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पहला अफेयर: इतना-सा झूठ (Pahla Affair: Itna Sa Jhooth)

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पहला अफेयर: इतना-सा झूठ (Pahla Affair: Itna Sa Jhooth)

प्यार करने की भी भला कोई उम्र होती है क्या? पंद्रह से पच्चीस वर्ष, बस इसी बीच आप प्यार कर सकते हैं, इसके आगे-पीछे नहीं. फिल्मों और कहानियों से तो ऐसा ही लगता है. नायक-नायिका न केवल जवां होने चाहिए, बल्कि उनका हसीन होना भी ज़रुरी है. सच पूछो तो इस उम्र के बाद का प्यार अधिक परिपक्व होता है, उसमें वासना का स्थान गौण हो जाता है और इस उम्र के पहले का प्यार तो और भी पवित्र होता है. निश्छल- हां बस यही एक शब्द है उसका बखान करने के लिए. और जब भी उस निश्छल प्यार के बारे में सोचती हूं तो मेरे सामने किशोर आ खड़ा होता है. सातवीं कक्षा में पढ़ता अल्हड़ किशोर.

हमारे ग्रुप में बिल्डिंग के बहुत से बच्चे थे. उन्हीं में से एक था- किशोर. बारह वर्षीय किशोर स्वयं को बहुत समझदार समझता था. उसके बड़े भाई का उन्हीं दिनों विवाह हुआ था एवं उसने अपने किशोर मन में कहीं यह ठान लिया था कि वह शादी करेगा तो स़िर्फ मुझसे. मैं तो खैर इन बातों से अनभिज्ञ तब तीसरी कक्षा में पढ़ती थी. बहुत नादान थी.

उन दिनों टी.वी., फ़िल्में उतनी प्रचलित नहीं थीं. हम कभी घर-घर खेलते, शादी-ब्याह करवाते-बच्चों की अपनी एक अलग दुनिया थी. इसके अलावा प्रायः हम छोटे-छोटे नाटक भी अभिनीत करते. किसी की मां की साड़ी का पर्दा बन जाता और बड़ी बहनों के दुपट्टों से पगड़ी और धोती. किशोर की हमेशा यह ज़िद रहती कि वह मेरे साथ ही काम करेगा. यदि मैं नायिका का रोल कर रही हूं तो वह नायक का करेगा और यदि मैं मां का पार्ट कर रही हूं तो वह पिता का करेगा.

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बचपन किशोरावस्था का समय कब पंख लगाकर उड़ जाता है, पता ही नहीं चलता. समय के साथ-साथ हमारी मित्र मंडली भी तितर-बितर हो गई अपने अभिभावकों के संग. पिताजी के तबादलों के कारण हर वर्ष नया शहर, नया स्कूल होता. शेष रह गईं बचपन की यादें. पर किशोर ने उन यादों को कुछ अधिक ही संजो रखा था. अपने उस इरादे पर वह सचमुच संजीदा था.

विधि का विधान देखो, मेरा विवाह तय हुआ भी तो किशोर के ममेरे भाई से और राज़ खुला कार्ड छपने के बाद, जब उसके हाथ वह कार्ड लगा. कार्ड हाथ में लिए ही वह हमारे घर आया. पास ही के शहर में हम रहते थे. पर क्या हो सकता था तब? उसने अपने प्यार की बहुत दुहाई दी. एक अपरिचित व्यक्ति से बंधने के स्थान पर उससे विवाह करना जिसने मुझे ताउम्र चाहा- मेरे लिए बहुत बड़ा प्रलोभन था.

अरसा बीत गया. यूं कहो कि जीवन ही बीत गया. पर मैंने भरसक उससे दूरी बनाए रखी. किसी उत्सव में उसकी उपस्थिति की संभावना मात्र से ही मैं वहां जाना टाल जाती. शादी-ब्याह में शामिल होना ज़रूरी हो जाता तो शादी की भीड़ में गुम हो जाने की कोशिश करती, पर क़रीबी रिश्ता होने से अनायास सामना हो ही जाता. और मुझसे नज़रें मिलते ही उसकी आंखों के चिराग़ दहक उठते. मैं भी उस ताप से कहां बच पाती हूं. मन का चोर हमें सामान्य बातचीत करने से भी रोक देता है. वह आज भी मुझे उसी शिद्दत से चाहता है . यह मात्र मेरी कल्पना नहीं- उसकी पत्नी मालिनी ने स्वयं मुझसे कहा था. कभी क्रोध के ज्वार में उसने अपने जीवन की पूरी निराशा, पूरी कुण्ठा, पत्नी पर उड़ेल दी और वह मेेरे पास आई थी सफ़ाई मांगने.

“मेरे लिए वह मात्र ससुराल पक्ष का रिश्तेदार है. इससे अधिक मैंने उसे कुछ नहीं माना.” मैंने मालिनी को पूरा विश्‍वास दिलाते हुए कहा था. मैं जानती हूं यह सच नहीं. पर सच बोलकर भला दो घरों की शांति भंग क्यों करूं? बच्चों की भावनाओं, उनके सुरक्षित भविष्य पर ठेस पहुंचाऊं? अपने निर्दोष पति और निर्दोष मालिनी का सुख-चैन छीनूं?

इन सबके लिए मेरा इतना-सा झूठ क्षम्य नहीं है क्या?

– उषा

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तुम्हारी कत्थई आंखें (Pahla Affair: Tumhari Kathai Ankhen)

Pyar Ki Kahaniya

तुम्हारी कत्थई आंखें (Pahla Affair: Tumhari Kathai Ankhen)

दस साल बीत गए… तुम्हारा चेहरा आज भी मेरी आंखों में बसा है. उस दिन के बाद न तो तुम मिले और न ही तुम्हारा कोई अता-पता. तुम्हें तो शायद मैं याद भी न हूं, पर मुझे तुम्हारी कत्थई आंखों की कशिश हर रोज़ शाम को गेटवे ऑफ इंडिया की तरफ़ खींच ले जाती है. क़दम ख़ुद-ब-ख़ुद तुम्हारे लिए चल पड़ते हैं. हर बार तुम्हें देखने और मिलने की एक उम्मीद जन्म लेती है, परंतु फिर मेरी शाम खाली हाथ लौट जाती है. वो पहली नज़र के प्रेम का एहसास आज भी मेरे अंदर सांसें ले रहा है.

कैसे भूल जाऊं वो 26 नवंबर का ताज होटल पर अटैकवाला दिन, जो इतिहास के पन्नों में एक काले, मनहूस दिन के रूप में अंकित हो चुका है. उस दिन न जाने कितनों ने अपनों को खोया था और कितनों ने अपनी जान गंवाई थी. विपरीत इसके मेरे लिए तो वो मेरी ज़िंदगी का सबसे ख़ूबसूरत, यादगार दिन था, जिसने मुझे प्यार जैसे ख़ूबसूरत एहसास से रू-ब-रू करवाया था. एकतरफ़ा ही सही, प्यार तो है.

याद है मुझे आज भी उस दिन का रोंगटे खड़े कर देनेवाला एक-एक लम्हा, जब मैंने और मेरी सहेलियों ने गेट वे ऑफ इंडिया घूमने का प्रोग्राम बनाया था. समुद्र की लहरें अपने मस्त अंदाज़ में साहिल से अठखेलियां करने में मग्न थीं कि अचानक आतंकवादियों ने मुंबई के ताज होटल पर हमला कर दिया था. थोड़ी देर पहले तक जो समां रोमांचक लग रहा था, वो करुणा से भरी चीखों, गोलियों की आवाज़ों और मदद की गुहारों में परिवर्तित हो चुका था. इसी भगदड़ में मेरी सभी सहेलियां मुझसे बिछड़ गई थीं.

