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पहला अफेयर: वो लड़की… (Pahla Affair: Wo Ladki)

Pahla Pyar Kahani

पहला अफेयर: वो लड़की… (Pahla Affair: Wo Ladki)

तब मैं 22 साल का दुबला-पतला शर्मीला युवक था. गणित में स्नातकोत्तर करने के बाद एक छोटे-से गांव के स्कूल में मुझे अध्यापक की नौकरी मिली. शहर में रहने के आदी मुझे गांव के नाम से ही रुलाई आ गई, किंतु नौकरी भी ज़रूरी थी, सो चला गया. वहां के जागीरदार साहब के यहां नीचे की मंज़िल पर एक छोटा-सा कमरा ले लिया किराए पर और रहने लगा.

घर कच्चा था, गोबर से लिपा हुआ. ऊपर की मंज़िल पर मकान मालिक का परिवार रहता था और नीचे के हिस्से में आधे भाग में गाय-ढोर बांधे जाते और आधे भाग में किराए के लिए छोटी-छोटी कोठरियां बनी हुई थीं, जिनमें से एक में मैं रहता था. कोठरी का एक दरवाज़ा बाहर सड़क पर खुलता था और एक अंदर के आंगन की तरफ़. जागीरदार साहब के बच्चे दिलीप और उसकी छोटी बहन सविता स्कूल के बाद अक्सर ही मेरे पास आ जाते और ख़ूब बातें करते. हालांकि दोनों ही 13-14 साल के ही थे, लेकिन न जाने क्यों मुझसे दोनों को ही बहुत लगाव था. जब भी समय मिलता, दोनों भागे चले आते.

उन्हीं से पता चला उनकी एक बड़ी बहन भी है, जो इंदौर में चाचा के पास रहकर बीए कर रही है. दोनों उसकी ही बातें करते रहते. वो कितनी सुंदर है, सुशील है, अन्य लड़कियों से अलग है, पढ़ने में तेज़ है. दोनों ने उसका इतना बखान किया कि मैं भी रात-दिन उसके बारे में सोचकर उससे मिलने को व्याकुल होने लगा. मन में उसकी छवि-सी बस गई. अब तो मुझे दिलीप और सविता का इंतज़ार रहता कि कब वे आएं और अपनी बहन विजया की बात करें. रातभर भी उसी का ख़्याल बना रहता मन में.

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पहली नज़र के प्यार के बारे में तो सुना था, लेकिन यहां तो मुझे बिना देखे ही प्यार हो गया था उससे. दिलीप से पता चला, वह दीपावली की छुट्टियों में घर आनेवाली है. अब तो मैं बेसब्री से राह देखने लगा. एक दिन ढलती सांझ में अचानक हल्ला हुआ… “दीदी आ गई… दीदी आ गई…” मेरी धड़कनें तेज़ हो गईं. दरवाज़े की दरार से देखने की बहुत कोशिश की, लेकिन अंधेरे में कुछ दिखाई नहीं दिया. तीसरे दिन सुबह खाट पर पड़ा था कि दिलीप की आवाज़ आई, “दीदी, मां बुला रही हैं…” और उत्तर में एक खनकदार स्वर उभरा “ये टोकरी डालकर आती हूं.” मैं तो सोच रहा था कि रोज़ उसकी मां वहां की सफ़ाई करती है, तो आज भी वही होंगी. मैंने दरार से झांककर देखा, चूड़ीदार-कुर्ता पहने, गुलाबी रंगतवाली

मासूम-सी लड़की सिर पर गोबर की टोकरी रखे आंगन में खड़ी थी. एक झलक ही देख पाया था कि वह गोबर फेंकने सामने मैदान में चली गई. किसी लड़के ने इस स्थिति में लड़की पसंद नहीं की होगी, लेकिन मैंने तय कर लिया कि इसी से शादी करूंगा.

20 दिनों में दो-चार बार ही उसकी झलक देख पाया और वह वापस चली गई. एक दिन शाम को दिलीप के साथ उसकी मां एक रिश्तेदार लड़की का फोटो लेकर आईं कि क्या वह मुझे पसंद है. मैंने तपाक से मना कर दिया. तब उन्होंने पूछा, “क्या आपको हमारी विजया पसंद है?” मैं शर्म के मारे कुछ बोल ही नहीं पाया, लेकिन दिल ख़ुशी से उछल पड़ा. मेरी चुप्पी पर वे निराश हो जाने लगीं, तभी दिलीप बोला, “मां, इन्हें दीदी पसंद है, ये शादी करने को तैयार हैं.” आज 55 साल हो गए हमारी शादी को, लेकिन आज भी गोबर की टोकरी सिर पर रखे हुए उसकी छवि आंखों में ज्यों की त्यों बनी हुई है.

– डॉ. विनीता राहुरीकर

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पहला अफेयर: तुम बिन… अधूरी मैं! (Pahla Affair: Tum Bin… Adhuri Main)

Pahla Affair Kahani

पहला अफेयर: तुम बिन… अधूरी मैं! (Pahla Affair: Tum Bin… Adhuri Main)

एक ख़्वाब थे तुम या मेरी हक़ीक़त… बस, आए… पलभर के लिए ठहरे… और ओझल हो गए… जैसे कोई नूर की बूंद तन-मन को भिगोकर चांद की आगोश में खो जाती है… जैसे कोई शबनम का क़तरा होंठों की दहलीज़ को छूकर, मदहोश करके, मन को प्यासा ही छोड़कर बिखर जाता है… इसी तरह से तुम भी आए थे, मेरी हस्ती पर छाए थे और फिर मुझे अधूरा करके चले गए… कैसे हो, कहां हो… मुझे आज तक पता नहीं… बस इतना पता है कि मैं अब तक वैसी ही हूं… तुम बिन अधूरी!

मुझे याद है, तुम्हारी वो पहली नज़र जो मुझे भीतर तक भिगो गई थी. बारिशों के मौसम में सावन के झूले की तरह तुम आए, मुझे ढलती शाम में भीगता देख अपना रेनकोट मुझे देकर बाइक पर तेज़ी से ओझल हो गए.

फिर कई दिनों तक तुम्हारा वहीं इंतज़ार करती रही थी मैं, पर तुम नहीं आए…

“हैलो मैम, कैसी हैं आप… आज तो बारिश नहीं हो रही, अब तो मेरा रेनकोट लौटा दीजिए. इस ग़रीब पर रहम कीजिए, मैं उस दिन के बाद रोज़ भीगकर घर जाता हूं.”

“ये अजीब बात है, बिन कहे, बिन बताए आप आए और चले गए. उसके बाद कहां ढूंढ़ती आपको. रोज़ आपका इंतज़ार करती थी यहीं, पर आप आज आए हैं.”

“क्या बात है, एक ही मुलाक़ात में इतनी बेक़रारी अच्छी नहीं. मेरा रोज़ इंतज़ार… वाह राहुल बेटा, काफ़ी डिमांड में है, एक ख़ूबसूरत हसीना तेरे इंतज़ार में थी…”

“बस-बस, मैं कोई तुमसे मिलने के लिए बेक़रार नहीं थी, बस तुम्हें थैंक्स कहना था और तुम्हारा सामान लौटाना था.”

“ठीक है, तो बोल दो थैंक्स और लौटा दो मेरा सामान…”

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“ये लीजिए, उस दिन से रोज़ बैग में इसका वज़न ढो रही हूं. वैसे थैंक्स मेरी मदद करने के लिए.”

“आप इतने दिनों तक मेरा इंतज़ार कर रही थीं, तो मेरा फ़र्ज़ है कि आपको कॉफी पिलाऊं… क्या मेरे नसीब में है ये?”

पता नहीं क्यों, मैं राहुल को मना नहीं कर पाई. एक तरह से तो वो अंजान ही था मेरे लिए, पर मैं उसके साथ चल पड़ी… कॉफी पीते-पीते ढेर सारी बातें हुईं हमारे बीच… और जाते समय राहुल ने कहा, “रूही, मेरा सामान लौटाया नहीं आपने… ये तो चीटिंग है.”

“नहीं, मैंने तो लौटा दिया… आपको ग़लतफ़हमी हुई है…”

“नहीं रूही, ये देखो, मेरा दिल, मेरे सीने में नहीं है… आपने चुपके से रख लिया अपने पास…”

जब राहुल ने रूमानी अंदाज़ में यह बात कही, तो अजीब-सी सिहरन हुई थी मेरे तन में… पहली बार किसी की बातों ने, किसी की नज़रों ने इस तरह से छुआ था मुझे. उसके बाद बातों का, मुलाक़ातों का सिलसिला चलता गया… हम क़रीब आने लगे कि एक रोज़ तुम अचानक चले गए मेरी ज़िंदगी से. बिना कुछ कहे, बिना कुछ बताए… मैंने बहुत इंतज़ार किया… पर तुम नहीं आए.

सारी आस टूट गई थी, फिर भी एक उम्मीद थी मन में कि तुम कभी न कभी आओगे, तब सारी शिकायतें कर लूंगी.

