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कहानी- बु़ढ़ापे का जन्मदिन (Short Story- Budhape Ka Janamdin)

 

“बहुत अच्छी बात है आंटी. हम यही तो चाहते हैं कि आप लोग जीवन के हर पल का आनंद लें.” सभी महिलाएं चली गईं, रमाजी ने अंजना और सुधा को गले लगा लिया और बोलीं, “बु़ढ़ापे का जन्मदिन इतना बढ़िया रहेगा, मैंने तो कभी सोचा ही न था.” वहीं खड़े केशवजी, महेश और विनय सहित सब उनकी बात पर ज़ोर से हंस पड़े.

 Kahani

महेश के ऑफिस से आने पर कंगना उत्साहपूर्वक कहने लगी, “अच्छा है, कल शनिवार है, सुबह ही चलकर मां को सरप्राइज़ देंगे. महेश ने भी ख़ुश होकर कहा, “हां, हमेशा मां ने ही हमारा जन्मदिन ख़ूब उत्साह से मनाया है. अब हमारी बारी है.”

“महेश, क्यों न इस बार कुछ अलग करें. हमेशा फोन पर बधाई देकर या मां के लिए एक साड़ी ले जाकर दे देते हैं, बस हो जाता है मां का बर्थडे. दो दिन की छुट्टी है, चलो न, मां के लिए कुछ नया करते हैं.”

“ठीक है, सोचो कुछ.” महेश ने कहा, “ऐसा करो, सुधा दीदी से भी बात कर लो.”

“हां, यह ठीक रहेगा.” सुधा महेश से तीन साल बड़ी थी. अंजना ने तुरंत सुधा को फोन किया. अपनी इच्छा बताई, सुधा भी फ़ौरन तैयार हो गई. बोली, “बताओ, क्या करना है?”

“दीदी, पहले तो सब एक साथ मां के पास पहुंचते हैं. फिर उसके बाद कुछ प्लानिंग करते हैं. सरप्राइज़ पार्टी रखते हैं, बड़ा मज़ा आएगा.”

“हां, ठीक हैं, मिलते हैं कल सुबह.”

रमाजी का जन्मदिन था, बहू अंजना प्रोग्राम बनाने में जुट गई थी. रमाजी अपने पति केशवजी के साथ मेरठ में रहती थीं. महेश की गुड़गांव में पोस्टिंग थी. वह इंजीनियर था. सुधा अपने पति विनय और दो बच्चे समृद्धि और सार्थक के साथ पानीपत में रहती थी. अंजना ने रमाजी को फोन किया.

“मां, कैसी हैं आप, क्या हो रहा है?”

“कुछ नहीं, तुम लोग सुनाओ कैसे हो?

“हम सब ठीक हैं मां, पापा कहां हैं? उनका फोन नहीं लग रहा है.”

“यही हैं, बात करवाऊं?”

“हां मां,” अंजना ने केशवजी से कहा, “पापा, मां को मत बताना. कल सुबह हम सब पहुंच रहे हैं. कल पार्टी करेंगे. मां की फ्रेंड्स को भी बुलाएंगे.” केशवजी हां, हूं में बातें करते रहे.

रमाजी साथ ही बैठी थीं. अपनी तरफ़ से कुछ ख़ास बात वे कर नहीं पाए.

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सभी लोग शनिवार की सुबह दस बजे पहुंच गए. सबको देखकर रमाजी बहुत ख़ुश हुईं. बर्थडे की बधाइयां पाकर बोलीं, “तुम लोग इस उम्र में मुझे सरप्राइज़ दे रहे हो?” ख़ूब हंसी-मज़ाक हुआ. फिर रमाजी ने कहा, “चलो, एक सरप्राइज़ मैं भी दे देती हूं. तुम सब अच्छे समय पर आए. मैंने भी आज अपनी सहेलियों को बुलाया है.”

सबको झटका-सा लगा. बोले, “अरे, बर्थडे की पार्टी?”

“नहीं भई, घर पर ही चार बजे भजन-कीर्तन रखा है.” एक और झटका लगा सबको.

अंजना ने कहा, “भजन-कीर्तन? आज जन्मदिन पर?”

“और क्या, बुढ़ापे का जन्मदिन है, कीर्तन ही हो सकता है, छप्पन साल की हो गई मैं आज.”

सबके चेहरे लटक गए. एक मायूसी-सी छा गई. सबने ठंडी सांस भरी और चुपचाप बैठ गए. केशवजी ने कहा, “तुमने तो मुझे भी नहीं बताया?”

“आपको कौन-सा इन कीर्तनों में रुचि है? बताकर भी क्या होता. हमेशा ग़ायब हो जाते हो कीर्तन के समय. रिटायर होनेवाले हो, यह नहीं कि ईश्‍वर में कुछ ध्यान लगाएं.”

रमाजी को हमेशा की तरह शुरू होते देख केशवजी ने कहा, “नहीं भई, आज ग़ायब नहीं होऊंगा, बच्चे आए हैं और तुम्हारा जन्मदिन भी है.” सब मुस्कुराए. अंजना ने कहा, “पापा, आप मां के लिए क्या गिफ्ट लाए?” केशवजी अंदर गए और साड़ी लाकर रमाजी को दी. इस उम्र में भी शर्मीली आभा छा गई रमाजी के चेहरे पर. अंजना और सुधा ने भी अपनी लाई हुई साड़ियां और शॉल उन्हें दीं.

रमाजी बहुत ख़ुश हुईं. फिर सब किचन में लग गईं. दोपहर में जब रमाजी थोड़ी देर आराम करने लेटीं, तब एक कमरे में सब एक साथ बैठ गए. अंजना ने धीमे स्वर में कहा,

“मेरा तो सारा प्रोग्राम चौपट कर दिया मां के कीर्तन ने. सोचा था मां की सहेलियों को बुलाएंगे और पार्टी करेंगे, पर कैसे कुछ अलग करें अब?” फिर अचानक कहा, “क्यों न इस कीर्तन को ही पार्टी में बदल दें?”

सुधा ने कहा, “वो कैसे?”

समृद्धि और सार्थक बोले, “हां मामीजी, कुछ तो इंट्रेस्टिंग सोचिए. हम लोग कुछ गेम्स और बढ़िया स्नैक्स का इंतज़ाम करते हैं.”

सुधा ने कहा, “इतनी जल्दी कैसे होगा सब?”

महेश और विनय ने कहा, “इसकी चिंता मत करो. हम तीनों बाज़ार से सब तैयार स्नैक्स ले आएंगे, क्यों पापा?”

“हां, ठीक है, पर तुम्हारी मां की कोई सहेली डायबिटीज़ की मरीज़ है, तो किसी को आर्थराइटिस है. वो कहां खाएंगी या खेलेंगी.”

अंजना ने बहुत उत्साहित स्वर में कहा, “अब आप लोग सब मुझ पर छोड़ दीजिए.”

सुधा ने कहा, “अरे, कुछ बताओ तो, क्या सोचा है?”

“दीदी, आप देखती जाओ बस.”

तीन बजे से रमाजी कीर्तन में आनेवाली अपनी सहेलियों के बैठने की व्यवस्था में लग गईं. सब उनका हाथ बंटा रहे थे. रमाजी ने केशवजी की लाई हुई साड़ी ही पहनी, जिसमें वे बहुत अच्छी लग रही थीं. केशवजी, महेश और विनय चुपचाप अंजना की दी हुई लिस्ट लेकर बाज़ार निकल गए. रमाजी ने कहा, “देखा, फिर ग़ायब हो गए कीर्तन के समय.” अंजना और सुधा को हंसी आ गई.

धीरे-धीरे उनकी सब सहेलियां आती गईं और कीर्तन शुरू हो गया. दो-तीन सहेलियों के साथ उनकी बहुएं भी थीं, जो अंजना की हमउम्र थीं. अंजना और सुधा सबकी आवभगत में लग गईं. उनकी किसी भी सहेली को नहीं पता था कि आज रमाजी का जन्मदिन है. डेढ़ घंटा कीर्तन चला. सब प्रसाद लेकर उठने की तैयारी करने लगीं, तो अंजना ने कहा, “आप सबको बताना चाहती हूं कि आज मां का जन्मदिन है. भजन-कीर्तन तो हो गया, पर अब और भी कुछ प्रोग्राम है आप लोगों के लिए.”

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सब चौंकीं, फिर हंस पड़ी और ‘हैप्पी बर्थडे’ की आवाज़ों से ड्रॉइंगरूम गूंज उठा. रमाजी शरमाई-सी बहू-बेटी को स्नेह भरी नज़रों से घूर रही थीं. इतने में केशवजी बच्चों के साथ सामान से लदे-फदे पहुंच गए. रमाजी हैरान-सी उन्हें देखती रहीं. कई तरह की मिठाइयां, स्वादिष्ट स्नैक्स से प्लेटे सज गईं. केक लाते हुए अंजना ने कहा, “आइए मां, पहले केक काटिए.”

रमाजी ने कहा, “केक? मैं?” इस प्रोग्राम पर उनकी सहेलियां हैरान थीं और बहुएं तो बहुत ख़ुश थीं. सासू मांओं के साथ मजबूरी में कीर्तन में आने के बाद कुछ तो मनोरंजन हुआ. केक काटा गया. खाना-पीना हुआ, फिर अंजना बोली, “अब कुछ गेम्स भी खेलेंगे.”

उर्मिलाजी बोलीं, “अरे, ये कोई उम्र है गेम खेलने की? क्या बात करती हो बहू!”

“नहीं आंटी, भागना-दौड़ना नहीं है. बैठे-बैठे ही खेलना है.”

“क्या खेलना है?”

“आंटी, अंताक्षरी.” आशा की बहू सुमन बहुत ख़ुश हो गई, बोली, “मां, खेलो न, मज़ा आएगा.” अंजना ने सबको गोल घेरा बनाकर बैठा दिया. केशवजी, महेश और विनय नाश्ता-पानी के बाद बाहर टहलने चले गए, जिससे सब महिलाएं फ्री होकर खेलें. उन्हें कोई संकोच न हो. अंताक्षरी शुरू हुई, तो सब धीरे-धीरे अपनी उम्र के खोल से बाहर निकल आईं. फिर तो सुर-ताल को ताक पर रख हर कोई अपने-अपने राग अलापने लगा और पुराने हिंदी गानों का एक अलग ही ख़ूबसूरत समां बंध गया. समृद्धि और सार्थक ने तो वे गाने कभी सुने ही नहीं थे, लेकिन नानी को ख़ुश देखकर वे भी ख़ुश थे. तनु इधर-उधर बीच में घूमती रही.

अंताक्षरी में आख़िर तक राधाजी डटी रहीं. अंजना ने उन्हें एक गिफ्ट दिया फिर कहा, “अब हाउजी गेम खेलेंगे.” कुछ ने उत्साहित होकर कहा, “हां, हां बिल्कुल,” कुछ ने कहा कि उन्हें खेलना नहीं आता, तो अंजना और सुधा ने जल्दी से सबको समझा दिया, सब ख़ुश थीं और बिना भागदौड़ के यह खेल भी हो जाएगा. सब मन से खेलीं. लाइन और हाउस होने पर सबको छोटे-मोटे गिफ्ट्स भी मिलते रहे. सब पूरे जोश में थीं. सात बज चुके थे. समय का किसी को होश नहीं था. जब घरों से फोन पर फोन आने शुरू हुए, तो सबको जाने की सुध आई.

जब सब जाने लगीं, तो अंजना ने सबको गिफ्ट का छोटा पैकेट दिया. सबने अंजना और सुधा को ढेरों आशीर्वाद दिए. रमाजी बहुत ख़ुश थीं आज. जाते-जाते उर्मिलाजी ने कुछ झिझकते हुए कहा, “अगले महीने 10 तारीख़ को मेरे घर कीर्तन रख लेंगे.” रमाजी ने कहा, “कुछ ख़ास है क्या?” उर्मिलाजी शरमाते हुए बोलीं, “वो मेरा जन्मदिन है न. ऐसे ही कुछ अलग ढंग से कर लेंगे.” सभी ज़ोर से हंस पड़े, तो वे सकुचा गईं. अंजना ने कहा, “बहुत अच्छी बात है आंटी. हम यही तो चाहते हैं कि आप लोग जीवन के हर पल का आनंद लें.” सब चली गईं, रमाजी ने अंजना और सुधा को गले लगा लिया और बोलीं, “बु़ढ़ापे का जन्मदिन इतना बढ़िया रहेगा, मैंने तो कभी सोचा ही न था.” वहीं खड़े केशवजी, महेश और विनय सहित सब उनकी बात पर ज़ोर से हंस पड़े.

पूनम अहमद

पूनम अहमद

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कहानी- छुट्टी के दिन (Short Story- Chhutti Ke Din)

Hindi Short Story

बचपन की यही फांस तुषार के मन में कुछ इस तरह चुभी कि शायद उसने बचपन में ही प्रण कर लिया था कि बड़ा होकर वह अपने बच्चों की इच्छाओं की अवहेलना नहीं करेगा, फिर चाहे उसे छुट्टी के दिन घर में रहकर आराम करने को मिले या न मिले.

Hindi Short Story

मामला बड़ा भी था और छोटा भी. देवेन्द्रजी की दृष्टि में तो यह कोई ऐसा मामला था ही नहीं, जिस पर ध्यान देने का कष्ट करते. लेकिन उनके बेटे तुषार के लिए यह जीवन का अहम् प्रश्‍न था और सुधाजी के लिए यह एक ऐसी विडम्बना थी, जिसे जीते हुए उन्होंने सालों व्यतीत कर दिए. वे पिछले कई सप्ताह से महसूस कर रही थीं कि जब से उनके पति देवेन्द्रजी नौकरी से रिटायर हुए हैं, तब से घर का माहौल उखड़ा-उखड़ा-सा रहता है. एक अनजाना-सा तनाव घर के समूचे वातावरण पर छाया रहता है. और छुट्टी के दिन तो ये तनाव और भी बढ़ जाता है.

आज भी छुट्टी का दिन था. सुधाजी आज सुबह से मन-ही-मन प्रार्थना कर रही थीं कि कम-से-कम आज तो घर में शांति बनी रहे, लेकिन उनके इस प्रकार प्रार्थना करने से अगर कुछ होना होता, तो बहुत पहले हो चुका होता.

सुधाजी की आकांक्षा के विपरीत पिता-पुत्र में आज फिर झड़प हो गई.

हुआ यूं कि देवेन्द्रजी सुबह का नाश्ता करके अपनी आरामकुर्सी पर अभी बैठे ही थे कि उनका नन्हा पोता पराग उचकता हुआ आया और उनके गले लग गया. वे भावविभोर हो उठे. उन्होंने हुलसते हुए पूछा, “आज हमारा पराग सुबह-सवेरे अपने दादाजी से इतना लाड़ क्यों कर रहा है?’’ इस पर पराग ने उत्साह से भरकर जवाब दिया कि वह मम्मी-पापा के साथ चिड़ियाघर जानेवाला है. वह वहां बड़े-बड़े भालू देखेगा, शेर देखेगा और बहुत सारे जानवर देखेगा. पराग की बात सुन कर देवेन्द्रजी का मन ख़राब हो गया. उस पल उनके मन में बस एक ही विचार आया कि छुट्टी का दिन आया नहीं कि लाट साहब चले घूमने. श्रीमानजी से ये नहीं होता कि कम-से-कम छुट्टी के दिन तो घर बैठें और अपने बूढ़े बाप से कुछ बोले-बतियाएं.

लगभग हर छुट्टी के दिन यही होता. पराग या उसकी बहन पल्लवी अपने पिता तुषार से कहीं घूमने चलने की ज़िद करते और तुषार उनकी बात तुरन्त मान लेता. देवेन्द्रजी जब तुषार से कहते कि सप्ताह में छह दिन तो तुम और बच्चे दिनभर घर से बाहर रहते ही हो, अब कम-से-कम एक दिन तो घर में रह लिया करो. इस पर तुषार उत्तर देता कि यह एक दिन ही तो मिलता है बच्चों की इच्छा पूरी करने के लिए. देवेन्द्रजी यदि और कुछ कहते तो तुषार पटाक्षेप करने के अंदाज़ में जवाब देता, “पापा, आप नहीं समझेंगे.”

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इस पर देवेन्द्रजी भी तुनककर कहते, “हां-हां बेटा, मैं भला कैसे समझूंगा? मैं तो जैसे कभी बाप रहा ही नहीं और मैंने तो जैसे तुम लोगों की कोई इच्छा कभी पूरी की ही नहीं.”

तुषार झल्लाकर कह उठता, “प्लीज़ पापा, आप हमारा मूड ख़राब मत कीजिए.” तब सुधाजी को हस्तक्षेप करना पड़ता. वे देवेन्द्रजी को समझातीं कि यदि तुषार अपने बच्चों को घुमाना-फिराना चाहता है, तो वे क्यों परेशान होते हैं? लेकिन कुनमुनाते हुए वे कह उठते कि अब तुषार के लिए अपने बीवी-बच्चे ही सब कुछ हो गए और ये बूढ़ा बाप कुछ नहीं रहा? उनका यह कटाक्ष सुनकर सुधाजी की इच्छा होती कि वे उन्हें याद दिलाएं कि किसी समय उनके लिए छुट्टी के दिन का आराम ही सब कुछ होता था और बच्चों की इच्छाएं कोई अहमियत नहीं रखती थीं. जब कभी तुषार, तनय या तन्वी उनसे कहीं घूमने चलने का आग्रह करते, तो वे बिगड़ कर कहते कि ये एक ही दिन तो मिलता है आराम करने के लिए, मैं कहीं नहीं जाऊंगा. यदि तुम लोगों को जाना ही हो, तो अपनी मां के साथ चले जाओ. सवाल एक दिन की छुट्टी का नहीं रहता, दो-तीन दिन की छुट्टियों में भी उनका यही बहाना रहता. देवेन्द्रजी को कभी इस बात का ख़याल नहीं आता कि वे ज़रूर द़फ़्तर के कारण सप्ताह में छह दिन घर से बाहर रहते हैं, लेकिन सुधाजी को तो यही छह दिन घर में कैद रह कर बिताने पड़ते हैं. ज़्यादा होता तो वे सुधाजी से कह देते, “अकेली घूम आया करो.”

अकेले घूमना तो पुरुष भी पसन्द नहीं करते हैं, फिर पागलों जैसी वे अकेली कहां घूमतीं?

जब तक तीनों बच्चे स्कूल जाने लायक नहीं हुए, तब तक सुधाजी और बच्चे छुट्टियों में घर पर ही रहते थे. जब बच्चों ने स्कूल जाना शुरू किया और उन्हें जब अपने सहपाठियों से विभिन्न स्थानों के बारे में रोचक बातें सुनने को मिलतीं, तो उनका मन भी ऐसे स्थानों पर जाने के लिए उत्सुक हो उठता. सुधाजी भी सोचतीं कि बाहर नहीं तो कम-से-कम शहर और उसके आस-पास के दर्शनीय स्थल तो बच्चों को दिखाए ही जा सकते हैं. किन्तु देवेन्द्रजी के पास वही एक उत्तर रहता कि मैं अपनी छुट्टी ख़राब नहीं कर सकता, तुम लोगों को जाना हो तो जाओ.

देवेन्द्रजी की बात सुनकर तुषार सहित तीनों बच्चे उदास हो जाते. तब सुधाजी तीनों बच्चों को लेकर निकल पड़तीं. बचपन की यही फांस तुषार के मन में कुछ इस तरह चुभी कि शायद उसने बचपन में ही प्रण कर लिया था कि बड़ा होकर वह अपने बच्चों की इच्छाओं की अवहेलना कभी नहीं करेगा, फिर चाहे उसे छुट्टी के दिन घर में रहकर आराम करने को मिले या न मिले. मां ने भले ही साथ दिया, लेकिन छुट्टियों में घूमते-फिरते समय अपने पिता की अनुपस्थिति उसके दिल को हमेशा सालती रही. आज यह बात उसने देवेन्द्रजी से लगभग कह डाली. तभी से वे बहुत उदास थे.

सुधाजी तुषार के मन की इस फांस को जानती थीं, किन्तु उन्हें लगता कि वे इस बारे में देवेन्द्रजी से कुछ बोलेंगी, तो उन्हें बुरा लग जाएगा. मगर आज देवेन्द्रजी के चेहरे की उदासी इतनी गहरी थी कि उन्होंने उसके बारे में उनसे खुलकर बात करने का फैसला कर लिया. वे जैसे ही देवेन्द्रजी के निकट पहुंचीं, वे आहत स्वर में बोल उठे, “अपने बच्चों के लालन-पालन में मैंने कहां कमी रखी सुधा?”

इस पर वे बोलीं, “अपने बच्चों के लालन-पालन में आपने कोई कमी नहीं रखी, लेकिन उनकी बालसुलभ इच्छाओं की अनदेखी अवश्य हुई. आपको तो गर्व होना चाहिए कि हमारा बेटा तुषार हमारी ग़लती को दोहरा नहीं रहा है.”

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देवेन्द्रजी एक पल को चुप रहे, फिर उन्होंने सुधाजी की बात स्वीकार करते हुए कहा, “तुम ठीक कहती हो, लेकिन ये ग़लती हम दोनों की नहीं, स़िर्फ मेरी थी और आज मुझे अपनी उस ग़लती का एहसास हो रहा है, जिसने मुझे आज अकेलेपन के दरवाज़े पर ला खड़ा किया है.”

इस पर सुधाजी मुस्कुराती हुई बोल उठीं, “लीजिए, ये आपकी दूसरी भूल होगी जो आप सोचेंगे कि आप अकेले हैं. अरे, मैं आपके साथ हूं, बच्चे आपके साथ हैं. बस, ज़रूरत है तो इतनी कि अब आप भी हम सबके साथ हो लीजिए.”

सुधाजी की बात सुनकर देवेन्द्रजी ने पलभर विचार किया और फिर बोल उठे, “तुम ठीक कहती हो सुधा. जाओ तुषार से कह दो कि हम भी चिड़ियाघर देखने चलेंगे.”

पता नहीं कैसे नन्हें पराग ने यह बात सुन ली और वह ख़ुशी से चिल्लाने लगा, “हुर्रे… दादाजी साथ चलेंगे, दादाजी साथ चलेंगे.”

ये सब देख-सुनकर सुधाजी ने चैन की सांस ली और बोलीं, “चलो, देर से ही सही इन्होंने सच को स्वीकारा तो!”

यही जीवन का यथार्थ है, कई बार जिन बातों को हम अपने जीवन में महत्वहीन समझकर अनदेखा करते चले जाते हैं, वही बातें हमारे ही जीवन में हमें महत्वहीन बनाने का षड्यंत्र रचती रहती हैं और हमें पता भी नहीं चलता. वे अब आश्‍वस्त थीं कि अब किसी भी तनाव या टकराव के बादल उनके घर पर नहीं छाएंगे और पिता-पुत्र भी आपस में मिलजुल कर प्यार से रहेंगे.

