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पहला अफेयर: मुझे क्या हुआ है? (Pahla Affair: Mujhe Kya Hua Hai)

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पहला अफेयर: मुझे क्या हुआ है? (Pahla Affair: Mujhe Kya Hua Hai)

उस समय यह पता ही नहीं लगता था कि दिन कब शुरू हो रहा है व कब ख़त्म हो रहा है. बस, दिल में एक ही बात रहती थी कि कब सुबह हो और कब डीटीसी की बस में ऑफिस जाने के लिए बैठूं. रोज़ के आने-जानेवालों में लगभग सभी एक-दूसरे को पहचानते हैं. ऐसे ही एक दिन वो मेरी बगल में बैठी थी. बस, उस दिन से ना जाने क्या हुआ कि रोज़ हम एक-दूसरे की उत्सुकता के साथ प्रतीक्षा करने लगे.

बस सरोजनी नगर डिपो से आरंभ होकर सचिवालय जाती थी, तो यह भी हम दोनों ही समझ गए कि हम लगभग एक ही जगह के
निवासी हैं व सेवा भी सचिवालय में ही करते हैं. हर रोज़ जब मैं बस में बैठता, तो वो स्वयं ही मेरे पास की सीट पर बैठ जाती अगर कभी वो पहले बस मैं बैठती, तो मैं उसके बगल की सीट पर बैठ जाता. कुछ दिन ऐसे ही चलता रहा. बात बस नयनों की ही भाषा में चलती रही, पर ज़ुबां से कुछ ना कह पाए.

कुछ समय बाद हम घर वापस आने के लिए भी एक-दूसरे का इंतज़ार करते, परंतु हम कभी भी एक-दूसरे से बात नहीं कर पाते थे. मन की भाषा शायद किसी अपने का मन ही पढ़ सकता है या यूं कहें कि कुछ लोगों से कभी-कभी न जाने क्यों ऐसा प्यार हो जाता है जिसे कहा भी नहीं जा सकता और उनके बग़ैर रहा भी नहीं जा सकता.

हम दोनों का साथ-साथ आना-जाना चलता रहा, पर दिल की बात ज़ुबां पर नहीं आ पाई. मन हमेशा ख़ुश रहने लगा था. सब कुछ अच्छा लगता था. परंतु सब कुछ अपने मन मुताबिक़ नहीं चलता. कुछ दिनों बाद उसने अचानक आना बंद कर दिया. मेरे पास न उसका पता और न ही कोई फोन नंबर था. बहुत दिनों तक मैंने उसका इंतज़ार किया, पर कुछ हासिल नहीं हुआ. मन कहता वो ज़रूर आएगी, पर कब तक इंतज़ार करता. 32 की उम्र हो चुकी थी मेरी, घरवालों ने शादी कर दी. धीरे-धीरे सब सामान्य होने लगा. सुंदर-सुशील पत्नी मिली थी. कुल मिलाकर मैं संतुष्ट था अपनी ज़िंदगी से.

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एक दिन जब मैं अपने नए घर के गृह प्रवेश के बाद पास ही के होटल में खाना खाने पत्नी व दोनों बच्चों के साथ गया, तो उसे अपने सामने देखकर सन्न रह गया. वो अपने पति व बच्चों के साथ बैठी हुई थी उसी होटल में. मन बेहद ख़ुश था उसे देखकर. हम दोनों दूर-दूर से ही आपस में एक-दूसरे को देखकर हंसते-मुस्कुराते रहे. खाना खाने के बाद जब वो होटल से बाहर जाने लगे, तो उसके पति ने कई बार मुझे मुड़-मुड़कर देखा.

मैं तो बेहद ख़ुश था. ऐसा लग रहा था जैसे कोई ख़ज़ाना मिल गया हो. कुछ दिनों बाद मेरी बेटी ने मुझसे कहा, “पापा, मेरी मैडम मुझको बहुत प्यार करती हैं और चॉकलेट भी देती हैं.” मैंने उसकी बातों को ज़्यादा तवज्जो नहीं दी और कहा, “बेटा, तुम सुंदर हो और पढ़ने में होशियार हो, इसलिए मैडम प्यार करती हैं.” आज मेरी बेटी का स्कूल में आख़िरी दिन था, क्योंकि वो स्कूल पांचवीं तक ही था. वैसे तो मेरी पत्नी ही जाती थी उसे स्कूल से लेने के लिए, पर उस दिन मुझे जाना पड़ा.

“पापा, वो देखो मेरी मैडम.” मैडम को देखकर मुझे लगा कि मैं फिर लुट गया, क्योंकि वही मेरा पहला प्यार था, जिसको मैंने मन व आंखों की भाषा में पाया था. मैं ठगा-सा मुंह लटकाए घर वापस आ गया. जीवन तो जीना है, पर कुछ लोग न जाने क्यों मन में घर कर जाते हैं. यह मैं समझ नहीं पाया कि मुझे क्या हुआ है?

– दिनेश लखेड़ा

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पहला अफेयर: यादों की परछाइयां… (Pahla Affair: Yaadon Ki Parchhaiyan)

 

पहला अफेयर: यादों की परछाइयां… (Pahla Affair: Yaadon Ki Parchhaiyan)

जहाज़ ने अपनी चाल पकड़ ली है. बस, मेरी यादों की चाल ढीली पड़ गई है. कभी-कभी तन्हाई जीवन को उलट-पलट कर देखने के अवसर देती है- उसकी कुनीन-सी कड़वी बातों ने उसे दोबारा पाने के मेरे दंभ को चकनाचूर कर दिया है. मैं अपने जीवन को तराज़ू में तोलने लगी हूं- एक पलड़ा उसे पाने की चाह में ज़मीन छू रहा है और उसके दंभ का पलड़ा हवा से बातें कर रहा है… उसने तो मुझे अपनी ग़लती को जानने का मौक़ा तक नहीं दिया.

बेटी के बार-बार आग्रह पर पहली बार मैं अमेरिका जा रही हूं. क्या देखती हूं कि सामने से हाथ में छोटा सूटकेस पकड़े उसी अकड़ू चाल से आदी चला आ रहा है. मुझे ज़ोर का झटका लगा. ख़ैर, मैं उसे अनदेखा कर सामने फॉर्मैलिटीज़ पूरी करते अपने मामाजी की तरफ़ मुड़ने को हुई, तभी आगे बढ़कर आदी ने कहा- अरे सुरभि, तुम यहां कहां? मेरा संक्षिप्त उत्तर था- बेटी के पास जा रही हूं. और… जाना कि वो अपनी कंपनी की तरफ़ से शिकागो जा रहा है.

न जाने कितने सालों के पत्थर सरकते रहे हैं सीने से. सुना था उसका विवाह किसी अमीर बाप की इकलौती बेटी से हुआ है. नतीजा, उसके लालची पिता को ख़ूब दान-दहेज से लादा गया होगा. प्लेन में हमारी सीटें नज़दीक थीं. वह जानकर अचरज हुआ कि दो वर्ष के अंदर ही उसका माधवी से विवाह-विच्छेद हो गया.

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मैं टीचिंग लाइन में आ गई थी. साहित्य में एमए करने के बाद मैंने पब्लिक स्कूल में वाइस प्रिंसिपल का पद संभाला. माता-पिता के अति आग्रह के बाद विवाह बंधन में भी बंधी.

मुझे लगा शायद हम ऑक्टोपस की तरह अष्ट पद वाले ऐसे प्राणी हैं, जो समाज के कई कालों में जीने की मजबूरी झेलते हैं. और जब हार्दिक पीड़ा शब्दों में ढलनी दुष्कर हो जाती है, तो शायद ऐसी आग का सृजन होता है, जो आस-पास का सब कुछ तहस-नहस कर देती है. उसके तलाक़ का कारण जानना मेरे लिए कोई मायने नहीं रखता. उसकी बातों में मुझे ठुकराने के पश्‍चाताप का लहज़ा-सा ज़ाहिर था.

आज मेरे मन में कई उद्गार पानी के बुलबुले की तरह उठ-गिर रहे हैं. फिर भी मैं जानना चाहती थी कि मैंने तुमसे तुम्हारी हंसी तो न मांगी थी? अनजाने ही संगिनी बनने का सुख मांग बैठी. और आज है सामने रेतीला मैदान और तेरी यादों की परछाइयां और… तुम्हारे झूठे दंभ के कारण बहुत कुछ झेला है मैंने. मन सागर में आए तूफ़ान की हुंकार सुनी है मैंने.

यूं तो ज़माना ख़रीद सका न हमें… तेरे प्यार के लफ़्ज़ों पर बिकते चले गए हम…

फ्लाइट के लैंड करते ही आदी न जाने कहां गायब हो गया. मुझे कुछ कहने तक का मौक़ा नहीं दिया. यूं भी अब खोखली यादों के सिवा क्या था मेरे पास. ये मेरी यादें परछाइयां बन आज भी डोल रही हैं मेरे संग.