“मैम, आप मेरी सीट पर बैठी हैं शायद…” एक जानी-पहचानी आवाज़ ने मुझे चौंका दिया… मैं फ्लाइट में शायद ग़लत सीट पर बैठी हुई थी. नज़रें उठाकर देखा, तो सामने राहुल था…

उसे भी अंदाज़ा नहीं था कि मैं बैठी हूं. वो सकपका गया… पूरे रास्ते हमने कुछ नहीं कहा एक-दूसरे से. लैंडिंग के बाद मैंने देखा कि राहुल कुछ लंगड़ाकर चल रहा है. मैंने उसे रोका, बहुत-से सवाल थे मेरे मन में…

“क्या हुआ है तुम्हें. तुम ऐसे क्यों चल रहे हो…? राहुल, मुझे इस तरह बीच राह में छोड़कर चले गए, अब इस तरह चुप नहीं रह सकते तुम… तुमको बताना होगा…”

“रूही, उस शाम जब मैं तुमसे मिलकर वापस जा रहा था, तब मेरा एक्सीडेंट हो गया था. उसी में मेरा एक पैर ख़राब हो गया…”

“तुमने मुझे बताना भी ज़रूरी नहीं समझा… तुम्हें क्या लगा कि इतनी सी बात के लिए मैं तुम्हें छोड़ दूंगी…? इतना ही समझे हो मेरे प्यार को?”

“नहीं रूही, बात स़िर्फ इतनी होती तो भी मैं तुम्हारी ज़िंदगी से नहीं जाता, पर डॉक्टर्स ने बताया कि मेरी रीढ़ की हड्डी में गंभीर इंजरी हुई है, जिससे मैं अब कभी पिता नहीं बन सकता… तुम हमेशा कहती थीं कि हमारा घर होगा, बच्चे होंगे, मैं तुम्हारे सपने पूरे नहीं कर सकता…”

“राहुल, मेरा सपना तुमसे ही शुरू होता है, तुम पर ही ख़त्म… बच्चे तो बाद की बात है… मैं तुमसे प्यार करती हूं, जब तुम ही नहीं, तो मेरा अस्तित्व ही नहीं… तुम अब भी नहीं समझे मुझे… नहीं पहचाने मेरे प्यार को… तुम बिन अधूरी हूं मैं! हमेशा… ताउम्र…!”
राहुल ने मुझे अपनी गर्म बांहों में ़कैद कर लिया, ख़ुद से कभी न जुदा होने के लिए!

– गीता शर्मा

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पहला अफेयर: इंतज़ार (Pahla Affair: Intezar)

First Love Story

पहला अफेयर: इंतज़ार (Pahla Affair: Intezar)

मैंने पूछा ऊपरवाले से, क्यों करवाता है तू अपने बंदों से प्यार? जब सारी उम्र उनकी क़िस्मत में दे देता है इंतज़ार… आख़िर ऐसा क्यों होता है, मुहब्बत करनेवालों के साथ?

ये चंद पंक्तियां ही लिखी थीं कि उसका मुस्कुराता हुआ चेहरा मेरे सामने आ गया, जिसने मेरी रूह को छू लिया था. वो भी इस कदर कि वो तो मुझसे दूर चली गई, लेकिन अपने प्यार से मेरी रूह को महका गई. जब भी सांस लेता हूं, उसकी आंखें, उसकी यादें, उसकी बातें ख़ुशबू बनकर बिखर जाती हैं, हर लम्हा मुहब्बत मेरी निखर जाती है.

हां, उसके दूर जाने के बाद इस दिल में कोई भी समा न पाया. हर पल संग मेरे चलता है उसकी यादों का साया. सुनहरी रात के वो चंद पल मेरे जीवन की सबसे अनमोल पूंजी हैं, जिन्हें मैंने संभालकर रखा है अपने दिल में.

बात उन दिनों की है, जब मेरी कविताएं और रचनाएं लोगों को अपनी-सी लगने लगी थीं और कुछ लोग तो अपनी चाहतों की दास्तान मुझसे साझा करने लगे थे और उनके प्यार की कहानियां सुनकर मैं फिर से कुछ नया लिखने को प्रेरित होता था.

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ऐसे ही एक दिन लिखने बैठा ही था कि मोबाइल की रिंग बजी, जैसे ही आवाज़ सुनी, दिल में अजीब-सी हलचल हुई और कानों में मधुर संगीत घुल गया. मिश्री-सी मीठी आवाज़ ने कहा, “मैं मिस्टर राज से ही बात कर रही हूं ना?” मुझे पता ही नहीं चला कि कब मेरे दिल ने मुझसे ही बगावत कर दी और मैं उसकी तरफ़ खिंचने लगा.

बस, उस दिन के बाद शुरू हुआ बातों का कभी न ख़त्म होनेवाला सिलसिला और पता नहीं कब मेरे जीवन में उसकी मुहब्बत का रंग गहराई से चढ़ गया.

एक दिन अचानक उसने कहा, “मैं तुमसे मिलना चाहती हूं राज.” और वो दिन मेरी ज़िंदगी का सबसे ख़ूबसूरत दिन था, मौसम तो ख़ुशनुमा था ही, पर आसमान ने भी मानो रंग बदल दिया, अचानक प्यार बनके बूंदें बरसाने लगा. काले रंग की साड़ी में वो ऐसे लग रही थी, मानो चांद को काले बादलों ने ओढ़ रखा है, चेहरे पर बूंदों का शृंगार…

आज भी मेरे ज़ेहन में वो तस्वीर ़कैद है, जिसकी मैं पूजा करता हूं और हमेशा करता रहूंगा. तुम्हारे जाने के बाद, इंतज़ार रहता था कि कब तुम्हारा फोन आएगा… पर न जाने क्या हो गया कि न तुम्हारा कोई फोन आया, न ही कोई मैसेज… क्यों तुमने मेरे दिल की मरुभूमि पर मुहब्बत के फूल उगाए?

पर मुझे कोई शिकायत नहीं है, दिल को आज भी तुम्हारा इंतज़ार है और ताउम्र रहेगा. आज सारे लोग मेरी मुहब्बत के पैग़ाम पढ़ते हैं, बस मेरा ही दिल जानता है कि वो किसके लिए तरसता है.

काश! तू भी मेरे लेख या कहानी से जान जाए या कोई पैग़ाम भेज दे, ताकि ये इंतज़ार की घड़ियां थम-सी जाएं और प्यार की बरसात हो जाए.

– वीना साधवानी

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पहला अफेयर: खिला गुलाब की तरह मेरा बदन… (Pahla Affair: Khila Gulab Ki Tarah Mera Badan)

Pahla Affair

पहला अफेयर: खिला गुलाब की तरह मेरा बदन… (Pahla Affair: Khila Gulab Ki Tarah Mera Badan)

पहले प्यार (First Love) का एहसास होता है बेहद ख़ास, अपने फर्स्ट अफेयर (Affair) की अनुभूति को जगाने के लिए पढ़ें रोमांस से भरपूर पहला अफेयर 

एक अरसे बाद तुम्हें देखा, ज़्यादा नहीं बदले थे तुम… पर हमारा रिश्ता बदल चुका था. वो प्यार का रिश्ता, वो मुहब्बत, वो चाहत अब कहीं मन म दबकर दम तोड़ चुकी थी.

बेइंतहा चाहती थी मैं तुम्हें, पर पता नहीं क्यों तुम पर भरोसा शुरू से ही नहीं था. तुम्हारा वो अजीब-सा व्यवहार… कभी बेहद प्यार और अपनापन, तो कभी अजनबियों सा बर्ताव. हर बार पूछने पर कहते कि एक नई लड़की से दोस्ती हुई है… उसी से बात करता हूं… मैं तुम्हें समझाती कि फ्लर्ट करना एक हद तक ठीक है, लेकिन अगर तुम हमारे रिश्ते को लेकर संजीदा हो, तो यह सब कहां तक जायज़ है और तुम हंसकर कहते, बता तो देता हूं न तुम्हें सबकुछ… ख़ैर इसी तरह से दिन गुज़र रहे थे. पर कुछ समय से महसूस कर रही थी कि तुम कुछ ज़्यादा ही इग्नोर कर रहे थे मुझे. पूछने पर वही टालने वाला अंदाज़… लेकिन मैं अपने रिश्ते को एक नाम देना चाहती थी, पर तुम्हारे साथ कितनी दूर तक जा सकती थी यही सोचकर एक ़फैसला लिया…

“विकास, मुझे नहीं लगता कि तुम मुझे लेकर सीरियस हो. मैं इस रिश्ते को अब और आगे नहीं ले जा सकती…”

“रितिका, मैं टूट जाऊंगा तुम्हारे बिना… ये सब मेरा मस्ती-मज़ाक, इसे इतना सीरियसली क्यों ले रही हो…?”

“मुझे कंमिटमेंट चाहिए, पर मुझे नहीं लगता कि तुम कभी भी ज़िंदगी में एक सच्चे लाइफ पार्टनर बनकर मेरा साथ दे सकोगे. बस, ये आख़िरी मुलाक़ात है हमारी, इसे फाइनल गुड बाय समझो.”

“रितिका, प्यार का रिश्ता इतनी आसानी से स़िर्फ गुड बाय कहने से नहीं टूट जाता. मैं ताउम्र तुमसे प्यार करता रहूंगा और तुम्हारा इंतज़ार भी.”

मैं चली आई थी वहां से. शहर भी छोड़ दिया था. नए शहर में दिन गुज़र रहे थे, पर तुम्हारी यादें पीछा नहीं छोड़ रही थीं. लेकिन व़क्त हर ज़ख़्म को भर देता है और तुम्हारी सोशल साइट्स देखकर कभी लगा भी नहीं कि तुम मुझे मिस करते हो. शायद तुम भी यही चाहते थे.
आज फिर उसी शहर में पूरे 3 साल बाद आना हुआ. तुम्हें पता चला, तो तुमने मिलने की गुज़ारिश की. मैंने भी हां कर दी कि चलो एक दोस्त के नाते ही मिल लेने में हर्ज़ ही क्या है… तुम्हारा घर वैसे भी मेरे होटल रुम के पास ही था.