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मैंने बड़ी मुश्किल से डरते-डरते एक बेंच के पीछे आश्रय लिया था. दहशत के मारे पूरा शरीर कांपने लग गया था. आंसुओं से भरी आंखें किसी तरह की मदद की खोज में थीं. पुलिस ने होटल के बाहर पूरी तरह घेराबंदी कर ली थी. जो लोग बाहर फंसे हुए थे, पुलिस उन्हें किसी तरह सुरक्षित निकालने की कोशिश में थी. मौत को इतने क़रीब देखकर मेरी शक्ति और हिम्मत जवाब देने लगी. बेहोशी मुझे अपनी आगोश में लेने को थी कि तभी किसी की मज़बूत बांहों ने मुझे थाम लिया. वो मज़बूत-गर्म बांहें तुम्हारी थीं. मेरी बेहोशी से भरी धुंधली आंखों से मुझे स़िर्फ तुम्हारी कत्थई आंखें दिखाई दे रही थीं.

“देखो, संभालो अपने आप को. बेहोश मत होना. हम किसी भी तरह यहां से सुरक्षित बाहर निकल जाएंगे…” यह कहते-कहते तुम किसी तरह मुझे होश में लाए. आंखें खुलते ही तुम्हारा चेहरा दिखा, जो मेरी आंखों में उतर गया. तुमने मुझे धीरे-धीरे पुलिस की तरफ़ चलने का इशारा किया. मैं तो तुम्हें देखकर अपनी सुध-बुध खो बैठी थी. बस, तुम्हारे भरोसे एक कठपुतली बन तुम्हारा हाथ पकड़कर चल पड़ी थी साथ.

किसी तरह हम पुलिस के पास पहुंच ही गए और उन्होंने तुरंत हमें वहां से सुरक्षित बाहर निकाल दिया. मेरे लिए तुम एक फ़रिश्ता बनकर आए थे. बस, यहीं तक था हमारा साथ. सुरक्षित बाहर आते ही तुम मुझे एक टैक्सी में बैठाकर, मेरा हाथ छोड़कर मेरी नज़रों से ओझल हो गए. कहां चले गए… पता नहीं. अपना नाम, पता, सब कुछ अपने साथ ले गए. तुम तो चले गए, किंतु अपना चेहरा, अपनी कत्थई आंखें सदा के लिए मेरी आंखों में, मेरी सांसों में छोड़ गए.

आज भी मेरी शामें तुमसे मिलने के एक अटूट भरोसे पर, गेटवे ऑफ इंडिया की उसी बेंच पर तुम्हारी कत्थई आंखों के इंतज़ार में गुज़रती हैं.

– कीर्ति जैन

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पहला अफेयर: एक ख़ूबसूरत रिश्ता (Pahla Affair: Ek Khoobsurat Rishta)

Pyaar Ki Kahaniya

पहला अफेयर: एक ख़ूबसूरत रिश्ता (Pahla Affair: Ek Khoobsurat Rishta)

रात के अंधेरे में शून्य में ताकती निगाहें… रेलगाड़ी के पहियों की आवाज़ें… जाने क्यों आज मिलकर स्मृतियों में दबी पड़ी हुई परतों को उधेड़कर चलचित्र की भांति चलने लगी थी और विक्रम का मन अपने अतीत को लेकर सोचने लगा… इस दुनिया में कोई ऐसा भी था, जो उसके दर्द को हमेशा उससे पहले ही महसूस कर लेता था. दुनिया में विक्रम ने स़िर्फ उसे ही चाहा और उसके सिवा उसने किसी और की तरफ़ मुड़कर भी नहीं देखा. श्रुति नाम था उसका. दुनिया में सबसे ख़ूबसूरत रिश्ता दोस्ती का होता है और उनका आपस में ऐसा ही रिश्ता था और यह दोस्ती की मिठास में डूबा हुआ था. उनकी वफ़ाएं हमेशा एक-दूसरे के साथ थीं.

श्रुति के साथ कॉलेज में विक्रम का यह तीसरा वर्ष था. हर वर्ष की तरह इस साल भी उनके कॉलेज में वार्षिक समारोह का बड़ा शानदार आयोजन किया जा रहा था, जिसमें उन दोनों को भी भाग लेना था. लेकिन इस बार एक हास्य नाटक में दोनों को 60-65 वर्ष के उम्र के फूफा-फूफी का क़िरदार निभाना था, जिसे करने के लिए कॉलेज में कोई और तैयार नहीं था.

यही वजह थी कि दोनों को अपनी सबसे प्रिय क्लास टीचर सुश्री लता मायकेल के विशेष अनुरोध पर यह रोल करना पड़ा. नाटक के समय दोनों ने अपने रोल्स को इस तरह जीवंत कर दिया था कि पूरे कॉलेज में उनकी चर्चा होने लगी. फिर जब उनकी क्लास के छात्र-छात्राएं श्रुति को ‘फूफी’ कहकर पुकारने लगे, तो इससे नाराज़ होकर श्रुति ने टीचर से इसकी शिकायत कर दी. टीचर ने क्लास के सभी स्टूडेंट्स की परेड ली और सबको आदेश दिया कि जो भी श्रुति को ‘फूफी’ कहते हैं, अपनी-अपनी जगह पर खड़े हो जाएं. इस पर विक्रम को छोड़कर सभी खड़े हो गए.

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टीचर ने पूछा, “विक्रम, तुम श्रुति को ‘फूफी’ कहकर नहीं चिढ़ाते, क्यों?” तब विक्रम ने जवाब दिया, “क्योंकि मैं ‘फूफा’ बना था.” इस पर पूरी क्लास ठहाका लगाकर हंस पड़ी. पूरा रूम ठहाकों से गूंज रहा था और अचानक श्रुति का गुलाबी चेहरा मारे शर्म के लाल होता चला गया… और फिर श्रुति की हालत देख विक्रम मन ही मन शर्मिंदा हुआ. वो अपनी प्रिय दोस्त का सम्मान भी करता था. दोनों में कभी भी किसी भी बात को लेकर कोई विवाद नहीं हुआ था. एक-दूसरे पर उनका अटूट विश्‍वास था.

उन दोनों के परिवार भी मध्यमवर्गीय थे… आज दोपहर में विक्रम की मां ने उसे फोन पर बताया था कि श्रुति के घरवाले श्रुति का रिश्ता लेकर कल उनके घर आनेवाले हैं. अर्थात् उनकी यह दोस्ती अब प्यार व शादी में बदलनेवाली है. इससे पहले विक्रम ने कभी सोचा ही कहां था कि वह श्रुति ही होगी, जो एक दिन उसकी जीवनसंगिनी बनेगी.

अचानक रेलगाड़ी के ब्रेक लगने से उसकी तंद्रा भंग हुई… उसका शहर आ गया था…

शायद प्यार का फूल तो कहीं पनप चुका था… जिसे दोनों दोस्ती की गहरी भावना के बीच महसूस नहीं कर पाए थे, लेकिन दूसरों ने उन्हें इसका एहसास दिला दिया था… उनके पहले प्यार को मंज़िल मिल रही थी, इससे ख़ूबसूरत रिश्ता और क्या हो सकता था.

– प्रांशु राजवानी

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पहला अफेयर: तुमसा कोई न मिला (Pahla Affair: Tumsa Koi Na Mila)

Pyar Ki Kahani

पहला अफेयर: तुमसा कोई न मिला (Pahla Affair: Tumsa Koi Na Mila)

वो ख़्वाब था बिखर गया, ख़्याल था मिला नहीं, मगर ये दिल को क्या हुआ… ये क्यों बुझा, पता नहीं… हरेक दिन उदास दिन, तमाम शब उदासियां… किसी से क्या बिछड़ गए कि जैसे कुछ बचा नहीं… जीवन से पूरी तरह संतुष्ट होने के बाद भी यादों की रहगुज़र पर जलता एक दीया है पहला प्यार, जिसकी झिलमिलाती यादों में कसक होती है, जो तन्हाई में दिल को उदास कर देती है, तो महफिल में भी नज़रें किसी को तलाशने लगती हैं. सब होने के बाद भी कुछ खोने का एहसास होता है. वो जज़्बात, जिन्हें इज़हार की मोहलत न मिली, जहां नज़रों ने नज़रों की ज़ुबां से दिल की बात सुन ली, लेकिन जब दिलों के फैसले दिमाग से किए जाते हैं, तो जुदाई ही मिलती है.

