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कहानी- डर अनजाना-सा (Short Story- Darr Anjana-Sa)

”आप विश्‍वास नहीं करेंगी डॉक्टर, पिछले कई महीनों से मेरा लेखन कार्य बिल्कुल ठप्प पड़ा है. मैं चंद पंक्तियां लिखने में भी स्वयं को असमर्थ पा रही हूं. मेरी सृजन क्षमता को मानो लकवा मार गया हो, जबकि अध्ययन और लेखन मेरे लिए संजीवनी बूटी की तरह हैं. ये मुझमें प्राणवायु का संचार करते हैं. इनके बिना तो मैं जीते जी ही मर जाऊंगी. मैं क्या करूं डॉक्टर, मैं क्या करूं??” कहते-कहते मैं फफककर रो पड़ी.

Short Story- Darr Anjana-Sa

”नहीं…” एक घुटी-घुटी चीख मुंह से निकली और मैं झटके से उठ बैठी. जब आंखें अंधेरे में देखने की अभ्यस्त हुईं तो पता चला पूरा शरीर पसीने से तरबतर था.

‘उफ़, फिर वही भयानक सपना!’

‘सपना नहीं मिताली, यह हक़ीक़त है. यह सपना तुम्हारे भविष्य का आईना है. इसे पहचानो और व़क़्त रहते संभल जाओ.’ अंदर से उठती आवाज़ ने मुझे चेतावनी दी.

हां, मुझे ख़ुद को बदलना ही होगा. मुझे अपने खोल से बाहर निकलना ही होगा, वरना कहीं मेरा भी वही अंजाम? एक अज्ञात भय से मैं पुन: सिहर उठी. अब फिर से नींद आना नामुमकिन था. बेहतर है, मैं अपनी अधूरी पड़ी कहानी पूरी कर लूं. लेकिन लाख प्रयास के बावजूद दिमाग़ काम नहीं कर रहा था. और दिमाग़ के ज़ोर के बगैर क़लम ने चलने से इंकार कर दिया. हारकर मैंने भी हथियार डाल दिए.

‘बह जाने दो दिमाग़ी धारा को, जिस ओर भी वह बहना चाहे.’ सामने ही मौसी की पोती की शादी का कार्ड पड़ा था. ‘चलो, यहीं से शुरुआत करती हूं.’ मैंने फटाफट सूटकेस में दो भारी साड़ियां और शगुन का लिफ़ाफ़ा डाला और अगले ही दिन पहुंच गई शादी में. मुझे देखकर वहां जो कानाफूसी शुरू हुई, तो वह मेरी रवानगी तक चलती रही. खिन्न मन से मैं घर लौटी. दिल ने कहा, ‘रिश्तेदारी निभाना तुम्हारे बस का नहीं मिताली.’ लेकिन मन ने समझाया, ‘यदि एक बार ठान लो तो क्या मुश्किल है? इतने बरसों बाद किसी पारिवारिक समारोह में सम्मिलित हुई हो तो ऐसी प्रतिक्रिया तो स्वाभाविक है. धीरे-धीरे सब ठीक हो जाएगा.’

कांताबाई आ चुकी थी. उसे सफ़ाई में जुटा देख मैं भी सहज होकर सूटकेस संभालने लगी. अचानक दिमाग़ में बिजली कौंधी. ‘बाई से घनिष्ठता भी तो ज़रूरी है.’

“अं…तुम्हारे कितने बच्चे हैं?”

“हं…?”  वह चिहुंककर पलटी और मुझे घूरने लगी.

“मैं तुम्हीं से पूछ रही हूं.” मैंने मुस्कुराने का असफल प्रयास करते हुए कहा.

“तीन. हं….., हां तीन ही हैं. आप ठीक तो हैं बीबीजी?”

“हां, मैं बिल्कुल ठीक हूं.  मुझे क्या हुआ है?”

“नहीं, ऐसे ही मुझे लगा…..”

“तुम्हें लगा मानो कोई भूत देख लिया हो.” ग़ुस्सा पीते हुए मैं मन-ही-मन बुदबुदाई. सब लोग मुझे समझते क्या हैं? क्या मैं हाड़-मांस के इंसानों से अलग हूं? मुझमें कोई भावना या संवेदना नहीं है? दिल कर रहा था फूट-फूटकर रोऊं, लेकिन मन-मसोसकर रह जाना पड़ा, क्योंकि बाई अब भी मुझे ही घूर-घूरकर देखे जा रही थी. दिन भर किसी काम में मन नहीं लगा और रात होते ही फिर वहीं भयानक सपना! मुझे लगा यदि जल्दी ही कुछ किया नहीं गया तो मैं पागल हो जाऊंगी.

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विचारों की कड़ी में उलझा मेरा दिमाग़ मेरे क़दमों को कब मनोचिकित्सक तक ले गया, ख़ुद मुझे भी पता न चला. भान तो तब हुआ जब मनोचिकित्सक ने मुझे विश्‍वास में लेकर मेरी अंतर्व्यथा को शब्दों में ढलवाना आरंभ किया और मैं यंत्रचलित-सी सब कुछ बताती चली गई.

“युवावस्था में एक के बाद पहले मां और फिर पिताजी को खो बैठी. मां को मेरी शादी का बड़ा चाव था. भाई-भाभी ने उस ज़िम्मेदारी को निभाना चाहा, पर मैंने ही किनारा कर लिया. शुरू से ही मैं गंभीर और एकाकी प्रवृत्ति की रही हूं. मां-पिताजी की असमय मृत्यु ने मुझे और भी अपने खोल में समेट लिया. मैंने गांव में अध्यापिका की नौकरी कर ली और इस तरह भैया-भाभी से भी धीरे-धीरे हमेशा के लिए दूर होती चली गई. गांव-गांव, शहर-शहर घूमते-घूमते सेवानिवृत्त होकर अंतत: मैं यहां इस महानगर में आकर बस गई. मेरी एक साथी अध्यापिका ने मुझे उचित क़ीमत पर यह छोटा-सा आशियाना दिलवा दिया था. मुझे लिखने का शौक़ रहा है. सेवानिवृत्ति के बाद मैंने स्वयं को पूरी तरह से इसी शौक़ में डुबो दिया. समय-समय पर मेरी रचनाएं छपती रहती हैं. पेंशन की निश्‍चित रकम मेरे लिए पर्याप्त है. मेरी एक बंधी-बंधाई दिनचर्या है. मुझे न अपने पड़ोसियों से मतलब रहा है, न रिश्तेदारों से. यहां तक कि बाई से भी कभी कोई विशेष बात नहीं होती. मैंने न तो कभी किसी से कोई अपेक्षा रखी है और न ही मैं चाहती हूं कि कोई मुझसे कुछ अपेक्षा रखे. मुझे अपनी ज़िंदगी से कभी कोई शिकायत नहीं रही. कुछ समय पूर्व तक मैं पूर्णत: आत्मसंतुष्ट थी. लेकिन…?”

“लेकिन क्या? बोलिए मितालीजी. आपको अपने संतुष्ट जीवन से एकाएक असंतुष्टि क्यों हो गई? किसने आपकी शांत और स्थिर जीवनधारा में कंकड़ फेंका है?”

“मैं अख़बारों में आए दिन छपनेवाली ख़बरों से असहज हो उठी हूं. मेरे जैसा एकाकी जीवन गुज़ारनेवाले प्रौढ़ और वृद्ध अब इस महानगर में सुरक्षित नहीं हैं. हालांकि इस असुरक्षा का एहसास मुझे पहले से ही था, इसलिए मैंने विशेष सुरक्षा व्यवस्था कर रखी है. सुरक्षागार्ड रात को दो बार विशेष रूप से मेरे घर के चक्कर लगा जाता है. दूधवाला, सब्ज़ीवाला घंटी बजाकर दूध-सब्ज़ी दे जाते हैं. किरानेवाला एक फ़ोन करने पर सारा सामान पहुंचा जाता है. मैं ही कभी-कभी बदलाव के लिए नीचे घूमने आ जाती हूं तो आवश्यक ख़रीददारी कर लेती हूं, अन्यथा मुझे कोई असुविधा नहीं है. लेकिन एकाकी प्रौढ़ों के दर्दनाक अंत संबंधी ख़बरें पढ़-पढ़कर मैं अपने होश खो बैठी हूं. पहले प्रसिद्ध अभिनेत्री ललिता पवार, फिर परवीन बॉबी, फिर ‘बुलेट’ फ़िल्म की वह अभिनेत्री और भी न जाने कितनी महिलाएं! ये सभी अपने घरों में मृत पाई गईं और दो-दो तीन-तीन दिनों तक इनकी लाशें सड़ती रहीं. कोई इनका अंतिम संस्कार करनेवाला भी नहीं था. ये सभी तो अपने ज़माने की मशहूर हस्तियां थीं, मैं तो एक अदना-सी प्रौढ़ा हूं. जब उनका अंत इतना बुरा था तो मेरा अंत कैसा होगा? ये सोच-सोचकर ही मैं सिहर उठती हूं. अक्सर मुझे रात में दु:स्वप्न आ घेरते हैं. मैं मृत्युशैया पर पड़ी हूं और कोई मुझे पानी देनेवाला भी नहीं है. छटपटाते हुए मैं प्राण त्याग देती हूं. मेरी मृतदेह अंतिम संस्कार के इंतज़ार में बंद घर में पड़ी है. बाई, दूधवाला, सब्ज़ीवाला घंटी बजाकर मेरे घर में न होने का कयास लगाते हुए निकल जाते हैं. मैं बेबस-सी आवाज़ें लगाकर उन्हें रोकने का प्रयास कर रही हूं, पर वे तो मानो न तो मुझे देख रहे हैं और न मुझे सुन रहे हैं. तीसरे दिन लाश से उठती दुर्गन्ध पड़ोसियों को पुलिस को फ़ोन करने के लिए तत्पर करती है. पुलिस आकर दरवाज़ा तोड़ती है. बदबू का एक भभका उठता है. लोग नाक पर रुमाल रखकर दूर छिटक जाते हैं… और मैं चिल्लाकर नींद से जाग जाती हूं. लेकिन अफ़सोस, मेरी भयभीत चीख की आवाज़ भी किसी के कानों तक नहीं पहुंचती और कोई मेरे पास आकर यह नहीं पूछता कि मैं क्यों चिल्लाई?” उत्तेजना में मैं हांफने लगी.

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“लीजिए, ठंडा पानी पी लीजिए.” डॉक्टर ने सामने रखा ग्लास मुझे थमा दिया. मैंने एक ही सांस में ग्लास खाली कर दिया.

“थैंक्यू, आपको यह सब कुछ बताकर मैं बहुत हल्का महसूस कर रही हूं.”

“मैं समझ सकती हूं. प्लीज़ गो ऑन.” डॉक्टर ने मेरी हौसलाअफ़ज़ाई की.

“अपने दुर्दान्त की कल्पना से सिहरकर मैंने लोगों से मेल-जोल बढ़ाने का प्रयास किया. लेकिन मुझे लगता है, जितनी तकलीफ़ मुझे अपने खोल से निकलने में होती है, उतनी ही, बल्कि उससे कहीं ज़्यादा तकलीफ़ लोगों को मुझे आत्मसात करने में होती है. आप विश्‍वास नहीं करेंगी डॉक्टर, पिछले कई महीनों से मेरा लेखन कार्य बिल्कुल ठप्प पड़ा है. मैं चंद पंक्तियां लिखने में भी स्वयं को असमर्थ पा रही हूं. मेरी सृजन क्षमता को मानो लकवा मार गया हो, जबकि अध्ययन और लेखन मेरे लिए संजीवनी बूटी की तरह हैं. ये मुझमें प्राणवायु का संचार करते हैं. इनके बिना तो मैं जीते जी ही मर जाऊंगी. मैं क्या करूं डॉक्टर, मैं क्या करूं??” कहते-कहते मैं फफककर रो पड़ी.

डॉक्टर ने उठकर मेरी पीठ सहलाई. “आप घर जाइए और आराम कीजिए. आपकी समस्या कोई बहुत बड़ी समस्या नहीं है. परसों आप इसी समय आकर मुझसे मिलें. थैंक्स फॉर कॉपरेशन.”

होंठों पर फीकी-सी मुस्कुराहट लिए मैंने डॉक्टर से विदा ली. घर आकर मैं बिस्तर पर औंधी पड़ गई. नींद ने कब मुझे अपनी आगोश में ले लिया, कुछ भान न रहा. ज़ोर-ज़ोर से दरवाज़ा खटखटाने और घंटी बजने की आवाज़ से मुझे कुछ चेतना हुई, लगा फिर वही दु:स्वप्न देख रही हूं. मगर ‘माई! माई!’ की आवाज़ से नींद उड़ गई और मैंने उठकर दरवाज़ा खोल दिया.

“क्या बीबीजी, कितनी देर करती हो दरवाज़ा खोलने में? मैं कब से खड़ी हूं… और घरों का भी तो काम निबटाना है.” मैं बुत-सी उसे निहारती रही. शायद ख़ुद को यह विश्‍वास दिला रही थी कि यह सपना नहीं, हक़ीकत है और मैं ज़िंदा हूं.

मुझे निर्निमेष निहारते देख बाई घबरा गई. “लगता है आपकी तबियत ठीक नहीं है.” कहते हुए बाई ने मेरी कलाई पकड़ ली.

“उई मां, आपको तो बहुत तेज़ बुखार है. पहले क्यूं नहीं बताया? चलो बिस्तर पर जाकर लेटो, मैं तुलसी-अदरक की चाय बनाकर लाती हूं.” वह मुझे घसीटकर बिस्तर तक ले गई और लिटाकर चादर ओढ़ा दी. मैं कुछ समझ या कह पाऊं, इससे पूर्व ही वह गरम चाय का प्याला लेकर हाज़िर थी. मैंने चाय के संग एक क्रोसीन ले ली.

“आपको बुखार में तनिक भी हिलने की ज़रूरत नहीं है, मैं सब संभाल लूंगी. आप मुंह से बात नहीं करतीं तो क्या हुआ, हम जानती हैं कि आप दिल की बहुत अच्छी हैं. और मेमसाब लोग तो इधर-उधर की पचास बातें पूछती हैं, लेकिन आप बस अपने काम से काम रखती हैं.” बाई की बातों से मुझे ऐसा महसूस हो रहा था मानो मरुस्थल में एकाएक हरियाली लहलहा उठी हो. मैं इस हरियाली का भरपूर आनन्द उठा पाऊं, इससे पूर्व ही दरवाज़े की घंटी बज उठी.

“आप बैठी रहिए, मैं देख लूंगी.” बाई ने दरवाज़ा खोल दिया. सामने वाले मकान की मिसेज मल्होत्रा एक महिला के संग खड़ी थीं. मेरा उनसे कोई विशेष परिचय नहीं था, बस एक-दो बार हाय-हैलो हुई थी.

“नमस्ते मितालीजी, यह मेरी सहकर्मी सानिया है. आपकी कहानियां और लेख बड़े चाव से पढ़ती है. कई बार आपसे मिलवाने का आग्रह कर चुकी है. आज ऑफ़िस से ज़रा जल्दी फ्री हो गए तो मैं उसे आपसे मिलवाने ले आई. शायद आपकी तबियत ठीक नहीं है. कोई बात नहीं, आप आराम करें, हम फिर आ जाएंगे.” “अरे नहीं, बैठिए.” मैंने बाई को दो चाय लाने का इशारा किया. “ऐसे ही थोड़ा बुखार हो गया था. अभी क्रोसीन ली है, उतर जाएगा.” हम देर तक साहित्यिक चर्चा करते रहे. मुझे लग रहा था दवा की असली खुराक तो मुझे अब मिल रही है. दो घंटे बाद वे जाने के लिए उठ खड़ी हुईं. “मैं बिट्टू के संग आपके लिए अभी दलिया बनाकर भिजवा दूंगी. आप आराम कीजिए.”

“अरे आप क्यूं तकलीफ़…” मैं कहती ही रह गई, पर वे नहीं मानीं.

“आप इसी तरह लिखती रहिएगा. आप नहीं जानतीं, आपकी रचनाओं से हमें हमारी कितनी ही समस्याओं का समाधान मिल जाता है. और सबसे बड़ी बात, उन्हें पढ़ने से हमें आत्मिक तृप्ति होती है.”

“मैं आपकी भावनाओं का ख़याल रखूंगी. आप भी मुझे ऐसे ही सहयोग करती रहिएगा.” बड़े ही तृप्त मन से मैंने उनसे विदा ली. अब लेटने का मन नहीं कर रहा था. मैं बालकनी में कुर्सी लगाकर बैठ गई. संध्या की सुरमई छटा चारों ओर पसरने लगी थी. सड़क पर कारों का धीरे-धीरे बढ़ता क़ाफिला बहुत भला लग रहा था. कभी यही रेंगता क़ाफिला झुंझलाहट से भर देता था. सच है, जब मन शांत हो तो सब कुछ सुहाना लगता है. मैं भी कितनी बुद्धू हूं! जीवन की सार्थकता किसमें है, यही नहीं समझ पाई. इस नश्‍वर शरीर का क्या होगा, यह बेसिर पैर की बात सोच-सोचकर ज़िंदा शरीर को दुख देती रही. अरे, जिस शरीर में प्राण ही नहीं, उसकी क्या चिंता करना? मौत तो किसी को कभी भी, कहीं भी आ सकती है. यदि सीमा पर लड़ने वाला जवान अपनी मौत को लेकर इतना फ़िक्रमंद हो जाए तो देश का क्या होगा? इंसान यदि मौत से डर-डरकर जीता रहा तो वह तो जीते जी मर जाएगा.

मैं अपने ढंग से ज़िंदगी जीते हुए आत्मसंतुष्ट हूं. दूसरों के लिए मेरा जीवन अनुकरणीय और सराहनीय रहेगा, यह सुखद एहसास यदि दिल में है, तो मौत हमेशा सुखद ही लगेगी. सोचते हुए मैंने काग़ज़- क़लम उठा ली. अधूरी कहानी आज अवश्य ही पूरी हो जाएगी.

 

Sangeeta Mathur

     संगीता माथुर

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कहानी- शिखर पर (Short Story- Shikhar Par)

उस पल मुझे लगा कि गुत्थियों के जंगल से निकल मैं एक शिखर पर खड़ी हुई हूं, जहां सम्मान के साथ मुझे एक अच्छी पत्नी आदर्श मां होने का दर्जा दिया जा रहा है.

Short Story- Shikhar Par

“आप ज़हर खाकर मर क्यों नहीं जातीं.” नीरव की बात सुन मैंने हंसते हुए उससे पूछा, “तुम लोग रह लोगे मेरे बिना?”
“हां रह लूंगा.” वह तमतमाते हुए बोला.
अब तक मैं समझ रही थी कि वह किसी कार्टून के पात्र को अपने में उतारकर उसकी भूमिका अदा कर रहा है, पर उसके चेहरे पर छाई तटस्थता और एक मौन स्वीकृति के भाव ने मुझे एहसास कराया कि वह गंभीर है.
अपने 14 वर्षीय बेटे के मुंह से यह बात सुन मैं हैरान रह गई. मुझे अपनी मां होने की क्षमताओं पर संदेह होने लगा.
“आप और बच्चों की मम्मी जैसी क्यों नहीं हैं? आप घर पर भी नहीं रहतीं. बस, पापा अच्छे हैं. हर समय मेरा ख़याल रखते हैं. स्कूल से आता हूं तो पापा ही घर पर मिलते हैं, आप नहीं.”
“बेटा, मेरा जॉब ही ऐेसा है, जिसमें मुझे ज़्यादा व़क़्त घर से बाहर रहना पड़ता है. तुम्हारे पापा का काम ऐसा है कि वे लंच के लिए घर आ सकते हैं. फिर घर के पास ही है उनका ऑफ़िस. पापा ख़ुद ही बॉस हैं, इसलिए जब चाहे घर आ-जा सकते हैं.” मैंने उसे समझाने की कोशिश की.
हालांकि इस उम्र में उसे समझाना बेमानी लगता था. वह काफ़ी समझदार हो चुका था. यह भी समझता था कि मम्मी की नौकरी की वजह से ही सुख-सुविधाओं के अंबार जुटते थे… फिर भी मन को समझाया, आख़िर है तो बच्चा ही.
“आप अच्छी मम्मी नहीं हैं. आप मम्मी जैसी मम्मी नहीं हैं.” मुझे लगा कि जैसे नीरव ने मेरे मुंह पर करारा तमाचा जड़ दिया है. ‘मम्मी जैसी मम्मी नहीं.’ आख़िर उसकी नज़र में मम्मी की क्या परिभाषा है? शायद वही ठीक है. मैं एक आदर्श मां की श्रेणी में नहीं आती हूं. आती तो मैं एक आदर्श पत्नी की श्रेणी में भी नहीं हूं… अपेक्षाओं को ठीक से समझकर पूरा करना दूसरों को ख़ुश रखने के लिए आवश्यक होता है. तभी दूसरे चाहे वह पति हो या बच्चा या कोई और. आपसे ख़ुश रह सकते हैं और अपनी ख़ुशी… अपनी अपेक्षाएं… क्या उनके बारे में सोचना स्वार्थी होने की निशानी होती है?
सिलसिला उस दिन ही रुका नहीं, क्योंकि नीरव की वह प्रतिक्रिया मात्र क्षणिक नहीं थी, दबे हुए ज्वालामुखी के फूटते लावे जैसी थी. वह भूला नहीं कि उसने क्या कहा था, वरना ग़ुस्से में तो वह न जाने क्या-क्या कह जाता था. उस दिन ऑफ़िस से आकर बैठी ही थी कि बोला, “ज़रा मार्केट जाना है, एक क़िताब ख़रीदनी है. आप चलो.”
“बेटा, अभी तो आई हूं, थोड़ी देर में पापा आ जाएंगे, तब उनके साथ चले जाना.”
बस तुनक गया वह. “आप मेरी मम्मी नहीं हैं.” अपने कमरे में जाकर उसने चीज़ों को इधर-उधर फेेंकना शुरू कर दिया. मन तो हुआ उसे झिंझोड़ डालूं, पर ठहर गई. थकावट और दर्द के सैलाब को स़िर्फ आंखों में समेट लिया. उम्र के कारण शरीर में हो रहे बदलावों की वजह से वह इस तरह रिएक्ट करने लगा था या सचमुच में वही उसकी अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतर पा रही थी.
नौकरी को मजबूरी कहकर नौकरी करना स्वयं को जस्टिफाई करने जैसा होता है. उसकी मजबूरी तो नहीं थी, हां शा़ैक था. वह घर बैठ ही नहीं सकती थी और फिर अच्छा जॉब मिलना भी क्या आसान होता है. क्षितिज का बिज़नेस ठीक-ठाक चल रहा था. ऊपर-नीचे तो बिज़नेस में होता ही रहता है, लेकिन अगर वह नौकरी न भी करे तो भी अच्छी ज़िंदगी जी जा सकती थी. अच्छी ज़िंदगी यानी अच्छा खाना, अच्छे कपड़े. ज़रूरतें पूरी हो सकती थीं, पर लिविंग स्टैंडर्ड मेंटेन उसकी नौकरी के चलते ही हो पाता था.
“ज़रूरत क्या है तुम्हें धक्के खाने की, घर में रहो और नीरव पर ध्यान दो.” क्षितिज कई बार उससे कह चुका था. आज भी उसके आते ही वही बहस शुरू हो गई थी. “एक दिन उसकी बात मान उसके साथ चली जातीं तो क्या हो जाता? कितनी बार कहा है कि नौकरी छोड़ दो, पर तुम तो बस अपने बारे में सोचती हो.”
“सही समझे, आख़िर नौकरी तो मैं अपने लिए कर रही हूं. बढ़ती महंगाई और रिसेशन के इस समय में तुम्हें क्यों नहीं यह बात समझ आती कि नौकरी आजकल कोई मौज-मस्ती करने की चीज़ नहीं है, एक ज़रूरत है. उन लोगों से जाकर पूछो, जिनके यहां कमानेवाला एक ही है. कितनी परेशानियां झेलनी पड़ती हैं उन्हें और तुम चाहते हो कि मैं सारे दिन किचन में घुसी रहकर अपने टैलेंट और हर महीने मिलने वाले वेतन को नज़रअंदाज़ कर दूं.”
“मैं ये सब नहीं जानता बस…” क्षितिज को मानो कहने के लिए शब्द नहीं मिल रहे थे.

