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पहला अफेयर: यादों के रंग… (Pahla Affair: Yaadon Ke Rang)

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पहला अफेयर: यादों के रंग… (Pahla Affair: Yaadon Ke Rang)

वो उम्र ही लड़कपन की थी, जिनमें कुछ मधुर यादें, सुखद एहसास के क्षण समाये हुए थे, जिसकी याद आज भी मेरे होंठों पर मुस्कुराहट ले आती है. बात उन दिनों की है, जब मेरा कॉलेज ख़त्म हुआ था. छुट्टियां चल रही थीं. पापा ने घर में पेंट करवाने का विचार किया. मेरी होम डेकोरेशन में अच्छी नॉलेज होने के कारण घर को रेनोवेट कराने की ज़िम्मेदारी मुझे दी गई. कलर, पेंट के डिब्बों व ब्रश के साथ मज़दूरों ने घर में काम करना शुरू किया.

सहसा एक आवाज़ सुनाई दी, “एक ग्लास पानी मिलेगा.” एक मधुर-सी आवाज़ कानों में घुल गई. मैं उसे एकटक देखती रह गई. वह शख़्स मेरी ही उम्र का था. बड़ा ही आकर्षक व्यक्तित्व, नीली आंखें. उसका चलना, बैठना, उसकी हर बात मुझे लुभाती. उसकी बड़ी पलकें विशेषकर उसकी नीली आंखें मुझे उसकी ओर खींच ले गईं. फिर तो न जाने चाय-पानी के बहाने मैं उस कमरे में कितनी बार ही चक्कर लगा आती, जहां वह अपना काम कर रहा था. जब वह ब्रश चला रहा होता, मैं ख़ामोश-सी उसे देखती रहती.

धीरे-धीरे मेरी दीवानगी एक तरफ़ा प्यार में कब बदली, मैं जान भी न सकी. कई बार मैंने अपने आपको मन ही मन डांटा भी था कि एक पेंट करनेवाले मज़दूर के प्रति इतना आकर्षण क्यों? पर न जाने क्या था, मैं चाहकर भी रुक नहीं पाती. उसकी उन नीली आंखों में न जाने कैसी कशिश थी कि मैं डूबती ही चली गई. पहले-पहले तो वो सकुचाया-सा रहता, फिर धीरे-धीरे बात करने लगा था. उसकी बोलती आंखें दिल में नए ख़्वाब जगातीं. जब भी वह दिखाई नहीं देता, मैं बेचैन हो उठती. उस दिन वो काम पर नहीं आया था. वह प्रतियोगी परीक्षा देने गया है, इसकी जानकारी पेंट करनेवाले मज़दूरों के हेड ने दी.

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तो जनाब पढ़ते भी हैं. “क्या लाल-पीले रंगों के बीच काले अक्षर समझ में आते हैं?” अगले दिन जब मैंने पूछा, तो तुरंत जवाब मिला, “क्यों नहीं.’ काले अक्षर ही नहीं, मैं बहुत-सी बातें भी समझता हूं.” तो क्या वह मेरे अंदर उमड़ती भावनाओं को भी समझता है? घर की पेंटिंग का काम लगभग पूरा हो चुका था. मेरा दिल ज़ोरों से धड़कने लगा कि अब मैं तो उसे नहीं देख पाऊंगी. जाते व़क्त उसने मुझे एक काग़ज़ की पर्ची दी, जिस पर लिखा था…‘ प्यार अपने आप में एक अनोखा एहसास है. ये वो अफ़साना है जो ख़ुद-ब-ख़ुद बयां होता है. यह जीवन का सबसे प्यारा समय है.

आप बहुत अच्छी हैं. कोई व्यक्ति आप से प्रभावित हुए बगैर नहीं रह सकता, पर आज की हक़ीक़त यही है कि हमारे बीच बहुत-से फासले हैं… परिवार के, जाति के, अमीरी-ग़रीबी के, जिनसे पार पाना नामुमकिन है. ज़िम्मेदारियों से लदा मेरा व्यक्तित्व है. मैं चाहकर भी तुम्हारी मंज़िल नहीं बन सकता.’ मेरा पहला प्यार, जिसकी क़िस्मत में अधूरा रहना लिखा था, अधूरा ही रह गया.

वो चला गया हमेशा के लिए. मैं उसे भीगी आंखों से देखती रह गई थी. न रोक सकती थी, न ही किसी से कुछ कह सकती थी. जिस सच्चाई से वह रू-ब-रू कराकर गया था, उसे तो मैं भी नहीं बदल सकती थी. मैं जिस आसमान में उड़ रही थी, वहां से उतरकर ज़मीन पर आ गई. व़क्त रुकता नहीं, ज़िंदगी थमती नहीं. ये वो मुक़ाम नहीं था, जहां मैं ठहर जाती. पर उसकी नीली आंखें जब-जब मेरे ज़ेहन में याद बनकर उमड़तीं, तो मेरी आंखें सजल हो जातीं. बड़ी बेनूर थी ये रूह मेरी, तुम्हारे आने से पहले, तुम्हारी यादों की कशिश ने रंग भर दिए इसमें ज़िंदगी के. अब तक ख़ामोश पड़ा था दिल का आंगन, तुम्हारी आहटों की ख़ुशबू ने इसमें मुहब्बत के फूल खिला दिए. लफ़्ज़ों को जैसे वजह मिल गई बोलने की. यही मेरा जहां है, यही मेरी कहानी.

– शोभा रानी गोयल

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पहला अफेयर: कैसा तेरा प्यार…? (Pahla Affair: Kaisa Tera Pyar)

Pyar Ki Kahani

पहला अफेयर: कैसा तेरा प्यार…? (Pahla Affair: Kaisa Tera Pyar)

वो नज़रों से प्यार करना तेरा, पर प्यार के साथ-साथ हर बात पर तक़रार करना तेरा… तेरी शरारतों से ही नहीं, तेरी बदतमीज़ियों से भी इश्क़-सा हो गया था मुझे. हसीन था मुहब्बत का वो मंज़र. चाहत से लबरेज़ वो दिन-रात… सब बेहद ख़ुशगवार था. लेकिन कहीं न कहीं कुछ तो कमी थी… मैं भी जानती थी, तुम भी जानते थे कि हम चाहते हुए भी अभी दो से एक नहीं हो सकते… हमें इंतज़ार करना होगा. वजह! न तुम्हारे पास कोई जॉब था, न ऐसा बैकग्राउंड कि हमारे परिवारवाले तैयार हो सकें. तुमने अपनी एजुकेशन भी तो पूरी नहीं की थी… उस पर तुम्हारा ज़िंदगी को जीने का अलग ही अंदाज़. बेपरवाह-सा रवैया…

“मैं न बीते कल में विश्‍वास करता हूं, न आनेवाले कल की कल्पना… मैं आज में, यथार्थ में जीता हूं और आज का सच यही है कि हम साथ हैं. फ्यूचर किसने देखा है… क्या पता कल क्या हो? उसके लिए हम आज को नहीं खो सकते…”

रौशन ये तुम्हारा नज़रिया हो सकता है, पर मेरा नहीं. मुझे फिक्र होती है आनेवाले कल की. हमारे रिश्ते के भविष्य की…

“स्मिता, तुम प्यार करती हो न मुझसे, तो कुछ न कुछ हो ही जाएगा. बस तुम साथ मत छोड़ना, वरना टूट जाऊंगा मैं… ”

पर कहीं न कहीं तो मैं टूटती जा रही थी… तुम स़िर्फ बातें ही करते हो… न कुछ करने की कोशिश है, न किसी बात को गंभीरता से लेते हो. अपने तरी़के से हर चीज़ करनी है, अपनी मर्ज़ी से ही बात करनी है… अजीब रवैया था यह.

शायद जो बदतमीज़ियां पहले मुझे तुम्हारी ओर आकर्षित करती थीं, वही अब मुझे तुमसे दूर करती जा रही थीं… हर रोज़, हर पल मन में सवाल, दुविधाएं बढ़ रही थीं… क्या तुम्हारी ज़िंदगी में और भी है कोई? क्या तुम मुझे लेकर गंभीर ही नहीं… क्या तुम स़िर्फ अपना व़क्त गुज़ार रहे हो… पता नहीं क्या-क्या और किस-किस तरह के ख़्याल!

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उस पर गौरव ने इस दुविधा को और बढ़ा दिया… “स्मिता मैं तुम्हारा अच्छा दोस्त हूं, तुम्हारा बुरा तो नहीं चाहूंगा, तुमने आख़िर उस रौशन में क्या देखा? वो किसी भी तरह से तुम्हारे लायक नहीं, वो स़िर्फ टाइमपास कर रहा है. क्यों अपना व़क्त, अपनी ज़िंदगी उसके पीछे बर्बाद कर रही हो. तुम जैसी न जाने कितनी होंगी उसकी लाइफ में. वैसे भी तुम कहती हो न कि दिनभर ऑनलाइन रहता है… क्या कभी तुमने पूछा है कि किससे बात करता है? क्या बात करता है? क्यों बात करता है? होश में आओ… ”

गौरव की बातों पर गंभीरता से ग़ौर किया, तो लगा सच तो कह रहा है. रौशन की तरफ़ से मुझे कभी यह महसूस नहीं हुआ कि उसे बहुत ज़्यादा मेरी ज़रूरत है अपनी ज़िंदगी में, शायद मैं अकेले ही, अपनी तरफ़ से इस रिश्ते को निभाए जा रही थी.