वो बीएससी करके कोचिंग में टीचर थे और मैं बारहवीं की स्टूडेंट, जो फिज़िक्स की प्रॉब्लम सॉल्व करना तो सीख गई, लेकिन दर्दे दिल में उलझकर रह गई. फिर तो जो समझ में आता था, उन्हें देखकर वो भी भूल जाया करती थी. कोचिंग के फेयरवेल पार्टी में उनका सुनाया वो शेर शायद उनके दिल की सदा थी. कुछ ऐसा था उन आंखों में कि मैंने कोचिंग जाना छोड़ दिया और घर पर ही परीक्षा की तैयारी करने लगी. सब ने बहुत समझाया कि परीक्षा तो हो जाने दो, लेकिन मैंने ना कर दिया. आखिरी पेपर के बाद कुछ इरादा करके मैं कोचिंग गई. वहां जाने पर पता चला कि वो तो शाखे-दिल पर गुलों की बहार की आस दिखाकर मुझे तन्हा छोड़कर जा चुके हैं. क्यों? कोई जवाब नहीं.

व़क्त अपनी रफ्तार से चलता रहा. विवाह, परिवार, सर्विस… इन सबके बीच कुछ खो देने का गम उतना ज़्यादा नहीं था, क्योंकि उसे पाया ही कब था. लेकिन फिर भी एक बार मिलने की ख़्वाहिश थी. लगता था महफिल में, मेले में कभी वो मेरे सामने आ जाएंगे. स्कूल में जब भी विदाई पार्टी होती, मुझे वो आखिरी मुलाकात याद आती.

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लेकिन गुज़रा व़क्त इस तरह सामने आ जाएगा, मैंने कभी सोचा न था. स्कूल में नए लेक्चरार से परिचय कराने के लिए प्रिंसिपल ने पूरे स्टाफ को बुलाया. पूरे 12 साल बाद उन्हें देखा था. आंखों पर यकीन नहीं हो रहा था. वही ग्रेसफुल चेहरा, आंखों में चमक, ठहरा हुआ प्रभावी अंदाज़… नज़रें हटाना मुशिकल था, कहीं फिर खो न जाएं. गुस्सा था या डर, मैं उनके सामने आने से कतराने लगी. लेकिन एक स्कूल में होते हुए ऐसा नामुमकिन था. एक दिन पता चला कि अभी तक उन्होंने शादी नहीं की. क्यों? किसकी खातिर? जानना चाहती थी, लेकिन हम सब एक मर्यादा में बंधे थे.

शिक्षक दिवस पर छात्रों की फरमाइश पर उन्होंने कुछ शेर और गजल सुनाई- कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता… वे कभी दिल के करीब थे. इसलिए उनके दर्द को मैं महसूस कर सकती थी. लेकिन कुछ सवालों के जवाब अभी पाने बाकी थे. अब हम दोस्त बन चुके थे.

“आपने शादी क्यों नहीं की?” एक बार फिर मैं पूछ बैठी.

“तुमसा कोई न मिला.” दिल की बात बताने में बिल्कुल भी नहीं झिझके थे.

“तो चोरों की तरह क्यों चले गए थे?”

“सब कुछ हमारे चाहने से नहीं होता. तक़दीर का फैसला हमें मानना पड़ता है.”

“कायरता को मजबूरी ना कहिए.” मैं गुस्से में बोली.

“तुम जानना चाहती हो, तो सुनो, तुम्हारे भैया मेरे दोस्त थे, फिर भी उनको सच्चाई बताकर तुम्हारा हाथ मांगा था, लेकिन उन्होंने जवाब दिय- ये तुम्हारी मर्ज़ी तक ही ठीक है, यदि मेरी बहन ने हां की, तो उसे गोली मार दूंगा, क्योंकि टीचर का दर्जा हर हाल में सम्मानीय होता है. अगर इस तरह शादियां होने लगीं, तो माहौल ही बिगड़ जाएगा. मैं उनको समझाने में नाकाम रहा, इसलिए खामोशी से चला गया. लेकिन फिर कोई और इस दिल में जगह न बना पाया.”

उनके शब्दों में उनकी बेबसी झलक रही थी, लेकिन अब मैंने उनका जहां मुकम्मल कराने का इरादा कर लिया था. अपनी मर्ज़ी उन्हें बता दी है. ज़िंदगी की ख़ुशियों पर उनका भी हक है. मुझे उम्मीद है कि इस दोस्ती के रिश्ते की वो लाज रखेंगे और इस शादी के लिए ना नहीं कहेंगे. बस, आप सभी की दुआओं की ज़रूरत है.

– शहाना सिद्दीकी

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पहला अफेयर: कहीं दूर मैं, कहीं दूर तुम… (Pahla Affair: Kahin Door Main, Kahin Door Tum)

Pyaar Ki Kahaniya

पहला अफेयर: कहीं दूर मैं, कहीं दूर तुम… (Pahla Affair: Kahin Door Main, Kahin Door Tum)

प्रेम, प्यार, रोमांस, इश्क़, मुहब्बत… चाहत से लबरेज़ ये शब्द सुनते ही आंखों में अपने आप कई सपने पलने लगते हैं… गालों पर हया की एक लालिमा-सी छा जाती है… मुझे भी इस इश्क़ के रोग ने छू लिया था. 23 साल की थी मैं. नई-नई नौकरी लगी थी. मेरे साथ ही मेरे सहपाठी अभिनव ने भी जॉइन किया था. अभिनव के विभाग में ही उसका एक

शर्मीला-सा दोस्त था पल्लव. अभिनव से मेरा काफ़ी दोस्ताना व्यवहार था, उसी बीच पल्लव का मुझे चुपचाप देखना, आंखें झुकाकर बातें करना और बहुत ही सली़के से व्यवहार करना बेहद भाने लगा था. पल्लव की यही बातें मुझे बार-बार अभिनव के विभाग की ओर जाने को मजबूर कर देती थीं.

आख़िर मेरी क़िस्मत भी रंग लाई और पल्लव का ट्रांसफर मेरे ही विभाग में हो गया. बेहद ख़ुश थी मैं, हद तो तब हो गई, जब हम दोनों को एक ही प्रोजेक्ट पर काम करने का मौक़ा मिला. अब धीरे-धीरे हमें क़रीब आने का मौक़ा मिला. दोस्ती गहरी हुई और फिर ये दोस्ती प्यार में बदल ही गई. पल्लव ने भी अपने प्यार का इज़हार इशारों-इशारों में कर ही दिया. हां, हमने आपस में कोई वादे नहीं किए थे, पर हमारे प्यार को मंज़िल मिलेगी, यह विश्‍वास हम दोनों को ही था.

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लेकिन नियति पर कब किसी का ज़ोर चला है. मैंने विभागीय परीक्षा दी थी और उसके लिए भी पल्लव ने ही मुझे प्रोत्साहन दिया था. हमने साथ-साथ तैयारी की. दुर्भाग्यवश पल्लव परीक्षा उत्तीर्ण नहीं कर पाया और मैं पास हो गई थी. विभाग में रिक्त पद होने के कारण मेरा अधिकारी पद पर चयन हो गया था. अगली विभागीय परीक्षा को अभी समय था, मैंने पल्लव का हौसला बढ़ाया, लेकिन अब कार्यक्षेत्र में हमारे बीच दूरी बढ़ गई थी और धीरे-धीरे ये दूरियां हमारे संबंधों में भी बढ़ने लगी थीं. मैंने कई कोशिशें कीं, लेकिन पल्लव के मन में हीनभावना ने घर कर लिया था. वो मुझसे नज़रें चुराने लगा था. दूरी बनाए रखने के प्रयास करने लगा था. कुछ पूछती तो यही कहता कि मैं तुम्हारे लायक ही नहीं.

