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पहला अफेयर: ख़्वाबों की डोर… (Pahla Affair: Khwabon Ki Dor)

Pahla Affair

पहला अफेयर: ख़्वाबों की डोर… (Pahla Affair: Khwabon Ki Dor)

पहले प्यार (First Love) का एहसास होता है बेहद ख़ास, अपने फर्स्ट अफेयर (Affair) की अनुभूति को जगाने के लिए पढ़ें रोमांस से भरपूर पहला अफेयर 

कई बार दिल के डूबने का अंदाज़ भी निराला होता है कि हम परेशानी की वजह ढूंढ़ने में लंबा अरसा लगा देते हैं. आदेश का ख़त हाथ में है और मैं माज़ी के समंदर में गोते लगा रही हूं. पूरे तीन साल तक जिसके नाम की अंगूठी पहने रही, आज हाथ की उंगली पर उसके निशां उसकी बेवफ़ाई की दास्तां कह रहे हैं.

अब तो हाथ की लकीरें भी मुझे मुंह चिढ़ा रही हैं. धीरे-धीरे रंगीन ख़्वाबों की डोर हाथों से छूटने लगी… अब तो आदेश के साथ बंधे रिश्तों में गांठें-सी पड़ गई हैं. ख़त क्या है, सफ़ाई का एक छोटा-सा मज़मून. मैं आवेश में आ ख़त को मुट्ठी में मरोड़ने लगती हूं. बेबस परिंदे से पन्ने, मेरे हाथों में फड़फड़ा रहे हैं. एक झटके में अपने से यूं रिहा करना, मेरे भीतर एक ज्वालामुखी धधक रहा है.

मन में एक युद्ध छिड़ा है. अरे! तेरे पापा इतने भी नासमझ न थे कि दो दिलों की धड़कन न सुन पाएं. बोलो, विजातीय होने से क्या प्यार की पौध नहीं पनपती. सवालों का बवंडर है, जो मेरा चैन छीन रहा है. अतीत से चाहे जितना भागो, लेकिन माज़ी का भूत पीछा कब छोड़ता है. परछाईं-सा संग-संग डोलता है. उसके हर ख़त का इंतज़ार, हर आहट पर चौंक जाना मेरी आदत-सी बन गई. कहीं और गुल सजाना था, तो इस अभागन की पलकों पर सपनों का फरेबी जाल क्यों बिछाया?

अब लग रहा है जैसे आदी शब्दों की भेड़चाल से सभ्यता का दायरा पार कर, मुझसे किनारे का कोई सिरा ढूंढ़ रहा हो. आज मेरे मन को छूकर निकले वो पल रेत से खिसक रहे हैं.

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मैंने फोन पर आदी से मिलने की आख़िरी इल्तिजा की. मैं उसके चेहरे के बदलते रंगों का जायज़ा लेना चाहती थी. साथ ही मन के किसी कोने में भय का भूत कुंडली मारे बैठा था. अगले दिन बाग में हम दोनों मिले. वह हाथ में भुट्टा लेकर मस्त चाल से मेरी ओर मुड़ा. मैं रुंधे गले से केवल इतना कह पाई, “आदेश! ज़रा सोचो, मुझे मझधार में छोड़ तुम किसी का हाथ थाम नई ज़िंदगी बसा लोगे… मेरा क्या…?”

मेरी आवाज़ भर्रा गई. उसके कांधे पर सिर रखकर मैं सिसक पड़ी. मेरी पीठ थपथपाते हुए उसने कहा, “कुछ करता हूं जूही, प्लीज़ रो मत.”
मैं उदास मन से घर लौटी. मां पूछती रह गई. मैं सोचती रही कि निराधार पुरातन संस्कारों तले दबे रहकर अपने प्यार की आहूति क्यों दी जाए?

मेरे घर उसका अक्सर आना-जाना था. मेरे घर में सब राज़ी थे. मेरे पिता तो थे नहीं, मां बेहद कोमल स्वभाव की थीं. मां अक्सर उसका मनपसंद खाना बनाकर उसे चाव से खिलाती थीं, पर सुना था उसके पिता ज़िद्दी स्वभाव के थे.

एक रोज़ चाचा की मौत की ख़बर सुनकर अचानक हमारा गांव जाना हुआ. वापस लौटे, तो ख़त मिला. उसका विवाह हो चुका था. उसके पिता की चाल थी या उसकी भी सहमति… पता नहीं! पर मेरा पहला प्यार अधूरा ही रह गया…

काश! उस पहले प्यार के नक्शे अपने मन की किताब से मिटा पाती… अब मैं हूं, तन्हाई है… वही परछाईं बन मेरे संग-संग डोलती है.

– मीरा हिंगोरानी

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पहला अफेयर: तुम्हारा मुजरिम! (Pahla Affair: Tumhara Mujrim)

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पहला अफेयर: तुम्हारा मुजरिम! (Pahla Affair: Tumhara Mujrim)

पहले प्यार (FirstLove) का एहसास होता है बेहद ख़ास, अपने फर्स्ट अफेयर (Affair) की अनुभूति को जगाने के लिए पढ़ें रोमांस से भरपूर पहला अफेयर 

क्यों इस तरह अधूरा छोड़कर चले गए तुम मुझे… मुकम्मल होने को बेक़रार था इस बार मेरा तन-मन, तुम्हारे साथ, तुम्हारी उस छुअन की वो सिहरन… तुम्हारा यूं लगातार मुझे देखते रहना… अपने हाथों से मुझे खाना खिलाना… इतना सारा व़क्त हमने एक साथ गुज़ारा… फिर ये कैसी प्यास जगाकर मुझे तन्हा छोड़ दिया… जानती थी कि तुमको तो लौटना जाना है एक दिन अपने लोगों के बीच… अपनों में… पर मेरा क्या… मुझे अपना बनाकर क्यों बेगानों में यूं छोड़ गए?

तुमने तो कहा था कि इस बार जब मैं आऊंगा, तो तुमको अपने साथ ही लेकर जाऊंगा… फिर क्यों इस तरह बिना हमारी ज़िंदगी का फैसला किए तुम चले गए… कितने दिन बीत गए, न तुमने कोई फोन किया, न तुम्हारी कोई ख़बर आई…

मुझे लगने लगा है अब तो जैसे ये रिश्ता, ये प्यार बस एक फरेब था… तुम्हें जो चाहिए था, वो तुमने पा लिया… अब पीछे मुड़कर देखने के लिए क्या बचा था तुम्हारे लिए… अगर मेरी परवाह होती, तो ज़रूर हमारे प्यार का सिलसिला आगे बढ़ता…

मेरी ज़िंदगी तो रुकी हुई है अब भी उसी मोड़ पर, बस किसी तरह धक्का मारकर चला रही हूं… पर अब जो सच सबके सामने आएगा, उसका सामना मैं कैसे करूंगी… मैं प्रेग्नेंट हो गई हूं… और मेरे बच्चे को कौन अपनाएगा? यही सोच-सोचकर परेशान हूं… स़िर्फ रितिका को इस सच के बारे में पता है…

“हैलो, प्रिया… कैसी हो…?”

“रितिका, मैं कैसी हो सकती हूं तुम ही बताओ… मैं कुछ डिसाइड ही नहीं कर पा रही.”

“तुम इस बच्चे को जन्म देने के बारे में सोच भी कैसे सकती हो, जो इंसान तुमको मंझधार में छोड़कर चला गया, तुम उसके बच्चे को दुनिया में लाने के लिए सबसे दुश्मनी ले लोगी?”

“ये बच्चा स़िर्फ उसका ही नहीं, मेरा भी है… पर शायद तुम सच कह रही हो, बस, कल तक मैं कोई न कोई निर्णय ले लूंगी.”

आज ऑफिस में भी मन नहीं लग रहा… डॉक्टर से अपॉइंटमेंट ले लेती हूं, भला मैं उस धोखेबाज़ इंसान के लिए अपनी ज़िंदगी दांव पर क्यों लगाऊं…

“प्रिया… सुनो, हैलो… प्रिया शर्मा!”

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अपना नाम सुनकर मैं चौंक गई, पीछे मुड़कर देखा, तो ये क्या… “विक्रम, तुम आज अचानक यूं? मैं तो समझी थी कि तुम अब तक भूल चुके होगे कि प्रिया नाम की भी कोई लड़की थी तुम्हारी ज़िंदगी में…”

“प्रिया, मुझे पता है, तुम मुझे फरेबी, धोखेबाज़ और न जाने क्या-क्या समझ रही होगी… पर मेरी मजबूरी थी…”

“ऐसी क्या मजबूरी थी विक्रम कि तुम एक फोन या एक मैसेज तक नहीं कर पाए?”