– डॉ. सुश्री शरद सिंह

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कहानी- परख (Short Story- Parakh)

अंकी की परख क्षमता पर उसे हमेशा संदेह रहा है. उसके लिए गए फैसले को वह अजीबो-ग़रीब और दुनिया से अलग मानकर टोकती थी. आज अंकी की दूरदर्शिता और परख ने, मंज़िल पाने के लिए सब कुछ दांव पर लगानेवाले जज़्बे ने वह सब कुछ दिया, जिसकी वह हक़दार थी. जिसके सपने वंदना ने बेटी के लिए देखे थे.

Kahaniya

“वंदना, ओ वंदना, कहां हो भई?” केतन की चहकती आवाज़ को वंदना नज़रअंदाज़ नहीं कर पाई. हाथ में पकड़ा हुआ चाय का पतीला वहीं रखकर भागी आई.

“क्या हुआ?”

“अरे भई, कुछ मीठा बनाओ, तो एक ख़ुशख़बरी सुनाऊं.” वंदना की उत्सुकता से ताकती नज़रों को और इंतज़ार नहीं करवाया केतन ने… हंसकर बोल दिया, “बधाई हो, एनआरआई को अपना दामाद तो नहीं बना पाई, पर हां, बेटी-दामाद ने कनाडा जाने की तैयारी कर ली है.”

“क्या…? मतलब शोभित का सिलेक्शन…” हर्ष से चहकती वंदना की आवाज़ में कंपन था.”

“भई उसके सोशल नेटवर्किंग साइट पर तो कुछ ऐसा ही लिखा है. एक-दो बधाई के कमेंट भी आ गए हैं. क़रीब दस मिनट पहले की पोस्ट है.”

“इसका मतलब है पूरी दुनिया को पता है, स़िर्फ हमें ही नहीं बताया है अंकी ने… कहीं उस दिन की बात से नाराज़ तो नहीं?” वंदना के स्वर में आशंका थी. “केतन ज़रा उससे बात करो फोन पर…” कहते हुए वंदना ने पलटकर केतन को देखा, तो वह फोन कान में लगाए बैठे थे.

“शोभित फोन नहीं उठा रहा है और अंकी का व्यस्त आ रहा है. क्या करें? घर चलें क्या?” “नहीं, अभी कुछ देर इंतज़ार कर लेते हैं.”

“मुझे लगता है कि हम लोगों को अंकी ख़ुद ही बताएगी. इंतज़ार कर लो.” केतन को अभी भी इत्मीनान था. पर वंदना कुछ और ही सोच रही थी… छह महीने पहले अंकी और शोभित घर आए थे, तो खाना खाते वक़्त कैसे अंकी ने यह बोलकर कि शोभित तुम ये जॉब छोड़कर फेलोशिप की तैयारी करो. वंदना की सांस अटका दी थी. अंकी की बात पर वंदना ने नाराज़गी जताते हुए लगभग अंकी को डांट दिया था. “मम्मी, मैंने ही इसे एमएस रिसर्च के लिए टोरेंटो यूनिवर्सिटी जाने का आइडिया दिया है. शोभित को मेरा सुझाव अच्छा लगा है, पर इसके लिए थोड़ा रिस्क तो लेना होगा. अगर ऐसा हुआ, तो उसका और मेरा फ्यूचर सिक्योर हो जाएगा.” वंदना शोभित के सामने बात बढ़ाना नहीं चाहती थी. ख़ुद को भरसक सामान्य दिखाते हुए बोली, “अभी खाना एंजॉय करो, बाद में सोचना.”

“सच मम्मी, मलाई-कोफ्ते बहुत अच्छे बने हैं, बिल्कुल अवॉर्ड-गिविंग हैं.” शोभित की चुहल माहौल में गर्मी नहीं ला पाई. मौक़ा देखते ही वंदना ने अंकी को आड़े हाथों लिया.

“आजकल के बच्चे शादी और करियर जैसी चीज़ों को गंभीरता से नहीं लेते हैं.”

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“ओ मम्मी प्लीज़…! अब इसमें सीरियस होने की क्या बात है. सीरियस होने से क्या काम बन जाएगा? अब शोभित कनाडा जाना चाहता है, तो रिस्क तो उठाना पड़ेगा. ऐसे में मैं हेल्प नहीं करूंगी, तो कौन करेगा? फिर उसके साथ मेरा भी फ़ायदा है. बाद में मैं भी ऐश करूंगी. अभी तो मेरा जॉब है. फाइनेंशियल सिक्योरिटी भी है.”

“बस कर अंकी, दुनिया क्या कहेगी कि अभी-अभी शादी हुई है और नौकरी भी…” “मम्मी, शादी से पहले तो आप बड़ी-बड़ी बातें करती थीं कि अपने पति को सपोर्ट करना, एडजस्ट करना… आपकी जनरेशन की बस यही प्रॉब्लम है कि सलाह पर अमल करो, तो प्रॉब्लम, न करो, तो प्रॉब्लम…” अंकी की बात पर वंदना नाराज़ हो गई थी. फिर कई दिनों तक मां-बेटी में कोई बातचीत नहीं हुई. केतन से अंकी का हालचाल मिलता था.

आख़िर जिसका डर था, वही हुआ. शोभित ने नौकरी छोड़ दी थी. एकाध बार शोभित की मम्मी से बात हुई, तो वो भी संकोच से सफ़ाई दे डालती थीं, “शोभित के पापा की पेंशन से घर आराम से चलता है. फिर जैसे पहले शोभित पढ़ता था, वैसे अभी भी पढ़ रहा है और रही बात अंकी की, तो उसने तो बेटी की कमी पूरी कर दी है.” वंदना सुन तो लेती, पर उसे कोफ़्त होती. रिश्तेदारों के संपर्क में भी कम ही आती. कौन जाने कब कोई पूछ ले… शोभित की नौकरी छूटनेवाली बात. केतन सुनते, तो वंदना की बात सुधारते.

“नौकरी छूटी नहीं है, उसने ख़ुद छोड़ दी है, ताकि जीवन में आगे बढ़ सके.” वंदना की समझ में नहीं आता कि जब विदेश जाने का शौक़ था, तो अच्छा भला एनआरआई लड़का क्यों नकारा अंकी ने, फोन पर ही बात हुई और फिर उससे

मिलने को भी तैयार नहीं हुई. कहने लगी, “लड़के में सुपीरियोरिटी का एहसास है.” अब एनआरआई है, तो यह एहसास तो होगा ही और हमें भी तो गर्व महसूस होगा कि लड़की विदेश में ब्याही है. पर अंकी ने यह कहकर सबको चुप करा दिया कि वो शादी अपने लिए कर रही है, किसी को दिखाने के लिए नहीं… उसके बाद वो इंजीनियर लड़का, उससे मिलकर आई तो बोली, “उसके कोई फ्यूचर प्लान्स नहीं हैं. कुछ कर दिखाने का जोश नहीं है.” जबकि यह लड़का नंदिता बुआ ने देखा था और बताया था कि पुश्तैनी जायदाद काफ़ी है, तो बोली “जब सब कुछ रेडीमेड मिला, तो लाइफ में क्या एडवेंचर होगा. अपनी तरफ़ से उदासीन है, तो मेरी जॉब को क्या महत्व देगा.” न जाने कितने लड़के देखे गए, पर बात न बननी थी, सो न बनी. महीनों घर में शांति बनी रही, फिर आया शोभित का रिश्ता. “मध्यमवर्गीय परिवार का बड़ा साधारण-सा लड़का लगता है. हमारी अंकी इसे क्या पसंद करेगी और सच पूछो, तो मुझे भी इस लड़के में कुछ ख़ास नहीं लगता है. एक ही तो लड़की है अपनी, साधारण परिवार न… न…” पर जोड़ियां ऊपर से ही बन के आती हैं, तभी तो अंकी न केवल शोभित से मिली, बल्कि इस रिश्ते के लिए हां भी कर दी. “अंकी ऐसा क्या है इस लड़के में?”

“मम्मी कुछ तो बात है.”

“पर तुम तो टॉल लड़का चाहती थी न…”

“अरे मम्मी, वो पुरानी बात है. मुझे शोभित की फैमिली अच्छी लगी. उसकी मम्मी समझदार लगीं, बनावटीपन नहीं है उनमें और पापा शोभित से फ्रेंडली हैं. ऐसे में कम्यूनिकेशन गैप नहीं रहेगा. शोभित की एक बात अच्छी लगी कि उसकी कोई स्ट्रॉन्ग पसंद-नापसंद नहीं है. लाइफ के प्रति अप्रोच काफ़ी फ्लेक्सिबल है. ऐसे में एडजस्टमेंट में प्रॉब्लम नहीं होगी.” अंकी की बातें सुनकर वंदना दंग रह गई. आजकल के बच्चों की न जाने कौन-सी फिलॉसफी काम करती है. वंदना ने अंकी को समझाया था. “देख अंकी, परिवार बहुत साधारण है.”

“मम्मी, साधारण परिवार को ख़ास तो उस घर के बच्चे ही बनाते हैं और शोभित के फ्यूचर प्लान बहुत अच्छे हैं.” अंकी की इस बात ने सबको चुप करा दिया. “कॉलबेल की लगातार आती आवाज़ ने वंदना को विचारों के भंवर से खींचा. जब तक वो उठती, केतन ने दरवाज़ा खोल दिया था. अंकी ख़ुशी के मारे वंदना से लिपटी हुई थी. शोभित केतन के पैर छू रहा था. “इतनी बड़ी ख़ुशख़बरी है और हमें पता ही नहीं.” वंदना की बात पर अंकी बोली, “कैसे पता चलेगा, फोन तो आप लोग उठाते नहीं हो. पापा का स्विच ऑफ आ रहा है और आपका फोन बज-बजकर थककर सो गया पर्स की किसी पॉकेट में…” अंकी की बात पर सभी हंस पड़े.

“अरे! सच में दस मिस्ड कॉल्स हैं.” पर्स को टटोलकर फोन निकालती हुई वंदना बोली. ख़ुशी के मारे उसे ही सूझ नहीं रहा था कि घर आए बेटी-दामाद को क्या खिलाए. रसोई की ओर बढ़ती वंदना को अंकी ने रोक लिया. “मम्मी, आप और पापा बस जल्दी से तैयार हो जाओ, आज का डिनर शोभित की तरफ़ से है.” जल्दी-जल्दी तैयार होकर केतन और वंदना उन दोनों के बताए रेस्टोरेंट पर पहुंचे, तो वहां अंकी को जींस और कुर्ती में देखकर वंदना कुछ सकुचा-सी गई. अंकी की सास सुलभा को ध्यान से देखा, तो उसे कोई शिकन नज़र नहीं आई. वंदना को याद आया, अंकी की शादी के एक हफ़्ते बाद वो उससे मिलने गई थी. वहां अंकी को सिर पर लिया दुपट्टा संभालते देख उसे तकलीफ़ हुई, तो वह सहसा बोल पड़ी थी, “अंकी ये पल्लू लेने का रिवाज़ अब पुराना हो गया है. अब इसे बदल डाल और हां अभी से सबकी आदत ऐसी मत डाल कि बाद में तेरे बदलने से कोई क्लेश हो. जैसी है, वैसे ही रहा कर.”

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“ओहो  मम्मी, आप  कुछ  समझती  नहीं  हो. घर  पर ताऊजी हैं. अभी नई-नई तो शादी हुई है मेरी… करना पड़ता है मम्मी…”

वंदना को एकबारगी झटका लगा कि क्या हो गया है इस लड़की को. पहले कैसे बोलती थी, “जो मेरी मर्ज़ी होगी, वो पहनूंगी…” ऐसे में अक्सर वंदना उसे एडजस्टमेंट की घुट्टी पिलाकर बोला करती थी और अब…

अंकी अभी बोल रही थी, “थोड़ा एडजस्टमेंट ज़रूरी है न मम्मा… तो देखो ये एडजस्मेंट है.” अपने पल्लू की ओर इशारा करते हुए बोली. “मम्मी, कहां खो गईं आप? शोभित पूछ रहे हैं क्या लेंगी?”

“सुलभाजी, आप बताइए.” वंदना तुरंत मेन्यू कार्ड सुलभा की ओर बढ़ाते बोली, तो उन्होंने भी ये ज़िम्मेदारी अंकी  के ऊपर डालते हुए कहा, “आज तो हम अपनी बहू की पसंद का डिनर लेंगे.”

“ये दोनों मम्मी कुछ भी नहीं बतानेवाली हैं. हमें ही डिसाइड करना पड़ेगा.” डिनर के बाद स्वीट डिश में आइस्क्रीम विद गुलाब जामुन के साथ कुल्फी आई, तो वंदना का मन तरल हो आया. अंकी जानती थी कि वंदना को कुल्फी बहुत पसंद है. वहीं सुलभाजी अपना दुलार अंकी पर यह कहकर बरसा रही थीं कि बड़े दिनों के बाद आइस्क्रीम के साथ गुलाब जामुन खाने को मिला है. खाना खाने के बाद सुलभा और तरुणजी आग्रह करके केतन व वंदना को कॉफी पिलाने के बहाने घर ले आए. रात को चलने का समय आया, तो अंकी ने इसरार करते हुए कहा, “मम्मी, आज आप यहीं रुक जाओ न…” सुलभाजी ने अंकी की तरफ़दारी करते हुए कहा, “वंदनाजी आप रुक जाइए. कुछ दिनों में ये दोनों तो कनाडा चले जाएंगे, ऐसे में हम लोगों को ही एक-दूसरे का साथ निभाना है. रात को ढेर सारी बातों के बीच में सुलभाजी ने बेहिचक कहा, “अंकी जैसी बहू पाकर हमारी बेटी की कमी पूरी हो गई. बड़ी हिम्मत से इसने शोभित को फेलोशिप के लिए कनाडा जाने का रास्ता निकाला है, वरना इसके नौकरी छोड़ने से हम भी बहुत घबराए थे. लोगों से आंख मिलाना मुश्किल था कि बहू तो नौकरी कर रही है और बेटा नौकरी छोड़े बैठा है, पर इन बच्चों का बैठाया गणित सही निकला.” सुलभा भावुक हो गई, तो अंकी ने प्यार से उनका हाथ अपने हाथ में ले लिया. यह देख वंदना मुस्कुरा पड़ी. वो भी अंकी और शोभित पर भरोसा कहां कर पाई थी.

अगले दिन सुबह चलते समय शोभित ने वंदना और केतन के पांव छुए. अंकी ने वंदना के गले लगते हुए कहा, “अब तो आप ख़ुश हैं न मम्मा?” प्रश्‍न के जवाब में वंदना की आंखें भर आईं, तो अंकी झट से बोली, “अब आप सेंटी मत हो जाओ.” रास्ते भर वंदना चुप रही. अंकी ने जो कहा वो करके दिखाया था. पिछले दिनों वह कितने तनाव में रही थी. घर पर उसे सोच में डूबा देखकर केतन ने मज़ाक किया, “भई डिनर तो बेटी और दामाद ने करवाया, ब्रेकफास्ट बेटी की ससुरालवालों ने, अब दोपहर का खाना बनाओगी या वो भी…” बात अधूरी छोड़कर केतन हंसने लगे, तो वंदना के होंठों पर भी मुस्कान आ गई. रसोई की ओर बढ़ी, तो जैसे कल शाम को छोड़ गई थी, वैसी ही पड़ी थी. कॉलबेल की आवाज़ पर वह

फुर्ती-से दरवाज़े की ओर बढ़ी. सामने कम्मो को देखकर तत्परता से बोली, “जल्दी अंदर आ, तुझे ही याद कर रही थीं.”

“अरे आप बिना बताए कहां चली गई थीं? कल शाम से तीन चक्कर लगा चुकी हूं.”

“कम्मो, दामाद बाबू और अंकी बिटिया कनाडा जा रहे हैं.” कम्मो का खुला मुंह देखकर उसने बात स्पष्ट की, “अरे विदेश…” कम्मो वंदना के चेहरे की ख़ुशी पढ़कर भांप चुकी थी कि कोई बड़ी ख़ुशख़बरी है. बस मौ़के को गंवाना

उसे समझदारी नहीं लगी, झट से बोल उठी, “अंकी दीदी से तो मोबाइल लूंगी.” उसकी इस मांग पर आशा के विपरीत वंदना हंसकर बोली, “अरे, जाने तो दे पहले उन लोगों को…” कम्मो बोल रही थी, “भाभी बड़े भाग से अंकी बिटिया को इतनी भली ससुराल और लड़का मिला.” शोभित से शादी करके अंकी ख़ुश थी, उसे ख़ुश देखकर वंदना और केतन ख़ुश थे. पर अब ऐसा लग रहा है कि शोभित और उसकी फैमिली से बेहतर अंकी के लिए चुनाव नहीं हो सकता था. आज सबके चेहरों पर छाया उल्लास वंदना के जी को भिगो गया था. जिस अंकी पर वो जल्दबाज़ और लापरवाह होने का आरोप लगाती थी, वो तो कहीं ज़्यादा मज़बूत इच्छाशक्ति और सार्थक निर्णय लेनेवाली साबित हुई. अपनी ही बेटी को वो पहचान नहीं पाई. जिन संस्कारों और नियमों की पोटली वह शब्दों के रूप में उसके आंचल से बांधना चाहती थी, उन्हें तो अंकी ने व्यवहार में सहज रूप से ऐसे ढाला कि वो जान ही नहीं पाई. अंकी की परख क्षमता पर उसे हमेशा संदेह रहा है. उसके लिए गए फैसले को वह अजीबो-ग़रीब और दुनिया से अलग मानकर टोकती थी. आज अंकी की दूरदर्शिता और परख ने, मंज़िल पाने के लिए सब कुछ दांव पर लगानेवाले जज़्बे ने वह सब कुछ दिया, जिसकी वह हक़दार थी. जिसके सपने वंदना ने बेटी के लिए देखे थे. आज अंकी उसे सयानी लगी ही थी कि केतन ने आवाज़ देकर

उसे विचारों के भंवर से बाहर निकाल लिया. केतन पूछ रहे थे, “ये ऊनी कपड़े बाहर क्यों निकाले हैं?” वंदना बोल रही थी…

“अंकी के ऊनी कपड़े धूप में डाल देती हूं, वहां का मौसम तो ठंडा होगा. इस लड़की को तो होश भी नहीं है कि वहां कितनी ठंड पड़ती है. जाने कैसे रहेगी वहां…” केतन वंदना की बात को हंसी में उड़ाकर कुछ कहना चाहते थे, पर ये सोचकर चुप रह गए कि अंकी कितनी भी सयानी हो जाए, पर वंदना उस पर लापरवाह होने का आरोप लगाती रहेगी और शायद यही ख़ूबसूरती है मां-बेटी के रिश्ते की. केतन को अपनी तरफ़ मुस्कुराते हुए देखने पर वंदना ने पूछा, “क्या हुआ?” तो केतन ने कुछ नहीं का इशारा करके अख़बार से अपने चेहरे के भाव छिपा लिए.

Meenu tripathi

   मीनू त्रिपाठी

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कहानी- बकेट लिस्ट (Short Story- Bucket List)

सरसरी नज़रों से कॉपी के पन्ने पलटती नीरा को कहीं कुछ अस्वाभाविक-सा लगा, तो उसके हाथ एक पल को थम गए और फिर विपरीत दिशा में पन्ने पलटने लगी. हर बार वास्तविक व्यय अनुमानित व्यय से अधिक? कुछ अनुमानित व्यय बरसों से सूची में बने हुए? पर उन पर कभी व्यय ही नहीं? और फिर यकायक वे व्यय सूची से एकदम विलुप्त हो गए?

Kahaniya

रचित को देर रात की फ्लाइट से यूएस रवाना करने के बाद सवेरे नीरा की आंख देर से खुली. लंबा वीकेंड है, तो सारे पेंडिंग काम निबटा डालती हूं. सारे बिखरे कपड़े, बिस्तर आदि ठिकाने लगाने के बाद उसने अपने लिए कॉफी बनाई और लॉबी में आ बैठी. कॉफी की चुस्कियां भरते-भरते उसकी नज़रें टेबल के नीचे रखे कार्टन पर जा टिकीं.

“ओह! इसका भी तो निबटारा करना है. अभी पगफेरे के समय मायके से लौटते व़क्त वह अपनी बैंकिंग की सारी पुस्तकें इस कार्टन में समेट लाई थी. रचित को यूएस में बहुत अच्छी जॉब मिल जाने से वह शादी के कुछ समय बाद ही जॉइन करने चला गया था. हनीमून के तौर पर नीरा की ऑस्ट्रेलिया टूर की इच्छा भी उसने दिसंबर की छुट्टियों में पूरी करने का वादा किया था. नीरा भी बहुत जल्दी वहां नौकरी तलाश कर उसे जॉइन करनेवाली थी. इसके लिए उसे कुछ जॉब इंटरव्यू और परीक्षाएं आदि देनी थीं, जिनके लिए वह मायके से अपनी सारी किताबें समेट लाई थी. मम्मी ने टोका भी था, “जो चाहिए वे ही ले जा, बेकार क्यों बोझा घसीट रही है?”

“मम्मी, इतना समय कहां है अभी मेरे पास? रचित को रवाना करने के बाद फ्री टाइम में काम की किताबें छांटकर रख लूंगी, बाकी वहीं रद्दी में दे दूंगी.”

कॉफी का मग रखकर नीरा ने कार्टन खींच लिया था और एक-एक किताब निकालकर देखने लगी. “हूं, कुछ तो ये ही काम आ जाएंगी. बाकी नई ऑर्डर कर दूंगी. नोट्स से भी काफ़ी पॉइंट्स कवर हो जाएंगे… अरे, यह कॉपी कैसी है? पापा की बनाई लगती है.”

नीरा को याद आया. वह और उसका छोटा भाई नलिन जब अगली कक्षा में आ जाते थे, तो पापा उनसे पुरानी कॉपी-किताबों की रद्दी छंटवाते थे. उस समय कॉपियों के खाली बचे पेज वे उनसे फड़वाकर अलग करवा लेते थे. “इन सबको सिलकर तुम दोनों के लिए नई रफ कॉपियां बन जाएंगी.”

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“क्या पापा, अब मैं बड़ी क्लास में आ गई हूं. मैं नहीं लूंगी ऐसी कॉपी. सहेलियां मज़ाक बनाती हैं.”

“अरे! इसमें क्या हो गया? खाली पेज हैं. व्यर्थ क्यों इन्हें रद्दी में देना. कितने पेड़ कटते हैं, तब ये पृष्ठ बनते हैं. किफ़ायत और कंजूसी दो अलग-अलग चीजें हैं.” प्रतिष्ठित प्रशासनिक अधिकारी, लेकिन बेहद ईमानदार और सिद्धांतवादी पापा सादा जीवन और उच्च विचार में विश्‍वास रखते थे.

यादों के अलबम के पृष्ठ पलटती नीरा अनायास ही हाथ में थामी कॉपी के पृष्ठ पलटने लगी. यह तो पापा की हस्तलिपि लगती है. ओह! इसमें तो बरसों पुराने

हिसाब-किताब लिखे हैं. हर माह का अनुमानित व्यय औेर फिर उसके सामने वास्तविक व्यय का क्रमबद्ध विस्तृत ब्योरा. नीरा को हंसी आ गई. पापा भी न, इतना व्यस्त रहते हुए भी जाने कैसे-कैसे बेकार के कामों के लिए व़क्त निकाल लेते हैं. उसे भी तो हमेशा से कहते आ रहे हैं, विशेषकर जब से वह यहां मुंबई आकर नौकरी करने लगी है.