डोर बेल बजाते हुए हाथ कांप रहे थे. बहुत कुछ चल रहा था मन में. तुमको देखकर सोचा नहीं था धड़कनें इतनी तेज़ हो जाएंगी. क्या मैं अब भी तुम्हें भुला नहीं पाई? क्या अब भी प्यार करती हूं तुमसे? नहीं, मुझे नहीं लगता… पर ये हाल क्यों है फिर दिल का… तुमने वही शर्ट पहनी थी, जो मैंने तुम्हारे बर्थडे पर गिफ्ट की थी.

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“कैसी हो रितु? बहुत क्यूट लग रही हो, हमेशा की तरह…”

“मैं ठीक हूं, तुम कैसे हो?”

“तुम्हारे बिना कैसा हो सकता हूं मैं? एकदम तन्हा और अधूरा हूं. तुम्हारी छोटी-छोटी ग़लतफ़हमियां हमारे रिश्ते को कहां ले आईं देख रही हो न?”

“मेरी ग़लतफ़हमियां या तुम्हारी आदतें और लापरवाहियां?”

“चलो, मान लिया मैं ही ग़लत था, पर आज भी इन आंखों को तुम्हारा ही इंतज़ार रहता है. मेरी ज़िंदगी में अगर कोई और होता, तो क्यों इस तरह तुम्हारे क़दमों में झुका रहता?”

“तुम्हारी सोशल साइट्स को देखकर तो नहीं लगता कि तुम्हें मेरा इंतज़ार है.”

“रितु, सोशल साइट्स को क्यों तुमने प्यार को परखने का पैमाना मान लिया है. क्या मेरी आंखों में नहीं दिखता तुम्हें?”

“घर काफ़ी अच्छा सजाया है तुमने.”

“तुम्हारे बिना ये घर नहीं स़िर्फ ईंट-पत्थरों का मकान है, रितु मेरी ज़िंदगी में वापस आ जाओ, मेरे इस मकान को घर बना दो प्लीज़…”
यह कहते हुए तुमने मेरा हाथ थाम लिया. तुम्हारी उस छुअन में अजीब-सी कशिश थी. उस गर्माहट में खो सी गई थी मैं. मेरे बदन में सिहरन-सी होने लगी थी. मैंने झटके से हाथ छुड़ा लिया. तुम फिर मेरे क़रीब आए और मुझे गले से लगा लिया. मैं चाहकर भी ख़ुद को तुमसे अलग नहीं कर पाई… तुमने वही मेरा पसंदीदा गाना प्ले कर रखा था… न जाने क्या हुआ, जो तूने छू लिया… खिला गुलाब की तरह मेरा बदन… उस मदहोशी के आलम में किसी भी शिकवे-शिकायत की जगह नहीं थी, बस बेपनाह प्यार था. अब हमें दो से एक होना था. इसी ख़्याल ने मुझे और भी निखार दिया था…

– गीता शर्मा

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पहला अफेयर: तुम्हारा मुजरिम! (Pahla Affair: Tumhara Mujrim)

Pahla Affair

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पहला अफेयर: तुम्हारा मुजरिम! (Pahla Affair: Tumhara Mujrim)

पहले प्यार (FirstLove) का एहसास होता है बेहद ख़ास, अपने फर्स्ट अफेयर (Affair) की अनुभूति को जगाने के लिए पढ़ें रोमांस से भरपूर पहला अफेयर 

क्यों इस तरह अधूरा छोड़कर चले गए तुम मुझे… मुकम्मल होने को बेक़रार था इस बार मेरा तन-मन, तुम्हारे साथ, तुम्हारी उस छुअन की वो सिहरन… तुम्हारा यूं लगातार मुझे देखते रहना… अपने हाथों से मुझे खाना खिलाना… इतना सारा व़क्त हमने एक साथ गुज़ारा… फिर ये कैसी प्यास जगाकर मुझे तन्हा छोड़ दिया… जानती थी कि तुमको तो लौटना जाना है एक दिन अपने लोगों के बीच… अपनों में… पर मेरा क्या… मुझे अपना बनाकर क्यों बेगानों में यूं छोड़ गए?

तुमने तो कहा था कि इस बार जब मैं आऊंगा, तो तुमको अपने साथ ही लेकर जाऊंगा… फिर क्यों इस तरह बिना हमारी ज़िंदगी का फैसला किए तुम चले गए… कितने दिन बीत गए, न तुमने कोई फोन किया, न तुम्हारी कोई ख़बर आई…

मुझे लगने लगा है अब तो जैसे ये रिश्ता, ये प्यार बस एक फरेब था… तुम्हें जो चाहिए था, वो तुमने पा लिया… अब पीछे मुड़कर देखने के लिए क्या बचा था तुम्हारे लिए… अगर मेरी परवाह होती, तो ज़रूर हमारे प्यार का सिलसिला आगे बढ़ता…

मेरी ज़िंदगी तो रुकी हुई है अब भी उसी मोड़ पर, बस किसी तरह धक्का मारकर चला रही हूं… पर अब जो सच सबके सामने आएगा, उसका सामना मैं कैसे करूंगी… मैं प्रेग्नेंट हो गई हूं… और मेरे बच्चे को कौन अपनाएगा? यही सोच-सोचकर परेशान हूं… स़िर्फ रितिका को इस सच के बारे में पता है…

“हैलो, प्रिया… कैसी हो…?”

“रितिका, मैं कैसी हो सकती हूं तुम ही बताओ… मैं कुछ डिसाइड ही नहीं कर पा रही.”

“तुम इस बच्चे को जन्म देने के बारे में सोच भी कैसे सकती हो, जो इंसान तुमको मंझधार में छोड़कर चला गया, तुम उसके बच्चे को दुनिया में लाने के लिए सबसे दुश्मनी ले लोगी?”

“ये बच्चा स़िर्फ उसका ही नहीं, मेरा भी है… पर शायद तुम सच कह रही हो, बस, कल तक मैं कोई न कोई निर्णय ले लूंगी.”

आज ऑफिस में भी मन नहीं लग रहा… डॉक्टर से अपॉइंटमेंट ले लेती हूं, भला मैं उस धोखेबाज़ इंसान के लिए अपनी ज़िंदगी दांव पर क्यों लगाऊं…

“प्रिया… सुनो, हैलो… प्रिया शर्मा!”

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अपना नाम सुनकर मैं चौंक गई, पीछे मुड़कर देखा, तो ये क्या… “विक्रम, तुम आज अचानक यूं? मैं तो समझी थी कि तुम अब तक भूल चुके होगे कि प्रिया नाम की भी कोई लड़की थी तुम्हारी ज़िंदगी में…”

“प्रिया, मुझे पता है, तुम मुझे फरेबी, धोखेबाज़ और न जाने क्या-क्या समझ रही होगी… पर मेरी मजबूरी थी…”

“ऐसी क्या मजबूरी थी विक्रम कि तुम एक फोन या एक मैसेज तक नहीं कर पाए?”

“प्रिया, हम किसी कॉफी शॉप में बैठकर बात करें?”

“बात करने के लिए अब बचा ही क्या है… मुझे डॉक्टर के पास जाना है, जो कहना है, यहीं कहो…”

“ठीक है प्रिया, दरअसल मैं जिस कंपनी में जॉब करता था, वहां बहुत बड़ा फ्रॉड हुआ था, जिन्होंने फ्रॉड किया था, उन्होंने मुझे बुरी तरह फंसा दिया था, क्योंकि मैंने कुछ दिन पहले ही उनकी शिकायत कंपनी के ओनर से की थी. मैं छुट्टी पर था, तो उन्होंने मौक़ा देखकर मुझे ही फंसा दिया और पुलिस में शिकायत तक दर्ज करवा दी.

मेरे घर वापस जाते ही पुलिस ने मुझे गिरफ़्तार कर लिया और मैं इन सबके बीच तुमसे कोई संपर्क न कर सका…
मेरे दोस्तों ने सच्चाई का पता लगाया और पुलिस की जांच के बाद सारा सच सामने आ गया. मैं अगर मुजरिम हूं, तो बस तुम्हारा… और अब तुम्हारा ये मुजरिम तुम्हारे सामने है, जो सज़ा दोगी, मैं सहने को तैयार हूं.”

मेरी आंखों से आंसू बह निकले… कभी-कभी छोटी-छोटी ग़लतफ़हमियां बड़े-बड़े रिश्ते तोड़ देती हैं…

“प्रिया, क्या सोच रही हो… और तुम डॉक्टर के पास क्यों जा रही हो? सब ठीक तो है न…?”

“विक्रम, आज तुम अगर नहीं आते, तो मुझसे बहुत बड़ा पाप हो जाता… क्या हम कॉफी शॉप पर चलकर बात करें…”

विक्रम और मैंने कॉफी शॉप में ढेर सारी बातें कीं…

“प्रिया, मैं पापा बननेवाला हूं, इससे बड़ी ख़ुशी की बात और क्या हो सकती है? चलो, आज ही घरवालों से चलकर बात करते हैं… मेरे घर में सभी तैयार हैं, मैं तुम्हारी लिए ही यहां आया था.”