ज़रूरी नहीं कि हर समय भावनाओं में बहकर ही निर्णय लिए जाएं, कभी-कभी बहुत ज़रूरी होता है अपने स्वाभिमान के लिए कठोर निर्णय लेकर आगे बढ़ा जाए. वरना ज़िंदगी वहीं उलझकर रह जाएगी.

मैंने रौशन से बात की… “हम कब शादी करेंगे?”

“अरे स्मिता, बस थोड़ा इंतज़ार करो. जिस दिन तुम्हारे लायक हो जाऊंगा, बारात लेकर सीधे तुम्हारे घर आऊंगा…”

“…लेकिन तुम कोशिश करोगे, तभी तो किसी लायक बनोगे. तुम तो इसी ज़िंदगी में ख़ुश हो. तुमको लग रहा है, जो जैसा चल रहा है, चलने दिया जाए.”

“हां, तो इस ज़िंदगी में भी क्या बुरा है…”

तुम जिस तरह से हल्के अंदाज़ में जवाब दे रहे थे, मैं समझ गई थी कि गौरव कहीं न कहीं सही था अपनी जगह… ज़रूरी नहीं कि असल ज़िंदगी में आपको फिल्मी हीरो की तरह परफेक्ट पार्टनर ही मिले, हम अक्सर धोखा खा जाते हैं. लोगों को पहचानने में. अगर ग़लती हो गई, तो बेहतर है समय रहते उसे सुधार लिया जाए. शायद मुझसे भी ग़लती हुई थी रौशन को पहचानने में. इस ग़लती को सुधारना ज़रूरी थी.

मैंने उसे मैसेज किया- तुम मेरी ज़िंदगी का अहम् हिस्सा हो, पर मुझे कभी यह महसूस क्यों नहीं हुआ कि मैं भी तुम्हारी ज़िंदगी में उतनी ही अहमियत रखती हूं?

मेरे दोस्त, यहां तक कि मेरे घरवाले भी जानते हैं हमारे रिश्ते के बारे में, लेकिन मुझे आजतक न तुम्हारे दोस्तों के बारे में पता है, न घरवालों के बारे में… और तुम बड़ी-बड़ी बातें करते हो… मुझे नहीं लगता हमारा रिश्ता आगे बढ़ सकता है…
मुझे लगा, शायद इस बात से तो तुम्हें फ़र्क पड़ेगा… लेकिन नहीं, तुमने इसे भी बेहद हल्के अंदाज़ में लिया और तुम्हारी तरफ़ से कभी कोई कोशिश नहीं हुई मुझे रोकनी की…

जानती हूं, तुम आगे बढ़ चुके हो, पर मैंने तो सच्चे दिल से तुमसे प्यार किया था, मैं कैसे आगे बढ़ सकती थी… वहीं खड़ी हूं, उसी मोड़ पर… संभाल रही हूं ख़ुद को… पता नहीं किस उम्मीद में जी रही हूं… हम भले ही बड़ी-बड़ी बातें करते हैं कि प्रैक्टिकल होकर सोचना चाहिए, पर मैं नहीं हूं प्रैक्टिकल… प्यार और रिश्तों में कैसे कोई प्रैक्टिकल हो सकता है… पता है, लोग खेल जाते हैं दिलों से, लेकिन अपना बस नहीं इन भावनाओं पर… हां, अब इतना समझ चुकी कि तुम्हारे इंतज़ार से कुछे हासिल नहीं होगा, बस आगे बढ़ना ही एकमात्र रास्ता है… उसी रास्ते पर चलने की कोशिश में हूं, भले ही अभी लड़खड़ा रही हूं, पर धीरे-धीरे सीख जाऊंगी… संभल जाऊंगी… तुम्हारे बिना जीना सीख जाऊंगी…!

– गीता शर्मा

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पहला अफेयर: धुंध के पार (Pahla Affair: Dhundh Ke Paar)

Pyar Ki Kahani

पहला अफेयर: धुंध के पार (Pahla Affair: Dhundh Ke Paar)

किशोरवय की सुनहरी धूप से भरे वे प्रिय दिन कितने सुहाने थे. मेरे चारों ओर बुद्धि प्रदीप्त सौंदर्य का एहसास पसरा हुआ था. इसी आत्मविश्‍वास के कारण मैं तनिक एकाकी हो गई थी. घर से दूर हॉस्टल में रहते हुए भी मैंने कभी भी स्वछंदता का लाभ नहीं उठाया था.
गीत-संगीत का शौक ही मेरे अकेलेपन का साथी था. मेरा शुरू से ही यह मानना था कि संगीत में जो कशिश है, वो न स़िर्फ तन्हाई को, बल्कि हर मुश्किल को दूर कर सकती है. संगीत से यह गहरा लगाव ही मुझे बेहद ख़ुश रखता था.

उन्हीं दिनों हमारी कक्षा पिकनिक पर गई. हरी-भरी पहाड़ियां, कल-कल बहता स्वच्छ झरना व पास ही दरी बिछा हम छात्र-छात्राएं संकोच से बतिया रहे थे. साथ में लाए टेप-रिकॉर्डर पर मधुर, पुराने फिल्मी गीत बज रहे थे. तभी किसी ने प्लेयर बंद कर दिया. एक सहपाठी के विषय में कहा गया कि वह बहुत अच्छा गाता है एवं क्यों न उससे ही कुछ सुना जाए.

“तेरी आंख के आंसू पी जाऊं…” यह गीत गाते हुए वह गौरवर्ण, सुदर्शन सहपाठी मेरी ओर ही क्यों देखे जा रहा था, यह मैं तब समझ नहीं पाई.

उस दिन के बाद हमारी मित्रता हुई, जो धीरे-धीरे असीम सुकोमल भावनाओं की डोर से हमें बांध गई. पहले प्यार ने हम दोनों को कुछ ऐसा छुआ कि कब साथ जीने-मरने का इरादा कर लिया, पता ही नहीं चला.

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मुहब्बत की इन भावनाओं के बीच हमारी पढ़ाई भी चल रही थी. एमबीबीएस के बाद मेरे उस सुख-दुख के सखा को सुदूर नगर स्नातकोत्तर शिक्षा के लिए जाना पड़ा.

वियोग के पल कितने निर्मम थे और कितने कठिन भी. तीन वर्ष पत्रों का आदान-प्रदान रहा. फिर समय की धुंध हमारे रिश्ते के बीच छा गई. धीरे-धीरे पत्रों का सिलसिला कम हुआ और फिर बंद ही हो गया. शायद माता-पिता की आज्ञानुसार वह विदेश चला गया.

बचपन से ही शरतचंद, टैगोर पढ़-पढ़कर पली-बढ़ी मैं उस प्रसंग को विस्मृत न कर सकी. सुगंधित पत्रों व जीवंत स्मृतियों का पिटारा अब भी पास था. शायद एक आस थी कि मेरे पहले प्यार की उन सुखद अनुभूतियों का एहसास उसे भी होगा और कहीं न कहीं उसके मन में भी वो तड़प, वो कशिश तो ज़िंदा होगी ही. नहीं जानती थी कि ये मेरा भ्रम था या हक़ीक़त… पर मैं बस उसकी यादों से बाहर नहीं निकलना चाह रही थी.

और आज… उस धुंध के आर-पार, समय की निष्ठुरता को ठुकराती, एक स्नेहिल आवाज़, टेलीफोन के माध्यम से फिर खनक उठी है,
“मैं सदैव के लिए तुम्हारे पास आ रहा हूं. मेरे मार्ग को अपने ख़ुशी के आंसुओं से सींचे रखना. मुझे पता है कि तुम ख़ुशी में भी ज़ार-ज़ार रोती हो.”

मुझसे पूछे बिना ही उसने जान लिया था कि मेरे नैनों में आज भी उसकी प्रतीक्षा के दीये जल रहे हैं. मेरा इंतज़ार, मेरा प्यार जीत गया था.
मेरी आस ग़लत नहीं थी… मेरी आंखों से सच में आंसू बहे जा रहे थे… पर ये ख़ुशी के आंसू थे, जिनमें ग़मों के सारे पल, जुदाई की सारी रातें और हिज्र के दिनों की सारी शिकायतें धुल गई थीं. अब हमारे दरमियान स़िर्फ प्यार था… बस प्यार ही प्यार…
ख़त्म हो गया था वो इंतज़ार!

– डॉ. महिमा श्रीवास्तव

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पहला अफेयर: हां, यही प्यार है! (Pahla Affair: Haan Yehi Pyar Hai)

Pyar Ki Kahani
पहला अफेयर: हां, यही प्यार है! (Pahla Affair: Haan Yehi Pyar Hai)

प्यार, इश्क़, मुहब्बत, लव, अफेयर… एक ही एहसास के न जाने कितने नाम हैं ये, लेकिन मुझे इस एहसास में डूबने की इजाज़त नहीं थी और न ही चाहत थी, क्योंकि मेरी शादी हो चुकी थी. यह बात अलग है कि मैं उस व़क्त शादी के लिए कतई तैयार नहीं थी. दरअसल, शादी की बातचीत के बीच ही जब मुझे यह पता चला कि लड़केवाले दहेज की मांग करने लगे हैं, तो एक नफरत-सी पाल ली थी मैंने उनके प्रति.

