Tag Archives: fiction

कहानी- बकेट लिस्ट (Short Story- Bucket List)

सरसरी नज़रों से कॉपी के पन्ने पलटती नीरा को कहीं कुछ अस्वाभाविक-सा लगा, तो उसके हाथ एक पल को थम गए और फिर विपरीत दिशा में पन्ने पलटने लगी. हर बार वास्तविक व्यय अनुमानित व्यय से अधिक? कुछ अनुमानित व्यय बरसों से सूची में बने हुए? पर उन पर कभी व्यय ही नहीं? और फिर यकायक वे व्यय सूची से एकदम विलुप्त हो गए?

Kahaniya

रचित को देर रात की फ्लाइट से यूएस रवाना करने के बाद सवेरे नीरा की आंख देर से खुली. लंबा वीकेंड है, तो सारे पेंडिंग काम निबटा डालती हूं. सारे बिखरे कपड़े, बिस्तर आदि ठिकाने लगाने के बाद उसने अपने लिए कॉफी बनाई और लॉबी में आ बैठी. कॉफी की चुस्कियां भरते-भरते उसकी नज़रें टेबल के नीचे रखे कार्टन पर जा टिकीं.

“ओह! इसका भी तो निबटारा करना है. अभी पगफेरे के समय मायके से लौटते व़क्त वह अपनी बैंकिंग की सारी पुस्तकें इस कार्टन में समेट लाई थी. रचित को यूएस में बहुत अच्छी जॉब मिल जाने से वह शादी के कुछ समय बाद ही जॉइन करने चला गया था. हनीमून के तौर पर नीरा की ऑस्ट्रेलिया टूर की इच्छा भी उसने दिसंबर की छुट्टियों में पूरी करने का वादा किया था. नीरा भी बहुत जल्दी वहां नौकरी तलाश कर उसे जॉइन करनेवाली थी. इसके लिए उसे कुछ जॉब इंटरव्यू और परीक्षाएं आदि देनी थीं, जिनके लिए वह मायके से अपनी सारी किताबें समेट लाई थी. मम्मी ने टोका भी था, “जो चाहिए वे ही ले जा, बेकार क्यों बोझा घसीट रही है?”

“मम्मी, इतना समय कहां है अभी मेरे पास? रचित को रवाना करने के बाद फ्री टाइम में काम की किताबें छांटकर रख लूंगी, बाकी वहीं रद्दी में दे दूंगी.”

कॉफी का मग रखकर नीरा ने कार्टन खींच लिया था और एक-एक किताब निकालकर देखने लगी. “हूं, कुछ तो ये ही काम आ जाएंगी. बाकी नई ऑर्डर कर दूंगी. नोट्स से भी काफ़ी पॉइंट्स कवर हो जाएंगे… अरे, यह कॉपी कैसी है? पापा की बनाई लगती है.”

नीरा को याद आया. वह और उसका छोटा भाई नलिन जब अगली कक्षा में आ जाते थे, तो पापा उनसे पुरानी कॉपी-किताबों की रद्दी छंटवाते थे. उस समय कॉपियों के खाली बचे पेज वे उनसे फड़वाकर अलग करवा लेते थे. “इन सबको सिलकर तुम दोनों के लिए नई रफ कॉपियां बन जाएंगी.”

यह भी पढ़ेबेटी की शादी का ख़र्च बड़ा हो या पढ़ाई का? (Invest More In Your Daughter’s Education Rather Than Her Wedding)

“क्या पापा, अब मैं बड़ी क्लास में आ गई हूं. मैं नहीं लूंगी ऐसी कॉपी. सहेलियां मज़ाक बनाती हैं.”

“अरे! इसमें क्या हो गया? खाली पेज हैं. व्यर्थ क्यों इन्हें रद्दी में देना. कितने पेड़ कटते हैं, तब ये पृष्ठ बनते हैं. किफ़ायत और कंजूसी दो अलग-अलग चीजें हैं.” प्रतिष्ठित प्रशासनिक अधिकारी, लेकिन बेहद ईमानदार और सिद्धांतवादी पापा सादा जीवन और उच्च विचार में विश्‍वास रखते थे.

यादों के अलबम के पृष्ठ पलटती नीरा अनायास ही हाथ में थामी कॉपी के पृष्ठ पलटने लगी. यह तो पापा की हस्तलिपि लगती है. ओह! इसमें तो बरसों पुराने

हिसाब-किताब लिखे हैं. हर माह का अनुमानित व्यय औेर फिर उसके सामने वास्तविक व्यय का क्रमबद्ध विस्तृत ब्योरा. नीरा को हंसी आ गई. पापा भी न, इतना व्यस्त रहते हुए भी जाने कैसे-कैसे बेकार के कामों के लिए व़क्त निकाल लेते हैं. उसे भी तो हमेशा से कहते आ रहे हैं, विशेषकर जब से वह यहां मुंबई आकर नौकरी करने लगी है.

“बेटी, हिसाब-किताब लिखकर रखना बहुत अच्छी आदत है. माना तेरा बहुत बड़ा पैकेज है, पर उस हिसाब से महानगर के ख़र्चे भी तो बड़े हैं. अनुमानित व्यय और वास्तविक व्यय लिखती रहोगी, तो तुम्हें पता रहेगा कि कहां पैसा व्यर्थ ख़र्च हो रहा है और उस पर कैसे लगाम कसनी है? कहां निवेश करना है? कहां कटौती करनी है? बूंद-बूंद से ही घड़ा भरता है और अगर घड़े के पेंदे में मामूली-सा सुराख़ हो जाए, तो ऊपर से कितना ही पानी भरते रहो, एक न एक दिन उसे खाली होना ही है.” पापा समझाते रहते, लेकिन नीरा यह सोचकर कि उससे यह सब नहीं होनेवाला एक कान से सुनकर दूसरे से निकाल देती.

सरसरी नज़रों से कॉपी के पन्ने पलटती नीरा को कहीं कुछ अस्वाभाविक-सा लगा, तो उसके हाथ एक पल को थम गए और फिर विपरीत दिशा में पन्ने पलटने लगी. हर बार वास्तविक व्यय अनुमानित व्यय से अधिक. कुछ अनुमानित व्यय बरसों से सूची में बने हुए, पर उन पर कभी व्यय ही नहीं. और फिर यकायक वे व्यय सूची से एकदम विलुप्त हो गए? पहेली सुलझाने के लिए नीरा कॉपी में घुस-सी गई और थोड़ा-सा विश्‍लेषण करने पर ही कारण सामने आ गया. नीरा सिर थामकर बैठ गई. घूमने-फिरने और शॉपिंग की शौकीन नीरा लाड़ से अधिकार जताते हुए प्रतिवर्ष कम से कम एक बाहर की ट्रिप तो प्लान करवा ही लेती थी. विदेश यात्रा नहीं, तो अपने देश में ही कहीं… नीरा के पास हर तरह की आइटिनररी मौजूद रहती. नीरा के इसी जुनून के सौजन्य से पूरा परिवार स्पेन, पेरिस, दुबई, गोवा, कश्मीर आदि जगह घूम चुका था, लेकिन नीरा की बकेट लिस्ट में कुछ न कुछ जुड़ता ही जाता.

आधुनिक पोशाकों से नीरा की वॉर्डरोब भरी रहती, लेकिन फिर भी उसकी उंगलियां ऑनलाइन नई ड्रेस तलाशने को लालायित रहतीं. पापा को सॉफ्ट टारगेट मान नीरा हमेशा उन्हें ही मनाने का प्रयास करती.

“अभी डिस्काउंट के साथ कार्ड पर कैश बैक भी मिल रहा है. स्कूल फेयरवेल में ड्रेस काम आ जाएगी. मेरा बर्थडे गिफ़्ट भी हो जाएगा.” लेकिन बर्थडे आते-आते दूसरी फ़रमाइश तैयार हो जाती थी. सहमत न होते हुए भी लाडली इकलौती बिटिया का मन रखने के लिए पापा मान जाते थे. मम्मी थोड़ा सख्ती बरतनेे का प्रयास करतीं, तो पापा उन्हें भी मना लेते. “छोड़ो न नैना, कुछ सालों के शौक हैं. ससुराल चली जाएगी, कंधों पर ज़िम्मेदारी का बोझ बढ़ेगा, तो सब पीछे छूटता चला जाएगा. फिर हम करने की स्थिति में हैं.”

“आज हैं, पर कल सेवानिवृति के बाद का भी तो सोचिए. आप हैं भी इतने हार्ड ऑनेस्ट! हमारी ज़िम्मेदारियां सारी अभी ज्यों की त्यों हैं. दोनों बच्चों की पढ़ाई, शादियां, मकान बनाना…” मम्मी अपनी बकेट लिस्ट गिनाने लग जाती थीं.

अतीत को स्मरण करती नीरा थोड़ा असहज हो उठी थी. मन में एक अपराधबोध जन्म लेने लगा. पापा की नसीहतें रह-रहकर याद आ रही थीं.

“अभी तू अकेली जान है. इतना बड़ा पैकेज है. ज़्यादा से ज़्यादा सेव किया कर. भविष्य में तेरे ही काम आएगा.” पापा ने ही उसका पैसा उसके नाम से जगह-जगह निवेश कर दिया था. वह झुंझला जाती थी. “क्या पापा, सैलरी अकांउट में आते ही इधर-उधर ट्रांसफर हो जाती है.”

“फिर भी तेरे हाथ में ख़र्च करने को कितना बचा रहता है. रोज़ पार्टी, मूवी… इन सब पर अब थोड़ा अंकुश लगा बेटी!”

“क्या पापा, आप ही तो कहते हो, उम्र के शौक हैं, उम्र के साथ चले जाएंगे.” नीरा लाड़ से ठुनकने लगती.

“अच्छा सुन, हम लोग इधर एक छोटा-सा प्लॉट ख़रीद रहे हैं. तू कहे, तो तेरी सेविंग से उससे जुड़ता वैसा ही एक प्लॉट तेरे लिए भी ले लें. तुझे यहां बसना तो नहीं है, पर मात्र निवेश के तौर पर सौदा बुरा नहीं है. भविष्य में अच्छी क़ीमत पर बेचकर जहां हो, वहीं फ्लैट ख़रीद लेना.”

यह भी पढ़ेरिश्तों की बीमारियां, रिश्तों के टॉनिक (Relationship Toxins And Tonics We Must Know)

“आप जैसा ठीक समझें.” नीरा ने उबासी लेते हुए सहमति दे दी थी.

सचमुच पापा नहीं देखते-संभालते, तो वह अपनी सारी कमाई घूमने, खाने, शॉपिंग आदि में ही उड़ा चुकी होती. वैसे उड़ा भी रही है.

गहन सोच में डूबी नीरा फिर से कॉपी के पृष्ठ पलटने लगी थी. पापा की बकेट लिस्ट से मां की चूड़ियां गायब होकर ‘नीरा के गहने’ नाम से नया मद जुड़ गया था. अप्रैल 2014 से… हूं, तब वह कॉलेज के अंतिम वर्ष में आ गई थी. मतलब तब से पापा-मम्मी ने उसकी शादी की तैयारियां आरंभ कर दी थीं. इसके बाद की वास्तविक व्यय सूची में नीरा की नथनी, चूड़ियां, बिछुए और सेट आदि जुड़ते चले गए, पर गायब हुई ‘नैना की चूड़ियां’ फिर कहीं नज़र नहीं आईं. इसी तरह

सालभर से बकेट लिस्ट में पड़ा पापा का गरम सूट दुबई ट्रिप की भेंट चढ़ गया था, तो क्या अपनी बकेट लिस्ट भरने के चक्कर में वह अनजाने ही पापा की बकेट लिस्ट खाली करती चली गई? वह इतनी ख़ुदगर्ज़ और नासमझ कैसे हो गई?

पापा-मम्मी को रचित के बारे में बताने के साथ ही उसने अपनी डेस्टिनेशन वेडिंग की आकांक्षा भी ख़ुशी-ख़ुशी जाहिर कर दी थी.

“पर बेटी, हमें इतना बड़ा सरकारी बंगला और अहाता मिला हुआ है. मेहमानों के लिए सर्किट हाउस, गेस्ट हाउस सब आसानी से मिल जाएगा. व्यर्थ हम इतना पैसा क्यूं बहाएं?” मम्मी ने तर्क किया था.

“मम्मी, शादी ज़िंदगी में एक बार होती है. फिर मैं फिल्मी तारिकाओं की तरह विदेश में शादी करने को नहीं कह रही हूं. अपनी सीमाएं पता हैं मुझे. जयपुर से आगे एक नया आइलैंड रिसॉर्ट बना है. ठहरिए! मैं आपको वहां की पिक्स दिखाती हूं.” बेहद उत्साह से नीरा मोबाइल खोलकर वहां की पिक्स दिखाने लगी. अपने उत्साह में उसने पापा-मम्मी के उतरे चेहरे भी नज़रअंदाज़ कर दिए थे, जिन्हें शायद छोटे भाई नलिन ने नोटिस कर लिया था.

“जगह तो बहुत शानदार है दीदी, पर इस पर लाखों ख़र्च करना मुझे बुद्धिमानी का सौदा नहीं लग रहा. इससे तो मेरे दोस्त के पापा के रिसॉर्ट में हम शादी कर सकते हैं. मेहमानों के लिए कमरे, हॉल के साथ-साथ ख़ूब खुला गार्डन स्पेस भी है. अपने घर से ज़्यादा दूर भी नहीं है. बाराती वहां रुक जाएंगे. बाकी अपने रिश्तदारों के लिए घर, सर्किट हाउस आदि के कमरे हो जाएंगे. क्यूं यह कैसा रहेगा?”

पापा-मम्मी को यह प्रस्ताव जहां अपने बजट से थोड़ा ऊपर, तो नीरा को अपने स्तर से थोड़ा नीचे लगा था. पर अंतत: इस पर सहमति बन गई थी.

नीरा को आज महसूस हो रहा था कि नलिन उससे पांच वर्ष छोटा होते हुए भी उससे कहीं अधिक समझदार, व्यवहारिक और ज़मीन से जुड़ा है. पूरी शादी में वह पापा के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम कर रहा था. हर व़क्त उनके आस-पास बना रहता.पूरी शादी में हर काम के लिए नलिन की ही पुकार मच रही थी. ख़ुद वह भी तो अपने हर काम के लिए उसी पर निर्भर हो गई थी. “नलिन, मेहंदीवाली का क्या हुआ? पार्लर कौन ले जाएगा? मेरी ज्वेलरी व़क्त पर ले आना, मैचिंग सैंडल दिलवा ला…”

अभी-अभी सेकेंड इयर में आया नलिन अपनी उम्र से कितना अधिक परिपक्व और समझदार है. मम्मी-पापा कितना भरोसा करते हैं उस पर. कितने निर्भर हैं उस पर. हर बात में उसकी राय लेते हैं.

भाई की तारीफ़ करता मन अनजाने ही उससे ईर्ष्या पर उतर आया. ‘बेटा जो है… वह तो ठहरी बेटी. पराई अमानत!’

पर अगले ही क्षण अपनी तुच्छ सोच पर नीरा ख़ुद ही शर्मिंदा हो उठी. बेटा-बेटी के बीच सुई की नोंक बराबर भी भेदभाव न रखनेवाले अपने माता-पिता पर वह कैसा घृणित आक्षेप लगा रही है. भाई के बराबर, बल्कि उससे कुछ अधिक ही उससे अधिकार पानेवाली वह कैसी बेटी है, जो कर्तव्य निर्वहन की दौड़ में छोटे भाई से पिछड़ गई.

मोबाइल बजा, तो नीरा की चेतना लौटी. “लो शैतान को याद किया और शैतान हाज़िर! तुझे ही याद कर रही थी.”

“भला क्यों? अब क्या काम बाकी रह गया? ड्राईक्लीनर को आपके कपड़े दे आया हूं समय से ले भी आऊंगा… वैसे मैंने जीजू का समाचार जानने के लिए फोन किया था.”

नलिन के परिहास पर भी नीरा शर्मिंदा हो गई. रचित का समाचार देकर वह स्वर में बड़ी बहनवाला रौब और ज़िम्मेदारी ले आई.

“तूने इंटर्नशिप का फॉर्म भर दिया या नहीं? किसी अच्छी विदेशी यूनिवर्सिटी से करेगा, तो आगे जॉब के अच्छे अवसर मिलेंगे. रचित ने भी यूएस अपने मामा के पास रहकर इंटर्नशिप की थी और आज उसी कंपनी ने इतना अच्छा जॉब ऑफर दिया है.”

“जानता हूं दीदी, पर बहुत महंगा सौदा है. अभी तो शादी के लोन से उबरने में ही पापा-मम्मी को एक लंबा व़क्त लग जाएगा. मैं उन पर एक और लोन का बोझ नहीं डालना चाहता. मैं इंटर्नशिप यहीं से कर लूंगा.

पापा-मम्मी की तबीयत भी आजकल ठीक नहीं रहती. पास रहूंगा, तो उन्हें भी तसल्ली रहेगी और मुझे भी. जॉब की चिंता मत करना. आपका भाई इतना प्रतिभाशाली तो है कि जॉब उसके पास चलकर आएगी.”

“सो तो है. मुझ पर जो गया है. ऑल द बेस्ट!” फोन बंद करते हुए नीरा की आंखें छलछला उठी थीं. छोटे भाई के प्रति कुछ पल पहले जगा ईर्ष्या का भाव जाने कहां तिरोहित हो गया था. मन में रह गया था उसके प्रति ढेर सारा प्यार, सम्मान, अपनापन और इन सबसे ऊपर अपरिमित गर्व. वह कितनी भाग्यशाली है कि उसने इतने सुसंस्कृत परिवार में जन्म लिया.

पापा की कॉपी और अपनी पुस्तकें, नोट्स आदि समेटते नीरा मन ही मन कुछ महत्वपूर्ण निर्णय ले चुकी थी. फिर भी मन में कुछ संशय लिए उसने रचित को फोन लगाया और बहुत देर तक दिल की बातें शेयर करती रही.

“बस, यही सब बताने के लिए इतनी रात गए फोन किया था जान? मुझे बताए बिना भी तुम ये सब करतीं, तो भी मुझे कोई आपत्ति नहीं होती. मैं तब भी इतना ही प्रसन्न होता.”

यह भी पढ़ेशादी के दिन दूल्हा-दुल्हन न करें ये 18 ग़लतियां (18 Common Mistakes Brides And Grooms Must Avoid)

‘ओह! आई एम सॉरी. मैं तो भूल ही गई थी कि वहां इस समय इतनी रात होगी, पर सच कहूं, तुमसे बात कर मन बहुत हल्का हो गया है. मुझे अपनी पसंद पर गर्व है. और….और… मैं तुमसे पहले से भी ज़्यादा प्यार करने लगी हूं.” नीरा ने फोन पर ही ताबड़तोड़ चुंबनों की बौछार कर दी थी. फिर वह फुर्ती से उठकर अपनी नई बकेट लिस्ट तैयार करने लगी-

नलिन को यूएस रचित के पास इंटर्नशिप के लिए भेजना… प्रयास करना कि तब तक वह स्वयं भी वहां पहुंच जाए… अपना प्लॉट पापा के नाम कर उन्हें वहां जल्द निर्माण कार्य आरंभ करने के लिए तैयार करना…ऑस्ट्रेलिया टूर पर जाने की बजाय रचित की इच्छानुसार सर्दी की छुट्टियां उसके पैतृक गांव में उसके माता-पिता के संग व्यतीत करना…

 

Sangeeta Mathur

       संगीता माथुर

अधिक शॉर्ट स्टोरीज के लिए यहाँ क्लिक करें – SHORT STORiE

कहानी- नेहरू अपार्टमेंट (Short Story- Nehru Apartment)

“अविजीत जीवित होते, तो अपनी मां का ख्याल रखते न! तो उनकी देखभाल कर मैं अविजीत का ही फर्ज़ पूरा कर रही हूं. अविजीत का बहुत साम्य था मम्मी के साथ. बात करने का, हंसने का बिल्कुल वही ढंग है. मम्मी में मैं अविजीत को ही देखती हूं और यूं उससे जुड़ा महसूस करती हूं.”

Kahani

साउथ दिल्ली में नए बने थे- नेहरू अपार्टमेंट्स. बिल्डर ने साथ-साथ के दो प्लॉट ख़रीदकर उस पर बारह फ्लैट्स बना लिए थे एकदम आधुनिक सुविधाओं से लैस. हम जब इस घर में आए, तो आस-पड़ोस बस चुका था.

बिल्डिंग में रहनेवालों का एक-दूसरे के प्रति स्नेह व अपनापन था. आवश्यकता पड़ने पर बच्चों को पड़ोसी के पास छोड़ गृहिणियां अपने ज़रूरी काम निबटा आतीं और महरी के छुट्टी लेने पर पड़ोस की बाई आकर काम कर जाती. बिल्डिंग के आगे बगीचा, गेट पर खड़ा चौकीदार, बच्चे-बड़ों सब को सुरक्षा का एहसास दिलाता. हम दोनों और हमारी डेढ़ वर्षीया बेटी रिया- यही छोटा-सा परिवार था हमारा. सोमेंद्र एक अंतर्राष्ट्रीय कंपनी में काम करते थे. रात देर से घर लौटते और अक्सर शहर से बाहर भी जाना पड़ता था.

सब परिवारों का आपसी मेल-मिलाप था, बस, ठीक हमारे ऊपर रहनेवाली मां-बेटी को छोड़कर. चूंकि वे किसी से मिलती-जुलती नहीं थीं, इसलिए लोग उनके बारे में तरह-तरह की बातें बनाते. कोई उन्हें घमंडी बताता, तो कोई नीरस. कुछ लोगों के अनुसार बेटी सुमंगला का विवाह-विच्छेद हो चुका था. हमारा फ्लैट दूसरी मंज़िल पर था और उनका तीसरी पर. सीढ़ियों पर उनके आने-जाने की आहट सुनाई पड़ जाती. मां चार बजे के आसपास लौटती और बेटी छह के बाद. एक-दो बार सीढ़ियों पर मुलाक़ात भी हुई, लेकिन विशेष बातचीत नहीं हुई. हमें इस घर में आए अभी अधिक समय नहीं हुआ था और सबसे उनके बारे में नकारात्मक सुनकर मैं बहुत उत्सुक भी नहीं थी उनसे मैत्री का हाथ बढ़ाने के लिए. अब सोचती हूं, पढ़े-लिखे होने का, सभ्य होने का दंभ भरनेवाले हम मनुष्य, बिना सच को जाने दूसरों के प्रति कितनी ग़लत धारणाएं बना लेते हैं.

रिया ने जब से चलना सीखा है, वह एक जगह टिककर बैठ ही नहीं सकती, विशेषकर शाम के समय नीचे खेलते बच्चों की आवा़ज़ सुनते ही वह नीचे जाने की ज़िद करने लगती है. उस दिन सुबह से ही मुझे तेज़ बुख़ार था और उसे नीचे ले जाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी. सामने खिलौनों का ढेर लगाकर मैंने उसका मन बहलाने की बहुत कोशिश की, पर वह नीचे जाने के लिए ज़िद किए बैठी थी. इतने में धोबी प्रेस के कप़ड़े ले आया. दरवाज़ा खोलते ही रिया सीढ़ियों की तरफ़ लपकी और नीचे जाने के लिए मचलने लगी.

मैं परेशान खड़ी थी कि क्या करूं कि सुमंगला ऊपर आती दिखी और आकर रिया को पुचकारने लगी. मुझ पर नज़र डालते ही वह समझ गई कि मेरी तबीयत ठीक नहीं है. जब उसे पता चला कि रिया नीचे जाने के लिए ज़िद कर रही है, तो वो रिया को नीचे जाकर घुमाने के लिए तैयार हो गई. उसने मुझे आश्‍वस्त किया कि वह रिया का पूरा ध्यान रखेगी. मुझे थोड़ी हिचकिचाहट तो हुई, पर और कोई रास्ता नहीं सूझ रहा था. सुमंगला बोली, “रिया के खाने-पीने का बता दो अथवा दे दो मैं ऊपर ले जाती हूं, ताकि तुम थोड़ी देर आराम कर सको.”

यह भी पढ़े7 वजहें जब एक स्त्री को दूसरी स्त्री की ज़रूरत होती है (7 Reasons When A Woman Needs Woman)

अगले दिन भी वह काम से लौटते हुए घर के यहां रुकी. सीधे दफ़्तर से आई थी, तो मैंने उससे चाय के लिए आग्रह किया. वह चाय पीने के लिए मान गई, पर इस ज़िद पर कि वही बनाएगी. ऊपर जाते समय रिया स्वयं उसके संग हो ली.

मुझे वह अच्छी लगने लगी थी. रंग सांवला ज़रूर था, लेकिन मनमोहक लगता था. छरहरी देह और लंबा क़द. लंबी-सी एक चोटी. चेहरे पर आत्मविश्‍वास के साथ एक नूर था, जो आकर्षित करता था. लेकिन जाने क्यों मुझे उसकी आंखें उदास लगीं. जब वह हंसती, तब भी आंखें जैसे उसकी हंसी में शामिल नहीं होती थीं.

