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कहानी- स्पृहा (Short Story- Spriha)

एक स्त्री होकर भी दूसरी स्त्री को जो अतीत में इतने दुख सहकर बाहर आई है, उसे प्यार से वंचित रखा जाए? एक अविवाहित, कम उम्र की लड़की अगर उसकी बहू बनकर घर में आए और वह घर में किसी को भी स्नेह व सम्मान ना दे, तो क्या कर लेगी माधवी… क्या इंसान के गुण व स्वभाव को उम्र और सामाजिक स्थिति के पैमानों पर बांटना उचित है? नहीं, कदापि नहीं!

Short Story in Hindi

सिरदर्द होना तो अब आम बात ही थी. यह तो माधवी का आजकल हर महीने का कष्ट बन गया था. पिछले चार महीनों से पीरियड से पहले एक दिन इतना तेज़ सिरदर्द होता है कि पेनकिलर टैबलेट लेने से भी आराम नहीं मिलता. आजकल यह सिरदर्द ही जैसे बताने लगा है कि कल पीरियड होगा.

वैसे स्त्री तन-मन हर स्थिति में स्वयं को संभाल लेना जानती ही है, सो माधवी भी समझ गई कि आज वह कुछ भी कर ले, यह सिरदर्द रात तक रहेगा. फिर कल उसे पीरियड हो जाने पर सिरदर्द भी महीनेभर के लिए गायब रहेगा.

एक दिन माधवी की ख़ास दोस्त नीरजा ने भी उसे बताया था कि मेनोपॉज़ के समय कई तरह के बदलाव होते हैं. उसमें मानसिक व शारीरिक परेशानियां भी होती हैं. वो भी इस स्थिति से गुज़र चुकी है.

पूरा दिन माधवी का ना कुछ खाने का मन करता है, ना कुछ करने का. किसी से बात करने की इच्छा भी नहीं होती. माधवी ने किसी तरह सुबह अपने पति तन्मय और बेटी तन्वी का टिफिन तो बना दिया था, पर ख़ुद ज़रा भी खाने की इच्छा नहीं हुई थी. दोनों ‘आराम कर लो’ कहते हुए ऑफिस चले गए थे. बेटा गौरव ऑफिस की मीटिंग के सिलसिले में कोलकाता गया हुआ है, एक हफ़्ते में आएगा.

दोपहर के दो बज रहे थे, पर माधवी की हिम्मत नहीं हुई कि उठकर किचन तक जाए और अपना खाना ले ले. सिर की नसें फट रही थीं. नाश्ता भी ठीक से नहीं किया था, तो अब पेट खाली था. एसिडिटी हो रही थी. इतने में पास रखा मोबाइल वाइब्रेट होने लगा. उसने फोन साइलेंट पर रखा हुआ था, पर वाइब्रेशन महसूस हुआ. देखा, स्पृहा का फोन था. नहीं, उसे फोन नहीं उठाना है. वही मीठी-मीठी बातें, “मम्मी, आप कैसी हैं? खाना खा लिया है ना… कुछ काम तो नहीं है ना…”

सिर को दुपट्टे में बांधे-बांधे माधवी स्पृहा के बारे में सोचने लगी. उसके बेटे गौरव की गर्लफ्रेंड है स्पृहा. गौरव से पांच साल बड़ी. माधवी को अपने बेटे और इस लड़की की उम्र का यह फ़र्क़ मन ही मन बहुत कचोटता है. उसका मन कई बार झुंझलाहट से भर उठता है और इसका कारण उम्र ही नहीं, स्पृहा का तलाक़शुदा होना भी है.

गौरव को स्पृहा दोस्तों के फंक्शन में मिली थी. गौरव ने बताया है कि स्पृहा घरेलू हिंसा की शिकार भी रही है. इसके पिता की संपत्ति के लालच में इसे ससुराल में ख़ूब मारा-पीटा जाता था. एक दिन वो सब छोड़कर मायके आ गई थी. बहुत लंबे समय डिप्रेशन में रही है. अब थोड़ा सामान्य हुई है.

माधवी जानती है कि गौरव के दिल में स्पृहा के लिए बहुत अधिक प्यार व सहानुभूति है. तन्मय और तन्वी भी स्पृहा को पसंद करते हैं. माधवी ने अपने मुंह से तो कभी कुछ नहीं कहा, पर तलाक़शुदा व उम्र में बड़ी लड़की अपने बेटे के लिए उसे नहीं जंच रही थी. वैसे जब भी स्पृहा घर में आती है, घर चहकने लगता है. वैसे तो माधवी ने अपने बेटे के लिए जैसी लड़की के सपने देखे थे, स्पृहा उन सभी पैमानों पर फिट बैठती है, पर बेटे के लिए उम्र में बड़ी और तलाक़शुदा लड़की के सपने थोड़े ही देखे थे! कौन मां देखती है? देखने में सुंदर, मेहनती, एक्टिव, उच्च शिक्षित, मॉडर्न, बड़ों को सम्मान और छोटों को ख़ूब स्नेह देनेवाली स्पृहा, जब माधवी से बात करती है, तो माधवी भूल जाती है मन की कसक.

स्पृहा की हर बात माधवी मंत्रमुग्ध होकर सुनती है. कितनी ज्ञानभरी बातें करती है. माधवी के पढ़ने के शौक़ को ध्यान में रखते हुए वही तो उन्हें किताबों की दुनिया में ले जाती है. हर बात घर में सबका ध्यान रखते हुए करती है. मजाल है कभी किसी को उसकी कोई बात नागवार गुज़री हो.

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माधवी ने कसमसाकर करवट बदली. भूख तो लगी थी, पर सुबह जो तन्मय और तन्वी के लिए खाना बना था, छोले और आलू गोभी, ज़रा भी खाने का मन नहीं था. बस, खिचड़ी खाने का मन कर रहा है जीरे और हींग से छौंकी गई हल्की-सी सादी पतली खिचड़ी, जैसे मां बनाती थीं.

माधवी की आंखों के कोरों से आंसू ढलक गए. कौन बनाकर देगा अब खिचड़ी? कोई भी तो नहीं… कौन है ऐसा? पिछले महीने भी तो इस सिरदर्द में यही खिचड़ी खाने का मन किया था. सोचा था अगले महीने अपने लिए पहले ही बनाकर रख लेगी, पर कहां अपने लिए अलग से कुछ बनाने की हिम्मत होती है. तबीयत ख़राब होने पर चार चीज़ें तो नहीं बन सकतीं ना. वो वही तो बनाती है, जो सबको खाना होता है.

उसे याद आया कुछ महीने पहले भी सिरदर्द के समय तन्वी घर पर थी. माधवी की खिचड़ी खाने की इच्छा को देखते हुए तन्वी ने कहा था, “मां, खिचड़ी कौन-सी बड़ी चीज़ है. अभी ऑर्डर कर देती हूं. आजकल सब तो मिल जाता है.” माधवी हैरान हुई थी.

“खिचड़ी भी ऑर्डर करोगी अब?”

“हां मां, आज वीकेंड है. मैं तो आराम के मूड में हूं. पापा और गौरव को तो बनाना आता नहीं है. हम अपने लिए कुछ और ऑर्डर कर लेंगे. आपके लिए खिचड़ी, ठीक है?” माधवी ने यूं ही बस सिर हिला दिया था. तीनों के लिए पिज़्ज़ा और उसके लिए खिचड़ी आ गई थी. अच्छी थी, पर मन में कुछ चटक ज़रूर गया था. जब स्पृहा अचानक आ गई थी और बोली थी, “अरे, मुझे फोन क्यों नहीं किया? मैं आकर खिचड़ी बना देती. मां को तो पहले से ही ठीक नहीं लग रहा है, उस पर बाहर की खिचड़ी…” स्पृहा का चेहरा उतर गया था.

तन्वी से कहा था, “मुझे फोन क्यों नहीं किया?”

माधवी ने स्वभाववश बात संभाल ली थी. धीरे-से अकेले में कहा था कि आजकल यह सिरदर्द तो हर महीने पीरियड से एक दिन पहले हो रहा है. यूं ही खिचड़ी खाने का मन हो आता है. बहुत हल्का ही खाने की इच्छा रहती है. कोई बात नहीं, अच्छी थी. खा ली.

माधवी के लिए स्पृहा का इतना चिंता करना भी कुछ ख़ास मायने नहीं रख पाता है. कारण वही कि बेटे के लिए उसी की कोई हमउम्र लड़की होती तो अच्छा रहता. रह-रहकर माधवी का फोन बजता रहा था. हर बार वाइब्रेशन होने पर माधवी ने देखा, स्पृहा ही थी. मन नहीं है बात करने का. नहीं उठाया, पर ऐसी एक नहीं, कई बातें माधवी को लेटे-लेटे याद आ रही थीं, जब स्पृहा ने घर की हर छोटी से छोटी बात की चिंता की थी. कभी माधवी कपड़े सुखाने के लिए बालकनी में होती है, तो चुपचाप उसके हाथ से कपड़े लेकर सुखाने लगती है स्पृहा. कभी किचन में बर्तन पोंछ रही होती है, तो दूसरा कपड़ा लेकर वह भी पोंछने लग जाती है. कभी सबके साथ खा रही होती है, तो बाकी तीनों तो अपनी प्लेट सिंक तक रखकर छुट्टी करते हैं. स्पृहा ही पूरा टेबल साफ़ करवाती है. सब डोंगे, बर्तन वही किचन तक ले जाती है. टेबल साफ़ करती है. कोई और कहां ध्यान देता है इतनी छोटी-छोटी बात पर… माधवी से स्पृहा की एक भी हरकत छुप नहीं पाती है. वह उसे पसंद करती है. प्यार भी करती है, पर उम्र और तलाक़ की बात पर माधवी के मन की सुई अटक जाती है.

वह बस आगे नहीं सोच पाती है. गौरव ने उसे स्पृहा की पूर्व विवाहित जीवन की शारीरिक और मानसिक यंत्रणा के बारे में बताया हुआ है. एक स्त्री होने के नाते उसे पूरी तरह सहानुभूति है स्पृहा के साथ, पर कुछ तो है ना, जो खटकता है माधवी के निश्छल मन को भी.

अचानक डोरबेल बजी. माधवी ने टाइम देखा पौने तीन बज रहे थे. उसने दोपहर से कुछ खाया ही नहीं था अभी तक. दरवाज़ा खोलूं या नहीं… किसी फ्रेंड से मिलने की ना तो इच्छा थी, ना हिम्मत. देखना तो पड़ेगा ही. कहीं कोई कुरियर हो… माधवी बेड से उठी. सिर की नसें जैसे फटने को थीं. आंखें आंसुओं से धुंधला गईं और जैसे ही मुंह से ‘ओह! मां’ निकला रोना आ गया. अब कहां कोई था मायके में… वह अकेली ही तो संतान थी. माता-पिता इस दुनिया से विदा ले ही चुके थे. जाकर दरवाज़ा खोला. मई की गर्मी में पसीने से तरबतर स्पृहा खड़ी थी.

“अरे! तुम? इस समय इतनी धूप में? क्या हुआ? ऑफिस नहीं गई क्या?” तेज़ी से अंदर आते हुए स्पृहा हमेशा की तरह पहले माधवी के गले लगी.

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“आपने फोन नहीं उठाया, तो बड़ी चिंता हुई. व्हाट्सएप पर भी आप सुबह से ऑनलाइन नहीं हैं. पापा, गौरव और तन्वी से भी पूछा, तो उन्होंने बताया कि आज आपको सुबह से सिरदर्द है. मां, आपने कुछ खाया?” माधवी ने ना में सिर हिलाया.

“ओह! मुझे अंदाज़ा था. आपने बताया था ना आपको आजकल भयंकर सिरदर्द हो रहा है.”

फिर अपने बैग से एक टिफिन निकालकर बोली, “यह खाइए आपके लिए खिचड़ी बनाकर लाई हूं.” फिर किचन में जाकर एक प्लेट में खिचड़ी निकाली. फ्रिज से दही भी अपने आप निकाल ली. डाइनिंग टेबल पर रखते हुए बोली, “आइए मां, खिचड़ी  खा लीजिए.”

माधवी चेयर पर बैठकर बोली, “तुमने इतनी तकलीफ़ क्यों की? इतनी गर्मी है बाहर.”

“अरे मां, आपकी चिंता हो रही थी. आजकल आप बहुत लो भी महसूस करती रहती हैं ना.” माधवी की आंखें छलछला उठीं. हद से ज़्यादा सिरदर्द और उस पर स्पृहा का स्नेहिल स्वर सुनकर ही दिल भर आया. स्पृहा किचन में गई और एक कटोरी में तेल गर्म करके ले आई. घर की हर चीज़ कहां है, उसे पता है.

माधवी को स्पृहा के हाथ की खिचड़ी इतनी अच्छी लगी थी कि पेट भरकर खा ली, पर मन नहीं भरा था. मां के हाथ जैसा ही स्वाद था खिचड़ी में. यह लड़की तो सब कुछ जानती है. आजकल यही तो मन होता है कि कोई तकलीफ़ में बस इतना कर दे, पर कहां हो पाता है ये सब. तन्वी से मन ही मन उम्मीद करती है माधवी. बेटी है, पर उसका मन ही नहीं होता किचन में कुछ भी करने का. फिर अपना ख़्याल किसी से कहलवाकर थोड़े ही रखा जाता है, कोई ख़ुद रखे तो बात है.

माधवी प्लेट किचन में रखने जाने लगी, तो स्पृहा ने हाथ से ले ली. उसे उठने ही नहीं दिया. उसके सिर पर हाथ रखते हुए बोली, “बस, आप बैठिए मां, मैं ज़रा सिर में तेल लगा देती हूं. आपको आराम मिलेगा.” माधवी स्पृहा के स्नेह के जादू में घिरी वापस चेयर पर बैठ गई.

स्पृहा ने गुनगुना तेल सिर में लगाना शुरू किया. बालों की जड़ों तक हाथों के दबाव से माधवी को इतना आराम मिला कि उसका मन हुआ कि स्पृहा से लिपटकर रो पड़े. उसने अपनी सिसकियों पर काबू रखने की कोशिश की, पर आंसू गालों पर ढुलक ही आए. माधवी नहीं चाहती थी कि स्पृहा जाने कि वह रो रही है, पर जैसे ही उसने धीरे-से अपने आंसुओं को पोंछने के लिए हाथ उठाया, स्पृहा बोल पड़ी, “क्या मां, आप रो रही हैं?” अब माधवी रो ही पड़ी.

“बहुत दर्द है? अभी आराम हो जाएगा मां.”

जैसे-जैसे माधवी के दिल को एक सुकून पहुंच रहा था. उसका दिल चीख-चीखकर जैसे उसे उलाहना दे रहा था कि वह जिन कारणों से अपने दिल में स्पृहा जैसी लड़की के गुणों को नज़रअंदाज़ कर रही थी, क्या वे कारण इतने बड़े हैं?

क्या एक स्त्री होकर भी दूसरी स्त्री को, जो अतीत में इतने दुख सहकर बाहर आई है, प्यार से वंचित रखना ठीक है? एक अविवाहित, कम उम्र की लड़की अगर उसकी बहू बनकर घर में आए और वह घर में किसी को भी स्नेह व सम्मान ना दे, तो क्या कर लेगी माधवी… क्या इंसान के गुण व स्वभाव को उम्र और सामाजिक स्थिति के पैमानों पर बांटना उचित है? नहीं, कदापि नहीं!

माधवी को लगा जैसे उसके सिर से बड़ा बोझ हट गया है. मन फूल-सा हल्का हुआ, तो इस स्पृहा पर ढेर सारा प्यार आ गया. उसने स्पृहा के तेल लगे हाथ चूम लिए और कहा, “बस कर,  अब बहुत आराम है.”

“सच मां?” ख़ुशी से स्पृहा की आंखें चमक उठीं. बोली, “अब आपके लिए एक कप चाय बना दूं.”

“मैं बना लूंगी. तुम बैठो. तुम भी पीकर जाना.”

“नहीं, मैं ऑफिस भागती हूं, ज़रूरी काम है कहकर निकली हूं ऑफिस से. आज शाम को बहुत ज़रूरी मीटिंग है. आप अपना ध्यान रखना. बस, आपको देखने ही भागकर आई थी. आपकी तबीयत पता चली थी, तो काम में मन नहीं लग रहा था.” कहते-कहते उसने हाथ धोकर अपना बैग उठाया. बाहर की धूप से बचने के लिए स्कार्फ बांधा और हमेशा की तरह उसके गले लगकर ‘बाय मां’ कहकर झटपट सीढ़ियां उतर गई.

माधवी ने दरवाज़ा बंद किया. वह जैसे किसी और ही दुनिया में पहुंच गई थी, जहां उसके हृदय में स्पृहा के लिए स्नेह ही स्नेह था और कुछ भी नहीं. वह मन ही मन स्पृहा को हमेशा के लिए इस घर में लाने के लिए उसके माता-पिता से मिलने को उत्सुक हो उठी थी.

Poonam ahmed

   पूनम अहमद

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कहानी- वैदेही (Short Story- Vaidehi)

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तभी वैदेही ने अपनी मां की आवाज़ सुनी, “हम अपने बेटों के भविष्य की इतनी चिंता क्यों करते हैं कि बेटियों का भविष्य ही बर्बाद हो जाता है? क्या बेटियां हमारी कोखजाई नहीं होतीं? इनका भविष्य भी सुधारना है, यह बात समझने में हम इतनी देर क्यों लगा देते हैं?”

“हमेशा से हम अपने बेटों को अपनी प्रतिछाया समझ उन पर ज़रूरत से कुछ ज़्यादा ही भरोसा करते हैं. हमारा विश्‍वास होता है कि वे हमारे अधूरे कामों को पूरा करेंगे. यहीं पर हम शायद सबसे बड़ी ग़लती करते हैं, जो ल़ड़कों को लड़कियों से अलग समझ उन पर अधिक भरोसा करने लगते हैं.”

वैदेही के जीवन का एकमात्र लक्ष्य था- डॉक्टर बनना. बचपन से ही हॉस्पिटल में स़फेद कोट पहने यहां-वहां आते-जाते और काम करते डॉक्टरों को देख वह बेहद प्रभावित होती थी. तभी से उसने ठान रखा था कि चाहे जितनी मेहनत करनी पड़े, लेकिन बनेगी वह डॉक्टर ही. वैसे भी पढ़ाई में वह शुरू से ही काफ़ी कुशाग्र थी और मेहनत करने से भी पीछे नहीं हटती थी. कभी-कभी तो रात भर उसके कमरे की बत्तियां जलती रहतीं और वह अपनी पढ़ाई पूरी करने में जुटी रहती. उसकी पढ़ाई की इस ऱफ़्तार और अपने स्वास्थ्य के प्रति उसकी बढ़ती लापरवाही को देख

अक्सर उसकी मां समय पर उसे सोने और खाने के लिए डांटती रहती. उसकी बड़ी भाभी भी गाहे-बगाहे जब बिजली का बिल ज़्यादा आता तो उसे कुछ-न-कुछ सुना ही देती, लेकिन उस पर किसी बात का कोई असर न होता.

सभी बातों से बेअसर वैदेही पूरी लगन से पढ़ाई में जुटी रहती और हमेशा अपनी क्लास में प्रथम स्थान प्राप्त करती. बारहवीं की परीक्षा पास करते ही वह मेडिकल प्रवेश परीक्षा की तैयारी में जुट गयी थी. उस कस्बानुमा शहर में जहां लड़कों की पढ़ाई के लिए कोई अच्छी सुविधा नहीं थी, वहां लड़कियों के लिए पढ़ाई-लिखाई और भी चुनौती भरी थी. फिर भी वैदेही स़िर्फ मेडिकल की प्रवेश परीक्षा में चुनी ही नहीं गई, बल्कि लड़कियों की योग्यता सूची में उसका नाम सबसे ऊपर था.

उसकी सफलता ने स़िर्फ उसे ही नहीं, उसके मम्मी-पापा को भी ख़ुशी से आह्लादित कर दिया था. पहली बार उसकी सफलता से ख़ुश हो उसके पापा सुमंत बाबू ने बढ़कर उसका माथा चूम लिया था और मम्मी तो उसे गले से लगाकर ख़ुशी से रो ही पड़ी थी. हमेशा तानों-उलाहनों की आदी वैदेही मम्मी और पापा के बेशुमार प्यार को देखकर भरपूर उत्साह के साथ अख़बार थामे भागती जा पहुंची थी बड़े भैया के पास.

कहीं जाने के लिए तैयार भैया और भाभी के सामने अख़बार फैलाकर वो उनकी तरफ़ से मिलनेवाले प्रशंसात्मक शब्दों का इंतज़ार करने लगी. लेकिन भैया और भाभी के चेहरे पर बस हल्की-सी मुस्कुराहट फैल कर रह गई थी. जिस प्रशंसा का इंतज़ार उसका दिल कर रहा था, वह करता ही रह गया. जल्द ही भैया का चेहरा सपाट हो गया. न ख़ुशी, न ग़म. अख़बार लौटाते हुए बोले, “ठीक है, इसे रखो. आकर बात करता हूं.” फिर दोनों बाहर चले गए.

देर रात तक वैदेही इंतज़ार करती रही भैया के लौटने का. उसके भैया और भाभी देर रात लौटे भी तो अपने कमरे में जा घुसे और वह ठगी-सी अपने कमरे में खड़ी रह गई. भैया के इस बेरूख़े रूप की तो उसने कल्पना भी न की थी. प्राथमिक विद्यालय के शिक्षक पद के अवकाश प्राप्त उसके पापा ने उसकी पढ़ाई से लेकर शादी तक की सारी ज़िम्मेदारियां अपने तीनों बेटों को ही सौंप रखी थी, क्योंकि अपनी सारी ज़िंदगी की कमाई तो वे पहले ही अपने तीनों बेटों को पढ़ा-लिखाकर अच्छी नौकरी प्राप्त करने में ख़र्च कर चुके थे.

दूसरे दिन सुबह-सुबह भैया और उसके पापा के बीच बहस हो रही थी.

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“पापा, आप समझ क्यों नहीं रहे हैं? स़िर्फ पचास हज़ार रुपयों की बात नहीं है. अभी नामांकन में इतने पैसे लगेंगे, उसके बाद भी पढ़ाई में लाखों रुपए ख़र्च होंगे. लड़की है- पराया धन. कल को उसकी शादी करनी होगी तो दहेज के लिए भी तो रकम जुटाना होगा. इतने पैसे कहां से आएंगे. आप थोड़ी समझदारी से काम लीजिए. उसका मेडिकल कॉलेज में एडमिशन करवाने के बदले उन्हीं पैसों से उसकी शादी करवाने की सोचिए.”

“कैसी बातें करते हो ज्ञान? वैदेही का दिल टूट जाएगा. उसके सारे सपने बिखर जाएंगे. मेरा तुम तीनों भाइयों से यही अनुरोध है कि उसकी शादी मत करवाना, लेकिन उसे पढ़ाकर डॉक्टर बना दो.”

सुमंत बाबू की आवाज़ गिड़गिड़ाने की हद तक कातर हो आई थी. लेकिन बड़े भैया अपने फैसले पर अड़े रहे.

तब सुमंत बाबू ने तीनों बेटों को एक साथ बुलाकर बातचीत की, पर नतीज़ा वही ढाक के तीन पात रहा. और किसी बात पर तीनों भाइयों की राय शायद ही कभी एक रही हो, लेकिन वैदेही की पढ़ाई को लेकर सभी भाई एकमत थे. फिर सुमंत बाबू ने किसी बेटे के सामने अपनी झोली नहीं फैलाई. स़िर्फ इतना ही बोले, “तुम तीनों भाइयों को पढ़ाने और योग्य बनाने में मैंने अपनी सारी ज़िंदगी की कमाई होम कर दी. अपने बुढ़ापे तक का नहीं सोचा और तुम मिलकर मेरी एकमात्र बची ज़िम्मेदारी को निभाने से कतरा रहे हो. एक बात और जान लो. वैदेही स़िर्फ मेरी ज़िम्मेदारी ही नहीं है, बल्कि तुम सभी की तरह वह भी मेरे वजूद का एक हिस्सा है. आज अपना सुख तलाशते-तलाशते तुम सभी की सोच इतनी छोटी हो गई है कि बिना बंटवारा किए ही तुम सभी के दिल बंट चुके हैं. तुम लोगों की नज़र में स़िर्फ पत्नी और अपने बच्चे ही प्यार के रिश्ते रह गए हैं. जिस बहन के साथ खेलकर-लड़कर बड़े हुए हो, उसके साथ भी कच्चे-धागे से बंधा एक प्यार का रिश्ता ही था, लेकिन बड़ी आसानी से तुम सभी ने उस रिश्ते से किनारा कर लिया.”

फिर थोड़ा रुककर बोले, “ख़ैर, मैं पिता हूं, तुम सभी के लिए बुरा सोच भी नहीं सकता, फिर भी यह तो नहीं भूला जा सकता कि अभी से अपने बच्चों के लिए कई-कई ट्यूशन लगाने वाले मेरे बेटों पर अपनी बहन की पढ़ाई पर ख़र्च होनेवाला बिजली का बिल भी भारी पड़ रहा है. आज से मैं तुम लोगों को उसकी शादी की ज़िम्मेदारी से भी मुक्त करता हूं. जिस दिन वह अपने जीवन का लक्ष्य पा लेगी, उसकी मानसिकता के अनुरूप उसकी शादी भी करवा दूंगा. स़िर्फ खाता-पीता परिवार देखकर उसकी शादी नहीं करवाऊंगा.”

बोलते-बोलते सुमंत बाबू का गला भर्रा गया. उसके बाद कई दिनों तक वे पैसों के इंतज़ाम करने के लिए इधर-उधर भटकते रहे, लेकिन पैसों का इंतज़ाम न हो सका. जैसे-जैसे नामांकन के लिए निर्धारित अंतिम तारीख़ नज़दीक आ रही थी, सुमंत बाबू की बेचैनी बढ़ती ही जा रही थी.

नामांकन भरने की अंतिम तारीख़ से एक दिन पहले तक भी सुमंत बाबू पैसों का इंतज़ाम न कर पाए. वैदेही की पीड़ा असहनीय हो गई थी. वह एकांत में फूट-फूटकर रो पड़ी. बचपन से एक ही तो सपना देखा था उसने. डॉक्टर बनने का और वही सपना यूं हथेली पर आकर फिसल जाएगा, इसकी तो उसने कभी कल्पना भी न की थी. अपनी मनोव्यथा को कम करने के लिए वो बरामदे में आ बैठी थी.

वहीं बरामदे में सुमंत बाबू भी आरामकुर्सी पर अधलेटे से पड़े थे. अपनी असमर्थता और लाचारी ने उन्हें पूरी तरह तोड़ दिया था. जैसे ही घड़ी ने बारह का घंटा बजाया, उनकी बंद आंखों से आंसुओं का सैलाब उमड़ पड़ा. पास ही खाट पर लेटी उसकी मां ने अपना चेहरा आंचल से ढंक रखा था. शायद उन्हें अपनी मजबूरी और आंसुओं को छिपाने के लिए आंचल से अच्छा कुछ और नहीं मिला था.

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तभी वैदेही ने अपनी मां की आवाज़ सुनी, “हम अपने बेटों के भविष्य की इतनी चिंता क्यों करते हैं कि बेटियों का भविष्य ही बर्बाद हो जाता है? क्या बेटियां हमारी कोखजाई नहीं होतीं? इनका भविष्य भी सुधारना है, यह बात समझने में हम इतनी देर क्यों लगा देते हैं?”

