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कहानी- गोरबन्द (Short Story- Gorband)

Short Story, Gorband,

Short Story, Gorband

“नारायण, वो ऊंटों के गले में पहनी जानेवाली ज्वेलरी को क्या कहते हैं?” नारायण ने अचकचाकर नैन्सी को देखा और तल्ख़ी से कह बैठा, “ओह नैन्सी! मैं ऊंटों के शहर में पैदा हुआ हूं, ऊंटों के कुनबे में नहीं.” पूरी चाय पार्टी हंसी के ठहाकों से गूंज उठी.

रुणक-झुणक… रुणक-झुणक… की दूर से आती आवाज़ ने नारायण को नींद से जगा दिया. नारायण उचककर बिस्तर पर बैठ गया और उसने अपने बिस्तर के दाएं हाथवाली खिड़की के लकड़ी के नक्काशीदार पल्लों पर टिकी सांकल को खोल दिया. चूं…चप्प… चूं… की आवाज़ के साथ लकड़ी के पल्ले खुले, तो सुबह की फागुनी बयार का एक टुकड़ा भर उसके चेहरे को छूने के लिए काफ़ी था. परदादाजी की बनाई ख़ूबसूरत हवेली के वास्तु शिल्प के लिए धन्यवाद देता कि इससे पहले ही रुणक-झुणक की आवाज़ और नज़दीक आ चुकी थी. ऊंटों का काफ़िला था. सजे-धजे ऊंट, उनकी पीठ पर नक्काशी, कहीं फूल, तो कहीं पत्ती… कहीं नाम लिखे-लाल, नीले, गुलाबी मखमली कपड़े पर कांच और गोटे का काम की हुई दुशाला ओढ़े हुए… गले में गोरबन्द… उसमें जड़ी घंटियां और पैरों में बंधे घुंघरुओं की रुणक-झुणक नारायण को आज कितना बेचैन कर रही थी. नारायण उस छोटे से झरोखे से तब तक देखता रहा, जब तक काफ़िला भादाणियों की पिरोल से गोगा गेट की तरफ़ कूच नहीं कर गया. शायद लक्ष्मीनाथजी की घाटी की तरफ़ जा रहा हो… शायद फाल्गुन का कोई कार्यक्रम हो या किसी का ब्याह हो… आज नारायण ऊंटों के बारे में इतना क्यों सोच रहा था? पिछले 25 साल से बीकानेर में पला-बढ़ा हुआ नारायण इसी हवेली के ऊपर-नीचे तलों में भागता-दौड़ता… शहर की तंग गलियों में गुल्ली-डंडा खेलता, तो कभी कंचे… ऊंटों की आवा-जाही उसके खेल में बाधा ही बनी. सतौलियों की मीनार पर निशाना लगाने के ऐन वक़्त पर ऊंटों का गली में आना… बच्चों का एक साथ कहना, “रामजी भली कीजै” और ऊंट के अगले पैर सतौलिये की मीनार को छुए भी ना, पर पिछले पैर का सतौलिये की सातों ठीकरियों को गिरा देना… नारायण का गेंद हाथ में लिए रह जाना और बच्चों का हो.. हो.. करके नाचना… नारायण को बचपन में भले ही अच्छा ना लगा हो, पर आज वो सब याद करके उसके चेहरे पर मुस्कुराहट आ गई थी.
उसे वह भी याद आ रहा था, जब जस्सुसर गेट के बाहर अपने विद्यालय जाते हुए ऊंट गाड़ा मिल जाता, तो पहले वो गाड़े के पीछे लकड़ी के खूंटे पर अपना बैग टांगते, फिर स्कूल के तीन-चार बच्चों के साथ चलते हुए गाड़े पर ही चढ़ने की कोशिश करते. ऊंट गाड़ेवाला देखता तो ग़ुस्सा करता. उन्हें चढ़ने से तो रोकता ही, साथ ही खूंटे पर टंगे बैग भी उतरवा देता. लेकिन कभी गाड़ा चालक सहृदय होता, तो वो बच्चों को अपना हाथ आगे दे देता. बच्चे कभी अपना हाथ, कभी कलाई, तो कभी बांह देकर गाड़े पर चढ़ जाते और हो.. हो.. का हल्ला, ऊंट गाड़े को तेज़ चलाने का एक ख़ूबसूरत उपक्रम बन जाता.
नारायण को आज यह भी याद आ रहा था कि उसकी मां कितनी ख़ूबसूरती से सुरीली आवाज़ में गोरबन्द गीत सुनाती थी- ‘लड़ली लूमा झूमा ए… म्हारो गोरबन्द नखरालो…आलीजा म्हारो गोरबन्द नखरालो…’ आज तक उसने कभी गीत पर ध्यान ही नहीं दिया था. आज क्यों इस गीत को और गहरे में जानने की उत्कंठा हुई थी. नेट सर्फिंग पर जाए या सीधा मां से ही पूछ ले… वो ख़ुद ही मुस्कुरा दिया था अपनी इस मुहिम पर.
नारायण बिस्तर छोड़कर उठा. पांच फुट के हवेली के दरवाज़े से उसे हमेशा झुककर निकलना पड़ता है. शुक्र है सालभर में वो भूला नहीं, वरना आज सिर टकराता. आंगन में कबूतरों को दाना बिखेरती मां के पीछे से गलबहियां डालते नारायण कहता है, “मां, गोरबन्द सुनाओ ना…”
“क्यों? क्या होय्यो?” मां की सुरीली आवाज़ उभरती है.
नारायण उत्तर देने की बजाय कहता है, “मां, अर्थ भी बताओ ना…”
मां नारायण के सिर पर हाथ फेरते हुए बताने लगती है कि गोरबन्द लूम-झूम और लड़ियों से बना कैसे नखरीला बन जाता है. कैसे देवरानी और जेठानी मिलकर इसे गूंथती हैं. ननद सच्चे मोती पिरोती है. कैसे घर की स्त्रियां गाय चराते हुए इसे गूंथती हैं और भैंस चराते हुए सच्चे मोती पिरोती हैं. अपनी बात ख़त्म करते हुए मां नारायण के सिर पर चपत लगाते हुए पूछती है, “आज तनै कईंया याद आयो मारो आ गोरबन्द नखरालो?” नारायण हंसकर भाग जाता है. वो कैसे बताए कि इस बार वो अपनी सभ्यता और संस्कृति की सारी पड़ताल करके जानेवाला है.
पिछले साल से कुछ सॉफ्टवेयर पर नारायण हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में रिसर्च कर रहा है. हार्वर्ड यूनिवर्सिटी, इतनी दूर, सात समंदर पार यानी अमेरिका… मूंदड़ों के ट्रस्टी स्कूल में पढ़ा नारायण यूं अमेरिका पहुंच जाएगा पढ़ने, उसने कभी सोचा भी न था. बीकानेर शहर छोड़कर जाने से पहले उसे कितनी आशंकाएं थीं. यूरोपीय देशों की खुली संस्कृति, खानपान, भाषा-पहनावा सब कुछ इतर… उस पर घर, शहर, मां-बाबा, भाई-बहन, यार-भायले सबसे दूरी… एक अनजाना डर पैदा कर रही थी.
अमेरिका के कैम्ब्रिज शहर में आकर आशंकाओं का भंवर धीरे-धीरे कम होने लगा. भय का औरा भी उस नई संस्कृति के आभा-मंडल के साथ एक सार होता दिखाई दे रहा था.
पहले ही दिन क्लास में प्रोफेसर ने विद्यार्थियों का अनोखा परिचय लिया था. हर विद्यार्थी को दीवार पर टंगे बड़े से विश्‍व के नक्शे पर बोर्ड पिन मार्क करनी थी, जहां से वो आया है. दुनियाभर से 35 बच्चे थे. चीन से 10, अफ्रीका से 5, ब्राजील से 2, नाइजीरिया से 3 और भी ना जाने कितने छोटे-छोटे से देशों से एक-एक विद्यार्थी थे. जब नारायण ने भारत के नक्शे के पश्‍चिमी तरफ़ थोड़ा उत्तर की तरफ़ पिन को लगाने से पहले अपने बीकानेर के बिंदु को ध्यानपूर्वक देखा और बड़े आत्मविश्‍वास के साथ बोला, “आई एम फ्रॉम इंडिया.” क्लास में तालियां बजीं, तो दक्षिणी अमेरिका की नैन्सी बोली, “ओह! डेज़र्ट पार्ट ऑफ इंडिया.” नारायण ने उसे चौंककर देखा.
नारायण ने तो केवल इंडियन होने का परिचय ही दिया था. वो कैसे जान गई कि वो भारत के रेगिस्तानी हिस्से से आया है, जबकि वो ख़ुद बहुत कम जानता है अपने देश के बारे में.
नई क्लास के नए विद्यार्थियों के बीच परिचय के दौर कतरा-कतरा बढ़ते रहे. नैन्सी हर दौर में नारायण को मुस्कुराकर देखती और कोई ना कोई जुमला उछाल देती, “ओह! यू आर फ्रॉम कलरफुल इंडिया?” तो कभी कहती, “यू आर फ्रॉम प्लेस ऑफ कैमल?” तो कभी कहती, “आइ लाइक कैमल?”


नारायण भी इस वैश्‍विक संस्कृति के वातावरण में घुलता जा रहा था. वो कई बार आश्‍चर्यचकित हो जाता था कि अन्य देशों के 20-22 साल के बच्चे अपनी सभ्यता और संस्कृति में तो रचे-बसे हैं ही, पर दूसरे देशों की संस्कृति को जानने को भी आतुर रहते हैं. वो अपनी संस्कृति का तो सम्मान करते हैं, साथ ही उतना ही दूसरे देशों की सभ्यता व संस्कृति का भी सम्मान करते हैं.
पर नैन्सी में कुछ अलग ही बात थी. क्लास में वो हमेशा चहकती दिखाई देती थी. हमेशा नए प्रयोगों के लिए तैयार… नए विचारों को स्वीकार करने…नई संकल्पनाओं को अपने जीवन में लागू करने को आतुर नैन्सी का व्यक्तित्व रोमांच भरा लगता.
“नारायण, तुम्हारे शहर में कितने ऊंट होंगे?” एक दिन नैन्सी के इस अटपटे सवाल से वो हक्का-बक्का रह गया था. भला उसने कभी ऊंट गिने थे?  “मैं कोई ऊंटों की रिसर्च करके नहीं आया.” नारायण अपना जुमला उछाल देता.
“अच्छा, ये बताओ उसके पैरों में सचमुच डनलप जैसा एहसास होता है?” नैन्सी प्रश्‍न करती, तो पूरी क्लास हंस देती. नारायण भी सोचता केवल मज़ाकभर है नैन्सी के ये अटपटे सवाल.
वो सोचता कि दूसरे देशों की सभ्यता व संस्कृति को जानने की जुगत में वो इतने प्रश्‍न कर जाती है. कभी-कभी नारायण उसे कहता, “एनफ नैन्सी! बस मुझे और नहीं मालूम.”
क्लास की साप्ताहिक चाय पार्टी में नैन्सी का हमेशा एक सवाल ऊंटों पर अवश्य होता. उस दिन दिसंबर की कड़कती ठंड में नैन्सी का सवाल था, “नारायण, वो ऊंटों के गले में पहनी जानेवाली ज्वेलरी को क्या कहते हैं?” नारायण ने अचकचाकर नैन्सी को देखा और तल्ख़ी से कह बैठा, “ओह नैन्सी! मैं ऊंटों के शहर में पैदा हुआ हूं. ऊंटों के कुनबे में नहीं.” पूरी चाय पार्टी हंसी के ठहाकों से गूंज उठी. नैन्सी उसके क़रीब आकर बोली, “उसे गोरबन्द कहते हैं… नारायण!”
नारायण की आंखें आश्‍चर्य से फैल गईं. गोरबन्द तो उसकी मां गीत में गाती है. उसने कभी इतनी गहराई से सोचा ही नहीं कि वो ऊंटों के गले में पहननेवाली ज्वेलरी है. ऊंटों के गले की ज्वेलरी… नारायण अपने कमरे में आकर बुदबुदाया और ख़ुद ही दबी हंसी हंस दिया था.
उस दिन नए साल पर क्लास की पार्टी थी. कैम्ब्रिज की सड़कों पर ब़र्फ जमी थी. नैन्सी नहीं पहुंची पार्टी में तो क्लास के सहपाठियों ने नैन्सी को लाने की योजना बनाई. नारायण और जोसेफ प्रोफेसर की कार लेकर निकले. सेंट्रल स्क्वायर पर स्थित नैन्सी के अपार्टमेंट में नारायण नैन्सी के कमरे तक पहुंचा, तो आश्‍चर्यचकित रह गया.
नैन्सी की स्टडी टेबल से लेकर शेल्फों और दीवारों तक ऊंटों की उपस्थिति थी. एक तस्वीर में तो ऊंट के गले में सुंदर-सा गोरबन्द भी लटका था. “नैन्सी, ये क्या पागलपन है? इतने ऊंट तुम्हारे कमरे में क्या कर रहे हैं?”
नैन्सी बोली, “नारायण, मुझे लगता है कि मैं पिछले जन्म में ऊंटों के प्रदेश में थी. चलो अभी सब इंतज़ार कर रहे हैं क्लास में, बाद में बात करेंगे.” नैन्सी ने अपना ओवरकोट लादा और मफलर लपेटते हुए कहा. जोसेफ बाहर कार में इंतज़ार कर रहा था. कार में एक ख़ामोशी के बीच नारायण के अंदर एक तूफ़ान ने जन्म ले लिया था.
फरवरी माह की ख़ुशनुमा शाम थी. नैन्सी और नारायण अपनी लैब से लाइब्रेरी की तरफ़ जा रहे थे. प्रोजेक्ट पर काम करने की बात करते-करते नैन्सी नारायण से बोली, “नारायण, तुम एक ऐसा ऐप नहीं बना सकते, जिसमें कोई व्यक्ति किसी भी देश की वेशभूषा पहनकर अपनी शक्ल देख सके.”
“क्या मतलब?” नैन्सी की यह बात नारायण के सिर के ऊपर से गुज़र गई. भले ही वो पिछले एक साल से ना जाने कितने छोटे-बड़े सॉफ्टवेयर के लिए कोड लिख चुका है, पर इस तरह का प्रस्ताव…
“ओह नारायण! जैसे तुम्हारे राजस्थान की कुर्ती-कांचली पहनकर, माथे पर बोरला लगाकर, नथ पहनकर, गले में ठुस्सी और हाथों में चूड़ला पहनकर मैं कैसी दिखूंगी… बस, उस ऐप में देख लूं.” नारायण की सांस धौंकनी-सी तेज़ हुई और थमने लगी थी. उसके अगले क़दम लाइब्रेरी की पतली पगडंडी पर पड़े बसंत की लाल-पीले मैपल की पत्तियों पर पड़े, तो चर्र-चर्र की आवाज़ जैसे पूरी सृष्टि ने सुन ली.
क्या नैन्सी सचमुच राजस्थान में थी पिछले जन्म में या नेट सर्फिंग के ज़रिए मेरी सभ्यता व संस्कृति में दख़ल दे रही थी… नारायण सोचने को मजबूर था. नैन्सी, क्या बेहतरीन आइडिया है… नारायण चाहकर भी नहीं बोल पाया था. लाइब्रेरी का ख़ामोश क्षेत्र जो आ गया था.
दो हफ़्ते बाद नैन्सी का जन्मदिन था. क्लास की साप्ताहिक चर्चा के साथ नैन्सी के लिए क्लास का तोहफ़ा भी था. नारायण भी एक बॉक्स हाथ में दबाए खड़ा था. नारायण ने उसे अपने बेलनाकार कार्ड बॉक्स में से कार्ड निकालकर दिया, तो उसने झटपट उस कार्ड को खोला. नारायण ने बहुत शिद्दत के साथ एक स्केच तैयार किया था…पहले दृश्य में उसे ऊंटों के पैर दिखे, फिर पीठ पर लटकते दुशाले, गर्दन में झूलता गोरबन्द… ऊंट पर नैन्सी. नैन्सी के तन पर कांचली कुर्ती, माथे पर बोरला, नाक में नथ, गले में ठुस्सी, हाथ में चूड़ला और नैन्सी के हाथ में ऊंट की डोर… “वॉव!” के साथ उसकी आंखें फैल गईं, “नारायण… ये तो मरवण है, पर वो ढोला? वो
कहां है?… ”
नारायण की ख़ामोशी हैरत की सुरंगों से गुज़र रही थी. नैन्सी के मुख से ढोला.. मरवण… का उच्चारण सुनकर नारायण कल्पना के सागर में डूब गया था. पूरे सालभर बाद होली पर बीकानेर आया था नारायण. इस बार वो बीकानेर प्रोजेक्ट लेकर आया था- ऊंटों की रिसर्च का. मां से गोरबन्द सुनकर अर्थ जान रहा है. ऊंटों की क़दम ताल देख रहा है. ऊंटों की गतिविधियां जानने उष्ट्र अनुसंधान केंद्र गया है.
कोट गेट पर लाभूजी कटला से राजस्थानी कुर्ती-कांचली का कपड़ा ख़रीद रहा है. “बोरला के लिए काला डोरा दीज्यो.” नारायण का बस यह अंतिम सोपान था ख़रीददारी का. “वठै मिलसी.” दुकानदार ने कोट गेट पर बैठी उन छाबड़ीवाली महिलाओं की तरफ़ इशारा कर दिया.
नारायण मुस्कुराता हुआ चल दिया. उसे सजाना ही है मरवण को उस ऐप से बाहर निकलकर… बैठाना ही है ऊंट पर… अगली बार लाना ही है नैन्सी को बीकानेर…

       संगीता सेठी

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कहानी- बेजान न जान  (Short Story- Bejaan Na Jaan)

Short Story, Bejaan Na Jaan

Short Story, Bejaan Na Jaan
बनवारीलाल का मन कसक उठा. बेटी के पराये होने और बेटे के पराये होने में कितना अंतर है! बेटी पराई होकर भी माता-पिता का ध्यान रखती है और बेटा पराया होता है, तो माता-पिता बीच मंझधार में डोलती बिना पतवार की कश्ती हो जाते हैं.

धूप बहुत तेज़ थी. स्कूटर से उतर रंजन पोस्ट ऑफिस के बरामदे में आया. तभी वहां बेंच पर बैठे एक वृद्ध सज्जन ने उसे आवाज़ दी, “बेटे, ज़रा सुनना. प्लीज़ मेरा एक काम कर दोगे?”‘….?’ रंजन ने प्रश्‍नवाचक दृष्टि से उनकी ओर निहारा.वृद्ध ने कंपकंपाते हाथ से एक अंतर्देशीय पत्र उसकी ओर बढ़ा दिया, “ज़रा एक छोटी-सी चिट्ठी लिख दोगे? प्लीज़!”‘….?’ रंजन ने आश्‍चर्य से उन्हें निहारा. पढ़े-लिखे लगते हैं, फिर भी? तभी उसकी नज़र उनकी दो उंगलियों पर पड़ी. उन पर पट्टी बंधी हुई थी. ओह! तो इसके कारण…“उंगलियों में चोट लगी है न बेटे, लिखने में…”“कोई बात नहीं!” आत्मीयता से उनके पास बैठ रंजन ने अंतर्देशीय पत्र हाथ में लिया, “क्या लिखना है?”वृद्ध ख़ुश हो गए. गद्गद् स्वर में अपना पेन भी उसे पकड़ाया, “पहले पता लिख देना…”नाम के साथ ‘श्री’ लगा पानेवाले का ‘पोस्ट’ लिखवाया ‘जनरल मैनेजर!’लिखते हुए रंजन ने सोचा, ‘शायद ये सज्जन वहां सर्विस में रहे होंगे. आज किसी काम से…’पूरा पता लिखवाकर, उन्होंने पत्र लिखवाना शुरू किया, “आयुष्मान पुत्र विनित पाल…”ओह! तो ये ‘जनरल मैनेजर’ इनके सुपुत्र हैं! फिर भी नाम के साथ श्री? ख़ैर! मुझे क्या?उसकी कुशलता की कामना लिखवा गला खंखार वृद्ध ने मजमून लिखवाना आरंभ किया, “तुम्हारी मां की तबीयत कुछ माह से ठीक नहीं रहती, अभी दवाइयों का ख़र्चा भी बढ़ गया है. कुछ रुपए भिजवा देते, तो अच्छा रहता…” लिखते हुए रंजन की उंगलियां कांप उठीं. एक पिता की पैसों के लिए अपने ही बेटे से ऐसी गुज़ारिश…? अचानक उसके मन में कोई कील-सी चुभी. जब मेरे दिल को इतना धक्का लग रहा है, तो इस बूढ़े इंसान को? वृद्ध पिता को कैसा लग रहा होगा?उसने महसूस किया, ऐसा लिखवाते हुए उन सज्जन की आवाज़ थर्रा गई थी! गला रुंध गया था. एक पिता के लिए इससे पीड़ादायक स्थिति और क्या होगी कि जिस बेटे पर, उसको लायक बनाने के लिए अपना धन उसकी हर ज़रूरत पर बिना मांगे ख़र्च किया, आज उसी के सामने अपने ख़र्च के लिए हाथ फैला गुज़ारिश करनी पड़ रही है? ‘दाता’ से ‘याचक’ बनने की कैसी पीड़ादायी दुखद स्थिति थी ये?कुछ पलों की तनावभरी शांति छा गई. दो पंक्तियां लिखवा वे चुप हो गए. रंजन आगे के लिए इंतज़ार करने लगा. कुछ क्षण बाद उसने नज़रें उठा उनकी ओर देखा, “आगे?”‘….!’ एक लंबी सांस ले उन्होंने होंठ भींच लिए, “बस बेटे, इतना ही!” और पत्र ख़त्म करने का संकेत किया, “तुम्हारा पिता बनवारीलाल!” रंजन आश्‍चर्य से उन्हें देखने लगा, “जब दो पंक्तियां ही लिखवानी थीं और पैसों की इतनी ही तंगी है, तो ‘अंतर्देशीय’ क्यों लिखवाया? ‘पोस्टकार्ड’ लिखवा देते?” “पोस्टकार्ड वहां अच्छा नहीं लगता बेटे! इतना बड़ा ऑफिसर है वो! और फिर… रिसिट सेक्शनवाला बाबू पढ़ भी लेता.”“तो घर के पते पर भेज देते? वहां तो कोई द़िक्क़त…”“वो मेरी बहू है न, मेरी चिट्ठियां फाड़कर फेंक देती है. बेटे तक पहुंचने ही नहीं देती, इसलिए…” भावना के अतिरेक में बनवारीलाल के मन का दर्द छलक उठा. गला रुंध गया. किसी मासूम माता-पिता से बिछड़े बच्चे की तरह बदहवासी उनके चेहरे पर छा गई! यह सुनकर रंजन का कलेजा मुंह को आ गया. एक पिता, जिसने अपनी पूरी जवानी, अपनी दौलत अपने बेटे को पालने, बढ़ाने और इतने ऊंचे ओहदे के लायक बनाने में ख़र्च कर दी, आज उसी बेटे से अपने मन की पी़ड़ा अभिव्यक्त कर पाने में कितना असमर्थ है? वो भी स़िर्फ अपनी बहू के कारण…? जिसका उनके बेटे को पालने लायक बनाने में कोई योगदान नहीं है? उसे तो ‘ऑलरेडी सेटल्ड’ पूर्ण लायक एक इंसान पति के रूप में मिला था! और उस पर पूर्ण अधिकार जमा उसकी पूरी कमाई पर कुंडली मार वह सास-ससुर को ठेंगा दिखा रही थी, जिनके त्याग के कारण ही पति इस कमाई के लायक बना था?कुछ क्षणों तक पीड़ादायी स्तब्धता छाई रही. फिर बनवारीलाल ने होंठों-होंठों में ‘थैंक्स’ बुदबुदा उसके हाथ से पत्र लिया, सामने खिड़की पर रखे गोंद से चिपकाया और डाक के डिब्बे में डाल थके-हारे क़दमों से गेट की ओर धीमी गति से बढ़ गए. रंजन की ओर उन्होंने गर्दन उठाकर देखा तक नहीं.रंजन उनकी विक्षत मनोस्थिति समझ रहा था. यदि एक बार भी रंजन से उनकी निगाह मिल जाती, निश्‍चित था उनकी आंखों से आंसू ढुलक पड़ते. बनवारीलाल के जाने के बाद भी रंजन कुछ देर तक वहीं जड़वत बैठा रहा. आधे घंटे बाद अपने काम निपटा रंजन घर की ओर रवाना हुआ. चौराहे पर रेड सिग्नल होने पर ज्यों ही वह रुका, बाईं ओर बनवारीलाल जाते दिखे. पसीने से लथपथ, छड़ी टेकते, कांपते क़दमों से!रंजन स्तब्ध रह गया. बनवारीलाल ने अपने पते में ‘गणेश कॉलोनी’ लिखवाया था. गणेश कॉलोनी यहां से अभी एक किलोमीटर और दूर थी, तो इतनी दूर इतनी गर्मी में? पैसों की तंगी के कारण, पैसे बचाने की ख़ातिर, बेचारे टेंपो भी नहीं कर रहे थे.कोई रिश्ता न होते हुए भी रंजन ने स्कूटर उनकी ओर मोड़ दिया. उनके पास पहुंच उसने बैठने का इशारा किया, “आइए बाबा, आपको छोड़ दूं.”“बेटा, तुम काहे नाहक तकलीफ़…” “तकलीफ़ कैसी? मैं गणेश कॉलोनी के आगे जा रहा हूं. वहां मेरी साइट है. आपको उतार दूंगा.” बनवारीलाल का हृदय गद्गद् हो गया. इतनी धूप में अजनबी होते हुए भी? आशीर्वाद में उसकी पीठ थपथपा वे उसके पीछे बैठ गए.जब घर आया, उन्होंने आग्रह से उसका हाथ पकड़ लिया, “दो मिनट घर तो चलो बेटे!” रंजन समझ गया. वे उसे कुछ नाश्ता करवाना चाह रहे होंगे, मगर उनकी आर्थिक अवस्था भांप ‘जल्दी’ का बहाना बना जाने लगा, तो उन्होंने कसकर हाथ पकड़ लिया, “‘देखो तो, मेरे हाथ के लगाए  नींबू-आंवला हैं. इनका शरबत गर्मी में बहुत राहत देगा.” इन्हें अतिरिक्त ख़र्चा नहीं करना पड़ेगा, आश्‍वस्त हो रंजन अंदर आया.

घर दो मंज़िला था. तीस साल पूर्व जब इधर सुनसान था, नई कॉलोनीज़ बनना शुरू हुई थीं,  बनवारीलाल ने सस्ते में 40 व 50 के दो प्लॉट ख़रीद लिए थे. एक में बैंक लोन ले घर बनवा लिया, दूसरे में बगीचा लगा लिया.शरबत से रंजन को वाक़ई बहुत तरावट मिली. जाने लगा, तो बनवारीलाल की पत्नी जमुनादेवी प्लास्टिक थैली में 25-30 नींबू ले आईं. रंजन को संकोच हुआ. अभी गर्मी में नींबू, वो भी इतने बड़े-बड़े, दो रुपये में एक बिक रहे थे. बनवारीलाल बेचते तो…बनवारीलाल ताड़ गए. आत्मीयता से उसका हाथ पकड़ा, “तीन पेड़ हैं, फूलों के भी हैं. आस-पड़ोस में सबको बांट देता हूं…” सही तो है. पड़ोसियों से आत्मीयता भी बनी रहती है, वरना बेटा तो सैकड़ों किलोमीटर दूर! वो भी निर्मोही!धन्यवाद दे रंजन चला आया.बनवारीलाल का मन बेहद अशांत था. वे बेचैनी से घर में इधर-उधर चकरघिन्नी से घूम रहे थे. मस्तिष्क में विचारों का झंझावात मच रहा था. कुछ निर्णय नहीं कर पा रहे थे, क्या करें? उस दिन के बाद इन पंद्रह दिनों में रंजन तीन बार उनके घर आया था. दो बार पत्नी को भी साथ लाया. एक आत्मीयता बन गई थी उनके बीच. उसकी पत्नी कुंतल के कारण पहली बार उन्हें ‘बहू का सुख’ मिल रहा था. भले ही वो पराई थी, पर सास-ससुर के समान सम्मान दे रही थी उन्हें.मगर आज जब रंजन आया, तो उन्हें विचारों के भंवर में डूबता-उतराता छोड़ गया. वे कुछ तय नहीं कर पा रहे थे कि रंजन के प्रस्ताव का क्या जवाब दें?ऐसे व़क्त में उन्हें अपनी बिटिया सेवंती की बहुत याद आई. काश! यहां होती तो उससे सलाह-मशविरा कर लेते. तभी बाहर रिक्शा रुकने की आवाज़ आई. खिड़की से झांककर देखा, तो सेवंती, निखिल संग उतर रही थी. बेटी-दामाद को देखते ही उनकी बूढ़ी रगों में जान आ गई. दौड़कर दरवाज़ा खोला. तब तक सेवंती-निखिल बरामदे में आ गए थे. बेटी को गले लगा वे भावुक हो गए. “बिटिया, तुझे ही याद कर रहा था.”“और मैं आ गई!” ख़ुशी से किलक सेवंती ने उनके चरण स्पर्श किए. उन्हें लिवा बनवारीलाल अंदर आए. कुशल-क्षेम पूछने के बाद बनवारीलाल के मुंह से निकल गया, “एक उलझन में हूं बेटे…”“इसीलिए तो हम आए हैं बाबूजी!” सेवंती ने पूरी बात सुने बिना कहा, “आपको रंजनजी का प्रस्ताव मान लेना चाहिए!”‘….?’