“प्रिया, हम किसी कॉफी शॉप में बैठकर बात करें?”

“बात करने के लिए अब बचा ही क्या है… मुझे डॉक्टर के पास जाना है, जो कहना है, यहीं कहो…”

“ठीक है प्रिया, दरअसल मैं जिस कंपनी में जॉब करता था, वहां बहुत बड़ा फ्रॉड हुआ था, जिन्होंने फ्रॉड किया था, उन्होंने मुझे बुरी तरह फंसा दिया था, क्योंकि मैंने कुछ दिन पहले ही उनकी शिकायत कंपनी के ओनर से की थी. मैं छुट्टी पर था, तो उन्होंने मौक़ा देखकर मुझे ही फंसा दिया और पुलिस में शिकायत तक दर्ज करवा दी.

मेरे घर वापस जाते ही पुलिस ने मुझे गिरफ़्तार कर लिया और मैं इन सबके बीच तुमसे कोई संपर्क न कर सका…
मेरे दोस्तों ने सच्चाई का पता लगाया और पुलिस की जांच के बाद सारा सच सामने आ गया. मैं अगर मुजरिम हूं, तो बस तुम्हारा… और अब तुम्हारा ये मुजरिम तुम्हारे सामने है, जो सज़ा दोगी, मैं सहने को तैयार हूं.”

मेरी आंखों से आंसू बह निकले… कभी-कभी छोटी-छोटी ग़लतफ़हमियां बड़े-बड़े रिश्ते तोड़ देती हैं…

“प्रिया, क्या सोच रही हो… और तुम डॉक्टर के पास क्यों जा रही हो? सब ठीक तो है न…?”

“विक्रम, आज तुम अगर नहीं आते, तो मुझसे बहुत बड़ा पाप हो जाता… क्या हम कॉफी शॉप पर चलकर बात करें…”

विक्रम और मैंने कॉफी शॉप में ढेर सारी बातें कीं…

“प्रिया, मैं पापा बननेवाला हूं, इससे बड़ी ख़ुशी की बात और क्या हो सकती है? चलो, आज ही घरवालों से चलकर बात करते हैं… मेरे घर में सभी तैयार हैं, मैं तुम्हारी लिए ही यहां आया था.”

“विक्रम, अगर तुम सही व़क्त पर न आते, तो मैं ख़ुद को कभी माफ़ नहीं कर पाती…”

“अब तो मैं आ गया न… तुम्हारा मुजरिम… तो जो हो सकता था वो मत सोचो, अब जो ख़ुशियां आनेवाली हैं हमारी ज़िंदगी में उनका स्वागत करो…”

– गीता शर्मा

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पहला अफेयर: ये मौसम की बारिश… (Pahla Affair: Ye Mausam Ki Barish)

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पहले प्यार (FirstLove) का एहसास होता है बेहद ख़ास, अपने फर्स्ट अफेयर (Affair) की अनुभूति को जगाने के लिए पढ़ें रोमांस से भरपूर पहला अफेयर 

आज फिर वही बारिश है, फिर वही हवाएं, फिर वही मिट्टी की ख़ुशबू… पर एक फ़र्क़ है कि आज तुम नहीं हो… स़िर्फ मैं हूं, मेरी तन्हाई है… आज याद करती हूं तुम्हें, तो बार-बार यही सोचती हूं कि क्यों प्यार करने लगी थी तुमसे… और प्यार करते-करते इतनी गहराई में डूबती गई कि सच्चाई देख भी नहीं पाई… आज भी याद है, वो पहली मुलाक़ात… तुमने निगाहों से छुआ था और मैं सकुचाते हुए निकल गई थी क्लासरूम में. मैं इस कॉलेज में नई आई थी. पापा का ट्रांसफर हो गया था इस दिलवालों की दिल्ली कहे जानेवाले शहर में, जहां मैंने दिल हारा और उसके बाद सब कुछ हार दिया…

कुछ दिनों तक ये नज़रों से बात करने का सिलसिला चलता रहा. फिर एक दिन घर जाते समय मेरी स्कूटी ख़राब हो गई. तुम पीछे से आ रहे थे, मदद की कोशिश की और मैंने मना कर दिया… तुमने कहा, “तुम्हारी मर्ज़ी, वैसे ये रास्ता है रिस्की…” और तुम आगे बढ़ गए. तुम्हारी इस बात से थोड़ा डर गई थी और मैंने सोचा कहीं ग़लती तो नहीं कर दी तुमसे मदद न लेकर… इतने में ही एक और गाड़ी दिखाई दी, कुछ लड़के बैठे थे, जो मुझ पर फ़ब्तियां कसते हुए जा रहे थे… मैं बुरी तरह घबरा गई थी कि इतने में तुम्हारी बाइक उनकी गाड़ी के पीछे नज़र आई. तुमने गाड़ी रोकी और मैं चुपचाप पीछे बैठ गई.

उस रात मैं सो नहीं पाई. रास्ते में न तुमने कुछ कहा, न मैंने. बस घर जाते समय तुम्हारी उन्हीं गहरी निगाहों में एक बार झांका था, जिनमें मासूमियत, ईमानदारी और मेरी लिए फिक्र झलक रही थी. उसके बाद तो रोज़ का ही यह सिलसिला हो गया था, तुम मुझे घर छोड़ते और मैं रास्तेभर बाइक पर तुमसे लिपटी रहती. देर रात तक हम दोनों एक-दूसरे को मैसेज करते रहते… प्यार में जीने-मरने की क़समें खाते… मुझे अक्सर दूसरों को देखकर लगता था कि कितना बचकाना होता है यह सब, लेकिन जब ख़ुद प्यार के एहसास ने मुझे छुआ, तब जाना कि ये बचकानी बातें कितनी क्यूट लगती हैं.

उस शाम हम समंदर के किनारे बैठे थे. तुमने ढलते सूरज की मदमाती लालिमा में मेरे अधरों पर अपने अधर रख दिए थे. एक नया एहसास था वो… बेहद रूमानी, बेहद हसीन… रातभर उसी एहसास को अपने ख़्यालों में समेटे रही मैं… अब मन में एक और नया ख़्याल जन्म ले रहा था… कब हम ज़माने के सामने एक हो पाएंगे? कब तुम मेरा हाथ थामोगे और मैं तुम्हारी दुल्हन बन तुम्हारी ज़िंदगी में हमेशा के लिए आऊंगी. हमारी परीक्षाएं हुईं. लास्ट ईयर था, तुमने अपने पापा का बिज़नेस भी संभाल लिया था और मैं भी अपने करियर को आकार देने में लगी थी.

फिर एक दिन वो शाम आई, जो ना ही आती तो अच्छा होता. तुम्हारा जन्मदिन था और तुमने कहा कि तुम मेरे साथ अकेले यह ख़ास दिन सेलिब्रेट करना चाहते हो… तुम पर तो ख़ुद से भी ज़्यादा भरोसा था, सो मैं तैयार हो गई. तुम्हारा फार्म हाउस पर शहर से दूर मदमाती शाम को हम दोनों अकेले थे. ज़ाहिर है, प्यार था, तो प्यार से जुड़े सारे आकर्षण भी जवां थे… तुमने मुझे बांहों में लिया और फिर धीरे-धीरे… “ये क्या कर रहे हो राज? ये ग़लत है…”

“सुहानी, इसमें ग़लत क्या है. हम प्यार में हैं और जल्द ही शादी करेंगे.”

“शादी करेंगे, तो शादी तक का इंतज़ार भी तो करना चाहिए न…”

“ये कैसी पिछड़ी हुई बातें कर रही हो सुहानी, प्लीज़ मेरा मूड मत ऑफ करो, कम से कम आज के दिन तो तुम ना नहीं बोल सकती…”

तुम शराब के नशे में थे, उस पर प्यार की ख़ुमारी ने तुम्हारी गुस्ताख़ी बढ़ा दी थी. बहुत मुश्किल हो रहा था तुम्हें रोक पाना… मैंने तुम्हें होश में लाने के लिए एक थप्पड़ जड़ दिया और वहां से किसी तरह चली आई… रोती रही रातभर. फिर यह सोचकर ख़ुद को समझा लिया कि नशा उतरते ही तुम समझ पाओगे…

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सुबह तुम्हें सॉरी का मैसेज किया, तुमने भी बुरा नहीं माना, यह जानकर तुम्हारे प्यार पर और गर्व होने लगा… व़क्त गुज़र रहा था और मैं कई बार तुम्हें कह भी चुकी थी कि घर आकर शादी की बात कर लो… पर न जाने क्यों आजकल मन अनहोनी की आशंका से घबराने लगा था. तुम्हारे मैसेजेस धीरे-धीरे कम होने लगे थे. कभी बिज़ी होने की बात, कभी काम का प्रेशर, कभी बिज़नेस की टेंशन कहकर तुम मुझे टालते रहे और मैं भी ख़ुद को समझाती रही. मुझे लगने लगा था कि तुम्हारी दिलचस्पी मुझमें कम होती जा रही है.

