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पहला अफेयर: वो मेरी तक़दीर बन गया… (Pahla Affair: Wo Meri Taqdeer Ban Gaya)

Wo Meri Taqdeer Ban Gaya

Pahla Affair: Wo Meri Taqdeer Ban Gaya

पहला अफेयर: वो मेरी तक़दीर बन गया… (Pahla Affair: Wo Meri Taqdeer Ban Gaya)

वो मेरी तक़दीर बन गया…
बरसात में हम पानी बनकर बह जाएंगे
पतझड़ में फूल बनकर झर जाएंगे
क्या हुआ आज तुम्हें इतना तंग करते हैं
एक दिन बिना बताए इस दुनिया से चले जाएंगे.

उसने तो शायरी की चंद पंक्तियां सुनाकर सबकी वाहवाही लूट ली. लेकिन मेरा दिल उन ल़फ़्ज़ों की आंच से धीमे-धीमे पिघलने लगा. कई दिनों से वह मेरा पीछा कर रहा था. वह मुझे अपनी हरकतों से इस अंदाज़ से छेड़ता कि मैं चाहकर भी कुछ न कह पाती. मन ही मन उसकी अदाएं, बदमाशियां और उसका इस तरह से मुझे छेड़ना अच्छा भी लगता, लेकिन मैं यह बात उस पर ज़ाहिर न होने देती. एक दिन वह अचानक मेरे सामने आ खड़ा हुआ और कहने लगा, “आख़िर आप मुझसे बात क्यों नहीं करना चाहती हैं? मैं एक शरीफ़ और अच्छे घर का लड़का हूं. आपको पसंद करता हूं, इसलिए आपसे दोस्ती करना चाहता हूं.”

मैंने कोई जवाब नहीं दिया और पलटकर चल दी. कई दिनों तक वो कोशिश करता रहा कि मैं एक बार नज़र उठाकर उसकी तरफ़ देख लूं. मन तो मेरा भी चाहता था कि सबकी नज़रें चुराकर उसकी एक झलक देख लूं, लेकिन एक अनजाना डर हमेशा मुझे इस बात से रोक देता था.

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मैं अपने परिवार से बहुत प्यार करती थी और नहीं चाहती थी कि मेरा कोई भी ग़लत क़दम मुझे उनसे अलग कर दे. हालांकि उसकी लगातार मेरे क़रीब आने और बात करने की कोशिशों से मेरा दिल विद्रोही हो उठा था और बगावत करने पर उतारू हो गया था. लेकिन मैं तो जैसे दिल की बात सुनने को तैयार ही नहीं थी. मैं प्यार के चक्कर में पड़ना नहीं चाहती थी. इतना तो मैं जानती थी कि ख़ुशनसीब होते हैं वो लोग, जिनका प्यार सही अंजाम तक पहुंचता है. मैं प्यार का दर्द लेकर जीना नहीं चाहती थी. इसलिए मैंने उससे दूर रहना ही ठीक समझा.

एक दिन पापा ने मुझसे कहा, “बेटे आज एक पार्टी में जाना है, जहां लड़केवाले आएंगे. मैं चाहता हूं तुम उन लोगों से मिलो. लड़के से भी बात करके देख लो. हमें जल्दी ही तुम्हारी शादी का फैसला लेना है.” मैंने भी पापा की बात को सहमति देते हुए कहा, “पापा, जैसा आप ठीक समझें. मुझे पता है, आपका फैसला ग़लत नहीं होगा.”

जब हम पार्टी में पहुंचे तो मैं सबसे औपचारिक बातें करने में मशग़ूल थी कि माइक पर आवाज़ गूंजी,
अजनबी लोग भी देने लगे इल्ज़ाम मुझे
कहां ले जाएगी तेरी पहचान मुझे
भुलाना चाहूं तो भुलाऊं कैसे,
लोग ले ले के बुलाते हैं तेरा नाम मुझे.