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“मैं भी नीरव के साथ क्वालिटी टाइम गुज़ारती हूं, पर उसने अपने मन में मुझे लेकर न जाने कैसी धारणाएं बना ली हैं. उसे समझाने से पहले तुम्हें मुझे समझना होगा. मैं इस तरह की ज़िंदगी नहीं जी सकती. मुझे लोगों से मिलना-जुलना अच्छा लगता है. इतने बरसों से नौकरी करते-करते इसकी आदत हो गई है. अब छोड़ दी तो फिर नहीं मिलेगी. बी प्रैक्टिकल क्षितिज. फिर आगे नीरव की पढ़ाई का ख़र्च दिन-ब-दिन बढ़ेगा ही.”
“तुम तो अपनी महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए घर से बाहर रहना चाहती हो. न जाने कौन-सी उपलब्धि की चाह तुम्हें घर के बाहर रहने के लिए उकसाती है. और फिर मैं कौन-सा तुम्हें घर में ़कैद होने के लिए कह रहा हूं. तुम्हें घूमने-फिरने की मनाही तो नहीं है. नीरव जिस दौर से गुज़र रहा है, ऐसे में बिगड़ने की संभावना ज़्यादा रहती है. तुम घर पर रहोगी तो कम से कम यह तो देख सकोगी कि वह टीवी पर क्या देख रहा है, नेट स़िर्फंग के कितने भयानक परिणाम देख-सुन चुके हैं हम.”
“पर तुम तो घर पर काफ़ी व़क़्त बिताते हो. तुम उस पर नज़र रख सकते हो. नीरव हम दोनों की ही ज़िम्मेदारी है. जैसी जिसकी सुविधा हो क्या, मैनेज नहीं करना चाहिए? ” इस बार उसकी आवाज़ में न तो तल्खी थी, न ही रोष. क्षितिज की ओर से कोई जवाब न पाकर मैंने फिर कहा, “क्या कोई और रास्ता नहीं निकल सकता?” मैं अपनी तरफ़ से किसी भी तरह की कोशिश करने में कोताही नहीं करना चाहती थी.
“जब रास्ता साफ़ दिख रहा है तो बेवजह दिमाग़ ख़राब करने से क्या फ़ायदा?” क्षितिज ने चिढ़कर कहा.
“यानी हर स्तर पर समझौता मुझे ही करना होगा?”
“तुम औरत हो और एक औरत को ही समझौता करना होता है. वैसे भी एक मां होने का दायित्व तो तुम्हें ही निभाना होगा. अपनी हद में रहना सीखो.” क्षितिज की बात सुन मेरा मन जल उठा.
मैं घायल शेरनी की तरह वार करने को तैयार हो गई, “अच्छा आज यह भी बता दो कि मेरी हद क्या है?”
“हद से मेरा मतलब है कि घर संभालो, नीरव को संभालो. खाओ-पीओ, मौज करो.” क्षितिज के स्वर में बेशक पहले जैसी कठोरता नहीं थी. आवाज़ में कंपन था, लेकिन उसकी सामंतवादी मानसिकता के बीज प्रस्फुटित होते अवश्य महसूस हुए. एक सभ्य समाज का प्रतिनिधित्व करनेवाला पुरुष लाख शिक्षित हो, पर बचपन में उसके अंदर औरत को दबाकर रखने के रोपे गए बीजों को झाड़-झंखाड़ बनने से कोई नहीं रोक सकता.
क्षितिज की बात सुन मैं हैरान रह गई. क्षितिज जैसे पढ़े-लिखे इंसान की मानसिकता ऐसी हो सकती है? क्या पत्नी से उसकी अपेक्षाएं बस इतनी ही हैं? मेरी इच्छाओं का मान रखना, मेरे व्यक्तित्व को तराशने तक का ख़याल नहीं आता उसे? मैं कब अपने मां होने की ज़िम्मेदारियों से पीछे हटना चाहती हूं, पर क्षितिज का साथ भी तो नीरव को सही सोच देने के लिए
ज़रूरी है.

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अपने आंसुओं को पीते हुए इस बार बिना कोई जवाब दिए मैं अंदर कमरे में चली गई. समझाया तो उसे जाता है, जो समझने को तैयार हो, जिसके मन की खिड़कियां खुली हों. क्या नीरव की चिंता उसे नहीं है? वह तो बस उससे थोड़ा-सा सहयोग चाहती है.
नीरव उन दोनों को लड़ते देख अपने कमरे में चला गया था. उसे अपने ख़ुद पर भी ग्लानि हो रही थी. वह इतना छोटा तो नहीं कि ख़ुद मार्केट न जा सके. अब वह नौवीं में है और हर काम ख़ुद कर सकता है… वैसे भी पढ़ने और ट्यूशन में काफ़ी समय निकल जाता है. फिर क्यों वह हर समय… पर पल भर के लिए मन में आए ये विचार उसके अंदर जड़ जमाई सोच के आगे पानी के बुलबुले की मानिंद ही साबित हुए.
‘नो, मम्मी इज़ रॉन्ग’, वह बुदबुदाया.
इधर क्षितिज को समझ नहीं आ रहा था कि वह किस तरह से इस ‘हद’ को परिभाषित करे. उसने तो वही कहा था, जो आज तक वह देखता आया था. उसकी दादी, मां, बुआ, चाची, यहां तक कि बहनें और भाभी भी इसी परंपरा का निर्वाह कर संतुष्ट जीवन जी रही थीं.
‘क्या वाकई में वे संतुष्ट हैं?’ उसकी अंतरात्मा ने उसे झकझोरा. अपनी मां को पिता की तानाशाही के आगे कितनी ही बार उसने बिखरते देखा था. पिताजी के लिए तो मां की राय का न कोई महत्व था, न ही उनका वजूद था. मां जब भी कुछ कहतीं, पिताजी चिल्लाकर उन्हें चुप करा देते थे. सारी ज़िंदगी मां चूल्हे-चौके में खपती रहीं. केवल जीना है, इसीलिए जीती रहीं. अंत तक उनके चेहरे पर सुकून और संतुष्टि का कोई भाव नहीं था. मां का दुख हमेशा ही उसे दर्द देता था, फिर आज क्यों वह…
उसकी बहनों को भी पिताजी ने कभी सिर उठाकर जीने का मौक़ा नहीं दिया. न मन का पहना, न खुलकर वे हंसीं. जहां क्षितिज की हर इच्छा को वह सिर माथे लेते थे, वहीं उसकी बहनों की हर छोटी से छोटी बात में कांट-छांट कर देते थे. वे हमेशा ही डर-डर कर जीं और आज ब्याह के बाद भी उनकी दुनिया घर की देहरी के अंदर तक ही सिमट कर रह गई है. उससे छोटी हैं, पर समय से पहले ही कुम्हला गई हैं. एक वीरानी-सी छाई रहती है उनके चेहरे पर. ख़ुशी की कोई किरण तक उन तक पहुंचती होगी, ऐसा लगता नहीं.
“पापा, बुक लेने चलेंगे? इस पास वाली मार्केट में नहीं, आगे वाली में मिलेगी, वरना मैं ख़ुद ले आता.” नीरव ने उसकी तंद्रा भंग की तो वह सोच के ताने-बाने से बाहर आया.
“हां, क्यों नहीं.” क्षितिज ने उसका कंधा थपथपाया.
“यू आर ग्रेट पापा, लेकिन मम्मी तो बस… उनके पास मेरे लिए समय ही नहीं है. मैं उन्हें बिल्कुल पसंद नहीं करता…” नीरव की बातें मेरे कान में पिघले हुए सीसे की भांति घुल रही थीं. एक बच्चा अपनी मां के बारे में ऐसा सोचे, इससे ज़्यादा आहत करने वाली बात और क्या हो सकती है? मेरा बेटा मुझसे दूर हो जाए, इससे तो बेहतर है कि मैं नौकरी छोड़ दूं. तभी शायद मैं उसकी उम्मीदों की मां बन सकूं.
नीरव शायद अपनी रौ में बहता ही जाता मानो मन की सारी भड़ास वह आज ही निकाल लेना चाहता हो. क्षितिज ने उसे कभी रोका भी तो नहीं, बल्कि उसके सामने मुझमें ही ग़लतियां निकालते रहते हैं. पर आशा के विपरीत क्षितिज की आवाज़ गूंजी.
“चुप रहो! अपनी मां के बारे में इस तरह बात करते तुम्हें शर्म नहीं आती? उनकी रिस्पेक्ट करना सीखो. वे तुम्हारी ख़ुशियों और इच्छाओं को पूरा करने के लिए दिन-रात मेहनत करती हैं. उनको जितना भी समय मिलता है, वह तुम्हारे साथ बिताती हैं और तुम हो कि…
वह दुनिया की सबसे अच्छी मां ही नहीं, पत्नी भी हैं.”
मेरी आंखों में नमी तैर गई. मैंने क्षितिज की ओर देखा. उसकी आंखों में आज पहली बार वह भाव दिखा जो जता रहा था कि वह मेरी भावनाओं की कद्र करता है. उसने मेरे हाथ को अपने हाथ में लिया तो मुझे आशवस्ति का एहसास हुआ. अपनों का विश्‍वास ही तो कठिन से कठिन परिस्थितियों से उबारने में मदद करता है.
नीरव को सिर नीचा किए खड़े देख मैंने उसके बालों को सहलाया तो वह मुझसे लिपट गया, “आई एम सॉरी मम्मी, अब मैं कभी आपसे ग़लत ढंग से बात नहीं करूंगा. आई लव
यू मम्मी.”
उस पल मुझे लगा कि गुत्थियों के जंगल से निकल मैं एक शिखर पर आ खड़ी हुई हूं , जहां सम्मान के साथ मुझे एक अच्छी पत्नी व आदर्श मां होने का दर्जा दिया जा रहा है.

Suman Bajpai

   सुमन बाजपेयी

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कहानी- प्रकृति के विरुद्ध (Short Story- Prakriti Ke Virudh)

Short Story- Prakriti Ke Virudh

 

 

“बच्चे की देखभाल का काम अब मम्मी-पापा या आया के बस का नहीं है संदीप. मां की जगह तो कोई नहीं ले सकता है. भला बच्चे के रहते मैं घर और ऑफिस दोनों में सामंजस्य कैसे बैठा पाऊंगी? मैं दोनों के साथ न्याय नहीं कर पाऊंगी.” श्रुति ने अपनी मजबूरी जताई.

 

डिंग-डांग, डिंग-डांग… डोरबेल बजती ही जा रही थी. श्रुति नींद में से उठकर झल्लाती हुई बाहर आई. दरवाज़ा खोला, तो पोस्टमैन सामने खड़ा था. अनमनी-सी उसने डाक ली और

खोलकर देखने लगी. डाक देखते ही उसके मुंह से ‘वाह!’ निकला. कंपनी के मैनेजर के जिस जॉब के लिए उसने इंटरव्यू दिया था, उसके लिए वो सिलेक्ट हो गई थी.

श्रुति ने ख़ुशी-ख़ुशी संदीप को फोन मिलाया और सिलेक्शन के बारे में बताया. उसने मम्मी-पापा, सास-ससुर, भाई-बहन, सहेलियों- सभी को सूचना दे दी और शाम को घर पर पार्टी का प्रोग्राम बन गया. सभी उससे दावत जो चाह रहे थे.

पहले इंटरव्यू में ही श्रुति ने इतनी बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी में नौकरी पा ली थी. यह बड़े गर्व की बात थी. शादी को चार-पांच महीने ही हुए थे. श्रुति की इच्छा काम करने की थी, सो उसने संदीप को पहले ही बता दिया था. संदीप भी चाहता था कि बीवी काम करे. अपने घर में इकलौता था संदीप और श्रुति जैसी ख़ूबसूरत और बुद्धिमान पत्नी पाकर बहुत खुश था. घर के साज-संभाल से लेकर मम्मी-पापा की देखभाल, लज़ीज़ खाना बनाने तक सब कुछ श्रुति ने अच्छी तरह से संभाल रखा था.

मां तो श्रुति की अक्सर तारीफ़ ही करती रहती. आज के ज़माने में इकलौते बेटे के लिए अच्छी बहू मिल जाए, तो पैरेंट्स मानो घर बैठे गंगा नहा लेते हैं. संदीप के माता-पिता बहुत ख़ुश थे. बस, अब उन्हें इंतज़ार था दादा-दादी बनने का, लेकिन श्रुति अभी इसके लिए तैयार नहीं थी.

संदीप भी नई-नई शादी के इस मोह को ज़िम्मेदारियों से लादना नहीं चाहता था.

दोनों की गृहस्थी अच्छी चल रही थी. श्रुति को नया काम पसंद आ रहा था. ऑफिस में सभी उसकी योग्यता के कायल हो गए थे. अपने मृदु स्वभाव और व्यवहारकुशलता से श्रुति ने सभी का दिल जीत लिया था. संदीप श्रुति के साथ बहुत ख़ुश था.

दोनों सुबह ऑफिस साथ जाते थे. शाम को साथ ही आते भी थे. कुछ ही महीनों में श्रुति ने अपनी कार ख़रीद ली. अब मम्मी-पापा को कहीं ले जाना होता, तो वही ले जाती थी.

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घर के काम में तो श्रुति परफेक्ट थी ही, अब वो बाहर के काम भी करने लगी थी. वीकेंड पर दोनों अक्सर शहर से दूर किसी रिसॉर्ट पर घूम आते थे. संदीप ने पहली एनीवर्सरी पर बच्चा प्लान करने की ज़िद श्रुति से की, तो उसने ‘बहुत जल्दी है’ कहकर टाल दिया. मम्मी-पापा जब भी श्रुति के मां बनने की इच्छा जताते, तो वो हंसकर टाल देती. श्रुति कोई ऐसी बात ही नहीं करती थी कि किसी को शिकायत हो, लिहाज़ा मम्मी-पापा ज़्यादा बोल नहीं पाते.

संदीप-श्रुति की शादी को अब पांच बरस होने को आए थे. दोनों अभी भी ‘जस्ट मैरिड’ कपल ही लगते थे. बस, लोग इनके विवाह की अवधि और संतान न हो पाने को सवालिया नज़रों से देखने लगे थे अब. एक-दो दोस्तों ने तो संदीप से पूछ भी लिया कि बाप बनने की पार्टी कब देगा. कब तक मैरिज एनीवर्सरी पर ही बुलाता रहेगा.

संदीप थोड़ा चिंतित हो उठा. उसने उसी रात श्रुति से बात करने की सोची. “श्रुति आज पार्टी में सभी दोस्त पूछ रहे थे कि बाप बनने की पार्टी कब दे रहा है. सच, अब तो मेरा भी मन करता है कि कोई मुझे डैडी कहे,  अपनी छोटी-छोटी उंगलियों से मेरा हाथ पकड़े.” संदीप ने श्रुति को प्यार से निहारते हुए कहा.

“मन तो मेरा भी बहुत करता है.” श्रुति ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया. “पर सोचती हूं कि एक प्रमोशन और ले लूं. काम थोड़ा कम हो जाए, फिर बच्चे की देखभाल अच्छे से कर पाऊंगी.”

“पर दोनों साथ-साथ भी तो चल सकते हैं. घर पर मम्मी-पापा तो हैं ना, वो देख लेंगे बच्चे को. फिर हम आया भी रख सकते हैं. कहीं कोई कमी तो है नहीं.” संदीप ने समझाते हुए कहा.

“बच्चे की देखभाल का काम अब मम्मी-पापा या आया के बस का नहीं है संदीप. मां की जगह तो कोई नहीं ले सकता है. बच्चे के रहते मैं घर और ऑफिस दोनों में सामंजस्य कैसे बैठा पाऊंगी?” श्रुति ने अपनी मजबूरी जताई.

“श्रुति, सभी वर्किंग कपल्स के बच्चे होते हैं. सब कुछ मैनेज हो जाता है. अब तो मम्मी-पापा ने टोकना भी बंद कर दिया है.” संदीप नाराज़गी भरे स्वर में बोला.

श्रुति ने संदीप के गले में बांहें डाल दीं और इस बातचीत को विराम देते हुए सोने का आग्रह किया. अगले दिन सुबह ऑफिस के लिए तैयार होते हुए संदीप ने श्रुति की आंखों में झांकते हुए पूछा, “हमारे प्रपोज़ल का क्या हुआ भई?”

“अरे, अभी भी वहीं अटके हो!” श्रुति हैरान थी. दोनों हंस पड़े और अपने-अपने ऑफिस को निकल गए. श्रुति अच्छी पोस्ट मिलते ही थोड़ी महत्वाकांक्षी हो गई थी. नौकरी के कारण ही उच्च प्रतिष्ठित वर्ग में उठना-बैठना, कंपनी की तरफ़ से देश-विदेश जाना, हाई प्रोफाइल लोगों से मेल-मिलाप आदि बातें हो रही थीं. ऐसे में मां बनने पर उसे छुट्टी लेनी पड़ती और कंपनी यक़ीनन उसके काम को किसी अन्य को सौंप देती, इसलिए मां बनने के अपने निर्णय को टालती ही जा रही थी.

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उस दिन मम्मी को हार्ट अटैक आ गया. तुरंत हॉस्पिटल में एडमिट किया गया और समय पर इलाज भी हो गया, लेकिन संदीप-श्रुति घबरा से गए थे. पापा भी गुमसुम ही थे. हॉस्पिटल में बीमारी के समय मम्मी ने यह कहते हुए कि ‘मरने से पहले पोते-पोती का मुंह देख लूं, बस यही इच्छा रह गई है’ कहकर श्रुति को मां बनने के लिए बाध्य कर दिया.

संदीप-श्रुति ने बच्चा कंसीव करने की प्लानिंग कर ली. इसके लिए वे गायनाकोलॉजिस्ट के पास गए. लेडी डॉक्टर ने श्रुति का पूरी तरह से चेकअप करने के बाद कुछ और जांच करवाने के लिए कहा. तीन दिन बाद दोनों डॉक्टर के पास रिपोर्ट के साथ थे. रिपोर्ट देखने के बाद डॉक्टर ने गंभीरता से कहना शुरू किया, “सॉरी संदीपजी, आप दोनों के कुछ प्रॉब्लम्स डिटेक्ट हुए हैं. दरअसल, बढ़ती उम्र में कंसीव करने की संभावनाएं कम होती जाती हैं. कॉम्प्लीकेशन्स का भी डर लगा रहता है. शादी के इतने साल गुज़र जाने के बाद भी आप दोनों ने कोई चांस नहीं लिया, इसलिए इंफर्टिलिटी की समस्या हो गई है.” डॉक्टर कहती जा रही थी और श्रुति स्तब्ध-सी बैठी रही.

“आजकल के वर्किंग कपल्स आज़ादी में खलल, बच्चे को संभालनेवाला कोई न होना, करियर में ऊंचाई अचीव करना या ख़र्चों आदि से बचने का सहज उपाय लेट प्रेग्नेंसी को मानते हैं, जो मेडिकली ग़लत है. पैरेंट्स बनने की सही उम्र इक्कीस से चौबीस-पच्चीस है और तीस के बाद तो कई कॉम्प्लीकेशन्स हो जाते हैं. प्रकृति के भी कुछ नियम हैं. मेडिकल साइंस चाहे कितनी भी तऱक्क़ी कर ले, यदि हम प्रकृति के विरुद्ध काम करेंगे, तो नुक़सान ही उठाएंगे.” इतनी-सी  भूल की इतनी बड़ी सज़ा! संदीप भी परेशान था. डॉक्टर की आवाज़ भी उसे अब सुनाई नहीं दे रही थी.

श्रुति डॉक्टर के चेंबर में ही फफक-फफककर रोने लगी. श्रुति सोचने लगी कि आख़िर इतनी बड़ी ग़लती उससे कैसे हो गई? मां बनने की नैसर्गिक उम्र को उसने भी तो टाला था, पर अब क्या हो सकता था. उसे अपराधबोध हो रहा था कि वो कितनी स्वार्थी हो गई थी. स़िर्फ अपने बारे में सोचती रही. मम्मी-पापा और संदीप किसी की भी भावना की उसने परवाह नहीं की, यहां तक कि अपने मम्मी-पापा की भी उसने कहां सुनी थी?

श्रुति को अपनी वो सारी सहेलियां याद आ रही थीं, जिन्होंने जॉब करते हुए संतानों को जन्म दिया और उनकी परवरिश की. उनमें कहीं भी संस्कारों की कमी न थी, न ही जॉब में उन सहेलियों ने कुछ गंवाया था. श्रुति को अब लगने लगा था कि नौकरी करते हुए भी बच्चे की अच्छी परवरिश की जा सकती है. बस, ज़रूरत है घरवालों के सहयोग की, टाइम मैनेजमेंट की और क्वालिटी टाइम बच्चों के साथ बिताने की, पर अब पछताने से क्या होनेवाला था.

अगली सुबह फोन की घंटी बजी. श्रुति ने फोन उठाया. फोन पर उसकी गायनाकोलॉजिस्ट थी. “आपका इलाज संभव है. मैंने दोबारा से रिपोर्ट्स देखी हैं.” श्रुति में मानो नवजीवन का संचार हुआ. वो जल्दी से डॉक्टर के पास जाने के लिए तैयार होने लगी. उसने ठान लिया था कि इस बार वो प्रकृति के विरुद्ध नहीं जाएगी.

Poonam Mehta

       पूनम मेहता

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कहानी- बहू-बेटी (Short Story- Bahu-Beti)

 

Short Story- Bahu-Beti

”हमें अपनी लड़ाई स्वयं ही लड़नी है और इसके लिए पुरुषों के विरुद्ध झण्डा उठाने की भी ज़रूरत नहीं. हमें ही एक-दूसरे का सहारा बनना है, एक-दूसरे का दर्द पहचानना है. सौभाग्यवश आज की सास शिक्षित है. उसकी सोच संकुचित नहीं रह गई. अब वह घर बैठ हर समय बहू की नुक्ताचीनी करने में अपना समय नहीं गंवाती.”

जया स्वयं को उतना उत्साहित नहीं पा रही थी, जितना कि छह माह पश्‍चात् घर लौटने पर उसे होना चाहिए था. स्पष्ट कुछ भी नहीं था. बस लौटना था, इसलिए लौट रही है. अमेरिका का उसका छह माह का वीज़ा समाप्त होने पर था. यह समय वह अपनी बेटी, दामाद और दो नटखट नातिओं के संग बिता कर अब अपने घर आ रही थी. यहां भी भरा-पूरा परिवार है. एक ही घर के ऊपर-नीचे की मंज़िल में दोनों बेटे सपरिवार रहते हैं. मकान तो उसके पति का ही बनवाया हुआ है और यहां उसका

निरादर होता हो, ऐसा भी नहीं है. तो फिर मन क्यों उचाट है? पिता की मृत्यु के बाद बेटी ने बुलवा भेजा था, ताकि मन बहल जाए कुछ दिन, पर रहना तो आख़िर यहीं है. अपने वतन और अपने लोगों के बीच और यही उसे पसन्द भी है.

हवाई जहाज के उड़ान भरते ही उसने अपनी दृष्टि पासवाली छोटी-सी बन्द खिड़की के पास ग़ड़ा दी. हवाई टिकट बुक कराते समय वह सदैव ही खिड़की वाली सीट के लिए भी आवेदन कर देती है. केबिन के खिड़की से बाहर देखना उसे बहुत अच्छा लगता है. एकदम अलौकिक दृश्य- दूर तक फैला अनन्त. दूर- बहुत दूर एक होते पृथ्वी और आकाश- बस और कुछ नहीं. कहां दिखता है ये सब महानगरों की बहुमंज़िली इमारतों के बीच. बादलों के आ जाने पर हवाई जहाज उनके भी ऊपर चला जाता है. स़फेद रूई के फाहों जैसे बादलों के ऊपर यह दृश्य एकदम अलग होता है.