“बेटी, हिसाब-किताब लिखकर रखना बहुत अच्छी आदत है. माना तेरा बहुत बड़ा पैकेज है, पर उस हिसाब से महानगर के ख़र्चे भी तो बड़े हैं. अनुमानित व्यय और वास्तविक व्यय लिखती रहोगी, तो तुम्हें पता रहेगा कि कहां पैसा व्यर्थ ख़र्च हो रहा है और उस पर कैसे लगाम कसनी है? कहां निवेश करना है? कहां कटौती करनी है? बूंद-बूंद से ही घड़ा भरता है और अगर घड़े के पेंदे में मामूली-सा सुराख़ हो जाए, तो ऊपर से कितना ही पानी भरते रहो, एक न एक दिन उसे खाली होना ही है.” पापा समझाते रहते, लेकिन नीरा यह सोचकर कि उससे यह सब नहीं होनेवाला एक कान से सुनकर दूसरे से निकाल देती.

सरसरी नज़रों से कॉपी के पन्ने पलटती नीरा को कहीं कुछ अस्वाभाविक-सा लगा, तो उसके हाथ एक पल को थम गए और फिर विपरीत दिशा में पन्ने पलटने लगी. हर बार वास्तविक व्यय अनुमानित व्यय से अधिक. कुछ अनुमानित व्यय बरसों से सूची में बने हुए, पर उन पर कभी व्यय ही नहीं. और फिर यकायक वे व्यय सूची से एकदम विलुप्त हो गए? पहेली सुलझाने के लिए नीरा कॉपी में घुस-सी गई और थोड़ा-सा विश्‍लेषण करने पर ही कारण सामने आ गया. नीरा सिर थामकर बैठ गई. घूमने-फिरने और शॉपिंग की शौकीन नीरा लाड़ से अधिकार जताते हुए प्रतिवर्ष कम से कम एक बाहर की ट्रिप तो प्लान करवा ही लेती थी. विदेश यात्रा नहीं, तो अपने देश में ही कहीं… नीरा के पास हर तरह की आइटिनररी मौजूद रहती. नीरा के इसी जुनून के सौजन्य से पूरा परिवार स्पेन, पेरिस, दुबई, गोवा, कश्मीर आदि जगह घूम चुका था, लेकिन नीरा की बकेट लिस्ट में कुछ न कुछ जुड़ता ही जाता.

आधुनिक पोशाकों से नीरा की वॉर्डरोब भरी रहती, लेकिन फिर भी उसकी उंगलियां ऑनलाइन नई ड्रेस तलाशने को लालायित रहतीं. पापा को सॉफ्ट टारगेट मान नीरा हमेशा उन्हें ही मनाने का प्रयास करती.

“अभी डिस्काउंट के साथ कार्ड पर कैश बैक भी मिल रहा है. स्कूल फेयरवेल में ड्रेस काम आ जाएगी. मेरा बर्थडे गिफ़्ट भी हो जाएगा.” लेकिन बर्थडे आते-आते दूसरी फ़रमाइश तैयार हो जाती थी. सहमत न होते हुए भी लाडली इकलौती बिटिया का मन रखने के लिए पापा मान जाते थे. मम्मी थोड़ा सख्ती बरतनेे का प्रयास करतीं, तो पापा उन्हें भी मना लेते. “छोड़ो न नैना, कुछ सालों के शौक हैं. ससुराल चली जाएगी, कंधों पर ज़िम्मेदारी का बोझ बढ़ेगा, तो सब पीछे छूटता चला जाएगा. फिर हम करने की स्थिति में हैं.”

“आज हैं, पर कल सेवानिवृति के बाद का भी तो सोचिए. आप हैं भी इतने हार्ड ऑनेस्ट! हमारी ज़िम्मेदारियां सारी अभी ज्यों की त्यों हैं. दोनों बच्चों की पढ़ाई, शादियां, मकान बनाना…” मम्मी अपनी बकेट लिस्ट गिनाने लग जाती थीं.

अतीत को स्मरण करती नीरा थोड़ा असहज हो उठी थी. मन में एक अपराधबोध जन्म लेने लगा. पापा की नसीहतें रह-रहकर याद आ रही थीं.

“अभी तू अकेली जान है. इतना बड़ा पैकेज है. ज़्यादा से ज़्यादा सेव किया कर. भविष्य में तेरे ही काम आएगा.” पापा ने ही उसका पैसा उसके नाम से जगह-जगह निवेश कर दिया था. वह झुंझला जाती थी. “क्या पापा, सैलरी अकांउट में आते ही इधर-उधर ट्रांसफर हो जाती है.”

“फिर भी तेरे हाथ में ख़र्च करने को कितना बचा रहता है. रोज़ पार्टी, मूवी… इन सब पर अब थोड़ा अंकुश लगा बेटी!”

“क्या पापा, आप ही तो कहते हो, उम्र के शौक हैं, उम्र के साथ चले जाएंगे.” नीरा लाड़ से ठुनकने लगती.

“अच्छा सुन, हम लोग इधर एक छोटा-सा प्लॉट ख़रीद रहे हैं. तू कहे, तो तेरी सेविंग से उससे जुड़ता वैसा ही एक प्लॉट तेरे लिए भी ले लें. तुझे यहां बसना तो नहीं है, पर मात्र निवेश के तौर पर सौदा बुरा नहीं है. भविष्य में अच्छी क़ीमत पर बेचकर जहां हो, वहीं फ्लैट ख़रीद लेना.”

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“आप जैसा ठीक समझें.” नीरा ने उबासी लेते हुए सहमति दे दी थी.

सचमुच पापा नहीं देखते-संभालते, तो वह अपनी सारी कमाई घूमने, खाने, शॉपिंग आदि में ही उड़ा चुकी होती. वैसे उड़ा भी रही है.

गहन सोच में डूबी नीरा फिर से कॉपी के पृष्ठ पलटने लगी थी. पापा की बकेट लिस्ट से मां की चूड़ियां गायब होकर ‘नीरा के गहने’ नाम से नया मद जुड़ गया था. अप्रैल 2014 से… हूं, तब वह कॉलेज के अंतिम वर्ष में आ गई थी. मतलब तब से पापा-मम्मी ने उसकी शादी की तैयारियां आरंभ कर दी थीं. इसके बाद की वास्तविक व्यय सूची में नीरा की नथनी, चूड़ियां, बिछुए और सेट आदि जुड़ते चले गए, पर गायब हुई ‘नैना की चूड़ियां’ फिर कहीं नज़र नहीं आईं. इसी तरह

सालभर से बकेट लिस्ट में पड़ा पापा का गरम सूट दुबई ट्रिप की भेंट चढ़ गया था, तो क्या अपनी बकेट लिस्ट भरने के चक्कर में वह अनजाने ही पापा की बकेट लिस्ट खाली करती चली गई? वह इतनी ख़ुदगर्ज़ और नासमझ कैसे हो गई?

पापा-मम्मी को रचित के बारे में बताने के साथ ही उसने अपनी डेस्टिनेशन वेडिंग की आकांक्षा भी ख़ुशी-ख़ुशी जाहिर कर दी थी.

“पर बेटी, हमें इतना बड़ा सरकारी बंगला और अहाता मिला हुआ है. मेहमानों के लिए सर्किट हाउस, गेस्ट हाउस सब आसानी से मिल जाएगा. व्यर्थ हम इतना पैसा क्यूं बहाएं?” मम्मी ने तर्क किया था.

“मम्मी, शादी ज़िंदगी में एक बार होती है. फिर मैं फिल्मी तारिकाओं की तरह विदेश में शादी करने को नहीं कह रही हूं. अपनी सीमाएं पता हैं मुझे. जयपुर से आगे एक नया आइलैंड रिसॉर्ट बना है. ठहरिए! मैं आपको वहां की पिक्स दिखाती हूं.” बेहद उत्साह से नीरा मोबाइल खोलकर वहां की पिक्स दिखाने लगी. अपने उत्साह में उसने पापा-मम्मी के उतरे चेहरे भी नज़रअंदाज़ कर दिए थे, जिन्हें शायद छोटे भाई नलिन ने नोटिस कर लिया था.

“जगह तो बहुत शानदार है दीदी, पर इस पर लाखों ख़र्च करना मुझे बुद्धिमानी का सौदा नहीं लग रहा. इससे तो मेरे दोस्त के पापा के रिसॉर्ट में हम शादी कर सकते हैं. मेहमानों के लिए कमरे, हॉल के साथ-साथ ख़ूब खुला गार्डन स्पेस भी है. अपने घर से ज़्यादा दूर भी नहीं है. बाराती वहां रुक जाएंगे. बाकी अपने रिश्तदारों के लिए घर, सर्किट हाउस आदि के कमरे हो जाएंगे. क्यूं यह कैसा रहेगा?”

पापा-मम्मी को यह प्रस्ताव जहां अपने बजट से थोड़ा ऊपर, तो नीरा को अपने स्तर से थोड़ा नीचे लगा था. पर अंतत: इस पर सहमति बन गई थी.

नीरा को आज महसूस हो रहा था कि नलिन उससे पांच वर्ष छोटा होते हुए भी उससे कहीं अधिक समझदार, व्यवहारिक और ज़मीन से जुड़ा है. पूरी शादी में वह पापा के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम कर रहा था. हर व़क्त उनके आस-पास बना रहता.पूरी शादी में हर काम के लिए नलिन की ही पुकार मच रही थी. ख़ुद वह भी तो अपने हर काम के लिए उसी पर निर्भर हो गई थी. “नलिन, मेहंदीवाली का क्या हुआ? पार्लर कौन ले जाएगा? मेरी ज्वेलरी व़क्त पर ले आना, मैचिंग सैंडल दिलवा ला…”

अभी-अभी सेकेंड इयर में आया नलिन अपनी उम्र से कितना अधिक परिपक्व और समझदार है. मम्मी-पापा कितना भरोसा करते हैं उस पर. कितने निर्भर हैं उस पर. हर बात में उसकी राय लेते हैं.

भाई की तारीफ़ करता मन अनजाने ही उससे ईर्ष्या पर उतर आया. ‘बेटा जो है… वह तो ठहरी बेटी. पराई अमानत!’

पर अगले ही क्षण अपनी तुच्छ सोच पर नीरा ख़ुद ही शर्मिंदा हो उठी. बेटा-बेटी के बीच सुई की नोंक बराबर भी भेदभाव न रखनेवाले अपने माता-पिता पर वह कैसा घृणित आक्षेप लगा रही है. भाई के बराबर, बल्कि उससे कुछ अधिक ही उससे अधिकार पानेवाली वह कैसी बेटी है, जो कर्तव्य निर्वहन की दौड़ में छोटे भाई से पिछड़ गई.

मोबाइल बजा, तो नीरा की चेतना लौटी. “लो शैतान को याद किया और शैतान हाज़िर! तुझे ही याद कर रही थी.”

“भला क्यों? अब क्या काम बाकी रह गया? ड्राईक्लीनर को आपके कपड़े दे आया हूं समय से ले भी आऊंगा… वैसे मैंने जीजू का समाचार जानने के लिए फोन किया था.”

नलिन के परिहास पर भी नीरा शर्मिंदा हो गई. रचित का समाचार देकर वह स्वर में बड़ी बहनवाला रौब और ज़िम्मेदारी ले आई.

“तूने इंटर्नशिप का फॉर्म भर दिया या नहीं? किसी अच्छी विदेशी यूनिवर्सिटी से करेगा, तो आगे जॉब के अच्छे अवसर मिलेंगे. रचित ने भी यूएस अपने मामा के पास रहकर इंटर्नशिप की थी और आज उसी कंपनी ने इतना अच्छा जॉब ऑफर दिया है.”

“जानता हूं दीदी, पर बहुत महंगा सौदा है. अभी तो शादी के लोन से उबरने में ही पापा-मम्मी को एक लंबा व़क्त लग जाएगा. मैं उन पर एक और लोन का बोझ नहीं डालना चाहता. मैं इंटर्नशिप यहीं से कर लूंगा.

पापा-मम्मी की तबीयत भी आजकल ठीक नहीं रहती. पास रहूंगा, तो उन्हें भी तसल्ली रहेगी और मुझे भी. जॉब की चिंता मत करना. आपका भाई इतना प्रतिभाशाली तो है कि जॉब उसके पास चलकर आएगी.”

“सो तो है. मुझ पर जो गया है. ऑल द बेस्ट!” फोन बंद करते हुए नीरा की आंखें छलछला उठी थीं. छोटे भाई के प्रति कुछ पल पहले जगा ईर्ष्या का भाव जाने कहां तिरोहित हो गया था. मन में रह गया था उसके प्रति ढेर सारा प्यार, सम्मान, अपनापन और इन सबसे ऊपर अपरिमित गर्व. वह कितनी भाग्यशाली है कि उसने इतने सुसंस्कृत परिवार में जन्म लिया.

पापा की कॉपी और अपनी पुस्तकें, नोट्स आदि समेटते नीरा मन ही मन कुछ महत्वपूर्ण निर्णय ले चुकी थी. फिर भी मन में कुछ संशय लिए उसने रचित को फोन लगाया और बहुत देर तक दिल की बातें शेयर करती रही.

“बस, यही सब बताने के लिए इतनी रात गए फोन किया था जान? मुझे बताए बिना भी तुम ये सब करतीं, तो भी मुझे कोई आपत्ति नहीं होती. मैं तब भी इतना ही प्रसन्न होता.”

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‘ओह! आई एम सॉरी. मैं तो भूल ही गई थी कि वहां इस समय इतनी रात होगी, पर सच कहूं, तुमसे बात कर मन बहुत हल्का हो गया है. मुझे अपनी पसंद पर गर्व है. और….और… मैं तुमसे पहले से भी ज़्यादा प्यार करने लगी हूं.” नीरा ने फोन पर ही ताबड़तोड़ चुंबनों की बौछार कर दी थी. फिर वह फुर्ती से उठकर अपनी नई बकेट लिस्ट तैयार करने लगी-

नलिन को यूएस रचित के पास इंटर्नशिप के लिए भेजना… प्रयास करना कि तब तक वह स्वयं भी वहां पहुंच जाए… अपना प्लॉट पापा के नाम कर उन्हें वहां जल्द निर्माण कार्य आरंभ करने के लिए तैयार करना…ऑस्ट्रेलिया टूर पर जाने की बजाय रचित की इच्छानुसार सर्दी की छुट्टियां उसके पैतृक गांव में उसके माता-पिता के संग व्यतीत करना…

 

Sangeeta Mathur

       संगीता माथुर

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कहानी- नेहरू अपार्टमेंट (Short Story- Nehru Apartment)

“अविजीत जीवित होते, तो अपनी मां का ख्याल रखते न! तो उनकी देखभाल कर मैं अविजीत का ही फर्ज़ पूरा कर रही हूं. अविजीत का बहुत साम्य था मम्मी के साथ. बात करने का, हंसने का बिल्कुल वही ढंग है. मम्मी में मैं अविजीत को ही देखती हूं और यूं उससे जुड़ा महसूस करती हूं.”

Kahani

साउथ दिल्ली में नए बने थे- नेहरू अपार्टमेंट्स. बिल्डर ने साथ-साथ के दो प्लॉट ख़रीदकर उस पर बारह फ्लैट्स बना लिए थे एकदम आधुनिक सुविधाओं से लैस. हम जब इस घर में आए, तो आस-पड़ोस बस चुका था.

बिल्डिंग में रहनेवालों का एक-दूसरे के प्रति स्नेह व अपनापन था. आवश्यकता पड़ने पर बच्चों को पड़ोसी के पास छोड़ गृहिणियां अपने ज़रूरी काम निबटा आतीं और महरी के छुट्टी लेने पर पड़ोस की बाई आकर काम कर जाती. बिल्डिंग के आगे बगीचा, गेट पर खड़ा चौकीदार, बच्चे-बड़ों सब को सुरक्षा का एहसास दिलाता. हम दोनों और हमारी डेढ़ वर्षीया बेटी रिया- यही छोटा-सा परिवार था हमारा. सोमेंद्र एक अंतर्राष्ट्रीय कंपनी में काम करते थे. रात देर से घर लौटते और अक्सर शहर से बाहर भी जाना पड़ता था.

सब परिवारों का आपसी मेल-मिलाप था, बस, ठीक हमारे ऊपर रहनेवाली मां-बेटी को छोड़कर. चूंकि वे किसी से मिलती-जुलती नहीं थीं, इसलिए लोग उनके बारे में तरह-तरह की बातें बनाते. कोई उन्हें घमंडी बताता, तो कोई नीरस. कुछ लोगों के अनुसार बेटी सुमंगला का विवाह-विच्छेद हो चुका था. हमारा फ्लैट दूसरी मंज़िल पर था और उनका तीसरी पर. सीढ़ियों पर उनके आने-जाने की आहट सुनाई पड़ जाती. मां चार बजे के आसपास लौटती और बेटी छह के बाद. एक-दो बार सीढ़ियों पर मुलाक़ात भी हुई, लेकिन विशेष बातचीत नहीं हुई. हमें इस घर में आए अभी अधिक समय नहीं हुआ था और सबसे उनके बारे में नकारात्मक सुनकर मैं बहुत उत्सुक भी नहीं थी उनसे मैत्री का हाथ बढ़ाने के लिए. अब सोचती हूं, पढ़े-लिखे होने का, सभ्य होने का दंभ भरनेवाले हम मनुष्य, बिना सच को जाने दूसरों के प्रति कितनी ग़लत धारणाएं बना लेते हैं.

रिया ने जब से चलना सीखा है, वह एक जगह टिककर बैठ ही नहीं सकती, विशेषकर शाम के समय नीचे खेलते बच्चों की आवा़ज़ सुनते ही वह नीचे जाने की ज़िद करने लगती है. उस दिन सुबह से ही मुझे तेज़ बुख़ार था और उसे नीचे ले जाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी. सामने खिलौनों का ढेर लगाकर मैंने उसका मन बहलाने की बहुत कोशिश की, पर वह नीचे जाने के लिए ज़िद किए बैठी थी. इतने में धोबी प्रेस के कप़ड़े ले आया. दरवाज़ा खोलते ही रिया सीढ़ियों की तरफ़ लपकी और नीचे जाने के लिए मचलने लगी.

मैं परेशान खड़ी थी कि क्या करूं कि सुमंगला ऊपर आती दिखी और आकर रिया को पुचकारने लगी. मुझ पर नज़र डालते ही वह समझ गई कि मेरी तबीयत ठीक नहीं है. जब उसे पता चला कि रिया नीचे जाने के लिए ज़िद कर रही है, तो वो रिया को नीचे जाकर घुमाने के लिए तैयार हो गई. उसने मुझे आश्‍वस्त किया कि वह रिया का पूरा ध्यान रखेगी. मुझे थोड़ी हिचकिचाहट तो हुई, पर और कोई रास्ता नहीं सूझ रहा था. सुमंगला बोली, “रिया के खाने-पीने का बता दो अथवा दे दो मैं ऊपर ले जाती हूं, ताकि तुम थोड़ी देर आराम कर सको.”

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अगले दिन भी वह काम से लौटते हुए घर के यहां रुकी. सीधे दफ़्तर से आई थी, तो मैंने उससे चाय के लिए आग्रह किया. वह चाय पीने के लिए मान गई, पर इस ज़िद पर कि वही बनाएगी. ऊपर जाते समय रिया स्वयं उसके संग हो ली.

मुझे वह अच्छी लगने लगी थी. रंग सांवला ज़रूर था, लेकिन मनमोहक लगता था. छरहरी देह और लंबा क़द. लंबी-सी एक चोटी. चेहरे पर आत्मविश्‍वास के साथ एक नूर था, जो आकर्षित करता था. लेकिन जाने क्यों मुझे उसकी आंखें उदास लगीं. जब वह हंसती, तब भी आंखें जैसे उसकी हंसी में शामिल नहीं होती थीं.

मैं ठीक हो गई, तो उसने मुझे भी ऊपर चलने का निमंत्रण दिया.

रिया तो ऊपर जाकर यूं खेलने लगी जैसे उसका अपना ही घर हो. भीतर से खिलौने उठा लाई, जो सुमंगला ने उसके लिए ला रखे थे. सुमंगला की मम्मी चाय बना लाईं, साथ में घर की बनी नमकीन भी थी. सुमंगला ने बताया कि उसकी मम्मी एक समाजसेवी संस्था के साथ जुड़ी हुई हैं, जो झुग्गी-झोपड़ी में रहनेवाली विधवाओं की देखभाल करती है. मैने ऐसी संस्था के बारे में पहली बार सुना था. अतः उसी के बारे में चर्चा होने लगी.

चाय पीते हुए मेरी नज़र दीवार पर लगी एक बड़ी-सी फोटो पर पड़ी. पायलट की वर्दी में 25-26 साल के एक ख़ूबसूरत नौजवान की तस्वीर पर फूल-माला चढ़ी हुई थी. सुमंगला ने मेरी नज़र देख ली थी, पर वह ख़ामोश रही और मैं भी पहली ही मुलाक़ात में उनका दर्द नहीं कुरेदना चाहती थी.

सुमंगला को रिया से मोह-सा हो गया था. काम से लौटते हुए वह ज़रूर थोड़ी देर रुककर ही ऊपर जाती. बच्चे भी प्यार की भाषा ख़ूब समझते हैं. रिया उसका इंतज़ार करती और उसे देखकर ख़ुश होती. मैं जब भी सुमंगला को रिया के संग खेलते देखती, उसके चेहरे पर छलकते स्नेह को देखती, तो यह जानने की उत्कंठा होती कि उसका तलाक़ हो चुका है अथवा उसने विवाह नहीं किया? चालीस की उम्र तो पार कर चुकी होगी. शादी हुई होती, तो आज उसका अपना परिवार और बच्चे होते. ऐसा भी नहीं लगता था कि उसके लिए अपना करियर इतना महत्वपूर्ण रहा हो कि वह शादी और बच्चों के झमेले में नहीं पड़ना चाहती हो. मेरी जब उससे अच्छी मैत्री हो गई और एक दिन जब रिया उसकी गोदी में सो गई, तो मैंने उससे पूछ ही लिया.

“ज़िंदगी के सब सपने तो पूरे नहीं होते न वसुधा! बस सपनों के टूट जाने पर व्यक्ति स्वयं न टूटे इतनी शक्ति होनी चाहिए.” कहकर वह थोड़ी देर को चुप हो गई.

“एक फौजी पिता के बेटे थे अविजीत. अभी वे स्कूल में ही थे कि उनके पिता कश्मीर में एक आतंकवादी की गोली का शिकार हो गए. मैं और मेरा भाई भी उसी स्कूल में थे. मेरा भाई अविजीत के संग था और मैं उनसे दो वर्ष जूनियर. यूं हम एक-दूसरे को जानने लगे. दोस्ती हुई, जो धीरे-धीरे प्यार में बदलती गई. मेरे पैरेंट्स जानते थे यह बात और अविजीत की मम्मी भी. हम भिन्न प्रांतों से थे, भिन्न भाषी, पर उनमें से किसी को भी इस बात से आपत्ति नहीं थी. अविजीत का सपना एयरफोर्स में पायलट बनने का था, जो उन्होंने पूरा किया. विवाह की जल्दी नहीं थी. मैं अपनी पढ़ाई पूरी कर लेना चाहती थी और अविजीत भी अपने जॉब में सेटल हो जाना चाहते थे. भैया पढ़ाई के लिए कुछ वर्षों के लिए विदेश जा रहे थे. घर के बड़ों ने सोचा उनके जाने से पहले सगाई कर दी जाए.