Short Story, Bejaan Na Jaan

बनवारीलाल अवाक् उसे देखते रह गए. ये रंजन को कैसे जानती है? और उसका प्रस्ताव? इसकी भी उसे जानकारी?“अरे बाबूजी!” सेवंती ने लाड़ से उनका असमंजस दूर किया, “पिछले हफ़्ते रंजनजी के मोबाइल से ही तो आपने हमसे बात की थी…” “हां… हां…” बनवारीलाल को याद आ गया. मगर वो प्रस्ताव? इसकी जानकारी इन दोनों को?“बाबूजी!” निखिल उनके पास खिसक धीर-गंभीर स्वर में समझाने लगा, “रंजनजी ने जो सुझाव दिया है, हमें बहुत उचित लगा. इसीलिए कल उनका फोन आने पर हम आए हैं, आपको समझाने.” बनवारीलाल आश्‍चर्य से उन्हें देखते रह गए. तो ये खिचड़ी इनके बीच पहले ही पक चुकी थी?बनवारीलाल गहरी सोच में डूब गए. बेटी-दामाद के अनुमोदन के बाद तो उनका दिल ही किसी गहरे अंधे गह्वर में धंसता चला गया. उन्हें इस सुझाव पर विचार करना ही बेहद मर्मांतक लग रहा था कि वे अपना ये ‘घर’ बेच दें.घर! वो मनोरम स्थल, जहां इंसान सुरक्षा से रह भविष्य के सपने बुनता है. अपनी गृहस्थी चलाता है. कोई एक याद जुड़ी होती है इसके संग? हर पल की सैकड़ों-हज़ारों यादें! उन सबको एक झटके में तिरोहित कर कैसे बेच दें इसे?उनका कलेजा मुंह को आ गया. निखिल का हाथ पकड़ वे कातर आंखों से उसे निहारने लगे, “बेटे, दामाद की बात आज तक टाली नहीं, लेकिन ज़रा मेरे मन की हालत सोचो! सेवंती से ही पूछ लो. पांच-छह साल की थी ये. शायद कुछ याद हो. कितने चाव से, कितनी हसरतों से मैंने ये घर बनवाया था. मां से पूछो, एक-एक ईंट मैंने अपने सामने लगवाई है…”“मैं मानता हूं बाबूजी.” निखिल ने उनके हाथों को अपनी मुट्ठी में भींच लिया, “लेकिन ऐसा कठोर निर्णय लेने के लिए हम आपके भले के वास्ते ही कह रहे हैं…”“अरे, काहे का भला?” बनवारीलाल का गला अवश विवशता से भर आया, “उस घर को बेचने के लिए बोल रहे हो, जिसे मैंने बड़े चाव से बनवाया था…” “चाव से तो बाबूजी आपने भैया को भी पढ़ाया था!” दख़ल देती सेवंती की आवाज़ थोड़ी तिक्तता के साथ दर्द में डूब गई. “क्या मिला आपको?” सैकड़ों टन पत्थरों के नीचे दब गया बनवारीलाल का मन. बिपिनपाल के लिए कितने सपने बुने थे उन्होंने! उसके उच्च अध्ययन के लिए इसी घर पर बैंक लोन लिया था उन्होंने. उसे चुकाने की ज़ेहमत तक नहीं उठाई बिपिनपाल ने. सारा कर्ज़ बनवारीलाल ने चुकाया. ब्याज समेत. स्तब्ध! मूर्तिवत्! जड़वत् रह गए बनवारीलाल. सेवंती की शादी में पैसा भी तो नहीं लगाने दिया था बिपिनपाल को उस कुंडली मारकर बैठी बहू ने. सारी ज़िम्मेदारियां बनवारीलाल ने उठाई थीं. जब रिटायर हुए… एडवांस में आधा खाली हो चुका पीएफ का पैसा पिछली देनदारियां चुकाने में पूरा हो गया! बस, अकेली पेंशन का सहारा है.ज़िंदगी के दांव में सब कुछ हार चुके जुआरी की तरह निस्तेज निढाल बेटी-दामाद को कातर नज़रों से देखते रहे.“बाबूजी!” पिता को गले लगा सेवंती की आंख भर आई, “उम्र के साथ बीमारी के ख़र्चे भी तो बढ़ रहे हैं! कहां से पूरे करोगे? हमसे लेते नहीं, भैया भेजता नहीं!”“… कहने को लाखों की मिल्कियत… मगर इलाज को… दवा, डॉक्टर को?… एक रुपया ख़र्चने में कंजूसी?… ये देखो… देखो ज़रा..” सेवंती उनकी कलाई थाम उनकी उंगलियां सहलाने लगी, “ चोट लग गई थी, कट गई थी… मगर डॉक्टर के पास नहीं गए… तो नहीं गए… घर पर पुराना कपड़ा फाड़… उसी की पट्टी बांध ली!”बनवारीलाल ने होंठ भींच लिए. अब वे ठंडे मन व शांत चित्त से सोचने लगे. सेवंती-निखिल वाकई सही सलाह दे रहे हैं. लाखों की संपत्ति होते हुए भी वे अभावों में जी रहे हैं. इलाज तक नहीं करवाते. पूरी ज़िंदगी यूं ही तकलीफ़ों में निकल जाएगी. मर जाएंगे. उसके बाद…? उसके बाद वो ख़ुदगर्ज़ बेटा बिपिनपाल आएगा… सब ले जाएगा- जो आज झांकता तक नहीं. फिर क्यों तरस-तड़प कर रहें?भारी… हताश… निरुपाय मन… उन्होंने घर बेचने का निर्णय ले लिया.सारी रात नींद नहीं आई. सुबह उठे भी तो बुझे-से. मौन चुप रह नित्यकर्म निपटाते रहे. ग्यारह बजे के लगभग रजिस्ट्री करने के लिए निकले. घर के बाहर आ उदास-बुझी आंखों से अपने घर को देखने लगे. अभी ये ‘मेरा’ है… ‘मेरा अपना घर!… जब लौटेंगे… किसी और का ‘पराया’ हो जाएगा… हमेशा… हमेशा के लिए…हठात् पास खड़ी सेवंती को निहारने लगे. उसकी शादी का ‘विदाईवाला’ दृश्य याद आ गया. ये भी उस दिन ‘पराई’ हो गई थी. लेकिन इसके पराए होने और घर के पराए होने में कितना अंतर है? बेटी के पराया होने में रत्तीभर दुख नहीं था. मालूम था, पराए घर की होकर भी मायके से जुड़ी रहेगी. लेकिन यहां तो?उनका ‘प्रेमकुंज’ सदा सर्वदा के लिए पराया हो जाएगा. एक ठंडी सांस ले उन्होंने होंठ भींच लिए.  पास खड़े निखिल ने संरक्षक भाव से उनके कंधे थपथपा रंजन की भेजी कार में बैठाया. वस्तुत: ये घर रंजन ही ख़रीद रहा था. उसका प्रॉपर्टी का बिज़नेस था. ज़मीन-पुराने मकान ख़रीदना, मल्टीस्टोरी बनाना और फ्लैट्स बेचना. बनवारीलाल के उस ‘दो पंक्ति’ के पत्र ने उसे बुरी तरह हिला दिया था. कोई रिश्ता, जान-पहचान न होते हुए भी वह उनकी सज्जनता से द्रवीभूत हो उनका जीवन संवारने को तड़प उठा. निखिल को फोन कर सारी योजनाएं समझाईर्ं. रजिस्ट्री के बाद वे सब रंजन के घर गए. दोपहर व रात का भोजन रंजन के घर ही था.देर रात वे लौटे. ‘प्रेमकुंज’ में प्रवेश करते समय बनवारीलाल के क़दम हठात् ठिठक गए. सुबह गए थे, तब बेटी का ख़्याल मन में आया था, अभी लौटे तो बेटे का आ गया.कितनी उम्मीदों से पाला था उसे! कर्ज़ा लेकर उच्च अध्ययन के लिए भेजा, शादी में पत्नी के गहने भी बहू को चढ़ा दिए, लेकिन बेटा सुंदर पत्नी के मोहपाश में ऐसा बंधा कि माता-पिता के मोह के बंधन को भूल गया. भूले-बिसरे याद भी नहीं करता? पराया हो गया! इस घर की तरह!बनवारीलाल का मन कसक उठा. बेटी के पराये होने और बेटे के पराये होने में कितना अंतर है! बेटी पराई होकर भी माता-पिता का ध्यान रखती है और बेटा पराया होता है, तो माता-पिता बीच मंझधार में डोलती बिना पतवार की कश्ती हो जाते हैं.ठंडी सांस ले बनवारीलाल अंदर दाख़िल हुए. सारी रात बनवारीलाल को नींद नहीं आई. बार-बार उठ पागलों की तरह पूरे घर के चक्कर लगाते. कभी दरवाज़ों से लिपटते, कभी दीवारों से. फ़र्श पर निढाल हो, शून्य आंखों से छत को टकटकी लगाए घूरते. खून-पसीने की कमाई से बनाए अपने घर को बेच देने की टीस से उनके मन का संताप निरंतर बढ़ता जा रहा था. जब व्यग्रता का लावा मन में उबलने लगा, तो एक खंभे से लिपट फूट-फूटकर रो पड़े, “आज तुमने भी मेरा साथ छोड़ दिया. उस पर अपनी कमाई लुटाई, तुम पर भी… उसने तो कब का किनारा कर लिया… आज तुम भी धोखा दे गए…”“ऐसा मत कहो बाबूजी!” हठात् बनवारीलाल को लगा वो खंभा झूठे इल्ज़ाम की पीड़ा से तड़प उठा है. “हमने आपको कोई धोखा नहीं दिया… हमने तो आपका जीवन संवार दिया है.”“हां बाबूजी!”बनवारीलाल को लगा खंभे के साथ अब घर की दीवारें, खिड़की, दरवाज़े सब रो-रोकर गुहार लगा रहे हैं, “ज़रा गहराई से सोचो!… अब आपको किसी भी तरह की चिंता नहीं करनी पड़ेगी…”बनवारीलाल विस्फारित नज़र सोचने लगे. चालीस लाख में रंजन ने उनका घर ख़रीदा. पंद्रह लाख में उसकी एक मल्टीस्टोरी बिल्डिंग में फ्लैट दिलवा दिया. पंद्रह लाख की बैंक में एफडी, दस लाख में उसकी नई बन रही मल्टी में एक फ्लैट बुक कर दिया कि सालभर में मल्टी बनने पर भाव बढ़ने पर उसे बेच फिर दूसरी नई बिल्डिंग में बुक कर देंगे…!“अब सोचो बाबूजी… आपको ख़र्च की रत्ती भर भी चिंता रहेगी?” हतप्रभ् बनवारीलाल की बूढ़ी हड्डियों में जान आई. बेटे ने तो ‘बेजान जान’ यादों के कूड़ेदान में फेंक दिया था, लेकिन इस ‘बेजान’ घर ने उनमें जान डाल दी. बनवारीलाल अब आह्लाद से उन बेजान दीवारों-खंभों-खिड़कियों और दरवाज़ों को दीवानों की तरह चूमने लगे. “नहीं-नहीं, मेरे ‘प्रेमकुंज’, तुम बेजान नहीं, तुम तो अपने बाबूजी में जान डालनेवाले सच्चे सपूत हो!

  प्रकाश माहेश्‍वरी

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कहानी- शुभकामना (Short Story- Shubhkamna)

Short Story, Shubhkamna

 

Short Story, Shubhkamna

आज मनीषा को अपने जन्मदिन को लेकर कोई उत्साह नहीं है, लेकिन यह बच्ची कितने उत्साह से शुभकामना देने चली आई है. तमाम धिक्कार, तिरस्कार, अवरोध, प्रतिबंध को भूलकर. सम्प्रेषण की छोटी-सी कोशिश, इतना आराम और सुख दे देती है मनीषा को नहीं मालूम था.

बगीचे में आकर मनीषा को लगता है उसने ख़ुद को खोज निकाला है और इस संसार में उसका होना, होने की तरह दर्ज हो रहा है. वह क्यारियों को दुरुस्त करती है, लॉन में चहलक़दमी करती है. कभी लॉन के कोने में लगे झूले में बैठती है. ऊपर स्वच्छ आकाश है और फेंस के पार मकानों की छत पर लोग हैं, मैदान में खेलते बच्चे हैं. बच्चे, मनीषा को निरुत्साह करते हुए
अनायास याद दिला देते हैं कि वह संतानहीन है. वह यातना से गुज़रती है. एक शिशु… एक शिशु उसकी ज़िंदगी को फलदायी बना सकता है, पर… एक बच्चे के बिना सब कुछ अस्वाभाविक लगता है. बच्चे कितने हैं जैसा स्वाभाविक प्रश्‍न भी. प्रहार करते इस प्रश्‍न पर उसका चेहरा खिंचकर सख़्त होने लगता है.
“नहीं हैं.”
“नहीं हैं… राम-राम…”
यह दया भाव बताता है कि वह दूसरी स्त्रियों से भिन्न है.
“राम-राम करने जैसी क्या बात है?”
“वकील साहब दिनभर दफ़्तर में रहते हैं, बच्चे नहीं हैं. मैडम, आप घर में अकेली कैसे रह लेती हैं?”
हर वक्ता स्त्री को सख़्ती से देखती है, “उत्पात करते बच्चों को देखती हूं, तो बच्चे न होने का कोई अफ़सोस नहीं होता. मेरे बगीचे से बच्चे कभी अमरूद चुराते हैं, कभी गुलाब.”
किसी दिन मनीषा ने दस-बारह साल के लड़के को फूल चुराते हुए पकड़ा था. लड़के को रोते… मिन्नते करते… माफ़ी मांगते देख उसे क्रूर क़िस्म का सुख मिल रहा था.
मानो बच्चेवाली स्त्रियों से बदला ले रही हो. साथ के लड़के ने शायद पकड़े गए लड़के के घर में सूचित कर दिया था. बदहवास मां आकर खेद प्रगट करने लगी, “मैडम, कोई माता-पिता बच्चे को चोरी-डकैती नहीं सिखाते, पर ये पता नहीं कहां से सीख लेते हैं. हमसे तो बेऔलाद अच्छे…”
बेऔलाद! यह शब्द उसके भीतर प्रक्षेपास्त्र की तरह फूटा.
यदि वह सही समय और सही आयु में मां बनती, तो आज उसका बच्चा, इस अमरूद चोर लड़के की उम्र का होता. लेकिन तब उसे बच्चे से अधिक अपने अध्यापन में रुचि थी. उसने भार्गव से स्पष्ट कह दिया था, “अभी बच्चे नहीं होने चाहिए. मैं कॉलेज और बच्चे साथ-साथ मैनेज करने की स्थिति में नहीं हूं.” असावधानीवश गर्भवती हो गई, तो भार्गव के विरोध और चिकित्सक की सलाह पर बिल्कुल ध्यान न दे गर्भपात करा लिया. और तीस की आयु पार कर जब ललक उठी घर में किलकारी गूंजनी चाहिए, तब चिकित्सक की चेतावनी का सत्यापन होता जान पड़ा- पहला गर्भपात अक्सर गर्भधारण को कठिन बना देता है. तमाम जटिलताएं आती हैं. वह गर्भधारण नहीं कर पा रही थी. किया तो मिस कैरिज हो गया. फिर चार वर्ष बाद बच्ची ने गर्भकाल पूर्ण किया, लेकिन गर्भ में ही सड़ चुकी थी. फिर संभावना न बनी. मनीषा निरुपाय हुई और सफल अधिवक्ता भार्गव क़ानून की किताबों में बच्चा गोद लेने के अधिनियम देखने लगे. संबंधित अनुच्छेदों को पढ़ते-समझते भार्गव मनीषा को बहुत दीन लगते. भार्गव पिता बन सकते थे, उसकी ज़िद ने उनसे यह सुख
छीन लिया.
“भार्गव, तुम क्या बच्चा गोद लेने का विचार बना रहे हो?”
“विकल्प ही क्या है?”
“मेरी ज़िद बुरी थी, लेकिन मेडिकल साइंस कहता है कि अब किसी स्त्री की गोद सूनी नहीं रहेगी. तमाम विधियां हैं. पैसा लगेगा, लेकिन हमें कोशिश करनी चाहिए.”
“वह सब मुझे कृत्रिम, अप्राकृतिक लगता है. तकलीफ़देह भी. तुम चालीस पूरा कर रही हो. कमज़ोर हो गई हो. तुम्हारा स्वास्थ्य देखना ज़रूरी है.”
“थोड़ा रुको न. भगवान शायद हमारी सुन लें.”
“दरअसल, तुम भावुक हो रही हो. एक दिन मैंने एक पॉलिटिकल मैगज़ीन में कुछ दंपतियों के विचार पढ़े. ख़ासकर स्त्रियां अपने करियर को इतनी प्रमुखता दे रही हैं कि वे सेटल होने के बाद बड़ी उम्र में विवाह करती हैं. बच्चे करियर में बाधक होते हैं, इसलिए गर्भधारण न कर बाद में ज़रूरत मुताबिक़ बच्चा गोद ले लेना चाहती हैं. और ये दंपति ख़ुश हैं कि वे जनसंख्या विस्फोट का कारण नहीं बनेंगे.”
मनीषा ने बहुत निरीह होकर भार्गव को निहारा. क्या यह सायास है कि भार्गव मेरी भूल को इन दंपतियों के माध्यम से मुझे बताना चाहते हैं?
“मैं कितनी परेशान हूं भार्गव.”
“इसीलिए फैसले पर आना चाहता हूं. इन लोगों की मान्यता से मैं प्रेरित हुआ हूं. मनीषा, हमें बच्चा गोद ले लेना चाहिए. बच्चा रिश्तेदारी से आएगा या अनाथ आश्रम से, यह तुम डिसाइड करोगी.”
लेकिन मनीषा की आस नहीं टूटती.
“मैं गर्भवती हुई न? फिर हो सकती हूं. उम्र नहीं बीत गई. ऐसा न हो हम जल्दबाज़ी में बच्चा गोद ले लें, फिर अपना हो जाए, तो दत्तक के साथ ईमानदार न रहें या वह हमारे बच्चों के लिए संकट बने.”
“हां, पर…”
मनीषा कुछ न बोलती.
वह चुप रहने लगी है. बातें नहीं सूझतीं. कॉलेज से आकर घर में ़कैद हो जाती है. धूप ढलने की प्रतीक्षा करती है. ढलते ही बगीचे में आ जाती है. बगीचे में आई, तो देखा आउटर गेट पर एक मोटी स्त्री और छह-सात साल की बच्ची खड़ी है. मनीषा ने आते-जाते इस बच्ची को सड़क पर खेलते देखा है.
“कहिए?” मनीषा गेट पर आई.
“वह घर देखती हो, जहां छत पर कपड़े फैले हैं, हम वहां रहते हैं. यह नीली है, मैं इसकी दादी. गांव के बड़े घर में रहती हूं, तो मुझसे यहां दो कमरे में नहीं रहा जाता. जी घबरा रहा था, सो नीली को लेकर निकल पड़ी कि देखूं यह इतना सुंदर बगीचा किसका है.” वृद्धा इस तरह परिसंवाद करने लगी मानो पूर्व परिचित है. जबकि मनीषा किसी से परिचय नहीं बढ़ाती. लोग प्रश्‍न बहुत पूछते हैं.
“अंदर आ जाऊं?” मनीषा चुप थी, लेकिन
दादी-पोती गेट खोल दाख़िल हो गईं.
“इतने सारे फूल? झूला भी है? नीली झूलेगी?”
दादी ने कहा तो नीली झिझक गई.
मनीषा ने देखा गोल भरे चेहरेवाली मासूम बच्ची उसे उत्सुकता से ताक रही है.
दादी कहती रही, “नीली की मां बताती है तुम कॉलेज में पढ़ाती हो.”
“हां.”
“बताओ, इतना बड़ा घर-द्वार, बाग-बगीचा. भगवान बाल-बच्चा दे देता, तो बगीचा चमन हो जाता.”
वृद्धा ने अपनी समझ से मनीषा को सांत्वना देने जैसी बात की, लेकिन मनीषा के द्वैत और द्वंद्व ख़त्म नहीं होते.
“मैं आराम से हूं.”
वृद्धा को अब भी बुद्धि न आई.
“नीली संझाबेरी तुम्हारे पास आ जाया करेगी. तुम्हारा मन बहलेगा.”
मनीषा का दिलो-दिमाग़ झनझना गया. नीली उसके मन बहलाव का साधन बने उसे स्वीकार नहीं. सदाशयता, सहानुभूति, सहयोग नहीं चाहिए.
लेकिन नीली नहीं समझती थी यहां आकर वह मनीषा को नाराज़ करने जैसी कोशिश करेगी. झूला उसके लिए आकर्षण था और वह शाम को आने लगी.
“स्कूल से लौटकर यूनीफॉर्म बदली और आपके पास भाग आई. मां बोली कुछ खा लो, मैंने कहा पहले आंटी के पास हो आऊं.”
नीली ने कहा उत्साह से, पर देखा मनीषा उसकी बात सुनकर प्रसन्न नहीं है, बल्कि उसे अप्रिय भाव से देख रही है. इस घर में बच्चे होते, तो उनके बहाने यहां आना आसान हो जाता. नीली अपने स्तर पर मानो उपाय
करने लगी.
“आंटी, आपके घर में बच्चे नहीं हैं?”
मनीषा का चेहरा सख़्त हो गया, तो यह भी
मुझे कठघरे में खीचेंगी? घर में सुनती होगी मैं नि:संतान हूं, लेकिन लोग चिंतित क्यों हैं? कठोर था स्वर, “यहां बच्चे नहीं हैं. मत आया करो.”
“मैं आपके पास आती हूं.”

Short Story, Shubhkamna
मनीषा नहीं समझ पा रही है कि नीली के साथ किस तरह प्रस्तुत हो. नीली के प्रति निर्लिप्त रहती है, लेकिन कठोर होकर उसे आने से रोक नहीं पाती है. अनायास होता है, हम जिन नामालूम-सी बातों को अपनी दिनचर्या में सम्मिलित नहीं करना चाहते, वे सम्मिलित हो जाती हैं. नीली को देखकर मनीषा अनायास ईश्‍वर से प्रार्थना करने लगती है कि ऐसी ही सलोनी बच्ची मुझे चाहिए, लेकिन नीली की उपस्थिति त्रास भी देती है. यहां तक कि जब नीली ने आकर बताया उसका जन्मदिन आनेवाला है, तब भी मनीषा ने उत्साह से नहीं पूछा, कब?
नीली उसकी स्थिति-मनःस्थिति नहीं समझती. ख़ुद ही बता दिया.
“14 अक्टूबर. बस, एक हफ़्ता है. आंटी, आपका जन्मदिन कब है?”
“20 फरवरी.”
“मैं नोट बुक में नोट कर लूंगी. मैंने मां, पापा, भाई, फ्रेंड्स सबके बर्थडे नोट कर रखे हैं. सबको विश करती हूं.”
14 अक्टूबर की शाम नीली ऐसे आह्लाद और विश्‍वास के साथ आई मानो मनीषा को यह तारीख़ याद होगी. मनीषा को याद नहीं. नीली झूला न झूलकर उसके आस-पास मंडराने लगी, “आज मैंने क्लास में चॉकलेट बांटें.”
“क्यों?”
“भूल गईं? मेरा बर्थडे?”
अदा मासूम थी. मनीषा को कहना पड़ा.
“जन्मदिन शुभ हो नीली!”
साथ ही मनीषा ने पीला गुलाब तोड़ा और नीली को दिया.
नीली उन फूलों को बहुत ललचाकर देखती रही. वह गुलाब उसकी उपलब्धि थी.
“ब्यूटीफुल. मैं इस गुलाब को अपने भाई को दिखाऊंगी.”
यह पहली बार था जब मनीषा नीली के प्रति सजग हुई. बच्चे वस्तुत: मासूम, निश्छल और चंचल होते हैं. अपनी उपस्थिति से वातावरण को सहज बना देते हैं.
मान-अभिमान से मुक्त. तभी तो नीली ने स्मरण कराया उसका जन्मदिन है. कितनी क्रिया-प्रतिक्रिया. ईश्‍वर ऐसा ही बच्चा मेरा हो. अपने क्रियाकलापों से मुझे विभोर कर दे.
मेरा बच्चा.
और प्रार्थना के स्वर बिखर गए. नीली भ्रम है. स़िर्फ एक भ्रम. यह सुख और संतुष्टि नहीं दे सकती. मुझे इससे सुख नहीं चाहिए. एक क्षण ऐसा आया, जब लगा मनीषा ज़ोर से चीखेगी- ‘नीली तुम मेरी भावनाओं को उकसाने के लिए क्यों चली आती हो? तुम मुझे यातना देती हो. कल से मत आना.’
पर नीली कैसे समझेगी न आने देने का यह कैसा कारण है? वह तो मनीषा के भाव-अभिप्राय से निर्लिप्त रहकर उस पर विश्‍वास करने लगी है. शाम को एक फॉर्म लेकर आई, “आंटी, आज के अख़बार के साथ यह फॉर्म मिला है. आदित्य कंप्यूटर सेंटर का है. इसमें दिए टेन क्वेश्‍चन, जो बच्चा सॉल्व कर लेगा, उसे फ्री में कंप्यूटर सिखाया जाएगा. पापा स़िर्फ दो अन्सर बता पाए. आपसे सब बन जाएंगे. फिर मैं फ्री में कंप्यूटर सीख लूंगी. है न अच्छी बात?”
नीली ने पर्चा और पेन मनीषा को थमा दिया.
मनीषा कुल तीन प्रश्‍न हल कर पाई.
“बस तीन? आप भी पापा की तरह बुद्धू हैं. मैं कंप्यूटर नहीं सीख पाऊंगी.”
“मत सीख. मुझे बुद्धू कहती है. मैनर्स नहीं जानती.”
मनीषा ने कटु होकर पर्चा नीली की ओर फेंक दिया.
“सॉरी आंटी.” नीली पर्चा उठाकर चली गई.
पखवाड़ा गुज़रा. नीली नहीं आई. मनीषा चाहती है कि नीली न आए, लेकिन लग रहा है नीली जब तक रहती है, समय अच्छा गुज़रता है. क्या नीली के एहसास की आदत होती जा रही है? इससे लगाव विकसित करना ख़ुद को धोखा देना है. अब न आए तो ठीक. बेकार की घुसपैठ. नीली अठारहवें दिन आई. मनीषा को झूले पर बैठे देख इस तरह करतल ध्वनि में बोली मानो किसी बड़े को झूले पर बैठे देखना रोमांचक घटना हो, “आंटी, मैं आपको झुलाऊं?”
जवाब में मनीषा ने प्रश्‍न किया, “इतने दिन कहां थी?”
नीली उत्साहित हो गई, “हाफ ईयरली एग्ज़ाम थे. पापा बोले पढ़ो. आप मेरा इंतज़ार करती थीं?”
“हां… नहीं…”
यह नहीं है, तो लगता है इसे आना चाहिए, पर न आए तो अच्छा है. यह बच्ची विभ्रम है, छलावा. इससे भावनाएं जोड़कर कुछ हासिल नहीं होना है.
मनीषा नीली को टालने लगी. मैं नोट्स बना रही हूं, डिस्टर्ब मत करो… मेरी तबीयत ठीक नहीं है… बाहर जा रही हूं… सालाना इम्तिहान नज़दीक है, तुम पढ़ती क्यों नहीं?… नीली आती और उदास होकर लौट जाती. फिर उसने आना छोड़ दिया. दूर बच्चों के साथ खेलती दिख जाती.
दिनों बाद अचानक चली आई.
“तुम?” मनीषा के स्वर में अचरज था या आरोप वह स्वयं नहीं जानती.
“अभी चली जाऊंगी.” नीली तेज़ चाल से उसकी ओर बढ़ी आ रही थी.
धृष्ट लड़की रुक नहीं रही है. गंवार बच्चों को मुंह लगाओ, तो लिहाज़ भूल जाते हैं.
लिहाज़ भूल नीली ने स़फेद गुलाब तोड़ लिया.
“नीली, बेव़कूफ़…”
जब तक मनीषा नीली की ओर झपटती, नीली ने जींस की जेब से छोटा ग्रीटिंग कार्ड निकालकर उसके ऊपर गुलाब को रख लिया, “हैप्पी बर्थडे आंटी. मैंने कहा था न मैं आपका बर्थडे याद रखूंगी. मैं बड़ा कार्ड लेना चाहती थी. मां ने कहा महंगा है, छोटा लो. और मैं फूल भी अपने घर से लाती, पर मेरे घर में गेंदा है, गुलाब नहीं. लीजिए.”
दो छोटे हाथ मनीषा को बहुत कुछ सौंप रहे थे- छोटी-सी उम्मीद… नन्हा-सा विश्‍वास… एक कोमल सपना… ओह! यह मासूम मुद्रा. यह भोला भाव. मनीषा को नीली का जन्मदिन याद नहीं था और नीली ने याद दिलाया था. आज मनीषा को अपने जन्मदिन को लेकर कोई उत्साह नहीं है, लेकिन यह बच्ची कितने उत्साह से शुभकामना देने चली आई है. तमाम धिक्कार, तिरस्कार, अवरोध, प्रतिबंध को भूलकर. सम्प्रेषण की
छोटी-सी कोशिश, इतना आराम और सुख दे देती है मनीषा को नहीं मालूम था. वह पिघलकर एकदम नरम पड़ गई. इच्छा हुई नीली के हाथों को थाम ले. उसके स्पर्श को अपने भीतर जज़्ब होने दे. उसके वजूद को महसूस करे.
“नीली, तुम आई, मुझे अच्छा लगा.” मनीषा ने कार्ड व फूल लेते हुए नीली के हाथ थाम लिए.
मासूम मुलायम छुअन. यह स्पर्श कैसा अलौकिक है अब तक नहीं जाना. बच्चों को कभी अपने पास नहीं आने दिया. बच्चों का आस-पास होना तनाव और दबाव को किस तरह दूर कर देता है, कभी जानना नहीं चाहा और घुटती रही अपने बनाए अंधेरों में.
“मैं जाऊंगी.” नीली ने असहजता में हाथ छुड़ा लिए.
“रुको ना. कुछ खिलाती हूं.”
“नहीं. मां ने कहा है तुरंत वापस आना. मां काम करती है, तब मुझे भाई को संभालना पड़ता है. वह छोटा है न.”
मनीषा की इच्छा हुई कहे- ‘नीली रुको. मैं फुर्सत में हूं. मुझे नोट्स नहीं बनाने, कहीं नहीं जाना, तबीयत बिल्कुल ठीक है. रुको. रोज़ आया करो.’ नहीं कह सकी. नीली समझ लेगी बहाने से उसे भगाया जाता था.
मनीषा जाती हुई नीली को देखती रही. उसकी शुभकामना ने मनीषा को सकारात्मक ऊर्जा से भर दिया. भार्गव कचहरी से लौटे, तो कहेगी हमें अनाथ आश्रम से बच्चा गोद ले लेना चाहिए.

        सुषमा मुनींद्र

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कहानी- रिश्तों की बगिया (Short Story- Rishto ki Bagiya)

Short Story- Rishto ki Bagiya
Short Story- Rishto ki Bagiya

वो जल्द से जल्द घर पहुंचकर अपनी भूल सुधारना चाहती थी. अपनी रिश्तों की बगिया को आनेवाले तूफ़ान में बिखरने से रोकना चाहती थी. उसे एहसास हो गया था कि रिश्ते प्रेम, समर्पण व त्याग से मधुर बनते हैं. अपनापन ही रिश्तों को गूंथकर रखता है.