“हमेशा से हम अपने बेटों को अपनी प्रतिछाया समझ उन पर ज़रूरत से कुछ ज़्यादा ही भरोसा करते हैं. हमारा विश्‍वास होता है कि वे हमारे अधूरे कामों को पूरा करेंगे. यहीं पर हम शायद सबसे बड़ी ग़लती करते हैं, जो ल़ड़कों को लड़कियों से अलग समझ उन पर अधिक भरोसा करने लगते हैं.

वे भी क्या करें. उनकी ज़रूरत और दिखावे उनकी कमाई से ज़्यादा हो गए हैं. वे भी विवश हैं. यह सोचकर कि कहीं इस आधुनिकता के स्वार्थपूर्ण दौड़ में पिछड़ न जाएं, इसी अंधी दौड़  ने हमारे बच्चों को उत्तरदायित्व शून्य बना दिया है. वे समझते हैं कि हमने जो उनके लिए किया, जो दुख-तकली़फें सही, वह हमारा कर्त्तव्य था, त्याग नहीं. इसलिए वे वैदेही का दायित्व लेने से कतरा रहे हैं. उनकी इसी सोच की वजह से मैंने उन्हें हर उत्तरदायित्व से मुक्त कर दिया है.”

मम्मी एक गहरा निःश्‍वास खींच चुप हो गई थी. मम्मी-पापा के मन का बढ़ता सूनापन और यूं टूट-टूटकर बिखरना वैदेही को असहनीय हो रहा था. वह तड़पकर पापा के पास आ गई.

“पापा, आप क्यों उदास हैं? आपको शायद पता नहीं कि मैंने अपना फैसला बदल दिया है. मुझे डॉक्टर नहीं बनना है, अब मैं प्रशासनिक सेवा में जाऊंगी. मैंने तो इस परीक्षा की तैयारी के लिए कुछ क़िताबें भी ख़रीद ली हैं. स्नातक करने के साथ ही मैं आपको आईएएस अधिकारी बनकर दिखाऊंगी.” उसकी आवाज़ की दृढ़ता ने सुमंत बाबू को चौंका दिया, लेकिन आश्‍वस्त नहीं कर पाई.

अपने वायदे के मुताबिक वैदेही स्नातक करने के बाद दूसरे साल ही प्रतियोगी परीक्षा में सफल हो आईएएस अधिकारी बन गई थी. जिस दिन परीक्षाफल आया था, वह ख़ुद ही अपनी सफलता पर अचंभित रह गई थी. हाथों में परीक्षाफल फड़फड़ा रहा था, लेकिन उसे फिर भी विश्‍वास नहीं हो रहा था कि वह इतनी बड़ी सफलता हासिल कर चुकी है. उसकी सफलता ने स्वयं उसे ही चमत्कृत कर दिया था.

जैसे ही उसने परीक्षाफल पापा के हाथों में पक़ड़ाया, देखते ही उनकी आंखों में गर्व, हैरानी और प्रसन्नता के भाव एक साथ छलक आए थे.

“आज तुमने मेरा सीना गर्व से…” उनके आगे के बोल अवरुद्ध गले और डबडबाई आंखों में डूब कर रह गए थे. सारी ज़िंदगी सर उठाकर जीनेवाले उसके पापा की अपनी ही मजबूरी ने उम्र के तीसरे पड़ाव पर उन्हें काफ़ी कमज़ोर बना दिया था. लेकिन अपने पापा और मम्मी की ख़ुशी देख वैदेही की आत्मा तृप्त हो गई थी.

आज वैदेही को अपने-पराए सभी बधाइयां दे रहे थे. उसके भाई-भाभियां भी काफ़ी ख़ुश थे. पर उससे नज़रें नहीं मिला पा रहे थे. अपनी बहन के प्रति अपना फज़र्र् पूरा न कर पाने का अपराधबोध उन्हें साल रहा था. वहीं सफलता के उच्चतम शिखर पर पहुंचकर वैदेही के दिल में अब तक भाइयों के प्रति पलता विद्रोह और पराएपन की भावना जाने कहां तिरोहित हो गई थी. अचानक ही उसे सब कुछ अच्छा और अपना लगने लगा था और पिछली सारी बातें भुलाकर पहले की तरह ही वो अपने भाई और भाभियों से आशीर्वाद लेने जा पहुंची थी. वैदेही के इस एक क़दम ने कई वर्षों से बहन-भाइयों के बीच आए फ़ासले को मिटा दिया. वैदेही ने भले ही भाइयों के स्वार्थपरता को भुला दिया, लेकिन उसके बहुत कोशिश करने के बावजूद उसके माता-पिता अपने बेटों को कभी माफ़ नहीं कर पाए थे.

अकस्मात् घर में आई ढेर सारी ख़ुशियों ने घर का माहौल ही बदल दिया था, जिसके बीच यह कोई नहीं जान सका कि वैदेही के जीवन में डॉक्टर बनने की सबसे बड़ी अभिलाषा के राख से उत्पन्न चिंगारी ने भले ही उसे सफलता के उच्चतम शिखर पर पहुंचा दिया था, लेकिन वह एक बदले की भावना से उत्पन्न संकल्प मात्र था- पैसा, ताक़त, हिम्मत और ऊंचाई प्राप्त करने के लिए.

वैदेही को आज भी सपने आते हैं कि वह मेडिकल प्रवेश परीक्षा दे रही है. कभी देखती मेडिकल कॉलेज जानेवाली बस छूट गई है. जब नींद खुलती, वह मन ही मन संकल्प करती कि इस घर की कोई लड़की, चाहे उसकी बेटी हो या भतीजी वह उनके सपनों को कभी राख नहीं होने देगी, क्योंकि उनके सपनों को संरक्षित करने के  लिए वैदेही ख़ुद समर्थ हो गई थी.

Rita kumari

       रीता कुमारी

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कहानी- सतरंगी अरमानों की उड़ान (Short Story- Satrangi Armano Ki Udan)

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“अलग-अलग भूमिकाओं में अपने को ढालना बांटना नहीं होता, बल्कि अपने वजूद को और मज़बूत बनाना होता है. मुझे ख़ुशी है कि तुमने सुख और संतोष के बीज अपने परिवार में अंकुरित किए हुए हैं. एक बार अपने दिल के दरवाज़े को खोलकर होंठों तक गीतों को आने दो, फिर देखना कैसे वे थिरकेंगे. हमारा प्यार जितना सच है, उतना ही सच तुम्हारा परिवार भी है.”

उसका आना वैसा ही होता था, जैसे गर्मियों में मीठी बयार का बहना, जैसे सर्दियों में खिली चटकती धूप. उसके आने से कमल के पत्ते पर बिछी ओस सचमुच मोती के मानिंद लगने लगती थी. पत्ता-पत्ता, फूल-फूल खिल उठते थे, रसपान करने के लिए भंवरे मंडराने लगते थे और तितलियां अपने रंग-बिरंगे पंखों का आंचल ओढ़े

यहां-वहां इठलाने लगती थीं. सतरंगी अरमानों को उड़ान देती एक गुनगुनाती बहार अपने हवा के झोंकों में प्यारभरी ख़ुशबू भर एक ओढ़नी की तरह शरीर से लिपट जाती थी. वह घंटों, दिनों और कई बार तो महीनों तक उस ख़ुशबू को अपने भीतर महसूस करती थी.

किसी का हरदम साथ बने रहना एक ख़ूबसूरत जज़्बा ज़रूर है, पर साथ न होने पर भी उसके वजूद का हर पल बने रहना उससे भी ख़ूबसूरत एहसास है.

फिर इंतज़ार लंबा नहीं लगता…

फिर तन्हाइयां काटती नहीं हैं…

फिर सन्नाटे में बेचैनी कचोटती नहीं है…

फिर जीवन निष्प्रयोजन नहीं लगता…

ये सब बातें न तो किताबी हैं, न ही मन की कल्पना के जाल से छनकर निकलीं. ये भोगी हुई संवेदनाओं का निचोड़ है.

कहां गईं अब उसकी ये संवेदनाएं. सर्दियों की गुनगुनी धूप हो या बारिश की भीगी फुहारें, गीली घास पर चलना हो या घंटों यूं ही बैठे-बैठे गीत गुनगुनाना… पुराने गानों को सुन एक रूमानियत-सी छा जाती थी. प्रकृति से सारा संपर्क ही टूट गया है. सतरंगी अरमानों की उड़ान अपना आकाश ही ढूंढ़ रही है अब.

डेक पर चिल्लाता तेज़ म्यूजिक, तीन मंज़िला आलीशान कोठी के संगमरमरी फ़र्श और खिड़कियों पर टंगे ख़ास कनाडा से मंगाए परदे, अपनी गरिमा को दर्शाते हुए मानो उसकी भावनाओं का उपहास उड़ाने को तत्पर रहते हैं.

मैं जो मिसेज़ पराग गुप्ता, अनुभव और अरुणिमा की मम्मी, प्रतिष्ठित व अकूत संपत्ति के स्वामी गुप्ता खानदान की बहू के रूप में जानी जाती हूं, उसका अपना नाम तो भूली-बिसरी याद की तरह स़िर्फ शादी के कार्ड पर ही अंकित होकर रह गया है. हीरे के व्यापारियों के विशाल और विदेशी कलाकृतियों से सजे ड्रॉइंगरूम के ग्लास कैबिनेट में क्रिस्टल की बेशक़ीमती क्रॉकरी के बीच सजा वह कार्ड भी गुप्ता खानदान की रईसी व खुले दिल का परिचायक है.

“पूरे 700 रुपए का एक कार्ड बना था. डिज़ाइनर है. कार्ड के साथ पिस्ते की लौज का डिब्बा दिया गया था…” पिछले 10 बरसों से वह यह वाक्य न जाने कितनी बार सुन चुकी है. बस, जब भी वह उस कार्ड में पूर्णिमा वेड्स पराग पढ़ती है, तो अपना नाम ही उसके भीतर एक सिहरन-सी पैदा कर देता है.

उसके नाम को कितने प्यार से लेता था वह. “पूर्णिमा की चांदनी की तरह ही खिली लगती हो तुम हमेशा. जब हंसती हो, तो न जाने कितनी कलियां एक साथ चटक जाती हैं. हर ओर जगमगाहट फैल जाती है, बस, अब जल्दी से मेरी दुनिया में आ जाओ और उसे सतरंगी बना दो. चांदनी के हर रूप को मैं अपने में उतारना चाहता हूं.”

प्यार की उत्कृष्ट ऊंचाइयों को छूने लगती थीं उसकी आंखें और वह लजाकर अपनी पलकें झुका लेती थी. फिर झट से वह उसकी कांपती पलकों को चूम लेता था.

कॉलेज के दिनों में परवान चढ़े उनके प्यार का रंग हर गुज़रते दिन के साथ गहरा होता जा रहा था. बस, अब इंतज़ार था, तो एक हो जाने का. जिस दिन विराट को नौकरी मिली, पूर्णिमा को लगा था कि अब उसके सपनों को सच होने में देर नहीं है. उदास थे, तो बस दोनों इस बात से कि नौकरी उसे दूसरे शहर में मिली थी.

पर एक-दूसरे के वजूद के हरदम बने रहने ने इस दूरी को भी आधारहीन बना दिया. फिर फोन तो था ही दिलों के तार जोड़े रखने के लिए. उस बार जब दो महीने बाद वह लौटा, तो बहुत ख़ुश था. “पूर्णिमा, वहां मैंने सारी व्यवस्था कर ली है. एक छोटा-सा फ्लैट भी किराए पर ले लिया है. अपनी गृहस्थी बसाने का हर सामान एकत्र कर लिया है. आज शाम को मम्मी-पापा के साथ तुम्हारे घर आऊंगा. मेरा इंतज़ार करना.”

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रोम-रोम रोमांचित हो उठा था उसका. ऐसे तैयार हुई मानो आज ही दुल्हन बननेवाली हो. उसके घरवालों को उन दोनों के रिश्ते के बारे में कुछ भी पता न था, पर उसे यक़ीन था कि उसके मम्मी-पापा अपनी इकलौती बेटी की बात नहीं टालेंगे. फिर यहां तो जाति की भी समस्या नहीं थी.फ़र्क था तो केवल हैसियत का, लेकिन उससे क्या… वह निश्‍चिंत थी.

“तुमने इस तरह की कल्पना की भी तो कैसे?” पापा की आवाज़ ड्रॉइंगरूम में गूंजी, तो घबराकर वह बाहर आई.

“रिश्ता बराबरवालों में किया जाता है. प्यार का रंग ज़िम्मेदारियों की पलस्तर चढ़ते ही फीका होने लगता है. घर चलाने की मश़क्क़त जज़्बात पर पैबंद लगा देती है. यही सच है. ख़ुश रहने के लिए जितना ज़रूरी प्यार है, उतना ही पैसा भी.”

“आप पूर्णिमा की इच्छा की तो कद्र करेंगे न?” विराट ने किसी तरह अपने को संयत करते हुए पूछा था.

“बिल्कुल करूंगा, पर अगर उससे उसकी ज़िंदगी बदरंग होगी, तो बाप होने के नाते ढाल बनकर उसके सामने खड़ा भी हो जाऊंगा.”

“पापा, पर… ”

“बस…” पूर्णिमा के विरोध को पलभर में ही झटक दिया गया था.

“मेहमानों को चाय-नाश्ता सर्व कर आदर से विदा करो.”

कितना कहा था उसने विराट को कि वह सबकुछ छोड़कर आने को तैयार है, लेकिन वह उसके पापा की इज़्ज़त को खाक में नहीं मिलाना चाहता था. “मां-बाप चाहे कितनी मनमानी करें, पर उनका कर्ज़ बच्चे कभी नहीं चुका सकते.”

विराट चला गया और उसके बाद से ही न तो कमल के पत्ते पर ओस मोती की तरह दिखी, न ही सतरंगी अरमानों ने उड़ान भरी.

वह मिसेज़ पराग गुप्ता बन गई. पापा की हैसियत और गुप्ता खानदान दोनों की इज़्ज़त व सम्मान का मान रखना उसका दायित्व बन गया. उसकी सुंदरता पराग के लिए गर्व का विषय बन गई. वह जहां जाती, केवल उसके रूप का बखान होता. उसके गुण सास-ससुर के लिए अच्छे संस्कार होने का विषय थे, पर कभी गुणों की चर्चा नहीं होतीबस हीरे की परख जौहरी ही जानता है, के जुमले हवा में तैरते, उसे एहसास कराते कि देखो हीरे के व्यापारियों ने कैसा हीरा ढूंढ़ा है. उसकी चमक कभी फीकी नहीं पड़नी चाहिए, नहीं तो शोकेस में रखा अच्छा नहीं लगेगा. बच्चों के लिए वह एक स्मार्ट मां थी. सबका प्यार, स्नेह और आदर पा वह भी बहुत ख़ुश थी. क्या सचमुच ख़ुश थी? नाख़ुश होने की वजह कोई थी भी नहीं, पर वह इसलिए ख़ुश थी, क्योंकि दूसरे उससे ऐसी उम्मीद रखते थे कि गुप्ता खानदान की हीरे जैसी बहू हमेशा खिलखिलाते हुए अपनी सुंदरता की चमक उनके घर में बिखेरती रहे और उन्हें हर पल एक गर्व के एहसास से सराबोर रहने दे, वरना वह तो इन सबके बीच भी अपने होने के एहसास को हमेशा तलाशती रहती.

होंठों पर थिरकते व्याकुल गीतों को सुन स्वयं भी चटकती कलियों की तरह खिलखिलाना चाहती. उसकी बंद पलकें उस चुंबन के लिए आकुल हो उठतीं, तो घबरा जाती वह. कितना लंबा इंतज़ार हो गया है इस बार. दस साल बीत गए हैं. इस बीच न तो कभी विराट से मुलाक़ात ही हुई, न ही फोन पर बात. मन तो किया कई बार उसका कि नेट पर चैटिंग कर ले, पर शायद कुछ पल उसके लिए चुरा पाना जैसे मुश्किल ही हो गया था.

हर साल की तरह इस बार भी छुट्टियों में घूमने का प्रोग्राम बन रहा था. “इस बार सिडनी का टूर बनाते हैं.” पराग ने सुझाया तो अनुभव बोला, “नो पापा, न्यूयॉर्क चलिए. लास्ट ईयर हमने वहां कितना एंजॉय किया था.”

“तभी तो इस बार न्यू प्लेस जाएंगे बुद्धू.” अरुणिमा ने अपने छोटे भाई को समझाया.

सिडनी की जगमगाती रातों में, मखमली सड़कों पर से गुज़रते, शॉपिंग करते और होटलों में खाना खाते, अपने परिवार को मौज-मस्ती करते देख पूर्णिमा संतुष्ट थी.

पर सतरंगी उड़ान और गुनगुनाती बहार और उसकी मीठी छुअन की चाह उसका मन बार-बार भटका देती. संडे था उस दिन. बच्चे होटल में ही रहकर गेम्स खेलना चाहते थे और पराग अपने किसी मित्र से मिलने गया था. अकेली ही निकल गई वह सिडनी की सड़कों पर सैर करने. इंडियन फूड सर्व करनेवाले होटल में कॉफी पीने के ख़्याल से घुसी. सोच के पाखी उसके अंतस से निकल यहां-वहां उड़ने लगे.

“कैन यू गेट मी ए कप ऑफ कॉफी एंड सम स्नैक्स.”

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ये आवाज़… अचानक पूर्णिमा को लगा जैसे चटकती धूप के टुकड़े उसकी टेबल पर आ नृत्य कर रहे हैं, उसके वजूद में बसी ख़ुशबू चारों ओर गमकने लगी है. उसकी भावनाएं पायल की रुनझुन की तरह हो गई हैं. छन-छन की मीठी-सी धुन बजने लगी है हर तरफ़. उसने पलटकर देखा. दोनों की नज़रें मिलीं और धड़कनें तेज़ हो गईं.

“पूर्णिमा तुम? तभी सोच रहा था कि आज सिडनी की सुबह इतनी चटकीली कैसे हो गई है.” वही चिर-परिचित अंदाज़, आंखों में प्यार और चेहरे पर मासूम मुस्कान. विराट से इस तरह मुलाक़ात होगी, सोचा तक नहीं था.

“कैसी हो? ”

“अच्छी हूं… और तुम?”

उसके बाद मौन पसर गया दोनों के बीच. मानो दस बरसों के उस अंतराल को दोनों इन क्षणों में अपनी मुट्ठी में ़कैद कर लेना चाहते हों.

“मुझे कभी माफ़ कर पाओगे विराट?”

“तुमसे कोई शिकायत ही नहीं है. वैसे भी दूरियां कभी भी प्यार के रंग को फीका नहीं कर पाती हैं. तुम आज भी मेरे साथ हो. मेरा वजूद तुमसे ही है.”

“लेकिन मैंने अपना वजूद खो दिया है विराट. इस पूर्णिमा ने बस अलग-अलग भूमिकाओं में अपने को बांट रखा है. ख़ुद के लिए कभी कुछ करने को मन ही नहीं करता.” उसकी पलकें थरथरा रही थीं.

“नहीं, तुम ग़लत कह रही हो. अलग-अलग भूमिकाओं में अपने को ढालना बांटना नहीं होता, बल्कि अपने वजूद को और मज़बूत बनाना होता है. मुझे ख़ुशी है कि तुमने सुख और संतोष के बीज अपने परिवार में अंकुरित किए हुए हैं. एक बार अपने दिल के दरवाज़े को खोलकर होंठों तक गीतों को आने दो, फिर देखना कैसे वे थिरकेंगे. हमारा प्यार जितना सच है, उतना ही सच तुम्हारा परिवार भी है. तुम संबंधों को ज़िम्मेदारियों की तरह बख़ूबी निभा रही हो, पर मन के दरवाज़े पूरी तरह खोलकर नहीं.”

शाम हो गई थी. दोनों को ही लौटना था. पर इस बार पूर्णिमा के क़दमों में अपने लिए किसी अलग रास्ते को तलाशने के लिए सबसे कटकर चलने की अकुलाहट नहीं थी. उसका वजूद है… रिश्तों के ओर-छोर में लिपटा… पराग, बच्चे, घर-परिवार… क्या इनके बीच रहकर वह अपने वजूद को पंख नहीं दे सकती…? सभी तो उसे कितना प्यार करते हैं… कार में बैठकर पलकें बंद कीं, तो महसूस हुआ जैसे अब भी हवा में ख़ुशबू तैर रही है, उसके सतरंगी अरमानों को जैसे आसमान मिल गया है.

Suman Bajpai

   सुमन बाजपेयी

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कहानी- रिश्तों का दर्द (Short Story- Rishto Ka Dard)

“मैं होती तो शायद यह नहीं करती जो आपने किया.”

“नहीं रति, कभी-कभी अपनों को ही सुखी देखने के लिए अनचाहे, कठोर निर्णय लेने पड़ते हैं. वह मां ही क्या जो बच्चों के लिए त्याग न कर सके. सम्बन्धों को समाप्त करने या बिगाड़ने से अच्छा है उन्हें बहानों की आड़ में एक सुन्दर मोड़ दे दिया जाए.”

Short Story in Hindi

“अरे, आप इन्दू दी हैं ना. यहां! इस इण्टरव्यू में!! इतने दिनों बाद!” प्रधानाचार्या रति शर्मा कक्ष के दरवाज़े को खोलकर अन्दर प्रवेश करती हुई महिला को देखकर चौंकते हुए बोली. आश्‍चर्य से उनकी आंखें फैल गयी थीं. कॉलेज में वर्षों से रिक्त पड़े पदों को सेवानिवृत्त शिक्षकों से भरने के लिए उन्होंने जो विज्ञापन दिया था, उसी का आज इंटरव्यू चल रहा था. “हां, मैं इन्दू कुलश्रेष्ठ ही हूं.” मुस्कुराते हुए धीमी आवाज़ में उस महिला ने कहा, “आइये… आइये इधर बैठिए.” कहते-कहते रति शर्मा अपनी कुर्सी से लगभग खड़ी हो गई. कॉलेज के मैनेजर डॉ. वर्मा तथा साक्षात्कार समिति के अन्य सदस्यों ने प्रश्‍नसूचक दृष्टि से पहले रति शर्मा, फिर उस नवागंतुका को देखा. सबकी जिज्ञासा के प्रत्युत्तर में रति शर्मा ने कुर्सी पर बैठते हुए उस महिला की ओर संकेत करते हुए कहा, “ये हैं मिसेज इन्दू कुलश्रेष्ठ, इस कॉलेज की भूतपूर्व प्रवक्ता, जो वर्ष 1995 में स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेकर यहां से चली गयी थीं. इन्हें स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति देने के लिए न पिछले मैनेजर साहब तैयार थे, न ही भूतपूर्व प्रधानाचार्य डॉ. अस्मित निगम, क्योंकि यह इस कॉलेज की बहुत ही योग्य एवं बहुमुखी प्रतिभा सम्पन्न शिक्षक-शिक्षिका थीं. छात्राएं ही नहीं, हम सब शिक्षिकाएं भी इनका सम्मान करते थे और इनके कॉलेज से जाने के नाम पर ही व्यथित थे. लेकिन यह हम सबको रुलाकर यहां से चली ही गयीं. और आज इतने दिनों बाद फिर इन्हें यहां इस तरह देखकर मैं सचमुच हैरान हूं. सारे कॉलेज का आग्रह व रुदन जिसे न रोक सका, वही आज पुनः इसी कॉलेज में…”

“हां, मैं फिर यहां वापस आ गयी.” छोटा-सा उत्तर दिया उस महिला ने जिसका गला भर आया था और जो आंखों की नमी को छिपाने की पूरी कोशिश कर रही थी. रति शर्मा एकटक उस महिला को कुछ पल देखती रही. फिर डॉ. वर्मा की ओर मुड़कर बोली, “भई मैनेजर साहब, अंग्रेज़ी प्रवक्ता के लिये इन्दू, मेरा मतलब है मिसेज इन्दू कुलश्रेष्ठ से बेहतर अन्य कोई शिक्षिका नहीं हो सकतीं. मेरे विचार से सर्व सहमति से इन्हें ही इस पद के लिये चुन लिया जाए.”

“हां-हां क्यों नहीं, जब यह इस विद्यालय की अध्यापिका रह चुकी हैं तो फिर और कुछ देखने-जानने की ज़रूरत ही क्या है?” डॉ. वर्मा ने अपने अन्य सदस्यों की ओर देखा, जिन्होंने उनकी सहमति में सिर हिला दिये थे. “लेकिन…” अभी वह महिला अपनी बात कह ही नहीं पायी थी कि रति शर्मा बीच में बोल पड़ी- “लेकिन-वेकिन कुछ नहीं, हम आप पर कोई एहसान नहीं कर रहे हैं. आपने जो यश अपनी योग्यता से अर्जित किया है, हम उसका केवल सूद ही आपको दे रहे हैं. इन्दू दी, उन दिनों मैं प्रधानाचार्य नहीं, बल्कि आपसे कनिष्ठ शिक्षिका थी. लेकिन छात्राओं की तरह ही मैं भी आप की ज़बरदस्त फैन थी. आपने इस कॉलेज को जो दिया, उसे मैं भूली नहीं हूं.”

कृतज्ञता की झलक इन्दू की आंखों में तैर रही थी. वह जाने के लिए उठी ही थी कि रति शर्मा ने आग्रह पूर्वक कहा, “हां, एक बात और आज शाम को आप मेरे घर खाने पर आ रही हैं.”

कॉलेज से घर आकर रति शर्मा के मन में इन्दू कुलश्रेष्ठ को लेकर तरह-तरह के विचार उठ रहे थे. इन्दू का पूरा अतीत उसकी आंखों में सजीव हो उठा. इन्दू ने अपने बहनोई राजेश से विवाह किया तो सारा कॉलेज चकित था कि इतनी सुंदर, योग्य, आर्थिक रूप से पूर्णत: आत्मनिर्भर लड़की ने एक विधुर से, जिसका कि एक बेटा भी था, उससे विवाह क्यों किया. लेकिन उसके निकट रहनेवाले जानते थे कि इन्दू को अपनी बहन के बच्चे स्मित से बहुत ही स्नेह था और वह नहीं चाहती थी कि कोई सौतेली मां उसके स्मित से दुर्व्यवहार करे, इसलिए राजेश के माता-पिता की ओर से राजेश की दूसरी शादी इन्दू से किए जाने का प्रस्ताव आते ही अपनी मां की कठोर अनिच्छा के बावजूद उसने हां कर दी थी. विदाई के समय आंसुओं से भीगा मां का चेहरा चूमकर उसने कहा था, “मां, तुम स्मित को छूकर कहो कि मैंने ग़लत किया. तुम मेरे लिए दुखी मत हो, राजेश मेरा ख़याल रखेंगे.” लेकिन शादी के कुछ ही महीने बाद ट्रेन दुर्घटना में राजेश की मृत्यु हो गयी. इन्दू का वैधत्व सारे कॉलेज को रुला गया. दूसरी शादी के कितने ही प्रस्ताव उसके घरवालों के पास आते, लेकिन उसका एक ही उत्तर था कि शादी के बाद कोई भी सौतेला पिता मेरे स्मित को हृदय से अपना नहीं पायेगा.

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इसके बाद इन्दू का जीवन-चक्र स्मित के इर्द-गिर्द ही घूमने लगा. कॉलेज में भी कभी-कभी वह उसे ले आती. सभी उसे प्यार करते और पूछते कि तेरी मम्मा कौन है तो वह मुस्कुराता हुआ अपनी छोटी-छोटी उंगलियां इन्दू की ओर उठा देता. सब हंस पड़ते और इन्दू का चेहरा मातृत्व की गरिमा से खिल उठता.