पहले तो ये नज़ारे सदैव ही उसके मन में पुलक जगा जाते थे, पर आज ये भी उसे अधिक समय तक नहीं बांध सके. वह आंखें मूंद अपने अतीत के गलियारों में घूमने लगी. कितना बदल गया है समय. जब उसका विवाह हुआ था तो सास अर्थात् बिना ताज की एकछत्र साम्राज्ञी. तिस पर उसकी सास तो कठोर और निर्मम भी थी. पति भी तो ऐसे नहीं थे कि कभी दबी ज़ुबान से ही पत्नी के पक्ष में बोल देते. घोर अन्याय तक की बात में भी ख़ामोश ही रहते. पुरुष जो ठहरे.

पर जया को अपने बड़े बेटे समीर का बहुत सहारा है. जाने किस मिट्टी का बना है वह. कभी किसी का दिल नहीं दुखाया होगा उसने. मां की पूरी देखभाल करता है और पत्नी वसुधा भी प्रसन्न है. और क्यों न हो? अपनी इच्छा से ही तो विवाह किया है दोनों ने. बैंगलौर में दोनों ने एक संग मैनेजमेन्ट का कोर्स किया है. दोस्ती हुई और विवाह का फ़ैसला कर लिया. कितना परेशान हो गए थे वे दोनों. ‘वसुधा को एक शब्द भी हिन्दी बोलनी नहीं आती’ बताया था समीर ने.

“अब हमें क्या अपने घर में अंग्रेज़ी बोलनी पड़ेगी? या फिर तमिल ही सीखनी पड़ेगी?” झुंझलाकर कहते उसके पिता.

पर ऐसा कुछ भी नहीं करना पड़ा था. सादे-से विवाह समारोह के पश्‍चात् बेटे-बहू ने प्रयत्न करके उसी शहर में नौकरी ढूंढ़ी और एक संग रहने का फैसला भी किया. वसुधा ने एक दिन भी महसूस नहीं होने दिया कि उन्हें अंग्रेज़ी सीखनी पड़ेगी, बल्कि सालभर के भीतर हिन्दी बोलने-समझने तो लगी ही थी, साथ में कुछ शब्द पंजाबी के भी सीख लिए थे. बहुत आदर-सम्मान करती थी सब का. उसके नौकरी करने से सास पर ही काम का सब बोझ न आन पड़े, इसलिए दिनभर के लिए आया की भी व्यवस्था कर दी थी और जल्द ही घर नन्हीं किलकारियों से भी गूंज उठा.

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इतना कुछ पाकर भी एक अरमान रह गया था जया के मन में. दूसरी बहू तो वह अपने कुल-गोत्र की ही लाएगी. अपने सब अरमान पूरे करेगी वह अपने बेटे रंजन के ज़रिए. पूरे रस्मो-रिवाज़ के साथ व्याह रचाएगी. बहुत-सी लड़कियों से मिलवाने के बाद ही रंजन ने माधवी को पसन्द किया था. पूरे विधि-विधान से विवाह सम्पन्न हुआ. जया ने बहू माधवी का बहुत खुलेदिल से स्वागत किया और अपनत्व देने का प्रयत्न किया. पर वह सबसे खिंची-खिंची अलग-थलग ही रहती. अपने कमरे में चुपचाप कुछ पढ़ती रहती अथवा रेडियो चला कर आंखें मूंदे लेटी रहती.

जया उससे बात करने का प्रयत्न भी करती लेकिन वह या तो चुप ही रहती अथवा रूखा, संक्षिप्त-सा उत्तर देकर चली जाती.

जया को अपने प्रति किया व्यवहार न अखरता, यदि रंजन-माधवी आपस में ही हंसी-ख़ुशी रह लेते, पर दोनों का ही मुंह अलग-अलग दिशा में रहता. वह यह भी नहीं कह सकती कि पूरा दोष माधवी का ही था. उसका बेटा भी तो कम आत्मकेन्द्रित नहीं. साथ ही पूरी तरह से पुरुष सत्तात्मक सोच भी थी उसकी. कहां ग़लती हो गई

उसके लालन-पालन में? संस्कार तो उसने अपने दोनों पुत्रों में एक-से ही डाले थे. वह इस आशा में थी कि मेरी परवाह भले ही न करे, लेकिन कम-से-कम अपनी पत्नी को तो प्यार करेगा. वह किसी तरह आपस

में ही सामंजस्य बिठा ले, यही सोचकर उसने ऊपर वाला हिस्सा उन्हें अलग रहने के लिए दे दिया.

प्रायः ऐसा होता है कि बहू सास से प्रताड़ना पाती है और अपना समय आने पर ब्याज सहित अपनी बहू से वसूलती है. पर जया ने इसके विपरीत यह तय किया कि जो कुछ उसने सहा-सुना, वह उसकी बहुओं के साथ न हो. वह उन्हें बेटियों-सा ही स्नेह देती. बड़ी से तो ख़ैर उसे कोई शिकायत नहीं थी. पर माधवी…? और जब उसे मालूम था कि वसुधा अपनी बीमार मां को देखने गई हुई है, तब भी क्यों उसे घर पहुंचने का उत्साह नहीं हो रहा? समीर उसे हवाई अड्डे लेने आया. रास्ते में उसने बताया कि रंजन और माधवी में तनातनी कुछ बढ़ी ही है, कम नहीं हुई और उनके बीच होते तकरार प्राय: ही नीचे सुनाई देते रहते हैं.

दूसरे दिन इतवार था. दोपहर के भोजन के पश्‍चात वह लेटी ही थी कि बाहर आहट हुई. बाहर के दरवाज़े की सांकल भी खुली. नीचे के हिस्से में उस व़क़्त कौन जा रहा है? यह देखने कमरे से बाहर आई तो पाया माधवी खड़ी है. द्वार के पास एक अटैचीकेस भी रखा है.

“कहां जा रही हो इस तपती दोपहरी में?” उसने पूछा.

“अभी सोचा नहीं.”

“मतलब?”

“आपके बेटे ने कहा है कि यह घर उसका है और मैं यहां से चली जाऊं.”

जया उसका हाथ थाम अपने कमरे में ले आई. उसे स्नेहपूर्वक अपने पास बिठाया और कहा.

“हां, अब बताओ.”

पर वह तो मुंह खोलने को ही तैयार नहीं थी.

“माधवी, तुम इस घर में व्याह कर आई हो. अतः अब यह घर उतना ही तुम्हारा है, जितना रंजन का.”

“घर तो आप लोगों का है, रंजन का है. मेरा कैसे हो सकता है?”

“फिर तो यह घर मेरा भी न हुआ. मैं भी तो तुम्हारी तरह बाहर से आई हूं… अच्छा, फिर यह बताओ मेरा और तुम्हारा घर कौन-सा है?”

माधवी चुप ही बैठी रही.

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“मां के घर सुनते रहे कि बेटी पराया धन है और ससुराल का घर तो पति का होता है, भले ही यह घर स्त्री ही तिनका-तिनका जोड़कर बनाती है. उस घर की दिन-रात देखभाल करती है. अपने से पहले पति और बच्चों की ज़रूरत पूरी करती है. फिर भी घर उसका नहीं. अच्छा, फिर यह बताओ उसका घर कौन-सा है?”

“क्या पता?” माधवी ने संक्षिप्त-सा उत्तर दिया.

“हमने कभी संग बैठ बातें नहीं की. दुख-सुख नहीं बांटा. चलो आज ही शुरुआत करते हैं…”

माधवी की तरफ़ से कुछ हरकत न पा जया ने ही आगे जोड़ा.

“मायके में जब भी तुम्हें कोई समस्या होती थी तो तुम मां से अथवा घर के किसी अन्य सदस्य से बात कर मन का बोझ

हल्का कर लेती थी न? वैसे ही आज भी कर लो… चलो पहले मैं ही तुम्हें आपबीती सुनाती हूं. तब तुम्हें शायद मन की बात कहने का हौसला मिल जाए.

मेरा विवाह हुआ तो मेरे साथ क्या होता था, जानती हो? शाम को बेटे के घर में घुसते ही दिनभर की शिकायतों का पुलिन्दा खोल कर बैठ जाती थीं अम्मा. कूप मण्डूक-सा ही जीवन जीया था उन्होंने और मैं सह शिक्षा में पढ़ी हुई थी. अत: अम्मा को तो मेरी हर बात नागवार गुज़रती. मेरी हर बात पर नुक्ताचीनी करतीं वह. पति के मित्रों के साथ हंसकर बात कर लेना उन्हें अक्षम्य अपराध लगता. पति भी तो ऐसे नहीं थे कि मां से कहते- ‘मां अब सिर ढंककर रहने का ज़माना नहीं रहा.’ अपनी पत्नी की हर बात, हर ज़रूरत को नज़रअंदाज़ कर अपने माता-पिता की ही हर बात सुनना- यही तो उस ज़माने में आदर्श बेटा होने का प्रमाण था.

यूं पूरा दोष अम्मा का भी नहीं था. पढ़ी-लिखी वह थीं नहीं. उस समय स्त्रियों की बातचीत का मुद्दा प्राय: इधर-उधर की शिकायतें, मीन-मेख निकालने का ही होता था. फिर उन्होंने स्वयं बहुत प्रताड़ना सही थी. युवावस्था में ही पति की मृत्यु हो गई.

पहले की महिला आर्थिक, सामाजिक रूप से पूर्णत: पति पर निर्भर थी तो ससुराल की सब धौंस चुपचाप सहती थी. पर अब शिक्षित होने पर वह उतनी निर्भर नहीं है. उसमें आत्मविश्‍वास भी आ चुका है तो वह ये सब क्यों सहे? पर सास की छवि आज भी वही है और इसका एक दुष्परिणाम यह हुआ है कि संयुक्त परिवार टूटने लगे हैं. जबकि दरअसल उनकी ज़रूरत बढ़ी है, कम नहीं हुई. मिल-जुलकर रहने से दोनों का ही लाभ है. मां के नौकरी करने पर छोटे बच्चे दादा-दादी की स्नेह की छत्रछाया में पलते हैं और वृद्धावस्था में बच्चे मां-बाप का सहारा बन जाते हैं.

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लड़की कितनी भी पढ़ी-लिखी हो, आधुनिक हो- परिचित माहौल को छोड़कर नई जगह में बसने का भय, एक झिझक तो होती ही है. उस पर यदि घर की प्रमुख स्त्री यानी सास विद्रोही खेमे में ही खड़ी हो तो समस्या और भी बढ़ जाती है. तुम्हारे मन में भी शायद मेरी यही छवि बनी हुई है.

सदियों से चली आ रही परम्परा को तोड़ना इतना आसान न भी हो, पर इतना तो हम कर ही सकते हैं कि नई नवेली दुल्हन का विशाल हृदय से स्वागत करें. यह तो संभव है कि हम आपस में मां-बेटी-सा रिश्ता कायम कर लें, दोस्ताना व्यवहार करें. एक-दूसरे के दुख-दर्द को समझें.

हमें अपनी लड़ाई स्वयं ही लड़नी है और इसके लिए पुरुषों के विरुद्ध झण्डा उठाने की भी ज़रूरत नहीं. हमें ही एक-दूसरे का सहारा बनना है, एक-दूसरे का दर्द पहचानना है. सौभाग्यवश आज की सास शिक्षित है. उसकी सोच संकुचित नहीं रह गई. अब वह घर बैठ हर समय बहू की नुक्ताचीनी करने में अपना समय नहीं गंवाती. उसकी अपनी रुचियां हैं, सामाजिक दायरा है.

अब आई बात रंजन और तुम्हारी. ज़िन्दगी की प्रत्येक समस्या का हल न हो तो भी अनेक का होता ही है, बशर्ते हम उसे शान्तिपूर्वक बैठ कर सुलझाने का प्रयत्न करें. यदि रंजन कुछ ग़लत करता है और सोचता है कि पुरुष होने के नाते अथवा इस घर का सदस्य होने के नाते उसकी मनमानी चल जाएगी तो वह ग़लत सोच रहा है. यदि वह तुम पर अन्यायपूर्ण बात थोपता है तो मैं तुम्हारे साथ हूं और उसकी मां होने के नाते सही राह दिखाना मेरा फ़र्ज़ है और यदि तुम  कोई ग़लती करोगी तो मैं तुम्हें भी डांट सकती हूं, क्योंकि तुम भी अब इसी घर की बेटी हो.”

जया खिसक कर माधवी के क़रीब आ गई और स्नेहपूर्वक उसे आलिंगनबद्ध कर लिया. माधवी एक पल के लिए रुकी रही. पर उसके चेहरे से लग रहा था कि ब़र्फ पिघल रही है. उसने पहले झिझकते हुए, फिर कस के जया का आलिंगन किया और अपना सिर उसके कंधे पर टिका कर आंखें मूंद लीं. फिर आंसुओं को पीते हुए बोली, “मां, मैंने तो हमेशा ही इस घर को और आप सभी को अपना समझा, पर इनका रूखा व्यवहार मुझे निराश करता चला गया. लेकिन धीरे-धीरे मैं बहुत-कुछ समझने और जानने लगी हूं. बस, एक परायेपन की फांस थी, जो आपने बहुत कुछ कह कर और प्रेम, अपनेपन से दूर कर दी है. सच, मैं ख़ुद को बेहद भाग्यशाली मानती हूं कि हमारा रिश्ता सास-बहू का नहीं, बल्कि मां-बेटी का है.”

जया प्यार से माधवी के सिर पर हाथ फेरने लगी.

Usha Drava

       उषा वधवा

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कहानी- सबक (Short Story- Sabak)

Short Story- Sabak

मुझे तो अभी-अभी जीवन का एक सबक मिला था कि चाहे रिश्ता जो भी हो, कभी एक तरफ़ की बात सुनकर किसी के बारे में कोई राय नहीं बना लेनी चाहिए, पता नहीं सच क्या हो.

सोसायटी के गार्डन में अपनी सहेलियों- तनु और रश्मि के साथ शाम की सैर करती हुई मैंने कोने में स्थित एक बेंच पर गुमसुम बैठी माया आंटी पर उड़ती हुई नज़र डाली. वे किसी सोच में गुम कुछ गंभीर व उदास लगीं. आंटी अक्सर यहीं मिलती हैं, ख़ूब बातें करती हैं. अंकल की पांच साल पहले मृत्यु हो गई थी. वे अपनी बेटी सोनल के साथ रहती हैं. सोनल की बेटी दसवीं क्लास में है और बेटा आठवीं में.

सोनल के पति अनिल की दस साल पहले एक सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो गई थी, तब से आंटी और सोनल से तीन साल छोटा उनका बेटा अनुज सोनल के साथ ही रहते हैं. गार्डन का हर चक्कर पूरा करने पर मेरा ध्यान आंटी की तरफ़ जा रहा था. वे आज कुछ ज़्यादा ही गंभीर थीं, नहीं तो हमें आवाज़ देकर बुला लिया होता. तनु और रश्मि तो सैर करके घर चली गईं, पर मेरा मन नहीं माना.

“हेलो आंटी!” कहते हुए मैं उनके पास ही बैठ गई. आंटी फीकी-सी हंसी हंसते हुए बोलीं, “आओ शुभा, कैसी हो?”

“मैं ठीक हूं आंटी. आज आप अकेली क्यों बैठी हैं? बाकी आंटी कहां हैं? आपकी सहेलियां?”

“वे सब सैर करके घर चली गईं.”

“आप नहीं गईं?”

“घर जाने का मन नहीं हुआ.”

“ओह! सोनल नहीं है घर पर?”

“नहीं, मूवी गई है बच्चों के साथ.”

“आप नहीं गईं?”

“मुझे कौन ले जाता है?” इससे ज़्यादा किसी के जीवन में हस्तक्षेप करना मुझे ठीक नहीं लगा, मैं चुप रही. पर आंटी ने ख़ुद ही अपने मन का गुबार निकालना शुरू कर दिया. जैसे-जैसे आंटी अपने मन की पीड़ा बांट रही थीं, मेरा दिल उनके प्रति असीम सहानुभूति से भरता जा रहा था.

आंटी कह रही थीं, “इस सोनल को सहारा देने के लिए सालों से इसके साथ रह रही हूं. आज जब इसके बच्चे बड़े हो गए, इसे मेरी ज़रूरत ही नहीं रही. कभी भी दोनों बच्चों को लेकर बाहर चली जाती है. कभी मूवी, कभी डिनर. मैं अनुज को नौकरी मिलते ही उसके साथ चली जाऊंगी. बेसहारा-सी पड़ी हूं, कोई और ठिकाना नहीं है न! नहीं तो इसके इतने नखरे क्यों उठाती. अभी तक उसके बच्चे छोटे थे. उसे हमारी ज़रूरत थी. उसका पति इतना पैसा छोड़कर गया है, तब भी उसे मुझ पर और अनुज पर ख़र्च करने में तकलीफ़ होती है.” मैं हैरान, दुखी-सी आंटी की बातें सुन रही थी.

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सोनल ऐसी है! मुझे तो जब भी मिली, सभ्य, कोमल स्वभाव की लगी. घर में अपनी मां के साथ उसका व्यवहार ऐसा है? मुझे मन-ही-मन उस पर ग़ुस्सा आया. अंधेरा होने लगा, तो आंटी को ज़बर्दस्ती वहां से उठाकर घर भेजकर मैं भी अपने घर लौट आई. फिर किसी काम में मन ही नहीं लगा. यही सोच रही थी कि वृद्धावस्था तो बहुत परेशानी की चीज़ है. अपनी बेटी पर आश्रित रहकर दिन-रात अपमान सहन करना आसान तो नहीं है, पर कोई बेटी अपनी मां के साथ दुर्व्यवहार कैसे कर पाती है! रह-रहकर आंटी का उदास चेहरा मेरी आंखों के आगे आ रहा था.

मुझे क्या करना चाहिए? सोनल से बात कर उसे समझाना ठीक रहेगा क्या? पर आजकल किसी के जीवन में हस्तक्षेप करना समझदारी तो नहीं है न! दो-चार दिन और निकल गए. आंटी उसके बाद भी मुझे गार्डन में दिखीं, पर बैठकर बातें करने का मौक़ा नहीं मिला. एक दिन आंटी नहीं थीं गार्डन में, अचानक सोनल दिखी. मैं हैरान हुई, वह भी मुस्कुराई. मैंने कहा, “तुम आज काफ़ी दिन बाद दिखी. आज आंटी नहीं आईं.”

“मां की किटी पार्टी है आज!”

“अच्छा?”

“हां, आज बच्चे भी बर्थडे पार्टी में गए हैं. मैंने सोचा मैं भी सैर पर निकल जाऊं.”

“अच्छा किया.” मैंने कहा तो उसने भी मेरे साथ क़दम बढ़ा दिए. वह मेरे बच्चों की पढ़ाई के बारे में पूछती रही. उसका सभ्य स्वभाव मुझे हमेशा अच्छा तो लगा था, पर आंटी की बातों के बाद मैं काफ़ी दुविधा में थी और उससे आंटी के बारे में बात करना चाहती थी. सैर के बाद मैंने कहा, “सोनल, पांच मिनट बेंच पर बैठें?”

“हां, क्यों नहीं!” हम दोनों बैठ गए. कैसे बात शुरू करूं, मैं सोच रही थी. आख़िर मैंने पूछ ही लिया, “अनुज को कहीं जॉब मिला?” सोनल के चेहरे पर दुख का एक साया-सा लहराता साफ़-साफ़ देखा मैंने. ठंडी सांस लेकर बोली, “मिलेगा उसे न जो ढ़ूंढ़ना चाहता हो! क्या बताऊं शुभा, घर-घर की कहानी है. छोड़ो, आज इतने दिनों बाद तुमसे मिली हूं. क्या अपना रोना लेकर बैठूं.”

“अरे नहीं, तुम मुझे अपने दिल की बात बता सकती हो, कुछ परेशानी है?”

“तुम्हें तो पता ही है, मेरे पति मेरा साथ बहुत जल्दी छोड़ गए, तब बच्चे कितने छोटे थे! मां अनुज और पिताजी के साथ मेरे पास रहने आ गई थीं कि मुझे सहारा रहेगा. पर मैं आज भी उस दिन को कोसती हूं, जब मां मेरे साथ रहने आई थीं.” मैं बुरी तरह चौंकी, “सच? क्या हुआ?”

“हमारा एक फ्लैट और दो दुकाने हैं. वहां से जो किराया आता है, उससे और मेरे पति की जो बीमा रक़म मिली, उससे मैंने घर-गृहस्थी और बच्चों की पढ़ाई संभाली हुई है. किसी तरह मैनेज कर ही लेती हूं.

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एक-दो बार मैंने कहीं जॉब भी किया, पर मुझे एक महीने में ही छोड़ना पड़ गया, क्योंकि अनुज और मां ने बच्चों को संभालने के लिए

साफ़-साफ़ मना कर दिया था. पिताजी नहीं रहे, तो मैं ही अपनी परेशानियां एक तरफ़ रख मां को संभालती रही. तुम्हें पता है शुभा, मां के तीन फ्लैट्स हैं, तीनों किराए पर दिए हैं. किराए का और पिताजी का काफ़ी पैसा मां के पास आता है, पर मां एक रुपया भी कभी मुझ पर या मेरे बच्चों पर ख़र्च नहीं करतीं. उनका सब कुछ अनुज के लिए है और अनुज! वह इतना कामचोर और निकम्मा है कि दिनभर बस टीवी या कंप्यूटर पर लगा रहता है. बच्चों को पढ़ना होता है, तो यही कहती रहती हूं कि टीवी की आवाज़ धीमी कर लो. फिर मां को यह इतना बुरा लगता है कि पूछो मत. खाने में मां और अनुज के इतने नखरे हैं कि बता नहीं सकती. मेड से भी दोनों बहुत किटकिट करते हैं. अपने ही घर में दम घुटता है मेरा, तो निकल जाती हूं कभी बच्चों को लेकर.

तीन-तीन किटी पार्टी है मां की. अपने और अनुज के लिए, सब तरह के मनोरंजन के लिए पर्याप्त धनराशि है मां के पास, पर कभी उनका हमारे ऊपर कुछ ख़र्च हो जाए, तो दिनभर सुनाती हैं. काश, सहारा देने के नाम पर मां हमारे पास न आतीं. मैं ज़्यादा चैन से जी लेती. वे कभी अपने फ्लैट में रहने के बारे में सोचती भी नहीं, क्योंकि वहां उनके ख़र्चे होंगे.

शुभा, आज सुबह मां ने बहुत सुनाया था, दिल भरा हुआ था. आज तुमसे सब कह दिया. पर प्लीज़, किसी को कहना मत. अपनी परेशानियां आज तक किसी को नहीं कही, कोई जल्दी यक़ीन भी तो नहीं कर पाएगा. जो सामने दिखता है, वही सच नहीं होता, बहुत कुछ अनदेखा रह जाता है. चलें?” आंखें पोंछते हुए सोनल ने कहा, तो मुझे भी अपनी आंखों की नमी का एहसास हुआ. हम दोनों अपनी-अपनी बिल्डिंग के रास्ते की तरफ़ बढ़ गए. मैंने उसे मुड़कर देखा. उसके थके सुस्त क़दमों से उसके दिल की उदासी महसूस हो रही थी मुझे. और मैं? मुझे तो अभी-अभी जीवन का एक सबक मिला था कि चाहे रिश्ता जो भी हो, कभी एक तरफ़ की बात सुनकर किसी के बारे में कोई राय नहीं बना लेनी चाहिए. पता नहीं सच क्या हो. दूसरा अपने अंदर पता नहीं कितने दुख समेटकर जी रहा हो. बुज़ुर्ग माता-पिता भी तो कर देते हैं न ग़लतियां! स़िर्फ बड़े होने से ही तो उनकी हर बात सही, सच नहीं हो जाती न!