जब अपने होनेवाले पति को देखा, तो मन और भी खिन्न हो गया. सांवला-सा रंग, दुबला-पतला शरीर और उस पर दहेज की मांग. ख़ैर, जैसे-तैसे शादी हो गई. मैं इंकार भी नहीं कर पाई, क्योंकि जिस परिवार में पली-बढ़ी थी, वहां लड़कियों की इच्छा-अनिच्छा को महत्व नहीं दिया जाता था. उस पर पिताजी की आर्थिक स्थिति भी बहुत ज़्यादा अच्छी नहीं थी. पिताजी की इच्छा की ख़ातिर शादी तो मैंने कर ली थी, पर पहले ही दिन अपने पति को सब कुछ साफ़-साफ़ बता दिया कि मुझसे किसी भी तरह के प्यार या अपनेपन की उम्मीद न रखें. उन्होंने हंसकर जवाब दिया कि उम्मीद पर ही तो दुनिया कायम है और अपना बिस्तर अलग लगाकर वो सो गए.

मैं बहुत हैरान हुई, लेकिन मेरे मन में इतनी शिकायतें थीं कि मुझे उनकी हर बात पर चिढ़ होती थी और एक ये थे कि मेरी हर चिढ़ और गुस्से पर बेहिसाब प्यार उमड़ आता था इन्हें. हर बात को प्यार से समझाते, हर व़क्त इनके होंठों पर मुस्कान बिखरी रहती. बहुत संयमित और संतुलित व्यक्ति थे ये. मुझे अक्सर कहते कि कभी न कभी तो तुम मेरे प्यार को समझोगी और तुम भी मुझसे प्यार करने लगोगी.

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एक दिन इनकी मम्मी से मेरी थोड़ी कहा-सुनी हो गई थी और इन्हें भी मैंने दहेज मांगने का ताना दे दिया था. उस पर इन्होंने बताया कि जो भी पैसे दहेज के रूप में मिले, वो मेरे ही अकाउंट में जमा करवा दिए हैं. अपने मम्मी-पापा को वो उस व़क्त नहीं समझा सके थे कि दहेज लेना अपराध है, पर शादी के बाद उन्हें मना लिया.

मैं समझ ही नहीं पा रही थी कि क्या कहूं और क्या न कहूं? इन्होंने मुझे इतना प्यार दिया, इस तरह संभाला कि न कभी ज़ोर-ज़बर्दस्ती की, न कभी पति होने का हक जताया. इनके प्यार में पवित्रता की महक थी, कभी वासना की की गंध नहीं आई. मैं भूखी रहती, तो बच्चों की तरह खाना खिलाते. घर में कोई टीका-टिप्पणी करता, तो उन्हें भी समझाते कि नए परिवेश में घुलने-मिलने में व़क्त लगता है.

इनकी इसी सादगी, समझदारी और सबसे बढ़कर पवित्र प्यार ने मुझे जैसे अपनी और खींच लिया था. मैं हर व़क्त सोचती कि दुनिया में कोई इतना अच्छा और सच्चा कैसे हो सकता है? मैं वाकई ख़ुशनसीब हूं, जो ऐसा जीवनसाथी मुझे मिला, एक अजीब-सा आकर्षण महसूस करने लगी थी मैं इनकी ओर. सोचा था कभी इश्क़ नामक रोग नहीं लगेगा मुझे, मगर इनके प्यार के एहसास ने मुझे भीतर तक भिगो दिया था.

मेरा जन्मदिन था, इनके आने का इंतज़ार कर रही थी और अपने तोह़फे का भी. ये आए और मैं बस इननकी बांहों में सिमट गई. आंखों ही आंखों में बातें हुईं और मुझे मेरी पहली मुहब्बत का एहसास हुआ. मैं समझ गई कि हां, यही प्यार है! उस रात मैं संपूर्ण स्त्री बन गई थी.

आज सात साल हो गए, हमारे दो प्यारे-प्यारे बच्चे हैं. मैं परिवार में पूरी तरह से घुल-मिल चुकी हूं, लेकिन हमारे प्यार में अब भी वही पहले प्यार की महक और कशिश बरकरार है. सचमुच यही मेरा पहला प्यार था. मैं इनसे यानी अपने पति राजेश से बेहद प्यार करती हूं और मुझे अपने प्यार पर नाज़ है.

– देवप्रिया सिंह

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पहला अफेयर: तुम्हारा इंतज़ार है… (Pahla Affair: Tumhara Intezar Hai)

Pahla Affair, Tumhara Intezar Hai

Pahla Affair, Tumhara Intezar Hai

पहला अफेयर: तुम्हारा इंतज़ार है… (Pahla Affair: Tumhara Intezar Hai)

नयन, तुम मेरे दूर के एक रिश्तेदार, इस तरह मेरे दिल के सबसे क़रीबी शख़्स बन जाओगे, वो भी जीवन के 40 वर्ष पूरे होने के बाद, मैंने कभी सोचा भी न था. शादी के बाद पति-बच्चों का भरपूर प्यार मिला, पर तुमने तो जीवन में ऐसे प्रवेश किया कि लगा प्यार का एहसास ही अब जाकर हुआ.

कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि मेरे साथ ऐसा होगा… किसी को याद करते ही दिल की धड़कनों का बढ़ना, तेज़-तेज़ चहलक़दमी करना, झूले पर बैठकर आसमान निहारते रहना… इन सबके पीछे तुम थे नयन… इसका एहसास मुझे बहुत दिनों बाद हुआ कि क्यूं तुमसे फ़ोन पर बात करना इतना अच्छा लगने लगा था? क्यूं तुम्हारी पसंद के रंग के कपड़े पहनने की इच्छा होने लगी थी? क्यूं तुमसे बातों-बातों में तुम्हारी सारी पसंद-नापसंद को जान मैं उन्हें अपनाने लगी थी… शायद मुझे तुमसे प्यार हो गया था.

नयन, वो तुम्हारा फ़ोन पर ङ्गहेलोफ बोलना, ऐसी सिरहन पैदा कर देता था कि बस पूछो ही मत. तुम्हारा इतना केयर करना और हर वक़्त मेरी फ़िक्र करना मुझे अंदर तक छू जाता था. ऐसा क्यूं होता था कि मैं अपने दिल की हर बात तुमसे शेयर करती थी? क्यूं तुम मुझसे वही बात कहते, जो मेरे हित में हो? क्यूं मेरा मन अक्सर ये चाहता कि ख़ामोशी के हर पल में तुम्हारी मुहब्बत का ही एहसास हो? क्यों मेरा मन हर पल तुम्हारे ही साथ की ख़्वाहिश करता था और ये चाहता था कि कहीं दूर पहाड़ों की तलहटी में तुम्हारे साथ बैठकर आंखें बंदकर मौन रहकर सारी ज़िंदगी बिता दूं.

नयन, मैंने तुम्हारे अंदर भी ऐसे ही प्यार का उफान महसूस किया था, पर तुमने कभी कुछ नहीं कहा. मैंने लाख कोशिश की, पर तुम्हारी ज़ुबान तक वो बात ला न सकी.

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तुम बेशक मुझसे प्यार न करो, मैं कभी तुमसे इस बात के लिए ज़बरदस्ती नहीं करूंगी, पर नयन मेरा दिल ये मानने को तैयार नहीं, क्योंकि मैं जानती हूं कि तुम भी मुझसे प्यार करते हो. प्यार के इस पवित्र रूप से रू-ब-रू कराने के लिए मैं हमेशा तुम्हारी आभारी रहूंगी.
मुझे ख़ुशी है कि इस उम्र में ही सही, लेकिन इतना पवित्र प्यार मिला मुझे, जिसमें वासना के लिए कोई स्थान नहीं था, जिसमें स़िर्फ आत्मा का सुंदर मिलन था.

नयन, तुमने कभी मेरा किसी तरह से फ़ायदा नहीं उठाया, जबकि तुम मेरे सौंदर्य की हमेशा तारीफ़ करते थे. मेरी गृहस्थी की इतनी चिंता थी तुम्हें कि कहीं मैं जुनून में अपनी गृहस्थी बर्बाद न कर दूं, यही सोचकर तुमने मुझसे दूरी बना ली. मुझे आगे न बढ़ने को कहकर तुमने ये साबित कर दिया कि कितनी परवाह है तुम्हेें मेरी ज़िंदगी की.

तुम्हारी और मेरी मंज़िल एक नहीं, पर नयन, प्यार तो मैं तुमसे करती रहूंगी. मैं तुमसे पूछूंगी नहीं कि तुम्हें भी मुझसे प्यार है या नहीं, पर तुम्हारे उसी एक वाक्य ङ्गआई लव यू टूफ का मैं जीवनभर इंतज़ार करूंगी.

कौन कहता है कि प्यार की उम्र होती है? मैं कहती हूं कि नयन जैसा इंसान जिस किसी को भी मिलेगा, उसे उससे प्यार तो हो ही जाएगा. प्यार में उम्र का बंधन, छोटा-बड़ा होना, ये कहां मायने रखता है? प्यार तो बस हो जाता है. आज मैं एक ज़िम्मेदार गृहिणी हूं, पर नयन को प्यार तो हमेशा करती रहूंगी.

– ऊषा शर्मा

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पहला अफेयर: गुज़ारिश (Pahla Affair: Guzarish)

Pahla Affair, Guzarish

Pahla Affair, Guzarish

पहला अफेयर: गुज़ारिश (Pahla Affair: Guzarish)

नहीं जानती कि मैं क्यों तुम्हारे बारे में सोचती हूं. मेरे ख़्यालों में हर वक़्त तुम्हीं रहते हो. मुझे आज भी याद है, वो पहला एहसास जब मैंने पहली बार तुम्हें देखा था. मेरा आईडी कार्ड कहीं गिर गया था. मैं उसे हर जगह ढूंढ़ चुकी थी और परेशान हो रही थी, तभी तुम आए और मेरा आईडी कार्ड मुझे देकर चले गए. तुम्हारी स्मार्टनेस मेरे मन पर गहरी छाप छोड़ चुकी थी. एक सहेली से पता चला कि तुम मुझसे सीनियर यानी एमएससी सेकंड ईयर के छात्र थे.