धीरे-धीरे दिन महीनों में, महीने वर्षों में बदलते गये. स्मित की शिशु सुलभ क्रियाएं बालावस्था की क्रीड़ाओं का रूप लेने लगीं. नर्सरी व के.जी. कक्षाओं को पार करते हुए स्मित विश्‍वविद्यालय के द्वार तक पहुंच गया. इन्दू को बस एक ही धुन थी कि वह स्मित को अच्छी से अच्छी शिक्षा दे, जिससे वह बहुत बड़ा आदमी बन सके. समाज में धन के साथ ज्ञान भी अर्जित करे. इसके लिए उसने अपनी ओर से कोई कसर नहीं छोड़ी थी.

रति शर्मा को याद आ रहा था कि बीए पास करने के बाद स्मित जब आईएएस की तैयारी कर रहा था तो इन्दू ने कॉलेज से छुट्टी ले ली थी. प्रिंसिपल ने उसके अवकाश प्रार्थना पत्र को देखकर हंस के पूछा था, “अरे भाई, आईएएस में बेटा बैठ रहा है. तुम तो नहीं ना, फिर ये छुट्टी किसलिए?”

“मेरे घर पर रहने से उसकी पढ़ाई और अच्छी तरह से हो सकेगी. उसे अपनी पढ़ाई के आगे खाने-पीने तक की सुध नहीं रहती मैडम.” इन्दू ने प्रत्युत्तर दिया था.

स्मित की परीक्षाएं समाप्त हो गयीं, तो सभी को स्मित के परीक्षा फल का बेसब्री से इंतज़ार था. इन्दू की नज़र तो अख़बारों में ही अटकी रहती. उसकी मनोदशा देखकर स्टाफ रूम में शिक्षिकाएं खुसर-फुसर करतीं. अधिकांश तो स्नेह से कहतीं, लेकिन कुछ ईर्ष्यावश भी कहतीं कि आख़िर इन्दू की तपस्या और स्मित की मेहनत रंग लाई. फिर आईएएस का परीक्षा फल निकला. सूची में स्मित दूसरे नम्बर पर था. उस दिन कॉलेज में इन्दू व स्मित की ही चर्चा सबके मुख पर थी. लोग इन्दू को बधाई दे रहे थे और इन्दू थी कि रोये ही जा रही थी. मारे ख़ुशी के उसके आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे.

इसके बाद इन्दू के मुख पर अचानक प्रौढ़ता झलकने लगी. स्मित के ट्रेनिंग पर चले जाने के बाद वह सबसे कहने लगी “अब नौकरी करने का मन नहीं चाहता… बहुत थकान लगती है. सोचती हूं, स्मित के नौकरी ज्वाइन करने के बाद मैं स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले लूं.”

“अरे, ऐसी भी क्या जल्दी है?” सभी इन्दू का विरोध करते. सब जानते थे कि इन्दू कॉलेज की सभी क्रियाओं व कार्यक्रमों की धुरी थी. उसके जाने पर उसकी कमी को भर पाना आसान नहीं था. लेकिन स्मित की ज्वाइनिंग के बाद इन्दू ने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले ही ली. प्रधानाचार्य अस्मिता निगम ने उसे बहुत समझाया था कि सर्विस पूरी किए बिना बीच में सेवा निवृत्ति लेने से उसका आर्थिक रूप से नुक़सान ही है. लेकिन इन्दू को एक ही धुन थी, “अब मुझे पैसों की क्या चिन्ता? फिर स्मित भी तो नहीं चाहता कि मैं नौकरी करूं. वह मुझे बहुत अच्छी तरह खिला-पहना सकता है. बेटे की बात मैं कैसे टाल दूं?”

आख़िर इन्दू कुलश्रेष्ठ ने विद्यालय छोड़ दिया और बेटे के साथ दिल्ली चली गयी. जाने से पहले कॉलेज आयी थी, सभी को बहुत शानदार पार्टी दी थी. रति शर्मा इन्दू से मिलकर बहुत रोयी थी. कुछ महीनों तक इन्दू से पत्र-व्यवहार भी चलता रहा, लेकिन धीरे-धीरे यह सिलसिला भी समाप्त हो गया था. और आज अचानक उसी इन्दू कुलश्रेष्ठ को देखकर रति शर्मा अचंभित थी. मन में उठ रहे हज़ार प्रश्‍न उसे विस्मित कर रहे थे. नौकरी बीच में छोड़ कर जानेवाली इन्दू दी फिर वापस क्यों चली आयी.

अचानक कॉलबेल बज उठी. उसने स्वत: दौड़कर दरवाज़ा खोला तो देखा इन्दू खड़ी थी. रति शर्मा इन्दू से लिपट गयी. कॉलेज में सबके सामने जो संकोच था, वह नौकर-चाकरों के सामने स्थिर न रह सका. मैं बहुत बेचैनी से आपकी प्रतीक्षा कर रही थी. आपसे बहुत-सी बातें पूछने का मन हो रहा था जो सबके सामने न पूछ सकी, इसलिए रात के भोजन के नाम पर आपको बुला लिया. यहां कैसे आयीं? घर कहां है? स्मित का यहां स्थानान्तरण हो गया है क्या…?” आदि तमाम प्रश्‍न रति शर्मा ने एक साथ इन्दू से कर डाले.

“अरे भाई, बैठने भी दोगी या यहीं से सब प्रश्‍न पूछ लोगी.” इन्दू ने एक फीकी मुस्कान के साथ कहा. “हां-हां, आइए, आराम से ड्रॉइंगरूम में बैठकर बातें करते हैं.” कह कर रति इन्दू को अन्दर ले गयी और कॉफी के लिए पास खड़े नौकर से कह दिया. उसके जाते ही रति ने बेचैन होकर कहा, “आख़िर कौन-सी मजबूरी आपको फिर यहां ले आयी दीदी? मैं यही जानने के लिए सबसे ज़्यादा बेचैन हूं.”

“नियति… मेरी नियति मुझे फिर यहां ले आई. मनुष्य की जीवन-डोरी का सूत्रधार तो वह ऊपरवाला ही है न…” इन्दू की आंखों में एक खालीपन था. “देखिये, पहेलियां न बुझाइए, अगर बताने योग्य हो तो खुलकर कहिए, मैं बहुत अधीर हो रही हूं.” रति ने कहा था.

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“तुमसे क्या छिपाना रति… और छिपाने जैसा कुछ है भी नहीं.” इन्दू ने कहना आरम्भ किया, “कॉलेज को तिलांजलि देकर मैं तुम सबको छोड़कर चली गयी. स्मित को लेकर ही मैंने जीवन का ताना-बाना बुना था. तुम तो जानती हो वही मेरा अतीत था, वही वर्तमान और वही मेरा भविष्य भी था. दिल्ली में स्मित के ज्वाइन कर लेने पर उसके लिए रिश्तों की जैसे बाढ़-सी आ गयी थी. एक से एक उच्च अधिकारियों की सुन्दर से सुन्दर लड़कियों के प्रस्ताव आ रहे थे. स्मित के पास तो सबके लिए एक ही जवाब था, “जो मां की पसन्द, वही मेरी पसन्द.” लेकिन स्मित के इस उत्तर ने मेरे ऊपर सुसंस्कृत व सुशील लड़की ढूंढ़कर लाने का दायित्व और बढ़ा दिया था. बहुत सोचने-समझने के बाद एक सुसंस्कृत, शिक्षित परिवार की कन्या से मैंने स्मित का विवाह कर दिया. स्मित की पसन्द मैं जानती थी. उसके लिए रूप से अधिक गुण का महत्व था. बहुत आधुनिक, नाज़-नखरेवाली लड़कियों से वह दूर ही रहता था. मेरा श्रम-साध्य जीवन उसके लिए आदर्श था. वह प्रशासनिक सेवा में था, इसलिए उसकी नौकरी मेरी नौकरी की प्रकृति से बिल्कुल भिन्न थी. फिर भी वह प्राय: कठिन प्रसंगों में मुझसे राय ले लेता.

“स्मित की बहू शुचि के आ जाने पर मैं बहुत हल्कापन महसूस करने लगी थी. घर से लेकर बाज़ार तक के सारे कार्यों में शुचि का मेरे साथ होना मुझे बहुत सुखद लगता. सारा जीवन अकेले ही सब करते-करते मैं थक गयी थी. स्मित भी शुचि को पाकर प्रसन्न था. उसे लगता कि वह उसके विचारों के अनुरूप ही होगी और वह मुझे वैसा ही मान-सम्मान देगी जैसा कि वह स्वयं देता है. वह प्राय: मेरे अतीत की चर्चा शुचि से करता और अपने आईएएस अधिकारी बनने का पूरा श्रेय अपनी लगन व परिश्रम को न देकर मुझे ही देता, जिसे सुनकर मुझे ऐसा लगता जैसे मैं धरती पर नहीं, आकाश पर पांव रखकर चल रही हूं. किन्तु उसका ऐसा मानना और ऐसी सोच ही उसके दाम्पत्य जीवन के सुख का कांटा बन गयी. एक दिन मैं बाहर लॉन में टहल रही थी कि अचानक स्मित के कमरे से ज़ोर-ज़ोर से आवाज़ आने लगी. मैं पास से गयी तो शुचि स्मित पर नाराज़ हो रही थी, “तुम्हें मां के सिवाय भी कुछ दिखता है? हर बात में मां ही मां रहती हैं. तुम्हारी मां ने त्याग किया तो कौन-सी बड़ी बात है? सभी की मां ऐसा ही करती हैं. लेकिन सब तुम्हारी तरह मां की माला नहीं जपते.” “अच्छा धीमे बोलो, मां सुनेंगी तो उन्हें दुख होगा.” स्मित ने शुचि को डांटते हुए कहा.

“मेरी बला से, सुन ले तो अच्छा ही है.” शुचि का स्वर और ऊंचा हो गया. “कम से कम पीछा तो छोड़ दें.” शुचि के मुंह पर शायद स्मित ने हाथ रख दिया था, इसलिए दबी आवाज़ के सिवाय मुझे कुछ नहीं सुनाई दिया.” इन्दू का चेहरा म्लान हो गया था. मैं फिर कुछ देर के लिए रुककर उन्होंने बातों का क्रम आगे बढ़ाया. “उस दिन के बाद रोज़ किसी न किसी बात पर शुचि स्मित से झगड़ने लगी.

स्मित जितना ही उसे ख़ुश रखने व समझाने की कोशिश करता, वह उतना ही उस पर हावी होने का प्रयास करती. उन दोनों के झगड़े से अनजान बनकर मैंने धीरे-धीरे अपने को समेटना आरम्भ कर दिया. बीमारी का बहाना बनाकर मैं उनके साथ घूमने से बचने लगी. रसोई की सब्ज़ियों से लेकर कपड़ों की ख़रीदारी तक में मैं शुचि की पसन्द को ही महत्व देने लगी. लेकिन इस पर भी वह सामान्य नहीं रहती थी. स्मित सब समझता था. वह मुझे अलग हटते देखकर मन ही मन दुखी था. प्रात: मेरे पास बैठता. सोने से पहले मेरा हाल लेता, दवा आदि देता. कहता तो कुछ नहीं था, लेकिन अन्दर से वह सुखी भी नहीं था, मां और पत्नी को लेकर उसका जीवन उलझ रहा था…”

“आपने शुचि को उसके दुर्व्यवहार के लिए कुछ कहा क्यों नहीं? अध्यापिका होने पर भी क्या आपके पास शब्दों की कमी थी?” रति शर्मा ने बीच में इन्दू से पूछा.

“नहीं, शब्दों की कमी तो मेरे पास कभी नहीं रही, लेकिन जीवन के कुछ ऐसे मार्मिक प्रसंग होते हैं, जहां शब्दों की नहीं भावनाओं की और समझ की आवश्यकता होती है. ईर्ष्या और दुराग्रह का निदान शब्दों से नहीं किया जा सकता. मैंने शुचि को प्यार व स्नेह देने में कोई कसर नहीं रखी थी, फिर उसका मुझसे चिढ़ना, यह ईर्ष्या के अतिरिक्त कुछ नहीं था. वह स्मित के जीवन से मुझे निकाल फेंकना चाहती थी. अतीत को तो वह बदल नहीं सकती थी, लेकिन भविष्य को वह अवश्य बदलना चाहती थी, जिसमें मेरा कोई चिह्न न हो. मैंने जीवन के बहुत उतार-चढ़ाव देखे हैं, जाने कितने लोगों से मिली हूं, इसलिए किसी के व्यवहार से उसका मन समझ लेना मेरे लिए कोई मुश्किल काम नहीं है. मैं झगड़कर अपना हक़ लेने में विश्‍वास नहीं करती. जानती हूं, इससे सम्बन्धों की खाइयां गहरी ही होती जाती हैं.”

“तो क्या शुचि ने आपको घर से निकाल दिया?” अभी रति की बात पूरी भी नहीं हो पायी थी कि इन्दू ने बीच में ही उसे रोक दिया, “नहीं-नहीं, मैं ऐसी कमज़ोर भी नहीं कि कोई मुझे निकालता और न ही स्मित ऐसा होने देता. लेकिन मुझे ऐसा लगने लगा कि मेरी निरन्तर उपस्थिति स्मित के जीवन को संकटमय अवश्य बना देगी. सम्बन्धों में कटुता न आने देने के लिए मुझे ही मोह त्याग करना पड़ेगा, इसीलिए मैंने अध्यापन से पुन: जुड़ने का प्रस्ताव स्मित के सामने रखा. यह जानकर उसे बहुत दुख हुआ. कहने लगा कि सारा जीवन नौकरी से तुम्हारा मन नहीं भरा मां, जो इस उम्र में मेहनत-मज़दूरी करोगी. लेकिन मैंने यह कहकर अपना तर्क रखा कि मेहनत-मजदूरी नहीं, अध्यापन तो मेरे खालीपन का उपचार है. मेरा जीवन इसी को समर्पित रहा है… यही मेरे सारे दुख-दर्द का मरहम है. स्मित चुपचाप मेरा मुंह देखता रहा. शायद मेरे अन्दर की पीड़ा को वह समझ रहा था.

फिर दूसरे दिन जब रोज़गार कार्यालय के दैनिक पत्र में मैंने इस कॉलेज का विज्ञापन देखा. सेवानिवृत्त शिक्षिकाओं को नियुक्ति देना कुछ अविश्‍वसनीय अवश्य लगा, फिर भी मैंने प्रार्थना पत्र दे दिया और जब इंटरव्यू के लिए पत्र मिला, तो मुझे स्मित से हटकर रहने का ख़ूबसूरत बहाना मिल गया. उसने मुझे बहुत रोका, लेकिन मैं बराबर उससे मिलते रहने का आश्‍वासन देकर चली आई.” इन्दू की आंखों के आंसू थम नहीं रहे थे. रति शर्मा ने उसका हाथ पकड़कर कहा, “मैं होती तो शायद यह नहीं करती जो आपने किया.”

“नहीं रति, कभी-कभी अपनों को ही सुखी देखने के लिए अनचाहे, कठोर निर्णय लेने पड़ते हैं. वह मां ही क्या जो बच्चों के लिए त्याग न कर सके. सम्बन्धों को समाप्त करने या बिगाड़ने से अच्छा है उन्हें बहानों की आड़ में एक सुन्दर मोड़ दे दिया जाए.”

इन्दू की दबी हुई रुलाई फूट पड़ी थी और रति शर्मा मूक होकर तपस्विनी मां को दर्द से मोम की तरह पिघलते हुए देख रही थी.

– प्रेमा राय

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कहानी- सम्मोहन (Short Story- Sammohan)

मेरे सवाल को उन्होंने टालने की बहुत कोशिश की, पर फिर हथियार डाल दिए. मुझसे वायदा लिया कि मैं कभी किसी से इस राज़ का खुलासा नहीं करूंगी.
वह मुझे बताने लगीं.
“हम औरतें सहनशील होती हैं. रिश्तों के खोखलेपन और खालीपन को पी जाती हैं. किसी को कुछ नहीं बतातीं, पर मुझसे इनकी पीड़ा देखी नहीं जाती थी. एक सीमा जब पार होती दिखी, तो मैंने अपने भीतर छिपाए एक राज़ का पर्दाफाश कर दिया.”
“राज़?” मैंने सवाल किया.
“हां राज़.”

Hindi Short Story

यज्ञदत्त शर्मा ‘नवीन’- अब तक वे केवल यज्ञदत्त शर्मा थे. 70 साल की उम्र में ‘नवीन’ उपनाम लगाने की क्या सूझी उन्हें, यह सवाल मेरे मन में उमड़ी उत्सुकता की सारी हदें पार कर गया. यज्ञदत्तजी से सीधा सवाल करना मुझे ठीक नहीं लगा, सो मैंने तारीफ़ का तीर फेंका-
“अरे वाह यज्ञदत्तजी, यह नवीन उपनाम तो बहुत ‘सूट’ करता है आप पर. हमें भी तो हमराज़ बनाइए न? बुढ़ापे में हमारे भी काम आएगा.”
सवाल का असर हुआ. 70 साल का कमान-सा शरीर तीर-सा तन गया. मोटे चश्मे के पीछे मुरझाई-सी दो बूढ़ी आंखों में चमक आ गई, जैसी बच्चों की आंखों में होती है. यज्ञदत्तजी बोले, “मेरा जीवन बदल गया है. मेरे जीवन में नवीनता आ गई है. जब से मैंने बांसुरी बजानी शुरू की है, तब से मेरे परिवार के लोग मेरे पास आकर बैठने लगे हैं. मेरी बांसुरी की आवाज़ से सम्मोहित होने लगे हैं. मेरे बेटे, मेरी बहुएं, मेरे पोते-पोतियां सब मुझे चाहने लगे हैं. इसलिए मैंने अपने नाम के आगे ‘नवीन’ उपनाम लगा दिया है. सच पूछो तो अपनी जवानी के दिनों में यह मेरी दिली इच्छा थी, पर मौक़ा ही नहीं मिला, सोचने की फुर्सत ही नहीं मिली. जवानी की चाहत बुढ़ापे में पूरी कर ली.”
यज्ञदत्तजी को मैं पिछले 12 सालों से जानती हूं. ह़फ़्ते में दो बार मेरे द़फ़्तर आना उनका नियम-सा बन गया था. द़फ़्तर में आते तो सबसे दो मीठे बोल बोलते, सबसे हाथ मिलाते, हालचाल पूछते, फिर आकर मुझे अपनी राम कहानी सुनाते. पहली बार जब मिले थे तो नौकरी से हाल ही में रिटायर हुए थे. चुस्ती-तंदुरुस्ती बरकरार थी. तब एक शौक़ उनके जीवन का पर्याय बना हुआ था, पेड़ों में आकृतियां तलाशते फिरते थे. पेड़ की शाखों, तनों और जड़ों में आकृतियां ढूंढ़ने का यह शौक़ उनके जीवन की एकमात्र उपलब्धि था.
उनका शयनगार किसी और को पहली नज़र में कबाड़खाना नज़र आ सकता था. पर यज्ञदत्तजी की नज़र में वह उनके जीवन की अमूल्य धरोहर था.
उनकी इस धरोहर में शामिल थी गिरगिट के आकार की एक जड़, शेर की मुखाकृति से मेल खाता एक तना, सांप-सी लहराती एक शाखा, बुढ़ापे के उजाड़ को चिह्नित करता एक झुरमुट, जो किसी पेड़ की जड़ थी, बारहसिंघा का मुंह और ऐसी लगभग 20 आकृतियां.
यज्ञदत्तजी अपनी इस धरोहर को संवारते और तराशते भी रहते थे. आकार और आकृति के अनुरूप अपनी कल्पना से कभी कुछ जोड़ देते, तो कभी कहीं से थोड़ा कुछ काट देते. कई दिनों की अथक मेहनत के बाद तैयार होती थी एक धरोहर. जैसे ही कोई आकृति तैयार होती, सीधे मेरे द़फ़्तर आते, अनुग्रह और आग्रह करने. धरोहर की फ़ोटो खिंचवाते. एक लेख लिखवाते, पत्र-पत्रिका में भेज देते.

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शुरू-शुरू में तो मुझे मज़ा आता था, पर फिर मैं उनसे कतराने लगी. टालने-टरकाने का बहाना ढूंढ़ने लगी. उन्हें टालने-टरकाने का यह पल और उस पल से उपजा हुआ एहसास, कभी-कभी मुझे आत्मग्लानि से भर देता था. मेरे इस व्यवहार से उन्हें पीड़ा भी होती थी, पर अपने जीवन में अपनों से मिली पीड़ा के वह इतने आदी हो चुके थे कि सब कुछ हंसकर झेल जाते थे. मेरा टरकाना उनके अपने घरवालों की दुत्कार से बहुत कम पीड़ादायक था. उन्होंने कई बार अपनों से मिली इस दुत्कार की रामकहानी मुझे सुनाई थी. पकी हुई उम्र के थे, इसलिए रामकहानी सुनाते व़क़्त मन के भीतर उमड़ी आंसुओं की बाढ़ को आंखों के बांध से बांधे रखते थे. क्या मजाल, जो एक बूंद भी छलक जाए. मुझे भी अपनी आंखों के गीलेपन को पीना पड़ता था.
रिटायरमेंट (सेवानिवृत्ति) पर मिला सारा पैसा अपनी पत्नी को देना वे अपने जीवन की पहली और सबसे बड़ी भूल मानते थे. उनकी पत्नी बेटे-बहुओं के मोहपाश में बंधी हुई थी. रिटायरमेंट पर मिला रुपया बेटों को देती रही. बेटों ने दो कमरोंवाले पुराने मकान को चार कमरोंवाले आधुनिक मकान बनाने में सारे रुपए ख़र्च कर दिए. यज्ञदत्तजी के अनुसार उनकी पत्नी सब कुछ लुटा बैठी थीं. वे कई बार इस बात को दोहराते थे. इस वाक्य को कभी-कभी ‘हादसे’ का नाम भी देते थे. अपने दर्द को छुपाने के लिए ज़ोर से हंस भी देते थे.
मकान बन गया, तो सब कुछ बदल गया. मकान का आंगन तो गया ही, अपने भी पराए हो गए. यज्ञदत्त शर्मा के तीन बेटों ने एक-एक कमरा अपने कब्ज़े में ले लिया और चौथे कमरे को ड्रॉइंगरूम बना दिया.
आदमी अपनी हैसियत को छुपाने के लिए अक्सर इस ड्रॉइंगरूम का सहारा लेता है. ख़ूब सजा-धजा के रखा जाता है इसे. ड्रॉईंगरूम में सभी बूढ़ों का प्रवेश वर्जित रहता है. कोई तख़्ती तो नहीं टांगता, पर होता यही है. नए ज़माने की नई सोच.
यज्ञदत्त शर्मा का घर भी नए ज़माने की इस रीति-नीति से कैसे बच सकता था भला? परोक्ष-अपरोक्ष रूप से उनकी बहुओं ने उन्हें जता दिया था कि ड्रॉइंगरूम में उनका प्रवेश वर्जित है. मेहमानों के सामने आने की भी सख़्त मनाही थी.
उनकी जीवनभर की जमा-पूंजी से बने उनके अपने घर में उन्हें मकान का वो हिस्सा दिया गया, जिसे पुराने ज़माने का चौक या वराण्डा कहते थे. अब उसका नामकरण ‘लॉबी’ कर दिया गया है.
चार कमरों के बीच की खुली जगह के दो कोने यज्ञदत्त शर्मा और उनकी बीवी को मिले. एक कोने में यज्ञदत्तजी का पुराना पलंग और कबाड़ जमा था, दूसरे कोने में पत्नी की खाट लगा दी गई. चौक में एक लंबा-सा पर्दा भी था. मेहमानों के आने पर इस पर्दे को खींच दिया जाता था, ताकि ड्रॉइंगरूम का रौब कम न हो जाए.
“यह तो गनीमत है कि सरकार ने एक नियम बना दिया है. पेंशन एकाउण्ट (खाता) ज्वाइंट एकाउण्ट (संयुक्त खाता) नहीं हो सकता, वरना शायद ये दो कोने और दो व़क़्त का खाना भी नसीब न होता.” यज्ञदत्त जी के ये शब्द मेरे कानों में अक्सर गूंजते रहते थे.
उन्होंने एक समझौता किया था. इस समझौते के तहत पेंशन के तीन चौथाई हिस्से के बदले उन्हें रहने-खाने की सुविधाएं मिल रही थीं. बेटों का सुख भी मिल रहा था. इसे ‘नामसुख’ कहते हैं. बाप का नाम बेटे के नाम के साथ जुड़ा रहे तो वह ‘नामसुख’ कहलाता है. कई लोग तड़पते हैं इस ‘नामसुख’ के लिए.
यज्ञदत्तजी ने जब अपने तीनों बेटों का स्कूल में दाखिला करवाया था, तो बहुत गर्व से नाम लिखा था- राजेश यज्ञदत्त शर्मा, विमल यज्ञदत्त शर्मा, कमल यज्ञदत्त शर्मा. उनके रिटायरमेंट तक यही नाम चले. घर में भी और घर के बाहर लगी नेमप्लेट पर भी. नया मकान बना, तो पुरानी नेमप्लेट फेंक दी गई और एक नई तख़्ती टांग दी गई. इस तख़्ती पर लिखा था ‘कमल वाई. शर्मा, विमल वाई. शर्मा तथा राजेश वाई. शर्मा’ मन और एहसासों के साथ नाम भी छोटे हो गए थे.
यूं तो यज्ञदत्तजी का नाम हर तरह से गायब हो गया था, पर उससे क्या फ़र्क़ पड़ता है. यज्ञदत्त का ‘वाई.’ तो बचा है अभी. इसी वाई को ज़िंदा रखने के लिए दुआएं मांगी जाती हैं, मन्नतें मांगी जाती हैं, एक अदद बेटे की. यज्ञदत्तजी तो ख़ुशनसीब थे, तीन-तीन ‘वाई’ टंगे थे उनके घर के आगे.
ऐसे यज्ञदत्तजी ने अपना शौक़ बदल लिया और अब वे ख़ुश हैं, यह देखकर मुझे आत्मसंतोष मिल रहा था.
यज्ञदत्त शर्मा ‘नवीन’ अपने इस नए शौक़ के सम्मोहन में पूरी तरह बंध गए थे. बेटे-बहुएं, पोते-पोतियां यूं एकदम बदल जाएंगे, उनके अपने जो पराए हो गए थे, फिर अपने हो जाएंगे, मेरे लिए यह बात सच्चाई कम और अजूबा अधिक थी. जीवन के आख़िरी मोड़ पर आकर अचानक ज़िंदगी यूं करवट ले सकती है, इस बात को देखते-समझते हुए भी मुझे इस पर विश्‍वास नहीं हो सका.
इस सम्मोहन की टोह लेना मुझे सबसे ज़रूरी लगने लगा. यज्ञदत्तजी से पूछना बेकार था. वह अपने आपमें इतने मंत्रमुग्ध थे कि उन्हें अब दुनिया के किसी और सुख से कोई सरोकार न था. वह एक बात बार-बार बताते और गद्गद् होते रहते थे. वह कहते- “न जाने क्या जादू हो गया. जब भी बांसुरी बजाता हूं पोता-पोती, बेटे-बहुएं पास आ बैठती हैं. बांसुरी सुनते हैं सभी ध्यान से. सब मुझसे प्यार से बातें भी करने लगे हैं.”
फिर धीरे से बोले, “अब तो ड्रॉइंगरूम में जाने की मनाही भी नहीं.”
मुझे लगा कि यज्ञदत्तजी को टटोलना, उनके सम्मोहन का कारण जानना मकड़ी के जाल के सिरे को तलाशने जैसा है.
मैंने तय कर लिया कि मैं यज्ञदत्त शर्मा ‘नवीन’ की पत्नी से मिलूंगी.
एक दिन मौक़ा तलाश कर मैं उनके घर गई. मेरा सौभाग्य कि मैं उनके घर ऐसे व़क़्त पहुंची, जब घर पर उनकी पत्नी अकेली थीं. उनकी पत्नी से मेरा मिलना तो कम होता था, पर वे जानती थीं कि मैं यज्ञदत्तजी की एकमात्र सच्ची हमदर्द हूं. उनकी पत्नी से थोड़ी देर तक मैंने इधर-उधर की बात की, फिर सीधा सवाल किया.
मेरे सवाल को उन्होंने टालने की बहुत कोशिश की, पर फिर हथियार डाल दिए. मुझसे वायदा लिया कि मैं कभी किसी से इस राज़ का खुलासा नहीं करूंगी.
वह मुझे बताने लगीं.