Poonam ahmed

    पूनम अहमद

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कहानी- अंधकार की किरण (Short Story- Andhkar Ki Kiran)

Short Story- Andhkar Ki Kiran

भविष्य की तो कौन जानता है, पर किशोरवय की चंचलता के कारण उन्हें कई बार मां की ही नहीं, पिता की भी डांट खानी पड़ती. मां-पिता भविष्य देखते थे और वे किशोरियां वर्तमान, जिसमें भरे होते सपने-ही-सपने. असत्य तो उन सपनों के बीच समाता ही न था. हर लड़का राजा, हर लड़की रानी. काश कि बचपन वहीं ठहर जाता.

जैसे ही तांगा गली के मोड़ पर मुड़ा, सत्या का दिल बैठने लगा था. ऐसा नहीं था कि वह इस शहर में पहली बार आई हो. यहां तो उसके बचपन से लेकर किशोरवय तक के किलकते-हंसते दिन बीते थे. जीवन के सबसे सुखद सपने उसने और मीरा ने यहीं देखे थे. वह तो ऐसी उम्र थी जब वह सत्य और कल्पना में भेद नहीं कर पाती थी. सारी कल्पनाएं उसे सुनहरी और सत्य लगती थीं. मीरा और वह घंटों बतियाती रहतीं, पर उनमें कभी कहीं कोई निराशा की गंध नहीं होती थी. भविष्य की तो कौन जानता है, पर किशोरवय की चंचलता के कारण उन्हें कई बार मां की ही नहीं, पिता की भी डांट खानी पड़ती. मां-पिता भविष्य देखते थे और वे किशोरियां वर्तमान, जिसमें भरे होते सपने-ही-सपने. असत्य तो उन सपनों के बीच समाता ही न था. हर लड़का राजा, हर लड़की रानी. काश कि बचपन वहीं ठहर जाता.

बचपन कब रू-ब-रू नहीं हो पाया है ज़िंदगी की धुंधली राहों से. ज़िंदगी के हर मोड़ पर वह खड़ा हो जाता है.

उनके घर कितने छोटे थे और सपने कितने बड़े. छोटे घरों में बड़े सपने देखना कोई गुनाह तो नहीं था.

तांगे वाले ने फिर पूछा, “कहां तक जाना है बहनजी?”

“आगे तो चलो अभी.”

सर्दी का सूरज साढ़े चार बजते-बजते धुंधला गया था. छोटा शहर, भीड़-भाड़ से दूर, इस कॉलोनी की गली में इक्का-दुक्का लोग ही चलते नज़र आ रहे थे. तांगे के घोड़े की टाप सुन कुछ लोग घर के बाहर निकल-निकलकर देखने भी लगे थे. सत्या की आंखें मकानों के नम्बरों पर टिकी थीं और मन बिजली की गति से दौड़ रहा था.

“मीरा सुना है, पिताजी का ट्रांसफर होनेवाला है.”

“ये….! नहीं यह नहीं हो सकता.” मीरा एकदम तिलमिला उठी थी. सत्या के पिता का ट्रांसफर होने का अर्थ है सहेली सत्या का भी चले जाना. वह यहां पर इसीलिए तो है कि उसके पिता यहां बैंक अधिकारी हैं. पिछले सात वर्षों से वे यहीं टिके हैं. मीरा के पिता का तो व्यवसाय ही यहां है. दोनों सखियों के घर नज़दीक थे. वे आसानी से एक-दूसरे के घर किसी भी समय आ-जा सकती थीं. एक ही स्कूल में पढ़ने के कारण उनकी मित्रता और भी गहरी हो गई थी. मीरा और सत्या की दोस्ती में कोई दुराव-छिपाव नहीं था. छोटी-से-छोटी चीज़ भी वे एक-दूसरे को दिखाने दौड़ पड़तीं. पहनने-ओढ़ने, किताब-कॉपी, एक जैसे बस्ते, एक जैसे कपड़े, एक जैसी किताबें और एक जैसा खाना, एक जैसी पसंद, एक जैसा फैशन.

समय नदी की धार बन बहता रहा. उस धारा में बह गये थे बड़े-बड़े समय के पत्थर. पिता की बदली के संग बिछुड़ गई थीं दोनों सखियां-सत्या और मीरा. दोनों की पढ़ाई पूरी हुई. फिर शादियां हुईं. एक-दूसरे के घर शादी के निमंत्रण आये थे. कोई जा तो नहीं सका था. केवल शुभकामनाओं के पत्र भेज दिए गए थे.

मीरा अपनी शादी के आठ दिन बाद ही सत्या की शादी का बहुत ही सादा-सा निमंत्रण पत्र देख हैरान रह गई थी. सत्या की शादी साहिल से? साहिल सत्या के साथ पढ़ने वाला लड़का था. निरंतर रहनेवाले पत्र-व्यवहार में दोनों सहेलियों को एक-दूसरे की पूरी जानकारी रहती थी. साहिल का ज़िक्र तो सत्या ने कई पत्रों में किया था, पर बात यहां तक बढ़ जाएगी, यह अंदाज़ा उसे नहीं था. मीरा को इस बात पर कुछ क्रोध भी आया-सत्या की बच्ची इतनी बड़ी बात मुझसे छुपा गई.

मीरा ने जब अपनी सहेली को क्रोध और उलाहने से भरा पत्र लिखा तो उसका छोटा-सा उत्तर क्षमा प्रार्थना के साथ आया था-

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सत्या, साहिल के साथ शादी की बात छिपा लेने का कारण यह था कि हम दोनों के परिवार तो इस शादी के लिए राज़ी थे, पर दोनों की बिरादरी इस रिश्ते को नहीं स्वीकार पाई. शादी के दूसरे ही दिन लोगों की भीड़ ने हमारे घर पर हमला बोल दिया. मां-पिता ने हमें पिछले रास्ते से भगा दिया. हम भागकर ट्रेन में चढ़े और एक अन्य दोस्त के यहां महीने भर छिपे रहे. फिर दूसरे रिश्तेदार के यहां रहे. इस बीच हमारे लंदन जाने का इंतज़ाम हो गया. आगे की कहानी तुम्हें मेरे पिता ने बताई ही होगी.

साहिल की ओर मेरा आकर्षण तो था, किन्तु पिता ने वचन लिया था कि जब तक मैं तुम्हारी शादी न कर दूं तब तक तुम अपनी मां से भी यह बात नहीं कहोगी. और मां को तब बतलाया गया, जब हम दोनों कोर्ट में शादी करके घर लौटे. पिता के साहस, उदारता और प्यार के आगे मैं नतमस्तक हूं मीरा. उन्हें भी बिरादरी के बंदों का डर था, वही हुआ. भड़के लोगों ने घर ही नहीं तोड़ा पिता के हाथ-पैर भी तोड़ दिए थे. वे छ: माह बिस्तर पर पड़े रहे. वो तो कुछ भले मानसों ने उन्हें बचा लिया.

हम लंदन के लिए रवाना हों, उसके पहले ही मेरे पेट में दर्द होने लगा. इतना भारी दर्द मैं सह नहीं सकी. प्रथम मातृत्व का दर्द सातवें मास में ही उठा और बेटे का जन्म हो गया. इतने कमज़ोर, समय से पूर्व जन्मे बच्चे को बीस दिन अस्पताल में ही रखा गया. फिर आठ दिन मां के दूध पर पला. हमें लंदन जाना था. इतने छोटे कमज़ोर बच्चे को सम्भालना भी कठिन था. अभी तक हम समाज की नज़रों से छिपकर रह रहे थे. पिता या ससुर के घर मैं जा नहीं सकती थी. दोनों घरों में बार-बार धमकी भरे पत्र मिल रहे थे कि अब जब भी लड़का या लड़की हमें घर में दिखाई देंगे, हम उन्हें ज़िंदा नहीं छोड़ेंगे. धर्म के ठेकेदारों का यह जुनून दो प्रेमियों के साथ-साथ दो परिवारों को भी नष्ट कर रहा था.

समझदार परिवारों ने दोनों बच्चों को बचाने के लिए पहले तो देश में ही आठ माह छिपाकर रखा, फिर विदेश भेजने की व्यवस्था कर दी. उन्होंने सोचा कुछ साल यहां से दूर चले जायेंगे, तब तक लोगों का क्रोध शांत हो जाएगा. किन्तु अब तीन सप्ताह के बच्चे की समस्या थी. इतने छोटे कमज़ोर बच्चे को प्लेन में ले जाने की अनुमति भी नहीं मिली. कुछ मित्रों ने सुझाया, बच्चे को किसी बालगृह में दे दो. इस बात पर मैं और साहिल दोनों ही राज़ी नहीं हुए. मेरा तो रोते-रोते बुरा हाल था.

“पापा, मैं छिपकर भागना नहीं चाहती. मैं उनका सामना करूंगी, जो हमें बरबाद करने पर तुले हैं.”

“बेटी, मैं तु्झे कैसे समझाऊं. भीड़ और क्रोध की बुद्धि नहीं होती. विवेक नहीं होता.”

“पापा उनका सामना करने के लिए हमें एक मौक़ा तो दो.”

“बेटी अपनी टांगें सदा के लिए खोकर मैं ऐसी चुनौती कैसे ले सकता हूं. अपनी आंखों की ज्योति को मैं आग में नहीं झोंक सकता.”

साहिल और सत्या के पिता भी लोगों की नज़रें बचाकर मिलते थे. अपने बच्चों को बचाये रखने की योजना वे दिन-रात बनाते रहे. भारी विडम्बना यह थी कि जिन्हें लड़ना चाहिए था, वे तो गले मिल रहे थे और लड़ रहे थे वे, जिन्हें इनसे कोई लेना-देना नहीं था.

घर और बाहर जलती आग के बीच उस छोटे बच्चे को मीरा के घर रातोंरात पहुंचाया गया था. आधी रात को चलने वाली गाड़ी से सत्या के मां-पिता बच्चे को लेकर जब मीरा के घर मुंह अंधेरे पहुंचे तो उन्हें देख वह हैरान रह गई.

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अपनी प्राणप्रिय सहेली के माता-पिता को इस संकट से उबारने के लिए उसने बच्चे को स्वीकार कर लिया. उस समय उसकी अपनी दो साल की एक बेटी थी. बच्चे को उसने अपने दूध से  ही नहीं, प्राणों से सींचा, उसकी किलकारियों में तो वह भूल भी गई कि बच्चे को जन्म देनेवाली मां वह नहीं है. और एक दिन तो ऐसा आया, जब उसे मां-पिता का नाम भी देना पड़ा. बड़ा होता जलज अपने मां-पिता इन्हीं को समझता रहा. स्कूल के कॉलेज के रजिस्टरों में पिता मीरा के पति थे. सारी स्थिति-परिस्थिति को समझकर मीरा के पति ने बहुत समझदारी से काम लिया. उन्हें सत्या का परिचय अपनी पत्नी मीरा से ही मिला था. मीरा के लिए सत्या का परिचय देना केवल एक सहेली का परिचय नहीं था. वह परिचय उसके जान-प्राण का परिचय था. मीरा के परिचय वर्णन से ही वे सत्या की तस्वीर मन में बनाकर उसका सम्मान करने लगे थे. अपनी पत्नी का भी वे सम्पूर्ण हृदय से प्यार और आदर करते थे. उसकी किसी बात को वे कभी थोथी या निरर्थक नहीं समझते थे. यही कारण था कि उन्होंने पत्नी की सहेली के मात्र बीस दिन के बेटे को अपने पास रखना स्वीकार कर लिया. एक वर्ष तक चला तूफान शांत हो गया और जीवन सहज सुचारू रूप से चलने लगा. अब मीरा अपने पितृ नगर में रहने आ गई थी.

जलज बड़ा होता गया. पढ़ने के साथ-साथ वह खेल-कूद में भी हमेशा आगे रहा. समय की गति बहुत तेज़ रही. सत्या और उसके पति आठ वर्ष तक विदेशों में जगह-जगह घूमते हुए अपने पैर जमाने का प्रयत्न करते रहे. इधर मीरा के पति दूर अरूणाचल स्थानांतरित हो गये. बेटा जलज तो आगे बढ़ता रहा, किन्तु दोनों मां-बाप के बीच सम्पर्क टूट गया. एक-दूसरे का कुशलक्षेम जानने के लिए दोनों सखियां बेचैन रहतीं, किन्तु बरसों एक-दूसरे के पते नहीं जान पाईं. उधर सत्या के मां-पिता भी जीवित नहीं रहे. इधर मीरा के माता-पिता भी दुनिया छोड़ गये. युग बदल गये. माता-पिता का इतिहास अब बेटे-बेटी दुहराने लगे थे. बेटी ने जिसे पसंद किया, मीरा ने बिना किसी विवाद के ख़ुशी से उसकी शादी कर दी.

एक दिन जब बेटा भी अपनी पसंद की लड़की के साथ इन पालनहार माता-पिता के सामने खड़ा हो गया, तब मीरा कुछ उलझन में पड़ गई. वह सत्या को खोजकर उसे इस शुभ सूचना से अवगत कराना चाहती थी. बेटे की बेचैनी बढ़ रही थी. मां जल्दी उसकी पसंद स्वीकार नहीं कर रही थी.

“मां आख़िर नैनी में बुराई क्या है?”

“बुराई कुछ नहीं बेटा. कुछ दिन सोच लेने में क्या बुराई है?”

“और कितने दिन सोचोगी मम्मी?”

“बेटा अपने घर जिसे लाना है, उसके लिए धैर्य से सोच-विचार करना होगा.”

“मम्मी बताओ न तुम्हें कितना समय चाहिए?”

“बहुत बेचैन हो रहा है!” हंसते हुए मीरा ने कहा.

मीरा का सुखी-संतुष्ट मन कई परतों के नीचे एक भारी अकुलाहट अनुभव कर रहा था. वैसे यह अकुलाहट नई उत्पत्ति नहीं थी. पिछले बाईस सालों से मन के किसी कोने में पड़ी आग आज जैसे भभककर ऊपर आना चाहती थी. अब वह हर क्षण यही सोचती थी कि किस तरह जलज को सत्य बताऊं? बताऊं भी या नहीं. सत्या मिल पाती तो उससे सलाह करती. अब जब कभी वह अपने बेटे को देखकर ले जाना चाहेगी तब क्या होगा? मैं कैसे सहूंगी? और जलज जाएगा? आसानी से वह मानेगा क्या?

एक मकान के गेट पर नामपट्ट देखकर तांगा रुका. “यही नम्बर है न बहनजी?” तांगे वाले ने कहा तो सत्या एकदम चौंकी, “हां-हां यही.” उसका दिल तीव्र गति से धड़क रहा था. धीमे क़दमों से चलकर वह गेट तक पहुंची. काफ़ी बदल दिया है मकान को मीरा ने. इस सुन्दर सुहाने मकान में वह तो पिता के समय का पुरानापन ढूंढ़ रही थी. वह ईंटों की दीवार को छूता हरसिंगार, वह पीछे आंगन से झांकता आम, आंगन के साथ-साथ चलती कच्ची नाली और बरामदे में पड़ी चिकें. मीरा ने घर और युग दोनों ही बदल दिए हैं. उसने गेट पर लगी बेल बजाई. किसी युवक ने आकर दरवाज़ा खोला. क्षण मात्र को वह सत्या के पैरों पर झुका और झट सामान उठाकर अन्दर चला गया. सत्या उसके पूरे रूप को आंखों में भी नहीं भर पाई. वह तांगे वाले को पैसे चुकाकर मुड़ी तो मीरा सामने खड़ी थी. घर के बरामदे में ही भरत-मिलाप-सा दृश्य उपस्थित हो गया. दोनों के आंसुओं से धरती भीगने लगी. बेटा जलज खिड़की से यह दृश्य देखकर चकित था कि दोनों सहेलियां ‘हैलो हाय’ के साथ मिलने के बजाय रोकर गले मिल रही हैं. हां मां ने बताया था, शायद मिलने का पुराना ढंग यही था. पर आंटी तो बरसों विदेश में रही हैं? कुछ लोग होते हैं जो अपना पुराना ढंग नहीं छोड़ते. क्या किया जाए. पर मम्मी को रोते देखना उसे अच्छा नहीं लग रहा. हां- वो भी होस्टल से आकर जब मम्मी के गले लगता तो मम्मी की आंखें भर आती थीं. महिलाएं भावुक होती ही हैं.

वे दोनों ड्राईंगरूम में आकर बैठ गई थीं और जलज क्रिकेट मैच देखने में व्यस्त था. सत्या की आंखें ड्राईंगरूम में लगे युवा के चित्रों पर अटक-अटक जा रही थीं. इसकी आंखें कितनी मिल रही हैं उनसे. जब दोनों सहेलियों की आंखें टकराईं तो मौन बहुत कुछ कह गया. चाय पीते-पीते सत्या की आंखें उन चित्रों पर बार-बार टिक रही थीं और मीरा की आंखें डबडबा रही थीं.

“बेटा जलज आओ. मौसी के साथ चाय पीयो.”

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अपने लिए ‘मौसी’ शब्द सुन एकबारगी सत्या कांप उठी. फिर अपने को संयत कर बातें करने का प्रयत्न करने लगी. पर सामने बैठे जलज को देख-देख उसका ज़िंदगीभर का रुका ममत्व फूट पड़ने को आतुर हो उठा. मीरा ने नाज़ुक स्थिति को समझा और जलज को किसी बहाने बाहर भेज दिया. दो स्त्रियों के इस भावनात्मक संघर्ष को समझने में जलज असमर्थ था. फिर भी वह इतना बच्चा नहीं था. कुछ गम्भीर बात है, यह उसे समझमें आ रहा था. सत्या चाहकर भी जलज से बात नहीं कर पा रही थी.

कितनी बातों के ग्रंथ भरे थे मन में, फिर भी दोनों सहेलियां ऊपरी बातों में अपना समय काट रही थीं. रात का खाना तीनों ने साथ खाया. थकी होने के कारण सत्या जल्दी सोने चली गई. मन में उठती ऊंची लहरें उसे नींद में जाने से रोक रही थींं. वह चाह रही थी कि जलज के पास ही बैठे और उसे ही निहारती रहे. अंतर्मन ने पूछा, ‘क्या जलज मेरे साथ जाने को राज़ी होगा? जब उसे सत्य पता चलेगा तब भी क्या वह अपनी इस जन्मदात्री मां का आदर करेगा?’ सत्या का सिर फटने को हुआ. एक नींद की गोली निगल वह सो गई.

उधर मीरा बेटे के पास आ बैठी थी.

“ममा… आज तुम कुछ परेशान लग रही हो?”

“नहीं तो बेटे. बस कुछ थकी हूं.”

“नहीं ममा कुछ बात है. डैडी की याद आ रही है?”

मीरा मुस्करा दी, “वो कौन-से बहुत दूर गए हैं, कल या परसों आ जाएंगे.”

“फिर क्या बात है मम्मी?”

“सोचती हूं अगर तुझे लंदन पढ़ने भेज दूं, तो मैं कैसे रहूंगी अकेली.”

“मां मैं कहीं नहीं जाऊंगा.” कहते हुए जलज मां के गले में झूल गया.

मां ने बेटे का माथा चूमा. “अच्छा बेटे, अब सो जा. मैं भी सोऊंगी.”

सत्या चार दिन मीरा के पास रही. दोनों सहेलियां उठते-बैठते, घूमते-फिरते, खाते-पीते तनाव में बनी रहीं. दोनों में से किसी का साहस नहीं हुआ कि बेटे को सच से अवगत करा दें. हालांकि पहले दोनों में यह तय हो चुका था कि जब हम दोनों सामने होंगी, बेटा भी सामने होगा, तब उसे सत्य से परिचित करा देंगे.

मीरा और जलज का लाड-दुलार भरा सम्बन्ध देखकर सत्या का मन सत्य को चोट करने को नहीं हुआ. यदि उस समय बीस दिन के बालक को मीरा स्वीकार न करती तो…?

सत्या ने दूसरे दिन जाने की तैयारी कर ली. मीरा ने देखा तो सत्या के पास आ खड़ी हुई. सत्या ने मीरा के कंधे पर सिर टिका दिया और रो पड़ी.

मीरा की आंखें भी बरस पड़ीं.

“मीरा, मैं तुम्हारी कोख सूनी करने का साहस नहीं कर सकती.”

“यह क्या कह रही हो सत्या? कोख तुम्हारी सूनी हुई है.”

“कोख मेरी थी, पर उसकी रौनक तुम्हारे घर में समाई है. अब उसे सूनापन देना अन्याय होगा. तुम्हारे तप की मैं तुम्हें सज़ा नहीं दे सकती.”

मीरा का मन हुआ, सहेली के पैर पकड़ ले.

पूर्व में प्रभात की किरणें फूट रही थीं और बेटा जलज ‘मौसी मां’ को छोड़ने स्टेशन जा रहा था. दो दिन से वह अपनी मम्मी के कहने पर

सत्या को इसी सम्बोधन से बुला रहा था.

– उर्मि कृष्ण

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कहानी- जीवन ठहरा नहीं (Short Story- Jeevan Thahara Nahi)

Short Story- Jeevan Thahara Nahi

“नहीं सुधा, जीवन अभी ठहरा नहीं, बस एक पड़ाव से गुज़र रहा है. अभी तो बहुत रास्ते तय करने हैं, बहुत दूर जाना है… साथ-साथ एक-दूसरे का हाथ थामे. सच, मैं तो सोचकर ही रोमांचित हो रहा हूं. ऐसा लग रहा है कि असुरक्षा और चिंताओं की परछाइयों से निकलकर इतने सालों के बाद अब हमारा समय आया है कि हम अपना जीवन अपने ढंग से जी सकें, अपने अधूरे सपने पूरे कर सकें…”

 रात के अंधियारे में जब निद्रा रानी पूरे जग को अपनी आगोश में समेटे लोरियां गा रही थी, सुधा की आंखों में न नींद थी, न ही दिल में चैन. वो रसोईघर में भारी मन से बैठी आटे के लड्डू बनाने में व्यस्त थी. बीच-बीच में जब नज़र कुछ धुंधला जाती, तो आंखों से छलक आई वेदना को साड़ी के पल्लू से पोंछ पुनः लड्डू बनाने लगती. दिनभर में कितना कुछ बना लिया था उसने अपने छोटे बेटे अमित के लिए- नमकीन मठरी, मीठे पारे, चकली, गुझिया और भी न जाने क्या-क्या… मगर दिल को अभी भी संतोष नहीं था. जो हाल घर से पहली बार हॉस्टल जा रहे हर बेटे की मां का होता है, वही हाल आज सुधा का भी था.

कैसे रहेगा इतनी दूर? मेरे बिना तो एक काम भी ठीक से नहीं कर पाता… पता नहीं ठीक से खाएगा-पिएगा भी या नहीं?… कौन रखेगा उसका ध्यान?… नन्हीं-सी जान है. देश के सर्वाधिक प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग संस्थान आईआईटी में 25वां रैंक पानेवाला 18 वर्षीय मेधावी अमित सुधा के लिए अभी भी ‘नन्हीं-सी जान’ ही था, जो सुबह की ट्रेन से कानपुर आईआईटी जा रहा था.

सुधा दिनभर के जतन से बनाए गए नाश्ते को बैग में व्यवस्थित कर ही रही थी कि पीछे से अमित रसोई में आ धमका, “प्लीज़ मम्मी सोने भी दो ना, कितनी देर से सोने की कोशिश कर रहा हूं, मगर तुम्हारी खटर-पटर रुकने का नाम ही नहीं ले रही… और ये क्या-क्या भर दिया बैग में? उ़फ् मम्मी, कानपुर भारत में ही है चीन में नहीं, वहां ये सब मिलता है…” अमित की झल्लाहट से सुधा की आंखें पुनः नम हो गईं. “ओह मम्मी, प्लीज़ अब रोओ मत… मेरी प्यारी मम्मी… मेरा वो मतलब नहीं था…” अमित अपनी दुखी मां को बांहों में भर दिलासा देने लगा. “मम्मी, आपका और पापा का यही सपना था कि मैं आईआईटी से इंजीनियरिंग करूं और आज जब मैं आपका सपना पूरा करने जा रहा हूं तो आपका ये हाल हो रहा है. जब जतिन भइया एन.डी.ए. में गए थे, तब भी आपका ऐसा ही हाल हुआ था. आपको तो ख़ुश होना चाहिए कि आपके दोनों बच्चे आपकी ही दिखाई हुई राह पर आगे बढ़ रहे हैं, अपना मुक़ाम हासिल कर रहे हैं और आप हैं कि यूं रोनी सूरत बनाए बैठी हैं.”

