कहानी- दिल ढूंढ़ता है 2 (Story Series- Dil Dhoondta Hai 2)

ऐसा क्यों होता है कि जब भी कोई स्त्री अपने लिए जीना चाहती है, तो ग़लत ठहराई जाती है? दूसरों के लिए जीना ही उसे महान बनाता है. उस महानता के लिए उसे मिलता क्या है? जिन बच्चों के लिए अपना पूरा जीवन होम कर देती है, उन्हें भी उसका अपने लिए जीना अखरता है.

भले ही वह ससुराल द्वारा खींची गई लक्ष्मण रेखा को कभी पार नहीं कर पाई, पर उसके मन के लगाम को कभी कोई थाम नहीं पाता. जब-तब अतीत में गोते लगाता उसका मन कॉलेज में बिताए उन बिंदास लम्हों को ढूंढ़ लाता, जो उसके जीवन के सबसे सुनहरे दिन थे. कितनी अच्छी दोस्ती थी उसकी सुनंदा और सोनाली के साथ. जहां ये तीनों जातीं, उस स्थान को जीवंत बना देतीं. बेफ़िक्र चिड़ियों की तरह चहकतीं, कभी कैंटीन में बैठतीं, तो कभी कॉलेज के प्रांगण में. कभी सिनेमा देखने का प्रोग्राम बनता, तो कभी डोसा खाने का.

ऐसा नहीं था कि कावेरी अलग रहना चाहती थी. उसे भी  घर-परिवार में घुल-मिलकर लोगों के साथ रहना अच्छा लगता था, फिर भी ये तो मानव स्वभाव है कि हर व्यक्ति अपने जीवन में एक व्यक्तिगत एकांत चाहता है, चाहे वे हमेशा साथ रहनेवाले पति-पत्नी ही क्यों न हों. अक्सर पति-पत्नी दोनों की पसंद और रुचियां भी अलग होती हैं, तब यह भी स्वाभाविक है कि उन्हें थोड़ा-सा समय भी अपने शौक़ को पूरा करने के लिए चाहिए, जो कावेरी को कभी मिल नहीं पाता था. अपने उसी निजी फुर्सत के पल को पाने की चाहत में उसका मन कभी-कभी विद्रोह कर उठता. दिल चाहता सारी ज़िम्मेदारियों को झटककर दूर फेंक दे और कुछ फुर्सत के पल निकालकर अपने लिए जी ले, जहां न खाना बनाने का झंझट हो, न ही घर के दूसरे कामों की ज़िम्मेदारियां. बस, वो हो और उसके स्वतंत्र पल हों.

यही कारण था कि जब भी योगेशजी 8-10 दिनों के लिए शहर से बाहर जाते, वह काफ़ी स्वतंत्रता महसूस करती. न नाश्ते में कोई ज़्यादा मीन-मेख निकालनेवाला होता, न ही खाने के समय मिर्च-मसाले पर प्रवचन देनेवाला. कमरे में भी पूरी स्वतंत्रता होती. जब तक चाहो, लाइट जलाकर अपनी पसंद की क़िताबें पढ़ो, म्यूज़िक सुनो या और कोई काम करो, कोई रोकने-टोकनेवाला नहीं होता. कुछ दिनों के लिए मिली इस स्वतंत्रता को वह पूरी तरह आत्मसात् करती. फिर भी इस बेफ़िक्री के आलम का आभास भी किसी को नहीं होने देती, वरना घर के लोग ही उसे ग़लत ठहराने लगते.

ऐसा क्यों होता है कि जब भी कोई स्त्री अपने लिए जीना चाहती है, तो ग़लत ठहराई जाती है? दूसरों के लिए जीना ही उसे महान बनाता है. उस महानता के लिए उसे मिलता क्या है? जिन बच्चों के लिए अपना पूरा जीवन होम कर देती है, उन्हें भी उसका अपने लिए जीना अखरता है.