रात होते ही अतीत की यादें मुझे पीछे धकेल ले गईं. सुना है स्मृतियों को कहीं भी उखाड़ कर फेंक दो, कैक्टस के कंटीले झाड़ की तरह फिर से उगने की उद्दंडता कर बैठती है. ऐसे ही एक शाम हम बगीचे में बैठे थे, तभी पेड़ से एक पक्षी मुंह में एक कीड़ा लेकर दूर आसमान में उड़ चला. हम ध्यान से उसे देखते रहे- आदी के एक मनचले दोस्त ने एक शेर कह डाला था… न रख उम्मीद किसी परिंदे से इकबाल… जब निकल आते पर अपना आशियां भूल जाते हैं… आज उस शेर का एक-एक मिसरा मुंह चिढ़ा रहा है. मेरे सीने में नश्तर चुभो रहा है… मुझे माज़ी की अधकचरी यादों में, पीछे धकेल रहा है.

– मीरा हिंगोरानी

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पहला अफेयर: आईना (Pahla Affair: Aaina)

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पहला अफेयर: आईना (Pahla Affair: Aaina)

मेरा यह अंतर्मुखी व्यक्तित्व शायद मैंने अपनी मां से जन्मजात पाया है. बहुत कम बोलने तथा अपनी किताबों में खोये रहने का स्वभाव लिए कब मैंने जीवन के इक्कीस बसंत पार कर लिए, इसका एहसास शायद मुझे भी नहीं हो पाया. उन दिनों अपने स्थानीय यूनिवर्सिटी से रसायन शास्त्र में पीएचडी की डिग्री हासिल करने के लिए मैंने दाख़िला लिया था.

मेरे अनुभवी गाइड ने पढ़ाई में मेरी रुचि देखकर मुझे कुछ समय के लिए बीएचयू, वाराणसी जाने की सलाह दी, जिससे मैं वहां की लाइब्रेरी में अपने विषय के अनुकूल नए शोध पत्रों को पढ़ सकूं. उनकी आज्ञा शिरोधार्य कर मैंने बीएचयू की लाइब्रेरी में अध्ययन करना प्रारंभ कर दिया. सब कुछ ठीक ही चल रहा था कि एक दिन मैंने एक सुशील से गौर वर्ण लड़के को मेरी सामनेवाली मेज़ पर अपनी किताबों में झुके हुए पाया. यह कोई आश्‍चर्य की बात नहीं थी, पर न जाने क्यों मुझे कुछ अजीब और अटपटा-सा लगा. मैंने उचककर उसकी किताबें देखी की कोशिश की, शायद डॉक्टर बनना था उसे, वह भी दांतों का. उसकी किताबें थीं मानव दांतों के आंतरिक अध्ययन विषय पर और उसे शायद बेचैनी की हद तक यह जानकारी चाहिए थी.

पता नहीं क्या और कैसे हुआ, लेकिन मैंने जब उसे पहली बार देखा, हृदय में कोई जल तरंग-सा बज उठा. मुझे अपनी किताबों के अक्षर जैसे दिखाई नहीं पड़ रहे थे. अब तो मैं बहाने से उसे ही देखती रहती. मेरे हृदय की गति पर जैसे मेरा नियंत्रण ही नहीं रह गया था. शाम को जब मैं वापस हॉस्टल लौटती, तो वहां कोई सखी-सहेली या परिचित तो मिलता नहीं, मैं कमरे में जाकर आईने के सामने खड़ी हो जाती और अपने आप से ही घंटों बातें किया करती. एक दिन मैं आईने से ही पूछ बैठी, ‘इतनी सुंदर तो हूं मैं, ये मुझे देखता क्यों नहीं…’ अगले दिन थोड़ा संवरकर जाती, परंतु वो पाषाण हृदय किताबों में ही घुसा रहता, मुझे देखता ही नहीं. ऐसा एक बार भी संभव नहीं हुआ कि हमारी नज़रें टकरा जाएं.

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धीरे-धीरे मेरा ध्यान अपनी किताबों में न होकर उसकी गतिविधियों में रहने लगा. नज़रें उसके चहेरे पर ही टिकी रहने लगीं और मुझे एहसास होता गया कि मैं उससे प्यार करने लगी हूं. मेरा संकोची, अंतर्मुखी मन मुझे मुंह खोलने नहीं देता और उस बेपरवाह को अपनी पढ़ाई के आगे शायद कोई दुनिया ही नहीं दिखाई देती.

और फिर एक दिन वह नहीं आया. आगे जब तक मैं बनारस की उस लाइब्रेरी में रही, वह नहीं आया. मैंने हिसाब लगाया, पूरे पांच दिन आया था वो और मुझे भटकाकर मीलों दूर न जाने किन ख़ुशबुओं के बगीचे में उड़ा ले गया था. मैं तितली की मानिंद उड़ती फिर रही थी, परंतु वह तो जा चुका था.

अथक प्रयासों से मैंने दोबारा अपनी पढ़ाई ब्रारंभ की, लेकिन मुझमें पहले जैसी एकाग्रता नहीं रही. वह चोर मुझसे मेरा ‘मैं’ ही चुरा ले गया था शायद. उसकी कोई पहचान मेरे पास नहीं थी. न नाम, न पता, सिवाय एक काग़ज़ के पन्ने के, जो उसकी मेज़ से उड़कर मेरी मेज़ के नीचे आ गया था. उस पन्ने पर उसने शायद मानव दांतों से संबंधित चित्र बनाने के लिए आड़ी-तिरछी लकीरें खींच रखी थीं. उसी काग़ज़ के पन्ने को मैंने संभालकर रख लिया था.

कैसा जादुई था यह प्यार का एहसास, जो पूर्णतया एक तरफ़ा तो था, लेकिन मुझे इतराना सिखा गया था और इसमें मेरा साक्षी बना था मेरे हॉस्टल के कमरे में लगा हुआ वह आदमक़द आईना. आज मैं दो बेटों की मां हूं और संतुष्ट भी हूं. सभी को मेरी पीएचडी की डिग्री और मेरे द्वारा किए गए हर एक कार्य पर गर्व है, लेकिन मेरी किताबों के बीच दांतों के चित्रवाला काग़ज़ का वह पन्ना आज भी छुपा बैठा है, जो तब बोल पड़ता है, जब-जब मैं आईना देखती हूं.

– डॉ. कमला कुलश्रेष्ठ

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पहला अफेयर: एक ख़ूबसूरत लम्हा (Pahla Affair: Ek Khoobsurat Lamha)

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पहला अफेयर: एक ख़ूबसूरत लम्हा (Pahla Affair: Ek Khoobsurat Lamha)

एक बार व़क्त का सबसे ख़ूबसूरत लम्हा गिरा कहीं, उसे देखकर सारी कायनात उसकी दीवानी हो गई और उसके स्पर्श की चाह में सारी हवाओं का रुख़ बदल गया. गुलाब भी उसके होंठों को छूने के लिए तरसने लगे. उस बहार का नाम शैलजा था, लेकिन इस नाम से कभी किसी ने उसे नहीं पुकारा होगा… सभी उसे शैलू कहते थे. अपने इस निकनेम से वह बड़ी मासूम और अल्हड़ लगती थी.

हमारे कॉलेज में आज उसका पहला दिन था और एक बार उसे जिसने भी देखा, वह उसके रूप का दीवाना हो गया. उसे चाहनेवालों की संख्या मतदाता सूची की तरह लंबी थी. जब से शैलू मेरे जीवन में आई थी, मेरी ज़िंदगी का हर लम्हा ख़ुशगवार हो गया था.

साथ पढ़ते हुए अपने कॉलेज की पढ़ाई हमने पूरी कर ली, तो मुझसे लौटकर आने की बात कहकर वह दूसरे शहर अपने घर चली गई. लेकिन उसके बाद लौटकर नहीं आ सकी और मैं न जाने किस उम्मीद पर उसका इंतज़ार करता रहा. व़क्त गुज़रता चला गया, मैं उसे भुला तो न सका, पर ज़िंदगी में आगे ज़रूर बढ़ गया.

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लेकिन इधर कुछ दिनों से अचानक न जाने कितनी बार, कितने ब्लैंक कॉल्स आने लगे और कल रात मैंने उस एक कॉल पर अनायास ही तीन बार फिर से फोन लगाकर जानना चाहा कि यह किसका कॉल था. तीन बार में भी कोई आवाज़ नहीं आई, लेकिन चौथी बार उसकी आवाज़ सुनाई दी. न जाने अंतर्मन ने कैसे जान लिया था कि वह जो बात नहीं कर रहा, वह ज़रूर कोई मेरा अपना ही है और उसकी आवाज़ की कशिश को आज भी मैं नहीं भूल पाया था.

