर भी तुम्हे मेरी जानकारियों पर संदेह है, तो तुम्हे बता दूं कि नानाजी ने ख़ास अपने लिए एक कुत्ता पाल रखा था शेरू. उसे उन्होंने नेपाल से मंगवाया था. उसकी शक्ल-सूरत तो नाम के अनुकूल ही था, पर स्वभाव पूरी तरह नानाजी पर था. नानाजी की तरह ही धीर-गंभीर शांत और कम बोलनेवाला. जब घर के बाहर आहाते में, घर के सारे कुत्ते, दुश्मन की आशंका पा, अपनी पूरी ताकत लगा भौंकते रहते, शेरू बरामदे में खड़ा-खड़ा सब का निरीक्षण करते रहता. फिर दो-चार बार भौंक कर उन्हे भौंकते रहने की प्रेरणा दे, वापस आकर नानाजी के आराम कुर्सी के नीचे बैठ जाता.”
‘‘उसका यह रवैया, छोटे नानाजी के कुत्ते बहादुर को पूरी तरह नापसंद होता. मौक़ा मिलते ही वह शेरू पर झपट पड़ता. छोटे नानाजी नानाजी के भाई लगते थे और उनके बिज़नेस में हाथ बंटाते थे. जितने वह ख़ुद ईर्ष्यालु और झगड़ालू थे, उनका बहादूर भी उनसे ज़रा सा भी उन्नीस नहीं था. घर के सभी कुत्तों पर अपना रोब बनाए रखने के लिए बात-बेबात दूसरे कुत्तों पर गुर्राता रहता था. अजनबियों पर भौंकता, तो बहुत तेजी से था, पर जैसे ही कुछ मार कुटाई की आशंका होती सभी कुत्तों को आगे कर ख़ुद पीछे जाकर दुबक जाता. पर वैसे दिनभर घर के दूसरे कुतों से लड़ते-झगड़ते रहता था. ख़ासकर मौसी के कुत्ता पप्पी से खार खाए रहता. मौसी का कुत्ता पप्पी, मौसी का लाडला तो था ही उनकी ही तरह पूरे ठाठ-बाट से रहता भी था.

मौसी उसके लिए तरह-तरह के बिस्किट लातीं और घर पर भी उसके लिए उसकी पसंद का मांसहारी भोजन बनवाती, जो सिर्फ़ उसे ही खाने को मिलता. उसके शैम्पू, साबुन सब दूसरे कुत्तों से अलग होते. उसकी प्यारी-सी सूरत देख, सभी उसे प्यार से सहलाते रहते. जिससे घर के दूसरे कुत्ते उससे खार खाए रहते. जब भी वह अकेला मिलता, उसे काट खाते, ख़ासकर बहादुर हमेशा उसके पीछे लगा रहता. शायद उसे लगता एक ही वर्ग का होकर यह हमें ठसक दिखाता है. हम लोंगो से ज़्यादा सुविधा मिल जाने से यह पाखंडी, तरह-तरह के ढोंग कर घर के सभी लोगों का प्यार पाता है. इसलिए बहादुर हर समय तना रहता और मौक़ा मिलते ही काट खाता. इतना ही नहीं पड़ोस का पप्पू भी मौक़ा मिलते ही पप्पी को मारता-पिटता रहता, क्योकि उसके नाम से मिलता-जुलता नाम होने के कारण सब उसे चिढ़ाते रहते.’’
“नानी ने भी एक कुत्ता पाल रखा था, जिसका नाम उन्होने सुलतान रखा था. लेकिन सुलतानों वाली कोई बात उसमें नहीं थी. वह नानी मां की तरह ही सरल था और हमेशा काम में व्यस्त रहता. कभी वह मासी के बेटा के साथ गेंद खेलता, तो कभी मामा के बेटी के साथ खेलता.कभी बहादुर का ग़ुस्सा शांत करने के लिए अपनी रोटी भी उसे दे देता. पूरी तरह नानी की तरह सब का ख़्याल रखता.’’

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पत्नी से उलझकर शर्माजी ने ख़ुद अपनी शामत बुला ली थी. उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि पत्नी को कैसे चुप करवाएं. वह साष्टांग दंडवत करते हुए बोले, ‘‘बस बस… अब बस भी करो. मैं मान गया, तुम महान हो और महान ही बनी रहो. मुझे अपनी लघुता स्वीकार करने में कोई संकोच नहीं है, इसलिए अब अपनी नानी घर की कहानी बंद करो. आज से और अभी से मैं प्रण करता हूं कि कभी भूल कर भी तुम्हे चुनौती नहीं दूंगा.”
तब कहीं जाकर कुत्तों की कहानी बंद हुई और वह सेन्टोसा के दूसरे समुद्री तटों का अवलोकन कर पाएं.

Rita kumari
रीता कुमारी
Kahaniya
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