“मैं ख़ुश हूं बेटा… बहुत ख़ुश… बस तुम्हारे दूर जाने से ज़रा-सा मन भारी हो रहा था, मगर अब मैं ठीक हूं… चलो चलकर सो जाओ, वरना सुबह आंख नहीं खुलेगी.” अमित सोने चला गया और रसोई से निवृत्त हो सुधा भी लेट गई, मगर उसकी आंखों से नींद अभी भी कोसों दूर थी. मन ही मन अमित के लिए पैक किया हुआ एक-एक सामान दोहरा रही थी, सब कुछ रख लिया न… कुछ भूल तो नहीं गया… थोड़ा लापरवाह है… कैसे ख़याल रखेगा अपना? कैसे रहेगा? और एक बार फिर सुधा के मस्तिष्क में उन्हीं प्रश्‍नों की पुनरावृत्ति होने लगी.

सारी रात खुली आंखों से काटकर उठी सुधा ने ठीक चार बजे अमित को जगा दिया. अमित तैयार हो अपनी मंज़िल की ओर रवाना होने लगा. जाने से पहले तक सुधा को समझाता रहा, “अकेली परेशान मत होना, 10-15 दिन में तो पापा आ ही जाएंगे, चाहो तो इस बीच मौसी के यहां चली जाना. मेरी चिंता मत करना. अब मैं अपना ख़याल ख़ुद रख सकता हूं.” मम्मी के लिए ढेरों नसीहतें छोड़ अमित चला गया.

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उसकी नसीहतें सुन सुधा को बेटे के बड़े और समझदार होने का एहसास होने लगा. इतना बड़ा कि वो दुनिया का अकेले मुक़ाबला करने को तैयार है. उसे अब मां के सुरक्षित आंचल की ज़रूरत नहीं. उसे अब मेरी ज़रूरत नहीं. ऐसी ही व्यथाओं में उलझी सुधा अमित के जाने के बाद अपने चार कमरों के आलीशान फ्लैट में इधर-उधर चक्कर लगा रही थी. किसी काम में मन नहीं लग रहा था और सच पूछो तो अब काम ही क्या बचा था उसके पास. जब कुछ न सूझा तो न जाने क्या सोचकर सुधा ने आलमारी से पुराना एलबम निकाला और देखने बैठ गई. पहले ही फ़ोटोग्राफ़ पर नज़र जम गई. आशीष के साथ पहली फ़ोटो थी उसकी. कैसे डर-डरकर, छुपकर, आशीष के ज़बरदस्ती करने पर खिंचवाई थी. कितना छुपाकर रखती थी उसे… कभी तकिये के नीचे, तो कभी आलमारी में बिछे अख़बार के नीचे. फ़ोटो देखकर पुरानी मधुर स्मृतियां सुधा के मन को गुदगुदा गईं.

नया-नया प्यार था सुधा और आशीष का. दोनों कॉलेज में साथ ही पढ़ते थे. दोनों के प्यार का आधार उनकी पारस्परिक समझ और दोस्ती थी. एक ओर जहां आशीष इलेक्ट्रॉनिक्स में पी.एच.डी. करके इलेक्ट्रॉनिक गुड्स की मैन्युफैक्चरिंग यूनिट लगाना चाहता था, वहीं सुधा पत्रकार बन अपनी लेखन प्रतिभा को नए आयाम देना चाहती थी. दोनों अपने-अपने सपनों को साकार करने के साथ-साथ एक-दूसरे के सहयोगी होने के लिए भी वचनबद्ध थे. मगर आशीष के पैरेंट्स की एक दुर्घटना में हुई असमय मृत्यु से घर और दो छोटी बहनों की ज़िम्मेदारी उसके कंधों पर आ पड़ी. फलस्वरूप आशीष को पढ़ाई बीच में ही छोड़ नौकरी करनी पड़ी और घर संभालने के लिए सुधा से शादी भी. दोनों ने सोचा था कि एक बार घर की गाड़ी वापस पटरी पर आ जाए, तो अपने-अपने सपने भी पूरे कर लेंगे. पिता के निधन से श्रीहीन हुए परिवार को वैभव की ऊंचाइयों पर पुनः प्रतिष्ठित करने को प्रतिबद्ध आशीष ने दोनों बहनों के विवाह की ज़िम्मेदारी से निबटकर बैंक से लोन ले छोटी-सी इलेक्ट्रॉनिक्स पार्ट्स की मैन्युफैक्चरिंग यूनिट लगाई और ख़ुद को अनवरत परिश्रम की भट्टी में झोंक डाला. अपनी अथक मेहनत और लगन के चलते वो जल्दी ही अपने क्षेत्र में स्थापित हो गया, मगर इस आयोजन में घर को बिल्कुल भुला बैठा.

आशीष के सपने साकार होने के बाद सुधा भी पत्रकारिता का कोर्स करने की सोच ही रही थी कि गर्भ में एक नवीन सृजन की आकस्मिक उत्पत्ति के बाद घर-संसार की ज़िम्मेदारियों में कुछ ऐसी उलझी कि आज तक नहीं निकल पाई थी. अपनी महत्वाकांक्षा को तो कब का भुला बैठी थी वो. आशीष तो पहले से ही घर को सुधा के भरोसे छोड़े बैठे थे, दो साल पहले बड़ा बेटा जतिन भी आर्मी में चला गया था और आज जब उसकी जीवन परिधि का अंतिम केंद्र अमित भी उसके वात्सल्य की छांव को छोड़ अपने क्षितिज की तलाश में बढ़ चला, तो नितांत अकेली खड़ी रह गई सुधा को स्वयं का अस्तित्व बिखरता-सा महसूस हो रहा था, निराधार… अर्थहीन…

सुधा दो सप्ताह घर में अकेली रही, कहीं आने-जाने का मन नहीं किया. कभी अपने अतीत के पन्ने पलटती, तो कभी अपने 23 साल के लंबे वैवाहिक जीवन की समीक्षा करने लग जाती. आज अचानक ही खाली बैठी सुधा की नज़रों के सामने वो लम्हे तैरने लगे, जब दिन के 24 घंटे भी उसके काम को निपटाने के लिए कम हुआ करते थे, ‘सुधा… सुधा… मम्मी… मम्मी…’ घर में पल-पल गूंजती पुकारें, “ओफ़़्, अभी आई… कुछ काम तो ख़ुद से किया करो.” सुधा झल्लाकर कहती. आशीष तो एक रुमाल भी ख़ुद से नहीं ले सकते थे और बच्चे, जब देखो उसके पल्लू से चिपके रहते. कितना थक जाती थी सुधा उस व़क़्त. सोचा करती थी, न जाने कब मुक्ति मिलेगी मुझे इन ज़िम्मेदारियों से और आज जब सच में उसे मुक्ति मिल चुकी थी तो वो अपनों के बीच उस ‘मोस्ट-वॉन्टेड’ होने के एहसास को मिस कर रही थी. आशीष के साथ तो तसल्ली से बैठ दो बातें करने को तरस गई थी वो. लगता था जैसे उनके ढीले पड़ चुके प्रेम सूत्र मात्र औपचारिकताओं पर ही टिके थे.

कुछ ही दिनों में कितना बड़ा शून्य उभर आया था सुधा के जीवन में. क्या-क्या सोचने लगी थी वो? सभी ने अपनी-अपनी डगर ले ली, किसी को मेरी ज़रूरत नहीं रही… कैसे ढोऊंगी इस उद्देश्यहीन जीवन का भार? अपनी मनोव्यथा वो स्वयं भी नहीं समझ पा रही थी. जितना सोचती, उतना ही उलझती जाती स्वयं के बनाए हुए भ्रमजाल में.

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आज सवेरे ही आशीष का मलेशिया से फ़ोन आया था, दो दिन बाद वे घर वापस आ रहे थे. हर बार जब भी आशीष टूर से वापस आने की ख़बर देते, तो घर में जैसे बहार आ जाती, मगर इस बार ऐसा कुछ भी नहीं था.

आशीष आ गए थे. सुधा खाना बना रही थी और बीच-बीच में पास खड़े हुए आशीष को उनकी अनुपस्थिति में हुए क्रियाकलापों की जानकारी दे रही थी. खाना खाकर आशीष बैठक में बैठ गए और सुधा के पास आकर बैठने का इंतज़ार करने लगे, मगर सुधा थी कि कोई न कोई काम निकालकर अपनी व्यस्तता ज़ाहिर कर रही थी. वो आशीष के सान्निध्य से भी कतरा रही थी. उसे डर था कि कहीं उसके भीतर का गुबार बाहर निकल उनके शेष बचे-खुचे सूत्रों को भी अपने साथ बहाकर न ले जाए.

“सुधा, थोड़ी देर यहां आकर बैठो न, मुझे तुमसे कुछ ज़रूरी बात करनी है.” सुनकर सुधा का मन स्वयं से बोल उठा, उहं… अपना काम छोड़कर कभी बैठे हो मेरे पास जो मैं बैठूं, मगर आशीष के विनम्र आग्रह को ठुकरा न सकी और एक नियत दूरी बनाकर बैठक में बैठ गई.

“कहिए.” उसकी शारीरिक भाषा अभी भी काम की हड़बड़ी जता रही थी.

“सुधा, तुम ख़ुश तो हो न मेरे साथ? कोई शिकायत?” आशीष ने सुधा की आंखों में झांककर पूछा.

“अ…हं… शिकायत?” सुधा को लगा जैसे उसके मन का चोर आंखों के रास्ते निकल आशीष के सामने जा खड़ा हुआ, मन किया फट पड़े और बता दे कि हां शिकायतें तो बहुत हैं. कितनी और कौन-कौन सी, ये तो वो स्वयं भी नहीं जानती, मगर कुछ बोल न सकी.

“नहीं, मुझे क्या शिकायत होने लगी भला.”

“ये भी नहीं कि मैं तुम्हें बिल्कुल समय नहीं देता.”

“तुम अपने काम में व्यस्त रहते हो, अपना क़ीमती समय मेरे साथ बैठकर थोड़े ही गंवाओगे.” आशीष को सुधा का कटाक्ष आहत कर गया, उसने आगे बढ़कर सुधा के हाथों को थाम लिया

“सुधा, तुम्हारे साथ बिताया गया एक-एक लम्हा अनमोल है मेरे लिए. कितना तरसता हूं मैं तुम्हारे लिए… तुम्हारे साथ के लिए… ये तुम नहीं जान सकती. मुझे

इस बात का एहसास है कि मैंने अपने बिज़नेस के पीछे घर को और तुम्हें बिल्कुल अनदेखा कर दिया, मगर क्या करता? मैं ख़ुद मजबूर था.”

“मजबूर…?” सहसा सुधा को अपने कानों पर यक़ीन नहीं हुआ.

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“हां सुधा, तुम तो जानती ही हो मम्मी-पापा के अचानक चले जाने के बाद मुझ पर क्या गुज़री? उनके बिज़नेस पार्टनर्स ने हमारा हिस्सा दबाकर हमें सड़क पर खड़ा कर दिया था, ऊपर से बहनों की ज़िम्मेदारियां, हमारा भविष्य… सब कुछ अधर में था. ख़ैर भगवान की कृपा से धीरे-धीरे सब संभल गया, पर इन कटु अनुभवों और अभावों के चलते मन में एक तरह की इनसिक्योरिटी घर कर गई.”

“कैसी इनसिक्योरिटी?” सुधा ने उत्सुकता से पूछा.

“लगता था कि अगर पापा की तरह मुझे भी अचानक से कुछ हो जाए, तो तुम्हारा क्या होगा? बच्चों का भविष्य कैसे बनेगा? रात-दिन बस यही चिंता खाए जाती थी, इसीलिए बिज़नेस बढ़ाता रहा, बैंक बैलेंस बनाता रहा. मगर जब अमित का आई.आई.टी.में सिलेक्शन हुआ तो मैं इन इनसिक्योरिटीज़ से उबर गया. मुझे विश्‍वास हो चला कि अब मेरे बच्चे इस लायक़ हो गए हैं कि उन्हें मेरे सहारे की, मेरी तरफ़ से किसी सिक्योरिटी की ज़रूरत नहीं, तो मैंने अपने बिज़नेस को सीमित करने का निश्‍चय कर लिया. बहुत हो चुका यहां-वहां भागना, रात-दिन काम में पिसना, बस अब बाकी की ज़िंदगी तुम्हारे साथ सुकून से गुज़ारना चाहता हूं और तुम्हारी लेखन प्रतिभा को निखरते हुए, आगे बढ़ते हुए देखना चाहता हूं.”

“ये क्या कह रहे हैं? मैं और लेखन प्रतिभा, वो सब तो अतीत की बातें हैं.”

“नहीं सुधा, प्रतिभा कभी नहीं मरती. हां, अनुकूल परिस्थितियां न होने पर कुछ समय के लिए दब अवश्य जाती है, मगर उसका अस्तित्व कभी नहीं मिटता. तुम्हारे सहयोग और कर्त्तव्यनिष्ठा से हम सभी के सपने पूरे हो गए, मगर तुम वहीं की वहीं रह गईं और तुम्हें इसकी कोई शिकायत भी नहीं. मगर मुझे हमेशा यह ग्लानि रही कि मुझसे शादी कर तुम्हारी प्रतिभा का गला घुट गया. पर अब समय आ गया है कि तुम अपने बारे में सोचो और आगे बढ़ो. इस बार पीछे खड़े रहकर सहयोग देने की मेरी बारी है.”

“ये अचानक कैसी बातें कर रहे हैं आप? अब कहां लिख पाऊंगी कुछ…? मेरी तो सोच में भी जंग लग चुका है… इस उम्र में नए सिरे से शुरुआत करना असंभव है… जीवन में एक ठहराव आ चुका है.”

“नहीं सुधा, जीवन अभी ठहरा नहीं, बस एक पड़ाव से गुज़र रहा है. अभी तो बहुत रास्ते तय करने हैं, बहुत दूर जाना है… साथ-साथ एक-दूसरे का हाथ थामे. सच, मैं तो सोचकर ही रोमांचित हो रहा हूं. ऐसा लग रहा है कि असुरक्षा और चिंताओं की परछाइयों से निकलकर इतने सालों के बाद अब हमारा समय आया है कि हम अपना जीवन अपने ढंग से जी सकें, अपने अधूरे सपने पूरे कर सकें…” आशीष बोल रहे थे और उनका एक-एक शब्द सुधा के हिमशिला बने मन-मस्तिष्क को पिघलाता जा रहा था. तेज़ हुए रुधिर प्रवाह ने शिथिल पड़ी धमनियों को पुनः थरथरा दिया था. मन के समस्त पूर्वाग्रह तो न जाने कहां हवा हो चले थे और 23 साल पुराने ‘जीवन में कुछ कर गुज़रने’ के तूफ़ानी उद्वेग उनकी जगह लेते जा रहे थे.

दो दिन बाद अमित का फ़ोन आया, “मम्मी, आप जर्नल़िज़्म का कोर्स कर रही हैं… आपने कभी बताया ही नहीं कि आप लिखती भी हैं. वो तो पापा ने बताया… मम्मी, कीप इट अप, मुझे आप पर गर्व है, आप अपनी हमउम्र औरतों के लिए एक मिसाल हैं. मम्मी, बेस्ट ऑफ़ लक…” सुधा बेटे की शुभकामनाओं से भावविह्वल हो रही थी, वहीं थोड़ी दूर खड़े आशीष सुधा के चेहरे पर लौट आई बरसों पुरानी चमक निहार रहे थे. एक पड़ाव पर कुछ देर ठहर सुधा का जीवन नए कुलांचे भरने को तैयार था.

दीप्ति मित्तल

       दीप्ति मित्तल

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कहानी- शुद्धिकरण (Short Story- Shudhikaran)

hindi short story

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अनुज को आश्‍चर्य में छोड़ मनीषा सोच रही थी, ‘तन से और नियम से तो वो सवा महीने बाद शुद्ध होगी, लेकिन उसकी आत्मा का ‘शुद्धिकरण’ आज ही हो गया है.’

रसोई से आ रही आवाज़ से नींद टूटी. अभी 6 ही बजे थे. ‘पता नहीं मौसी को भी इतनी सुबह रसोई में क्या काम रहता है?’ मनीषा अभी उठने के मूड में नहीं थी, लेकिन वो जानती थी कि अभी मौसी आवाज़ें देने लगेंगी, इसलिए खीझते हुए उसे उठना ही पड़ा.

मनीषा और अनुज की शादी को तीन साल हो गए थे. मनीषा मां बननेवाली थी. उसे सातवां महीना चल रहा था, इसलिए उसकी देखभाल के लिए अनुज ने मौसी को विशेष आग्रह से अपने यहां बुलाया था. मनीषा की मां लंदन में छोटे बेटे के पास रह रही थी और उसके परिवार में ऐसा कोई नहीं था, जो ऐसे समय में उसकी देखभाल करता.

अनुज की मां का देहांत 10 साल की उम्र में हो गया था. पिता ने दूसरी शादी नहीं की, लेकिन स्वयं को काम में उलझा लिया था. अनुज को तकलीफ़ न हो, इसलिए उसे अपनी साली अलका के पास भेज दिया. मौसी व मौसा के स्नेह और उनके बच्चे सुधा व वैभव के साथ खेलते हुए अनुज अपने सारे दुख भूल चुका था.

पढ़ाई पूरी कर अपनी योग्यता के बल पर उच्च पद पर आसीन भी हो गया और पिता के पास लौट आया. दोनों पिता-पुत्र बेहद ख़ुश थे, लेकिन छह माह के भीतर उसके पिता का भी देहांत हो गया.

मनीषा से अनुज ने मौसी की सहमति से ही प्रेम-विवाह किया था. मनीषा एक सुलझे विचारों की लड़की थी. उसका स्वभाव भी अच्छा था.

अनुज अपने आनेवाली संतान को लेकर चिंतित था, इसीलिए वह हर पल मौसी को अपने पास रखना चाहता था. वैभव जोधपुर में था और सुधा कानपुर में ब्याही थी. सभी दायित्वों से मुक्त हो अब वे अपने इस बेटे को सहयोग देने के लिए आ पहुंची थीं.

मनीषा आजकल बहुत परेशान रहती थी. कुछ दिनों से दोपहर के समय जब वो सोती तो रसोई से देशी घी और मेवे की ख़ुशबू आती, लेकिन शाम को रसोई में किसी भी चीज़ का नामोनिशान न रहता. वह संकोचवश मौसी से कुछ पूछ भी नहीं पाती थी.

कभी-कभी दोपहर को मौसी बाज़ार जातीं. वे क्या लातीं? कहां रखतीं? न आज तक उन्होंने बताया, न मनीषा ने पूछा.

लेकिन वो जानती थी कि कुछ गड़ब़ड़ ज़रूर चल रहा है. एक दिन अनुज के सामने ही वो मौसी से तपाक से पूछ बैठी, “आज दोपहर में आपने क्या ख़रीदारी की?” मौसी ने जवाब दिया, “सुधा के बच्चे के लिए कुछ सामान लेना था. वही लेने गई थी.” और इस तरह उन्होंने बात को टाल दिया. उसी दिन से मनीषा उनसे चिढ़ने लगी थी.

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एक दिन डॉक्टर के पास से लौटी, तो देखा मौसी स्टोर रूम में थीं. कामवाली ने बताया कोई आदमी आया था, लकड़ी की बात हो रही थी. मनीषा ग़ुस्से से भर उठी. अब घर के सामानों की भी ख़रीद-फ़रोख़्त शुरू कर दी गई है.

‘हे भगवान, मैं क्या करूं?’ इन सब बातों से मनीषा का स्वास्थ्य भी प्रभावित हो रहा था. लेकिन शक का कीड़ा उस पर पूरी तरह से हावी हो चुका था. वह किसी भी तरह मौसी को गांव वापस भेजना चाहती थी.

सबसे पहले उसने एक आया की व्यवस्था की. अब वो मौ़के की तलाश में थी. संजोग से सुधा का फ़ोन आया, जिसे मनीषा ने ही उठाया था. सुधा ने बताया राजीव बाहर गए हैं और उसकी तबियत भी ठीक नहीं है. अगर मां 10-15 दिन के लिए आ सकें तो..?

बस, मनीषा ने इस मुद्दे को इतना बढ़ा दिया कि हम अपने स्वार्थ के लिए मौसी को नहीं रख सकते. सुधा को उनकी ज़रूरत है. इस तरह की कई बातें उसने कह डालीं. एक तीर से दो शिकार हो गए. वो महान भी बन गयी और उसकी समस्या भी सुलझ गयी.

मौसी के जाने के बाद ही आया को देख अनुज कुछ-कुछ समझ गया था, लेकिन बोला कुछ नहीं.

नियत समय पर मनीषा ने एक सुंदर बेटी को जन्म दिया. चार-पांच दिनों में वह घर भी आ गयी. अब आया को रात में भी रुकना था, इसलिए उसे मौसीवाला कमरा साफ़ करने को कहा. वह पास वाले कमरे में आ गयी. अभी उसे और बच्ची को सवा महीने इसी कमरे में रहना था. उसके पश्‍चात् दोनों की शुद्धि-पूजा तथा बेटी का नामकरण होना था. ये सारे नियम मौसी समझाकर गयी थी, इसलिए अनुज ने वैसी ही व्यवस्था की थी.

मनीषा लेटने जा ही रही थी कि अनुज ने उसे एक लिफ़ाफ़ा दिया और कहा, “मौसी ने दिया था. कहा था जिस दिन तुम घर आ जाओ, उसी दिन तुम्हें दूं.”

इतना कहकर अनुज बाहर चला गया. मनीषा ने लिफ़ाफ़ा खोलकर पत्र पढ़ना शुरू किया.

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प्रिय बेटी मनीषा,

आज तुम मां बन गयी हो, बधाई! मुझे पोता हुआ है या पोती, जो भी है, उसे ढेरों आशीष.

बेटी, मुझे माफ़ करना, मैं तुम्हारे साथ नहीं रह पायी. मैं तो शुद्धि-पूजा के बाद ही जाना चाहती थी, लेकिन सुधा के लिए पहले ही जाना पड़ रहा है.

मेरे कमरे में तुम्हें वो सारी चीज़ें मिल जाएंगी, जिसकी तुम्हें ज़रूरत है. बेटा, ये सारी चीज़ें तुमसे छुपाकर रखनी पड़ी. कहते हैं, जन्म से पहले कुछ ख़रीदारी नहीं करनी चाहिए, इसलिए मैंने सुधा के बच्चे के नाम से ही ये सारी चीज़ें जुटा ली थीं.

तुम्हारे लिए लड्डू बनाकर रखे हैं. डॉक्टर ने गरिष्ठ खाने से मना किया था, इसीलिए चखा भी नहीं पायी. हां, पूजावाले दिन के लिए बच्चे का पालना उसके दादाजी की आरामकुर्सी की लकड़ी से बनवा कर रख दिया है. उसे उसी पालने में डालना, दादाजी का आशीर्वाद भी तो ज़रूरी है! मैंने अनुज को सब बता दिया है. अपना ख़याल रखना. जाना ज़रूरी है, इसलिए जा रही हूं.

तुम्हारी मौसी,

अलका

पत्र समाप्त हो चुका था. आया सिर के पास सारा सामान लेकर खड़ी थी. जनवरी के इस ठंड में भी मनीषा पसीने से लथपथ हो गयी. उफ़! कितने छोटे मन की थी मैं! जो मौसी रात-दिन मेरे और मेरी संतान के लिए सोचती रहीं, उन्हें ही घर से भगाने के लिए मैं हरदम परेशान रही.

तभी अनुज मोबाइल लिए अंदर आए. मौसी का फ़ोन था. औपचारिक बातें हुईं. मनीषा के मुंह से आवाज़ नहीं निकल रही थी. अंत में उसने इतना ही कहा, “जब तक आप नहीं आएंगी, आपकी पोती का नाम नहीं रखा जाएगा. आपको मेरी क़सम, जो मना किया.” मौसी ने हंसकर कहा, “अरे! मैं तो ऐसे ही आ जाती, इसमें क़सम देने की क्या ज़रूरत है?”