बीस साल पहले मैंने उसे खो दिया और आज इतने सालों बाद रात के दो बजे महज़ वो आवाज़ सुनकर उसके नाम से मैंने उसे पुकारा, तो ख़ुशी के मारे वो भावुक होती चली गई. फिर उसके शब्द भीगने लगे थे. मेरे लिए दुनिया का यह सबसे सुखद आश्‍चर्य था. जाने इन बीस सालों में वह ज़िंदगी के किन हालात से गुज़री होगी और जाने मेरा ये फोन नंबर उसने कहां से, किस तरह से लिया होगा.

और आज एक ही बार की लंबी बातचीत में हमने कॉलेज के अंतिम दिनों के एक-एक पल को न जाने कितनी बार जीया. हम दोनों को अब तक सब कुछ वैसा ही याद था, जैसा हम साथ चलते-चलते पीछे व़क्त की दहलीज़ पर छोड़ आए थे. उसके लहज़े में छिपा दर्द और उदासी मैंने महसूस कर ली थी. एक बेहद अंतरंग रिश्ते के पुनर्जीवित होने की ख़ुशी उसे मुझसे अधिक थी. लेकिन मैं अपनी सुखी ज़िंदगी में व्यस्त था. उसके जीवन के रेगिस्तान को एक क़तरा शबनम भी न दे सका. शायद उसे भी यह एहसास हो गया और वह मुझसे दूर, बहुत दूर चली गई और इस बार मैंने उसे हमेशा के लिए खो दिया था.

कहां मिलता है कोई दिल की गहराइयों से चाहनेवाला…
मेरे पास अब ज़िंदगीभर के लिए उसकी यादों के सिवा कुछ भी नहीं बचा. मैं उसे कभी भुला नहीं सकता था, उसे भुलाने में तो सदियां लग जाएंगी, पर उसकी यादें मेरे जीने का सहारा बनी रहेंगी… ताउम्र!

– तरुण राजवानी

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पहला अफेयर: इंतज़ार (Pahla Affair: Intezar)

Pahla Affair Kahani

पहला अफेयर: इंतज़ार (Pahla Affair: Intezar)

मुहब्बत इंद्रधनुष की तरह कायनात के एक किनारे से दूसरे किनारे तक फैली हुई है और इसके दोनों सिरे दर्द के अथाह समंदर में डूबे हुए. लेकिन फिर भी जो इस दर्द को गले लगा लेता है, उसे इसी में सुकून मिलता है.

बस, मुझे भी इसका एहसास उस व़क्त हुआ, जब उसकी मासूम आंखें और मुस्कुराते होंठों को मैंने देखा. न जाने कैसी कशिश थी उसकी आंखों में कि डूबता ही चला गया और आज तक उबर ही नहीं पाया.

वैसे तो मैंने उसे कैफे में देखा था, तभी से खो सा गया था, पर आमने-सामने मुलाक़ात कॉलेज के बाइक स्टैंड पर हुई. “ऐ मिस्टर, तुम समझते क्या हो अपने आप को? तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मेरी दोस्त से बदतमीज़ी करने की और ये दादागिरी कहीं और जाकर दिखाना.”

मैं ख़ामोश सा बस उसे देखता ही जा रहा था और उसका चेहरा गुस्से में तमतमा रहा था. आंखें चमक रही थीं और माथे पर पसीने की बूंदें थीं. अचानक उसकी सहेली आई और कहने लगी, “ये तू क्या कर रही है, ये वो लड़का नहीं है.”

वो अवाक् सी देखने लगी और कहने लगी, “मुझे माफ़ कर दीजिए, मुझे लगा कि…”

“कोई बात नहीं, अंजाने में ऐसा हो जाता है.” मेरी बात सुनकर वो तेज़ी से वहां से चली गई.

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लेकिन मैं बुत बनकर वहीं खड़ा रहा, जब तक कि मेरे दोस्तों ने आकर मुझे चौंकाया नहीं. फिर तो बस आते-जाते मुलाक़ातें होने लगीं. पहले-पहले वो सकुचाई सी नज़रें उठाती, फिर बाद में मुस्कुराने लगी. उसकी वो मुस्कुराहट मेरे दिल में उतर जाया करती थी. उसकी बोलती आंखें कई ख़्वाब जगाया करती थी. वो भी मुझे पसंद करने लगी थी, कम से कम मुझे तो यही लगने लगा था. हम क़रीब आने लगे थे.

एक दिन उसने कहा कि वो विदेश जा रही है, आगे की पढ़ाई के लिए. मैंने कुछ नहीं कहा. अगले दिन फिर उसने कहा. मैंने कहा कि ठीक है. वो कहने लगी, “कुछ कहोगे या पूछोगे नहीं?”

मैंने कहा, “तू मुझसे दूरी बढ़ाने का शौक पूरा कर, मेरी भी ज़िद है कि तुझे हर दुआ में मांगूंगा.” वो देखती ही रह गई.

पांच साल में शायद बहुत कुछ हो जाता है, लेकिन मेरा प्यार उसके प्रति बढ़ता ही चला गया… बस फिर वो लम्हा आ गया, जब वो सामने आई, लेकिन बदले हुए रूप में. उसके साथ उसका हमसफ़र था और उसके चेहरे की ख़ुशी देखकर मैं मुस्कुरा दिया. बिना किसी शिकवे-गिले के मैंने उसे विदा किया…

मेरा पहला प्यार अधूरा रह गया… बस उम्रभर का इंतज़ार दे गया… मैं अब भी उसके लिए ख़ुशियों की दुआ मांगता हूं, क्योंकि प्यार का अर्थ स्वार्थी होना नहीं है, प्यार का मतलब समर्पण और त्याग भी तो है.

– वीना साधवानी

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पहला अफेयर: नीली छतरीवाली लड़की… (Pahla Affair: Neeli Chhatriwali Ladki)

Pyar ki Khaniya

पहला अफेयर: नीली छतरीवाली लड़की… (Pahla Affair: Neeli Chhatriwali Ladki)

प्रतिदिन वो नीली छतरीवाली लड़की घर के सामने से गुज़रती थी. किसी बच्चे को स्कूल बस तक छोड़ने के लिए चौराहे तक जाना उसका रोज़ का काम था. लेकिन आज पहली बार मेरी नज़र उसकी नज़र से टकरा गई. वो हौले से मुस्कुराई और आगे बढ़ गई. उसकी आंखों में ओस की बूंदों के समान चमक थी. मुस्कुराते हुए उसके लब ऐसे लग रहे थे मानो गुलाब की कई कलियां अभी-अभी खिली हों.

उसकी नाज़ुक-सी कलाई में एक ब्रेसलेट था, उसी हाथ से उसने छतरी को पकड़ रखा था, दूसरे हाथ की उंगली को बच्चे ने पकड़ रखा था. उसकी सुराहीदार गर्दन में कोई आभूषण नहीं था और सच पूछो तो उसे किसी आभूषण की ज़रूरत भी नहीं थी, बिन शृंगार के ही बेहद ख़ूबसूरत लगती थी वो. पैरों में सिंपल-सी चप्पल और हल्के रंग की सलवार-कुर्ती पहनकर आती थी वो. वेशभूषा भले ही साधारण थी उसकी, पर व्यक्तित्व असाधारण था. उसमें ग़ज़ब का आकर्षण था, एक कशिश थी, जो मुझे उसकी ओर खींच रही थी. वो किसी मत्स्यकन्या की तरह ख़ूबसूरत थी.

मैं उसके वापस लौटने का इंतज़ार करने लगा. कुछ देर बाद वह वापस लौटी. अब उसकी पलकें झुकी हुई थीं. लजाते हुए वो छुईमुई-सी प्रतीत हो रही थी. उसकी मासूम मुस्कान अब भी बनी हुई थी. उसे देखकर मेरे भीतर हज़ारों फूल खिल गए थे. यह पहली नज़र का प्यार नहीं तो और क्या था? मैंने घड़ी को देखा, तो दस बजने को थे. मैं अब रोज़ साढ़े नौ बजे से ही उसका इंतज़ार करने लगा था.

वो रोज़ मुस्कुराते हुए आती और चली जाती. मैं बस उसे देखता रह जाता. इतना ज़रूर समझ गया था कि वो भी मुझे पसंद तो करती थी, पर क्या प्यार भी करने लगी थी? सोचता था उसका नाम पूछूं, पर कभी हिम्मत ही नहीं जुटा पाया.