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“हम औरतें सहनशील होती हैं. रिश्तों के खोखलेपन और खालीपन को पी जाती हैं. किसी को कुछ नहीं बतातीं, पर मुझसे इनकी पीड़ा देखी नहीं जाती थी. एक सीमा जब पार होती दिखी, तो मैंने अपने भीतर छिपाए एक राज़ का पर्दाफाश कर दिया.”
“राज़?” मैंने सवाल किया.
“हां राज़. जब मैं इस परिवार में आई, तब से मैंने मन ही मन कुछ निर्णय कर लिया था. यह बहुत दरियादिल थे. दिल भी खुला रखते थे, जेब भी. हर महीने पूरी तनख़्वाह मेरे हाथ में रखते थे. फिर जब जितनी ज़रूरत होती, लेते रहते.
हर महीने मैं इनकी तनख़्वाह में से कुछ रुपए बचा लेती थी. ये सारे रुपए आड़े समय में काम आएंगे, यह सोचकर मैं ऐसा करती थी. इसके लिए साल में बारह झूठ बोलने पड़ते थे मुझे.”
“बारह झूठ?” मैंने चौंककर कहा.
“हां बारह झूठ. हर महीने तनख़्वाह में से जो पैसे बचाती थी, उसके बारे में हर महीने एक झूठ बोलना पड़ता था कि सब पैसे ख़त्म हो गए. फिर इनका रिटायरमेंट हुआ. इन्होंने हमेशा की तरह सारी रकम मेरे हाथ में रख दी. हमने मकान बनवाया. मकान का ख़र्चा मैं देती रही. एक हद के बाद मैंने कह दिया कि रकम ख़त्म हो गई.
यूं करते-करते मेरे पास पांच लाख रुपए जमा हो गए. शुरू में ही मैंने पोस्ट ऑफ़िस में खाता खुलवा रखा था. ये सारे पैसे उसमें जमा करवाती रही. ब्याज मिलता रहा. बूंद-बूंद करके घड़ा भर गया.
वह थोड़ी देर चुप हो गईं. गहरी पीड़ा की रेखाएं उनके चेहरे पर उभर आईं.
“फिर?” मैंने सवाल किया.
“फिर क्या? मैं जानती थी बेटे-बहुएं रकम ख़त्म होते ही मुंह फेर लेंगे, पर इतने संगदिल हो जाएंगे, मुझे विश्‍वास न था. जिन बच्चों पर हमने कभी हाथ नहीं उठाया, वे बच्चे अपने पिता पर हाथ उठा लें, यह कड़वा सच मुझसे बर्दाश्त नहीं हुआ. मैंने अपनी पासबुक अपने बेटे-बहुओं के सामने रख दी. एक समझौता किया अपनों के साथ, मैं उन्हें रकम दूंगी, वे लोग मुझे और मेरे पति को माता-पिता का सम्मान देंगे. सम्मान का यही समझौता रिश्तों का सम्मोहन है.
कोई सवाल बाकी न बचा था. मैं उठी और चली आई. घर के बाहर लगी तख़्ती भी बदल गई थी. अब उसमें ‘वाई’ की जगह ‘यज्ञदत्त’ चिपक गया था.

– पूनम रतनानी

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कहानी- आस्था का फल (Short Story- Aastha Ka Phal)

Short Story- Aastha Ka Phal

“ये विज्ञान का दुरुपयोग है, अगर हम इसका इसी प्रकार उपयोग करते रहे तो ये अभिशाप बन कर कहर बन सकता है.” अनु उत्तेजित हो उठी.

क्षितिज बिना कुछ कहे कमरे से बाहर चले गए.

उस दिन के बाद से अनु ने सभी के मिज़ाज में परिवर्तन देखा, ऐसी स्थिति में वह ज़्यादा तनाव में नहीं रहना चाहती थी. अत: उसने कुछ दिनों के लिए मां के यहां जाने का फैसला कर लिया.

मां-पिताजी उसे देख कर बेहद ख़ुश हुए, परन्तु ज्यों-ज्यों उन्हें भी वास्तविकता का पता चला, उन्हें भी ससुराल पक्ष की बात अधिक सही लगी.

अनुभा अपनी पूर्व योजना के अनुसार जब दूसरी बार गर्भवती हुई, तो बहुत प्रसन्न थी. उसकी पुत्री अब तीन वर्ष की हो चुकी थी. अनुभा ने महसूस किया कि अब वह दूसरे बच्चे को जन्म देकर, उसे भी पूरी ज़िम्मेदारी से पाल सकती है और इसके साथ ही उसके इस कर्त्तव्य की इति भी हो जायेगी.

इस शुभ सूचना से घर में सभी के चेहरों पर ख़ुशी की लहर दौड़ गई. पर सभी के दिल में चाह थी कि इस बार बेटा ही होना चाहिए. सास-ससुर दोनों ने ही बातों-बातों में कह भी दिया कि इस बार तो सारे घर को रौशन करने वाला चिराग़ ही आना चाहिए, फिर वंश बेल भी तो बढ़नी है.

सब कुछ सुनकर अनुभा चुप थी. पहले प्रसव के समय की सब बातें अभी तक उसे याद थीं, बेटी पैदा होने की किसी को ज़्यादा ख़ुशी नहीं हुई थी. बेमन से ही सबने सब रीति-रिवाज़ निबाहे थे.

परन्तु पति क्षितिज के उदार व्यवहार ने इस स्थिति से उबरने में उसकी बड़ी मदद की. प्रत्यक्ष रूप से तो उन्होंने बेटी के जन्म को भी एक सुअवसर के रूप में ही स्वीकार किया.

अनुभा को बेटे व बेटी में कोई अन्तर न लगता था. वह स्वयं इंजीनियर थी. उसके विवाह की बुनियाद शायद उसकी ये डिग्री ही थी. समाज में ऊंची प्रतिष्ठा रखने वाले उसके ससुराल पक्ष के लोग मुंह खोल कर दहेज की मांग तो नहीं कर सके थे, पर इस बात से आश्‍वस्त ज़रूर थे कि इंजीनियर बहू ऊंची नौकरी करेगी तो ख़ुद ही पैसा बरसेगा.

परन्तु यहां भी अनुभा अपने आदर्शों पर अडिग रही. वह वैवाहिक जीवन के साथ-साथ मातृत्व का भी पूरा सुख उठाना चाहती थी, जबकि पहले दिन से ही पति सहित सास-ससुर सभी यही चाहते थे कि जल्दी ही अनुभा अच्छी-सी नौकरी कर ले. कई अच्छी फर्मों से उसके लिए ऑफ़र भी आए, पर उसने नौकरी करने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई. एक दिन अन्तिम प्रयास करते हुए क्षितिज ने बात छेड़ी.

“अनु, तुम इतनी पढ़ी-लिखी होकर भी इस दिशा में कोई दिलचस्पी नहीं दिखा रही हो.”

“हां क्षिति, मैं वैवाहिक जीवन का पूरा आनंद उठाना चाहती हूं. नौकरी करने में अभी मुझे कोई दिलचस्पी नहीं है.”

क्षितिज हंस पड़ा, “अरे, नौकरी करते-करते आनंद नहीं उठाया जा सकता क्या? ये तुमने बड़ी अजीब-सी बात सोच रखी है.”

“बात अजीब नहीं, सत्य है क्षिति, यदि शुरू से ही हम दोनों अपनी-अपनी नौकरियों में उलझ जायेंगे तो एक-दूसरे को जानने-समझने का अवसर कब मिलेगा. तब हम एक-दूसरे के प्रति ज़िम्मेदारियां समझने के बजाए अपनी-अपनी नौकरियों के प्रति अधिक ज़िम्मेदार रहेंगे. तब प्रेम के बदले हमारे बीच दरारें पड़ सकती हैं, हमारा दांपत्य जीवन प्रभावित हो सकता है.”

“अब तुम्हें कौन समझाए? चलो छोड़ो, मुझे तो तुम्हारे पैसों की ज़रूरत भी नहीं है अनु, बस मैं तो तुम्हारी योग्यता को व्यर्थ में यूं दम तोड़ते नहीं देखना चाहता था.”

“योग्यताएं कभी दम नहीं तोड़ती हैं क्षिति, यदि सही समय और सही उद्देश्य के लिए उनका प्रयोग किया जाए तो लाभप्रद सिद्ध होती हैं.”

“ठीक है बाबा, मैं तो तुम्हें ख़ुश देखना चाहता हूं बस.” क्षितिज कुछ चिढ़ कर बोले.

“बस क्षितिज, मैं आपके मुंह से यही सुनना चाहती थी. जब ज़रूरत होगी, मैं अपनी योग्यता का उपयोग अवश्य करूंगी. पहले नारी जीवन के कर्त्तव्य तो पूरे कर लूं.” अनुभा क्षितिज के गले में बांहें डाल, उसके गले लग गयी. क्षितिज ने भी जबरन मुस्कुराने का प्रयत्न किया.

ये उसके ज़िद्दी निर्णय का पहला झटका उसके सास-ससुर को लगा. उन्हें भी उसने यही कहकर समझाया कि पहले मैं बच्चों को पाल-पोसकर स्वावलम्बी बना दूं, तब अपने बारे में सोचूंगी. अपने स्वार्थ के कारण मैं बच्चों से उनका बचपन नहीं छीनना चाहती हूं, उन्हें अपनी स्नेह छाया में अपने हाथों से पालना चाहती हूं, ताकि माता-पिता के प्रति वे भी अपने कर्त्तव्यों से अनभिज्ञ न रह जाएं.

अनुभा अच्छी तरह जानती थी कि इस बार सबके मन में काफ़ी हलचल चल रही होगी. इस बार बेटी का जन्म सब पर गाज बन कर गिरेगा, पर वह चुपचाप आने वाले पलों का इन्तज़ार कर रही थी.

मौक़ा देख एक दिन उसकी सास ने कहा, “बेटा अनु, तुम ख़ुद ही काफ़ी समझदार हो, यदि बुरा न मानो तो जांच करवा कर पता करवा लो कि इस बार बेटा है या बेटी.”

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अनु ने पहले तो बड़ी तीव्र दृष्टि से उन्हें देखा, लेकिन जल्दी ही स्वर को नम्र बना कर बोली, “मांजी, क्या होगा जांच कराने से, अब तो जो होना है वही होगा. जांच से बदला तो नहीं जा सकता.”

“बदला क्यों नहीं जा सकता बेटा? यदि फिर बेटी हुई तो उसे गिराया भी जा…”

“बस मांजी बस, कुछ समझ भी रही हैं कि आप क्या कह रही हैं, अपने गर्भ में पल रहे जीव की हत्या करा दूं मैं?”

“तुम बेटा मुझे ग़लत मत समझो, मेरा मतलब ये नहीं है.” सास कुछ मीठा बनते हुए बोली.

“आपका मतलब चाहे जो हो मांजी, पर इतना तो आप जानती ही होंगी कि जांच कराना व गर्भ गिराना दोनों ही क़ानूनन अपराध है. क्या आप चाहती हैं कि मैं कोई अपराध करूं?”

मांजी कुछ और बोलतीं, इससे पहले ही वह उठकर अपने कमरे में चली गयी. अनमने मन से वह चादर ओढ़ कर लेट गयी. घरवालों के मन में उपजी इस नयी बात ने उसे परेशान कर दिया था.

तभी क्षितिज ने कमरे में प्रवेश किया. अनु उठकर बैठ गयी और बोली, “क्षिति, तुम मुझे एक बात साफ़-साफ़ बताओ कि तुम भी चाहते हो कि इस बार बेटा ही हो.”

“तुम भी से तुम्हारा क्या मतलब है? अनु, क्या इस बार तुम्हारी यही इच्छा नहीं है?” वह मुस्कुराकर बोला.

“मेरी नहीं, घर में सभी और ख़ासकर मांजी यही चाहती हैं.”

“कुछ बुरा तो नहीं चाहतीं वे. एक लड़की है तो दूसरा लड़का हो जाए, ऐसा चाहने में क्या बुराई है.”

“चाहने में कुछ बुराई नहीं है क्षितिज, लेकिन वे चाहती हैं कि मैं स्कैनिंग द्वारा पता लगा लूं, यदि इस बार भी लड़की हो तो उसे…” कहते-कहते अनु चुप हो गयी.

क्षितिज भी कुछ गंभीर हो उठा, वह टाई की नॉट खोलते हुए बोला, “अनु शायद इसमें भी कोई बुराई नहीं है.”

“ये तुम कह रहे हो क्षिति, कम से कम मुझे तुमसे ये उम्मीद न थी.” अनु आहत-सी हो उठी.

“इसमें उम्मीद की क्या बात है अनु? अब जहां दो के बाद तीसरे बच्चे की गुंजाइश नहीं है, वहां तो ये क़दम उठा ही सकते हैं.”

“पर ये सब क़ानून की दृष्टि में अपराध है, इतना तो आप भी जानते ही होंगे.”

“हां होगा, पर ज़रूरी है कि सब कुछ ढोल बजा कर ही किया जाए, कुछ काम चोरी-छुपे भी होते हैं. हमारे इतने डॉक्टर मित्र हैं, सब कुछ आसानी से हो जाएगा.”

“अच्छा, तो अपराध के ऊपर अपराध, तुमसे मुझे समझदारी की उम्मीद थी क्षितिज, पर तुम सब तो एक ही स्वर में बोल रहे हो.”

“मैं समझदारी की ही बात कर रहा हूं अनु, वंश बेल को बढ़ाने के लिए बेटे की इच्छा करना क्या मूर्खता है? यदि विज्ञान की प्रगति ने हमें ये सुविधा प्रदान की है तो इसका उपयोग करने में क्या हर्ज़ है.” वह कुछ तेज़ स्वर में बोले.

“ये विज्ञान का दुरुपयोग है, अगर हम इसका इसी प्रकार उपयोग करते रहे तो ये अभिशाप बन कर कहर बन सकता है.” अनु उत्तेजित हो उठी.

क्षितिज बिना कुछ कहे कमरे से बाहर चले गए.

उस दिन के बाद से अनु ने सभी के मिज़ाज में परिवर्तन देखा, ऐसी स्थिति में वह ज़्यादा तनाव में नहीं रहना चाहती थी. अत: उसने कुछ दिनों के लिए मां के यहां जाने का फैसला कर लिया.

मां-पिताजी उसे देख कर बेहद ख़ुश हुए, परन्तु ज्यों-ज्यों उन्हें भी वास्तविकता का पता चला, उन्हें भी ससुराल पक्ष की बात अधिक सही लगी, क्योंकि वे स्वयं भी पुत्र रत्न से वंचित थे और यही मानते थे कि लड़की अपनी योग्यता से चाहे आकाश छू ले, पर होती तो पराया धन ही है, बुढ़ापे की लाठी तो बेटा ही होता है.

अनु ने तर्क देते हुए कहा, “मां, बेटा हो तो मुझे भी अपार ख़ुशी होगी, पर बेटी को मार कर पुत्र प्राप्ति का ग़लत तरी़के से यत्न करना कतई ठीक नहीं है.”

मां ने कहा, “अच्छा अनु, तुम्हारी सभी बातें सही हैं, पर पता करने में क्या हर्ज़ है, यदि बेटा हुआ तो कम से कम तुम्हारे ससुराल वाले अभी से ख़ुश हो जायेंगे.”

“मुझे इस विषय में किसी की ख़ुशी या नाराज़गी की परवाह नहीं है मां. इसे तो ईश्‍वर का उपहार समझ स्वीकार करना चाहिए.”

अनुभा ने देखा मां भी गंभीर हो गयी है. उसे लगा जिस परिस्थिति से बच कर वह यहां तनावमुक्त होने आयी थी, उसकी छाया यहां भी विराजमान है.

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अनुभा ने मन ही मन सोचा क्यों न सबका दिल रखने के लिए जांच करवा ही लूं. यदि लड़का हुआ तो सब झंझट ही समाप्त हो जायेगा और यदि लड़की हुई तो कम-से-कम सब अभी से मानसिक रूप से तैयार हो जाएंगे. उस व़क़्त उन लोगों को ज़्यादा मानसिक आघात नहीं लगेगा और मैं भी बाक़ी का समय सुख-चैन से काट सकूंगी.

मां के साथ वह उनकी पारिवारिक डॉक्टर सुधा सेन के पास जांच के लिए गई.

जांच की रिपोर्ट जब उन्होंने फ़ोन पर मां को दी, तो वह उदास-सी हो गयी. उसके चेहरे की रंगत देख अनुभा सब समझ गयी, कुछ न पूछा.

मां फ़ोन रखकर रसोई में चली गयी, वह उसके पीछे गयी और उसके गले में बांहें डाल कर बोली, “अब उदास क्यों हो रही हो मां, सरप्राइज़ में ही आनंद था न.”

“डॉक्टर ने मुझे एक बात और भी बताई है, यदि तुम सहमत हो तो.” मां उसकी बातों पर ध्यान दिए बिना बोली.

“अब और क्या चमत्कार करवाना चाहती हो मां?” वह हंसकर बोली.

“चमत्कार ही जैसी बात है बेटी, डॉ. सुधा ने कहा है कि यदि इस मुसीबत से तुम छुटकारा पाना चाहो तो वह गुप्त रूप से तुम्हारी मदद कर सकती हैं- और इसके बाद जब तुम पुन: गर्भधारण करो तब वह तुम्हें एक ऐसी अचूक दवा देंगी, जिससे सौ फ़ीसदी लड़का ही होता है.”

अनुभा ज़ोर से हंस पड़ी, “मां, यदि ऐसा संभव होता, तो ये समस्या कब की हमारे समाज से ख़त्म हो चुकी होती. मां आख़िर ये दकियानूसी बातें तुम्हें सूझ कैसे रही हैं?”

“बस केवल इसलिए कि ससुराल में तुम्हें सम्मान मिले.” मां ने समझाते हुए कहा.

“मां, मेरे सम्मान की फ़िक्र न करो, बेटा यदि आज सम्मान दिलायेगा तो ज़रूरी नहीं कि वह बुढ़ापे का सहारा भी बने ही.

आज हमारे समाज में वृद्धों की समस्या इन चहेते पुत्रों के कारण ही जिधर देखो मुंह बाए खड़ी है. क्या निहाल कर रहे हैं- वे अपने बूढ़े मां-बाप को.”

अनु के ज़िद्दी स्वभाव को मां जानती थी. अत: वह चुप हो गयी.

अनु ने निश्‍चय किया कि इस बार डिलीवरी के लिए वह मां के पास ही रहेगी. समय बीता और प्रसव का समय भी आ पहुंचा. घर में किसी को कोई ज़्यादा उत्साह नहीं था. मां को केवल एक ही चिन्ता थी कि अनु की डिलीवरी का सब काम राज़ी-ख़ुशी निपट जाए और वह अपने घर जाए.

समय आने पर अनुभा प्रसन्न मन से अस्पताल गई और उसने सबको एक बहुत बड़ा सरप्राइज़ दिया. जब डॉक्टर ने बाहर आकर, मुंह लटकाए बैठे परिवार जनों को बताया कि अनुभा ने एक सुन्दर व स्वस्थ बेटे को जन्म दिया है तो सभी लोग हतप्रभ हो गए. मां तो सोच रही थी कि यदि हम डॉक्टर की सलाह मान लेते तो… और वह सिहर उठी.

थोड़ी देर बाद सभी अनु को देखने कमरे में पहुंचे. वह पहले की ही तरह शान्त चित्त थी. मां से नज़रें मिलीं तो वह मुस्कारा उठी.

”कुदरत के नियमों का उल्लंघन करना इंसान के लिए हितकर नहीं है मां. इंसान से ग़लतियां होती हैं, पर कुदरत सबकी ज़रूरतें पूरी करती है.”

मां की आंखों में ख़ुशी के आंसू भर आए, उन्होंने अनु के सिर पर ममता का हाथ फेर कर अपनी सहमति दी.

“ये तुम्हारी आस्था का ही फल है बेटा, तुमने तो भगवान की इच्छा को ही हृदय से स्वीकार कर लिया था, इसलिए शायद उसने तुम्हारी ज़रूरत को पूरा किया.” पिता ने पुत्री पर गर्व करते हुए कहा.

डॉ. सुधा भी पीछे कोने में खड़ी सोच रही थी कि आख़िर उससे कहां ग़लती हो गई, पर शुक्र है भगवान का कि अनु के दृढ़ निश्‍चय के कारण वह यह पाप करने से बच गई.

पूरा कमरा हंसी के ठहाकों और बधाइयों से गूंज रहा था. अनुभा की ख़ुशी में भी उदासी की झलक थी कि अब तो नारी किसी भी क्षेत्र में पीछे नहीं है, फिर उसके जन्म पर ऐसी ख़ुशियां क्यों नहीं मनाई जातीं. शायद जनक को ही पहल करनी होगी तभी ये भेद मिट सकेगा. उसने सबकी ओर से मुंह फेर कर आंखें बंद कर लीं.

– मधु भटनागर

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कहानी- गांव (Short Story- Gaon)

शुक्र है, इतने बदलावों के बीच भी कुछ चीज़ें नहीं बदल रहीं. हमारी वो परंपरा, जो हमारी पहचान है, उन पर अब भी इस भौतिकता का प्रभाव नहीं पड़ा है. ये छोटे-छोटे बच्चे भी बड़ों के आशीर्वाद का महत्व जानते हैं, फिर क्या फ़र्क़ पड़ता है कि मकान कच्चे हैं या पक्के, ये बच्चे बड़ों का सम्मान करते हैं, फिर क्या फ़र्क़ पड़ता है कि खाना चूल्हे पर पका है या गैस पर…

Short Story- Gaon

न जाने वो ख़ुशबू कहां खो गई थी, वो कच्चे मकानों की ख़ुशबू… वो मिट्टी की ख़ूशबू… वो अपनेपन की ख़ुशबू… अब यहां घरों के बीच, छतों के बीच, दहलीज़ों के बाहर भी दीवारें खिंची हुई थीं… कहने को तो ये ईंट-पत्थर की दीवारें थीं, पर यूं लग रहा था जैसे ये दीवारें घरों के बीच नहीं, दिलों के बीच भी खिंच चुकी हैं.

न अब यहां पंछी चहकते हैं, न मोर नाचते हैं… न गाय की वो पहली रोटी बनती है, न वो कचोरी-समोसे बिकते हैं… इतना बदलाव भला कहां लेकर जा रहा है हमें?

हर गली-नुक्कड़ पर शहरीपन की छाप… अपनी आंखों से देख रही हूं मैं, मेरा ये प्यारा गांव सिकुड़ रहा है, सिमट रहा है… यहां एक शहर पसर रहा है…

मन ही मन कई सवाल उठ खड़े हुए कि वैसे शहरीकरण में बुराई ही क्या है? मुझे तो शहर पसंद है, वहां की वो बिज़ी लाइफस्टाइल, वर्क प्रेशर, बड़े-बड़े मॉल्स… और लेट नाइट पार्टीज़… लेकिन कभी-कभी इन सबसे भी तो ऊब होने लगती है, तब हम भागते हैं अपनी जड़ों की ओर. वो हमें लुभाती हैं, खींचती हैं अपनी तरफ़. अपने तनावों से निपटने के लिए, अपनों से मिलने के लिए, अपनी असली ज़िंदगी को जीने के लिए हम गांव का रुख़ करते हैं. वहां की ताज़गी, वहां का अपनापन हमें आकर्षित करता है और हम अपनी इस बनावटी-दिखावटी दुनिया के सारे नकाब फेंककर वहां खुलकर जीने के लिए चल पड़ते हैं.

भले ही वहां शहरों जैसी भौतिक सुख-सुविधा न हो, लेकिन एक चीज़ है वहां- समय. अपनों के बीच रहकर सुख-दुख बांटने का समय वहां सबके पास है, जो किसी भी सुख-सुविधा से कहीं ज़्यादा है.

लेकिन आज ऐसा क्यों महसूस हो रहा है कि मेरा गांव मुझसे छिन गया है. यह कोई अंजान-सी अजनबी जगह है. पहलेवाली कोई बात नहीं. लोग इसे तऱक्क़ी कहते हैं, पर क्या वाक़ई यह तऱक्क़ी है?

ज़मीनों पर खेत नहीं लहलहाते अब, वहां तो कोई मल्टीनेशनल कंपनी बननेवाली है… वो नुक्कड़ के चाचा की छोटी-सी दुकान पर पान के स्वादवाली खट्टी-मीठी गोलियां भी नहीं बिकतीं अब. चाचा के जाने के बाद उनके बेटे ने कपड़ों का शोरूम जो खोल लिया है… पास की गली की ब़र्फ फैक्टरी बंद हो चुकी है, वहां गिफ्ट शॉप आ गई है. पिछली गली में जो मार्केट थी, वहां बड़ा-सा मॉल बन चुका है… मैं तो यहां ख़ुद को खोजने आई थी. कहां है मेरा अस्तित्व? कहां हैं वो गलियां, जहां मेरा बचपन गुज़रा था…? कहां हैं वो मैदान, जहां मैं खेलने जाती थी…? वो कुआं कहां है, जो दादाजी ने बनवाया था? वो आंगन कहां है, जहां लोगों का

आना-जाना लगा रहता था? वो रसोई, वो चूल्हा कहां है, जहां सबके लिए चाय-नाश्ता-खाना-पीना बना करता था?

ये मेरा गांव नहीं है… इसकी सूरत ही नहीं, सीरत भी बदल गई है… अब न कोई छतों पर आकर आपस में बात करता है, न किसी के दुख-सुख के बारे में कोई पूछता है… सबने तऱक्क़ी जो कर ली है, सबके पास पहले से अधिक पैसा जो आ गया है… सुख-सुविधाएं जो बढ़ गई हैं… फिर भला समय कहां रह गया किसी के पास.

कच्ची सड़कें पक्की हो गईं. साइकल रिक्शा की जगह ई-रिक्शा ने ले ली. बैल गाड़ी, ऊंट गाड़ी तो जैसे क़िस्से-कहानियों में ही नज़र आएंगे अब, टैक्सी की सुविधाएं हो गई हैं, बसों और ट्रेनों का अच्छा-ख़ासा नेटवर्क हो गया है. और हां, सबसे बड़ी बात मोबाइल फोन्स ने तो सबकी ज़िंदगी ही बदलकर रख दी है. इंटरनेट अब घर-घर की ज़रूरत हो गया है… सोचती हूं कि लौट जाऊं अब. क्या रह गया है यहां…

“अरे, कहां खोई हुई है वर्षा? तुझे आए तीन दिन हो गए, लेकिन पता नहीं किन ख़्यालों में खोई रहती है? क्या बात है?” चाची की बात से मेरी तंद्रा भंग हुई.