उस दिन के बाद से मेरी नज़रें कॉलेज में अक्सर तुम्हें तलाश करने लगी थीं. तुम अक्सर दिख ही जाते थे. तुम्हारी पर्सनैलिटी मुझे अपनी तरफ़ आकर्षित करने लगी थी. जब कभी तुम मेरे सामने होते थे, मेरी नज़रें अनायास ही तुम्हारी तरफ़ उठ जाती थीं. पर अगले ही पल दिमाग़ यह एहसास कराता कि एक लड़की का किसी को इस तरह देखना ठीक नहीं. लोग क्या कहेंगे? और मेरी नज़रें झुक जातीं. पर दिल को कहां परवाह थी किसी की? नज़रें फिर तुम्हारी तरफ़ उठतीं और झुक जातीं. जब तक तुम सामने होते दिल और दिमाग़ का ये द्वंद्व चलता ही रहता.

एक दिन बस का इंतज़ार करते वक़्त एक छोटा बच्चा आकर भीख मांगने लगा. तुमने उसे दुकान पर ले जाकर भरपेट खाना खिलाया. उस दिन मैंने तुम्हारे अंदर की ख़ूबसूरती भी देखी थी. मैं अपनी सहेली निशा से अक्सर तुम्हारी बातें करती थी. एक दिन वह मुझे छेड़ते हुए बोली, लगता है, वह तुझे कुछ ज़्यादा ही पसंद है. मैंने कहा, नहीं, वह तो चांद है जिसे स़िर्फ दूर से देखा जा सकता है, हाथों में नहीं लिया जा सकता. वह बोली, लोग चांद पर घर बनाने की सोच रहे हैं और तू पुराने ख़्यालों में अटकी पड़ी है. मैं उसके बारे में पता करूंगी और फिर तुम दोनों प्रो़फेसर बन इसी कॉलेज में साथ-साथ पढ़ाना. ये बातें उसने मज़ाक में ही कही थीं, पर अनजाने में ही उसने हमारे अनजाने रिश्ते की नींव रख दी थी.

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अब न जाने क्यों मैं तुम्हें ख़ुद से जोड़ने लगी थी. फिर निशा ने ही मुझे बताया कि तुम उसी कॉलेज के किसी प्रो़फेसर के बेटे होे. अब निशा मुझसे बार-बार कहने लगी कि अपने मन की बात उससे कह दे, पर न जाने क्यों मैं रुक जाती थी. शायद तुम्हारा स्टेटस मुझे रोक देता था. तुम एक अमीर प्रो़फेसर के बेटे और मैं एक लोअर मिडल क्लास की लड़की. मुझे डर था कि तुम मुझे ठुकरा न दो.

और फिर वो वक़्त भी आ गया, जिसके बारे में सोचकर डर लगता था. तुम्हारी विदाई का वक़्त. हम फ़र्स्ट ईयर वालों ने सेकंड ईयर के स्टूडेंट्स के लिए फेयरवेल पार्टी रखी थी, जिसमें मुझे एंकरिंग करनी थी. सुबह तैयार होते वक़्त भी तुम मेरे ख़्यालों में थे. आज मेरे पास आख़िरी मौक़ा था तुमसे अपने मन की बात कहने का, पर मैंने इसे गवां दिया, क्योंकि मेरे स्वाभिमान ने मुझे रोक दिया. मुझे आज भी याद है, वो बेचैनी, वो बेक़रारी तुम्हें न देख पाने की, जो उस शाम घर लौटते वक़्त मेरे दिलो-दिमाग़ पर छाई हुई थी. एक अनजाने से दर्द ने मुझे सारी रात सोने नहीं दिया. एक्ज़ाम्स के बाद प्रैक्टिकल के दिन जब मैं कॉलेज पहुंची तो तुम्हें बरामदे में खड़े देखकर आंखों पर यक़ीन नहीं हुआ, क्योंकि मैं तो तुमसे दोबारा मिलने की आस भी छोड़ चुकी थी. तुमने भी मेरी तरफ़ देखा और इस बीच मेरी आंखों ने बहुत कुछ बयां कर दिया था तुमसे.

अब मैं अपने शहर वापस आ गई हूं, तुम्हारी यादों को अपने दिल में संजोए हुए. अब शायद कुछ सालों तक मैं तुम्हें न देख पाऊं. जानते हो मेरा रिज़ल्ट आ चुका है. मैं क्लास में सेकंड हूं और वह प्रैक्टिकल, जिसमें तुम मेरे सामने थे, उसमें मेरे सबसे अधिक मार्क्स हैं. शायद तुम मेरी प्रेरणा भी हो. मैं इतने दिनों तक तुमसे कुछ न कह पाई, पर एक दिन अपने मन की बात तुमसे ज़रूर कहूंगी. उस दिन मिट जाएंगी हमारे बीच की सारी दूरियां और गिर जाएंगी सारी दीवारें. ये यक़ीन है मुझे ख़ुद पर और अपनी क़िस्मत पर भी. तब तक तुम मेरा इंतज़ार करना, यही गुज़ारिश है तुमसे.

– सारिका सोनी

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पहला अफेयर: काला खट्टा (Pahla Affair: Kaala Khatta)

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पहला अफेयर: काला खट्टा (Pahla Affair: Kaala Khatta)

रेस्टोरेंट की सीट पर बैठते ही उसने हमेशा की तरह कहा, “एक काला खट्टा.” हैरानी तब हुई जब पीछे से भी कुछ जानी-पहचानी आवाज़ ने कहा, “एक काला खट्टा.” कुछ ख़ास बात नहीं थी, लेकिन उसे उत्सुकता हो आई. उसका ऑर्डर टेबल पर सज गया था, लेकिन वो उस आवाज़ को देखने का लोभ न छोड़ सकी और हाथ धोने के बहाने उठ खड़ी हुई. जब वो पास से गुज़री, तो एक ताना मिश्रित नारी स्वर उसे सुनाई दिया, “पता नहीं, तुम कब बाज़ आओगे ऐसी बचकानी चीज़ें खाने से…” और वो चाट खाने में व्यस्त हो गई. उसका पति धीरे-धीरे काला खट्टा चूस रहा था.

बेशक उम्र के निशान साफ़ नज़र आ रहे थे, लेकिन वो सोमेश ही था. उसके बचपन का स्कूल के समय का साथी. एक ही स्कूल और पास-पास घर. दोनों इकट्ठे ही खाते-पीते. ख़ासकर काला खट्टा एक ही स्टिक से चूसते. सोमेश को आज एक अरसे बाद इस तरह अचानक देखकर बीती बातों में दिल खोने लगा. बचपन का वो ज़माना फिर याद आने लगा, जहां दोनों एक साथ स्कूल
आते-जाते, एक ही साथ खेलते. बचपन की नादानियां, खट्टी-मीठी नोक-झोंक दोनों को कब एक-दूसरे के क़रीब ले आई, इसका एहसास ही नहीं हो पाया.

बचपन के छूमंतर होते ही जवानी में क़दम रखते ही लड़कियों पर हज़ारों तरह के पहरे लगना कोई नई बात नहीं है. भले ही ज़माना कितना ही मॉडर्न हो जाए, बहुत आगे पहुंच जाए, लेकिन समाज व परिवार की लक्ष्मण रेखा पार करना सबके बूते की बात नहीं होती. अब बात-बात पर उसे टोका जाने लगा था कि वो बच्ची नहीं है, जवान हो चुकी है. सोमेश के साथ इस तरह आना-जाना या समय बिताना ठीक नहीं. समाज और परिवार के लोग क्या कहेंगे? लेकिन उसके मन में प्यार की कोंपल फूट चुकी थी और सोमेश की आंखों की भाषा भी वो समझती थी. उसके मन में छिपे प्यार को और सोमेश की आंखों में साफ़ नज़र आते इक़रार को दोनों ही बख़ूबी समझते थे.

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अब बचपन की वो बेफ़िक्री नहीं थी, एक अजीब-सी झिझक और हया दोनों के बीच पसर गई थी. एक-दूसरे को देखकर धड़कनें तेज़ हो जाना, चोरी-चोरी एक-दूसरे को छुप-छुपकर निहारना और जब आंखों से आंखें टकरा जाएं, तो अजीब-सी सिहरन और मदहोशी का एहसास होना… ये सब प्यार की ही तो निशानियां थीं… पहले प्यार की ख़ुशबू, एक अलग-सा जादू… दोनों को ही इस अनोखे एहसास ने छू लिया था.

चाहत तो दोनों की ही थी कि एक-दूसरे के हो जाएं हमेशा के लिए. एक पवित्र बंधन में बंध जाएं और खुलकर सबको कह सकें कि हां, हमें मुहब्बत है… और हम अपनी मुहब्बत को रिश्ते का नाम देना चाहते हैं, लेकिन दरिया गहरा था और वो सोहनी नहीं थी, जो कच्चे घड़े से दरिया पार कर लेती. पहला प्यार एक कसक बनकर रह गया.