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यह सिलसिला कई दिनों तक चलता रहा, फिर अचानक उसका मेरी राह से गुज़रना बंद हो गया. मैं परेशान था. मोहल्ले से पता चला कि उसकी शादी तय हो चुकी है. समय बीतता गया, पर 7-8 महीनों बाद वो फिर दिखाई दी. कलाईभर की चूड़ियां पहने हुए थी वो. मांग में सिंदूर और गले में मंगलसूत्र था. लेकिन ये क्या… उसका सौदर्य यूं मुरझाया हुआ क्यों लग रहा था. उसके चहरे पर पहले-सी आभा नहीं थी. होंठ सूखे और मन उदास लग रहा था. बेहद कमज़ोर और थकी हुई लग रही थी. अब वो मुस्कुराती भी नहीं थी.

वो अक्सर मायके आया करती थी. सुनने में आता कि जाते समय वो मायके से ढेर सारा सामान ले जाया करती थी.

पर कई महीनों से उसके मायके आने का सिलसिला भी ख़त्म हो गया था. फिर एक दिन अचानक ख़बर मिली कि ससुराल ेमं उसकी जलने से मौत हो गई. क्या, कैसे और क्यों हुआ, कोई नहीं जानता… पर अंदाज़ा तो सबको है कि दहेज की बलि चढ़ चुकी थी वो.

इस दुनिया में अब वो नीली छतरीवाली लड़की नहीं है, लेकिन मुझे लगता है कि वो नीली छतरीवाली लड़की आज भी मुझे नीले आकाश से निहारती है और अब हमें कोई जुदा नहीं कर सकता.

– वैभव कोठारी

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पहला अफेयर: वो लड़की… (Pahla Affair: Wo Ladki)

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पहला अफेयर: वो लड़की… (Pahla Affair: Wo Ladki)

तब मैं 22 साल का दुबला-पतला शर्मीला युवक था. गणित में स्नातकोत्तर करने के बाद एक छोटे-से गांव के स्कूल में मुझे अध्यापक की नौकरी मिली. शहर में रहने के आदी मुझे गांव के नाम से ही रुलाई आ गई, किंतु नौकरी भी ज़रूरी थी, सो चला गया. वहां के जागीरदार साहब के यहां नीचे की मंज़िल पर एक छोटा-सा कमरा ले लिया किराए पर और रहने लगा.

घर कच्चा था, गोबर से लिपा हुआ. ऊपर की मंज़िल पर मकान मालिक का परिवार रहता था और नीचे के हिस्से में आधे भाग में गाय-ढोर बांधे जाते और आधे भाग में किराए के लिए छोटी-छोटी कोठरियां बनी हुई थीं, जिनमें से एक में मैं रहता था. कोठरी का एक दरवाज़ा बाहर सड़क पर खुलता था और एक अंदर के आंगन की तरफ़. जागीरदार साहब के बच्चे दिलीप और उसकी छोटी बहन सविता स्कूल के बाद अक्सर ही मेरे पास आ जाते और ख़ूब बातें करते. हालांकि दोनों ही 13-14 साल के ही थे, लेकिन न जाने क्यों मुझसे दोनों को ही बहुत लगाव था. जब भी समय मिलता, दोनों भागे चले आते.

उन्हीं से पता चला उनकी एक बड़ी बहन भी है, जो इंदौर में चाचा के पास रहकर बीए कर रही है. दोनों उसकी ही बातें करते रहते. वो कितनी सुंदर है, सुशील है, अन्य लड़कियों से अलग है, पढ़ने में तेज़ है. दोनों ने उसका इतना बखान किया कि मैं भी रात-दिन उसके बारे में सोचकर उससे मिलने को व्याकुल होने लगा. मन में उसकी छवि-सी बस गई. अब तो मुझे दिलीप और सविता का इंतज़ार रहता कि कब वे आएं और अपनी बहन विजया की बात करें. रातभर भी उसी का ख़्याल बना रहता मन में.

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पहली नज़र के प्यार के बारे में तो सुना था, लेकिन यहां तो मुझे बिना देखे ही प्यार हो गया था उससे. दिलीप से पता चला, वह दीपावली की छुट्टियों में घर आनेवाली है. अब तो मैं बेसब्री से राह देखने लगा. एक दिन ढलती सांझ में अचानक हल्ला हुआ… “दीदी आ गई… दीदी आ गई…” मेरी धड़कनें तेज़ हो गईं. दरवाज़े की दरार से देखने की बहुत कोशिश की, लेकिन अंधेरे में कुछ दिखाई नहीं दिया. तीसरे दिन सुबह खाट पर पड़ा था कि दिलीप की आवाज़ आई, “दीदी, मां बुला रही हैं…” और उत्तर में एक खनकदार स्वर उभरा “ये टोकरी डालकर आती हूं.” मैं तो सोच रहा था कि रोज़ उसकी मां वहां की सफ़ाई करती है, तो आज भी वही होंगी. मैंने दरार से झांककर देखा, चूड़ीदार-कुर्ता पहने, गुलाबी रंगतवाली

मासूम-सी लड़की सिर पर गोबर की टोकरी रखे आंगन में खड़ी थी. एक झलक ही देख पाया था कि वह गोबर फेंकने सामने मैदान में चली गई. किसी लड़के ने इस स्थिति में लड़की पसंद नहीं की होगी, लेकिन मैंने तय कर लिया कि इसी से शादी करूंगा.

20 दिनों में दो-चार बार ही उसकी झलक देख पाया और वह वापस चली गई. एक दिन शाम को दिलीप के साथ उसकी मां एक रिश्तेदार लड़की का फोटो लेकर आईं कि क्या वह मुझे पसंद है. मैंने तपाक से मना कर दिया. तब उन्होंने पूछा, “क्या आपको हमारी विजया पसंद है?” मैं शर्म के मारे कुछ बोल ही नहीं पाया, लेकिन दिल ख़ुशी से उछल पड़ा. मेरी चुप्पी पर वे निराश हो जाने लगीं, तभी दिलीप बोला, “मां, इन्हें दीदी पसंद है, ये शादी करने को तैयार हैं.” आज 55 साल हो गए हमारी शादी को, लेकिन आज भी गोबर की टोकरी सिर पर रखे हुए उसकी छवि आंखों में ज्यों की त्यों बनी हुई है.

– डॉ. विनीता राहुरीकर

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पहला अफेयर: तुम बिन… अधूरी मैं! (Pahla Affair: Tum Bin… Adhuri Main)

Pahla Affair Kahani

पहला अफेयर: तुम बिन… अधूरी मैं! (Pahla Affair: Tum Bin… Adhuri Main)

एक ख़्वाब थे तुम या मेरी हक़ीक़त… बस, आए… पलभर के लिए ठहरे… और ओझल हो गए… जैसे कोई नूर की बूंद तन-मन को भिगोकर चांद की आगोश में खो जाती है… जैसे कोई शबनम का क़तरा होंठों की दहलीज़ को छूकर, मदहोश करके, मन को प्यासा ही छोड़कर बिखर जाता है… इसी तरह से तुम भी आए थे, मेरी हस्ती पर छाए थे और फिर मुझे अधूरा करके चले गए… कैसे हो, कहां हो… मुझे आज तक पता नहीं… बस इतना पता है कि मैं अब तक वैसी ही हूं… तुम बिन अधूरी!

मुझे याद है, तुम्हारी वो पहली नज़र जो मुझे भीतर तक भिगो गई थी. बारिशों के मौसम में सावन के झूले की तरह तुम आए, मुझे ढलती शाम में भीगता देख अपना रेनकोट मुझे देकर बाइक पर तेज़ी से ओझल हो गए.

फिर कई दिनों तक तुम्हारा वहीं इंतज़ार करती रही थी मैं, पर तुम नहीं आए…

“हैलो मैम, कैसी हैं आप… आज तो बारिश नहीं हो रही, अब तो मेरा रेनकोट लौटा दीजिए. इस ग़रीब पर रहम कीजिए, मैं उस दिन के बाद रोज़ भीगकर घर जाता हूं.”

“ये अजीब बात है, बिन कहे, बिन बताए आप आए और चले गए. उसके बाद कहां ढूंढ़ती आपको. रोज़ आपका इंतज़ार करती थी यहीं, पर आप आज आए हैं.”

“क्या बात है, एक ही मुलाक़ात में इतनी बेक़रारी अच्छी नहीं. मेरा रोज़ इंतज़ार… वाह राहुल बेटा, काफ़ी डिमांड में है, एक ख़ूबसूरत हसीना तेरे इंतज़ार में थी…”

“बस-बस, मैं कोई तुमसे मिलने के लिए बेक़रार नहीं थी, बस तुम्हें थैंक्स कहना था और तुम्हारा सामान लौटाना था.”

“ठीक है, तो बोल दो थैंक्स और लौटा दो मेरा सामान…”

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“ये लीजिए, उस दिन से रोज़ बैग में इसका वज़न ढो रही हूं. वैसे थैंक्स मेरी मदद करने के लिए.”