”दीदी, संजय का रिश्ता पक्का कर दिया है. दो माह बाद विवाह है. आपको एक महीने पहले ही आना पड़ेगा. अजय के विवाह का सारा काम आपने ही संभाला था, अब संजय का भी…”
वृंदा के उत्साह पर रोक दीदी के जवाब से लगी, “वृंदा, ये तो ख़ुशख़बरी है, पर मैं दो-तीन दिन के लिए ही आ सकूंगी.”
“क्या कह रही हो दीदी? मैं तो आपके भरोसे हूं. आप अजय के विवाह में भी तो एक माह पहले ही आ गई थीं, फिर संजय की शादी में पहले से क्यों नहीं आएंगी?”
दीदी हंसते हुए बोलीं, “वृंदा, तब की बात और थी. अब नटखट मोनू जो आ गया है. उसे नहीं छोड़ सकती.”
वृंदा भुनभुनाई, “उसे स्नेहा बहू संभाल लेगी. आपने क्या ठेका ले रखा है उसका.”
दीदी बोली, “कैसी बातें करती है वृंदा? स्नेहा अभी बच्ची है, बहुराष्ट्रीय कंपनी में काम करती है. अर्पित और स्नेहा सुबह आठ बजे घर से निकलते हैं और शाम सात-साढ़े सात बजे तक लौटते हैं. ऐसे में मोनू की देखभाल कौन करेगा?”
वृंदा क्रोधित हो उठी, “तो आजकल आपने ‘आया’ का काम संभाला हुआ है?”
दीदी ने समझाते हुए कहा, “नहीं वृंदा, आया है मोनू को संभालने को, पर उसकी निगरानी के लिए भी तो घर में किसी का होना ज़रूरी है. समझने की कोशिश कर, मैं ज़्यादा दिनों के लिए नहीं आ सकती. अजय के विवाह में मैंने दो डायरियां बनवाई थीं, उस में विवाह से सम्बंधित सभी ज़रूरी बातें नोट की थीं. उसी के आधार पर सारी तैयारियां कर लेना. मैं नहीं हूं तो क्या हुआ, तू अब अकेली नहीं है. निकिता बहू तेरे साथ है ही.”
फ़ोन रखते हुए वृंदा भुनभुना उठी, “जीजाजी के जाने के बाद बेचारी दीदी अपने ही घर में नौकरानी बनकर रह गई हैं. ये भला क्या बात हुई कि पोता हो गया तो वो कहीं आ-जा नहीं सकतीं. बहू अपने बच्चे को ख़ुद संभाले. मुझे भी पोती है, तो क्या मैंने नाते-रिश्तेदारों में आना-जाना बंद कर दिया? मेरी बहू भी नौकरी करती है, पर घर और बच्ची को भी संभालती है. बच्चे पैदा किए हैं, तो संभालने भी ख़ुद पड़ेंगे. हम नौकरी नहीं करते थे तो क्या हुआ, घर और बच्चे ख़ुद ही संभालते थे. हमारी सास नहीं संभालती थीं हमारे बच्चे.”
शाम को ऑफ़िस से आते ही वृंदा के उखड़े मूड को भांपकर पति निखिल बोल पड़े, “क्या बात है वृंदा, उर्मी दीदी से बात नहीं हो पाई क्या?”
वृंदा व्यंग्यात्मक स्वर में बोली, “बात तो हुई, पर दीदी का कहना है कि वो दो-तीन दिनों के लिए ही आएंगी. उनके बिना वहां पोते की देखभाल कौन करेगा?”
निखिल बोले, “उनका कहना उचित ही है. बेटा-बहू दोनों नौकरी पर जाते हैं. ऐसे में छोटे बच्चे को संभालने के लिए उनकी वहां ज़्यादा ज़रूरत है. कोई बात नहीं, बहू तो है ही तुम्हारे साथ. बहू की पसंद से ख़रीददारी होगी, तो छोटी बहू को भी पसंद आएगी. बच्चों और हमारी पसंद में काफ़ी फ़र्क़ है.”
वृंदा ने मुंह बिचकाया, “बहू को नौकरी और बच्ची से फुर्सत मिले तब तो और कुछ कर पाए. संजय के विवाह में सारी ख़रीददारी मेरी पसंद से होगी और वो मैं कर लूंगी. पर मैं उर्मी दीदी को लेकर परेशान हूं. जीजाजी के जाने के बाद उनकी हैसियत अपने ही घर में नौकरों जैसी हो गई है.”
निखिल असहज हो उठे, “कैसी बात करती हो वृंदा? अर्पित ऐसा लड़का नहीं है. उर्मी दीदी भी समझदार हैं, अर्पित की पसंद से ही उसका विवाह किया. ऐसे में बहू स्नेहा उनका अनादर करे, ये संभव नहीं है.”
वृंदा उत्तेजित होकर बोली, “तुम ये क्यों नहीं सोचते कि जीजाजी तो दुनिया में रहे नहीं, ऐसे में अर्पित की पसंद को मानना दीदी की मजबूरी रही होगी.”
निखिल बोले, “नहीं, अर्पित के विवाह में उर्मी दीदी बहुत ख़ुश थीं. कहीं से भी नहीं लगा कि उस रिश्ते से उन्हें कोई ऐतराज़ हो.”
वृंदा ने तर्क दिया, “तुमने देखा नहीं, विवाह के पांच दिन बाद ही बेटा-बहू दीदी को अकेली छोड़ हनीमून पर निकल गए थे.”
निखिल ने टोका, “तुम भूल रही हो वृंदा कि बेटे-बहू की हनीमून ट्रिप दीदी ने ही प्लान की थी और उन्हें सरप्राइज़ ग़िफ़्ट के तौर पर हनीमून टिकट दिए थे. तुम्हारी तरह नहीं, जिसने अपने बेटे-बहू का हनीमून ट्रिप रद्द करवाने की ठान ली थी.”
वृंदा बड़बड़ाई, “मैं बीमार पड़ गई थी, तो इसमें मेरा क्या कसूर? पर तुमने इसे भी मेरी बहानेबाज़ी ही माना. तभी तो बेटे-बहू को कह दिया कि ज़्यादा बीमार नहीं है तुम्हारी मां, तुम लोग जाओ, इसे देखने के लिए मैं हूं.”
वृंदा की बात सुनकर निखिल ठठाकर हंस पड़े और वृंदा झेंप मिटाने के लिए बड़बड़ाने लगी, “औरों के पति होते हैं, जो अपनी पत्नी का साथ देते हैं. तुम तो हमेशा ही बहू की तरफ़दारी करते आए हो.”
“क्या करता? नवविवाहितों को एक-दूसरे को समझने का यही समय तो मिलता है. फिर तो सारी ज़िंदगी घर-गृहस्थी के चक्करों में उलझकर रह जाते हैं.” निखिल बोले.
वृंदा फिर भुनभुनाई, “तो तुम कौन-सा मुझे हनीमून पर ले गए थे? बड़े दार्शनिक बनते रहते हो. अच्छा ये बताओ कि विवाह के लिए हॉल बुक हो गया या नहीं?”
निखिल ने जवाब दिया, “हां, हो गया. बैंडवाले को भी तय कर दिया है.”
समय मानो पंख लगाकर उड़ता रहा. उर्मी दीदी विवाह से ठीक दो दिन पहले आईं. वो भी अकेली ही. ‘अच्छा, तो अब बेटे-बहू पर उनका इतना भी अधिकार नहीं रहा. सगी मौसी के लड़के के विवाह पर आने के लिए भी राज़ी नहीं हुए.’ वृंदा ने सोचा.
उसकी चढ़ी त्यौरियों को देख उर्मी दीदी बोलीं, “मोनू अभी आठ माह का ही है, उसे मेरी ज़रूरत पड़ती है. यहां आने को हम सभी तैयार थे, हवाई जहाज़ की टिकट भी हो गई थी, पर मोनू को तेज़ बुखार हो गया. अर्पित और स्नेहा तो फिर भी आने को तैयार थे, पर शादी के घर में बच्चे की बीमारी संभलती नहीं, सो मैंने ही उन्हें मना कर दिया.”
‘बेचारी दीदी को झूठ पर झूठ बोलना पड़ रहा है.’ वृंदा को उनसे सहानुभूति होने लगी.
निखिल बोले, “इतने मुश्किल हालात में भी आप यहां आईं, ये क्या कम है.” तभी भारी-भरकम बनारसी साड़ी और ज़ेवरात से लदी-फदी निकिता आ गई. उसकी गोद में चुनमुन रो रही थी. वह उर्मी दीदी के पैर छूने को झुकी, तो उसके सिर से साड़ी का पल्लू गिर गया. वृंदा ने घूरती निगाहों से उसे देखा. निकिता घबराकर पल्लू ठीक करने लगी.
ये सब देख उर्मी दीदी के मुख से बेसाख़्ता निकल पड़ा, “इतनी गर्मी में बिटिया ये क्या पहन लिया तूने? ऊपर से बच्ची को गोद में उठाया हुआ है. ला, बच्ची मुझे दे. तू ऐसी साड़ी पहनकर आ, जो संभाल सके.”
निकिता बच्ची उन्हें पकड़ाकर तुरंत साड़ी बदलने चली गई. वृंदा धीरे से दीदी के कान में फुसफुसाई, “दीदी, इसे इतना सिर मत चढ़ाओ. मैंने ही इसे भारी साड़ी और भारी गहने पहनने को कहा था. घर में शादी है, दो-तीन दिन भारी साड़ी पहन लेगी तो कौन-सा पहाड़ टूट पड़ेगा. अपने ज़माने में हमने आठ-आठ किलो की साड़ियां नहीं पहनी थीं क्या? और आपने बच्ची को क्यों उठा लिया? मैं तो इसकी बच्ची नहीं संभालती. अरे पैदा किया है तो ख़ुद सम्भाले.”

Short Story- Rishto ki Bagiya
“इसकी बच्ची! क्या तेरी कुछ नहीं लगती? तेरे बेटे की बेटी है, तेरा अपना ख़ून. वृंदा, तू इतनी निष्ठुर कब से हो गई?”
वृंदा बोली, “दीदी, मैं बहू के चोंचले नहीं सह सकती. अब दूसरी बहू भी आ जाएगी, तो क्या मैं ‘क्रेच’ संभालने का काम करूंगी! मैंने तो अकेले अपने दोनों बेटे पाल-पोसकर बड़े किए. मज़ाल है कि मेरी सास ने कभी रसोई में या बच्चे पालने में मेरी मदद की हो. अब मेरा आराम करने का समय आया है, तो मैं क्यों फिर से मुसीबत मोल लूं.”
दीदी बोलीं, “वृंदा, जो सुख-सुविधाएं किन्हीं कारणों से हमें अपने समय में न मिल सकीं, वो सक्षम होने पर भी हम अपनी बहुओं को न दें, क्या ये अनुचित नहीं? हम दोनों को बेटी नहीं है, क्यों न हम इस कमी को बहुओं से पूरी कर लें. एक बार बहू को बेटी के नज़रिए से देखो, तो रिश्तों के मायने ही बदल जाएंगे, रिश्ते सुवासित हो उठेंगे.”
वृंदा उकताकर बोली, “बस-बस दीदी, बहू को बेटी समझने का ये नुस्ख़ा आपको ही मुबारक़ हो. मेरी बहू को बहू बनकर ही रहने दो. बहू को बेटी बनाने के चक्कर में आपकी क्या हालत हो गई है, क्या मैं नहीं जानती?”
दीदी मुस्कुराकर रह गईं. विवाह में वे हर समय निकिता व चुनमुन का ख़याल रखती रहीं. निकिता भी उनसे काफ़ी घुल-मिल गई. इन तीन दिनों में बार-बार फ़ोन पर बेटे-बहू व पोते का हाल-समाचार भी लेती रहीं. शादी निपटते ही वे चली गईं.
छोटी बहू चंचल अपने नामानुसार ही चंचल निकली. लेकिन जल्द ही वृंदा ने उसे वो सब समझा दिया, जो कभी बड़ी बहू से कहा था. मसलन- कटे-खुले बाल इस घर में नहीं चलेंगे. सिर से कभी पल्ला न हटे. सलवार-सूट पहनने का रिवाज़ हमारे यहां नहीं है. घर में खाना क्या बनेगा, इसकी चिंता करने की ज़रूरत तुम्हें नहीं है. घर में हर चीज़ अपने निर्धारित स्थान पर रखी है, उनमें अपनी मर्ज़ी से अदला-बदली करने की कोशिश न करना.
छोटी बहू चुप रही, पर उसके चेहरे से लगा कि उसे ये बातें पसंद नहीं आईं. वृंदा ने सोचा, ‘बड़ी को देखकर अपने आप ये भी लाइन पर आ जाएगी.’
दोनों बहुओं की गहरी छनने लगी. जब भी घर में होतीं, खुसुर-फुसुर करती रहतीं. पर वृंदा के आते ही उनकी बातों पर विराम लग जाता. इसी बीच एक बार चुनमुन की तबियत ख़राब हो गई और उसे संभालनेवाली आया भी नहीं आ रही थी. निकिता को छुट्टी नहीं मिली, तो छोटी बहू ने अपने ऑफ़िस से एक सप्ताह का अवकाश ले लिया. वृंदा को बड़ा आश्‍चर्य हुआ और उसने सोचा, ‘बड़ा प्यार दिखाया जा रहा है आपस में…’
एक रात खाने में देर होने पर वृंदा दोनों को डपटने के ख़याल से रसोईघर की तरफ़ बढ़ ही रही थी कि फुसफुसाहटें सुनकर बाहर ही रुक गई. छोटी बहू कह रही थी, “दीदी, कल मेरी छुट्टी ख़त्म हो जाएगी. आया तो काम पर आ गई है, पर चुनमुन की देखभाल के लिए घर का एक आदमी होना भी ज़रूरी है. मांजी तो इसकी तरफ़ ध्यान ही नहीं देतीं. ये भी नहीं देखतीं कि आया ने इसे ढंग से कुछ खिलाया-पिलाया भी है या नहीं. बच्ची चाहे भूख से रोती रहे, लेकिन उनकी पसंद का खाना न बने या बनने में ज़रा देर हो जाए, तो आसमान सिर पर उठा लेती हैं.”
मारे क्रोध के वृंदा का सर्वांग जलने लगा. छोटी की ये मज़ाल कि बड़ी को मेरे ख़िलाफ़ भड़काए! तभी बड़ी की फुसफुसाहट सुनाई दी, “तुम चिन्ता मत करो चंचल, तुम्हारे जेठजी भी परेशान हो चुके हैं. मां से तो कुछ कह नहीं पाते, इसलिए हम दोनों का ट्रांसफ़र मुम्बई ब्रांच में करवाने की कोशिश कर रहे हैं. मुम्बई में मुझे चुनमुन की चिन्ता नहीं रहेगी, वहां मेरी मां व छोटी बहन हैं. चुनमुन को देखने के लिए वो तरस गए हैं. वहां आया भी आसानी से मिल जाती है और वहां उर्मी मौसी जी भी हैं. सच, कितना फ़र्क़ है मांजी व उर्मी मौसीजी की सोच में.”
छोटी चहक उठी, “यही अच्छा है. सच, ऐसे माहौल में मैं तो अपने बच्चे को पालने की बात सोच भी नहीं सकती. दम घुटता है यहां. अपनी मर्ज़ी से न कुछ खा सकते हैं, न पहन सकते हैं. कहीं जा नहीं सकते, न किसी से हंस-बोल सकते हैं. ये भी कोई ज़िंदगी है. घर में भी हरदम तनाव रहता है.”
तो हालात यहां तक पहुंच गए. इन बहुओं ने मेरे श्रवण कुमार जैसे बेटों को भी पथभ्रष्ट करने की ठान ली है. इनका इलाज करना ही पड़ेगा. वृंदा इसी सोच में डूबी थी कि उर्मी दीदी की देवरानी का फ़ोन आ गया. अपने बेटे की सगाई का न्यौता दे रही थीं. उन्हीं से पता चला कि तीन ह़फ़्ते पहले सड़क पार करते समय उर्मी दीदी का एक्सीडेन्ट हो गया था.
वृंदा का दिल धक् से रह गया. इस बीच वह उन्हें फ़ोन नहीं कर पाई थी. मन में बुरे-बुरे विचार आने लगे. स्नेहा से अपने बच्चे ही नहीं संभलते तो वो सास को क्या संभालेगी? ये अर्पित कितना निष्ठुर है, मेरी बहन का इतना बड़ा एक्सीडेंट हो गया और मुझे ख़बर तक नहीं दी. शादी के बाद गिरगिट की तरह रंग बदल लिया है उसने. बड़ा कहता था कि तुम मेरी सबसे प्यारी मौसी हो. बेचारी दीदी की क्या गत बन गई होगी.
वृंदा ने तुरंत दीदी का नम्बर मिलाया, पर उधर से किसी महिला की अपरिचित आवाज़ सुनकर चौंकी, “उर्मी दीदी हैं?”
“जी वो सो रही हैं, आप कौन?”
“ये बताइए, आप कौन बोल रही हैं?” वृंदा ने प्रतिप्रश्‍न किया.
“मैं स्नेहा की मां बोल रही हूं.”
वृंदा ने फ़ोन काट दिया. तो बहू ने अपनी मां को बुला रखा है. ख़ुद महारानी नौकरी पर जाती होगी. वह निखिल के पीछे पड़ गई, “तुरंत मेरा मुम्बई का टिकट करवाओ. वहां जाकर स्नेहा की ऐसी ख़बर लूंगी कि उसे समझ में आ जाएगा कि सास क्या होती है. दीदी के सीधेपन को उनकी बेवकूफ़ी समझ लिया है उसने.”
निखिल समझाते हुए बोले, “टिकट तो मैं आज का ही करवा दूंगा, पर जाते ही वहां शुरू मत हो जाना. पहले वस्तुस्थिति का पता कर लेना.”
“तुम मेरा मुंह बंद मत करवाओ, कहे देती हूं. क्या मिला दीदी को बहू को बेटी बनाकर? भला बहू भी कभी बेटी बन सकती है!”
दीदी के घर पहुंचने पर स्नेहा की मां के दर्शन हुए. दीदी स्नेहा के साथ अस्पताल गई थीं. नन्हा मोनू नानी के साथ किलकारियां मारते हुए खेल रहा था. उन्होंने ही बताया कि दीदी के कंधे व सिर में चोट लगी थी. सिर से काफ़ी खून बह गया. डॉक्टर ने बेड रेस्ट बताया था. स्नेहा और अर्पित ने बारी-बारी से एक-एक ह़फ़्ते की छुट्टी ली थी. अब दीदी ठीक हैं. दिन में वो उनके पास आ जाती हैं और शाम को अपने घर चली जाती हैं. एक आया दिनभर बच्चे को देखती है और महरी पूरे दिन का चूल्हा-चौका कर जाती है.
स्नेहा की मां ये सब बता ही रही थीं कि दीदी आ गईं. स्नेहा साथ थी. उसने सलवार-कुर्ता पहना हुआ था. दीदी को देखकर वृंदा भौंचक्की रह गई. वो तो उनके कमज़ोर व बीमार रूप की कल्पना कर रही थी, पर दीदी पहले से ज़्यादा स्वस्थ लग रही थीं. दोनों सास-बहू नहीं, बल्कि मां-बेटी दिख रही थीं.
उसे अचानक आया देख दीदी प्रसन्न हो उठीं. दीदी के गले लगते हुए वृंदा बोली, “मैं इतनी पराई हो गई कि अपने एक्सीडेंट की ख़बर तक मुझे नहीं दी.”
दीदी बोलीं, “अर्पित ने कहा था कि वृंदा मौसी को बुला लें, पर मैंने ही मना कर दिया. बेकार तुझे परेशान करने का दिल नहीं किया. यहां स्नेहा और अर्पित तो हैं ही मेरा ध्यान रखने को. इन्होंने खिला-खिलाकर मुझे कुछ ज़्यादा ही तंदुरुस्त कर दिया है. बहुत ख़याल रखती है स्नेहा मेरा.”
स्नेहा ने कहा, “मां, आप हमारे लिए जितना करती हो, उसका रत्तीभर भी ऋण हम नहीं उतार सकते.”
दीदी अपनी समधन से बोलीं, “देखा कामनाजी, हमारी बेटी कैसी भारी-भरकम बातें करने लगी है!” दोनों ही घनिष्ठ सहेलियों की तरह हंसने लगीं.
दीदी के इतने घनिष्ठ रिश्ते देख वृंदा को उनसे ईर्ष्या हो आई. उसे याद आया, बड़ी बहू की मां चुनमुन के होने पर जब उनके घर आई थीं, तो दो दिन वृंदा ने उनसे ऐसी कलहपूर्ण बातें की थीं कि उसके बाद वो कभी उनके यहां आकर रहने की हिम्मत नहीं जुटा पाईं.
तभी दीदी बोलीं, “वृंदा, मैं तो मोनू को गोद उठाने को भी तरस गई हूं. ये लोग मुझे उठाने नहीं देते कि कहीं मेरा कंधा न दुखने लगे, पर तू सही समय पर आई है, स्नेहा ने मेरे ठीक होने के उपलक्ष्य में आज घर में सत्यनारायणजी की कथा रखी है.”
वृंदा ने देखा कि स्नेहा ने बड़े चाव से पूजा की तैयारियां कीं और पूजा के बाद अपने हाथ से सबसे पहले दीदी को प्रसाद खिलाया. रात को कमरे में स़िर्फ दीदी रह गईं, तो वृंदा ने कहा, “दीदी, आप कुछ दिन मेरे साथ चलो, आराम मिल जाएगा. दो-दो बहुएं हैं मेरी.”
दीदी ने मुस्कुराते हुए कहा, “वृंदा, मुझे यहां क्या तकलीफ़ है. एक बेटा था ही, भगवान ने बेटी की कमी भी स्नेहा के रूप में पूरी कर दी. सच कहूं तो स्नेहा ने जैसे मेरी देखभाल की, उसी से मुझे समझ में आया कि एक बेटी मां के लिए क्या मायने रखती है. मैं पूरी तरह सुखी व संतुष्ट हूं. तू बता, घर में सब कैसे हैं? तू तो मुझसे ज़्यादा सुखी होगी, बहुओं के रूप में दो बेटियां मिली हैं तुझे.” सुनकर वृंदा फीकी-सी हंसी हंस दी.
दूसरे दिन वृंदा अर्पित के पीछे ही पड़ गई, “बेटा, मेरी आज की ही हवाई जहाज़ की टिकट करवा दे.”
दीदी हैरानी से बोलीं, “इतने दिनों बाद आई है, कुछ दिन रुक जा.” अर्पित और स्नेहा ने भी बहुत कहा, पर वृंदा नहीं मानी. वो जल्द से जल्द घर पहुंचकर अपनी भूल सुधारना चाहती थी. अपनी रिश्तों की बगिया को आनेवाले तूफ़ान में बिखरने से रोकना चाहती थी. उसे एहसास हो गया था कि रिश्ते प्रेम, समर्पण व त्याग से मधुर बनते हैं. अपनापन ही रिश्तों को गूंथकर रखता है.
वृंदा सोच रही थी कि क़िस्मत ने तो उसे बहुओं के रूप में दो बेटियां दे दी हैं, अब वो भी उनकी मां बनने का प्रयत्न करेगी. नन्हीं चुनमुन को कलेजे से लगाने को उसका दिल अचानक ही बड़े ज़ोरों से मचलने लगा था.

   नीलिमा टिक्कू

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कहानी- हिचकियां (Short Story- Hichkiya)

Short Story, Hichkiya

 

 

 

 

 

 

Short Story, Hichkiya

‘‘वो याद कर रही होगी!’’ कहते-न-कहते पार्वती के चेहरे पर एक अजीब-सा तनाव उभर आया… सहसा महेन्द्र बाबू को
भी कुछ स्मरण हो आया और वे बजाय सुबह-सुबह पत्नी से उलझने के, एकदम ख़ामोश से हो गए.

‘नहीं, महान प्रेम कथाएं स़िर्फ फ़िल्मों में ही नहीं होतीं, ज़िंदगी में भी होती हैं…’ उगते लाल सूरज के साथ ही टहलकर लौटे महेन्द्र बाबू के दिमाग़ में यह वाक्य न जाने क्यों कौंधा. पार्वती ने बाहर के चबूतरे पर नाश्ते की सारी सामग्री सजाकर हमेशा की तरह तैयार कर दी थी- छोटी मेज़ पर केतली में गरम चाय, दो कप, प्लेट में नमकीन, काजू, किशमिश, कटोरी में पानी में भीगी अंजीरें और मुनक्के, एक तरफ़ तह किया हुआ अख़बार…
चौथी सीढ़ी पर पांव रख जैसे ही उन्होंने फाटक के कुंडे को खोला, पार्वती भीतर से बाहर आ गई. बाहर से आते ही उन्हें बाथरूम जाना पड़ता है. हाथ-मुंह धो तौलिए से पोंछते बाहर आए तब तक पार्वती कुर्सी पर बैठी उनकी प्रतीक्षा करने लगी थी. महेन्द्र बाबू खाली कुर्सी पर बैठे तो अचानक उन्हें हिचकियां शुरू हो गईं. हिचकियां लेते हुए वे मुस्कुरा दिए, ‘‘तुम्हें तो हिचकियां तब आती हैं, जब तुम्हारे बच्चे तुम्हें यहां या दिल्ली में याद करते हैं. पता नहीं क्यों, आज मुझे आ रही है!’’
‘‘वो याद कर रही होगी!’’ कहते-कहते पार्वती के चेहरे पर एक अजीब-सा तनाव उभर आया… सहसा महेन्द्र बाबू को भी कुछ स्मरण हो आया और वे बजाय सुबह-सुबह पत्नी से उलझने के, एकदम ख़ामोश से हो गए.
सुबह की गुनगुनी धूप, गरम चाय की चुस्कियां और न रुकनेवाली हिचकियां… कहीं उन्होंने पढ़ा था, हिचकियों को गंभीरता से लेना चाहिए. ये हृदय रोग की पहचान होती हैं, पर मान्यता तो कुछ और ही है… पत्नी से न उलझना पड़े, इसलिए उन्होंने एक हाथ में अख़बार थाम चश्मे को ठीक किया और मोटे-मोटे शीर्षकों पर नज़र दौड़ाने लगे. उन्हें ख़बरें पढ़ने-देखने का बेहद शौक़ था. उन्हें ख़बरें पढ़ने में मशगूल होते देख, चिढ़कर पार्वती ने कहा, ‘‘ख़बरें पढ़ते-देखते ऊब नहीं जाते?’’ असल में वह कोई न कोई सीरियल या फ़िल्म देखना पसंद करती है, जबकि वे स़िर्फ ख़बरें… शायद सोच और नज़रिए में ही बहुत फ़र्क़ है, इसी कारण उनकी पत्नी से कभी बनी नहीं. हमेशा छत्तीस का आंकड़ा रहा. एक पूरब तो दूसरा पश्‍चिम. जीवनभर न बनने के बावजूद जीवन संग-संग काट लिया! है न हैरत की बात.
आजकल की पीढ़ी इतने मतभेदों के बावजूद साथ काटेगी ज़िंदगी? हरगिज़ नहीं. पहले दिन झगड़ेंगे. दूसरे दिन कोर्ट-कचहरी करने लगेंगे. पर वे पार्वती के साथ पूरे चालीस साल काट ले गए और मतभेदों के बावजूद पार्वती ने भी कभी अलग होने की उन्हें धमकी नहीं दी, न रूठकर मायके जा बैठी, न मां-बाप और रिश्तेदारों से कभी कोई शिकायत की. ऐसा भी नहीं कि वह लड़ी-झगड़ी नहीं. ख़ूब झगड़ा हुआ, फिर भी… अख़बार में उनका मन क़तई नहीं लगा.
‘‘बजाय गरम चाय के पानी पी लेते, तो शायद हिचकियां बंद हो जातीं.’’ पार्वती ने सुझाया, ‘‘कहो तो चीनी के दाने लाऊं? फांक लो, हिचकियां बंद हो जाएंगी. कम्बख़्त यहां भी तुम्हें चैन नहीं लेने देती. सुबह-सुबह ही याद करने बैठ गई, जैसे और कोई काम ही नहीं है उसे सिवा तुम्हें याद करने के!’’
पार्वती जान-बूझकर तीखे वाक्य कह रही थी, जिससे वे उससे उलझ जाएं, पर इधर उन्होंने चुप रहना सीख लिया है. अब शेष बची ज़िंदगी इसी के साथ गुज़ारनी है तो क्यों उलझें इससे? विषय बदलने के लिए पूछा, ‘‘लड़का अभी उठा कि नहीं?’’
‘‘अभी सुबह छः बजे तो प्लांट से आया है. दस-ग्यारह बजे से पहले क्या उठेगा? आख़िर रातभर का जागा हुआ है, कुछ नींद भी ज़रूरी है. बड़ी कठिन नौकरी है. सुसरी कभी रात भर डयूटी, कभी दिनभर, न खाने का कोई निश्‍चित व़़क्त, न सोने-बैठने का. कभी-कभी तो दो-दो पालियों में डयूटी लगा देते हैं ऊपर के अफ़सर. यह भी कोई नौकरी हुई!’’ पार्वती बड़बड़ाकर प्लांट की नौकरी और अफ़सरों को कोसती रही, पर हिचकियां लेते महेन्द्र कुछ और ही सोचते रहे. अच्छा हुआ जो पार्वती का ध्यान उन्होंने किसी और तरफ़ मोड़ दिया, अब वे कुछ और सोच सकते हैं.