अविजीत का विभिन्न जगहों पर आना-जाना लगा ही रहता था, पर टेलिफोन, ईमेल ने तो सब दूरियां ख़त्म कर दी थीं, सो आपसी संपर्क बना ही रहता. लेकिन एक दिन वह सारे संपर्क सूत्र तोड़ गया सदा के लिए, बस सूचना भर मिली. लाश भी बरामद नहीं हो पाई. दुश्मन के क्षेत्र में हुआ था हादसा. आज भी वह ख़बर झूठी लगती है. आज भी लगता है लौट आएंगे वे एक दिन. बुद्धि जानती है कि यह झूठा दिलासा है, पर मन नहीं सुनता उसकी बात.”

कहते-कहते वह फिर ख़ामोश हो गई. मैं भी क्या बोलती?

वह शाम के समय अक्सर आ जाती, पर इस बात का ज़िक्र हमारे बीच दोबारा नहीं छिड़ा. वह रिया से खेल रही होती, तो प्रसन्न होती और मैं वह बात छेड़कर उसका मूड बिगाड़ना नहीं चाहती थी. आज के युग में भी कोई इतना अटूट प्यार कर सकता है, मैं तो इसी बात पर अभिभूत थी. विवाह नहीं हुआ था तो क्या! उसने अपने प्यार की याद से ही वफ़ादारी निभाई थी.

एक दिन सुमंगला ने बताया कि मम्मी के पैर में मोच आ गई है और डॉक्टर ने उन्हें कुछ दिनों के लिए चलने-फिरने को मना किया है, इसलिए वह आजकल घर पर रहती हैं और उनकी देखभाल के लिए कामवाली बाई दिनभर को रुक जाती है. दूसरे दिन सुबह का काम समाप्त कर मैं और रिया उन्हें देखने ऊपर चले गए. वह आरामकुर्सी पर बैठीं कोई पुस्तक पढ़ रही थीं. कुर्सी पर बैठी भी वह चुस्त और स्मार्ट लग रही थीं. गोरा खिला रंग और तीखे नैन-नक्श. हमें देखकर वह बहुत ख़ुश हुईं, “मेरा कुछ समय अच्छा बीत जाएगा.” वे बहुत ख़ुशमिज़ाज और बातूनी थीं. मुझे भी उनसे बात करके अच्छा लगा, सो जब तक उन्हें आराम बताया गया, मैं और रिया सुबह के समय उन्हीं के पास जा बैठते.

दीवार पर लगी तस्वीर पर अक्सर निगाह पड़ जाती. एक दिन मज़ाक के मूड में मैंने उनसे कह ही दिया, “आपकी बेटी की शक्ल आपसे उतनी नहीं मिलती, जितनी उसके मंगेतर से.”

सहसा जैसे उनके चेहरे से किसी ने हंसी पोंछ दी हो. कुछ क्षण रुककर बोलीं, “यह मेरे बेटे की तस्वीर है, न कि होनेवाले दामाद की.”

“और सुमंगला…?”

“उसकी मंगेतर थी.”

“मतलब! सुमंगला आपकी बेटी नहीं है?”

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“मैं तो भूल ही चुकी हूं इस बात को. कितना तो ख्याल रखती है मेरा. मुझे अकेली कहीं नहीं जाने देती. ज़बरदस्ती एक टैक्सी लगा रखी है, जो सुबह दस बजे ले जाती है और चार बजे छोड़ जाती है. अपनी मां को तो वह ‘आई’ कहकर बुलाती थी. मराठी में ‘आई’ ही कहते हैं मां को. सगाई हो जाने के बाद मुझसे मिलने आया करती थी. कुछ दिन न आती, तो मैं ही बुलवा भेजती. इन दोनों के सिवा मेरा था ही कौन? तभी से ‘मम्मी’ कहने लगी है मुझे.

मैंने तो एक लंबी उम्र अकेले ही काटी है. अविजीत के पापा जीवित थे, तो बहुत व्यस्त रहा जीवन. किन्तु अविजीत अभी छोटा ही था कि वे कश्मीर में आतंकवादियों द्वारा मारे गए. पर तब हिम्मत थी, अविजीत को पालने का एक बड़ा मक़सद था सामने. उम्मीदें ज़िंदा थीं. नौकरी करने की ज़रूरत तो नहीं पड़ी, अच्छी पेंशन मिलती थी, सो मैंने अपना सारा समय समाज सेवा में लगा दिया. परंतु अविजीत के जाने के बाद से बुरी तरह टूट गई मैं. यदि सुमंगला ने सहारा न दिया होता तो…

इस हादसे के बाद उसके अपने पिता को दिल का ज़बरदस्त दौरा पड़ा. अस्पताल की भागदौड़, ऑपरेशन, इन सबके बीच वह मेरा हालचाल लेती रही. सुमंगला का भाई आया था पिता के ऑपरेशन के समय, पर वह कितने दिन रुक सकता था? सुमंगला ने ही संभाला सब… घर भी इतना पास नहीं था और वह ख़ुद भी बुरी तरह से टूट चुकी थी… पर अपना दर्द भूल हम तीन प्राणियों को संभालती रही. वह दिन याद करती हूं, तो ऐसा लगता है जैसे कोई ज़बरदस्त झंझावत ही आया था हमारे जीवन में, जो बहुत कुछ उड़ा कर ले गया अपने साथ. दो वर्ष तक भागदौड़ की, परंतु अपने पापा को न बचा सकी सुमंगला… शायद हम स्त्रियां अपना जो दर्द आंसुओं में बहा देती हैं, पुरुष उसे पी जाते हैं और तभी सहन नहीं कर पाते. आख़िर चोट तो उन्हें भी लगती ही है.

वह मुझे अकेली नहीं छोड़ना चाहती थी. बहुत दिनों से ज़ोर डाल रही थी कि मैं चलकर उनके ही संग रहूं. उधर उसकी मां अकेली पड़ गई थी और इधर मैं. उसकी परेशानी देखकर मैंने वहीं चलकर रहने की हामी भर दी. हम तीनों प्राणी एक साथ रहने लगे. एक-दूसरे को ढांढ़स बंधाते. हमारी ओर से निश्‍चिंत हो सुमंगला ने नौकरी करनी शुरू की. उसकी आई और मैंने बहुत कोशिश की कि वह विवाह करने को राज़ी हो जाए. अच्छी जगह रिश्ता हो सकता था, पर वह नहीं मानी. हमने सोचा नौकरी करेगी, तो स्वयं कोई पसंद आ जाएगा, पर उसने तो जैसे अपने दिल में प्यार के सभी दरवाज़े मज़बूती से बंद कर दिए थे.

लगभग दस वर्ष हम एक साथ रहे, फिर सुमंगला की मां को भी कैंसर हो गया. ऑपरेशन व कीमो थेरेपी सब कुछ करवाया, पर एक तो उम्र, फिर निराशाएं ले ही गईं उन्हें. बहुत मुश्किल हो गया था, इतनी सारी पुरानी यादों के बीच जीना. सुमंगला ने अपना तबादला यहां करवा लिया. मेरे लिए तो जहां रहूं काम है. दूसरों के दुख में हाथ बंटा, उनकी सहायता कर, अपना दुख कम लगने लगता है.” और सुमंगला का नज़रिया सुन तो मैं दंग ही रह गई.

एक दिन जब मैंने उसके त्याग की चर्चा की तो वह बोली, “अविजीत जीवित होते, तो अपनी मां का ख्याल रखते न! तो उनकी देखभाल कर मैं अविजीत का ही फर्ज़ पूरा कर रही हूं. अविजीत का बहुत साम्य था मम्मी के साथ. बात करने का, हंसने का बिल्कुल वही ढंग है. मम्मी में मैं अविजीत को ही देखती हूं और यूं उससे जुड़ा महसूस करती हूं. इन सबने बहुत चाहा कि मैं कहीं और विवाह कर लूं, परंतु अविजीत तो मेरे रोम-रोम में बसे हुए हैं. उन्हें स्वयं से अलग करना संभव है क्या?” सुमंगला के प्यार और समर्पण की भावना को देख मेरी आंखें नम हो गईं.

प्यार जब दैहिक और सांसारिक आवश्यकताओं से ऊपर उठ जाता है, तो उसमें कोई अलौकिक तत्व आ जाता है शायद.

usha vadhava

       उषा वधवा

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कहानी- गति ही जीवन है (Short Story- Gati Hi Jeevan Hai)

यह भागदौड़ उस सन्नाटे से अच्छी है, जो कई बार डरा देता है. पर जीवन की गति अनवरत चलती रहे, तो ही सब सहज व सुगमता से चल पाता है. विराम कुछ पल के लिए तो ठीक है, पर उसके बाद वह खालीपन और निरर्थकता का बोध कराने लगता है. बिज़ी लाइफ तो जीवन का ही एक हिस्सा है, जिससे एक चहल-पहल बनी रहती है. गति ही जीवन है डियर. व्यस्तता में ही ख़ुशी है.

Kahani

उ़फ् कैसा समा था… धूप की किरणें या कहें रोशनी के छोटे-छोटे क़तरे बादलों की कोख से धीरे-धीरे झांक रहे थे. आसमान के विस्तृत फलक पर छितरी स़फेद बादलों की लंबी कतारें, दूर-दूर तक छिटकी हुईं. कहीं-कहीं बादलों की दरारों से झांकता नीला आसमान नज़र आ जाता. कहीं बादलों का एक आसमान-सा झुंड लगता सामने आ जाता, मानो वह आसमान की सैर करने निकला हो.

दूर पहाड़ों की चोटियों पर पड़ती सूरज की रोशनी… पहाड़ों  की परतों की तरह लग रही थी और एक अद्भुत दृश्य प्रस्तुत कर रही थी. एक पहाड़ को पार करता दूसरा पहाड़, एक चोटी दूसरी चोटी को लांघती… सर्पीली चोटियां… ऊबड़-खाबड़… फिर भी ग़ज़ब का समन्वय और संतुलन. पहाड़ों पर लगे पेड़ों की लंबी-लंबी कतारें… रिसॉर्ट की बालकनी पर खड़ी अमला जब इस नज़ारे को निहार रही थी, तो उसे लगा कि जैसे बैगपाइपर बांसुरी बजाता चल रहा है और उसके पीछे-पीछे असंख्य बच्चे या फिर संगीत की कोई धुन… आरोह-अवरोह… उठती-गिरती लय… प्रकृति कितनी दक्ष है, संतुलन बनाना जानती है… लेकिन तभी तक, जब तक इंसान के क्रूर हाथ उस तक न पहुंचें. फिर तो उसकी सुंदरता नैसर्गिक न रहकर, कृत्रिम बन जाती है.

बड़े शहरों में हम पत्थरों को पैरों की ठोकरें मारते रहते हैं और पहाड़ों पर यही पत्थर, बड़ी-बड़ी चट्टानें किसी तिलिस्म से कम नहीं लगती हैं. न कोई आकार, न कोई स्थल का चुनाव, फिर भी यही बड़े-छोटे पत्थर आकर्षित करते हैं. इन्हें छूने, इनके पास बैठने का मन होता है. पहाड़ों से उतरते कटावदार, सीढ़ीनुमा आकार और उनके बीच-बीच में बने घर, झोपड़ीनुमा… कहीं कोई बस्ती नहीं, घर भी यहां बहुत दूर-दूर बने होते हैं. जैसे-जैसे सूरज की किरणें बादलों की कोख से बाहर निकल रही थीं, उजाला बढ़ता जा रहा था और उसके मन की प्रफुल्लता भी. एक उजास-सा मन-प्राण को घेर रहा था.

बालकनी से उठ वह अंदर आ गई. बेड पर यूं ही लेट गई. तीन दिन हो गए थे उसे नारकंडा आए. हिमाचल में स्थित यह स्थान एकदम शांत था. कभी-कभी तो लगता कि हर तरफ़ सन्नाटा ही सन्नाटा पसरा हुआ है. असल में वह ख़ुद ऐसी ही जगह आना चाहती थी, जहां न तो शोर-शराबा हो और न ही कोई डिस्टर्ब करनेवाला. थक गई थी, अपनी रूटीन लाइफ से. ऑफिस में काम करने की तो कोई सीमा ही नहीं थी. एक प्रोजेक्ट ख़त्म होता, तो दूसरा शुरू हो जाता. इतनी बिज़ी लाइफ कि कभी-कभी तो लगता था कि घर केवल सराय मात्र है. जाओ सो जाओ, उठो ऑफिस पहुंच जाओ, न खाने का ठिकाना, न रिलैक्स करने का अवसर. बस, काम ही करते रहो.

बहुत दिनों से उसे लग रहा था कि उसे कहीं बाहर जाना चाहिए. एक लंबी छुट्टी पर… कितनी बार वह अपनी कलीग सौम्या से कह चुकी थी कि चलो कहीं चलते हैं, पर निकलना ही नहीं हो पाता था. वैसे भी छुट्टी मांगना भी किसी जोखिम से कम न था. बड़ी मुश्किल से एक दिन बॉस से लड़-झगड़कर उसने दस दिनों की छुट्टी ली और ख़ुद ही निकल पड़ी सुकून पाने के लिए.

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“कुछ काम होगा, तो कॉन्टैक्ट करूंगी, तू वहीं से मुझे प्रोजेक्ट में हेल्प कर देना अमला.” सौम्या ने जब उससे कहा, तो उसने तुरंत मना कर दिया. “देख, मैं वहां रिलैक्स करने जा रही हूं, इसलिए कोई काम मत पूछना प्लीज़. मैं ऑफिस का कोई फोन नहीं उठाऊंगी. अरे बाबा, वहां तो चैन से रहने देना मुझे. सारा दिन सोनेवाली हूं मैं. इसलिए रिसॉर्ट बुक किया है. अच्छी बात तो यह है कि इस समय वहां भीड़ भी नहीं होती. इस समय रिसॉर्ट एकदम खाली है. वैसे तुझे बता दूं कि मैं अपने साथ लैपटॉप भी लेकर नहीं जा रही हूं और प्लीज़ यह बात बॉस को मत बताना, वरना वह मेरी छुट्टी कैंसल कर देंगी.”

बस दो दिन से वह आराम ही कर रही थी. कहीं बाहर निकली भी नहीं थी. दरवाज़े पर खटखट हुई, तो वह उठी.

“मैडम, लंच लाया हूं.” वेटर था. खाना खाते-खाते वह टीवी खोलकर बैठ गई. चैनल ही पलटने में व़क्त निकल गया. सब जगह बकवास ही आ रहा था. वैसे भी उसे टीवी देखने की आदत नहीं थी. असल में टाइम ही नहीं मिलता था. कुछ देर नॉवेल पढ़ा, तो नींद आ गई. मोबाइल की घंटी से नींद टूटी. सौम्या थी.                                                                                                                      “तेरा चिलिंग पीरियड ख़त्म हो गया हो, तो वापस आ जा यार, नहीं हैंडल कर पा रही हूं अकेले. बॉस भी बड़बड़ कर रही है.” सौम्या अपनी आदत के अनुसार बिना किसी औपचारिकता के बोली. “इडियट, यह तो पूछ मैं कैसी हूं, क्या कर रही हूं. बस, शुरू हो गई.”

“ठीक ही होगी, बता कब वापस आ रही है. तीन दिन बहुत होते हैं. अब आ जा. तत्काल में टिकट बुक करा देती हूं.”

“चुप रह, मैं नहीं आ रही. फोन रख और मुझे आराम करने दे.”

सौम्या की याद तो उसे भी बहुत आ रही थी, लेकिन अभी भी वह कुछ करने के मूड में नहीं थी. फिर क्यों उसका मन कर रहा है कि कुछ तो होना चाहिए… कुछ तो करने को होता. फोन पर भी किससे, कितनी बातें करें. क्या मुसीबत है, अख़बार भी नहीं आता यहां. उसे थोड़ी कुढ़न हुई. रिसॉर्ट भी खाली है, कोई टूरिस्ट होता, तो उनसे ही गप्पे मार लेती. पांच बजे से ही इतना अंधेरा हो जाता है यहां कि अब कहीं बाहर भी घूमने नहीं जाया जा सकता है. कितना बोरिंग है… उसे अपने आप पर ही खीझ हुई. दस दिन वह कैसे काटेगी. अचानक उसे लगा कि इतने रिलैक्सेशन के बावजूद कहीं कुछ मिसिंग है. आख़िर सोए भी तो कितना… वैसे भी थकान उतर

चुकी थी और चूंकि कभी इतने खाली रहने की आदत नहीं थी, इसलिए नींद भी आंख-मिचौली करने लगी थी. लैपटॉप ही ले आती, प्रोजेक्ट का कुछ काम ही कर लेती… अब बस भी करो अमला, काम के बारे में नहीं सोचो… तुम यहां रिलैक्स करने आई हो, उसने ख़ुद को समझाया.

एक अकुलाहट-सी होने लगी… ऐसी बैचेनी उसने पहले कभी महसूस न की थी. न कंप्यूटर, न इंटरनेट, न अख़बार, उ़फ् कैसी तो अजीब-सी फीलिंग हो रही है. भागदौड़, चुनौतीपूर्ण प्रोजेक्ट, डेडलाइन पर काम पूरा करने की हड़बड़ी, सब उसे अपनी ओर खींचने लगे. सौम्या के साथ काम को लेकर होनेवाली लड़ाई, बॉस के साथ बहस और ऑफिस गॉसिप वह मिस करने लगी. यहां तक कि काम को लेकर हर समय होनेवाली चिड़चिड़ाहट भी उसे याद आने लगी.                                                                                               अगले दिन वह सुबह-सुबह ही आसपास की जगह देखने चली गई. फिर वहां के एक निवासी ने बताया कि वह ‘हातू पीक’ देखने अवश्य जाए, जो नारकंडा में सबसे ऊंचाई पर स्थित एक जगह है और जहां ‘हातू माता’ का मंदिर है. टैक्सी लेकर वह वहां चल दी.

ठंड ने कोहरे की चादर बिछा रखी थी. मन खिल उठा अमला का वहां पहुंचकर. वहां से हिमालय की चोटियां नज़र आ रही थीं. थोड़ी दूर बने ‘भीम के चूल्हे’ को देख तो वह और ख़ुश हो गई. पांडव अज्ञातवास के दौरान वहां खाना बनाया करते थे. उसने तुरंत सौम्या को फोन किया, “जानती है तू क्या मिस कर रही है? यार, क्या प्राकृतिक नज़ारा है. क्या मौसम है यहां का. अभी भी आ जा तू यहां. दोनों एंजॉय करेंगे. इसके बाद मैं ‘महामाया मंदिर’ और ‘तनी जुब्बार लेक’ देखने जा रही हूं. ढेर सारी फोटो खींची हैं मैंने.”

“यार, वापस आ जा, यहीं एंजॉय कर लेंगे. कितने दिन हो गए पार्टी में गए.” सौम्या शायद आगे कुछ और कहना चाह रही थी, पर उसकी बात काटते हुए अमला ने अपनी बात पूरी कर दी, “रहने दे यार, अभी तो और घूमनेवाली हूं मैं यहां.” अमला बहुत ही एक्साइटेड थी. अगला दिन भी उसने आउटिंग में बिता दिया और अब देखने को कुछ नहीं बचा था, सिवाय नेचर वॉच के. धीरे-धीरे उस खालीपन और रिक्तता में उसे डिप्रेशन होने लगा. बिना कुछ काम के एक भारीपन उसे घेरने लगा, तमाम प्राकृतिक सुंदरता और स्वच्छ मौसम के बावजूद. आख़िर क्यों…? वह तो ख़ुद अपनी मर्ज़ी से आई थी.                                                                                                “यार सौम्या, तू मेरा तत्काल में टिकट बुक करा दे, मैं वापस आ रही हूं.” अमला की परेशानी महसूस करते हुए सौम्या ने पूछा, “सब ठीक तो है ना? क्या हुआ? तुझे कोई मदद चाहिए?”

यह भी पढ़ेक्या है आपकी ख़ुशी का पासवर्ड? (Art Of Living: How To Find Happiness?)

“आकर बताती हूं.” वापस पहुंचकर अमला सीधे ऑफिस गई और बाकी की छुट्टियां कैंसल करा लीं. कॉफी की चुस्कियां लेते हुए वह बोली, “पता है सौम्या, हम व्यस्त ज़िंदगी के इतने आदी हो जाते हैं कि सुकून के पल भी खलते हैं हमें. भागदौड़भरी ज़िंदगी से भागकर वहां गई थी कि कुछ दिन चैन से गुज़ारूंगी, पर दो-तीन दिन बाद ही लगने लगा कि करूं तो क्या करूं… कुछ भी तो नहीं यहां करने को, आख़िर बादलों को, पहाड़ों को, फूलों को और चारों ओर फैली हरियाली को कितना निहार सकते हैं. खाली बैठने की आदत या कहें यूं ही निरर्थक बैठे रहने की आदत कहां रही है अब.”

“तू कुछ ज़्यादा ही सेंटी नहीं हो रही है?” सौम्या ने उसके हाथ पर अपना हाथ रखते हुए कहा.

“थोड़ा सुकून तो सभी को चाहिए लाइफ में. अच्छा हुआ जो तू चली गई. थोड़ा बदलाव तो महसूस हुआ. अब और फुर्ती से काम करेगी. इस बार का प्रोजेक्ट है भी बहुत चैलेंजिंग.”

“तू ठीक कह रही है, पर सच तो यह है कि यह भागदौड़ उस सन्नाटे से अच्छी है, जो कई बार डरा देता है. पर जीवन की गति अनवरत चलती रहे, तो ही सब सहज व सुगमता से चल पाता है. विराम कुछ पल के लिए तो ठीक है, पर उसके बाद वह खालीपन और निरर्थकता का बोध कराने लगता है. बिज़ी लाइफ तो जीवन का ही एक हिस्सा है, जिससे एक चहल-पहल बनी रहती है. गति ही जीवन है डियर. व्यस्तता में ही ख़ुशी है.”

सौम्या के चेहरे पर एक मुस्कान छा गई थी. ऑफिस के चिर-परिचित माहौल में पहुंच अमला को लगा कि चाहे काम के दौरान वह कितनी ही टेंशन में क्यों न रहती हो, चाहे थकान कितनी ही क्यों न हो, लेकिन काम पूरा हो जाने के बाद जो संतुष्टि मिलती थी, उसके सामने तो बाकी सब बातें व्यर्थ ही लगती हैं.

suman bajapaye

     सुमन बाजपेयी

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कहानी- सुनहरा अध्याय (Short Story- Sunhara Adhyay)

“पागल मत बनो काव्या. वह अध्याय कब का समाप्त हो चुका है. मुझे और नलिन को अलग रहते कितने बरस बीत चुके हैं. मैं अपने एकांतवास से ख़ुश हूं.”