“आप इतने दिनों तक मेरा इंतज़ार कर रही थीं, तो मेरा फ़र्ज़ है कि आपको कॉफी पिलाऊं… क्या मेरे नसीब में है ये?”

पता नहीं क्यों, मैं राहुल को मना नहीं कर पाई. एक तरह से तो वो अंजान ही था मेरे लिए, पर मैं उसके साथ चल पड़ी… कॉफी पीते-पीते ढेर सारी बातें हुईं हमारे बीच… और जाते समय राहुल ने कहा, “रूही, मेरा सामान लौटाया नहीं आपने… ये तो चीटिंग है.”

“नहीं, मैंने तो लौटा दिया… आपको ग़लतफ़हमी हुई है…”

“नहीं रूही, ये देखो, मेरा दिल, मेरे सीने में नहीं है… आपने चुपके से रख लिया अपने पास…”

जब राहुल ने रूमानी अंदाज़ में यह बात कही, तो अजीब-सी सिहरन हुई थी मेरे तन में… पहली बार किसी की बातों ने, किसी की नज़रों ने इस तरह से छुआ था मुझे. उसके बाद बातों का, मुलाक़ातों का सिलसिला चलता गया… हम क़रीब आने लगे कि एक रोज़ तुम अचानक चले गए मेरी ज़िंदगी से. बिना कुछ कहे, बिना कुछ बताए… मैंने बहुत इंतज़ार किया… पर तुम नहीं आए.

सारी आस टूट गई थी, फिर भी एक उम्मीद थी मन में कि तुम कभी न कभी आओगे, तब सारी शिकायतें कर लूंगी.

“मैम, आप मेरी सीट पर बैठी हैं शायद…” एक जानी-पहचानी आवाज़ ने मुझे चौंका दिया… मैं फ्लाइट में शायद ग़लत सीट पर बैठी हुई थी. नज़रें उठाकर देखा, तो सामने राहुल था…

उसे भी अंदाज़ा नहीं था कि मैं बैठी हूं. वो सकपका गया… पूरे रास्ते हमने कुछ नहीं कहा एक-दूसरे से. लैंडिंग के बाद मैंने देखा कि राहुल कुछ लंगड़ाकर चल रहा है. मैंने उसे रोका, बहुत-से सवाल थे मेरे मन में…

“क्या हुआ है तुम्हें. तुम ऐसे क्यों चल रहे हो…? राहुल, मुझे इस तरह बीच राह में छोड़कर चले गए, अब इस तरह चुप नहीं रह सकते तुम… तुमको बताना होगा…”

“रूही, उस शाम जब मैं तुमसे मिलकर वापस जा रहा था, तब मेरा एक्सीडेंट हो गया था. उसी में मेरा एक पैर ख़राब हो गया…”

“तुमने मुझे बताना भी ज़रूरी नहीं समझा… तुम्हें क्या लगा कि इतनी सी बात के लिए मैं तुम्हें छोड़ दूंगी…? इतना ही समझे हो मेरे प्यार को?”

“नहीं रूही, बात स़िर्फ इतनी होती तो भी मैं तुम्हारी ज़िंदगी से नहीं जाता, पर डॉक्टर्स ने बताया कि मेरी रीढ़ की हड्डी में गंभीर इंजरी हुई है, जिससे मैं अब कभी पिता नहीं बन सकता… तुम हमेशा कहती थीं कि हमारा घर होगा, बच्चे होंगे, मैं तुम्हारे सपने पूरे नहीं कर सकता…”

“राहुल, मेरा सपना तुमसे ही शुरू होता है, तुम पर ही ख़त्म… बच्चे तो बाद की बात है… मैं तुमसे प्यार करती हूं, जब तुम ही नहीं, तो मेरा अस्तित्व ही नहीं… तुम अब भी नहीं समझे मुझे… नहीं पहचाने मेरे प्यार को… तुम बिन अधूरी हूं मैं! हमेशा… ताउम्र…!”
राहुल ने मुझे अपनी गर्म बांहों में ़कैद कर लिया, ख़ुद से कभी न जुदा होने के लिए!

– गीता शर्मा

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पहला अफेयर: खिला गुलाब की तरह मेरा बदन… (Pahla Affair: Khila Gulab Ki Tarah Mera Badan)

Pahla Affair

पहला अफेयर: खिला गुलाब की तरह मेरा बदन… (Pahla Affair: Khila Gulab Ki Tarah Mera Badan)

पहले प्यार (First Love) का एहसास होता है बेहद ख़ास, अपने फर्स्ट अफेयर (Affair) की अनुभूति को जगाने के लिए पढ़ें रोमांस से भरपूर पहला अफेयर 

एक अरसे बाद तुम्हें देखा, ज़्यादा नहीं बदले थे तुम… पर हमारा रिश्ता बदल चुका था. वो प्यार का रिश्ता, वो मुहब्बत, वो चाहत अब कहीं मन म दबकर दम तोड़ चुकी थी.

बेइंतहा चाहती थी मैं तुम्हें, पर पता नहीं क्यों तुम पर भरोसा शुरू से ही नहीं था. तुम्हारा वो अजीब-सा व्यवहार… कभी बेहद प्यार और अपनापन, तो कभी अजनबियों सा बर्ताव. हर बार पूछने पर कहते कि एक नई लड़की से दोस्ती हुई है… उसी से बात करता हूं… मैं तुम्हें समझाती कि फ्लर्ट करना एक हद तक ठीक है, लेकिन अगर तुम हमारे रिश्ते को लेकर संजीदा हो, तो यह सब कहां तक जायज़ है और तुम हंसकर कहते, बता तो देता हूं न तुम्हें सबकुछ… ख़ैर इसी तरह से दिन गुज़र रहे थे. पर कुछ समय से महसूस कर रही थी कि तुम कुछ ज़्यादा ही इग्नोर कर रहे थे मुझे. पूछने पर वही टालने वाला अंदाज़… लेकिन मैं अपने रिश्ते को एक नाम देना चाहती थी, पर तुम्हारे साथ कितनी दूर तक जा सकती थी यही सोचकर एक ़फैसला लिया…

“विकास, मुझे नहीं लगता कि तुम मुझे लेकर सीरियस हो. मैं इस रिश्ते को अब और आगे नहीं ले जा सकती…”

“रितिका, मैं टूट जाऊंगा तुम्हारे बिना… ये सब मेरा मस्ती-मज़ाक, इसे इतना सीरियसली क्यों ले रही हो…?”

“मुझे कंमिटमेंट चाहिए, पर मुझे नहीं लगता कि तुम कभी भी ज़िंदगी में एक सच्चे लाइफ पार्टनर बनकर मेरा साथ दे सकोगे. बस, ये आख़िरी मुलाक़ात है हमारी, इसे फाइनल गुड बाय समझो.”

“रितिका, प्यार का रिश्ता इतनी आसानी से स़िर्फ गुड बाय कहने से नहीं टूट जाता. मैं ताउम्र तुमसे प्यार करता रहूंगा और तुम्हारा इंतज़ार भी.”

मैं चली आई थी वहां से. शहर भी छोड़ दिया था. नए शहर में दिन गुज़र रहे थे, पर तुम्हारी यादें पीछा नहीं छोड़ रही थीं. लेकिन व़क्त हर ज़ख़्म को भर देता है और तुम्हारी सोशल साइट्स देखकर कभी लगा भी नहीं कि तुम मुझे मिस करते हो. शायद तुम भी यही चाहते थे.
आज फिर उसी शहर में पूरे 3 साल बाद आना हुआ. तुम्हें पता चला, तो तुमने मिलने की गुज़ारिश की. मैंने भी हां कर दी कि चलो एक दोस्त के नाते ही मिल लेने में हर्ज़ ही क्या है… तुम्हारा घर वैसे भी मेरे होटल रुम के पास ही था.

डोर बेल बजाते हुए हाथ कांप रहे थे. बहुत कुछ चल रहा था मन में. तुमको देखकर सोचा नहीं था धड़कनें इतनी तेज़ हो जाएंगी. क्या मैं अब भी तुम्हें भुला नहीं पाई? क्या अब भी प्यार करती हूं तुमसे? नहीं, मुझे नहीं लगता… पर ये हाल क्यों है फिर दिल का… तुमने वही शर्ट पहनी थी, जो मैंने तुम्हारे बर्थडे पर गिफ्ट की थी.

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“कैसी हो रितु? बहुत क्यूट लग रही हो, हमेशा की तरह…”

“मैं ठीक हूं, तुम कैसे हो?”

“तुम्हारे बिना कैसा हो सकता हूं मैं? एकदम तन्हा और अधूरा हूं. तुम्हारी छोटी-छोटी ग़लतफ़हमियां हमारे रिश्ते को कहां ले आईं देख रही हो न?”