“विक्रम, अगर तुम सही व़क्त पर न आते, तो मैं ख़ुद को कभी माफ़ नहीं कर पाती…”

“अब तो मैं आ गया न… तुम्हारा मुजरिम… तो जो हो सकता था वो मत सोचो, अब जो ख़ुशियां आनेवाली हैं हमारी ज़िंदगी में उनका स्वागत करो…”

– गीता शर्मा

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पहला अफेयर: तुम मेरे हो… (Pahla Affair: Tum Mere Ho)

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पहले प्यार (FirstLove) का एहसास होता है बेहद ख़ास, अपने फर्स्ट अफेयर (Affair) की अनुभूति को जगाने के लिए पढ़ें रोमांस से भरपूर पहला अफेयर 

उस चेहरे को देखने के बाद गौतम को कभी किसी और चेहरे को देखने की चाह नहीं हुई… उसे पहली बार देखते ही गौतम का मन उसकी ओर जाने लगा था. उसने कभी सोचा भी नहीं था कि कभी कोई पलभर में ही इस तरह अपना हो जाएगा… उसके जीवन की वो सबसे सुहानी और सबसे ख़ूबसूरत सुबह थी… जब वो लड़की अपने कमरे की खिड़की के पास हर बात से बेपरवाह होकर अपनी घनेरी ज़ुल्फ़ों को सुलझाने में व्यस्त थी. उस समय सुबह की शीतल हवा के चंचल झोंके उसके ख़ूबसूरत बालों की महकती ख़ुशबू चुराने की चाह में उन्हें और भी बेतरतीब किए जा रहे थे… उसके भीगे सौंदर्य की लावण्यता और भी निखार पर थी.

फिर अचानक ही गौतम को अपनी ओर देखता पाकर उसकी भृकुटि कुछ तन-सी गई और फिर न जाने क्या सोचकर एकाएक बड़ी मोहक अदा के साथ उसके मदभरे होंठों की लाली एक दिलकश मुस्कान बनकर उसके लबों कर खिल उठी… उस समय गौतम कुछ और भी संशय में पड़ गया था. उसकी आंखों में एक नकली रोष था और अपने एक ख़ास अंदाज़ में वह उसे निरंतर देखे जा रही थी, फिर पलक झपकते ही अचानक वह गायब हो गई.

अभी एक माह पहले ही हमारे घर के ठीक सामनेवाले मकान में एक परिवार रहने आया है. मां ने बताया था कि वे उनके मायके अंबिकापुर से आए हैं. इस परिवार में पांच सदस्य हैं और उनमें शालिनी नाम की बहुत सुंदर उनकी एक बेटी है, जो यहां के आई.आई.एम. कॉलेज में पढ़ रही है. शालिनी की मां के साथ उनका हमेशा एक बहन जैसा अपनापन रहा है और वे दोनों कॉलेज के ज़माने से एक-दूसरे की बहुत अच्छी दोस्त व सहपाठी रही हैं.

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आज सुबह शालिनी का उसे इस तरह देखने का वो रहस्यमय अंदाज़ अब उसकी समझ में आने लगा था और आज सुबह ही अपने ऑफिस जाने के लिए जब वह घर से निकला, तो उसी समय शालिनी भी बड़े बेबाक अंदाज़ में चलते हुए उसके पास आकर रुकी और अपना दायां हाथ आगे बढ़ाकर उसे अपना परिचय देते हुए कहा, “मैं शालिनी…” तब गौतम ने भी उसके कोमल हाथ को थामकर तुरंत जवाब दिया, “और मैं गौतम…” तब उसका नाम सुनकर उसने शरारत से मुस्कुराते हुए कहा, “अरे, मैंने तो सोचा था आपका नाम अक्षय कुमार या रणबीर कपूर होगा…” तब गौतम ने भी जवाब में कहा, “ज़रूर होता, अगर आपका नाम दीपिका पादुकोण या प्रियंका चोपड़ा होता…” इसके पहले कि वो कुछ कहती, गौतम ने घर की ओर इशारा करते हुए कहा, “जाइए, मां घर पर हैं और आपका इंतज़ार कर रही हैं.” अब गौतम की बारी थी उसे हैरान करने की.

आज ही उसे पता चला था कि शालिनी का प्रतिदिन उसके घर में आना-जाना होता है. गौतम की मम्मी के साथ उसका बड़ा गहरा लगाव था. गौतम की मम्मी शालिनी को बेहद प्यार-दुलार करती हैं. गौतम ने जब अपनी भाभी से शालिनी की बात की, तो उन्होंने कहा, “मेरे प्यारे देवरजी, मम्मी तो उसे अब मेरी देवरानी बनाने जा रही हैं. वो हम सबकी पहली पसंद है.” बस, अब गौतम को कुछ कहने की ज़रूरत ही नहीं थी… इतने में ही शालिनी के खिलखिलाने की आवाज़ उसे अपनी मम्मी के कमरे से आई और वो हंसी सीधे उसके दिल में उतर गई… उसका पहला प्यार हमेशा के लिए उसका होने जा रहा था… गौतम सोचकर मन ही मन मुस्कुरा उठा!

– दिशा राजवानी

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पहला अफेयर: तुम्हारा प्यार मिला… (Pahla Affair: Tumhara Pyar Mila)

Pahla Affair

पहला अफेयर: तुम्हारा प्यार मिला… (Pahla Affair: Tumhara Pyar Mila)

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मेरी वफ़ा का सिला मुझको शानदार मिला… गीत की यह लाइन मेरी ज़िंदगी की हक़ीक़त है. आज हमारी प्रीत 45 बरस की हो गई. आज भी तुम्हारे होंठों पर वह क़ातिल मुस्कान है, जो मुझ पर जादू कर गई थी. आज तुम मौन हो, कितने दिनों से तुमने मुझे ‘मन्ना’ कहकर नहीं पुकारा. पहले जब तुम पुकारते मन्ना… तो मिठास घुल जाती वातावरण में. कहनेवाले सच ही कहते हैं कि हाथ में जिसका नाम होता है, उसे ऊपरवाला मिलवा ही देता है. हम भी कुछ यूं ही मिले थे.

सांची हमारे परिवार की पसंदीदा जगह थी. जब भी मन करता मम्मी-पापा और हम दोनों बहनें सांची चले जाते. उन दिनों लड़कियां कार तो चलाती थीं, पर मोटरसाइकिल चलानेवाली लड़कियां बस दीदी और मैं ही थीं. जब हम निकलते, तब उसकी निगाह हम पर होती. दीदी तो न केवल मोटरसाइकिल चलातीं, बल्कि उसको सुधारने में भी माहिर थीं.

बारिश की झड़ी लगी थी. कॉलेज में छुट्टी का माहौल था. मन उकता रहा था. दीदी ने कहा, “चल सांची तक घूमकर आते हैं.” मैंने भी हामी भर दी. पापा की कार पर सवार होकर हम दोनों बहनें चल पड़ीं. रास्ते में एक जगह भीड़ जमा थी. कोई दुर्घटना घटी थी. हम दोनों भी पहुंचे. एक महिला अचेत पड़ी थी और घायल लड़का मदद की गुहार लगा रहा था. फ़ौरन दीदी और मैंने उस अचेत महिला और युवक को गाड़ी में बैठाया और अस्पताल भागे.

महिला और युवक दोनों अचेत थे. हमने पापा को भी ख़बर करवा दी. पुलिस भी आई. उनकी शिनाख्त हो गई. अगले दिन जब हम लोग हालचाल जानने पहुंचे, तो युवक होश में आ चुका था. “हैलो, मैं मनोज शास्त्री, भोपाल में प्रोफेसर हूं.” दीदी और मैंने औपचारिक बातचीत की, फिर लौट आए. यूं मिलने-मिलाने के दौरान मनोज बड़े भले-भले से लगे. एकदम सहज, मुस्कान क़ातिलाना थी, मगर दीदी तो मनोज की फैन हो गईं. आख़िर दोनों ही साइंसवाले थे और मैं इतिहास की स्टूडेंट.

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एक दिन मनोज की मम्मी घर आईं और उन्होंने रिश्ते की बात की. “अपने दोनों बेटों के लिए आपकी दोनों बेटियों का हाथ मांगती हूं.” झटपट सब तय हुआ और फिर जल्द शादी हो गई. बस, हम एक बार ही मिले थे और वो भी कुछ ही पलों के लिए. ससुराल में जब पहली बार हम मिले, तो इन्होंने कहा, “मैं तुम्हें मन्ना ही कहा करूंगा, मेरी मन्ना…” सच, उस दिन के बाद से हर दिन, हर पल तुमने अपनी मन्ना के मन को टूटने न दिया. प्यार का यह एहसास कितना अनमोल था. साल-दर-साल हमारी भूमिकाएं बदलीं, पर तुम्हारा प्यार कभी कम न हुआ. वो बढ़ा, बढ़ता चला गया, बच्चों को भी उनकी मुहब्बत की मंज़िल दिलवाने में तुमने कोई कसर बाकी न रखी.

हमारे बहू और दामाद दोनों अलग-अलग धर्मों के हैं, पर इस कदर वो हम में घुल-मिल गए हैं कि धर्म कहीं पीछे छूट गया है. आज जब मैं लड़खड़ा रही हूं, तो बच्चे मेरा संबल हैं और उनके भीतर छुपा तुम्हारा प्यार!

