Tag Archives: Ishq

पहला अफेयर: ख़ूबसूरत फरेब (Pahla Affair: Khoobsurat Fareb)

Pyaar Ki Kahani

पहला अफेयर: ख़ूबसूरत फरेब (Pahla Affair: Khoobsurat Fareb)

घर में आर्थिक तंगी से मेरी पढ़ाई छूट गई थी. बस, गुज़र-बसर हो रही थी किसी तरह. तभी मकान का आधा हिस्सा एक सरकारी ऑफिस को किराए पर दिया, तो आमदनी का कुछ ठोस ज़रिया हो गया. फिर एक दिन एक आकर्षक युवक को जीप से उतरते देखा, तो बस देखती ही रह गई. पता चला, ये साहब हैं, आलोक नाम है.

कोई काम तो था नहीं, उधर ताक-झांककर मन बहला लेती, पकड़ी जाती, तो मैं झेंप जाती और वो मुस्कुरा देते. बीस दिन बीते होंगे, मैं अचानक बहुत बीमार हो गई. डॉक्टर ने तुरंत ज़िला अस्पताल ले जाने को कहा.

आस-पड़ोस के तमाम हितैषी जमा थे, पर सर्द आधी रात, सभी तरह-तरह की सलाहें देकर बहाने बनाने लगे. अम्मा हताश-निराश होकर रोने लगीं, तभी उधर से पूछा गया, “मांजी, क्या बात हो गई?” नीम बेहोशी में आगे नहीं जान सकी मैं कि क्या और कैसे हुआ. सुबह आंख खुली, तो ख़ुद को अस्पताल में पाया. साहब थके-थके-से सामने बैठे थे. लगा कि रातभर सोये नहीं थे.

उन्होंने पूछा, “अब कैसी हो?” मैंने कहा, “हां, अब आराम है. मेरे कारण आपको बहुत कष्ट हुआ.” वे बोले, “क्यों? रात अगर मुझे कुछ हो जाता, तो क्या तुम मेरी मदद नहीं करतीं?” यह सुनकर अच्छा लगा था. तीन दिन बाद अपना सहारा देकर उन्होंने जीप से घर उतारा तो उन्हीं पड़ोस के हितैषी जनों में चर्चा का आधार भी बन गई.

यह भी पढ़ें: पहला अफेयर: लम्हे तुम्हारी याद के (Pahla Affair: Lamhe Teri Yaad Ke)

पड़ोस में रहते हुए उन्हें मेरे घर में दो वर्ष के भीतर घटित विपदा व दीनदशा की सारी जानकारी हो चुकी थी. अब कभी-कभी आंगन के बीच की दीवार पर कुछ देर बातें भी होने लगीं, जिससे मेरी ताका-झांकी तो बंद हो गई, लेकिन रातों की नींद और चैन गायब हो गया था. और जब एक दिन मुझे बुलाकर मेरा इंटरमीडिएट का फॉर्म भरवा दिया, पढ़ाई शुरू कराई, तो मैं शीशे में बार-बार ख़ुद को निहारती कुंआरे सपनों को संवारती रहती. इंटर पास हो गई, तो उसी ऑफिस में नौकरी भी मिल गई. मेरा बीए का फॉर्म भी भराया गया. अब मकान के किराए व मेरे वेतन से घर को बहुत सहारा हो गया. पुराने घाव भर से गए.

नज़दीकियां प्यार को जन्म देती हैं. ऑफिस में काम बताते, डिक्टेशन देते हुए उनकी आंखों की तरलता में अपने लिए जिज्ञासा देखती और वो अपने पद की मर्यादा व गरिमा से बंधे मेरा मन टटोला करते. मैं हिम्मत करके कुछ कहना चाहती, किंतु कस्बई संकीर्ण संस्कार घर की पुरानी चौखट लांघ ही न पाते.

नानी का निधन हो गया. सुबह छुट्टी मांगने उधर गई, तो मेरे दोनों हाथ पकड़कर पूछा, “कुछ और नहीं कहोगी?” दरिद्रता कृपण भी तो होती है. मैं ठूंठ-सी खड़ी रही, न एतराज़ कर पाई और न उस अनुपम प्यार का प्रतिदान कर अपना व उनका असमंजस ही मिटा पाई. लौटकर आई, तो बड़े बाबू ने एक पत्र देकर बताया, “साहब को दो वर्ष की ट्रेनिंग पर विदेश भेजा गया है.”

पत्र पढ़ा- ‘आरती, इतने दिन साथ रहे. अच्छा लगा. कभी-कभी सफ़र में कुछ ऐसा छूट जाता है, जिसकी भरपाई नहीं हो पाती और वो तुम हो आरती. याद है, अस्पताल से आते ही तुमने कहा था कि अगर रात आप न होते, तो मरी कहानी ख़त्म ही थी. उस कहानी को मैंने आगे बढ़ाना चाहा, पर तुम्हारा अंतर्मन पढ़ न पाया. हो सकता है, तुम्हारे मन में वैसा कुछ न रहा हो, जैसा मैं सोचता रहा. तभी तो जाते समय तुमने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी थी. तुमसे मिल न सका, नौकरी की मजबूरी जानती हो. तुम्हें दुख तो होगा और मुझे तुम्हारी याद आया करेगी. पथराई आंखों से पत्र पकड़े संज्ञा-शून्य-सी बैठी रह गई थी.

कैसा दुख? ग़रीब को तो दुख की आदत होती है. सुख कभी आता भी है, तो अधिक देर ठहरता नहीं. मैं तो स्त्री थी. उपकारों के बोझ से दबी. वे तो पुरुष थे. सबल व समर्थ भी. मेरी दीनदशा से मर्माहत हो मुझसे कौन-सा रिश्ता बनाए रहे, तो जता न सके? तब भी नहीं, जब हमारे प्यार की चर्चा कस्बे में फैली. तब भी इतना ही बोले, “आरती हवन करते हाथ भले ही न जलें, आंच तो आती ही है.” फिर न कोई वादा, न सांत्वना. अपने फर्ज़ से वो तो ़फुर्सत पा गए और मैं ख़ूबसूरत फरेब का ताना-बाना बुनती रह गई.

– आरती सिंह

यह भी पढ़ें: पहला अफेयर: हरसिंगार के फूल (Pahla Affair: Harsingar Ke Phool)

पहला अफेयर: लम्हे तुम्हारी याद के (Pahla Affair: Lamhe Teri Yaad Ke)

Love Stories

पहला अफेयर: लम्हे तुम्हारी याद के (Pahla Affair: Lamhe Teri Yaad Ke)

प्यार, यूं तो इस शब्द से हर शख़्स वाकिफ़ होता है, पर इसका एहसास तो होता है तब, जब किसी का इंतज़ार यूंं ही करते रहना अच्छा लगने लगता है. प्यार का एहसास मुझे इस रूप में होगा, मैंने कभी सोचा भी न था. ज़िंदगी की बीस बहारें यूूं ही गुज़र गईं और इस बहार ने मेरी ज़िंदगी के मायने ही बदल दिए.

हमने घर हाल में ही बदला था. कुछ दूर मोड़ पर जाकर ही उनका घर था. एक संपूर्ण व्यक्तित्व – सुंदर, बोलने में इतनी आत्मीयता कि कोई भी प्रभावित हुए बिना रह न सके. देखते-देखते कब बातें शुरू हुईं और कब एक अजनबी अपनों से बढ़कर मेरे इतने क़रीब आ गया, पता ही नहीं चला.

हर सुबह एक नई उमंग लेके आती और हर शाम नए ख़्वाब. उनके बिना कुछ भी सोच पाना मुमकिन न था. दिल के एक कोने में जीवनसाथी की तस्वीर उनके रूप में परिपूर्ण थी. उनकी आंखों में छिपी चाहत को मैंने कई बार महसूस किया, पर उन्होंने कभी कुछ कहा नहीं. वैसे तो निगाहों की भाषा काफ़ी होती है मोहब्बत के इज़हार के लिए, पर शायद वज़ूद के लिए शब्द भी ज़रूरी हैं, इसलिए शब्दों के सहारे मैंने अपनी इच्छाएं उनके सामने रख दीं. वो सुनते रहे और चुप रहे, पर जब उनका मौन टूटा तो मेरी ज़िंदगी, मेरा वज़ूद सब बिखर कर रह गया.