“नहीं मम्मी, आपने ख़ुद स्वीकारा है कि गृहस्थी एक लड़की की ज़िंदगी में कितना मायने रखती है. जिस तरह आपको यह एहसास हो रहा है कि आप मेरी ज़िंदगी में पापा की कमी पूरी नहीं कर सकीं, मुझे भी यह एहसास हो रहा है कि मैं आपकी ज़िंदगी की यह कमी पूरी नहीं कर सकी.”

Kahaniya

काव्या को लेकर प्रमिलाजी की चिंता अब वाकई बहुत ज़्यादा बढ़ गई थी. आख़िर यह लड़की अपनी ज़िंदगी की क़िताब में यह सुनहरा अध्याय क्यों नहीं जोड़ना चाहती? जवानी की दहलीज़ को छूती लड़कियों के मां-बाप की रातों की नींद उड़ जाती है, यह सोचकर कि कहीं हमारी लड़की कोई अनुचित क़दम न उठा ले? कहीं वह कोई विजातीय या ऐसा-वैसा लड़का न पसंद कर ले? लेकिन यहां तो मामला ही उल्टा है. प्रमिलाजी चाहती हैं कि काव्या के जीवन में कोई आए, जिसे लेकर उसके दिल में लड्डू फूटने लगें और वह अपनी बेटी की हंसी-ख़ुशी डोली सजाकर उसे विदा कर अपनी ज़िम्मेदारी से मुक्त हों. लेकिन जीवन के पच्चीसवें बसंत में भी फूलों से लदी डालियां, हिलोरें लेता सागर, मदमाती हवा, लड़कों की सीटियां आदि बातें काव्या के लिए कोई मायने नहीं रखती थीं. हद तो तब हो गई जब उसने प्रमिलाजी द्वारा लाए रिश्तों को देखने-सुनने से भी इंकार कर दिया. प्रमिलाजी का पारा उस दिन फट ही पड़ा.

“तुम आख़िर चाहती क्या हो? अरे, लड़कियां इस दिन के लिए लालायित रहती हैं. क्यूं तुम अपनी ज़िंदगी का यह सुनहरा अध्याय आरंभ नहीं करना चाहती?”

“मम्मी, क्या सचमुच शादी एक लड़की की ज़िंदगी का सुनहरा अध्याय होता है?”

“हां, बिल्कुल. विवाह करके, मां बनकर ही एक स्त्री का जीवन पूर्ण होता है. एक पुरुष का संग उसके जीवन में ख़ुशियों के सतरंगी इंद्रधनुष खिला देता है. ज़िंदगी बेहद ख़ूबसूरत और अर्थपूर्ण नज़र आने लगती है. एक बार इस अध्याय के पृष्ठ उलटकर तो देखो!”

“आपने भी तो कभी इस अध्याय के पृष्ठ उल्टे थे मम्मी… क्या हुआ?” काव्या का दबा-सा स्वर उभरा तो प्रमिलाजी मानो आसमान से गिर पड़ीं.

‘मेरी बेटी ने मेरी ही ज़िंदगी को आधार बनाकर शादी के बारे में कितने पूर्वाग्रह पाल रखे हैं और मैं नासमझ-सी उससे सवाल-जवाब कर रही हूं.’ सोचकर प्रमिलाजी का सिर चकराने लगा. पर फिर तुरंत ही उन्होंने अपने आपको संभाला.

“मेरी ज़िंदगी का क़िस्सा अलग था बेटी. तुम उसे अपनी ज़िंदगी से क्यों जोड़ रही हो? जो मेरे साथ हुआ, ज़रूरी नहीं कि तुम्हारे साथ भी वही हो. सारे पुरुष एक जैसे नहीं होते बेटी.” प्रमिलाजी ने बेटी को समझाने का प्रयास किया.

“तो फिर आपने हमेशा दूसरी शादी से इंकार क्यों किया? सारे पुरुष एक से तो नहीं होते?” काव्या भी आज पूरे तर्क-वितर्क पर उतर आई थी.

“काव्या!” प्रमिलाजी का स्वर न चाहते हुए भी थोड़ा तीखा और कटु हो गया था. “यहां बात तुम्हारी शादी की चल रही है. मेरी शादी, मेरे अतीत को इसमें मत घसीटो.”

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“मम्मी, कैसी बातें कर रही हैं आप? भला मुझे, आपकी बेटी को आपकी ज़िंदगी से सरोकार नहीं होगा तो और किसे होगा? मां-बाप तो संतान के रोल मॉडल होते हैं. मैंने जब भी आपके वैवाहिक अतीत को टटोलना चाहा, आपने यह कहकर मेरा मुंह बंद कर दिया कि आम कामकाजी दंपतियों की भांति आपके अहम् टकराए और अलगाव हो गया. दोनों ने स्वेच्छा से अलग-अलग रहना मंज़ूर कर लिया. तलाक़ जैसी औपचारिक क़ानूनी प्रक्रिया में उलझना भी आपने आवश्यक नहीं समझा. कल को मेरी ज़िंदगी में भी यही मोड़ आए, इससे पूर्व ही मैं इस राह से किनारा कर लेना चाहती हूं.” एक दुखभरी सांस के साथ काव्या ने अपनी बात समाप्त की. उसे अफ़सोस था कि उसने गड़े मुर्दे उखाड़कर मम्मी के दिल को चोट पहुंचाई. लेकिन संतोष था कि आख़िर वह अपने दिल की समस्त उलझनें, समस्त शंकाएं मम्मी के सम्मुख रखने में क़ामयाब हो ही गई.

बरसों से मन में उमड़ते-घुमड़ते आशंका, संदेह, आक्रोश के बादल अंततः बरस ही गए और पीछे छोड़ गए एक नीर ख़ामोशी. प्रमिलाजी अपने कमरे में चली गईं. दो दिनों तक दोनों के बीच मौन पसरा रहा. सिवाय औपचारिक वार्तालाप के दोनों के बीच कोई बात नहीं हुई. प्रमिलाजी गहरी सोच में थीं. इतना उन्हें स्पष्ट हो गया था कि काव्या जब तक विवाह संबंधी पूर्वाग्रहों से मुक्त नहीं होगी, गृहस्थ जीवन में प्रवेश नहीं करेगी. उसका घर कभी नहीं बस पाएगा. अकेलेपन की जिस त्रासदी को वे भोग रही हैं, काव्या भी… नहीं-नहीं! सोचकर ही प्रमिलाजी का कलेजा मुंह को आने लगा. तीसरे दिन ही उन्होंने बेटी से संवाद का सूत्र जोड़ दिया.

“काव्या, मैं समझती थी कि मैंने तुम्हारी ज़िंदगी में मां-बाप दोनों की कमी पूरी कर दी. लेकिन यह मेरी ख़ुशफ़हमी थी. एक टूटा हुआ परिवार संतान के लिए कभी भी ख़ुशी का सबब नहीं बन सकता. तुम्हारा घर बस सके, इसके लिए मुझे अपनी कमज़ोरियां स्वीकार करने में भी कोई गुरेज़ नहीं है. हां, आज मैं स्वीकार करती हूं कि यदि उस व़क़्त मैंने समझौते की दिशा में एक क़दम भी बढ़ाया होता, तो नलिन दो क़दम बढ़ाने में कोई कोताही नहीं करते और मैं तुम्हें यह भी बता देना चाहती हूं कि यदि नलिन ने एक क़दम बढ़ाया होता तो मुझे चार क़दम बढ़ाकर उस बढ़ती दूरी को पाटने में तनिक भी संकोच नहीं होता. लेकिन अहम् का मुद्दा तो यही एक क़दम बनकर रह गया. मैं दावे के साथ कह सकती हूं कि आज भी अधिकांश टूटते परिवारों की एकमात्र वजह यही पहले क़दम का ईगो है. तुम यदि इस ईगो को दरकिनार कर सकी, तो तुम्हारी गृहस्थी कभी नहीं टूट पाएगी. अब देखो, अपने ईगो को दरकिनार रखते हुए मैंने अपने अतीत की भूल स्वीकार कर ली है. अब तो तुम शादी के लिए तैयार हो ना?” प्रमिलाजी की आशा भरी नज़रें काव्या की ओर उठीं और देर तक वहीं टिकी रहीं, क्योंकि काव्या गहरी सोच में डूब गई थी. काफ़ी देर सोच-विचार के बाद काव्या के होंठ हिले.

“मम्मी, क्या यही स्वीकारोक्ति तुम पापा के सम्मुख भी दोहरा सकती हो?” काव्या का स्वर शांत और संयत था. फिर भी प्रमिलाजी चिल्ला उठीं.

“काव्या!”

“हां मम्मी, क्या तुम पापा के सामने अपनी ग़लती मान सकती हो?”

“मैंने कोई ग़लती नहीं की.” प्रमिलाजी की गर्दन एकदम तन गई थी और वाणी में कठोरता का पुट आ गया था. “मैं तुम्हें स़िर्फ टूटते परिवारों की मिसाल दे रही थी और यह बता रही थी कि यदि दोनों में से एक भी पक्ष अपने ईगो को कुछ देर के लिए नज़रअंदाज़ कर समझौते की दिशा में एक क़दम भी उठाए तो दूसरा पक्ष चार क़दम बढ़ाकर उसका स्वागत करेगा, क्योंकि अधिकांश मामलों में ही दोनों पक्ष अलग नहीं होना चाहते.”

“मैं भी यही कह रही हूं मम्मी. आप और पापा भी अलग होना नहीं चाहते थे. बस, किसी एक के झुकने का इंतज़ार कर रहे थे और शायद आज भी कर रहे हैं.”

“पागल मत बनो काव्या. वह अध्याय कब का समाप्त हो चुका है. मुझे और नलिन को अलग रहते कितने बरस बीत चुके हैं. मैं अपने एकांतवास से ख़ुश हूं.”

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“नहीं मम्मी, आपने ख़ुद स्वीकारा है कि गृहस्थी एक लड़की की ज़िंदगी में कितना मायने रखती है. जिस तरह आपको यह एहसास हो रहा है कि आप मेरी ज़िंदगी में पापा की कमी पूरी नहीं कर सकीं, मुझे भी यह एहसास हो रहा है कि मैं आपकी ज़िंदगी की यह कमी पूरी नहीं कर सकी.” काव्या भावुक होने लगी तो प्रमिलाजी ने मोर्चा संभाल लिया.

“हम मुद्दे से भटक रहे हैं काव्या. हम तुम्हारी शादी की बात कर रहे थे और मैंने तुम्हें विश्‍वास दिला दिया है कि यह ज़िंदगी का बेहद ख़ूबसूरत मोड़ है, जहां संयम और धैर्य बनाए रखने की ज़रूरत है. केवल समझौतावादी प्रवृत्ति से इस मोड़ के ख़ूबसूरत नज़ारों का आनंद लिया जा सकता है.”

“और समझौते का यह प्रयास कभी भी, कहीं भी किया जा सकता है, है ना मम्मी?”

“तुम ज़िद पर उतर आई हो काव्या… मुझे नलिन से मिले बरसों बीत गए हैं. मेरे पास उनका कोई अता-पता नहीं है.”

“पापा कोलकाता में हैं.” प्रमिलाजी को लगा उनके आसपास मानो सैकड़ों बम फट गए हैं.

“तुम्हें अपने पापा का पता मालूम है? मतलब… मतलब तुम उनसे मिलती रही हो? इतना बड़ा धोखा, इतना बड़ा झूठ! मैं तुम्हें अपनी ज़िंदगी, अपना सब कुछ मानकर संतोष करती रही. तुम्हारा घर बसाने के लिए अपने बरसों से पाले अहम् के टुकड़े-टुकड़े कर डाले और तुम…?”

“नहीं मम्मी! आप ग़लत समझ रही हैं. मैं कभी पापा से नहीं मिली. बस इधर-उधर पूछताछ और पत्र-व्यवहार, फ़ोन आदि के बाद बड़ी मुश्किल से उनका पता जुटा पाई हूं. सेवानिवृत्ति के बाद अब नितांत एकाकी जीवन व्यतीत कर रहे हैं पापा. दरअसल, शादी को लेकर मैं इतने पूर्वाग्रहों से ग्रस्त थी कि एक बार उनसे मिलना चाहती थी. अब पता भी मिला है तो इतनी दूर का, जहां अकेले आपको बताए बगैर मैं नहीं जा सकती. मम्मी हम साथ कोलकाता चलेंगे. मैं देखना चाहती हूं कि कैसे एक क़दम बढ़ाने पर प्रत्युत्तर में चार क़दम का फ़ासला नापा जाता है? बोलो मम्मी, कब चलें?”

“तुम पागल हो गई हो काव्या. मुझे कहीं नहीं जाना.”

“ठीक है. मतलब आप नहीं चाहतीं मेरी ज़िंदगी में शादी जैसा कोई अध्याय जुड़े.”

“ये कैसी बातें कर रही हो?” मां-बेटी में काफ़ी देर तक बहस चलती रही. आख़िरकार हार मानते हुए प्रमिलाजी ने कहा, “ओह काव्या, मैं हार गई तुमसे. ठीक है, चलो जहां भी चलना है.”

ट्रेन का लंबा सफ़र प्रमिलाजी को और भी लंबा लग रहा था. कैसे करेगी वह इतने बरसों बाद नलिन का सामना?… कह देगी कि वह अपनी मर्ज़ी से नहीं आई है. उनकी बेटी खींचकर लाई है, वरना उन्हें कहां ज़रूरत है पति नामक प्राणी की? जहां इतने बरस अकेले गुज़ार लिए, बाकी के और गुज़र जाते. नहीं-नहीं, ‘गुज़ार लिए’ शब्द ठीक नहीं रहेगा. इससे बेचारगी झलकती है. वे अपने आपको कभी बेचारी सिद्ध नहीं होने देंगी… नलिन ने व्यंग्यभरी मुस्कान से ताका या कुछ ताना कसा तो? तो वे उल्टे क़दमों से लौट आएंगी और फिर कभी उस ओर रुख़ नहीं करेंगी. लेकिन इन सबसे काव्या को क्या संदेश जाएगा? यह संवेदनशील लड़की तो हमेशा के लिए शादी से मुंह मोड़ लेगी. ओह, यह मैं क्या कर बैठी? मैं यहां आने के लिए राज़ी ही क्यों हुई?

उधर काव्या के दिमाग़ में भी उथल-पुथल मची हुई थी. यदि आमने-सामने होने पर एक बार फिर दोनों के अहम् टकरा गए, तो उसकी अब तक की सारी जांच-पड़ताल, मीलों का यह कष्टदायी सफ़र, जो शारीरिक से भी ज़्यादा मानसिक रूप से कष्टदायी सिद्ध हो रहा था, सब व्यर्थ चला जाएगा. पर जो भी हो, मम्मी की ज़िंदगी का फैसला किए बिना वह अपनी नई ज़िंदगी की शुरुआत नहीं कर सकती.

गंतव्य तक पहुंचने के लिए मां-बेटी को ज़्यादा मश़क़्क़त नहीं करनी पड़ी. हां, मश़क़्क़त करनी पड़ी, तो बंद दरवाज़े की घंटी बजाने की हिम्मत जुटाने में. कुछ देर दिल थामकर इंतज़ार करने के बाद दरवाज़ा खुला. दरवाज़ा खोलनेवाले शख़्स को देखकर प्रमिलाजी का कलेजा मुंह को आने लगा. यह उनका नलिन है? उनकी कल्पना के यंग, स्मार्ट, हैंडसम नलिन की जगह यह कौन स़फेद बाल, कृशकाय शरीर और झुर्रियोंवाला चेहरा लिए बूढ़ा खड़ा था? मोटे लेंस की ऐनक के पीछे से झांककर पहचानने का प्रयास करता वह कृशकाय थरथराता शरीर जैसे ही ढहने लगा, काव्या ने आगे बढ़कर उसे थाम लिया, “पापा!”

नज़रभर काव्या को देखने और फिर प्रमिला को देख नलिन हर्षातिरेक से बोले, “काव्या? मेरी बच्ची?… यह हमारी बेटी ही है न प्रमिला? ओह… मैं… मैं… सपना तो नहीं देख रहा? मुझे विश्‍वास दिलाओ… कोई मुझे नींद से जगाओ.” नलिन मानो ख़ुशी से बौरा उठे थे. प्रमिलाजी और काव्या ने सहारा देकर उन्हें सोफे पर बैठाया. सबकी डबडबाई आंखें बरसने लगीं. पंद्रह बरसों के वियोग की पीड़ा बहते निःशब्द आंसुओं में कब घुलकर बह गई, किसी को पता ही नहीं लगा. प्रमिलाजी के दिमाग़ में कब से चल रहे संवाद, प्रतिसंवाद, व्यंग्य-प्रतिव्यंग्य, कटुक्तियां जाने कहां तिरोहित हो गई थीं. इस अशक्त, निरीह, व़क़्त के थपेड़ों से घायल इंसान पर वह अब और क्या प्रहार करे? दया, सहानुभूति और अंततः निर्मल प्रेम का सागर उनके हृदय में हिलोरें लेने लगा था. नलिन भी शायद ऐसी ही मनःस्थिति से गुज़र रहे थे. नज़रें चुराती आंखों ने मानो वाक्क्षमता भी चुरा ली थी.

“मैं रसोई देखती हूं और कुछ चाय-पानी का प्रबंध करती हूं.” कहते हुए काव्या खिसक ली. उसका सोचना सही था. एकांत ने दिलों की दूरियां और मीलों के फ़ासले पल में मिटा दिए. जान-बूझकर काफ़ी देर लगाकर जब वह चाय की ट्रे लेकर कमरे में दाख़िल हुई तो नलिन उसे अपलक ताकते रह गए.

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“कितनी बड़ी, समझदार और सुंदर हो गई है हमारी छोटी-सी गुड़िया!” पापा के उद्गार सुन काव्या सकुचा उठी.

“बस, यह अंतिम ज़िम्मेदारी रह गई है मेरी. इसे अच्छा घर-वर देखकर विदा कर दूं…”

“अब यह हमारी ज़िम्मेदारी है.” नलिन ने ‘हमारी’ शब्द पर ज़ोर देते हुए काव्या को अपने पास बैठा लिया और स्नेह से उसके सिर पर हाथ फेरने लगे.

काव्या सोच रही थी, रिश्तों में सद्भाव और मिठास हो, तो ज़िंदगी का हर अध्याय ही सुनहरा है. गृहस्थी बसाने से पूर्व ही वह शनैः शनैः सफल गृहस्थ जीवन के समस्त गुर आत्मसात् करती जा रही थी.

Sangeeta Mathur

     संगीता माथुर

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कहानी- स्नेह के सूत्र (Short Story- Sneh Ke Sutra)

“यूं तो हम समानता की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं, लेकिन बात जब अपने पर आती है, तो अक्सर हमसे चूक हो जाती है. हम भूल जाते हैं कि जिस तरह हमने बेटे को पढ़ा-लिखाकर बड़ा किया है, बहू की परवरिश भी उसी तरह हुई होगी. हमें अपने बेटे से अपेक्षाएं रहती हैं, तो बहू का भी अपने माता-पिता के प्रति कुछ फ़र्ज़ बनता है.”

Kahani

रिचा का फोन आने से संध्या का मन और भी क्षुब्ध हो उठा. क्या समझते हैं ये बच्चे स्वयं को. ये जो कहेंगे, जैसा कहेंगे, हम करने को बाध्य होंगे. मानो हम लोग हाड़-मांस का शरीर न होकर कोई मशीन मात्र हों, जिसका काम बस बच्चों का हुक्म बजाना हो. नहीं…नहीं… वह रिचा के मायके हरगिज़ नहीं जाएगी. रिचा को उसकी भावनाओं की तनिक भी फ़िक़्र होती, तो घर में तनाव का माहौल न रखती. आख़िर ऐसा क्या कह दिया था उसने, जो वह इतने दिनों से मुंह फुलाए घूम रही है.

अकेले रिचा का दोष नहीं है. रजत भी उसी का साथ दे रहा है. उसे भी कहां फ़िक़्र है अपने माता-पिता की. कभी-कभी बहुत सोच-विचार कर लिए गए फैसले भी ग़लत साबित होते हैं. नवीन के रिटायरमेंट पर रजत व रिचा दिल्ली आए थे. उस समय दोनों ने अपनत्व भरे शब्दों में कहा था,

“मां-पापा, अब हम आपको अकेले नहीं रहने देंगे. आपको हमारे साथ पूना रहना होगा.” नवीन हंसे थे. “मैं रिटायर भले ही हो गया हूं, पर अभी बूढ़ा नहीं हुआ हूं.”

“पापा, हमें आपकी चिंता रहती है. अब आप फ्री हैं, आराम से पूना सेटल हो सकते हैं.”

संध्या व नवीन काफ़ी दिनों तक सोच-विचार करते रहे थे. नवीन का दिल्ली में अच्छा फ्रेंड सर्कल था.

“एक दिन तो हमें बच्चों के पास जाकर रहना ही पड़ेगा, तो क्यों न अभी जाएं. अभी वे हमें बुला रहे हैं. कल को उम्र बढ़ने पर शरीर अशक्त हो गया और बच्चों ने नहीं बुलाया, तब क्या करेंगे?” संध्या की बात से नवीन सहमत हो गए. पूना पहुंचकर उन्हें सुकून मिला. रजत और रिचा उनका ध्यान रखते थे. संध्या को लगा, उनका बुढ़ापा आराम से कट जाएगा, पर कुछ माह ही बीते होंगे कि कुछ बातें उन्हें बुरी तरह से खटकने लगीं.

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रिचा व रजत की अपनी ही दुनिया थी. दोस्तों के यहां ख़ूब आना-जाना होता. रिचा का मायका कुछ ही दूरी पर था. घर में उसकी मम्मी मीना व छोटी बहन अनु थे. पापा का दो वर्ष पूर्व स्वर्गवास हो चुका था. उनकी जगह पर मीना को बैंक में नौकरी मिल गई थी. घर में कोई पुरुष मेंबर न होने के कारण मीना अपने हर काम में रजत की राय लेती. अनु भी अपने जीजू के साथ खुली हुई थी. यह सब देखकर संध्या और नवीन मन ही मन कुढ़ते.

नवीन अक्सर कहते, “पहले ये लोग जैसे भी रहते हों, कम से कम हमारी उपस्थिति में तो इन्हें अपना रवैया बदलना चाहिए.” उस दिन तो हद ही हो गई. संध्या को सुबह से बुख़ार व सिरदर्द था. शाम को रजत ऑफिस से लौटा, तो अपने साथ मीना को भी लेता आया. उन्हें देख संध्या उठने लगी, तो मीना बोली, “आपकी तबीयत ख़राब है. आप लेटी रहिए. मैं सबके लिए चाय बना लाती हूं.” थोड़ी देर में मीना चाय और पकौड़े बना लाई. पकौड़े देख रजत चहका, “अरे वाह, आपको कैसे पता, मेरी पकौड़े खाने की इच्छा हो रही थी.”