मैं ठीक हो गई, तो उसने मुझे भी ऊपर चलने का निमंत्रण दिया.

रिया तो ऊपर जाकर यूं खेलने लगी जैसे उसका अपना ही घर हो. भीतर से खिलौने उठा लाई, जो सुमंगला ने उसके लिए ला रखे थे. सुमंगला की मम्मी चाय बना लाईं, साथ में घर की बनी नमकीन भी थी. सुमंगला ने बताया कि उसकी मम्मी एक समाजसेवी संस्था के साथ जुड़ी हुई हैं, जो झुग्गी-झोपड़ी में रहनेवाली विधवाओं की देखभाल करती है. मैने ऐसी संस्था के बारे में पहली बार सुना था. अतः उसी के बारे में चर्चा होने लगी.

चाय पीते हुए मेरी नज़र दीवार पर लगी एक बड़ी-सी फोटो पर पड़ी. पायलट की वर्दी में 25-26 साल के एक ख़ूबसूरत नौजवान की तस्वीर पर फूल-माला चढ़ी हुई थी. सुमंगला ने मेरी नज़र देख ली थी, पर वह ख़ामोश रही और मैं भी पहली ही मुलाक़ात में उनका दर्द नहीं कुरेदना चाहती थी.

सुमंगला को रिया से मोह-सा हो गया था. काम से लौटते हुए वह ज़रूर थोड़ी देर रुककर ही ऊपर जाती. बच्चे भी प्यार की भाषा ख़ूब समझते हैं. रिया उसका इंतज़ार करती और उसे देखकर ख़ुश होती. मैं जब भी सुमंगला को रिया के संग खेलते देखती, उसके चेहरे पर छलकते स्नेह को देखती, तो यह जानने की उत्कंठा होती कि उसका तलाक़ हो चुका है अथवा उसने विवाह नहीं किया? चालीस की उम्र तो पार कर चुकी होगी. शादी हुई होती, तो आज उसका अपना परिवार और बच्चे होते. ऐसा भी नहीं लगता था कि उसके लिए अपना करियर इतना महत्वपूर्ण रहा हो कि वह शादी और बच्चों के झमेले में नहीं पड़ना चाहती हो. मेरी जब उससे अच्छी मैत्री हो गई और एक दिन जब रिया उसकी गोदी में सो गई, तो मैंने उससे पूछ ही लिया.

“ज़िंदगी के सब सपने तो पूरे नहीं होते न वसुधा! बस सपनों के टूट जाने पर व्यक्ति स्वयं न टूटे इतनी शक्ति होनी चाहिए.” कहकर वह थोड़ी देर को चुप हो गई.

“एक फौजी पिता के बेटे थे अविजीत. अभी वे स्कूल में ही थे कि उनके पिता कश्मीर में एक आतंकवादी की गोली का शिकार हो गए. मैं और मेरा भाई भी उसी स्कूल में थे. मेरा भाई अविजीत के संग था और मैं उनसे दो वर्ष जूनियर. यूं हम एक-दूसरे को जानने लगे. दोस्ती हुई, जो धीरे-धीरे प्यार में बदलती गई. मेरे पैरेंट्स जानते थे यह बात और अविजीत की मम्मी भी. हम भिन्न प्रांतों से थे, भिन्न भाषी, पर उनमें से किसी को भी इस बात से आपत्ति नहीं थी. अविजीत का सपना एयरफोर्स में पायलट बनने का था, जो उन्होंने पूरा किया. विवाह की जल्दी नहीं थी. मैं अपनी पढ़ाई पूरी कर लेना चाहती थी और अविजीत भी अपने जॉब में सेटल हो जाना चाहते थे. भैया पढ़ाई के लिए कुछ वर्षों के लिए विदेश जा रहे थे. घर के बड़ों ने सोचा उनके जाने से पहले सगाई कर दी जाए.

अविजीत का विभिन्न जगहों पर आना-जाना लगा ही रहता था, पर टेलिफोन, ईमेल ने तो सब दूरियां ख़त्म कर दी थीं, सो आपसी संपर्क बना ही रहता. लेकिन एक दिन वह सारे संपर्क सूत्र तोड़ गया सदा के लिए, बस सूचना भर मिली. लाश भी बरामद नहीं हो पाई. दुश्मन के क्षेत्र में हुआ था हादसा. आज भी वह ख़बर झूठी लगती है. आज भी लगता है लौट आएंगे वे एक दिन. बुद्धि जानती है कि यह झूठा दिलासा है, पर मन नहीं सुनता उसकी बात.”

कहते-कहते वह फिर ख़ामोश हो गई. मैं भी क्या बोलती?

वह शाम के समय अक्सर आ जाती, पर इस बात का ज़िक्र हमारे बीच दोबारा नहीं छिड़ा. वह रिया से खेल रही होती, तो प्रसन्न होती और मैं वह बात छेड़कर उसका मूड बिगाड़ना नहीं चाहती थी. आज के युग में भी कोई इतना अटूट प्यार कर सकता है, मैं तो इसी बात पर अभिभूत थी. विवाह नहीं हुआ था तो क्या! उसने अपने प्यार की याद से ही वफ़ादारी निभाई थी.

एक दिन सुमंगला ने बताया कि मम्मी के पैर में मोच आ गई है और डॉक्टर ने उन्हें कुछ दिनों के लिए चलने-फिरने को मना किया है, इसलिए वह आजकल घर पर रहती हैं और उनकी देखभाल के लिए कामवाली बाई दिनभर को रुक जाती है. दूसरे दिन सुबह का काम समाप्त कर मैं और रिया उन्हें देखने ऊपर चले गए. वह आरामकुर्सी पर बैठीं कोई पुस्तक पढ़ रही थीं. कुर्सी पर बैठी भी वह चुस्त और स्मार्ट लग रही थीं. गोरा खिला रंग और तीखे नैन-नक्श. हमें देखकर वह बहुत ख़ुश हुईं, “मेरा कुछ समय अच्छा बीत जाएगा.” वे बहुत ख़ुशमिज़ाज और बातूनी थीं. मुझे भी उनसे बात करके अच्छा लगा, सो जब तक उन्हें आराम बताया गया, मैं और रिया सुबह के समय उन्हीं के पास जा बैठते.

दीवार पर लगी तस्वीर पर अक्सर निगाह पड़ जाती. एक दिन मज़ाक के मूड में मैंने उनसे कह ही दिया, “आपकी बेटी की शक्ल आपसे उतनी नहीं मिलती, जितनी उसके मंगेतर से.”

सहसा जैसे उनके चेहरे से किसी ने हंसी पोंछ दी हो. कुछ क्षण रुककर बोलीं, “यह मेरे बेटे की तस्वीर है, न कि होनेवाले दामाद की.”

“और सुमंगला…?”

“उसकी मंगेतर थी.”

“मतलब! सुमंगला आपकी बेटी नहीं है?”

यह भी पढ़ेज़िंदगी रुकती नहीं (Life Doesn’t Stop And Neither Should You)

“मैं तो भूल ही चुकी हूं इस बात को. कितना तो ख्याल रखती है मेरा. मुझे अकेली कहीं नहीं जाने देती. ज़बरदस्ती एक टैक्सी लगा रखी है, जो सुबह दस बजे ले जाती है और चार बजे छोड़ जाती है. अपनी मां को तो वह ‘आई’ कहकर बुलाती थी. मराठी में ‘आई’ ही कहते हैं मां को. सगाई हो जाने के बाद मुझसे मिलने आया करती थी. कुछ दिन न आती, तो मैं ही बुलवा भेजती. इन दोनों के सिवा मेरा था ही कौन? तभी से ‘मम्मी’ कहने लगी है मुझे.

मैंने तो एक लंबी उम्र अकेले ही काटी है. अविजीत के पापा जीवित थे, तो बहुत व्यस्त रहा जीवन. किन्तु अविजीत अभी छोटा ही था कि वे कश्मीर में आतंकवादियों द्वारा मारे गए. पर तब हिम्मत थी, अविजीत को पालने का एक बड़ा मक़सद था सामने. उम्मीदें ज़िंदा थीं. नौकरी करने की ज़रूरत तो नहीं पड़ी, अच्छी पेंशन मिलती थी, सो मैंने अपना सारा समय समाज सेवा में लगा दिया. परंतु अविजीत के जाने के बाद से बुरी तरह टूट गई मैं. यदि सुमंगला ने सहारा न दिया होता तो…

इस हादसे के बाद उसके अपने पिता को दिल का ज़बरदस्त दौरा पड़ा. अस्पताल की भागदौड़, ऑपरेशन, इन सबके बीच वह मेरा हालचाल लेती रही. सुमंगला का भाई आया था पिता के ऑपरेशन के समय, पर वह कितने दिन रुक सकता था? सुमंगला ने ही संभाला सब… घर भी इतना पास नहीं था और वह ख़ुद भी बुरी तरह से टूट चुकी थी… पर अपना दर्द भूल हम तीन प्राणियों को संभालती रही. वह दिन याद करती हूं, तो ऐसा लगता है जैसे कोई ज़बरदस्त झंझावत ही आया था हमारे जीवन में, जो बहुत कुछ उड़ा कर ले गया अपने साथ. दो वर्ष तक भागदौड़ की, परंतु अपने पापा को न बचा सकी सुमंगला… शायद हम स्त्रियां अपना जो दर्द आंसुओं में बहा देती हैं, पुरुष उसे पी जाते हैं और तभी सहन नहीं कर पाते. आख़िर चोट तो उन्हें भी लगती ही है.

वह मुझे अकेली नहीं छोड़ना चाहती थी. बहुत दिनों से ज़ोर डाल रही थी कि मैं चलकर उनके ही संग रहूं. उधर उसकी मां अकेली पड़ गई थी और इधर मैं. उसकी परेशानी देखकर मैंने वहीं चलकर रहने की हामी भर दी. हम तीनों प्राणी एक साथ रहने लगे. एक-दूसरे को ढांढ़स बंधाते. हमारी ओर से निश्‍चिंत हो सुमंगला ने नौकरी करनी शुरू की. उसकी आई और मैंने बहुत कोशिश की कि वह विवाह करने को राज़ी हो जाए. अच्छी जगह रिश्ता हो सकता था, पर वह नहीं मानी. हमने सोचा नौकरी करेगी, तो स्वयं कोई पसंद आ जाएगा, पर उसने तो जैसे अपने दिल में प्यार के सभी दरवाज़े मज़बूती से बंद कर दिए थे.

लगभग दस वर्ष हम एक साथ रहे, फिर सुमंगला की मां को भी कैंसर हो गया. ऑपरेशन व कीमो थेरेपी सब कुछ करवाया, पर एक तो उम्र, फिर निराशाएं ले ही गईं उन्हें. बहुत मुश्किल हो गया था, इतनी सारी पुरानी यादों के बीच जीना. सुमंगला ने अपना तबादला यहां करवा लिया. मेरे लिए तो जहां रहूं काम है. दूसरों के दुख में हाथ बंटा, उनकी सहायता कर, अपना दुख कम लगने लगता है.” और सुमंगला का नज़रिया सुन तो मैं दंग ही रह गई.

एक दिन जब मैंने उसके त्याग की चर्चा की तो वह बोली, “अविजीत जीवित होते, तो अपनी मां का ख्याल रखते न! तो उनकी देखभाल कर मैं अविजीत का ही फर्ज़ पूरा कर रही हूं. अविजीत का बहुत साम्य था मम्मी के साथ. बात करने का, हंसने का बिल्कुल वही ढंग है. मम्मी में मैं अविजीत को ही देखती हूं और यूं उससे जुड़ा महसूस करती हूं. इन सबने बहुत चाहा कि मैं कहीं और विवाह कर लूं, परंतु अविजीत तो मेरे रोम-रोम में बसे हुए हैं. उन्हें स्वयं से अलग करना संभव है क्या?” सुमंगला के प्यार और समर्पण की भावना को देख मेरी आंखें नम हो गईं.

प्यार जब दैहिक और सांसारिक आवश्यकताओं से ऊपर उठ जाता है, तो उसमें कोई अलौकिक तत्व आ जाता है शायद.

usha vadhava

       उषा वधवा

अधिक शॉर्ट स्टोरीज के लिए यहाँ क्लिक करें – SHORT STORiES

कहानी- गति ही जीवन है (Short Story- Gati Hi Jeevan Hai)

यह भागदौड़ उस सन्नाटे से अच्छी है, जो कई बार डरा देता है. पर जीवन की गति अनवरत चलती रहे, तो ही सब सहज व सुगमता से चल पाता है. विराम कुछ पल के लिए तो ठीक है, पर उसके बाद वह खालीपन और निरर्थकता का बोध कराने लगता है. बिज़ी लाइफ तो जीवन का ही एक हिस्सा है, जिससे एक चहल-पहल बनी रहती है. गति ही जीवन है डियर. व्यस्तता में ही ख़ुशी है.

Kahani

उ़फ् कैसा समा था… धूप की किरणें या कहें रोशनी के छोटे-छोटे क़तरे बादलों की कोख से धीरे-धीरे झांक रहे थे. आसमान के विस्तृत फलक पर छितरी स़फेद बादलों की लंबी कतारें, दूर-दूर तक छिटकी हुईं. कहीं-कहीं बादलों की दरारों से झांकता नीला आसमान नज़र आ जाता. कहीं बादलों का एक आसमान-सा झुंड लगता सामने आ जाता, मानो वह आसमान की सैर करने निकला हो.

दूर पहाड़ों की चोटियों पर पड़ती सूरज की रोशनी… पहाड़ों  की परतों की तरह लग रही थी और एक अद्भुत दृश्य प्रस्तुत कर रही थी. एक पहाड़ को पार करता दूसरा पहाड़, एक चोटी दूसरी चोटी को लांघती… सर्पीली चोटियां… ऊबड़-खाबड़… फिर भी ग़ज़ब का समन्वय और संतुलन. पहाड़ों पर लगे पेड़ों की लंबी-लंबी कतारें… रिसॉर्ट की बालकनी पर खड़ी अमला जब इस नज़ारे को निहार रही थी, तो उसे लगा कि जैसे बैगपाइपर बांसुरी बजाता चल रहा है और उसके पीछे-पीछे असंख्य बच्चे या फिर संगीत की कोई धुन… आरोह-अवरोह… उठती-गिरती लय… प्रकृति कितनी दक्ष है, संतुलन बनाना जानती है… लेकिन तभी तक, जब तक इंसान के क्रूर हाथ उस तक न पहुंचें. फिर तो उसकी सुंदरता नैसर्गिक न रहकर, कृत्रिम बन जाती है.

बड़े शहरों में हम पत्थरों को पैरों की ठोकरें मारते रहते हैं और पहाड़ों पर यही पत्थर, बड़ी-बड़ी चट्टानें किसी तिलिस्म से कम नहीं लगती हैं. न कोई आकार, न कोई स्थल का चुनाव, फिर भी यही बड़े-छोटे पत्थर आकर्षित करते हैं. इन्हें छूने, इनके पास बैठने का मन होता है. पहाड़ों से उतरते कटावदार, सीढ़ीनुमा आकार और उनके बीच-बीच में बने घर, झोपड़ीनुमा… कहीं कोई बस्ती नहीं, घर भी यहां बहुत दूर-दूर बने होते हैं. जैसे-जैसे सूरज की किरणें बादलों की कोख से बाहर निकल रही थीं, उजाला बढ़ता जा रहा था और उसके मन की प्रफुल्लता भी. एक उजास-सा मन-प्राण को घेर रहा था.

बालकनी से उठ वह अंदर आ गई. बेड पर यूं ही लेट गई. तीन दिन हो गए थे उसे नारकंडा आए. हिमाचल में स्थित यह स्थान एकदम शांत था. कभी-कभी तो लगता कि हर तरफ़ सन्नाटा ही सन्नाटा पसरा हुआ है. असल में वह ख़ुद ऐसी ही जगह आना चाहती थी, जहां न तो शोर-शराबा हो और न ही कोई डिस्टर्ब करनेवाला. थक गई थी, अपनी रूटीन लाइफ से. ऑफिस में काम करने की तो कोई सीमा ही नहीं थी. एक प्रोजेक्ट ख़त्म होता, तो दूसरा शुरू हो जाता. इतनी बिज़ी लाइफ कि कभी-कभी तो लगता था कि घर केवल सराय मात्र है. जाओ सो जाओ, उठो ऑफिस पहुंच जाओ, न खाने का ठिकाना, न रिलैक्स करने का अवसर. बस, काम ही करते रहो.

बहुत दिनों से उसे लग रहा था कि उसे कहीं बाहर जाना चाहिए. एक लंबी छुट्टी पर… कितनी बार वह अपनी कलीग सौम्या से कह चुकी थी कि चलो कहीं चलते हैं, पर निकलना ही नहीं हो पाता था. वैसे भी छुट्टी मांगना भी किसी जोखिम से कम न था. बड़ी मुश्किल से एक दिन बॉस से लड़-झगड़कर उसने दस दिनों की छुट्टी ली और ख़ुद ही निकल पड़ी सुकून पाने के लिए.

यह भी पढ़ेसर्वगुण संपन्न बनने में खो न दें ज़िंदगी का सुकून (How Multitasking Affects Your Happiness)

“कुछ काम होगा, तो कॉन्टैक्ट करूंगी, तू वहीं से मुझे प्रोजेक्ट में हेल्प कर देना अमला.” सौम्या ने जब उससे कहा, तो उसने तुरंत मना कर दिया. “देख, मैं वहां रिलैक्स करने जा रही हूं, इसलिए कोई काम मत पूछना प्लीज़. मैं ऑफिस का कोई फोन नहीं उठाऊंगी. अरे बाबा, वहां तो चैन से रहने देना मुझे. सारा दिन सोनेवाली हूं मैं. इसलिए रिसॉर्ट बुक किया है. अच्छी बात तो यह है कि इस समय वहां भीड़ भी नहीं होती. इस समय रिसॉर्ट एकदम खाली है. वैसे तुझे बता दूं कि मैं अपने साथ लैपटॉप भी लेकर नहीं जा रही हूं और प्लीज़ यह बात बॉस को मत बताना, वरना वह मेरी छुट्टी कैंसल कर देंगी.”

बस दो दिन से वह आराम ही कर रही थी. कहीं बाहर निकली भी नहीं थी. दरवाज़े पर खटखट हुई, तो वह उठी.

“मैडम, लंच लाया हूं.” वेटर था. खाना खाते-खाते वह टीवी खोलकर बैठ गई. चैनल ही पलटने में व़क्त निकल गया. सब जगह बकवास ही आ रहा था. वैसे भी उसे टीवी देखने की आदत नहीं थी. असल में टाइम ही नहीं मिलता था. कुछ देर नॉवेल पढ़ा, तो नींद आ गई. मोबाइल की घंटी से नींद टूटी. सौम्या थी.                                                                                                                      “तेरा चिलिंग पीरियड ख़त्म हो गया हो, तो वापस आ जा यार, नहीं हैंडल कर पा रही हूं अकेले. बॉस भी बड़बड़ कर रही है.” सौम्या अपनी आदत के अनुसार बिना किसी औपचारिकता के बोली. “इडियट, यह तो पूछ मैं कैसी हूं, क्या कर रही हूं. बस, शुरू हो गई.”

“ठीक ही होगी, बता कब वापस आ रही है. तीन दिन बहुत होते हैं. अब आ जा. तत्काल में टिकट बुक करा देती हूं.”

“चुप रह, मैं नहीं आ रही. फोन रख और मुझे आराम करने दे.”

सौम्या की याद तो उसे भी बहुत आ रही थी, लेकिन अभी भी वह कुछ करने के मूड में नहीं थी. फिर क्यों उसका मन कर रहा है कि कुछ तो होना चाहिए… कुछ तो करने को होता. फोन पर भी किससे, कितनी बातें करें. क्या मुसीबत है, अख़बार भी नहीं आता यहां. उसे थोड़ी कुढ़न हुई. रिसॉर्ट भी खाली है, कोई टूरिस्ट होता, तो उनसे ही गप्पे मार लेती. पांच बजे से ही इतना अंधेरा हो जाता है यहां कि अब कहीं बाहर भी घूमने नहीं जाया जा सकता है. कितना बोरिंग है… उसे अपने आप पर ही खीझ हुई. दस दिन वह कैसे काटेगी. अचानक उसे लगा कि इतने रिलैक्सेशन के बावजूद कहीं कुछ मिसिंग है. आख़िर सोए भी तो कितना… वैसे भी थकान उतर

चुकी थी और चूंकि कभी इतने खाली रहने की आदत नहीं थी, इसलिए नींद भी आंख-मिचौली करने लगी थी. लैपटॉप ही ले आती, प्रोजेक्ट का कुछ काम ही कर लेती… अब बस भी करो अमला, काम के बारे में नहीं सोचो… तुम यहां रिलैक्स करने आई हो, उसने ख़ुद को समझाया.

एक अकुलाहट-सी होने लगी… ऐसी बैचेनी उसने पहले कभी महसूस न की थी. न कंप्यूटर, न इंटरनेट, न अख़बार, उ़फ् कैसी तो अजीब-सी फीलिंग हो रही है. भागदौड़, चुनौतीपूर्ण प्रोजेक्ट, डेडलाइन पर काम पूरा करने की हड़बड़ी, सब उसे अपनी ओर खींचने लगे. सौम्या के साथ काम को लेकर होनेवाली लड़ाई, बॉस के साथ बहस और ऑफिस गॉसिप वह मिस करने लगी. यहां तक कि काम को लेकर हर समय होनेवाली चिड़चिड़ाहट भी उसे याद आने लगी.                                                                                               अगले दिन वह सुबह-सुबह ही आसपास की जगह देखने चली गई. फिर वहां के एक निवासी ने बताया कि वह ‘हातू पीक’ देखने अवश्य जाए, जो नारकंडा में सबसे ऊंचाई पर स्थित एक जगह है और जहां ‘हातू माता’ का मंदिर है. टैक्सी लेकर वह वहां चल दी.

ठंड ने कोहरे की चादर बिछा रखी थी. मन खिल उठा अमला का वहां पहुंचकर. वहां से हिमालय की चोटियां नज़र आ रही थीं. थोड़ी दूर बने ‘भीम के चूल्हे’ को देख तो वह और ख़ुश हो गई. पांडव अज्ञातवास के दौरान वहां खाना बनाया करते थे. उसने तुरंत सौम्या को फोन किया, “जानती है तू क्या मिस कर रही है? यार, क्या प्राकृतिक नज़ारा है. क्या मौसम है यहां का. अभी भी आ जा तू यहां. दोनों एंजॉय करेंगे. इसके बाद मैं ‘महामाया मंदिर’ और ‘तनी जुब्बार लेक’ देखने जा रही हूं. ढेर सारी फोटो खींची हैं मैंने.”

“यार, वापस आ जा, यहीं एंजॉय कर लेंगे. कितने दिन हो गए पार्टी में गए.” सौम्या शायद आगे कुछ और कहना चाह रही थी, पर उसकी बात काटते हुए अमला ने अपनी बात पूरी कर दी, “रहने दे यार, अभी तो और घूमनेवाली हूं मैं यहां.” अमला बहुत ही एक्साइटेड थी. अगला दिन भी उसने आउटिंग में बिता दिया और अब देखने को कुछ नहीं बचा था, सिवाय नेचर वॉच के. धीरे-धीरे उस खालीपन और रिक्तता में उसे डिप्रेशन होने लगा. बिना कुछ काम के एक भारीपन उसे घेरने लगा, तमाम प्राकृतिक सुंदरता और स्वच्छ मौसम के बावजूद. आख़िर क्यों…? वह तो ख़ुद अपनी मर्ज़ी से आई थी.                                                                                                “यार सौम्या, तू मेरा तत्काल में टिकट बुक करा दे, मैं वापस आ रही हूं.” अमला की परेशानी महसूस करते हुए सौम्या ने पूछा, “सब ठीक तो है ना? क्या हुआ? तुझे कोई मदद चाहिए?”

यह भी पढ़ेक्या है आपकी ख़ुशी का पासवर्ड? (Art Of Living: How To Find Happiness?)

“आकर बताती हूं.” वापस पहुंचकर अमला सीधे ऑफिस गई और बाकी की छुट्टियां कैंसल करा लीं. कॉफी की चुस्कियां लेते हुए वह बोली, “पता है सौम्या, हम व्यस्त ज़िंदगी के इतने आदी हो जाते हैं कि सुकून के पल भी खलते हैं हमें. भागदौड़भरी ज़िंदगी से भागकर वहां गई थी कि कुछ दिन चैन से गुज़ारूंगी, पर दो-तीन दिन बाद ही लगने लगा कि करूं तो क्या करूं… कुछ भी तो नहीं यहां करने को, आख़िर बादलों को, पहाड़ों को, फूलों को और चारों ओर फैली हरियाली को कितना निहार सकते हैं. खाली बैठने की आदत या कहें यूं ही निरर्थक बैठे रहने की आदत कहां रही है अब.”

“तू कुछ ज़्यादा ही सेंटी नहीं हो रही है?” सौम्या ने उसके हाथ पर अपना हाथ रखते हुए कहा.