फिर एक दिन तुम्हारा फोन आया, “सॉरी लव, मैं इतना बिज़ी रहता हूं कि तुमसे बात भी नहीं कर पाता, पर बिलीव मी आई लव यूं…”

“मुझे पता है राज, कोई बात नहीं. तुम अपने काम पर ध्यान दो…”

“सुहानी, एक हेल्प चाहिए थी. मेरे दोस्त की गर्लफ्रेंड है, पर मेरा दोस्त उसको चीट कर रहा है. मैंने उसको लाख समझाया, पर वो मान ही नहीं रही.”

“इसमें मैं कैसे हेल्प कर सकती हूं?”

“तुम इतनी ब्यूटीफुल हो, तुम अगर उसके बॉयफ्रेंड से दोस्ती करके उसको अट्रैक्ट करोगी, तो शायद वो समझ जाए.”

“यार तुम कैसी बातें कर रहे हो, तुम अपनी गर्लफ्रेंड से ऐसा काम कैसे करवा सकते हो?”

“सुहानी, तुम भी न, यार सच में अट्रैक्ट

करने को थोड़ी कह रहा हूं, स़िर्फ उस लड़की राधा को समझाने के लिए, ताकि उसके साथ ग़लत न हो…”

“अच्छा ठीक है…” उसके बाद तुमने मुझे समझाया कि कैसे, कब, क्या बात करनी है तुम्हारे दोस्त से और उसका नंबर मुझे दिया. मैंने उससे दोस्ती बढ़ानी शुरू की और बहुत जल्द ही उसकी सच्चाई सबके सामने आ गई. राधा भी जान चुकी थी कि उसका बॉयफ्रेंड ग़लत था.

इस इंसिडेंट के बाद फिर तुम्हारे मैसेजेस कम आने लगे. एक दिन फिर तुम्हारा फोन आया कि राधा मुझसे बात करना चाहती है. मैंने जानना चाहा कि क्यों करना चाहती है, तो तुमने कहा, “तुम्हारी वजह से उसका ब्रेकअप हुआ, तो शायद वो भी बदला ले…” उसके बाद तुम हंसने लगे. राधा का फोन आया और उसने जो कुछ भी कहा, वो सुनकर मेरे होश उड़ गए. “हाय सुहानी, राज से तुम्हारा नंबर लिया, राज बहुत मानते हैं तुम्हें. कहते हैं, तुम उनकी सबसे अच्छी दोस्त हो. इसलिए मैंने सोचा कि तुमसे अपने दिल की बात शेयर करूं.”

“हां, बोलो, क्या कहना चाहती हो.”

“सुहानी, राज ने मुझे तब प्रपोज़ किया था, जब मैं उसके दोस्त को डेट कर रही थी. उसने मुझे लाख समझाया कि उसका दोस्त मुझे चीट कर रहा है, पर मुझे तो अपने प्यार पर विश्‍वास था. राज ने मेरा वो ग़ुरूर तोड़ दिया, पर एक तरह से अच्छा ही हुआ, क्योंकि मैं एक ग़लत इंसान पर भरोसा कर रही थी. सुहानी, तुम सुन रही हो न…”

“हां, तुम बोलती रहो, मैं सुन रही हूं… ज़्यादा बात नहीं करनी आती मुझे…”

“सुहानी, राज बहुत ही अच्छा लड़का है और पता ही नहीं चला कि इस बीच कब मैं भी उससे प्यार करने लगी, तुम उसकी दोस्त हो, तुम्हें क्या लगता है कि मुझे इस रिश्ते में आगे बढ़ना चाहिए?”

“राधा, ये तुम्हारा और राज का निजी मामला है, मैं कैसे सलाह दे सकती हूं. तुम जो ठीक समझो, करो.” यह कहकर फोन काट दिया मैंने, क्योंकि आगे बात सुनने और करने की मुझमें हिम्मत नहीं थी.

अब समझ में आया कि राज स़िर्फ मेरा इस्तेमाल कर रहा था, राधा को पाने के लिए. उसके बाद कई दिनों तक मैंने किसी से बात नहीं की… आज मौसम बदला है… पर मन बेहद उदास है. इतने में ही मेरा फोन बजा…

“हैलो, कौन बात कर रहा है?”

“सुहानी, फोन कट मत करना, मैं राज बोल रहा हूं. जानता था, मेरा फोन तुम नहीं उठाओगी, इसलिए किसी दूसरे नंबर से कॉल किया.”

“राज, मैं किसी की लाइफ में ज़बर्दस्ती नहीं रहना चाहती, तुम राधा के साथ अपनी ज़िंदगी जी सकते हो, मेरी तरफ़ से तुम्हें कोई प्रॉब्लम नहीं आएगी कभी…”

“सुहानी, तुम्हें राधा पर भरोसा है, मुझ पर नहीं, अपने प्यार पर नहीं. राधा मुझे पसंद करने लगी, तो इसमें मेरा क्या ़कुसूर है? उसने तुम्हें जो भी कहानी सुनाई, तुमने भरोसा कर लिया? हमारा प्यार इतना कमज़ोर है कि बस एक लड़की आकर उसे तोड़कर चली जाए… मुझे बिज़नेस की सिलसिले में बाहर जाना पड़ा. अब लौटा हूं लंबे टूर के बाद तो तुमसे कॉन्टैक्ट ही नहीं हो पाया.

राधा से बात की, तो पता चला उसने तुमसे बात की थी. मुझे लगा कि वो रिश्ता टूटने के दर्द से गुज़र रही है, तो तुमसे शेयर करना चाहती होगी अपने दिल की बात.

“पर राज, तुमने ही तो कहा था कि वो भी बदला लेना चाहती होगी और पता नहीं क्या-क्या…”

“अरे, वो मैंने मज़ाक में कहा था, मुझे क्या पता था कि सच में वो ऐसा ही कुछ करने जा रही है… वो सब छोड़ो, मेरे पापा आज आ रहे हैं तुम्हारे घर पर हमारी शादी की बात करने… अब प्लीज़ मेरे घर, मेरी ज़िंदगी में पूरी तरह से आ जाओ, ताकि फिर किसी को मौक़ा न मिले हमारे बीच आने का. अब फोन रख रहा हूं, बहुत काम है, लव यू.”

मुझे समझ में ही नहीं आ रहा था कि ये सब कुछ क्या और कैसे हुआ… बस, इतना समझ में आया कि मेरा प्यार सच्चा था और अब हम हमेशा के लिए एक होने जा रहे हैं… ये बारिश अब अचानक इतनी रूमानी लगने लगी और मैं प्यार व आंसुओं से सराबोर छत पर जाकर भीगने लगी…

– गीता शर्मा

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पहला अफेयर: तुम्हारा प्यार मिला… (Pahla Affair: Tumhara Pyar Mila)

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पहला अफेयर: तुम्हारा प्यार मिला… (Pahla Affair: Tumhara Pyar Mila)

पहले प्यार (FirstLove) का एहसास होता है बेहद ख़ास, अपने फर्स्ट अफेयर (Affair) की अनुभूति को जगाने के लिए पढ़ें रोमांस से भरपूर पहला अफेयर 

मेरी वफ़ा का सिला मुझको शानदार मिला… गीत की यह लाइन मेरी ज़िंदगी की हक़ीक़त है. आज हमारी प्रीत 45 बरस की हो गई. आज भी तुम्हारे होंठों पर वह क़ातिल मुस्कान है, जो मुझ पर जादू कर गई थी. आज तुम मौन हो, कितने दिनों से तुमने मुझे ‘मन्ना’ कहकर नहीं पुकारा. पहले जब तुम पुकारते मन्ना… तो मिठास घुल जाती वातावरण में. कहनेवाले सच ही कहते हैं कि हाथ में जिसका नाम होता है, उसे ऊपरवाला मिलवा ही देता है. हम भी कुछ यूं ही मिले थे.

