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कविता- कोयलिया और मैं.. (Kavita- Koyaliya Aur Main..)

कोयलिया तू हर दिन किसे बुलाती है? भोर होते ही सुनती हूं तेरी आवाज़ विरह का आर्तनाद प्रणयी की पुकार…

दीपावली पर विशेष- कविताएं: दिवाली की झालरें… (Kavitayen- Diwali Ki Jhalaren… Main Roshani Sa…)

दिवाली की झालरें… ..टिम-टिम करती रंग-बिरंगी झिलमिलाती हुईं झालरें बतियाती रही रातभर दो सहेलियों की तरह कभी हंसतीं-खिलखिलाती.. कभी चुप-चुप…

कविता- ऐसा है मेरा आंचल… (Kavita- Aisa Hai Mera Aanchal…)

पूर्णता की चाहत लिए प्रतीक्षारत कविताएं.. कुछ अधमिटे शब्दों की प्रस्तावित व्याख्याएं.. कब से, पल-पल संजोई हुई आशान्वित कल्पनाएं.. संभावनाओं…

ग़ज़ल- मुझे तन्हाई से… (Gazal- Mujhe Tanhai Se…)

मुझे तन्हाई से अक्सर मिला हैख़्यालों में वहीं दिलबर मिला है यूं मिलने के ठिकाने और भी थे कभी छज्जे…

काव्य- एक-दूसरे के मौन में… (Kavya- Ek-Dusare Ke Maun Mein…)

कभी-कभी मैं कुछ नहीं भी कहती हूं तुम तब भी सुन लेते हो.. कैसे! कभी-कभी मैं कुछ कहती हूं तुम…

कविता- तेरे लिए… (Kavita- Tere Liye…)

* गुज़र जानी थी ये उम्र किसी बेनाम कहानी की तरह कि बियाबान में फैली ख़ुशबू और उसकी रवानी की…

काव्य- बारिश और मन (Kavya- Barish Aur Maan)

बारिश की बूंदों ने आज फिर दिल को गुदगुदाया है रिमझिम फुहारों ने मौसम को आशिक़ाना बनाया है ठंडी बयार…

काव्य- सब प्रतीक्षारत हैं… (Kavay- Sab Pratiksharat hain…)

लॉकडाउन पर विशेष... सब प्रतीक्षारत हैं बैठे हैं वक़्त की नब्ज़ थामे कि कब समय सामान्य हो और रुके हुए…

कविता- क्यों रखा उसको पराश्रित ही… (Kavita- Kyon Rakha Usko Parashrit Hi…)

सुनो कवि.. पहाड़ी के उस पार वो स्त्री.. रोप रही है नई-नई पौध सभ्यताओं की और उधर.. गंगा के किनारे…

काव्य- हार गए तुम… (Kavya- Haar Gaye Tum…)

जिस दिन तमन्ना बड़ी और हौसला छोटा हो जाए समझना कि हार गए तुम जिस दिन राजनीति बड़ी और दोस्ती…

ग़ज़ल- तस्तीक़ (Gazal- Tastik)

अब न कोई शक़-ओ-शुबा है, हर ढंग से तस्तीक़ हो गई निराशाओं से लड़ने की, मेरी बीमारी ठीक हो गई…

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