तालियों की गड़गड़ाहट के बीच जो चेहरा मेरे सामने आया, वो उसका ही था. मैं मुड़कर जाने ही लगी कि पापा बोले, “बेटे, यही मधुर है, जिसे हमने तेरे लिए चुना है. अब फैसला तुझे करना है.” मेरी आंखें छलक पड़ीं. जब पलकें उठाकर उसे मुस्कुराते देखा तो मैं रोते-रोते मुस्कुरा उठी और अपनी क़िस्मत पर इतराने लगी-

जिस प्यार को मैं ठुकरा रही थी
वही मेरी क़िस्मत बन गया
जिसे ज़ुबां पर लाना मुश्किल था
वो नाम मेरे माथे का सिंदूर
मेरी तक़दीर बन गया…

– वीना साधवानी

पहला अफेयर: यादों की ख़ुशबू… (Pahla Affair: Yadon Ki Khushbu)

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पहला अफेयर: यादों की ख़ुशबू… (Pahla Affair: Yadon Ki Khushbu)

चली हवा छाई घटा, चुनरी क्यों लहराई
बैठी-बैठी सोच रही मैं, बेबात क्यों हिचकी आई
उस रोज़ स्वेटर सीने बैठी उंगली में सुई ऐसी चुभी कि उस चुभन का एहसास आज भी ताज़ा है. ख़ून आज भी रिस रहा है. सूई की पीड़ा की अथाह परतें आज भी मन को मथने लगती हैं. मम्मी उठकर पास चली आईं. शायद उसने मेरा दर्द महसूस किया. मम्मी के बगल में बैठा मनुज ज़ोर-ज़ोर से ठहाका लगाकर हंस पड़ा. कभी-कभी बातों को हंसी में उड़ा देना और फिर एकदम गंभीर हो जाना, जैसे कोई रहस्यमयी क़िताब पढ़ रहा हो, ये सब उसकी आदतों में शामिल था. मैं खीझ उठती, “मनु, किसी नाटक कंपनी में भरती हो जाओ या मंच पर मिमिक्री का रोल…” मेरी बात को काटकर मम्मी से कहता, “भई स्वेटर के उल्टे फंदों में उलझेगी तो हादसा तो होगा ही.” मैं कटकर रह जाती. वह फिर ठहाका लगाता और… मैं उसकी हंसी की आवाज़ में खो जाती.

उसका छोटा-सा परिचय- वह हमारे गेस्ट हाउस में रहने आया. पापा के किसी ख़ास दोस्त का सिरफिरा साहबज़ादा. उसकी कही हुई एक-एक बात आज भी दुधारी तलवार-सी चीरती है मुझे. हर व़क़्त तोते-सी रटी-रटाई बात कहता, “शिल्पी, ज्यों ही मुझे वीज़ा मिल जाएगा, मैं हवा में फुर्र हो जाऊंगा.”

“उ़़फ्! लंदन जाकर पढ़ने का इतना ही शौक़ था तो फिर प्यार की पींगें बढ़ाने का यह जुनून क्यों पाला?” मैं चिढ़कर कहती.
बेशक कसकर बंद कर लूं आंखें. विचार चलचित्र की भांति चलते रहते हैं. चैन कहां लेने देते हैं? सुना था, चूक गए अवसर अपने पीछे पछतावे की लंबी कतारें छोड़ जाते हैं. कैसे यक़ीन की कश्ती पर मुझे बिठा चुपचाप समंदर पार कर गया… और छोड़ गया मेरे लिए यादों की लंबी कतारें. अब तो रूह से एक मायूस गज़ल फूटती है-

अब न लौट के आनेवाला
वो घर छोड़ के जानेवाला
हो गई उधर बात कुछ ऐसी
रुक गया रोज़ का आनेवाला

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जिस रोज़ उसे वीज़ा मिला, उस रोज़ वह बेहद ख़ुश आया. हवा के झोंके-सा आया था मेरे घर. छत पर हम कुछ पल बतियाए. रुख़सत होते व़क़्त मेरे दोनों हाथ पकड़कर वह बोला, “शिल्पी, उदासी उतार फेंको. मेडिकल की पढ़ाई ख़त्म होते ही लौटूंगा अपनी शिल्पी के पास, विवाह बंधन में बंधने.” मैं पगली गुलमोहर के फूलों में भी लाल जोड़े की कल्पना करने लगी.