यह भी पढ़ें: पहला अफेयर: पहले प्यार की ख़ुशबू (Pahla Affair: Pahle Pyar Ki Khushbu)

‘कृति मैं भी तुमसे बहुत प्यार करता हूं. तुमने मेरी ज़िंदगी को एक नई दिशा दी है, पर एक सच्चाई जिसे मैं तुम्हें खोने के डर से आज तक नहीं बता पाया कि मैं एक शादीशुदा पुरुष हूं. तुम्हारे साथ, तुम्हारे प्यार और अपनेपन ने मुझे अंदर तक छू लिया. मेरी भावनाएं, मेरी इच्छाएं जो अब तक अधूरी थीं, तुमने उन सबको परिपूर्ण किया है. तुम्हारे साथ ने ही मुझे प्यार का एहसास कराया है. तुम ही मेरी ज़िंदगी का पहला प्यार हो, जिसे मैं हमेशा चाहूंगा, पर तुम्हारे इस साथ में मैं अपने यथार्थ को भूल गया था और उससे भाग रहा था. तुम्हें खोने के डर ने मुझे बहुत स्वार्थी बना दिया था, इसलिए चाहकर भी मैं तुम्हें आज तक ये नहीं बता पाया और जाने-अनजाने में तुम्हारी भावनाओं को आहत किया. काश! हमारी ज़िंदगी हमारी सोच की तरह आसान होती और जो हम चाहते, हमें मिल जाता. हो सके तो मुझे माफ़ कर देना…’ इतना कहकर वो चले गए.

सब कुछ रेत की तरह हाथों से निकल गया. उनके इस झूठ ने मेरी ज़िंदगी के मायने ही बदल दिए. सच है पहला प्यार कभी भी भुलाया नहीं जा सकता. सब कुछ जानते हुए आज भी मैं उनसे बेइंतहा मोहब्बत करती हूं और वो लम्हे जो हमने साथ गुज़ारे थे, वो अनमोल पल आज भी मेरी स्मृतियों में यूं ही कायम हैं और हमेशा रहेंगे.

हंसना तो बड़ी शै है, रोने भी नहीं देते
लम्हे तुम्हारी याद के, कुछ ऐसे भी आते हैं

– कृति

यह भी पढ़ें: पहला अफेयर- तुम मेरे हो… (Pahla Affair- Tum Mere Ho)

पहला अफेयर: पहले प्यार की ख़ुशबू (Pahla Affair: Pahle Pyar Ki Khushbu)

Pyaar Ki Kahaniya

पहला अफेयर: पहले प्यार की ख़ुशबू (Pahla Affair: Pahle Pyar Ki Khushbu)

आज भी मेरे हाथों पर तेरे प्यार की मेहंदी का रंग बरक़रार है. वह सिंदूरी शाम. डूबते सूरज की पहली लाली, वो तेरा छत पर पतंग की डोर थाम बार-बार मुझे देख मुस्कुराना….वह मुस्कुराहट आज भी मेरे मन के भीतोें पर रंगीन चित्रों-सी उकरी है. तेरा वो दिलकश क़ातिलाना अंदाज़, बार-बार मुड़कर मुझे निहारना, मुझसे नज़रें मिलाना फिर चुराना सब कुछ याद है मुझे.

याद है तुम्हें, एक दिन अचानक शाम के धुंधलके में तुमने गली के मोड़ पर मेरा हाथ पकड़कर कहा था, ङ्गङ्घशालू मैं तुम्हें तहेदिल से चाहता हूं. मैं तुम्हारे दिल की बात सुनना चाहता हूं.फफ लगा था जैसे गोली की आवाज़ से कई परिंदे पंख फड़फड़ाकर उड़ चले हों. मेरा दिल ज़ोर से धड़क उठा था. मैं सुरमई अंधेरों की गुलाबी खनक में खो-सी गई थी. हाथ छुड़ाकर भागने की कोशिश में मेरी चुन्नी का कोना तुम्हारे हाथ में आ गया था. वही कमबख़्त कोना जैसे तुम्हारी ज़िंदगी का मक़सद बन गया.

यह भी पढ़ें: पहला अफेयर: रहें न रहें हम… (Pahla Affair: Rahen Na Rahen Hum)

बहुत चाहा तुम्हारा दामन थाम ज़िंदगी का ख़ुशनुमा सफ़र तय करूं, लेकिन क़िस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था- मेरे पिता की असमय दिल के दौरे से मौत ने सब कुछ ख़त्म कर दिया. मैं टूटकर बिखर गई, हमारी मोहब्बत बिखर गई.

पिता ने मरते समय मां से वचन लिया था- मैं उनके बताए लड़के से विवाह करने को मज़बूर कर दी गई. वह एक लम्हा, तुम्हारा मेरा हाथ थामना मेरे लिए क़ातिलाना साबित हुआ. मां की आंखों में तैरती बेबसी की नावें और तुम्हारी आंखों में मोहब्बत का बेइंतहा समंदर मेरे लिए ज़िंदगी कशमकश का दरिया बन गई. तुम्हारी यादों की गहरी खाइयों में मैं गिरती चली गई.

याद है, मैंने तुम्हें ख़त लिखा था, यदि मेरा विवाह अन्यत्र हुआ तो मैं आत्महत्या कर लूंगी. छत पर तुमने जो पुर्जा फेंका था, आज वही मेरे पास तुम्हारी धरोहर है-

मेरी अपनी शालू,
ज़िंदगी जीने का नाम है, वे बुज़दिल होते हैं, जो ज़िंदगी से हार मान मौत को गले लगा लेते हैं. तुम्हें अभी ज़िंदगी की कई बहारें देखनी हैं. प्यार तो कुर्बानी मांगता है. अगर तुम्हें कुछ हो गया तो मैं किसके सहारे जीऊंगा, बोलो.
तुम्हारा पहला प्यार,
पीयूष

हमारे पहले प्यार की ख़ुशबूओं से लबालब वह पुर्ज़ा आज भी मेरे पास तुम्हारी अमानत है, जैसे- वह काग़ज़ का टुकड़ा न होकर छोटा-सा टिमटिमाता जुगनू हो, जो मेरी ज़िंदगी का रहबर बना है. शायद इसी के सहारे ही मैं ज़िंदगी के बीहड़ बियाबान जंगल लताड़ती आगे बढ़ती रही हूं. अब तो मैंने ज़िंदगी की हर मुश्किल से लड़ना सीख लिया है.

कांप उठती हूं मैं ये
सोचकर तनहाई में
मेरे चेहरे पे कहीं
पहला प्यार न
पढ़ ले कोई

– मीरा हिंगोरानी

यह भी पढ़ें: पहला अफेयर: कहीं दूर मैं, कहीं दूर तुम… (Pahla Affair: Kahin Door Main, Kahin Door Tum)

पहला अफेयर: रहें न रहें हम… (Pahla Affair: Rahen Na Rahen Hum)

Love Kahaniya

पहला अफेयर: रहें न रहें हम… (Pahla Affair: Rahen Na Rahen Hum)

हमारा पहला प्यार अधूरा ही रहा किसी सपने की मानिंद, पर फिर भी उसकी रेशमी छुअन है जो दिल के किसी कोने में छुपी है मेरी जीवनशक्ति बनकर. बात 8 वर्ष पहले की है. मैं दिल्ली से ग्रेजुएशन फ़ाइनल ईयर की परीक्षा देने के बाद देहरादून ङ्गपर्यावरण संरक्षण वर्कशॉपफ में भाग लेने आई थी. मेरा अंतर्मुखी कवि मन देहरादून के प्राकृतिक सौंदर्य का साथ पा रोमांचित हो उठा. हर शाम को लेक्चर अटेंड करने के बाद मैं राजपुर की वादियों में पहुंच जाती.