“बच्चों के दिल की बात हम मांएं नहीं समझेंगी तो कौन समझेगा, क्यों संध्याजी.” मीना ने संध्या की ओर देख मुस्कुराकर कहा. संध्या ने बेमन से गर्दन हिला दी. तभी रिचा और अनु भी आ गए. पकौड़े देख अनु ने फ़रमाइश की, “जीजू, पकौड़ों के साथ जलेबी का कॉम्बीनेशन कैसा रहेगा?”

“अभी लो.” रजत लपकता हुआ मार्केट गया और जलेबी ले आया. रात में सब को गर्म खाना खिलाकर मीना और अनु अपने घर चले गए, तो संध्या नवीन से बोली, “मां-बेटी को बिल्कुल शर्म नहीं है. लगता ही नहीं, अपने दामाद के घर बैठी हैं.”

“जब अपना ही सिक्का खोटा हो, तो किसी का क्या दोष?”

“देखा नहीं इन लोगों के आने पर रजत भी कितना प्रसन्न रहता है.”

“मेरा ख़्याल है, हमें रजत को बताना चाहिए कि इस तरह रोज़ का आना-जाना हमें पसंद नहीं है.”

“सोच लो, कहीं वह बुरा न मान जाए.” नवीन ने आशंका जताई.

“मानने दो. जब हमें यहां बुलाया है, तो हमारी इच्छाओं का भी ध्यान रखना चाहिए.” अगली सुबह अनु खाने का टिफिन लेकर आई, तो संध्या बोली, “अब मैं बिल्कुल ठीक हूं. मम्मी से कहना, शाम का भोजन बनाने की तकलीफ़ न करें.”

एक दिन मौक़ा देख उसने रजत से कहा, “तुम्हारी दीदी का फोन आया था. वह हमें अहमदाबाद बुला रही है, किंतु मैंने इंकार कर दिया.”

“मम्मी, कुछ दिनों के लिए चली जाइए. आपको चेंज मिल जाएगा.”

“छह माह पूर्व हम उसके पास गए थे. इतनी जल्दी जाने का क्या तुक है?” रिचा उसका व्यंग्य समझ गई. वह तुनककर बोली, “मां, मैं समझ गई हूं, आपका इशारा किस ओर है. रजत, मैंने तुमसे कहा था न कि मां को मम्मी और अनु का यहां आना पसंद नहीं है. अब तुम स्वयं देख लो.” रजत ख़ामोश रहा.

रिचा बोली, “मां, मैंने रजत से शादी से पहले ही कह दिया था कि मैं सदैव अपनी मम्मी और बहन का ध्यान रखूंगी. जिस तरह आप लोगों के प्रति हमारा फ़र्ज़ है, उसी तरह उन दोनों की देखभाल करना भी हमारा दायित्व है.” रिचा ग़ुस्से में कमरे से बाहर चली गई. रजत भी उसके पीछे-पीछे चल दिया. उस दिन से घर में तनाव रहने लगा.

रिचा का अपने घरवालों के साथ आना-जाना तो कम नहीं हुआ, हां, संध्या व नवीन के प्रति उसके व्यवहार में बदलाव अवश्य आ गया. पहले मीना और अनु घर पर आते, तो रिचा चाहती कि सब लोग इकट्ठे बैठें, हंसे-बोलें, खाएं-पीएं. लेकिन अब उसने ऐसा प्रयास छोड़ दिया था. एक दिन संध्या ने नवीन से कहा, “इससे तो हम दिल्ली में रहते, तो अच्छा होता.”

नवीन झुंझला उठे, “अक्सर इंसान भविष्य की चिंता में अपना वर्तमान भी बिगाड़ लेता है. यही तुमने किया है. मैंने तुमसे कहा था कि अपना शहर छोड़ना ठीक नहीं है. बच्चों के पास कुछ दिन रहो, उसी में इज़्ज़त है. आजकल के बच्चे ऐसे कहां हैं कि बड़ों की बात का मान रखें, पर तुम मेरी सुनती ही कहां हो. अपने साथ-साथ मेरी भी ज़िंदगी ख़राब कर दी.” संध्या ख़ामोश रही. अब तो उसे नवीन की बातें सुननी ही थीं.

उन दिनों से संध्या व नवीन का मन काफ़ी उचाट रहने लगा था. दिनभर घर में रहते बोर हो जाते. पहाड़-सा दिन काटे नहीं कटता था. बेटा-बहू तो दिनभर ऑफिस में रहते. घर पर होते, तब भी रिचा से कम ही बात होती थी.

एक दिन रजत का सुझाव आया, “अपनी कॉलोनी से कुछ ही दूरी पर रिटायर्ड लोगों का एक क्लब है. उसे जॉइन कर लीजिए. वहां आप दोनों को हमउम्र लोग मिलेंगे, तो दिल बहल जाएगा.” रजत का सुझाव उन्हें पसंद आया. अगले ही दिन उन्होंने क्लब जॉइन कर  लिया. क्लब में समय तो अच्छा गुज़र जाता, पर घर के तनाव से मन पर बोझ बना हुआ था.

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क्लब में ही उनकी मुलाक़ात कमलनाथजी व उनकी पत्नी से हुई. दोनों को उनका स्वभाव बहुत पसंद आया. धीरे-धीरे उनकी दोस्ती बढ़ने लगी. उस दिन शनिवार था. रजत व रिचा की छुट्टी थी. संध्या ने सोचा कि आज कमलनाथ दंपति को डिनर पर बुलाएंगे, पर इससे पहले कि वह यह बात रिचा को बताती, रिचा तैयार होकर उसके कमरे में आई और बोली, “मां, मैं और रजत घर जा रहे हैं, कुछ ज़रूरी काम है. कल वापस आएंगे.” संध्या को क्रोध आ गया.

रिचा और रजत के जाने के बाद वह बड़बड़ाने लगी, “क्या काम है, माता-पिता को यह बताना भी ज़रूरी नहीं समझा. बस, मुंह उठाया और चल दिए.”

“अरे, काम-वाम कुछ नहीं, बस जाने का बहाना चाहिए. ख़ैर, हम भी घर पर बोर क्यों होएं. चलो, कमलनाथजी के घर चलते हैं.” तैयार होकर वे दोनों घर से निकल पड़े. रास्ते में रिचा का फोन आया, “मां, अनु की शादी की बात होनी है. आप दोनों घर आ जाएं. लीजिए मम्मी से बात कीजिए.” मीना की आवाज़ आई, “भाभीजी, आपका और भाईसाहब का आना ज़रूरी है. आप दोनों बड़े हैं. आपकी राय के बिना कुछ नहीं हो सकेगा.”

“हम कोशिश करेंगे.” उखड़े स्वर में संध्या ने जवाब दिया और फोन काट दिया. थोड़ी देर में वे दोनों कमलनाथजी के घर पहुंचे. कमलनाथजी अपनी पत्नी के साथ गेट पर ही मिल गए. साथ में एक सज्जन भी थे. नवीन व संध्या का स्वागत करते हुए उन्होंने कहा, “इनसे मिलिए, ये हमारे समधी डॉ. ब्रजेश हैं, हमारी बहू के पिताजी.” नवीन ने उनसे हाथ मिलाया. डॉ. ब्रजेश बोले, “मैं चलता हूं कमलनाथ.”

“कल समय से आ जाना डॉक्टर व याद रखना कल तुम्हें पार्टी भी देनी है.” इस पर दोनों हंस पड़े.

डॉ. ब्रजेश के जाने पर लॉन में बैठते हुए नवीन बोले, “लगता है, अपने समधी के साथ आपके बहुत दोस्ताना संबंध हैं.”

“हां, रिश्तों को दोस्ताना बना लो, तो उन्हें निभाना सहज हो जाता है. उन्हें व मुझे दोनों को शतरंज का शौक़ है. जब भी मिलते हैं, शतरंज की बाज़ी ज़रूर जमती है.”

“आप ख़ुशक़िस्मत हैं, जो आपको इतने अच्छे समधी मिले, अन्यथा कभी-कभी तो रिश्तेदारी बोझ बन जाती है.” नवीन बुझे मन से बोले.

“इस सदंर्भ में मेरे विचार भिन्न हैं. नवीन, मेरा यह मानना है कि रिश्ते कभी बोझ नहीं होते, बस उन्हें निभाने की कला आनी चाहिए.”

“आपकी समधन नहीं आई थीं.” संध्या ने बात बदली. मिसेज़ कमलनाथ ने बताया, “आई हैं न. अभी अपनी बेटी यानी हमारी बहू के साथ मार्केट गई हुई हैं. आज रात यहीं रुकेंगी.” कमलनाथ बताने लगे, “डॉ. ब्रजेश के बेटा-बहू लंदन में हैं. पति-पत्नी यहां अकेले हैं, इसलिए अक्सर आते रहते हैं. कभी-कभी रात में रुक भी जाते हैं.”

संध्या बोली, “लगता है, आपके व हमारे घर की कहानी एक जैसी है. हमारी बहू रिचा का मायका घर से कुछ ही दूरी पर है. हर व़क्त का आना-जाना लगा रहता है. हम दोनों को बिल्कुल अच्छा नहीं लगता. एक दिन मैंने रिचा को कह ही दिया कि मायकेवालों का ज़्यादा आना-जाना ठीक नहीं लगता है. बस, उसी दिन से वह उखड़ी-उखड़ी रहती है. घर में एक तनाव-सा रहने लगा है. बेटा भी उसे समझाने के बदले उसी का पक्ष लेता है. अरे, पुराने समय में तो लोग बेटी के घर का पानी भी नहीं पीते थे. आज का ज़माना बदल गया है. लोग एडवांस हो गए हैं, पर इसका अर्थ यह नहीं कि सास-ससुर का कोई लिहाज़ ही न हो. जब देखो, मुंह उठाया और चले आए.”

नवीन भारी मन से बोले, “दरअसल, दिल्ली से यहां आना हम लोगों की भूल थी. रजत और रिचा अपनी दुनिया में मस्त हैं. उसमें हमारे लिए कोई जगह नहीं.”

मिसेज़ कमलनाथ चाय लेकर आई थीं. सब के हाथ में एक-एक कप पकड़ाते हुए बोलीं, “भाईसाहब, पैरेंट्स हमेशा पैरेंट्स ही होते हैं. बच्चों की ज़िंदगी में हमेशा उनकी जगह होती है. ऐसा न होता, तो वे आपको पूना क्यों बुलाते?”

“पूना बुलाकर अपना फ़र्ज़ पूरा कर दिया, पर हमारी भावनाओं का सम्मान तो नहीं रखा.”

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“संध्या, स्पष्टवादी हूं. बुरा मत मानना, हम बड़े अपनी हर इच्छा को बच्चों पर थोपना क्यों चाहते हैं? क्यों चाहते हैं कि हम जैसा कहें, वे वैसा ही करें. सहज होकर उनके साथ क्यों नहीं रह सकते. जो बात तुम्हारे लिए छोटी है, उनके लिए बहुत बड़ी है. अंतर स़िर्फ सोच का है. नवीन का व़क्त अब बहुत आगे बढ़ गया है. न जाने कितनी पुरानी मान्यताओं को हम पीछे छोड़ चुके हैं, पर अपनी इस सोच से आज भी चिपके रहना चाहते हैं कि बहू के मायकेवालों का आना-जाना ठीक नहीं लगता. क्या तुम्हारे घर में दूसरे लोग नहीं आते? बेटे के दोस्त, रिश्तेदार, फिर बहू के मायकेवालों से ही इतना परहेज़ क्यों है?

यूं तो हम समानता की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं, लेकिन बात जब अपने पर आती है, तो अक्सर हमसे चूक हो जाती है. हम भूल जाते हैं कि जिस तरह हमने बेटे को पढ़ा-लिखाकर बड़ा किया है, बहू की परवरिश भी उसी तरह हुई होगी. हमें अपने बेटे से अपेक्षाएं रहती हैं, तो बहू का भी अपने माता-पिता के प्रति कुछ फ़र्ज़ बनता है.

विवाह स़िर्फ दो व्यक्तियों को ही आपस में नहीं जोड़ता है, बल्कि इससे दो परिवार भी स्नेह के सूत्र में बंधते हैं. हमारे बेटे की जब शादी हुई, तब हम दोनों ने सोच लिया था कि बहू के साथ-साथ हम उसके परिवार को भी खुले मन से स्वीकारेंगे. अपने पैंरेंट्स के लिए वह जो भी करना चाहेगी, उसमें भरपूर सहयोग देंगे. सकारात्मक होकर जब हम रिश्तों के तार दूसरों से जोड़ते हैं, तो सकारात्मक असर होता है. आपको जो भी हमारे घर का सौहार्दपूर्ण वातावरण दिखाई दे रहा है, इसकी वजह यही है कि हम बच्चों की ज़िंदगी में दख़लअंदाज़ी नहीं करते. उनसे अधिक अपेक्षाएं भी नहीं रखते, बस, एक सहयोगी की भूमिका निभाते हैं.

नवीन, यह ध्यान रखो, बेटा तुम्हारा ही है, फिर भी पराया हो चुका है. एक नए बंधन में बंध चुका है. उसकी अब एक नई दुनिया है, जिसमें बेवजह की दख़लअंदाज़ी करने से रिश्ते बिगड़ सकते हैं. बदलते समय के साथ अपने व्यवहार व सोच में परिवर्तन लाओ, ताकि बच्चे तुमसे खुलकर बात कर सकें. तुम्हारी कंपनी को एंजॉय कर सकें.” संध्या मंत्रमुग्ध-सी कमलनाथजी को सुन रही थी. उसे महसूस हुआ कि उसके मन की गांठें परत-दर-परत खुल रही हैं. अब तक बंद पड़े ज़ेहन के दरवाज़े खुल गए हैं और शीतल मंद बयार बहने लगी है. अब वह स्वयं को बहुत हल्का महसूस कर रही थी.

सच! यदि सकारात्मक सोच हो, तो परिस्थितियों का स्वरूप ही बदल जाता है. जिसे वह मीनाजी की अनाधिकृत कोशिश मानती थी, अब लग रहा था, वह उनका स्नेह व अपनापन था. नवीन भी कमलनाथजी के विचारों से अभिभूत थे. कह रहे थे, “मैं आपका सदैव आभारी रहूंगा, सही समय पर आपने हमारी सोच की दिशा बदल दी. हमें परिस्थितियों को देखने का एक नया नज़रिया दिया. आज हम उम्र के जिस पड़ाव पर हैं, उस पर हमें इन छोटी-छोटी बातों से ऊपर उठकर कुछ उद्देश्यपूर्ण सोचना चाहिए.” कमलनाथजी ने मुस्कुराकर सहमति जताई. संध्या बोली, “अब हमें चलना चाहिए. रिचा व उसकी मम्मी हमारी प्रतीक्षा कर रही होंगी.” कमलनाथ व उनकी पत्नी से विदा लेकर संध्या व नवीन पुनः अपने रिश्ते को स्नेह के सूत्र में बांधने के लिए रिचा के मायके की ओर चल दिए.

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      रेनू मंडल

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कहानी- दूसरा जनम (Short Story- Doosara Janam)

मैं अब अकेली रह गई, निस्सहाय! मुझे रोना आ गया. रोते-रोते मेरी हिचकियां बंध गईं. भाई कभी डूबता, कभी उतराता. उसकी हालत ख़राब होती जा रही थी और मेरे पास रोने के अलावा और कोई चारा नहीं था. उसे अकेला छोड़कर भी नहीं जा सकती थी. मैं मन-ही-मन भगवान को याद कर रही थी कि मेरे भाई को बचा लो. मां ने एक बार हमें बतलाया था कि जो भी सच्चे मन से भगवान को पुकारता है, उसकी सहायता के लिए वे अवश्य ही आते हैं.

Bacho Ki Kahani

कभी-कभी जीवन में कुछ ऐसा घट जाता है, जिसकी याद सदा बनी रहती है. मुझे जब भी वह दिन याद आता है, तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं और फिर घंटों उस घटना के बारे में सोचती रहती हूं. और लाख कोशिश करने पर भी वह बात दिल और दिमाग़ से हटती ही नहीं.

मैं जब छोटी थी, तो ज़्यादातर खेलने में ही ध्यान रहता. पढ़ने में मन लगता ही नहीं था. संयुक्त परिवार था हमारा. हम छः-सात भाई-बहन स्कूल जाते एक साथ. मां और चाची सुबह से उठकर हमें उठाने और तैयार करने में लग जाती थीं. सुबह सात बजे बुलाने वाली आ जाती थी. वह कई घरों से बच्चों को जमा करके स्कूल पहुंचाती थी.

दोपहर को स्कूल से लौटने के बाद मां-चाची हमें बिस्तरों पर सोने के लिए लिटा देतीं. हमें सुलाते-सुलाते मां और चाची की तो आंख लग जाती, लेकिन हमारी आंखों में नींद कहां? हम चुपके से उठ कर दरवाज़ा खोल बाहर निकल जाते खेलने के लिए. बीच में मां की आंख ख्ुलती, तो हमें न पाकर ग़ुस्से में बाहर आती और फिर पकड़कर अन्दर ले जाकर फिर से डांट-डपटकर सुला देती. कई बार जब हम बहुत शैतानी करते, तो हमारी पिटाई भी कर देती. मां से हमें डर भी बहुत लगता था, लेकिन हम भी मजबूर थे मन तो हमेशा खेल-कूद में ही लगा रहता था.

इसी तरह हमारे दिन बीत रहे थे. जाड़ा हो, गर्मी हो या बरसात, दोपहर को खाना खाकर 15-20 मिनट लेटना ही हमारे लिए काफ़ी था. दो-चार बच्चे पड़ोस के भी आ जाते और हम, खूब उत्पात मचाते. कभी ‘‘छिपा छिपौअल’’ खेलते तो कभी कुछ और.

पिताजी का बड़ा रौब था घर में. शाम को जब उनके द़फ़्तर से आने का समय होता तो हम सब घर के अन्दर आ के चुपचाप से अपनी-अपनी किताब निकाल कर पढ़ने बैठ जाते. पिताजी हमें बहुत सीधे-सादे और अच्छे बच्चे समझते. लेकिन हैरानी की बात ये थी कि इतनी शैतानी और खेलकूद के बावजूद हम सब पढ़ने में अच्छे थे और हमेशा अव्वल नंबर से पास होते थे. पिताजी को हमारी पढ़ाई पर नाज़ था. जब हम अपना रिपोर्ट कार्ड लेकर घर आते तो वह बहुत ख़ुश होते थे, यह देख कर कि हम सब कितने अच्छे नंम्बर से पास हुए हैं.

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उन दिनों बरसात का मौसम था और हमारे घर के पास ही एक और घर बन रहा था. जगह-जगह चूने, मिट्टी और ईटों के ढेर लगे हुए थे. उन ईंटों के बीच में ही हम लुकने-छिपने का खेल खेलते थे. घर बनाने के लिए पानी की ज़रूरत होती है. इसलिए जब भी ऐसा कोई बिल्डिंग बनाने का काम होता है, तो पास में ही पानी के लिए एक बड़ा-सा गड्ढा खोद कर उसमें पानी भर देते हैं. उस समय भी जब घर बन रहा था तो गड्ढा खोदा गया था और उसे पानी से भर दिया गया था. हम सब काग़ज़ की नावें बना-बनाकर उसमें डालते और देखते कि किसकी नाव कितनी देर तैर कर पानी में डूबती है. जिसकी नाव सबसे देर तक तैरती रहती, वही जीत जाता.

एक दिन बारिश बहुत हुई थी और हर तरफ़ फिसलन हो गई थी. बारिश के पानी से वह गड्ढा और भी भर गया था. हमारा नावों का खेल ज़ारी था. कोई 10-12 नावें गड्ढे में तैर रही थीं. सब अपनी-अपनी नाव को संभाल रहे थे. ठण्डी हवा चल रही थी. बहुत ही सुहावना मौसम था. बड़ा ही आनन्द आ रहा था. पांच वर्ष का मेरा छोटा भाई भी खेल में शामिल था, एक नाव उसकी भी थी. एक छोटी डण्डी उसके हाथ में भी थी. वह भी अपनी नांव को सम्भाल रहा था. देखते-देखते उसकी नाव बहकर पानी में कुछ दूर चली गई. अपनी डण्डी से वह उसे अपने पास लाने की कोशिश कर रहा था.

इसी चक्कर में मेरे भाई ने ज़रा-सा अपना पैर आगे बढ़ाया ही था कि वह फिसल गया और गड्ढे में जा गिरा. अब वह उस पानी में डुबकी लगाने लगा. उसने हाथ ऊपर किए, मैंने उसका हाथ पकड़ने की कोशिश की, लेकिन मैं भी फिसलने लगी. बाकी के बच्चों ने जब यह देखा, तो इस डर से भाग गए कि कहीं उन पर दोष न लग जाए कि तुमने धक्का दिया होगा. मैं अब अकेली रह गई, निस्सहाय! मुझे रोना आ गया. रोते-रोते मेरी हिचकियां बंध गईं. भाई कभी डूबता, कभी उतराता. उसकी हालत ख़राब होती जा रही थी और मेरे पास रोने के अलावा और कोई चारा नहीं था. उसे अकेला छोड़कर भी नहीं जा सकती थी. मैं मन-ही-मन भगवान को याद कर रही थी कि मेरे भाई को बचा लो. मां ने एक बार हमें बतलाया था कि जो भी सच्चे मन से भगवान को पुकारता है, उसकी सहायता के लिए वे अवश्य ही आते हैं.

तभी पड़ोस के घर से उनका नौकर अपना काम ख़त्म करके बाहर निकला. उसने मुझे अकेले खड़े रोते देखा. मेरे पास आया और बोला, ‘‘बेबी क्या बात है? क्यों रो रही हो?’’ मेरे मुंह से बोल नहीं निकले. रुलाई और भी ज़ोर से छूट गई. मैंने इशारे से कहा, ‘‘वो…वो देखो.’’

‘‘उसने देखा तो एक क्षण भी सोचे बिना वह गड्ढे में कूद गया और भाई को गोदी में उठा लिया और पानी और फिसलन में से बड़ी मुश्किल से गड्ढे में से बाहर निकला और मेरे पास आकर बोला, ‘‘चलो बेबी, तुम्हें घर पहुंचा दूं.’’

हम जब घर आए, तो भाई की ऐसी हालत देखकर मां हक्की-बक्की रह गई. इससे पहले कि वह कुछ बोलतीं, नौकर बोला, ‘‘लो माईजी, सम्भालो अपने लाड़ले को. आज तो भगवान की बड़ी कृपा हो गई. बस समझ लो बाबा को नई ज़िन्दगी मिली है. यदि मैं समय पर न पहुंचता तो पता नहीं क्या हो जाता. मुझे तो, समझो, भगवान ने ही भेज दिया.”

मां ने लपककर भाई को अपनी गोदी में उठा लिया. उनकी आंखों में आंसू आ गए. पूछने लगी, ‘‘क्या हो गया इसे? ये सब क्या हुआ? क्यों हुआ? कैसे हुआ?’’ एक साथ घबराहट में इतने सारे प्रश्‍न पूछ डाले उन्होंने. तब नौकर ने पूरी बात बताई, ‘‘माईजी, वो तो आपकी तक़दीर अच्छी थी. थोड़ी भी और देर हो जाती तो मालूम नहीं क्या होता. बाबा बच गया! अब तो आप लड्डू मंगाकर भगवान का भोग लगाइए और सारे मोहल्ले में बांटिए. बाबा का नया जनम हुआ है.’’ मां ने तुरन्त रुपए निकालकर उस नौकर को दिए और कहा, ‘‘तुमने इतना बड़ा काम किया है, अब तुम्ही लड्डू भी लाओ, फिर शाम को हम सब मन्दिर जाकर भगवान का भोग लगाकर आएंगे.’’