उसका सच इतना झंझावाती था कि सपनों के तमाम घरौंदों को रौंदता आगे निकल गया. वह जा बसा सात समंदर पार…
मैं यहां बिलखती रही अकेली. कभी-कभी मेरी यादों के परिंदे जाकर मेरे पहले प्यार को छू आते हैं. उन हवाओं में आज भी रची-बसी हैं तुम्हारे यादों की ख़ुशबू… डरती हूं. इन यादों को कहां उखाड़ फेंकूं. ये तो कैक्टस की तरह फिर उग आएंगी.

रात आंखों में कटी, पलकों पे जुगनू आए
हम हवा की तरह जा के उसे छू आए.

– मीरा हिंगोरानी

पहला अफेयर: बहुत देर कर दी… (Pahla Affair: Bahot Der Kar Di)

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पहला अफेयर: बहुत देर कर दी… (Pahla Affair: Bahot Der Kar Di)

गुनाहों का देवता यह वही उपन्यास है, जिसे मैं अपने पढ़ाई के दिनों में सबसे ज़्यादा पसंद किया करता था. मुहब्बत की इस दास्तां को न जाने कितनी बार पढ़ डाला था मैंने. रैक पर से क़िताब तो उठा ली, पर याद ही नहीं आ रहा था कि यह उपन्यास मेरे पास कैसे आया? पहला पृष्ठ खोलते ही नज़र पड़ी, सुषमा की ओर से सप्रेम भेंट. ओह! अब याद आया, यह तो सुषमा ने दिया था कॉलेज के दिनों में, जब विदाई समारोह में आई थी और कहा था, “इसे खोलकर ज़रूर पढ़ना.” लेकिन चूंकि दर्जनों बार यह उपन्यास पढ़ चुका था, इसलिए इसे बिना पढ़े रैक में रख दिया. कब नौकरी लगी, कब शादी हुई और कैसे 35 साल गुज़र गए, पता ही नहीं चला.

ये वही सुषमा थी, जिससे मैं बेइंतहा मुहब्बत करता था, लेकिन कभी कहने की हिम्मत नहीं जुटा पाया. तभी हवा का ज़ोर का झोंका आया और उपन्यास मेरे हाथ से गिरकर फ़र्श पर जा गिरा. काग़ज़ का एक पुर्जा क़िताब के पन्नों से निकलकर बाहर आ गिरा. उठाकर पढ़ा. लिखा था-प्रिय कमल, मुझे ख़ुद नहीं पता कि प्रेम क्या होता है? प्रेम की परिभाषा क्या होती है? लेकिन मैं जब भी तुम्हें देखती हूं मुझे अजीब-सी ख़ुशी होती है और तुम्हारा भोला-भाला चेहरा देखना अच्छा लगता है. शायद यही प्रेम है. आज हमारे कॉलेज का आख़िरी दिन है. तुम मुझे चाहते हो या नहीं, मैं नहीं जानती, लेकिन मैं तुम्हारा इंतज़ार करूंगी. परसों शाम मैं अपने परिवार के साथ यह शहर छोड़कर जा रही हूं. न जाने फिर मिलना हो न हो. तुम कल शाम चार बजे आनंद भवन में आना. मैं तुम्हारा इंतज़ार करूंगी. यह क़िताब हमारी नई पहचान का प्रतीक होगी.
                                             – तुम्हारी सुषमा