वहीं प्रकृति को निहारते मेरी मुलाक़ात हुई थी श्यामल से. वह डॉक्टर था. कानपुर में प्रैक्टिस करता था और लंबी छुट्टी पर देहरादून आया था. देखने में सुदर्शन और मासूम, पर बेहद शरारती. एक पल चुप नहीं बैठता था, पर दिल बेहद साफ़था उसका.

हम जल्दी ही अच्छे दोस्त बन गए. हम दोनों के विपरीत स्वभावों के बावजूद हमें बांध रखा था हमारे प्रकृति प्रेम, गज़लों-शायरी के शौक़ और शायद एक अनकही-सी समझ ने. श्यामल को क़रीब से जानकर लगा कि वह उतना सतही नहीं जितना लगता था. जीवन को बहुत करीब से देखा-समझा था उसने.

कभी-कभी उसकी खनकती हंसी में एक उदासी की ख़ुशबू भी आ जाती थी. तब लगता था जैसे उसने कोई आंसू कहीं छुपा रखा है. मैंने उससे इस बारे में पूछा भी, पर वो हर बार बात टाल जाता. वो अपने बारे में जल्दी बात नहीं करता था. बस, कभी-कभी यूं ही लगता कि वो कुछ कहना चाहता था, पर ख़ामोशी ही अपनी ज़ुबां आप बन जाती.

यह भी पढ़ें: पहला अफेयर: हार्डवेयरवाला प्यार (Pahla Affair: Hardwarewala Pyar)

धीरे-धीरे मेरे जाने का दिन क़रीब आ रहा था. कई बार एक अजीब-सा एहसास होता कि मैं श्यामल को ही नहीं, ख़ुद को भी पीछे छोड़ जा रही हूं. जिस दिन मुझे वापस जाना था, उस दिन श्यामल मेरे लिए पीले गुलाब के फूल लाया था. साथ में एक चिट थी जिस पर लिखा था-
आपसे मिलकर तमन्ना इतनी रही, एक बार फिर मिलें अगर ज़िंदगी रही… पढ़कर मैं तड़प उठी थी और श्यामल से वादा लिया था कि वो जल्दी ही मुझसे मिलने दिल्ली आएगा. उसने उदास आंखों से वादा कर दिया.

फिर मैं दिल्ली आ गई, पर श्यामल की यादें ज़ेहन में ताज़ा थीं बिल्कुल महकते गुलाबों की तरह. पर उसका न फ़ोन आया, न कोई चिट्ठी. मैं मोबाइल ट्राई करती तो वो भी ऑफ़ मिलता. मैं बहुत बेचैन थी. तभी एक दिन श्यामल की बहन का फ़ोन आया. उसने जो बताया उससे तो जैसे मेरी दुनिया ही बिखर गई.

श्यामल कैंसर के लास्ट स्टेज पर था, जब मुझसे मिला. उसने कहा था कि उसके आख़िरी दिनों में मेरी मुस्कान ने ही
उसे मौत को हंसते-हंसते गले लगाने की ताक़त दी थी. ज़िंदगी से मौत के बीच का सफ़र ख़ुशगवार बनाने के लिए उसने मेरा शुक्रिया अदा किया था.

श्यामल चला गया था और मेरे पास ज़िंदगी गुज़ारने के लिए थी उसकी शायरी और ढेरों महकती यादें. उसके बाद मैं देहरादून में नौकरी ढूंढ़ यहीं बस गई, उसकी मौजूदगी के एहसास के साए में ज़िंदगी बिताने की ख़्वाहिश लिए. बस, अक्सर फ़िज़ां में उसका एक शेर कौंध जाता है.

रोओ कुछ इस तरह कि अश्क़ न बहें, दर्द सहो इस तरह कि ज़ख़्म न रहे
लबों पे आह, आंखों में पानी, रोको कुछ इस तरह कि कोई ग़म न कहे

– दीपाशिखा श्रीवास्तव

यह भी पढ़ें: पहला अफेयर: कच्ची उम्र का प्यार (Pahla Affair: Kachchi Umra Ka Pyar)

पहला अफेयर: हार्डवेयरवाला प्यार (Pahla Affair: Hardwarewala Pyar)

Pyar Ki Kahaniya
पहला अफेयर: हार्डवेयरवाला प्यार (Pahla Affair: Hardwarewala Pyar)

उन दिनों मैं डीएन कॉलेज से इंफॉर्मेशन ब्रांच में बी.ई. कर रही थी. हमारे कॉलेज में संजय भी था, जो कंप्यूटर साइंस में था. आते-जाते अक्सर वह दिख जाता था और इधर-उधर निगाह बचाकर मुझे देखता था. लेकिन मैं ध्यान नहीं देती थी और बाहर निकल जाती थी. इस पर वो मुझे हसरतभरी निगाह से देखता था.

बी.ई. के छठे सेमिस्टर चल रहे थे. मेरा घर कॉलेज से काफ़ी दूर था. मैं बस का इंतज़ार कर रही थी, लेकिन बसें देर से चल रही थीं. मुझे एग्ज़ाम के लिए देर होने की चिंता सताने लगी कि तभी हेलमेट पहने एक बाइक सवार मेरे पास आकर रुका और कहने लगा, “पेपर का समय हो गया है, अगर इसी तरह खड़ी रहीं, तो आज का पेपर गया समझो.”

मैंने जब ग़ौर से देखा, तो मालूम हुआ कि वो तो संजय है. मैं उसके साथ बैठने में हिचकिचाने लगी. तब उसने कहा, “अरे भई, हम कोई भूत नहीं हूं, चलो जल्दी बैठो, पेपर शुरू होने में 10 मिनट ही बचे हैं.” अब मैं उसकी बाइक पर बैठ गई. बीच-बीच में कभी ब्रेक लगाने पर मेरा शरीर उससे छू जाता, तो अजीब-सी सिहरन होने लगती. मेरा मुंह सूख रहा था. मैंने ख़ुद को संभाला और पेपर देने चली गई.

इसके बाद संजय से मुलाक़ातें बढ़ने लगीं और धीरे-धीरे एहसास होने लगा कि पहला प्यार इसे ही कहते हैं. संजय बिहार से था और उसकी भाषा व बोलने के अंदाज़ पर मुझे कभी-कभी हंसी आ जाती थी. एक दिन वो बोला, “वो ऐसा है कि हमने ज़्यादा किसी से प्यार-व्यार नहीं किया, इसलिए मालूम नहीं कि ये कैसा होता है, पर अपना प्यार तो एकदम हार्डवेयरवाला है. पक्का मतलब एकदम पक्का.” तब मैंने हंसते हुए कहा, “अपन तो सॉफ्टवेयरवाले हैं और प्यार के मामले में भी एकदम सॉफ्ट हैं.”

यह भी पढ़ें: पहला अफेयर: इतना-सा झूठ (Pahla Affair: Itna Sa Jhooth)

अब हम लोग कॉलेज के पास की झील के किनारे बैठकर भविष्य के सपने बुनते रहते… एक बार वो तुकबंदी करते हुए कहने लगा… “जब फूल खिलता है, तो ख़ुशबू फैल जाता है… जब तुम हंसता है, तो बहार आ जाता है.” उसकी इस तुकबंदी पर मुझे ज़ोर से हंसी आ गई और मैंने भी हंसते हुए कहा, “ जब तुम तुकबंदी करता है, तो आंसू आ जाता है… यह ख़ुशी का है या ग़म का पता नहीं लग पाता है.” फिर काफ़ी देर तक हम हंसते रहे और मैंने सोचा कि व़क्त यहीं रुक जाए और यूं ही हंसते-खिलखिलाते ज़िंदगी गुज़र जाए.