हिचकियां तभी आती हैं, जब कोई अपना याद करता है. यह एहसास भर आदमी को किस क़दर ख़ुश कर देता है. इस नरम गुनगुनी धूप की तरह तन-मन को गरम कर देता है. उत्फुल्लता और प्रसन्नता के एहसास से पोर-पोर खिल और खुल उठता है. आज की भागदौड़भरी व्यस्त ज़िंदगी में कहीं कोई है, जो आपको याद कर रहा है. कितना मधुर एहसास है यह! किसी की यादों में आप हैं, आदमी हो या औरत, यह किस क़दर उसे प्रसन्नता और ख़ुशी से भर देता है. पार्वती कभी इसे महसूस कर सकेगी? शायद कभी नहीं. मुल्ला की दौड़ मस्जिद तक, अगर उसे हिचकियां आएंगी, तो वह सोचेगी कि उसे बेटी याद कर रही है या बेटी के बच्चे या फिर यहां दूर नौकरी कर रहा बेटा और उसकी बहू!
ज़िंदगी में जिसने कभी किसी को प्यार नहीं किया, शायद उसने ज़िंदगी के बहुत बड़े एहसास को जिया ही नहीं! ज़िंदगी को सही मायने में वही समझ पाया, जिसने जीवन में कभी किसी को प्यार किया. जिसके पांव में प्रेम-प्यार की बिवाई कभी नहीं फटी, वह उसकी पीर को क्या जाने?
कहां होगी मरीना इस वक्त…? वे वहां से भाग कर यहां क्यों आए? शायद वे वो सब बर्दाश्त नहीं कर सकते थे. वो सब- मरीना की शादी… मरीना का वहीं हनीमून पर जाना, जहां कभी वह उनके साथ रही… और वहां तो ढंग का स़िर्फ वही होटल है. निश्‍चित ही वह उसी होटल में अपने पति के साथ ठहरेगी. क्या मालूम उसी कमरे में ठहरे और उसी पलंग पर पति की बांहों में रात भर अलसाई पड़ी रहे, जिस तरह उस रात वह उनके साथ, उनकी बांहों में पड़ी रही थी. उस दिन अपनी शादी का कार्ड देने वह ख़ुद आई थी.
आदर से बैठाया था उसे, ‘‘तो आख़िर तुमने उससे शादी का फैसला कर ही लिया?’’
‘‘किसी से तो करनी ही थी.’’ वह उदास हो गई थी, ‘‘लड़की अगर उससे शादी न कर पाए, जिसे वह प्यार करती है, तो फिर उससे शादी करना ठीक रहता है, जो उसे प्यार करता हो… प्रबोध को तो आप जानते है. वह मुझे पागलों की तरह प्यार करता है. एकदम दीवाना है मेरा.’’
न चाहते हुए भी एक खिसियाहट-सी उभर आई उनके चेहरे पर, ‘‘एक प्रबोध ही तुम्हारा दीवाना कहां है मरीना? पता नहीं कितने दीवाने हैं तुम्हारे. मेरा नाम भी उन्हीं में है… हृदय के चार कक्ष होते हैं आदमी में… मैं चाहूंगा कि अगर एक कक्ष में तुम प्रबोध को जगह दो, एक में अपने होनेवाले बच्चों को और एक में अपने माता-पिता, दोस्तों व सास-ससुर को, तो एक कक्ष में कहीं मुझे भी बनाए रखना. बोलो, रख सकोगी मुझे ताज़िंदगी उस एक कक्ष में…? कुछ और नहीं चाहिए मुझे तुमसे. स़िर्फ यह वचन काफ़ी है कि कहीं तुम्हारी ज़िंदगी में मैं भी हूं और रहूंगा.’’
पता नहीं क्या सोचती हुई देर तक चुप बैठी रही मरीना. वे ख़ुद नहीं सोच पाए कि जब सब कुछ ख़त्म हो गया है तो मरीना से अब और कहा भी क्या जाए? किसी तरह सहज होने का ढोंग करते हुए हंसे, ‘‘चाय पिओगी.’’
‘‘कहां हैं वे? यहीं हैं कि कहीं गई हुई हैं?’’ वह घर में भीतर की तरफ़ देखने लगी.
‘‘बेटी के पास दिल्ली गईं हैं.’’ वे बोले.
‘‘तब तो चाय आपको बनानी पड़ेगी. रहने दीजिए. फिर कभी पी लूंगी, उधार रही इस बार की चाय.’’ हंसने लगी वह.
महेन्द्र ख़ामोश अपलक देर तक ताकते बैठे रहे- कितनी खनकती हुई प्यारी हंसी हंसती है मरीना. चमकता, दिप-दिप करता रूपवान चेहरा, चांदनी में धुले स़फेद चमकते दांत. हंसते व़़क्त गालों में पड़ने वाले गड्ढे, काली कजरारी बड़ी-बड़ी आंखें और खुले आवारा क़िस्म के चमकते बाल.. पहले वह दो चोटियां करती थी, कस्बाई शहरों की लड़कियों की तरह… और लंबा कुर्ता व सलवार, सादा चप्पलें. पर अब… जीन्स और टॉप, ऊंची हील के सैंडिल, कटे-छटे संवरे बाल, नामालूम-सी अधरों पर लिपस्टिक, झील-सी गहरी और चमकती आंखों को काली कोरों से ठीक धार देना, पतली कमानी दार भौंहें…
‘‘आश्‍चर्य है, उस महानगर में तुम पर मॉडल बनानेवालों की नज़र क्यों नहीं पड़ी? कोई भी देखता तो तुम्हें कैमरे में कैद कर लेता.’’ वे कह बैठे थे.
‘‘नज़रें तो पड़ीं, पर मैंने ही इनकार कर दिया.’’ वह हंसने लगी,’’
‘‘जब वहां पढ़ाई के दौरान तुम्हारे पांव में चोट लगी और फ्रैक्चर हुआ, उस व़़क्त प्रबोध ने तुम्हारी बहुत मदद की शायद.’’
‘‘आपको कैसे पता चला?’’ वह हंसती हुई सामने ताकती रही.

Short Story, Hichkiya
‘‘तुम्हारी शायद ही कोई बात हो, जो मुझे पता न चल जाती हो. असल में मेरा दिल, मेरा दिमाग़, मेरी भावनाएं, मेरा मन, मेरा मस्तिष्क सब कुछ सदा तुम्हारे आसपास बना रहता है.’’ वे एकाएक भावुक हो उठे थे, हालांकि अब इस तरह की भावुकता शायद मरीना को पसंद भी न रही हो. पहले वह ऐसी भावुकता भरी बातों से लजाती और ख़ुश होती रहती थी. उनके कहे का अब उस पर जैसे कोई असर ही नहीं हुआ.
‘‘आप मुझे याद यहां करते हैं और हिचकियां मुझे वहां आती हैं. सच, जब आपका नाम लेती हूं, तभी बंद होती हैं. क्यों करते हैं आप इस तरह हैरान मुझे?’’
‘‘मेरे याद करने से भी अब तुम्हें तकलीफ़ होने लगी मरीना?’’ कहते हुए महेन्द्र गंभीर हो गए, ‘‘हैरान और परेशान तो मैं होता हूं तुम्हारे कारण. तुम्हें चोट वहां लगी और मेरे पांव में यहां दर्द होता रहा. समझ सकोगी कभी यह?’’
सिर झुकाए मुस्कुराती बैठी रही वह देर तक चुप, फिर बोली, ”प्रबोध को मैं उस तरह नहीं चाहती, जैसे कभी आपको चाहा, पर प्रबोध बहुत पीछे पड़ गया और घरवाले भी चाहते हैं कि मैं शादी कर लूं. आप हिम्मत नहीं जुटा पाए. पत्नी का क्या करें, बच्चे क्या कहेंगे. आपके सामने अपने ये संकट बने रहे. मैं भी एक औरत हूं और औरत के दुख को समझ सकती हूं. आपकी पत्नी आपसे अलग होकर कैसे रहतीं, क्या करतीं, बच्चे उन्हें अपने साथ रखते या दुत्कार देते. इस उम्र में वे कहां जातीं? ये सब ठीक नहीं था. अपने सुख के लिए, अपनी ख़ुशी के लिए किसी को उजाड़ना… नहीं, मेरे जैसी लड़की ये सब बर्दाश्त नहीं कर पाती. आप से ज़्यादा मुझे कौन जानता है भला? बताइए, मैं बर्दाश्त कर पाती आपकी पत्नी का उजड़ना…? यही सब सोचकर अपने आप को अलग कर लिया मैंने. बहुत दिनों तक मन में द्वंद्व चला, उचित-अनुचित पर विचार करती रही, कई-कई रातें जागी. प्रबोध भी चकराया करता था. हंसता रहता था कि क्या सोचती रहती हो तुम छत की तरफ़ ताकती हुई हर व़़क्त. अब उसे क्या बताती कि मैं कहां-कहां भटकती रहती हूं.’’
कुछ देर को चुप रही वह. वे भी अपलक उसकी तरफ़ ताकते रहे, उसे कहने का अवसर देते हुए. अपने मन को तो वे जानते हैं, दूसरे के मन को भी तो जानें. जब वह कुछ न बोली तो पूछ बैठे, ‘‘झूठ कह रही हो या मुझे धोखा दे रही हो?’’
‘‘आपको लगता है कि मैं आपसे कोई बात झूठ कह सकती हूं? आपको धोखा देने की बात मैं सोच सकती हूं कभी?’’ वह गंभीर हो गई.
‘‘ख़ैर, हनीमून के लिए कहां जाओगी?’’
‘‘उसी जगह के लिए प्रबोध ज़िद कर रहा है.. और वहां मैं जाना नहीं चाहती. एक ही होटल है वहां, जिसमें ठहरना होगा और वहां मैं आपके साथ रही थी. वह सब कुछ याद आता रहेगा और मैं प्रबोध के साथ सहज नहीं हो पाऊंगी.’’
‘‘झूठ बोलना ख़ूब आ गया है तुम्हें मरीना, बहुत चालाक हो गई हो. महानगर की चमक-दमक में रहकर. ठीक है भई, बना लो मुझे बेवकूफ़.’’
सहसा वह उठ गई कुर्सी से, ‘‘रहने दीजिए, आप इस तरह अविश्‍वास कर मेरी सच्ची भावनाओं की नाकद्री कर रहे हैं, मेरे प्यार का मज़ाक उड़ा रहे हैं आप.’’ उसके साथ वे भी उठ खड़े हुए, उसे बाहर तक छोड़ने जाने के लिए.
सो कर उठने पर लड़का चाय का कप हाथ में लिए उनके कमरे में आया, ‘‘पापा, आप मम्मी के साथ हरिद्वार और ॠषिकेश घूम आइए. मैंने ड्राइवर का इंतज़ाम कर दिया है, वह आप लोगों को लिवा जाएगा. आप दो-चार दिन या एक सप्ताह जितने दिन मन हो, वहां रह आइए.’’
‘‘एक सप्ताह तक वहां ड्राइवर संग बना रहेगा क्या?’’ पार्वती ने पूछा. ‘‘अगर आप लोग वहां किसी अच्छे आश्रम में ठहर जाएं, तो ड्राइवर आप लोगों को छोड़कर आ जाएगा यहां. फिर आप जब फ़ोन करेंगे, उसे लेने भेज देंगे.’’
‘‘ठीक रहेगा.’’ पार्वती ने ही कहा, ‘‘हमें वहां गाड़ी की ज़रूरत भी नहीं होगी. आश्रम से गंगा तक घूमना और फिर वापस आश्रम में पहुंच जाना.’’
सहसा उन्हें लगा जैसे सब कुछ उन पर थोपा जा रहा है. उनके हाथ में जैसे अब कुछ न रह गया हो. वैसे ही, जैसे मरीना का पढ़ने उस महानगर में चले जाना. फिर वहां प्रबोध के संपर्क में आ जाना, फिर उसका उससे शादी के लिए तैयार हो जाना, फिर उन्हें शादी का कार्ड देने आना… और अब बेटे का उन्हें जबरन हरिद्वार और ॠषिकेश जैसे तीर्थ पर भेज देना और पत्नी पार्वती द्वारा उसे स्वीकार कर लेना… क्या आदमी सचमुच किसी अदृश्य शक्ति के वशीभूत होता है? वही उससे सब कुछ कराती है? क्या उसके हाथ में कुछ नहीं होता?
वे चुप बैठे सोचते रहे देर तक… अगर जाना ही है, तो वहीं क्यों न जाएं, जहां मरीना प्रबोध के साथ इस व़़क्त हनीमून पर गई हुई है? लेकिन वहां जाना क्या उचित होगा? नहीं, ठीक नहीं होगा. अनुचित होगा यह.
‘‘क्यों…? कहां खो गए…?’’ पार्वती ने ख़ुशी से पूछा, ‘‘अरसा हो गया, हम लोग किसी तीर्थ पर गए भी नहीं… हां कहे देते हैं हम.’’
हम? यानी इस हम में उसने उन्हें अपने आप ही शामिल कर लिया है. लेकिन वे उसके साथ शामिल तो हमेशा रहे, चाहे-अनचाहे…

– दिनेश पालीवाल

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कहानी- और वो चला गया (Short Story- Aur Woh Chala Gaya)

hort Story, Aur Woh Chala Gaya

 

short Story, Aur Woh Chala Gaya

स्वप्निल अब उसके लिए इस तरह हो गया था, जिस पर न कोई अधिकार है, न उलाहना. प्रेम अब भी उसे ही करती है, पर इस तरह नहीं जैसे एक औरत मर्द को प्रेम करती है, बल्कि इस तरह जैसे कोई इंसान ईश्‍वर से प्रेम करता है.

यह कहानी है एक औरत की, जिसमें वही चेतना बसती थी, जो आम औरतों में होती है. बस, उसकी क़िस्म अलग थी… उसका नाम था ‘तितिक्षा’. उसने प्रहर सचदेवा के साथ घर बसाया था, लेकिन एक अबूझ कसक हमेशा उसके मन में बनी रहती. कैसा विचित्र जुड़ाव था वो? काया का संपूर्ण समर्पण भाव था, पर मन फिर रह-रहकर इस कदर उचाट क्यों हो जाता था? पति के सारे काम करना, लोगों से बातें करना, पति के मित्रों से मिलना- ये सारे काम आराम से करती थी. पर ये सब करते हुए भी एक बेचैनी-सी पूरे अस्तित्व पर छाई ही रहती थी.
तितिक्षा अति संवेदनशील थी- ख़ुद के प्रति भी और दूसरों के प्रति भी. उसका मानना था कि भावनाओं की अभिव्यक्ति एक कला है, जो जीवन से धीरे-धीरे सीखी जा सकती है.
अक्सर वह एक सपना देखती है कि वो दौड़ रही है, उसके पीछे लोग दौड़ रहे हैं और अंत में सामने समंदर है, लोग हंस रहे हैं और पूछते हैं, “अब कहां जाओगी?” घबराकर वह पानी पर पैर रखती है, तो देखती है कि पानी तो नर्म बिछौने जैसा है और वो बड़ी सहजता से पानी पर चलती जा रही है. उस पार कोई है, जो बांहें फैलाए उसकी प्रतीक्षा में खड़ा है, लेकिन उसका चेहरा साफ़-साफ़ नज़र नहीं आ रहा है.
शुरू-शुरू में वह इस सपने से चौंक पड़ती थी, फिर धीरे-धीरे उसे लगने लगा था कि उसके शरीर में एक नहीं, दो स्त्रियां हैं. एक- जिसका नाम तितिक्षा था, जो किसी की बेटी थी, श्री प्रहर सचदेवा की पत्नी थी, जिसकी जाति हिंदू थी, देश भारत था और जिस पर कई नियम-क़ानून लागू होते थे. और दूसरी- जिसका नाम औरत के सिवा और कुछ न था, जो धरती की बेटी थी और आकाश का वर ढूंढ़ रही थी, जिसका धर्म प्रेम था और देश-दुनिया थी और जिस पर एक ‘तलाश’ को छोड़ कोई नियम-क़ानून लागू नहीं होता था. फिर धीरे-धीरे उसे इस स्वप्न में आनंद आने लगा.

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फिर एक दिन अचानक एक घटना घटी. वह किसी के घर गई थी. वहीं एक व्यक्ति से मुलाक़ात हुई. शक्ल-सूरत, क़द-काठी सामान्य थी, मगर उसकी आंखें बिल्कुल उसके सपनोंवाले बुत की तरह थीं- गहरी और बोलती हुई. वह कितनी देर उसे देखती रही थी. फिर पता चला कि उसका नाम स्वप्निल था. तितिक्षा ने चिकोटी काटी ख़ुद को कि कहीं यह सपना तो नहीं था. मेरा मन शायद वर्षों से कुछ मांग रहा था. सूखे पड़े जीवन के लिए मांग रहा था- थोड़ा पानी और अचानक बिन मांगे ही सुख की मूसलाधार बारिश मिल गई.
अब उसमें बदलाव आने लगा था. जब एक तितिक्षा अपने पति के पास बैठी होती, दूसरी स्वप्निल के पास बैठी होती. एक तितिक्षा के पास शरीर का अस्तित्व था, दूसरी तितिक्षा के पास कल्पनाओं की अपनी दुनिया थी.
अब वह कल्पना की जगह सचमुच स्वप्निल से बातें करना चाहती थी, उससे मिलना चाहती थी. फिर एक दिन उसने दोस्तों के साथ स्वप्निल को भी चाय पर बुलाया. सभी गपशप कर रहे थे, तभी एक मित्र ने कहा, “मेज़बान की तारीफ़ में सभी लोग एक-एक वाक्य काग़ज़ पर लिखकर दें. देखें, कौन कितना अच्छा लिखता है?” सभी ने लिखकर दिया, जब स्वप्निल की बारी आई, तो उसने हाथ में ली हुई क़लम से खेलते हुए तितिक्षा की तरफ़ देखा और धीरे से तितिक्षा के कान के पास आकर बोला, “मुझे लिखना नहीं आता, क्योंकि किसी के दिल की कोई भाषा नहीं होती. मुझे तो बस आंखों की भाषा पढ़नी आती है.” और तितिक्षा ने पहली बार जाना कि आंखें मौन रहकर भी कितनी स्पष्ट बातें कर जाती हैं और वह कांप गई थी. मगर उसने महसूस किया कि बचपन से जिस उदासी ने उसके अंदर डेरा जमा रखा था, वो आज दूर चली गई थी. एक उत्साह, एक उमंग-सी भर गई थी उसके रोम-रोम में.
सबके चले जाने के बाद तितिक्षा ने स्वप्निल के जूठे प्याले में बची हुई ठंडी चाय का घूंट लेकर सोचा कि क्या मैं दीवानी हो गई हूं? जैसे उसने एक ऐसी वस्तु का आस्वादन कर लिया था, जो पहले कभी नहीं पी थी. फिर ख़ामोशी से कितने ही दिन बीत गए.
एक शाम वो घर में अकेली थी कि दरवाज़े पर दस्तक हुई, दरवाज़ा खोला तो सामने स्वप्निल खड़ा था. उसकी जो दृष्टि तितिक्षा की ओर उठी थी, वह असावधान नहीं थी, वह मूक भी नहीं थी. आंखों में ज़ुबान उग आई थी. वह एक पुरुष की मुग्ध दृष्टि थी, जो नारी के सौंदर्य के भाव से दीप्त थी. दृष्टि तितिक्षा की आंखों पर टिकी थी. उसकी आंखें झुक गईं, पर वह इस तथ्य के प्रति पूरी सचेत थी कि स्वप्निल की दृष्टि ने अब संकोच छोड़ दिया है. वह ढीठ हो गई है. उसकी दृष्टि जैसे देखती नहीं थी, छूती थी. वह जहां से होकर बढ़ती थी जैसे रोम-रोम को सहला जाती थी. तितिक्षा का शरीर थर-थर कांप रहा था. उसकी समझ में बिल्कुल नहीं आ रहा था कि उसका मन इतना घबरा क्यों रहा है? वह पहली बार किसी पुरुष से नहीं मिली थी, न ही पहली बार किसी पुरुष के सान्निध्य में आई थी. उसने पुरुष दृष्टि का न जाने कितनी बार सामना किया था, मगर ये दृष्टि उसे व्याकुल कर रही थी. स्वप्निल की दृष्टि में प्रशंसा थी और वह प्रशंसा तितिक्षा के शरीर को जितना पिघला रही थी, उसका मन उतना ही घबरा रहा था.
“आप बहुत सुंदर हैं, तन और मन दोनों से.” स्वप्निल ने धीरे-से मुस्कुराते हुए कहा. अपने रूप की प्रशंसा सबको अच्छी लगती है. युवक उसके रूप की प्रशंसा कर रहा था और वह ऐसे भयभीत थी, जैसे कोई संकट आ गया हो. वह सम्मोहित-सी देखती रही. पर उसका विवेक लगातार हाथ में चाबुक लिए उसे पीट रहा था, ‘यह ठीक नहीं है तितिक्षा! ये ठीक नहीं है! संभल जा.’
तभी स्वप्निल ने कहा, “उस दिन ग़लती से आपकी क़लम मेरे पास रह गई थी.” उसने कलम निकालकर तितिक्षा की ओर बढ़ा दी. मुहब्बत में सारी शक्तियां होती हैं, एक बस बोलने की शक्ति नहीं होती! तितिक्षा ने इतना ही कहा, “यह जहां है, इसे वहीं रहने दीजिए ना!”
“तभी इतने दिनों तक लौटाने नहीं आया था.” उसने शरारतभरी निगाहों से कहा. थोड़ा आगे झुककर उसे ध्यान से देखा और बोला, “आप अपना महत्व नहीं जानतीं, कैसे जानेंगी? आपके पास अपनी नज़र है मेरी नहीं. मेरी नज़रों से देखेंगी तो जानेंगी कि आप क्या हैं? पता है, आपको देखा तो मुझे यह समझ में आया कि मां की आवश्यकता पुरुष को तभी तक होती है, जब तक वो अबोध होता है. बोध होने पर उसे मां नहीं, प्रियतमा की आवश्यकता होती है, जिससे वो अपने वयस्क प्रेम की प्रतिध्वनि पा सके.” और हाथ की सिगरेट बुझाकर उसने तितिक्षा की ओर इतनी उदास नज़रों से देखा कि तितिक्षा को लगा था- वह एक औरत नहीं थी, एक सिगरेट थी, जिसको स्वप्निल ने एक ही नज़र से सुलगा दिया था और वह चला गया.
उस दिन के बाद से तितिक्षा तितिक्षा नहीं रही, एक सुलगती सिगरेट बन गई थी, जिसे स्वप्निल ने सुलगा दिया था, पर पीने का अधिकार नहीं लिया था. वह कला में निपुण नर्तकी की तरह अपने यथार्थ और कल्पना दोनों के साथ खेल रही थी और फिर एक दिन उसे पता चला कि स्वप्निल को कोई दूसरी नौकरी मिल गई है और वो मुंबई जा रहा है. वो स्वप्निल से मिलने गई और पूछा, “तुम्हें इसी तरह चले जाना था? मुझे बता नहीं सकते थे?” जाने उसकी आवाज़ किन गहराइयों से निकल रही थी कि उसे ख़ुद भी सुनाई न दी थी.
“मैं रात को आया था आपके घर, कमरे की लाइट ऑफ थी. मैंने सोचा, आप लोग सो रहे होंगे, सो मैं बाहर से ही लौट आया.”
“काश! आप मिले ही न होते.” तितिक्षा के मुंह से अनायास ही निकल गया. वो देखता रह गया और फिर बोला, “इसीलिए तो जा रहा हूं, क्योंकि यहां रहना अब मेरे लिए बहुत मुश्किल है.” और वो विदा लेकर घर लौट आई.
उस रात तितिक्षा अपने पति के साथ बस लेटी हुई थी. उसके शरीर को अपने शरीर से सटाकर ये पलंग पर लेटा हुआ कौन-सा आदमी था? यह वही रात थी, उसे अच्छी तरह याद है कि जब एक मासूम उसकी कोख में आया. उसकी चेतना में स्वप्निल ही था. इसके बाद उसने डायरी लिखनी शुरू की और फिर ये डायरी उसकी ऐसी आवश्यकता बन गई थी जैसे दर्पण, जिसमें वह ख़ुद को देख सकती थी. एक दिन अचानक ये ख़याल आया कि अगर ये डायरी किसी ने पढ़ ली तो…?
उसने निश्‍चय किया कि वो डायरी को पराए हाथों से बचाने के लिए जला देगी. मगर जब वो डायरी को तीली लगाने लगी, तो उसके हाथ बिलख उठे- अगर कभी एक बार इस डायरी को स्वप्निल पढ़ लेता- मैं भले ही मर जाऊं, तब भी कभी उसे ध्यान आता और सोचता… एक थी तितिक्षा.
फिर एक दिन वो भी आया, जब तितिक्षा ने एक सुंदर बच्चे को जन्म दिया. और एक अजीब इत्तेफ़ाक हुआ कि स्वप्निल का कल्पित मुख और बच्चे का यथार्थ मुख मिलकर एक हो गया था. बच्चे की शक्ल हूबहू स्वप्निल से मिलती थी. उसके अंदर की प्रेमिका और मां मिलकर एक हो रही थीं. एक संतुष्टि थी, जिससे अंदर की दरार मिटती जा रही थी. वह सोचने लगी थी कि अब वो पति के साथ न्याय कर सकेगी. आख़िर वो एक नेक आदमी था और वो उसके बच्चे का बाप था. भले ही वो और उसका पति कभी उलझे नहीं थे. दोनों एक-दूसरे की बातों में सहमति देते थे. और दिखने में दोनों का जीवन शांत पानी-सा दिखता था, पर अंदर ही अंदर दोनों को पता था कि ये शांत ठहरा पानी गंदलाने पर आ गया है. इस पानी पर ख़ामोशी की काई जमने लगी थी, क्योंकि पति को अभिव्यक्ति की कला आती ही नहीं थी.
विभोर- यही नाम रखा था उसने अपने बच्चे का! विभोर जब स्कूल जाने लगा तो तितिक्षा की विकलता बढ़ गई. धीरे-धीरे वो ख़ुद से बातें करने लगी थी. एक दिन अचानक स्वप्निल उसके दरवाज़े पर खड़ा था. उसे महसूस हुआ जैसे उसके पैरों के नीचे ज़मीन नहीं है.
“कब आए?” कुछ देर बाद तितिक्षा ने कहा.
“कल आया.”

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“अब तो शादी कर ली होगी?” अचानक सोफे पर बैठते हुए तितिक्षा ने पूछा.
“जिसके साथ शादी करना चाहता था, उसने मुझसे पहले ही किसी के साथ शादी कर ली है… फिर मैं किससे शादी करूं?” तितिक्षा ने संभलकर उसकी तरफ़ देखा. न जाने क्यूं उसकी आंखों का सामना न कर सकी और सिर झुका लिया. दोनों के बीच गहरी ख़ामोशी छाई रही. तितिक्षा को पता ही नहीं चला कि स्वप्निल कब उसके पीछे आकर खड़ा हो गया था और उसकी सांसें उसकी गर्दन को छू रही थीं. उसने कोशिश की, मगर उससे कुछ बोला न गया. तितिक्षा के होंठों पर स्वप्निल के होंठ झुके हुए थे और तितिक्षा, उसे तो जैसे याद ही नहीं कि उसके शरीर में किसी और के प्यार की स्मृति है भी या नहीं!
“यह तुमने मेरे साथ क्या किया?” तितिक्षा की आवाज़ कांप रही थी. स्वप्निल ने उसे उठाकर पलंग पर बैठा दिया था और ख़ुद पलंग के एक कोने पर बैठ गया. “तुमने मुझसे कभी भी बात नहीं की. मैं इतने सालों तक ख़ुद से बातें करती रही हूं.” तितिक्षा ने धीरे-से कहा.
“मैं सोचता था तुम्हारी शादी हो चुकी है… एक बसे हुए घर को उजाड़ना नहीं चाहता था.”
“पर जब कोई किसी की कल्पना में आ जाए और जीवन में न आए, तो मेरे ख़याल से वो एक बसता हुआ घर नहीं रह जाता. आंखें बंदकर जब कोई औरत किसी और को याद करती है, पर आंखें खोलकर किसी दूसरे का चेहरा देखती है तो इससे बड़ा झूठ और क्या हो सकता है?” तितिक्षा ने नज़रें स्वप्निल के चेहरे पर गड़ा दीं. “मैं क़ानून नहीं समझती, धर्म नहीं समझती, समझती हूं तो स़िर्फ इंसान को और इंसान के सरल स्वभाव को.”
“मैंने ये सोचा ही नहीं था कि तुम भी मुझसे प्यार कर सकती हो, क्योंकि समाज के इस ढांचे को तोड़ना सरल नहीं होता. मैंने कई वर्ष सोचने में ही बिता दिए. मैं अंदर और बाहर से एक होकर जीना चाहता हूं, पर आज मेरा सब्र टूट गया है.” स्वप्निल बोलते-बोलते मेरे सामने घुटनों के बल बैठ गया. उसके हाथ तितिक्षा के घुटनों पर थे और आंखें जैसे तरल होकर उसकी आंखों में समाई जा रही थीं. उसे हैरानी हो रही थी- विश्‍वास नहीं हो रहा था कि यह उसके जीवन से जुड़ा कोई दृश्य है. उसे अच्छा लग रहा था. ऐसा पल उसकी कल्पना में ही था. कहीं कोई पुरुष अहं नहीं! प्रेम आदमी को और ज़्यादा इंसान बनाता है.
स्वप्निल के निर्मल प्रेम ने उसे ये एहसास कराया था.
वो एक रूढ़िवादी परिवार की लड़की थी और उससे भी ज़्यादा रूढ़िवादी परिवार की बहू! वो ख़ुद यह नहीं समझ पा रही है कि उसके लिए यह कैसे संभव है कि घर में सक्षम-संपन्न पति के रहने के बावजूद वो ग़ैर मर्द के स्पर्श को उत्सुक हो रही है? कहां गए वर्षों पुराने संस्कार, जिन्हें खून में संचारित करते हुए इतने वर्षों में किसी पुरुष के प्रति कोई आकर्षण तक न जागा था? आंखें मूंदकर उसने अनुभव किया कि ये कोई अपरिचित पुरुष नहीं है, बल्कि उसका स्वप्न पुरुष है.


तितिक्षा ने पाया कि एक हाथ सिरहाने रखकर दूसरे हाथ से स्वप्निल ने उसे आलिंगन में लेना चाहा, “नहीं स्वप्निल, नहीं.” तितिक्षा ने हाथ पकड़कर उसे रोक दिया.
“क्यों…?” स्वप्निल की आवाज़ अटक गई. मगर उसने कोई उत्तर नहीं दिया. उसकी विचारशक्ति स्तब्ध थी. वह धीरे-से उठा और खिड़की के पास खड़ा हो गया, उसकी तप्त श्‍वासों को शीतल वायु की ज़रूरत थी. फिर वहीं खड़े-खड़े बोला, “चलो तितिक्षा, मुझे दरवाज़े तक छोड़ आओ.” उसने देखा स्वप्निल का रंग स़फेद पड़ गया था. उसकी आवाज़ आज्ञा की तरह थी. तितिक्षा उसके साथ बाहर तक आ गई और वो चला गया. अंदर आकर वो सोफे पर गिर पड़ी. उसे लगा मिनटों में ये क्या से क्या हो गया? क्या यह किसी का अपराध है? मेरा या स्वप्निल का? या फिर यह मेरी विवेकहीनता थी? या फिर अचानक होनेवाली कोई भूल? कोई दुर्घटना…? क्या कहेंगे इसे? यह मैंने क्या कर दिया? जिन हाथों की इतने वर्षों तक प्रतीक्षा करती रही, आज खाली लौटा दिया? देह के भीतर अच्छा लगने की इतनी तीव्र अनुभूति क्यों? अब क्या करूं इस शरीर का? इसे पवित्र रखकर मैंने क्या संवार लिया? क्या पवित्रता यही होती है? यह शरीर उसको अर्पित न हुआ, जिसके लिए बना था. स्त्रियों के चरित्र और चरित्रहीनता का मामला स़िर्फ शारीरिक घटनाओं से क्यूं तय किया जाता है? कितना विचित्र नियम है? सोचते-सोचते उसकी आंख लग गई, जैसे उसमें हिलने की भी शक्ति नहीं रही थी.