पढ़ते ही मेरे पैर लड़खड़ाने लगे. “हे ईश्‍वर कितनी देर कर दी मैंने.” आज से 38 साल पहले के दृश्य किसी चलचित्र की भांति मेरी आंखों के सामने से गुज़रने लगे, जब मैं पहली बार गांव से इलाहाबाद विश्‍वविद्यालय में पढ़ने के लिए आया था. पहली क्लास, पहला साल गांव का सीधा-सादा लड़का, उस पर रैगिंग का डर. मैं क्लास में लड़कों के बीच सहमा-सा बैठा हुआ था. हल्ला होने पर पता चला कि सीनियर्स आ रहे हैं रैगिंग के लिए. मेरा तो डर के मारे ख़ून सूख गया. सीनियर्स तो आए, पर रैगिंग नहीं कर पाए. कारण- लड़कियों की ग्रुप लीडर सुषमा ने सब जूनियर्स को संगठित कर लिया. सीनियर्स अपना-सा मुंह लेकर चले गए और वह लड़की क्लास की लीडर बन गई. उसने गर्व से हेय दृष्टि से मेरी ओर देखा, जैसे मेरा मज़ाक उड़ा रही हो. उस दिन के बाद से वह क्लास की ‘मिस शेरनी’ और मैं ‘मिस्टर दब्बू’ के नाम से मशहूर हो गया. गाहे-बगाहे वह उसे छेड़ दिया करती थी. पहले मुझे ख़राब लगता था, पर धीरे-धीरे अच्छा लगने लगा. लेकिन प्यार का इज़हार करने की हिम्मत नहीं जुटा पाया. कॉलेज के आख़िरी दिन विदाई समारोह में सुषमा ने सभी छात्रों को ग़िफ़्ट दिए, बड़े बाप की बेटी जो ठहरी. अंत में मेरे सामने आकर बोली, “मिस्टर दब्बू, इस ग़िफ़्ट में रखी क़िताब तुम्हारे लिए. शायद यह क़िताब तुमने पहले पढ़ी हो, फिर भी इसे खोलकर ज़रूर पढ़ना.” लेकिन उपन्यास का शीर्षक देखकर ही मैंने क़िताब रैक में रख दी थी.

दो साल बाद मेरी शादी हो गई. दो बच्चे छोड़कर पत्नी दुनिया से विदा हो गई. बच्चे अपनी दुनिया में मस्त हैं. रिटायरमेंट की उम्र में, ज़िंदगी के इस मोड़ पर आज मेरी ज़िंदगी अकेलेपन में गुज़र रही है.

अचानक तेज़ हवा के झोंके के साथ बारिश की बौछारें मेरे चेहरे को भिगो गईं. मेरी तंद्रा टूटी और हाथ से काग़ज़ का टुकड़ा छूटकर उड़ गया, जैसे हवा का झोंका मुझसे कह रहा हो, ‘व़क़्त गुज़र चुका है- शायद इसे पढ़ने में तुमने बहुत देर कर दी…’

– दिलीप द्विवेदी

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पहला अफेयर: रॉन्ग नंबर (Pahla Affair: Wrong Number)

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पहला अफेयर: रॉन्ग नंबर (Pahla Affair: Wrong Number)

प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में कभी न कभी ये मखमली, सुकोमल एहसास ज़रूर होता है, जिसमें आपको दुनिया की हर चीज़ अचानक यूं ही अच्छी लगने लगती है. बेवजह मुस्कुराना अच्छा लगता है, जब दिल ज़ोर-ज़ोर से किसी के आने की आहट पर धड़कने लगता है, तो उस पर काबू न कर पाना अच्छा लगता है. मेरे साथ भी कुछ ऐसी ही घटना घटित हुई.

उन दिनों हमारे यहां लैंडलाइन फोन हुआ करता था. उस दिन शाम फोन अचानक घनघनाकर बज उठा था. घर के सभी लोग काम में बिज़ी थे, सो फोन मैंने ही उठाया. उधर से ‘हैलो’ के संबोधन ने मेरे मन-मस्तिष्क के तारों को झंकृत-सा कर दिया था. कितना अपनापन और सुकून था उस आवाज़ में, लेकिन दुर्भाग्य से वो रॉन्ग नंबर था, सो सॉरी कहकर रख दिया. मगर रिसीवर रखने के बाद भी दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़के जा रहा था और मैं समझ नहीं पा रही थी कि ये किस तरह का एहसास है, मगर… वो ‘हैलो’ अभी तक मेरे कानों में गूंज रही थी.