बी.ई. पूरा होने के बाद संजय पटना चला गया. बीच-बीच में हमारी बातें होती रहती थीं और इसी बीच संजय ने बताया कि उसका सिलेक्शन आर्मी में हो गया है, संजय काफ़ी मेहनती था, जो ठान लेता, वो करता ही था. उसे दूर-दराज़ के इलाकों में कंप्यूटर इंस्टॉलेशन का काम सौंपा गया था. एक दिन मेरे मोबाइल पर उसका मैसेज आया- हम लोगों को अपने काम पर ले जानेवाला ट्रक खाई में गिर गया है, अस्पताल में पड़ा हूं, ऐसा लगता है ज़िंदगी ज़्यादा नहीं है. तुम अपनी ज़िंदगी सॉफ्टवेयर-सी रखना, मेरे जैसी हार्डवेयर नहीं.

आज मैं एक बैंक में कार्यरत हूं, लेकिन संजय के बिना ज़िंदगी वीरान है. उसका प्यार मेरा संबल है, पर उसके बिना ज़िंदगी सॉफ्ट नहीं, हार्डवेयर-सी है. अकेले जीवन गुज़ारते हुए बस उसका चेहरा और बातें ही सहारा हैं.

– संतोष श्रीवास्तव

यह भी पढ़ें: पहला अफेयर: काला खट्टा (Pahla Affair: Kaala Khatta)

पहला अफेयर: इतना-सा झूठ (Pahla Affair: Itna Sa Jhooth)

Affair Stories

पहला अफेयर: इतना-सा झूठ (Pahla Affair: Itna Sa Jhooth)

प्यार करने की भी भला कोई उम्र होती है क्या? पंद्रह से पच्चीस वर्ष, बस इसी बीच आप प्यार कर सकते हैं, इसके आगे-पीछे नहीं. फिल्मों और कहानियों से तो ऐसा ही लगता है. नायक-नायिका न केवल जवां होने चाहिए, बल्कि उनका हसीन होना भी ज़रुरी है. सच पूछो तो इस उम्र के बाद का प्यार अधिक परिपक्व होता है, उसमें वासना का स्थान गौण हो जाता है और इस उम्र के पहले का प्यार तो और भी पवित्र होता है. निश्छल- हां बस यही एक शब्द है उसका बखान करने के लिए. और जब भी उस निश्छल प्यार के बारे में सोचती हूं तो मेरे सामने किशोर आ खड़ा होता है. सातवीं कक्षा में पढ़ता अल्हड़ किशोर.

हमारे ग्रुप में बिल्डिंग के बहुत से बच्चे थे. उन्हीं में से एक था- किशोर. बारह वर्षीय किशोर स्वयं को बहुत समझदार समझता था. उसके बड़े भाई का उन्हीं दिनों विवाह हुआ था एवं उसने अपने किशोर मन में कहीं यह ठान लिया था कि वह शादी करेगा तो स़िर्फ मुझसे. मैं तो खैर इन बातों से अनभिज्ञ तब तीसरी कक्षा में पढ़ती थी. बहुत नादान थी.

उन दिनों टी.वी., फ़िल्में उतनी प्रचलित नहीं थीं. हम कभी घर-घर खेलते, शादी-ब्याह करवाते-बच्चों की अपनी एक अलग दुनिया थी. इसके अलावा प्रायः हम छोटे-छोटे नाटक भी अभिनीत करते. किसी की मां की साड़ी का पर्दा बन जाता और बड़ी बहनों के दुपट्टों से पगड़ी और धोती. किशोर की हमेशा यह ज़िद रहती कि वह मेरे साथ ही काम करेगा. यदि मैं नायिका का रोल कर रही हूं तो वह नायक का करेगा और यदि मैं मां का पार्ट कर रही हूं तो वह पिता का करेगा.

यह भी पढ़ें: पहला अफेयर: तुम्हारी कत्थई आंखें (Pahla Affair: Tumhari Kathai Ankhen)

बचपन किशोरावस्था का समय कब पंख लगाकर उड़ जाता है, पता ही नहीं चलता. समय के साथ-साथ हमारी मित्र मंडली भी तितर-बितर हो गई अपने अभिभावकों के संग. पिताजी के तबादलों के कारण हर वर्ष नया शहर, नया स्कूल होता. शेष रह गईं बचपन की यादें. पर किशोर ने उन यादों को कुछ अधिक ही संजो रखा था. अपने उस इरादे पर वह सचमुच संजीदा था.

विधि का विधान देखो, मेरा विवाह तय हुआ भी तो किशोर के ममेरे भाई से और राज़ खुला कार्ड छपने के बाद, जब उसके हाथ वह कार्ड लगा. कार्ड हाथ में लिए ही वह हमारे घर आया. पास ही के शहर में हम रहते थे. पर क्या हो सकता था तब? उसने अपने प्यार की बहुत दुहाई दी. एक अपरिचित व्यक्ति से बंधने के स्थान पर उससे विवाह करना जिसने मुझे ताउम्र चाहा- मेरे लिए बहुत बड़ा प्रलोभन था.

अरसा बीत गया. यूं कहो कि जीवन ही बीत गया. पर मैंने भरसक उससे दूरी बनाए रखी. किसी उत्सव में उसकी उपस्थिति की संभावना मात्र से ही मैं वहां जाना टाल जाती. शादी-ब्याह में शामिल होना ज़रूरी हो जाता तो शादी की भीड़ में गुम हो जाने की कोशिश करती, पर क़रीबी रिश्ता होने से अनायास सामना हो ही जाता. और मुझसे नज़रें मिलते ही उसकी आंखों के चिराग़ दहक उठते. मैं भी उस ताप से कहां बच पाती हूं. मन का चोर हमें सामान्य बातचीत करने से भी रोक देता है. वह आज भी मुझे उसी शिद्दत से चाहता है . यह मात्र मेरी कल्पना नहीं- उसकी पत्नी मालिनी ने स्वयं मुझसे कहा था. कभी क्रोध के ज्वार में उसने अपने जीवन की पूरी निराशा, पूरी कुण्ठा, पत्नी पर उड़ेल दी और वह मेेरे पास आई थी सफ़ाई मांगने.

“मेरे लिए वह मात्र ससुराल पक्ष का रिश्तेदार है. इससे अधिक मैंने उसे कुछ नहीं माना.” मैंने मालिनी को पूरा विश्‍वास दिलाते हुए कहा था. मैं जानती हूं यह सच नहीं. पर सच बोलकर भला दो घरों की शांति भंग क्यों करूं? बच्चों की भावनाओं, उनके सुरक्षित भविष्य पर ठेस पहुंचाऊं? अपने निर्दोष पति और निर्दोष मालिनी का सुख-चैन छीनूं?

इन सबके लिए मेरा इतना-सा झूठ क्षम्य नहीं है क्या?

– उषा

यह भी पढ़ें: पहला अफेयर: एक ख़ूबसूरत रिश्ता (Pahla Affair: Ek Khoobsurat Rishta)

तुम्हारी कत्थई आंखें (Pahla Affair: Tumhari Kathai Ankhen)

Pyar Ki Kahaniya

तुम्हारी कत्थई आंखें (Pahla Affair: Tumhari Kathai Ankhen)

दस साल बीत गए… तुम्हारा चेहरा आज भी मेरी आंखों में बसा है. उस दिन के बाद न तो तुम मिले और न ही तुम्हारा कोई अता-पता. तुम्हें तो शायद मैं याद भी न हूं, पर मुझे तुम्हारी कत्थई आंखों की कशिश हर रोज़ शाम को गेटवे ऑफ इंडिया की तरफ़ खींच ले जाती है. क़दम ख़ुद-ब-ख़ुद तुम्हारे लिए चल पड़ते हैं. हर बार तुम्हें देखने और मिलने की एक उम्मीद जन्म लेती है, परंतु फिर मेरी शाम खाली हाथ लौट जाती है. वो पहली नज़र के प्रेम का एहसास आज भी मेरे अंदर सांसें ले रहा है.