“थोड़ा सुकून तो सभी को चाहिए लाइफ में. अच्छा हुआ जो तू चली गई. थोड़ा बदलाव तो महसूस हुआ. अब और फुर्ती से काम करेगी. इस बार का प्रोजेक्ट है भी बहुत चैलेंजिंग.”

“तू ठीक कह रही है, पर सच तो यह है कि यह भागदौड़ उस सन्नाटे से अच्छी है, जो कई बार डरा देता है. पर जीवन की गति अनवरत चलती रहे, तो ही सब सहज व सुगमता से चल पाता है. विराम कुछ पल के लिए तो ठीक है, पर उसके बाद वह खालीपन और निरर्थकता का बोध कराने लगता है. बिज़ी लाइफ तो जीवन का ही एक हिस्सा है, जिससे एक चहल-पहल बनी रहती है. गति ही जीवन है डियर. व्यस्तता में ही ख़ुशी है.”

सौम्या के चेहरे पर एक मुस्कान छा गई थी. ऑफिस के चिर-परिचित माहौल में पहुंच अमला को लगा कि चाहे काम के दौरान वह कितनी ही टेंशन में क्यों न रहती हो, चाहे थकान कितनी ही क्यों न हो, लेकिन काम पूरा हो जाने के बाद जो संतुष्टि मिलती थी, उसके सामने तो बाकी सब बातें व्यर्थ ही लगती हैं.

suman bajapaye

     सुमन बाजपेयी

अधिक शॉर्ट स्टोरीज के लिए यहाँ क्लिक करें – SHORT STORiES

कहानी- सुनहरा अध्याय (Short Story- Sunhara Adhyay)

“पागल मत बनो काव्या. वह अध्याय कब का समाप्त हो चुका है. मुझे और नलिन को अलग रहते कितने बरस बीत चुके हैं. मैं अपने एकांतवास से ख़ुश हूं.”

“नहीं मम्मी, आपने ख़ुद स्वीकारा है कि गृहस्थी एक लड़की की ज़िंदगी में कितना मायने रखती है. जिस तरह आपको यह एहसास हो रहा है कि आप मेरी ज़िंदगी में पापा की कमी पूरी नहीं कर सकीं, मुझे भी यह एहसास हो रहा है कि मैं आपकी ज़िंदगी की यह कमी पूरी नहीं कर सकी.”

Kahaniya

काव्या को लेकर प्रमिलाजी की चिंता अब वाकई बहुत ज़्यादा बढ़ गई थी. आख़िर यह लड़की अपनी ज़िंदगी की क़िताब में यह सुनहरा अध्याय क्यों नहीं जोड़ना चाहती? जवानी की दहलीज़ को छूती लड़कियों के मां-बाप की रातों की नींद उड़ जाती है, यह सोचकर कि कहीं हमारी लड़की कोई अनुचित क़दम न उठा ले? कहीं वह कोई विजातीय या ऐसा-वैसा लड़का न पसंद कर ले? लेकिन यहां तो मामला ही उल्टा है. प्रमिलाजी चाहती हैं कि काव्या के जीवन में कोई आए, जिसे लेकर उसके दिल में लड्डू फूटने लगें और वह अपनी बेटी की हंसी-ख़ुशी डोली सजाकर उसे विदा कर अपनी ज़िम्मेदारी से मुक्त हों. लेकिन जीवन के पच्चीसवें बसंत में भी फूलों से लदी डालियां, हिलोरें लेता सागर, मदमाती हवा, लड़कों की सीटियां आदि बातें काव्या के लिए कोई मायने नहीं रखती थीं. हद तो तब हो गई जब उसने प्रमिलाजी द्वारा लाए रिश्तों को देखने-सुनने से भी इंकार कर दिया. प्रमिलाजी का पारा उस दिन फट ही पड़ा.

“तुम आख़िर चाहती क्या हो? अरे, लड़कियां इस दिन के लिए लालायित रहती हैं. क्यूं तुम अपनी ज़िंदगी का यह सुनहरा अध्याय आरंभ नहीं करना चाहती?”

“मम्मी, क्या सचमुच शादी एक लड़की की ज़िंदगी का सुनहरा अध्याय होता है?”

“हां, बिल्कुल. विवाह करके, मां बनकर ही एक स्त्री का जीवन पूर्ण होता है. एक पुरुष का संग उसके जीवन में ख़ुशियों के सतरंगी इंद्रधनुष खिला देता है. ज़िंदगी बेहद ख़ूबसूरत और अर्थपूर्ण नज़र आने लगती है. एक बार इस अध्याय के पृष्ठ उलटकर तो देखो!”

“आपने भी तो कभी इस अध्याय के पृष्ठ उल्टे थे मम्मी… क्या हुआ?” काव्या का दबा-सा स्वर उभरा तो प्रमिलाजी मानो आसमान से गिर पड़ीं.

‘मेरी बेटी ने मेरी ही ज़िंदगी को आधार बनाकर शादी के बारे में कितने पूर्वाग्रह पाल रखे हैं और मैं नासमझ-सी उससे सवाल-जवाब कर रही हूं.’ सोचकर प्रमिलाजी का सिर चकराने लगा. पर फिर तुरंत ही उन्होंने अपने आपको संभाला.

“मेरी ज़िंदगी का क़िस्सा अलग था बेटी. तुम उसे अपनी ज़िंदगी से क्यों जोड़ रही हो? जो मेरे साथ हुआ, ज़रूरी नहीं कि तुम्हारे साथ भी वही हो. सारे पुरुष एक जैसे नहीं होते बेटी.” प्रमिलाजी ने बेटी को समझाने का प्रयास किया.

“तो फिर आपने हमेशा दूसरी शादी से इंकार क्यों किया? सारे पुरुष एक से तो नहीं होते?” काव्या भी आज पूरे तर्क-वितर्क पर उतर आई थी.

“काव्या!” प्रमिलाजी का स्वर न चाहते हुए भी थोड़ा तीखा और कटु हो गया था. “यहां बात तुम्हारी शादी की चल रही है. मेरी शादी, मेरे अतीत को इसमें मत घसीटो.”

यह भी पढ़ेबॉडी पर भी दिखते हैं ब्रेकअप के साइड इफेक्ट्स (How Your Body Reacts To A Breakup?)

“मम्मी, कैसी बातें कर रही हैं आप? भला मुझे, आपकी बेटी को आपकी ज़िंदगी से सरोकार नहीं होगा तो और किसे होगा? मां-बाप तो संतान के रोल मॉडल होते हैं. मैंने जब भी आपके वैवाहिक अतीत को टटोलना चाहा, आपने यह कहकर मेरा मुंह बंद कर दिया कि आम कामकाजी दंपतियों की भांति आपके अहम् टकराए और अलगाव हो गया. दोनों ने स्वेच्छा से अलग-अलग रहना मंज़ूर कर लिया. तलाक़ जैसी औपचारिक क़ानूनी प्रक्रिया में उलझना भी आपने आवश्यक नहीं समझा. कल को मेरी ज़िंदगी में भी यही मोड़ आए, इससे पूर्व ही मैं इस राह से किनारा कर लेना चाहती हूं.” एक दुखभरी सांस के साथ काव्या ने अपनी बात समाप्त की. उसे अफ़सोस था कि उसने गड़े मुर्दे उखाड़कर मम्मी के दिल को चोट पहुंचाई. लेकिन संतोष था कि आख़िर वह अपने दिल की समस्त उलझनें, समस्त शंकाएं मम्मी के सम्मुख रखने में क़ामयाब हो ही गई.

बरसों से मन में उमड़ते-घुमड़ते आशंका, संदेह, आक्रोश के बादल अंततः बरस ही गए और पीछे छोड़ गए एक नीर ख़ामोशी. प्रमिलाजी अपने कमरे में चली गईं. दो दिनों तक दोनों के बीच मौन पसरा रहा. सिवाय औपचारिक वार्तालाप के दोनों के बीच कोई बात नहीं हुई. प्रमिलाजी गहरी सोच में थीं. इतना उन्हें स्पष्ट हो गया था कि काव्या जब तक विवाह संबंधी पूर्वाग्रहों से मुक्त नहीं होगी, गृहस्थ जीवन में प्रवेश नहीं करेगी. उसका घर कभी नहीं बस पाएगा. अकेलेपन की जिस त्रासदी को वे भोग रही हैं, काव्या भी… नहीं-नहीं! सोचकर ही प्रमिलाजी का कलेजा मुंह को आने लगा. तीसरे दिन ही उन्होंने बेटी से संवाद का सूत्र जोड़ दिया.

“काव्या, मैं समझती थी कि मैंने तुम्हारी ज़िंदगी में मां-बाप दोनों की कमी पूरी कर दी. लेकिन यह मेरी ख़ुशफ़हमी थी. एक टूटा हुआ परिवार संतान के लिए कभी भी ख़ुशी का सबब नहीं बन सकता. तुम्हारा घर बस सके, इसके लिए मुझे अपनी कमज़ोरियां स्वीकार करने में भी कोई गुरेज़ नहीं है. हां, आज मैं स्वीकार करती हूं कि यदि उस व़क़्त मैंने समझौते की दिशा में एक क़दम भी बढ़ाया होता, तो नलिन दो क़दम बढ़ाने में कोई कोताही नहीं करते और मैं तुम्हें यह भी बता देना चाहती हूं कि यदि नलिन ने एक क़दम बढ़ाया होता तो मुझे चार क़दम बढ़ाकर उस बढ़ती दूरी को पाटने में तनिक भी संकोच नहीं होता. लेकिन अहम् का मुद्दा तो यही एक क़दम बनकर रह गया. मैं दावे के साथ कह सकती हूं कि आज भी अधिकांश टूटते परिवारों की एकमात्र वजह यही पहले क़दम का ईगो है. तुम यदि इस ईगो को दरकिनार कर सकी, तो तुम्हारी गृहस्थी कभी नहीं टूट पाएगी. अब देखो, अपने ईगो को दरकिनार रखते हुए मैंने अपने अतीत की भूल स्वीकार कर ली है. अब तो तुम शादी के लिए तैयार हो ना?” प्रमिलाजी की आशा भरी नज़रें काव्या की ओर उठीं और देर तक वहीं टिकी रहीं, क्योंकि काव्या गहरी सोच में डूब गई थी. काफ़ी देर सोच-विचार के बाद काव्या के होंठ हिले.

“मम्मी, क्या यही स्वीकारोक्ति तुम पापा के सम्मुख भी दोहरा सकती हो?” काव्या का स्वर शांत और संयत था. फिर भी प्रमिलाजी चिल्ला उठीं.

“काव्या!”

“हां मम्मी, क्या तुम पापा के सामने अपनी ग़लती मान सकती हो?”

“मैंने कोई ग़लती नहीं की.” प्रमिलाजी की गर्दन एकदम तन गई थी और वाणी में कठोरता का पुट आ गया था. “मैं तुम्हें स़िर्फ टूटते परिवारों की मिसाल दे रही थी और यह बता रही थी कि यदि दोनों में से एक भी पक्ष अपने ईगो को कुछ देर के लिए नज़रअंदाज़ कर समझौते की दिशा में एक क़दम भी उठाए तो दूसरा पक्ष चार क़दम बढ़ाकर उसका स्वागत करेगा, क्योंकि अधिकांश मामलों में ही दोनों पक्ष अलग नहीं होना चाहते.”

“मैं भी यही कह रही हूं मम्मी. आप और पापा भी अलग होना नहीं चाहते थे. बस, किसी एक के झुकने का इंतज़ार कर रहे थे और शायद आज भी कर रहे हैं.”

“पागल मत बनो काव्या. वह अध्याय कब का समाप्त हो चुका है. मुझे और नलिन को अलग रहते कितने बरस बीत चुके हैं. मैं अपने एकांतवास से ख़ुश हूं.”

यह भी पढ़ेशादीशुदा ज़िंदगी में बढ़ता अकेलापन…! (Why Do People Feel Lonely In Their Marriage?)

“नहीं मम्मी, आपने ख़ुद स्वीकारा है कि गृहस्थी एक लड़की की ज़िंदगी में कितना मायने रखती है. जिस तरह आपको यह एहसास हो रहा है कि आप मेरी ज़िंदगी में पापा की कमी पूरी नहीं कर सकीं, मुझे भी यह एहसास हो रहा है कि मैं आपकी ज़िंदगी की यह कमी पूरी नहीं कर सकी.” काव्या भावुक होने लगी तो प्रमिलाजी ने मोर्चा संभाल लिया.

“हम मुद्दे से भटक रहे हैं काव्या. हम तुम्हारी शादी की बात कर रहे थे और मैंने तुम्हें विश्‍वास दिला दिया है कि यह ज़िंदगी का बेहद ख़ूबसूरत मोड़ है, जहां संयम और धैर्य बनाए रखने की ज़रूरत है. केवल समझौतावादी प्रवृत्ति से इस मोड़ के ख़ूबसूरत नज़ारों का आनंद लिया जा सकता है.”

“और समझौते का यह प्रयास कभी भी, कहीं भी किया जा सकता है, है ना मम्मी?”

“तुम ज़िद पर उतर आई हो काव्या… मुझे नलिन से मिले बरसों बीत गए हैं. मेरे पास उनका कोई अता-पता नहीं है.”

“पापा कोलकाता में हैं.” प्रमिलाजी को लगा उनके आसपास मानो सैकड़ों बम फट गए हैं.

“तुम्हें अपने पापा का पता मालूम है? मतलब… मतलब तुम उनसे मिलती रही हो? इतना बड़ा धोखा, इतना बड़ा झूठ! मैं तुम्हें अपनी ज़िंदगी, अपना सब कुछ मानकर संतोष करती रही. तुम्हारा घर बसाने के लिए अपने बरसों से पाले अहम् के टुकड़े-टुकड़े कर डाले और तुम…?”

“नहीं मम्मी! आप ग़लत समझ रही हैं. मैं कभी पापा से नहीं मिली. बस इधर-उधर पूछताछ और पत्र-व्यवहार, फ़ोन आदि के बाद बड़ी मुश्किल से उनका पता जुटा पाई हूं. सेवानिवृत्ति के बाद अब नितांत एकाकी जीवन व्यतीत कर रहे हैं पापा. दरअसल, शादी को लेकर मैं इतने पूर्वाग्रहों से ग्रस्त थी कि एक बार उनसे मिलना चाहती थी. अब पता भी मिला है तो इतनी दूर का, जहां अकेले आपको बताए बगैर मैं नहीं जा सकती. मम्मी हम साथ कोलकाता चलेंगे. मैं देखना चाहती हूं कि कैसे एक क़दम बढ़ाने पर प्रत्युत्तर में चार क़दम का फ़ासला नापा जाता है? बोलो मम्मी, कब चलें?”

“तुम पागल हो गई हो काव्या. मुझे कहीं नहीं जाना.”

“ठीक है. मतलब आप नहीं चाहतीं मेरी ज़िंदगी में शादी जैसा कोई अध्याय जुड़े.”

“ये कैसी बातें कर रही हो?” मां-बेटी में काफ़ी देर तक बहस चलती रही. आख़िरकार हार मानते हुए प्रमिलाजी ने कहा, “ओह काव्या, मैं हार गई तुमसे. ठीक है, चलो जहां भी चलना है.”

ट्रेन का लंबा सफ़र प्रमिलाजी को और भी लंबा लग रहा था. कैसे करेगी वह इतने बरसों बाद नलिन का सामना?… कह देगी कि वह अपनी मर्ज़ी से नहीं आई है. उनकी बेटी खींचकर लाई है, वरना उन्हें कहां ज़रूरत है पति नामक प्राणी की? जहां इतने बरस अकेले गुज़ार लिए, बाकी के और गुज़र जाते. नहीं-नहीं, ‘गुज़ार लिए’ शब्द ठीक नहीं रहेगा. इससे बेचारगी झलकती है. वे अपने आपको कभी बेचारी सिद्ध नहीं होने देंगी… नलिन ने व्यंग्यभरी मुस्कान से ताका या कुछ ताना कसा तो? तो वे उल्टे क़दमों से लौट आएंगी और फिर कभी उस ओर रुख़ नहीं करेंगी. लेकिन इन सबसे काव्या को क्या संदेश जाएगा? यह संवेदनशील लड़की तो हमेशा के लिए शादी से मुंह मोड़ लेगी. ओह, यह मैं क्या कर बैठी? मैं यहां आने के लिए राज़ी ही क्यों हुई?

उधर काव्या के दिमाग़ में भी उथल-पुथल मची हुई थी. यदि आमने-सामने होने पर एक बार फिर दोनों के अहम् टकरा गए, तो उसकी अब तक की सारी जांच-पड़ताल, मीलों का यह कष्टदायी सफ़र, जो शारीरिक से भी ज़्यादा मानसिक रूप से कष्टदायी सिद्ध हो रहा था, सब व्यर्थ चला जाएगा. पर जो भी हो, मम्मी की ज़िंदगी का फैसला किए बिना वह अपनी नई ज़िंदगी की शुरुआत नहीं कर सकती.

गंतव्य तक पहुंचने के लिए मां-बेटी को ज़्यादा मश़क़्क़त नहीं करनी पड़ी. हां, मश़क़्क़त करनी पड़ी, तो बंद दरवाज़े की घंटी बजाने की हिम्मत जुटाने में. कुछ देर दिल थामकर इंतज़ार करने के बाद दरवाज़ा खुला. दरवाज़ा खोलनेवाले शख़्स को देखकर प्रमिलाजी का कलेजा मुंह को आने लगा. यह उनका नलिन है? उनकी कल्पना के यंग, स्मार्ट, हैंडसम नलिन की जगह यह कौन स़फेद बाल, कृशकाय शरीर और झुर्रियोंवाला चेहरा लिए बूढ़ा खड़ा था? मोटे लेंस की ऐनक के पीछे से झांककर पहचानने का प्रयास करता वह कृशकाय थरथराता शरीर जैसे ही ढहने लगा, काव्या ने आगे बढ़कर उसे थाम लिया, “पापा!”

नज़रभर काव्या को देखने और फिर प्रमिला को देख नलिन हर्षातिरेक से बोले, “काव्या? मेरी बच्ची?… यह हमारी बेटी ही है न प्रमिला? ओह… मैं… मैं… सपना तो नहीं देख रहा? मुझे विश्‍वास दिलाओ… कोई मुझे नींद से जगाओ.” नलिन मानो ख़ुशी से बौरा उठे थे. प्रमिलाजी और काव्या ने सहारा देकर उन्हें सोफे पर बैठाया. सबकी डबडबाई आंखें बरसने लगीं. पंद्रह बरसों के वियोग की पीड़ा बहते निःशब्द आंसुओं में कब घुलकर बह गई, किसी को पता ही नहीं लगा. प्रमिलाजी के दिमाग़ में कब से चल रहे संवाद, प्रतिसंवाद, व्यंग्य-प्रतिव्यंग्य, कटुक्तियां जाने कहां तिरोहित हो गई थीं. इस अशक्त, निरीह, व़क़्त के थपेड़ों से घायल इंसान पर वह अब और क्या प्रहार करे? दया, सहानुभूति और अंततः निर्मल प्रेम का सागर उनके हृदय में हिलोरें लेने लगा था. नलिन भी शायद ऐसी ही मनःस्थिति से गुज़र रहे थे. नज़रें चुराती आंखों ने मानो वाक्क्षमता भी चुरा ली थी.

“मैं रसोई देखती हूं और कुछ चाय-पानी का प्रबंध करती हूं.” कहते हुए काव्या खिसक ली. उसका सोचना सही था. एकांत ने दिलों की दूरियां और मीलों के फ़ासले पल में मिटा दिए. जान-बूझकर काफ़ी देर लगाकर जब वह चाय की ट्रे लेकर कमरे में दाख़िल हुई तो नलिन उसे अपलक ताकते रह गए.

यह भी पढ़ेआपके सफ़र का साथी ट्रैवल इंश्योरेंस (Why Travel Insurance Is Necessary For You?)

“कितनी बड़ी, समझदार और सुंदर हो गई है हमारी छोटी-सी गुड़िया!” पापा के उद्गार सुन काव्या सकुचा उठी.

“बस, यह अंतिम ज़िम्मेदारी रह गई है मेरी. इसे अच्छा घर-वर देखकर विदा कर दूं…”

“अब यह हमारी ज़िम्मेदारी है.” नलिन ने ‘हमारी’ शब्द पर ज़ोर देते हुए काव्या को अपने पास बैठा लिया और स्नेह से उसके सिर पर हाथ फेरने लगे.

काव्या सोच रही थी, रिश्तों में सद्भाव और मिठास हो, तो ज़िंदगी का हर अध्याय ही सुनहरा है. गृहस्थी बसाने से पूर्व ही वह शनैः शनैः सफल गृहस्थ जीवन के समस्त गुर आत्मसात् करती जा रही थी.

Sangeeta Mathur

     संगीता माथुर

अधिक शॉर्ट स्टोरीज के लिए यहाँ क्लिक करें – SHORT STORiES

कहानी- स्नेह के सूत्र (Short Story- Sneh Ke Sutra)

“यूं तो हम समानता की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं, लेकिन बात जब अपने पर आती है, तो अक्सर हमसे चूक हो जाती है. हम भूल जाते हैं कि जिस तरह हमने बेटे को पढ़ा-लिखाकर बड़ा किया है, बहू की परवरिश भी उसी तरह हुई होगी. हमें अपने बेटे से अपेक्षाएं रहती हैं, तो बहू का भी अपने माता-पिता के प्रति कुछ फ़र्ज़ बनता है.”

Kahani

रिचा का फोन आने से संध्या का मन और भी क्षुब्ध हो उठा. क्या समझते हैं ये बच्चे स्वयं को. ये जो कहेंगे, जैसा कहेंगे, हम करने को बाध्य होंगे. मानो हम लोग हाड़-मांस का शरीर न होकर कोई मशीन मात्र हों, जिसका काम बस बच्चों का हुक्म बजाना हो. नहीं…नहीं… वह रिचा के मायके हरगिज़ नहीं जाएगी. रिचा को उसकी भावनाओं की तनिक भी फ़िक़्र होती, तो घर में तनाव का माहौल न रखती. आख़िर ऐसा क्या कह दिया था उसने, जो वह इतने दिनों से मुंह फुलाए घूम रही है.

अकेले रिचा का दोष नहीं है. रजत भी उसी का साथ दे रहा है. उसे भी कहां फ़िक़्र है अपने माता-पिता की. कभी-कभी बहुत सोच-विचार कर लिए गए फैसले भी ग़लत साबित होते हैं. नवीन के रिटायरमेंट पर रजत व रिचा दिल्ली आए थे. उस समय दोनों ने अपनत्व भरे शब्दों में कहा था,

“मां-पापा, अब हम आपको अकेले नहीं रहने देंगे. आपको हमारे साथ पूना रहना होगा.” नवीन हंसे थे. “मैं रिटायर भले ही हो गया हूं, पर अभी बूढ़ा नहीं हुआ हूं.”

“पापा, हमें आपकी चिंता रहती है. अब आप फ्री हैं, आराम से पूना सेटल हो सकते हैं.”

संध्या व नवीन काफ़ी दिनों तक सोच-विचार करते रहे थे. नवीन का दिल्ली में अच्छा फ्रेंड सर्कल था.

“एक दिन तो हमें बच्चों के पास जाकर रहना ही पड़ेगा, तो क्यों न अभी जाएं. अभी वे हमें बुला रहे हैं. कल को उम्र बढ़ने पर शरीर अशक्त हो गया और बच्चों ने नहीं बुलाया, तब क्या करेंगे?” संध्या की बात से नवीन सहमत हो गए. पूना पहुंचकर उन्हें सुकून मिला. रजत और रिचा उनका ध्यान रखते थे. संध्या को लगा, उनका बुढ़ापा आराम से कट जाएगा, पर कुछ माह ही बीते होंगे कि कुछ बातें उन्हें बुरी तरह से खटकने लगीं.

यह भी पढ़ेरिश्तों में मिठास बनाए रखने के 50 मंत्र (50 Secrets For Happier Family Life)

रिचा व रजत की अपनी ही दुनिया थी. दोस्तों के यहां ख़ूब आना-जाना होता. रिचा का मायका कुछ ही दूरी पर था. घर में उसकी मम्मी मीना व छोटी बहन अनु थे. पापा का दो वर्ष पूर्व स्वर्गवास हो चुका था. उनकी जगह पर मीना को बैंक में नौकरी मिल गई थी. घर में कोई पुरुष मेंबर न होने के कारण मीना अपने हर काम में रजत की राय लेती. अनु भी अपने जीजू के साथ खुली हुई थी. यह सब देखकर संध्या और नवीन मन ही मन कुढ़ते.

नवीन अक्सर कहते, “पहले ये लोग जैसे भी रहते हों, कम से कम हमारी उपस्थिति में तो इन्हें अपना रवैया बदलना चाहिए.” उस दिन तो हद ही हो गई. संध्या को सुबह से बुख़ार व सिरदर्द था. शाम को रजत ऑफिस से लौटा, तो अपने साथ मीना को भी लेता आया. उन्हें देख संध्या उठने लगी, तो मीना बोली, “आपकी तबीयत ख़राब है. आप लेटी रहिए. मैं सबके लिए चाय बना लाती हूं.” थोड़ी देर में मीना चाय और पकौड़े बना लाई. पकौड़े देख रजत चहका, “अरे वाह, आपको कैसे पता, मेरी पकौड़े खाने की इच्छा हो रही थी.”