“मेरी ग़लतफ़हमियां या तुम्हारी आदतें और लापरवाहियां?”

“चलो, मान लिया मैं ही ग़लत था, पर आज भी इन आंखों को तुम्हारा ही इंतज़ार रहता है. मेरी ज़िंदगी में अगर कोई और होता, तो क्यों इस तरह तुम्हारे क़दमों में झुका रहता?”

“तुम्हारी सोशल साइट्स को देखकर तो नहीं लगता कि तुम्हें मेरा इंतज़ार है.”

“रितु, सोशल साइट्स को क्यों तुमने प्यार को परखने का पैमाना मान लिया है. क्या मेरी आंखों में नहीं दिखता तुम्हें?”

“घर काफ़ी अच्छा सजाया है तुमने.”

“तुम्हारे बिना ये घर नहीं स़िर्फ ईंट-पत्थरों का मकान है, रितु मेरी ज़िंदगी में वापस आ जाओ, मेरे इस मकान को घर बना दो प्लीज़…”
यह कहते हुए तुमने मेरा हाथ थाम लिया. तुम्हारी उस छुअन में अजीब-सी कशिश थी. उस गर्माहट में खो सी गई थी मैं. मेरे बदन में सिहरन-सी होने लगी थी. मैंने झटके से हाथ छुड़ा लिया. तुम फिर मेरे क़रीब आए और मुझे गले से लगा लिया. मैं चाहकर भी ख़ुद को तुमसे अलग नहीं कर पाई… तुमने वही मेरा पसंदीदा गाना प्ले कर रखा था… न जाने क्या हुआ, जो तूने छू लिया… खिला गुलाब की तरह मेरा बदन… उस मदहोशी के आलम में किसी भी शिकवे-शिकायत की जगह नहीं थी, बस बेपनाह प्यार था. अब हमें दो से एक होना था. इसी ख़्याल ने मुझे और भी निखार दिया था…

– गीता शर्मा

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पहला अफेयर: ख़्वाबों की डोर… (Pahla Affair: Khwabon Ki Dor)

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पहला अफेयर: ख़्वाबों की डोर… (Pahla Affair: Khwabon Ki Dor)

पहले प्यार (First Love) का एहसास होता है बेहद ख़ास, अपने फर्स्ट अफेयर (Affair) की अनुभूति को जगाने के लिए पढ़ें रोमांस से भरपूर पहला अफेयर 

कई बार दिल के डूबने का अंदाज़ भी निराला होता है कि हम परेशानी की वजह ढूंढ़ने में लंबा अरसा लगा देते हैं. आदेश का ख़त हाथ में है और मैं माज़ी के समंदर में गोते लगा रही हूं. पूरे तीन साल तक जिसके नाम की अंगूठी पहने रही, आज हाथ की उंगली पर उसके निशां उसकी बेवफ़ाई की दास्तां कह रहे हैं.

अब तो हाथ की लकीरें भी मुझे मुंह चिढ़ा रही हैं. धीरे-धीरे रंगीन ख़्वाबों की डोर हाथों से छूटने लगी… अब तो आदेश के साथ बंधे रिश्तों में गांठें-सी पड़ गई हैं. ख़त क्या है, सफ़ाई का एक छोटा-सा मज़मून. मैं आवेश में आ ख़त को मुट्ठी में मरोड़ने लगती हूं. बेबस परिंदे से पन्ने, मेरे हाथों में फड़फड़ा रहे हैं. एक झटके में अपने से यूं रिहा करना, मेरे भीतर एक ज्वालामुखी धधक रहा है.

मन में एक युद्ध छिड़ा है. अरे! तेरे पापा इतने भी नासमझ न थे कि दो दिलों की धड़कन न सुन पाएं. बोलो, विजातीय होने से क्या प्यार की पौध नहीं पनपती. सवालों का बवंडर है, जो मेरा चैन छीन रहा है. अतीत से चाहे जितना भागो, लेकिन माज़ी का भूत पीछा कब छोड़ता है. परछाईं-सा संग-संग डोलता है. उसके हर ख़त का इंतज़ार, हर आहट पर चौंक जाना मेरी आदत-सी बन गई. कहीं और गुल सजाना था, तो इस अभागन की पलकों पर सपनों का फरेबी जाल क्यों बिछाया?

अब लग रहा है जैसे आदी शब्दों की भेड़चाल से सभ्यता का दायरा पार कर, मुझसे किनारे का कोई सिरा ढूंढ़ रहा हो. आज मेरे मन को छूकर निकले वो पल रेत से खिसक रहे हैं.

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मैंने फोन पर आदी से मिलने की आख़िरी इल्तिजा की. मैं उसके चेहरे के बदलते रंगों का जायज़ा लेना चाहती थी. साथ ही मन के किसी कोने में भय का भूत कुंडली मारे बैठा था. अगले दिन बाग में हम दोनों मिले. वह हाथ में भुट्टा लेकर मस्त चाल से मेरी ओर मुड़ा. मैं रुंधे गले से केवल इतना कह पाई, “आदेश! ज़रा सोचो, मुझे मझधार में छोड़ तुम किसी का हाथ थाम नई ज़िंदगी बसा लोगे… मेरा क्या…?”

मेरी आवाज़ भर्रा गई. उसके कांधे पर सिर रखकर मैं सिसक पड़ी. मेरी पीठ थपथपाते हुए उसने कहा, “कुछ करता हूं जूही, प्लीज़ रो मत.”
मैं उदास मन से घर लौटी. मां पूछती रह गई. मैं सोचती रही कि निराधार पुरातन संस्कारों तले दबे रहकर अपने प्यार की आहूति क्यों दी जाए?

मेरे घर उसका अक्सर आना-जाना था. मेरे घर में सब राज़ी थे. मेरे पिता तो थे नहीं, मां बेहद कोमल स्वभाव की थीं. मां अक्सर उसका मनपसंद खाना बनाकर उसे चाव से खिलाती थीं, पर सुना था उसके पिता ज़िद्दी स्वभाव के थे.

एक रोज़ चाचा की मौत की ख़बर सुनकर अचानक हमारा गांव जाना हुआ. वापस लौटे, तो ख़त मिला. उसका विवाह हो चुका था. उसके पिता की चाल थी या उसकी भी सहमति… पता नहीं! पर मेरा पहला प्यार अधूरा ही रह गया…

काश! उस पहले प्यार के नक्शे अपने मन की किताब से मिटा पाती… अब मैं हूं, तन्हाई है… वही परछाईं बन मेरे संग-संग डोलती है.

– मीरा हिंगोरानी

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पहला अफेयर: तुम्हारा मुजरिम! (Pahla Affair: Tumhara Mujrim)

Pahla Affair

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पहला अफेयर: तुम्हारा मुजरिम! (Pahla Affair: Tumhara Mujrim)

पहले प्यार (FirstLove) का एहसास होता है बेहद ख़ास, अपने फर्स्ट अफेयर (Affair) की अनुभूति को जगाने के लिए पढ़ें रोमांस से भरपूर पहला अफेयर 

क्यों इस तरह अधूरा छोड़कर चले गए तुम मुझे… मुकम्मल होने को बेक़रार था इस बार मेरा तन-मन, तुम्हारे साथ, तुम्हारी उस छुअन की वो सिहरन… तुम्हारा यूं लगातार मुझे देखते रहना… अपने हाथों से मुझे खाना खिलाना… इतना सारा व़क्त हमने एक साथ गुज़ारा… फिर ये कैसी प्यास जगाकर मुझे तन्हा छोड़ दिया… जानती थी कि तुमको तो लौटना जाना है एक दिन अपने लोगों के बीच… अपनों में… पर मेरा क्या… मुझे अपना बनाकर क्यों बेगानों में यूं छोड़ गए?

तुमने तो कहा था कि इस बार जब मैं आऊंगा, तो तुमको अपने साथ ही लेकर जाऊंगा… फिर क्यों इस तरह बिना हमारी ज़िंदगी का फैसला किए तुम चले गए… कितने दिन बीत गए, न तुमने कोई फोन किया, न तुम्हारी कोई ख़बर आई…

मुझे लगने लगा है अब तो जैसे ये रिश्ता, ये प्यार बस एक फरेब था… तुम्हें जो चाहिए था, वो तुमने पा लिया… अब पीछे मुड़कर देखने के लिए क्या बचा था तुम्हारे लिए… अगर मेरी परवाह होती, तो ज़रूर हमारे प्यार का सिलसिला आगे बढ़ता…

मेरी ज़िंदगी तो रुकी हुई है अब भी उसी मोड़ पर, बस किसी तरह धक्का मारकर चला रही हूं… पर अब जो सच सबके सामने आएगा, उसका सामना मैं कैसे करूंगी… मैं प्रेग्नेंट हो गई हूं… और मेरे बच्चे को कौन अपनाएगा? यही सोच-सोचकर परेशान हूं… स़िर्फ रितिका को इस सच के बारे में पता है…

“हैलो, प्रिया… कैसी हो…?”