कैसे भूल जाऊं वो 26 नवंबर का ताज होटल पर अटैकवाला दिन, जो इतिहास के पन्नों में एक काले, मनहूस दिन के रूप में अंकित हो चुका है. उस दिन न जाने कितनों ने अपनों को खोया था और कितनों ने अपनी जान गंवाई थी. विपरीत इसके मेरे लिए तो वो मेरी ज़िंदगी का सबसे ख़ूबसूरत, यादगार दिन था, जिसने मुझे प्यार जैसे ख़ूबसूरत एहसास से रू-ब-रू करवाया था. एकतरफ़ा ही सही, प्यार तो है.

याद है मुझे आज भी उस दिन का रोंगटे खड़े कर देनेवाला एक-एक लम्हा, जब मैंने और मेरी सहेलियों ने गेट वे ऑफ इंडिया घूमने का प्रोग्राम बनाया था. समुद्र की लहरें अपने मस्त अंदाज़ में साहिल से अठखेलियां करने में मग्न थीं कि अचानक आतंकवादियों ने मुंबई के ताज होटल पर हमला कर दिया था. थोड़ी देर पहले तक जो समां रोमांचक लग रहा था, वो करुणा से भरी चीखों, गोलियों की आवाज़ों और मदद की गुहारों में परिवर्तित हो चुका था. इसी भगदड़ में मेरी सभी सहेलियां मुझसे बिछड़ गई थीं.

यह भी पढ़ें: पहला अफेयर: एक ख़ूबसूरत रिश्ता (Pahla Affair: Ek Khoobsurat Rishta)

मैंने बड़ी मुश्किल से डरते-डरते एक बेंच के पीछे आश्रय लिया था. दहशत के मारे पूरा शरीर कांपने लग गया था. आंसुओं से भरी आंखें किसी तरह की मदद की खोज में थीं. पुलिस ने होटल के बाहर पूरी तरह घेराबंदी कर ली थी. जो लोग बाहर फंसे हुए थे, पुलिस उन्हें किसी तरह सुरक्षित निकालने की कोशिश में थी. मौत को इतने क़रीब देखकर मेरी शक्ति और हिम्मत जवाब देने लगी. बेहोशी मुझे अपनी आगोश में लेने को थी कि तभी किसी की मज़बूत बांहों ने मुझे थाम लिया. वो मज़बूत-गर्म बांहें तुम्हारी थीं. मेरी बेहोशी से भरी धुंधली आंखों से मुझे स़िर्फ तुम्हारी कत्थई आंखें दिखाई दे रही थीं.

“देखो, संभालो अपने आप को. बेहोश मत होना. हम किसी भी तरह यहां से सुरक्षित बाहर निकल जाएंगे…” यह कहते-कहते तुम किसी तरह मुझे होश में लाए. आंखें खुलते ही तुम्हारा चेहरा दिखा, जो मेरी आंखों में उतर गया. तुमने मुझे धीरे-धीरे पुलिस की तरफ़ चलने का इशारा किया. मैं तो तुम्हें देखकर अपनी सुध-बुध खो बैठी थी. बस, तुम्हारे भरोसे एक कठपुतली बन तुम्हारा हाथ पकड़कर चल पड़ी थी साथ.

किसी तरह हम पुलिस के पास पहुंच ही गए और उन्होंने तुरंत हमें वहां से सुरक्षित बाहर निकाल दिया. मेरे लिए तुम एक फ़रिश्ता बनकर आए थे. बस, यहीं तक था हमारा साथ. सुरक्षित बाहर आते ही तुम मुझे एक टैक्सी में बैठाकर, मेरा हाथ छोड़कर मेरी नज़रों से ओझल हो गए. कहां चले गए… पता नहीं. अपना नाम, पता, सब कुछ अपने साथ ले गए. तुम तो चले गए, किंतु अपना चेहरा, अपनी कत्थई आंखें सदा के लिए मेरी आंखों में, मेरी सांसों में छोड़ गए.

आज भी मेरी शामें तुमसे मिलने के एक अटूट भरोसे पर, गेटवे ऑफ इंडिया की उसी बेंच पर तुम्हारी कत्थई आंखों के इंतज़ार में गुज़रती हैं.

– कीर्ति जैन

यह भी पढ़ें: पहला अफेयर: धुंध के पार (Pahla Affair: Dhundh Ke Paar)

पहला अफेयर: एक ख़ूबसूरत रिश्ता (Pahla Affair: Ek Khoobsurat Rishta)

Pyaar Ki Kahaniya

पहला अफेयर: एक ख़ूबसूरत रिश्ता (Pahla Affair: Ek Khoobsurat Rishta)

रात के अंधेरे में शून्य में ताकती निगाहें… रेलगाड़ी के पहियों की आवाज़ें… जाने क्यों आज मिलकर स्मृतियों में दबी पड़ी हुई परतों को उधेड़कर चलचित्र की भांति चलने लगी थी और विक्रम का मन अपने अतीत को लेकर सोचने लगा… इस दुनिया में कोई ऐसा भी था, जो उसके दर्द को हमेशा उससे पहले ही महसूस कर लेता था. दुनिया में विक्रम ने स़िर्फ उसे ही चाहा और उसके सिवा उसने किसी और की तरफ़ मुड़कर भी नहीं देखा. श्रुति नाम था उसका. दुनिया में सबसे ख़ूबसूरत रिश्ता दोस्ती का होता है और उनका आपस में ऐसा ही रिश्ता था और यह दोस्ती की मिठास में डूबा हुआ था. उनकी वफ़ाएं हमेशा एक-दूसरे के साथ थीं.

श्रुति के साथ कॉलेज में विक्रम का यह तीसरा वर्ष था. हर वर्ष की तरह इस साल भी उनके कॉलेज में वार्षिक समारोह का बड़ा शानदार आयोजन किया जा रहा था, जिसमें उन दोनों को भी भाग लेना था. लेकिन इस बार एक हास्य नाटक में दोनों को 60-65 वर्ष के उम्र के फूफा-फूफी का क़िरदार निभाना था, जिसे करने के लिए कॉलेज में कोई और तैयार नहीं था.

यही वजह थी कि दोनों को अपनी सबसे प्रिय क्लास टीचर सुश्री लता मायकेल के विशेष अनुरोध पर यह रोल करना पड़ा. नाटक के समय दोनों ने अपने रोल्स को इस तरह जीवंत कर दिया था कि पूरे कॉलेज में उनकी चर्चा होने लगी. फिर जब उनकी क्लास के छात्र-छात्राएं श्रुति को ‘फूफी’ कहकर पुकारने लगे, तो इससे नाराज़ होकर श्रुति ने टीचर से इसकी शिकायत कर दी. टीचर ने क्लास के सभी स्टूडेंट्स की परेड ली और सबको आदेश दिया कि जो भी श्रुति को ‘फूफी’ कहते हैं, अपनी-अपनी जगह पर खड़े हो जाएं. इस पर विक्रम को छोड़कर सभी खड़े हो गए.

यह भी पढ़ें: पहला अफेयर: उड़ती हवा का वो झोंका जीना सिखा गया (Pahla Affair: Udti Hawa Ka Wo Jhonka Jeena Sikha Gaya)

टीचर ने पूछा, “विक्रम, तुम श्रुति को ‘फूफी’ कहकर नहीं चिढ़ाते, क्यों?” तब विक्रम ने जवाब दिया, “क्योंकि मैं ‘फूफा’ बना था.” इस पर पूरी क्लास ठहाका लगाकर हंस पड़ी. पूरा रूम ठहाकों से गूंज रहा था और अचानक श्रुति का गुलाबी चेहरा मारे शर्म के लाल होता चला गया… और फिर श्रुति की हालत देख विक्रम मन ही मन शर्मिंदा हुआ. वो अपनी प्रिय दोस्त का सम्मान भी करता था. दोनों में कभी भी किसी भी बात को लेकर कोई विवाद नहीं हुआ था. एक-दूसरे पर उनका अटूट विश्‍वास था.