पीछे वाली सीट खाली हो चुकी थी और उसकी प्लेट का काला खट्टा भी बह गया था, उसकी आंखों के आंसुओं की तरह…

– विमला गुगलानी

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पहला अफेयर: अधूरा एहसास… अधूरा प्यार… (Pahla Affair: Adhura Ehsas… Adhura Pyar)

Pahla Affair

पहला अफेयर: अधूरा एहसास… अधूरा प्यार… (Pahla Affair: Adhura Ehsas… Adhura Pyar)

हर बात अच्छी थी तुम्हारी, क्योंकि तुम में हर वो बात थी, जो किसी भी लड़की को आकर्षित कर सकती थी. कम से कम मुझे तो यही लगता था. यही वहज थी कि मैं भी बिना डोर की पतंग की तरह तुम्हारी ओर खिंचती चली गई. मुहब्बत का वो शुरुआती आकर्षण, वो कशिश, वो एहसास… बेहद ख़ुबसूरत पल थे वो. बेहद हसीन दिन… कॉलेज का लास्ट ईयर था. तुमने इसी साल कॉलेज में एडमिशन लिया था और कुछ ही दिनों में तुम लड़कियों के मोस्ट फेवरेट बन गए थे. तुम्हारा स्टाइल, एटीड्यूड और स्टडीज़ से लेकर हर एक्टिविटीज़ में सबसे आगे रहना… सब दीवानी थीं तुम्हारी ही.

उन सबके बीच तुमने मुझे चुना था. मैं ख़ुद को सबसे ख़ुशनसीब समझ रही थी. वैलेंटाइन डे के दिन तुमने मुझे प्रपोज़ किया और मेरे पास भी इंकार करने का कोई कारण नहीं था. अब तो बस दिन-रात तुम्हारा ही ख़्याल…

इसी बीच हमें कुछ सालों के लिए जुदा होना था, क्योंकि तुम हायर स्टडीज़ के लिए ऑस्ट्रेलिया जा रहे थे और मुझे जॉब मिल गया था. हमने वादा किया था एक-दूसरे से कि इंतज़ार करेंगे और सही व़क्त आने पर शादी भी, शायद इसीलिए ये दूरियां भी खल नहीं रही थीं इतनी.

तुम्हारा रोज़ कॉल आता. वीडियो कॉल पर ढेरों बातें होतीं. तुम अक्सर पूछते कि मेरे ऑफिस में कौन-कौन है… मैं कहां जा रही हूं… क्या कर रही हूं… और मैं भी अपनी सारी बातें तुमसे शेयर करती. हमारे दिन-रात के अंतर का भी हमारी बातचीत पर असर नहीं पड़ता था. तुम देर रात तक जागते थे, मुझसे बात करने के लिए.

उस दिन, तुम शायद नशे में थे, जब मैंने तुम्हें अपनी ऑफिस की पार्टी के बारे में बताया था, क्योंकि तुम्हारा ऐसा रूप मैंने पहले कभी नहीं देखा था. तुमने मुझे, अपनी प्रिया को इतना बुरा-भला कह दिया कि मुझे विश्‍वास ही नहीं हो रहा था अपने कानों पर. तुमने मेरे चरित्र पर सवाल उठाए कि ऑफिस पार्टी में दूसरों के साथ डान्स क्यों किया… इतना बन-ठन के क्यों गई… मेरे लिए काफ़ी शॉकिंग था तुम्हारा यह बर्ताव, पर मैंने अपने दिल को यही कहकर समझा लिया कि तुम दूर हो, इसीलिए ओवर पज़ेसिव हो रहे हो. साथ ही तुम नशे में भी थे.
ख़ैर, दो-तीन दिन की नाराज़गी के बाद तुमने माफ़ी मांगी और सब कुछ नॉर्मल हो गया. लेकिन फिर कुछ दिनों बाद तुम्हारे वही सवालात… कि फोन क्यों नहीं उठाया, मेरा फोन था, तुम समझती क्या हो, नौकरी करके मुझ पर एहसान नहीं कर रही… और भी न जाने क्या-क्या… उसके बाद तो ये सिलसिला रूटीन ही बन गया था… तुम हर रोज़ किसी न किसी बात को लेकर मुझे बुरा-भला कहते और अगले दिन माफ़ी मांग लेते.

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अगले महीने तुम छुट्टियों में इंडिया आनेवाले थे. मुझे लगा मिलकर बात करेंगे, तो शायद मैं तुम्हें बेहतर ढंग से समझा सकूं. तुम आए, हम मिले भी, पर मुझे कहीं न कहीं यह एहसास हो रहा था कि तुम्हारा पुरुष अहम् तुम्हें सहज नहीं रहने दे रहा था मेरे साथ. तुम्हें लगता था कि तुम जो बोलो वही हो, तुम जब बोलो, तभी हो, क्यों? “क्योंकि मैं बोल रहा हूं, क्या इतना काफ़ी नहीं है?” यही जवाब होता तुम्हारा.
जब मन करता मेरा फोन उठाकर चेक करना, सोशल मीडिया पर किस-किस से पिक्चर लाइक की है, उसका नाम देखकर उसके बारे में सवाल करना… उसके बाद सोशल मीडिया से दूर रहने की सलाह देना… और मैं भी हर बात मानती चली गई, क्योंकि मैं तुम्हें खोना नहीं चाहती थी. पर अक्सर मन में सोचती थी कि मेरा राज ऐसी सोच रखता है. इस मॉडर्न ज़माने में, ऑस्ट्रेलिया में रह रहा है, फिर भी ऐसी सोच?

उस दिन जब तुम वापस लौट रहे थे, मन बहुत उदास था. तुमसे लिपटकर रो रही थी मैं और तुमने मुझे सहलाते हुए कहा, “प्रिया, रोने की क्या बात है, तुम्हारे तो यहां भी बहुत सारे दोस्त हैं. उनस मन बहला लेना.”

“ये क्या बकवास है…”

“अरे, ठीक ही ता है. फ्रेंड्स तो होते ही इसलिए हैं. इतना सीरियस होने की क्या बात है.”

ख़ैर, तुम चले गए. तुम्हारी स्टडीज़ कंप्लीट होने को थी और अब तुम हमेशा के लिए इंडिया आनेवाले थे. हम शादी करनेवाले थे. तुम आए, हमारी सगाई भी हो गई. एंगेजमेंट में तुम्हारे दोस्त मेरे साथ हंसी-मज़ाक कर रहे थे. पार्टी ख़त्म होने पर मैंने तुमसे गौतम के बारे में पूछा भी था कि काफ़ी हंसमुख लड़का है. और तुमने कहा, “हां, पसंद है, तो नंबर दे देता हूं. बुला लेना रात को. चाहो तो बेड भी शेयर कर लेना.”

मैं पत्थर बनी वहीं खड़ी रही. सारी रात सोचती रही… कहां, क्या ग़लत हो रहा है मुझसे? क्या मैं यह सब डिज़र्व करती हूं?

“अरे, प्रिया सुबह-सुबह, क्या बात है?”

“हां राज, तुमसे ज़रूरी बात करनी थी. तुम्हें कुछ देना चाहती हूं.”

“क्या लाई हो मेरे लिए स्वीटहार्ट?”

“ये एंगेजमेंट रिंग, इसे अपने पास ही रखो और जब तुम्हें कोई ऐसी लड़की मिल जाए, तो तुम्हारी घटिया सोच के साथ निभा सके, तब उसे यह पहना देना.” और मैं चली आई वहां से. मेरे परिवारवाले भी मेरे इस फैसले से सहमत थे. तुमने भी उसके बाद कोई फोन या माफ़ी नहीं मांगी, क्योंकि मैं जानती थी, तुम्हारा ईगा इतना बड़ा है कि कोई लड़की तुम्हें ठुकरा दे, यह तुमसे बर्दाश्त नहीं होगा.

मेरा पहला प्यार भले ही अधूरा था, उसमें दर्द था, लेकिन मैंने सही समय पर उसे अधूरा छोड़ने का जो फैसला लिया, उससे मैं ख़ुश थी. ज़िंदगी से कोई शिकायत नहीं, इंसान को परखने से कहीं ज़्यादा उसे समझने में व़क्त लग जाता है. ऊपरवाले ने मेरे लिए भी कोई न कोई सही और सच्चा इंसान ज़रूर चुन रखा होगा. जब वो मुझे मिल जाएगा, तो दोबारा प्यार करने से परहेज़ नहीं करूंगी, क्योंकि मुझे प्यार से शिकायत नहीं, प्यार की भावना पर पूरा भरोसा है मुझे, क्योंकि प्यार ग़लत नहीं होता, ग़लत स़िर्फ इंसान होता है.

– गीता शर्मा

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पहला अफेयर: मुझे माफ़ कर देना… (Pahla Affair: Mujhe Maaf Kar Dena)

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पहला अफेयर: मुझे माफ़ कर देना… (Pahla Affair: Mujhe Maaf Kar Dena)

न जाने क्यों वो आज भी बहुत याद आती है. तीन साल बीत गए, पर बीते दिनों की याद मन में हलचल ही पैदा करती है. प्रेम अद्भुत होता है. जीवन में कब और किससे हो जाए कोई नहीं जानता. किसी के लिए मनमोहक एहसास, तो किसी के लिए जीने का सबब. मेरे लिए मेरा प्यार उसकी नफ़रत है. उसकी ज़िंदगी में मेरी कोई जगह नहीं, फिर भी न जाने कौन-सा तार है, जो मुझे उसकी ओर खींच ही लेता है. बार-बार माफ़ी मांगता हूं, क्योंकि उसका दिल बुरी तरह ज़ख़्मी हुआ है.

फेसबुक पर पहली मुलाक़ात हुई थी. फ्रेंड रिक्वेस्ट को स्वीकार करने से पहले उसका प्रोफाइल चेक किया. भोली-भाली मासूम-सी लगी थी. तीखे नयन-नक्श किसी को भी अपनी ओर आकर्षित करने के लिए काफ़ी थे. धीरे-धीरे बातचीत होने लगी. कभी-कभी लगता कि बातों-बातों में कुछ कहना चाहती है. अब मुझे उसकी आदत हो गई.