“कुछ नहीं चाची, बस यही सोच रही हूं कि कितना कुछ बदल गया है 5-6 सालों में ही. पिछली बार जब गांव आई थी, तो सब कुछ अलग था.”

“देख, तेरे लिए ही हमने मकान भी ठीक करवा लिया है. अब तो कच्चे मकान भी नहीं हैं, पक्के हो गए. टाइल्स लगवा ली, एसी लग गया, फ्रिज, गैस सब कुछ है, तेरे चाचा ने सब तेरे लिए किया, ताकि तुझे असुविधा न हो. तुझे तो पता ही है, तेरे चाचा कितना प्यार करते हैं तुझसे.”

“हां चाची, लेकिन वो कच्चे मकान भी तो अच्छे ही थे. हम आंगन में या फिर छत पर खुली हवा में सोते थे. सुबह-सुबह मोर, तो शाम को बंदर भी आते थे. अब तो कुछ भी नहीं नज़र आता.”

“चल छोड़ तू यह सब, बता आज खाने में क्या बनाएं?” चाची ने पूछा.

मैं कुछ बोल पाती, इससे पहले ही घर के बच्चे बोल पड़े, “बुआजी, आज मम्मी को बोलो बे्रड पिज़्ज़ा बनाकर खिलाएंगी.”

“बेटा, ब्रेड पिज़्ज़ा तो कभी भी खा सकते हैं. गांव के चूल्हे की रोटी खाने में जो मज़ा है, वो ब्रेड में कहां?”

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“चूल्हा अब कहां है?” बच्चों ने कहा.

“क्यों, ऊपर छत पर था न पहले तो?” मैंने आश्‍चर्य से पूछा.

“पहले था, पर अब कोई भी चूल्हे पर रोटियां नहीं सेंकता. घर-घर में गैस आ चुकी है, तो कौन धुएं में अपनी आंखें फोड़ेगा.” चाची ने कहा.

“पर चाची, आप ही तो कहती थीं कि चूल्हे की रोटियां ही सेहत के लिए सबसे अच्छी होती हैं. गैस में पका खाना तो शरीर को नुक़सान ही पहुंचाता है.”

“हां बेटा, कहती तो अब भी हूं, लेकिन अब व़क्त के साथ बदलना पड़ता है. चूल्हा-चौका भी बदल गया है. तेरी भाभी भी चूल्हे पर खाना नहीं बनाती. पर मैं तेरे लिए आज बाटी बनाऊंगी, तुझे पसंद है न.” चाची ने लाड़ से कहा.

अगली सुबह मैं अपना सामान पैक कर रही थी कि चाची ने पूछा, “क्या बात है वर्षा, कहां जा रही है?”

“चाची, मैं वापस जा रही हूं, ऑफिस जल्दी जॉइन करना है.”

“ये क्या बात हुई, तू तो 15 दिन की छुट्टी लेकर आई थी. फोन पर तो कहा था तूने कि इस बार पूरे 15 दिन आप लोगों के साथ बिताऊंगी. इतने सालों बाद तो आती है और अब जाने की बात कह रही है.”

चाची नाराज़ हो रही थीं, लेकिन मैं भी क्या करती. मन ही नहीं लग रहा

था. “चाची, सच कहूं तो मेरा मन ही नहीं लग रहा इस बार. सब अपने-अपने घरों में कैद हैं, न समय है, न फुर्सत. टीवी, कंप्यूटर और मोबाइल में ही सिमट गई हैं यहां भी लोगों की ज़िंदगियां. अब आंगन में आकर कोई नहीं बैठता, न छतों पर आकर आपस में बातचीत होती है. छतें भी अब कहां रह गईं, हर जगह स़िर्फ दीवारें ही दीवारें नज़र आती हैं. शहर में दम घुटने लगता था, तो हम अपने गांव आ जाते थे सुकून के कुछ पल गुज़ारने, लेकिन गांव में भी अगर दम घुटने लगेगा, तो कहां जाएंगे? ये सुख-सुविधा तो बाद की बात है, पहले कच्चे मकानों में चूल्हे की रोटियां खाकर जो सुकून मिलता था, वो अब एसी कमरों में बैठकर गैस पर बने ब्रेड पिज़्ज़ा में नहीं मिलता…”

भावनाओं में बहकर न जाने मैं क्या-क्या और कब तक बोलती रही… “बुआजी, राम-राम! आशीर्वाद दीजिए, आज से मेरी परीक्षाएं शुरू हो रही हैं. स्कूल जा रहा हूं.” मेरे 5 साल के भतीजे ने मेरे पांव छूकर जैसे ही यह कहा, तो एक अलग ही अनुभव हुआ. नकारात्मक भावनाओं का बहाव अचानक रुक गया… मैंने उसे आशीर्वाद दिया, तो थोड़ी देर बाद ही मेरी 8 साल की भतीजी भी तैयार होकर आ गई. उसने भी राम-राम कहा और सबसे आशीर्वाद लेने लगी.

मेरे मन में एक बात अचानक आई और रोज़ सुबह का वो मंज़र घूम गया, जब ये बच्चे 6 बजे उठकर स्कूल के लिए तैयार होकर सबको राम-राम कहते हैं और पांव छूकर आशीर्वाद लेते हैं. मैं सोई हुई होती हूं, तब भी मेरे पैरों को हाथ लगाकर स्कूल के लिए चल पड़ते हैं और दोपहर में भी स्कूल से लौटकर सभी के चरण स्पर्श करके आशीर्वाद लेते हैं. मैंने अपनी पैकिंग वहीं रोक दी और बच्चों से कहा, “चलो, मैं तुम लोगों को स्कूल छोड़कर आती हूं आज.”

बच्चे तो ख़ुशी से उछल पड़े. वापस घर आई, तो मैं काफ़ी हल्का महसूस कर रही थी. दरसअल, मैं यह समझ ही नहीं पाई कि भले ही भौतिक चीज़ें बदल रही हैं, गांव में भी सुख-सुविधाएं बढ़ी हैं, लेकिन हमारे संस्कार अब भी ज़िंदा हैं. हमारे ये छोटे-छोटे बच्चे आज भी सुबह उठकर सबको राम-राम कहना और सबके पांव छूना नहीं भूले. बड़ों का आशीर्वाद इन्हें परीक्षाओं में हौसला देगा, यह बात इतनी-सी उम्र में भी ये जानते हैं… यही तो है हमारे गांव, हमारे संस्कार, हमारी पहचान. हम अपना अस्तित्व क्यों उन गली, मोहल्लों, नुक्कड़ों या छतों में छिपी यादों में ढूंढ़ते फिरते हैं, जबकि हमारा अस्तित्व तो हमारे संस्कारों में है. इन बच्चों में है, जो आनेवाली पीढ़ी हैं, जो हमारा भविष्य हैं. मैं भी कितनी मूर्ख हूं, जो इन मूल संस्कारों को छोड़कर बाहरी चीज़ों में सुकून ढूंढ़ती रही.

शुक्र है, इतने बदलावों के बीच भी कुछ चीज़ें नहीं बदल रहीं. हमारी वो परंपरा, जो हमारी पहचान है, उन पर अब भी इस भौतिकता का प्रभाव नहीं पड़ा है. ये छोटे-छोटे बच्चे भी बड़ों के आशीर्वाद का महत्व जानते हैं, फिर क्या फ़र्क़ पड़ता है कि मकान कच्चे हैं या पक्के, ये बच्चे बड़ों का सम्मान करते हैं, फिर क्या फ़र्क़ पड़ता है कि खाना चूल्हे पर पका है या गैस पर… ये बच्चे अपने संस्कारों से बेहद प्यार करते हैं, फिर क्या फ़़र्क  पड़ता है कि ये बाटी खा रहे हैं या पिज़्ज़ा…

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दरअसल, हम वेशभूषा, खान-पान और रहन-सहन को ही अपनी संस्कृति और अपनी पहचान मान लेते हैं, जबकि इन बाहरी आवरणों से भी कहीं ज़्यादा ज़रूरी है कि हम अपनी पहचान से, अपने अस्तित्व से और अपने संस्कारों से दिल से कितना प्यार करते हैं. उसका कितना सम्मान करते हैं.

अगर मुझे कोई देहाती कहे, तो मुझे चिढ़ होती है, लेकिन अपने देहात में तो मैं उसी देहातीपन को ढूंढ़ती हूं… अगर मुझे कोई गंवार कहे, तो ख़ुद को सॉफिस्टिकेटेड दिखाने की तमाम कोशिशों में जुट जाती हूं, लेकिन गांव में आकर तो दिल उस गंवारपन में ही घुलना-मिलना चाहता है… जिस दिन यह दोहरा मापदंड हम अपने भीतर से निकाल देंगे, तब हमें अपने गांव को गांव में आकर यूं खोजना नहीं पड़ेगा… क्योंकि वो हमारा अस्तित्व बनकर हमारे मन में, हमारे संस्कारों में हमेशा हमारे साथ बना रहेगा.

“चाची, आज खाने में क्या बना रही हो?”

“मैंने छाछ और आलू के परांठे बनाए हैं. देशी घी भी है घर का बना हुआ. तेरे लिए कल से चूल्हे पर रोटियां भी सेंक देंगे. कह दिया है तेरी भाभी को. लेकिन तू तो जाने को कह रही थी, अब क्या हुआ…?”

“चाची, मेरे वापस जाने में कई दिन हैं, अभी तो मुझे नई सब्ज़ी मंडी, नई मार्केट, सिनेमाघर और मॉल भी देखने हैं… और हां, चूल्हे में बना खाना भी तो खाना है… और भाभी के हाथों का ब्रेड पिज़्ज़ा भी…”

Geeta sharma

    गीता शर्मा

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कहानी- वर्जिन लड़की (Short Story- Virgin Ladki)

“रितु, वर्जिनिटी से बड़ा लिंग भेद कुछ भी नहीं आज हमारे समाज में. एक ओर जहां लड़कों से कुछ भी नहीं पूछा जाता, वहीं दूसरी ओर लड़कियों के चरित्र को प्रमाणित करने के लिए न जाने कैसे-कैसे शब्द और तरी़के इजाद कर दिए गए हैं. यह पुरुषों की सत्ता और झूठे अहंकार को बनाए व बचाए रखने की बातें हैं और कुछ भी नहीं. पर सारे पुरुष एक जैसे नहीं होते.”

Short Story- Virgin Ladki

मेरे तकिये के नीचे अब भी तुम्हारी यादें दुबकी पड़ी हैं… मेरे सिरहाने तुम्हारे वो ढेरों चुंबन अंकित हैं, जो कभी ख़्वाबों में तुमने मुझे दिए, तो कभी रू-ब-रू… मेरे दरीचों से अब भी तुम्हारा अक्स मुस्कुराता नज़र आता है… मेरे आंगन में तुम्हारी धड़कनें अब भी बिखरी रहती हैं… फिर क्यों तुम यहां नहीं हो मेरे पास? ऐसी क्या मजबूरी थी कि बिना कुछ कहे यूं ही चले गए मेरी ज़िंदगी से अचानक… ठीक उसी तरह, जिस तरह अचानक तुम मेरी ज़िंदगी में आए थे.
तुम्हें शायद ये एहसास ही नहीं कि मैं अब भी ज़िंदगी के उसी मोड़ पर खड़ी हूं, जहां तुम मुझे छोड़कर चले गए थे. तुम नहीं लौटकर आओगे अब शायद, यह मैं समझ चुकी हूं, लेकिन मेरा दिल नहीं समझ रहा… इसे कहीं न कहीं अब भी तुमसे उम्मीदें हैं… ये अब भी तुम्हारे ख़्वाब संजोता है, अब भी तुम्हारे ख़्यालों से इसे सिहरन होती है… तुम्हारी वो पहली छुअन अब भी मुझे भीतर तक भिगो देती है. कितना अपनापन था उस छुअन में… बहुत पाक-साफ़ था वो एहसास, ख़ालिस प्रेम था उसमें. क्या तुम्हें याद नहीं आते हमारे प्यार के वो पल? वो घंटों बैठकर बातें करना, वो तुम्हारा मेरे लिए कॉफी बनाना… वो अपनी पुरानी गर्लफ्रेंड के क़िस्से सुनाना…!
और हर बार मेरा यही सवाल होता था, इतना प्यार करते थे, तो शादी क्यों नहीं की… और तुम कहते थे, “कितनी बार बताया, गांव में जाति-गोत्र सब देखे जाते हैं, सो शादी नहीं हो पाई.”
“मुझसे तो करोगे न…?” और तुम हंस देते बस… उस हंसी की खनक अब भी कानों में गूंजती है… मैं भी कितनी पागल थी, शादी तो तुमको मुझसे भी नहीं करनी थी, सो नहीं की… यूं ही एक दिन अचानक तुमने बिना कुछ कहे, बिना बताए ख़ुद को समेट लिया. कितनी बार फोन किया, कितने मैसेज किए… तुमने पढ़कर भी जवाब नहीं दिया.
पर मेरा दिल था कि मान ही नहीं रहा था… तुम्हारा इंतज़ार करने के सिवा कोई चारा भी तो नहीं था मेरे पास. तुम्हारी होने के बाद किसी और की होने की हिम्मत भी नहीं थी. ख़ैर, किसी तरह ख़ुद को संभाल रही हूं. ज़िंदगी को जितना संभव हो सामान्य बनाए रखने की पुरज़ोर कोशिश में थी मैं.
“रितु, तैयार नहीं होना क्या आज तेरी दिल्ली की फ्लाइट है. छूट न जाए कहीं.” मम्मी की आवाज़ से ख़्यालों का सिलसिला टूटा.
“हां मम्मी, बस तैयार ही हूं.”
संडे था, इसलिए ट्रैफिक नहीं था रोड़ पर. एयरपोर्ट जल्दी ही पहुंच गई थी मैं. सिक्योरिटी चेक से बाहर निकलकर सोचा कुछ शॉपिंग कर लूं… बैग्स की एक शॉप की तरफ़ नज़र गई, तो एक पल को ठिठक गई. अरे! क्या मेरी नज़रें धोखा खा रही हैं? नहीं, बिल्कुल नहीं. तुम ही तो हो. तुम्हें पहचानने में भला कैसे भूल कर सकती हूं मैं.
“कैसे हो राजवीर?” मैंने गंभीरता से कहा, तो वो थोड़ा असहज हो गया, फिर संभलते हुए बोला, “अरे, रितु तुम. मैं बिल्कुल ठीक हूं. तुम कैसी हो?”
“कमाल है, तुम्हें क्या लगता है कि मैं कैसी होऊंगी?”
“सॉरी रितु, पर मैं यहां कोई सीन क्रिएट नहीं करना चाहता. बेहतर होगा हम आराम से बात करें इस मुद्दे पर.”
“यूं अचानक मुझे ज़िंदगी के मोड़ पर अकेला छोड़कर चले गए तुम, बिना कोई वजह बताए, तो इतना हक़ बनता है मेरा कि जान सकूं आख़िर क्या कारण था, जो इतना बड़ा धोखा दिया तुमने मुझे.”
“धोखे की क्या बात है यार इसमें. हम दोनों एडल्ट हैं, हम एक-दूसरे की तरफ़ आकर्षित थे, जो कुछ भी हमने किया प्यार में किया.”
“और अब क्या प्यार ख़त्म हो गया? तुमने मुझसे शादी का वादा किया था. तुम्हारे उस वादे पर भरोसा था मुझे.”

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“तुम ऐसा सोच भी कैसे सकती हो रितु कि मैं तुम जैसी लड़की से शादी करूंगा? ज़रा ख़ुद सोचो, जो लड़की इतनी आसानी से किसी लड़के के साथ… तुम समझ रही हो न. बीवी कैसे बन सकती हो तुम. हां, चाहो तो हम अब भी… क्योंकि तुम बहुत अट्रैक्टिव हो…”
एक ज़ोरदार तमाचा जड़ते-जड़ते रह गई थी मैं तुम्हारी इस घटिया सोच पर, लेकिन रोक लिया ख़ुद को, क्योंकि मैं भी कोई सीन क्रिएट नहीं करना चाहती थी एयरपोर्ट पर.
हां, तुम्हारा असली रंग ज़रूर देख चुकी थी. लड़कियों को स़िर्फ इस्तेमाल करके ज़िंदगी से बाहर निकाल फेंकना तुम्हारी आदत ही नहीं, शौक़ भी था यह भी समझ चुकी थी. ख़ैर, किसी तरह ख़ुद को संभाला मैंने और दिल्ली पहुंची. बाहर निकलते समय तुम्हारे चेहरे की कुटिल मुस्कान को कभी नहीं भूल सकती मैं.
समय बीत रहा था. तुम्हारे दिए ज़ख़्म भर तो रहे थे, लेकिन कहीं न कहीं उनमें दर्द था, वो भी बहुत ज़्यादा. मैंने अपना पूरा ध्यान प्रैक्टिस पर लगा दिया. मम्मी-पापा का सपना था कि मैं एक कामयाब डॉक्टर बनूं. उनका सपना आकार ले रहा था.
आज इतने सालों बाद तुम फिर मेरे सामने हो, बेहद मजबूर, लाचार और ग़मगीन से… कहां गया तुम्हारा वो ग़ुरूर? कहां गई वो कुटिल मुस्कान? शायद ये कायनात का ही एक फैसला था, तुम्हारे पाप की सज़ा तुम्हारी बेटी भुगत रही थी. हालांकि एक स्त्री होने के नाते मैं कभी नहीं चाहूंगी कि किसी भी लड़की के साथ ऐसा हो, लेकिन समय न जाने कब किसको क्या दिखा दे.
“डॉक्टर रितु, कैसी है मेरी बेटी अब?”
“जी, वो अब बेहतर है. पर होश में नहीं आई अब तक. थोड़ा इंतज़ार कीजिए और हौसला रखिए मिसेज़ राजवीर.”
“कैसे रखूं हौसला, न जाने कौन था वो लड़का, जिसने मेरी बेटी का ये हाल बना दिया. कैसे संस्कार रहे होंगे उसके, जो एक लड़की को ज़िंदगी के ऐसे मोड़ पर लाकर धोखा देकर भाग गया. कायर कहीं का, कभी सुखी नहीं रहेगा वो… ”
राजवीर की पत्नी बोले जा रही थी और रजवीर की नज़रें झुकी जा रही थीं.
“राजवीर और मैंने डॉली को इतने लाड़-प्यार से पाला था. मेरी फूल जैसी बच्ची का ये हाल बना दिया कि आज उसने आत्महत्या की कोशिश जैसा क़दम उठा लिया…”
मुझे बुरा इसलिए लग रहा था कि ऊपरवाले ने राजवीर की बेटी को ही ज़रिया क्यों बनाया उसे अपने किए का एहसास दिलाने के लिए… ख़ैर बेटी किसी की भी हो, ऐसा किसी के साथ न हो. इतने में ही डॉली को होश आ गया. हम सब अंदर गए. बच्ची बुरी तरह डरी हुई थी. मैंने उसे प्यार से पूछा, “बेटा, डरो मत. खुलकर अपनी बात कहो. क्यों किया तुमने ऐसा? अगर किसी ने तुम्हारे साथ ज़्यादती की, तो तुम्हें ज़रूर न्याय मिलेगा.”
“मम्मी-पापा, आई एम सॉरी. सब मेरी ही ग़लती है. मुझे नहीं पता था कि मेरे आज़ाद ख़्यालों को, मेरी मॉडर्न लाइफस्टाइल को कोई मेरे चरित्र से जोड़कर देखेगा और मेरा फ़ायदा उठाएगा.”
“बेटा मैं और तेरे पापा इतने आज़ाद ख़्यालों के हैं, कम से कम ऐसा कोई भी क़दम उठाने से पहले एक बार अपनी परेशानी हमसे शेयर तो की होती… तुझे कुछ हो जाता तो, किसके लिए जीते हम.” मिसेज़ राजवीर का दर्द छलक पड़ा.
“सॉरी मॉम, मैं इतनी डिप्रेशन में थी कि पता ही नहीं चला कि मेरे साथ हो क्या रहा है… रोहित ने इस तरह से छला मुझे…”
“डॉली अपने मन से अब सारी निगेटिव बातें निकाल दो और सारा क़िस्सा
साफ़-साफ़ बताओ…” मैंने डॉली को समझाते हुए कहा. राजवीर इस पूरे मसले पर चुप्पी ही साधे हुए था… ख़ैर, डॉली ने अपनी बात आगे बढ़ाई.
“आंटी, रोहित मेरे ही ऑफिस में मेरा सीनियर है. बहुत दिनों से वो मुझे लगातार अपने प्यार का भरोसा दिला रहा था. हम डेट कर रहे थे एक-दूसरे को. इतना समझदार, इतना मैच्योर लगा मुझे वो, बिल्कुल पापा की तरह. मेरा ख़्याल रखता था, मेरी हर ज़रूरत पर साथ खड़ा रहता था. मुझे पूरा भरोसा हो गया था कि इससे बेहतर जीवनसाथी मुझे नहीं मिलेगा.
दो महीने पहले हम आउटिंग पर गए थे. बस वो एक कमज़ोर पल था, जिसमें हमसे ग़लती हो गई थी. रोहित ने कहा था जल्द ही घर आकर शादी की बात करेगा. पर…” यह कहते ही डॉली फूट-फूटकर रोने लगी.
“धैर्य रखो डॉली, ग़लतियां ही हमें ज़िंदगी जीने का सबक और हौसला देती हैं.”
“आप ठीक कह रही हैं आंटी. रोहित पर भरोसा करना एक बहुत बड़ी भूल थी. उसने धीरे-धीरे मुझसे दूरी बनानी शुरू कर दी. मेरे फोन उठाने और मेरे मैसेजेस के जवाब देने भी बंद कर दिए. फिर मुझे पता चला कि उसकी एंगेजमेंट हो रही है और उसने रिक्वेस्ट करके दूसरे शहर में ट्रांसफर ले लिया.
मुझे तो कुछ समझ में नहीं आ रहा था. विश्‍वास ही नहीं हो रहा था. मैंने किसी तरह रोहित से बात करने की कोशिश की, तो उसने कहा ऑफिस में सीन क्रिएट मत करो, शाम को कॉफी हाउस में बात करते हैं.
हम शाम को गए. मैंने उसकी एंगेजमेंट की बात पूछी, तो उसने कहा कि प्यार और शादी दो अलग-अलग चीज़ होती हैं. तुम जैसी लड़कियों को गर्लफ्रेंड तो बनाया जा सकता है, पर शादी… शादी के लिए संस्कारी और वर्जिन लड़की ही सही होती है. तुम मेरे साथ शादी से पहले ही इतनी कंफर्टेबल हो गई, तो न जाने और किस-किस के साथ… एक चांटा मारकर मैं वहां से चली आई. ऐसे गंदी सोच और बुरी नीयतवाले लड़के से मुझे अपना कैरेक्टर सर्टिफिकेट नहीं चाहिए था.”
“वो सब तो ठीक है डॉली, तुम एक स्ट्रॉन्ग और कॉन्फिडेंट लड़की हो, तुमने भला सुसाइड जैसा ग़लत क़दम क्यों उठाया? अपने मम्मी-पापा से मदद लेनी चाहिए थी.”
“आप ठीक कह रही हैं. पर मेरी हिम्मत नहीं थी, क्योंकि मैं प्रेग्नेंट हो गई थी. रोहित को बताया भी था यह सोचकर कि शायद बच्चे की बात सुनकर वो सही क़दम उठाएगा, पर उसने कहा कि ये उसका बच्चा है ही नहीं… पापा, आप कुछ बोलो न, आप ही तो कहते थे कि लड़की किसी लड़के से कम नहीं होती, तो क्यों उसे हर किसी को अपना कैरेक्टर सर्टिफिकेट देना होता है… कभी अपने कपड़ों के माध्यम से, कभी नज़रें झुकाकर, कभी शर्माकर, तो कभी मर्दों के सामने गिड़गिड़ाकर.
मुझे लगा कौन मुझे और मेरे बच्चे को अपनाएगा. एबॉर्शन करवाकर मैं अपने बच्चे की जान नहीं लेना चाहती थी, तो सोचा ख़ुद ही अपनी जान लेकर अपने बच्चे को भी इस फरेबी दुनिया में आने से बचा लूं. पर देखो डॉक्टर मेरी जान आपने बचा ली, पर मेरा बच्चा…” डॉली रोने लगी.

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राजवीर के चेहरे का रंग उड़ा हुआ था. वो कुछ न बोल सका.
“डॉली, तुम्हारी जान बच गई ये भी कम बात नहीं. पर अफ़सोस कि तुम्हारे बच्चे को हम बचा नहीं सके. रही बात रोहित जैसे लड़कों की, तो तुम्हें किसी को अपना कैरेक्टर सर्टिफिकेट देने की ज़रूरत नहीं है. दरसअल, समस्या हमारे समाज की सोच में ही है. वो बेटों को संस्कार देने की बजाय बेटियों के तन ढांकने में ज़्यादा विश्‍वास रखता है. बेटों को बेलगाम छोड़ देता है और बेटियों को तमाम तरह की बेड़ियों में जकड़ने की नसीहतें देता है. यही वजह है कि तुम जैसी स्ट्रॉन्ग लड़की भी हक़ की लड़ाई लड़ने की बजाय पलायन का रास्ता चुनती है.
हम सभी ऐसे ही हैं. मैं भी भले ही बड़ी-बड़ी बातें कर लूं, लेकिन अगर मेरे साथ ग़लत होता, तो मैं भी लड़ने का हौसला नहीं रख पाती, पर अब मैं तुमसे वादा करती हूं कि तुम्हारी लड़ाई मैं लड़ूंगी.”
डॉली और उसके पैरेंट्स के साथ जाकर पुलिस स्टेशन में रोहित के ख़िलाफ़ कंप्लेन दर्ज करवाई और डॉली को इंसाफ़ भी ज़रूर मिल जाएगा.
“रितु, मैं तुमसे माफ़ी भी मांगने लायक नहीं हूं. तुमने मेरे लिए जो कुछ भी किया…”
“राजवीर, मैंने तुम्हारे लिए नहीं, जो भी किया, डॉली के लिए किया.”
“मैं तुम्हारा अपराधी हूं… मैंने तुम्हारी ज़िंदगी बर्बाद की… ”
“राजवीर, मैं तुम्हें साफ़-साफ़ बता दूं कि न मेरी ज़िंदगी बर्बाद हुई और न मैं अपने बीते हुए कल में जीती हूं. मैं तो तुम्हें ‘थैंक्स’ कहना चाहती हूं कि तुम जैसे इंसान की पत्नी बनने से बच गई… रही बात मेरी, तो हां शादी और प्यार जैसी पवित्र भावनाओं पर आज भी मेरा विश्‍वास है. और मैं चाहती हूं कि डॉली भी मानसिक रूप से ऐसी ही सोच के साथ आगे बढ़े. इसीलिए तुम्हें घर पर बुलाया कि उसकी काउंसलिंग पर थोड़ा ध्यान देना होगा. उसके मन से नकारात्मक विचार निकालने ज़रूरी हैं, तभी वो एक सकारात्मक जीवन जी पाएगी.”
राजवीर चला गया. मेरे मन को आज एक तसल्ली थी, जो मैं अपने लिए न कर सकी, वो डॉली के लिए करने की हिम्मत जुटा पाई. कितनी मासूम और प्यारी बच्ची है डॉली, बिल्कुल मेरी रानी की तरह…
“रितु मैडम, क्या बात है, किन ख़्यालों में खोई हो.”
“अरे, अजय आप आ गए हॉस्पिटल से. मैं बस राजवीर और डॉली के बारे में सोच रही थी.”
“तुमने बहुत अच्छा काम किया. रोहित जैसे लड़कों को यूं ही छोड़ने का मतलब है किसी और लड़की की ज़िंदगी दांव पर लगाना. तुमने भी तो बरसों पहले यही ग़लती की थी, पर कोई बात नहीं, देर आए, दुरुस्त आए.”
“आप जैसा जीवनसाथी पाकर सच में मैं ख़ुद को ख़ुशनसीब समझती हूं, वरना जीवन के एक मुकाम पर तो शादी और प्यार से भरोसा ही उठ गया था मेरा. पर मैं आज तक नहीं समझ पाई, आपके मन में उस व़क्त ये बात नहीं आई कि आपको भी शादी किसी वर्जिन लड़की से ही करनी चाहिए.”
“रितु, वर्जिनिटी से बड़ा लिंग भेद कुछ भी नहीं आज हमारे समाज में. एक ओर जहां लड़कों से कुछ भी नहीं पूछा जाता, वहीं दूसरी ओर लड़कियों के चरित्र को प्रमाणित करने के लिए न जाने कैसे-कैसे शब्द और तरी़के इजाद कर दिए गए हैं. यह पुरुषों की सत्ता और झूठे अहंकार को बनाए व बचाए रखने की बातें हैं और कुछ भी नहीं. पर सारे पुरुष एक जैसे नहीं होते.”
“जी हां, समझ गई मिस्टर हसबैंड, कुछ लोग आपकी तरह भी होते हैं. चलिए अब खाना खा लेते हैं. मैंने आपके लिए और आपकी लाड़ली बेटी रानी के लिए कुछ स्पेशल बनाया है.”