उन दोनों के परिवार भी मध्यमवर्गीय थे… आज दोपहर में विक्रम की मां ने उसे फोन पर बताया था कि श्रुति के घरवाले श्रुति का रिश्ता लेकर कल उनके घर आनेवाले हैं. अर्थात् उनकी यह दोस्ती अब प्यार व शादी में बदलनेवाली है. इससे पहले विक्रम ने कभी सोचा ही कहां था कि वह श्रुति ही होगी, जो एक दिन उसकी जीवनसंगिनी बनेगी.

अचानक रेलगाड़ी के ब्रेक लगने से उसकी तंद्रा भंग हुई… उसका शहर आ गया था…

शायद प्यार का फूल तो कहीं पनप चुका था… जिसे दोनों दोस्ती की गहरी भावना के बीच महसूस नहीं कर पाए थे, लेकिन दूसरों ने उन्हें इसका एहसास दिला दिया था… उनके पहले प्यार को मंज़िल मिल रही थी, इससे ख़ूबसूरत रिश्ता और क्या हो सकता था.

– प्रांशु राजवानी

यह भी पढ़ें: पहला अफेयर: नीली छतरीवाली लड़की… (Pahla Affair: Neeli Chhatriwali Ladki)

पहला अफेयर: तुमसा कोई न मिला (Pahla Affair: Tumsa Koi Na Mila)

Pyar Ki Kahani

पहला अफेयर: तुमसा कोई न मिला (Pahla Affair: Tumsa Koi Na Mila)

वो ख़्वाब था बिखर गया, ख़्याल था मिला नहीं, मगर ये दिल को क्या हुआ… ये क्यों बुझा, पता नहीं… हरेक दिन उदास दिन, तमाम शब उदासियां… किसी से क्या बिछड़ गए कि जैसे कुछ बचा नहीं… जीवन से पूरी तरह संतुष्ट होने के बाद भी यादों की रहगुज़र पर जलता एक दीया है पहला प्यार, जिसकी झिलमिलाती यादों में कसक होती है, जो तन्हाई में दिल को उदास कर देती है, तो महफिल में भी नज़रें किसी को तलाशने लगती हैं. सब होने के बाद भी कुछ खोने का एहसास होता है. वो जज़्बात, जिन्हें इज़हार की मोहलत न मिली, जहां नज़रों ने नज़रों की ज़ुबां से दिल की बात सुन ली, लेकिन जब दिलों के फैसले दिमाग से किए जाते हैं, तो जुदाई ही मिलती है.

वो बीएससी करके कोचिंग में टीचर थे और मैं बारहवीं की स्टूडेंट, जो फिज़िक्स की प्रॉब्लम सॉल्व करना तो सीख गई, लेकिन दर्दे दिल में उलझकर रह गई. फिर तो जो समझ में आता था, उन्हें देखकर वो भी भूल जाया करती थी. कोचिंग के फेयरवेल पार्टी में उनका सुनाया वो शेर शायद उनके दिल की सदा थी. कुछ ऐसा था उन आंखों में कि मैंने कोचिंग जाना छोड़ दिया और घर पर ही परीक्षा की तैयारी करने लगी. सब ने बहुत समझाया कि परीक्षा तो हो जाने दो, लेकिन मैंने ना कर दिया. आखिरी पेपर के बाद कुछ इरादा करके मैं कोचिंग गई. वहां जाने पर पता चला कि वो तो शाखे-दिल पर गुलों की बहार की आस दिखाकर मुझे तन्हा छोड़कर जा चुके हैं. क्यों? कोई जवाब नहीं.

व़क्त अपनी रफ्तार से चलता रहा. विवाह, परिवार, सर्विस… इन सबके बीच कुछ खो देने का गम उतना ज़्यादा नहीं था, क्योंकि उसे पाया ही कब था. लेकिन फिर भी एक बार मिलने की ख़्वाहिश थी. लगता था महफिल में, मेले में कभी वो मेरे सामने आ जाएंगे. स्कूल में जब भी विदाई पार्टी होती, मुझे वो आखिरी मुलाकात याद आती.

यह भी पढ़ें: पहला अफेयर: कहीं दूर मैं, कहीं दूर तुम… (Pahla Affair: Kahin Door Main, Kahin Door Tum)

लेकिन गुज़रा व़क्त इस तरह सामने आ जाएगा, मैंने कभी सोचा न था. स्कूल में नए लेक्चरार से परिचय कराने के लिए प्रिंसिपल ने पूरे स्टाफ को बुलाया. पूरे 12 साल बाद उन्हें देखा था. आंखों पर यकीन नहीं हो रहा था. वही ग्रेसफुल चेहरा, आंखों में चमक, ठहरा हुआ प्रभावी अंदाज़… नज़रें हटाना मुशिकल था, कहीं फिर खो न जाएं. गुस्सा था या डर, मैं उनके सामने आने से कतराने लगी. लेकिन एक स्कूल में होते हुए ऐसा नामुमकिन था. एक दिन पता चला कि अभी तक उन्होंने शादी नहीं की. क्यों? किसकी खातिर? जानना चाहती थी, लेकिन हम सब एक मर्यादा में बंधे थे.

शिक्षक दिवस पर छात्रों की फरमाइश पर उन्होंने कुछ शेर और गजल सुनाई- कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता… वे कभी दिल के करीब थे. इसलिए उनके दर्द को मैं महसूस कर सकती थी. लेकिन कुछ सवालों के जवाब अभी पाने बाकी थे. अब हम दोस्त बन चुके थे.

“आपने शादी क्यों नहीं की?” एक बार फिर मैं पूछ बैठी.

“तुमसा कोई न मिला.” दिल की बात बताने में बिल्कुल भी नहीं झिझके थे.

“तो चोरों की तरह क्यों चले गए थे?”

“सब कुछ हमारे चाहने से नहीं होता. तक़दीर का फैसला हमें मानना पड़ता है.”

“कायरता को मजबूरी ना कहिए.” मैं गुस्से में बोली.

“तुम जानना चाहती हो, तो सुनो, तुम्हारे भैया मेरे दोस्त थे, फिर भी उनको सच्चाई बताकर तुम्हारा हाथ मांगा था, लेकिन उन्होंने जवाब दिय- ये तुम्हारी मर्ज़ी तक ही ठीक है, यदि मेरी बहन ने हां की, तो उसे गोली मार दूंगा, क्योंकि टीचर का दर्जा हर हाल में सम्मानीय होता है. अगर इस तरह शादियां होने लगीं, तो माहौल ही बिगड़ जाएगा. मैं उनको समझाने में नाकाम रहा, इसलिए खामोशी से चला गया. लेकिन फिर कोई और इस दिल में जगह न बना पाया.”

उनके शब्दों में उनकी बेबसी झलक रही थी, लेकिन अब मैंने उनका जहां मुकम्मल कराने का इरादा कर लिया था. अपनी मर्ज़ी उन्हें बता दी है. ज़िंदगी की ख़ुशियों पर उनका भी हक है. मुझे उम्मीद है कि इस दोस्ती के रिश्ते की वो लाज रखेंगे और इस शादी के लिए ना नहीं कहेंगे. बस, आप सभी की दुआओं की ज़रूरत है.