अनुज को आश्‍चर्य में छोड़ मनीषा सोच रही थी, ‘तन से और नियम से तो वो सवा महीने बाद शुद्ध होगी, लेकिन उसकी आत्मा का ‘शुद्धिकरण’ आज ही हो गया है.’

आया के हाथ से मौसी की बनाई रजाई लेकर उसने बिटिया को ओढ़ा दी.

रूपाली भट्टाचार्या

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कहानी- कच्ची धूप (Short Story- Kachchi Dhoop)

Short Story- Kachchi Dhoop

“अरे… देखो, देखो कोई…! जल्दी आओ! ये लड़की तो पागल हो गयी है!”

अर्पिता ख़ुशी को थामे हुए, बौखलाई हुई-सी चीख रही थी. ख़ुशी की कलाई से बूंद-बूंद खून चू रहा था. लड़की रो नहीं रही थी. बड़े यत्न से उसने आंसुओं को अपनी बड़ी-बड़ी आंखों के कटोरे में रोक रखा था. सभी टीचर्स की आंखों में सवाल थे. कुछ ही पलों में छात्राओं की भीड़ भी प्रश्‍नवाचक नज़रों के साथ इकट्ठी हो गयी थी. सभी टीचर्स ने ख़ुशी को स्टाफ़ रूम में लाकर दरवाज़ा बन्द कर दिया था.

“ ये अपनी कलाई पर ब्लेड से राजीव का नाम लिख रही थी.” अर्पिता ने दयनीय मुद्रा में कहा था.

“क्या…?” कई सारी टीचरों का समवेत स्वर गूंजा था.

काफ़ी देर से अर्पिता स्टाफ़ रूम में बैठी अपनी सह-शिक्षिका और सहेली श्रुति का इन्तज़ार कर रही थी. घंटी बजते ही श्रुति क्लास से बाहर निकली तो दूर से ही उसे स्टाफ़ रूम में बैठी अर्पिता दिख गयी.

श्रुति जानती थी, पिछले कई दिनों से अर्पिता परेशान थी. एक अजीब-सा केस उसके लिये परेशानी का कारण बना हुआ था.

“श्रुति! अभी फ्री हो ना? तो फिर बैठो… ज़रा मेरी समस्या का हल बताओ.

जानती हो, अब तो ख़ुशी क्लास में बेहद खोई-खोई-सी रहती है. उसकी सूनी आंखें जैसे हमेशा दरवाजे की ओर लगी राजीव को ढूंढ़ती रहती हैं. पिछले कई दिनों से राजीव स्कूल भी तो नहीं आ रहे हैं. मुझे समझ में नहीं आता… ऐसा कितने दिन चलेगा?  ख़ुशी जैसी अच्छी लड़की का भविष्य ही कहीं दांव पर ना लग जाये.”

“अर्पिता… अब तो तुम्हें ख़ुशी के माता-पिता से मिल ही लेना चाहिए. वैसे

मुझे लगता है, इस प्रॉब्लम का सोल्युशन हमें मिल सकता है.” श्रुति ने कुछ सोचकर कहा था.

“पता नहीं, तुम्हें क्या सोल्युशन दिख रहा है. मैं तो हार गयी हूं इस लड़की से. जितना भी समझाती हूं, उतना ही वो नासमझ होती जा रही है. अब तू ही बता… मैं क्या करूं?” अर्पिता ने श्रुति का हाथ थामकर कहा.

“मैं… तुम्हें इस परेशानी का हल कल बताती हूं. अभी मुझे एक बार मिसेस जोशी से कुछ बातें करनी हैं.”

देर रात तक श्रुति की आंखों से नींद गायब थी. वो पिछले कई दिनों के घटनाक्रम को याद कर रही थी, ताकि अर्पिता की परेशानी का कोई हल ढूंढ़ सके. पिछले पांच वर्षों से श्रुति और अर्पिता इस स्कूल की शिक्षिकाएं थीं. दोनों ने एक साथ इस स्कूल में काम करना शुरू किया था. दोनों का पाला तरह-तरह की छात्राओं से पड़ा था और छात्राओं के विषय में दोनों ही अक्सर डिसकस करती रहती थीं.

कुछ दिनों पहले ही अर्पिता ने नौंवी कक्षा की एक छात्रा ख़ुशी के विषय में जो कुछ भी बताया था, वो वाकई परेशानी का विषय था. इस उम्र में किशोरियों को जो ख़्याल आते हैं, उनसे श्रुति व अर्पिता अनजान नहीं थीं,

पर ख़ुशी की समस्या कुछ गम्भीर रूप ले रही थी.

ख़ुशी अपने क्लास की होनहार छात्राओं में से थी. उसी स्कूल में राजीव भी पढ़ाते थे. एक आकर्षक और संवेदनशील टीचर. ख़ुशी की कक्षा में वो फ़िज़िक्स के टीचर थे. उनके पढ़ाने का ढंग भी आकर्षक था. ख़ुशी होनहार थी, इसलिये दूसरे टीचरों की तरह राजीव भी उस पर ज़्यादा ध्यान देते थे. शायद… ख़ुशी इसी से प्रभावित हो गयी थी. टी.वी. या किताबों में कहीं उसने पढ़ा था और उनसे प्रभावित ख़ुशी ने एक बार अपनी फ़िज़िक्स की कॉपी में राजीव सर के लिये एक छोटा-सा प्रेम-पत्र लिखकर रख दिया था. राजीव तो चौंक ही गये थे. उसने ख़ुशी की क्लास टीचर अर्पिता को बताया था. अर्पिता को अपनी प्रिय छात्रा ख़ुशी से ऐसी आशा नहीं थी. गुस्से व खीझ में बिना कुछ सोचे-समझे उसने ख़ुशी को सज़ा दे दी थी. श्रुति ने जब ख़ुशी को कड़ी धूप में, मैदान में खड़े देखा था तो उसे सब पता चल गया था.

“अपू… ये क्या? तुम क्या समझती नहीं हो कि ख़ुशी उम्र के किस दौर से गुज़र रही है? उसे समझाना तो दूर… तुमने उसे ऐसी सज़ा दी!” श्रुति ने अर्पिता को डांटा था.

ख़ुशी के लाल हुए चेहरे पर अपमान के आंसू और गर्मी से आया पसीना देखकर अर्पिता को भी बुरा लगा था. अकेले में श्रुति और अर्पिता ने उसे काफ़ी समझाया था.

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“इस उम्र में हम सपनों की दुनिया में जीते हैं. पहले तो शारीरिक आकर्षण से हम प्रभावित होते हैं. फिर कोई मीठा बोल दे या प्रशंसा ही कर दे तो… वो शख़्स हमें अपना लगने लगता है. हम उससे ही अपने जीवन की डोर बांधने के सपने सजाने लगते हैं. पर हम जो सामने देखते हैं, वही सच नहीं होता. हर आदमी के दो पहलू होते हैं. दूसरा पहलू हमें ढूंढ़ना होता है. तुम समझ रही हो ना… ख़ुशी! ये प्यार नहीं होता है. ये तो महज़ आकर्षण है. इस घटना को भूल कर तुम अपनी पढ़ाई पर ध्यान दो.

“श्रुति ने ख़ुशी को समझाया था. उस व़क़्त तो ख़ुशी की आंखों से बहते आंसुओं और नीची निगाहों को देखकर सभी ने ये समझा था कि लड़की अपनी ग़लती पर शर्मिंदा है. इसलिये उसके अभिभावक को नहीं बुलाया गया था.

पर ये अन्त नहीं था. ख़ुशी रोई थी, क्योंकि उसे दु:ख हुआ था कि उसकी प्रिय शिक्षिकाएं भी उसे समझ नहीं सकी थीं. इस बात का खुलासा भी बाद में ही हो सका था. श्रुति और अर्पिता ख़ुशी को साथ लेकर स्टाफ़ रूम से बाहर निकली थीं कि राजीव सर सामने आ गये थे. ख़ुशी ने जिस तरह से उन्हें देखा था, वो सभी को अखर गया था. राजीव ने उसे देख कर भी अनदेखा करते हुए, अपना क्लास लेना ज़ारी रखा था. ख़ुशी अब ख़ामोश-सी हो गयी थी. खाली समय में भी वो अपनी सहेलियों के साथ नहीं रहती थी, बल्कि अब वो अपनी पढ़ाई के प्रति ज़्यादा ही ज़िम्मेदार हो गयी थी. राजीव सर अब पहले की तरह खुलकर उससे पेश नहीं आ पाते थे, बल्कि वे तो खुलकर पढ़ा भी नहीं पा रहे थे, क्योंकि उनके कक्षा में प्रवेश करते ही छात्राएं कानाफूसी शुरू कर देतीं या दबी-दबी-सी हंसी गूंजती रहती.

फिर आया वेलेन्टाइन डे! नौंवी और दसवीं की छात्राएं अब इसका महत्व

समझने लगती हैं. उनके चेहरे पर प्रेम के नाम पर एक सलज्ज मुस्कान खेलने लगती है. उनकी फुसफुसाहटें पूरे स्कूल में गूंजती हैं. उसी दिन पूरा स्टाफ़ रूम अर्पिता की चीख से चौंक गया था.

“अरे… देखो, देखो कोई…! जल्दी आओ! ये लड़की तो पागल हो गयी है!”

अर्पिता ख़ुशी को थामे हुए, बौखलाई हुई-सी चीख रही थी. ख़ुशी की कलाई से बूंद-बूंद खून चू रहा था. लड़की रो नहीं रही थी. बड़े यत्न से उसने आंसुओं को अपनी बड़ी-बड़ी आंखों के कटोरे में रोक रखा था. सभी टीचर्स की आंखों में सवाल थे. कुछ ही पलों में छात्राओं की भीड़ भी प्रश्‍नवाचक नज़रों के साथ इकट्ठी हो गयी थी. सभी टीचर्स ने ख़ुशी को स्टाफ़ रूम में लाकर दरवाज़ा बन्द कर दिया था.

“ ये अपनी कलाई पर ब्लेड से राजीव का नाम लिख रही थी.” अर्पिता ने दयनीय मुद्रा में कहा था.

“क्या…?” कई सारी टीचरों का समवेत स्वर गूंजा था.

“ये लड़की पागल हो गयी है.”

मिसेज जोशी ने तो गुस्से में अपना हाथ ही उठा लिया था.

“ये क्या सोचती है, ऐसा करके ये राजीव को पा लेगी? राजीव शादीशुदा है. उसकी अपनी ज़िन्दगी है.” इतिहास पढ़ानेवाली शिखा ने कुछ तल्खी से कहा था.

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ख़ुशी के हाथ पर श्रुति बैण्डेज बांध रही थी. ख़ुशी ने एक बार अपनी गम्भीर नज़रों से जाने क्या कहने की कोशिश में शिखा की ओर देखा था और दूसरे ही पल नज़रें फेर ली थीं.

ख़ुशी को समझाने के लिए प्रधानाध्यापिका मिसेज जोशी ने फिर श्रुति को ही भेजा था.

“टीचर… मैं राजीव सर से… बहुत प्यार करती हूं.” एक लम्बी ख़ामोशी के बाद ख़ुशी ने कहा था.

“पर… क्या तुम नहीं जानतीं कि वो शादीशुदा हैं. क्या तुम सोचती हो कि वो तुमसे शादी करेंगे?” श्रुति ने ख़ुशी की आंखों में झांकते हुए कहा था.

“अगर वो मुझसे शादी नहीं करेंगे, तो मैं मर जाऊंगी. आत्महत्या कर लूंगी.” ख़ुशी की दृढ़ता से श्रुति सहम गयी थी.

श्रुति को समझ में नहीं आ रहा था कि अब वो क्या करे. तभी अनायास ही उसके दिमाग़ में कौंधा था कि क्यों ना राजीव से ही श्रुति की सीधी बात करायी जाये.

राजीव से भी श्रुति की बातचीत कराई गयी, पर वो पागल लड़की अपने सर की गोद में सिर रख कर रोती रही और राजीव इससे इतना घबरा गये कि उनसे कुछ बोलते ही नहीं बना. एक किशोर लड़की को समझना या समझाना राजीव जैसे युवा फ़िज़िक्स के टीचर के बस में नहीं था. राजीव ने बस इतना किया था कि कुछ दिनों के लिये उन्होंने स्कूल से छुट्टी ले ली थी. पर ये समस्या का समाधान तो नहीं हो सकता था.

श्रुति ने रात की ख़ामोशी में इस समस्या का हल ढूंढ़ निकाला था.

“अपू… आज मैं इस समस्या का हल लेकर आयी हूं.” कहकर श्रुति ने अपनी सहेली को कुछ समझाना शुरू किया था.

“ठीक है, हम यही करेंगे. वैसे ख़ुशी के माता-पिता कहते हैं कि अगर कुछ दिनों में कोई राह नहीं दिखती है तो वे लोग उसे मनोचिकित्सक को दिखाएंगे.” अर्पिता ने बेहद दबी-बुझी आवाज़ में दुखी होकर कहा था.

ख़ुशी को लेकर अर्पिता आयी, “ख़ुशी, तुम राजीव सर को प्यार करती हो ना!” श्रुति ने कहा था.

उत्तर में ख़ुशी ने केवल अपनी नज़रें उठाकर श्रुति की ओर देखा था.

“ख़ुशी, हमने राजीव सर से बात कर ली है. उनका कहना है कि वो तुमसे शादी कर लेंगे, पर तुम पहले उनका दूसरा पक्ष भी तो देख-समझ लो. मेरा मतलब है, तुम उनके घर का वातावरण देख लो. उनका घरेलू रूप देख लो. तुम चाहो तो हमारे साथ उनके घर चल सकती हो.”

अर्पिता ने श्रुति की योजना के अनुसार ख़ुशी को समझाना शुरू किया था. कुछ देर विचार करने के बाद ख़ुशी राज़ी हो गयी थी.

योजना के अनुसार राजीव अपने घर में ही थे. बीमार होने का बहाना कर वो बिस्तर पर थे. ख़ुशी की आंखें राजीव को देखकर चमक उठी थीं और वो राजीव के सिरहाने बैठ गयी थी. कुछ ही देर में राजीव ने उससे चाय बनाकर लाने को कहा. ख़ुशी अवाक्-सी राजीव का चेहरा ताकने लगी थी.

“हां, हां.. जाओ ना, उधर बायीं ओर किचन है. वहीं तुम्हें सब मिल जायेगा. और हां, ज़रा कड़क चाय बनाना. सरदर्द हो रहा है ना!” राजीव ने आग्रह किया था. ख़ुशी अनमने मन से किचन की ओर बढ़ गयी थी.

शायद पहले कभी एक-दो बार ख़ुशी ने अपने घर में चाय बनायी थी, इसलिये काफ़ी मुश्किल से वो चाय बना पायी थी. आंखों में आंसू भरकर वो सोच रही थी, ‘घर में तो मम्मी कितनी भी रिक्वेस्ट कर ले, मैं किचन में जाना तक पसन्द नहीं करती और यहां… सर के घर… मुझे चाय बनानी पड़ रही है.

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“ख़ुशी, स्तुति अभी-अभी बाज़ार से लौटी है. तुम एक कप और चाय बना लेना.” बाहर के कमरे से श्रुति की आवाज़ सुनाई पड़ी थी. ख़ुशी तो स्तब्ध ही रह गयी थी.

‘पहले ही चाय नाप कर बनाई थी. अब फिर… पता नहीं और क्या-क्या फ़रमाइशें होंगी इनकी.’ बुदबुदाते हुए ख़ुशी ने फिर से चाय बनानी शुरू की.

ख़ुशी आधे घण्टे में चाय वगैरह लेकर बैठक में आयी तो वहां स्तुति से परिचय हुआ.

“ख़ुशी, अब तो तुम इस घर का हिस्सा बननेवाली हो, इसलिये मैं चाहती हूं कि तुम घर के काम सीख लो. चलो मैं तुम्हें कपड़े धोने का काम भी सिखा देती हूं.” स्तुति ने बड़े प्यार से ख़ुशी का हाथ पकड़कर उठाते हुए कहा, पर ख़ुशी थक चुकी थी. उसके चेहरे की ओर देखते हुए श्रुति और अर्पिता ने एक-दूसरे को इशारा किया.

“ख़ुशी, अब हम चलते हैं. तुम स्तुति से सारा काम समझ लो. अब तुम्हें भी तो एक दिन सारा कुछ सम्भालना ही होगा. वैसे स्तुति अब मां भी बननेवाली है.” श्रुति ने अर्पिता के साथ बाहर जाते हुए कहा.

ख़ुशी अनिश्‍चितता की स्थिति में कुछ न समझते हुए चुपचाप खड़ी थी. आख़िर कहती भी क्या? उसने पहले ही श्रुति से कह दिया था कि उसे कोई ऐतराज़ नहीं होगा एक ही घर में राजीव सर की पत्नी के साथ रहने में. पर वो शादी करेगी तो राजीव सर से ही.

“दी…दी! आपके घर कामवाली बाई नहीं है?”

“वो तो है. पर बाई के भरोसे कहां सारा काम होता है. अब राजीवजी की आमदनी भी तो बंधी-बंधाई है. कुछ काम तो ख़ुद करने ही होंगे ना.” स्तुति ने मन-ही-मन मुस्कुराते हुए ख़ुशी को सच्चाई से परिचित कराने की कोशिश की. ख़ुशी के मन से अब धीरे-धीरे प्यार का भूत उतरता जा रहा था. कहां उसने सोचा था कि राजीव के क़रीब बैठी वो सारा दिन उसे देखते हुए गुज़ार देगी. अपने प्रियतम के गोरे चेहरे, घुंघराले बाल और आकर्षक देहयष्टि में सारी ज़िन्दगी बिता देगी. राजीव सर भी उसके मासूम सवालों का जवाब देते रहेंगे और कहां ये सब!

अचानक ही ख़ुशी के विचारों पर दूसरा प्रहार भी हुआ. उसके राजीव सर, लुंगी-बनियान पहने बाथरूम की ओर गये. ख़ुशी को अपने सर के चेहरे पर हल्की दाढ़ी की छाया भी दिखी.

‘राजीव सर… कोई ख़ास सुन्दर तो हैं नहीं. मैं ही पागल हो रही थी.’ ख़ुशी ने मन ही मन सोचा था.

शाम को जब ख़ुशी घर लौटी, तो बेहद थक चुकी थी. दिनभर स्तुति उसे साथ लिये जाने क्या-क्या करती रही थी. ख़ुशी तो ऊब गयी थी.

‘अगर मैं सारा दिन काम करती रही तो मेरी पढ़ाई कब होगी? सभी कहते हैं कि मैं अच्छी स्टूडेंट हूं. तो…? फिर इतना काम करूंगी, तो राजीव सर के साथ समय कैसे बिता सकूंगी? फिर स्तुति दीदी मां भी बननेवाली हैं. मेरे कहने पर राजीव सर उसे तलाक़ तो देंगे नहीं. फिर दीदी कहती हैं कि राजीव सर की आय इतनी भी नहीं है कि दो-चार नौकरानियां रखी जा सकें. तब क्या होगा…? मैं एकतरफ़ा प्यार करते हुए तो…’ सोचते-सोचते ख़ुशी की आंखों में आंसू आ गये थे.

दूसरे दिन… श्रुति और अर्पिता स्टाफ़ रूम में बैठी बातें कर रही थीं.

दूसरे टीचर्स अपने-अपने क्लास में थे. ख़ुशी मौक़ा देखकर कमरे में आई.

“टीचर…, आई एम सॉरी.” ख़ुशी ने सिर झुकाकर कहा.

“ख़ुशी…? क्या हुआ…?” अर्पिता ने पूछा

“टीचर, मैं अभी केवल अपनी पढ़ाई करना चाहती हूं. मुझे अब ज़िन्दगी के दूसरे पहलू का सच दिख गया है. मैं… अभी शादी नहीं करूंगी.

“क्या…?” श्रुति और अर्पिता ने लगभग ख़ुश होते हुए कहा था.

“हमें ख़ुशी है कि तुम हक़ीक़त को समझ गईं. हम भी नहीं चाहते थे कि तुम्हारे जैसी अच्छी स्टूडेंट अभी पढ़ाई को भूलकर ग़लत निर्णय ले. शादी तो होनी ही है. पर पहले उस उम्र तक तो पहुंचो. फिर मैच्योरिटी आयेगी और तुम सब समझ सकोगी. फिर तुम शादी के झमेलों को भी सह सकोगी. अभी जो दिखता है, वो तस्वीर का एक पहलू ही दिखता है. पांच वर्षों बाद तुम इस वाक्ये को याद करोगी तो तुम्हें ख़ुद ही हंसी आयेगी. तब ये सब बचकाना लगेगा.”

श्रुति ने खुशी को सामने बिठाकर कहा.

“सॉरी टीचर…! अब मैं समझने की कोशिश करूंगी. पर आप लोग मेरी मदद करेंगी न?” ख़ुशी ने अपने आंसू पोंछते हुए कहा था.

अर्पिता ने आगे बढ़कर ख़ुशी को अपने गले से लगाते हुए कहा, “टीचर्स तो हमेशा स्टूडेन्ट्स की मदद करते हैं, खुशी!”

– सीमा मिश्रा

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कहानी- यादें (Hindi Short Story- Yaaden)

Short Story- Yaaden

हम किसी ग़लत राह पर चल पड़ें, उससे पहले दिशा बदल लेना बहुत ज़रूरी है. ऐसे संबंध अहं को तृप्त कर सकते हैं, कुछ समय के लिए जीने का सबब भी बन सकते हैं, लेकिन कभी न कभी अपराधबोध से ग्रसित करते ही हैं अनुराधा. समाज द्वारा बनाए नियम किसी कारण से बने हैं. हमें लगता है कि वे हमारी इच्छाओं का दमन करते हैं, हमें अपनी मर्ज़ी से नहीं जीने देते, पर वही समाज को उच्छृंखल बनाने से रोके हुए भी हैं.

यादों द्वारा हम अपनी ज़िंदगी के कुछ विशेष लम्हों को जीवित रखते हैं, जीवित भी और नूतन भी. समय के लंबे अंतराल के पश्‍चात् भी यूं लगता है, जैसे कल ही की बात हो. इन यादों से जुड़े व्यक्ति कभी अतीत का हिस्सा नहीं बनते, वे सदैव हमारे संग ही रहते हैं. बरसों बीत गए दिवाकर से मिले, पर आज भी यूं लगता है, जैसे वह मेरे आसपास ही मौजूद है- मेरी ज़िंदगी का एक अटूट हिस्सा बनकर. स्कूल यूनीफॉर्म के छूटते ही अनेक प्रतिबंध पीछे छूट गए थे. कॉलेज का प्रांगण आज जैसा स्वच्छंद न होकर भी स्कूली जीवन से बहुत भिन्न था. संस्कारों की दीवार, मर्यादाओं की लक्ष्मण रेखाएं सब सलामत थीं, पर कुछ था, जो बदल गया था, जो अच्छा लग रहा था. आकाश अधिक विस्तृत, धरती का दामन अधिक विशाल लगने लगा था. कक्षा का बहिष्कार कर फ़िल्म देखने न भी गए हों, लेकिन कभी-कभी ग़ैरज़रूरी-सी लगनेवाली क्लास छोड़ कैंटीन में बैठ कॉफ़ी तो पी ही लेते थे हम.