“रितिका, मैं कैसी हो सकती हूं तुम ही बताओ… मैं कुछ डिसाइड ही नहीं कर पा रही.”

“तुम इस बच्चे को जन्म देने के बारे में सोच भी कैसे सकती हो, जो इंसान तुमको मंझधार में छोड़कर चला गया, तुम उसके बच्चे को दुनिया में लाने के लिए सबसे दुश्मनी ले लोगी?”

“ये बच्चा स़िर्फ उसका ही नहीं, मेरा भी है… पर शायद तुम सच कह रही हो, बस, कल तक मैं कोई न कोई निर्णय ले लूंगी.”

आज ऑफिस में भी मन नहीं लग रहा… डॉक्टर से अपॉइंटमेंट ले लेती हूं, भला मैं उस धोखेबाज़ इंसान के लिए अपनी ज़िंदगी दांव पर क्यों लगाऊं…

“प्रिया… सुनो, हैलो… प्रिया शर्मा!”

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अपना नाम सुनकर मैं चौंक गई, पीछे मुड़कर देखा, तो ये क्या… “विक्रम, तुम आज अचानक यूं? मैं तो समझी थी कि तुम अब तक भूल चुके होगे कि प्रिया नाम की भी कोई लड़की थी तुम्हारी ज़िंदगी में…”

“प्रिया, मुझे पता है, तुम मुझे फरेबी, धोखेबाज़ और न जाने क्या-क्या समझ रही होगी… पर मेरी मजबूरी थी…”

“ऐसी क्या मजबूरी थी विक्रम कि तुम एक फोन या एक मैसेज तक नहीं कर पाए?”

“प्रिया, हम किसी कॉफी शॉप में बैठकर बात करें?”

“बात करने के लिए अब बचा ही क्या है… मुझे डॉक्टर के पास जाना है, जो कहना है, यहीं कहो…”

“ठीक है प्रिया, दरअसल मैं जिस कंपनी में जॉब करता था, वहां बहुत बड़ा फ्रॉड हुआ था, जिन्होंने फ्रॉड किया था, उन्होंने मुझे बुरी तरह फंसा दिया था, क्योंकि मैंने कुछ दिन पहले ही उनकी शिकायत कंपनी के ओनर से की थी. मैं छुट्टी पर था, तो उन्होंने मौक़ा देखकर मुझे ही फंसा दिया और पुलिस में शिकायत तक दर्ज करवा दी.

मेरे घर वापस जाते ही पुलिस ने मुझे गिरफ़्तार कर लिया और मैं इन सबके बीच तुमसे कोई संपर्क न कर सका…
मेरे दोस्तों ने सच्चाई का पता लगाया और पुलिस की जांच के बाद सारा सच सामने आ गया. मैं अगर मुजरिम हूं, तो बस तुम्हारा… और अब तुम्हारा ये मुजरिम तुम्हारे सामने है, जो सज़ा दोगी, मैं सहने को तैयार हूं.”

मेरी आंखों से आंसू बह निकले… कभी-कभी छोटी-छोटी ग़लतफ़हमियां बड़े-बड़े रिश्ते तोड़ देती हैं…

“प्रिया, क्या सोच रही हो… और तुम डॉक्टर के पास क्यों जा रही हो? सब ठीक तो है न…?”

“विक्रम, आज तुम अगर नहीं आते, तो मुझसे बहुत बड़ा पाप हो जाता… क्या हम कॉफी शॉप पर चलकर बात करें…”

विक्रम और मैंने कॉफी शॉप में ढेर सारी बातें कीं…

“प्रिया, मैं पापा बननेवाला हूं, इससे बड़ी ख़ुशी की बात और क्या हो सकती है? चलो, आज ही घरवालों से चलकर बात करते हैं… मेरे घर में सभी तैयार हैं, मैं तुम्हारी लिए ही यहां आया था.”

“विक्रम, अगर तुम सही व़क्त पर न आते, तो मैं ख़ुद को कभी माफ़ नहीं कर पाती…”

“अब तो मैं आ गया न… तुम्हारा मुजरिम… तो जो हो सकता था वो मत सोचो, अब जो ख़ुशियां आनेवाली हैं हमारी ज़िंदगी में उनका स्वागत करो…”

– गीता शर्मा

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पहला अफेयर: ये मौसम की बारिश… (Pahla Affair: Ye Mausam Ki Barish)

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पहले प्यार (FirstLove) का एहसास होता है बेहद ख़ास, अपने फर्स्ट अफेयर (Affair) की अनुभूति को जगाने के लिए पढ़ें रोमांस से भरपूर पहला अफेयर 

आज फिर वही बारिश है, फिर वही हवाएं, फिर वही मिट्टी की ख़ुशबू… पर एक फ़र्क़ है कि आज तुम नहीं हो… स़िर्फ मैं हूं, मेरी तन्हाई है… आज याद करती हूं तुम्हें, तो बार-बार यही सोचती हूं कि क्यों प्यार करने लगी थी तुमसे… और प्यार करते-करते इतनी गहराई में डूबती गई कि सच्चाई देख भी नहीं पाई… आज भी याद है, वो पहली मुलाक़ात… तुमने निगाहों से छुआ था और मैं सकुचाते हुए निकल गई थी क्लासरूम में. मैं इस कॉलेज में नई आई थी. पापा का ट्रांसफर हो गया था इस दिलवालों की दिल्ली कहे जानेवाले शहर में, जहां मैंने दिल हारा और उसके बाद सब कुछ हार दिया…

कुछ दिनों तक ये नज़रों से बात करने का सिलसिला चलता रहा. फिर एक दिन घर जाते समय मेरी स्कूटी ख़राब हो गई. तुम पीछे से आ रहे थे, मदद की कोशिश की और मैंने मना कर दिया… तुमने कहा, “तुम्हारी मर्ज़ी, वैसे ये रास्ता है रिस्की…” और तुम आगे बढ़ गए. तुम्हारी इस बात से थोड़ा डर गई थी और मैंने सोचा कहीं ग़लती तो नहीं कर दी तुमसे मदद न लेकर… इतने में ही एक और गाड़ी दिखाई दी, कुछ लड़के बैठे थे, जो मुझ पर फ़ब्तियां कसते हुए जा रहे थे… मैं बुरी तरह घबरा गई थी कि इतने में तुम्हारी बाइक उनकी गाड़ी के पीछे नज़र आई. तुमने गाड़ी रोकी और मैं चुपचाप पीछे बैठ गई.

उस रात मैं सो नहीं पाई. रास्ते में न तुमने कुछ कहा, न मैंने. बस घर जाते समय तुम्हारी उन्हीं गहरी निगाहों में एक बार झांका था, जिनमें मासूमियत, ईमानदारी और मेरी लिए फिक्र झलक रही थी. उसके बाद तो रोज़ का ही यह सिलसिला हो गया था, तुम मुझे घर छोड़ते और मैं रास्तेभर बाइक पर तुमसे लिपटी रहती. देर रात तक हम दोनों एक-दूसरे को मैसेज करते रहते… प्यार में जीने-मरने की क़समें खाते… मुझे अक्सर दूसरों को देखकर लगता था कि कितना बचकाना होता है यह सब, लेकिन जब ख़ुद प्यार के एहसास ने मुझे छुआ, तब जाना कि ये बचकानी बातें कितनी क्यूट लगती हैं.

उस शाम हम समंदर के किनारे बैठे थे. तुमने ढलते सूरज की मदमाती लालिमा में मेरे अधरों पर अपने अधर रख दिए थे. एक नया एहसास था वो… बेहद रूमानी, बेहद हसीन… रातभर उसी एहसास को अपने ख़्यालों में समेटे रही मैं… अब मन में एक और नया ख़्याल जन्म ले रहा था… कब हम ज़माने के सामने एक हो पाएंगे? कब तुम मेरा हाथ थामोगे और मैं तुम्हारी दुल्हन बन तुम्हारी ज़िंदगी में हमेशा के लिए आऊंगी. हमारी परीक्षाएं हुईं. लास्ट ईयर था, तुमने अपने पापा का बिज़नेस भी संभाल लिया था और मैं भी अपने करियर को आकार देने में लगी थी.