सांची हमारे परिवार की पसंदीदा जगह थी. जब भी मन करता मम्मी-पापा और हम दोनों बहनें सांची चले जाते. उन दिनों लड़कियां कार तो चलाती थीं, पर मोटरसाइकिल चलानेवाली लड़कियां बस दीदी और मैं ही थीं. जब हम निकलते, तब उसकी निगाह हम पर होती. दीदी तो न केवल मोटरसाइकिल चलातीं, बल्कि उसको सुधारने में भी माहिर थीं.

बारिश की झड़ी लगी थी. कॉलेज में छुट्टी का माहौल था. मन उकता रहा था. दीदी ने कहा, “चल सांची तक घूमकर आते हैं.” मैंने भी हामी भर दी. पापा की कार पर सवार होकर हम दोनों बहनें चल पड़ीं. रास्ते में एक जगह भीड़ जमा थी. कोई दुर्घटना घटी थी. हम दोनों भी पहुंचे. एक महिला अचेत पड़ी थी और घायल लड़का मदद की गुहार लगा रहा था. फ़ौरन दीदी और मैंने उस अचेत महिला और युवक को गाड़ी में बैठाया और अस्पताल भागे.

महिला और युवक दोनों अचेत थे. हमने पापा को भी ख़बर करवा दी. पुलिस भी आई. उनकी शिनाख्त हो गई. अगले दिन जब हम लोग हालचाल जानने पहुंचे, तो युवक होश में आ चुका था. “हैलो, मैं मनोज शास्त्री, भोपाल में प्रोफेसर हूं.” दीदी और मैंने औपचारिक बातचीत की, फिर लौट आए. यूं मिलने-मिलाने के दौरान मनोज बड़े भले-भले से लगे. एकदम सहज, मुस्कान क़ातिलाना थी, मगर दीदी तो मनोज की फैन हो गईं. आख़िर दोनों ही साइंसवाले थे और मैं इतिहास की स्टूडेंट.

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एक दिन मनोज की मम्मी घर आईं और उन्होंने रिश्ते की बात की. “अपने दोनों बेटों के लिए आपकी दोनों बेटियों का हाथ मांगती हूं.” झटपट सब तय हुआ और फिर जल्द शादी हो गई. बस, हम एक बार ही मिले थे और वो भी कुछ ही पलों के लिए. ससुराल में जब पहली बार हम मिले, तो इन्होंने कहा, “मैं तुम्हें मन्ना ही कहा करूंगा, मेरी मन्ना…” सच, उस दिन के बाद से हर दिन, हर पल तुमने अपनी मन्ना के मन को टूटने न दिया. प्यार का यह एहसास कितना अनमोल था. साल-दर-साल हमारी भूमिकाएं बदलीं, पर तुम्हारा प्यार कभी कम न हुआ. वो बढ़ा, बढ़ता चला गया, बच्चों को भी उनकी मुहब्बत की मंज़िल दिलवाने में तुमने कोई कसर बाकी न रखी.

हमारे बहू और दामाद दोनों अलग-अलग धर्मों के हैं, पर इस कदर वो हम में घुल-मिल गए हैं कि धर्म कहीं पीछे छूट गया है. आज जब मैं लड़खड़ा रही हूं, तो बच्चे मेरा संबल हैं और उनके भीतर छुपा तुम्हारा प्यार!

दो महीने बीत चुके हैं. मुझे अपने प्यार पर यक़ीन है और देखो, आज जब मैं तुम्हारे बाल बना रही थी, तो तुमने हौले से कहा, “मन्ना!” तुम्हारे होंठों को हिलते देखा मैंने. एक दिन तुम होश में आओगे… इस एक्सीडेंट ने तुम्हें भले ही कोमा तक पहुंचा दिया, पर मेरा प्यार तुम्हें मुझ तक वापस पहुंचाएगा… मेरे मन्ना.

– राजेश्‍वरी शुक्ला

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पहला अफेयर: वो बेपरवाह से तुम…! (Pahla Affair: Wo Beparwaah Se Tum)

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पहला अफेयर: वो बेपरवाह से तुम…! (Pahla Affair: Wo Beparwaah Se Tum)

पहले प्यार (FirstLove) का एहसास होता है बेहद ख़ास, अपने फर्स्ट अफेयर (Affair) की अनुभूति को जगाने के लिए पढ़ें रोमांस से भरपूर पहला अफेयर 

आज मन अजीब-सी दुविधा से जूझ रहा है… समझ में नहीं आ रहा क्या कहूं तुम्हें और उसको क्या कहूं, जिसकी तरफ़ कुछ दिनों से मन अंजानी डोर-सा खिंचता चला जा रहा है… जानती हूं तुम मेरे बहुत अच्छे दोस्त हो, अच्छे इंसान हो और सबसे बड़ी बात तुम्हारे साथ मुझे वो सारी सुख-सुविधाएं मिलेंगी, वो सम्मान मिलेगा, जो हर लड़की चाहती है… फिर ये दुविधा कैसी?

हालांकि कुछ दिनों से मुझे अंदाज़ा हो रहा था कि तुम्हारे मन में कुछ चल रहा है… तुम्हारा वो मुझे चोरी-चोरी देखना और फिर मेरे देख लेने पर यह जताना कि तुम तो कुछ देख ही नहीं रहे थे… तुम्हारी बातों से भी एहसास हो रहा था कि शायद पहले प्यार की ख़ुशबू ने तुम्हें छू लिया है… मेरी तरफ़ वो अलग-सा आकर्षण तुम्हारा… समझ रही थी मैं… यहां मेरा भी हाल कुछ ऐसा ही था… मेरे मन में भी पहली मुहब्बत ने दस्तक दे दी थी शायद… वो अंजाना-सा लड़का अच्छा लगने लगा था… हां, तुम्हारी तरह न वो सुलझा हुआ था, न वो ज़िम्मेदार था, न उसमें सलीका था, न परिपक्वता, न वो सोफिस्टिकेशन, जो तुम में है… पर दिल की धड़कनें तो उसी को देखकर बेकाबू हो रही थीं…

उसका वो बेपरवाह अंदाज़, वो लापरवाह-सा रहना… न सली़के से वो बात करता था, न ज़िंदगी को लेकर इतना गंभीर… शायद उसकी यही बातें मुझे आकर्षित कर रही थीं… और एक दिन उससे मेरी नज़रें मिलीं… दिल वहीं खो गया… उसने भी मुहब्बत का इज़हार किया… और मैं भी ना नहीं कह सकी… कहती भी कैसे, मैं तो न जाने कब से इसी बात का इंतज़ार कर रही थी.

उसका नाम विक्रांत था. मैं अक्सर विक्रांत को कहती कि इतने बेपरवाह क्यों रहते हो, ज़िंदगी में तुम्हें कुछ बनना नहीं है क्या? और वो कहता नहीं, कुछ नहीं बनना, बस तुमसे प्यार करना है… मुझे हंसी आ जाती उसकी बातों पर…
“लेकिन प्यार से पेट नहीं भरता विक्रांत…”
“प्यार के बिना भी तो ज़िंदगी बेमानी है… अब तुमने मुझसे प्यार किया है, तो मुझे ऐसे ही अपनाओ… मैं तो यूं ही रहूंगा हमेशा…”

कभी-कभी तो लगता कि कितना अजीब है ये लड़का… फिर सोचती उसकी यही बातें तो मुझे अच्छी लगती थीं, पर रिलेशनशिप में आने के बाद मैं प्रैक्टिकली सोच रही थी.

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तुम मेरे सबसे अच्छे दोस्त थे सागर… और आज तुमने भी जब अपने मन की बात मेरे सामने रखी, तो मन उलझ गया… किसे छोड़ूं, किसे अपनाऊं?… तुमसे लगाव था, पर प्यार नहीं… विक्रांत से प्यार था, पर उसका वो बेपरवाह जीवन…
ख़ैर, सोच रही हूं कि इस उलझन को जल्द ही ख़त्म करूं…

“विक्रांत, हम शादी कब करेंगे?”

“जब तुम कहो बेबी… मैं तो कब से कह रहा हूं…”

“कह रहे हो, पर तुम न कोई काम करते हो, न अपने करियर को लेकर सीरियस हो… शादी के बाद क्या करोगे? कैसे गुज़ारा करेंगे हम?”