Geeta Sharma

         गीता शर्मा

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कहानी- मैंने तो पहले ही कहा था… (Short Story- Main To Pahle Hi Kaha Tha…)

मंगला को समझ में नहीं आया कि ये अचानक शांता को क्या हो गया? मंगला ने रमेशजी से शांता के पत्र की चर्चा की. रमेशजी ने वही पुराना वाक्य दुहरा दिया, “मैंने तो तुमसे पहले ही कहा था कि इस झमेले में मत पड़ो. अब भुगतो अपनी भलाई का परिणाम.”

रमेशजी के पास समस्या का हल न पाकर मंगला भागी-भागी हर्ष के घर पहुंची. उसने हर्ष की मां से इस बारे में चर्चा की.

Short Story- Main To Pahle Hi Kaha Tha

“चलो, अंत भला तो सब भला! अब तो तुम्हारी जान में जान आई होगी.” रमेशजी ने मंगला से कहा.

‘हूं!’ मंगला के मुंह से इससे अधिक और कुछ नहीं निकला. उसे बस रुलाई फूट रही थी. उसे लगा कि आज ये कितने आराम से कह रहे हैं कि अब तो तुम्हारी जान में जान आई होगी, कल तक तो ये भी मुझे ही ताना दे रहे थे.

“अरे-अरे, तुम रोने क्यों लगी? अब तो सब कुछ ठीक हो गया. अब रोने का क्या कारण?” रमेशजी ने चकित होते हुए मंगला से पूछा.

“कल तक तो आप भी मुझे ही दोष दे रहे थे.” मंगला के मन का क्षोभ आख़िर शब्दों के रूप में सामने आ ही गया.

“ओह, तो ये बात है. ठीक है-ठीक है, कल तक मैं ग़लत था और तुम सही थीं. लो, मान ली मैंने अपनी ग़लती. चलो, अब आंसू पोंछो.” रमेशजी ने मुस्कुराते हुए कहा. फिर वे मंगला के पास बैठते हुए बोले, “सचमुच, तुमने बहुत समझदारी से सब कुछ संभाल लिया, वरना मैं तो समझता था कि इस मामले में अब कुछ नहीं हो सकता.”

ये प्रशंसा थी या सांत्वना, मंगला तय नहीं कर पाई, लेकिन उसने भी बात को आगे खींचना उचित नहीं समझा. दूसरों के कारण पिछले एक माह से घर में जो तनाव चल रहा था, आज उसके समाप्त हो जाने पर उसकी चर्चा दोहराने से क्या लाभ.

“आप बैठिए, मैं आपके लिए चाय बना कर लाती हूं.” मंगला रसोई की ओर जाने के लिए उठ खड़ी हुई.

“नहीं, तुम बैठो. चाय बनाकर मैं लाता हूं.” रमेशजी ने मंगला का हाथ पकड़ कर उसे वापस सो़फे पर बिठाते हुए कहा और वे स्वयं उठ खड़े हुए. मंगला ने प्रतिवाद नहीं किया. वह चुपचाप सो़फे पर बैठ गई.

रमेशजी के जाते ही मंगला के मानस पर विगत एक माह का घटनाक्रम चलचित्र की भांति घूमने लगा. उफ़! कितनी निर्लज्जता के साथ शांता ने दोषारोपण किया था मंगला पर.

“अपनी बेटियों को तो अच्छे-अच्छे घरों में ब्याह दिया और हमारी बेटी के लिए ऐसा नरक चुना. शरम नहीं आई तुम्हें ऐसा करते हुए.” फिर कोसने की मुद्रा में उंगलियां चटकाती हुई बोली थी, “तुम्हारी बेटियां भी सुख से नहीं रह सकेंगी, मंगला! ये मेरा श्राप है, श्राप!”

शांता की बात सुन कर मंगला फूट-फूटकर रो पड़ी थी. उसके लिए कोई कुछ भी बुरा-भला कहे, वह हंसकर सुन सकती है, लेकिन बेटियों के लिए वह बुराई का एक भी शब्द सहन नहीं कर सकती. रो-रोकर उसके सीने में दर्द होने लगा था. मगर शांता को न चुप होना था और न वह चुप हुई. जी भर कर अनाप-शनाप बकती रही. शाम को जब रमेशजी द़फ़्तर से घर आए, तो वे भी शांता का रौद्र रूप देखकर सकते में आ गए. मंगला ने अलग ले जाकर उन्हें सारी बात बताई. मंगला की बात सुनते ही वे बोले, “और करो भलाई के काम. इसी को कहते हैं होम करते हाथ जलना. मैंने तो तुमसे पहले ही कहा था कि तुम इस झमेले में मत पड़ो, लेकिन तुम्हें तो उस समय शांता की बेटी का घर बसाने की धुन थी. अब तुम्हीं सुनो उसकी सत्रह बातें.”

कहां तो मंगला को आशा थी कि रमेशजी उसकी मदद करेंगे. उसे कोई रास्ता सुझाएंगे, लेकिन रमेशजी ने तो पल्ला ही झाड़ दिया. ऊपर से उसी को दोषी ठहराया. जबकि देखा जाए तो मंगला का इसमें कोई दोष था ही नहीं. किसी का घर बसाना क्या कोई अपराध है?

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मंगला इस झमेले में पड़ती भी नहीं अगर शांता ने उसे रो-रोकर अपना दुखड़ा न सुनाया होता. शांता रिश्ते में मंगला की फुफेरी बहन लगती थी. यह रिश्ता बहुत निकट का तो नहीं था, लेकिन सहृदया मंगला की आदत है कि वह दूसरों के दुख से जल्दी द्रवित हो उठती है. शांता ने उसे बताया कि उसकी बेटी कुशा के लिए योग्य वर नहीं मिल पा रहा है. वह एमए कर चुकी है. अपना स्वयं का ब्यूटीपार्लर चला रही है. फिर भी दहेज की लम्बी-चौड़ी मांगें कुशा के ब्याह के रास्ते में रोड़ा बनी हुई हैं.

“तुम अपने आसपास का कोई लड़का देखो ना. तुम लोगों का तो अच्छा रुतबा है, शायद यहां बात बन जाए. हम तो अपने शहर में क्या, अपने प्रदेश में भी लड़का ढूंढ़ चुके, लेकिन बात नहीं बन रही है. लड़की की बढ़ती उम्र देख-देख कर रात को नींद नहीं आती.” शांता ने चिरौरी करते हुए कहा था.

“ठीक है, मैं देखूंगी, मगर एक बात है….”

“क्या बात?” शांता ने चिंतित होकर पूछा था.

“कुशा बड़े शहर में पली-बढ़ी है और ये शहर कस्बाई है. यहां और वहां के रहन-सहन में बहुत अंतर है. कुशा को कहीं परेशानी न हो यहां रहने में.” मंगला ने कहा था.

“अरे नहीं, तुम इस बारे में ज़रा भी चिंता मत करो. हमारी कुशा बड़ी व्यवहारकुशल है. वह हर माहौल में तालमेल बिठा लेती है. तुम तो बस, उसकी नैय्या पार लगा दो.” शांता ने दोनों हाथ जोड़ते हुए कहा था.

उस दिन के बाद से मंगला ने कुशा के विवाह कराने का मानो बीड़ा उठा लिया. रमेशजी ने उसे टोका भी था, “मेरे विचार से तो तुम इस झमेले में मत पड़ो. शांता का स्वभाव यूं भी तीखा है, अगर कल को कुछ ऊंच-नीच हो गई तो तुम्हें दोष देगी.”

रमेशजी ने मानो भविष्यवाणी कर दी थी, किन्तु उस समय मंगला को क्या पता था कि उसे क्या-क्या भुगतना पड़ेगा. मंगला ने रमेशजी के साढू के एक दूर के रिश्तेदार के लड़के को कुशा के लिए ढूंढ़ ही निकाला. लड़के का नाम था हर्ष. उसने व्यावसायिक शिक्षा में उपाधि ले रखी थी, किन्तु फ़िलहाल उसके पास कोई अच्छी नौकरी नहीं थी. वह एक निजी मिल में फिटर का काम करता था. हर्ष के भाई-बहनों का विवाह हो चुका था. उस पर अपने माता-पिता के अतिरिक्त और कोई ज़िम्मेदारी नहीं थी. वे लोग लालची भी नहीं थे. उन्होंने दहेज लेने से साफ़ मना कर दिया था. मंगला को लगा कि हर्ष की पत्नी बनकर कुशा बहुत ख़ुश रहेगी. मंगला ने जब इस रिश्ते की बात रमेशजी को बताई, तो उन्होंने एक बार फिर मंगला को समझाया.

“ठीक है कि तुमने कुशा के लिए लड़का ढूंढ़ लिया है, लेकिन अंतिम निर्णय शांता को ही लेने दो. तुम तो बस, बिना कुछ छिपाए सब कुछ साफ़-साफ़ बता दो. आगे उनकी मर्ज़ी.”

“हां-हां, मैं सब कुछ बता दूंगी, भला मुझे किसी से कुछ छिपाकर क्या करना है? लेकिन देख लेना, शांता को यह रिश्ता पहली नज़र में ही पसंद आ जाएगा.” उत्साह से भरी हुई मंगला बोल उठी थी.

हुआ भी वही. शांता को रिश्ता पसंद आ गया. कुशा और हर्ष ने भी एक-दूसरे को पसंद कर लिया. शीघ्र ही मुहूर्त निकल आया और कुशा और हर्ष विवाह बंधन में बंध गए. रमेशजी ने भी अपने सारे संदेहों को किनारे करके विवाह के अवसर पर बढ़-चढ़ कर हाथ बंटाया.

सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था. पिछले माह मंगला को पता चला था कि कुशा के पांव भारी हैं और वह अपने मायके गई है. कुशा के सुखी जीवन के बारे में जान कर मंगला को अजीब-सा सुकून मिलता. उसे लगता कि उसने अपनी बेटियों की भांति एक और लड़की का जीवन संवारा है. किन्तु एक दिन शांता का पत्र पाकर मंगला अवाक रह गई. शांता ने मंगला पर आरोप लगाते हुए लिखा था कि उसने हर्ष के साथ ब्याह कराकर कुशा का जीवन बर्बाद कर दिया. वह अगर कुशा को सुखी नहीं देखना चाहती थी तो उसने कुशा को ज़हर क्यों नहीं दे दिया, ऐसे जीवनभर का नरक क्यों गले मढ़ दिया? इत्यादि-इत्यादि.

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मंगला को समझ में नहीं आया कि ये अचानक शांता को क्या हो गया? मंगला ने रमेशजी से शांता के पत्र की चर्चा की. रमेशजी ने वही पुराना वाक्य दुहरा दिया, “मैंने तो तुमसे पहले ही कहा था कि इस झमेले में मत पड़ो. अब भुगतो अपनी भलाई का परिणाम.”

रमेशजी के पास समस्या का हल न पाकर मंगला भागी-भागी हर्ष के घर पहुंची. उसने हर्ष की मां से इस बारे में चर्चा की.

“अब हम तुम्हें क्या दोष दें मंगला बहन! तुमने तो भले का ही विचार किया होगा, लेकिन इतना तो कहना ही पड़ेगा कि तुमने लड़की के बारे में हमें ठीक-ठीक नहीं बताया.” हर्ष की मां ने कोमल शब्दों में ही सही, लेकिन दोषी मंगला को ही ठहराया.

“लेकिन हुआ क्या?” मंगला ने चिंतित होते हुए पूछा.

“वह लड़की यहां तालमेल नहीं बिठा पा रही है. हम ठहरे मध्यमवर्गीय, उसके जैसी फारवर्ड लड़की को हम भी कहां तक सहन करें.” हर्ष की मां ने अपनी बेचारगी प्रकट करते हुए कहा.

“यह तो मैंने पहले ही बताया था कि कुशा बड़े शहर में पली-बढ़ी है. हो सकता है कि उसे यहां के तौर-तरी़के अपनाने में थोड़ा समय लगे.” मंगला ने याद दिलाया.

“हां, कहा तो था, लेकिन अब तो वह यहां आना ही नहीं चाहती है. हर्ष गया था उसे और अपनी बेटी को लेने, मगर उसने आने से मना कर दिया.” हर्ष की मां ने बताया.

“क्या? कुशा को बेटी हुई है! अरे वाह!” मंगला ने अपनी प्रसन्नता व्यक्त की.

“इसमें अच्छा क्या है? उसे तो अब यहां आना ही नहीं है.” हर्ष की मां ने ठंडे स्वर में कहा.

मंगला को हर्ष की मां का यह भाव रुचिकर नहीं लगा.

सप्ताह भर बाद शांता का एक और पत्र आ गया. उसमें भी उसने मंगला को उल्टा-सीधा लिखा था और कुशा का जीवन बर्बाद करने का दोषारोपण किया था. इस प्रकार दोनों पक्षों की ओर से बार-बार दोषारोपण किए जाने से मंगला का हृदय आहत होने लगा. उसने तो ऐसा स्वप्न में भी नहीं सोचा था कि कुशा अथवा हर्ष को अपने जीवन में कोई दुख झेलना पड़े.

अभी तीन दिन पहले शांता और कुशा अपनी नन्हीं बेटी सहित आ धमकी थी.

“तुमने ही ये आग लगाई है, अब तुम्हीं इसे बुझाओ. मेरी कुशा एक पल के लिए भी उस घर में नहीं रहेगी. ये हैं तलाक़ के काग़ज़ात, इन पर तुम हर्ष के हस्ताक्षर करा कर लाओ.” शांता ने मंगला पर मानसिक दबाव डालते हुए कहा.

शांता की बात सुनकर मंगला घबरा गई. उसने एक बार फिर रमेशजी से इस बारे में चर्चा की.

“मामला तो सचमुच गंभीर हो चला है. ठीक है, देखता हूं मैं.” रमेशजी ने मंगला को धीरज बंधाते हुए कहा. किन्तु उसी दिन उन्हें दौरे पर तीन दिन के लिए बाहर जाना पड़ गया.

“जैसे भी हो, ये तीन दिन टाल-मटोल करती रहना. फिर मैं लौटकर देखूंगा कि क्या हो सकता है… वैसे मैंने तो पहले ही कहा था…” रमेशजी ने जाते-जाते मंगला को समझाया भी था और उलाहना भी दे डाला था.

रमेशजी के उलाहने सुनकर मंगला को ताव आ गया कि अब चाहे जो भी हो, इस मामले को वह ख़ुद ही हल करेगी. यह निश्चय करने के बाद उसने पूरे मामले पर एक बार फिर दृष्टिपात किया. उसे लगा कि उसने अभी तक कुशा की मां और हर्ष की मां की बातें सुनी हैं, उसने कुशा या हर्ष से तो बात ही नहीं की. आख़िर वे लोग क्या चाहते हैं?

मंगला ने शाम के समय शांता, उसके पति और कुशा से बात करने का निश्चय किया. उसी समय उसने हर्ष और उसके माता-पिता को भी बुला लिया. सभी लोगों के इकट्ठा होने पर पहले तो विवाद की स्थिति निर्मित होने लगी, लेकिन तब मंगला ने कठोरता से काम लिया.

“आप लोग बहुत बोल चुके हैं, कृपया, अब आप लोग बीच में न बोलें.” मंगला ने कठोर स्वर में शांता और हर्ष की मां को डांटते हुए कहा.

“कुशा, क्या तुम अपनी ससुराल में दुखी हो?” मंगला ने कुशा से पूछा.

“नहीं तो.” कुशा ने उत्तर दिया.

“लेकिन तुम्हारी मां का तो कहना है कि तुम ससुराल में ख़ुश नहीं हो.” मंगला ने फिर कहा.

“नहीं, ऐसा कुछ नहीं है….बात दरअसल ये है कि मां मुझसे पूछती रहती हैं कि हर्ष मुझे घुमाने ले जाते हैं कि नहीं या हर्ष कितने बजे घर लौटते हैं… मैंने मां को बताया कि इनकी ड्यूटी का समय बदलता रहता है, इसलिए रोज़ घूमने नहीं जा पाते हैं. कई बार ये देर से घर लौटते हैं और तब हम साथ में खाना खाते हैं. शायद इसी से मां को लगा होगा कि मैं ख़ुश नहीं हूं.” कुशा ने कहा.

“तो फिर तुम तलाक़ क्यों लेना चाहती हो?” मंगला ने पूछा.

“मैं कहां लेना चाहती हूं…ये तो हर्ष चाहते हैं, मुझसे अलग होना.” कुशा के स्वर में पीड़ा का भाव उभर आया.

“क्या बात है हर्ष? क्या तुम्हें कुशा अच्छी नहीं लगती? या तुम्हें इसके व्यवहार से कष्ट पहुंचता है?” मंगला ने अब हर्ष से पूछा.

“नहीं, ऐसा कुछ भी नहीं है. मुझे कुशा से कोई शिकायत नहीं है.” हर्ष ने दृढ़तापूर्वक कहा. वह आगे बोला, “मैंने तो कुशा से तलाक़ लेने के बारे में कभी सोचा भी नहीं, बल्कि मैं तो ये सोचकर चकित था कि कुशा मेरे साथ क्यों नहीं रहना चाहती? लेकिन अब तो मुझे कुछ और ही मामला समझ में आ रहा है.”

“हां, मुझे भी. तो कुशा और हर्ष तुम दोनों तलाक़ लेना चाहते हो या साथ-साथ रहना चाहते हो?” मंगला ने पूछा.

“हम साथ-साथ रहना चाहते हैं.” दोनों एक स्वर में बोल उठे.

कुशा के मुंह से यह स्वीकारोक्ति सुनकर शांता का चेहरा उतर गया. उधर हर्ष की मां भी नज़रें चुराने लगी.

“देखा, कभी-कभी घर के बड़ों के अहम् के कारण किस तरह बच्चों का जीवन बर्बाद होने लगता है.” मंगला ने कहा. फिर उसने शांता से पूछा, “तुमने ऐसा क्यों किया शांता?”

“मैंने सोचा कि कुशा ख़ुश नहीं है, लेकिन अगर कुशा ख़ुश है तो… तो मैं अपने व्यवहार के लिए माफ़ी मांगती हूं.”

“हां, मैं भी! मैंने भी नाहक तुम्हें दोष दिया, मंगला बहन!” हर्ष की मां बोल उठी.

“चलो इसी बात पर दोनों समधिनें एक-दूसरे को गले लगा लो!” मंगला ने कहा. फिर उसने आगे कहा, “कई बार हम समझ लेते हैं कि हमारे बच्चे नई परिस्थिति में तालमेल नहीं बैठा पाएंगे और इसी भ्रम में पड़कर हम ग़लत निर्णय कर डालते हैं. और नई बहू के साथ-साथ सास को भी तो तालमेल बैठाना चाहिए. क्यों हर्ष की मां, मैंने ग़लत कहा क्या?”

“नहीं मंगला बहन, तुम ठीक कहती हो.” हर्ष की मां ने झेंपते हुए कहा.

इस प्रकार पटाक्षेप हुआ मंगला के जीवन के इस अप्रिय प्रसंग का. रमेशजी जब दौरे से वापस आए तो मंगला ने उन्हें पूरी घटना कह सुनाई.

“चलो अच्छा हुआ कि सब कुछ ठीक हो गया और एक घर उजड़ने से बच गया.” रमेशजी बोल उठे. आज सुबह शांता अपने पति के साथ वापस घर चली गई. हर्ष, कुशा और अपनी बेटी को अपने साथ ले गया.

“चाय तैयार है, मैडम!… और साथ में गरमा-गरम पकौड़े भी.” रमेशजी ने प्रफुल्लित होते हुए कहा.

“अरे, पकौड़े मैं बना देती आपने क्यों कष्ट किया?” मंगला हड़बड़ाकर बोली. वह अब बीते घटनाक्रम से बाहर निकल आई थी.

“तो क्या हुआ जो मैंने बना लिए. मैंने तो पहले ही कहा था…”

“क्या…?” मंगला ने चौंककर पूछा.

“यही कि मैं पकौड़े बहुत अच्छे बनाता हूं!” कहते हुए रमेशजी ठहाका मारकर हंस दिए, मंगला भी अपनी हंसी रोक नहीं पाई. आख़िर महीना भर बाद वह खुलकर हंसी थी.

– डॉ. सुश्री शरद सिंह

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कहानी- राम-लखन का…? (Short Story- Ram Lakhan Ka…?)

ईश्‍वर से प्रार्थना करती हूं, संसार में सभी भाई-बहन के पावन रिश्ते को समझ सकें. जब कभी अपनी ‘दी’ के प्रति किसी ‘मानो’ की अटूट स्नेहपगी श्रद्धा निरखूंगी, स्वयं से ही प्रश्‍न करूंगी, ‘राम-लखन का…?’ और मेरे अंतस् के एक निर्मल कोने में स्थापित तुम्हारी स्मृति निस्सन्देह जीवन्त हो बोल पड़ेगी, “जो ऽऽऽ ड़ा ऽऽऽ!!!” …पर मैं नहीं रोऊंगी. सच, तुम्हारी सौगन्ध, कभी नहीं रोऊंगी.

Short Story- Ram Lakhan Ka

बालकनी में एकाकी बैठी लता वेदना की महोदधि में आपादमस्तक डूबती जा रही थी. जब नियति का कुठाराघात आत्मा को खंडित करके अनिर्वचनीय पीड़ा का सृजन करता है, तब इंसान एकाकी, मौन, स्तब्ध-सा होकर कुछ ही पलों में भूतकाल को पुनः जी उठता है. ऐसी ही अवस्था आज लता की हो रही थी.

हृदय से जुड़ा, बालपन की कोमल भावनाओं के मृदुल एहसास से भीगा, रक्त बंधन में बंधा वो नैसर्गिक रिश्ता, जो मन-प्राण में उष्मा का संचार करता रहा हो, सहसा सामने से विलुप्त हो अनंत में मिल जाए, तो हृदयविदारक अनुभूति तो होगी ही.

लता की आंखें आंसुओं से लबालब थीं. ‘उ़फ्! तू इस तरह चला जाएगा, कभी सोचा न था.’ वह बेचैन हो उठी.

“मां! कहां हैं आप?” बेटी ने पुकारा. पर वो मौन रहीं.

“लता! अकेली क्यों बैठी हो? चलो, भाभी बुला रही हैं.” पति प्रभाकर ने पीछे से सम्बोधित किया तो आर्द्र स्वर में बोल पड़ी, “प्लीज़! मुझे थोड़ी देर अकेला छोड़ दीजिए न. मैं कुछ देर में आ जाऊंगी.”

“लेकिन…”

“प्लीज़…”

“ठीक है. पर वादा करो, अब रोओगी नहीं.” प्रभाकर ने कहा तो लता ने कोई उत्तर नहीं दिया. आंसुओं पर कभी किसी का वश रहा है भला?

प्रियपात्र की मृत्यु के कारण उपजी पीड़ा अगर आंसू बनकर न झरे, तो इंसान जीवित रह सकेगा? सम्पूर्ण हृदय की यात्रा कर नयन-मार्ग से व्यक्त हुई वेदना का अक्षरशः अनुवाद होते हैं आंसू और भावनात्मक धरातल पर स्वस्थ संबंधों का मौन संवाद भी. आंसू ही तो भावनाओं के पावन अनुबंधों को एक विराटता प्रदान करते हैं.

भीगी पलकें मूंदकर लता ने आरामकुर्सी की पुश्त से सर टिका दिया. अधर मौन थे, पर मन में शब्दों की आंधी-सी चल रही थी.  मन भूतकाल का पुनर्द्रष्टा होकर मुखर हो उठा था. बचपन के अनमोल क्षण पुनः वर्तमान का रूप धर अठखेलियां कर उठे थे. लग रहा था, जैसे ‘लता दी’ अपने ‘मानो’ के समक्ष बैठी मीठे शैशव की मृदु-स्निग्ध यादें बांट रही हो, उससे बातें कर रही हो…

मेरा और तुम्हारा रिश्ता बचपन से ही न जाने कौन-से तंतुओं में बंधा था, मानो! मात्र चार वर्ष ही तो बड़ी थी मैं तुमसे, फिर भी वो स्नेह, वो आदर… अभिभूत हो उठती थी मैं. ‘दी’ के बिना एक कौर मुंह में नहीं डालते थे तुम. हम साथ स्कूल जाते, खेलते-खाते, पर लड़ते-झगड़ते नहीं थे. स्मरण है, दादी मां ने एक बार हमारी नज़र उतारते हुए कहा था, “नज़र न लगे मेरे राम-लखन के जोड़े को.”

“दादी, ये तो बताओ, राम कौन और लखन कौन? मैं तो लड़की हूं न?” मैंने ज़ोर से हंसते हुए पूछा था, तो तुम दादी के कुछ बोलने से पहले ही बोल पड़े थे, “दी! तुम राम, मैं तुम्हारा लखन.” पूरा घर आनंद की ध्वनि से आपूरित हो उठा था और मैं आह्लाद के अतिरेक से भाव-विभोर.

मां पूछतीं, “क्यों रे मनोहर! बड़ा होकर भी लखन बना रहेगा न? या फिर अपनी ‘दी’ को ही भूल जाएगा?”

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तुम ज़ोर से मेरा हाथ पकड़कर कहते, “दी! मैं तुम्हें भूल सकता हूं क्या?”

“नहीं रे!” मैं हंस पड़ती.

तुम्हारी वो भयमिश्रित तोतली वाणी आज भी कानों में गूंजती है.

दादी प्रायः तुझसे पूछा करतीं, “राम लखन का…?”

निश्छल बाल सुलभ हंसी हंसकर तुम ज़ोर से कह उठते, “जो ऽऽऽ ड़ा ऽऽऽ!!” जब कभी तुम किसी बात से नाराज़-परेशान रहते, यही प्रश्‍न क्षणांश में तुम्हारी सम्पूर्ण उदासी को उसी तरह ले भागता, जैसे धूप कोहरे को ले भागती है.