एक दिन उसने सीधे सरल शब्दों में प्यार का इज़हार करते हुए कहा, “मैं तुम्हें प्यार करती हूं, मैं नहीं जानती कि तुम्हारे दिल में क्या है, लेकिन ज़रूरी नहीं कि तुम भी मुझे प्यार करो. प्यार कोई सौदा नहीं कि प्यार के बदले प्यार मिले, ये वो रूहानी एहसास, जो दिल से महसूस किया जाता है, जो मैंने तुम्हारे प्रति पाया.”

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मैं तो जैसे इसी इंतज़ार में था. बिना कुछ सोचे-समझे ‘हां’ कह दिया. एक दिन मन में विचार आया कि जब ज़िंदगी उसके साथ
गुज़ारनी है, तो क्यों न रू-ब-रू हुआ जाए. जब मैंने उसे इस बारे में कहा, तो वह तुरंत तैयार हो गई. जब पहली बार उससे मिला तो मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई. इतना बड़ा धोखा. उस व़क्त तो मैं कुछ कह नहीं पाया, पर उससे दूरियां बनानी शुरू कर दीं.

मेरे और उसके बीच एक दीवार खड़ी हो गई थी. एक व्हील चेयर पर बैठी लड़की और एक अति महत्वाकांक्षी लड़के के बीच बनी ये
दीवार, जिसके नीचे प्यार, सपने सब दब गए. मन ही मन सोचता मैंने

जल्दबाज़ी कर दी. मेरा और उसका क्या मेल? मैं कभी कल्पना भी नहीं कर सकता था कि मैं एक विकलांग लड़की के साथ प्यार करूंगा. कभी-कभी लगता कि मेरे सारे दोस्त मुझ पर हंस रहे हैं, ये दुनिया ताना दे रही है. मैं घबराकर आंखें बंद कर लेता हूं. मैं मन ही मन प्रश्‍न करता हूं कि मुझसे ग़लती कहां हो गई.

एक दिन मैंने उसके सामने मन की बात रखी कि अब आगे जाना संभव नहीं होगा. “क्या एक विकलांग लड़की प्यार नहीं कर सकती. क्या मेरा प्यार मेरे पैरों की तरह कमज़ोर था?” उसकी आंखों में आंसू उतर आए. मेरे पास कोई जवाब नहीं था. उसके बाद उसने मुझे अनफ्रेंड कर दिया, कभी कोई मैसेज नहीं किया. यहां तक कि उसने अपना अकाउंट भी डिलीट कर दिया. बिना कुछ कहे, बिना कोई शिकायत के वो मेरी ज़िंदगी से चली गई. आख़िरी बार उसकी बातों में जो उदासी छलकी थी उसे भुला नहीं पाया.

सच में ग़लती मेरी थी. उसके प्रोफाइल पर लगे फोटोग्राफ्स पर ध्यान नहीं दिया. क्यों कभी नहीं पूछा कि वो क्या करती है… मोहब्बत का कोई दायरा नहीं होता, पर मैं न जाने किस दिशा में भटक गया. आज मैं अपनी ग़लती के लिए क्षमाप्रार्थी हूं और बार-बार माफ़ी मांगता हूं कि मुझे माफ़ कर दो…

– शोभा रानी गोयल

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बी टाउन के फेमस ब्रेकअप्स और लिंकअप्स… (Famous Breakups And Linkups Of B Town)

Breakups And Linkups Of Bpllywood

बी टाउन के फेमस ब्रेकअप्स और लिंकअप्स… (Famous Breakups And Linkups Of B Town)

जिसने भी महसूस किया है, उसने इस सच को जाना है कि मुहब्बत का एहसास होता है सबसे ख़ास… यही वजह है कि मुहब्बत से जुड़ा दर्द भी सबसे ज़्यादा तकलीफ़ देता है. हमें लगता है कि स़िर्फ हम ही इस दर्द के दौर से गुज़रते हैं, लेकिन दुनिया में कोई भी इस एहसास और इससे जुड़े दर्द से शायद ही अछूता रहा हो… हर ख़ासो-आम इन मानवीय वेदनाओं और संवेदनाओं को उसी शिद्दत से महसूस करता है. इन्हीं वेदनाओं और संवेदनाओं का ज़िक्र आज हम करेंगे, जिसमें आपके फेवरेट स्टार्स और सेलिब्रिटीज़ की बातें होंगी, उनकी मुहब्बत और उसके टूटने का भी ज़िक्र होगा… जिससे आप भी यह महसूस ज़रूर करेंगे कि इंसानी भावनाएं सबमें समान होती हैं, सबको उसी तरह से छूती हैं, जैसे आपको और हमको… लेकिन इनकी कहानी में होता है थोड़ा ट्विस्ट, थोड़ा स्पाइस और थोड़ा रोमांच भी…

arjun and malaika

अरबाज़ से तलाक़ के बाद हॉट मलाइका कर रही हैं यंग अर्जुन कपूर को डेट?
अरबाज़ ख़ान और मलाइका अरोड़ा को एक समय पर आइडियल कपल माना जाता था, लेकिन फिर न जाने ऐसा क्या हुआ कि दोनों के ब्रेकअप की ख़बरें सामने आने लगीं और उनके तलाक़ ने इन ख़बरों की सच्चाई पर मुहर भी लगा दी. कहा जाता है कि मलाइका और अरबाज़ के बीच कोई तीसरा आ गया था. किसी बिज़नेसमैन के साथ मलाइका के लिंकअप की ख़बरें थीं.
वहीं अरबाज़ आईपीएल के दौरान सट्टेबाज़ों से संपर्क में आए थे और उन्हें करोड़ों का घाटा भी हुआ था और कुछ लोग इसे ही मलाइका और अरबाज़ के ब्रेकअप का कारण बताते हैं.
मलाइका और अरबाज़ ने तलाक़ के बाद जॉइंट स्टेटमेंट जारी करके यह बात साफ़ कर दी कि न तो मलाइका की लाइफस्टाइल के कारण, न किसी बिज़नेसमैन के कारण और न ही आर्थिक कारणों से दोनों अलग हुए.
ख़ैर, इन दिनों मलाइका और अर्जुन कपूर भी काफ़ी क़रीब आ चुके हैं और माना जा रहा है कि दोनों शादी कर सकते हैं. अर्जुन और मलाइका को अक्सर डिनर डेट पर भी साथ-साथ देखा जाता है और कई बार वो मलाइका को भीड़ से प्रोटेक्ट करते भी नज़र आते हैं. अर्जुन और मलाइका में उम्र का काफ़ी अंतर है, लेकिन प्यार उम्र कहां देखता है. वहीं अरबाज़ भी जल्द ही अपनी गर्लफ्रेंड के साथ शादी कर सकते हैं.

Sushmita and Ritik Bhasin

सुष्मिता सेन रितिक भसीन से ब्रेकअप के बाद अब डेट कर रही हैं रोहमन शॉल को
रोहमन फ्रीलांस फैशन मॉडल हैं और सुष्मिता से उम्र में 15 साल छोटे हैं, लेकिन प्यार के एहसास के आगे उम्र आड़े नहीं आती, यह इन दोनों ने साबित कर दिया है. इससे पहले भी सुष्मिता के लिंकअप्स की ख़बरें आती रही हैं, पर दूसरों की तरह रोहमन और सुष्मिता ने अपने रिलेशनशिप को किसी से छुपाया नहीं है. सोशल मीडिया पर दोनों ही खुलकर अपने प्यार का इज़हार करते रहते हैं और अपनी रोमांटिक पिक्चर्स भी शेयर करते हैं. माना जा रहा है कि ये लिंकअप भी शादी में तब्दील हो सकता है.

सुष्मिता ने मंगलवार को ही अपने इंस्टा पर ये स्वीट वीडियो भी पोस्ट किया है, जो दोनों के प्यार और बॉन्डिंग को दर्शाता है… साथ ही सुष्मिता ने भावनात्मक और रोमांटिक मैसेज भी शेयर किया है.

इससे पहले सुष्मिता बिज़नेसमैन रितिक भसीन के साथ चार साल तक रिलेशन में थीं. सुष्मिता का कहना है कि शादी के मामले में वो जल्दबाज़ी नहीं करना चाहतीं और सही समय आने पर ही शादी होती है. साथ ही वो ख़ुद को बेहद रोमांटिक पर्सन मानती हैं और कहती हैं कि मुझे कभी भी ऐसा महसूस नहीं हुआ कि हे भगवान! मेरी शादी नहीं हुई. ख़ैर, अब शायद सही समय आ गया है, जब सुष्मिता और रोहमन अपने रिलेशनशिप को नेक्स्ट लेवल तक ले जाना चाहें.

Ranbir Kapoor

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रणबीर से ब्रेकअप करूं या नहीं, कैटरीना ने पूछा था सलमान से!
बॉलीवुड सोर्सेस की मानें, तो रणबीर से ब्रेकअप से पहले कैटरीना और सलमान एक स्टूडियो में मिले थे और माना यह जा रहा था कि कैटरीना ने अपने और रणबीर कपूर के बनते-बिगड़ते रिश्तों पर सलमान से चर्चा की थी. ख़ैर, कैटरीना-रणबीर का तो ब्रेकअप हो चुका है और जहां कैटरीना वापस सलमान के क्लोज़ आ चुकी हैं. वहीं रणबीर इन दिनों आलिया के साथ अपने लिंकअप्स को लेकर काफ़ी चर्चा में हैं.