मन कर रहा था कि दोबारा उस अजनबी की आवाज़ सुनने को मिल जाए. मेरे मन की बेचैनी बढ़ती जा रही थी. इसी बीच कई दिन गुज़र गए, मगर कोई फोन नहीं आया. कुछ दिनों के बाद उसी समय फोन ‘ट्रिन ट्रिन’ कर फिर बजा और मुझे भी ये एहसास हुआ कि ज़रूर ये उसी अजनबी का कॉल है. मैंने लपककर कॉल लिया और वही निकला, जिसकी मुझे उम्मीद थी. उसकी ‘हैलो’ सुनकर काफ़ी सुकून मिला. मैं जिस तरह उसकी आवाज़ सुनने को बेचैन थी, उसका भी वही हाल था, इसका मतलब अंजाने में दोनों के दिल के तार एक-दूसरे से जुड़ने की कोशिश में थे. अब तो घरवालों से नज़रें चुराकर, बच-बचाकर घंटों एक-दूसरे से फोन पर हम बातें करते और कब हम इतने क़रीब आ गए कि एक-दूसरे की ज़िंदगी का अहम् हिस्सा बन गए, पता भी नहीं चला. हमारी फोन पर दोस्ती को दो साल बीत चुके थे. काफ़ी कुछ जान गए थे हम एक-दूसरे के बारे में, वो भी बिना मिले और देखे.

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ख़ैर, व़क्त अपनी रफ़्तार से चल रहा था. घर में सब मेरी शादी के लिए लड़का तलाशने लगे. मेरा दिल तो डूबा जा रहा था. उस अजनबी के बिना जीना मुश्किल लग रहा था. मगर अपने डर और संकोच के आगे घरवालों को कुछ भी नहीं बता पाई मैं उस फोन फ्रेंड के बारे में.

आख़िर वो पल भी आ गया, जब मुझे लड़केवाले देखने आए. मुझे पहली नज़र में ही पसंद कर लिया गया था. मगर लड़के ने मुझसे अकेले में मिलने की मंशा ज़ाहिर की. मिलने के दौरान उसने मुझे बताया कि उसके जीवन में कोई लड़की है, जिसे वो अपनी ज़िंदगी मानता है. घरवालों के दबाव में आकर वो यहां मुझे देखने आ गया था. हमने सोचा इस व़क्त शादी के लिए इंकार किया, तो दोनों के घरवालों को समझाना मुश्किल होगा. उसने मुझे अपनी जेब से एक फोन निकालकर दिया और कहा कि घर जाकर वो फोन करेगा, ताकि सोचा जा सके कि किस तरह से शादी को रोक सकते हैं. मैंने भी अनमने मन से फोन ले लिया.

जाने के लगभग तीन दिन बाद उस मोबाइल पर फोन आया और ‘हैलो’ का संबोधन सुन मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई. अचानक लगा कि वो अजनबी इस फोन पर कैसे हो सकता है, मगर सच्चाई यही थी कि वो अजनबी ही मुझे देखने आया था, लेकिन हम दोनों ही इस बात से अंजान थे. क़िस्मत भी कभी-कभी कितने अजीबो-ग़रीब खेल खेलती है. अब तो हम दोनों ने ही ख़ुशी-ख़ुशी शादी के लिए ‘हां’ कर दी थी. आख़िर करते भी क्यों न, रॉन्ग नंबर मेरे जीवन का राइट नंबर जो बन चुका था.

– मंजू यादव

 

पहला अफेयर: ख़ामोश मुहब्बत… (Pahla Affair: Khamosh Mohabbat)

Pahla Affair, Khamosh Mohabbat

Pahla Affair, Khamosh Mohabbat

पहला अफेयर: ख़ामोश मुहब्बत… (Pahla Affair: Khamosh Mohabbat)

बात उन दिनों की है, जब मैंने कॉलेज में दाख़िला लिया था. मेरा कोई दोस्त नहीं था, इसलिए थोड़ा अकेलापन-सा लगता. फिर धीरे-धीरे आदत-सी हो चली. कक्षा में मेरी सीट खिड़की के पास थी. कई दिनों से मैं गौर कर रही थी कि रोज़ एक साया मेरे पास से गुज़रता, उसकी निगाहें मुझे ही घूर रही होती थीं. पहले तो मुझे उस पर बहुत ग़ुस्सा आया. सोचा, किसी दिन ऐसी ख़बर लूंगी कि होश ठिकाने आ जाएंगे जनाब के. फिर धीरे-धीरे वह मुझे अच्छा लगने लगा. उसका चेहरा बहुत आकर्षक था. जब भी वह मेरे क्लास रूम के पास से गुज़रता मैं बेचैन हो जाती, उसकी आहटों से मेरी धड़कनें तेज़ हो जातीं.