शायद पल्लव जान-बूझकर मुझसे दूर जाना चाहता था. मेरे सामने दूसरी लड़कियों से बातें करता… मेरा सामना तक नहीं करता था अब वो. मैंने फिर कोशिश की, तो उसने कहा, “मैं चाहता हूं तुम मुझे भूल जाओ, मुझसे घृणा करो, क्योंकि मेरा-तुम्हारा कोई मुक़ाबला नहीं. तुम्हें मुझसे बेहतर जीवनसाथी मिलेगा.”

ख़ैर, घर पर भी मेरी शादी की बातें होने लगी थीं और फिर मैंने भी पल्लव के लिए कोशिशें करनी बंद कर दीं, क्योंकि उसने ख़ुद मुझसे दूर जाने का निर्णय कर लिया था. मेरी शादी हो गई. पति के रूप में बेहद शालीन और प्यार करनेवाला साथी ज़रूर मिला, लेकिन मेरा पहला प्यार तो पल्लव था. कुछ समय बाद पता चला कि पल्लव के पिताजी ने काफ़ी दहेज लेकर एक लड़की से उसकी शादी कर दी. मेरा पहला प्यार दम तोड़ चुका था.

कई वर्षों बाद किसी समारोह में अचानक हमारा आमना-सामना हुआ. साधारण-सी औपचारिक बात के बाद हम दोनों अपनी-अपनी राह
चल दिए…

यूं ही अपने-अपने सफ़र में गुम… कहीं दूर मैं, कहीं दूर तुम… मेरा पहला प्यार स़िर्फ एक छोटे-से मेल ईगो की बलि चढ़ गया था, काश! पल्लव तुमने अपना वो झूठा ईगो छोड़ दिया होता… काश!… लेकिन अब कोई फ़ायदा नहीं यह सोचने का, क्योंकि नियति को यही मंज़ूर था!

– अलका कुलश्रेष्ठ

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पहला अफेयर: ऐसा प्यार कहां? (Pahla Affair: Aisa Pyar Kahan)

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पहला अफेयर: ऐसा प्यार कहां? (Pahla Affair: Aisa Pyar Kahan)

कहते हैं, जोड़ियां स्वर्ग में ही तय हो जाती हैं. ईश्‍वर सबके लिए एक जीवनसाथी चुनकर भेजते हैं. पर क्या हमारा सच्चा जीवनसाथी वह होता है, जिसके साथ हम अपना पूरा जीवन बिता देते हैं या फिर वह जिसे कभी हमने अपने लिए चुना था और आज भी दिल में उसके लिए एक ख़ास जगह है? विपुलजी से मैं विद्यालय के शिक्षक पद के नियुक्तिवाले दिन मिली थी, जिसमें मेरा चुनाव अंग्रेज़ी और विपुलजी का चुनाव गणित के शिक्षक के रूप में हुआ था.

जेपीएससी की परीक्षा की तैयारी के लिए गणित में मैं विपुलजी से मदद लिया करती थी. उनकी कुशाग्र बुद्धि और गणित के प्रति समर्पण ने मुझे उनका दीवाना ना दिया. रोज़ मैं विद्यालय समय से पहले पहुंच जाती और स्टाफ रूम में दरवाज़ के पासवाली कुर्सी पर बैठ उनका इंतज़ार करती.

विपुलजी मेरी भावनाओं को काफ़ी पहले समझ चुके थे. एक दिन सबकी नज़र बचाकर मुझे एक लाल गुलाब थमाकर तेज़ कदमों से वो बाहर निकल गए. मेरी ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा. अब मेरा ध्यान बच्चों को पढ़ाने में कम और उनकी एक झलक पाने में ज़्यादा लगा रहता.

लेकिन हम अपने प्यार को बाकी शिक्षकों की नज़र से ज़्यादा दिनों तक छिपा नहीं पाए. जब प्रधानाध्यापक को इसकी ख़बर मिली, तो उन्होंने मेरे और विपुलजी समेत सभी शिक्षकों को अपने कमरे में बुलाया और विद्यालय के अध्यापकों द्वारा पालन किए जानेवाले शिष्टाचार के बारे में लंबा-चौड़ा भाषण दिया.

अगले दिन मैं फुफेरी बहन की शादी के लिए एक सप्ताह का अवकाश लेकर चली गई. जब वापस आई, तो पता चला कि विपुलजी दो दिन पहले ही विद्यालय छोड़ चुके हैं.

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मैं सातवें आसमान से सीधे ज़मीन पर आ गिरी. ऐसा लगा मानो शीतल हवाओं की जगह तेज़ आंधियों ने ले ली है. मैं अगले ही दिन उनके घर गई, तो पता चला कि वो आगे की पढ़ाई के लिए बैंगलुरू चले गए हैं. मैं उनसे बात करना चाहती थी, उन्हें समझाना चाहती थी, पर उन्होंने मुझे एक मौका तक नहीं दिया.

काफ़ी मुश्किल से अपने अंदर उमड़ रहे आंसुओं के सैलाब को रोककर बाहर निकली,तो उनके छोटे भाई ने मुझे एक बंद लिफ़ाफ़ा दिया और कहा कि भैया ने आपको देने के लिए कहा था. इसमें गणित के कुछ फॉर्मूले हैं. मैंने घर जाकर वो लिफ़ाफ़ा खोला, तो उसमें गणित के फॉर्मूलों की एक मोटी कॉपी मिली. मुझे उन पर बहुत गुस्सा आया और मैंने कॉपी एक तरफ़ पटक दी. जैसे ही कॉपी पटकी, उसमें से एक चिट्टी गिरी. वो विपुलजी का ख़त था, जिसमें लिखा था- मेरी प्यारी संचिता, मैं जानता हूं कि तुम्हें मुझ पर गुस्सा आ रहा होगा कि इस तरह बिना कुछ कहे-सुने मैं चला आया, लेकिन तुम भी यह अच्छी तरह जानती हो कि हम दोनों में ही वो हिम्मत नहीं कि हम समाज के बंधनों को तोड़कर शादी कर सकें.

मैं नहीं चाहता कि मेरी वजह से तुम्हारी किसी तरह की बदनामी हो, क्योंकि समाज लड़की के माथे पर लगा हल्का-सा दाग़ भी किसी को भूलने नहीं देता. शायद अब और नहीं लिख पाऊंगा. बस ये समझ लो कि मैं परिस्थितियों को समझते हुए आगे बढ़ने या पीछे हटने में विश्‍वास रखता हूं. उम्मीद है, तुम मुझे समझ पाओगी.

उस समय तो मुझे विपुलजी पर बहुत गुस्सा आया और ख़ुद पर तरस, लेकिन आज समझ गई हूं कि वो सही थे. मैं जो आज इज़्ज़त की ज़िंदगी जी रही हूं, वो विपुलजी की ही दी हुई है. मैं आज अपने पति और बच्चों के साथ ख़ुश हूं और इसमें विपुलजी का बहुत बड़ा त्याग व योगदान है.

– ज्योति प्रसाद

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पहला अफेयर: यादों के रंग… (Pahla Affair: Yaadon Ke Rang)

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पहला अफेयर: यादों के रंग… (Pahla Affair: Yaadon Ke Rang)

वो उम्र ही लड़कपन की थी, जिनमें कुछ मधुर यादें, सुखद एहसास के क्षण समाये हुए थे, जिसकी याद आज भी मेरे होंठों पर मुस्कुराहट ले आती है. बात उन दिनों की है, जब मेरा कॉलेज ख़त्म हुआ था. छुट्टियां चल रही थीं. पापा ने घर में पेंट करवाने का विचार किया. मेरी होम डेकोरेशन में अच्छी नॉलेज होने के कारण घर को रेनोवेट कराने की ज़िम्मेदारी मुझे दी गई. कलर, पेंट के डिब्बों व ब्रश के साथ मज़दूरों ने घर में काम करना शुरू किया.