“बच्चों के दिल की बात हम मांएं नहीं समझेंगी तो कौन समझेगा, क्यों संध्याजी.” मीना ने संध्या की ओर देख मुस्कुराकर कहा. संध्या ने बेमन से गर्दन हिला दी. तभी रिचा और अनु भी आ गए. पकौड़े देख अनु ने फ़रमाइश की, “जीजू, पकौड़ों के साथ जलेबी का कॉम्बीनेशन कैसा रहेगा?”

“अभी लो.” रजत लपकता हुआ मार्केट गया और जलेबी ले आया. रात में सब को गर्म खाना खिलाकर मीना और अनु अपने घर चले गए, तो संध्या नवीन से बोली, “मां-बेटी को बिल्कुल शर्म नहीं है. लगता ही नहीं, अपने दामाद के घर बैठी हैं.”

“जब अपना ही सिक्का खोटा हो, तो किसी का क्या दोष?”

“देखा नहीं इन लोगों के आने पर रजत भी कितना प्रसन्न रहता है.”

“मेरा ख़्याल है, हमें रजत को बताना चाहिए कि इस तरह रोज़ का आना-जाना हमें पसंद नहीं है.”

“सोच लो, कहीं वह बुरा न मान जाए.” नवीन ने आशंका जताई.

“मानने दो. जब हमें यहां बुलाया है, तो हमारी इच्छाओं का भी ध्यान रखना चाहिए.” अगली सुबह अनु खाने का टिफिन लेकर आई, तो संध्या बोली, “अब मैं बिल्कुल ठीक हूं. मम्मी से कहना, शाम का भोजन बनाने की तकलीफ़ न करें.”

एक दिन मौक़ा देख उसने रजत से कहा, “तुम्हारी दीदी का फोन आया था. वह हमें अहमदाबाद बुला रही है, किंतु मैंने इंकार कर दिया.”

“मम्मी, कुछ दिनों के लिए चली जाइए. आपको चेंज मिल जाएगा.”

“छह माह पूर्व हम उसके पास गए थे. इतनी जल्दी जाने का क्या तुक है?” रिचा उसका व्यंग्य समझ गई. वह तुनककर बोली, “मां, मैं समझ गई हूं, आपका इशारा किस ओर है. रजत, मैंने तुमसे कहा था न कि मां को मम्मी और अनु का यहां आना पसंद नहीं है. अब तुम स्वयं देख लो.” रजत ख़ामोश रहा.

रिचा बोली, “मां, मैंने रजत से शादी से पहले ही कह दिया था कि मैं सदैव अपनी मम्मी और बहन का ध्यान रखूंगी. जिस तरह आप लोगों के प्रति हमारा फ़र्ज़ है, उसी तरह उन दोनों की देखभाल करना भी हमारा दायित्व है.” रिचा ग़ुस्से में कमरे से बाहर चली गई. रजत भी उसके पीछे-पीछे चल दिया. उस दिन से घर में तनाव रहने लगा.

रिचा का अपने घरवालों के साथ आना-जाना तो कम नहीं हुआ, हां, संध्या व नवीन के प्रति उसके व्यवहार में बदलाव अवश्य आ गया. पहले मीना और अनु घर पर आते, तो रिचा चाहती कि सब लोग इकट्ठे बैठें, हंसे-बोलें, खाएं-पीएं. लेकिन अब उसने ऐसा प्रयास छोड़ दिया था. एक दिन संध्या ने नवीन से कहा, “इससे तो हम दिल्ली में रहते, तो अच्छा होता.”

नवीन झुंझला उठे, “अक्सर इंसान भविष्य की चिंता में अपना वर्तमान भी बिगाड़ लेता है. यही तुमने किया है. मैंने तुमसे कहा था कि अपना शहर छोड़ना ठीक नहीं है. बच्चों के पास कुछ दिन रहो, उसी में इज़्ज़त है. आजकल के बच्चे ऐसे कहां हैं कि बड़ों की बात का मान रखें, पर तुम मेरी सुनती ही कहां हो. अपने साथ-साथ मेरी भी ज़िंदगी ख़राब कर दी.” संध्या ख़ामोश रही. अब तो उसे नवीन की बातें सुननी ही थीं.

उन दिनों से संध्या व नवीन का मन काफ़ी उचाट रहने लगा था. दिनभर घर में रहते बोर हो जाते. पहाड़-सा दिन काटे नहीं कटता था. बेटा-बहू तो दिनभर ऑफिस में रहते. घर पर होते, तब भी रिचा से कम ही बात होती थी.

एक दिन रजत का सुझाव आया, “अपनी कॉलोनी से कुछ ही दूरी पर रिटायर्ड लोगों का एक क्लब है. उसे जॉइन कर लीजिए. वहां आप दोनों को हमउम्र लोग मिलेंगे, तो दिल बहल जाएगा.” रजत का सुझाव उन्हें पसंद आया. अगले ही दिन उन्होंने क्लब जॉइन कर  लिया. क्लब में समय तो अच्छा गुज़र जाता, पर घर के तनाव से मन पर बोझ बना हुआ था.

यह भी पढ़े10 तरह के चुगलखोर: कैसे करें इनसे डील (10 Types Of Snitches You Must Know)

क्लब में ही उनकी मुलाक़ात कमलनाथजी व उनकी पत्नी से हुई. दोनों को उनका स्वभाव बहुत पसंद आया. धीरे-धीरे उनकी दोस्ती बढ़ने लगी. उस दिन शनिवार था. रजत व रिचा की छुट्टी थी. संध्या ने सोचा कि आज कमलनाथ दंपति को डिनर पर बुलाएंगे, पर इससे पहले कि वह यह बात रिचा को बताती, रिचा तैयार होकर उसके कमरे में आई और बोली, “मां, मैं और रजत घर जा रहे हैं, कुछ ज़रूरी काम है. कल वापस आएंगे.” संध्या को क्रोध आ गया.

रिचा और रजत के जाने के बाद वह बड़बड़ाने लगी, “क्या काम है, माता-पिता को यह बताना भी ज़रूरी नहीं समझा. बस, मुंह उठाया और चल दिए.”

“अरे, काम-वाम कुछ नहीं, बस जाने का बहाना चाहिए. ख़ैर, हम भी घर पर बोर क्यों होएं. चलो, कमलनाथजी के घर चलते हैं.” तैयार होकर वे दोनों घर से निकल पड़े. रास्ते में रिचा का फोन आया, “मां, अनु की शादी की बात होनी है. आप दोनों घर आ जाएं. लीजिए मम्मी से बात कीजिए.” मीना की आवाज़ आई, “भाभीजी, आपका और भाईसाहब का आना ज़रूरी है. आप दोनों बड़े हैं. आपकी राय के बिना कुछ नहीं हो सकेगा.”

“हम कोशिश करेंगे.” उखड़े स्वर में संध्या ने जवाब दिया और फोन काट दिया. थोड़ी देर में वे दोनों कमलनाथजी के घर पहुंचे. कमलनाथजी अपनी पत्नी के साथ गेट पर ही मिल गए. साथ में एक सज्जन भी थे. नवीन व संध्या का स्वागत करते हुए उन्होंने कहा, “इनसे मिलिए, ये हमारे समधी डॉ. ब्रजेश हैं, हमारी बहू के पिताजी.” नवीन ने उनसे हाथ मिलाया. डॉ. ब्रजेश बोले, “मैं चलता हूं कमलनाथ.”

“कल समय से आ जाना डॉक्टर व याद रखना कल तुम्हें पार्टी भी देनी है.” इस पर दोनों हंस पड़े.

डॉ. ब्रजेश के जाने पर लॉन में बैठते हुए नवीन बोले, “लगता है, अपने समधी के साथ आपके बहुत दोस्ताना संबंध हैं.”

“हां, रिश्तों को दोस्ताना बना लो, तो उन्हें निभाना सहज हो जाता है. उन्हें व मुझे दोनों को शतरंज का शौक़ है. जब भी मिलते हैं, शतरंज की बाज़ी ज़रूर जमती है.”

“आप ख़ुशक़िस्मत हैं, जो आपको इतने अच्छे समधी मिले, अन्यथा कभी-कभी तो रिश्तेदारी बोझ बन जाती है.” नवीन बुझे मन से बोले.

“इस सदंर्भ में मेरे विचार भिन्न हैं. नवीन, मेरा यह मानना है कि रिश्ते कभी बोझ नहीं होते, बस उन्हें निभाने की कला आनी चाहिए.”

“आपकी समधन नहीं आई थीं.” संध्या ने बात बदली. मिसेज़ कमलनाथ ने बताया, “आई हैं न. अभी अपनी बेटी यानी हमारी बहू के साथ मार्केट गई हुई हैं. आज रात यहीं रुकेंगी.” कमलनाथ बताने लगे, “डॉ. ब्रजेश के बेटा-बहू लंदन में हैं. पति-पत्नी यहां अकेले हैं, इसलिए अक्सर आते रहते हैं. कभी-कभी रात में रुक भी जाते हैं.”

संध्या बोली, “लगता है, आपके व हमारे घर की कहानी एक जैसी है. हमारी बहू रिचा का मायका घर से कुछ ही दूरी पर है. हर व़क्त का आना-जाना लगा रहता है. हम दोनों को बिल्कुल अच्छा नहीं लगता. एक दिन मैंने रिचा को कह ही दिया कि मायकेवालों का ज़्यादा आना-जाना ठीक नहीं लगता है. बस, उसी दिन से वह उखड़ी-उखड़ी रहती है. घर में एक तनाव-सा रहने लगा है. बेटा भी उसे समझाने के बदले उसी का पक्ष लेता है. अरे, पुराने समय में तो लोग बेटी के घर का पानी भी नहीं पीते थे. आज का ज़माना बदल गया है. लोग एडवांस हो गए हैं, पर इसका अर्थ यह नहीं कि सास-ससुर का कोई लिहाज़ ही न हो. जब देखो, मुंह उठाया और चले आए.”

नवीन भारी मन से बोले, “दरअसल, दिल्ली से यहां आना हम लोगों की भूल थी. रजत और रिचा अपनी दुनिया में मस्त हैं. उसमें हमारे लिए कोई जगह नहीं.”

मिसेज़ कमलनाथ चाय लेकर आई थीं. सब के हाथ में एक-एक कप पकड़ाते हुए बोलीं, “भाईसाहब, पैरेंट्स हमेशा पैरेंट्स ही होते हैं. बच्चों की ज़िंदगी में हमेशा उनकी जगह होती है. ऐसा न होता, तो वे आपको पूना क्यों बुलाते?”

“पूना बुलाकर अपना फ़र्ज़ पूरा कर दिया, पर हमारी भावनाओं का सम्मान तो नहीं रखा.”

यह भी पढ़ेख़ुश रहना है तो सीखें ये 10 बातें (10 Easy Things Successful People Do To Stay Happy)

“संध्या, स्पष्टवादी हूं. बुरा मत मानना, हम बड़े अपनी हर इच्छा को बच्चों पर थोपना क्यों चाहते हैं? क्यों चाहते हैं कि हम जैसा कहें, वे वैसा ही करें. सहज होकर उनके साथ क्यों नहीं रह सकते. जो बात तुम्हारे लिए छोटी है, उनके लिए बहुत बड़ी है. अंतर स़िर्फ सोच का है. नवीन का व़क्त अब बहुत आगे बढ़ गया है. न जाने कितनी पुरानी मान्यताओं को हम पीछे छोड़ चुके हैं, पर अपनी इस सोच से आज भी चिपके रहना चाहते हैं कि बहू के मायकेवालों का आना-जाना ठीक नहीं लगता. क्या तुम्हारे घर में दूसरे लोग नहीं आते? बेटे के दोस्त, रिश्तेदार, फिर बहू के मायकेवालों से ही इतना परहेज़ क्यों है?

यूं तो हम समानता की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं, लेकिन बात जब अपने पर आती है, तो अक्सर हमसे चूक हो जाती है. हम भूल जाते हैं कि जिस तरह हमने बेटे को पढ़ा-लिखाकर बड़ा किया है, बहू की परवरिश भी उसी तरह हुई होगी. हमें अपने बेटे से अपेक्षाएं रहती हैं, तो बहू का भी अपने माता-पिता के प्रति कुछ फ़र्ज़ बनता है.

विवाह स़िर्फ दो व्यक्तियों को ही आपस में नहीं जोड़ता है, बल्कि इससे दो परिवार भी स्नेह के सूत्र में बंधते हैं. हमारे बेटे की जब शादी हुई, तब हम दोनों ने सोच लिया था कि बहू के साथ-साथ हम उसके परिवार को भी खुले मन से स्वीकारेंगे. अपने पैंरेंट्स के लिए वह जो भी करना चाहेगी, उसमें भरपूर सहयोग देंगे. सकारात्मक होकर जब हम रिश्तों के तार दूसरों से जोड़ते हैं, तो सकारात्मक असर होता है. आपको जो भी हमारे घर का सौहार्दपूर्ण वातावरण दिखाई दे रहा है, इसकी वजह यही है कि हम बच्चों की ज़िंदगी में दख़लअंदाज़ी नहीं करते. उनसे अधिक अपेक्षाएं भी नहीं रखते, बस, एक सहयोगी की भूमिका निभाते हैं.

नवीन, यह ध्यान रखो, बेटा तुम्हारा ही है, फिर भी पराया हो चुका है. एक नए बंधन में बंध चुका है. उसकी अब एक नई दुनिया है, जिसमें बेवजह की दख़लअंदाज़ी करने से रिश्ते बिगड़ सकते हैं. बदलते समय के साथ अपने व्यवहार व सोच में परिवर्तन लाओ, ताकि बच्चे तुमसे खुलकर बात कर सकें. तुम्हारी कंपनी को एंजॉय कर सकें.” संध्या मंत्रमुग्ध-सी कमलनाथजी को सुन रही थी. उसे महसूस हुआ कि उसके मन की गांठें परत-दर-परत खुल रही हैं. अब तक बंद पड़े ज़ेहन के दरवाज़े खुल गए हैं और शीतल मंद बयार बहने लगी है. अब वह स्वयं को बहुत हल्का महसूस कर रही थी.

सच! यदि सकारात्मक सोच हो, तो परिस्थितियों का स्वरूप ही बदल जाता है. जिसे वह मीनाजी की अनाधिकृत कोशिश मानती थी, अब लग रहा था, वह उनका स्नेह व अपनापन था. नवीन भी कमलनाथजी के विचारों से अभिभूत थे. कह रहे थे, “मैं आपका सदैव आभारी रहूंगा, सही समय पर आपने हमारी सोच की दिशा बदल दी. हमें परिस्थितियों को देखने का एक नया नज़रिया दिया. आज हम उम्र के जिस पड़ाव पर हैं, उस पर हमें इन छोटी-छोटी बातों से ऊपर उठकर कुछ उद्देश्यपूर्ण सोचना चाहिए.” कमलनाथजी ने मुस्कुराकर सहमति जताई. संध्या बोली, “अब हमें चलना चाहिए. रिचा व उसकी मम्मी हमारी प्रतीक्षा कर रही होंगी.” कमलनाथ व उनकी पत्नी से विदा लेकर संध्या व नवीन पुनः अपने रिश्ते को स्नेह के सूत्र में बांधने के लिए रिचा के मायके की ओर चल दिए.

renu mandal

      रेनू मंडल

अधिक शॉर्ट स्टोरीज के लिए यहाँ क्लिक करें – SHORT STORiES

कहानी- दूसरा जनम (Short Story- Doosara Janam)

मैं अब अकेली रह गई, निस्सहाय! मुझे रोना आ गया. रोते-रोते मेरी हिचकियां बंध गईं. भाई कभी डूबता, कभी उतराता. उसकी हालत ख़राब होती जा रही थी और मेरे पास रोने के अलावा और कोई चारा नहीं था. उसे अकेला छोड़कर भी नहीं जा सकती थी. मैं मन-ही-मन भगवान को याद कर रही थी कि मेरे भाई को बचा लो. मां ने एक बार हमें बतलाया था कि जो भी सच्चे मन से भगवान को पुकारता है, उसकी सहायता के लिए वे अवश्य ही आते हैं.

Bacho Ki Kahani

कभी-कभी जीवन में कुछ ऐसा घट जाता है, जिसकी याद सदा बनी रहती है. मुझे जब भी वह दिन याद आता है, तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं और फिर घंटों उस घटना के बारे में सोचती रहती हूं. और लाख कोशिश करने पर भी वह बात दिल और दिमाग़ से हटती ही नहीं.

मैं जब छोटी थी, तो ज़्यादातर खेलने में ही ध्यान रहता. पढ़ने में मन लगता ही नहीं था. संयुक्त परिवार था हमारा. हम छः-सात भाई-बहन स्कूल जाते एक साथ. मां और चाची सुबह से उठकर हमें उठाने और तैयार करने में लग जाती थीं. सुबह सात बजे बुलाने वाली आ जाती थी. वह कई घरों से बच्चों को जमा करके स्कूल पहुंचाती थी.

दोपहर को स्कूल से लौटने के बाद मां-चाची हमें बिस्तरों पर सोने के लिए लिटा देतीं. हमें सुलाते-सुलाते मां और चाची की तो आंख लग जाती, लेकिन हमारी आंखों में नींद कहां? हम चुपके से उठ कर दरवाज़ा खोल बाहर निकल जाते खेलने के लिए. बीच में मां की आंख ख्ुलती, तो हमें न पाकर ग़ुस्से में बाहर आती और फिर पकड़कर अन्दर ले जाकर फिर से डांट-डपटकर सुला देती. कई बार जब हम बहुत शैतानी करते, तो हमारी पिटाई भी कर देती. मां से हमें डर भी बहुत लगता था, लेकिन हम भी मजबूर थे मन तो हमेशा खेल-कूद में ही लगा रहता था.

इसी तरह हमारे दिन बीत रहे थे. जाड़ा हो, गर्मी हो या बरसात, दोपहर को खाना खाकर 15-20 मिनट लेटना ही हमारे लिए काफ़ी था. दो-चार बच्चे पड़ोस के भी आ जाते और हम, खूब उत्पात मचाते. कभी ‘‘छिपा छिपौअल’’ खेलते तो कभी कुछ और.

पिताजी का बड़ा रौब था घर में. शाम को जब उनके द़फ़्तर से आने का समय होता तो हम सब घर के अन्दर आ के चुपचाप से अपनी-अपनी किताब निकाल कर पढ़ने बैठ जाते. पिताजी हमें बहुत सीधे-सादे और अच्छे बच्चे समझते. लेकिन हैरानी की बात ये थी कि इतनी शैतानी और खेलकूद के बावजूद हम सब पढ़ने में अच्छे थे और हमेशा अव्वल नंबर से पास होते थे. पिताजी को हमारी पढ़ाई पर नाज़ था. जब हम अपना रिपोर्ट कार्ड लेकर घर आते तो वह बहुत ख़ुश होते थे, यह देख कर कि हम सब कितने अच्छे नंम्बर से पास हुए हैं.

यह भी पढ़ेबच्चों की परवरिश को यूं बनाएं हेल्दी (Give Your Child A Healthy Upbringing)

उन दिनों बरसात का मौसम था और हमारे घर के पास ही एक और घर बन रहा था. जगह-जगह चूने, मिट्टी और ईटों के ढेर लगे हुए थे. उन ईंटों के बीच में ही हम लुकने-छिपने का खेल खेलते थे. घर बनाने के लिए पानी की ज़रूरत होती है. इसलिए जब भी ऐसा कोई बिल्डिंग बनाने का काम होता है, तो पास में ही पानी के लिए एक बड़ा-सा गड्ढा खोद कर उसमें पानी भर देते हैं. उस समय भी जब घर बन रहा था तो गड्ढा खोदा गया था और उसे पानी से भर दिया गया था. हम सब काग़ज़ की नावें बना-बनाकर उसमें डालते और देखते कि किसकी नाव कितनी देर तैर कर पानी में डूबती है. जिसकी नाव सबसे देर तक तैरती रहती, वही जीत जाता.

एक दिन बारिश बहुत हुई थी और हर तरफ़ फिसलन हो गई थी. बारिश के पानी से वह गड्ढा और भी भर गया था. हमारा नावों का खेल ज़ारी था. कोई 10-12 नावें गड्ढे में तैर रही थीं. सब अपनी-अपनी नाव को संभाल रहे थे. ठण्डी हवा चल रही थी. बहुत ही सुहावना मौसम था. बड़ा ही आनन्द आ रहा था. पांच वर्ष का मेरा छोटा भाई भी खेल में शामिल था, एक नाव उसकी भी थी. एक छोटी डण्डी उसके हाथ में भी थी. वह भी अपनी नांव को सम्भाल रहा था. देखते-देखते उसकी नाव बहकर पानी में कुछ दूर चली गई. अपनी डण्डी से वह उसे अपने पास लाने की कोशिश कर रहा था.

इसी चक्कर में मेरे भाई ने ज़रा-सा अपना पैर आगे बढ़ाया ही था कि वह फिसल गया और गड्ढे में जा गिरा. अब वह उस पानी में डुबकी लगाने लगा. उसने हाथ ऊपर किए, मैंने उसका हाथ पकड़ने की कोशिश की, लेकिन मैं भी फिसलने लगी. बाकी के बच्चों ने जब यह देखा, तो इस डर से भाग गए कि कहीं उन पर दोष न लग जाए कि तुमने धक्का दिया होगा. मैं अब अकेली रह गई, निस्सहाय! मुझे रोना आ गया. रोते-रोते मेरी हिचकियां बंध गईं. भाई कभी डूबता, कभी उतराता. उसकी हालत ख़राब होती जा रही थी और मेरे पास रोने के अलावा और कोई चारा नहीं था. उसे अकेला छोड़कर भी नहीं जा सकती थी. मैं मन-ही-मन भगवान को याद कर रही थी कि मेरे भाई को बचा लो. मां ने एक बार हमें बतलाया था कि जो भी सच्चे मन से भगवान को पुकारता है, उसकी सहायता के लिए वे अवश्य ही आते हैं.

तभी पड़ोस के घर से उनका नौकर अपना काम ख़त्म करके बाहर निकला. उसने मुझे अकेले खड़े रोते देखा. मेरे पास आया और बोला, ‘‘बेबी क्या बात है? क्यों रो रही हो?’’ मेरे मुंह से बोल नहीं निकले. रुलाई और भी ज़ोर से छूट गई. मैंने इशारे से कहा, ‘‘वो…वो देखो.’’

‘‘उसने देखा तो एक क्षण भी सोचे बिना वह गड्ढे में कूद गया और भाई को गोदी में उठा लिया और पानी और फिसलन में से बड़ी मुश्किल से गड्ढे में से बाहर निकला और मेरे पास आकर बोला, ‘‘चलो बेबी, तुम्हें घर पहुंचा दूं.’’

हम जब घर आए, तो भाई की ऐसी हालत देखकर मां हक्की-बक्की रह गई. इससे पहले कि वह कुछ बोलतीं, नौकर बोला, ‘‘लो माईजी, सम्भालो अपने लाड़ले को. आज तो भगवान की बड़ी कृपा हो गई. बस समझ लो बाबा को नई ज़िन्दगी मिली है. यदि मैं समय पर न पहुंचता तो पता नहीं क्या हो जाता. मुझे तो, समझो, भगवान ने ही भेज दिया.”

मां ने लपककर भाई को अपनी गोदी में उठा लिया. उनकी आंखों में आंसू आ गए. पूछने लगी, ‘‘क्या हो गया इसे? ये सब क्या हुआ? क्यों हुआ? कैसे हुआ?’’ एक साथ घबराहट में इतने सारे प्रश्‍न पूछ डाले उन्होंने. तब नौकर ने पूरी बात बताई, ‘‘माईजी, वो तो आपकी तक़दीर अच्छी थी. थोड़ी भी और देर हो जाती तो मालूम नहीं क्या होता. बाबा बच गया! अब तो आप लड्डू मंगाकर भगवान का भोग लगाइए और सारे मोहल्ले में बांटिए. बाबा का नया जनम हुआ है.’’ मां ने तुरन्त रुपए निकालकर उस नौकर को दिए और कहा, ‘‘तुमने इतना बड़ा काम किया है, अब तुम्ही लड्डू भी लाओ, फिर शाम को हम सब मन्दिर जाकर भगवान का भोग लगाकर आएंगे.’’

यह भी पढ़ेकितने दानी हैं आप? (The Benefits Of Charity)

शाम को पिताजी जब द़फ़्तर से आए और उन्हें यह सब हाल पता चला, तो उन्होंने भगवान का बड़ा धन्यवाद किया- बड़ी प्रार्थना की, ‘हे प्रभो ! तुमने ही मेरे बेटे की ज़िन्दगी बचाई है. हे भगवान, तुम्हारे बड़े लम्बे हाथ हैं. तुम्हारी इस कृपा के लिए हम सब नतमस्तक हैं.’’ फिर भाई को गोदी में लेकर बहुत प्यार किया और मुझे भी अपने पास बुलाकर प्यार किया और कहने लगे, ‘‘तेरी वजह से ही इसकी जान बच गई. तू भी अगर और सबकी तरह भाग जाती, तो वह नौकर गड्ढे में झांकने थोड़े ही आता!’’