अब तो ये रोज़ का सिलसिला हो गया था. वह दिन में कई बार उस जगह से गुज़रता और मैं सबकी नज़रें बचाकर उसे देख लिया करती. कई बार तो आते-जाते हमारा आमना-सामना भी हुआ, परंतु कोई बात नहीं हुई. हर समय एक बेक़रारी-सी रहती. कुछ कहना चाहती, पर कह नहीं पाती थी. शायद यही प्यार था. वे मेरे दोस्तों से मेरे बारे में बातें करते. दोस्तों से ही पता चला कि उन्हें मैं बहुत ख़ूबसूरत लगती हूं और जिस तरह के पहनावे में वे मुझे देखना चाहते थे, उसका ज़िक्र भी कर देते. जब बात मुझ तक पहुंचती तो मैं उनकी ही पसंदीदा ड्रेस पहनकर कॉलेज जाती. उनकी प्रशंसा उनकी आंखों में नज़र आ जाती. आंखों ही आंखों में हमारी बातें होतीं. दोनों ही संकोची स्वभाव के थे. न वे कुछ कह पाए, न मैं.

मैं सम्पन्न परिवार से थी और दोस्तों से पता चला कि वे साधारण परिवार के हैं. हमारी जाति में फ़र्क़ था. शायद यही कारण था, जो हम दिल की बात दिल में ही दबाकर रह गए. समय गुज़रता गया. परीक्षाएं हुईं. कॉलेज ख़त्म हो गए. मन में एक कसक लिए हम एक-दूसरे से जुदा हो गए.

कॉलेज के बाद मेरी शादी की बात चलने लगी. मन तो बहुत हुआ कि कहीं से वो सामने आ जाएं और मम्मी-पापा से मेरा हाथ मांग लें, पर ऐसा कुछ नहीं हुआ और मेरी शादी मम्मी-पापा की मर्ज़ी से हो गई. मैंने भी उन्हें पाने की ख़्वाहिश को अपने मन के किसी कोने में दबाकर पति को मन से स्वीकार कर लिया.

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पति स्वभाव से अच्छे थे और मुझे ख़ुश भी रखते. जल्दी ही मैं एक बच्चे की मां भी बन गई. बहुत समय बाद मेरे पति को फुर्सत मिली थी, हमने छुट्टियों में घूमने का प्रोग्राम बना लिया. मेरे बेटे का ट्रेन में ये पहला सफ़र था. मैं और मेरे पति उसे ख़ुश होते, किलकारियां मारते हुए देख आनंदित हो रहे थे. अचानक एक आहट-सी हुई और दिल ज़ोरों से धड़कने लगा. यह तो वही आहट है, जिसका कभी मुझे हर पल इंतज़ार रहता था, धड़कनें बेचैन हो जाया करती थीं. मैंने सिर उठाकर सामने देखा तो देखती रह गई. वही चेहरा नज़र आया, जो आज भी दिल में बसा हुआ है. मेरा प्यार मेरी आंखों के सामने खड़ा मंद-मंद मुस्कुरा रहा था. यही तो वह मुस्कान थी, जिसकी मैं दीवानी थी.

वे मेरे सामने वाली बर्थ पर थे. आज भी फिर वही बात हुई. मैं बहुत-सी बातें करना चाहती थी, पर परिवार के आगे बेबस थी. मेरे पति ने उनसे परिचय किया और बातों-बातों में ही दोस्ती भी कर ली. उनकी बातों से ही पता चला कि उन्होंने मेरी आस में किसी से शादी नहीं की. मेरी आंखें भर आईं.

सफ़र ख़त्म होने को था. अफ़सोस कि आज भी मैं उन्हें नज़रें चुराकर ही देख रही थी. मैं उस मोहिनी मूरत को जीभर के देखना चाहती थी. हमारा स्टेशन आ गया. मैं मन में एक टीस लिए उनसे जुदा हो गई, मेरी तो मंज़िल आ गई थी, पर उनके न सफ़र का पता था, न मंज़िल का.