सहसा एक आवाज़ सुनाई दी, “एक ग्लास पानी मिलेगा.” एक मधुर-सी आवाज़ कानों में घुल गई. मैं उसे एकटक देखती रह गई. वह शख़्स मेरी ही उम्र का था. बड़ा ही आकर्षक व्यक्तित्व, नीली आंखें. उसका चलना, बैठना, उसकी हर बात मुझे लुभाती. उसकी बड़ी पलकें विशेषकर उसकी नीली आंखें मुझे उसकी ओर खींच ले गईं. फिर तो न जाने चाय-पानी के बहाने मैं उस कमरे में कितनी बार ही चक्कर लगा आती, जहां वह अपना काम कर रहा था. जब वह ब्रश चला रहा होता, मैं ख़ामोश-सी उसे देखती रहती.

धीरे-धीरे मेरी दीवानगी एक तरफ़ा प्यार में कब बदली, मैं जान भी न सकी. कई बार मैंने अपने आपको मन ही मन डांटा भी था कि एक पेंट करनेवाले मज़दूर के प्रति इतना आकर्षण क्यों? पर न जाने क्या था, मैं चाहकर भी रुक नहीं पाती. उसकी उन नीली आंखों में न जाने कैसी कशिश थी कि मैं डूबती ही चली गई. पहले-पहले तो वो सकुचाया-सा रहता, फिर धीरे-धीरे बात करने लगा था. उसकी बोलती आंखें दिल में नए ख़्वाब जगातीं. जब भी वह दिखाई नहीं देता, मैं बेचैन हो उठती. उस दिन वो काम पर नहीं आया था. वह प्रतियोगी परीक्षा देने गया है, इसकी जानकारी पेंट करनेवाले मज़दूरों के हेड ने दी.

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तो जनाब पढ़ते भी हैं. “क्या लाल-पीले रंगों के बीच काले अक्षर समझ में आते हैं?” अगले दिन जब मैंने पूछा, तो तुरंत जवाब मिला, “क्यों नहीं.’ काले अक्षर ही नहीं, मैं बहुत-सी बातें भी समझता हूं.” तो क्या वह मेरे अंदर उमड़ती भावनाओं को भी समझता है? घर की पेंटिंग का काम लगभग पूरा हो चुका था. मेरा दिल ज़ोरों से धड़कने लगा कि अब मैं तो उसे नहीं देख पाऊंगी. जाते व़क्त उसने मुझे एक काग़ज़ की पर्ची दी, जिस पर लिखा था…‘ प्यार अपने आप में एक अनोखा एहसास है. ये वो अफ़साना है जो ख़ुद-ब-ख़ुद बयां होता है. यह जीवन का सबसे प्यारा समय है.

आप बहुत अच्छी हैं. कोई व्यक्ति आप से प्रभावित हुए बगैर नहीं रह सकता, पर आज की हक़ीक़त यही है कि हमारे बीच बहुत-से फासले हैं… परिवार के, जाति के, अमीरी-ग़रीबी के, जिनसे पार पाना नामुमकिन है. ज़िम्मेदारियों से लदा मेरा व्यक्तित्व है. मैं चाहकर भी तुम्हारी मंज़िल नहीं बन सकता.’ मेरा पहला प्यार, जिसकी क़िस्मत में अधूरा रहना लिखा था, अधूरा ही रह गया.

वो चला गया हमेशा के लिए. मैं उसे भीगी आंखों से देखती रह गई थी. न रोक सकती थी, न ही किसी से कुछ कह सकती थी. जिस सच्चाई से वह रू-ब-रू कराकर गया था, उसे तो मैं भी नहीं बदल सकती थी. मैं जिस आसमान में उड़ रही थी, वहां से उतरकर ज़मीन पर आ गई. व़क्त रुकता नहीं, ज़िंदगी थमती नहीं. ये वो मुक़ाम नहीं था, जहां मैं ठहर जाती. पर उसकी नीली आंखें जब-जब मेरे ज़ेहन में याद बनकर उमड़तीं, तो मेरी आंखें सजल हो जातीं. बड़ी बेनूर थी ये रूह मेरी, तुम्हारे आने से पहले, तुम्हारी यादों की कशिश ने रंग भर दिए इसमें ज़िंदगी के. अब तक ख़ामोश पड़ा था दिल का आंगन, तुम्हारी आहटों की ख़ुशबू ने इसमें मुहब्बत के फूल खिला दिए. लफ़्ज़ों को जैसे वजह मिल गई बोलने की. यही मेरा जहां है, यही मेरी कहानी.

– शोभा रानी गोयल

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पहला अफेयर: ख़ूबसूरत बहाना..(Pahla Affair: Khoobsurat Bahana)

Pahla Affair

पहला अफेयर: ख़ूबसूरत बहाना… (Pahla Affair: Khoobsurat Bahana)

बैंक में मेरी छवि एक शर्मीले स्वभाव वाले अफसर की थी. अपने केबिन में एकांत में अकाउंट के आंकड़ों में उलझे रहना ही मुझे भाता था. घर पर भी मैं कम ही बोलता था. मेरी अंतर्मुखी प्रवृत्ति देख भाभी अक्सर कहतीं, “देवरजी ऐसे अकेले-अकेले मौनी बाबा बनकर रहोगे, तो कौन तुम्हें अपनी लड़की देगा? संन्यासी बनने का इरादा है क्या?”

मैं भी हर बार की तरह हंसकर यही कहता, “क्या करूं भाभी लड़कियों के सामने बड़ा ही संकोच होता है.”

कुछ दिनों बाद दिवाली थी. भइया-भाभी ने मुझे दीदी को लाने उनकी ससुराल भेज दिया. दीदी की ससुराल में काफ़ी आवभगत हुई. खाना खाने के दौरान ही एक मधुर आवाज़ कानों में पड़ी, “आप तो कुछ खा ही नहीं रहे, एक रोटी और लीजिए ना.” मैंने देखा तो दीदी की ननद मानिंदी हौले-हौले मुस्कुरा रही थी. उसकी सौम्य मुस्कुराहट में न जाने क्या बात थी, मैं उसे देखता ही रह गया. आंखें मिलीं और मेरे दिल में पहली बार अजीब-सी हलचल हुई. अब मैं मानिंदी की एक झलक पाने को ही बेताब रहता. उसकी खिलखिलाती हंसी और उसकी मासूमियत में अजीब-सी कशिश थी.

मैं कुछ-कुछ समझने लगा था कि शायद इसी को प्यार कहते हैं और अब मैं भी इसकी गिरफ़्त में आ चुका हूं. एक दिन मैं पानी पीने के बहाने डायनिंग रूम में आया. मानिंदी फिल्मी पत्रिका पढ़ते-पढ़ते कुछ गुनगुना रही थी, “होशवालों को ख़बर क्या, बेख़ुदी क्या चीज़ है…” दीदी ने उसे छेड़ा, “मेरा भाई है ही इतना प्यारा कि उसे देखकर लड़कियां अपने होश खो बढ़ती हैं… बस थोड़ा शर्माता है, उसे इश्क़ करना सिखाना पड़ेगा.”

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“धत् भाभी…” कहते हुए शर्माकर वह भागी और सीधे आकर मुझसे ही टकरा गई. फिर आंखें चार हुईं और उसके गालों पर हया की सुर्ख़ी उतर आई. वो फिर भागी, मैं हिरणी-सी भागती मानिंदी को देखता ही रह गया. उसकी चंचलता, चपलता और अल्हड़पन पर मैं मर मिटा.

इतने में ही दीदी ने बताया कि कल मुंबई की टिकट कंफर्म हो गई. यह सुनकर तो मैं जिसे आसमान से सीधे ज़मीन पर गिर पड़ा. मेरे होश ठिकाने आ गए थे. मानिंदी ने उदास होकर दीदी से पूछा, “भाभी आप कल चली जाएंगी?” पर न जाने क्यों मुझे ऐसा लगा जैसे उसे मेरा विरह सता रहा है. मुझे रातभर नींद नहीं आई. करवट बदलते-बदलते न जाने कब सुबह हो गई. जीजाजी और उनके परिवारवाले हमें विदा कर रहे थे. मानिंदी दूर खड़ी जुदाई की पीड़ा झेल रही थी. उसकी आंखों में साफ़ नज़र आ रहा था.

