कविता- लव यू ज़िंदगी… (Poetry- Love You Zindagi…)

न जाने क्यों, सुबह से ज़िंदगी ढूढ़ रहा हूं बस उसे धन्यवाद देना था ख़ुद से ही अपने लिए माफ़ी मांगनी थी जी तो रहा…

न जाने क्यों, सुबह से ज़िंदगी ढूढ़ रहा हूं
बस उसे धन्यवाद देना था
ख़ुद से ही अपने लिए माफ़ी मांगनी थी
जी तो रहा था पर मुद्दत हो गई थी उससे मिले
कुछ नहीं बस कहना था ‘आई लव यू ज़िंदगी’
जब मैंने ख़ुद को आंसुओं में डूबा पाया
वह मुझे मुस्कुराती मिली
आज मैं शिकायतों के साथ नहीं था
जब ढेर सारी शिकायतों के साथ मिलता
तो मैं मुस्कुराता और वह रोती
मैं बचपन से लेकर आज तक उसके पास
सिर्फ़ शिकायतों के साथ ही तो खड़ा था
बचपन में अच्छी किताब
ढेर सारे कपड़ों
ट्यूशन और स्कूटर और
खिलौनों की शिकायतें
जवानी में
पैसे की कमीं
बड़े घर, गाड़ी और
मनचाही नौकरी की शिकायतें
कभी कुछ होने कभी कुछ बन जाने की
शिकायतें
कहां हैं आज वो शिकायतें…


ऐ ज़िंदगी,
जिनकी लिस्ट
मेरी ख़्वाहिशों से बड़ी है
आज जब उस मोड़ पर खड़ा हूं
कि जहां सिर्फ़ वक़्त और सांस
चाहिए जीने के लिए
यह समझ पाया हूं तो
मुझे लगता है सब कुछ तो है मेरे पास
जिनके लिए तुझसे शिकायत करता था
बस नहीं बचा तो वक़्त
आह मुझे यहां से जाने से पहले
लव यू ज़िंदगी कहने का
हौसला दे दे
मुझे अपनी ग़लतियों की
माफ़ी मांगने का हौसला दे दे
मुझे ख़ुद को इक बार
गुनहगार समझने का अवसर दे दे…
हां ‘आई लव यू ज़िंदगी’
तू जितनी भी है, जैसी भी है
आई लव यू…


जब मैं किताबें और ट्यूशन मांगता
तो भूल गया
तूने मुझे आईएएस
बनाने के लिए नहीं पैदा किया है
जब जवानी में दौलत, बंगला, गाड़ी
और ग्लैमर मांग रहा था
तो मुझे एहसास नहीं था
इनकी क़ीमत बहुत बड़ा दर्द है
जो बाहर से नहीं दिखता
मैं भूल गया था कि
तूने मुझे
तितलियों के रंग, फूल की सुगंध
सुबह-शाम का दृश्य देखने
इंसानों के दुख-दर्द
को जीने के लिए जन्म दिया है
मुझे माफ़ कर दो ऐ ज़िंदगी
कि मैंने तुम्हारे अर्थ को
अपने भीतर न खोज कर
कहीं और ढूढ़ने निकल पड़ा
और तुम्हारे साथ हो कर भी
तुमसे कोसों दूर
भटकता रहा


ऐ ज़िंदगी,
आज जब तुम
मुझे देख
मेरी अज्ञानता पर
मुस्कुरा रही हो
तो थोड़ा-सा हौसला भी दे दो
ख़ुद को ‘आई लव यू’
कहने का
मैं जानता हूं
मेरे हाथ कांपेंगे
किसी बगीचे से गुलाब तोड़ने में
बहुत डर लगेगा
रास्ते में तुम्हारा पीछा करने
या कोई सूनसान सा कोना ढूढ़ने में
मेरे होंठ कांपेंगे
तुम्हें ‘आई लव यू’
कहने में झिझक भी तो होगी
जानता हूं
तुम मुझे बार-बार पूछोगी
बोलो क्या कहना चाहते हो
मुस्कुराओगी
मुझे हिम्मत देने के लिए
लेकिन नहीं जुटा सकूंगा
हमेशा की तरह
तुम्हें ‘आई लव यू’
कहने का हौसला
क्योंकि
सिर्फ़ शिकायतों में ही तो
जीता रहा हूं तुम्हें
लेकिन नहीं
आज तुम्हारे लिए
अपनी बांहें फैलाए खड़ा हूं
सभी शिकायतों से दूर
मुझे जीने के लिए
वक़्त, सांस और हौसला दे दो
आई लव यू ज़िंदगी…

मुरली मनोहर श्रीवास्तव

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Published by
Usha Gupta

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