इसी कैंटीन में मेरा दिवाकर से परिचय हुआ था, जो धीरे-धीरे ज़्यादा बढ़ गया था. मुझसे एक ही वर्ष सीनियर था वह. देखने में साधारण, पर मृदु,  कोमल व भावपूर्ण आंखें. जब वह अपनत्व से देखता, तो नज़रों से छू लेने सा एहसास होता. मज़ाक में कहता, “कैसी मीठी आवाज़ है तुम्हारी, सुबह मिश्री का घोल पीकर आती हो क्या?” और फिर बिना उत्तर की प्रतीक्षा किए कोई दूसरी बात छेड़ देता. न मुझे स्वीकृति में धन्यवाद देने की ज़रूरत होती और न ही नाराज़गी दिखाने की मोहलत ही मिलती. यौवन की दहलीज़ पर खड़ी, लड़कपन अभी बाकी था मुझमें और प्यार-मोहब्बत जैसे भारी-भरकम शब्दों से दूर ही थी मैं. चाहो तो मैत्री ही कह लो इसे. छात्रावास में रहने के कारण परेशानियां बांटनेवाला घर का कोई नहीं था, सो ज़रूरत पड़ने पर भावनात्मक संबल तलाशने उसी के पास जाती थी मैं. कभी कॉलेज में देर हो जाने पर मुझे हॉस्टल तक छोड़ देता. बस, इससे अधिक कुछ नहीं.

अब सोचती हूं कि कभी उसने अधिकारपूर्वक कुछ कहा होता, जवाब मांगा होता, तो कितनी अलग होती मेरी कहानी!

बीस वर्ष की होते ही माता-पिता ने अपनी इच्छानुसार मेरा विवाह तय कर दिया. आज की पीढ़ी शायद समझ ही न पाए उस माहौल को, जिसमें हम ब़ड़े हुए थे. विवाह तय करते समय लड़की की पसंद-नापसंद की बात तो दूर, यह जानने की कोशिश भी नहीं की जाती थी कि वह अभी विवाह करना चाहती भी है या नहीं.

बहरहाल ख़ुशियों की उम्मीद लिए मैंने अपने नए जीवन में प्रवेश किया और उम्मीद तो सभी करते हैं न ख़ुुशियों की! सभी की उम्मीदें पूरी हो जाती हैं क्या? और हो सकती हैं क्या? लोगों की दृष्टि में यदि पति अपने व्यवसाय को पूरी तरह समर्पित है, तो यह उनके गुणों की श्रेणी में आता है, पर मेरे लिए क्या बच गया था जीवन में? पति ने पहले ही दिन बता दिया था कि घर में शिशु की किलकारियां गूंजने की कोई संभावना नहीं, जबकि मुझे अपनी किशोरावस्था से ही बच्चों से बेहद लगाव था. आस-पड़ोस के बच्चों को उठा लाती और घंटों उनके संग खेला करती. अपने माता-पिता के दबाव में आकर ही विवाह किया था इन्होंने और अब इसकी पूरी ज़िम्मेदारी अपने माता-पिता पर डाल किसी भी प्रकार की आत्मग्लानि से भी पूर्णतः मुक्त थे वे. बहुत बड़ी अपेक्षाएं नहीं थीं मेरी ज़िंदगी से. बस, एक सामान्य इंसान की तरह मैं ज़िंदगी को भरपूर जीना चाहती थी और इन सबसे बढ़कर मैं मां बनना चाहती थी. मुझे किसी चीज़ की कमी नहीं थी. पहनने-ओढ़ने और खाने को भरपूर था घर में, पर न कोई पहना देखनेवाला और न कोई खिलानेवाला. हर दिन के अंत में यही लगता, ‘चलो एक दिन और कट गया’. सब सुविधाओं के बावजूद भावनात्मक कोने सभी खाली थे मेरे मन के.

समय को तो गुज़रना ही होता है, सो वह गुज़र रहा था. हम मनुष्यों के दुख-दर्द से सरोकार रखना वैसे भी समय का स्वभाव कभी रहा ही नहीं है.

पढ़ने का शौक़ तो मुझे पहले से ही था और अब तो पुस्तकें ही मेरी एकमात्र संगिनी बन गई थीं. बाहर न निकलने के कारण दोस्ती भी कम ही लोगों से थी. अतः दिन का अधिकांश समय कुछ न कुछ पढ़ती रहती. शहर में हर वर्ष पुस्तक मेला लगता, सो वहीं से मैं अपनी पसंद की ढेर सारी पुस्तकें ख़रीद लाती. ज़िंदगी का रास्ता ऐसा सपाट नहीं होता, जिसमें दूर तक देखा जा सके. अनेक अंधे मोड़ होते हैं इसमें, कभी भी कहीं भी मुड़ जाती है ज़िंदगी- बिना किसी पूर्व चेतावनी के.

मेरी नीरस उदास ज़िंदगी में भी कोई मोड़ आ सकता है, ऐसा मैंने कब सोचा था?

पुस्तक मेला आरंभ हुआ, तो सदैव की भांति मैं इस वर्ष भी गई. यही एक जगह थी जहां चाहकर भी पति आपत्ति नहीं कर पाते थे. अपनी पसंद की पुस्तकें ख़रीद मैं कुछ नव प्रकाशित काव्य संग्रह देख रही थी कि मैंने महसूस किया कि कोई मेरे समीप आकर खड़ा हुआ है. लेकिन मैंने उधर ध्यान नहीं दिया. सहसा उसने मुझे मेरे नाम से पुकारा ‘अनुराधा’, वह नाम जिसे मैं लगभग भूल ही चुकी थी और जिस नाम के साथ ही मेरी पूरी पहचान, मेरी अस्मिता कहीं बहुत पीछे छूट चुकी थी. अब मैं स़िर्फ श्रीमती जैन थी- राजीव जैन की पत्नी. अतः मुझे कुछ समय लगा यह चेत आने में कि मुझे ही संबोधित किया गया है.

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पूरे पंद्रह वर्ष पश्‍चात् देख रही थी उसे- फिर भी कितना अपना-सा लगा था वह. पूरा एक कालखंड ही बीत चुका था, पर कुछ था जो आज भी वहीं रुका हुआ था इंतज़ार में, बिजली के किसी तार की तरह, जो मौक़ा पाते ही फिर से जुड़कर जीवंत हो उठा था.

हमने पुस्तक मेले का एक और चक्कर लगाया और उसके साथ ही बीत चुके वर्षों का भी. मेले से बाहर निकल हम ढलती दोपहरी में बैठे भुने चने-मूंगफली खाते रहे और बातें करते रहे. बातें थीं, जो ख़त्म ही नहीं हो रही थीं- पुरानी यादों का अंतहीन सिलसिला. कितनी अजीब बात है न कि पंद्रह वर्ष के वैवाहिक जीवन में याद करने लायक, याद करके ख़ुुश होने लायक एक भी बात नहीं थी मेरे पास. जबकि कॉलेज के तीन वर्ष अनेक यादों का भंडार थे, जिनकी चर्चा मात्र से ही मन प्रफुल्लित हो उठा था.

शहर में होनेवाले सांस्कृतिक कार्यक्रमों में दिवाकर अक्सर ही जाया करता. नाटकों का मंचन, कवि सम्मेलन, मुशायरा, कला दीर्घाएं, पुस्तकों का विमोचन- मेरी भी इन सब में रुचि थी, लेकिन पति को ये सब समय की बर्बादी लगते थे और मैं मन मसोसकर रह जाती. पर अब मैंने निश्‍चय किया कि अच्छा कार्यक्रम होने पर अवश्य जाया करूंगी. शुरू में इन्होंने मेरे अकेले बाहर जाने पर आपत्ति की, तो मैं कभी बहन, कभी किसी सहेली को पकड़ ले जाती, पर धीरे-धीरे मेरे भीतर आत्मविश्‍वास आने लगा और मैं अकेली ही जाने लगी. मैंने दिवाकर से सायास मिलने का कार्यक्रम कभी नहीं बनाया, पर इन जगहों पर प्रायः उससे मुलाक़ात हो ही जाती. हम कभी पढ़ी हुई पुस्तक पर चर्चा करते, तो कभी देखे हुए नाटक पर. ऊपरी तौर पर सब कुछ सामान्य था, कुछ भी तो अनुचित नहीं हो रहा था, लेकिन यदि मैं कहूं कि मैं उसकी ओर आकर्षित नहीं हो रही थी, तो यह सत्य नहीं था. वर्षों से उपेक्षा सहता मेरा मन दिवाकर का अपनत्व पाकर पिघलने लगा था. प्यार पाने और प्यार देने की भूख व्यक्ति की नैसर्गिक भूख है, हो सकता है मुझमें कुछ अधिक ही हो. मैंने ख़ुद को रोकने की बहुत कोशिश की, पर पानी के तेज़ प्रवाह में जैसे बेकाबू हो बहता ही चला जा रहा था मेरा मन. मेरे पास अपने वैवाहिक जीवन में प्राप्त ख़ुशियों के वे चंद स्तंभ भी तो नहीं थे, जिन्हें मज़बूती से पकड़ मैं ख़ुद को बहने से रोक पाती. संस्कारों की अदृश्य दीवारें भी बस अदृश्य ही रह गईं.

विधाता ने ग़लती से मेरे भीतर एक की जगह दो मन रख दिए थे क्या? पहला जब तर्क करता कि यह अनुचित है, पागलपन है, तो दूसरा प्रश्‍न करता ‘मुझे ख़ुुशियां पाने के लिए एक और जीवन मिलेगा क्या?’ पहला जब सही-ग़लत की पहचान कराता, दिवाकर से मिलने पर चेतावनी देता, तो दूसरा उसकी बात पूरी तरह से अनसुनी कर अपने ही मन की करता.

जीवन के उस मोड़ पर पहली बार जाना कि क्या होती है प्यार की अनुभूति? कितना सुखद होता है एक ऐसे व्यक्ति का साथ, जो कई स्तरों पर आपसे जुड़ा हो? पहली बार जाना कि प्यार वह शय है जिसे महसूस ही किया जा सकता है, पारिभाषित नहीं.

उस दिन कालीदास जयंती के अवसर पर उनके प्रसिद्ध नाटक ‘अभिज्ञान शाकुन्तलम्’ का मंचन था. दिवाकर भी आया हुआ था और संयोग से हम साथ-साथ ही बैठे थे. अति कुशल अभिनय ने पात्रों को एकदम सजीव बना दिया था. गंधर्व विवाह का दृश्य देख मैंने कहा, “उस समय की स्त्री को अपना वर स्वयं चुनने का, बिना माता-पिता की अनुमति के विवाह तक कर लेने का अधिकार था. स्त्री की अस्मिता का सम्मान किया जाता था. इतनी छूट तो आज भी बहुत कम युवतियों को है. पिता कण्व ऋषि के लौट आने की प्रतीक्षा तक नहीं की शकुन्तला ने, पर न स़िर्फ इस विवाह को स्वीकारा गया, बल्कि उनकी संतान को भी पूरा सम्मान मिला. भरत राजा बने और उनकी पीढ़ियों ने शासन किया. आज के माता-पिता कितना भी आधुनिक होने का दावा कर लें, उनमें से अधिकांश बेटियों का भविष्य तय करना आज भी अपना ही  अधिकार समझते हैं.”

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वर्षों से दबी मां बनने की मेरी इच्छा एक बार फिर बलवती हो उठी. किसी के प्यार का बीज मेरी कोख में पले, मेरी गोद में खेले बस इतना ही तो चाहा था मैंने और मेरा हाथ पासवाली कुर्सी पर बैठे दिवाकर के हाथ पर जा पड़ा. शायद मैंने उसे हल्के-से दबा भी दिया. सब कुछ पलभर में ही हो गया. सच मानो! सच यह भी है कि वही हमारा एकमात्र स्पर्श था.

महाभारत की एक कथानुसार बालक देवव्रत अपनी तीव्र बाण वर्षा द्वारा गंगा की धारा रोक पाने में सक्षम थे. वही देवव्रत, जो बाद में भीष्म पितामह कहलाए. मेरे उद्वेग, मेरे प्रेम के प्रवाह को दिवाकर ने रोका था- देवव्रत बनकर.

‘अभिज्ञान शाकुन्तलम्’ देखे बहुत दिन बीत चुके थे. उस दिन के बाद से दिवाकर से मुलाक़ात नहीं हुई थी. स्वयं पर अभी भी इतना अनुशासन रखा हुआ था कि न तो मैं उसे फ़ोन करती, न ही उससे ऐसी अपेक्षा ही रखती. हालांकि इस बार मैं बहुत व्याकुल हो रही थी उससे बात करने के लिए और अगले किसी कार्यक्रम की प्रतीक्षा में थी, लेकिन उससे पहले दिवाकर का फ़ोन आ गया. कॉफ़ी हाउस में बुलाया था. मेरे मन की मुराद पूरी हो गई, पर थोड़ा भयभीत भी थी, क्योंकि इस तरह पहले कभी नहीं मिले थे हम. जब मैं पहुंची, तो दिवाकर पहले से ही वहां बैठा मेरी प्रतीक्षा कर रहा था. मैं सामने वाली कुर्सी पर जाकर बैठ गई, लेकिन उसने कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की. काफ़ी देर के पश्‍चात् गहन समाधि से मानो जागकर उसने पूछा, “कैसी हो राधा?”

उसने टटोलती निगाहों से मेरी ओर देखा, तो एक बार फिर निगाहों द्वारा छू लेने का मृदु एहसास महसूस किया मैंने, किंतु उस नज़र में कुछ और भी था- उदासी? पर वह किसलिए?

मैं कुछ कह पाती, इससे पूर्व ही उसने कहा, “तुमसे एक ज़रूरी बात करनी थी अनु… मैंने अपना यहां से तबादला करवा लिया है… मुझे लगता है यही हम दोनों के हित में है…”

मैं बेचैन हो गई उसकी बात सुनकर. उसने मेरी उत्तेजना भांप ली थी. उसने हाथ से मुझे शांत हो जाने का इशारा किया मानो मेरे उद्वेग को हथेली से ही रोक लेगा. बोला, “मैं समझ रहा हूं तुम्हारे मन को और तभी ऐसा किया है. हम केवल मित्र बनकर रह सकते, तो बात अलग थी, पर लगता नहीं कि ऐसा हो पाएगा. हम किसी ग़लत राह पर चल पड़ें, उससे पहले दिशा बदल लेना बहुत ज़रूरी है. ऐसे संबंध अहं को तृप्त कर सकते हैं, कुछ समय के लिए जीने का सबब भी बन सकते हैं, लेकिन कभी न कभी अपराधबोध से ग्रसित करते ही हैं अनुराधा. समाज द्वारा बनाए नियम किसी कारण से बने हैं. हमें लगता है कि वे हमारी इच्छाओं का दमन करते हैं, हमें अपनी मर्ज़ी से नहीं जीने देते, पर वही समाज को उच्छृंखल बनाने से रोके हुए भी हैं.”

लंबा अरसा बीत चुका है उस मुलाक़ात को. अच्छा हुआ मैं अपने मन की बात उस समय स्पष्ट रूप से दिवाकर से कह नहीं पाई. क्या सोचता वह मेरे बारे में? दिवाकर के सुलझे-संयत व्यवहार ने मेरे उन्माद पर रोक लगा दी थी. उस समय तो मैं बहुत हताश हुई थी, पर अब उससे उबर चुकी हूं मैं. उन्मादी लहरें एक बार फिर जाकर सागर में विलीन हो गई हैं.

आजकल मैं बहुत व्यस्त रहती हूं. हरदम बच्चों से घिरी हुई. किसी की मां-सी हूं और किसी की मौसी. अपना पूरा खाली समय एक अनाथाश्रम में बिताती हूं. उन बच्चों के खिले चेहरे मुझे पूर्णतः तृप्त कर देते हैं. आवश्यक तो नहीं कि स़िर्फ अपनी कोख से जन्मे बच्चों पर ही प्यार उड़ेला जाए. जो बच्चे अपने नैसर्गिक प्यार से वंचित रह जाते हैं, बिना किसी क़सूर के, उनमें प्यार बांटकर, उनके उदास चेहरों पर मुस्कुराहट लाकर जीवन परिपूर्ण हो गया है मेरा.

दिवाकर ने कहा था, “अपनी इच्छानुसार जीने को तो किसी को नहीं मिलता अनु. मुझे मिला क्या? पर जीवन वह नहीं है, जैसा जीने की हम कल्पना करते हैं, जैसा हम जीना चाहते हैं. जीवन वह जीना होता है, जैसा हमें मिलता है. उसमें सुंदर रंग भरकर हम कितना संवार पाते हैं, यह हम पर निर्भर करता है. सांस लेने भर को जीना नहीं कहते अनु. जीवनदाता का अपमान है यह. समय काट देनेवाली सोच बहुत घातक सोच है. हर पल का सार्थक उपयोग करके जियो राधा.”

हां! वह कभी मुझे अनु बुुलाता था और कभी राधा.

दिवाकर की यादों का उजास मेरे मन को ठीक उसी तरह आलोकित किए है, जैसे किसी मंदिर के गर्भगृह में निरंतर जलती एक लौ. वर्षों बीत गए उससे मिले, उसे देखे. यह भी नहीं जानती कि वह रहता कहां है? पर उसकी उपस्थिति का एहसास हर पल अपने आसपास महसूस करती हूं मैं. इस रिश्ते को क्या नाम दूं? नहीं जानती.

        उषा वधवा

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कहानी- मंज़िल तक (Short Story- Manzil Tak)

Manzil Tak

“जीवन केवल वह नहीं, जो अपनी इच्छित आकांक्षा को पूर्ण करने में ख़र्च किया जाए, जीवन वह है जो दूसरों को ख़ुश देखने, दूसरों को सहारा देने के लिए जीया गया हो. जीवन-पथ पर बहुत कुछ पीछे छूट जाता है.., कुछ छोड़ देना पड़ता है, जो स्वयं के लिए बोझ साबित हो… आगे बढ़ने के लिए बाधक साबित हो, उसे छोड़कर आगे बढ़ना ही जीवन है. उसी मोड़ पर बैठ जाना तो कर्महीनता है. मंज़िल तो आगे… बहुत आगे बढ़ने पर ही मिलती है. यह तो इंसान को स्वयं तय करना होता है कि उसकी मंज़िल क्या है, उसके जीवन का उद्देश्य क्या है?”

‘दक्षा तिवारी…’

नाम की घोषणा होते ही दक्षा आत्मविश्‍वास से भरी हुई अपनी कुर्सी से उठकर मंच की ओर चल पड़ी. मंच पर अतिथि महोदय से दक्षा ने अपना प्रशस्ति-पत्र और पी.एच.डी. की थिसिस थाम ली व गर्वित मुस्कान से अभिवादन कर मंच से नीचे उतरने लगी.

दो-तीन कैमरामैन नीचे से लगातार कार्यक्रम की फ़ोटो खींचने में व्यस्त थे. मंच से उतरते व़क़्त चेहरे पर पड़ी फ्लैश की चमक से सहसा दक्षा की नज़र कैमरामैन पर पड़ी. वह भी कुछ चकित, कुछ सहमा, कुछ लज्जित-सा नज़र चुराते एक तरफ़ चला गया.

दक्षा ने देखते ही पहचान लिया था उसे. यह वही शख़्स है, जो आज से क़रीब आठ वर्ष पूर्व बीए करने के बाद पहली बार दक्षा को वर के रूप में देखने पहुंचा था.

दक्षा अपनी कुर्सी पर आकर बैठ गई व पुनः उसकी नज़रें कैमरामैन को खोजने लगीं. कहीं नज़र न आने पर वह मन ही मन बुदबुदाई. “कायर कहीं का…” एक व्यंग्यात्मक मुस्कान इसके चेहरे पर फैल गई.

दक्षा को देखते ही विवाह के लिए मना कर दिया था इसने. कारण था- लड़की का रंग दबा है. सुनकर दक्षा कितनी रोई थी. क्या है इस इंसान में? मामूली-सा कैमरामैन! किसी के यूं ही कह देने भर से क्या कोई योग्य-अयोग्य हो जाता है?

लेकिन उस व़क़्त उन्नीस वर्ष की अल्हड़ दक्षा में कहां थी इतनी समझ? यदि ‘मां’ जैसी मां न होती तो कहां जान पाती दक्षा ज़िंदगी के मायने… कार्यक्रम की गमगमाहट से दूर दक्षा का मन अतीत में विचरने लगा.

बीए करते-करते आम लड़की की तरह दक्षा भी अपने राजकुमार के सपने संजोने लगी थी. मां-पिताजी तो दक्षा की पूर्ण उच्च-शिक्षा के पश्‍चात ही विवाह के पक्ष में थे, पर बिस्तर पर पड़ी दादी दिन-रात पिताजी के कान खाती- “मेरे जीते जी दक्षा को ब्याह दो, वरना दामाद का मुंह नहीं देख पाऊंगी, अब गिनती के दिन शेष हैं मेरे…”

तभी दक्षा के मामाजी ने आकर रिश्ते की बात चलाई. किसी मित्र का भाई है, कैमरामैन है, अपना स्टूडियो है, प्रायवेट वीडियो शूटिंग करता है, ग्रेजुएट है, सुंदर है, गोरा है… और न जाने क्या-क्या.

हालांकि मां-पिताजी इन बातों से प्रभावित न हुए थे, पर दादी की ज़िद पर वर-दिखलाई का कार्यक्रम तय हुआ.

लड़का अपने मां-बाप व भाई के साथ दक्षा को देखने पहुंचा. दूसरे ही दिन ख़बर भिजवा दी कि लड़की नापसंद है, काली है.

दक्षा ने सुना तो रो-रोकर बुरा हाल बना लिया था. लड़के के मना करने का दुख कम, अपनी अवहेलना का ज़्यादा था.

मां पिताजी पर झल्ला पड़ी थी- “मैंने तो पहले ही मना किया था. न लड़की की पढ़ाई पूरी हुई है, न उम्र. बेवजह की तमाशाई हुई… लड़की का दिल दुखा सो अलग.”

पिताजी कम आहत नहीं थे, पर चुप ही रहे और मन-ही-मन तय किया कि जब तक बिटिया की पढ़ाई पूरी नहीं होगी, विवाह की चर्चा नहीं होगी.

समय के मरहम से दक्षा पूर्ववत हो गयी थी व फिर से पढ़ाई-खेल, साथी-सहेलियों की गतिविधियों में व्यस्त हो गई.

उन्हीं दिनों एमए के दौरान दक्षा का वंदन से परिचय हुआ. कॉलेज के सांस्कृतिक कार्यकम में वंदन दक्षा के साथ ही नाटक में काम कर रहा था. तीव्र बुद्धि, हंसमुख स्वभाव, लुभावनी काया-कुल मिलाकर एक चुंबकीय व्यक्तित्व का स्वामी था वंदन.

कुछ उम्र का असर, कुछ अनुकूल परिस्थितियां… दोनों का साथ-साथ हर गतिविधि में सम्मिलित होना धीरे-धीरे दक्षा व वंदन को क़रीब ले आया, इसका दोनों को ही भान न था. दोनों ही एक-दूसरे के आकर्षण में बंधे जा रहे थे.

हालांकि दक्षा का वंदन के प्रति व्यवहार केवल मित्रवत ही होता था, पर मां की पारखी नज़रों ने दक्षा के मन में छिपे चोर को ताड़ लिया था. मां आख़िर मां ही होती है.

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मां स्वभावगत चिंतित हो गई थी. वैसे दक्षा की पसंद उनकी अपनी पसंद थी. वंदन उन्हें भी भाता था. परंतु केवल लड़के-लड़की की आपसी पसंद से क्या होता है? “क्या वंदन के परिवारवाले भी दक्षा को पसंद करेंगे? यदि नहीं, तो क्या वंदन में इतना हौसला है कि घरवालों के विरोध के बावजूद दक्षा का हाथ थाम सके? यदि ऐसा न हुआ तो दक्षा एक बार फिर घायल होगी, टूटेगी, बिखरेगी… कैसे संभालूंगी बेटी को…?” आदि बहुत-सी चिंताएं जो हर मां को बेटी के प्रति होती हैं, दक्षा की मां को भी सताने लगीं.

मां ने दक्षा व वंदन से इस संबंध में बात करने का मन बनाया ही था कि उसके पूर्व ही एक शाम दक्षा कॉलेज से लौटते ही अपने कमरे में जाकर लेट गई. जो कभी न होता हो, उसके होने पर मन में आशंका उठना स्वाभाविक है. रोज़ आते ही कॉलेज की बातें सुनाना दक्षा की दिनचर्या का हिस्सा था.