रास्ते में दीदी ने न जाने क्यों अचानक पूछा, “मानिंदी के बारे में क्या ख़्याल है?” मैं चुप ही रहा, शायद दीदी को हमारे मौन प्रेम की भनक लग चुकी थी. घर पहुंचकर भइया ने दीदी से पूछा, “सफ़र कैसा रहा?” दीदी ने मुस्कुराकर कहा, “प्रदीप से ही पूछ लो.” भाभी भी किचन से आकर बोलीं, “क्या बात है देवरजी, बदले-बदले से सरकार नज़र आ रहे हैं.” मुझे तो कुछ समझ में ही नहीं आ रहा था कि यह सब क्या चल रहा है. कुछ समझ पाता इससे पहले ही दीदी ने तपाक से जवाब दिया, “बात ही कुछ ऐसी है. प्रोजेक्ट मानिंदी सफल रहा, “भइया भी फ़ौरन बोले, “तो बात चलाई जाए?”

अब मैं सब समझ चुका था कि ये सब भइया-भाभी की ही मिलीभगत थी. दीदी के ससुराल भेजना तो स़िर्फ एक बहाना था. लेकिन मुझे कोई गिला नहीं, यह बहाना इतना हसीं थी कि मुझे मेरी ज़िंदगी का सबसे ख़ूबसूरत मक़सद मिल गया था. मेरा पहला प्यार, मेरी प्यारी मानिंदी, जो कुछ ही दिनों में मेरी जीवन संगिनी भी बननेवाली थी!

– प्रदीप मेहता

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पहला अफेयर: कैसा तेरा प्यार…? (Pahla Affair: Kaisa Tera Pyar)

Pyar Ki Kahani

पहला अफेयर: कैसा तेरा प्यार…? (Pahla Affair: Kaisa Tera Pyar)

वो नज़रों से प्यार करना तेरा, पर प्यार के साथ-साथ हर बात पर तक़रार करना तेरा… तेरी शरारतों से ही नहीं, तेरी बदतमीज़ियों से भी इश्क़-सा हो गया था मुझे. हसीन था मुहब्बत का वो मंज़र. चाहत से लबरेज़ वो दिन-रात… सब बेहद ख़ुशगवार था. लेकिन कहीं न कहीं कुछ तो कमी थी… मैं भी जानती थी, तुम भी जानते थे कि हम चाहते हुए भी अभी दो से एक नहीं हो सकते… हमें इंतज़ार करना होगा. वजह! न तुम्हारे पास कोई जॉब था, न ऐसा बैकग्राउंड कि हमारे परिवारवाले तैयार हो सकें. तुमने अपनी एजुकेशन भी तो पूरी नहीं की थी… उस पर तुम्हारा ज़िंदगी को जीने का अलग ही अंदाज़. बेपरवाह-सा रवैया…

“मैं न बीते कल में विश्‍वास करता हूं, न आनेवाले कल की कल्पना… मैं आज में, यथार्थ में जीता हूं और आज का सच यही है कि हम साथ हैं. फ्यूचर किसने देखा है… क्या पता कल क्या हो? उसके लिए हम आज को नहीं खो सकते…”

रौशन ये तुम्हारा नज़रिया हो सकता है, पर मेरा नहीं. मुझे फिक्र होती है आनेवाले कल की. हमारे रिश्ते के भविष्य की…

“स्मिता, तुम प्यार करती हो न मुझसे, तो कुछ न कुछ हो ही जाएगा. बस तुम साथ मत छोड़ना, वरना टूट जाऊंगा मैं… ”

पर कहीं न कहीं तो मैं टूटती जा रही थी… तुम स़िर्फ बातें ही करते हो… न कुछ करने की कोशिश है, न किसी बात को गंभीरता से लेते हो. अपने तरी़के से हर चीज़ करनी है, अपनी मर्ज़ी से ही बात करनी है… अजीब रवैया था यह.

शायद जो बदतमीज़ियां पहले मुझे तुम्हारी ओर आकर्षित करती थीं, वही अब मुझे तुमसे दूर करती जा रही थीं… हर रोज़, हर पल मन में सवाल, दुविधाएं बढ़ रही थीं… क्या तुम्हारी ज़िंदगी में और भी है कोई? क्या तुम मुझे लेकर गंभीर ही नहीं… क्या तुम स़िर्फ अपना व़क्त गुज़ार रहे हो… पता नहीं क्या-क्या और किस-किस तरह के ख़्याल!

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उस पर गौरव ने इस दुविधा को और बढ़ा दिया… “स्मिता मैं तुम्हारा अच्छा दोस्त हूं, तुम्हारा बुरा तो नहीं चाहूंगा, तुमने आख़िर उस रौशन में क्या देखा? वो किसी भी तरह से तुम्हारे लायक नहीं, वो स़िर्फ टाइमपास कर रहा है. क्यों अपना व़क्त, अपनी ज़िंदगी उसके पीछे बर्बाद कर रही हो. तुम जैसी न जाने कितनी होंगी उसकी लाइफ में. वैसे भी तुम कहती हो न कि दिनभर ऑनलाइन रहता है… क्या कभी तुमने पूछा है कि किससे बात करता है? क्या बात करता है? क्यों बात करता है? होश में आओ… ”

गौरव की बातों पर गंभीरता से ग़ौर किया, तो लगा सच तो कह रहा है. रौशन की तरफ़ से मुझे कभी यह महसूस नहीं हुआ कि उसे बहुत ज़्यादा मेरी ज़रूरत है अपनी ज़िंदगी में, शायद मैं अकेले ही, अपनी तरफ़ से इस रिश्ते को निभाए जा रही थी.

ज़रूरी नहीं कि हर समय भावनाओं में बहकर ही निर्णय लिए जाएं, कभी-कभी बहुत ज़रूरी होता है अपने स्वाभिमान के लिए कठोर निर्णय लेकर आगे बढ़ा जाए. वरना ज़िंदगी वहीं उलझकर रह जाएगी.

मैंने रौशन से बात की… “हम कब शादी करेंगे?”

“अरे स्मिता, बस थोड़ा इंतज़ार करो. जिस दिन तुम्हारे लायक हो जाऊंगा, बारात लेकर सीधे तुम्हारे घर आऊंगा…”

“…लेकिन तुम कोशिश करोगे, तभी तो किसी लायक बनोगे. तुम तो इसी ज़िंदगी में ख़ुश हो. तुमको लग रहा है, जो जैसा चल रहा है, चलने दिया जाए.”

“हां, तो इस ज़िंदगी में भी क्या बुरा है…”

तुम जिस तरह से हल्के अंदाज़ में जवाब दे रहे थे, मैं समझ गई थी कि गौरव कहीं न कहीं सही था अपनी जगह… ज़रूरी नहीं कि असल ज़िंदगी में आपको फिल्मी हीरो की तरह परफेक्ट पार्टनर ही मिले, हम अक्सर धोखा खा जाते हैं. लोगों को पहचानने में. अगर ग़लती हो गई, तो बेहतर है समय रहते उसे सुधार लिया जाए. शायद मुझसे भी ग़लती हुई थी रौशन को पहचानने में. इस ग़लती को सुधारना ज़रूरी थी.

मैंने उसे मैसेज किया- तुम मेरी ज़िंदगी का अहम् हिस्सा हो, पर मुझे कभी यह महसूस क्यों नहीं हुआ कि मैं भी तुम्हारी ज़िंदगी में उतनी ही अहमियत रखती हूं?