अचानक विभोर की आवाज़ से वो हड़बड़ाकर उठी और उसे गले लगा लिया और सोचा कि इसे लेकर उसके पास जाऊंगी और कहूंगी कि देखो, बिल्कुल तुम्हारी अपनी सूरत है विभोर में. मगर दूसरे ही क्षण उसे लगा कि भला वह किस तरह मेरी बात मानेगा? आज से पहले तो मैंने कभी उसका हाथ भी नहीं छुआ था, कौन-सा विज्ञान ये मानेगा भला? और आज भी कौन-सा छुआ है? मैंने उसके स्वाभिमान को बहुत चोट पहुंचाई है. सालों से उसने जब्त किया था. ये प्रेम में कुछ पाना नहीं था, बल्कि ख़ुद को समर्पित करना था. वो ये क्यूं नहीं समझ सका कि औरत के इंकार में उसके संस्कार भी तो होते हैं. औरत जब किसी से प्यार करती है तो पूरा प्रेम करती है. फिर वह अपने पास कुछ नहीं रखती. आगे के कुछ दिन याद नहीं कैसे बीते थे. दिल की बात किसी से कह नहीं सकती थी. और एक दिन पता चला कि स्वप्निल शहर छोड़कर कहीं और चला गया. उस रात अधिकांशतः नींद तितिक्षा के सिरहाने ही बैठी रही.
तितिक्षा को अपनी पराजय को स्वीकार करने का एक अजीब साहस हुआ. उसने सोचा कि कम से कम मैं अपने पति से सच तो बोल सकती हूं.
एक रात तितिक्षा ये साहस अपने होंठों पर ले आई, “मैं यहां नहीं रहना चाहती.”
“क्यों?” उसके पति ने आश्‍चर्य से पूछा.
“मैं सदा आपका आदर करती हूं, पर सोचती हूं कि किसी का आदर करना ही काफ़ी नहीं होता.” प्रहर पथराई आंखों से उसे देख रहा था.
“तुम्हें क्या तकलीफ़ है तितिक्षा?”
“आपकी दी हुई कोई तकलीफ़ नहीं है.”
“फिर…? ये सब क्या है?”
“बस, इतना कि मुझे यहां सब कुछ निर्जीव-सा लगता है.” और फिर अपनी ही बात पर मुस्कुराकर तितिक्षा बोली, “यहां मुझे ऐसा लगता है कि मैं जीये बिना ही मर जाऊंगी. मुझे मरने से डर नहीं लगता, पर मैं मरने से पहले कुछ दिन जीकर देखना चाहती हूं. भले ही वो थोड़े-से दिन हों.” तितिक्षा ने थके हुए स्वर में कहा.
प्रहर को किसी प्रश्‍न या उत्तर से डर नहीं लगा था, लेकिन आज तितिक्षा से प्रश्‍न करने में उसे डर लग रहा था. उसने डरते-डरते पूछा, “तुम्हारे जीवन में कोई और है?”
“है भी और नहीं भी.” तितिक्षा ने जवाब दिया. “क्योंकि वह आदमी मेरे जीवन में उतना नहीं है, जितना मेरी कल्पना में है.”
“मैं स़िर्फ इतना जानना चाहता हूं कि वो कौन है?”
“स्वप्निल…” तितिक्षा जैसे नींद में बोल रही थी.
“उसे तो शहर से गये कई वर्ष हो गए हैं..”
“हां..”
“इन सालों में कभी वो यहां आया है?”
“एक बार. मुझे नहीं पता वो कितने दिन रहा, बस मैं उससे 2 घंटे के लिए मिली थी.”
“क्या वो तुम्हें पत्र लिखता है?”
“कभी नहीं..” प्रहर को ये बड़ा अजीब लगा. उसने ये भी पूछ लिया जो उसने सोचा भी न था.
“तुम और स्वप्निल कभी…?”
“जिन अर्थों में आप पूछना चाह रहे हैं, उन अर्थों में कभी नहीं.”

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प्रहर को क्रोध की बजाय निराशा ने घेर लिया. तितिक्षा को लगा, यदि प्रहर सख़्ती से पेश आते तो अच्छा होता, क्योंकि जो आदमी सख़्ती करे, उससे घृणा की जा सकती है और जिससे घृणा हो जाए, उससे टूटने में देर नहीं लगती.
घर में एक ख़ामोशी ने घर कर लिया था और इस माहौल में तितिक्षा को घुटन होती थी. अपनी घुटन से निकलने के लिए एक दिन वो अपनी सहेली के घर गई, जहां उसे पता चला कि यहां से जाने के बाद स्वप्निल का नर्वस ब्रेक डाउन हो गया था और वह अभी तक बीमार है, सुनकर तितिक्षा कांप गई थी. उसे लगा उसकी इस हालत की ज़िम्मेदार वही है. वह घर आकर अपनी बेबसी पर बहुत रोई. रोते-रोते उसका ध्यान विभोर की तरफ़ गया, जो उसके आंसू पोंछने की कोशिश कर रहा था. उसे लगा वो एक बच्चे का मुंह नहीं, बल्कि एक शक्तिशाली और जवान मर्द का मुंह है. एक सच्चे दोस्त का मुंह, जो इस समय एक मां को ढाढ़स नहीं बंधा रहा था, एक औरत की मजबूरी से बातें कर रहा था. बच्चे को मां के दुख का ज्ञान नहीं था. उससे केवल मां के आंसू न देखे गए और वह एक शाश्‍वत मर्द बनकर एक शाश्‍वत औरत के आंसू पोंछ देना चाहता था. तितिक्षा ने तड़पकर विभोर को आलिंगन में कस लिया.
समाज में हर स्त्री को घुट-घुटकर मर जाना तो आता है, पर सांस लेने के लिए किसी भी खिड़की या दरवाज़े को तोड़ देना नहीं आता है.
उसने अपनी डायरी में लिखा, ‘अगर कहीं मुझे स्वप्निल न मिलता, तो मैं कल्पना की दुनिया में जीती और मर जाती. स्वप्निल! अपने जीवन की राह पर चलते-चलते उस स्थान पर आ गई हूं, जहां से कई राहें अलग-अलग दिशाओं में जाती हैं. मैं नहीं समझ पा रही कि मैं किधर जाऊं? मुझे लगता है, सभी राहें तुम्हारी तरफ़ जाती हैं. आज किसी एक राह में खड़ा कोई मुझे पुकार रहा है और किसी राह से कोई आवाज़ नहीं आती, इसीलिए मैं उस एक राह की ओर मुड़ रही हूं…!’
उसकी ज़िंदगी ने एक और नया मोड़ ले लिया था. अब उसकी शेष आयु स़िर्फ पानी का बहाव बन गई थी. इस बहाव में कुछ पल सांस लेने के लिए दो किनारे थे… एक विभोर और दूसरी दुनियाभर की क़िताबें, जो उसके हाथ में आकर छूटने का नाम नहीं लेती थीं. स्वप्निल अब उसके लिए इस तरह हो गया था, जिस पर न कोई अधिकार है, न उलाहना. प्रेम अब भी उसे ही करती है, पर इस तरह नहीं जैसे एक औरत मर्द को प्रेम करती है, बल्कि इस तरह जैसे कोई इंसान ईश्‍वर से प्रेम करता है. वह अब प्रेम से प्रेम करने लगी थी. उसका प्रेम वहां पहुंच चुका था, जहां वो ख़ुद ईश्‍वर बन जाता है.

      ज्योत्सना ‘प्रवाह’

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कहानी- राग मधुवन्ती (Short Story- Raag Madhuvanti)

Short Story, Raag Madhuvanti

Short Story, Raag Madhuvanti

पत्र खोलते ही सम्बोधन ने उसे चौंका दिया, ‘प्रिय मधु…?’ उसके माथे पर सोच की लकीरें उभर आईं. इस नाम से तो उसे सीमा का ममेरा भाई नरेन्द्र बुलाता था. नरेन्द्र ने कभी खुलकर उससे बात तक नहीं की. आज वर्षों बाद पत्र क्यों लिखा है? उसे देखे क़रीब तीस वर्ष तो हो ही गये होंगे! सुजाता के मन में कई सवाल उठ रहे थे.

पास के मार्केट से रोज़मर्रा का कुछ सामान लेकर सुजाता घर लौटी, तो देखा बाहर बरामदे पर डाकिया एक पत्र डाल गया है. पत्र उसी के नाम था, पर लिखनेवाले का नाम-पता कहीं नहीं था. वो मन-ही-मन सोच रही थी, उसे कौन पत्र लिखेगा? दोनों पति-पत्नी एकमात्र बेटे-बहू के साथ ही रहते हैं. दोनों बेटियां भी इसी शहर में ब्याही हैं. एक सीमा है, उसके बचपन की सखी, पर ये लिखावट तो उसकी भी नहीं?
पत्र खोलते ही सम्बोधन ने उसे चौंका दिया, ‘प्रिय मधु…?’ उसके माथे पर सोच की लकीरें उभर आईं. इस नाम से तो उसे सीमा का ममेरा भाई नरेन्द्र बुलाता था. नरेन्द्र ने कभी खुलकर उससे बात तक नहीं की. आज वर्षों बाद पत्र क्यों लिखा है? उसे देखे क़रीब तीस वर्ष तो हो ही गये होंगे! सुजाता के मन में कई सवाल उठ रहे थे. वो सो़फे पर बैठकर पत्र पढ़ने लगी.

प्रिय मधु,
मैं जानता हूं, मेरा ख़त पढ़कर तुम सकते की हालत में अवाक् खड़ी रह जाओगी. आज जीवन के कई पड़ाव पार कर लेने के बाद वृद्धावस्था के गिने-चुने दिन ही शेष रह गये हैं. बासठ का हो चला हूं मैं. तुम भी तो पचपन-छप्पन वर्षों का खट्टा-मीठा अनुभव दामन में समेटे किसी की नानी-दादी बन चुकी होगी. न जाने कनपटियों पर स़फेद हो आईं लटों से घिरा तुम्हारा चेहरा कैसा लगता होगा? मैं तो तुम्हारे उस अनुपम रूप माधुरी को अब तक विस्मृत नहीं कर पाया हूं, जब हम पहली बार रत्ना बुआ के घर पर मिले थे.
गुलाबी रंग की साड़ी, गले में स़फेद मोतियों का हार… ख़ूबसूरत गुलाबी चेहरे पर हीरे-सी जड़ी मोहक, कजरारी, पनीली आंखें, अधरों पर आकर्षक मुस्कान….. खिलखिलाकर हंसने पर गालों पर उभरते ख़ूबसूरत गड्ढे….. तुम्हें पहली बार देखकर मैं हतप्रभ रह गया था.
“भैया, ये सुजाता है. हमारे कॉलेज की ब्यूटी क्वीन… और सुजाता, ये हैं मेरे ममेरे भाई, नरेन्द्र.”
मेरी बुआ की बेटी सीमा ने परिचय करवाया, तो मैंने थरथराते हाथ जोड़ दिये थे, पर आंखें अपलक तुम्हें निहार रही थीं. कुछ कहने के लिये शब्द ही कहां शेष रह गये थे?
“तुम्हारे भैया गूंगे हैं क्या?” अचानक तुम्हारी मिश्री-सी आवाज़ कानों में किसी मधुर गान की तरह उतरी थी. मैं कुछ कह पाता, इससे पहले ही सीमा तुम्हें भीतर खींचकर ले गयी थी. अपनी शादी का जोड़ा दिखाने… याद हैं ना वो पल…
तुम्हारा ख़याल हर पल मेरे दामन से लिपटा रहता. मेरी धड़कनों ने बेकरार होकर मेरा चैन, मेरी नींद सब कुछ छीन लिया था. तुम जब भी सीमा से मिलने आतीं, मेरी धड़कनें बेकाबू हो उठतीं. तुम दोनों ज़मानेभर की बातें करने में मशगूल होतीं. और मैं धीरे-से खिड़की का पर्दा हटाकर तुम्हें अपलक निहारता रहता. एक अदृश्य डोर में बंधा, अवश-सा… तुम्हारी ओर खिंचता जा रहा था.
मैं सीमा की सगाई पर मात्र सप्ताह भर की छुट्टी पर आया था, पर उसकी शादी तक रुक गया था. जिस बुआ के घर साल में पांच या सात दिन छुट्टियां गुज़ारने आता था, वहां महीनेभर से टिका था. एक दिन बुआ ने स्नेह से पूछा भी था, “क्यों इंजीनियर साहब, इस बार नौकरी छोड़कर आये हैं क्या?”
“अरे नहीं बुआ, मां की मृत्यु के बाद एक तुम ही तो हो, जिससे मैं सबसे ज़्यादा प्यार करता हूं. सोचा इस बार ज़्यादा समय तुम्हारे साथ गुज़ारूं. छोटी बहन को विदा कर दूं. काम में तुम्हारा हाथ बटाऊं.” मैं लाड़ में बुआ के गले से लिपट गया था. उस व़क़्त महसूस हुआ कि स़फेद झूठ बोलना कितना दुश्कर काम है. पर बुआ की पारखी आंखों ने तुम्हें देखकर मेरे चेहरे पर उभरनेवाले प्रेम पगे भावों और स्नेहिल उमंगों से परिपूर्ण भविष्य के सपने बुनती मेरी आंखों में जैसे सब कुछ पढ़ लिया था.
एक रात बुआ ने भेद भरे स्वर में मुझे समझाया भी था कि मैं एक संभ्रांत मैथिल ब्राह्मण खानदान का इकलौता वारिस हूं. मुझे अपने पिता और स्वर्गीय मां के मान-सम्मान का ध्यान रखते हुए कोई भी क़दम उठाने से पहले दस बार सोचना चाहिए.
बुआ ने मुझे बचपन से पाला था. वो मेरे मन में उमड़ रहे विचारों से अनजान नहीं थीं. मैं भी बुआ के मनोगत विचार भली-भांति समझ रहा था. सब कुछ समझकर भी हम दोनों मौन थे. और तुम्हें तो मेरे असीम प्रेम का लेशमात्र पता नहीं था.
एक शाम सीमा एक संगीत समारोह के दो टिकट ले आयी थी. उसने बताया कि टाउन हॉल में हो रहे उस संगीत समारोह में तुम भी गीत गाने वाली हो. उस क्षण तुम्हारे व्यक्तित्व के एक और अनछुए रहस्य पर से पर्दा उठा कि अपार सौन्दर्य की स्वामिनी तुम कोकिल कण्ठी भी हो.
हॉल खचाखच भरा था. कई उत्कृष्ट गायक मंच पर आये. उनका संगीत सुनकर बार-बार हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठता था. पर मैं तो दम साधे उस पल की प्रतीक्षा कर रहा था, जब तुम्हारी आवाज़ हॉल में गूंजेगी. तभी उद्घोषक ने मंच पर आकर कहा, “अब आपके सामने वूमन्स कॉलेज की छात्रा कुमारी सुजाता ‘राग मधुवन्ती’ पर आधारित एक भजन प्रस्तुत करने जा रही हैं. इस भजन में वृक्ष पर सहमे से बैठे उस पक्षी की ईश्‍वर से दया की कातर पुकार है, जिसे ऊपर मंडराते बाज और नीचे तीर साधे खड़े बहेलिये का भय कंपा रहा है. तभी सर्पदंश के कारण बहेलिये का निशाना चूक जाता है. और तीर सीधे बाज के कलेजे में उतर जाता है इस भजन में ईश्‍वर की अपार कृपा का वर्णन किया गया है… तो लीजिये… मंच पर आ रही हैं… कुमारी सुजाता.”
पूरा हॉल नि:शब्द था. उस क्षण तुम्हारी मधुर आवाज़ कानों में एक अविस्मरणीय गूंज बनकर उभरी. “हौं अनाथ…बैठ्यो द्रुम डरिया…. पारधि साधे बाण. ताके भय मैं भागन चाहूं… ऊपर ढुक्यो सचान. अब के राखि लेहू भगवान…… !”
लोग स्तब्ध होकर संगीत रस में डुबकियां लगा रहे थे. और मैं मंत्रमुग्ध-सा तुम्हें अपलक निहार रहा था. उस पल ने मेरे दिल पर जैसे किसी अमिट स्याही से तुम्हारा नाम लिख दिया था. मैंने सोच लिया था कि अगर कोई मेरी जीवनसंगिनी होगी, तो वो स़िर्फ तुम होगी.
उसी दिन मैंने तुम्हें नया नाम दिया था, ‘राग मधुवन्ती.’
“वाह भैया, तुम्हारा भी जवाब नहीं. क्या नाम दिया है, राग मधुवन्ती……” सीमा खिलखिलाकर हंस पड़ी थी. साथ में तुम्हारा भी ठहाका गूंजा था. मैंने पहली बार हिम्मत जुटाकर तुमसे कहा था, “तुम्हारा स्वर इतना मीठा है कि तुम्हारा नाम सुजाता नहीं…..मधु होना चाहिए.”
“ठीक है, आप मुझे मधु ही कहिये.” तुमने मुस्कुराकर सामान्य रूप से कहा था.
काश! मैं उस व़क़्त तुम्हें अपना हृदय चीर कर दिखला सकता, पर मैं तो बुआ की नसीहतों से बंधा था. जात-पात, कुल की मर्यादा मेरे प्रेम को उसी तरह निगलती जा रही थी, जैसे चांद पर लगा ग्रहण उसे धीरे-धीरे ढंकता चला जाता है.
बुआ के साथ कुछ दिन पहले हुई बातचीत का एक-एक शब्द कानों में गूंज रहा था.
“नहीं नरेन्द्र, तुम ऐसा सोच भी कैसे सकते हो? कहां तुम उच्च कोटि के ब्राह्मण. और कहां वो… सुजाता पासवान? नहीं बेटा, भूल जाओ उसे. तुम्हारे लिये लड़कियों की कमी है क्या?”
“मुझे उसकी जात से क्या लेना-देना बुआ? मैं तो स़िर्फ इतना जानता हूं कि मैं उससे अथाह प्रेम करने लगा हूं. उसके सिवा किसी और की पत्नी के रूप में कल्पना भी नहीं कर सकता.”
“बेटे, यथार्थ और कल्पना में ज़मीन-आसमान का फ़र्क़ होता है. तुम्हारे पिता किसी भी क़ीमत पर नहीं मानेंगे.”
“बुआ मेरी ख़ातिर, एक बार बाबूजी से बात करने का प्रयास…”
“नरेन्द्र, प्रयास वहीं करना चाहिए, जहां सफलता की कम-से-कम एक प्रतिशत तो गुंजाइश हो.”
मेरी दशा उस जुआरी जैसी हो गयी थी. जिसका सर्वस्व दांव पर लग गया हो.
सीमा के विवाह के दिन तुम्हारे साथ विभिन्न कामों में जुटा रहा. अपने अधरों पर मौन का पहरा बिठा दिया था मैंने. चेहरे पर मुश्किल से ओढ़ी गयी हंसी के पीछे अपना सारा दर्द अच्छी तरह छिपा लिया था, पर उसी पल जाना, दर्द छिपाना कितना दुश्कर होता है.

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सीमा की विदाई के व़क़्त मैं बिलख-बिलख कर रोया था. ख़ुद तुमने कहा था, “सीमा, तुम्हारे भैया तुमसे कितना प्यार करते हैं.” पर तुम्हें क्या पता, मेरी आंखों से केवल सीमा का बिछोह ही नहीं, तुम्हारा बिछोह भी झरने की भांति फूट पड़ा था. कोई मेरे दर्द को समझनेवाला था, तो वो एकमात्र बुआ थीं. मेरे अमर-प्रेम की मूक साक्षी. सीमा भी तुम्हारे प्रति मेरे प्रेम से सर्वथा अनजान थी, आज भी है.
सीमा से ही तुम्हारे बारे में हर ख़बर मिलती रही. कुछ वर्ष बीते, पता चला तुम अपने स्नेहिल पति और तीन बच्चों के साथ बेहद सुखी हो. मेरे लिये यही बहुत बड़ी बात थी. क्या प्रेम का अर्थ केवल शारीरिक मिलन है? प्रेम तो वो एहसास है, जो किसी के लिये सम्पूर्ण समर्पण की भावना को जन्म देता है. हम जिससे प्रेम करते हैं, वो हर हाल में ख़ुश रहे, जब मन में ये भावना उदित होती है, तो बिछड़ने का एहसास कम पीड़ा देता है. मैं तुम्हारी हर ख़बर रखता था… तुम्हारे बच्चे बड़े हुए… उनकी शादियां हुईं… तुम सास बनीं… फिर नानी… और दादी बनीं.

Short Story, Raag Madhuvanti
तुमसे मिलने में हमेशा कतराता रहा. कहीं मेरी आंखें मेरे मन का भेद न खोल दें.
मेरे पिता और बुआ वंश नष्ट होने की अगाध पीड़ा लिये दुनिया को अलविदा कह गये. मेरे नसीब में शायद एकाकी रहना ही लिखा था. मेरी दशा पर दु:खी होकर एक दिन सीमा ने कहा था, “न जाने वो कौन अभागी होगी, जिसने आप जैसे हीरे की अवहेलना की?”
“उसे तो पता भी नहीं कि मैं उससे बेपनाह प्रेम करता हूं.” मेरी बात पर सीमा बुरी तरह चौंक पड़ी थी. उसकी आंखों में घोर आश्‍चर्य था. उसने लाख क़समें दीं, पर मेरा मौन नहीं टूटा. अट्ठावन वर्ष की उम्र तक नौकरी की… फिर रिटायर हुआ… और फंस गया फेफड़ों के कैन्सर की गिऱफ़्त में. लगातार सिगरेट पीने का फल सामने था.
पर मैं दुखी नहीं हूं… मेरी मृत्यु तो उसी व़क़्त हो गयी थी, जब तुम्हारी डोली उठी थी. हां, एक शरीर शेष बचा था… जो अब नष्ट होने जा रहा है. डॉक्टर कहते हैं, कुछ ही दिनों का मेहमान हूं… पुनर्जन्म पर विश्‍वास नहीं है, इसलिये अगले जन्म में तुम्हारा साथ पाने की कामना भी तो नहीं कर सकता.
एक दिन अचानक मन में ख़याल आया, हम जिससे प्रेम करते हैं, उसे अगर इस प्रेम का आभास भी न रहे, तो क्या प्रेम की सार्थकता सिद्ध हो सकती है? दिमाग़ ने कहा, क्यों नहीं… पर दिल ने बार-बार नकार दिया. पूरा एक सप्ताह लगा है काग़ज़ पर चंद शब्द उकेरने में. बहुत सोचा, तुम्हें कभी कुछ पता न चले, पर अब हार गया हूं. मृत्यु मेरे सिरहाने मंडरा रही है… भीषण व्याधि, वेदना का तीर साधे समक्ष खड़ी है… आज मेरी दशा भी उसी कातर, व्याकुल और विह्वल पक्षी की तरह हो गयी है, जिसे सिर पर बाज और नीचे बहेलिये का भय आतुर कर रहा था.
मरते हुए इन्सान की आख़िरी इच्छा पूरी करना सबसे बड़ा धर्म है ना? मेरी भी एक अन्तिम इच्छा है… काश! मृत्यु से पहले एक क्षण के लिये तुम्हें देख पाऊं. क्या ऐसा हो सकता है?
जानता हूं, मेरे शब्द… उनमें छिपा निवेदन… मनुहार… तुम्हें काठ बना डालेंगे,पर एक तुम ही तो हो, जो मेरी मृत्यु को सरल बना सकती हो. मुझे माफ़ कर देना, मन पर वश नहीं रख पाया… अस्पताल के एक कर्मचारी के हाथों पत्र डाक में डलवा रहा हूं. न जाने तुम तक पहुंचेगा भी या नहीं. वर्षों पहले सीमा की डायरी से तुम्हारा पता चुपचाप उतार लिया था ना…
किस अधिकार से तुम्हें कहूं कि इसी शहर के सिटी अस्पताल के फर्स्ट फ्लोर के कमरा नम्बर 120 में तुम्हें आना ही होगा?… क्या तुम एक बार… नहीं आ सकती मधु?
अब तक स़िर्फ तुम्हारा…
पत्र पढ़कर सुजाता पाषण की प्रतिमा की तरह जड़… संज्ञाशून्य-सी होकर सो़फे पर ढह-सी गयी. पत्र का एक-एक शब्द मानो हृदय को अनजानी वेदना के असंख्य तीरों से बेधता चला गया. वो भीतर तक कांप उठी. “प्रेम का ये कैसा रूप है? हे ईश्‍वर! मैंने तो कभी उनको इस दृष्टि से नहीं देखा. अगर ये पत्र मेरे पति या बेटे-बहू के हाथ में पड़ जाता तो? इस उम्र में अपयश की काली परछाइयों से बच सकती? कौन करता मेरी सच्चाई पर विश्‍वास?”

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वो सिर थामकर बिलख पड़ी. विगत के कई चित्र बार-बार आंखों के सामने नृत्य कर उठे. पत्र में जिन घटनाओं का उल्लेख था… सारी घटनाएं नवीन चोला धारण कर मन को मथने लगीं. क्या करूं? सुजाता के मन में मन्थन चल ही रहा था कि कॉलबेल बज उठी. उसने जल्दी से पत्र अलमारी में छिपा दिया फिर देखा, उसके पति विपिन अपने दोस्त के घर से लौट आये थे.
“एक कप चाय मिलेगी?” कहते हुए उन्होंने पत्नी के पीले ज़र्द चेहरे पर नज़रें डालीं, तो चौंक पड़े.
“क्या हुआ? तबियत तो ठीक है ना?” सुजाता ने सहज होने का प्रयास करते हुए कहा, “चार बजनेवाले हैं, बच्चों का नाश्ता फ्रिज में रखा है. समर और बहू आयें तो कह दीजियेगा, मैं अपनी एक मित्र से मिलने जा रही हूं… शायद आने में देर हो जाए… प्लीज़ आज आप दोनों बच्चों को नाश्ता निकालकर दे दीजियेगा…”
“अरे भई, वो मेरे भी पोता-पोती हैं.” विपिन हंस पड़े थे. “तुम निश्‍चिन्त होकर जा सकती हो.” उन्होंने सुजाता का कंधा थपथपा दिया था.
ऑटो से सिटी अस्पताल का आधे घंटे का सफ़र उसे सदियों की यात्रा जैसा लग रहा था. वो ऑटो से उतरकर लगभग दौड़ती हुई कमरा नम्बर 120 के दरवाज़े पर खड़ी हो गयी.
कमरे में कई लोग खड़े थे. सब सुजाता के लिये अपरिचित थे. सबकी प्रश्‍नवाचक निगाहों की अवहेलना करके वो भीतर चली आयी. वहां उपस्थित लोगों की बातचीत के कुछ शब्द उसके कानों में भी पड़े.
“इनकी रिश्तेदारी में बस एक फुफेरी बहन है… उसे ख़बर दे दी गयी है… शाम छ: बजे की ट्रेन से आ रही है.”
“मेरे ही किरायेदार थे नरेन्द्र बाबू… पिछले पांच वर्षों से… महीने भर पहले तबियत बिगड़ी… तो मैं ही अस्पताल ले आया था.”
“न जाने घड़ी-घड़ी दरवाज़े पर किसे खोजते हैं?”
“तीन दिनों से हालत बिगड़ती जा रही है… लगता है प्राण अब छूटे कि तब… पर पता नहीं किसके लिये प्राण अटके हैं?”
“शायद बहन की प्रतीक्षा हो.” जितने मुंह उतनी बातें थीं.
सुजाता थरथराते क़दमों से बेड की तरफ़ बढ़ी. कृशकाय नरेन्द्र बेड पर अर्धमूर्च्छित-सा पड़ा था.
आहट पाकर नरेन्द्र की पलकें धीरे-से खुल गयीं. आंखों में असीम आश्‍चर्य से ओतप्रोत आह्लाद कौंधा. अधरों पर सन्तुष्टि भरी मुस्कान उभरी. होंठों से अस्फुट से कुछ शब्द फूटे, “राग… म…धु…वन्ती…” नरेन्द्र के चेहरे पर ज़िन्दगी की अन्तिम चमक कौंधी और उसकी आंखें निस्तेज हो गयीं. पर चेहरे पर अब भी प्रेम-मंडित एक मुस्कान थी, जो मानो मृत्यु का उपहास कर रही थी.
“हे भगवान! ये तो नहीं रहे.” आसपास खड़े लोग अफ़सोस ज़ाहिर करने लगे, पर सुजाता के संयम का बांध टूट गया. उसका रुदन सारी सीमाएं तोड़ गया.
“कौन है ये, जो इस तरह रो रही है?” सबकी आंखों में फिर सवाल छोड़कर सुजाता तेज़ क़दमों से कमरे से बाहर निकल गयी. छ: बजने ही वाले थे. कुछ ही देर में सीमा अस्पताल पहुंच जाएगी. वो उसका सामना नहीं करना चाहती थी. राज़, राज़ ही रहे तो अच्छा होगा, उसने सोच लिया था.
ऑटो तेज़ ऱफ़्तार से भागा जा रहा था. सीट की पुश्त से सिर टिकाये सुजाता अब तक रो रही थी. उसकी भीगी आंखों में रह-रहकर नरेन्द्र का वर्षों पुराना मुस्कुराता चेहरा कौंध रहा था. आज वो सारे बन्धन तोड़कर चला गया था, पर जाते-जाते सुजाता को एक बन्धन से बांध गया था. ऑटो घर के पास पहुंचने ही वाला था. सुजाता ने रुमाल से अच्छी तरह चेहरा पोंछा और होंठों पर मुस्कुराहट ओढ़ने की कोशिश की. पर दोनों हाथों से चेहरा छिपाकर फिर फूट-फूट कर रो पड़ी.
रात दस बजे सीमा का फ़ोन आया, “सुजाता, इसी शहर से बोल रही हूं… आज शाम नरेन्द्र भैया की सिटी अस्पताल में मौत हो गयी.”

 डॉ. निरुपमा राय

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कहानी- डैनियल-मार्था पुराण (Short Story- Daniel-Martha Puran)

Short Story- Daniel-Martha Puran

 

Short Story- Daniel-Martha Puran

डैनियल-मार्था की कहानी ने मेरे ज़ेहन में कई सवाल खड़े कर दिए हैं. उस समाज का मानना है कि हमें यह जीवन एक ही बार जीने को मिला है और हमें उसको अपनी इच्छानुसार जीने का पूरा हक़ है. बात सुनने में एकदम सही लगती है, पर इसका व्यावहारिक रूप सब कुछ गड़बड़ा देता है.