फिर एक दिन वो शाम आई, जो ना ही आती तो अच्छा होता. तुम्हारा जन्मदिन था और तुमने कहा कि तुम मेरे साथ अकेले यह ख़ास दिन सेलिब्रेट करना चाहते हो… तुम पर तो ख़ुद से भी ज़्यादा भरोसा था, सो मैं तैयार हो गई. तुम्हारा फार्म हाउस पर शहर से दूर मदमाती शाम को हम दोनों अकेले थे. ज़ाहिर है, प्यार था, तो प्यार से जुड़े सारे आकर्षण भी जवां थे… तुमने मुझे बांहों में लिया और फिर धीरे-धीरे… “ये क्या कर रहे हो राज? ये ग़लत है…”

“सुहानी, इसमें ग़लत क्या है. हम प्यार में हैं और जल्द ही शादी करेंगे.”

“शादी करेंगे, तो शादी तक का इंतज़ार भी तो करना चाहिए न…”

“ये कैसी पिछड़ी हुई बातें कर रही हो सुहानी, प्लीज़ मेरा मूड मत ऑफ करो, कम से कम आज के दिन तो तुम ना नहीं बोल सकती…”

तुम शराब के नशे में थे, उस पर प्यार की ख़ुमारी ने तुम्हारी गुस्ताख़ी बढ़ा दी थी. बहुत मुश्किल हो रहा था तुम्हें रोक पाना… मैंने तुम्हें होश में लाने के लिए एक थप्पड़ जड़ दिया और वहां से किसी तरह चली आई… रोती रही रातभर. फिर यह सोचकर ख़ुद को समझा लिया कि नशा उतरते ही तुम समझ पाओगे…

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सुबह तुम्हें सॉरी का मैसेज किया, तुमने भी बुरा नहीं माना, यह जानकर तुम्हारे प्यार पर और गर्व होने लगा… व़क्त गुज़र रहा था और मैं कई बार तुम्हें कह भी चुकी थी कि घर आकर शादी की बात कर लो… पर न जाने क्यों आजकल मन अनहोनी की आशंका से घबराने लगा था. तुम्हारे मैसेजेस धीरे-धीरे कम होने लगे थे. कभी बिज़ी होने की बात, कभी काम का प्रेशर, कभी बिज़नेस की टेंशन कहकर तुम मुझे टालते रहे और मैं भी ख़ुद को समझाती रही. मुझे लगने लगा था कि तुम्हारी दिलचस्पी मुझमें कम होती जा रही है.

फिर एक दिन तुम्हारा फोन आया, “सॉरी लव, मैं इतना बिज़ी रहता हूं कि तुमसे बात भी नहीं कर पाता, पर बिलीव मी आई लव यूं…”

“मुझे पता है राज, कोई बात नहीं. तुम अपने काम पर ध्यान दो…”

“सुहानी, एक हेल्प चाहिए थी. मेरे दोस्त की गर्लफ्रेंड है, पर मेरा दोस्त उसको चीट कर रहा है. मैंने उसको लाख समझाया, पर वो मान ही नहीं रही.”

“इसमें मैं कैसे हेल्प कर सकती हूं?”

“तुम इतनी ब्यूटीफुल हो, तुम अगर उसके बॉयफ्रेंड से दोस्ती करके उसको अट्रैक्ट करोगी, तो शायद वो समझ जाए.”

“यार तुम कैसी बातें कर रहे हो, तुम अपनी गर्लफ्रेंड से ऐसा काम कैसे करवा सकते हो?”

“सुहानी, तुम भी न, यार सच में अट्रैक्ट

करने को थोड़ी कह रहा हूं, स़िर्फ उस लड़की राधा को समझाने के लिए, ताकि उसके साथ ग़लत न हो…”

“अच्छा ठीक है…” उसके बाद तुमने मुझे समझाया कि कैसे, कब, क्या बात करनी है तुम्हारे दोस्त से और उसका नंबर मुझे दिया. मैंने उससे दोस्ती बढ़ानी शुरू की और बहुत जल्द ही उसकी सच्चाई सबके सामने आ गई. राधा भी जान चुकी थी कि उसका बॉयफ्रेंड ग़लत था.

इस इंसिडेंट के बाद फिर तुम्हारे मैसेजेस कम आने लगे. एक दिन फिर तुम्हारा फोन आया कि राधा मुझसे बात करना चाहती है. मैंने जानना चाहा कि क्यों करना चाहती है, तो तुमने कहा, “तुम्हारी वजह से उसका ब्रेकअप हुआ, तो शायद वो भी बदला ले…” उसके बाद तुम हंसने लगे. राधा का फोन आया और उसने जो कुछ भी कहा, वो सुनकर मेरे होश उड़ गए. “हाय सुहानी, राज से तुम्हारा नंबर लिया, राज बहुत मानते हैं तुम्हें. कहते हैं, तुम उनकी सबसे अच्छी दोस्त हो. इसलिए मैंने सोचा कि तुमसे अपने दिल की बात शेयर करूं.”

“हां, बोलो, क्या कहना चाहती हो.”

“सुहानी, राज ने मुझे तब प्रपोज़ किया था, जब मैं उसके दोस्त को डेट कर रही थी. उसने मुझे लाख समझाया कि उसका दोस्त मुझे चीट कर रहा है, पर मुझे तो अपने प्यार पर विश्‍वास था. राज ने मेरा वो ग़ुरूर तोड़ दिया, पर एक तरह से अच्छा ही हुआ, क्योंकि मैं एक ग़लत इंसान पर भरोसा कर रही थी. सुहानी, तुम सुन रही हो न…”

“हां, तुम बोलती रहो, मैं सुन रही हूं… ज़्यादा बात नहीं करनी आती मुझे…”

“सुहानी, राज बहुत ही अच्छा लड़का है और पता ही नहीं चला कि इस बीच कब मैं भी उससे प्यार करने लगी, तुम उसकी दोस्त हो, तुम्हें क्या लगता है कि मुझे इस रिश्ते में आगे बढ़ना चाहिए?”

“राधा, ये तुम्हारा और राज का निजी मामला है, मैं कैसे सलाह दे सकती हूं. तुम जो ठीक समझो, करो.” यह कहकर फोन काट दिया मैंने, क्योंकि आगे बात सुनने और करने की मुझमें हिम्मत नहीं थी.

अब समझ में आया कि राज स़िर्फ मेरा इस्तेमाल कर रहा था, राधा को पाने के लिए. उसके बाद कई दिनों तक मैंने किसी से बात नहीं की… आज मौसम बदला है… पर मन बेहद उदास है. इतने में ही मेरा फोन बजा…

“हैलो, कौन बात कर रहा है?”

“सुहानी, फोन कट मत करना, मैं राज बोल रहा हूं. जानता था, मेरा फोन तुम नहीं उठाओगी, इसलिए किसी दूसरे नंबर से कॉल किया.”

“राज, मैं किसी की लाइफ में ज़बर्दस्ती नहीं रहना चाहती, तुम राधा के साथ अपनी ज़िंदगी जी सकते हो, मेरी तरफ़ से तुम्हें कोई प्रॉब्लम नहीं आएगी कभी…”

“सुहानी, तुम्हें राधा पर भरोसा है, मुझ पर नहीं, अपने प्यार पर नहीं. राधा मुझे पसंद करने लगी, तो इसमें मेरा क्या ़कुसूर है? उसने तुम्हें जो भी कहानी सुनाई, तुमने भरोसा कर लिया? हमारा प्यार इतना कमज़ोर है कि बस एक लड़की आकर उसे तोड़कर चली जाए… मुझे बिज़नेस की सिलसिले में बाहर जाना पड़ा. अब लौटा हूं लंबे टूर के बाद तो तुमसे कॉन्टैक्ट ही नहीं हो पाया.

राधा से बात की, तो पता चला उसने तुमसे बात की थी. मुझे लगा कि वो रिश्ता टूटने के दर्द से गुज़र रही है, तो तुमसे शेयर करना चाहती होगी अपने दिल की बात.

“पर राज, तुमने ही तो कहा था कि वो भी बदला लेना चाहती होगी और पता नहीं क्या-क्या…”

“अरे, वो मैंने मज़ाक में कहा था, मुझे क्या पता था कि सच में वो ऐसा ही कुछ करने जा रही है… वो सब छोड़ो, मेरे पापा आज आ रहे हैं तुम्हारे घर पर हमारी शादी की बात करने… अब प्लीज़ मेरे घर, मेरी ज़िंदगी में पूरी तरह से आ जाओ, ताकि फिर किसी को मौक़ा न मिले हमारे बीच आने का. अब फोन रख रहा हूं, बहुत काम है, लव यू.”

मुझे समझ में ही नहीं आ रहा था कि ये सब कुछ क्या और कैसे हुआ… बस, इतना समझ में आया कि मेरा प्यार सच्चा था और अब हम हमेशा के लिए एक होने जा रहे हैं… ये बारिश अब अचानक इतनी रूमानी लगने लगी और मैं प्यार व आंसुओं से सराबोर छत पर जाकर भीगने लगी…

– गीता शर्मा

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