मेरे दोस्त, यहां तक कि मेरे घरवाले भी जानते हैं हमारे रिश्ते के बारे में, लेकिन मुझे आजतक न तुम्हारे दोस्तों के बारे में पता है, न घरवालों के बारे में… और तुम बड़ी-बड़ी बातें करते हो… मुझे नहीं लगता हमारा रिश्ता आगे बढ़ सकता है…
मुझे लगा, शायद इस बात से तो तुम्हें फ़र्क पड़ेगा… लेकिन नहीं, तुमने इसे भी बेहद हल्के अंदाज़ में लिया और तुम्हारी तरफ़ से कभी कोई कोशिश नहीं हुई मुझे रोकनी की…

जानती हूं, तुम आगे बढ़ चुके हो, पर मैंने तो सच्चे दिल से तुमसे प्यार किया था, मैं कैसे आगे बढ़ सकती थी… वहीं खड़ी हूं, उसी मोड़ पर… संभाल रही हूं ख़ुद को… पता नहीं किस उम्मीद में जी रही हूं… हम भले ही बड़ी-बड़ी बातें करते हैं कि प्रैक्टिकल होकर सोचना चाहिए, पर मैं नहीं हूं प्रैक्टिकल… प्यार और रिश्तों में कैसे कोई प्रैक्टिकल हो सकता है… पता है, लोग खेल जाते हैं दिलों से, लेकिन अपना बस नहीं इन भावनाओं पर… हां, अब इतना समझ चुकी कि तुम्हारे इंतज़ार से कुछे हासिल नहीं होगा, बस आगे बढ़ना ही एकमात्र रास्ता है… उसी रास्ते पर चलने की कोशिश में हूं, भले ही अभी लड़खड़ा रही हूं, पर धीरे-धीरे सीख जाऊंगी… संभल जाऊंगी… तुम्हारे बिना जीना सीख जाऊंगी…!

– गीता शर्मा

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पहला अफेयर: धुंध के पार (Pahla Affair: Dhundh Ke Paar)

Pyar Ki Kahani

पहला अफेयर: धुंध के पार (Pahla Affair: Dhundh Ke Paar)

किशोरवय की सुनहरी धूप से भरे वे प्रिय दिन कितने सुहाने थे. मेरे चारों ओर बुद्धि प्रदीप्त सौंदर्य का एहसास पसरा हुआ था. इसी आत्मविश्‍वास के कारण मैं तनिक एकाकी हो गई थी. घर से दूर हॉस्टल में रहते हुए भी मैंने कभी भी स्वछंदता का लाभ नहीं उठाया था.
गीत-संगीत का शौक ही मेरे अकेलेपन का साथी था. मेरा शुरू से ही यह मानना था कि संगीत में जो कशिश है, वो न स़िर्फ तन्हाई को, बल्कि हर मुश्किल को दूर कर सकती है. संगीत से यह गहरा लगाव ही मुझे बेहद ख़ुश रखता था.

उन्हीं दिनों हमारी कक्षा पिकनिक पर गई. हरी-भरी पहाड़ियां, कल-कल बहता स्वच्छ झरना व पास ही दरी बिछा हम छात्र-छात्राएं संकोच से बतिया रहे थे. साथ में लाए टेप-रिकॉर्डर पर मधुर, पुराने फिल्मी गीत बज रहे थे. तभी किसी ने प्लेयर बंद कर दिया. एक सहपाठी के विषय में कहा गया कि वह बहुत अच्छा गाता है एवं क्यों न उससे ही कुछ सुना जाए.

“तेरी आंख के आंसू पी जाऊं…” यह गीत गाते हुए वह गौरवर्ण, सुदर्शन सहपाठी मेरी ओर ही क्यों देखे जा रहा था, यह मैं तब समझ नहीं पाई.

उस दिन के बाद हमारी मित्रता हुई, जो धीरे-धीरे असीम सुकोमल भावनाओं की डोर से हमें बांध गई. पहले प्यार ने हम दोनों को कुछ ऐसा छुआ कि कब साथ जीने-मरने का इरादा कर लिया, पता ही नहीं चला.

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मुहब्बत की इन भावनाओं के बीच हमारी पढ़ाई भी चल रही थी. एमबीबीएस के बाद मेरे उस सुख-दुख के सखा को सुदूर नगर स्नातकोत्तर शिक्षा के लिए जाना पड़ा.

वियोग के पल कितने निर्मम थे और कितने कठिन भी. तीन वर्ष पत्रों का आदान-प्रदान रहा. फिर समय की धुंध हमारे रिश्ते के बीच छा गई. धीरे-धीरे पत्रों का सिलसिला कम हुआ और फिर बंद ही हो गया. शायद माता-पिता की आज्ञानुसार वह विदेश चला गया.

बचपन से ही शरतचंद, टैगोर पढ़-पढ़कर पली-बढ़ी मैं उस प्रसंग को विस्मृत न कर सकी. सुगंधित पत्रों व जीवंत स्मृतियों का पिटारा अब भी पास था. शायद एक आस थी कि मेरे पहले प्यार की उन सुखद अनुभूतियों का एहसास उसे भी होगा और कहीं न कहीं उसके मन में भी वो तड़प, वो कशिश तो ज़िंदा होगी ही. नहीं जानती थी कि ये मेरा भ्रम था या हक़ीक़त… पर मैं बस उसकी यादों से बाहर नहीं निकलना चाह रही थी.

और आज… उस धुंध के आर-पार, समय की निष्ठुरता को ठुकराती, एक स्नेहिल आवाज़, टेलीफोन के माध्यम से फिर खनक उठी है,
“मैं सदैव के लिए तुम्हारे पास आ रहा हूं. मेरे मार्ग को अपने ख़ुशी के आंसुओं से सींचे रखना. मुझे पता है कि तुम ख़ुशी में भी ज़ार-ज़ार रोती हो.”

मुझसे पूछे बिना ही उसने जान लिया था कि मेरे नैनों में आज भी उसकी प्रतीक्षा के दीये जल रहे हैं. मेरा इंतज़ार, मेरा प्यार जीत गया था.
मेरी आस ग़लत नहीं थी… मेरी आंखों से सच में आंसू बहे जा रहे थे… पर ये ख़ुशी के आंसू थे, जिनमें ग़मों के सारे पल, जुदाई की सारी रातें और हिज्र के दिनों की सारी शिकायतें धुल गई थीं. अब हमारे दरमियान स़िर्फ प्यार था… बस प्यार ही प्यार…
ख़त्म हो गया था वो इंतज़ार!

– डॉ. महिमा श्रीवास्तव

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पहला अफेयर: हां, यही प्यार है! (Pahla Affair: Haan Yehi Pyar Hai)

Pyar Ki Kahani
पहला अफेयर: हां, यही प्यार है! (Pahla Affair: Haan Yehi Pyar Hai)

प्यार, इश्क़, मुहब्बत, लव, अफेयर… एक ही एहसास के न जाने कितने नाम हैं ये, लेकिन मुझे इस एहसास में डूबने की इजाज़त नहीं थी और न ही चाहत थी, क्योंकि मेरी शादी हो चुकी थी. यह बात अलग है कि मैं उस व़क्त शादी के लिए कतई तैयार नहीं थी. दरअसल, शादी की बातचीत के बीच ही जब मुझे यह पता चला कि लड़केवाले दहेज की मांग करने लगे हैं, तो एक नफरत-सी पाल ली थी मैंने उनके प्रति.

जब अपने होनेवाले पति को देखा, तो मन और भी खिन्न हो गया. सांवला-सा रंग, दुबला-पतला शरीर और उस पर दहेज की मांग. ख़ैर, जैसे-तैसे शादी हो गई. मैं इंकार भी नहीं कर पाई, क्योंकि जिस परिवार में पली-बढ़ी थी, वहां लड़कियों की इच्छा-अनिच्छा को महत्व नहीं दिया जाता था. उस पर पिताजी की आर्थिक स्थिति भी बहुत ज़्यादा अच्छी नहीं थी. पिताजी की इच्छा की ख़ातिर शादी तो मैंने कर ली थी, पर पहले ही दिन अपने पति को सब कुछ साफ़-साफ़ बता दिया कि मुझसे किसी भी तरह के प्यार या अपनेपन की उम्मीद न रखें. उन्होंने हंसकर जवाब दिया कि उम्मीद पर ही तो दुनिया कायम है और अपना बिस्तर अलग लगाकर वो सो गए.