पति के ऑफिस जाने पर दरवाज़ा बंद करके मुड़ी ही थी कि नाहिद ने अपनी टूटी-फूटी अंग्रेज़ी में कहा, “तुम हिंदुस्तानी ज़रा भी रोमांटिक नहीं हो.”
मुझे क्रोध नहीं आया. मैं यह बात दिन में कितनी ही बार सुन लेती हूं अथवा इसी से मिलता-जुलता कोई जुमला. अब तो यह नाहिद का तकियाकलाम ही बन चुका है.
मैंने मुस्कुराते हुए पूछा, “अब क्या हुआ?”
“तुम्हारे पति ने ऑफिस जाते समय तुम्हें किस करना तो दूर, तुम्हारा हाथ तक नहीं छुआ. नाश्ता किया और उठकर चल दिया. तुमसे पहले रहनेवाला डैनियल तो ऑफिस जाते समय अपनी पत्नी मार्था को बांहों में भरकर किस करता था. कार में बैठ फिर से एक फ्लाइंग किस देता. ऑफिस से लौटकर फिर से आलिंगन में लेता और दोनों एक-दूसरे से पूछते, “दिन कैसा गुज़रा?”
मैं यह डैनियल-मार्था पुराण अनेक बार सुन चुकी हूं. अमेरिकी जोड़े डैनियल और मार्था के बारे में इतना कुछ सुन चुकी हूं कि अब तो ऐसा लगता है कि मैं उन्हें अच्छी तरह से जानती हूं.
तेहरान (ईरान) आते समय मन में अनजाना-सा डर था. अपरिचित देश, भाषा न जानने-समझने की समस्या भी थी. सौभाग्यवश हमारे लिए जो मकान तय किया गया था, उसकी स्वामिनी को थोड़ी-बहुत अंग्रेज़ी आती थी. लंबे-चौड़े ड्रॉइंगरूम वाला बहुत बड़ा-सा घर था वह और घर के पिछवाड़े बगीचा. घर की मालकिन अपनी चालीस वर्षीया बेटी नाहिद के संग ऊपर वाली मंज़िल पर रहती थीं. उनका बाहर जाने का अपना अलग रास्ता तो था ही, ऊपर से एक सीढ़ी सीधे हमारी लॉबी में भी उतरती थी. नाहिद अपने पति व परिवार के साथ नीचे रहेगी और मां ऊपर, ऐसा सोचकर घर को कुछ इस तरह बनाया गया था, लेकिन विवाह के एक वर्ष बाद ही नाहिद का तलाक़ हो गया और अब मां-बेटी ऊपर रहकर नीचे का हिस्सा किराये पर देने लगी थीं.
नाहिद के पिता का देहांत हो चुका था. नाहिद एक कॉलेज में पढ़ाती थी और दोपहर के भोजन तक घर लौट आती. मौक़ा मिलते ही वह नीचे मेरे पास आ जाती. कोई और होता, तो शायद उसे यह बात अच्छी न लगती और अपनी प्राइवेसी में दख़ल लगती, पर मुझे उसका आना बहुत भाता था. नाहिद मिलनसार और ख़ुशमिज़ाज थी. किसी से भी उसकी जल्दी दोस्ती हो जाती थी और मेरी तो वो हमउम्र ही थी. कार्पेट लगी सीढ़ियों पर बैठे-बैठे हम घंटों बातें करते रहते.
वह मुझे फारसी के साहित्य और मशहूर कवियों के बारे में बताती. साथ ही हमारे देश के बारे में भी जानने को उत्सुक रहती. अकेली होने के कारण मेरा मन भी लगा रहता और एक नए समाज को जानने-समझने का मौक़ा भी मिलता. इसी तरह मैं उसे अपने तीज-त्योहारों और रीति-रिवाज़ों के बारे में बताती. हम साथ-साथ घूमने-फिरने जाते. फिल्में भी देखते. फारसी न जानने के कारण नाहिद के साथ बाज़ार जाने से मुझे विशेष सहूलियत भी रहती. ईरान में शिक्षा का माध्यम पूर्णतः फारसी है, इसलिए शिक्षित वर्ग में भी बहुत कम लोग अंग्रेज़ी बोल पाते हैं. नाहिद के दिवंगत पिता विदेशों में रह चुके थे, इस कारण नाहिद की मां थोड़ी-बहुत अंग्रेज़ी बोल-समझ लेती थीं. उनकी मृत्यु के समय नाहिद मात्र तेरह वर्ष की थी और उसकी मां ने घर पर शिक्षक रखकर नाहिद को अंग्रेज़ी की शिक्षा दिलवाई थी. मां-बेटी दोनों ही कामचलाऊ अंग्रेज़ी बोल लेती थीं और इसलिए उन लोगों को अपना घर विदेशियों को किराये पर देना आसान हो गया था.
हमसे पूर्व अनेक अमेरिकी, अंग्रेज़, फ्रांसीसी इत्यादि उनके घर रह चुके थे. मां-बेटी दोनों ही उनके सांस्कृतिक खुलेपन से बहुत प्रभावित थीं और उनका गुणगान करते नहीं अघाती थीं. इसी वजह से हमसे पूर्व रहे अमेरिकी दंपति डैनियल-मार्था के मैं हर रोज़ ही क़िस्से सुना करती.
अधिकतर ईरान निवासी बहुत मिलनसार होते हैं और पुराने सांस्कृतिक संबंधों के कारण भारतीयों में विशेष रुचि रखते हैं. इसी वजह से नाहिद की कई सखियों से मेरा परिचय था और कुछ से तो अच्छी दोस्ती हो गई थी. उन्हीं में से एक थी परिज़ाद. आज हम उसी के फार्म हाउस पर दिन बिताने के लिए आमंत्रित थे. दूर जाना था और रास्ते में उसके लिए केक भी ख़रीदना चाहते थे, इसलिए नाहिद सुबह ही तैयार होकर नीचे आ गई थी, ताकि हम जल्दी ही घर से निकल सकें.
प्रवासी भारतीय, चाहे वह किसी भी देश में बसे हों, आपस में मिलने को बहुत उत्सुक रहते हैं व पार्टी करने का बहाना ढूंढ़ते रहते हैं और हमारी तो आज विवाह की वर्षगांठ ही थी. अतः एक बड़ी-सी पार्टी की मांग थी. मैंने नाहिद और उसकी मम्मी को भी न्योता दिया, ताकि उन्हें अपने भारतीय मित्रों से मिलवा सकूं. वहां घरेलू सहायता तो मिलती नहीं और विशुद्ध भारतीय व्यंजनों की फरमाइश थी, सो बाज़ार से भी कुछ नहीं मंगाया जा सकता था. नाहिद सुबह से ही मेरा हाथ बंटा रही थी. उसने सब्ज़ी काट दी. प्लेटें पोंछकर मेज़ लगा दी और बोली, “लगे हाथ ड्रॉइंग रूम ठीक कर देती हूं.” सोफे को दीवार से सटाते हुए उसने पूछा, “खाली जगह बीच में रखूं या एक किनारे पर?”
मेरे यह पूछने पर कि खाली जगह किसलिए? उसने हैरान होकर प्रत्युत्तर में पूछा, “तुम लोग डांस नहीं करोगे क्या?” मेरे मना करने पर उसे बहुत आश्‍चर्य हुआ और उसका वही डैनियल पुराण शुरू हो गया. “तुम हिंदुस्तानी बहुत बोर हो. डैनियल-मार्था की हर पार्टी में डांस हुआ करता था. डैनियल ख़ुद बहुत अच्छा नाचते थे. पहला डांस वह हमेशा अपनी पत्नी के साथ ही करते, फिर अन्य महिलाओं के साथ. मैंने भी उनके साथ अनेकों बार डांस किया है. बिना डांस के पार्टी का मज़ा ही क्या आएगा?”
ख़ैर, हमें पार्टी का बहुत मज़ा आया. गाने हुए, शेरो-शायरी हुई, चुटकुले, हंसी-मज़ाक बहुत कुछ हुआ.
दूसरे दिन सुबह मां-बेटी काम ख़त्म कर नीचे आ गईं. वे यह जानने को उत्सुक थीं कि विवाह की वर्षगांठ पर मुझे क्या उपहार मिला? मेरे यह बताने पर कि मुझे कोई उपहार नहीं मिला, वे इतनी आश्‍चर्यचकित रह गईं कि एक बार तो डैनियल पुराण का पाठ भी भूल गईं. हालांकि बाद में उन्होंने इसकी कसर पूरी कर ली. डैनियल तो मार्था को जन्मदिन, शादी की सालगिरह आदि पर अवश्य उपहार देता था, लेकिन वह छोटे-मोटे उपहारों से भी राज़ी नहीं होती थी. शादी की सालगिरह पर तो मार्था के लिए ज्वेलरी ही ख़रीदी जाती थी. डायमंड के टॉप्स, रिंग, नेकलेस आदि. वैलेंटाइन डे पर भी डैनियल फूल और कार्ड लाता, डिनर पर लेकर जाता. मार्था भी डैनियल की पसंद की कोई डिश बनाती थी. नाहिद और उसकी मां का विचार था कि मैं बहुत दब्बू हूं और मेरे जन्मदिन, विवाह की वर्षगांठ पर पति के उपहार न लाने पर बुरा नहीं मानती, इसलिए वे भी इसे नज़रअंदाज़ कर जाते हैं. उनका मानना था कि यदि मैं एक-दो बार नाराज़ होकर दिखाऊं, तो वह अवश्य उपहार लाएंगे.

Short Story- Daniel-Martha Puran
नाहिद को यह अजीब लगता कि हमारे समाज में स्त्री-पुरुष उस तरह से आपसी प्रेम का प्रदर्शन नहीं करते, जिस तरह से कि पश्‍चिमी देशों के कपल्स खुलेआम अपने प्यार का इज़हार करते है. डैनियल-मार्था कथा में मैंने यह भी जाना कि वे दोनों एक-दूसरे को सदैव ‘डार्लिंग’ कहकर ही बुलाते थे. दिन में अनेक बार एक-दूसरे को ‘आई लव यू’ कहा करते थे और मार्था जब भी डैनियल के लिए कुछ विशेष बनाती, तो वह पत्नी को ‘थैंक यू डार्लिंग’ अवश्य कहते थे.
डैनियल-मार्था के चले जाने के बाद भी उनकी सूचना मिलती रहती. उनके घूमने-फिरने, मौज-मस्ती करने की ख़बर मिलती. कभी इटली से इनका पिक्चर पोस्टकार्ड आता, तो कभी स्विट्ज़रलैंड से. दो-चार महीने के अंतराल पर मार्था का लंबा-चौड़ा पत्र भी आ जाता, जिसमें वह अपने बारे में विस्तार से लिखती.
नाहिद के मैत्रीपूर्ण स्वभाव के कारण दोनों में गहरी दोस्ती हो गई थी. मेरे रहते आए एक पत्र में उसने लिखा कि उसकी बेटी हुई है. मार्था के अपने कोई भाई-बहन नहीं थे, सो वह बेटी पाकर बहुत प्रसन्न थी. अगली बार उसने अपनी चार माह की बेटी के साथ एक ख़ुशहाल परिवार की फोटो भी भेजी थी. उनके बारे में इतना कुछ सुन लिया था कि डैनियल परिवार मुझे अपना-सा लगने लगा था और मैं उनके बारे में जानने-सुनने को उत्सुक रहती थी. बेटी होने के पश्‍चात् डैनियल ने अमेरिका में ही ऐसी नौकरी ले ली थी, जिसमें वह एक ही स्थान पर टिककर रह सकें.
हमारे भी ईरान के तीन वर्ष पूरे हुए. नाहिद से विदा लेकर और भारत आने का न्योता दे हम स्वदेश लौट आए. नाहिद से पत्र-व्यवहार चलता रहा.
बेटी का विवाह तो हम ईरान जाने से पूर्व ही कर चुके थे. बेटा तब हॉस्टल में रहकर मेडिकल की पढ़ाई कर रहा था. अब वह डॉक्टर बन गया था और अपने साथ पढ़ रही लड़की के साथ शादी करना चाहता था. हम सबकी रज़ामंदी उसके साथ थी. मैं बहुत ख़ुश थी. बेटी के विवाह के बाद दो पुरुषों के बीच मैं अकेली-सी पड़ गई थी. घर में एक बहू आ जाएगी, तो बाज़ार जाने, पहनने-ओढ़ने में सलाह लेने के लिए साथ मिल जाएगा. घर में रौनक़ हो जाएगी. ऊपरवाली मंज़िल पर दोनों मिलकर अपनी क्लिनिक खोलेंगे, ऐसी योजना भी थी.
विवाह की तैयारियों के साथ-साथ मैं भविष्य के सपने भी बुनने लगी थी. मैंने अन्य स्वजनों के साथ-साथ नाहिद एवं उसकी मां को भी निमंत्रण भेजा और आने का विशेष आग्रह किया. विवाह होने के बाद उनके लिए यहां के दर्शनीय स्थल देखने का इंतज़ाम भी कर दिया. ब्याह निबट गया, सभी मेहमान राज़ी-ख़ुशी चले गए और बेटे-बहू भी हनीमून के लिए घूमने निकल गए, तो मैं फारिग हो इत्मीनान के साथ नाहिद के संग गप्पे लगाने बैठी.
विवाह की तैयारी में पिछले एक वर्ष में उससे कोई विशेष बात नहीं हो पाई थी. उनके घूमने जाने का कार्यक्रम अभी एक हफ़्ते बाद का था. बातों ही बातों में डैनियल-मार्था का ज़िक्र आना स्वाभाविक था, पर नाहिद ने जो बताया वह एकदम अप्रत्याशित था. उन दोनों का तलाक़ हो चुका था. डैनियल का अपनी एक सहकर्मी के साथ अफेयर हो गया था. उसे लगने लगा था कि मानसिक स्तर पर वह मार्था से बहुत उच्च है और उसकी सहकर्मी के साथ जीवन बिताना अधिक रोमांचकारी होगा. अतः उसने मार्था से तलाक़ ले अपनी उस सहकर्मी से विवाह कर लिया था. मार्था पहले तो बहुत परेशान रही, पर अब उसे भी एक नया दोस्त मिल गया है और वह उससे विवाह करने की सोच रही है.
डैनियल-मार्था की कहानी ने मेरे ज़ेहन में कई सवाल खड़े कर दिए हैं. उस समाज का मानना है कि हमें यह जीवन एक ही बार जीने को मिला है और हमें उसको अपनी इच्छानुसार जीने का पूरा हक़ है. बात सुनने में एकदम सही लगती है, पर इसका व्यावहारिक रूप सब कुछ गड़बड़ा देता है. डैनियल-मार्था की मासूम बच्ची के बारे में जब उसके अपने जन्मदाता ही नहीं सोचेंगे, तब भला दूसरा कौन सोचेगा? ‘अपनी इच्छानुसार जीने का हक़’ क्या अपने ही बच्चों को सुरक्षित एवं ख़ुशहाल भविष्य देने से बढ़कर है? सामाजिक व्यवस्था का क्या होगा? महल का हर खंभा यदि अपनी लंबाई-चौड़ाई अपनी ही इच्छानुसार तय करने लगे, तो उसकी छत किस पर टिकेगी?
एकदम ही न बन पाए, लड़ाई-झगड़ा होता रहे निरंतर, तो बात अलग है. ज़ुल्म सहने को नहीं कह रही मैं, किंतु बिना किसी ठोस कारण के अलग हो जाना भी तो ठीक नहीं? सवाल और भी हैं. प्यार क्या मौसमी बुख़ार है कि चढ़ा, तो ख़ूब गर्मा गए और उतरा, तो पहले-सी ठंड. या फिर प्यार आधुनिक फैशन-सा है, ‘मौजूदा कपड़े पहनकर हम बोर हो गए हैं. मार्केट में नए क़िस्म के कपड़े आ गए हैं, अब हम वही पहनेंगे.’
नाहिद प्यार के खुले इज़हार से बहुत प्रभावित रहती थी, लेकिन प्यार के इज़हार से इतर भी बहुत कुछ है. प्यार का इज़हार करना या न कर पाना अपनी व्यक्तिगत इच्छा एवं स्वभाव पर निर्भर है और जो हमारे समाज व संस्कृति से भी प्रभावित होता है. कहीं ऐसा तो नहीं कि आपको अपने प्यार की निरंतरता पर संदेह है, तभी उसे बार-बार दोहराते रहते हैं, साथी की वफ़ादारी पर भरोसा नहीं, तभी उससे बार-बार सुनकर आश्‍वस्त होना चाहते हैं. क्योंकि प्यार का खुला इज़हार तो क्या, कई बार प्यार बिना बोले भी व्यक्त कर दिया जाता है. बिना एक भी शब्द कहे स़िर्फ चेहरे और नज़रों से दिल की बात बयां कर दी जाती है. इससे भी बड़ा चमत्कार यह कि सामनेवाला पूरी तरह से उसे समझ भी लेता है.
उपहार किसे अच्छा नहीं लगता, पर क्या वही प्यार को जानने का पैमाना है? मृत पत्नी की कब्र पर ताजमहल खड़ा कर देनेवाले बादशाह का प्यार जितना सच्चा है, उतना ही झोपड़ी में लकड़ी की आंच पर रोटी सेंकती और पति को दाल के साथ सूखी रोटी परोसती स्त्री का भी है. उस पति का प्यार भी सच्चा है, जो तृप्त हो रोटी सेंकती अपनी पत्नी पर प्यार भरी एक नज़र डालता है. दरअसल, प्यार की कोई एक परिभाषा नहीं. जितने मनुष्य, उतनी ही प्यार की परिभाषाएं, अभिव्यक्ति के उतने ही तरी़के.
बस, यह विश्‍वास अवश्य होना चाहिए कि मेरे दुख-सुख का एक साथी है, जो ज़रूरत के समय मेरा संबल बनेगा. स़िर्फ यही एक एहसास सब उपहारों से बढ़कर है.

        उषा वधवा

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कहानी- रोल मॉडल (Short Story- Role Model)

Short Story- Role Model

Short Story- Role Model

“कोई भी इंसान सर्वगुण संपन्न या अपने आपमें पूर्ण नहीं होता. उसमें कुछ-न-कुछ कमियां अवश्य होती हैं, इसलिए किसी एक इंसान को अपना ‘रोल मॉडल’ मानना नासमझी है. इसी तरह हर इंसान में कोई ख़ूबी भी अवश्य होती है. हमें चाहिए कि हम उसकी उस ख़ूबी को अपना रोल मॉडल मानकर आत्मसात करें.”

शिखा से फ़ोन पर बात करके हमेशा शुभ्रा का मन हल्का हो जाता है, इकलौती लाड़ली बेटी जो ठहरी. लेकिन आज उसका फ़ोन सुनने के बाद शुभ्रा का मन भारी हो गया था. कल शिखा के कॉलेज का वार्षिकोत्सव था. उसे वर्ष का सर्वश्रेष्ठ विद्यार्थी चुना गया था. अपने भाषण में उसने शुभ्रा को अपना रोल मॉडल बताया था. वह बड़ी होकर शुभ्रा जैसी बनना चाहती है.
किसी भी मां के लिए यह फ़ख़्र की बात हो सकती है कि उसकी बेटी बड़ी होकर उसके जैसी बनना चाहे, लेकिन शुभ्रा के लिए बेटी का यह ख़्वाब किसी वज्रपात से कम न था. आज उसकी बेटी उसके जैसा बनना चाहती है, क्योंकि वह उसकी असलियत नहीं जानती. जिस दिन उसे अपनी मां की असलियत पता चलेगी वह उसका मुंह तक देखना पसंद नहीं करेगी. क्या वह सारी ज़िंदगी उस भयावह दिन के आने की आशंका में ही गुज़ार देगी? आशंका का यह पहाड़ वह कब तक अपने सीने पर लादे रहेगी और पल-पल घुटती-मरती रहेगी? नहीं, अब उससे और नहीं सहा जाएगा. वह आज अभी इसी व़क़्त शिखा को सब कुछ बता देगी, लेकिन कैसे…? बरसों की कहानी कुछ ही पलों में फ़ोन पर कैसे बतायी जा सकती है? वह शिखा को विस्तार से पत्र लिखेगी. हां, यही ठीक रहेगा. अब चाहे जो अंजाम हो. कांपते हाथों से शुभ्रा ने काग़ज़ क़लम उठा लिए.

बेटी शिखा,
सदा प्रसन्न रहो!
बहुत प्रयासों के बाद तुम्हें यह पत्र लिखने का साहस जुटा पाई हूं. वो भी इसलिए कि तुमने मुझे अपना रोल मॉडल चुना है. बेटी, तुम्हारे इस चयन से मैं अपनी ही नज़रों में गिर गई हूं. मैं तुम्हारे सामने आज अपना अतीत खोलकर रख रही हूं. मैं जानती हूं ऐसा करने के बाद मैं तुम्हें खो बैठूंगी, लेकिन मुझे इस बात की कोई परवाह नहीं. इस झूठ का बोझ मैं अब और नहीं ढो सकती. समझ में नहीं आ रहा कि कहां से शुरू करूं? चलो, शुरुआत अपनी ज़िंदगी के उस काले अध्याय से करती हूं, जिसने मेरी ज़िंदगी को गुमनामी के अंधेरे में डाल दिया.
मैं एल.एल.बी. अंतिम वर्ष में थी. एक दिन अपनी एक सहेली के यहां से लौटने में मुझे देरी हो गई. आंधी और बारिश के कारण बहुत जल्दी ही अंधेरा घिर आया था. मैंने जल्दी घर पहुंचने के चक्कर में एक शॉर्टकट पकड़ लिया. जाने कहां से घात लगाए एक दरिंदे ने मेरा मुंह दबाकर मेरा सब कुछ लूट लिया. मैंने किसी तरह अपने को संभाला और लुटी-पिटी अवस्था में घर तक पहुंची. वृद्ध मां-बाप को सच बताकर आघात पहुंचाने का साहस न कर सकी. मैंने कह दिया कि कीचड़ में पांव फिसल गया था और ऐसी हालत हो गई. उन्होंने सहज ही विश्‍वास भी कर लिया. नहा-धोकर मैंने तन पर लगे दाग़ तो छुड़ा लिए, लेकिन मन हमेशा के लिए कलुषित हो गया. घर में मेरी शादी की चर्चा चल रही थी, पर मैं इसके लिए मानसिक रूप से बिल्कुल तैयार नहीं थी.
दुख और निराशा मेरी ज़िंदगी पर इस कदर हावी हो गए कि एक दिन मैंने आत्महत्या करने की ठान ली और इसी इरादे से सरयू नदी की ओर चल पड़ी. वहां के शांत-एकांत वातावरण में एक नौजवान तस्वीर बनाने में लीन था. उसे देख मैंने अपना रास्ता बदलना चाहा. लेकिन उसने मुझे देख लिया था और मेरी मनोदशा ताड़कर बोला, “रुकिए! उधर नदी गहरी है.”
“आपसे मतलब…?” मैंने रुखाई से कहा.
“आप मरने जा रही हैं?”
‘तो?’
“क्या इसके अलावा आपके पास और कोई चारा नहीं बचा?”
“नहीं बचा तभी तो मरने जा रही हूं.”
“तो जाते-जाते अपनी समस्या मुझे बताती जाइए. शायद मैं कोई हल सुझा सकूं. आख़िर एक अंतिम प्रयास करने में हर्ज़ ही क्या है?”
मैं कुछ सोचने लगी.
“आप किसी को बताएंगे तो नहीं?”
“मैं तो नहीं बताऊंगा, लेकिन आपने आत्महत्या कर ली तो लोग उल्टे-सीधे कई कयास लगा लेंगे, मसलन- प्रेम में असफल, बलात्कार की शिकार या…”
“बस, बस…” मैं सुन नहीं पाई.
“ओह आई एम सॉरी. मैं आपको हर्ट नहीं करना चाहता था, लेकिन इतना ज़रूर कहूंगा कि दुनिया की कोई भी समस्या इतनी गंभीर नहीं कि उसके साथ जिया न जा सके. दुनिया में आपसे भी अधिक दुखी इंसान हैं, लेकिन वे भी तो जी रहे हैं. हो सकता है कल को आपकी ज़िंदगी में कुछ ऐसा हो जाए कि आप सोचकर सुकून महसूस करें कि अच्छा हुआ जो उस दिन मैंने कोई ग़लत क़दम नहीं उठाया.”
“आप मुझे बहला रहे हैं?”
“नहीं, मैं तो आपको हक़ीक़त बता रहा हूं. हो सकता है, कल को आपकी ज़िंदगी में इससे भी बुरा कुछ घट जाए…”
“नहीं, इससे अधिक बुरा कुछ नहीं हो सकता.”
“यह तो और भी अच्छी बात है. जब इतना बुरा आपके साथ पहले ही घट चुका है तो अब तो जो भी होगा, इससे तो अच्छा ही होगा.”

मैं उसके तर्कों के सामने लाजवाब हो गई. अपनी बातों से उसने मुझे विश्‍वास में ले लिया और मैंने उसे धीरे-धीरे सब कुछ बता दिया. रजत ने मुझे संभाला, समझाया और ज़िंदगीभर एक दोस्त की तरह साथ देने का वादा किया.

मैं लौट आई और फिर से अपनी पुरानी ज़िंदगी जीने का प्रयास करने लगी. रजत और मैं अच्छे दोस्त बन चुके थे. उन्हीं दिनों मुझे पता चला कि मैं गर्भवती हूं. मैंने यह बात रजत को बताई. अब हमारे पास सिवाय गर्भपात के कोई चारा नहीं रह गया था. लेकिन डॉक्टर ने यह कहकर इंकार कर दिया कि समय ज़्यादा हो चुका है और गर्भपात से मेरी जान को ख़तरा है. हम निराश लौट आए. रजत ने सुझाया कि मैं मां-पिताजी द्वारा पसंद किए गए लड़के से जल्द-से-जल्द शादी कर लूं, लेकिन यह मेरी आत्मा को गवारा नहीं हुआ. रजत ने मुझे समझाने की कोशिश की कि दुनिया में कोई तो लड़का होगा, जो सब कुछ जानते हुए भी मुझसे शादी करना चाहेगा.
मैं उसकी इस बात पर बिफर पड़ी, “झूठी तसल्ली मत दो. ऐसी हालत में कौन करेगा मुझसे शादी..? क्या तुम कर सकते हो?”
“म…मैं? नहीं.”
“बस हो गए न सब आदर्श हवा! जानबूझकर मक्खी कोई नहीं निगलना चाहता.”
“तुम ग़लत समझ रही हो. मैं तुमसे तो क्या किसी से भी शादी नहीं कर सकता, क्योंकि मैं उसे मातृत्व सुख नहीं दे पाऊंगा. एक दुर्घटना में मैं अपनी यह क्षमता गंवा चुका हूं.”
“जब मुझे तुमसे शादी करने में कोई ऐतराज़ नहीं तो तुम्हें क्यों है? हम दोनों की मजबूरी हमें शादी के बंधन में बांध सकती है.”
“मैं ऐसी शादी में विश्‍वास नहीं करता, जिसकी नींव ही मजबूरी पर टिकी हो. जहां प्यार हो, वहीं शादी होनी चाहिए.”
‘मैं तुमसे प्यार करती हूं रजत. अपनी मजबूरी के चलते तुम्हें नहीं बता पा रही थी.”