शाम को हम सब मन्दिर गए, प्रसाद चढ़ाया भगवान को. मां ने भाई के हाथ से बहुत-सा दान-पुण्य करवाया.

उस दिन मेरी समझ में आया, कि दिल की पुकार भगवान ज़रूर सुनते हैं. मेरी आवाज़ उन्होंने सुनी और नौकर के रूप में आकर भाई को बचा लिया.

मेरा वह भाई अब बहुत बड़ा हो गया है. बाल-बच्चोंवाला है और नौकरी से रिटायर भी हो गया है. हम लोग कई बार उस घटना की बातें करते हैं और हर बार भगवान की कृपा के लिए नतमस्तक हो जाते हैं. मुझे आज भी जब कभी उस घटना की याद आती है, तो पूरे शरीर में सिहरन-सी दौड़ जाती है और रोंगटे खड़े हो जाते हैं. सचमुच मैं तो यही समझती भी हूं कि मेरे भाई का दूसरा जनम ही हुआ था- यही सच भी है कि पूर्ण रूप से आश्रित होकर- शरणागत होकर सच्चे दिल से जो भगवान को पुकारता है, उसकी सहायता के लिए वे नंगे पैरों दौड़े आते हैं.

– शकुन्तला माथुर

अधिक शॉर्ट स्टोरीज के लिए यहाँ क्लिक करें – SHORT STORiES

कहानी- अप्रत्याशित (Short Story- Apratyashit)

वे दुर्लभ क्षण थे. हमने मैडम की चढ़ी हुई नज़रों को मुलायम पड़ते देखा. मुस्कुराते देखा, जो अब तक नहीं देखा था. शायद सिंधु ने देखा होगा. मैडम साफ़तौर पर परिवर्तन से गुज़र रही थीं. प्रेम में बड़ी शक्ति होती है, यह प्रमाणित हो रहा था. सप्रे सर अनोखे सिद्ध हो रहे थे.

Kahaniya

कॉलेज के वे दिन भी क्या दिन थे. हम छात्राओं पर हरदम ज्वाला मैडम का आतंक बना रहता. ज्वाला मैडम, एक उलझा हुआ व्यक्तित्व. सांवला रंग, मझौला क़द, चालीस के आसपास का प्रसाधन विहीन सख़्त चेहरा, क्रोधी कपाल, सिकुड़ी हुई शुष्क आंखें, जहां किसी चमकीले सपने को कभी जगह न मिली होगी. कुंठा भरे कुटिल जान पड़ते अधर, एक मज़बूत चोटी की शक्ल में बंधे सज़ा पाए से केश, नियमित स़फेद ब्लाउज़ के साथ पहनी गई कलफ़ लगी हल्के रंग की सूती साड़ी. रजिस्टर और चॉक का डिब्बा संभालती हुई मैडम तेज़ी से कक्षा में दाख़िल होतीं और इस तरह पढ़ाने लगतीं, मानो देर से पढ़ाते हुए अब पूरी फ्लो में आ गई हैं.

बी.एससी. फाइनल में ज्वाला मैडम हमारी क्लास सप्ताह में दो दिन लेती थीं. वे अच्छा पढ़ाती थीं और प्रश्‍न बहुत पूछती थीं. आतंकित करती उनकी मुद्रा और स्वर के मद्देनज़र हम उन प्रश्‍नों के उत्तर भी न दे पाते, जो हम जानते थे. एक प्रश्‍न का उत्तर दे दो, तो दूसरा प्रश्‍न, फिर तीसरा, जब तक निरुत्तर न हो जाओ सवालों का दौर चलता रहता. निरुत्तर छात्राओं की गर्दनें झुक जातीं. मैडम क्रोधित होकर कहतीं, “मैं इतना समझाकर पढ़ाती हूं, लेकिन तुम लोगों से कुछ नहीं बनता. तुम लोग बेवकूफ़ हो या मुझे पढ़ाना नहीं आता? पढ़ाना नहीं आता, तो मैं अपनी डिग्री रद्द करा लूं?…

तो… तो…”

उनकी प्रत्येक तो पर हम छात्राएं डरी हुई और मौन. मैडम समझ जातीं कि इस तरह हमसे उत्तर नहीं उगलवा पाएंगी. वे चॉक का टुकड़ा उछाल देतीं. चॉक जिस छात्रा पर पड़े वह हलाल.

“खड़ी हो जाओ.”

छात्रा खड़ी हो जाती.

“मैंने जो पढ़ाया समझ में आया?”

“जी”

“क्या?”

“सब”

“तो इस बोगस बैच में एक गुणी है, जिसे सब समझ में आता है. आओ, चॉक पकड़ो. ब्लैकबोर्ड पर वह सवाल समझाओ, जो तुम्हें समझ में आ गया है.”

यह भी पढ़ेइन 9 आदतोंवाली लड़कियों से दूर भागते हैं लड़के (9 Habits Of Women That Turn Men Off)

ज्वाला मैडम के मुख पर निर्मम क़िस्म का आनंद छा जाता. मानो छात्राओं को उत्पीड़ित करने में उन्हें तृप्ति मिलती है.

“पर… मैडम, आधा समझ में आया.”

“आधा समझा दो, आधा मैं समझा दूंगी. बार-बार समझाऊंगी. यदि तुम लोग समझना चाहो. ऐसा बोगस बैच मैंने आज तक नहीं देखा. तुम लोग पास नहीं हो सकतीं. रसायनशास्त्र में तो बिल्कुल नहीं. सिंधु, मैंने जो प्रश्‍न पूछा, तुम उसका उत्तर जानती हो?”

सिंधु उत्तर बता देती.

सिंधु मैडम के साथ उनके घर में रहती थी. हमें संदेह था कि मैडम उसे बता देती होंगी कि वे क्लास में क्या पूछनेवाली हैं.

“सिंधु जैसी अच्छी लड़की क्लास में है, वरना मैं इस क्लास में आना छोड़ दूं.”

पहले हम नहीं जानते थे कि ज्वाला मैडम, सिंधु की संरक्षिका हैं. एक बार हम सभी छात्राएं ज्वाला मैडम की चर्चा में लिप्त थीं. सभी अपना-अपना राग आलाप रही थीं.

“मैडम बहुत दुष्ट हैं. इतना डांटती हैं कि आता हुआ उत्तर भी मैं भूल जाती हूं…”

“मैं तो उत्तर जानते हुए भी नहीं बताती कि मैडम को खीझने दो. वे चिल्लाती हैं, तो मुझे मज़ा आता है…”

“सोचती हैं पढ़ाकर हम लोगों पर एहसान कर रही हैं. पढ़ाती हैं, तो वेतन भी तो लेती हैं…”

“प्रैक्टिकल में नंबर काट लेंगी, वरना मैं तो उन्हें करारा जवाब दे दूं…”

“लड़कों के कॉलेज में पढ़ातीं, तो लड़के इन्हें दुरुस्त कर देते… ”

“मुझे लगता है कि इनकी शादी नहीं हुई है, इसलिए निराश रहती हैं…”

“शादी होती, तो पति इन्हें एक दिन न रखता, क्योंकि वह इनका छात्र न होता…”

“सैडिस्ट हैं. इन्हें किसी साइकियाट्रिस्ट से सलाह लेनी चाहिए…”

हम सभी ज्वाला मैडम पर अपनी भड़ास निकाल ही रहे थे कि अचानक सिंधु किसी बेंच से प्रगट हो गई. शायद वह धैर्य से परख रही थी कि हम किस सीमा तक निंदारत हो सकते हैं. प्रायः चुप रहनेवाली सिंधु का पतला चेहरा तप रहा था, “तुम लोग मैडम के बारे में क्या जानती हो? बस, यही कि वे दुष्ट हैं, सैडिस्ट हैं. तुम सबकी सोच घटिया है. दरअसल, मैडम छह भाई-बहनों में सबसे बड़ी हैं. ठीक से पढ़ भी न पाई थीं कि सड़क दुर्घटना में उनके माता-पिता चल बसे. मैडम ने पढ़ाई पूरी करने के बाद नौकरी की और परिवार को संभाला. भाई-बहनों को सेटल किया. अब वे सब अपनी दुनिया में मस्त हैं. मैडम अकेली रह गईं. मैं और मैडम एक गांव के हैं. मैडम ने मेरी विधवा-बेसहारा मां और मुझे अपने पास बुला लिया. मां घर संभालती हैं और एवज में मैडम मुझे पढ़ा रही हैं, वरना मैं और मां गांव में न जाने कब का मर-खप जाते.”

सन्नाटा.

यह भी पढ़ेक्या होता है जब प्रेमिका बनती है पत्नी? (After Effects Of Love Cum Arrange Marriage)

फिर एक छात्रा की वाणी ने हरकत ली, “मैडम ने जो भी त्याग किया हो, पर हम लोगों को क्यों सताती हैं?”

“वे सताती नहीं हैं, बस थोड़ी सख़्त हैं. वे ख़ुद को स्ट्रिक्ट न बनातीं, तो उनके भाई-बहन बिगड़ जाते. भाई-बहनों को अनुशासित करते, अपनी इच्छाओं को दबाते हुए मैडम अब सचमुच स्ट्रिक्ट हो गई हैं. वे इस तरह परिस्थितियों के कारण हुई हैं.”

“उनकी जो भी परिस्थिति रही हो, पर वे हमें इस तरह पढ़ाती हैं, जैसे हम लोगों पर एहसान कर रही हैं. हम उनका एहसान क्यों मानें?” एक छात्रा ने उखड़कर कहा.

“यह मैडम का फ्रस्टेशन है. वे चाहती हैं कि उनके भाई-बहन उनका एहसान मानें. उनका मान-सम्मान व लिहाज करें. ज़रूरत में उनके पास आएं, लेकिन वे लोग अपनी दुनिया में मस्त हैं. शायद इसलिए मैडम छात्राओं को दबाने की कोशिश करती हैं कि कहीं तो उनका रुतबा व शासन दिखाई दे.”

आख़िरकार थक-हारकर सिंधु कहती, “जाने दो, तुम लोग उन्हें नहीं समझ सकोगी.”

ज्वाला मैडम पूरे सत्र कहती रहीं कि तुम लोग पास नहीं हो सकतीं, फिर भी हमारे बैच की प्रायः सभी छात्राएं उत्तीर्ण हो गईं. हम ग्यारह छात्राओं ने एमएससी के लिए केमिस्ट्री चुना. मैडम ने स्वागत किया, “तुम लोग पास हो गईं? और सब्जेक्ट केमिस्ट्री चुना? ऐसा बोगस बैच विभाग की छवि ख़राब कर देगा. और सुनो, तुम लोगों के आते ही हमारे इतने अच्छे एचओडी का ट्रांसफर हो गया.”

विभागाध्यक्ष के स्थान पर सांवले, भरे शरीर के प्रसन्न चेहरेवाले सप्रे सर आ गए. सूत्रों से ज्ञात हुआ दो बच्चोंवाले सर विधुर हैं. उनके बेटे तकनीकी पढ़ाई के लिए दिल्ली में हैं और परिसर के क्वार्टर में सर निपट अकेले वास करते हैं. प्रसन्नचित्त सप्रे सर की उपस्थिति में रसायन विभाग में किसी सीमा तक फील गुड वाला माहौल बनने लगा. हमारे शुरुआती दो पीरियड थ्योरी के होते, फिर चार पीरियड प्रैक्टिकल के. जब गैस प्लांट में ख़राबी आ जाती, हाइड्रोजन सल्फाइड गैस का उत्पादन न होता. गैस के बिना प्रैक्टिकल संभव नहीं होगा देखकर फाइनल की छात्राएं दुखी हो जातीं, जबकि स्थिति का लाभ उठाते हुए हम छात्राएं बारह से तीन का समय सिनेमा हॉल में गुज़ार देतीं. सिंधु अपवाद थी. दूसरे दिन क्लास में जोशो-जुनून के साथ फिल्म की समीक्षा की जाती. हम लोग समीक्षा में व्यस्त थे कि कॉरीडोर से गुज़र रही ज्वाला मैडम प्रकट हो गईं.

“किसकी क्लास है?”

हमारे दिल बैठ गए.

सिंधु ने आधिकारिक तौर पर बताया कि निशिगंधा मैडम की फिज़िकल केमिस्ट्री.

“निशिगंधा?” मैडम ने वहशी मुख बनाया.

“निशिगंधा पढ़ाना नहीं चाहती और तुम लोग पढ़ना नहीं चाहतीं. बंक मारकर फिल्में देखो. फेल होकर विभाग की छवि ख़राब करो, ऐसा बोगस बैच…”

मैडम धाराप्रवाह बोलती जा रही थीं कि तभी सप्रे सर दनदनाते हुए क्लास में घुस आए.

“क्या कर रही हो लड़कियां?” मैडम ने सूचना दी, “चीख रही हैं. मास्टर डिग्री लेनेवाली हैं, लेकिन तमीज़ नाममात्र नहीं है.”

मैडम पर कोमल नज़र डाल, सर छात्राओं की ओर मुड़े, “तुम लोग मास्टर डिग्री लेनेवाली हो. हम भी मास्टर. तुम भी मास्टर. पीजी में छात्र और अध्यापक एक बराबर हो जाते हैं. आपस में सामंजस्य होना चाहिए. किसकी क्लास है?”

जवाब मैडम ने दिया, “निशिगंधा की. उनके बच्चे की छमाही परीक्षा है. छुट्टी लेकर उसे कोर्स रटा रही होंगी. मुझे ड्यूटी से भागनेवाले लोग बर्दाश्त नहीं. सर आपको स्ट्रिक्ट होना चाहिए.”

यह भी पढ़ेलेट मैरेज को स्वीकारने लगा है समाज (Late Married Are Being Accepted By Society)

“ठीक कहती हैं आप.” सर ने प्रेम से मैडम को देखते हुए कहा. सप्रे सर कदाचित पहले शख़्स होंगे, जो मैडम को इस तरह प्यार से देखने का साहस कर सके थे. उनके इस तरह नज़रभर देखने से मानो एक पुख्ता सूत्र हम लोगों के हाथ लग गया और हम लोग अप्रत्याशित पर विचार करने लगे.

सप्रे सर विधुर, ज्वाला मैडम कुंआरी. यदि यह मिलन हो जाए, तो मैडम का घर बस जाए और सर के दिल के वीराने में बहार आ जाए.

“नामुमकिन!”

“सर, मैडम को बहुत दुलार से देखते हैं. पछताएंगे. मैडम झिड़कती कितना हैं.”

“कोई प्रेम करनेवाला नहीं मिला, इसलिए झिड़कती हैं. मिल जाए, तो वे भी सुधर जाएं.”

छात्राएं सप्रे सर की नज़र ताड़ने लगीं.

जल्द ही विभाग ने इस अनुराग का सुराग पा लिया. कॉलेज में अक्सर सेमिनार होते थे, जिसमें बाहर से आए प्राध्यापकों के व्याख्यान होते. सप्रे सर की सुपुर्दगी में यह पहला सेमिनार था. सर के निर्देशानुसार सभी छात्राओं को छोटे-छोटे पुष्प गुच्छ दिए गए कि प्रमुख अतिथि को थमाते हुए अपना परिचय देना होगा. छात्राएं अतिथि को पुष्प गुच्छ पकड़ाएंगी. मैडम नाराज़ हो गईं.

“ल़ड़कियो, यह ड्रामा नहीं होगा. फूलों को इकट्ठा कर गुलदस्ते में सजाओ और गुलदस्ता गेस्ट की मेज़ पर रखो. परिचय अपने स्थान पर खड़े होकर दे देना. तुम लोगों को तो यहां के नियम मालूम हैं.” अंतिम वाक्य मैडम ने फाइनल की छात्राओं से कहा.

“सप्रे सर भोले हैं.” फाइनल की छात्रा ने स्पष्टीकरण दिया.

“सर क्या जानें.” मैडम ने कुछ-कुछ होता है वाली भावदशा में कहा. सिंधु ने अपने अधिकारों का प्रयोग करते हुए पुष्प गुच्छ सबसे छीने और गुलदस्ते में ठूंस दिए. व्यस्तता में डूबे सप्रे सर आए और मेज़ पर सजा भारी गुलदस्ता देख दंग हुए, “लड़कियो, तुम लोगों को समझ में नहीं आता?”

मैडम आगे कूद आईं, “हमारी छात्राएं किसी को फूल पकड़ाएं, यह भद्दा लगेगा.”

मैडम पहली मर्तबा छात्राओं को ‘हमारी’ घोषित कर रही थीं. सप्रे सर ने अजब भाव में कहा, “भद्दा क्या है? औपचारिकता है. मैं पहले जहां था, वहां ऐसे ही होता था.”

“यहां नहीं होता.”

“आपकी मर्ज़ी.”

सप्रे सर समर्पित.

वे दुर्लभ क्षण थे. हमने मैडम की चढ़ी हुई नज़रों को मुलायम पड़ते देखा. मुस्कुराते देखा, जो अब तक नहीं देखा था. शायद सिंधु ने देखा होगा.

मैडम साफ़तौर पर परिवर्तन से गुज़र रही थीं.

प्रेम में बड़ी शक्ति होती है, यह प्रमाणित हो रहा था.

सप्रे सर अनोखे सिद्ध हो रहे थे.

मैडम हमारे साथ प्रयोगशाला में होतीं और सप्रे सर किसी बहाने राउंड पर आ जाते.

मैडम हमारी अयोग्यता साबित करने लगतीं.

सर पर फ़र्क़ नहीं पड़ता, “ठंड बहुत है. लड़कियां अपना काम कर रही हैं. आइए, चाय पीते हैं. घर से मंगवाई है.”

“नहीं… नहीं.”

नहीं, नहीं करते हुए मैडम, सर के पीछे जिस आज्ञाकारिता से जातीं, उससे उनके भीतर खिल रहे मधुर भाव का आभास मिलता था.

और हमने पाया ज्वाला मैडम के स्वभाव में मधुरता आ रही है. कठोर मुद्रा नरम पड़ने लगी है. भिंचते जबड़े ढीले पड़ जाते हैं. कटाक्ष करते-करते थम जाती हैं, मानो अपनी कठोर छवि और पिघलती मनःस्थिति के बीच संघर्षरत हैं. छात्राओं को कभी कुछ अनपेक्षित कहना चाहतीं, तो सप्रे सर संतुलन के लिए हाज़िर.

“आप परेशान होना छोड़ो मैडम. ये लोग नहीं सुधरेंगी. बोगस बैच है.”

यह भी पढ़ेग़ुस्सा कम करने और मन शांत करने के आसान उपाय (Anger Management: How To Deal With Anger)

मैडम नज़ाकत से सर को देखतीं और पलकें झुका लेतीं. झुकी पलकें विस्मयकारी प्रेम की पुष्टि करती थीं. फिर भी मैडम के विवाह की सूचना हम लोगों को अविश्‍वसनीय, बल्कि अस्वाभाविक लग रही थी. एक अप्रत्याशित घटना. अधीरता में हम सभी छात्राएं एक साथ बोलने लगी थीं, “सर कमाल के निकले. इस्पात को पिघला दिया.”

“प्रेम में बड़ी ताक़त होती है.”

“इस उम्र में सामंजस्य बैठाने में समस्या होगी.

शादी करनी ही थी, तो ठीक उम्र में कर लेतीं.”

“तब सप्रे सर नहीं मिले थे.”

“सोचो तो मैडम सज-धजकर कैसी लगेंगी? चूड़ी, बिंदी, सिंदूर, मंगलसूत्र…”

“मुझे लगता है, वे ये साज-शृंगार नहीं करेंगी. जैसे सादगी से रहती हैं, वैसे ही रहेंगी.”

सचमुच!

विवाह के बाद कॉलेज आई ज्वाला मैडम की वेशभूषा में कुछ बदलाव के साथ पहले जैसी ही सादगी थी. बस, स़फेद ब्लाउज़ की जगह पर मैचिंग ब्लाउज़, माथे पर छोटी बिंदी, हाथ में कांच के कड़े और वही पुराने डायलवाली घड़ी.

कुल मिलाकर वे हमें पहली बार स्वाभाविक लगी थीं.

Sushma Munindra

     सुषमा मुनीन्द्र

 अधिक शॉर्ट स्टोरीज के लिए यहाँ क्लिक करें – SHORT STORiES

कहानी- ओल्ड इज़ गोल्ड (Short Story- Old Is Gold)  

 

“ओह! कम ऑन. आरती वो नहीं, तो क्या हम गाएंगे? काश! मेरी भी ऐसी इन-लॉ होतीं.” तभी विनीता बोल उठी, “शिल्पी, हमसे नहीं मिलाओगी अपनी इन-लॉ को? हम लोग तो तरसते हैं कोई बुज़ुर्ग साथ रहे. कितना ईज़ी हो जाता है हमारे लिए भी और बच्चों के लिए भी.” इन बातों से शिल्पी हैरान रह गई. वो सोचती थी कि सभी सहेलियों की चाहत न्यूक्लियर फैमिली ही होगी.

Kahani

डोरबेल बजी तो शिल्पी चौंक गई. दिन के तीन बजे कौन हो सकता है? दरवाज़ा खोला, तो हैरान रह गई. “दीप्ति तुम? इस समय?”

दीप्ति अधीरता से बोली, “शिल्पी, तेरी इन-लॉ घर में ही हैं न?”

“हां, वो कहां जाएंगी? मगर…”

“अगर-मगर छोड़, मुझे उनसे ही मिलना है.”

“उनसे?” शिल्पी आश्‍चर्य से बोली.

“हां, तीज आ रही है न! कितने सालों से ऐसे ही रस्म-सी निभाती आ रही हूं. इस बार सोचा उनसे सारे डिटेल पूछ लूं. कितनी गुणी व जानकार हैं. प्लीज़, चल न उनके कमरे में.” दीप्ति तो जैसे घोड़े पर सवार थी. शिल्पी सोच रही थी कि यहां उसकी सास की कितनी कद्र हो रही है, जबकि उसका ख़्याल कुछ और ही था. दीप्ति के जाने के बाद उसे पुरानी बातें याद आने लगीं.

तीन-चार महीने पहले की बात रही होगी. शाम को ऑफिस से लौटकर रवि सोच में डूबा था. शिल्पी बोली, “क्या हुआ, तुम्हारी तबीयत तो ठीक है? ऑफिस की कोई बात तो नहीं?”

“मेरी तबीयत ठीक है. दिन में सतीश का फोन आया था कि मां की तबीयत कुछ ठीक नहीं रहती. आजकल कुछ खाती-पीती भी नहीं. जाने क्या सोचा करती हैं.” रवि के स्वर में चिंता व पीड़ा झलक उठी.

“यह कौन-सी बड़ी समस्या है कि तुम इतने चिंतित हो रहे हो. वो लोग कुछ पैसा चाह रहे होंगे. तुम एक-डेढ़ हज़ार रुपए भेज दो और कह दो वहीं सरकारी अस्पताल में दिखा दें. पैसा मिल जाएगा, तो उन लोगों को रास्ता भी ख़ुद ही सूझेगा.” शिल्पी ने दरियादिली की आड़ में समझदारी दिखाई.

रवि की मां पार्वतीजी फैज़ाबाद में एक गांव में रहती थीं. इकलौता बेटा रवि गुड़गांव में अच्छी पोज़ीशन पर था. लक्ज़री अपार्टमेंट में अपना फ्लैट, महंगी कार आदि सब ख़रीद चुका था. कुछ ही दिन पहले पिताजी का निधन होने पर उसने मां को साथ चलने की बहुत ज़िद की, पर उन्होंने ही मना कर दिया कि यहां तुम्हारे पिताजी की यादें जुड़ी हैं. सारा जीवन यहीं बिता दिया, तो बुढ़ापे के दो-चार साल भी कट जाएंगे. गांव में बड़ा खानदानी मकान था, जिसमें चाचा का भी परिवार संयुक्त रूप से रहता था. इसलिए अकेलेपन या खाना बनाने की भी कोई समस्या नहीं थी. खेती-बाड़ी सम्मिलित थी, जिसे उसका चचेरा भाई सतीश देखता था. उसकी पत्नी पूरे घर की देखभाल के साथ मां को भी खाना व दवा देने की सारी ज़िम्मेदारी ख़ुशी-ख़ुशी निभाती थी.

यह भी पढ़ेपैरेंट्स एंड सीनियर सिटीजन्स एक्ट: बुज़ुर्ग जानें अपने अधिकार (Parents And Senior Citizens Act: Know Your Rights)

“नहीं शिल्पी, इतना आसान नहीं है. मुझे लगता है कि पिताजी के बाद मां एकदम अकेली पड़ गई हैं और इस समय उनको हमारी ज़रूरत है. भले ही वो कुछ न कहें, पर मुझे बस इस बात का डर है कि ज़्यादा अकेलेपन की वजह से मां कहीं डिप्रेशन में न चली जाएं. इसलिए सोचता हूं कुछ दिनों के लिए उनको यहीं ले आऊं. कुछ दिन बाद यदि वो चाहें, तो गांव वापस पहुंचा आऊंगा.” रवि ने कहा.