दो महीने बीत चुके हैं. मुझे अपने प्यार पर यक़ीन है और देखो, आज जब मैं तुम्हारे बाल बना रही थी, तो तुमने हौले से कहा, “मन्ना!” तुम्हारे होंठों को हिलते देखा मैंने. एक दिन तुम होश में आओगे… इस एक्सीडेंट ने तुम्हें भले ही कोमा तक पहुंचा दिया, पर मेरा प्यार तुम्हें मुझ तक वापस पहुंचाएगा… मेरे मन्ना.

– राजेश्‍वरी शुक्ला

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पहला अफेयर: मुहब्बत उम्र की मोहताज नहीं (Pahla Affair: Mohabbat Umra Ki Mohtaj Nahi)

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पहला अफेयर: मुहब्बत उम्र की मोहताज नहीं (Pahla Affair: Mohabbat Umra Ki Mohtaj Nahi)

पहले प्यार (FirstLove) का एहसास होता है बेहद ख़ास, अपने फर्स्ट अफेयर (Affair) की अनुभूति को जगाने के लिए पढ़ें रोमांस से भरपूर पहला अफेयर 

ईश्‍वर ने जब इस सृष्टि की रचना की, तो उन्होंने सृष्टि की प्रत्येक वस्तु को नियमों में बांध दिया. सूरज के उगने और डूबने का स्थान और समय पहले से निर्धारित कर दिया. जहां पंछियों को उड़ने का सौभाग्य प्राप्त हुआ, वहीं इंसान आकाश में मुक्त होकर विचरण करने की कल्पना तक नहीं कर सकता. जहां दिन का आगमन रोशनी के साथ होता है, वहीं रात का स्वागत अंधकार करता है. लेकिन स़िर्फ एक ही चीज़ है इस सृष्टि में, जिसको ईश्‍वर ने सभी नियमों से मुक्त रखा है. वह चीज़ है- प्यार!

प्यार किसी को भी, कहीं भी, किसी से भी हो सकता है. यह इस सृष्टि की सबसे रहस्यमयी रचना है. प्रेम में उम्र और जन्म का बंधन कोई मायने नहीं रखता. यही वजह है कि मुझे जिस व्यक्ति से प्यार हुआ, वो मुझसे उम्र में 22 साल बड़े थे. जब इस ख़ूबसूरत एहसास को मैंने पहली बार महसूस किया, उस व़क्त मेरी उम्र मात्र 16 साल थी और वो 38 साल के थे. वो शादीशुदा थे.

मुझे आज भी वो दिन अच्छी तरह याद है, जब मेरे मोबाइल पर उनका संदेश आया था. मेरे मोबाइल पर किसी अज्ञात नंबर से कुछ रोमांटिक पंक्तियां आई थीं. मैंने सोचा कि कोई लड़का मेरे साथ बदमाशी कर रहा है. मैंने ग़ुस्से में आकर फोन लगाया और जमकर उनको बातें सुनाईं, पर उन्होंने मेरी गालियों का ज़रा भी बुरा नहीं माना, बल्कि नम्रतापूर्वक मुझसे आग्रह किया कि मैं उनकी दोस्ती स्वीकार कर लूं.

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पता नहीं, उनकी आवाज़ में क्या जादू था कि मुझ जैसी लड़की, जो हमेशा लड़कों से दूर रहती थी, ने एक अंजान शख़्स के आग्रह को स्वीकार कर लिया. इस घटना के बाद लगभग 20 दिनों तक हम एक-दूसरे से फोन पर बातें करते रहे. इन 20 दिनों में मैं यह तो बहुत अच्छी तरह समझ चुकी थी कि ये वही हंसान हैं, जिसकी मुझे तलाश थी.

इन 20 दिनों के बाद हम कई बार एक-दूसरे से समंदर के किनारे मिले. समंदर के किनारे बैठकर हम दोनों ही आई पॉड पर बजते संगीत का आनंद लेते थे और बिना एक-दूसरे से एक शब्द भी बोले अंधेरा होने तक समंदर को निहारते रहते थे. उस पल मुझे ऐसा महसूस होता था कि काश! ऐसा होता कि मैं अपनी सारी ज़िंदगी इसी तरह उनके साथ समंदर के किनारे बैठकर गुज़ार देती.

ऐसी ही एक ख़ूबसूरत शाम थी, जब उन्होंने मुझे अपनी बांहों में लेकर चूमा था. वो मेरी ज़िंदगी के पहले और आख़िरी पुरुष थे, जिन्होंने मेरे शरीर के साथ-साथ मेरी आत्मा को भी छुआ था. हमें एक-दूसरे से मिले स़िर्फ एक साल ही हुआ था कि उनका तबादला दूसरे शहर में हो गया. उसके बाद हम कभी नहीं मिले.

मेरी तो दुनिया ही वीरान हो गई. इस बीच उनका पत्र मुझे मिला, जिसमें उन्होंने अपने प्रेम का इज़हार किया और इस असफल प्रेम कहानी पर दुख व्यक्त किया. वो मजबूर थे. एक तरफ़ उनकी पत्नी और बेटे की ज़िम्मेदारी थी, तो दूसरी तरफ़ हमारे प्रेम को समाज की स्वीकृति कभी प्राप्त नहीं होती.

आज इस बात को 20 साल हो गए, पर आज भी मैं उनको भूल नहीं पाई. मेरे जीवन का कोई ऐसा दिन नहीं गुज़रता जब मैं उनको याद नहीं करती. ईश्‍वर से यही दुआ करती हूं कि वो जहां भी रहें, हमेशा ख़ुश रहें.

हालांकि मेरी क़िस्मत में उनसे जुदाई ही लिखी है, जिसे मैंने अब स्वीकार कर लिया है, क्योंकि किसी ने सच ही कहा है- कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता…

– सोनी दुबे

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पहला अफेयर: मैसेजवाला लड़का… (Pahla Affair: Messagewala Ladka)

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पहला अफेयर: मैसेजवाला लड़का… (Pahla Affair: Messagewala Ladka)

पहले प्यार (FirstLove) का एहसास होता है बेहद ख़ास, अपने फर्स्ट अफेयर (Affair) की अनुभूति को जगाने के लिए पढ़ें रोमांस से भरपूर पहला अफेयर 

तुमने उस रोज़ जब नज़रों से छुआ था मुझे, आज भी उस नज़र का असर ये है कि पूरा बदन सिहर उठता है… वो पहली मुलाक़ात थी हमारी… और पहली ही मुलाक़ात में इतने क़रीब आ जाना… न मैंने कुछ सोचा था, न तुमने… हम तो बस सोशल मीडिया के ज़रिये मिले थे, तस्वीरों से ही जानते थे…

मुझे याद है आज भी, तुम्हारा पहला मैसेज… ‘हैलो जी, आप कैसी हो? ठीक-ठाक ही होंगी… ये मेरा नंबर है… आपसे दोस्ती करनी है…’
फिर इसके बाद लगातार न जाने कितनी बार तुम्हारे मैसेजेस आते गए और मैं इग्नोर करती गई… फिर एक रोज़ देश की राजनीतिक स्थिति को लेकर तुमने एक तस्वीर भेजी, मैं ख़ुद को रोक न सकी… जवाब देना ज़रूरी समझा. सो दिया. हमारी राजनीतिक सोच अलग थी. ख़ैर, मुझे कौन-सी तुमसे शादी करनी थी. अगली सुबह तुमने सॉरी लिखा… उसके बाद फिर वही सिलसिला… लगातार मेरी तस्वीरों पर कमेंट और मैसेजेस… पर अब तुम्हारी हिम्मत और बढ़ गई थी… अब तुम सीधे-सीधे आई लव यू… मिस यू… न जाने कितनी गुस्ताखियां करने लगे थे.

पर मुझे क्या हुआ था, मैंने तुम्हें ब्लॉक भी नहीं किया… यह तो मैं जानती थी कि तुम वो नहीं हो, जिसको मैं जीवनसाथी के रूप में देखना चाहूंगी, पर तुम्हारा मैसेज करना अब अच्छा लगने लगा था. हालांकि मैं स़िर्फ इग्नोर कर रही थी कि अचानक तुमने लिखा- ‘मैं तुम्हारे शहर आया हूं, तुमसे मिलने… यह मेरा नंबर है, प्लीज़ एक बार मिल लो. बस, एक बार बात कर लो.’

ख़ैर, मैंने तुम्हें पागल-दीवाना समझकर फिर इग्नोर कर दिया. तुम आहत थे मेरे इस बर्ताव से, लेकिन मैं भी कहां ग़लत थी. मैंने तुम्हें मैसेज भी किया था कि हम एक-दूसरे को जानते भी नहीं हैं, ऐसे कैसे प्यार कर सकते हो तुम मुझसे… तुमने सरलता से जवाब दिया था कि बात ही नहीं करोगी, तो ज़िंदगीभर अंजान बने रहेंगे.

मैंने फिर एक दिन लिखा- ‘आख़िर चाहते क्या हो?’

तुमने फिर सरलता से जवाब दिया- ‘तुम्हें. मुझे क्यों इतना इग्नोर कर रही हो. तकलीफ़ होती है. मुझे प्यार है तुमसे. ज़िंदगीभर साथ निभाऊंगा, बस एक बार भरोसा करके देखो.’