– अनुपलता श्रीवास्तव

 

पहला अफेयर: डायट चार्ट (Pahla Affair: Diet Chart)

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पहला अफेयर: डायट चार्ट (Pahla Affair: Diet Chart)

बात उन दिनों की है, जब मैं डायटीशियन का कोर्स कर रही थी. कॉलेज की पढ़ाई के बाद हमारी 6 महीने की इंटर्नशिप रहती है, जिसके लिए दिल्ली के मौलाना आज़ाद मेडिकल हॉस्पिटल जाना रहता था. घर से सुबह 9 बजे से हॉस्पिटल के लिए निकलना, फिर शाम 7 बजे तक वापस आना, काफ़ी व्यस्त दिनचर्या रहती थी. पढ़ाई के अलावा कुछ भी सोचने का व़क्त नहीं मिलता था. किसी छुट्टीवाले दिन यह ज़रूर एहसास होता था कि घर में शादी के बारे में सोचा जाने लगा है. हालांकि मुझसे शादी के बारे में जानने का कोई प्रयास नहीं किया गया था. बस, यही कहते थे कि अपनी पढ़ाई मन लगाकर करो, समय आने पर सब काम हो ही जाते हैं.

मिसेज़ इंदू आहूजा, हमारी चीफ डायटीशियन थीं. एक दिन उनसे किसी बात पर विचार-विमर्श कर रही थी कि तभी एक साथ तीन लड़के कमरे में आए. यही सोचकर कि डायट चार्ट बनवाने आए हैं, मैंने उन्हें इंतज़ार करने को कहा. किंतु वे तीनों टेबल पर ही आ गए, यह कहते हुए कि डायट चार्ट बनवाना है और कुछ जानकारी भी लेनी है. वैसे तो इतने लोग आते हैं, मेरा ध्यान किसी पर नहीं जाता, परंतु न जाने क्यूं उनमें से एक लड़के पर मेरी नज़र गई, तो मैं उसे देखती ही रह गई. एक अलग ही आकर्षण था उसमें. मन में अजीब-सी हलचल हुई. शायद यह पहली नज़र के प्यार का हल्का-सा एहसास था.

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वे तीनों अपना काम पूरा होते ही चले गए, जाते-जाते भी मैं उसी लड़के को देख रही थी, उसने भी मुड़कर देखा और मेरी नज़रें उससे मिलीं, अच्छा लगा. ख़ैर, बात आई-गई हो गई और मैं भी अपने काम में व्यस्त हो गई. बीच-बीच में उसका ख़्याल एक मीठे एहसास की तरह तन-मन को भिगो जाता था.

क़रीब एक महीने बाद एक दिन मम्मी-पापा ने अपने पास बुलाया और कहने लगे, “अब पढ़ाई पूरी हो गई, इंटर्नशिप भी ख़त्म होनेवाली है, तो सोचा क्यों न शादी के बारे में तुमसे बात करें.” मेरा मन तैयार नहीं हो रहा था, क्योंकि मैं जॉब करना चाहती थी. मम्मी-पापा भी शायद समझ गए थे, सो उन्होंने कहा, “एक लड़का देखा है. घर-परिवार भी अच्छा है. सारी बातें पक्की हैं, लेकिन तेरा फैसला ही अंतिम होगा. अगर लड़का पसंद न आए, तो जैसा तू चाहेगी, वैसा ही होगा.” मैंने भी हां कर दी, लेकिन इस बीच रह-रहकर मेरी आंखों के सामने उसी हॉस्पिटलवाले लड़के की तस्वीर घूम जाती. मुझे अपने ऊपर हंसी भी आती कि ये तो बचपना है.