“सब हो जाएगा दिव्या, तुम बस मुझ पर भरोसा तो करो…”

“यार तुम्हारी यही बातें मुझे बेचैन करती हैं, तुम सीरियस तो हो न मुझे लेकर?”

“तुम्हें क्या लगता है? आज़माकर देख लो… जान दे सकता हूं…”

“मुझे सागर ने कहा है कि वो भी मुझसे प्यार करता है… क्या करूं तुम ही बताओ?”

“मैं क्या बताऊं? तुम क्या सोचती हो उसके बारे में?”

“वो अच्छा लड़का है, उसे हर्ट नहीं करना चाहती…”

“हा, हा, हा… तो हां कह दो…” तुमने हंसते हुए लापरवाही से कहा…

“तुम सच में पागल हो… मुझे तुमसे शेयर ही नहीं करनी चाहिए बातें…”

“अरे यार, ग़लत समझ रही हो, वो तुम्हारा दोस्त है, तुम उसको हर्ट भी नहीं करना चाहती, तो तुम बेहतर जानती हो कि उसे कैसे टैकल करना है… कैसे ना कहना है… कल अगर मैं तुमसे कहूं कि मेरी फ्रेंड ने मुझे प्रपोज़ किया है, तो तुम्हारा क्या रिएक्शन होगा… तुम मेरी जगह ख़ुद को रखकर सोचो…

मैं जानता हूं, तुम मुझे बहुत लापरवाह समझती हो, तुम्हें लगता है कि मैं सीरियस नहीं हूं, पर मेरा विश्‍वास करो, जब तक सांस है, तुमसे प्यार करूंगा, तुम्हारा इंतज़ार करूंगा… जब तक तुम्हारा हाथ मांगने लायक नहीं हो जाता, तब तक तो तुम इंतज़ार करोगी न मेरा… इतना व़क्त दोगी न…?

मुझे पता है दुनिया बहुत प्रैक्टिकल है, मैं नहीं हूं वैसा, मैं बस ज़िंदगी को जीना चाहता हूं तुम्हारे साथ… ज़्यादा कुछ सोचता नहीं, पर इसका ये मतलब नहीं कि मुझे फ़िक्र नहीं या मैं अपने रिश्ते को लेकर गंभीर नहीं.”

आज तुम्हें पहली बार मैंने इतनी गंभीरता से बात करते देखा… तुम्हारी आंखें भर आईं थीं… तुम भले ही बेपरवाह नज़र आते हो, पर परिस्थितियों को मुझसे बेहतर तरी़के व परिवक्वता से समझने की क्षमता है तुम में… कितना भरोसा करते हो तुम मुझ पर, न कभी ओवर पज़ेसिव होते हो, न कभी मुझे बेवजह रोकते-टोकते हो…

अक्सर ऐसे मौ़के भी आए, जब मुझे किसी ने कुछ ग़लत कहा हो, तुमने ऐसी नौबत कभी नहीं आने दी कि मुझे किसी को जवाब देने की ज़रूरत पड़ी हो… हालांकि मैं एक इंडिपेंडेंट लड़की हूं, लेकिन जब-जब तुम मुझे प्रोटेक्ट करते हो, मुझे अच्छा लगता है… जब-जब तुम बच्चों की तरह ज़िद करके मुझे आईलवयू टु कहलवाने की ज़िद करते हो, मुझे अच्छा लगता है, जब कभी तुम इमोशनल होकर किसी छोटी-सी घटना पर भी यह कहते हो कि आज मन बहुत दुखी है, तुम्हारी ज़रूरत है… मुझे अच्छा लगता है… अच्छा लगता है तुम्हें सुनना, तुम्हारा मुझे हर व़क्त छेड़ना, मुझे ग़ुस्सा दिलाना और फिर कहना मज़ाक कर रहा हूं डफर…

मन की सारी दुविधाएं दूर हो गई थीं. तुमसे प्यार है, तो तुम्हारे साथ ही ज़िंदगी गुज़ारूंगी… फिर भले ही उसमें संघर्ष हो… इस संघर्ष का नाम ही तो ज़िंदगी है और ज़िंदगी का दूसरा नाम मेरे लिए तुम हो…

– गीता शर्मा

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पहला अफेयर: दरमियान (Pahla Affair: Darmiyaan)

Pahla Affair, Darmiyaan
Pahla Affair, Darmiyaan
पहला अफेयर: दरमियान (Pahla Affair: Darmiyaan)

पहले प्यार (FirstLove) का एहसास होता है बेहद ख़ास, अपने फर्स्ट अफेयर (Affair) की अनुभूति को जगाने के लिए पढ़ें रोमांस से भरपूर पहला अफेयर 

किस तरह से कोई शख़्स अचानक ज़िंदगी में चला आता है और कब वो मुहब्बत बनकर आपकी रूह को छूकर निकल जाता है, शायद पता ही नहीं चलता. तुम भी तो इसी तरह से आए थे मेरे जीवन में. एक ताज़े, मदमस्त हवा के झोंके की तरह और मैं सूखे पत्ते की तरह बस उड़ती चली गई, किसी पागल नदी की तरह बस बहती चली गई… न धड़कनों पर काबू रहा था, न क़दमों पर… बहकती चली गई, मचलती चली गई… तुम मेरे लिए क्या थे, शायद तुम कभी समझ ही नहीं पाए… या मैं ही इतनी नासमझ थी कि तुमको समझ नहीं पाई…

वो पहली मुलाक़ात अब तक है याद… एक दोस्त की पार्टी में मिले थे हम. वो पूरी रात मैंने बस तुम्हें सोचते हुए काटी थी. कितनी कशिश थी तुम्हारे व्यक्तित्व में, कितना शालीन था तुम्हारा व्यवहार… पहली नज़र में ही मैंने ख़ुद को खो दिया था. पर तुम्हारे दिल में क्या था, मैं नहीं जानती थी.

एक दिन ऑफिस में काम कर रही थी कि अंजान नंबर से कॉल आया, “हाय, मैं विक्रम, विक्रम शर्मा बोल रहा हूं.”

“जी, मैंने आपको पहचाना नहीं, क्या काम है कहिए.” मैंने बेमन से जवाब दिया.

“आप रितु बोल रही हैं न, हम उस दिन पार्टी में मिले थे… इतनी जल्दी भूल जाएंगी आप मुझे, मैंने सोचा नहीं था.”

“ओ माय गॉड! आपका नाम तक भी नहीं जानती थी मैं, इसलिए नहीं पहचान पाई, मेरा नंबर कहां से मिला आपको?”

“ढूंढ़ने पर तो भगवान भी मिल जाता है… मैं सोच रहा था, अगर आप आज शाम मेरे साथ कॉफी पी सकें, तो मेरी लाइफ बन जाएगी.”

“जी, बात अगर आपकी लाइफ की है, तो मैं मना कैसे कर सकती हूं…” न जाने उसकी बातों में क्या जादू था, मैं बस खिंचती चली गई. उसके बाद न जाने ऐसी कितनी ही मदभरी शामें हमने साथ गुज़ारीं. मैंने तो कल्पना भी नहीं की थी कि मेरी पहली नज़र का पहला प्यार मेरे लिए इतना बेक़रार होगा…

लेकिन पता नहीं मन में कहीं न कहीं मुझे यह महसूस होता था कि कहीं कुछ न कुछ सही नहीं है. तुम्हारा अचानक कहीं खो जाना, कुछ कहते-कहते ख़ुद को रोक लेना… फिर मैंने ही एक दिन सोचा कि अपने दिल की बात कह दूं तुमसे कि हां, मुझे प्यार है और तुम ही वो, जिसके साथ मुझे सारी ज़िंदगी बितानी है… इतने में तुम्हारा भी फोन आ गया कि शाम को कुछ ज़रूरी बात करनी है, मैंने सोचा तुम भी मुझे प्रपोज़ करनेवाले हो…

मेरी ज़िंदगी का सबसे हसीन दिन था वो. सोचा था दोपहर को शॉपिंग के बाद तुमसे कॉफी हाउस में मिलूंगी. पर मेरे लिए यह किसी सरप्राइज़ से कम नहीं था कि तुम मुझे शॉपिंग मॉल में ही नज़र आ गए थे.