“ऐसा कैसे हो सकता है?” शिल्पी ने तुरंत तेवर बदले. “यहां इस पॉश सोसायटी में उनको कहां रखेंगे और कुल तीन ही तो कमरे हैं. ड्रॉइंगरूम, हमारा बेडरूम और एक बच्चों का कमरा. कहां रखोगे उनको? जगह भी है? और जब बच्चे छोटे थे सहारे के लिए बुलाया था, तब तो आई नहीं और अब बोझा बनने को तैयार हैं.” कटु स्वर में बड़बड़ाते हुए शिल्पी ने अपने सारे तीर एक साथ छोड़ दिए.

“बात समझो शिल्पी. वे मेरी मां हैं, कोई बोझ नहीं और न ही कोई आउटडेटेड फर्नीचर हैं कि पॉश सोसायटी में उनको लाने में शर्म आए और जगह घर में नहीं दिल में होनी चाहिए. जो जी में आए उल्टा-सीधा मत बोलो. उस समय पिताजी यहां आते नहीं और अपने स्वार्थ के लिए पिताजी को गांव में अकेले छोड़कर मां को बुलाना व्यावहारिक नहीं होगा, यही सोचकर मैंने ही उनसे नहीं कहा था, तो इसमें उनका क्या दोष? और फिर वे अभी भी अपनी इच्छा से तो यहां आ नहीं रही हैं, मैं ही ज़िद करके लाऊंगा. और अगर इकलौता बेटा ही संकट के समय काम नहीं आएगा, तो कब काम आएगा? शिल्पी, परिवार इसीलिए होते हैं. माता-पिता, बेटा-बहू, भाई-बहन- ये सब ऐसे रिश्ते हैं कि इनसे ही हमारी ख़ुशियां बढ़ती हैं और दुख घटते हैं. रही बात जगह की, तो वे बच्चों के कमरे में रह लेंगी.” रवि ने ग़ुस्से पर क़ाबू रखते हुए अपने स्वर में कुछ दृढ़ता लाते हुए कहा.

“जब तुमने सब पहले ही सोच लिया है, तो मुझसे क्यों पूछ रहे हो. जो मर्ज़ी करो.” शिल्पी ग़ुस्से में उठकर चल दी. वो जानती थी कि बच्चे अपनी दादी के साथ ख़ुशी-ख़ुशी एडजस्ट कर लेंगे, क्योंकि उनकी दादी का स्वभाव ही ऐसा था. घर-गृहस्थी की समस्या या सिलाई-बुनाई-कढ़ाई हो, विभिन्न व्यंजन बनाना या घर संभालना उनका कोई सानी न था. रवि समर वेकेशंस में रतन, रुचि व शिल्पी के साथ कुछ दिन अपने गांव ज़रूर जाता, ताकि बच्चों को अपने पूरे परिवार को जानने-समझने का मौक़ा मिले. बच्चों को दादा-दादी का स्नेह से परिपूर्ण स्वभाव, खपरैल वाले मकान, खेत-खलिहान, तालाब, बाग़-बगीचे बहुत अच्छे लगते.

रवि अपनी ज़िद से मां को मनाकर ले ही आया. बच्चों ने उनको अपने कमरे में रखा या दिल में यह तो पता नहीं, पर वे उनको हर समय घेरे रहते. एकल परिवारों में शायद टीवी ही बच्चों के सुख-दुख का साथी होता है, परंतु स्कूल से आकर उनको छोटी-छोटी बातें बतानेवाले बच्चे यह तक भूल गए कि घर में टीवी भी है. रात को दादी के एक ओर रतन, तो दूसरी ओर रुचि लेटकर कहानी सुनते-सुनते सोते, वरना पांच वर्षीया रुचि अक्सर शिल्पी के साथ सोने की ज़िद करती थी.

शिल्पी का मन किचन में अधिक न लगता इसलिए जैसे-तैसे निपटाती, पर पार्वतीजी विभिन्न पौष्टिक व्यंजन बच्चों को मान-मनुहार करके खिलातीं. उनको बच्चों का साथ बहुत भाता, बल्कि वे ख़ुद ही बच्चा बनकर कभी उनके साथ लूडो, कैरम बोर्ड सहित अन्य गेम्स खेलतीं, तो कभी बातें करतीं. बच्चे भी चाहते हैं कि मन की बातें किसी से शेयर करें और इसके लिए बड़े-बुज़ुर्ग सबसे अच्छे साथी होते हैं. बच्चों के आर्ट-क्राफ्ट के होमवर्क शिल्पी के सिरदर्द थे, पर पार्वतीजी मनोयोग से करातीं. कुछ लोगों की स्कूली शिक्षा भले ही कम हो, पर मनोविज्ञान का अद्भुत ज्ञान होता है. पार्वतीजी भी भले ही बच्चों को डांटती-फटकारती न थीं, पर परोक्ष रूप से अनुशासन, संस्कार, सद्गुण, सदाचार आदि विकसित कर रही थीं.

उस दिन किटी का नंबर शिल्पी का था. उसने सासूमां को बच्चों के कमरे में ही रहने की हिदायत दी थी. वो नहीं चाहती थी कि उसकी आउटडेटेड सास दिखें और उसकी रेपुटेशन ख़राब हो. शाम के पांच बजे थे कि एकाएक मधुर स्वर गूंज उठा, “ओम् जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे। भक्तजनों के संकट क्षण में दूर करें…” शिल्पी असहज होने लगी. “यह क्या शिल्पी?” रूपा ने पूछा ही था कि शिल्पी सफ़ाई देने लगी, “सॉरी. वो मेरी मदर इन-लॉ आई हैं. पुराने ख़्यालों की हैं न, इसलिए आरती-भजन गाती हैं.” उसके चेहरे पर झेंप साफ़ दिख रही थी.

तब तक सोनल ठहाका मारकर बोली, “ओह! कम ऑन. आरती वो नहीं, तो क्या हम गाएंगे? काश! मेरी भी ऐसी इन-लॉ होतीं.” तभी विनीता बोल उठी, “शिल्पी, हम से नहीं मिलाओगी अपनी इन-लॉ को? हम लोग तो तरसते हैं कोई बुज़ुर्ग साथ रहे. कितना ईज़ी हो जाता है हमारे लिए भी और बच्चों के लिए भी.” इन बातों से शिल्पी हैरान रह गई. वो सोचती थी कि सभी सहेलियों की चाहत न्यूक्लियर फैमिली ही होगी, क्योंकि सास-ससुर का साथ स्वच्छंद जीवन में बहुत बाधक होता है.

यह भी पढ़ेइन केमिकल्स से बचाएं अपने बच्चों को… (Protect Your Children From These Chemicals)

सबके कहने से मजबूर शिल्पी पार्वतीजी को बुला लाई. कॉटन की सादी साड़ी और सुनहरे फ्रेम के चश्मे में पार्वतीजी का गरिमामय व्यक्तित्व, ममता से भरी आंखें और आत्मीय मुस्कान से अभिभूत सारी सहेलियां उठ खड़ी हुईं. “बैठो-बैठो तुम सब तो मेरी बेटियां हो.” पार्वतीजी की बात से तो वे सब ऐसे खिल उठीं जैसे सूखी लता पर सावन की वर्षा हो. “जी पहले आप बैठिए.” रूपा की बात सुनकर पार्वतीजी बैठ गईं.

“मांजी, आप कितना अच्छा गाती हैं. कुछ सुनाइए न?” दीप्ति की बात पर पार्वतीजी मुस्कुरा दीं. “अरे बेटा, अब वो स्वर नहीं रह गया, फिर भी कभी सुना दूंगी. अरे, अगले हफ़्ते जन्माष्टमी है. उस दिन भजन-संध्या रख लो. तुम सब भजन सुनाना, तो मैं भी सुना दूंगी.” पार्वतीजी की बात पर सब खिल उठीं. पहली बार ऐसा कार्यक्रम बना था. पार्वतीजी की बनाई रंगोली और

जन्माष्टमी की सजावट तो सब देखते ही रह गए. फिर उन्होंने ढोलक बजाते हुए ऐसे भजन गाए कि समां बंध गया. क्या बच्चे, क्या बड़े सभी देर रात तक आनंदित होते रहे.

अब तो पार्वतीजी जैसे सब की सास, बल्कि मां बन गई थीं. शिल्पी की सहेलियां किसी न किसी बहाने उनको घेरे रहतीं. कभी कोई नए-पुराने व्यंजन सीखता, अचार-सॉस की विधि लिखता, तो कोई त्योहारों की कथा पूछता. कितने ही भजन व लोकगीत वे उनसे पूछकर लिख चुकी थीं. बाज़ार के अचार की आदी सहेलियों को पार्वती के बनाए सिंघाड़े के अचार ने तो दीवाना ही कर दिया था, इसलिए सभी उनसे अचार बनाना सीख चुकी थीं.

दीप्ति की बेटी को सिंथसाइ़जर सीखने का बहुत क्रे़ज था, पर आसपास म्यूज़िक टीचर न होने से मायूस थी. पार्वतीजी को पता चला, तो बोलीं, “कोई बात नहीं, मैं सिखा दूंगी. तुम्हारे विदेशी बाजे और हारमोनियम का की-बोर्ड एक ही तो है.” उसके बाद दो-तीन बच्चे जब-तब सिंथसाइ़जर सीखने पहुंच जाते. एक दिन दीप्ति ने कहा, “मांजी, अगर आप घर पर म्यूज़िक क्लासेस शुरू कर दें, तो कितनी इनकम हो जाएगी.” इस पर पार्वतीजी मुस्कुराकर बोलीं, “अरे बेटा, पैसा क्या करूंगी. मेरी इनकम तो तुम बेटियों का प्यार और इन बच्चों का अपनापन है.”

अपने बेटे के घर व परिजनों के बीच रहकर प्रेम की धूप से पार्वतीजी का अवसाद तो कोहरे के समान तिरोहित हो चुका था. स्वास्थ्य भी सुधर गया था. वृद्धावस्था में अपनों का साथ संजीवनी के समान होता है, जो जीवन को उत्साह से भर देता है और जीने के नए-नए बहाने भी दे देता है. बुज़ुर्ग वैसे ही मग्न हो जाते हैं जैसे कि बच्चे खिलौने से होते हैं. शायद बच्चों और बुज़ुर्गों को एक-दूसरे का साथ कुछ अधिक भाता है, जो आजकल दुर्लभ होता जा रहा है.

रवि भी कुछ दिनों से शिल्पी में बदलाव महसूस कर रहा था कि मां के यहां रहने से शिल्पी ख़ुश ही है. इसलिए रात में जान-बूझकर बोला, “मां का स्वास्थ्य तो सुधर ही गया है, तो क्यों न गांव छोड़ आऊं. तुम भी सोचती होगी कि इतने महीने हो गए और स्वस्थ होने के बावजूद बोझ बनी हुई हैं.”

शिल्पी पुरानी बातों को लेकर ग्लानि महसूस करती थी, परंतु कैसे कहती कि उनके आने से ज़िंदगी बदल गई है. इसलिए परोक्ष रूप से बोली, “लेकिन ऐसा न हो कि वहां जाकर फिर बीमार हो जाएं और तुम परेशान हो जाओ. इसलिए कुछ दिन और रह लेने दो.” रवि छेड़ने के लिए बोला, “फिर सोच लो. मैं तो इसलिए कह रहा था कि तुम अपनी सासूमां से परेशान न हो गई हो?”

इस पर शिल्पी बोली, “ऐसा नहीं है. वे दूसरों जैसी नहीं हैं. गुणी व अनुभवी तो हैं ही, अपने व्यवहार से सबको अपना बना लेती हैं. उनकी वैल्यू मुझे अब समझ आई. मेरी सहेलियों में ऐसी मशहूर हो जाएंगी मैंने कभी सोचा भी नहीं था. बच्चे भी कितने बदल गए हैं. टीवी से तो पीछा छूटा ही, घर की बनी डिशेज़ भी खाने लगे हैं. समय पर सोना, होमवर्क करना और क्लास में रैंक भी कितनी अच्छी आई है. दादी ने तो उनको एकदम बदल ही दिया. रवि उन्हें यहीं रहने दो.” शिल्पी के मुंह से सच निकल ही गया.

“ठीक है, जैसी तुम्हारी मर्ज़ी. वैसे मुझे लगता है उनको यहां रोकने की वजह कुछ और ही है.” रवि ने कहा, तो शिल्पी हैरानी से पूछने लगी, “ऐसी और क्या वजह हो सकती है?”

“अरे भाई, अब रुचि यहां सोने की ज़िद जो नहीं करती. अब तुमको पूरी फ्रीडम और निश्‍चिंतता जो है.” रवि ने शरारती लहज़े में कहा ही था कि शिल्पी ने शरमाकर नाइट बल्ब ऑफ कर दिया.

Anoop Shrivastav

अनूप श्रीवास्तव

अधिक शॉर्ट स्टोरीज के लिए यहाँ क्लिक करें – SHORT STORiES

कहानी- नेमप्लेट (Short Story- Nameplate)

“तुमसे मिलने आता ही कौन है? तुम्हारी जितनी भी सहेलियां हैं, वो सब मुझे जानती हैं. बाकी जो लोग तुम्हें जानते हैं, वो तुम्हें मिसेज़ नमन शर्मा के नाम से जानते हैं. और वैसे भी, तुमसे ज़्यादा मिलनेवाले अमन के आते हैं. मैं सोचता हूं मुझे अमन के नाम का नेमप्लेट लगवा लेना चाहिए…”

Kahani

कितनी देर से कॉलबेल बज रही थी. आरोही अंदर बाथरूम में थी. दौड़कर उसने दरवाज़ा खोला. पोस्टमैन खड़ा था बाहर.

“आरोही शर्मा का घर यही है?” उसने पूछा.

“जी हां, यही है. मैं ही आरोही हूं.”

“अच्छा-अच्छा, नमन शर्मा का नेमप्लेट देखा था बाहर. आप उनकी मिसेज़ होंगी. अगली बार से भेजनेवाले को बोलना पते में नमनजी का नाम अवश्य लिखें. ढूंढ़ने में परेशानी होती है. अब सब उन्हीं को जानते हैं न.”

आज फिर आरोही को काम करते-करते देर हो गई थी. कितना भी जल्दी करो, काम बारह बजे के पहले ख़त्म ही नहीं होता. अभी थोड़ी देर में अमन स्कूल से आ जाएगा. फिर उसे वक़्त मिल ही नहीं पाएगा, अपनी कहानी पूरी करने का.

नमन और आरोही की शादी को पांच साल हो गए थे. उनका चार साल का एक बेटा था ‘अमन’. नमन एक मल्टीनेशनल कंपनी में अच्छे पद पर थे.

आरोही भी काफ़ी पढ़ी-लिखी थी, लेकिन बेटे और घर की ज़िम्मेदारियों की वजह से जॉब नहीं कर पा रही थी. कॉलेज के दिनों से ही उसे लिखना बहुत पसंद था. शादी के बाद जब भी समय मिलता, वो अपनी मन की उधेड़बुन को काग़ज़ पर उतार लेती.

यह भी पढ़ेपति की ग़लत आदतों को यूं छुड़ाएं (Make Your Husband Quit His Bad Habits)

“मैडम-मैडम.” पोस्टमैन की आवाज़ से आरोही अपनी सोच से बाहर आई.

“मैडम, ख़त पर साहब का नाम होता, तो पूछना नहीं पड़ता न! नेमप्लेट देखकर पहचान लेता. अब बताइए कितने फ्लैटों में पूछना पड़ा तब कहीं…”

“थैंक्यू भइया, आगे से ध्यान रखूंगी.”

कहकर आरोही ने चिट्ठी लेकर दरवाज़ा बंद कर लिया. सोच रही थी आज नमन आएंगे, तो बात करेगी नेमप्लेट के लिए.शाम को नमन ऑफिस से आते ही अमन के साथ खेलने लग गए. रात का खाना निपटाकर, अमन के सो जाने के बाद आरोही ने बात शुरू की.

“नमन, मैं सोच रही थी बाहर मेरे नाम का भी नेम-प्लेट लगवा लें तो… मेरे नाम से ख़त आए या कोई मुझसे मिलने आए, तो द़िक्क़त नहीं होगी. आज मां की चिट्ठी आई थी तो वो…”

थोड़ी देर नमन उसे देखते रहे. फिर हंसने लगे. आरोही को समझ नहीं आ रहा था कि इसमें हंसने की क्या बात है?

आरोही को अपनी तरफ़ सवालिया नज़रों से देखते देख नमन ने अपनी हंसी रोक दी और बोले, “सॉरी आरोही, पर तुम भी खाली बैठे-बैठे क्या सोचती रहती हो? तुमसे मिलने आता ही कौन है? तुम्हारी जितनी भी सहेलियां हैं, वो सब मुझे जानती हैं. बाकी जो लोग तुम्हें जानते हैं, वो तुम्हें मिसेज़ नमन शर्मा के नाम से जानते हैं. और वैसे भी, तुमसे ज़्यादा मिलनेवाले अमन के आते हैं. मैं सोचता हूं मुझे अमन के नाम का नेमप्लेट लगवा लेना चाहिए. चलो अब सो जाओ जानू और मुझे भी सोने दो. बहुत रात हो चुकी है.”

बात चुभनेवाली ज़रूर थी, पर सच थी और ये आरोही भी जानती थी.

देखते-देखते दो साल बीत गए. इन दो सालों में काफ़ी कुछ बदल गया था. नहीं बदली थी, तो आरोही की दिनचर्या. हां, अब उसने घर का काम करने के लिए एक कामवाली लगा ली थी. जो समय बचता, उसमें वह एक कहानी लिखने लगी थी. आज उसकी कहानी पूरी हो चुकी थी.

यह भी पढ़ेसेल्फी की लत से कैसे बचें? (Side Effects Of Selfie Addiction)

समझ नहीं पा रही थी कि क्या करे? नमन को बताने का मन नहीं था. नमन क्या, उसे ख़ुद अपने ऊपर भरोसा नहीं था. उसने सोचा, छोड़ो ऐसे ही रहने देते हैं.

दोपहर में एक पत्रिका के पन्ने पलटते हुए उसने देखा ‘कहानी प्रतियोगिता’. प्रथम स्थान पाने वाले को 50 हज़ार नक़द इनाम मिलनेवाला था. नाम मिलता सो अलग. जीतनेवाले का साक्षात्कार भी उसी पत्रिका में छपनेवाला था. यही नहीं, जीतनेवाले को एक उपन्यास भी लिखने का मौक़ा दिया जाएगा.

आरोही जानती थी कि उसकी कहानी कुछ ख़ास नहीं थी. फिर भी, उसने उस कहानी को दो साल दिए थे.

अचानक फोन की घंटी बजी. पापा थे फोन पर. उसने इस कहानी के बारे में स़िर्फ उन्हीं को बताया था.

“बेटा एक बार कोशिश तो करो. कोशिश किए बिना हार जाना तो ग़लत है. उससे अच्छा तो कोशिश करके हारना है. इससे कम से कम ये तसल्ली तो रहती है कि मैंने कोशिश की. और क्या पता अगली कोशिश क़ामयाब ही हो जाए.”

आख़िर उसने कहानी पोस्ट कर दी. उस बात को पांच महीने बीत गए थे. आरोही भूल भी चुकी थी कि उसने कोई कहानी भी भेजी थी या फिर भूलने की कोशिश में लगी थी.

रविवार का दिन था. नमन और अमन घर पर ही थे. फोन की घंटी बजी, तो नमन ने फोन उठाया. कोई ज़रूरी बात थी, तभी काफ़ी देर तक फोन पर बात करते रहे.

अगले दिन, सुबह जब आरोही उठी, तो घर एकदम शांत था. नमन और अमन दोनों ही बिस्तर पर नहीं थे. जैसे ही उठकर ड्रॉइंगरूम में आई, तभी ज़ोरदार शोर से उसका स्वागत हुआ. उसका घर उसके दोस्तों से भरा हुआ था.

सब उसे बधाई दे रहे थे. आज आरोही का जन्मदिन था. नमन सबको बड़े गर्व से बता रहे थे कि आरोही की कहानी को प्रथम पुरस्कार मिला है. संपादक कह रहे थे कि कई प्रकाशक कंपनियां चाहती हैं कि वो उनके लिए उपन्यास लिखे, लेकिन आरोही का पहला उपन्यास तो वो ही…”

आरोही सब को धन्यवाद दे रही थी.

पापा-मम्मी, सास-ससुर, भाई-भाभी सबके फोन आ रहे थे. सबके जाने के बाद आरोही नमन की बांहों में समा गई.

“मुझे कल ही पता चल गया था. मुझे माफ़ करना, मैंने तुम्हें नहीं बताया. मैं तुम्हें आज के दिन बताना चाहता था. तुम्हारे गिफ्ट के साथ.” नमन बोले.

यह भी पढ़ेलघु उद्योग- पोटैटो वेफर मेकिंग क्रंची बिज़नेस (Small Scale Industries- Start Your Own Potato Wafer-Making Business)  

“गिफ्ट, लेकिन नमन आप मुझे बाहर क्यों ले जा रहे हैं?” आरोही ने पूछा.

“मम्मा आओ न प्लीज़.” अमन अपनी मीठी-सी आवाज़ में बोला.

नमन ने आरोही की आंखें बंद कीं और बाहर दरवाज़े के पास आकर खोल दीं.

आरोही ने देखा, नमन शर्मा के नेमप्लेट के बिल्कुल पास एक सुंदर-सा गोल्डन फ्रेमवाला नेमप्लेट लगा हुआ था. उस नेमप्लेट पर लिखा था- आरोही शर्मा (लेखिका). इसे देख आरोही की आंखें नम हो गईं. जन्मदिन का यह अनोखा तोहफ़ा उसके लिए यादगार बन गया.

– पल्लवी

अधिक शॉर्ट स्टोरीज के लिए यहाँ क्लिक करें – SHORT STORiES

कहानी- परिवर्तन (Short Story- Parivartan)

‘‘एक साधारण-सी दिखनेवाली स्त्री जिसे अबला कहा जाता है, वो भीतर से कितनी बलशाली है. उसके अंदर सोए स्वाभिमान को यदि जगा दिया जाए, तो वो क्या कर सकती है, इस बात का जीवंत उदाहरण है सामने बैठी मेरी सहेली और व्यवसाय में मेरी सहभागी वृंदा. दुखों से जूझती नारी को मैंने बस सहारा दिया और थोड़ा-सा मार्गदर्शन किया, तो उसने मेरे छोटे से काम को विस्तृत बना दिया. आज मुझे जो सम्मान मिला है, उसकी असली हक़दार वही है, क्योंकि वो स्वयंसिद्धा है.’’

Kahani

धीमे क़दमों से घर की ओर आती वृंदा को देखकर उसके बच्चों में उत्साह जागा और वो दौड़कर उससे लिपट गए. वृद्धा सास ने हाथ का सहारा देकर उसके सिर पर रखी सब्ज़ी की टोकरी उतरवायी, ‘‘ये क्या? आज भी कुछ ज़्यादा बिक्री नहीं हुई?’’ उसके प्रश्‍न में पीड़ा छिपी हुई थी. दाने-दाने को मोहताज होते परिवार की आमदनी का एकमात्र ज़रिया यही था. फटे आंचल से चेहरे पर आयी पसीने की बूंदों को साफ़ करके वृंदा धम्म से बैठ गयी. सारा दिन यहां-वहां सिर पर बोझ लादे पैदल चलती रही. इस आशा से कि शायद आज तो उसे मेहनत का फल मिलेगा, पर हमेशा की तरह आज का दिन भी व्यर्थ गया. बच्चों के पीले पड़ते चेहरे की ओर दृष्टिपात करते ही उसकी आंखों से दर्द आंसुओं के रूप में बहने लगा.

तब सास ने ढांढ़स बंधाया, ‘‘कोई बात नहीं, हो सकता है कल ज़्यादा बिक्री हो जाए. चल सब्ज़ी को गीली बोरी में लपेट दे, ताकि सबेरे तक ताज़ी रहे.’’ पत्नी को निराशा से घिरी देखकर अंदर बिस्तर पर पड़े रोगी पति गोपाल का कलेजा मुंह को आ गया. वो अपने भाग्य को कोसने लगा. यदि दुर्घटना में मेरा अंग भंग न होता, तो मेरे परिवार की ये दुर्दशा न होती. ‘‘सुन, तू कोई दूसरा काम क्यों नहीं कर लेती?’’ उसने पत्नी को सलाह दी.

‘‘दूसरा काम… भूल गए क्या, पहले मेरे साथ क्या हुआ था? मेरी ईमानदारी का मालिकों ने क्या सिला दिया था. उनके घर का सब काम मैं पूरी लगन के साथ किया करती थी, लेकिन नौकर की कोई इ़ज़्ज़त नहीं होती. उनके कमरे से पांच सौ रुपए जो उनके ही बेटे ने चुराए थे, उसकी चोरी का इल्ज़ाम उन्होंने मुझ पर लगाया. रातभर पुलिस थाने में बिठवाया. वो तो मैंने एक पुलिस वाले साहब के घर थोड़े दिन काम किया था, उनकी मेमसाब ने दया दिखायी और मुझे झंझट से छुटकारा दिलवाया. बाद में सारी सच्चाई सामने आ गई, पर उससे मेरा खोया हुआ मान तो वापस नहीं आया. इसलिए तौबा, अब किसी के घर में काम नहीं करूंगी.’’