मैं बहुत हैरान हुई, लेकिन मेरे मन में इतनी शिकायतें थीं कि मुझे उनकी हर बात पर चिढ़ होती थी और एक ये थे कि मेरी हर चिढ़ और गुस्से पर बेहिसाब प्यार उमड़ आता था इन्हें. हर बात को प्यार से समझाते, हर व़क्त इनके होंठों पर मुस्कान बिखरी रहती. बहुत संयमित और संतुलित व्यक्ति थे ये. मुझे अक्सर कहते कि कभी न कभी तो तुम मेरे प्यार को समझोगी और तुम भी मुझसे प्यार करने लगोगी.

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एक दिन इनकी मम्मी से मेरी थोड़ी कहा-सुनी हो गई थी और इन्हें भी मैंने दहेज मांगने का ताना दे दिया था. उस पर इन्होंने बताया कि जो भी पैसे दहेज के रूप में मिले, वो मेरे ही अकाउंट में जमा करवा दिए हैं. अपने मम्मी-पापा को वो उस व़क्त नहीं समझा सके थे कि दहेज लेना अपराध है, पर शादी के बाद उन्हें मना लिया.

मैं समझ ही नहीं पा रही थी कि क्या कहूं और क्या न कहूं? इन्होंने मुझे इतना प्यार दिया, इस तरह संभाला कि न कभी ज़ोर-ज़बर्दस्ती की, न कभी पति होने का हक जताया. इनके प्यार में पवित्रता की महक थी, कभी वासना की की गंध नहीं आई. मैं भूखी रहती, तो बच्चों की तरह खाना खिलाते. घर में कोई टीका-टिप्पणी करता, तो उन्हें भी समझाते कि नए परिवेश में घुलने-मिलने में व़क्त लगता है.

इनकी इसी सादगी, समझदारी और सबसे बढ़कर पवित्र प्यार ने मुझे जैसे अपनी और खींच लिया था. मैं हर व़क्त सोचती कि दुनिया में कोई इतना अच्छा और सच्चा कैसे हो सकता है? मैं वाकई ख़ुशनसीब हूं, जो ऐसा जीवनसाथी मुझे मिला, एक अजीब-सा आकर्षण महसूस करने लगी थी मैं इनकी ओर. सोचा था कभी इश्क़ नामक रोग नहीं लगेगा मुझे, मगर इनके प्यार के एहसास ने मुझे भीतर तक भिगो दिया था.

मेरा जन्मदिन था, इनके आने का इंतज़ार कर रही थी और अपने तोह़फे का भी. ये आए और मैं बस इननकी बांहों में सिमट गई. आंखों ही आंखों में बातें हुईं और मुझे मेरी पहली मुहब्बत का एहसास हुआ. मैं समझ गई कि हां, यही प्यार है! उस रात मैं संपूर्ण स्त्री बन गई थी.

आज सात साल हो गए, हमारे दो प्यारे-प्यारे बच्चे हैं. मैं परिवार में पूरी तरह से घुल-मिल चुकी हूं, लेकिन हमारे प्यार में अब भी वही पहले प्यार की महक और कशिश बरकरार है. सचमुच यही मेरा पहला प्यार था. मैं इनसे यानी अपने पति राजेश से बेहद प्यार करती हूं और मुझे अपने प्यार पर नाज़ है.

– देवप्रिया सिंह

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पहला अफेयर: तुम्हारा इंतज़ार है… (Pahla Affair: Tumhara Intezar Hai)

Pahla Affair, Tumhara Intezar Hai

Pahla Affair, Tumhara Intezar Hai

पहला अफेयर: तुम्हारा इंतज़ार है… (Pahla Affair: Tumhara Intezar Hai)

नयन, तुम मेरे दूर के एक रिश्तेदार, इस तरह मेरे दिल के सबसे क़रीबी शख़्स बन जाओगे, वो भी जीवन के 40 वर्ष पूरे होने के बाद, मैंने कभी सोचा भी न था. शादी के बाद पति-बच्चों का भरपूर प्यार मिला, पर तुमने तो जीवन में ऐसे प्रवेश किया कि लगा प्यार का एहसास ही अब जाकर हुआ.

कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि मेरे साथ ऐसा होगा… किसी को याद करते ही दिल की धड़कनों का बढ़ना, तेज़-तेज़ चहलक़दमी करना, झूले पर बैठकर आसमान निहारते रहना… इन सबके पीछे तुम थे नयन… इसका एहसास मुझे बहुत दिनों बाद हुआ कि क्यूं तुमसे फ़ोन पर बात करना इतना अच्छा लगने लगा था? क्यूं तुम्हारी पसंद के रंग के कपड़े पहनने की इच्छा होने लगी थी? क्यूं तुमसे बातों-बातों में तुम्हारी सारी पसंद-नापसंद को जान मैं उन्हें अपनाने लगी थी… शायद मुझे तुमसे प्यार हो गया था.

नयन, वो तुम्हारा फ़ोन पर ङ्गहेलोफ बोलना, ऐसी सिरहन पैदा कर देता था कि बस पूछो ही मत. तुम्हारा इतना केयर करना और हर वक़्त मेरी फ़िक्र करना मुझे अंदर तक छू जाता था. ऐसा क्यूं होता था कि मैं अपने दिल की हर बात तुमसे शेयर करती थी? क्यूं तुम मुझसे वही बात कहते, जो मेरे हित में हो? क्यूं मेरा मन अक्सर ये चाहता कि ख़ामोशी के हर पल में तुम्हारी मुहब्बत का ही एहसास हो? क्यों मेरा मन हर पल तुम्हारे ही साथ की ख़्वाहिश करता था और ये चाहता था कि कहीं दूर पहाड़ों की तलहटी में तुम्हारे साथ बैठकर आंखें बंदकर मौन रहकर सारी ज़िंदगी बिता दूं.

नयन, मैंने तुम्हारे अंदर भी ऐसे ही प्यार का उफान महसूस किया था, पर तुमने कभी कुछ नहीं कहा. मैंने लाख कोशिश की, पर तुम्हारी ज़ुबान तक वो बात ला न सकी.

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तुम बेशक मुझसे प्यार न करो, मैं कभी तुमसे इस बात के लिए ज़बरदस्ती नहीं करूंगी, पर नयन मेरा दिल ये मानने को तैयार नहीं, क्योंकि मैं जानती हूं कि तुम भी मुझसे प्यार करते हो. प्यार के इस पवित्र रूप से रू-ब-रू कराने के लिए मैं हमेशा तुम्हारी आभारी रहूंगी.
मुझे ख़ुशी है कि इस उम्र में ही सही, लेकिन इतना पवित्र प्यार मिला मुझे, जिसमें वासना के लिए कोई स्थान नहीं था, जिसमें स़िर्फ आत्मा का सुंदर मिलन था.

नयन, तुमने कभी मेरा किसी तरह से फ़ायदा नहीं उठाया, जबकि तुम मेरे सौंदर्य की हमेशा तारीफ़ करते थे. मेरी गृहस्थी की इतनी चिंता थी तुम्हें कि कहीं मैं जुनून में अपनी गृहस्थी बर्बाद न कर दूं, यही सोचकर तुमने मुझसे दूरी बना ली. मुझे आगे न बढ़ने को कहकर तुमने ये साबित कर दिया कि कितनी परवाह है तुम्हेें मेरी ज़िंदगी की.

तुम्हारी और मेरी मंज़िल एक नहीं, पर नयन, प्यार तो मैं तुमसे करती रहूंगी. मैं तुमसे पूछूंगी नहीं कि तुम्हें भी मुझसे प्यार है या नहीं, पर तुम्हारे उसी एक वाक्य ङ्गआई लव यू टूफ का मैं जीवनभर इंतज़ार करूंगी.

कौन कहता है कि प्यार की उम्र होती है? मैं कहती हूं कि नयन जैसा इंसान जिस किसी को भी मिलेगा, उसे उससे प्यार तो हो ही जाएगा. प्यार में उम्र का बंधन, छोटा-बड़ा होना, ये कहां मायने रखता है? प्यार तो बस हो जाता है. आज मैं एक ज़िम्मेदार गृहिणी हूं, पर नयन को प्यार तो हमेशा करती रहूंगी.

– ऊषा शर्मा

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