शैशव की मधुर यादें दामन में समेटे हम दोनों भाई-बहन बचपन की दहलीज़ लांघने लगे, तो रक्त संबंध से जुड़ा ये पावन रिश्ता और मज़बूत होता गया. मानो! क्या तुम्हें नहीं लगता, यदि माता-पिता भाई-बहन के प्यारे-पावन रिश्ते को बचपन से ही प्रगाढ़ बनाएं, दोनों को एक-दूसरे का महत्व समझाते चले जाएं, तो एक अटूट परिवार का सृजन होता जाएगा? व्यक्ति कभी एकाकी नहीं रहेगा!

मात्र पंद्रह वर्ष की ही तो थी मैं, जब भीषण ज्वर, जिसे डॉक्टरों ने टायफाइड बताया था, के घेरे में कसती जा रही थी. न दवा असर कर रही थी, न दुआ. ज्वर के भीषण संघात से मैं चेतना शून्य हो जाती थी. कई दिनों से अन्न का दाना मुख में नहीं डाला था. घर में सब का बुरा हाल था. फिर एक दिन सेब के छोटे-छोटे टुकड़े कटोरी में डालकर तुम मेरे सम्मुख बैठ गए थे.

“दी! आज तो तुम्हें खाना ही होगा. जब तक खाओगी नहीं, स्कूल भी नहीं जाऊंगा. और रोज़ पूछती हो न, ‘राम-लखन का…?’ तो जवाब में ‘जोड़ा’ कभी नहीं बोलूंगा. चलो, मुंह खोलो.” तुम ने साधिकार एक टुकड़ा मेरे मुंह में डाल दिया था. न जाने किस शक्ति के वशीभूत हो मैं उस दिन के बाद धीरे-धीरे खाना खाने लगी थी. फिर ज्वर भी उतरने लगा था.

“हे ईश्‍वर! इनका स्नेह बनाए रखना.” मां का आर्द्र स्वर आज भी मन में ध्वनित होता है, मानो.

समय की गति कितनी तीव्र होती है, इसका एहसास इंसान को तब होता है, जब वो किसी के न रहने से उत्पन्न हुए शून्य को अनुभूत कर ठगा-सा खड़ा रह जाता है.

याद है न, मेरे विवाह का दिन? अठारह वर्ष के सुंदर-सौम्य मनोहर के मुखड़े पर आनंदमिश्रित वेदना की स्पष्ट छाया. एक ओर बहन के सुख-सौभाग्य की कामना से उत्पन्न आह्लाद, तो दूसरी तरफ़ बिछोह का दंश. सारे काम ऐसे निबटाए थे तुमने जैसे किसी ने जादू की छड़ी फेर दी हो. विदाई के क्षणों में बार-बार रुलाई रोकने के प्रयास में होंठ काट रहे थे तुम और तुम्हारे सर पर स्नेह से हाथ फेरकर मैंने पूछ ही लिया था, “मानो! राम-लखन का…?”

तुम बिलखकर मेरे चरणों में झुक गए थे. इस प्रश्‍न का उत्तर तुम्हारे मन में जो कौंध गया था. अपने जीजाजी से भी तुमने यही मांगा था, “मुझे आप से केवल ये वादा चाहिए कि अगर आप मुझसे किसी बात पर रुष्ट हो जाएं, तब भी दीदी को मुझसे मिलने से नहीं रोकेंगे. और वो जब भी मुझे पुकारेगी, मैं हाथ बांधे उसके समक्ष खड़ा मिलूंगा.”

तुम इतने बड़े झूठे निकलोगे, कभी सपने में भी नहीं सोचा था. आज पुकारूंगी तो क्या आओगे मानो?

तुमने जीवन का हर कार्य मेरे विमर्श से ही किया. सब का आशीष सर-माथे लिया, तभी तो माधवी जैसी सुघड़ पत्नी और पूजा, पीयूष जैसे प्यारे बच्चे मिले. “दी! जीजाजी के रिटायरमेंट के बाद तुम हमारे शहर में ही बस जाना. यहीं पास में एक अच्छा प्लॉट खाली है. मैंने बात भी पक्की कर ली है. मैं जीवनपर्यंत तुम्हारे आशीष तले रहना चाहता हूं.” मैंने तुम्हारी ये बात भी तो मान ली थी न? आज घर है, मैं हूं… तुम कहां हो मानो?

जब कभी छुट्टियों में मायके आती, तुम छोटे बच्चे-से बन जाते. अल्पभाषी, सौम्य व्यक्तित्व का धनी, विद्वान इतिहासवेत्ता डॉ. मनोहर चौधरी कहीं खो जाता और मेरा वही तोतला नन्हा भाई सामने खड़ा हो जाता, जिससे मैं पूछा करती थी,

“राम-लखन का…?”

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माधवी कहती, “दीदी! आपके कारण ही इनका बचपन आज भी विद्यमान है. अभी कोई देख ले इन्हें, तो धोखा खा जाए. कॉलेज में घुसते हैं तो सबको सांप सूंघ जाता है. पढ़ाते हैं तो छात्र मंत्रमुग्ध-सा सुनते हैं. वक्ता ऐसे कि श्रोता आंखों में कौतूहल और मन में अपार आदर समेटे हतप्रभ रह जाते हैं और व्यक्तित्व ऐसा कि लगता है जैसे नाक पर बैठी मक्खी उड़ाने के लिए भी एक नौकर होगा. और अभी देखिए, पायजामा पिंडलियों तक उठाए, मात्र बनियान डाले आपके साथ रसोई में आलू छील रहे हैं.”

“हां, हां. उड़ाओ मेरा मज़ाक. पर याद रखो, एक भी आलू की टिकिया चखने नहीं दूंगा.” तुम मुंह बनाकर कहते तो सब हंस पड़ते. मैं सोच में डूब जाती, ठीक ही तो कहती है माधवी. भाई-बहन का सुदृढ़ स्नेह बचपन को हमेशा मुट्ठी में सहेजे रखता है. ये एक ऐसा अलौकिक रिश्ता है, जिसमें कोई लेन-देन नहीं होता. न कोई ऋण चुकाना होता है, न ही कोई समझौता निभाना होता है. आस्था की बुनियाद पर रखा यह पावन रिश्ता कोई शर्त नहीं रखता.

मानो! कहां विलुप्त हो गए वो क्षण? किस जादूगर ने अपनी डिबिया में समेट लिए?

उस दिन तुम्हारे आनंद का पारावार नहीं था, जिस दिन तुम्हारे जीजाजी के रिटायरमेंट के बाद मैं वापस अपने शहर, अपने घर लौट आई थी.

“दी! अब राम-लखन का जोड़ा कभी नहीं बिछुड़ेगा. बस, पांच-छह वर्ष में मैं भी रिटायर हो जाऊंगा. फिर हर क्षण तुम्हारे स्नेहाच्छादित आंचल तले ही बिताऊंगा. ढेरों क़िताबें लिखूंगा. ख़ूब खाऊंगा.

मानो! कहां रखूं इतने स्नेह-मान को? आज जहां हर रिश्ते की नींव में कटुता है, वहां इतना आदर कहां सहेजूं? मैं अपने सौभाग्य पर इतरा उठी थी.

कॉलेज से लौटते हुए प्रतिदिन तुम मेरे घर आना नहीं भूलते थे. नित्य नये व्यंजन खाने की बचपन की तुम्हारी इच्छा अब और अधिक मुखर हो उठी थी.

तुम्हारे जीजाजी अक्सर कहते, “लता! बड़ी भाग्यवान हो तुम, जो तुम्हें मनोहर जैसा सहोदर मिला. अच्छे-बुरे हर व़क़्त में इसने हमारा साथ दिया है. आज के भौतिकवादी युग में तो जीवन का सार लगनेवाले रिश्ते भी भार लगने लगे हैं. ऐसे में तुम्हारा ये भाई विधाता की अनुपम भेंट है तुम्हारी झोली में.”

मैं भावविभोर हो हृदय से तुम्हें आशीष देती. फिर कहां चूक हो गई मानो! तू अपनी ‘दी’ से रूठकर कभी न लौटने के लिए क्यों चला गया?

कभी विस्मृत नहीं कर सकती वो दिन, जब तुम शाम को घर आए थे और तुरंत फ़रमाइश कर डाली थी, “दी! आज तो चाशनीवाला हलवा खाकर ही जाऊंगा.”

“नहीं मानो! तुझे डायबिटीज़ है, मैं अपने हाथ से तुझे इतना मीठा नहीं खिला सकती.”

“खिला दो, खिला दो. अब शायद जीवनभर खिला नहीं पाओगी.” तुम वही चिर-परिचित बालसुलभ हंसी हंसे थे.

मैं कांप गई थी, “मानो! क्या अशुभ बोल रहे हो?”

“दी! मैंने आपसे कभी कुछ छिपाया है, जो ये बात छिपाऊंगा? कुछ दिनों से पेट-कमर में दर्द रहता है, यूरिन में भी कुछ तकलीफ़ थी. डॉक्टर से मिला तो उसने किडनी प्रॉब्लम की ओर संकेत किया है. मैंने माधवी से भी नहीं कहा है. तुम उससे कहो, परसों दिल्ली जाने की तैयारी करे. फिर…”

तुम सहज भाव से बोलते जा रहे थे. मैं संज्ञाशून्य-सी बैठी थी.

फिर…? फिर सब कुछ अनचाहा घटित होता रहा.

दिल्ली आयुर्विज्ञान संस्थान में भी पुष्टि कर दी गई कि तुम्हारी दोनों किडनियां ख़राब हो चुकी हैं. पूरा परिवार इस आघात से उपजी पीड़ा के भंवरजाल में फंसा कसमसा रहा था. माधवी की ज़िद पर तुम उसके साथ बेहतर इलाज के लिए वेलौर जाने लगे, तो जाते-जाते मुझसे पहली बार पूछ गए, “दी! आज मैं पूछता हूं, राम-लखन का…?” मेरा अंतस् विदीर्ण हो उठा, अधर कांप कर रह गए. मैं ‘जोड़ा!’ नहीं कह पाई. तुम एक मायूस मुस्कान लिए मेरी नज़रों से ओझल हो गए. मैं आशीष को अंजुरी में भर ईश्‍वर से प्रार्थना करती रही.

एक शाम द्वार पर दस्तक हुई.

“कौन?”

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“मैं हूं दी! डॉक्टर मनोहर चौधरी, वेलौर रिटर्न.” तुम्हारा वही ज़ोरदार ठहाका बरामदे में गूंज उठा था.

लम्बी-चौड़ी क़द-काठीवाला मानो न जाने कहां विलुप्त हो गया था. हाथ में छड़ी लिये कृशकाय कोई दूसरा ही व्यक्ति सामने खड़ा था.

उ़फ्! कितना निर्दयी होता है काल, जो क्षणांश में सुखों की परिधि को लांघ, दुख के अगाध सागर में हठात् खींच ले जाता है.

कितना रोई थी मैं. “मानो, तुझे कुछ नहीं होगा. मैं तुझे अपनी किडनी दूंगी.” पर बेहद हठी थे तुम. शायद पहली बार मेरी बात नहीं मानी तुमने. आर्द्र कंठ से इतना ही कहा, “दी! मैं तुमसे केवल आशीष लूंगा और कुछ नहीं. वैसे भी जन्म लिया है, तो मृत्यु से भय कैसा? पूरा जीवन आनंद से जिया हूं. जब तक हूं, कोई दुखी नहीं होगा, कोई नहीं रोएगा…”

पर पूरा परिवार पाले से झुलसी कमलिनी-सा मृतप्राय था. दिन सरकते जा रहे थे. जिन हाथों से तुम्हें तरह-तरह के पकवान खिलाती आई थी, उन्हीं हाथों से नाप कर खाना और पानी देने में कलेजा मुंह को आता था मानो!

अंतिम सांस लेते हुए भी तुमने मेरा ही मान रखा था.

“मत रोओ, माधवी! ‘दी’ हैं न. पूजा… पीयूष… पापा नहीं रहेंगे तो क्या… बुआ हैं न? जीवन बहुत सुंदर है बच्चों, जीना सीखो… चलते रहो…”

और हम सब को काष्ठ प्रतिमा में तब्दील कर, हमारी संज्ञा ही मानो अपने पाथेय के रूप में लेकर तुम अनन्त में विलीन हो गए. खंडित हो गया राम-लखन का जोड़ा…

मानो पंडित कर्मकाण्डी कह रहे हैं, तेरहवीं के बाद इस सुंदर संसार से तुम्हारा अस्तित्व समाप्त हो जाएगा, पर मैं ऐसा नहीं मानती. जानती हूं, अपनों के असमय प्रयाण से मिली पीड़ा असह्य ही नहीं, असाध्य भी होती है. भोगे विगत को, यदि वो मधुर रहा हो, विस्मृत करना सरल-सहज नहीं है. जीवनभर पीड़ा की पगडंडी पर गतिमान रहूंगी… फिर भी मेरे अंतर्मन में तुम सदा जीवन्त रहोगे मेरे भाई.

ईश्‍वर से प्रार्थना करती हूं, संसार में सभी भाई-बहन के पावन रिश्ते को समझ सकें. जब कभी अपनी ‘दी’ के प्रति किसी ‘मानो’ की अटूट स्नेहपगी श्रद्धा निरखूंगी, स्वयं से ही प्रश्‍न करूंगी, ‘राम-लखन का…?’ और मेरे अंतस् के एक निर्मल कोने में स्थापित तुम्हारी स्मृति निस्सन्देह जीवन्त हो बोल पड़ेगी, “जो ऽऽऽ ड़ा ऽऽऽ!!!”

पर मैं नहीं रोऊंगी. सच, तुम्हारी सौगन्ध, कभी नहीं रोऊंगी.

Dr. Nirupama Rai

   डॉ. निरुपमा राय

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कहानी- मुखौटे के भीतर (Short Story- Mukhote Ke Bheetar)

बाबूजी की वे कातर निगाहें एवं फैली हथेलियां क्या कभी भूली जा सकती हैं?

“बेटा मुझे छोड़कर न जाओ…” उनके अंतिम शब्द रात-दिन मुझे दिग्दिगंत से आते  महसूस होते हैं. कनपटियां घमघमाती हैं? क्या कृष्ण को कुछ महसूस नहीं होता? सिर हिलाते हुए इनकार किए जा रही हूं, “बाबूजी बच जाएंगे. देखना वे आयेंगे एक दिन. ऐसा नहीं हो सकता. वे जीवित हैं. यह शांतिपाठ किसलिए? भोज क्यों कर रहे हो? हमारे घर पर किसी की मृत्यु नहीं हुई है.”

प्रभा ने मुझे झकझोर कर चिंतातुर स्वरों में कृष्ण को पुकारा.

Short Story- Mukhote Ke Bheetar

अभी हम हवन करके उठे थे. हवन में मेरे साथ मेरे पति कृष्ण, दोनों पुत्र प्राण एवं पूर्ण भी बैठे थे. यह शांति हवन हमने बाबूजी के लिए रखा था. सभी रिश्तेदार, मित्र एवं परिचित भी इस अवसर पर आए हुए थे. पूजन-हवन के पश्‍चात् भोज का आयोजन किया गया था. हलवाई अपने सहयोगियों के साथ पकवान, खीर, पूरी, मिठाइयां तैयार कर रहा था.

हमारे द्वारा हाथ जोड़कर आग्रह करने के पश्‍चात लोग पंक्तिबद्ध होकर भोजन हेतु बैठने लगे. तभी एक बुज़ुर्ग ने सलाह दी कि सर्वप्रथम बाहर इकट्ठे भिखारियों को पेटभर भोजन कराना चाहिए. बाबूजी की आत्मा की शांति के लिए भूखों व भिखारियों को तृप्त करने हेतु पत्तलें लगाकर ले जायी जाने लगीं, तत्पश्‍चात बैठे हुए सभी लोगों के लिए भोजन परोसा जाने लगा. अंदर भंडार में मेरी व मेरे पति की बहनें, भाभियां रखी हुई भोज्य सामग्री निकाल कर देने एवं अफ़सोस ज़ाहिर करने आई महिलाओं को भोजन परोसने का कार्य कर रही थीं. पुरुष वर्ग में भी भाई-भतीजे लग गए थे. भोजन की ख़ुशबू मेरे नथुनों में प्रवेश करती, न जाने कितना कुछ बीता हुआ याद दिला रही थी.

इस तरह के भोजन बाबूजी को कितने पसंद थे. वह खाने के लिए मांगते हुए कभी-कभी तो गिड़गिड़ाने की हद तक उतर आते थे. मगर कृष्ण ने उन्हें ये सब देने से या तो मना कर रखा था या देते तो बहुत थोड़ा-सा, जिससे बाबूजी कभी संतुष्ट नहीं हो पाते थे. इतनी सारी सामग्री औरों को खिलाकर क्या अब हमें सुख प्राप्त हो सकेगा या बाबूजी की आत्मा को तृप्ति मिल सकेगी? यही सब सोचकर मैं बेचैन हो उठी. जो हुआ वह सही था या ग़लत, इसकी विवेचना करने का व़क़्त अभी कहां था? मगर मन भी गुज़रे व़क़्त को किसी ज़िद्दी बच्चे की भांति बार-बार धकेल कर नज़रों के सामने ला खड़ा करता था. मैं विवश-सी वहीं रखी चटाई पर बैठ गई. छोटी बहन प्रभा ने मुझे गुमसुम-सा बैठा देखा तो वह समझी कि मैं अपने पितातुल्य ससुर की मृत्यु पर अफ़सोस कर उदास हो उठी हूं. वह मुझे समझाने लगी, “धैर्य रखो दीदी. ऐसे कैसे चलेगा? उधर जीजाजी भी विह्वल हो रहे हैं और इधर आप ऐसे बैठी हैं. बाबूजी तो देवतुल्य पुरुष थे. लेकिन अच्छे व्यक्तियों की तो भगवान के घर में भी ज़रूरत रहती है न. उठो और अपनी संपूर्ण संवेदना, श्रद्धा के साथ उन्हें विदा करो.” प्रभा के साथ-साथ दीप्ति भी मुझे समझा रही थी. दीप्ति मेरी रिश्ते की ननद थी. मैं स्वयं को रोक न सकी, रूंधे कंठ से बिलख उठी. जो ये कह रही हैं, क्या वही मैं भी सोच रही हूं? मेरे अफ़सोस का कारण तो कुछ और ही था. बाबूजी की ऐसी मुक्ति की कामना मैंने कभी नहीं की थी. उधर कृष्ण ऐसे व्यवहार कर रहे थे, जैसे अपने पिता के श्रवण कुमार एक वही थे. अभी मेरे दोनों जेठ भी आए हुए थे. उनमें से बड़े व उनकी पत्नी डॉक्टर थे. दोनों मिलकर शहर में अपना बड़ा-सा नर्सिंग होम चला रहे थे. 25-30 लोगों का स्टाफ था और बड़ी-सी इमारत शहर के बीचोंबीच जेठानी के पिता की दी हुई ज़मीन पर बनी हुई थी. छोटे जेठ दूसरे शहर में एक निजी बहुराष्ट्रीय कंपनी में इंजीनियर थे. कंपनी की दी हुई गाड़ी-बंगला एवं समस्त सुविधाएं उपलब्ध थीं. जेठानी नहीं आ सकी थीं, कारण बच्चों की परीक्षाएं निकट थीं. कृष्ण श्‍वेत धोती-कुर्ता पहने कई लोगों से घिरे बैठे थे. लोग मातमपुरसी के लिए आ रहे थे. वे थोड़ी देर रुककर हमें सांत्वना देते, फिर भोजन करके चले जाते.

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किसी को भी पता न था कि सत्य क्या है? कृष्ण के पिता कैसे मरे? उन्हें हुआ क्या था? मृत्यु पूर्व क्या वाक्या घटा था. जो कृष्ण के द्वारा बताया जा रहा था, वे उसे ही सच मान रहे थे. शक की कोई गुंजाइश ही नहीं थी. ‘होनी को कौन टाल सका है? अमरफल खाकर कौन आया है?’ सुनते-सुनते मेरे कान पक गए. क्या इस छल-छद्मवेशी, मुंहदेखी कहनेवालों की दुनिया में कुछ लोग भी ऐसे नहीं हैं, जो खरी-खरी कह सकें कि कृष्ण तुमने अपने पिता को कितना तरसाया? उनके साथ क्या-क्या सुलूक किया. जब जानते थे कि उनकी शारीरिक एवं मानसिक स्थिति इस लायक नहीं थी तो उन्हें कुंभ में ले जाने की क्या आवश्यकता थी? वहां वे कैसे मृत्यु को प्राप्त हुए? क्या आज पिता और पुत्र के मध्य शाश्‍वत विश्‍वास, स्नेह एवं सहानुभूति की उष्मा को पैसे एवं स्वार्थ का घुन चट कर गया है? सामान्य परिस्थितियों में मृत्यु का होना और बात है, मगर छलपूर्वक ला दिया जाना एक घनघोर अपराध. परिवार-समाज के लिए एक व्यक्ति का होना, न होना, उसका जीवन-मृत्यु बहुत कुछ मायने रखता है, सुख-दुख का कारण बन सकता है. मैं अंतर्यात्रा करती मौन बैठी थी.

क्या मैं भूल सकती हूं वह सब? मन-ही-मन मैं स्वयं को इस गुनाह में शामिल मान रही थी. न मानती तो अपराधबोध से क्यों ग्रसित होती? लेकिन कृष्ण के तो वे जनक थे. उनके सुख-दु:ख की परवाह, उन्हें मुझसे अधिक होनी चाहिए थी. कृष्ण की रगों में उनका ही रक्त दौड़ रहा था. मेरे दोनों जेठ तो और भी निश्‍चिंत व दायित्वमुक्त थे. माता-पिता के प्रति बच्चों का कोई कर्त्तव्य भी बनता है, वे तो सोचना-समझना भी नहीं चाहते थे. अम्माजी यानी मेरी सास की मृत्यु पूर्व तक तो सब कुछ ठीक था. अम्मा स्वयं इतनी सक्षम थीं कि बाबूजी के साथ-साथ अपनी भी पूरी परिचर्या कर लेती थीं. यह सब तो अम्मा के दिवंगत होने के बाद हुआ. पत्नी की मृत्यु के पश्‍चात बाबूजी को न जाने क्या हुआ कि वे मानसिक एवं शारीरिक रूप से अस्वस्थ हो उठे. कभी स्वाद लेकर खाते-पीते तो कभी थाली फेंक देते. कभी धीमे-धीमे बड़बड़ाते तो कभी अवसादग्रस्त हो दो-दो दिन तक पड़े रहते. अनियमित दिनचर्या, रखरखाव की कमी से जल्द ही वे बीमार, चिड़चिड़े व कमज़ोर हो गए थे. तंद्रा में पड़े-पड़े ऊलजलूल बातें करते, चिल्लाते भी.

बुढ़ापा तो यूं भी शारीरिक बल को पस्त कर देता है, ऊपर से बाबूजी की ऐसी अजब स्थिति थी. अम्मा के हाथ के पुओं-पकौड़ों का स्वाद उन्हें बेतरह याद आता, तो कभी चीले-चटनी की याद में लार टपकाते वे मौक़ा पाते ही रसोई घर में पहुंच जाते और कांपते-हांफते बनाने के आधे-अधूरे प्रयास करने लग जाते. सच कहा है कि बूढ़े और बच्चे बराबर होते हैं. बाबूजी की पाचन शक्ति को जानते हुए हम अक्सर उनकी उचित-अनुचित मांग नकार देते थे. ऐसे समय बाबूजी की बेबसी भरी दृष्टि मैं क्या भुला पाऊंगी? कभी-कभी मैं पिघल जाती तो बाद में गंदगी और बदबू से दो-चार होना ही पड़ता. डॉक्टर की ज़रूरत पड़ जाती, साथ ही कृष्ण शंकालु हो मुझसे तकरार पर उतारू हो उठते और साफ़-सफ़ाई के लिए मदद के व़क़्त झुंझलाते-झल्लाते बाबूजी के साथ-साथ मुझे भी कोसते.

कितने अफ़सोस की बात है कि जिन बाबूजी ने अपने बेटों एवं परिवार के लिए अपना स्नेह, प्यार एवं समस्त पैसा-रुपया कमाई ख़र्च कर दी थी, उन्हें हम सबके बीच ख़ुशी के पलों में शरीक तक करना किसी को गवारा न था. एक बार तो बाज़ार से मंगाकर कुछ खा-पी लेने पर बाबूजी की चाय में कृष्ण ने दस्त लगने वाली गोलियां ही मिला दी थीं, जिसके कारण वे खाट से लग गए एवं कुछ भी अंट-शंट न खाने के लिए बार-बार माफ़ी मांगते रहे थे.

कृष्ण मेरे पति थे, उनके विरोध की कल्पना मेरे अंदर बैठी भारतीय संस्कारी नारी कैसे कर सकती थी. मगर कृष्ण के अंदर छिपी शैतानियत को अनुभव कर मैं कांप जाती. क्या इसी दिन के लिए बाबूजी ने अपने बच्चों को पिट्ठू चढ़ाया होगा. चलना, बोलना और दुनियादारी को समझने की शक्ति का अनुभव कराया होगा? क्या ये व्यक्ति यही सब कुछ बूढ़े, अशक्त, बीमार या अचेत होने पर मेरे साथ भी कर सकता है? तब मुझे कृष्ण अनजाने, अजनबी, क्रूर व हिंसा के पुतले दिखते. मेरे मन में उमड़ते-घुमड़ते विचारों के चलते पति के प्रति प्रेम, प्यार व मान-सम्मान धीरे-धीरे नफरत में बदलने लगा. कल को हमारे बेटे प्राण व पूर्ण हमारे साथ यही सब या इससे भी बढ़कर करने लगें तो क्या होगा? मैं चिंतातुर रहती, मगर कृष्ण में हैवानियत के साथ-साथ धूर्तता भी कम न थी. जो भी वे करते, प्राय: बेटों से छिपकर ही करते.

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मेरे दोनों जेठों को रुपया-पैसा मकान के साथ ही बाबूजी की भी दरकार न थी, अतएव बाबूजी हमारे ही होकर रह गए थे और अपनी समस्त चल-अचल संपत्ति कृष्ण के ही नाम लिख दी थी. अभी परिचितों-स्वजनों के सामने घर के सब लोग ऐसा दिखावा कर रहे थे कि बाबूजी के जाने का सबसे अधिक ग़म उन्हीं को हो रहा है. लेकिन मन-ही-मन सब निश्‍चिंत थे कि चलो अच्छा हुआ, बाबूजी की मुक्ति हुई. मगर मुक्ति का सवाल बड़ा पेचीदा है. हम सब तो बाबूजी सहित कुंभ के मेले में स्नान के लिए गए थे. लोग तो आंख मूंद कर मान लेते हैं कि तीर्थ क्षेत्र में हुई अकाल मृत्यु भी मोक्ष के लिए काफ़ी है. मगर इंसानियत के नाते सोचकर देखिए कि एक वृद्ध जिसके भीतर अदम्य जिजीविषा मौजूद है, जो अच्छा खाना-पीना एवं परिवार की ख़ुशियों के बीच रहकर उन्हें महसूस करता हुआ जीवित रहना चाहता है, वो अकाल मृत्यु को प्राप्त हो जाए, यह क्या गहन अपराध नहीं? क्या इसकी कोई सज़ा तजवीज़ कर सकते हैं आप? क्या समाज का ढांचा अब इतना चरमरा गया है कि कोई पिता अपने पुत्र पर भी विश्‍वास न करे. आनेवाले समय में नैतिकताबोध स़िर्फ क्या किस्से-कहानियों में बचेगा या अपवाद स्वरूप कहीं नज़र आएगा? आप यह तो मानते होंगे कि प्रत्येक इंसान के अंदर दैवीय एवं आसुरी शक्ति का वास होता है. यह हमारे अपने ऊपर निर्भर होता है कि हम किसको जगाए रखते हैं. अपने निर्दोष निष्कलुष मन की दैवीय शक्ति के सामने अपने अच्छे-बुरे प्रत्येक कर्म का लेखा-जोखा सभी को देना होता है. इसीलिए मंदिर, मस्जिद, चर्च, गुरुद्वारे में ईश्‍वर के समक्ष हम खड़े होते हैं.