भले ही वह ससुराल द्वारा खींची गई लक्ष्मण रेखा को कभी पार नहीं कर पाई, पर उसके मन के लगाम को कभी कोई थाम नहीं पाता. जब-तब अतीत में गोते लगाता उसका मन कॉलेज में बिताए उन बिंदास लम्हों को ढूंढ़ लाता, जो उसके जीवन के सबसे सुनहरे दिन थे. कितनी अच्छी दोस्ती थी उसकी सुनंदा और सोनाली के साथ. जहां ये तीनों जातीं, उस स्थान को जीवंत बना देतीं. बेफ़िक्र चिड़ियों की तरह चहकतीं, कभी कैंटीन में बैठतीं, तो कभी कॉलेज के प्रांगण में. कभी सिनेमा देखने का प्रोग्राम बनता, तो कभी डोसा खाने का. उसके खुले विचारवाले मम्मी-पापा ने उसे अपने हिसाब से जीने की पूरी आज़ादी दे रखी थी. अब सोचती है, तो लगता है जाने कहां गए वो दिन और कहां गईं उसकी सखियां? सब दुनिया की भीड़ में ऐसे खो गईं कि फिर दुबारा मुलाक़ात ही नहीं हो पाई. काश! कोई लौटा दे उसे वे खोए हुए पल और उसकी ख़ुशियां, क्योंकि अब भी उसके अंदर ज़िंदा है वह सोलह साल की लड़की.

ऐसे ही छोटे-छोटे पल अपने लिए चुराती, वह कब ज़िंदगी के पचासवें दशक में पहुंच गई, पता ही नहीं चला. बदलते समय के साथ पहले बड़ा संयुक्त परिवार टूटकर छोटा संयुक्त परिवार बना, जिससे काम की ज़िम्मेदारियां और बोझ भी सिमटने लगा. ननद-देवर ने शादी कर अपनी-अपनी अलग गृहस्थी बसा ली. घर के बड़े-बुज़ुर्ग स्वर्गवासी हुए और देखते-देखते बच्चे भी अपने-अपने जीवन में व्यवस्थित हो गए. उसका जीवन भी योगेशजी के आसपास सिमटकर रह गया. घर में ज़्यादा लोग थे, तो अपना पौरुष सिद्ध करने के लिए योगेशजी कुछ ज़्यादा ही गरजते-बरसते थे. अब वो सावन की हल्की फुहार बन गए थे. जो मन का रिश्ता उम्र रहते कायम नहीं कर पाए, अब रिटायरमेंट के बाद बनाने की कोशिश कर रहे थे.

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हालांकि कावेरी को यूं कांटों की झाड़ का फूलों भरी डाल बनना रास नहीं आ रहा था.

अक्सर आस-पड़ोस की औरतें उसका अकेलापन देखकर हमदर्दी जतातीं और उसे बच्चों के पास जाने की सलाह देतीं, पर उसे लगता बहुत जी लिए दूसरों और बच्चों के लिए, अब अपने ढंग से अपने लिए जी रही है, तो इसमें अफ़सोस जैसी क्या बात है? अपना जो दिल चाहता है, बनाती है, मस्ती से खाती-पीती और घूमती है. बच्चों के घर जाकर फिर नई ज़िम्मेदारी संभाले, उससे अब इतिहास दुहराया नहीं जाएगा.

योगेशजी हमेशा कहते, “बहुत अकेले रह लिए, चलो, बच्चों के पास चलकर उनकी गृहस्थी देखें.”

कावेरी को पति की बातें ज़रा भी नहीं सुहातीं. कितना परिश्रम किया था कावेरी ने अपने दोनों बच्चों- निधि और वरुण को योग्य बनाने के लिए. अपने लिए कभी ढंग की एक अच्छी साड़ी भी नहीं ले पाती. उसी का परिणाम था, जो आज निधि और वरुण दोनों इंजीनियर थे, फिर भी अपनी मां के दर्द और चाहत का ख़्याल रखना तो दूर, उन्हें एहसास भी नहीं है कि उनकी मां क्या चाहती है?

       रीता कुमारी

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