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जीने की कला- सीखें कहने और सुनने की कला… (The art of living – learn the art of speaking and listening…)

हम अक्सर जीवन में यह मानकर चलते हैं कि जो हम कह रहे हैं, वही सही है. बातचीत के दौरान शब्दों का चयन, लहजा और भावनाएं, इन सब पर बहुत कम ध्यान दिया जाता है. ख़ासकर पारिवारिक और वैवाहिक जीवन में यह आदत धीरे-धीरे रिश्तों को खोखला कर देती है. कहा गया है कि बोलना आसान है, लेकिन सही समय पर चुप रहना और सही ढंग से व्यवहार करना एक कला है. यदि हम बोलते समय नए गुण नहीं सीख पाते, तो कम से कम अपने कर्मों में अच्छे गुणों को अपनाने का प्रयास ज़रूर करना चाहिए.

रिश्तों में सबसे बड़ी समस्या: कटु वाणी

अधिकांश दांपत्य जीवन की समस्याओं की जड़ में कटु वाणी और निरंतर आलोचना होती है. पति-पत्नी एक-दूसरे के सबसे क़रीब होते हैं, लेकिन यही निकटता कई बार अधिकार और अहंकार में बदल जाती है. 'मैं जैसा हूं, वैसा ही ठीक हूं या मेरी बात ही सही है', इस सोच के कारण सामने वाले की भावनाओं को समझने की कोशिश ही नहीं की जाती. पत्नी हो या पति, जब बार-बार ताने सुनने पड़ें, अपमान सहना पड़े, तो आत्मसम्मान आहत होता है. धीरे-धीरे यह स्थिति तनाव, निराशा और अवसाद का रूप ले लेती है.

शब्दों का घाव, जो दिखाई नहीं देता

शारीरिक चोट समय के साथ भर जाती है, लेकिन शब्दों से लगा घाव लंबे समय तक मन में टीस बनकर रह जाता है. घर के भीतर कही गई बातें सबसे ज़्यादा चुभती हैं, क्योंकि वहां व्यक्ति सुरक्षा और अपनापन खोजता है. जब वही स्थान आलोचना और तिरस्कार का केंद्र बन जाए, तो व्यक्ति अंदर से टूटने लगता है. अक्सर पति यह सोचते हैं कि 'मैं तो मज़ाक कर रहा था या मैं तो सुधार के लिए कह रहा था', लेकिन सामने वाले के मन पर उसका असर बिल्कुल अलग होता है.

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आलोचना और सलाह में फ़र्क़ समझें

बहुत कम लोग यह समझ पाते हैं कि आलोचना और सलाह में बुनियादी अंतर होता है. आलोचना में दोष ढूंढ़ा जाता है. सलाह में समाधान दिया जाता है. जब बात-बात पर कमियां गिनाई जाती हैं, तो सामने वाला रक्षात्मक हो जाता है. वह सुनना बंद कर देता है. इसके विपरीत, प्रेम और सम्मान के साथ कही गई बात दिल तक पहुंचती है.

पत्नी को नीचा दिखाने की मानसिकता

कुछ पुरुष अंजाने में ही पत्नी को कमतर आंकने लगते हैं. उसके मायके की तुलना करना, उसकी समझ पर सवाल उठाना, उसके काम को महत्व न देना, दूसरों के सामने उसकी कमियां बताना, ये सब व्यवहार पत्नी के आत्मविश्वास को गहरी चोट पहुंचाते हैं. कई महिलाएं वर्षों तक चुपचाप सहती रहती हैं, लेकिन एक समय ऐसा आता है, जब सब्र का बांध टूट जाता है.

जब चुप्पी फ़ैसला बन जाती है

लगातार अपमान और उपेक्षा से गुज़रने के बाद कई महिलाएं बोलना छोड़ देती हैं. यह चुप्पी शांति नहीं, बल्कि थकान और हार का संकेत होती है. कुछ मामलों में यही चुप्पी अंततः बड़े फ़ैसलों में बदल जाती है, अलगाव, मानसिक दूरी या घर छोड़ने तक की स्थिति. यह स्थिति केवल पत्नी के लिए नहीं, पूरे परिवार के लिए पीड़ादायक होती है.

संवाद की कमी, रिश्तों की दुश्मन

रिश्तों में समस्याएं, इसलिए नहीं बढ़तीं कि मतभेद हैं, बल्कि इसलिए बढ़ती हैं, क्योंकि संवाद सही तरीक़े से नहीं होता. यदि पति-पत्नी एक दूसरे की बात ध्यान से सुनें, बीच में टोके बिना, बिना जज किए, तो आधी समस्याएं वहीं ख़त्म हो सकती हैं. सुनना भी एक गुण है, ऐसा गुण, जो बोलने से कहीं अधिक प्रभावशाली होता है.

करने में अपनाएं नए गुण

यदि बोलते समय संयम नहीं रख पा रहे, तो कम से कम अपने व्यवहार में अच्छे गुण लाएं. जैसे सम्मान देना, सहयोग करना छोटे प्रयासों की सराहना करना, ग़लती होने पर स्वीकार करना, धन्यवाद कहना... ये छोटे-छोटे गुण रिश्तों में बड़ा बदलाव ला सकते हैं.

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सकारात्मक व्यवहार का असर

जब घर का माहौल सकारात्मक होता है तो उसका असर सभी पर पड़ता है- बच्चों पर, बुज़ुर्गों पर और स्वयं पति-पत्नी पर भी. जहां प्रशंसा होती है, वहां आत्मविश्वास बढ़ता है. जहां सम्मान होता है, वहां प्रेम अपने आप पनपता है. नकारात्मकता से कोई रिश्ता मज़बूत नहीं हुआ, लेकिन सकारात्मक व्यवहार से कई टूटते रिश्ते संभल गए हैं.

आत्ममंथन की आवश्यकता

हर व्यक्ति को समय-समय पर ख़ुद से यह सवाल पूछना चाहिए, क्या मेरी बातें सामने वाले को चोट पहुंचा रही हैं? क्या मैं सुधार के नाम पर अपमान तो नहीं कर रहा? क्या मैं सिर्फ़ बोल रहा हूं या सुन भी रहा हूं? ईमानदारी से किया गया आत्ममंथन व्यक्ति को बेहतर इंसान और बेहतर जीवनसाथी बना सकता है।व.

रिश्ते शब्दों से नहीं, भावनाओं से चलते हैं

अंत में यही कहा जा सकता है कि रिश्ते तर्क से नहीं, संवेदना से चलते हैं. यदि बोलने में नया गुण नहीं सीख पा रहे, तो कम से कम अपने कर्मों में अच्छाई ज़रूर लाएं, क्योंकि एक अच्छा व्यवहार, सौ अच्छी बातों से अधिक प्रभाव छोड़ता है. घर वही स्वर्ग बनता है, जहां शब्द मरहम बनें, घाव नहीं.

- स्नेहा सिंह

Photo Courtesy: Freepik

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