– शहाना सिद्दीकी

यह भी पढ़ें: पहला अफेयर: कैसा तेरा प्यार…? (Pahla Affair: Kaisa Tera Pyar)

 

पहला अफेयर: कहीं दूर मैं, कहीं दूर तुम… (Pahla Affair: Kahin Door Main, Kahin Door Tum)

Pyaar Ki Kahaniya

पहला अफेयर: कहीं दूर मैं, कहीं दूर तुम… (Pahla Affair: Kahin Door Main, Kahin Door Tum)

प्रेम, प्यार, रोमांस, इश्क़, मुहब्बत… चाहत से लबरेज़ ये शब्द सुनते ही आंखों में अपने आप कई सपने पलने लगते हैं… गालों पर हया की एक लालिमा-सी छा जाती है… मुझे भी इस इश्क़ के रोग ने छू लिया था. 23 साल की थी मैं. नई-नई नौकरी लगी थी. मेरे साथ ही मेरे सहपाठी अभिनव ने भी जॉइन किया था. अभिनव के विभाग में ही उसका एक

शर्मीला-सा दोस्त था पल्लव. अभिनव से मेरा काफ़ी दोस्ताना व्यवहार था, उसी बीच पल्लव का मुझे चुपचाप देखना, आंखें झुकाकर बातें करना और बहुत ही सली़के से व्यवहार करना बेहद भाने लगा था. पल्लव की यही बातें मुझे बार-बार अभिनव के विभाग की ओर जाने को मजबूर कर देती थीं.

आख़िर मेरी क़िस्मत भी रंग लाई और पल्लव का ट्रांसफर मेरे ही विभाग में हो गया. बेहद ख़ुश थी मैं, हद तो तब हो गई, जब हम दोनों को एक ही प्रोजेक्ट पर काम करने का मौक़ा मिला. अब धीरे-धीरे हमें क़रीब आने का मौक़ा मिला. दोस्ती गहरी हुई और फिर ये दोस्ती प्यार में बदल ही गई. पल्लव ने भी अपने प्यार का इज़हार इशारों-इशारों में कर ही दिया. हां, हमने आपस में कोई वादे नहीं किए थे, पर हमारे प्यार को मंज़िल मिलेगी, यह विश्‍वास हम दोनों को ही था.

यह भी पढ़ें: पहला अफेयर: ऐसा प्यार कहां? (Pahla Affair: Aisa Pyar Kahan)

लेकिन नियति पर कब किसी का ज़ोर चला है. मैंने विभागीय परीक्षा दी थी और उसके लिए भी पल्लव ने ही मुझे प्रोत्साहन दिया था. हमने साथ-साथ तैयारी की. दुर्भाग्यवश पल्लव परीक्षा उत्तीर्ण नहीं कर पाया और मैं पास हो गई थी. विभाग में रिक्त पद होने के कारण मेरा अधिकारी पद पर चयन हो गया था. अगली विभागीय परीक्षा को अभी समय था, मैंने पल्लव का हौसला बढ़ाया, लेकिन अब कार्यक्षेत्र में हमारे बीच दूरी बढ़ गई थी और धीरे-धीरे ये दूरियां हमारे संबंधों में भी बढ़ने लगी थीं. मैंने कई कोशिशें कीं, लेकिन पल्लव के मन में हीनभावना ने घर कर लिया था. वो मुझसे नज़रें चुराने लगा था. दूरी बनाए रखने के प्रयास करने लगा था. कुछ पूछती तो यही कहता कि मैं तुम्हारे लायक ही नहीं.

शायद पल्लव जान-बूझकर मुझसे दूर जाना चाहता था. मेरे सामने दूसरी लड़कियों से बातें करता… मेरा सामना तक नहीं करता था अब वो. मैंने फिर कोशिश की, तो उसने कहा, “मैं चाहता हूं तुम मुझे भूल जाओ, मुझसे घृणा करो, क्योंकि मेरा-तुम्हारा कोई मुक़ाबला नहीं. तुम्हें मुझसे बेहतर जीवनसाथी मिलेगा.”

ख़ैर, घर पर भी मेरी शादी की बातें होने लगी थीं और फिर मैंने भी पल्लव के लिए कोशिशें करनी बंद कर दीं, क्योंकि उसने ख़ुद मुझसे दूर जाने का निर्णय कर लिया था. मेरी शादी हो गई. पति के रूप में बेहद शालीन और प्यार करनेवाला साथी ज़रूर मिला, लेकिन मेरा पहला प्यार तो पल्लव था. कुछ समय बाद पता चला कि पल्लव के पिताजी ने काफ़ी दहेज लेकर एक लड़की से उसकी शादी कर दी. मेरा पहला प्यार दम तोड़ चुका था.

कई वर्षों बाद किसी समारोह में अचानक हमारा आमना-सामना हुआ. साधारण-सी औपचारिक बात के बाद हम दोनों अपनी-अपनी राह
चल दिए…

यूं ही अपने-अपने सफ़र में गुम… कहीं दूर मैं, कहीं दूर तुम… मेरा पहला प्यार स़िर्फ एक छोटे-से मेल ईगो की बलि चढ़ गया था, काश! पल्लव तुमने अपना वो झूठा ईगो छोड़ दिया होता… काश!… लेकिन अब कोई फ़ायदा नहीं यह सोचने का, क्योंकि नियति को यही मंज़ूर था!

– अलका कुलश्रेष्ठ

यह भी पढ़ें: पहला अफेयर: तुम्हारा मुजरिम! (Pahla Affair: Tumhara Mujrim)

पहला अफेयर: ऐसा प्यार कहां? (Pahla Affair: Aisa Pyar Kahan)

 Kahani

पहला अफेयर: ऐसा प्यार कहां? (Pahla Affair: Aisa Pyar Kahan)

कहते हैं, जोड़ियां स्वर्ग में ही तय हो जाती हैं. ईश्‍वर सबके लिए एक जीवनसाथी चुनकर भेजते हैं. पर क्या हमारा सच्चा जीवनसाथी वह होता है, जिसके साथ हम अपना पूरा जीवन बिता देते हैं या फिर वह जिसे कभी हमने अपने लिए चुना था और आज भी दिल में उसके लिए एक ख़ास जगह है? विपुलजी से मैं विद्यालय के शिक्षक पद के नियुक्तिवाले दिन मिली थी, जिसमें मेरा चुनाव अंग्रेज़ी और विपुलजी का चुनाव गणित के शिक्षक के रूप में हुआ था.

जेपीएससी की परीक्षा की तैयारी के लिए गणित में मैं विपुलजी से मदद लिया करती थी. उनकी कुशाग्र बुद्धि और गणित के प्रति समर्पण ने मुझे उनका दीवाना ना दिया. रोज़ मैं विद्यालय समय से पहले पहुंच जाती और स्टाफ रूम में दरवाज़ के पासवाली कुर्सी पर बैठ उनका इंतज़ार करती.

विपुलजी मेरी भावनाओं को काफ़ी पहले समझ चुके थे. एक दिन सबकी नज़र बचाकर मुझे एक लाल गुलाब थमाकर तेज़ कदमों से वो बाहर निकल गए. मेरी ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा. अब मेरा ध्यान बच्चों को पढ़ाने में कम और उनकी एक झलक पाने में ज़्यादा लगा रहता.

लेकिन हम अपने प्यार को बाकी शिक्षकों की नज़र से ज़्यादा दिनों तक छिपा नहीं पाए. जब प्रधानाध्यापक को इसकी ख़बर मिली, तो उन्होंने मेरे और विपुलजी समेत सभी शिक्षकों को अपने कमरे में बुलाया और विद्यालय के अध्यापकों द्वारा पालन किए जानेवाले शिष्टाचार के बारे में लंबा-चौड़ा भाषण दिया.

अगले दिन मैं फुफेरी बहन की शादी के लिए एक सप्ताह का अवकाश लेकर चली गई. जब वापस आई, तो पता चला कि विपुलजी दो दिन पहले ही विद्यालय छोड़ चुके हैं.

यह भी पढ़ें: पहला अफेयर: यादों के रंग… (Pahla Affair: Yaadon Ke Rang)

मैं सातवें आसमान से सीधे ज़मीन पर आ गिरी. ऐसा लगा मानो शीतल हवाओं की जगह तेज़ आंधियों ने ले ली है. मैं अगले ही दिन उनके घर गई, तो पता चला कि वो आगे की पढ़ाई के लिए बैंगलुरू चले गए हैं. मैं उनसे बात करना चाहती थी, उन्हें समझाना चाहती थी, पर उन्होंने मुझे एक मौका तक नहीं दिया.