Short Story- Role Model
मेरे बहुत आग्रह करने पर वह मुझसे शादी के लिए तैयार हो गया. मां और पिताजी को भी हमने किसी तरह मना लिया और इस तरह हमारी शादी हो गई. नियत समय पर मैं मां भी बन गई. अपने जन्म का इतिहास जानकर तुम्हें बहुत धक्का लगा होगा. लेकिन बेटी बच्चे तो भगवान का रूप होते हैं. निश्छल, मासूम और पवित्र. चाहे उसके जन्म का कोई भी इतिहास रहा हो, इसलिए अपने प्रति कभी भी घृणा या हीन-भाव मन में न लाना. तुम्हारा जन्म भले ही असामान्य परिस्थितियों में हुआ, लेकिन तुम्हारी ज़िंदगी को ख़ुशियों से भरने में मैंने और तुम्हारे पापा ने कोई कसर नहीं छोड़ी. तुम्हें दुनिया की हर ख़ुशी देने की कोशिश की.
मेरी वकालत चल निकली थी और रजत भी एक कॉलेज में कला के शिक्षक हो गए थे. तुम नौ-दस बरस की हो चली थी, लेकिन रजत अब भी तुम्हें एक छोटी बच्ची की तरह ही दुलारते थे. तुम्हें गोद में बिठा लेते, तुम्हारे गाल चूम लेते. तुम भी उनके घर में आते ही उनसे लिपट जाती. घंटों तुम दोनों अकेले में हंस-हंसकर बतियाते रहते. यह सब देख मेरे मन में संशय का सांप फन उठाने लगा था. रजत तो जानते हैं कि तुम उनका ख़ून नहीं हो. कहीं बेटी के प्यार की आड़ में वे अपनी हवस तो नहीं बुझा रहे? मर्द जात का क्या भरोसा! मैं तो कोर्ट-कचहरी-मुक़दमों में उलझी रहती हूं. ज़्यादातर समय तो रजत ही शिखा के साथ होते हैं. वह बेचारी मर्दों के खेल क्या जाने? वह अबोध तो वासना और वात्सल्य का भेद ही नहीं समझती. मेरी सशंकित निगाहें और असहज व्यवहार रजत की आंखों से छुप न सकी. उन्होंने एक दिन मुझसे इसका कारण पूछ ही लिया. झिझकते हुए मैंने उन्हें अपना डर बता दिया. रजत के लिए यह किसी वज्रपात से कम न था. उन्होंने तुरंत घर छोड़कर जाने की तैयारी आरंभ कर दी. मैंने ऐसा कदापि नहीं सोचा था.
मैंने तुम्हारे पापा को रोकने का बहुत प्रयास किया, माफ़ी भी मांगी, लेकिन वे नहीं रुके. मैंने तुम्हें यह कहकर शांत कर दिया कि वे हमें ठुकराकर कहीं चले गए हैं.
कई सालों के बाद पता चला कि दूर एक शहर में उन्होेंने अपना प्रशिक्षण केन्द्र खोल लिया है. नीचे उनका पता और फ़ोन नंबर लिख रही हूं. मुझे मालूम है पत्र मिलते ही तुम तुरंत उनसे संपर्क करोगी. मैं उनसे कई बार मिली, फ़ोन पर भी संपर्क किया. मेरे प्रति उनके दिल में कोई द्वेष नहीं है. इतना सब होने के बावजूद उन्होंने मुझसे कभी नफ़रत नहीं की. सच तो यह है कि वे इन क्षुद्र भावनाओं से बहुत ऊपर उठ चुके हैं. उन्होंने अपना जीवन पूरी तरह कला के प्रति समर्पित कर दिया है. तुम्हें यदि ज़िंदगी में किसी को अपना रोल मॉडल बनाना है तो अपने पिता को बनाओ.
मैं जानती हूं यह पत्र तुम्हें मिलने पर मैं तुम्हें पूर्ण रूप से खो दूंगी, लेकिन मुझे इसका कोई मलाल नहीं है. किसी चीज़ को खोने का दुख तो उन लोगों को होता है, जिन्होंने उसे बहुत मेहनत से अर्जित किया हो. मेरा अपनी मेहनत से अर्जित तो कुछ भी नहीं है. यहां तक कि जो ज़िंदगी मैं जी रही हूं, वह भी रजत ने ही दी है. मुझसे शादी करके उन्होंने मुझे समाज में मान दिलाया, तुम्हें पिता का नाम दिया.
तुम्हें सब कुछ लिख देने के बाद मेरा मन हल्का हो गया है. मैं जानती हूं तुम इतनी परिपक्व और समझदार हो चुकी हो कि सब कुछ समझ सकती हो. मेरी ग़लतियां अक्षम्य हैं, इसलिए तुमसे क्षमा भी नहीं मांग रही हूं. मेरी ग़लतियों से सबक लेना और उन्हें तुम अपनी ज़िंदगी में न दोहराना. शायद इसी मामले में मैं तुम्हारी रोल मॉडल साबित हो सकूं.
तुम्हारी मां

पत्र ख़त्म करते ही शुभ्रा ने उसे तुरंत लिफ़ा़फे में डालकर पोस्ट कर दिया. कहीं फिर वह कमज़ोर न पड़ जाए. सात दिन व्यतीत हो चुके थे. शुभ्रा को न दिन में चैन था, न रात में.
शिखा को मेरा पत्र तो कभी का मिल चुका होगा. उसने अपने पापा से अवश्य ही संपर्क स्थापित किया होगा. बाप-बेटी का मिलन भी हो गया होगा. तो अब मैं किसका इंतज़ार कर रही हूं और क्यूं?
डिंग… डांग… डोरबेल की आवाज़ से शुभ्रा की विचार श्रृंखला टूटी. दरवाज़ा खोलते ही शिखा उससे लिपट गई.
“हाय ममा! गुड मॉर्निंग! कितना प्लेज़ेंट सरप्राइज़ दिया न मैंने आपको सवेरे-सवेरे! रूमा, अंदर आ जाओ. मीट माई मदर. यस! माय रोल मॉडल!”
रोल मॉडल! यह शिखा क्या कह रही है? क्या इसे मेरा पत्र नहीं मिला? हे भगवान, यह सब क्या हो रहा है? कितनी हिम्मत जुटाकर मैंने वह पत्र लिखा था. अब सब कुछ फिर से कैसे कह सकूंगी? असमंजस में डूबती-तैरती शुभ्रा के मुंह से बोल नहीं फूट रहे थे.
“रूमा! वह रहा बाथरूम. तुम फ्रेश होकर आओ. मैं तब तक ममा से बात करती हूं… कहां खो गई ममा?”
“तुम… तुम्हें मेरा…”
“मुझे आपका पत्र मिल गया था. एकबारगी तो आप पर बहुत ग़ुस्सा आया. सोच लिया था कभी आपका मुंह तक नहीं देखूंगी.”
“फिर…?” शुभ्रा व्यग्र थी सब कुछ जानने को.
“फिर मैं पापा से मिली. उन्हें आपका पत्र दिखाया. सारे गिले-शिकवे दूर हुए. मैं उनके गले लगकर ख़ूब रोई. आपके लिए ख़ूब बुरा-भला कहा. आपके पास कभी न लौटने की बात कही… उन्हें अपना ‘रोल मॉडल’ कहा… फिर पापा ने मुझे समझाया. उन्होंने कहा, ‘कोई भी इंसान सर्वगुण संपन्न या अपने आपमें पूर्ण नहीं होता. उसमें कुछ-न-कुछ कमियां अवश्य होती हैं, इसलिए किसी एक इंसान को अपना ‘रोल मॉडल’ मानना नासमझी है. इसी तरह हर इंसान में कोई ख़ूबी भी अवश्य होती है. हमें चाहिए कि हम उसकी उस ख़ूबी को अपना रोल मॉडल मानकर आत्मसात करें. तुम्हारी मम्मी ने अपना सतीत्व खो दिया था. लेकिन फिर भी हिम्मत जुटाई और दुबारा नई ज़िंदगी शुरू की, चाहे मेरी प्रेरणा से ही सही. पर उनकी यह जिजिविषा उन्हें रोल मॉडल मानकर आत्मसात करने योग्य है. उन्होंने ज़िंदगी में ग़लतियां कीं, लेकिन उन्हें क़बूल करने का साहस भी दिखाया. उनका यह आत्मबल और आत्मविश्‍वास आत्मसात करने योग्य है. संसार का हर इंसान तुम्हारा रोल मॉडल है यदि तुम उसकी एक ख़ूबी को आत्मसात करो. उन्होंने ही मुझे आपके पास लौटने की सलाह दी. उनके अनुसार, मेरी ज़रूरत आपको उनसे ज़्यादा है.
शुभ्रा सोच रही थी. रजत के बताए अनुसार वह हर इंसान में एक ख़ूूबी तो ढूंढ़ लेगी, लेकिन रजत में तो एक खामी ढूंढ़ना भी मुश्किल है.

 

        अनिल माथुर

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कहानी- कब तक? (Short Story- Kab Tak)

कहानी- कब तक

कहानी- कब तक

“आनंद चाहता, तो आठ साल पहले तुम्हारे द्वारा अस्वीकार किए जाने के बाद एक नई शुरुआत कर सकता था, पर उसने तुम्हारी माफ़ी का लंबा इंतज़ार किया है. साथ ही तुम्हारी मर्ज़ी को देखते हुए उसने अपने बच्चों से भी दूरी रखी. कब तक तुम जान-बूझकर इन नागफनी के कांटों को गले लगाओगी?”

”अब कैसा लग रहा है तुम्हें?” लतिका के पूछने पर कुमुद ने धीरे से सिर हिलाकर जवाब दिया, “अब मैं ठीक हूं, तुम भी अपना घर देखो. मैं संभाल लूंगी ख़ुद को, वैसे भी तीन-चार दिन में मुझे डिस्चार्ज कर ही देंगे.”
“विहान और मान्या को कुछ दिनों के लिए बुला लूं?”
“नहीं लतिका, विहान की नई-नई नौकरी लगी है और मान्या को ससुराल गए छह महीने ही तो हुए हैं. मैं नहीं चाहती कि उनकी ज़िंदगी में कोई उथल-पुथल हो. अभी यहां आनंद भी हैं, क्या सोचेंगे बच्चे?”
“क्या सोचेंगे मतलब? कुमुद, आनंद पति है तुम्हारा, मान्या और विहान का पिता है. इसमें सोचने जैसी क्या बात है?” लतिका आवेश में आ गई थी.
“लतिका, अब बहुत देर हो चुकी है. बच्चों को क्या जवाब दूंगी कि टूट गई मैं आनंद की माफ़ी के आगे. वैसे भी मैंने अपनी ज़िंदगी अपने तरी़के से जी है. मैं भावुकता में आकर आनंद को अपने अकेलेपन का फ़ायदा नहीं उठाने दूंगी.”
“कुमुद, वो तुम्हारे अकेलेपन का फ़ायदा नहीं उठाना चाहता है. मेरे कहने के बावजूद इन पंद्रह दिनों में एक क़दम भी नहीं रखा उसने तुम्हारे घर में. अपने मन की दुविधा को दूर करके पूछो अपने मन से कि वो क्या चाहता है? क्या एक मौक़ा तुम और नहीं दे सकती आनंद को?”
“नहीं…” कहकर कुमुद ने आंखें मूंद लीं. “प्लीज़ कुमुद, आठ साल से वो तुम्हारी माफ़ी का इंतज़ार कर रहा है. नफ़रत को गले लगाकर तुम थकी नहीं. मैं जानती हूं कि अभी भी आनंद के लिए तुम्हारे दिल में जगह है.”
“जगह थी, तुमसे बेहतर कौन जानता है? मैंने इन आठ सालों में उनसे कितनी नफ़रत की है, क्या तुम नहीं जानती?”
“कुमुद, आनंद के प्रति तुम्हारे प्यार ने ही इस नफ़रत को जन्म दिया है, वरना यूं नीम बेहोशी की अवस्था में तुम्हारे होंठों पर आनंद का नाम नहीं आता.” लतिका के खुलासे पर कुमुद ने अपने कान बंद कर लिए, तभी नर्स भीतर आ गई और लतिका से बोली, “मैडम, आप बाहर जाइए. अभी डॉक्टर सान्याल राउंड पर हैं.” लतिका बाहर आई, तो आनंद मिल गया, “अब कैसी है कुमुद?”
“ठीक ही है.”
“तुम बहुत थकी लग रही हो.” आनंद ने पूछा तो वह बोली, “थकी नहीं, परेशान हूं मैं, कुमुद की वजह से.”
“चाय पियोगी?” आनंद ने पूछा, तो उसने हामी भर दी. चाय का घूंट भरते हुए लतिका कुछ खोई हुई-सी बोली, “आनंद, जानते हो मुझे अब इस बात की ग्लानि होती है कि मैंने कुमुद को तुम्हारे ख़िलाफ़ इस हद तक भड़का दिया कि अब वो मेरी भी कोई बात सुनने को राज़ी नहीं है. काश! तुम्हारे और नेहा के रिश्ते के बारे में मैं आवेश में आकर कुमुद को कुछ न बताती, तो अच्छा होता. कम से कम नेहा से मोहभंग होने पर तुम्हारा कुमुद के पास वापस आना इतना मुश्किल तो न होता.”
“नहीं लतिका, जो मैंने किया है, वो माफ़ी के क़ाबिल नहीं है, इसलिए तुम ख़ुद को दोषी मत समझो. मेरे प्रति तुम सबकी नफ़रत मैं डिज़र्व करता हूं. मैं तुम्हारी सहेली को जानता हूं, वो मुझे कभी माफ़ नहीं करेगी. कुमुद माने या न माने, पर मैं अब भी उससे बहुत प्यार करता हूं. इंतज़ार तो मैं उसका हमेशा करूंगा और अब मैं इसी शहर में रहूंगा, क्योंकि मान्या और विहान उसके साथ नहीं हैं. ऐसे में उसका अकेले रहना ठीक नहीं है.”
कुछ देर की चुप्पी के बाद लतिका बोली, “आनंद सच-सच बताना, कुमुद के प्रति आज तुम्हारी जो भावनाएं हैं, कहीं वो उसके प्रति जन्मी कोई हमदर्दी तो नहीं? तुम्हारे अंदर बैठे गिल्ट को दूर करने का ज़रिया मात्र तो नहीं है?”
“नहीं लतिका, ये मेरा प्यार ही है, जो आठ साल से माफ़ी का इंतज़ार कर रहा हूं. और कितना साबित करूं मैं ख़ुद को. कुमुद के प्यार और समर्पण के बावजूद नेहा के प्रति मेरा आकर्षित होना निस्संदेह ग़लत था. ऐसा क्यूं हुआ, मुझे नहीं पता, पर कुमुद इस बात को कभी नहीं समझेगी कि नेहा की तरफ़ झुकने के बावजूद कुमुद के लिए मेरे मन में प्यार और सम्मान बना रहा. जब कुमुद ने मुझे अपने जीवन से निकाला, तब मुझे एहसास हुआ कि उसके बिना मेरा जीवन एक बड़ा शून्य है.”
आनंद का गला भर आया था. कुछ देर की चुप्पी के बाद वह बोला, “लतिका, तुमने कुमुद का बहुत साथ दिया है. क्या तुम कुछ और दिन उसके साथ रह सकती हो?” “आनंद, मुझे कोई प्रॉब्लम नहीं है, पर आज मेरा दिल्ली जाना बहुत ज़रूरी है. मुझे जैसे ही मौक़ा मिलेगा, मैं कुमुद के पास आ जाऊंगी. तुम तो कुमुद के पास हो ही. आज मेरी डॉ. सान्याल से बात हुई थी. वो बता रही थीं कि कल-परसों तक कुमुद को हम घर ले जा सकते हैं. तुम उसे घर तक छोड़ देना. मैं आज ही घर जाकर शांताबाई को समझा दूंगी, बाकी वो संभाल लेगी.”
दूसरे दिन सिस्टर मारिया गुलाब के फूलों का गुलदस्ता लेकर आई, तो कुमुद पूछ बैठी, “ये गुलाब किसने भेजे हैं?” तो मारिया मुस्कुराकर बोली, “आपकी सहेली ने. वो आज नहीं आ पाएंगी, आपके नाम ये चिट्ठी दे गई हैं.” कहते हुए उसने एक लिफ़ाफ़ा उसे पकड़ा दिया.
“अरे, उसने मुझे बताया भी नहीं. मैं घर कैसे…?” कुमुद की बात को बीच में ही काटते हुए नर्स बोली, “अरे! आपके हसबैंड हैं न? भई मानना पड़ेगा. आपकी इतनी सेवा की है, जिसकी कोई मिसाल नहीं है. जब आप होश में नहीं थीं, तब एक पल के लिए भी उन्होंने आपको अकेला नहीं छोड़ा. आप बहुत ख़ुशक़िस्मत हैं कि वे इतना ज़्यादा प्यार करते हैं आपसे.” नर्स की बात पर कुमुद कराह उठी. “अरे क्या हुआ, आज शायद पेनकिलर नहीं लगा है. अब थोड़ा दर्द तो सहना पड़ेगा.”
“दर्द ही तो सहती आई हूं अब तक और कितना…?” आगे के शब्द हिचकियों में डूब गए. सिस्टर कुछ सहम-सी गई थी, “मैं अभी डॉक्टर को बुलाकर लाती हूं.” मारिया के जाने के बाद कुमुद ने लतिका का पत्र खोला, जिसमें लिखा था- कुमुद मुझे माफ़ करना, मैं तुम्हे बिना बताए जा रही हूं, पर मेरा जाना ज़रूरी है. आनंद हैं, इसलिए मुझे तुम्हारी फ़िक्र नहीं है. एक समय था, जब मैंने कहा था कि आनंद को कभी माफ़ मत करना. तुम तो मेरे स्वभाव को जानती थी. मेरी नज़र में इंसान या तो ग़लत होता है या सही. वो कभी परिस्थितियों का शिकार भी हो सकता है, इस बारे में मैंने सोचा ही नहीं.
एक बात तुम्हें माननी पड़ेगी कि आनंद चाहता, तो आठ साल पहले तुम्हारे द्वारा अस्वीकार किए जाने के बाद एक नई शुरुआत कर सकता था, पर उसने तुम्हारी माफ़ी का लंबा इंतज़ार किया है. साथ ही तुम्हारी मर्ज़ी को देखते हुए उसने अपने बच्चों से भी दूरी रखी. कब तक तुम जान-बूझकर इन नागफनी के कांटों को गले लगाओगी? ये गुलाब के फूल देख, मैंने बड़े ध्यान से एक-एक कांटों को चुनकर निकाल फेंका है. अगर कोई रह गया हो, तो हिम्मत दिखाते हुए उसे तुम निकाल देना. मैं जल्दी वापस आऊंगी.
– लतिका
पत्र पढ़कर कुमुद आंखें बंदकर लेट गई. उसे याद आया एक दिन अस्पताल में जाने किस भावुक क्षण वो आनंद से पूछ बैठी थी, “क्या कमी रह गई थी आनंद, मेरे और बच्चों के प्यार में?” तो उसकी बात के जवाब में आनंद फफक पड़ा था. “एक बार मुझे माफ़ करके देखो कुमुद, तुम्हें शांति मिलेगी और मुझे जीवन.” पर इतना आसान कहां था आनंद को माफ़ करना. उसे याद आया, मान्या की शादी से पहले आनंद मान्या से मिलने घर आए थे, तो विहान ने कितनी बेरुखी दिखाते हुए कहा था, “आप क्यूं बार-बार मम्मी को परेशान करने आ जाते हैं? आपके लिए इस घर में कोई जगह नहीं है.” विहान की बात पर क्यूं कुमुद की सांस अटक-सी गई थी. आख़िर यही तो वह चाहती थी. बच्चों के मन में पिता के प्रति नफ़रत उसने ही तो पोषित की थी.
जब आनंद पहली बार माफ़ी की फ़रियाद लेकर आए थे, तो मान्या ने डरते-डरते कुमुद सेे कहा, “मां, प्लीज़ पापा को माफ़ कर दो न.” जवाब में कुमुद का करारा तमाचा उसके गाल पर पड़ा था. उस दिन के बाद आनंद को माफ़ कर देने की बात कभी नहीं उठी. कुमुद के रोष भरे आंसुओं में हमेशा यही प्रश्‍न होता कि क्यूं गए थे तुम, जब मुझे तुम्हारी सबसे ़ज़्यादा ज़रूरत थी? बड़े होते मान्या और विहान को पिता के मार्गदर्शन और संरक्षण की ज़रूरत थी. उम्र के उस पड़ाव में अपने से इतनी छोटी नेहा के आकर्षण में कैसे पड़ गए? काश! उनके बीच टिका ये क्षणिक रिश्ता वो जान ही न पाती, तो अच्छा होता. कम से कम समाज और बच्चों के सामने शर्मिंदा तो न होना पड़ता, पर ये बातें छिपती कहां हैं.

कहानी- कब तक
ऑफिस ट्रिप के बहाने साथ बिताए नेहा और आनंद के अंतरंग क्षणों के सबूत उसकी प्रिय सहेली लतिका ने दिए, तो शर्म से गड़ गई थी कुमुद. आनंद द्वारा किए गए विश्‍वासघात ने उसके वजूद के मानो टुकड़े कर डाले थे. उस वक़्त समाज, बच्चे, लतिका सब कुमुद के पाले में थे, पर वो किसे बताए कि एक आनंद के न होने से उसका पलड़ा हवा में तैरता प्रतीत होता था. व़क़्त के साथ सभी ने आनंद को माफ़ कर दिया, लेकिन संघर्षपूर्ण रास्ता तय करती कुमुद ने आनंद के प्रति रोष को जीवंत रखा.
विहान ने मां को अच्छा जीवन देने के लिए दिन-रात एक कर दिया. मान्या शुरू से ही होनहार थी. विवाह जैसी संस्था के प्रति उसका मोहभंग हो चुका था. ऐसे में जब आयुष मान्या के जीवन में आया और परिणति विवाह के रूप में हुई, तब कुमुद ने भी चैन की सांस ली.
विहान ने इंजीनियरिंग करके पुणे में अपने पैर जमा लिए थे. ज़िंदगी जैसी भी थी, चल तो रही थी, फिर उसकी ज़िंदगी को दोबारा उथल-पुथल करने आनंद क्यूं आ गए? अस्पताल में बिताए पंद्रह दिनों में वो शारीरिक और मानसिक रूप से कमज़ोर तो नहीं हो गई, जो दोबारा आनंद के प्रति तहों में दबी भावनाएं सिर उठाने लगी हैं. यदि ऐसा है भी, तो वह भयभीत क्यूं है? और किससे है? कहीं वह अपने ही बच्चों को जवाब देने से तो नहीं डर रही है? या डर है उसे आठ साल पहले ख़ुद से किए हुए उस वादे के ख़िलाफ़ जाने का कि वो आनंद को इस जीवन में माफ़ नहीं करेगी. कुमुद का सिर दर्द से फटने लगा था.
दूसरे दिन तमाम हिदायतों के साथ उसे डिस्चार्ज मिल गया था. “कुमुद, अपना ख़्याल रखना.” आनंद के शब्दों के प्रत्युत्तर में कुमुद उसे रोकना चाहती थी, पर उससे पहले ही गाड़ी की आवाज़ सुनकर शांताबाई दौड़ती हुई आई, उसे सहारा देकर अंदर ले आई. कुमुद ने पीछे मुड़कर देखा, तो आनंद दिखाई नहीं दिए. कुमुद ने कमरे में जैसे ही क़दम रखा. ‘वेलकम बैक’ की सम्मिलित आवाज़ ने उसे सुखद आश्‍चर्य में डुबो दिया. “अरे, विहान-मान्या तुम यहां…”
“मम्मी, मैं भी हूं.” आयुष कुमुद के पैर छूते हुए बोला.
“तुम लोग कब आए?”
“दो दिन पहले मेमसाब.” शकुंतला ने बताया, तो कुमुद विस्मय से बोली, “तुम लोग अस्पताल क्यूं नहीं आए?”
“क्योंकि हमें पता चला कि वहां पापा भी थे. हम तो डर गए थे कि कहीं पापा आपके अकेलेपन का फ़ायदा उठाकर आपकी ज़िंदगी में वापस न आ जाएं.” मान्या ने कहा, तो आयुष ने जवाब दिया, “इसमें बुरा क्या है मान्या?”
“तुमने मेरी मम्मी की तकलीफ़ देखी नहीं है आयुष.”
“पापा भी तो आठ साल से तुम लोगों से अलग रहने की सज़ा भोग रहे हैं. अगर इतनी शिद्दत से हम रिश्तों को बचाते, तो इन तकलीफ़ों से किसी को न गुज़रना पड़ता.” आयुष की बात कुमुद को चीर गई थी. सच ही तो कहा है इसने, आनंद की माफ़ी कहां कुमुद के ग़ुस्से को ठंडा कर पाई थी. आशा के विपरीत विहान शांत लगा, मानो हृदय में कोई मंथन चल रहा हो.
दो-तीन दिन सब साथ रहे. आनंद की कोई बात न होना कुमुद को अस्वाभाविक लग रहा था. आज सुबह-सुबह लतिका भी आ गई थी. विहान के पुणे जाने का समय पास आ गया था, एक रात पहले वह कुमुद से बोला, “मम्मी, आज मैं आपके साथ सो जाऊं.” कुमुद भीग-सी गई थी. तभी मान्या की आवाज़ आई, “आज मैं भी आपके साथ सोऊंगी.” कुमुद ने दोनों को प्यार से सीने से लगा लिया.
कुछ देर की चुप्पी के बाद अचानक विहान बोला, “मम्मी, क्या पापा का कसूर इतना बड़ा है कि हम उन्हें माफ़ नहीं कर सकते?”
“लोग क्या कहेंगे?” अनायास कुमुद के मुंह से निकला, तो विहान बोला, “जब पापा गए थे, तब भी तो लोगों ने कुछ नहीं कहा था.”
“पर तुम लोग तो ख़िलाफ़ थे न आनंद के?” तभी विहान ने कुमुद का हाथ अपने हाथों में लेकर कहा, “पापा ने जो किया, उससे आप बहुत आहत थीं. ये हम जानते थे. आप हमें स्वार्थी न कहें इस वजह से हमने उन्हें अपने क़रीब आने नहीं दिया, पर मम्मी वो हमारे पापा हैं. हर बच्चे की तरह हम भी चाहते हैं कि आप दोनों साथ रहें. बचपन में आपके भय ने हमें उनसे दूर रखा, अब ऐसा तो नहीं कि हमारा भय आपको पापा से दूर रख रहा हो.” कुमुद अपने अंतर्मुखी बेटे के मुंह से यह सुनकर अवाक् रह गई. कितनी आसानी से मानवीय रिश्तों के मनोविज्ञान को वह समझ गया था.
तभी मान्या बोली, “उस दिन जान-बूझकर पापा के लिए मेरे कहे शब्दों पर आप विचलित हो गई थीं न मम्मी? हम पापा का विरोध करके यह देखना चाहते थे कि उनके प्रति आपके मन में क्या है. मम्मी, पापा को बुला लो, आपके साथ हम भी उनका सामीप्य पाना चाहते हैं.” कहते हुए वह रो पड़ी, तो कुमुद भी स्वयं को रोक नहीं पाई, तभी लतिका आयुष के साथ अंदर आते हुए बोली, “कुमुद, हम तुम पर कोई दबाव नहीं डालेंगे लेकिन एक बार अपने पूर्वाग्रह से बाहर निकलकर सोचो. बच्चे तुम्हारी एक हां का बेसब्री से इंतज़ार कर रहे हैं.” कुमुद फूट-फूटकर रो पड़ी, तो लतिका ने इशारे से सभी को उसे चुप कराने के प्रयास को मना कर दिया.
कुमुद के बहते आंसू आनंद के प्रति नफ़रत को बहाते रहे. लतिका जानती थी कि अपनों की रज़ामंदी ने आनंद के प्रति जबरन दबाए प्यार को हवा दे दी है, ये बहते आंसू उसी सुकून के प्रतीक हैं. जहां कुमुद का अवचेतन मन इस पल का इंतज़ार कर रहा था, वहीं आनंद को कुमुद और अपने बच्चों की एक पुकार का इंतज़ार था.

         मीनू त्रिपाठी

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कहानी- सौग़ात (Short Story- Saugat)

कहानी, Kahani

कहानी, Kahani

उसकी तोतली बोली पहली बार साम्या के कानों में मिश्री घोल रही थी. उसकी उजली हंसी साम्या की आत्मा पर सालों से छाए अंधकार को मिटा रही थी. उसकी वो निश्छल आंखें ईश्‍वर के दर्शन करा रही थीं. साम्या के ममत्व की धार जो अब तक सूखी थी, आज फूट-फूटकर बहना चाहती थी. पिता की व्यस्तता ने उस मासूम से पिता का प्यार छीना, तो मां की बेरुखी ने ममता का अधिकार.

साम्या! जनता स्टोर से बाहर निकलते हुए सहसा अपना नाम सुनकर वह सकपका गई. यहां ट्रांसफर हुए अभी एक हफ़्ता ही हुआ है. यहां कौन जानता है? शायद वहम् हुआ होगा, यही सोचकर वह तेज़ क़दमों से आगे बढ़ गई, लेकिन वहम् सच बनकर सामने आ खड़ा हुआ. उसे यूं अचानक सामने पाकर वह जड़वत् हो गई और अतीत जैसे वर्तमान बनकर उभर आया.
वह नियत की आर्ट क्लासेस में पेंटिंग सीखने जाती थी. पेंटिंग सीखते-सीखते कब वह नियत से प्यार करने लगी, पता ही नहीं चला. उसकी इस चाहत को पढ़कर ही नियत ने उसे प्रपोज़ किया था, लेकिन ‘हां’ कहने से पहले उसने अपने माता-पिता की रज़ामंदी लेना ज़रूरी समझा.
“क्या? एक पेंटर से शादी? सपने में भी नहीं सोचना कि हम ऐसा होने देंगे. तुम्हें पेंटिंग का शौक़ था, इसलिए क्लासेस में भेज दिया, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि क़लम-कूंचीवाले से शादी कर लोगी. तुम इस राज्य के चीफ सेक्रेटरी की बेटी हो. तुम्हारी शादी होगी, तो किसी आईएएस या आईपीएस से.” मां ने तर्क दिया.
“…मगर मां, वो बहुत अच्छा इंसान है. मुझे बहुत चाहता है और फिर पेंटर होने में बुराई क्या है? वो इतनी अच्छी पेंटिंग करता है कि एक दिन ज़रूर क़ामयाब होगा. और नहीं करनी है मुझे आप लोगों की पसंद से किसी ब्यूरोक्रेट से शादी.” साम्या ने क्रोधपूर्वक कहा.
“समू बेटा, हम समझते हैं यह सब. लेकिन प्यार से पेट नहीं भरता और क्या गारंटी है उसकी सफलता की? आज क्या दे सकता है वो तुम्हें- बेकारी और ग़रीबी के सिवा.
ज़िंदगी चित्रकार के कैनवास पर नहीं, यथार्थ के धरातल पर रंग बिखेरती है, इसलिए मेरा भी यही फैसला है कि तुम्हारी शादी हमारे रुतबे के अनुसार होगी.” ब्यूरोक्रेट पिता ने आदेश सुनाया.
माता-पिता का अंतिम निर्णय आ चुका था, मगर वो अपने दिल को कैसे समझाती, जो हर पल नियत के लिए धड़कता था. उसकी पेंटिंग क्लासेस बंद कर दी गईं. बाद में पता चला कि नियत अपनी आर्ट गैलरी बंद कर कहीं चला गया था. साम्या जानती थी कि इसके पीछे उसके रसूख़दार पिता का हाथ था.
महीनों तक साम्या के चेहरे से उदासी के बादल नहीं छंटे. उसने अपनी पढ़ाई, पेंटिंग सब कुछ छोड़ दिया था. दिन-ब-दिन एक गहरे अंधेरे गड्ढे में धंसती जा रही थी वो. एक दिन नियत घर आया, “साम्या, मां ने गांव बुला लिया था और वहीं मेरी शादी भी तय कर दी. शादी की तैयारियों में इतना व्यस्त था कि बता नहीं पाया. अगले हफ़्ते मेरी शादी है. तुम ज़रूर आना.” उसने कहा.
साम्या को अपने कानों पर यक़ीन ही नहीं हो रहा था. जिस इंसान की चाहत में वो एक ज़िंदा लाश बन गई है, वो इतने दिनों अपनी शादी की तैयारियों में लगा था. उसने जी भर कर नियत को खरी-खोटी सुनाई, मगर उस कलाप्रेमी का हृदय नहीं पिघला. बिना कुछ कहे वो शादी का कार्ड रखकर चला गया.
बाद में न चाहते हुए भी साम्या ने पिता की इच्छा से एक ब्यूरोक्रेट से शादी कर ली. बात-बात में होनेवाली सरकारी, ग़ैर सरकारी पार्टियों में सज-संवरकर नकली मुस्कान ओढ़े जाना होता था उसे. लेकिन वह ख़ुश नहीं थी वहां. चाहकर भी उसकी आंखों से आंसू नहीं निकलते थे. घुटती ही जा रही थी भीतर ही भीतर.
इसी बीच उसने एक बेटी को जन्म दिया. जब उसका नाम नियति रखा, तो साम्या के माता-पिता की आंखें पथरा गईं. उन्हें लगता था कि शादी और संतान के बाद साम्या ख़ुश होगी, मगर आज साम्या की ज़िंदगी की
कड़वाहट उनकी आंखों में आंसू बनकर बह रही थी. साम्या विरह की आंच को कम करती, तभी तो ममता की शीतलता महसूस कर पाती. अपनी बेटी की ज़िंदगी की घुटन साम्या के पिता की ग्लानि बनकर उन्हें अंदर ही अंदर खोखला करती गई.
एक दिन बीमार पिता ने साम्या को अपने पास बुलाया.
“समू बेटा, मुझे माफ़ कर दो. मैंने तुमसे एक बहुत बड़ा सच छिपाया है. नियत ने शादी नहीं की है. मैंने उसके रिटायर्ड पिता की पेंशन बंद करवा दी थी, उसकी आर्ट गैलरी का रजिस्ट्रेशन रद्द कर दिया था. उसके घरवालों के लिए रोटी के भी लाले पड़ गए थे. उस पर बीमार मां का इलाज बंद हो गया था. उसे इतना मजबूर कर दिया कि वो उस दिन घर आकर तुम्हारे सामने झूठ बोलकर चला गया. वो शादी का कार्ड भी मैंने ही छपवा कर दिया था, ताकि तुम उसकी बात पर यक़ीन कर लो. शायद आज भी इंतज़ार है उसे तुम्हारा…” कहकर पिता ने अंतिम सांस ली.
आज तक साम्या समझ नहीं पाई थी कि नियत की बेवफ़ाई के बावजूद वह क्यों नहीं भुला पा रही है उसे? आज मालूम हुआ कि नियत तो आज भी उसी मोड़ पर खड़ा है, जहां साम्या ने उसे छोड़ा था.
मगर क्या साम्या में हिम्मत थी अपने पति और बेटी को छोड़ नियत की तलाश में निकल जाने की? विरह की अग्नि में झुलसना तो उसे मंज़ूर था, मगर क्या विवाह की अग्नि से बाहर निकलना उसके लिए संभव था- वो भी शादी के इतने सालों बाद? इसी उधेड़बुन में रहती थी कि तभी पति का डेपुटेशन पर जयपुर आना हुआ. साथ में साम्या और नियति भी आए. वह हमेशा सोचती थी कि यदि नियत उसके सामने आ गया तो क्या कहेगी, क्या करेगी, क्या संभाल पाएगी ख़ुद को, क्या उसके कांधे पर सिर रखकर अपने दुख उसे बता पाएगी?
“साम्या, तुम इसी तरह ख़ामोश खड़ी रही तो मुझे लगेगा कि तुमने मुझे माफ़ नहीं किया. मैंने जो भी किया था, मजबूरी में किया था. अंकल मेरे पास आए थे. उन्होंने बताया था कि वो तुम्हें सब कुछ सच-सच बतानेवाले हैं. आशा करता हूं कि तुम अब वो सारी बातें भुलाकर अपने परिवार में ख़ुश होगी.” नियत ने साम्या को झकझोरकर पूछा और वह अपने वर्तमान में लौटी.
“हं… हां नियत, ख़ुश हूं. बहुत ख़ुश हूं. तुम घर क्यों नहीं चलते? मेरी बेटी से भी…” मेरे शब्द मेरे कंठ में ही अटक गए.
“अरे हां. क्यों नहीं? अच्छा बताओ बेटी का नाम क्या रखा तुमने?” उसने पूछा.
“नाम… न… न…”
“क्या हुआ? अभी तक नाम नहीं रखा?”