Ranbir and Alia

क्या आलिया को रणबीर ने पा लिया?
इन दिनों बी टाउन की हॉट न्यूज़ तो यही है कि आलिया और रणबीर एक-दूसरे के हो चुके हैं. दोनों को कई बार साथ-साथ देखा जा चुका है. यहां तक कि फैमिली डिनर पर भी अब तो इन्हें साथ-साथ देखा जाता है. कहा जा रहा है कि मॉम नीतू और पापा ऋषि कपूर को भी इस रिश्ते से कोई ऐतराज़ नहीं. आलिया और रणबीर फिल्म ब्रह्मास्त्र की शूटिंग के दौरान काफ़ी क़रीब आ गए और उनकी ये नज़दीकियां प्यार में तब्दील हो गईं. सुनने में तो यही आ रहा है कि दोनों जल्द ही शादी के बंधन में बंध सकते हैं.

बॉलीवुड के दिल तोड़नेवाले फेमस ब्रेकअप्स

कुछ कपल्स होते हैं, जो फैंस को भी बेहद प्यारे लगते हैं और फैंस उन्हें रील ही नहीं, रियल लाइफ में भी साथ-साथ देखने की ख़्वाहिश करने लगते हैं, जब उनके ब्रेकअप की ख़बरें आती हैं, तो ज़ाहिर है सबके दिल टूट जाते हैं. उन्हीं ब्रेकअप्स की बात यहां करेंगे.

salman and aishwarya

सलमान-ऐश्‍वर्या: हम दिल दे चुके सनम में साथ-साथ काम करते हुए कब सलमान और ऐश एक-दूसरे को अपना दिल दे चुके थे, दोनों को अंदाज़ा भी नहीं हुआ था. सबको लगा था कि बॉलीवुड का मोस्ट एलिजिबल बैचलर अब जल्द ही घर बसा लेगा, लेकिन सलमान ऐश को लेकर काफ़ी पज़ेसिव होने लगे थे, जिससे उनका बर्ताव काफ़ी हद तक ऐश को नागवार गुज़रने लगा था. इनके बीच विवेक ओबेरॉय भी कुछ दिनों के लिए आए और उनके साथ भी काफ़ी झगड़े और मीडिया वॉर के बाद मामला ठंडा हुआ. इन सबका नतीजा ये हुआ कि सलमान-ऐश का ब्रेकअप हो गया और आज ऐश अभिषेक बच्चन के साथ हैपिली मैरिड हैं, वहीं सलमान आज भी बने हुए हैं मोस्ट एलिजिबल बैचलर.

shahid saif and kareena

शाहिद-करीना: ये क्यूट कपल सबको अच्छा लगता था. दोनों ने अपने प्यार को कभी छिपाया भी नहीं. यहां तक कि दोनों का स्मूचिंग एमएमएस भी काफ़ी ख़बरों में आया था, पर उससे भी उनके रिलेशन पर कोई नकारात्मक असर नहीं हुआ. लेकिन जब वी मेट पूरी होते-होते दोनों के रास्ते जुदा हो गए. करीना की लाइफ में सैफ आ चुके थे और शाहिद अपने टूटे दिल को संभाल रहे थे. ख़ैर, करीना-सैफ की शादी के बाद शाहिद भी अब मीरा के साथ हैप्पी फैमिली का मज़ा ले रहे हैं.

सुशांत सिंह-अंकिता: टीवी सीरियल पवित्र रिश्ता के सेट पर दोनों का प्यार परवान चढ़ा और हर कोई इसी इंतज़ार में था कि कब अंकिता लोखंडे और सुशांत अपनी शादी के कार्ड्स छपवाएंगे. लेकिन सुशांत की बॉलीवुड एंट्री के बाद ही दोनों में सेपरेशन की ख़बरें आने लगी थीं और अब दोनों ही अलग होने के बाद अपने करियर को संवारने में बिज़ी हैं.

  • इन सबके अलावा अक्षय कुमार भी रवीना टंडन और फिर शिल्पा शेट्टी के साथ अपने लिंकअप और ब्रेकअप को लेकर काफ़ी न्यूज़ में थे.
  • करिश्मा कपूर और अभिषेक बच्चन का रिश्ता टूटना भी काफ़ी दुखद था. 
  • लारा दत्ता और भूटान के एक्टर केली दोर्जी भी लंबे समय तक लिव इन में थे, पर दोनों के विचार नहीं मिले और 10 साल के रिलेशन के बाद दोनों अलग हो गए.
  • वहीं रणबीर और दीपिका को भी आइडियल कपल की तरह देखा जाता था, पर दोनों की राहें जुदा हो गईं और अब दीपिका रणवीर सिंह के साथ शादी करके काफ़ी ख़ुश हैं.

जॉन-बिपाशा: बॉलीवुड का सबसे हॉट कपल था यह और 9 सालों तक लिव इन में रहने के बाद जब ये दोनों अलग हुए, तो फैंस का दिल भी उतना ही टूटा था, जितना इन दोनों का. अलग होने के बाद दोनों ने ही एक-दूसरे पर आरोप भी लगाए थे, पर अब ये दोनों ही अपने-अपने पार्टनर्स के साथ हैपिली मैरिड हैं.

प्रीति-नेस वाडिया: इस क्यूट कपल से भी लोगों को काफ़ी उम्मीदें थीं और सबको यही लग रहा था कि दोनों जल्दी ही शादी करेंगे. यहां तक कि दोनों ने मिलकर आईपीएल टीम किंग्स इलेवन पंजाब भी ख़रीदी थी, पर क्रिकेट मैच के दौरान ही दोनों की अनबन की ख़बरें आने लगीं. यह भी सुनने में आया कि नेस ने किसी युवती के साथ शराब के नशे में छेड़छाड़ की और उसके बाद से ही दोनों के रास्ते अलग होने लगे. प्रीति से भी धक्का-मुक्की की न्यूज़ आई और मामला पुलिस चौकी तक जा पहुंचा. इस क्यूट जोड़ी का इस तरह से टूटना बेहद दुखद था. लेकिन प्रीति को अब नया साथी मिल चुका है और वो अपनी शादी को एंजॉय कर रही हैं.

– गीता शर्मा

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पहला अफेयर: ख़्वाब (Pahla Affair: Khwab)

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पहला अफेयर: ख़्वाब (Pahla Affair: Khwab)

कभी देखा है ख़्वाबों को उड़ते हुए… कभी देखा है चांद को आंगन में बैठे हुए… कभी देखा है आसमान को झुकते हुए… कभी देखा है हथेली पर सूरज को उगते हुए… एक ख़ामोश अफ़साने से तुम जब आते हो. फेसबुक पर जब देखती हूं ये सब कुछ होते हुए, सारी कायनात का नूर समेटे हुए अपनी अदाओं में बेपनाह चाहत भरे हुए जब तुम होते हो, तब स़िर्फ तुम होते हो और कोई नहीं होता आस-पास.

आज दो साल हो गए तुमसे बात करते हुए, हम फेसबुक पर एक-दूसरे से चैट करते हैं. कब समय गुज़र गया, पता ही नहीं चला. न व़क्त का होश रहा, न ही अपना ख़्याल. दीन-दुनिया से बेख़बर हम घंटों चैट करते. हर टॉपिक पर बात करते. बहत करते, खिलखिलाते एक अलग ही जहां में खोये रहते.

अजीब चीज़ है ये व़क्त भी… न कभी ठहरता है, न कभी रुकता है. बस, आगे ही आगे बढ़ता रहता है. एक दिन पापा-मम्मी ने कहा, “शादी की उम्र हो गई है तुम्हारी. कोई पसंद हो, तो बताओ.” शादी का नाम सुनते ही कुंआरी उमंगें अंगड़ाई लेने लगीं, पर पसंद तो कोई नहीं था, सो पापा से कहा, “जो आपकी पसंद हो.”

कैसा जीवनसाथी होना चाहिए? उसमें क्या गुण होने चाहिए? क्या बात करनी चाहिए… जब मैंने टाइप करते हुए पूछा, तो उसने कहा, ‘जो तुम्हारी आंखों से ही समझ जाए कि तुम्हें कुछ कहना है… तुम्हारी ख़ामोश ज़ुबां की आवाज़ उसकी धड़कन को सुनाई दे, जो रिश्तों की कद्र करे, तुम्हें मान दे… ऐसा होना चाहिए जीवनसाथी.’ कहां ढूंढ़ूं उसे? पूझने पर बताया बस अपनी आंखें बंद करो, जिसका भी चेहरा सामने आए, वही है सच्चा जीवनसानी, जैसा कहा, वैसा किया, पर कोई चेहरा सामने नहीं आया. आता भी कैसे? इस फेसबुक के चेहरे के अलावा न किसी से जान, न पहचान.

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आज पापा ने कुछ लोगों को घर पर बुलाया है. मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि एक अंजान शख़्स से कैसे बात करूं? फेसबुक पर उससे बात करने में जो कंफर्ट लेवल था, वो यहां नहीं था. शाम को वो लोग आए और पापा ने पराग से मेरा परिचय करवाते हुए अकेले में बात करने को कहा. मैं बेहद घबराई हुई थी कि क्या और कहां से बात शुरू करूं. पराग ने भी बस मेरा नाम ही पूछा. हम दोनों लगभग आधे घंटे तक चुपचाप बैठे थे. कुछ दिन बाद पापा ने शादी की तारीख़ भी तय कर दी. मैंने फेसबुक पर उसे मैसेज किया कि कुछ ही दिनों में मेरी शादी होनेवाली है, पर मुझे नहीं पता वो मेरे लिए सही है या नहीं. उधर से तुरंत जवाब मिला, ‘जो केवल नाम पूछकर शादी के लिए हां कर दे, उस पर भी भरोसा नहीं करोगी क्या?’