काफ़ी मुश्किल से अपने अंदर उमड़ रहे आंसुओं के सैलाब को रोककर बाहर निकली,तो उनके छोटे भाई ने मुझे एक बंद लिफ़ाफ़ा दिया और कहा कि भैया ने आपको देने के लिए कहा था. इसमें गणित के कुछ फॉर्मूले हैं. मैंने घर जाकर वो लिफ़ाफ़ा खोला, तो उसमें गणित के फॉर्मूलों की एक मोटी कॉपी मिली. मुझे उन पर बहुत गुस्सा आया और मैंने कॉपी एक तरफ़ पटक दी. जैसे ही कॉपी पटकी, उसमें से एक चिट्टी गिरी. वो विपुलजी का ख़त था, जिसमें लिखा था- मेरी प्यारी संचिता, मैं जानता हूं कि तुम्हें मुझ पर गुस्सा आ रहा होगा कि इस तरह बिना कुछ कहे-सुने मैं चला आया, लेकिन तुम भी यह अच्छी तरह जानती हो कि हम दोनों में ही वो हिम्मत नहीं कि हम समाज के बंधनों को तोड़कर शादी कर सकें.

मैं नहीं चाहता कि मेरी वजह से तुम्हारी किसी तरह की बदनामी हो, क्योंकि समाज लड़की के माथे पर लगा हल्का-सा दाग़ भी किसी को भूलने नहीं देता. शायद अब और नहीं लिख पाऊंगा. बस ये समझ लो कि मैं परिस्थितियों को समझते हुए आगे बढ़ने या पीछे हटने में विश्‍वास रखता हूं. उम्मीद है, तुम मुझे समझ पाओगी.

उस समय तो मुझे विपुलजी पर बहुत गुस्सा आया और ख़ुद पर तरस, लेकिन आज समझ गई हूं कि वो सही थे. मैं जो आज इज़्ज़त की ज़िंदगी जी रही हूं, वो विपुलजी की ही दी हुई है. मैं आज अपने पति और बच्चों के साथ ख़ुश हूं और इसमें विपुलजी का बहुत बड़ा त्याग व योगदान है.

– ज्योति प्रसाद

यह भी पढ़ें: पहला अफेयर: मुझे माफ़ कर देना… (Pahla Affair: Mujhe Maaf Kar Dena)

पहला अफेयर: यादों के रंग… (Pahla Affair: Yaadon Ke Rang)

Love Stories
पहला अफेयर: यादों के रंग… (Pahla Affair: Yaadon Ke Rang)

वो उम्र ही लड़कपन की थी, जिनमें कुछ मधुर यादें, सुखद एहसास के क्षण समाये हुए थे, जिसकी याद आज भी मेरे होंठों पर मुस्कुराहट ले आती है. बात उन दिनों की है, जब मेरा कॉलेज ख़त्म हुआ था. छुट्टियां चल रही थीं. पापा ने घर में पेंट करवाने का विचार किया. मेरी होम डेकोरेशन में अच्छी नॉलेज होने के कारण घर को रेनोवेट कराने की ज़िम्मेदारी मुझे दी गई. कलर, पेंट के डिब्बों व ब्रश के साथ मज़दूरों ने घर में काम करना शुरू किया.

सहसा एक आवाज़ सुनाई दी, “एक ग्लास पानी मिलेगा.” एक मधुर-सी आवाज़ कानों में घुल गई. मैं उसे एकटक देखती रह गई. वह शख़्स मेरी ही उम्र का था. बड़ा ही आकर्षक व्यक्तित्व, नीली आंखें. उसका चलना, बैठना, उसकी हर बात मुझे लुभाती. उसकी बड़ी पलकें विशेषकर उसकी नीली आंखें मुझे उसकी ओर खींच ले गईं. फिर तो न जाने चाय-पानी के बहाने मैं उस कमरे में कितनी बार ही चक्कर लगा आती, जहां वह अपना काम कर रहा था. जब वह ब्रश चला रहा होता, मैं ख़ामोश-सी उसे देखती रहती.

धीरे-धीरे मेरी दीवानगी एक तरफ़ा प्यार में कब बदली, मैं जान भी न सकी. कई बार मैंने अपने आपको मन ही मन डांटा भी था कि एक पेंट करनेवाले मज़दूर के प्रति इतना आकर्षण क्यों? पर न जाने क्या था, मैं चाहकर भी रुक नहीं पाती. उसकी उन नीली आंखों में न जाने कैसी कशिश थी कि मैं डूबती ही चली गई. पहले-पहले तो वो सकुचाया-सा रहता, फिर धीरे-धीरे बात करने लगा था. उसकी बोलती आंखें दिल में नए ख़्वाब जगातीं. जब भी वह दिखाई नहीं देता, मैं बेचैन हो उठती. उस दिन वो काम पर नहीं आया था. वह प्रतियोगी परीक्षा देने गया है, इसकी जानकारी पेंट करनेवाले मज़दूरों के हेड ने दी.

यह भी पढ़ें: पहला अफेयर: ख़ूबसूरत बहाना..(Pahla Affair: Khoobsurat Bahana)

तो जनाब पढ़ते भी हैं. “क्या लाल-पीले रंगों के बीच काले अक्षर समझ में आते हैं?” अगले दिन जब मैंने पूछा, तो तुरंत जवाब मिला, “क्यों नहीं.’ काले अक्षर ही नहीं, मैं बहुत-सी बातें भी समझता हूं.” तो क्या वह मेरे अंदर उमड़ती भावनाओं को भी समझता है? घर की पेंटिंग का काम लगभग पूरा हो चुका था. मेरा दिल ज़ोरों से धड़कने लगा कि अब मैं तो उसे नहीं देख पाऊंगी. जाते व़क्त उसने मुझे एक काग़ज़ की पर्ची दी, जिस पर लिखा था…‘ प्यार अपने आप में एक अनोखा एहसास है. ये वो अफ़साना है जो ख़ुद-ब-ख़ुद बयां होता है. यह जीवन का सबसे प्यारा समय है.

आप बहुत अच्छी हैं. कोई व्यक्ति आप से प्रभावित हुए बगैर नहीं रह सकता, पर आज की हक़ीक़त यही है कि हमारे बीच बहुत-से फासले हैं… परिवार के, जाति के, अमीरी-ग़रीबी के, जिनसे पार पाना नामुमकिन है. ज़िम्मेदारियों से लदा मेरा व्यक्तित्व है. मैं चाहकर भी तुम्हारी मंज़िल नहीं बन सकता.’ मेरा पहला प्यार, जिसकी क़िस्मत में अधूरा रहना लिखा था, अधूरा ही रह गया.

वो चला गया हमेशा के लिए. मैं उसे भीगी आंखों से देखती रह गई थी. न रोक सकती थी, न ही किसी से कुछ कह सकती थी. जिस सच्चाई से वह रू-ब-रू कराकर गया था, उसे तो मैं भी नहीं बदल सकती थी. मैं जिस आसमान में उड़ रही थी, वहां से उतरकर ज़मीन पर आ गई. व़क्त रुकता नहीं, ज़िंदगी थमती नहीं. ये वो मुक़ाम नहीं था, जहां मैं ठहर जाती. पर उसकी नीली आंखें जब-जब मेरे ज़ेहन में याद बनकर उमड़तीं, तो मेरी आंखें सजल हो जातीं. बड़ी बेनूर थी ये रूह मेरी, तुम्हारे आने से पहले, तुम्हारी यादों की कशिश ने रंग भर दिए इसमें ज़िंदगी के. अब तक ख़ामोश पड़ा था दिल का आंगन, तुम्हारी आहटों की ख़ुशबू ने इसमें मुहब्बत के फूल खिला दिए. लफ़्ज़ों को जैसे वजह मिल गई बोलने की. यही मेरा जहां है, यही मेरी कहानी.

– शोभा रानी गोयल

यह भी पढ़ें: पहला अफेयर: काला खट्टा (Pahla Affair: Kaala Khatta)