‘प्यार तुम्हें हुआ है, मुझे नहीं. ये तुम्हारी समस्या है. मैं जानबूझकर तुम्हें तकलीफ़ नहीं दे रही. स़िर्फ तस्वीरें देखकर कोई किसी से प्यार नहीं कर सकता.’

‘तो रू-ब-रू मिल लो. मैं तो आया ही था. पर तुमने नज़रअंदाज़ कर दिया. वैसे भी सूरत से कहीं ज़्यादा सीरत मायने रखती है और देखने-दिखाने की ज़रूरत उन्हें होती है, जो डे-टुडे प्यार बदलते हैं…’

‘ये प्यार नहीं, आकर्षण है, लस्ट है… जिसे तुम प्यार समझ रहे हो… बस, मेरा पीछा छोड़ो, वरना ब्लॉक कर दूंगी.’ मैंने ग़ुस्से में जवाब दिया था.

‘मेरे प्यार को वासना का नाम मत दो, बात अगर स़िर्फ जिस्म की है, तो अंधेरी रातों में बाज़ार और मंडियां सजती हैं… अब तुम चाहो, तो मुझे बेझिझक ब्लॉक कर सकती है, पर मेरे प्यार को वासना बोलकर गाली मत दो.’ तुम्हारे इस जवाब ने मुझे शर्मिंदा कर दिया था.

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‘सॉरी, मैंने ग़लत शब्द का इस्तेमाल किया. मैं स़िर्फ यह कहना चाह रही हूं कि आकर्षण को प्यार समझ रहे हो तुम.’

‘तुम मिलना चाहती हो न? चलो मिल लेते हैं एक बार, फिर तुम जो निर्णय लोगी, उसे अपनी तक़दीर मान लूंगा, प्यार न सही, इंतज़ार तो मिलेगा मुझे.’

‘ठीक है, अपना फोन नंबर दो. आज शाम को कॉल करूंगी. लेकिन एक बात याद रखना कि मैं फोन पर ज़्यादा बात नहीं करती और न ही यह पसंद करूंगी कि कोई मुझे बेवजह कॉल करके परेशान करे. ’ मैंने फिर तुम्हें टालने के लिए मैसेज कर दिया.

तुमने नंबर भेजा, मैंने भी सोचा फोन कर लूं एक बार और इस बंदे को निपटाऊं, वरना रोज़-रोज़ परेशान करेगा. तुमसे बात की. क्यूट लगे तुम मुझे. फिर ये बातों का सिलसिला थमा ही नहीं. बात होती रही. मैसेज बढ़ते गए.

मैं हर बार यही कहती कि आसान नहीं है लॉन्ग डिस्टेंस रिलेशनशिप… और तुम यही कहते कि मुश्किल कुछ भी नहीं. आज के ज़माने में सब आसान है…

कुछ दिनों बाद ऑफिस के काम से मुझे दिल्ली जाना था. तुम्हें बताया, तो तुमने कहा कि तुम मिलने आओगे. बहुत डर लग रहा था मुझे. क्या पता सेफ होगा कि नहीं इस तरह किसी अंजान से मिलना, क्योंकि तुमने कहा था कि मॉल में मिलने तो तुम आ सकते हो, पर क्या हम दोनों वहां कंफर्टेबल होंगे? पहली मुलाक़ात की झिझक वैसे भी रहेगी, उस पर इतने लोगों के बीच.

एक तरफ़ तो मुझे लगा कि बात तुम सही कह रहे हो, पर कहीं किसी मुसीबत में न फंस जाऊं. फिर भी हिम्मत करके तुम्हें मैंने अपने होटल रूम में बुला लिया मिलने के लिए, पर एक शर्त भी रखी कि तुम्हारा हेयर स्टाइल मुझे पसंद नहीं, फिर तुम्हें कुछ तस्वीरें भेजीं कि ऐसा हेयर कट करवाओ, तब मिलने आओ.

तुमने कहा कि जानता था कुछ ऐसा ही होगा. तुम्हें तो बस बहाना चाहिए मुझे नापसंद करने का. सारी रात यही सोचती रही कि न जाने कैसा होगा यह लड़का, फोटो को देखकर किसी को जज नहीं किया जा सकता… फिर सोचा मीटिंग कैंसिल कर देती हूं, कोई बहाना बना देती हूं.

तुमको सुबह मैसेज किया कि हम मॉल में ही मिल लेते हैं, रूम में नहीं हो पाएगा. तुमने बुझे मन से कहा कि कोई बात नहीं, मैं आऊंगा मॉल में भी मिलने.

फिर मुझे लगा कि तुम पर भरोसा किया जा सकता है, फिर से मैंने प्लान चेंज किया और तुम्हें कहा कि रूम में ही आ जाना. पर ज़्यादा क्लोज़ होने की कोशिश मत करना.

“तुम अपने ऊपर कंट्रोल रखना, मैं ख़ुद को संभाल लूंगा.” यही जवाब दिया था तुमने. कहीं न कहीं मुझे लग रहा था कि ये मुलाक़ात पहली और शायद आख़िरी होगी.

ख़ैर, सुबह तुम आए, मैंने दरवाज़ा खोला, एक नर्वस-सा लड़का मेरे सामने खड़ा था. तुम अंदर आए और मैं बस तुम्हें देख रही थी और यही सोच रही थी कि इतना हैंडसम लड़का, इससे न मिलना तो बेव़कूफ़ी थी. तुम बहुत ज़्यादा नर्वस थे.

“हेयर कट सूट कर रहा है तुम पर…” मैंने हंसते हुए कहा.

“तुम्हें पसंद आया, बस और क्या चाहिए…” तुमने मुझे निहारते हुए कहा.

मैं कुछ असहज हो गई. फिर मैं इधर-उधर की बातें करने लगी और तुम बस लगातार मुझे निहार ही रहे थे.

टीवी ऑन थी, तो मैंने टॉपिक चेंज करने के लिए कहा, “मुझे ये हीरो बहुत पसंद है.”

“हां, बस मैं ही एक कमीना हूं, जो नापसंद हूं, बाकी तो तुमको सब पसंद हैं…” यह कहते हुए तुम मेरे क़रीब आए. मेरे हाथों को चूमा. मैंने नहीं रोका… फिर न जाने कितने चुंबनों की बरसात तुमने की और मैं प्यार की बारिश में भीगती चली गई. इतनी मदहोशी, इतना हसीन मंज़र ज़िंदगी में पहले कभी नहीं आया था.

मन नहीं था तुमसे अलग होने का, पर वापस तो आना था… वापसी में कई तरह के ख़्याल थे मन में… क्या पता, इसके बाद तुम बातचीत बंद कर दो, बदल जाओ, तुम्हें जानती ही कितना थी मैं… तुम ये भी तो सोच सकते हो कि पहली मुलाक़ात में इतनी कंफर्टेबल होनेवाली लड़की न जाने कैसी होगी… हो सकता है मेरा फ़ायदा उठाना ही तुम्हारा इरादा हो… सुबह से तुम्हारा कोई मैसेज भी तो नहीं आया… हे भगवान! ख़ुद को इतना समझदार समझनेवाली मैं इस तरह बेवक़ूफ़ कैसे बन गई. तुम्हारा फोन भी बंद था.

ख़ैर, घर पहुंचते ही देखा तुम्हारा मैसेज था- ‘विल यू मैरी मी!’

मेरी जान में जान आई… ये दिल भी कितना नादान है… एक पल में लाखों ख़्याल उमड़ने लगते हैं… तुम्हें न कहने का कोई कारण नहीं था… पर मैंने हां नहीं कही थी… तुमने फिर मैसेज किया- ‘जानता हूं अभी तुम्हें मुझे और परखना है… कौन हूं, कैसा हूं, क्या काम करता हूं, कितना कमाता हूं… तुम लड़कियां भी कितना सोचती हो… और हम लड़के बस प्यार और विश्‍वास करते हैं… ख़ैर, तुम्हारी हां के लिए मैं उम्रभर इंतज़ार करूंगा… शहर, दूरियां, धर्म, जाति, बिरादरी, पैसा… इन सबसे कहीं ऊंचा होता है प्यार… और सच स़िर्फ यही है कि मैं तुमसे और तुम मुझसे प्यार करती हो…!
आई लव यू माय लव!’

आज पूरे एक साल हो गए हैं हमें मिले और अब अगली मुलाक़ात में हम हमेशा के लिए एक-दूसरे के हो जाएंगे. हम लकी हैं कि हमारे घरवाले भी मान गए और हमारे प्यार को समझ पाए और मैं और भी लकी हूं कि तुम जैसा समझदार जीवनसाथी मुझे मिला. मेरा पहला प्यार… पहला एहसास… हमेशा के लिए अब मेरा होगा.