तभी प्रभा ने फिर आकर मेरी तंद्रा भंग कर दी. “दीदी, ज़रा सुनना तो…”

पश्‍चाताप और ग्लानि से भरे अपने विचारों में व्यवधान आते ही मैं घबरा उठी, “नहीं… नहीं… मैंने तो कुछ भी नहीं किया. किया तो कृष्ण ने है, बाबूजी का हाथ नदी की गहरी धारा में कृष्ण ने छोड़ा था. मैं तो प्राण व पूर्ण के साथ तट पर थी.” बाबूजी की वे कातर निगाहें एवं फैली हथेलियां क्या कभी भूली जा सकती हैं?

“बेटा मुझे छोड़कर न जाओ…” उनके अंतिम शब्द रात-दिन मुझे दिग्दिगंत से आते  महसूस होते हैं. कनपटियां घमघमाती हैं? क्या कृष्ण को कुछ महसूस नहीं होता? सिर हिलाते हुए इनकार किए जा रही हूं, “बाबूजी बच जाएंगे. देखना वे आयेंगे एक दिन. ऐसा नहीं हो सकता. वे जीवित हैं. यह शांतिपाठ किसलिए? भोज क्यों कर रहे हो? हमारे घर पर किसी की मृत्यु नहीं हुई है.”

प्रभा ने मुझे झकझोर कर चिंतातुर स्वरों में कृष्ण को पुकारा. कृष्ण आकर आग्नेय नेत्रों से मुझे तकते हुए डपटे, “क्या उल्टा-सीधा बके जा रही हो?” फिर मेरा हाथ थामकर मेरे आंचल को व्यवस्थित करते हुए स्नेह-प्रदर्शन करने लगे और भीतर बाबूजी के कमरे में ले जाकर बैठा दिया. क्या मैंने बाबूजी के स्थान की प्रतिपूर्ति की है? क्या मेरे प्राण और पूर्ण, जिन्हें मैंने अपने हृदय से लगा कर पल-पल बड़ा किया है. रक्त, मज्जा, आंचल की धार से सींचा है, क्या वे भी कृष्ण की तरह एक दिन मुझसे तंग आकर कहीं किसी कुंभ में मुझे मोक्ष प्रदान कर देंगे? मैं भयभीत-सी बाबूजी के बिस्तर पर सिकुड़ी बैठी हूं. कृष्ण ने द्वार की कुंडी बाहर से बंद कर दी. बाहर बाबूजी की मुक्ति का अनुष्ठान चल रहा था. मैं सोच रही हूं, बहुत से लोगों के दो चेहरे होते हैं एक मुखौटे पर, दूसरा उसके भीतर. अदम्य शांति ऊपर बरसती रहती है और भीतर असली चेहरा वीभत्सता का पर्याय होता है.

– शोभा मधुसूदन

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कहानी- उसकी राह (Short Story- Uski Rah)

“क्या यह वरदान मेरे लिए अभिशाप नहीं बन जाएगा? क्या यह सहारा मेरे लिए बोझ नहीं साबित होगा? इसके साथ क्या मैं सदा के लिए अपूर्ण नहीं रह जाऊंगी? अपने करियर के लिए अपूर्व ने मेरे बच्चे को अजन्मा होने का अभिशाप दिया था. बताइए क्या दोष था उसका? बस इतना कि वह एक महत्वाकांक्षी बाप की औलाद था?” कंगना ने अपनी आंखों से ढलक आये आंसुओं को पोंछा, फिर लक्ष्मीदेवी की आंखों में झांकती हुई बोली, “अपूर्व का क्या होगा, यह अब कोई रहस्य नहीं रह गया है, लेकिन उसके बाद मेरा क्या होगा? यह आपने तो नहीं सोचा, पर क्या मुझे भी अपने करियर के बारे में नहीं सोचना चाहिए? डूबना अवश्यंभावी है, यह जानकर क्या मुझे आंख मूंद कर अपनी कश्ती को लहरों के सहारे छोड़ देना चाहिए?”

Short Story Uski Rah

आईटी कानपुर से बी.टेक., केलीफोर्निया यूनिवर्सिटी से एम. टेक, लंदन स्कूल ऑफ़ इकेनॉमिक्स से एमबीए, तीन साल में 3 कंपनियों का सफ़र, चौथे साल एक मल्टीनेशनल कंपनी के डिप्टी सीईओ के पद का दावेदार…. लक्ष्मीदेवी के 29 वर्षीय इकलौते बेटे अपूर्व की ऊंची उड़ान के आगे सफलता की सीढ़ियां भी छोटी पड़ती जा रही थीं. ऐसा हो भी क्यूं न, सोते-जागते, उठते-बैठते-बस काम ही काम. काम के अलावा अपूर्व को और कुछ सूझता ही नहीं था.

कई धन-कुबेर अपनी कन्याओं के लिए लक्ष्मीदेवी के घर लाइन लगाए रहते, पर अपूर्व कोई लड़की देखने को राज़ी ही नहीं होता. एक दिन उन्होंने उसके सामने कई फ़ोटो रखते हुए कहा, “मैंने ये लड़कियां पसंद की हैं, बता इनमें से सबसे अच्छी कौन है?”

अपूर्व ने तस्वीरों पर एक उचटती हुई दृष्टि डाली, फिर बोला, “ये सभी अच्छी हैं, पर मैं इनमें से किसी से शादी कर उसकी ज़िंदगी बर्बाद नहीं कर सकता.”

“क्या मतलब?”

“मां, मेरा प्यार कहीं और है. अगर मैं इनमें से किसी से शादी करूंगा तो बेचारी की ज़िंदगी बर्बाद हो जाएगी या नहीं?” अपूर्व मुस्कुराया.

“तो बता, तू किससे प्यार करता है, मैं उसी से तेरी शादी कर देती हूं.” लक्ष्मीदेवी हुलस उठीं.

“मेरा पहला प्यार मेरा करियर है. मुझे जल्द-से-जल्द कंपनी का सीईओ बनना है. हां, जिस दिन कोई ऐसी लड़की मिलेगी, जिसे देख दिल कहे कि यह करियर से भी ज़्यादा क़ीमती है, उस दिन फ़ौरन शादी कर लूंगा.” अपूर्व हल्का-सा मुस्कुराया, फिर ऑफ़िस चला गया. लक्ष्मीदेवी काफ़ी देर तक बड़बड़ाती रहीं.

अपूर्व ऑफ़िस पहुंचा ही था कि ब्लू-स्काई एडवर्टाइज़िंग कंपनी के एम.डी. रमन मेहता आ गए.

“मि. मेहता, हमारा काम हुआ कि नहीं.” अपूर्व ने उन्हें बैठने का इशारा करते हुए पूछा.

“सर, आप जैसे इंपोेर्टेन्ट क्लाईंट का काम न होने का प्रश्‍न ही नहीं उठता.” रमन मेहता धीरे से मुस्कुराए, फिर अपने ब्रीफकेस से दो एलबम निकाल अपूर्व की ओर बढ़ाते हुए बोले, “ख़ास आपके लिए दो नयी और बेइंतहा ख़ूबसूरत मॉडल्स का पोर्टफोलियो लाया हूं.”

अपूर्व ने एक एलबम को लेकर पन्ने पलटने शुरू किए.

“ये मिस रेणुका रमानी हैं, मिस इंडिया यूनिवर्स के फ़ाइनल राउंड तक पहुंच चुकी हैं. आख़िरी राउंड में तबियत ख़राब हो जाने के कारण पिछड़ गई थीं, वरना इस बार की मिस इंडिया यही होतीं.”

अपूर्व ने बिना कोई प्रतिक्रिया व्यक्त किए एलबम के पन्ने पलटे, फिर दूसरा एलबम उठा लिया.

“ये हैं मिस नेहा गोविरकर, इस बार अमेरिका में बेस्ट एशियन ब्यूटी का पुरस्कार इन्हें ही मिला है. आपकी ख़ातिर बहुत मुश्किल से ये इंडिया में अपना पहला असाइनमेंट करने के लिए तैयार हुईं.” रमन मेहता ने प्रशंसात्मक स्वर में बताया.

अपूर्व ने इस एलबम के भी पन्ने पलटे, फिर उसे भी मेज़ पर रखते हुए बोला, “हमारी कंपनी एक्सक्लूसिव प्रोडक्ट लॉन्च करने जा रही है, इसके लिए हमें मॉडल चाहिए, बिल्कुल अनछुआ सौंदर्य. ओस की बूंद जैसा पवित्र चेहरा. ऐसी ख़ूबसूरती, जिसमें उन्मुक्त पवन जैसी चंचलता और अनंत आकाश जैसी असीम शांति एक साथ हो.”

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“ऐसा एक चेहरा है मेरे पास.” रमन मेहता ने ब्रीफकेस से एक और एलबम निकाला, “ये हैं मिस कंगना राय, बीएससी फ़ाइनल ईयर की स्टूडेंट. पिछले महीने अपने कॉलेज की नृत्य प्रतियोगिता में पुरस्कार जीता तो उत्साहित हो मेरे स्टूडियो में फ़ोटो खिंचवाने चली आई थीं.”

“मि. मेहता, आप मेरा समय बर्बाद कर रहे हैं. मैंने इस मॉडलिंग असाइनमेंट के लिए आपको मुंहमांगी क़ीमत देने का वादा किया है और आप किसी को भी लाकर मेरे मत्थे मढ़ देना चाहते हैं.” अपूर्व का स्वर तल्ख़ हो गया.

“सर, अनछुआ सौंदर्य बाज़ार में नहीं मिलता. ऐसा सौंदर्य तो बस सीप में बंद मोती के पास ही हो सकता है. अगर किसी पारखी की नज़र पड़ जाए तो उसे अनमोल रत्न बनते देर नहीं लगती.” रमन मेहता भरपूर आत्मविश्‍वास के साथ मुस्कुराए, फिर अपने शब्दों को वज़न देते हुए बोले, “आप एक बार इस एलबम के पन्ने तो पलट कर देखिए, आपकी आंखें चौंधिया न जाएं तो मेरा नाम बदल दीजिएगा.”

अपूर्व ने बहुत बेदिली से एलबम का पहला पन्ना खोला, लेकिन पहली ही तस्वीर सीधे दिल में उतरती चली गयी. ख़ूबसूरत चेहरे से झांक रही झील-सी गहरी आंखें किसी को भी अपने मोहपाश में बांध लेने में सक्षम थीं.

“मैं आज ही इनसे मिलना चाहूंगा.” अपूर्व ने एलबम रखते हुए फैसला सुनाया.

उसी दिन शाम रमन मेहता ने अपूर्व की कंगना राय से मुलाक़ात करवा दी. अपूर्व ने उसे देखा तो देखता ही रह गया. थोड़ी देर की औपचारिक बातचीत के पश्‍चात अपूर्व ने कहा, “मि. मेहता, अगर आप बुरा न मानें तो मैं मिस कंगना से अकेले में कुछ  बात करना चाहता हूं.”

“श्योर सर.” रमन मेहता के चेहरे पर एक व्यवसायिक मुस्कान उभरी और कंगना राय को बोलने का कोई मौक़ा दिए बिना वे वहां से हट गए.

कंगना के चेहरे पर परेशानी के चिह्न उभर आए, जिन्हें पढ़ते हुए अपूर्व ने धीमे स्वर में कहा, “आप अपना मॉडलिंग असाइनमेंट तो पक्का ही समझिए, लेकिन उससे पहले मैं एक शर्त रखना चाहता हूं.”

“आप मुझे काम दें या न दें, पर मैं आपकी कोई शर्त नहीं मानूंगी.” कंगना का  चेहरा अपमान से लाल हो उठा और वह झटके से उठ खड़ी हुई.

“देखिए, शर्त सुने बिना इनकार करना अक्लमंदी न होगी.” अपूर्व ने हड़बड़ाकर वहां से जा रही कंगना की कलाई थाम ली.

“छोड़िए मेरा हाथ, आप ग़लत समझ रहे हैं. मैं वैसी लड़की नहीं हूं.” हाथ छुड़ाते-छुड़ाते कंगना की आंखों से आंसू टपक पड़े.

“आप भी मुझे ग़लत समझ रही हैं. मैं भी वैसा लड़का नहीं हूं, मैं तो आपसे शादी करना चाहता हूं.” कंगना के आंसू देख अपूर्व हड़बड़ा उठा.

“क्या?” कंगना की आंखें आश्‍चर्य से फैल गईं.

“हां मिस कंगना, क्षणभर पहले मेरे मन में हल्की-सी आशंका थी, पर अब मुझे विश्‍वास हो गया है कि मेरा ़फैसला सही है.” अपूर्व क्षणभर के लिए रुका, फिर कंगना की आंखों में देखते हुए बोला, “मेरी शर्त स़िर्फ इतनी है कि या तो आप हमारी कंपनी के लिए मॉडलिंग के प्रस्ताव को स्वीकार कर लें या मेरी शादी के प्रस्ताव को, क्योंकि मॉडलिंग के बाद शादी और शादी के बाद मॉडलिंग मुझे स्वीकार न होगी.”

“मुझे थोड़ा व़क़्त चाहिए.” कंगना ने सहज होने की कोशिश की.

किंतु फैसला लेना आसान न था. एक तरफ़ कैरियर के आरंभ में ही इतना बड़ा ब्रेक था- ग्लैमर, शोहरत, पैसा और तड़क-भड़क भरी ज़िंदगी थी, तो दूसरी तरफ़ अपूर्व जैसा पति था, जिसके पास वह सब कुछ था जिसकी कामना हर लड़की करती है. कंगना की पूरी रात उहापोह में बीती.

अगले दिन जब उसने फैसला सुनाया तो अपूर्व ख़ुशी से उछल पड़ा. लक्ष्मीदेवी ने भी देरी नहीं की. चट मंगनी-पट ब्याह हो गया और अगले ही सप्ताह अपूर्व और कंगना हनीमून पर निकल गए. स्विटज़रलैंड, पेरिस, रोम, सिंगापुर और हांगकांग होते हुए जब वे एक माह बाद लौटे तो बहुत ख़ुश थे.

इस बीच अपूर्व का काम काफ़ी पिछड़ गया था, अतः वापस आते ही वह बुरी तरह व्यस्त हो गया. कंगना बहुत समझदार थी. पति की व्यस्तताओं और मजबूरियों को समझती थी. शिकायतें करने के बजाय वह अपूर्व के काम में हाथ बंटाने लगी.

“बहू, तुम एक अच्छी पत्नी के साथ-साथ एक अच्छी सेक्रेट्री भी बन गई हो. अब जल्दी से अच्छी मां बन कर भी दिखा दो.” एक दिन लक्ष्मीदेवी ने कंगना के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा.

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“यह ख़ुशी भी आपको जल्दी ही मिल जाएगी.” कंगना के चेहरे पर रक्तिम आभा उभर आयी.

यह सुन लक्ष्मीदेवी का चेहरा प्रसन्नता से खिल उठा और उन्होंने कंगना के चेहरे को अपने हाथों में थामते हुए उलाहना दिया,  “तुमने इतनी बड़ी ख़ुशी मुझसे अब तक छुपा कर क्यूं रखी?”

“मांजी, मुझे भी आज ही इस बात का एहसास हुआ है. अभी तो इनको भी कुछ मालूम नहीं है.” कंगना की पलकें लाज से बोझिल हो उठीं.

“मैं अभी उसे ख़बर करती हूं.” लक्ष्मीदेवी ने मोबाइल उठाया.

“मांजी, प्लीज़ उन्हें सबसे पहले यह ख़बर मुझे देने दीजिए. मैं देखना चाहती हूं कि उनकी आंखों में कैसी ख़ुशी उभरती है.” उस शाम कंगना ने पूरे घर को नये सिरे से सजाया. अपूर्व काफ़ी देर से लौटा था. खाने के बाद दोनों जल्दी ही अपने कमरे में चले गए. थोड़ी देर बाद उनके कमरे से तेज़ बहस की आवाज़ें आने लगीं. फिर अपूर्व का स्वर तो शांत हो गया, पर कंगना की सिसकियां काफ़ी देर  तक सन्नाटे को भंग करती रहीं.

सुबह दोनों काफ़ी देरी से कमरे से बाहर निकले. अपूर्व के चेहरे पर शांति थी, किंतु कंगना के चेहरे पर वीरानी छायी हुई थी.

“तुम लोग कहां जा रहे हो?” उन्हें तैयार देख लक्ष्मीदेवी ने पूछा.

“डॉक्टर के पास.” अपूर्व ने सपाट स्वर में बताया.

अचानक जैसे छठीं इंद्रिय जागृत हो गयी. लक्ष्मीदेवी की अनुभवी आंखों ने पलभर में कंगना के दिल का हाल पढ़ लिया था, किंतु संशय मिटाने के लिए पूछा, “क्यों?”

“जी…. वो… वो…” अपूर्व चाहकर भी अभिव्यक्ति के लिए शब्द नहीं जुटा पाया, किंतु कंगना के आंखों से टपके आंसुओं ने प्रश्‍न का उत्तर दे दिया था.

“देखिए, शादी तो मैंने कर ली, पर अभी बच्चे-वच्चे के झंझट में फंसने का समय मेेरे पास नहीं है.” अपूर्व ने समस्या सामने रखी.

“इसमें तू परेशान क्यूं होता है? बच्चा तुझे नहीं कंगना को पालना है.” समस्या का मूल जान लक्ष्मीदेवी हंस पड़ीं.

“ये क्या पिछड़े ज़माने की बातें कर रही हैं.” अपूर्व पहले तो झल्लाया, फिर समझाते हुए बोला, “अभी तो मेरे कैरियर की शुरुआत है, बहुत लंबा सफ़र तय करना है मुझे. इसके लिए आए दिन पार्टियां देनी होंगी, लोगों से मिलना-जुलना होगा. कॉन्टेक्ट बढ़ाने होंगे. हाई सोसायटी की पार्टियों में लोग पत्नियों के साथ आते हैं. अब मेरे साथ यह नैपकीन में बच्चा लेकर चलेगी तो कैसा लगेगा?”

“तो इतनी-सी बात के लिए तू अपने बच्चे की हत्या कर देगा?” लक्ष्मीदेवी का मुंह खुला रह गया.

अपूर्व ने उनकी बात का कोई उत्तर नहीं दिया, किंतु कंगना की ओर मुड़ते हुए बोला, “मां पुराने ज़माने की हैं, हमारी बात नहीं समझ सकेंगी, लेकिन तुम मेरी शर्त सुन लो. अगर मेरे साथ ज़िंदगी गुज़ारनी है तो मैं गाड़ी निकाल रहा हूं, चुपचाप आकर बैठ जाओ वरना….”

अपना वाक्य अधूरा छोड़ अपूर्व तेज़ी से बाहर चला गया. यह अधूरा वाक्य ज़िंदगी में अधूरापन भर सकता था, अतः न चाहते हुए भी कंगना को पति की अनुगामिनी बनना पड़ा.

ज़िंदगी मिटाकर भी ज़िंदगी चलती रहती है. चंद दिनों बाद कंगना एक बार फिर पति के क़दमों से क़दम मिलाकर चलने लगी, किंतु कहीं कुछ ऐसा था जो दरक गया था. उसके चेहरे को देखकर ऐसा लगता था जैसे किसी पुष्प से उसकी सुगंध छीन ली गयी हो.

समय बीतता रहा, अपूर्व की मेहनत रंग लायी और शादी की दूसरी वर्षगांठ पर कंपनी ने उसे सीईओ  के पद का तोहफ़ा दिया. इस ख़ुशी में उसने बहुत बड़ी पार्टी दी. अपूर्व और कंगना रातभर झूमते-गाते रहे. उनके सारे सपने सच हो गए थे.

अगले दिन ऑफ़िस में अपूर्व के पेट में भयंकर दर्द उठा. पहले भी दो-तीन बार ऐसा हो चुका था, किंतु व्यस्तताओं के चलते अपूर्व ने उसे नज़रअंदाज़ कर दिया था, लेकिन इस बार दर्द असहनीय था. सहकर्मियों ने उसे हॉस्पिटल में भर्ती कर दिया.

जांच के बाद जब रिपोर्ट सामने आयी तो सबके पैरों तले ज़मीन खिसक गयी. अपूर्व की आंत में कैंसर था, वह भी अंतिम चरण में. कंगना ने सुना तो जड़ हो गयी.

अपूर्व को एक नामी कैंसर इंस्टिट्यूट में भर्ती करा दिया गया. कंगना ने देश के बड़े-बड़े डॉक्टरों को बुलाया. अपूर्व की सेवा में दिन-रात एक कर दिया, पर उसकी स्थिति में सुधार नहीं हो रहा था. डॉक्टरों की सलाह पर अपूर्व का अमेरिका में ऑपरेशन करवाने का निश्‍चय किया गया. चार दिन बाद की हवाई जहाज की टिकटें भी मिल गईं.

अगले दिन कंगना कुछ ज़रूरी काग़ज़ात    लेने घर गयी. अचानक उसे उल्टी होने लगी. लक्ष्मीदेवी की अनुभवी आंखों ने कारण समझ लिया. कंगना को बिस्तर पर लिटाते हुये उन्होंने सांस भरी, “लगता है, ऊपर वाले ने हमारी सुन ली है.”

“कुछ नहीं सुनी है ऊपर वाले ने. अगर उसे सुनना ही होता तो… तो….” कंगना के शब्द हिचकियों में बदल गए.

“रो मत बेटा.” लक्ष्मीदेवी ने कंगना के सिर पर हाथ फेरा, फिर मोबाइल उसकी ओर बढ़ाते हुए बोलीं, “अब तो तुम्हें जीने का सहारा मिल गया है, चलो यह ख़ुश-ख़बरी अपूर्व को सुना दो.”

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“नहीं मांजी, अपूर्व को यह ख़बर न तो मैं दूंगी और न ही आप.” कंगना का स्वर कड़ा हो गया और वह झटके से उठ खड़ी हुई.

“क्यों?”

“क्योंकि यह बच्चा दुनिया में नहीं आएगा और इसके वजूद की ख़बर देकर मैं अपूर्व के कष्ट को और नहीं बढ़ाना चाहती.” कंगना ने दो टूक फैसला सुनाया.

“यह क्या पागलपन है. जो ग़लती अपूर्व ने की थी, वही ग़लती तू करने जा रही है?” लक्ष्मीदेवी तड़प उठीं.

“मांजी, ग़लती न तो अपूर्व ने की थी और न मैं कर रही हूं. मैं बहुत सोच-समझकर फैसला कर रही हूं.” कंगना ने एक-एक शब्द पर ज़ोर देते हुए कहा.

लक्ष्मीदेवी ने कंगना को अविश्‍वसनीय नज़रों से देखा, फिर बोलीं, “बेटा, बच्चा तो स्त्री को प्रकृति का दिया सबसे बड़ा वरदान है, उसके जीने का सहारा है. बच्चे के बिना स्त्री सदैव अपूर्ण होती है और तू….”

कंगना ने लक्ष्मीदेवी की बात बीच में ही काट दी, “क्या यह वरदान मेरे लिए अभिशाप नहीं बन जाएगा? क्या यह सहारा मेरे लिए बोझ नहीं साबित होगा? इसके साथ क्या मैं सदा के लिए अपूर्ण नहीं रह जाऊंगी? अपने करियर के लिए अपूर्व ने मेरे बच्चे को अजन्मा होने का अभिशाप दिया था. बताइए क्या दोष था उसका? बस इतना कि वह एक महत्वाकांक्षी बाप की औलाद था?” कंगना ने अपनी आंखों से ढलक आये आंसुओं को पोंछा, फिर लक्ष्मीदेवी की आंखों में झांकती हुई बोली, “अपूर्व का क्या होगा, यह अब कोई रहस्य नहीं रह गया है, लेकिन उसके बाद मेरा क्या होगा? यह आपने तो नहीं सोचा, पर क्या मुझे भी अपने करियर के बारे में नहीं सोचना चाहिए? डूबना अवश्यंभावी है, यह जानकर क्या मुझे आंख मूंद कर अपनी कश्ती को लहरों के सहारे छोड़ देना चाहिए?”

कंगना के मुंह से निकला प्रत्येक वाक्य लक्ष्मीदेवी का जीवन के यथार्थ से कटु साक्षात्कार करवा रहा था, फिर भी उन्होंने तिनके का सहारा लेने की कोशिश की, “बेटा, बच्चे के सहारे तेरा जीवन कट जाएगा और जाते-जाते अपूर्व को भी थोड़ी-सी ख़ुशी मिल जाएगी.”

“जीवन कट जाएगा? लेकिन कैसे कटेगा यह आप भी जानती हैं और मैं भी.” कंगना के चेहरे पर दर्द की रेखाएं तैर आईं और वह लक्ष्मीदेवी का हाथ थामते हुए बोली, “यक़ीन मानिए मांजी, अगर इस बात की ज़रा-सी भी संभावना होती कि अपूर्व नौ माह बाद बच्चे का मुंह देखने के लिए मौजूद रहेंगे तो मैं यह धर्म अवश्य निभाती.”

“तूने उसके साथ सात फेरे लिए हैं. पति के वंश को आगे बढ़ाना भी पत्नी का धर्म होता है.” लक्ष्मीदेवी ने अंतिम शस्त्र चलाया.

“मैं पत्नी के धर्म को निभाऊंगी, दिन-रात उनकी सेवा करूंगी. जितने भी पल उनके पास बचे हैं, उन्हें अधिक-से-अधिक सुख देने की कोशिश करूंगी.” कंगना ने सांत्वना दी.

“पर…”

“अब कोई ‘पर’ नहीं मांजी. हमेशा आपके बेटे ने शर्त सामने रखी है. आज आपकी बहू शर्त रखती है.” कंगना ने अपने अंदर उमड़ रहे आंसुओं को नियंत्रित किया और एक-एक शब्द पर ज़ोर देते हुए बोली, “मैं अस्पताल जा रही हूं, आप चाहें तो साथ चल कर मुझे इस लायक बना सकती हैं कि मैं अंतिम समय तक आपके बेटे की सेवा कर सकूं. लेकिन यदि आप चाहें तो मुझे रोक कर इस लायक भी बना सकती हैं कि मैं अपने बढ़े हुए पेट को लेकर ख़ुद अपनी सेवा करवाऊं और मेरा पति अंतिम समय में जीवनसाथी के साथ को तरसता रहे.”

इतना कहकर कंगना सधे क़दमों से दरवाज़े की ओर चल दी. लक्ष्मीदेवी के अंदर इतना साहस शेष नहीं बचा था कि उठकर दरवाज़े को बंद कर सकें. वह फटी आंखों से उसे बाहर जाते देखती रहीं. वह तय नहीं कर पा रही थीं कि उसकी राह सही है या ग़लत….?

Sanjeev Jaiswal

संजीव जायसवाल ‘संजय’  

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