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शाम को पिताजी जब द़फ़्तर से आए और उन्हें यह सब हाल पता चला, तो उन्होंने भगवान का बड़ा धन्यवाद किया- बड़ी प्रार्थना की, ‘हे प्रभो ! तुमने ही मेरे बेटे की ज़िन्दगी बचाई है. हे भगवान, तुम्हारे बड़े लम्बे हाथ हैं. तुम्हारी इस कृपा के लिए हम सब नतमस्तक हैं.’’ फिर भाई को गोदी में लेकर बहुत प्यार किया और मुझे भी अपने पास बुलाकर प्यार किया और कहने लगे, ‘‘तेरी वजह से ही इसकी जान बच गई. तू भी अगर और सबकी तरह भाग जाती, तो वह नौकर गड्ढे में झांकने थोड़े ही आता!’’

शाम को हम सब मन्दिर गए, प्रसाद चढ़ाया भगवान को. मां ने भाई के हाथ से बहुत-सा दान-पुण्य करवाया.

उस दिन मेरी समझ में आया, कि दिल की पुकार भगवान ज़रूर सुनते हैं. मेरी आवाज़ उन्होंने सुनी और नौकर के रूप में आकर भाई को बचा लिया.

मेरा वह भाई अब बहुत बड़ा हो गया है. बाल-बच्चोंवाला है और नौकरी से रिटायर भी हो गया है. हम लोग कई बार उस घटना की बातें करते हैं और हर बार भगवान की कृपा के लिए नतमस्तक हो जाते हैं. मुझे आज भी जब कभी उस घटना की याद आती है, तो पूरे शरीर में सिहरन-सी दौड़ जाती है और रोंगटे खड़े हो जाते हैं. सचमुच मैं तो यही समझती भी हूं कि मेरे भाई का दूसरा जनम ही हुआ था- यही सच भी है कि पूर्ण रूप से आश्रित होकर- शरणागत होकर सच्चे दिल से जो भगवान को पुकारता है, उसकी सहायता के लिए वे नंगे पैरों दौड़े आते हैं.

– शकुन्तला माथुर

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कहानी- अप्रत्याशित (Short Story- Apratyashit)

वे दुर्लभ क्षण थे. हमने मैडम की चढ़ी हुई नज़रों को मुलायम पड़ते देखा. मुस्कुराते देखा, जो अब तक नहीं देखा था. शायद सिंधु ने देखा होगा. मैडम साफ़तौर पर परिवर्तन से गुज़र रही थीं. प्रेम में बड़ी शक्ति होती है, यह प्रमाणित हो रहा था. सप्रे सर अनोखे सिद्ध हो रहे थे.

Kahaniya

कॉलेज के वे दिन भी क्या दिन थे. हम छात्राओं पर हरदम ज्वाला मैडम का आतंक बना रहता. ज्वाला मैडम, एक उलझा हुआ व्यक्तित्व. सांवला रंग, मझौला क़द, चालीस के आसपास का प्रसाधन विहीन सख़्त चेहरा, क्रोधी कपाल, सिकुड़ी हुई शुष्क आंखें, जहां किसी चमकीले सपने को कभी जगह न मिली होगी. कुंठा भरे कुटिल जान पड़ते अधर, एक मज़बूत चोटी की शक्ल में बंधे सज़ा पाए से केश, नियमित स़फेद ब्लाउज़ के साथ पहनी गई कलफ़ लगी हल्के रंग की सूती साड़ी. रजिस्टर और चॉक का डिब्बा संभालती हुई मैडम तेज़ी से कक्षा में दाख़िल होतीं और इस तरह पढ़ाने लगतीं, मानो देर से पढ़ाते हुए अब पूरी फ्लो में आ गई हैं.

बी.एससी. फाइनल में ज्वाला मैडम हमारी क्लास सप्ताह में दो दिन लेती थीं. वे अच्छा पढ़ाती थीं और प्रश्‍न बहुत पूछती थीं. आतंकित करती उनकी मुद्रा और स्वर के मद्देनज़र हम उन प्रश्‍नों के उत्तर भी न दे पाते, जो हम जानते थे. एक प्रश्‍न का उत्तर दे दो, तो दूसरा प्रश्‍न, फिर तीसरा, जब तक निरुत्तर न हो जाओ सवालों का दौर चलता रहता. निरुत्तर छात्राओं की गर्दनें झुक जातीं. मैडम क्रोधित होकर कहतीं, “मैं इतना समझाकर पढ़ाती हूं, लेकिन तुम लोगों से कुछ नहीं बनता. तुम लोग बेवकूफ़ हो या मुझे पढ़ाना नहीं आता? पढ़ाना नहीं आता, तो मैं अपनी डिग्री रद्द करा लूं?…

तो… तो…”

उनकी प्रत्येक तो पर हम छात्राएं डरी हुई और मौन. मैडम समझ जातीं कि इस तरह हमसे उत्तर नहीं उगलवा पाएंगी. वे चॉक का टुकड़ा उछाल देतीं. चॉक जिस छात्रा पर पड़े वह हलाल.

“खड़ी हो जाओ.”

छात्रा खड़ी हो जाती.

“मैंने जो पढ़ाया समझ में आया?”

“जी”

“क्या?”

“सब”

“तो इस बोगस बैच में एक गुणी है, जिसे सब समझ में आता है. आओ, चॉक पकड़ो. ब्लैकबोर्ड पर वह सवाल समझाओ, जो तुम्हें समझ में आ गया है.”

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ज्वाला मैडम के मुख पर निर्मम क़िस्म का आनंद छा जाता. मानो छात्राओं को उत्पीड़ित करने में उन्हें तृप्ति मिलती है.

“पर… मैडम, आधा समझ में आया.”

“आधा समझा दो, आधा मैं समझा दूंगी. बार-बार समझाऊंगी. यदि तुम लोग समझना चाहो. ऐसा बोगस बैच मैंने आज तक नहीं देखा. तुम लोग पास नहीं हो सकतीं. रसायनशास्त्र में तो बिल्कुल नहीं. सिंधु, मैंने जो प्रश्‍न पूछा, तुम उसका उत्तर जानती हो?”

सिंधु उत्तर बता देती.

सिंधु मैडम के साथ उनके घर में रहती थी. हमें संदेह था कि मैडम उसे बता देती होंगी कि वे क्लास में क्या पूछनेवाली हैं.

“सिंधु जैसी अच्छी लड़की क्लास में है, वरना मैं इस क्लास में आना छोड़ दूं.”

पहले हम नहीं जानते थे कि ज्वाला मैडम, सिंधु की संरक्षिका हैं. एक बार हम सभी छात्राएं ज्वाला मैडम की चर्चा में लिप्त थीं. सभी अपना-अपना राग आलाप रही थीं.

“मैडम बहुत दुष्ट हैं. इतना डांटती हैं कि आता हुआ उत्तर भी मैं भूल जाती हूं…”

“मैं तो उत्तर जानते हुए भी नहीं बताती कि मैडम को खीझने दो. वे चिल्लाती हैं, तो मुझे मज़ा आता है…”

“सोचती हैं पढ़ाकर हम लोगों पर एहसान कर रही हैं. पढ़ाती हैं, तो वेतन भी तो लेती हैं…”

“प्रैक्टिकल में नंबर काट लेंगी, वरना मैं तो उन्हें करारा जवाब दे दूं…”

“लड़कों के कॉलेज में पढ़ातीं, तो लड़के इन्हें दुरुस्त कर देते… ”

“मुझे लगता है कि इनकी शादी नहीं हुई है, इसलिए निराश रहती हैं…”

“शादी होती, तो पति इन्हें एक दिन न रखता, क्योंकि वह इनका छात्र न होता…”

“सैडिस्ट हैं. इन्हें किसी साइकियाट्रिस्ट से सलाह लेनी चाहिए…”

हम सभी ज्वाला मैडम पर अपनी भड़ास निकाल ही रहे थे कि अचानक सिंधु किसी बेंच से प्रगट हो गई. शायद वह धैर्य से परख रही थी कि हम किस सीमा तक निंदारत हो सकते हैं. प्रायः चुप रहनेवाली सिंधु का पतला चेहरा तप रहा था, “तुम लोग मैडम के बारे में क्या जानती हो? बस, यही कि वे दुष्ट हैं, सैडिस्ट हैं. तुम सबकी सोच घटिया है. दरअसल, मैडम छह भाई-बहनों में सबसे बड़ी हैं. ठीक से पढ़ भी न पाई थीं कि सड़क दुर्घटना में उनके माता-पिता चल बसे. मैडम ने पढ़ाई पूरी करने के बाद नौकरी की और परिवार को संभाला. भाई-बहनों को सेटल किया. अब वे सब अपनी दुनिया में मस्त हैं. मैडम अकेली रह गईं. मैं और मैडम एक गांव के हैं. मैडम ने मेरी विधवा-बेसहारा मां और मुझे अपने पास बुला लिया. मां घर संभालती हैं और एवज में मैडम मुझे पढ़ा रही हैं, वरना मैं और मां गांव में न जाने कब का मर-खप जाते.”

सन्नाटा.

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फिर एक छात्रा की वाणी ने हरकत ली, “मैडम ने जो भी त्याग किया हो, पर हम लोगों को क्यों सताती हैं?”

“वे सताती नहीं हैं, बस थोड़ी सख़्त हैं. वे ख़ुद को स्ट्रिक्ट न बनातीं, तो उनके भाई-बहन बिगड़ जाते. भाई-बहनों को अनुशासित करते, अपनी इच्छाओं को दबाते हुए मैडम अब सचमुच स्ट्रिक्ट हो गई हैं. वे इस तरह परिस्थितियों के कारण हुई हैं.”

“उनकी जो भी परिस्थिति रही हो, पर वे हमें इस तरह पढ़ाती हैं, जैसे हम लोगों पर एहसान कर रही हैं. हम उनका एहसान क्यों मानें?” एक छात्रा ने उखड़कर कहा.

“यह मैडम का फ्रस्टेशन है. वे चाहती हैं कि उनके भाई-बहन उनका एहसान मानें. उनका मान-सम्मान व लिहाज करें. ज़रूरत में उनके पास आएं, लेकिन वे लोग अपनी दुनिया में मस्त हैं. शायद इसलिए मैडम छात्राओं को दबाने की कोशिश करती हैं कि कहीं तो उनका रुतबा व शासन दिखाई दे.”

आख़िरकार थक-हारकर सिंधु कहती, “जाने दो, तुम लोग उन्हें नहीं समझ सकोगी.”

ज्वाला मैडम पूरे सत्र कहती रहीं कि तुम लोग पास नहीं हो सकतीं, फिर भी हमारे बैच की प्रायः सभी छात्राएं उत्तीर्ण हो गईं. हम ग्यारह छात्राओं ने एमएससी के लिए केमिस्ट्री चुना. मैडम ने स्वागत किया, “तुम लोग पास हो गईं? और सब्जेक्ट केमिस्ट्री चुना? ऐसा बोगस बैच विभाग की छवि ख़राब कर देगा. और सुनो, तुम लोगों के आते ही हमारे इतने अच्छे एचओडी का ट्रांसफर हो गया.”

विभागाध्यक्ष के स्थान पर सांवले, भरे शरीर के प्रसन्न चेहरेवाले सप्रे सर आ गए. सूत्रों से ज्ञात हुआ दो बच्चोंवाले सर विधुर हैं. उनके बेटे तकनीकी पढ़ाई के लिए दिल्ली में हैं और परिसर के क्वार्टर में सर निपट अकेले वास करते हैं. प्रसन्नचित्त सप्रे सर की उपस्थिति में रसायन विभाग में किसी सीमा तक फील गुड वाला माहौल बनने लगा. हमारे शुरुआती दो पीरियड थ्योरी के होते, फिर चार पीरियड प्रैक्टिकल के. जब गैस प्लांट में ख़राबी आ जाती, हाइड्रोजन सल्फाइड गैस का उत्पादन न होता. गैस के बिना प्रैक्टिकल संभव नहीं होगा देखकर फाइनल की छात्राएं दुखी हो जातीं, जबकि स्थिति का लाभ उठाते हुए हम छात्राएं बारह से तीन का समय सिनेमा हॉल में गुज़ार देतीं. सिंधु अपवाद थी. दूसरे दिन क्लास में जोशो-जुनून के साथ फिल्म की समीक्षा की जाती. हम लोग समीक्षा में व्यस्त थे कि कॉरीडोर से गुज़र रही ज्वाला मैडम प्रकट हो गईं.

“किसकी क्लास है?”

हमारे दिल बैठ गए.

सिंधु ने आधिकारिक तौर पर बताया कि निशिगंधा मैडम की फिज़िकल केमिस्ट्री.

“निशिगंधा?” मैडम ने वहशी मुख बनाया.

“निशिगंधा पढ़ाना नहीं चाहती और तुम लोग पढ़ना नहीं चाहतीं. बंक मारकर फिल्में देखो. फेल होकर विभाग की छवि ख़राब करो, ऐसा बोगस बैच…”

मैडम धाराप्रवाह बोलती जा रही थीं कि तभी सप्रे सर दनदनाते हुए क्लास में घुस आए.

“क्या कर रही हो लड़कियां?” मैडम ने सूचना दी, “चीख रही हैं. मास्टर डिग्री लेनेवाली हैं, लेकिन तमीज़ नाममात्र नहीं है.”

मैडम पर कोमल नज़र डाल, सर छात्राओं की ओर मुड़े, “तुम लोग मास्टर डिग्री लेनेवाली हो. हम भी मास्टर. तुम भी मास्टर. पीजी में छात्र और अध्यापक एक बराबर हो जाते हैं. आपस में सामंजस्य होना चाहिए. किसकी क्लास है?”

जवाब मैडम ने दिया, “निशिगंधा की. उनके बच्चे की छमाही परीक्षा है. छुट्टी लेकर उसे कोर्स रटा रही होंगी. मुझे ड्यूटी से भागनेवाले लोग बर्दाश्त नहीं. सर आपको स्ट्रिक्ट होना चाहिए.”

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“ठीक कहती हैं आप.” सर ने प्रेम से मैडम को देखते हुए कहा. सप्रे सर कदाचित पहले शख़्स होंगे, जो मैडम को इस तरह प्यार से देखने का साहस कर सके थे. उनके इस तरह नज़रभर देखने से मानो एक पुख्ता सूत्र हम लोगों के हाथ लग गया और हम लोग अप्रत्याशित पर विचार करने लगे.

सप्रे सर विधुर, ज्वाला मैडम कुंआरी. यदि यह मिलन हो जाए, तो मैडम का घर बस जाए और सर के दिल के वीराने में बहार आ जाए.

“नामुमकिन!”

“सर, मैडम को बहुत दुलार से देखते हैं. पछताएंगे. मैडम झिड़कती कितना हैं.”

“कोई प्रेम करनेवाला नहीं मिला, इसलिए झिड़कती हैं. मिल जाए, तो वे भी सुधर जाएं.”

छात्राएं सप्रे सर की नज़र ताड़ने लगीं.

जल्द ही विभाग ने इस अनुराग का सुराग पा लिया. कॉलेज में अक्सर सेमिनार होते थे, जिसमें बाहर से आए प्राध्यापकों के व्याख्यान होते. सप्रे सर की सुपुर्दगी में यह पहला सेमिनार था. सर के निर्देशानुसार सभी छात्राओं को छोटे-छोटे पुष्प गुच्छ दिए गए कि प्रमुख अतिथि को थमाते हुए अपना परिचय देना होगा. छात्राएं अतिथि को पुष्प गुच्छ पकड़ाएंगी. मैडम नाराज़ हो गईं.

“ल़ड़कियो, यह ड्रामा नहीं होगा. फूलों को इकट्ठा कर गुलदस्ते में सजाओ और गुलदस्ता गेस्ट की मेज़ पर रखो. परिचय अपने स्थान पर खड़े होकर दे देना. तुम लोगों को तो यहां के नियम मालूम हैं.” अंतिम वाक्य मैडम ने फाइनल की छात्राओं से कहा.

“सप्रे सर भोले हैं.” फाइनल की छात्रा ने स्पष्टीकरण दिया.

“सर क्या जानें.” मैडम ने कुछ-कुछ होता है वाली भावदशा में कहा. सिंधु ने अपने अधिकारों का प्रयोग करते हुए पुष्प गुच्छ सबसे छीने और गुलदस्ते में ठूंस दिए. व्यस्तता में डूबे सप्रे सर आए और मेज़ पर सजा भारी गुलदस्ता देख दंग हुए, “लड़कियो, तुम लोगों को समझ में नहीं आता?”

मैडम आगे कूद आईं, “हमारी छात्राएं किसी को फूल पकड़ाएं, यह भद्दा लगेगा.”

मैडम पहली मर्तबा छात्राओं को ‘हमारी’ घोषित कर रही थीं. सप्रे सर ने अजब भाव में कहा, “भद्दा क्या है? औपचारिकता है. मैं पहले जहां था, वहां ऐसे ही होता था.”

“यहां नहीं होता.”

“आपकी मर्ज़ी.”

सप्रे सर समर्पित.

वे दुर्लभ क्षण थे. हमने मैडम की चढ़ी हुई नज़रों को मुलायम पड़ते देखा. मुस्कुराते देखा, जो अब तक नहीं देखा था. शायद सिंधु ने देखा होगा.

मैडम साफ़तौर पर परिवर्तन से गुज़र रही थीं.

प्रेम में बड़ी शक्ति होती है, यह प्रमाणित हो रहा था.

सप्रे सर अनोखे सिद्ध हो रहे थे.

मैडम हमारे साथ प्रयोगशाला में होतीं और सप्रे सर किसी बहाने राउंड पर आ जाते.

मैडम हमारी अयोग्यता साबित करने लगतीं.

सर पर फ़र्क़ नहीं पड़ता, “ठंड बहुत है. लड़कियां अपना काम कर रही हैं. आइए, चाय पीते हैं. घर से मंगवाई है.”

“नहीं… नहीं.”

नहीं, नहीं करते हुए मैडम, सर के पीछे जिस आज्ञाकारिता से जातीं, उससे उनके भीतर खिल रहे मधुर भाव का आभास मिलता था.

और हमने पाया ज्वाला मैडम के स्वभाव में मधुरता आ रही है. कठोर मुद्रा नरम पड़ने लगी है. भिंचते जबड़े ढीले पड़ जाते हैं. कटाक्ष करते-करते थम जाती हैं, मानो अपनी कठोर छवि और पिघलती मनःस्थिति के बीच संघर्षरत हैं. छात्राओं को कभी कुछ अनपेक्षित कहना चाहतीं, तो सप्रे सर संतुलन के लिए हाज़िर.

“आप परेशान होना छोड़ो मैडम. ये लोग नहीं सुधरेंगी. बोगस बैच है.”

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मैडम नज़ाकत से सर को देखतीं और पलकें झुका लेतीं. झुकी पलकें विस्मयकारी प्रेम की पुष्टि करती थीं. फिर भी मैडम के विवाह की सूचना हम लोगों को अविश्‍वसनीय, बल्कि अस्वाभाविक लग रही थी. एक अप्रत्याशित घटना. अधीरता में हम सभी छात्राएं एक साथ बोलने लगी थीं, “सर कमाल के निकले. इस्पात को पिघला दिया.”

“प्रेम में बड़ी ताक़त होती है.”

“इस उम्र में सामंजस्य बैठाने में समस्या होगी.

शादी करनी ही थी, तो ठीक उम्र में कर लेतीं.”

“तब सप्रे सर नहीं मिले थे.”

“सोचो तो मैडम सज-धजकर कैसी लगेंगी? चूड़ी, बिंदी, सिंदूर, मंगलसूत्र…”

“मुझे लगता है, वे ये साज-शृंगार नहीं करेंगी. जैसे सादगी से रहती हैं, वैसे ही रहेंगी.”

सचमुच!

विवाह के बाद कॉलेज आई ज्वाला मैडम की वेशभूषा में कुछ बदलाव के साथ पहले जैसी ही सादगी थी. बस, स़फेद ब्लाउज़ की जगह पर मैचिंग ब्लाउज़, माथे पर छोटी बिंदी, हाथ में कांच के कड़े और वही पुराने डायलवाली घड़ी.

कुल मिलाकर वे हमें पहली बार स्वाभाविक लगी थीं.

Sushma Munindra

     सुषमा मुनीन्द्र

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कहानी- ओल्ड इज़ गोल्ड (Short Story- Old Is Gold)  

 

“ओह! कम ऑन. आरती वो नहीं, तो क्या हम गाएंगे? काश! मेरी भी ऐसी इन-लॉ होतीं.” तभी विनीता बोल उठी, “शिल्पी, हमसे नहीं मिलाओगी अपनी इन-लॉ को? हम लोग तो तरसते हैं कोई बुज़ुर्ग साथ रहे. कितना ईज़ी हो जाता है हमारे लिए भी और बच्चों के लिए भी.” इन बातों से शिल्पी हैरान रह गई. वो सोचती थी कि सभी सहेलियों की चाहत न्यूक्लियर फैमिली ही होगी.

Kahani

डोरबेल बजी तो शिल्पी चौंक गई. दिन के तीन बजे कौन हो सकता है? दरवाज़ा खोला, तो हैरान रह गई. “दीप्ति तुम? इस समय?”

दीप्ति अधीरता से बोली, “शिल्पी, तेरी इन-लॉ घर में ही हैं न?”

“हां, वो कहां जाएंगी? मगर…”

“अगर-मगर छोड़, मुझे उनसे ही मिलना है.”

“उनसे?” शिल्पी आश्‍चर्य से बोली.

“हां, तीज आ रही है न! कितने सालों से ऐसे ही रस्म-सी निभाती आ रही हूं. इस बार सोचा उनसे सारे डिटेल पूछ लूं. कितनी गुणी व जानकार हैं. प्लीज़, चल न उनके कमरे में.” दीप्ति तो जैसे घोड़े पर सवार थी. शिल्पी सोच रही थी कि यहां उसकी सास की कितनी कद्र हो रही है, जबकि उसका ख़्याल कुछ और ही था. दीप्ति के जाने के बाद उसे पुरानी बातें याद आने लगीं.

तीन-चार महीने पहले की बात रही होगी. शाम को ऑफिस से लौटकर रवि सोच में डूबा था. शिल्पी बोली, “क्या हुआ, तुम्हारी तबीयत तो ठीक है? ऑफिस की कोई बात तो नहीं?”

“मेरी तबीयत ठीक है. दिन में सतीश का फोन आया था कि मां की तबीयत कुछ ठीक नहीं रहती. आजकल कुछ खाती-पीती भी नहीं. जाने क्या सोचा करती हैं.” रवि के स्वर में चिंता व पीड़ा झलक उठी.