शंकित मन से मां दक्षा के कमरे में दाख़िल हुई व दक्षा से कारण जानना चाहा, पर तबीयत ख़राब होने का बहाना बनाकर दक्षा ने स्वयं को चादर में छिपा लिया.

जिसकी आशंका थी, आख़िर वही हुआ. दूसरे ही दिन मां को दक्षा की सहेली से पता चला कि वंदन की सगाई तय हो गयी है.

एकबारगी मन हुआ कि बुलाकर भला-बुरा कहे वंदन को… कहे कि प्रेम की पेंगें बढ़ाना जितना आसान है, उतना ही कठिन है हाथ थामना. हिम्मत चाहिए, हौसला चाहिए, आत्मविश्‍वास चाहिए उसके लिए. जिसमें ये सब नहीं, वह दक्षा के काबिल नहीं. पर पराई संतान को भला क्या कहा जा सकता है. अतः वंदन का ख़याल झटके से मन के बाहर कर दिया मां ने.

उन्हें चिंता थी तो केवल दक्षा की… उसके टूटे मन की… उसकी दरकती भावनाओं की.

एक बार पिताजी ने कहा,“हम ख़ुद चलकर वंदन के मां-बाप से बात करते हैं.” पर मां नहीं मानी. जो लड़का अपने अधिकार के लिए ज़ुबान तक नहीं खोल सकता, ऐसे लड़के से ब्याहकर दक्षा को कौन से सुख मिल पाएंगे?

“नहीं…नहीं, बिल्कुल नहीं,” मां ने निर्णयात्मक स्वर में कहा, “वह कायर दक्षा के लायक नहीं है. रही दक्षा की बात तो वह आप मुझ पर छोड़ दीजिए, मैं उसे संभाल लूंगी.” आठ… दस… पंद्रह दिन हो गए… आख़िर महीना हो गया. दक्षा ने कॉलेज जाना बंद कर दिया था. यंत्रवत-सी वह दिनभर के आवश्यक काम निपटाती, खाने के नाम पर दो-चार निवाले मुंह में ठूंसती व उठकर फिर कछुए की तरह अपनी खोल में स्वयं को छिपा लेती.

मां ने दक्षा को कुछ दिन बिल्कुल नहीं टोका. वह जानती थी कि जब कभी हर उपदेश, समझाइश जवाब दे जाते हैं तब केवल ‘समय’ ही वह उपाय रह जाता है जो सब कुछ बदलने का सामर्थ्य रखता है. ऐसी स्थिति में दक्षा को सामान्य होने के लिए उसके हाल पर यथावत् छोड़ देना ही अंतिम उपाय था.

माह-दो माह पश्‍चात भी दक्षा की रुचि किसी कार्य में नहीं जाग रही थी. न टी.वी., न गाना, न सहेली, न फ़िल्म.. दक्षा को देख पिताजी भी स्वयं को बेबस पाते, उसकी हालत देख स्वयं तिल-तिल मर रहे थे.

आख़िर एक दिन मौक़ा देखकर खाने की मेज़ पर मां ने चर्चा छेड़ी. संबोधन पिताजी के लिए था, पर बात दक्षा के लिए उद्येशित थी. “आपने सुना, पड़ोस की निशी की वर्मा साहब ने ज़बरदस्ती शादी तय कर दी. वह भी उसकी इच्छा के विरुद्ध.”

“अच्छा.., लेकिन क्यों?” पिताजी बोले.

“क्यों क्या? उनकी मर्ज़ी! हर पिता तुम्हारी तरह नहीं होता, जो लड़की की भावनाओं का ख़याल कर पल-पल घुटता रहे. लड़की भूखी रहे तो ख़ुद भी भूखे उठ जाएं.” कनखियों से दक्षा पर नज़र डालते हुए मां ने अपनी बात ज़ारी रखी. “निशी को भी तो देखो. मज़ाल है कि विरोध में मुंह से दो शब्द भी निकल जाएं.”

आज दो माह में पहली बार दक्षा का ध्यान पिताजी पर गया. उसे देख-देखकर कितने चिंतित, कितने उदास, कितने दुर्बल लग रहे हैं, शायद पिताजी ने भी इतने दिनों से ठीक से खाना नहीं खाया. सोचते हुए दक्षा अपने कमरे में आ गई व रातभर मां की बातों का विश्‍लेषण करती रही. उसका मन ग्लानि से भर उठा. किसी की सज़ा किसी को क्यों दे? और ख़ासकर उन्हें, जो हर व़क़्त उसके भले की सोचते हैं. मां-पिताजी को अनजाने ही उसने दुःखी कर दिया, इस ख़याल से वह पछता उठी.

सुबह नहा-धोकर दक्षा किचन में आकर मां के काम में हाथ बंटाने लगी, “मां, आज पिताजी की पसंद का खाना मैं बनाऊंगी.”

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दक्षा में आए इस अप्रत्याशित परिवर्तन से मां का हृदय सुखानुभूति से भर गया. यही व़क़्त है दक्षा को कुछ कहने का… सही बात सही समय पर कही जाए तभी उसका सकारात्मक असर होता है… सोचते हुए मां ने दक्षा से कहा, “दक्षा, जीवन केवल वह नहीं, जो अपनी इच्छित आकांक्षा को पूर्ण करने में ख़र्च किया जाए, जीवन वह है जो दूसरों को ख़ुश देखने, दूसरों को सहारा देने के लिए जीया गया हो. जीवन-पथ पर बहुत कुछ पीछे छूट जाता है.., कुछ छोड़ देना पड़ता है, जो स्वयं के लिए बोझ साबित हो… आगे बढ़ने के लिए बाधक साबित हो, उसे छोड़कर आगे बढ़ना ही जीवन है. उसी मोड़ पर बैठ जाना तो कर्महीनता है. मंज़िल तो आगे… बहुत आगे बढ़ने पर ही मिलती है. यह तो इंसान को स्वयं तय करना होता है कि उसकी मंज़िल क्या है, उसके जीवन का उद्देश्य क्या है?”

“तुम तो भाग्यशाली हो जो तुम्हारे पिताजी आम इंसानों से हटकर तुम्हारी ऊंचाइयों के ख़्वाब देखते हैं, आम पिताओं की तरह तुम्हें ब्याहकर बोझ उतारने की भावना उनमें नहीं है. इन सबके बावजूद तुम ही हारकर रुक जाओगी तो क्या पिताजी के प्रति अन्याय नहीं करोगी?”

मां की एक-एक बात यथार्थ के पाठ की तरह दक्षा के मन-मस्तिष्क में बैठ गई. मां सच ही तो कहती है कि जीवन में उन कष्टप्रद यादों व पीड़ादायक बातों को दुःस्वप्न मानकर भूलना आवश्यक है. बीती बातों में उलझकर आने वाले उज्ज्वल ‘कल’ को अंधकारमय बना देना कहां की बुद्धिमानी है? विचारों में आए इस परिवर्तन के साथ ही दक्षा के मन से अवसाद और निराशा धुल गई व भविष्य का मार्ग प्रशस्त हो उठा. अब उसकी नज़र भविष्य-पथ पर स्थिर हो गयी… सीधे मंज़िल तक.

“मैडम, आज यहीं रुकने का इरादा है क्या?” प्रोफेसर शरद की आवाज़ पर दक्षा जैसे नींद से जाग उठी व हड़बड़ाहट में उठकर खड़ी हो गयी.

प्रोफेसर शरद को अपनी ओर मुस्कुराते देख कुछ झेंप-सी गई. कार्यक्रम संपन्न हो चुका था. लोग हॉल से बाहर निकल रहे थे.

“चलिए, मैं आपको रास्ते में ड्रॉप कर दूंगा और वैसे भी आपने आज मेरे प्रस्ताव का जवाब देने का वादा किया है. कहते हुए एक गहरी नज़र शरद ने दक्षा पर डाली.

दोनों आगे बढ़े ही थे कि कैमरामैन सामने आ गया- “एक्सक्यूज़ मी..” कहते हुए दक्षा से बोला “आपने शायद मुझे पहचाना नहीं, मैं…”

दक्षा बात काटते हुए आत्मविश्‍वास से भरे लहज़े में बोली “जी नहीं, मैंने आपको अच्छी तरह से पहचान लिया है. इनसे मिलिए प्रोफेसर शरद… मेरे होनेवाले पति…” कहकर दक्षा ने शर्माते हुए शरद की आंखों में झांका व उनके साथ आगे बढ़ गई.

 

स्निग्धा श्रीवास्तव

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कहानी- धाय (Short Story- Dhay)

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यक़ीनन कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जिन्हें विधाता अपनी पूरी लगन से गढ़ता है और पूर्ण संस्कारित करके ही धरा पर भेजता है. जो न मिला, उसके लिए कभी भगवान को दोष नहीं देते. कभी मुंह खोलकर अपने जीवन की त्रासदियों की शिकायत नहीं करते और मिसाल बन जाते हैं, जीती जागती… जिनका ‘होना’ बरगद की छांव-सा लगता है.

उसके देहावसान की सूचना मिले चार महीने से ऊपर हो गए. तब से एक दिन भी वह मेरी आंखों से ओझल नहीं हुई. खाना बनाते व़क़्त तवे पर सिंकते फुलके से उठनेवाली सौंधी सुगंध के साथ उसकी याद की टीस का क्या मेल हो सकता है, यह मैं समझ नहीं पा रही हूं. कदाचित यह कि बचपन में लकड़ी-उपले के चूल्हे में रोटी सेंकती वो… और उसके सामने बैठी हाथ तापती या खाना खाती मैं… अनजाने में रोटियों की वह सुगंध मेरे नथुनों में भरती चली गयी होगी. अर्थात् उसकी याद के साथ उस विशेष महक का मेल तो था. पहले यह बात समझ में नहीं आई मुझे. मगर, अब जबकि वह नहीं रही तो मैं… ह़ज़ारों कोस दूर बैठी तवे पर सिंकती रोटी से उठती महक के साथ कलेजे से उठती हूक को समझने की कोशिश में लगी हूं.
कितनी यादें… कितनी स्मृतियां- देखी हुई सुनी हुई… आज उनको पृष्ठों पर उतार देने का मन हो रहा है. शायद उस अनूठी हस्ती के प्रति मेरी अशेष श्रद्धा के सुमन अर्पित हो जाएं. मन में उठते भावों को शब्दों में बांधने का कितना भी प्रयास किया जाए… हूबहू करना सम्भव कहां हो पाता है? यदि होता, तो मैं आपको रोटी से उठनेवाली उस महक का स्वाद क्या न बता पाती कि किस तरह इधर कपड़े से फुलायी रोटी की भाप बाहर निकली और उधर उसकी तस्वीर मेरी आंखों के सामने आयी.
लगभग साठ या उससे भी पांच-सात वर्ष पहले की एक तपती दोपहरी में राजस्थान के बीकानेर शहर में ‘देशनोक’ गांव की वह सुतारी (लकड़ी का काम करनेवाले को सुतार कहते हैं) अपने साथ दस वर्षीया बालिका का हाथ थामे शहर के प्रतिष्ठित सेठ की ऊंची लाल पत्थरों की हवेली के विशाल आंगन में खड़ी कह रही थी.
“सेठाणीजी आपरा बाईसा ने रमावण ने कोई छोटी-छापरी चहिज ही सी. ई ने लाई हूं. करम फूटोड़ा हो, जिको पेला ईरा मां-बाप काल में मर गया अबे धणी. म्हें अभागण दिन-रात खेतां में रेंऊ ईरी रखवाली कोनी कर सकूं… आपरे दरबार में पल जायी माईता.” और रोने लगी वह.
विधवा के लिए निर्धारित क्रीम रंग के मोटे कपड़ों में गठरी बनी वह बच्ची, जिसका नख-शिख तक नहीं दिख रहा था, उसकी पुत्रवधू थी. इस कच्ची उम्र में विधवा…
सेठजी के यहां पांच-छ: महीने पहले ही प्रथम पुत्री का जन्म हुआ था. इतनी बड़ी हवेली में बच्ची को रखनेवालों का अभाव नहीं था, किन्तु एक तो सेठ स्वयं ‘देशनोक’ गांव के थे, उस पर ‘सुतार घराने’ के पुराने सेवाभाव के कारण उसे रख लिया गया.
सांवली-सलोनी कृशकाय बालिका का नाम था ‘चांद’. चांद की ही भांति उसके छोटे-से जीवनकाल में ‘विधवा’ का दाग़ लगा था. चुपचाप माथा झुकाए सुबह पांच से रात दस बजे तक सेठानी के पीछे-पीछे उनके बताए छोटे-मोटे काम वह नि:शब्द करती रहती. सेठजी की बेटी कमला को तो वह गोद से नीचे ही नहीं उतारती थी. इशारों में समझने और अद्भुत आज्ञाकारिता के दुर्लभ गुण के कारण उसे उपालम्भ देने का अवसर कभी किसी को नहीं मिला. संपन्न घर में खाने-पहनने की कमी तो थी नहीं. सेठानी ने भी अन्य सेवक-सेविकाओं की संगत में उसे कभी नहीं रखा. इसकी वजह उनका दयावान धर्मभीरू स्वभाव तो था ही, चांद का शांत, कर्मठ, समर्पित व्यवहार भी था. मेवा-मिष्ठान, फल-फूल, कपड़े-गहने, खेल-खिलौनों के अंबार देख कर भी उस अबोध बच्ची की आंखों में लोभ-लालच तो दूर, किसी प्रकार के कौतुहल का भाव तक नहीं आता था.

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लगता था जैसे भौतिक वस्तुओं से अघायी कोई देवबाला शापग्रस्त जीवन काटने आ पहुंची थी.
समय का रथ गतिमान था. सेठ का मोतीपुरा आंगन समृद्धि के साथ-साथ एक-एक करके पांच बेटियों की चहचहाहट से गुलज़ार हो गया. बालिका चांद कब ‘धायजी’ के संबोधन की हक़दार बन गयी, पता तक न चला. निःस्वार्थ कर्त्तव्यपरायणता अपना हक़ ख़ुद दिला देती है. जैन धर्मावलम्बी परिवार में अब सेठ-सेठानी बेटियों को घर पर धायजी की देख-रेख में छोड़ साधु-संतों के सेवा-दर्शन पर जाते रहते. घर की पूरी ज़िम्मेदारी धायजी के कंधों पर रहती. चार-पांच नौकर-नौकरानियों की बागडोर भी उसके हाथ में रहती, मगर धाय की कार्यकुशलता ने कभी मात खाना नहीं जाना. बड़ी बेटी कमला दस वर्ष की हुई तो बड़ी धूमधाम से अति संपन्न घर में उसका विवाह हुआ.
उन दिनों की प्रथा व अतिरिक्त प्रेम के कारण बालिका वधू के साथ धाय भी उसके ससुराल साथ जाती. दस वर्ष की कमला और बीस वर्ष की उसकी धाय. ससुराल में होनेवाली बहू की मनुहारें, लाड, प्रेम व अपेक्षाकृत युवा दूल्हे की प्यार भरी छेड़खानी, पत्नी का सामीप्य पाने की चेष्टाएं, धाय की आंखों के सामने घटते रहते… यक़ीनन उसका मन वैरागी ही रहा होगा… कि व़क़्त और वयस की किसी मौसमी हवा ने उसे हिलाया तक नहीं. उसने अपने मन के घोड़े को संयम के किस अदृश्य चाबुक से साधा था, जो कभी भटका नहीं.
इस दौरान सेठ के बेटा हुआ और कालांतर में एक-एक करके सभी बेटियां ससुराल चली गयीं. इतने बड़े घर की पाकशाला का दायित्व धाय के पटु हाथों में था. सेठानी ख़ुद उसके सहयोग को तत्पर रहती. बेटियां जैसे-जैसे बड़ी होती जातीं, वे उन्हें धाय का हाथ बंटाने व काम सीखने उसके पास भेजती रहती. अनजाने में सभी बेटियों ने गृहकार्य की दीक्षा धाय से ली और उसके साथ उन सबका नेह का नाता प्रगाढ़ होता गया.
धाय और सेठानी में एक बात को लेकर अक्सर तकरार होती. धाय जब खाने बैठती तो न जाने किस आले-अलमारी के ओने-कोने से निकालकर ठण्डी-बासी रोटी और बची सब्ज़ी अपनी थाली में रख लेती. सेठानी इस पर बरस पड़ती.
इस लम्बे अंतराल में यह ज़रूर हुआ कि धाय का सेवाभाव तो वही रहा, मगर अब अधिकार भाव भी आ गया. लड़कियां ससुराल से आतीं तो उनके वेश-व्यवहार या फिर बच्चों के रख-रखाव को लेकर सगी मां से पहले ही धाय डपट दिया करती.
लड़कियों के ससुराल उसी शहर में थे. आना-जाना लगा रहता. मारवाड़ी घरों में गहने पहनने का चलन कुछ ज़्यादा है. ससुराल से आतीं, तो वे अपने गहने उतार कर धाय को सौंप देतीं. ऊपर जाकर ताले-चाबी का झंझट कौन करे. शाम को ससुराल जाते व़क़्त वापस पहनना ही होता. धाय के रहते निश्‍चिंतता थी.
सभी लड़कियों की शादियां हो गयीं.. बेटा कलकत्ता पढ़ने चला गया. घर सूना हो गया था. सेठानी ने इस सूनेपन को कम करने के लिए अपनी एक नातिन मंजू को अपने पास रख लिया. मंजू की मां अब कलकत्ता रहने लगी थी. अब नानीमां और धाय की तमाम वर्जनाओं व दुलार का केन्द्र मंजू थी. बेटियों के सभी बच्चों की वह नानी थी और एक-एक की पसंद उसे कंठस्थ रहती थी. बच्चे आते, तो उन सबकी फरमाइशें पूरी करती रहती. अपने लिए रखती वही बासी रोटी और बची सब्ज़ी. कई बार नानीमां के इशारे से मंजू खाने की कोई वस्तु, फल या मिठाई फ्राक में छुपा कर लाती और खाना खाती धाय की थाली में चुपके से रख देती, तो वह बिगड़ उठती. थाली धो कर पीने का सनातन नियम पालने वाली धर्मभीरू धाय को फिर वह वस्तु खानी ही पड़ती. मंजू पर उसकी डांट का कोई असर नहीं होता था. उसे बहुत बुरा लगता कि नानी कोई अच्छी चीज़ क्यों नहीं खाती… और वह ताक में रहती इसी तरह उसकी जूठी थाली में कुछ रख देने के.
छुट्टियों में नानीमां उसे भी अपनी बेटियों की तरह नानी के पास रसोईघर में भेजती काम सीखने के लिए, “जा नानी खने घर का काम सीख, नहीं तो सासरे में गाल्या खासी.” रात के व़क़्त गलियों में कुत्तों का समवेत कर्णकटु आलाप मंजू को डराता. वह जब तक नानी का हाथ कस कर पकड़ कर नहीं सोती, उसे नींद नहीं आती.
सेठजी के बेटे की शादी की बात चलने लगी. लड़कियां देखी जातीं… धाय का पूरा दख़ल रहता. छांट कर रूपसी बहू लाए. बहू पर सगी सास-सा शासन करने व दुलार लुटाने वाली धाय बेटे के बच्चों पर तो जैसे जान छिड़कती थी. बहू ने भी उसका मान सास जैसा ही रखा. न कभी पलट कर जवाब दिया, न मनमानी की. अब धाय को बुढ़ापा आ रहा था. सेठजी का देहावसान हो गया था और यह परिवार कलकत्ता रहने लगा था.
साल में एक बार परिवार बीकानेर आता तो वह अपने गांव ‘देशनोक’ आठ-दस दिन जा आती थी. वहां उसके तीन देवर व उनके परिवार रहते थे. लकड़ी के काम में अच्छी आय थी उनकी और धाय का मान भी बहुत रखते थे. एक बार जब वह देशनोक गयी तो किसी ने उसके दिमाग़ में एक बात जमा दी, “पूरो जमारों तो सेठां रे घर में गाल दियों. पण आगलों जमारो क्या गमावों, अबे थारी ऊमर आयेगी. कदेई सांस निकल जाएगी तो बढ़े बिना पूरों बाल्यां नदी में फेंक देवे, जिके सु गति कोनी हूवें.”
और गांव से वापस आकर धाय ने ऐलान कर दिया वह अब कलकत्ता नहीं जाएगी. सभी को ताज्जुब हुआ. बहुत समझाया, मगर वह नहीं मानी. उसे वहां छोड़ते सभी को दुख हो रहा था, पर वह तो अड़ी गयी, रो रही थी. व्याकुल भी थी. जानती थी जहां कभी रही नहीं, वहां रहना कठिन तो होगा. लेकिन सद्गति व परलोक के भय ने उसे जकड़ रखा था. कलकत्ता में मंजू ने सुना, तो उसे बहुत ठेस लगी. सगी मां जैसे कहीं अकेली रह जाए, तो जैसा मन आकुल-व्याकुल हो उठे, ठीक वैसा ही लगा था उसे.

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जब सभी बीकानेर जाते तो वह गांव से आ जाती थी. इस बीच एक बार मंजू का राजस्थान जाना हुआ, तो वह नानी से मिलने देशनोक गयी. उसे देख कर मंजू की आंखों से ढल-ढल आंसू टपकने लगे.
ख़ुद पर उसका वश नहीं रहा. वह धाय के देवरों से कह बैठी, “थे केवता हा इने खने राखर पूरी सेवा चाकरी करसा. इसी सेवा करो हो कई आ हालत हुगी. इसी तो आ कदेई कोनी ही.”
मंजू की बात सुन कर कोई कुछ नहीं बोला, सब कमरे से बाहर निकल गये तो धाय ने उसे हाथ दबा कर चुप रहने का इशारा किया और बोली, “गेली हुयी है… क्यां रोवे है. ए सगला बापड़ा तो मारे आगे-भारे फिरे हैं. अबे बुढ़ापो है, पीला पान हां… कदेई झर जासा… रो मती तू तो म्हारी साणी बाई है.”
मंजू भी उसके संकोची स्वभाव को जानती थी. संभव है, हमेशा जिनके साथ रही. उनसे दूर रहने के कारण उसकी यह हालत हो गयी है. सब पर पूरे अधिकार से गरजने वाली नानी की सूखी देह और गठरी-सी बनी पांवों में माथा डाले, दीन-हीन-सा बैठा रहना मंजू को कचोट गया और वह आपा खो बैठी थी. उसने फिर नानी को समझाने का पूरा प्रयास किया. पर वह कहां मानने वाली थी.
सोचती हूं, उस जैसे इन्सान को भी अपने अगले जनम के लिए चाह कर पुण्यों को अर्जित करने की आवश्यकता थी क्या? काम, मोह, लोभ, लालच को इसने जितना साधा था, उतना तो कोई संसार त्यागी साधु भी नहीं साध पाता. उसे अपना अगला जनम सुधारने के लिए अन्तिम प्रहर के तप के मूलधन से कहीं ज़्यादा आजीवन नि:स्वार्थ सेवाभाव, अलौकिक ईमानदारी तथा उम्र के कच्चे पड़ावों पर भी अडिग रहने की दृढ़ता का पुण्य क्या कम था?
ऐसे किसी इंसान की गढ़न में मां-बाप के उच्च संस्कार, सुशिक्षा तथा वैसा ही परिवेश का बड़ा हाथ होता है. कब पाये उसने मां-बाप से संस्कार…? कब मिली शिक्षा…? और कहां मिला परिवेश…? यक़ीनन कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जिन्हें विधाता अपनी पूरी लगन से गढ़ता है और पूर्ण संस्कारित करके ही धरा पर भेजता है. जो न मिला, उसके लिए कभी भगवान को दोष नहीं देते. कभी मुंह खोलकर अपने जीवन की त्रासदियों की शिकायत नहीं करते और मिसाल बन जाते हैं, जीती जागती… जिनका ‘होना’ बरगद की छांव-सा लगता है. अदृश्य, मगर सुकून भरा, शीतल-शांत, घनघोर, लेकिन जब चले जाते हैं तो छोड़ जाते हैं एक एहसास… एक सुगंध.

– निर्मला डोसी

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