“हाय विक्रम, देखो हम शाम को मिलनेवाले थे, पर शायद भगवान भी नहीं चाहता कि अब हम और इंतज़ार करें… विक्रम, क्या हुआ? तुम इतने झिझक क्यों रहे हो?” मैं बस विक्रम से बात ही कर रही थी कि एक 7-8 साल का बच्चा वहां आकर विक्रम से लिपटते हुए बोला, “पापा, मुझे प्लीज़ गेम ज़ोन में ले चलो न, मैं यहां बोर हो रहा हूं…” मुझे अपने कानों पर विश्‍वास नहीं हो रहा था. विक्रम शादीशुदा थे. उनका बेटा भी है. ऐसा कैसे हो सकता है. इतना बड़ा धोखा? मेरी ज़िंदगी का सबसे हसीन दिन तो जैसे मेरे लिए जानलेवा साबित हो गया था. किसी तरह ख़ुद को संभाला मैंने और विक्रम को बाय बोलकर चली आई.

एक महीने से ज़्यादा का समय हो गया, तुमने कई बार फोन किया, मैसेज किए, पर मैंने न मैसेज पढ़े, न ही फोन का जवाब दिया. एक धोखेबाज़ शख़्स से मैं कोई रिश्ता नहीं रखना चाहती थी. मेरी भावनाओं से खेलकर आख़िर क्या मिला… या यह तुम्हारा शौक़ होगा, लड़कियों को अपने आकर्षण में फंसाकर उनका इस्तेमाल करना.

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काश! मैं समझ पाती पहले, तो वो सब कुछ भी न हुआ होता, जो एक शाम हमारे बीच हुआ था… इतने में ही डोरबेल बजी, दरवाज़ा खोला, तो हैरानी भी थी और ग़ुस्सा भी…

“विक्रम, तुम अब क्या लेने आए हो? तुम्हें जो चाहिए था, वो तो मिल ही चुका न, मेरा शरीर, मेरा जिस्म… बस यही तो चाहते हो तुम मर्द.”

“रितु, मेरे प्यार को वासना का नाम देकर उसे गाली मत दो. तुम्हें मुझसे बात नहीं करनी, मत करना, रिश्ता नहीं रखना, मत रखना… पर एक बार सफ़ाई देने का मौक़ा तो दे ही सकती हो…”

“सफ़ाई, किस बात की, यही कहोगे न कि तुम्हारी शादी कम उम्र में ही गांव की किसी लड़की से हो गई थी, तुम्हारी बीवी से तुम्हें प्यार नहीं, वो तुम्हें समझ नहीं पाती… अक्सर मर्द अपनी कमज़ोरियों को इसी तरह छिपाते हैं. अपनी बीवी को बदनाम करके नाजायज़ रिश्ते बनाते हैं… मैं किसी की रखैल बनकर नहीं जीना चाहती…”

बस करो रितु, यह कहकर विक्रम ने मुझे बांहों में भरकर मेरे लबों को अपने लबों से बंद कर दिया… मैं छूटने की कोशिश करती रही, पर नाकामयाब रही…

“रितु, तुम इतनी ग़ुस्से में हो कि अपने प्यार से ही तुम्हारा मुंह बंद कर सकता था. अब प्लीज़ सुनो मेरी बात… रोहित मेरा बेटा है यह सच है, मैं शादीशुदा हूं यह भी सच है, हां मेरी शादी मेरी अपनी मर्ज़ी से हुई थी और मेरी पत्नी मेरे जीवन का सबसे अनमोल तोहफ़ा थी. बहुत प्यार करता था उससे मैं. लेकिन राहुल के जन्म के व़क्त ही वो हमें छोड़कर दूसरी दुनिया में चली गई. राहुल को उसके नाना-नानी अपने साथ ले गए, क्योंकि मेरे परिवार में कोई बुज़ुर्ग नहीं था और न ही राहुल को संभालनेवाला कोई था. वो छुट्टियों में आता है मेरे पास. उस रोज़ शाम को मैं तुम्हें यही सब बतानेवाला था, ताकि तुम अपना निर्णय ले सको.

सच कहता हूं रितु, तुम्हें जब पहली बार देखा, तो बेहद अपनापन लगा. मुझे लगा मेरी पत्नी नीलू के बाद अगर किसी लड़की ने मेरे दिल को छुआ है, तो वो स़िर्फ तुम हो… जब तुमसे शादी के बारे में सोचता, तो बस राहुल का ख़्याल आ जाता और तुम्हारी प्रतिक्रिया को लेकर थोड़ा डर जाता. लेकिन जिस रोज़ हम और क़रीब आए, उसके बाद मुझे एक अपराधबोध महसूस होने लगा. मुझे लगा तुम्हें अब तक अंधेरे में रखा और तुम्हारे साथ इतना क़रीब आ गया… बस, यही ग़लती है मेरी. अब तुम जो निर्णय लो, मैं तुम पर ज़ोर नहीं डालूंगा… ”

“तुमने मुझे इस काबिल ही कहां छोड़ा कि अब किसी और की हो सकूं…” यह कहते हुए अपने अधरों को मैंने विक्रम के लबों पर रख दिया… उसके बाद स़िर्फ प्यार ही प्यार था हमारे दरमियान… न कोई दीवार, न कोई ग़लतफ़हमी, न कोई शिकवा, न शिकायत…

आज मैं ख़ुश हूं कि जिसको चाहा उसे ही हमसफ़र बना दिया भगवान ने, राहुल जैसा बेटा और रिनी जैसी बेटी के साथ हम एक हैप्पी फैमिली हैं. मेरा पहला प्यार मेरी ज़िंदगी बन गया… आप भी किसी से प्यार करो, तो उस पर पूरा विश्‍वास करो…

– योगिनी भारद्वाज

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पहला अफेयर: आईनेवाली अलमारी (Pahla Affair: Aainewali Almaari)

Pahla Affair, Aainewali Almaari

Pahla Affair, Aainewali Almaari

पहला अफेयर: आईनेवाली अलमारी (Pahla Affair: Aainewali Almaari)

पहले प्यार का एहसास होता है बेहद ख़ास, अपने फर्स्ट अफेयर की अनुभूति को जगाने के लिए पढ़ें रोमांस से भरपूर पहला अफेयर

आज फिर दोपहर में फुर्सत होते ही ड्रेसिंग रूम में जाकर अलमारी के सामने खड़ी हो गई. कितने घर बदल गए, घर का पूरा फर्नीचर बदल गया, नहीं बदला कुछ, तो यह अलमारी और इससे मेरा प्यार… अपने पहले प्यार की तरंगित मधुर स्मृतियों को क्या कोई अपने आप से दूर कर पाया है? इसके धुंधला चुके आईने में अब भी तुम्हारा प्रतिबिंब झलकता है. इसके भीतर आज भी दो कुंआरे दिलों के प्रेम की प्रथम अनछुई अनुभूति धड़कती है.

सोलह-सत्रह बरस की, ख़्वाबों में खोई रहनेवाली उम्र थी वो. जब एक दिन ढलती सांझ के रंगों में अपने मन की तूलिका से कुछ अनगढ़ से चित्र गढ़ती मैं छत पर खड़ी थी कि तभी पड़ोसवाली छत पर किसी के आने की आहट सुनकर उत्सुकता से उधर देखा. बगलवाला मकान कई दिनों से खाली था, दो-तीन दिन हुए कोई आया था, लेकिन पहचान नहीं हुई थी. देखा, 20-22 बरस का एक लड़का खड़ा था.

पता नहीं उम्र का तकाज़ा था या प्रकृति ने ही कोई संकेत किया था कि आंखें बरबस ही उस ख़ूबसूरत चेहरे पर अटक गईं. ढलती शाम की लालिमा उसके सुंदर, गोरे चेहरे पर छाई थी और तभी उसका ध्यान मेरी तरफ़ गया. मैंने फ़ौरन अपनी आंखें झुका लीं. दिल ज़ोर से धड़क उठा. देर तक मैं छत पर ही खड़ी रही, मन हवा में किसी के साथ को महसूस कर रोमांचित हो रहा था.

स्कूल आते-जाते अक्सर वो दिखाई देता. मेरी आंखें झुक जातीं, हाथ-पैर कांप जाते, चाल लड़खड़ा जाती और वो हौले से मुस्कुरा देता. मेरी शामें अब छत पर ही गुज़रने लगीं और वो तो मुझसे पहले ही छत पर मिलता, दरवाज़े पर नज़रें गड़ाए हुए. दिल से दिल तक प्रेम शायद कुछ तार जोड़ने लग गया था. जल्द ही दोनों घरों के बीच घनिष्ठता हो गई और हमारे बीच भी. हां, दिल की बातें अब भी बस आंखों तक ही सीमित रहती थीं. साल कब बीत गया पता ही नहीं चला.