‘‘सब मेरा ही दोष है. यदि मैं हाथ-पैर से लाचार न होता तो आज ये दिन तो नहीं देखने पड़ते. तुम दर-दर की ठोकरें खा रही हो. मां इस बुढ़ापे में मेरी सेवा कर रही है और हमारे दोनों बच्चों का तो बचपन ही छिन गया. ’’ कहते-कहते गोपाल रो पड़ा.

‘‘सुनिए, दिल छोटा मत कीजिए. जब वो दिन नहीं रहे तो ये दिन भी नहीं रहेंगे. जब तक आप भले-चंगे थे तब तक मैंने सुख भोगा. अब मेरा दायित्व है कि मैं आपका हर तरह से ध्यान रखूं. आख़िर मैं आपकी अर्धांगिनी हूं. जब सुख साथ बांटा है तो दुख में भी साथी बनूंगी.’’ वृंदा ने दिलासा दिया और घर का काम निपटाने चली गयी. रातभर वो सोचती रही कि ऐसा क्या करे, जिससे उसके अपनों का दुख-दर्द कम हो जाए. पति एक प्राइवेट कंपनी में ड्राइवर था. आमदनी ठीक थी, सो गुज़ारा अच्छे से हो जाता था. एक सड़क दुर्घटना में पति की जान तो बच गई, पर दोनों पैर और एक हाथ कट गया. जो कुछ रुपया-ज़ेवर पास में था, वो सारा इलाज में ख़र्च हो गया. पेट भरने के लिए उसे बाहर क़दम रखना पड़ा. सास के पास चांदी की एक जोड़ी पायल बची थी, जिसे बेचकर सब्ज़ी बेचने का काम शुरू किया, पर उसकी माली हालत को देखकर कोई उससे सौदा लेना तो क्या, उसकी ओर देखना भी पसंद नहीं करता था. वो दूर-दूर तक भटकती तब कहीं जाकर दो पैसे कमा पाती, जिससे घर के लोगों को दाल-रोटी नसीब हो पाती. आंखों ही आंखों में सारी रात बीत जाती. बच्चों से घर की हालत छिपी नहीं थी. वो अपनी इच्छाओं का दमन करके अपने माता-पिता को सहयोग दे रहे थे.

यह भी पढ़ेमहिलाओं के लिए फाइनेंशियली स्मार्ट बनने के 12 ट्रिक्स (12 Financially Smart Tricks For Women)

सुबह सूरज के उगते ही वृंदा घर का काम निपटाकर सब्ज़ी टोकरी में सजा निकल पड़ी. आधा दिन बीत गया, पर बोहनी नहीं हुई. मन-ही-मन ईश्‍वर से दया की प्रार्थना कर रही थी कि तभी उसके कानों में शब्द टकराए, ‘‘ऐ भाजीवाली, ज़रा सुन तो, इधर आ.’’ वो मुड़ी, ‘‘अरे जया तू….’’ ‘‘कौन… वृंदा… तू इस हालत में!’’ घर के दरवाज़े पर खड़ी महिला दौड़ती हुई बाहर आयी और अपनी सखी का हाथ पकड़कर अंदर ले गयी. ‘‘ये क्या हाल बना रखा है तूने? बिखरे बाल, फटे हुए कपड़े. क्या हो गया है तुझे?’’ उसने प्रश्‍न किया. ‘‘जब भाग्य ख़राब हो तो ऐसी ही दशा हो जाती है. एक हादसे में ये हाथ-पैरों से लाचार हो गए. जो कुछ पास में था, वो एक-एक करके बाज़ार में बिक गया. घर की गाड़ी पलट गयी. पढ़ी-लिखी तो ़ज़्यादा हूं नहीं, जो कहीं नौकरी कर लेती. नौकरानी का काम करके भी कुछ हाथ नहीं आया तो यही काम शुरू कर दिया. मेरी छोड़, तू बता कैसी गुज़र रही है?’’ वृंदा ने विषय को बदला, ‘‘अपनी आंखों से देख ले कि एक समय काम से जी चुराने वाली तेरी ये सहेली अब क्या कर रही है, चल आ.’’ इतना कहकर वो घर के पिछवाड़े ले गई. वहां का दृश्य देखकर वृंदा की आंखें विस्मय से फैल गईं. छह-सात महिलाएं पापड़ बना रही थीं, कुछ महिलाएं एक ओर बड़ियां बना रही थीं, ‘‘तू ये सब क्या..’’

‘‘हां, घर में रहकर मैं अपना छोटा-सा व्यवसाय चला रही हूं. न बाहर जाने का झंझट और न ही किसी की चाकरी. आत्मसम्मान भी बरकरार. है ना मज़े की बात.’’ जया ने खुलासा किया.

‘‘इसमें तो बहुत ख़र्चा आया होगा.’’ वृंदा दुखी मन से बोली.

जया ने उसके मन के भावों को ताड़ लिया, कहने लगी, ‘‘नहीं रे, ये सब तो सूझ-बूझ से कर लिया. जानती तो है तू. पति की छोटी-सी नौकरी में गृहस्थी का ख़र्च चलाना कितना मुश्किल होता है. नौकरी तो अच्छे-अच्छे डिग्रीवालों को नहीं मिलती तो हमें कहां से मिलेगी. मुझे हाथ का काम आता था सो मैंने इसी को व्यवसाय बना लिया.’’

‘‘काम तो मैं भी करती हूं, पर सब्ज़ी बिकती ही नहीं. अब तो इसे भी बंद करने की नौबत आ गयी है. समझ में नहीं आता कि कौन-सा काम करूं?’’

‘‘पहला काम तो यह कर कि मुझे सब्ज़ी दे.’’ जया ने तुरंत आस-पड़ोस की महिलाओं को बुलाया और सब्ज़ियों को बेचकर वृंदा के हाथ में पैसे रख दिए.

जिसको बेचने के लिए वो दो दिन से पसीना बहा रही थी, उसे जया ने कितनी कुशलता से कुछ ही मिनटों में बेच दिया. ‘‘समय बहुत हो गया है. अब चलती हूं.’’ वृंदा ने जया से विदा ली और घर आ गयी. सास ने जब टोकरी को खाली देखा तो उसके चेहरे पर संतोष छा गया. बच्चों के भी चेहरे खिल गए. शाम को भोजन के बाद उसने पति और सास को जया और उसके कामकाज के बारे में बताया, ‘‘तेरी सहेली तो बड़ी समझदार है. उससे ही कुछ गुर सीख ले, ताकि तेरी परेशानी कम हो और घर का गुज़ारा भी हो सके.’’ सासू मां ने सुझाव दे डाला. ‘‘मांजी, आप ठीक कहती हैं. मैं उससे बात करूंगी.’’ रात्रि में उसको बीता समय याद आने लगा. हर काम को बाद में करने का बहाना करने वाली उसकी सहेली जया को सब आलसी कहकर पुकारते थे और वो भी अपने इस नाम से ख़ुश रहती थी. वहीं दूसरी ओर वृंदा घर-भर की दुलारी थी. मां का रसोई में दौड़कर हाथ बंटाती, छोटे भाई-बहनों को भी बख़ूबी संभालती. मोहल्ले में किसी के घर में भी ज़रूरत होती तो वृंदा मदद करने फौरन पहुंच जाती. उसके हाथ का बना अचार तोे सब चटकारे लेकर खाते. सुबह उठी तो वृंदा को लगा कि उसके जीवन में आया अमावस का अंधेरा छंटने वाला है और सुनहरी किरणें तमस को चीरती हुई उसकी ओर आ रही हैं. अगले दिन दोपहर के समय मन में दृढ़ निश्‍चय कर वो जया के घर पहुंची. ‘‘मुझे ख़ुशी होगी कि मैं तेरे कुछ काम आ सकूं.’’ जया ने अपना हाथ उसके हाथ पर रख दिया. ‘‘जया, मैं भी तेरी तरह आत्मसम्मान से जीना चाहती हूं. आत्मनिर्भर बनना चाहती हूं.’’ ‘‘इसमें कोई मुश्किल नहीं है, पर सबसे पहले तो तुझे अपने हुलिए पर ध्यान देना होगा. अरे पहले ये दुनिया चमक-दमक ही देखती है. सामान की पैकिंग यदि अच्छी होगी तो ग्राहक ख़ुद उसकी ओर दौड़ेगा. यदि वो ही ठीक नहीं तो वस्तु कितनी ही अच्छी हो, सब व्यर्थ है.’’

‘‘मेरे पास तो इनके अलावा कपड़े ही नहीं हैं.’’ वृंदा ने अपनी मजबूरी बयान की. ‘‘मैं किसलिए हूं. सहेली क्या बहन नहीं होती. मेरे पास कुछ कपड़े नए रखे हैं, वो तू पहन लेना. किसी भी काम को करने के लिए बहुत ऊंची शिक्षा पाना ज़रूरी नहीं, बस आपके भीतर लगन होनी चाहिए. नारी को स्वयंसिद्धा यूं ही नहीं कहा जाता. उसके भीतर असीमित शक्ति का भंडार होता है. बस उसे जगाने की ज़रूरत है, फिर देख वो कठिनाई को कैसे सरलता में बदल देती है. तुझे भी यही करना है. अपनी क्षमता को पहचान और अपने व्यक्तित्व में थोड़ा बदलाव ला. देखना सफलता तेरे भी क़दम चूमेगी. आज से क्या, बल्कि अभी से तुम मेरे कुटुम्ब की सदस्य हो. हम मिलकर काम करेंगे और जो चार पैसे मिलेंगे, उन्हें आपस में बांट लेंगे.’’

‘‘जया तू तो पूरी की पूरी टीचर बन गई है.’’ वृंदा ने चुटकी ली. दोनों खिलखिलाकर हंस दीं. नए क्षितिज को पाने के लिए वृंदा ने पहली सीढ़ी पर क़दम रख दिया. वो रोज़ आकर काम में हाथ बंटाने लगी.?इससे जुड़कर उसे अपनेपन का एहसास हो रहा था. घर में आय भी बराबर होने लगी. जब उसने निर्माण की प्रक्रिया को भली-भांति समझ लिया तब जया ने उसे लोगों के बीच अपने उत्पाद को बेचने का काम दिया. पहले जो वृंदा फटे कपड़ों, उड़े चेहरा और उलझे बालों में सब्ज़ी बेचने जाया करती थी, वही अब करीने से पहनी हुई साड़ी, सादी-सी चोटी और चेहरे पर आत्मविश्‍वास की चमक से भरपूर बिना किसी हिचक के घर-घर जा रही थी. उसके नए अंदाज़ पर किसी ने उसे फटकार नहीं लगायी, उसका सामान हाथों-हाथ बिकने लगा. अब उसने कुटुम्ब में अचार बनाने का काम भी शुरू कर दिया. अब आमदनी लगातार बढ़ने लगी.

यह भी पढ़ेलघु उद्योग- वड़ा पाव मेकिंग: ज़ायकेदार बिज़नेस (Small Scale Industries- Start Your Own Business With Tasty And Hot Vada Pav)

परिवर्तन चहुं ओर आया. जीवन जो मरुस्थल की भांति बेजान हो गया था, उसको अपनी मेहनत से उपजाऊ भूमि में बदलकर उसमें नए प्राण फूंक दिए. उसके पति गोपाल के लिए उसने एक-एक रुपया जोड़कर कृत्रिम पैरों की व्यवस्था की, बच्चों के नाम स्कूल में लिखवाए. पति ख़ुद को उपेक्षित महसूस न करें, इसके लिए उसने घर बैठे कुछ काम शुरू करवाए. गोपाल ने काग़ज़ से थैली और लिफ़ा़फे बनाने का काम शुरू किया, जिससे उसका मन भी लगने लगा और समय का सदुपयोग भी होने लगा. बच्चे और सास भी इसमें सहायता करने लगे. जो लोग पहले उनकी गरीबी का उपहास करते थे, अब वो उनकी प्रगति से ईर्ष्या कर रहे थे. दिन-महीनों में बीतते चले गए. वृंदा के क़दम विकास के पथ पर निरंतर अग्रसर होते रहे. छोटे से कुटीर उद्योग को उसने बड़े व्यवसाय का रूप दे दिया. जया ने भी अपनी सखी को उसके परिश्रम का फल अपने व्यवसाय में भागीदार बनाकर दिया. वृंदा ने अपने परिवार को फिर से ख़ुशहाल बना दिया… ये सब कमाल उसके व्यक्तित्व में आए परिवर्तन का था. एक दिन जब उनके उद्योग को सरकार की ओर से पुरस्कार मिला, तो जया ने अपनी सफलता का सारा श्रेय वृंदा को दिया, ‘‘एक साधारण-सी दिखनेवाली स्त्री जिसे अबला कहा जाता है, वो भीतर से कितनी बलशाली है. उसके अंदर सोए स्वाभिमान को यदि जगा दिया जाए, तो वो क्या कर सकती है, इस बात का जीवंत उदाहरण है सामने बैठी मेरी सहेली और व्यवसाय में मेरी सहभागी वृंदा. दुखों से जूझती नारी को मैंने बस सहारा दिया और थोड़ा-सा मार्गदर्शन किया, तो उसने मेरे छोटे से काम को विस्तृत बना दिया. आज मुझे जो सम्मान मिला है, उसकी असली हक़दार वही है, क्योंकि वो स्वयंसिद्धा है.’’ सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा और वृंदा की आंखों से ख़ुशी के आंसू छलकने लगे… आज उसने सब कुछ पा लिया था.

– राजेश्‍वरी शुक्ला

अधिक शॉर्ट स्टोरीज के लिए यहाँ क्लिक करें – SHORT STORiES

कहानी- अधूरी कहानी (Short Story- Adhuri Kahani)

‘मेरे उस अधूरे प्यार के नाम, जिसे मैंने जीवनभर पूरी संपूर्णता से चाहा’ चित्रलेखा का पूरा वजूद थरथरा गया. आंखें जैसे गंगा-जमुना बन गईं. प्यार का प्रत्युत्तर… इतनी लंबी तपस्या का फल… मिला भी तो कब, जब ज़िंदगी का लंबा सफ़र तय कर लिया. क्यों किया चित्रगुप्त आपने ऐसा? वह फफक पड़ी. क्यों रखा हमारी कहानी को अधूरा..?

 Hindi Kahani

एयरपोर्ट की सभी औपचारिकताओं को पार कर, सामान चेक इन काउंटर पर जमा करवाकर, चित्रलेखा के हाथ में बोर्डिंग पास आ गया. फिर सिक्युरिटी को पार कर वह एयरपोर्ट के वेटिंग लॉज में आकर बैठ गई.

वह चेन्नई जा रही थी बेटी के पास. बेटी आईआईटी इंजीनियर थी और वहां पर जॉब कर रही थी. कुछ दिनों से तबीयत ख़राब होने व उसमें सुधार न होने की वजह से उसे अचानक चेन्नई जाने का प्रोग्राम बनाना पड़ा था. वह जल्द से जल्द बेटी के पास पहुंच जाना चाहती थी. बेटी के पास जल्दी पहुंचने की बेचैनी उसके अंदर उथल-पुथल मचा रही थी. तभी बगल की कुर्सी पर बैठे सज्जन उसकी तरफ़ मुख़ातिब हुए, “अरे तुम? चेन्नई जा रही हो क्या…?” वह बुरी तरह चौंक गई. उस आवाज़ की सनसनाहट दिल के तारों में जलतरंग छेड़ गई थी.

“हां मैं… पर आप कौन..? क्या आप मुझे जानते हैं?” वह उन सज्जन की तरफ़ मुड़कर देखने लगी.

“तुम तो वैसी ही हो अभी भी चित्रलेखा… इसलिए पहचान में आ गई, पर मुझे कैसे पहचानोगी…” वे सिर से हाथ फेरते चेहरे तक ले आए. अब तक वह भी उन्हें पहचान चुकी थी.

“ओह! आप? अचानक मिले न… मिलने की उम्मीद नहीं थी, इसलिए…” चित्रलेखा किंचित शर्मिंदा हो गई.

“लेकिन आप बहुत बदल गए हैं. शादी भी नहीं की, फिर भी सिर के बाल उड़ गए..?”

यह भी पढ़ेबर्थडे से जानें लव मैरिज होगी या अरेंज मैरिज (Love Or Arranged Marriage: Your Birthdate Can Predict)

इस बार हास्य से उठकर ठहाका मारकर हंस पड़े थे चित्रगुप्त, “यह सिर के बालों का शादी न होने से कनेक्शन समझ में नहीं आया…”

“कनेक्शन तो गहरा है, पर आप नहीं समझेंगे.”

“क्यों?”

“क्योंकि आपने शादी जो नहीं की.” चित्रलेखा खिलखिलाकर हंस पड़ी थी.

“फिर तो तुम्हारे पति भी…?”

“ज़ाहिर है.” दोनों हंस पड़े.

“आपकी नई किताब का ज़िक्र पढ़ा आपकी प्रोफाइल पर… पर उपलब्ध नहीं हो पाई. कैसे मिलेगी?”

“एक सम्मेलन में भाग लेने जा रहा हूं चेन्नई. परसों रात की फ्लाइट है वापसी की, अगर उससे पहले मिल पाओ तो दे जाऊंगा.”

“फोन नंबर बताइए अपना. बेटी का पता भेज देती हूं, जब भी समय मिले आ जाइए. इस बार कॉफी मेरे हाथ की पी लीजिए.”

एक दिन बाद हाथ में किताब लिए उसके दरवाज़े पर हाज़िर थे चित्रगुप्त. वे लगभग 25 साल बाद मिल रहे थे, इसलिए वार्तालाप गति नहीं पकड़ पा रही थी उनके बीच. कॉफी पीते, विचारों में डूबे चित्रगुप्त को देखती हुई चित्रलेखा सोच रही थी कि ज़िंदगी तो बीत ही गई और बीत ही जाएगी तुम्हारे बिना भी, पर तुम्हारे साथ बीतती तो कुछ और बात होती.

छिटपुट बातें कर चित्रगुप्त उठ खड़े हुए, “चलता हूं अब.”

“ठीक है.” वह भी अनमनी-सी उठ खड़ी हुई.

“जाने अब कब मुलाक़ात होगी?” चित्रगुप्त एकाएक बोल पड़े.

“जाने कब?” चित्रलेेखा के होंठ एक मजबूर स्मित हास्य में हल्के से फैले.

प्रत्युत्तर में एक स्मित मुस्कान उसकी तरफ़ उछाल, हाथ जोड़, वे पलटकर चले गए और वह मेज़ पर रखी किताब को हताश-सी घूरती रह गई.

रात का नीरव अंधकार भले ही अकेलापन बढ़ाता हो, पर किसी को याद करने के लिए साथी की तरह होता है. उसकी ज़िंदगी की कहानी की तरह चित्रगुप्त की नई किताब का नाम भी ‘अधूरी कहानी’ था. रात में किताब पढ़ने बैठी, तो ख़ुद अपनी ज़िंदगी की किताब के पन्ने पलटने लगी.

जिस संस्थान से चित्रगुप्त पीएचडी कर रहे थे, वहीं से चंद कदम की दूरी पर स्कूल था, जहां से चित्रलेखा दसवीं की पढ़ाई कर रही थी. पर उसे पता नहीं था कि चित्रगुप्त उसके इतने पास हैं. वह तो उस उम्र से ही उनकी रचनाओं की इतनी दीवानी थी कि उनका लिखा जहां कहीं भी देखती, भूखों की तरह पढ़ती. उसकी अभिन्न सहेली विदिषा के भाई भी चित्रगुप्त के साथ ही पीएचडी कर रहे थे. उसी से चित्रलेखा को चित्रगुप्त के उस संस्थान में होने का पता चला. उस छोटी-सी उम्र में भी वह कभी उनको आते-जाते देख लेती, तो मदहोश हो जाती. लेकिन चित्रगुप्त के लिए दसवीं में पढ़नेवाली चित्रलेखा निहायत ही बच्ची थी.

सहेली विदिषा जब-तब उसे छेड़ देती, “पता नहीं क्या दिखता है तुझे इस काले कलूटे में… नाम भी तो देखो चित्रगुप्त. लगता है जैसे इतिहास के पन्नों से सीधे बाहर निकल आया हो… वैसे तेरा नाम भी चुनकर रखा है अंकल-आंटी ने…”

यह भी पढ़े: 5 तरह के होते हैं पुरुषः जानें उनकी पर्सनैलिटी की रोचक बातें (5 Types Of Men And Interesting Facts About Their Personality)

“चुप… ख़बरदार, मेरे सांवले-सलोने को काला-कलूटा कहा तोे… टॉल, डार्क एंड हैंडसम कितना शानदार लगता है… और उसके बाल जब उलझे हुए उसके माथे पर गिरे रहते हैं… और वैसे भी मैं तो उसके मन-मस्तिष्क की दीवानी हूं, जिसमें इतने तरह के भाव व विचार आते हैं…”

“देख, देख… वो आ रहा है, तेरा टीडीएस…” एक दिन स्कूल के गेट से बाहर निकलते हुए सामने से आ रहे चित्रगुप्त को देखकर विदिषा चिल्लाई. चित्रगुप्त विदिषा के भाई के दोस्त थे. इसलिए आज उसने चित्रलेखा को धकेलते हुए ले जाकर चित्रगुप्त के सामने खड़ा कर दिया.

“भइया, यह मेरी सहेली चित्रलेखा. आपसे बहुत दिनों से मिलना चाहती थी…”

“मुझसे? कहिए क्यों मिलना चाहती हैं आप मुझसे?“ गंभीर चेहरे पर स्मित हास्य रेखा, विद्वता की चमक से प्रद्वीप्त आंखों से टकराकर, उसकी किशोर निगाहें अनायास ही झुक गईं. नाजुक़ गुलाबी अधर किसी तरह फड़फड़ाए.

“जी आपका ऑटोग्राफ चाहिए था. आपकी सारी रचनाएं पढ़ती हूं मैं…“

बच्चों की बात समझ मंद-मंद मुस्कुराते चित्रगुप्त ने अपना ऑटोग्राफ दे दिया था. लेकिन वह और भी तड़प गई थी. पूरे समय न जाने कितनी बार अपने नाजुक़ अधरों से उनका नाम चूमती रहती. अगले दो सालों में चित्रलेखा ने 12वीं के बाद उसी कॉलेज में दाख़िला ले लिया, जहां से चित्रगुप्त पीएचडी कर रहे थे, लेकिन चित्रगुप्त उसे कभी नज़र नहीं आए. शायद उनकी पीएचडी पूरी हो गई थी. चित्रलेखा तड़पती रह गई थी, ‘न जाने कहां रहते हैं’ पत्रिकाओं में उनकी तस्वीर देखती, दिल से लगा लेती. आंखें भीग जातीं, पर यह कहानी शायद तब ख़त्म हो भी जाती, पर इसे तो ख़त्म होना ही नहीं था, बल्कि अधूरी रहना था.

ग्रैजुएशन के बाद एमबीए कर वह एक एफएमसीजी कंपनी में नियुक्त हो गई. और उस समय ब्रैंड मैनेजर के पद पर पदस्त थी. जब अपने किसी प्रोडक्ट की शिकायत को लेकर, बार-बार उससे मिलने को उतारू ज़िद्दी कस्टमर की ज़िद पर वह अपनी कंपनी की रिसेप्शनिस्ट को एक दिन डांट रही थी.

“अरे, आप मुझसे कैसे किसी को मिलाने की बात कर रही हैं.” चित्रलेखा रिसेप्शनिस्ट मिस रीमा पर झुंझला रही थी. “प्रोडक्ट मैंने नहीं बनाया है, कंपनी ने बनाया है. उन्हें कहो कि जाकर कस्टमर केयर में शिकायत करें.”

“लेकिन मैम, वे तो ज़िद पाले बैठे हैं कि वे आपसे मिलकर ही रहेंगे. बड़े अजीब से इंसान हैं. कुछ-कुछ दार्शनिक टाइप के… कहते हैं, आपके हेयर कलर ने उनके बालों को ख़राब कर, उनकी सामाजिक छवि को नुक़सान पहुंचाया है.”

“ये कैसी शिकायत है. उन्हें उनके पुराने प्रोडक्ट के बदले नया प्रोडक्ट मिल जाएगा.”

“पता नहीं, कहते हैं, नया प्रोडक्ट उनकी बिगड़ी हुई सामाजिक छवि की भरपाई नहीं कर सकता. बाल स्ट्रेट से कुछ-कुछ कर्ली हो गए हैं…” कहते-कहते रीमा हंसने लगी. मुस्कुरा तो चित्रलेखा भी गई.

“मैम, एक बार मिल लीजिए मिस्टर चित्रगुप्त से. कई चक्कर लगा चुके हैं. आज भी यहीं बैठे हैं धरना देकर.”

नाम सुनकर कुछ कसमसा गया चित्रलेखा के अंदर, “ठीक है, भेज दो उन्हें.”