– गीता शर्मा

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पहला अफेयर: दरमियान (Pahla Affair: Darmiyaan)

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पहला अफेयर: दरमियान (Pahla Affair: Darmiyaan)

पहले प्यार (FirstLove) का एहसास होता है बेहद ख़ास, अपने फर्स्ट अफेयर (Affair) की अनुभूति को जगाने के लिए पढ़ें रोमांस से भरपूर पहला अफेयर 

किस तरह से कोई शख़्स अचानक ज़िंदगी में चला आता है और कब वो मुहब्बत बनकर आपकी रूह को छूकर निकल जाता है, शायद पता ही नहीं चलता. तुम भी तो इसी तरह से आए थे मेरे जीवन में. एक ताज़े, मदमस्त हवा के झोंके की तरह और मैं सूखे पत्ते की तरह बस उड़ती चली गई, किसी पागल नदी की तरह बस बहती चली गई… न धड़कनों पर काबू रहा था, न क़दमों पर… बहकती चली गई, मचलती चली गई… तुम मेरे लिए क्या थे, शायद तुम कभी समझ ही नहीं पाए… या मैं ही इतनी नासमझ थी कि तुमको समझ नहीं पाई…

वो पहली मुलाक़ात अब तक है याद… एक दोस्त की पार्टी में मिले थे हम. वो पूरी रात मैंने बस तुम्हें सोचते हुए काटी थी. कितनी कशिश थी तुम्हारे व्यक्तित्व में, कितना शालीन था तुम्हारा व्यवहार… पहली नज़र में ही मैंने ख़ुद को खो दिया था. पर तुम्हारे दिल में क्या था, मैं नहीं जानती थी.

एक दिन ऑफिस में काम कर रही थी कि अंजान नंबर से कॉल आया, “हाय, मैं विक्रम, विक्रम शर्मा बोल रहा हूं.”

“जी, मैंने आपको पहचाना नहीं, क्या काम है कहिए.” मैंने बेमन से जवाब दिया.

“आप रितु बोल रही हैं न, हम उस दिन पार्टी में मिले थे… इतनी जल्दी भूल जाएंगी आप मुझे, मैंने सोचा नहीं था.”

“ओ माय गॉड! आपका नाम तक भी नहीं जानती थी मैं, इसलिए नहीं पहचान पाई, मेरा नंबर कहां से मिला आपको?”

“ढूंढ़ने पर तो भगवान भी मिल जाता है… मैं सोच रहा था, अगर आप आज शाम मेरे साथ कॉफी पी सकें, तो मेरी लाइफ बन जाएगी.”

“जी, बात अगर आपकी लाइफ की है, तो मैं मना कैसे कर सकती हूं…” न जाने उसकी बातों में क्या जादू था, मैं बस खिंचती चली गई. उसके बाद न जाने ऐसी कितनी ही मदभरी शामें हमने साथ गुज़ारीं. मैंने तो कल्पना भी नहीं की थी कि मेरी पहली नज़र का पहला प्यार मेरे लिए इतना बेक़रार होगा…

लेकिन पता नहीं मन में कहीं न कहीं मुझे यह महसूस होता था कि कहीं कुछ न कुछ सही नहीं है. तुम्हारा अचानक कहीं खो जाना, कुछ कहते-कहते ख़ुद को रोक लेना… फिर मैंने ही एक दिन सोचा कि अपने दिल की बात कह दूं तुमसे कि हां, मुझे प्यार है और तुम ही वो, जिसके साथ मुझे सारी ज़िंदगी बितानी है… इतने में तुम्हारा भी फोन आ गया कि शाम को कुछ ज़रूरी बात करनी है, मैंने सोचा तुम भी मुझे प्रपोज़ करनेवाले हो…

मेरी ज़िंदगी का सबसे हसीन दिन था वो. सोचा था दोपहर को शॉपिंग के बाद तुमसे कॉफी हाउस में मिलूंगी. पर मेरे लिए यह किसी सरप्राइज़ से कम नहीं था कि तुम मुझे शॉपिंग मॉल में ही नज़र आ गए थे.

“हाय विक्रम, देखो हम शाम को मिलनेवाले थे, पर शायद भगवान भी नहीं चाहता कि अब हम और इंतज़ार करें… विक्रम, क्या हुआ? तुम इतने झिझक क्यों रहे हो?” मैं बस विक्रम से बात ही कर रही थी कि एक 7-8 साल का बच्चा वहां आकर विक्रम से लिपटते हुए बोला, “पापा, मुझे प्लीज़ गेम ज़ोन में ले चलो न, मैं यहां बोर हो रहा हूं…” मुझे अपने कानों पर विश्‍वास नहीं हो रहा था. विक्रम शादीशुदा थे. उनका बेटा भी है. ऐसा कैसे हो सकता है. इतना बड़ा धोखा? मेरी ज़िंदगी का सबसे हसीन दिन तो जैसे मेरे लिए जानलेवा साबित हो गया था. किसी तरह ख़ुद को संभाला मैंने और विक्रम को बाय बोलकर चली आई.

एक महीने से ज़्यादा का समय हो गया, तुमने कई बार फोन किया, मैसेज किए, पर मैंने न मैसेज पढ़े, न ही फोन का जवाब दिया. एक धोखेबाज़ शख़्स से मैं कोई रिश्ता नहीं रखना चाहती थी. मेरी भावनाओं से खेलकर आख़िर क्या मिला… या यह तुम्हारा शौक़ होगा, लड़कियों को अपने आकर्षण में फंसाकर उनका इस्तेमाल करना.

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काश! मैं समझ पाती पहले, तो वो सब कुछ भी न हुआ होता, जो एक शाम हमारे बीच हुआ था… इतने में ही डोरबेल बजी, दरवाज़ा खोला, तो हैरानी भी थी और ग़ुस्सा भी…

“विक्रम, तुम अब क्या लेने आए हो? तुम्हें जो चाहिए था, वो तो मिल ही चुका न, मेरा शरीर, मेरा जिस्म… बस यही तो चाहते हो तुम मर्द.”

“रितु, मेरे प्यार को वासना का नाम देकर उसे गाली मत दो. तुम्हें मुझसे बात नहीं करनी, मत करना, रिश्ता नहीं रखना, मत रखना… पर एक बार सफ़ाई देने का मौक़ा तो दे ही सकती हो…”

“सफ़ाई, किस बात की, यही कहोगे न कि तुम्हारी शादी कम उम्र में ही गांव की किसी लड़की से हो गई थी, तुम्हारी बीवी से तुम्हें प्यार नहीं, वो तुम्हें समझ नहीं पाती… अक्सर मर्द अपनी कमज़ोरियों को इसी तरह छिपाते हैं. अपनी बीवी को बदनाम करके नाजायज़ रिश्ते बनाते हैं… मैं किसी की रखैल बनकर नहीं जीना चाहती…”

बस करो रितु, यह कहकर विक्रम ने मुझे बांहों में भरकर मेरे लबों को अपने लबों से बंद कर दिया… मैं छूटने की कोशिश करती रही, पर नाकामयाब रही…

“रितु, तुम इतनी ग़ुस्से में हो कि अपने प्यार से ही तुम्हारा मुंह बंद कर सकता था. अब प्लीज़ सुनो मेरी बात… रोहित मेरा बेटा है यह सच है, मैं शादीशुदा हूं यह भी सच है, हां मेरी शादी मेरी अपनी मर्ज़ी से हुई थी और मेरी पत्नी मेरे जीवन का सबसे अनमोल तोहफ़ा थी. बहुत प्यार करता था उससे मैं. लेकिन राहुल के जन्म के व़क्त ही वो हमें छोड़कर दूसरी दुनिया में चली गई. राहुल को उसके नाना-नानी अपने साथ ले गए, क्योंकि मेरे परिवार में कोई बुज़ुर्ग नहीं था और न ही राहुल को संभालनेवाला कोई था. वो छुट्टियों में आता है मेरे पास. उस रोज़ शाम को मैं तुम्हें यही सब बतानेवाला था, ताकि तुम अपना निर्णय ले सको.

सच कहता हूं रितु, तुम्हें जब पहली बार देखा, तो बेहद अपनापन लगा. मुझे लगा मेरी पत्नी नीलू के बाद अगर किसी लड़की ने मेरे दिल को छुआ है, तो वो स़िर्फ तुम हो… जब तुमसे शादी के बारे में सोचता, तो बस राहुल का ख़्याल आ जाता और तुम्हारी प्रतिक्रिया को लेकर थोड़ा डर जाता. लेकिन जिस रोज़ हम और क़रीब आए, उसके बाद मुझे एक अपराधबोध महसूस होने लगा. मुझे लगा तुम्हें अब तक अंधेरे में रखा और तुम्हारे साथ इतना क़रीब आ गया… बस, यही ग़लती है मेरी. अब तुम जो निर्णय लो, मैं तुम पर ज़ोर नहीं डालूंगा… ”

“तुमने मुझे इस काबिल ही कहां छोड़ा कि अब किसी और की हो सकूं…” यह कहते हुए अपने अधरों को मैंने विक्रम के लबों पर रख दिया… उसके बाद स़िर्फ प्यार ही प्यार था हमारे दरमियान… न कोई दीवार, न कोई ग़लतफ़हमी, न कोई शिकवा, न शिकायत…

आज मैं ख़ुश हूं कि जिसको चाहा उसे ही हमसफ़र बना दिया भगवान ने, राहुल जैसा बेटा और रिनी जैसी बेटी के साथ हम एक हैप्पी फैमिली हैं. मेरा पहला प्यार मेरी ज़िंदगी बन गया… आप भी किसी से प्यार करो, तो उस पर पूरा विश्‍वास करो…

– योगिनी भारद्वाज

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पहला अफेयर: आईनेवाली अलमारी (Pahla Affair: Aainewali Almaari)

Pahla Affair, Aainewali Almaari

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पहला अफेयर: आईनेवाली अलमारी (Pahla Affair: Aainewali Almaari)

पहले प्यार का एहसास होता है बेहद ख़ास, अपने फर्स्ट अफेयर की अनुभूति को जगाने के लिए पढ़ें रोमांस से भरपूर पहला अफेयर

आज फिर दोपहर में फुर्सत होते ही ड्रेसिंग रूम में जाकर अलमारी के सामने खड़ी हो गई. कितने घर बदल गए, घर का पूरा फर्नीचर बदल गया, नहीं बदला कुछ, तो यह अलमारी और इससे मेरा प्यार… अपने पहले प्यार की तरंगित मधुर स्मृतियों को क्या कोई अपने आप से दूर कर पाया है? इसके धुंधला चुके आईने में अब भी तुम्हारा प्रतिबिंब झलकता है. इसके भीतर आज भी दो कुंआरे दिलों के प्रेम की प्रथम अनछुई अनुभूति धड़कती है.