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एक दिन घर के सभी लोग किसी रिश्तेदार के यहां गए हुए थे कि तभी वो आ गया. यूं एकांत में पहली बार उसके साथ… तभी उसने एक किताब मांगी और मैं कमरे में चली आई. वो भी आकर मेरे पीछे ही खड़ा हो गया. हम दोनों के दिल इतनी ज़ोरों से धड़क रहे थे कि हमें एक-दूसरे की धड़कनें सुनाई दे रही थीं. तभी उसने मेरा दुपट्टा उठाया और मेरे सिर पर ओढ़ा दिया. मैंने सामने आईने में देखा, वो मुस्कुरा रहा था, उसकी आंखों में जैसे सारी क़ायनात का प्यार उमड़ आया था. कितना पवित्र, पावन प्रणय निवेदन था. बिना बोले भी सब कुछ तो कह दिया था. जैसे संपूर्ण अधिकारों के साथ मुझे अपने जीवन में शामिल कर लिया था. मौन घोषणा कर दी थी ईश्‍वर के सामने कि मैं स़िर्फ उसकी हूं. मैं देर तक आईने में हम दोनों की छवि निहारती प्रार्थना करती रही कि यह बंधन सात जन्मों तक अटूट रहे. आईना हम दोनों के प्रणय और युगल छवि का मौन साक्षी बन गया.

किंतु 35 बरस पहले की रूढ़ियों ने हमारे प्यार को विवाह में परिणत नहीं होने दिया और टूटा मन लेकर वह शहर छोड़कर ऐसा गया कि फिर कभी नहीं मिला.

जब विवाह हुआ, तो पिताजी से बस यह अलमारी ही मांग ली थी. आज भी पहले प्यार की वह मधुर छवि इस आईने में ज्यों की त्यों मुस्कुराती हुई दिखाई देती है.

– डॉ. विनीता राहुरीकर

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पहला अफेयर: मेरी क्या ख़ता थी…? (Pahla Affair: Meri Kya Khata Thi?)

Pahla Affair, Meri Kya Khata Thi

पहला अफेयर: मेरी क्या ख़ता थी…? (Pahla Affair: Meri Kya Khata Thi?)

लगभग 20 साल पुरानी है. तब मेरी उम्र 17 साल थी. हमारे पड़ोस में एक कपूर परिवार रहता था. उनके परिवार से मैं बहुत घुल-मिल गई थी. उनकी पत्नी अपनी स्कूटी की चाबी हमेशा उसमेंं ही लगाकर भूल जाती थीं. मैं उनकी इस आदत का फ़ायदा उठाते हुए अक्सर उनसे बिना कहे उनकी स्कूटी लेकर घूमने चली जाती थी.

एक दिन इसी तरह मैं उनकी स्कूटी लेकर अपनी बुआ के घर चली गई. वापस लौटी तो पता चला कि कपूर साहब के भाई, जो चंडीगढ़ से यहां किसी इंटरव्यू के लिए आए थे, उनकी ट्रेन छूट गई, क्योंकि उनका टिकट स्कूटी की डिक्की में रखा हुआ था.

मैं अपने किए पर शर्मिंदा हो रही थी कि वो साहब बोले, “शायद वाहे गुरु की मर्ज़ी कुछ और है. मेरी मंज़िल चंडीगढ़ नहीं, कहीं और है.” मैं शरमाकर वहां से भाग गई. पर उनका चेहरा मेरे ख़यालों में और बातें मेरे कानों में गूंज रही थीं. अब तो मैं कुछ न कुछ बहाना करके उनके घर के चक्कर लगाने लगी थी.

उस ज़माने में खुलकर मिलने की बात तो हम सोच भी नहीं सकते थे. अत: हमारी बातों का ज़रिया था- गोलू, कपूर साहब का बेटा. वे लोग आपस में पंजाबी में बातें किया करते थे, जो मुझे समझ में नहीं आती थीं.

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एक दिन मैंने खीझकर कहा, “रहते बिहार में हो, तो आपको यहां की भाषा अपनानी चाहिए.” बस, उन्होंने झट से एक काग़ज़ पर कुछ लिखा और शरारतभरी मुस्कुराहट के साथ कहा, “अगर आप कहें तो मैं यहीं का बन जाऊं और मुझे तो हिंदी लिखनी भी आती है. आप पढ़कर सुनाओ तो जानूं.” मैंने उस काग़ज़ को पढ़ना शुरू ही किया था कि मेरी बोलती बंद हो गई. उसमें लिखा था, ‘झील-सी आंखों में डूब जाऊं, ऐतराज़ न करना, इन बांहों में ही चाहूं अब जीना-मरना.’

इस तरह हमारा प्यार चुपके-चुपके अपनी मंज़िल की ओेर बढ़ रहा था कि एक आंधी ने सब तहस-नहस कर दिया. मेरी दीदी ने एक तमिल लड़के से कोर्ट-मैरिज कर ली. वे जानती थीं कि इस रिश्ते को हमारा कट्टरपंथी ब्राह्मण परिवार और समाज अपनी स्वीकृति नहीं देगा. पापा इस सदमे को सह नहीं पाए और उन्होंने नींद की गोलियां खाकर अपनी जान देने की कोशिश की.

ईश्‍वर की कृपा से पापा बच गए. पर मैं जैसेे हक़ीक़त के धरातल पर उतर आई थी. मैं भी तो एक पंजाबी लड़के से प्यार करने लगी थी. पापा शायद दूसरे सदमे को सह नहीं पाएंगे. मुझे अपने बढ़ते क़दमों को रोकना होगा. उस दिन से मैंने कपूर साहब के घर जाना बंद कर दिया. लेकिन मैं इतना समझ चुकी थी कि उनके सामने रहूंगी, तो टूट जाऊंगी. अत: मैंने अपनी आगे की पढ़ाई कोलकाता में अपनी मौसी के घर रहकर पूरी करने का निर्णय लिया.

जिस दिन मैं कोलकाता जा रही थी, गोलू ने मुझे एक काग़ज़ का टुकड़ा दिया, जिसमें लिखा था, ‘मेरी क्या ख़ता थी?’ आज भी मैं इसका उत्तर खोजती हूं, तो अपराधबोध से भर जाती हूं. पर इसके लिए भी समाज कम दोषी नहीं. पता नहीं हम ग़लत थे या यह रूढ़िवादी समाज. शायद कच्ची उम्र का प्यार ही ग़लत होता है, जो वास्तविकताओं से दूर केवल दिल को ही पहचानता है. लेकिन ये एक अनमोल ख़्वाब की तरह है, जो कभी भुलाए नहीं भूलता.

– पूनम

पहला अफेयर: साइबर लव (Pahla Affair: Cyber Love)

Pahla Affair, Cyber Love
Pahla Affair, Cyber Love
पहला अफेयर: साइबर लव (Pahla Affair: Cyber Love)

ऑफ़िस से लौटने के बाद सो़फे पर बैठकर मैं लैपटॉप पर ऑफ़िस का काम कर रही थी. काम करते-करते अचानक लैपटॉप के माय डॉक्यूमेंट में समीर नाम की एक फ़ाइल खुल गई. फ़ाइल के खुलने के साथ ही मेरी पुरानी यादों का पिटारा भी खुल गया. एक के बाद एक पत्रों का सिलसिला चलने लगा. पहला पत्र 4 फरवरी 2000 का था, जिसमें लिखा था- समीर, मैं एक राजपत्रित अधिकारी हूं. काम के सिलसिले में मेरा कई लोगों से संपर्क होता रहता है, परंतु जब से तुम्हें देखा है, मन विचलित-सा रहता है. बस, हर पल एक ही इच्छा रहती है कि तुम्हारा सामीप्य बना रहे.

समीर के लिए मैंने यह पत्र लिख तो दिया था, परंतु उसे मेल करने की हिम्मत मुझमें नहीं थी, इसलिए यह ज्यों का त्यों पड़ा रहा. लेकिन यह क्या, अगले ही पल नेट खोलने पर इनबॉक्स में समीर का मेल था. लिखा था- मैं समझ सकता हूं कि तुम मेरे बारे में क्या सोच रही होगी? जो तुम्हारी हालत है, वही मेरी भी है.