“यह कौन-सी बड़ी समस्या है कि तुम इतने चिंतित हो रहे हो. वो लोग कुछ पैसा चाह रहे होंगे. तुम एक-डेढ़ हज़ार रुपए भेज दो और कह दो वहीं सरकारी अस्पताल में दिखा दें. पैसा मिल जाएगा, तो उन लोगों को रास्ता भी ख़ुद ही सूझेगा.” शिल्पी ने दरियादिली की आड़ में समझदारी दिखाई.

रवि की मां पार्वतीजी फैज़ाबाद में एक गांव में रहती थीं. इकलौता बेटा रवि गुड़गांव में अच्छी पोज़ीशन पर था. लक्ज़री अपार्टमेंट में अपना फ्लैट, महंगी कार आदि सब ख़रीद चुका था. कुछ ही दिन पहले पिताजी का निधन होने पर उसने मां को साथ चलने की बहुत ज़िद की, पर उन्होंने ही मना कर दिया कि यहां तुम्हारे पिताजी की यादें जुड़ी हैं. सारा जीवन यहीं बिता दिया, तो बुढ़ापे के दो-चार साल भी कट जाएंगे. गांव में बड़ा खानदानी मकान था, जिसमें चाचा का भी परिवार संयुक्त रूप से रहता था. इसलिए अकेलेपन या खाना बनाने की भी कोई समस्या नहीं थी. खेती-बाड़ी सम्मिलित थी, जिसे उसका चचेरा भाई सतीश देखता था. उसकी पत्नी पूरे घर की देखभाल के साथ मां को भी खाना व दवा देने की सारी ज़िम्मेदारी ख़ुशी-ख़ुशी निभाती थी.

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“नहीं शिल्पी, इतना आसान नहीं है. मुझे लगता है कि पिताजी के बाद मां एकदम अकेली पड़ गई हैं और इस समय उनको हमारी ज़रूरत है. भले ही वो कुछ न कहें, पर मुझे बस इस बात का डर है कि ज़्यादा अकेलेपन की वजह से मां कहीं डिप्रेशन में न चली जाएं. इसलिए सोचता हूं कुछ दिनों के लिए उनको यहीं ले आऊं. कुछ दिन बाद यदि वो चाहें, तो गांव वापस पहुंचा आऊंगा.” रवि ने कहा.

“ऐसा कैसे हो सकता है?” शिल्पी ने तुरंत तेवर बदले. “यहां इस पॉश सोसायटी में उनको कहां रखेंगे और कुल तीन ही तो कमरे हैं. ड्रॉइंगरूम, हमारा बेडरूम और एक बच्चों का कमरा. कहां रखोगे उनको? जगह भी है? और जब बच्चे छोटे थे सहारे के लिए बुलाया था, तब तो आई नहीं और अब बोझा बनने को तैयार हैं.” कटु स्वर में बड़बड़ाते हुए शिल्पी ने अपने सारे तीर एक साथ छोड़ दिए.

“बात समझो शिल्पी. वे मेरी मां हैं, कोई बोझ नहीं और न ही कोई आउटडेटेड फर्नीचर हैं कि पॉश सोसायटी में उनको लाने में शर्म आए और जगह घर में नहीं दिल में होनी चाहिए. जो जी में आए उल्टा-सीधा मत बोलो. उस समय पिताजी यहां आते नहीं और अपने स्वार्थ के लिए पिताजी को गांव में अकेले छोड़कर मां को बुलाना व्यावहारिक नहीं होगा, यही सोचकर मैंने ही उनसे नहीं कहा था, तो इसमें उनका क्या दोष? और फिर वे अभी भी अपनी इच्छा से तो यहां आ नहीं रही हैं, मैं ही ज़िद करके लाऊंगा. और अगर इकलौता बेटा ही संकट के समय काम नहीं आएगा, तो कब काम आएगा? शिल्पी, परिवार इसीलिए होते हैं. माता-पिता, बेटा-बहू, भाई-बहन- ये सब ऐसे रिश्ते हैं कि इनसे ही हमारी ख़ुशियां बढ़ती हैं और दुख घटते हैं. रही बात जगह की, तो वे बच्चों के कमरे में रह लेंगी.” रवि ने ग़ुस्से पर क़ाबू रखते हुए अपने स्वर में कुछ दृढ़ता लाते हुए कहा.

“जब तुमने सब पहले ही सोच लिया है, तो मुझसे क्यों पूछ रहे हो. जो मर्ज़ी करो.” शिल्पी ग़ुस्से में उठकर चल दी. वो जानती थी कि बच्चे अपनी दादी के साथ ख़ुशी-ख़ुशी एडजस्ट कर लेंगे, क्योंकि उनकी दादी का स्वभाव ही ऐसा था. घर-गृहस्थी की समस्या या सिलाई-बुनाई-कढ़ाई हो, विभिन्न व्यंजन बनाना या घर संभालना उनका कोई सानी न था. रवि समर वेकेशंस में रतन, रुचि व शिल्पी के साथ कुछ दिन अपने गांव ज़रूर जाता, ताकि बच्चों को अपने पूरे परिवार को जानने-समझने का मौक़ा मिले. बच्चों को दादा-दादी का स्नेह से परिपूर्ण स्वभाव, खपरैल वाले मकान, खेत-खलिहान, तालाब, बाग़-बगीचे बहुत अच्छे लगते.

रवि अपनी ज़िद से मां को मनाकर ले ही आया. बच्चों ने उनको अपने कमरे में रखा या दिल में यह तो पता नहीं, पर वे उनको हर समय घेरे रहते. एकल परिवारों में शायद टीवी ही बच्चों के सुख-दुख का साथी होता है, परंतु स्कूल से आकर उनको छोटी-छोटी बातें बतानेवाले बच्चे यह तक भूल गए कि घर में टीवी भी है. रात को दादी के एक ओर रतन, तो दूसरी ओर रुचि लेटकर कहानी सुनते-सुनते सोते, वरना पांच वर्षीया रुचि अक्सर शिल्पी के साथ सोने की ज़िद करती थी.

शिल्पी का मन किचन में अधिक न लगता इसलिए जैसे-तैसे निपटाती, पर पार्वतीजी विभिन्न पौष्टिक व्यंजन बच्चों को मान-मनुहार करके खिलातीं. उनको बच्चों का साथ बहुत भाता, बल्कि वे ख़ुद ही बच्चा बनकर कभी उनके साथ लूडो, कैरम बोर्ड सहित अन्य गेम्स खेलतीं, तो कभी बातें करतीं. बच्चे भी चाहते हैं कि मन की बातें किसी से शेयर करें और इसके लिए बड़े-बुज़ुर्ग सबसे अच्छे साथी होते हैं. बच्चों के आर्ट-क्राफ्ट के होमवर्क शिल्पी के सिरदर्द थे, पर पार्वतीजी मनोयोग से करातीं. कुछ लोगों की स्कूली शिक्षा भले ही कम हो, पर मनोविज्ञान का अद्भुत ज्ञान होता है. पार्वतीजी भी भले ही बच्चों को डांटती-फटकारती न थीं, पर परोक्ष रूप से अनुशासन, संस्कार, सद्गुण, सदाचार आदि विकसित कर रही थीं.

उस दिन किटी का नंबर शिल्पी का था. उसने सासूमां को बच्चों के कमरे में ही रहने की हिदायत दी थी. वो नहीं चाहती थी कि उसकी आउटडेटेड सास दिखें और उसकी रेपुटेशन ख़राब हो. शाम के पांच बजे थे कि एकाएक मधुर स्वर गूंज उठा, “ओम् जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे। भक्तजनों के संकट क्षण में दूर करें…” शिल्पी असहज होने लगी. “यह क्या शिल्पी?” रूपा ने पूछा ही था कि शिल्पी सफ़ाई देने लगी, “सॉरी. वो मेरी मदर इन-लॉ आई हैं. पुराने ख़्यालों की हैं न, इसलिए आरती-भजन गाती हैं.” उसके चेहरे पर झेंप साफ़ दिख रही थी.

तब तक सोनल ठहाका मारकर बोली, “ओह! कम ऑन. आरती वो नहीं, तो क्या हम गाएंगे? काश! मेरी भी ऐसी इन-लॉ होतीं.” तभी विनीता बोल उठी, “शिल्पी, हम से नहीं मिलाओगी अपनी इन-लॉ को? हम लोग तो तरसते हैं कोई बुज़ुर्ग साथ रहे. कितना ईज़ी हो जाता है हमारे लिए भी और बच्चों के लिए भी.” इन बातों से शिल्पी हैरान रह गई. वो सोचती थी कि सभी सहेलियों की चाहत न्यूक्लियर फैमिली ही होगी, क्योंकि सास-ससुर का साथ स्वच्छंद जीवन में बहुत बाधक होता है.

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सबके कहने से मजबूर शिल्पी पार्वतीजी को बुला लाई. कॉटन की सादी साड़ी और सुनहरे फ्रेम के चश्मे में पार्वतीजी का गरिमामय व्यक्तित्व, ममता से भरी आंखें और आत्मीय मुस्कान से अभिभूत सारी सहेलियां उठ खड़ी हुईं. “बैठो-बैठो तुम सब तो मेरी बेटियां हो.” पार्वतीजी की बात से तो वे सब ऐसे खिल उठीं जैसे सूखी लता पर सावन की वर्षा हो. “जी पहले आप बैठिए.” रूपा की बात सुनकर पार्वतीजी बैठ गईं.

“मांजी, आप कितना अच्छा गाती हैं. कुछ सुनाइए न?” दीप्ति की बात पर पार्वतीजी मुस्कुरा दीं. “अरे बेटा, अब वो स्वर नहीं रह गया, फिर भी कभी सुना दूंगी. अरे, अगले हफ़्ते जन्माष्टमी है. उस दिन भजन-संध्या रख लो. तुम सब भजन सुनाना, तो मैं भी सुना दूंगी.” पार्वतीजी की बात पर सब खिल उठीं. पहली बार ऐसा कार्यक्रम बना था. पार्वतीजी की बनाई रंगोली और

जन्माष्टमी की सजावट तो सब देखते ही रह गए. फिर उन्होंने ढोलक बजाते हुए ऐसे भजन गाए कि समां बंध गया. क्या बच्चे, क्या बड़े सभी देर रात तक आनंदित होते रहे.

अब तो पार्वतीजी जैसे सब की सास, बल्कि मां बन गई थीं. शिल्पी की सहेलियां किसी न किसी बहाने उनको घेरे रहतीं. कभी कोई नए-पुराने व्यंजन सीखता, अचार-सॉस की विधि लिखता, तो कोई त्योहारों की कथा पूछता. कितने ही भजन व लोकगीत वे उनसे पूछकर लिख चुकी थीं. बाज़ार के अचार की आदी सहेलियों को पार्वती के बनाए सिंघाड़े के अचार ने तो दीवाना ही कर दिया था, इसलिए सभी उनसे अचार बनाना सीख चुकी थीं.

दीप्ति की बेटी को सिंथसाइ़जर सीखने का बहुत क्रे़ज था, पर आसपास म्यूज़िक टीचर न होने से मायूस थी. पार्वतीजी को पता चला, तो बोलीं, “कोई बात नहीं, मैं सिखा दूंगी. तुम्हारे विदेशी बाजे और हारमोनियम का की-बोर्ड एक ही तो है.” उसके बाद दो-तीन बच्चे जब-तब सिंथसाइ़जर सीखने पहुंच जाते. एक दिन दीप्ति ने कहा, “मांजी, अगर आप घर पर म्यूज़िक क्लासेस शुरू कर दें, तो कितनी इनकम हो जाएगी.” इस पर पार्वतीजी मुस्कुराकर बोलीं, “अरे बेटा, पैसा क्या करूंगी. मेरी इनकम तो तुम बेटियों का प्यार और इन बच्चों का अपनापन है.”

अपने बेटे के घर व परिजनों के बीच रहकर प्रेम की धूप से पार्वतीजी का अवसाद तो कोहरे के समान तिरोहित हो चुका था. स्वास्थ्य भी सुधर गया था. वृद्धावस्था में अपनों का साथ संजीवनी के समान होता है, जो जीवन को उत्साह से भर देता है और जीने के नए-नए बहाने भी दे देता है. बुज़ुर्ग वैसे ही मग्न हो जाते हैं जैसे कि बच्चे खिलौने से होते हैं. शायद बच्चों और बुज़ुर्गों को एक-दूसरे का साथ कुछ अधिक भाता है, जो आजकल दुर्लभ होता जा रहा है.

रवि भी कुछ दिनों से शिल्पी में बदलाव महसूस कर रहा था कि मां के यहां रहने से शिल्पी ख़ुश ही है. इसलिए रात में जान-बूझकर बोला, “मां का स्वास्थ्य तो सुधर ही गया है, तो क्यों न गांव छोड़ आऊं. तुम भी सोचती होगी कि इतने महीने हो गए और स्वस्थ होने के बावजूद बोझ बनी हुई हैं.”

शिल्पी पुरानी बातों को लेकर ग्लानि महसूस करती थी, परंतु कैसे कहती कि उनके आने से ज़िंदगी बदल गई है. इसलिए परोक्ष रूप से बोली, “लेकिन ऐसा न हो कि वहां जाकर फिर बीमार हो जाएं और तुम परेशान हो जाओ. इसलिए कुछ दिन और रह लेने दो.” रवि छेड़ने के लिए बोला, “फिर सोच लो. मैं तो इसलिए कह रहा था कि तुम अपनी सासूमां से परेशान न हो गई हो?”

इस पर शिल्पी बोली, “ऐसा नहीं है. वे दूसरों जैसी नहीं हैं. गुणी व अनुभवी तो हैं ही, अपने व्यवहार से सबको अपना बना लेती हैं. उनकी वैल्यू मुझे अब समझ आई. मेरी सहेलियों में ऐसी मशहूर हो जाएंगी मैंने कभी सोचा भी नहीं था. बच्चे भी कितने बदल गए हैं. टीवी से तो पीछा छूटा ही, घर की बनी डिशेज़ भी खाने लगे हैं. समय पर सोना, होमवर्क करना और क्लास में रैंक भी कितनी अच्छी आई है. दादी ने तो उनको एकदम बदल ही दिया. रवि उन्हें यहीं रहने दो.” शिल्पी के मुंह से सच निकल ही गया.

“ठीक है, जैसी तुम्हारी मर्ज़ी. वैसे मुझे लगता है उनको यहां रोकने की वजह कुछ और ही है.” रवि ने कहा, तो शिल्पी हैरानी से पूछने लगी, “ऐसी और क्या वजह हो सकती है?”

“अरे भाई, अब रुचि यहां सोने की ज़िद जो नहीं करती. अब तुमको पूरी फ्रीडम और निश्‍चिंतता जो है.” रवि ने शरारती लहज़े में कहा ही था कि शिल्पी ने शरमाकर नाइट बल्ब ऑफ कर दिया.

Anoop Shrivastav

अनूप श्रीवास्तव

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कहानी- नेमप्लेट (Short Story- Nameplate)

“तुमसे मिलने आता ही कौन है? तुम्हारी जितनी भी सहेलियां हैं, वो सब मुझे जानती हैं. बाकी जो लोग तुम्हें जानते हैं, वो तुम्हें मिसेज़ नमन शर्मा के नाम से जानते हैं. और वैसे भी, तुमसे ज़्यादा मिलनेवाले अमन के आते हैं. मैं सोचता हूं मुझे अमन के नाम का नेमप्लेट लगवा लेना चाहिए…”

Kahani

कितनी देर से कॉलबेल बज रही थी. आरोही अंदर बाथरूम में थी. दौड़कर उसने दरवाज़ा खोला. पोस्टमैन खड़ा था बाहर.

“आरोही शर्मा का घर यही है?” उसने पूछा.

“जी हां, यही है. मैं ही आरोही हूं.”

“अच्छा-अच्छा, नमन शर्मा का नेमप्लेट देखा था बाहर. आप उनकी मिसेज़ होंगी. अगली बार से भेजनेवाले को बोलना पते में नमनजी का नाम अवश्य लिखें. ढूंढ़ने में परेशानी होती है. अब सब उन्हीं को जानते हैं न.”

आज फिर आरोही को काम करते-करते देर हो गई थी. कितना भी जल्दी करो, काम बारह बजे के पहले ख़त्म ही नहीं होता. अभी थोड़ी देर में अमन स्कूल से आ जाएगा. फिर उसे वक़्त मिल ही नहीं पाएगा, अपनी कहानी पूरी करने का.

नमन और आरोही की शादी को पांच साल हो गए थे. उनका चार साल का एक बेटा था ‘अमन’. नमन एक मल्टीनेशनल कंपनी में अच्छे पद पर थे.

आरोही भी काफ़ी पढ़ी-लिखी थी, लेकिन बेटे और घर की ज़िम्मेदारियों की वजह से जॉब नहीं कर पा रही थी. कॉलेज के दिनों से ही उसे लिखना बहुत पसंद था. शादी के बाद जब भी समय मिलता, वो अपनी मन की उधेड़बुन को काग़ज़ पर उतार लेती.

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“मैडम-मैडम.” पोस्टमैन की आवाज़ से आरोही अपनी सोच से बाहर आई.

“मैडम, ख़त पर साहब का नाम होता, तो पूछना नहीं पड़ता न! नेमप्लेट देखकर पहचान लेता. अब बताइए कितने फ्लैटों में पूछना पड़ा तब कहीं…”

“थैंक्यू भइया, आगे से ध्यान रखूंगी.”

कहकर आरोही ने चिट्ठी लेकर दरवाज़ा बंद कर लिया. सोच रही थी आज नमन आएंगे, तो बात करेगी नेमप्लेट के लिए.शाम को नमन ऑफिस से आते ही अमन के साथ खेलने लग गए. रात का खाना निपटाकर, अमन के सो जाने के बाद आरोही ने बात शुरू की.

“नमन, मैं सोच रही थी बाहर मेरे नाम का भी नेम-प्लेट लगवा लें तो… मेरे नाम से ख़त आए या कोई मुझसे मिलने आए, तो द़िक्क़त नहीं होगी. आज मां की चिट्ठी आई थी तो वो…”

थोड़ी देर नमन उसे देखते रहे. फिर हंसने लगे. आरोही को समझ नहीं आ रहा था कि इसमें हंसने की क्या बात है?

आरोही को अपनी तरफ़ सवालिया नज़रों से देखते देख नमन ने अपनी हंसी रोक दी और बोले, “सॉरी आरोही, पर तुम भी खाली बैठे-बैठे क्या सोचती रहती हो? तुमसे मिलने आता ही कौन है? तुम्हारी जितनी भी सहेलियां हैं, वो सब मुझे जानती हैं. बाकी जो लोग तुम्हें जानते हैं, वो तुम्हें मिसेज़ नमन शर्मा के नाम से जानते हैं. और वैसे भी, तुमसे ज़्यादा मिलनेवाले अमन के आते हैं. मैं सोचता हूं मुझे अमन के नाम का नेमप्लेट लगवा लेना चाहिए. चलो अब सो जाओ जानू और मुझे भी सोने दो. बहुत रात हो चुकी है.”

बात चुभनेवाली ज़रूर थी, पर सच थी और ये आरोही भी जानती थी.

देखते-देखते दो साल बीत गए. इन दो सालों में काफ़ी कुछ बदल गया था. नहीं बदली थी, तो आरोही की दिनचर्या. हां, अब उसने घर का काम करने के लिए एक कामवाली लगा ली थी. जो समय बचता, उसमें वह एक कहानी लिखने लगी थी. आज उसकी कहानी पूरी हो चुकी थी.

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समझ नहीं पा रही थी कि क्या करे? नमन को बताने का मन नहीं था. नमन क्या, उसे ख़ुद अपने ऊपर भरोसा नहीं था. उसने सोचा, छोड़ो ऐसे ही रहने देते हैं.

दोपहर में एक पत्रिका के पन्ने पलटते हुए उसने देखा ‘कहानी प्रतियोगिता’. प्रथम स्थान पाने वाले को 50 हज़ार नक़द इनाम मिलनेवाला था. नाम मिलता सो अलग. जीतनेवाले का साक्षात्कार भी उसी पत्रिका में छपनेवाला था. यही नहीं, जीतनेवाले को एक उपन्यास भी लिखने का मौक़ा दिया जाएगा.

आरोही जानती थी कि उसकी कहानी कुछ ख़ास नहीं थी. फिर भी, उसने उस कहानी को दो साल दिए थे.

अचानक फोन की घंटी बजी. पापा थे फोन पर. उसने इस कहानी के बारे में स़िर्फ उन्हीं को बताया था.

“बेटा एक बार कोशिश तो करो. कोशिश किए बिना हार जाना तो ग़लत है. उससे अच्छा तो कोशिश करके हारना है. इससे कम से कम ये तसल्ली तो रहती है कि मैंने कोशिश की. और क्या पता अगली कोशिश क़ामयाब ही हो जाए.”

आख़िर उसने कहानी पोस्ट कर दी. उस बात को पांच महीने बीत गए थे. आरोही भूल भी चुकी थी कि उसने कोई कहानी भी भेजी थी या फिर भूलने की कोशिश में लगी थी.

रविवार का दिन था. नमन और अमन घर पर ही थे. फोन की घंटी बजी, तो नमन ने फोन उठाया. कोई ज़रूरी बात थी, तभी काफ़ी देर तक फोन पर बात करते रहे.

अगले दिन, सुबह जब आरोही उठी, तो घर एकदम शांत था. नमन और अमन दोनों ही बिस्तर पर नहीं थे. जैसे ही उठकर ड्रॉइंगरूम में आई, तभी ज़ोरदार शोर से उसका स्वागत हुआ. उसका घर उसके दोस्तों से भरा हुआ था.

सब उसे बधाई दे रहे थे. आज आरोही का जन्मदिन था. नमन सबको बड़े गर्व से बता रहे थे कि आरोही की कहानी को प्रथम पुरस्कार मिला है. संपादक कह रहे थे कि कई प्रकाशक कंपनियां चाहती हैं कि वो उनके लिए उपन्यास लिखे, लेकिन आरोही का पहला उपन्यास तो वो ही…”

आरोही सब को धन्यवाद दे रही थी.

पापा-मम्मी, सास-ससुर, भाई-भाभी सबके फोन आ रहे थे. सबके जाने के बाद आरोही नमन की बांहों में समा गई.

“मुझे कल ही पता चल गया था. मुझे माफ़ करना, मैंने तुम्हें नहीं बताया. मैं तुम्हें आज के दिन बताना चाहता था. तुम्हारे गिफ्ट के साथ.” नमन बोले.

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“गिफ्ट, लेकिन नमन आप मुझे बाहर क्यों ले जा रहे हैं?” आरोही ने पूछा.

“मम्मा आओ न प्लीज़.” अमन अपनी मीठी-सी आवाज़ में बोला.

नमन ने आरोही की आंखें बंद कीं और बाहर दरवाज़े के पास आकर खोल दीं.

आरोही ने देखा, नमन शर्मा के नेमप्लेट के बिल्कुल पास एक सुंदर-सा गोल्डन फ्रेमवाला नेमप्लेट लगा हुआ था. उस नेमप्लेट पर लिखा था- आरोही शर्मा (लेखिका). इसे देख आरोही की आंखें नम हो गईं. जन्मदिन का यह अनोखा तोहफ़ा उसके लिए यादगार बन गया.

– पल्लवी

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