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“तुम घर चलो. उसी से पूछना.” कहकर साम्या ने लंबी आह भरी, मगर मन में तूफ़ान उमड़ रहे थे कि जब उसका नाम पता चलेगा, तो क्या सोचेगा नियत?
घर की दहलीज पर बैठी नियति उसे देखते ही ‘ममा, ममा’ कहते हुए दौड़कर आई. वो अपने दोनों हाथ ऊपर किए उसे गोद में लेने को कह रही थी. यह उसका रोज़ का नित्यक्रम था और रोज़ साम्या आया को देखकर कह देती, इसे संभालो, मैं बहुत थकी हुई हूं. मगर आज ये शब्द भी गले में ख़राश बनकर अटक गए थे. इससे पहले कि साम्या उसे गोद में उठाती, नियत उसे गोद में उठा चुका था.
“हैलो अंटल, आपटा माम टा है.” नियति ने तुतलाती आवाज़ में कहा.
“मेला माम नियट है. आपका नाम क्या है?”
“अले वाह, आपटा माम नियट औल मेला माम निअटि है.” नियति का इतना कहना था कि नियत की आंखें साम्या से टकराईं और जैसे पराजित सिपाही शत्रु से बचता यहां-वहां भागता है, वैसे ही साम्या की निगाहें पल भर में कितनी ही वस्तुओं से जा टकराईं. तेज़ क़दमों से वह रसोई की ओर चल दी, मगर रह-रहकर आंखें नियत के साथ खेलती अपनी बेटी पर जा पड़तीं. उसकी तोतली बोली पहली बार साम्या के कानों में मिश्री घोल रही थी. उसकी उजली हंसी साम्या की आत्मा पर सालों से छाए अंधकार को मिटा रही थी. उसकी वो निश्छल आंखें ईश्‍वर के दर्शन करा रही थीं. साम्या के ममत्व की धार जो अब तक सूखी थी, आज फूट-फूटकर बहना चाहती थी. पिता की व्यस्तता ने उस मासूम से पिता का प्यार छीना, तो मां की बेरुखी ने ममता का अधिकार.
खाना बनाकर साम्या ने मेज़ पर लगाया और नियत को खाना खाने के लिए कहा. वह नियति की बातों में इतना खो गया था कि उसने आंगन में ही बैठकर खाने को कहा, ताकि वो उसके साथ खेलते-खेलते खाना खा सके. साम्या भी दोनों के साथ आंगन में ही बैठ गई. आज नियत के साथ नियति की ख़ुशी में शामिल होकर साम्या की सारी घुटन दूर हो गई. ऐसा लग रहा था कि सांसों को नई ऑक्सीजन मिल गई थी.
मालूम ही नहीं चला कब साम्या के पति अवकाश आ गए और उन तीनों को आंगन में बैठे खेलते और खाते देखने लगे. सहसा साम्या की नज़र अवकाश पर पड़ी. उसकी नज़रें आत्मग्लानि से झुक गईं. क्या सोच रहे होंगे अवकाश? और फिर क्यों उसके दिमाग़ में नहीं आया कि उसे फोन करके अवकाश को बता देना चाहिए था कि नियत घर पर आया है? फिर भी अपनी ग्लानि को दूरकर उसने अवकाश से कहा, “आप कब आए, पता ही नहीं चला. ये नियत हैं, मेरे पुराने दोस्त. मैं फोन करके आपको बताने ही वाली थी.”
“अरे, कोई बात नहीं. आप लोग डिनर जारी रखो. मैं हाथ-मुंह धोकर जॉइन करता हूं.” अवकाश ने नियत से हाथ मिलाकर कहा.
खाने के बाद अवकाश और नियत कुछ देर लॉन में टहलते रहे और फिर उसने हम सबसे विदा ली. एक हफ़्ता होने को आया है नियत को आए, ऐसे में साम्या की ख़ुशी, ज़िंदादिली तो जैसे फिर लौट आई थी. आज अचानक दोपहर में नियत आया.
उसने साम्या को एक तस्वीर थमाई और कहने लगा, “तुम्हें मालूम है, तुम्हारी बेरुखी और विरह में सबसे ज़्यादा किसने खोया है? तुम सोचती होगी कि तुमने अपनी मुहब्बत खोई है, अपने परिवार के रुतबे की वेदी पर. लेकिन नहीं साम्या, तुमसे कहीं ज़्यादा खोया है अवकाश ने.
उस दिन अवकाश मुझे लॉन में टहलने के लिए इसलिए ले गया, ताकि वो मुझसे तुम्हें और नियति को अपनाने की विनती कर सके. उसके चेहरे पर तुम्हारी तड़प और नियति के साथ हुआ अन्याय साफ़ झलक रहा था. उसने बताया कि किस तरह शादी की पहली रात ही तुम्हारे मन के घाव मृत जैसे तुम्हारे शरीर ने उसे बता दिए थे. बाद में उसने ऑफिस और घर-परिवार की पार्टी इत्यादि में तुम्हें ले जाकर तुम्हारा मन बदलने की कोशिश भी की, लेकिन हर बार तुम्हारी घुटन और बढ़ती जाती. अंततः अवकाश ने तय किया कि वो ख़ुद को काम में इतना झोंक लेगा कि चाहकर भी वो तुम्हें न चाहे और व़क्त आने पर वो तुम्हें उस व्यक्ति को सौंप सके, जिसकी विरह में तुम हर पल जल रही थी. नियति के जन्म पर हर बाप की तरह अवकाश भी बहुत ख़ुश था, लेकिन जब तुमने उसका नाम नियति रखा और तुम्हारे मम्मी-पापा के चेहरे से ख़ुशी ग़ायब हो गई, तो वह समझ गया कि इस नाम का तुम्हारे अतीत से कुछ संबंध है. तभी उसने अंकल से तुम्हारे अतीत के बारे में पूछा. अवकाश के कहने पर ही अंकल ने तुम्हें सब कुछ सच-सच बताया.
जब अवकाश को पता चला कि मैं यहां जयपुर में हूं, तो उसने डेपुटेशन के बहाने यहां ट्रांसफर करवा लिया, ताकि किसी बहाने से हम दोनों एक-दूसरे के सामने आ जाएं. उस दिन अवकाश ने मुझसे विनती की थी कि मैं तुम्हें और नियति को अपना लूं. लेकिन मैं यह नहीं कर सकता, क्योंकि तुम दोनों पर यदि किसी का सबसे ज़्यादा अधिकार है, तो वह है- अवकाश. मैंने तुम्हें जो तस्वीर दी है, उसमें तुम तीनों साथ हो. आशा करता हूं कि तुम्हारा निर्णय इस कल्पना को यथार्थ बना देगा.”
इतना कहकर नियत चला गया, लेकिन साम्या ने निर्णय लिया कि उसकी यह तस्वीर साम्या के परिवार के लिए सबसे अनमोल सौग़ात
बनकर रहेगी.

Nidhi-Chaudhary

      निधि चौधरी

 

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कहानी- लविंग मेमोरी (Short Story- Loving Memory)

Kahani Short Story Loving Memory

Kahani Short Story Loving Memory

मैं सोचने लगी- यह एकदम कैसा बदलाव आ गया विजय पाल में. प्रायश्‍चित के किस क्षण ने उनकी आंखों पर पड़ा परदा हटा दिया था. मन में उगे ईर्ष्या और अविश्‍वास के झाड़-झंखाड़ को जला डाला था. लेकिन वह तरुणा से अपना मन बदलने की बात क्यों छिपाना चाहते हैं? क्या पुरुष का थोथा अहम् उन्हें अब भी जकड़े हुए है? उन्हें तरुणा की दृष्टि में अपने छोटे होने का भय सता रहा है? क्या यह प्रायश्‍चित वह जूही के जीवित रहते हुए नहीं कर सकते थे?

 

अक्सर स्कूल से लौटते ही रचना पहले अपने जूते उतारकर, हाथ धोकर, बस्ता तथा दूसरी चीज़ें ठीक जगह पर रखकर मेरे पास आती है और उसका पहला सवाल होता है… आज खाने में क्या मिलेगा? लेकिन आज ऐसा नहीं हुआ. वह सीधी मेरे पास चली आयी. मैंने आश्‍चर्य से उसकी ओर देखा. वह हाथ में एक क़िताब पकड़े हुए थी. नज़रें मिलते ही उसने क़िताब मुझे थमा दी. फिर पन्ने पलटकर एक जगह उंगली टिकाकर मेरी ओर देखने लगी, बोली कुछ नहीं.

मेरी नज़रें उसकी उंगली पर टिक गईं- उस पृष्ठ पर एक लड़की का चित्र छपा हुआ था. बड़ी-बड़ी आंखें, दुबला चेहरा, होंठ सख़्ती के साथ आपस में सटे हुए. उम्र में रचना जितनी ही लग रही थी. फ़ोटो के नीचे एक पंक्ति छपी हुई थी. ‘इन लविंग मेमोरी ऑफ़ जूही… मिसेज़ तरुणा पाल.’
मैंने कहा- “अभी देखती हूं, आओ पहले कुछ खा लो.”
“नहीं, अभी खाने का मन नहीं है.” रचना ने कहा. उसकी उंगली अभी तक चित्र पर टिकी हुई धीरे-धीरे हिल रही थी. मैंने रचना को बांहों में भर लिया. उसके कपोल मेरे होंठों से छू गए. कुछ गीला-गीला लगा…
“अरे, क्या हुआ?” मेरे इतना कहते ही उसके शरीर का कंपन मेरे अंदर पहुंचने लगा. वह सुबक रही थी. मैंने रचना की पीठ थपथपा दी. उसे बांहों में लेकर प्यार करने लगी.
रचना धीरे-धीरे बता रही थी कि यह जूही का चित्र है, जो उसके स्कूल की छात्रा है और दूसरे सेक्शन में पढ़ती है. रचना कह रही थी- “मम्मी, मेरी कभी जूही से बात नहीं हुई. बस प्रेयर या आधी छुट्टी के समय कभी-कभी दिखार्ई दे जाती थी. एक दिन वह प्रेयर के समय बेहोश होकर गिर गई थी. तब प्रिंसिपल ने उसकी मां को बुलाया था. बीच में काफ़ी समय से मैंने उसे नहीं देखा.”
“शायद बीमार रहने के कारण स्कूल नहीं आ रही होगी.” मैंने कहा.
“और फिर सुना.. कि…. ” रचना आंसू पोंछने लगी.
“यह क़िताब तुम्हें कहां मिल गई?”
“लायब्रेरीवाली मैडम ने दी है.” कहकर रचना चुप हो गई. मैंने देखा उसकी आंखें छत पर टिकी थीं- गहराई से सोच रही थी कुछ. कुछ देर बाद रचना को नींद आ गई. मैं क़िताब उठाकर फिर से जूही का चित्र देखने लगी. मन में बार-बार एक ही विचार आ रहा था- जूही की मां तरुणा पाल को कितना दुख हुआ होगा. क्या हुआ होगा नन्हीं जूही को? मुझे याद था, एक बार जब रचना बीमार हो गई थी और काफ़ी समय तक स्कूल नहीं जा सकी थी तो मेरा मन कितना डरा-डरा रहता था. रचना सो रही थी और मैं सोच रही थी- कैसी होंगी मिसेज़ पाल.
दो दिन बाद मैं रचना के स्कूल गई. मैंने रचना से इस बारे में कुछ नहीं कहा था. दूसरी क्लासेस चल रही थीं, इसलिए लायब्रेरी में बस लायब्रेरियन ही बैठी थी. मैंने अपना परिचय दिया. उसका नाम सुलभा पांडे था. मैंने क़िताब दिखाकर जूही के बारे में पूछा तो उसकी आंखें भी गीली हो गईं. बोली- “बहुत अच्छी बच्ची थी. लायब्रेरी के पीरियड में क़िताब लेने अवश्य आती थी. देखने में ही बीमार लगती थी, चुप-चुप रहती थी. एक-दो बार मैंने बात करनी चाही, पर वह ज़्यादा कुछ नहीं बोली. फिर मैंने सुना कि जूही नहीं रही. सुनकर मन बहुत देर तक ख़राब रहा. मैंने कई बार उसे मां के साथ स्कूल में देखा था.”
सुलभा ने आगे बताया कि कैसे एक दिन जूही की मां तरुणा पाल लायब्रेरी में आई थीं. उन्होंने कहा था कि वह जूही की स्मृति में कुछ क़िताबें लायब्रेरी को देना चाहती हैं. “मैंने तरुणा पाल को प्रिंसिपल से मिलवा दिया था. फिर उन्होंने दो हज़ार रुपये दिये थे क़िताबों के लिए. इस बीच उनका कई बार आना हुआ. आज रचना जो क़िताब ले गई थी, यह उन्हीं पुस्तकों में से है.”
कुछ देर मौन छाया रहा. मैंने कहा- “क्या मैं जूही की मां से मिल सकती हूं?”
सुलभा ने कहा- “मिलेंगी तो उनके साथ-साथ आपको भी दुख होगा. रहने दीजिए.” पर मेरा मन नहीं मान रहा था, मैंने कहा- “अच्छा! आप मुझे उनके घर का पता तो दे दीजिए. हो सकता है मैं न जाऊं, पर कभी…”
सुलभा ने मुझे जूही के घर का पता दे दिया. कई दिन बीत गए. जब भी जाने की सोचती तो सुलभा पांडे की सलाह याद आ जाती और मेरे बढ़ते क़दम रुक जाते. फिर जाने का मन हुआ तो पाया कि पता लिखी हुई चिट न जाने मैंने कहां रख दी थी.

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एक दिन सफ़ाई करते समय अलमारी के पीछे गिरी वही चिट मिल गई, तो मैं ख़ुद को जाने से नहीं रोक सकी. तरुणा पाल के घर पहुंची, तो चार बज रहे थे. अब लग रहा था कि शायद मुझे नहीं आना चाहिए था. मृत जूही के बारे में उसकी मां से बातचीत उनका दुख ही बढ़ाएगी.
कॉलबेल बजाई, तो एक पुरुष ने दरवाज़ा खोला. उनकी आंखों में अपरिचय का भाव देख मैंने अपना नाम बताया और कहा- “मैं मिसेज़ तरुणा पाल से मिलने आई हूं.”
उन्होंने कहा- “आइए, अंदर आइए. तरुणा तो इस समय घर पर नहीं है. मैं हूं विजय पाल.”
विजय पाल यानी तरुणा पाल के पति और मृत जूही के पिता यह जानना चाह रहे थे कि मैंने आने की तकलीफ़ क्यों की थी. मैंने उन्हें रचना के बारे में बताया, फिर क़िताब खोलकर दिखाई- “हालांकि मैं जूही से कभी नहीं मिली, पर मुझे लगा…” मैं अपना वाक्य पूरा नहीं कर सकी. मैंने देखा मि. पाल ने क़िताब उठा ली थी और ध्यान से उस पृष्ठ को देख रहे थे.
कमरे में जैसे एक अशोभनीय मौन छा गया. मि. पाल की नज़रें अपलक जूही के चित्र पर टिकी थीं जैसे उन्हें यह याद ही नहीं रह गया था कि मैं भी उसी कमरे में बैठी थी. मैंने उनके शब्द सुने- “पर…. मैंने तो नहीं दीं ये क़िताबें…….”
उनकी प्रतिक्रिया सुनकर मैं चौंक गई, पर शायद वह ठीक ही कह रहे थे, क्योंकि जूही के चित्र के नीचे छपी पंक्ति में केवल तरुणा पाल का ही नाम था. विजय पाल का नाम नहीं था. उनकी ओर देखती हुई मैं सोच रही थी, आखिर क्यों नहीं था उसका नाम? इसके बाद विजय पाल ने क़िताब वापस मेरे हाथों में थमा दी. उनकी ख़ामोशी मुझे असहज बना रही थी. मैं क्षमा मांगकर उठ खड़ी हुई. विजय पाल ने कुछ नहीं कहा. बस, बाहरी दरवाज़ा खोलकर एक तरफ़ खड़े रहे. क्या यह साफ़ नहीं था कि मुझे वहां नहीं आना चाहिए था? अपने पीछे ज़ोर से दरवाज़ा बंद होने की आवाज़ ने मुझे कुछ चौंका दिया. तभी सामने से एक महिला आती दिखाई दी. उन्होंने मेरी ओर प्रश्‍न सूचक दृष्टि से देखा तो मैंने बता दिया कि मैं कौन हूं और क्यों आई थी.
इतना सुनते ही उनकी आंखों में आंसू आ गए. उन्होंने कहा- “मैं तरुणा हूं, आइए…..” मेरे हाथ पर कसी उनकी उंगलियों में थरथराहट थी. वह मुझे फिर से अंदर ले जाना चाहती थीं. मैंने धीरे से हाथ छुड़ा लिया. “मैं फिर कभी आऊंगी.”
“आइएगा, ज़रूर आइएगा…” तरुणा पाल ने कहा. उनके कपोलों में आंसुओं का गीलापन था और आंखें लाल हो गई थीं. मुझे लायब्रेरियन सुलभा पांडे की बात याद आ रही थी- ‘मिलेंगी तो उनके साथ आपको भी दुख होगा. रहने दीजिए.’ उन्होंने एकदम ठीक सलाह दी थी. अगर विजय पाल के व्यवहार से मुझे अपना आना ग़लत लगा था, तो तरुणा के दुख ने कहीं अंदर तक छू लिया था मुझे. मैं उनके साथ बैठकर कुछ देर तक बातें करना चाहती थी, लेकिन… दोबारा आने की बात कहकर मैं तरुणा पाल के पास से चली आई थी.
एक बात बार-बार परेशान कर रही थी- आख़िर समर्पण की पंक्ति तरुणा पाल के नाम पर ही क्यों ख़त्म हो गई थी. क्या जूही के चित्र के नीचे विजय पाल का नाम नहीं होना चाहिए था? तरुणा पाल बेटी के दुख में इतनी शोकाकुल थीं और विजय पाल… मुझे उनके शब्द याद आए- “पर… मैंने तो नहीं दीं ये क़िताबें.” उनका वाक्य बार-बार कानों में गूंज रहा था. और फिर तरुणा पाल की आंसू भरी लाल आंखें सामने कौंधने लगीं.
फिर पता ही नहीं चला कि मेरे क़दम कब मुझे रचना की स्कूल लायब्रेरी में ले गए. शायद मैं सुलभा पांडे से उनकी सलाह न मानने के लिए क्षमा मांगना चाहती थी.
“मैंने इसीलिए तो आपको जाने से मना किया था.” फिर धीमे स्वर में बोलीं- “जूही को लेकर मिस्टर और मिसेज़ पाल के बीच सदा तनाव रहता था. यूं तरुणा पाल यहां कई बार आईं और उन्होंने अपने और विजय पाल के बारे में सीधे-सीधे कुछ बताया भी नहीं. पर जो कुछ टुकड़ा-टुकड़ा बातें मैंने सुनी थीं, वही काफ़ी थीं.” फिर मेरी ओर झुककर सुलभा ने लगभग फुसफुसाते हुए कहा- “जानती हैं, विजय पाल जूही को अपनी बेटी नहीं मानते थे. न जाने क्यों उनके मन में वहम बैठ गया है कि तरुणा पाल उनके प्रति सच्ची नहीं हैं. तरुणा पाल ने पति को बहुत बार समझाया, लेकिन…”
मैं सोच रही थी- तो इसीलिए दिवंगत जूही के चित्र के नीचे तरुणा के साथ विजय पाल का नाम नहीं है.
“पति-पत्नी के तनाव का सबसे ज़्यादा असर बेचारी जूही पर पड़ा था. शायद उसके अस्वस्थ रहने के पीछे इस बात का सबसे ज़्यादा प्रभाव रहा हो.” सुलभा पांडे कह रही थी.
कैसे सहा होगा मां-बाप के बीच के इस तनाव को जूही ने? शायद पिता की उपेक्षा का दंश उसे सदा ही प्रताड़ित करता रहा हो और यही उसकी बीमारी का सबसे बड़ा कारण भी हो. औरतों के बारे में पुरुषों के पास एक यही तो सबसे बड़ा और धारदार हथियार होता है. औरत बार-बार आहत-मर्माहत होने पर भी उस चक्रव्यूह में रहने पर विवश होती है. मेरा मन हो रहा था कि अभी तरुणा पाल के पास जाऊं और उनसे ढेर सारी बातें करूं. वह बात न करना चाहें तब भी जान लूं कि उन्होंने विजय पाल का विरोध क्यों नहीं किया? नन्हीं जूही को तिल-तिल करके क्यों मर जाने दिया- क्यों?
सोचा अनेक बार, मैं गई नहीं… जा नहीं सकी. इस बार सुलभा पांडे की सलाह नहीं थी, पर मैं जान रही थी कि मेरे प्रश्‍नों के तीर तरुणा पाल को कहीं गहरे घायल न कर दें. पति का अविश्‍वास सहते-सहते ही उन्होंने जूही को खो दिया था. इस दुख का कोई मरहम नहीं था, हो भी नहीं सकता था.
मैं तरुणा पाल से नहीं मिल पा रही थी, पर अंदर से कुछ बार-बार कचोटता था. समझ में नहीं आता था कि मुझे क्या करना चाहिए. जब मन ज़्यादा बेचैन हुआ तो मैं सुलभा पांडे के पास फिर जा पहुंची. मैं ख़ुद नहीं जानती थी कि आख़िर मैं उनके पास क्यों आई थी.
मुझे देखते ही सुलभा पांडे की आंखें चमक उठीं. बोलीं- “मैं आपके बारे में ही सोच रही थी?”
“वह क्यों?”
“असल में मेरे अलावा केवल आप ही हैं, जो तरुणा पाल के बारे में जानती हैं.”
मुझे अब महसूस हो रहा है कि आपकी सलाह न मानकर मैंने तरुणा के घाव कुरेदने के साथ ही अपने मन पर भी भारी बोझ बैठा लिया है.” मैंने कहा.
“नहीं-नहीं, ऐसी बात नहीं है. बल्कि आपका जाना शायद अच्छा ही रहा. मेरे मना करने पर भी आप गईं, शायद इसीलिए….” सुलभा ने कहा.
सुलभा पांडे की बात मुझे आश्‍चर्य में डाल रही थी. “साफ़-साफ़ कहिए- क्या बात है?”
सुलभा पांडे ने मेरी बात का जवाब नहीं दिया, बस एक साथ कई पुस्तकें खोलकर मेरे सामने रखती चली गईं- एक ही वाक्य कहते हुए- “देखिए… देखिए.”
मैंने देखा और देखती रह गई- एक-दो नहीं आठ-नौ तस्वीरें जूही की मेरे सामने थीं और समर्पण की पंक्ति कुछ ज़्यादा ही चमक रही थी.
“इन लविंग मेमोरी ऑफ़ जूहीः तरुणा पाल, विजय पाल.”
“यह क्या!” मैंने सुलभा पांडे की ओर देखा.
“हां, आपने ठीक देखा. तरुणा पाल के नाम के आगे विजय पाल का नाम- और यह किसी और ने नहीं, स्वयं विजय पाल ने अपने हाथों से लिखा है.”
“विजय पाल ने लिखा है अपना नाम! कब?” मेरी उत्सुकता बांध तोड़ रही थी.
सुलभा पांडे चमकती आंखों से मुझे देख रही थीं. “एक दिन एक व्यक्ति यहां आया और उसने कहा कि वह विजय पाल है- तरुणा पाल का पति, जूही का पिता.”
मुझे अपने कानों पर विश्‍वास नहीं हो रहा था.
सुलभा का स्वर गंभीर था. बोली- “आने के बाद कुछ देर विजय पाल चुपचाप बैठे रहे जैसे अपनी बात कहने के लिए शब्द तलाश रहे हों, फिर झिझकते हुए कहा कि वह जूही के चित्र के नीचे अपना नाम लिखना चाहते हैं. सुनकर मैं तो हैरान रह गई. अगर यह वही विजय पाल थे, तरुणा पाल के पति, तो फिर… फिर… लेकिन मुझे @ज़्यादा कुछ पूछना नहीं पड़ा. उन्होंने धीरे-धीरे मन की सारी परतें खोल दीं मेरे सामने. उनके शब्द अभी तक मेरे कानों में गूंज रहे हैं. ‘जूही को मैंने मारा है. तरुणा मेरे कारण ही परेशान है. काश, मैंने पहले समझ लिया होता.’ और उनकी आंखों से आंसू गिरने लगे.
मैं क्या कहती, चुप रही. फिर मैंने जूही को समर्पित सारी पुस्तकें अलमारियों से निकालकर उनके सामने रख दीं और वे तरुणा पाल के नाम के आगे अपना नाम लिखते चले गए. मैं चुपचाप देखती रही. भला कहती भी क्या. सब पुस्तकों पर अपना नाम लिखने के बाद विजय पाल ने कहा- ‘एक बात है, मेहरबानी करके मेरे यहां आने और इस तरह अपना नाम लिखने की बात तरुणा को मत बताइएगा.’
“क्यों?”
‘कुछ मत पूछिए. बोलिए, क्या मेरी बात रख सकेंगी? मैं आपके किसी प्रश्‍न का उत्तर नहीं दे पाऊंगा.’ मैं कुछ कहती, इससे पहले ही विजय पाल यहां से चले गए.” कहकर सुलभा चुप हो गई.
मैं सोचने लगी- यह एकदम कैसा बदलाव आ गया विजय पाल में. प्रायश्‍चित के किस क्षण ने उनकी आंखों पर पड़ा परदा हटा दिया था. मन में उगे ईर्ष्या और अविश्‍वास के झाड़-झंखाड़ को जला डाला था. लेकिन वह तरुणा से अपना मन बदलने की बात क्यों छिपाना चाहते हैं? क्या पुरुष का थोथा अहम् उन्हें अब भी जकड़े हुए है? उन्हें तरुणा की दृष्टि में अपने छोटे होने का भय सता रहा है? क्या यह प्रायश्‍चित वह जूही के जीवित रहते हुए नहीं कर सकते थे?
न जाने कितनी बातें चक्रवात की तरह दिमाग में घूम गईं और मैंने सुलभा के सामने रखी पुस्तकों में से एक पुस्तक उठा ली, जिस पर लिखा था- ‘इन लविंग मेमोरी ऑफ़ जूही- तरूणा पाल, विजय पाल.’
सुलभा ने मुझे पुस्तक उठाने से रोका नहीं, पर प्रश्‍नभरी आंखों से मेरी ओर अपलक देखती रही. मैं उसका प्रश्‍न समझ रही थी- क्या मैं फिर से तरुणा के पास जाने की सोच रही थी?
मैंने सुलभा की आंखों का प्रश्‍न वहीं रहने दिया और चली आई. लेकिन नहीं, घर पहुंचने से पहले ही मेरे पैर तरुणा पाल के घर की ओर बढ़ गए थे. क़िताब मेरे हाथ में थी. विजय पाल ने सुलभा से कहा था कि लायब्रेरी में आकर पुस्तकों पर तरुणा के आगे अपना नाम लिखने की बात रहस्य ही रहने दें, लेकिन मैं कुछ और सोच रही थी.
तरुणा का दरवाज़ा बंद है. मेरी उंगलियां कॉलबेल दबाने के लिए कसमसा रही हैं. मैं विजय पाल का रहस्य तरुणा को अवश्य बताऊंगी. शायद तब तरुणा की आंखों में उनका क़द छोटा होने के बदले कुछ बड़ा ही हो जाए. शायद जूही को लेकर उनका अपना संताप भी कुछ कम हो जाए. चाहे मरने के बाद ही सही, जूही को उसके पिता मिल गए थे. मेरी उंगली कॉलबेल दबा चुकी थी.

– छवि गुप्ता

 

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