थोड़ी देर बाद आगंतुक उसके सामने था. “कहिए.” लैपटॉप पर नज़रें गड़ाए चित्रलेखा बोली.

“मैडम, आप पलभर के लिए आंखों को थोड़ा विराम देंगी, तो मैं अपनी बात कह सकता हूं.”

जानी-पहचानी आवाज़ कहीं हृदय की गहराइयों से रास्ता टटोलती हुई, सतह पर आकर कानों में रस घोल बैठी. उसने तड़पकर आगंतुक की तरफ़ देखा,

“आप?” उसकी आंखें आश्‍चर्य से फैल गईं.

“हां मैं, पर मैं कौन? क्या आप मुझे जानती हैं?” वह सामने कुर्सी पर बैठते हुए बोले.

यह भी पढ़ेलघु उद्योग- चॉकलेट मेकिंग- छोटा इन्वेस्टमेंट बड़ा फायदा (Small Scale Industry- Chocolate Making- Small Investment Big Returns)

चित्रलेखा जड़ हो गई. भला इन्हें वह 15-16 वर्षीया दो चोटी हिलाती, स्कर्ट पहने लड़की कहां याद होगी. आज वह 25 वर्षीया एमएनसी में कार्यरत युवती है.

“जी मैं, आपकी एक पाठिका. हमेशा पढ़ती हूं आपको. जहां से आपने पढ़ाई और पीएचडी की, वहीं से मैंने भी पढ़ाई की है. विदिषा मेरी फ्रेंड थी. शायद याद होगा आपको. मैंने तब आपका ऑटोग्राफ भी लिया था.”

“अच्छा वो.” आज स्मित हास्य रेखा मुस्कान में बदल गई, “तो वह आप थीं. बहुत बदल गईं हैं आप.” चित्रलेखा अनायास पुलकित हो गई, “याद है आपको?” वे कुछ नहीं बोले.

“पर आप बिल्कुल नहीं बदले… आपकी सारी किताबें पढ़ती हूं. अभी लेटेस्टवाली भी पढ़ ली.”

“कैसे समय निकाल लेती हैं?”

“बस जुनून होता है, तो निकल जाता है, जैसे आप लिखने के लिए निकाल लेते हैं, वैसे मैं स़िर्फ आपकी ही किताबें पढ़ती हूं.”

“अच्छा!” वे खुलकर मुस्कुरा दिए थे.

सांवली रंगत पर दिलकश मुस्कुराहट उसके दिल को थोड़ा और बींध गई.

“शाम को क्या कर रही हैं. अगर अन्यथा न लें, तो अपनी इस अज़ीज़ पाठिका के साथ एक कप कॉफी अवश्य पीना चाहूंगा.”

“लेकिन आपको तो… शायद कुछ शिकायत थी कंपनी के प्रोडक्ट से.”

“शिकायत को रहने दीजिए, शाम की कॉफी साथ पीकर शिकायत दूर कर दीजिए.”

दिल ख़ुशी से झूम उठा उसका, “जी मैं पहुंच जाऊंगी…”

शाम को वह कॉफी हाउस पहुंच गई. चित्रगुप्त जितना अच्छा लिखते थे, उतनी ही विशिष्ट उनकी शख़्सियत, उतने ही महान उनके विचार, उतनी ही उच्च उनकी भावनाएं, पर वह तो कुछ और ही चाहती थी.

उनकी कुछ मुलाक़ातें हुई. घर में उसके विवाह की चर्चा अपने अंतिम चरण पर थी.

“मेरा विवाह होनेवाला है.” कॉफी हाउस में एक दिन कॉफी का घूंट भरते हुए वह बोली.

“अच्छा!” पलभर के लिए चित्रगुप्त चौंके. उसकी आंखों में झांका. जैसे कुछ ढूंढ़ना चाह रहे हों, फिर कप उठा लिया.

“क्या करता है?”

“मेरी तरह एमएनसी में काम करता है. आईआईटियन है…”

“कब है शादी?”

वह अंदर से फट पड़ी. क्या लेखक इतने हृदयहीन होते हैं. सारी संवेदनाएं स़िर्फ रचनाओं में ही दिखती हैं. उनका सारा आदर्शवाद, कोमल भावनाएं, कोरी कल्पनाएं होती हैं, जो उनकी पुस्तकों के नायक-नायिका ही बोलते हैं और उनकी प्रेम कहानियों में वर्णित वे कोमल प्रेम भावनाएं..?

“दिसंबर में.” वह निर्विकार स्वर में बोली.

“मेरी अग्रिम बधाई कबूल करो. शादी में बुलाना मत भूलना…” कहकर वे उठ खड़े हुए.

बहुत कुछ बोलना चाहती थी वह, पर चित्रगुप्त के विराट व्यक्तित्व, कुछ उनका मितभाषी स्वभाव, कुछ उन दोनों के बीच आयु के बड़े अंतराल ने होंठों पर चुप्पी के ताले लगा दिए.

चित्रगुप्त उसकी ज़िंदगी से चले गए और मीरा-सी लगन हृदय में लिए उसका विवाह हो गया. वह उनकी किताबें पढ़ती. विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित उनकी रचनाएं पढ़ती. अकेले में उनका प्रोफाइल खंगालकर न जाने क्या ढूंढ़ती रहती और उनके प्रेम में हृदय की दीवानगी और बढ़ती रहती.

पति बच्चों या गृहस्थी से प्यार न हो, ऐसा तो हो ही नहीं सकता. ये तो सांसों के आरोह-अवरोह हैं. जो हर पल एहसास में समाए रहते हैं, पर इनके साथ प्यार में अचानक कहां डूबते हैं. इनके साथ तो प्यार की शुरुआत होती है और चित्रगुप्त के प्यार में तो वह अचानक आकंठ डूब गई थी और संभलने का मौक़ा तक न मिला था. बहुत चाहा ख़ुद को बहलाना, पर मीरा तो कृष्णमय हो चुकी थी.

दिन-महीने-साल गुज़रते चले गए और फिर आज मिले 25 साल बाद. वह चित्रगुप्त में आते हुए परिवर्तन को देखती रहती थी उनकी फोटो के ज़रिए. बाल गिरते जा रहे थे. चांद दिखने लगा था. सांवली रंगत गहरी होती जा रही थी. विदिषा की बात अक्सर याद आ जाती. ‘आख़िर क्या दिखता है तुझे इस काले कलूटे में’ पर जो उसकी आंखें देखती थीं, वह उसे कहां दिख पाता था.

एकाएक वह स्मृतियों के कारागार से वर्तमान के कठोर धरातल पर आ गिरी, जहां चित्रगुप्त बस अब एक परछाईं की तरह थे. उसने किताब का पहला पन्ना पलटा. लिखा था… ‘मेरे उस अधूरे प्यार के नाम, जिसे मैंने जीवनभर पूरी संपूर्णता से चाहा’ चित्रलेखा का पूरा वजूद थरथरा गया. आंखें जैसे गंगा-जमुना बन गईं. प्यार का प्रत्युत्तर… इतनी लंबी तपस्या का फल… मिला भी तो कब, जब ज़िंदगी का लंबा सफ़र तय कर लिया.

यह भी पढ़े… क्योंकि गुज़रा हुआ व़क्त लौटकर नहीं आता (Lost Time Is Never Found Again)

क्यों किया चित्रगुप्त आपने ऐसा? वह फफक पड़ी. क्यों रखा हमारी कहानी को अधूरा..? क्या कमी थी मेरी तपस्या में कि विश्‍वामित्र की समाधि भंग न कर पाई? अब इस छटपटाहट के साथ बाकी की ज़िंदगी कैसे जीऊंगी?

आंसुओं में डूबी चित्रलेखा ने किताब को दोनों बांहों में भींच छाती से चिपका लिया, जैसे प्रिय को बांहों में समेट लिया हो. आंखें बंदकर जल धाराओं को अविरल बह जाने दिया और महसूस करने लगी जैसे चित्रगुप्त ने अपनी चित्रलेखा को बहुत कोमलता से अपनी बांहों में समेटकर सीने में छिपा लिया हो. ‘काश, एहसास के ये लम्हे कभी ख़त्म न होते… जैसे उनकी कहानी फिर भी ख़त्म नहीं हुई थी, बल्कि अधूरी रह गई थी.

sudha jugaran

    सुधा जुगरान

अधिक शॉर्ट स्टोरीज के लिए यहाँ क्लिक करें – SHORT STORiES

कहानी- पंचर का जोड़ (Short Story- Puncture Ka Jod)

Short Story

यही एक पल जब यामिनी सभी बाहरी अदालतों के परे अपने भीतर है और अपनी ही सफ़ाई में कहने को उसके पास कुछ नहीं! इस पल को यहां से ताकती यामिनी ने ख़ुद को कार में इतना अकेला पाया है, जैसे मरीचिका में भटकती कोई हिरणी अब थकने लगी हो.

Short Story

शहर में त्योहार का मतलब है- अतिरिक्त छुट्टी! रक्षाबंधन के दिन, सावन मेला घूमकर लौटते समय कार पंचर हो गई. चार साल की रोली कार की पिछली सीट पर, 12 साल के बड़े भाई आदी से इस होड़ में चिप्स के पैकेट निपटा रही है कि विजेता वही बनेगी. आदी का ध्यान चिप्स से ज़्यादा ईयरफोन लगाए अंग्रेज़ी गाने सुनने में है. अगली सीट पर मम्मी यामिनी सावन मेले से ख़रीदा सात सौ रुपए का जड़ाऊ कंगन सेट निहारने में मुग्ध है. हालात की गंभीरता से परेशान बच्चों के पापा मलय ने कार पास के पेट्रोल पंप की ओर बढ़ा दी.

उनके वहां पहुंचने से ऐन पहले, एक कार पेट्रोल पंप की पंचर की दुकान के आगे आकर रुकी. वहां पहले से ही एक कार का पंचर बन रहा है और अब पिछली दोनों कारें प्रतीक्षा में खड़ी हो गई हैं.

“अरे!” अगली कार के पीछे अपनी कार लगाते मलय को अब सहज चौंकना ही था और मलय को चौंकता देख यामिनी का ध्यान भी सहज ही उस ओर खिंचना ही था. अगली कार से जो युवक उतरा, वो मलय का छोटा भाई प्रखर है. पांच साल पहले, तथाकथित छोटी जाति की लड़की से प्रेम-विवाह करने के कारण उसे संयुक्त परिवार से अलग कर दिया गया था और तब से शायद वो कुल पांच बार भी घर न आया होगा. इस वक़्त कार में पिछली सीट पर उसका साढ़े चार साल का बेटा टीटू और उसकी पत्नी ज्योत्सना बैठी दिख रही है.

पीछे खड़ी कार में से मलय और यामिनी उन्हें चुपचाप देख रहे हैं.

“आदी, बेटा जाओ. जाकर अंकल के चरण स्पर्श करो.”

मलय की आवाज़ गंभीर है, लेकिन ऑनलाइन अंग्रेज़ी गानों के आनंद में लिप्त बेटे ने पिता को सुना ही नहीं. सुन भी लेता तो स्मृति पर ज़ोर डाल समझ रहा होता- कौन अंकल? लेकिन जिसे सचमुच समझ में आया, उसकी प्रतिक्रिया आदेश जितनी ही गंभीर थी. यामिनी ने सर्द आवाज़ में कहा, “आदी नहीं जाएगा.”

“क्यों?”

“क्योंकि चरण स्पर्श करने से पहले चरणों की योग्यता देखी जाती है.”

यह भी पढ़ेअब बेटे भी हो गए पराए (When People Abandon Their Old Parents)

“ठीक है, जैसी तुम्हारी मर्ज़ी.”

मलय ने संयमित ढंग से कार का दरवाज़ा खोला. बीवी-बच्चों को कार में बैठा छोड़, कमर पर बेल्ट दुरुस्त करता प्रौढ़ बड़ा भाई अपने छोटे भाई की तरफ़ बढ़ चला, जो शायद अब तक उन्हें देख चुका है, पर न देखने का अभिनय कर रहा है.

यहां से यामिनी देख रही है, प्रखर ने अपने भाईसाहब के पैर छुए हैं और अपने बेटे को बुलाकर उससे भी उनके चरण स्पर्श करवाया. उस कार की अगली सीट पर देवरानी की झलक देखते ही ‘छोटी जात’ यामिनी ने अपना वही सदैव का जुमला बुदबुदाया, जो अपनी इस देवरानी-लड़की का घर में ज़िक्र सुनकर वो हमेशा कहती रही है.

यामिनी वहां हर्गिज़ नहीं जाएगी, लेकिन उसका मन उत्सुकता की सब हदें पार कर चला है- ‘वहां क्या बातें हो रही होंगी?’

उसने आदी को पापा के पास जाने को कहा, पर बेटे ने ईयरफोन के गाने से

स्वर-से-स्वर मिलाकर गाने के आनंद में फिर नहीं सुना.

“आदी, पापा के पास जाओ, अभी!” मां ने कंधा झिंझोड़ा, तो आदी को बेमन से उधर को जाना पड़ा.

यामिनी यहां से देख रही है- मलय ने छोटे भाई के सिर, कंधों, चेहरे पर पिता-सा हाथ फेरा है.

कार की पारदर्शी कांच के पार से दिख रहा है, आदी ने पिता के आदेश पर अपने अपरिचित से चाचा के चरण स्पर्श किए हैं.

इधर यामिनी के चेहरे का रंग और ढंग बदल गया और अब उसका पूरा ध्यान कार की अगली सीट पर है. कुछ ठीक से दिख नहीं रहा यहां पीछे से- कैसे कपड़े पहने होगी वो? सुना है पैंट-टीशर्ट, स्कर्ट-ब्लाउज़, टॉप-कैप्री सब पहनती है. और तो और कभी-कभी तो बाल भी लड़कों की तरह कटवाती है. यामिनी अपनी बंगाली तांत की साड़ी के ओपन पल्ले की पिन छूकर आश्‍वस्त हुई. लंबे बालों की संवरी चोटी को छू-छाकर देखा और पर्स में से छोटा आईना निकालकर अपने भारतीय नारी लुक-मेकअप का सरसरी तौर पर मुआयना किया, जिस पर गर्व करना जैसे उसके गृहिणी जीवन की एक बड़ी उपलब्धि है.

लेकिन अगले ही पल उसका ध्यान फिर कार की अगली सीट पर जा चिपका है- ‘देखो तो, जेठाई का कोई आव-आदर नहीं! लाख दूरी सही, हैं तो हम बड़े ही ना! बड़प्पन तो तब था, जब ख़ुद कार से उतरती और आकर पैर छू लेती, पर छोटी जातवाले क्या जानें ये संस्कार!’

यामिनी ने फिर मन-ही-मन उसे जीभर दुत्कारा. इस समय अम्माजी की बड़ी याद आ रही है. वे होतीं, तो यामिनी अंतत: विजेता की तरह साबित कर पाती.उनकी दुलारी छोटी बहू की ये असलियत! तीन बरस हुए, वे स्वर्ग सिधार गईं और मरते व़क्त भी घर की बड़ी बहू से उस बूढ़ी विधवा मां का यही रिरियाता-सा झगड़ा-रार कायम रहा कि प्रखर के बेटे-बीवी का इस घर में मान-सम्मान से आना-जाना हो जाए. वे कभी-कभार प्रखर के घर गईं भी. एक बार तो तीन दिन रह भी आई थीं और जब लौटीं, तो बड़ी बहू की नज़रें जैसे उनका कत्ल कर रही थीं.

यामिनी अपनी सीट पर शिकनभरी मुद्रा में बैठी लगातार उधर को ही देख रही है. मलय अपने छोटे भाई से बड़े ख़ुश होकर बतिया रहे हैं. कभी कंधा थपथपाते हैं, कभी उसकी बात पर हामी में सिर हिलाते हैं, जैसे बच्चों की उपलब्धियों को बड़े प्रोत्साहन देते हैं. प्रखर भइया अपनेपन और औपचारिकता के बीच गड़बड़ाए लगातार कुछ बोले जा रहे हैं. यामिनी यहां से ग़ौर कर रही है कि कार की अगली सीट पर बैठी स्त्री भी अपनी जगह से हर्गिज़ नहीं हिली है, ठीक वैसे ही जैसे वो!

रोली के चिप्स का पैकेट ख़त्म हुआ, तो वह बड़े भाई-पापा के पास जाने के लिए ज़ोर-ज़ोर से मचलने लगी, “पापा पास जाना! पापा पास जाना है!

आं आं ऽ ऽ!”

यह भी पढ़ेरिश्तों को संभालने की फुर्सत क्यों नहीं हमें (Relationship Problems And How To Solve Them)

इससे पहले कि मां उसे अपनी सीट पर खींचती और ज़ोर लगाकर या पीट-पाटकर चुप करा लेती, उसकी ऊंची मचलती आवाज़ अगली कार के आगे तक जा पहुंची. सबने इस तरफ़ देखा. पापा के इशारे पर आदी दौड़ा-दौड़ा आया है और बहन को गोद में उठा लिया है.

उसने भी बच्चों को उधर जाने से रोका नहीं. उसे बस अपने सम्पन्न कस्बाई मायके पक्ष के ताने याद आ रहे हैं. मामा के लड़के की शादी में… चाचा के पोते के दष्टोन में… बुआ की बेटी के चलावे-विदाई में, सब अवसरों पर उसके देवर के विजातीय प्रेम-विवाह में रिश्तेदारों की ज़बर्दस्त दिलचस्पी रही है सालों तक और अब भी इक्का-दुक्का कोई सवाल उछलता ही रहता है उस पर.

‘सुनते हैं मैला ढोनेवालों की जात से है यामी की देवरानी!’, ‘क्या बिन्नू, सनाढ्य ब्राह्मणों के यहां सबसे ही नीच जात! तुम्हारे कुल पर तो ऐसा अमिट दाग़ लग गया जैसे चंद्रमा का कलंक.’, ‘उसका बच्चा सरनेम क्या लिखता होगा दीदी?’, ‘बुरा न मानना बिटिया, पर अगर तुम्हारी देवरानी का तुम्हारी रसोई में आना-जाना, खाना-पीना होता हो, तो बता देना… हमारा धरम तो भ्रष्ट न हो.’ गर्वीली

यामिनी लज्जा से मर-मर जाती है.

ज़ेवर, साड़ी, मेकअप, शहरी जीवनशैली और पति की तरक़्क़ी के क़िस्से, सब धूल हो जाते, जब अपनों के बीच वो अपनी देवरानी की प्रतिनिधि की तरह पाती है ख़ुद को- छोटी जात! और ताबूत की आख़िरी कील थीं वे बातें जो कॉलोनी की पार्लरवाली ने उसे बताई थीं. देवरानी दो कॉलोनियां पार कर यहीं आती थी- शायद जानबूझकर ही… बकौल यामिनी की मम्मी के अनुमान के, ज़रूर वो पैतृक मकान में से, अपने पति को हिस्सा लेने के लिए भड़काया करती होगी.

बहरहाल, एक दशक पुरानी परिचित पार्लरवाली उसकी देवरानी की तारीफ़ कर रही थी कि वो अधिक महंगी सेवाएं लेती है पार्लर की, इसीलिए उससे अधिक मेनटेन’है. आवेश में जब यामिनी बता बैठी थी कि कैसे उस छोटी जात की लड़की ने उसके रत्न जैसे देवर को फंसाया, ब्याह से पहले ही गर्भवती होकर, तो पार्लरवाली ने उसकी देवरानी की उसके बारे में राय उसे बता दी थी, क्योंकि अतिरिक्त सेवाएं लेने के लिए उस दिन यामिनी ज़्यादा देर तक पार्लर में रुकी थी.

‘मामूली गृहिणियां वो भी कस्बों-गांवोंवाले बैकग्राउंड कीं, हम शहरी वर्किंग वुमन्स की क्या बराबरी कर सकती हैं? और इस शहर में इंग्लिश मीडियम से एमबीए करनेवालों के सामने कस्बे-देहात के कॉलेज की एमए हिंदी डिग्री भी कोई डिग्री है. वहां पढ़ाई होती ही क्या है, सर्टिफिकेट भर निकाल लेते हैं बस- अनपढ़ ही समझिए.’

यामिनी के कलेजे में बह्मास्त्र उतरता चला जाता है- अनपढ़ ही समझिए.

सबसे आगेवाली कार का पंचर बन चुका और वो जा चुकी है. प्रखर की कार के टायरों की हवा की भी कब की जांच हो चुकी है और अब पंचर बनानेवाला 10-12 साल का लड़का इस कार के पास आकर पंचर जांच रहा है़, पर दोनों भाई जैसे मौक़ा प माहौल सब भूल गए हैं और एक-दूसरे के साथ के इस हर क्षण को

भर-भर के जी रहे हैं. यामिनी यहां से एक दूसरा आश्‍चर्य भी देख रही है. आदी,

रोली और टीटू- वे बच्चे जो पहले कभी नहीं मिले, पल में ऐसे हिल-मिल गए हैं, जैसे साथ-साथ पले-बढ़े हों. कार में ठहरा वक़्त यामिनी से बर्दाश्त नहीं हो रहा. शायद अगली कार की उस सीट पर बुत बनी बैठी देवरानी से भी न हो रहा होगा.

यामिनी ने अपनी खिड़की के कांच को नीचे किया है और पेट्रोल पंप की

चहल-पहल को नज़रभर देखने लगी है. आसमान में ऐसे भरे बादल घुमड़ आए हैं कि बस अब छलके या तब छलके. हवा का दम सधा हुआ है, जैसे अपने बारे में लिए जा रहे किसी अहम् निर्णय को सुनती कोई घरेलू लड़की. पेट्रोल पंप पर दो-तीन लंबी कतारें हैं. छोटी कारों में अकेले बुज़ुर्ग, स्कूटियों पर सवार खिलखिलाती लड़कियां, स्टाइलिश बाइक पर ब्रांडेड चीज़ों से सजे नौजवान, दोनों तरफ़ से रोशनी देती मोमबत्ती-सी कामकाजी, सुपर वुमन मांएं, जिनकी स्कूटियों में आगे अबोध बच्चे खड़े हैं. इन कच्ची माटी भारतीयों को आधुनिकता अपने संग तराश हाथों से गढ़ रही है- महीन पाश्‍चात्य कारीगरी.

यामिनी का ध्यान फिर इधर को लौट आया है. आदी ख़ुश हो-होकर टीटू को अपनी राखियां दिखा रहा है- झिलमिल लाइटवाली राखी, अपने मनपसंद सुपरहीरो वाली राखी, चांदी की राखी… अपनी एक बहन से अपने मन की तीन-चार राखियां हर साल न बंधवा ले, तो आदी मम्मी का सिर चढ़ा दुलारा कैसे साबित हो?

यामिनी की बारीक़ नज़र उधर की हर एक गतिविधि पर है. अब प्रखर भइया का सेलफोन ये दूसरी-तीसरी बार ऐसे बजा है कि नंबर देखते ही कॉल काट दी है. ज़रूर कार में बैठी पत्नी मौन दबाव बना रही है. अब प्रखर भइया की मुद्रा अनुमति मांगने जैसी दिख रही है, लेकिन इससे पहले कि देवरानी की तरह यामिनी ने भी छुटकारे की राहतभरी सांस ली होती, उसे लगा मलय ने छोटे भाई को कुछ और देर ठहरने को कहा है. अब तीनों बच्चों को अपने पास बुलाया है.

‘हो क्या रहा है वहां?’

दो कारों में से दो बिल्कुल अलग-अलग व्यक्तित्व की स्त्रियां समान उतावलेपन से देख रही हैं.

मलय ने बेटे की कलाई से चांदी की राखी निकाल ली है. अब नन्हीं रोली के हाथों वही राखी टीटू की सूनी कलाई पर बंधवा रहे हैं. अपने पापा के इशारे पर टीटू ने बड़े पापा, बड़े भाई-बहन सबके पैर बारी-बारी से छुए हैं और मलय ने आगे बढ़कर छोटे भाई के बेटे को बांहों में भींच लिया है.

टीटू को गले से लगाए उसके बड़े पापा की बंद आंखों से आंसू बह चले हैं. यही एक पल है… यही जब ज्योत्सना अपने लिए मुख्य परिवार में सच्चा स्वागत देख रही है… यही एक पल जब यामिनी सभी बाहरी अदालतों के परे अपने भीतर है और अपनी ही सफ़ाई में कहने को उसके पास कुछ नहीं! इस पल को यहां से ताकती यामिनी ने ख़ुद को कार में इतना अकेला पाया है, जैसे मरीचिका में भटकती कोई हिरणी अब थकने लगी हो.

प्रखर भइया रुमाल से अपनी आंखों को पोंछ रहे हैं या दूर से बड़ी भाभी को भ्रम हो रहा है? और क्या ये भी सच है जो आंखें देख रही हैं? आधुनिका देवरानी कार से उतरी है. झुककर बड़े भाईसाहब के पैर छुए हैं… और अब मुस्कुराती हुई, इस कार की ओर चली आ रही है.

…इधर बनानेवाले ने पंचर का जोड़ बनाने का काम शुरू कर दिया है.

 

        इंदिरा दांगी

अधिक शॉर्ट स्टोरीज के लिए यहाँ क्लिक करें – SHORT STORiES