सोलह-सत्रह बरस की, ख़्वाबों में खोई रहनेवाली उम्र थी वो. जब एक दिन ढलती सांझ के रंगों में अपने मन की तूलिका से कुछ अनगढ़ से चित्र गढ़ती मैं छत पर खड़ी थी कि तभी पड़ोसवाली छत पर किसी के आने की आहट सुनकर उत्सुकता से उधर देखा. बगलवाला मकान कई दिनों से खाली था, दो-तीन दिन हुए कोई आया था, लेकिन पहचान नहीं हुई थी. देखा, 20-22 बरस का एक लड़का खड़ा था.

पता नहीं उम्र का तकाज़ा था या प्रकृति ने ही कोई संकेत किया था कि आंखें बरबस ही उस ख़ूबसूरत चेहरे पर अटक गईं. ढलती शाम की लालिमा उसके सुंदर, गोरे चेहरे पर छाई थी और तभी उसका ध्यान मेरी तरफ़ गया. मैंने फ़ौरन अपनी आंखें झुका लीं. दिल ज़ोर से धड़क उठा. देर तक मैं छत पर ही खड़ी रही, मन हवा में किसी के साथ को महसूस कर रोमांचित हो रहा था.

स्कूल आते-जाते अक्सर वो दिखाई देता. मेरी आंखें झुक जातीं, हाथ-पैर कांप जाते, चाल लड़खड़ा जाती और वो हौले से मुस्कुरा देता. मेरी शामें अब छत पर ही गुज़रने लगीं और वो तो मुझसे पहले ही छत पर मिलता, दरवाज़े पर नज़रें गड़ाए हुए. दिल से दिल तक प्रेम शायद कुछ तार जोड़ने लग गया था. जल्द ही दोनों घरों के बीच घनिष्ठता हो गई और हमारे बीच भी. हां, दिल की बातें अब भी बस आंखों तक ही सीमित रहती थीं. साल कब बीत गया पता ही नहीं चला.

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एक दिन घर के सभी लोग किसी रिश्तेदार के यहां गए हुए थे कि तभी वो आ गया. यूं एकांत में पहली बार उसके साथ… तभी उसने एक किताब मांगी और मैं कमरे में चली आई. वो भी आकर मेरे पीछे ही खड़ा हो गया. हम दोनों के दिल इतनी ज़ोरों से धड़क रहे थे कि हमें एक-दूसरे की धड़कनें सुनाई दे रही थीं. तभी उसने मेरा दुपट्टा उठाया और मेरे सिर पर ओढ़ा दिया. मैंने सामने आईने में देखा, वो मुस्कुरा रहा था, उसकी आंखों में जैसे सारी क़ायनात का प्यार उमड़ आया था. कितना पवित्र, पावन प्रणय निवेदन था. बिना बोले भी सब कुछ तो कह दिया था. जैसे संपूर्ण अधिकारों के साथ मुझे अपने जीवन में शामिल कर लिया था. मौन घोषणा कर दी थी ईश्‍वर के सामने कि मैं स़िर्फ उसकी हूं. मैं देर तक आईने में हम दोनों की छवि निहारती प्रार्थना करती रही कि यह बंधन सात जन्मों तक अटूट रहे. आईना हम दोनों के प्रणय और युगल छवि का मौन साक्षी बन गया.

किंतु 35 बरस पहले की रूढ़ियों ने हमारे प्यार को विवाह में परिणत नहीं होने दिया और टूटा मन लेकर वह शहर छोड़कर ऐसा गया कि फिर कभी नहीं मिला.

जब विवाह हुआ, तो पिताजी से बस यह अलमारी ही मांग ली थी. आज भी पहले प्यार की वह मधुर छवि इस आईने में ज्यों की त्यों मुस्कुराती हुई दिखाई देती है.

– डॉ. विनीता राहुरीकर

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पहला अफेयर: मेरा प्यार ही मेरी प्रेरणा बन गया… (Pahla Affair: Mera Pyar Hi Meri Prerna Ban Gaya)

Pahla Affair, Mera Pyar Hi Meri Prerna Ban Gaya

Pahla Affair, Mera Pyar Hi Meri Prerna Ban Gaya

पहला अफेयर: मेरा प्यार ही मेरी प्रेरणा बन गया… (Pahla Affair: Mera Pyar Hi Meri Prerna Ban Gaya)

पहले प्यार का एहसास होता है बेहद ख़ास, अपने फर्स्ट अफेयर की अनुभूति को जगाने के लिए पढ़ें रोमांस से भरपूर पहला अफेयर

सच्चे प्यार का एहसास भटके हुए को सही राह दिखाता है. कभी किसी की कमज़ोरी नहीं बनता, बल्कि किसी की ताक़त बन उसे जीने की प्रेरणा देता है. ऐसी प्रेरणा, जो उसके जीवन को किसी मुक़ाम तक पहुंचाए. मीना भी मेरे जीवन की वह प्रेरणा है, जिसने  मुझे नई राह दिखाई. इस मुक़ाम तक पहुंचने में मेरी प्रेरणा बनी.

बात उन दिनों की है, जब मैं कॉलेज में पढ़ता था. मीना नाम की बेहद ख़ूबसूरत लड़की मेरी क्लास में पढ़ती थी. उसकी नीली, झील-सी आंखों में ऐसी कशिश थी कि मैं उसमें बंधता जा रहा था. धीरे-धीरे आलम यह हो गया कि उसे देखे बिना मेरा दिन कटना मुश्किल होता जा रहा था. पढ़ने में मेरा मन बिल्कुल नहीं लगता था. बस, हर पल आंखों में उसी की तस्वीर रहती थी. सच पूछो तो मैं उसके प्यार में अंधा हो गया था.

एक दिन मीना से मैंने अपने प्यार का इज़हार कर ही दिया. मेरी बात का कोई उत्तर दिए बिना वो चली गई. अगले दिन उसने क्लास में खड़े होकर कहा, “आज सर नहीं आए, तो क्यों न एक परिचर्चा पर विचार-विमर्श हो जाए.” पूरी क्लास ने एक स्वर में कहा, “आइडिया अच्छा है. पर विषय तो बताओ?”

मीना बोली, “हमारी कॉलेज लाइफ़ और प्यार. अब आप लोग इस पर अपने विचार व्यक्त करें.” पीछे की बेंच पर बैठे लड़के चिल्लाए, “बहुत ज़रूरी है प्यार लाइफ़ में…”

नेहा नाम की एक दबंग लड़की बोली, “प्यार का मतलब बकवास है. इसका फेवर वे लोग ही करेंगे, जो कॉलेज को मौज-मस्ती का अड्डा मानते हैं.” यह सुनकर लड़के होहल्ला मचाने लगे. यह सुनकर मीना ने सबको शांत किया और क्लास के सबसे बुद्धिमान लड़के
राकेश की ओर मुखातिब होकर बोली, “तुम अपने विचार व्यक्त करो.”

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राकेश बोला, “प्यार वह ख़ूबसूरत एहसास है, जिसके बिना ज़िंदगी जीना संभव नहीं. सबसे पहला और अद्भुत प्यार तो वात्सल्य होता है, जो जन्म से ही हमें माता-पिता से मिलता है. यह प्यार निस्वार्थ और निष्कपट होता है, जो जीवन के अंतिम पड़ाव तक हमें संरक्षण प्रदान करता है. प्यार का दूसरा रूप है- स्नेह. यह हमें अपने भाई-बहनों, गुरुजनों, मित्रों-रिश्तेदारों से मिलता है. यह प्यार हमें अपने गुणों और अच्छे व्यवहार के कारण मिलता है. हां, यदि परिचर्चा का विषय प्रेमी-प्रेमिका वाले प्यार सेे है, तो उससे तो तौबा-तौबा, क्योंकि अभी हमारे पढ़ने की उम्र है. बीता व़क़्त तरकश से निकले तीर की तरह होता है, जो दोबारा लौटकर नहीं आता. कॉलेज लाइफ़ का एक-एक दिन क़ीमती है. हमें ऐसे प्यार के चक्कर में न पड़कर अपना भविष्य संवारना चाहिए.”

मीना के चेहरे पर एक विशेष प्रकार की संतुष्टि थी, वो मेरी तरफ़ मखातिब होकर बोली, “ओमेशजी, क्या आप भी राकेशजी के विचारों से सहमत हैं?” मेरे मुंह से बस इतना ही निकला, “हां, पूरी तरह से.”

उस दिन यदि मीना ने मुझे सही राह न दिखाई होती, तो मैं आज जिस मुक़ाम पर खड़ा हूं, वहां तक कभी न पहुंच पाता. पहले प्यार के एहसास जब याद आते हैं, तो आज भी आंखें उसके प्रति श्रद्धा से झुक जाती हैं.

– डॉ. ओ. पी. दास गुप्ता