‘तुम्हें कैसे पता?’

‘…अब भी नहीं पहचाना इस बंदे को?’ यह पढ़ते ही सब कुछ साफ़ हो गया… ‘पराग आप?’

‘हां, क्या तुम मुझसे शादी करोगी?’

‘हां…’ दिल की सारी उलझनें मिट गईं. सब कुछ मिल गया था मुझे. आंखें बंद कीं, तो चेहरा भी सामने आ गया पराग का. दो साल कम नहीं होते किसी को जानने के लिए, मैं ही नहीं समझ पाई थी इस प्यार की अनुभूति को. आज ऐसा लगा छोटे-छोटे बादल के टुकड़े हवा में तैर रहे हैं. लग रहा है मानो आकाश ज़मीं पर उतर आया है और शाम की ख़ामोशियों में एक मीठी खनक गूंज रही है.

– शोभा रानी गोयल

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पहला अफेयर: ख़्वाबों के दरमियान… (Pahla Affair: Khwabon Ke Darmiyaan)

Pahla Affair Ki Kahani

पहला अफेयर: ख़्वाबों के दरमियान… (Pahla Affair: Khwabon Ke Darmiyaan)

वो ख़्वाब था कोई या मेरी ज़िंदगी की ख़ूबसूरत हक़ीक़त… आज तक नहीं समझ पाई हूं. अचानक आया और कई अरमान जगाकर चला गया… ट्रेन का सफ़र लंबा था और वो मेरे सामनेवाली सीट पर बैठा अपने में ही मस्त था. मुझे थोड़ा अजीब लगा, क्योंकि एक ख़ूबसूरत लड़की सामने बैठी है और पिछले 2-3 घंटों से उसने एक बार में मेरी तरफ़ नज़र भरकर नहीं देखा. पर उसका न देखना ही मुझे उसकी ओर आकर्षित कर रहा था. उसका इस तरह मुझ पर ध्यान न देना ही मुझे ख़ास लग रहा था. न चाहते हुए भी मेरी नज़र उसी की तरफ़ जा रही थी. वो अपने खाने-पीने में, फोन पर म्यूज़िक सुनने में ही बिज़ी था. मैं पहली बार अकेले सफ़र कर रही थी. थोड़ा असहज लग रहा था सब कुछ. मैं खिड़की से बाहर झांकने लगी, कोई बड़ा स्टेशन आया था.

“चाय पीती हैं आप?” अचानक एक आवाज़ आई और मेरे सामने वही था, चाय के दो कप थे हाथ में, एक कप मेरी तरफ़ बढ़ाते हुए कहा उसने… अजीब लड़का है. मैं कुछ कह पाती, उसने वो चाय का कप मेरे हाथ में थमा दिया और फिर अपनी दुनिया में खो गया.

सच कहूं, तो चाय की बहुत ज़रूरत थी उस व़क्त मुझे. शाम ढली, खाने का टाइम हुआ, तो उसने अपने बैग से खाना निकाला और फिर मुझे देखकर बोला, “मेरे साथ खाना शेयर कर सकती हैं आप, मुझे बुरा नहीं लगेगा, ये घर का बना खाना है, आपको अच्छा लगेगा.”

“थैंक यू, आप खा लीजिए, मुझे भूख नहीं है…” मैंने थोड़ा फॉर्मल होते हुए कहा, तो उसने फ़ौरन जवाब दिया, “नहीं खाना है, तो आपकी

मर्ज़ी, पर झूठ मत बोलो कि भूख नहीं है, क्योंकि दिनभर से आपने कुछ नहीं खाया है. आप कुछ डरी हुई-सी लग रही हैं.”

“जी मैं अकेले पहली बार सफ़र कर रही हूं, इसलिए थोड़ा अजीब-सा लग रहा है.”

“कोई बात नहीं, खाना खा लीजिए, आपका डर कुछ कम हो जाएगा, भूखे पेट ज़्यादा डर लगता है.”

मेरे पास अब उसे मना करने का कोई कारण नहीं था. मैंने उससे बातें करनी शुरू कीं, कहां से आया, कहां जा रहा है, क्या करता है… आदि… पर उसने हर बात को बेफिक्री में उड़ा दिया और सीधा-सरल जवाब नहीं दिया.

मैंने भी सोचा कि क्यों इससे इतनी बातें कर रही हूं, सीधा जवाब तो देता नहीं है. कितना अजीब लड़का है. ख़ैर सुबह स्टेशन आया, तो देखा वो भी अपना सामान पैक कर रहा है. फिर उतरने में मेरी मदद करने लगा. मैंने भी ज़्यादा कुछ तो नहीं कहा, पर थैंक्स बोलकर आगे बढ़ गई.

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“अपना नाम तो बता दो मिस…” पीछे से उसने पुकारा.

मैंने पलटकर स़िर्फ उसको एक स्माइल पास की और आगे बढ़ गई…

एक साल बीत गया. पर वो सफ़र मैं आजतक नहीं भूली हूं, क्योंकि एक अकेले सफ़र में उस अंजान शख़्स से मुझे कुछ देर तो सहज महसूस करवाया. एक पहेली की तरह था वो, जिसे सुलझाने तक का मौक़ा मुझे नहीं मिला. पर उसके प्रति वो आकर्षण आज तक बना हुआ है. सोचती हूं कि क्या मुझे अपना नाम उसे बता देना चाहिए था? कहीं मैंने ग़लती तो नहीं कर दी, क्या पता नाम से बात आगे बढ़ती, तो वो मेरा फोन नंबर, पता-ठिकाना पूछ लेता. पर फिर यह सोचकर मन को समझा लेती हूं कि कितना अजीब लड़का था, क्या पता उसके मन में मेरे प्रति यह आकर्षण था भी या नहीं. मैं बस यूं ही वन वे ट्रैफिक चलाए जा रही हूं.

ख़ैर, जो भी था, बहुत मीठा-गुदगुदानेवाला एहसास था. शायद यही मेरा पहला प्यार था. पर आज इतना सब क्यों सोच रही हूं मैं. अब तो मुझे अपनी नई ज़िंदगी की शुरुआत करनी है, किसी और के ख़्वाबों को अपना बनाना है, उसके ही ख़्वाबों में खो जाना है.

“कविता बेटा, तैयार नहीं हुई क्या अब तक, लड़केवाले आते ही होंगे तुझे देखने…” मां की आवाज़ ने मुझे चौंकाया.

“मैं तैयार ही हूं मां, बस दो मिनट…”

नीचे गई, तो मैं हैरान थी, अरे, ये तो वही लड़का है. मुझे अपनी क़िस्मत पर यक़ीन नहीं हो रहा था. इतने में ही मेरा परिचय करवाया गया, “कविता, ये विक्रमजीत है हमारा छोटा बेटा और तुम्हें जिस ख़ास से मिलना है, वो बस अभी पहुंच ही रहा है. कमलजीत हमारा बड़ा बेटा, वो पीछेवाली कार में था, ट्रैफिक में फंस गया, आता ही होगा.

मुझे फिर एक झटका लगा. ऐसा लगा अब ख़ुद को नहीं रोक पाऊंगी, मैं फूट-फूटकर रो पड़ी, क़िस्मत मेरे साथ ऐसा भद्दा मज़ाक कैसे कर सकती है…!

मैं अपने कमरे में चली आई. सब हैरान थे कि आख़िर ऐसा क्या हो गया…

“उस दिन नाम बता देती, तो आज इस तरह हमारा सामना नहीं होता.” पीछे से विक्रम की आवाज़ सुनाई दी, तो मैं उस पर बिफर पड़ी…

“तुम ख़ुद को क्या समझते हो, ख़ुद चाहे कुछ भी करो, पर मैंने स़िर्फ नाम नहीं बताया, तो उसकी इतनी बड़ी सज़ा मिलेगी मुझे. तुमने भी तो कुछ नहीं बताया था, न नाम, न पता, न फोन नंबर, न ठिकाना और मुझे तो यह भी नहीं पता था कि तुम मुझसे प्यार करते भी हो या नहीं.”

“अरे, अगर ये आपसे प्यार नहीं करता, तो आज आपका हाथ मांगने आपके घर पर नहीं आया होता…” किसी अंजाने शख़्स की आवाज़ थी यह.मैंने पलटकर देखा, तो विक्रम ने परिचय करवाया… “ये मेरे बड़े भाई कमल हैं.”

कमल ने अपनी बात आगे बढ़ाई, “कविता, आपकी फोटो देखते ही विक्रम ने मुझे सब कुछ बता दिया था. पर वो आपके दिल की बात जानना चाहता था और इसीलिए उसी का यह आइडिया था कि मैं बाद में आऊंगा और आपको वो इस तरह सरप्राइज़ करेगा. मम्मी-पापा ने आपको पहले ही पसंद कर लिया था, विक्रम ने उन्हें भी अपने दिल की बात बता दी थी, बस आपकी मर्ज़ी वो जानना चाहता था.”

यह सब सुनकर मुझे विक्रम पर ग़ुस्सा भी आ रहा था और प्यार भी… सच में कितना अजीब लड़का है… पर मैं ख़ुश थी कि मैंने जिसको ख़्वाबों में अब तक संजोया था, वही मेरी ज़िंदगी की ख़ूबसूरत हक़ीक़त बन रहा है, मेरा हमसफ़र बन रहा है. मैं ख़ुशनसीब हूं कि मुझे मेरा प्यार ताउम्र के लिए मिल चुका था. थैंक यू भगवान!

– गीता शर्मा

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