इसे संस्कारों की बेड़ी कहें या शर्म-संकोच कि मैं उस मेल को देखकर भी कुछ नहीं कर पाई. बस, समीर नाम की फ़ाइल में डमी लेटर लिखकर सेव कर देती. दिल बहलाने का सिलसिला चलता रहा. जहां मैं समीर को पत्र लिख-लिखकर फ़ाइल में इकट्ठे किए जा रही थी, वहीं समीर मेरे द्वारा जवाब न दिए जाने पर भी मुझे ह़फ़्ते में एक मेल ज़रूर भेज देता था.

समीर परियोजन अधिकारी था और अक्सर मीटिंग में उससे आमना-सामना हो जाता था. जब भी उसे देखती, दिल की धड़कनें बढ़ जातीं. मुझे देख समीर भी शरारत से मुस्कुरा देता.

मालूम हुआ कि समीर डिप्टी कलेक्टर बन गया है और उसकी पोस्टिंग रीवा हो गयी है. समीर के मेल आते रहे और फिर धीरे-धीरे बंद हो गए. न चाहते हुए भी मैं हर घंटे इनबॉक्स ज़रूर खोलती, लेकिन निराशा ही हाथ लगती. मैं सोचने लगी कि आख़िर समीर कब तक मेरे मेल का इंतज़ार करता? हो सकता है उसने अपना जीवनसाथी चुन लिया हो और उसके साथ सुखी जीवन बिता रहा हो.

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तभी दरवाज़े पर नौकरानी सुमित्रा की आवाज़ से मेरी तंद्रा भंग हो गई. किसी आदमी ने पूछा, मैडम हैं?
हां हैं. क्या कहना है?
उनसे कहो, समीर आया है.
आप बैठें, मैं अभी ख़बर करती हूं.

समीर की आवाज़ सुनकर मेरा दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा.
मैं उठकर बाहर आ गई और नमस्ते कहते हुए दोनों हाथ जोड़ दिए. सुमित्रा पानी लेने अंदर चली गई. समीर ने कहा,कैसी हो?
ठीक हूं. और तुम…?
ठीक हूं…
तुम्हारे पति और बच्चे?
नहीं, मैंने शादी नहीं की. लेकिन तुम क्या अकेले…?
हां, मैं भी अकेला ही हूं…

सुनकर मुझे अच्छा लगा. एक बार मन हुआ कि उसके सीने से लग जाऊं और अपने मन की सारी बातें कह दूं. फिर कुछ संभलकर पूछा, तुमने शादी क्यों नहीं की?
जवाब देने के बजाय उसने पलटकर सवाल किया,और तुमने क्यों नहीं की?
मैंने कहा, तीन साल पहले मम्मी-पापा इस दुनिया से चले गए थे. तुम्हारी भी कुछ ख़बर नहीं मिली. अब तो अकेले रहने की आदत-सी पड़ गई है.

हम दोनों एक-दूसरे को निहारते रहे. समीर की नज़रें कुछ पूछ रही थीं. अजीब दास्तां है हम दोनों की, एक-दूसरे को चाहते रहे फिर भी कह न सके. समीर ने धीरे से मेरा हाथ थामा और कहा,क्या तुम मुझसे शादी करोगी? शरमाते हुए मैं समीर के गले लग गई. देर से ही सही मुझे मेरा पहला प्यार हासिल हो ही गया.

– एक पाठिका

 

पहला अफेयर: तोहफ़ा (Pahla Affair: Tohfa)

Pahla Affair: Tohfa

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पहला अफेयर: तोहफ़ा (Pahla Affair: Tohfa)

ऑफिस से लौटने के बाद मैं अक्सर वॉक पर जाता हूं. तेज़ क़दमों से वॉक करने पर ताज़गी का अनुभव होता है. घर के पास ही लगभग 1.5 किलोमीटर का वॉकिंग ट्रैक बना हुआ है, जो बेहद ख़ूबसूरत है. ट्रैक के दोनों तरफ़ हवा में झूमते बड़े-बड़े पेड़ भी हैं. ट्रैक एलईडी लाइट्स से रोशन है और ट्रैफिक भी ज़्यादा नहीं है. कुल मिलाकर वॉक के लिए परफेक्ट जगह है.

उस दिन संडे था. छुट्टी के दिन मैं कुछ जल्दी ही वॉक पर निकल गया. बारिश का मौसम शुरू ही हुआ था, लेकिन उस दिन हल्के बादल छाए हुए थे. देखकर ऐसा लगा नहीं था कि तेज़ बारिश होगी. मैं बिना छतरी के ही निकल गया.

अभी आधा ट्रैक ही पार किया था कि मूसलाधार बारिश शुरू हो गई. साथ ही बिजली कड़कने लगी, बादल गरजने लगे. मौसम अचानक बदल गया. तूफ़ानी बारिश होने लगी. मन ही मन मैं ख़ुद को कोसने लगा कि क्यों बिना छतरी के निकल पड़ा. अपने आलस पर मुझे ग़ुस्सा आ रहा था. ख़ैर सबक तो मिलना ही था.

देखते ही देखते पूरा ट्रैक खाली हो गया. जिनके पास छतरियां थीं, वो आगे निकल पड़े और कुछ स्कूटर पर ही भीगते हुए हवा से बातें करते तेज़ रफ़्तार से आगे बढ़ गए.

आसपास कहीं कोई छिपने की जगह नहीं थी, इसलिए मैं एक घने पेड़ के नीचे ही खड़ा हो गया. सोचा कुछ तो बचाव होगा, लेकिन भीगी पत्तियों से गिरती तेज़ बूंदों ने मुझे पूरी तरह से तर-बतर कर दिया था. उस पर आसमान में चमकती तेज़ बिजली ने मंज़र को थोड़ा भयावह कर दिया था. मैं समझ नहीं पा रहा था कि क्या करूं?

तभी एक अप्रत्याशित घटना घटी. सामने से आती एक तेज़ रफ़्तार कार अचानक मेरे पास आकर रुक गई. उसमें से एक युवती निकली और अपना छाता मुझे थमाते हुए तेज़ी से कार में बैठकर बोली, “मैं आपको घर छोड़ देती, पर मैं अपने पापा को रिसीव करने एयरपोर्ट जा रही हूं, उनकी फ्लाइट का टाइम हो गया है…”

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इससे पहले कि मैं कुछ समझ पाता, वो तेज़ी से आगे बढ़ गई और देखते ही देखते उसकी कार आंखों से ओझल हो गई. न मैं कुछ पूछ सका, न ही कार का नंबर नोट कर पाया. आंधी की तरह वो लड़की आई और मेरे मन में सवालों का तूफ़ान छोड़कर चली गई.

अगले तीन-चार दिन मौसम बिल्कुल साफ़ रहा, लेकिन मैं रोज़ वो छतरी लेकर जाता रहा, ताकि ‘थैंक्स’ कह सकूं, लेकिन वो नहीं दिखी. मैं निराश हो गया.

तभी एक दिन मम्मी ने कहा, “तेरे लिए एक रिश्ता आया है. शाम को लड़कीवालों के यहां चलना है.”
मैं तैयार होकर सबके साथ चला गया, तो देखा वही लड़की चाय लेकर आई. मैं उसे देखता ही रह गया और वो भी मुझे ही निहार रही थी. हम दोनों मंद-मंद मुस्कुरा रहे थे. लड़की ख़ूबसूरत तो थी ही, इंजीनियर भी थी, मैं तो पहले ही उससे इंप्रेस हो गया था और अब तो बस शादी के लिए ‘हां’ कहना बाकी था.

चलते समय मैंने हौले से उससे कहा, “आज फिर मैं आपका छाता लाना भूल गया…”
“लौटाने की ज़रूरत नहीं. अपने पास ही रखिए, लेकिन शाम को उसे अपने साथ लेकर ज़रूर जाइए, जिससे कोई दूसरी लड़की आपको अपनी छतरी भेंट न कर सके.” उसके होंठों पर एक शरारतभरी मुस्कान थी. कुछ शायद उसने बिना कहे ही अधूरा छोड़ दिया था… मेरे अनुमान के लिए.

जिसने हमारी मुलाक़ात करवाई उस प्रिय छतरी के तले बरसते पानी की झमाझम में, शीतल फुहारों का आनंद उठाते मैं शाम को फिर वॉक पर निकल पड़ा… मन में पहले प्यार का मदभरा एहसास था, लबों पर गीत और आंखों में होनेवाले जीवनसाथी के प्यारभरे सपने…

– सत्य स्वरूप दत्त

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