ख़ैर, दिल्ली के बिड़ला मंदिर में देखने की बात तय हुई. निश्‍चित समय पर हम लोग वहां पहुंच गए. थोड़ी ही देर में लड़केवाले भी आ गए. उनके बीच अचानक उस परिचित चेहरे पर मेरी नज़र पड़ी, मुझे तो विश्‍वास ही नहीं हो रहा था. मैंने सबसे नज़रें चुराकर दो-तीन बार आंखें उठाकर उसे देखने की कोशिश की. जैसे ही उसने भी मुझे देखा, तो मेरे मुंह से अनायास ही निकल गया, “अरे, आप? आप तो हॉस्पिटल में आए थे. यहां कैसे?” मैं कुछ समझ ही नहीं पा रही थी, इसी बीच मुझे सम्मिलित हंसी के ठहाके सुनाई दिए. मेरी तंद्रा भंग हुई, तो देखा सबकी नज़रें मेरी ओर ही थीं और अब चौंकने की मेरी बारी थी. मुझे बताया गया कि दरअसल ये अपने दोनों भाइयों के साथ मुझे देखने ही हॉस्पिटल आए थे. मां ने बताया, “तुम्हें फोटो में सबने पसंद कर लिया था, लेकिन सबने सोचा कि एक बार तुम दोनों आमने-सामने एक-दूसरे को देख लो, तो बेहतर होगा.”

मुझे तो विश्‍वास ही नहीं हो रहा था कि जिसे पहली नज़र में चाहा, वही मुझे मिल गया. हम दोनों की हां थी, सो शादी भी जल्दी हो गई. आज मैं अपनी गृहस्थी में सुखी-संतुष्ट हूं और बार-बार ऊपरवाले का शुक्रिया अदा करती हूं कि मेरा पहला प्यार ही मेरे जन्म-जन्मांतर का प्यार बन गया.

– प्रीता जैन

 

पहला अफेयर: पहला-पहला प्यार है… (Pahla Affair: Pahla Pahla Pyar Hai)

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पहला अफेयर: पहला-पहला प्यार है… (Pahla Affair: Pahla Pahla Pyar Hai)

भारतीय नारी के लिए पहला प्यार ही उसके जीवन का आधार होता है. मम्मी-पापा ने भी बचपन से यही सिखाया था कि भारतीय संस्कृति में लड़कियां पहले शादी करती हैं और बाद में उन्हें प्यार होता है. उस वक़्त तक मैं प्यार के एहसास से भी अनजान थी. मेरा तो शौक़ था पढ़ाई और कविताएं लिखना.

जब मम्मी ने मेरी शादी का फैसला सुनाया, तब मेरी उम्र मात्र 17 वर्ष थी.

“पर अभी तो मुझे पढ़ना है.” मैं चिल्लाई थी.

“अभी कौन-सा शादी कर रहे हैं? तू अपनी पढ़ाई पर ध्यान दे.”  मां ने मुझे आश्‍वस्त किया. आख़िर मैं भी जानना चाहती थी कि वो शख़्स कौन है? जब नाम सुना तो पैरों तले ज़मीन ही खिसक गई. हमारे सामनेवाले मकान में रहनेवाले राज ही मेरे होनेवाले पति थे.
मेरी ख़ामोशी को मेरी हां मान लिया गया था. बात आगे चली तो उनकी तरफ़ से भी हां कर दी गई. मेरी दो शर्तें थीं- एक तो मुझे पढ़ाई जारी रखनी है और दूसरी ये कि कॉलोनी में इस रिश्ते की चर्चा नहीं होनी चाहिए. .

हमारी सगाई कर दी गई, परंतु बाकी लोगों से इस बात को छुपाए रखा गया. एक दिन मम्मी से मिलने उनकी सहकर्मी आईं. उनको विदा करने मैं और मम्मी दरवाज़े तक आए तो सामने राज को खड़ा देखकर मैं छुपकर भागना ही चाहती थी कि मम्मी ने अपना पांव मेरे पांव पर ज़ोर से रख दिया. मैं घबरा-सी गई. मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि मैं क्या करूं. मम्मी ने पांव तब तक दबाए रखा, जब तक वो सहकर्मी विदा नहीं हो गई. उनके जाने के बाद मम्मी ने डांटा कि इस तरह भागने की क्या ज़रूरत थी. ऐसे तो किसी को न मालूम हो तो भी पता चल जाएगा.

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आख़िर इस रिश्ते का ऐलान तो करना ही था. ऐलान होते ही चारों तरफ़ हंगामा हो गया था. इस तरह आमने-सामने घरों में रिश्ता होने का कॉलोनी में यह एक अनोखा उदाहरण था. लेकिन मैं इन सबसे दूर पढ़ाई में व्यस्त थी. मुश्किल ये थी कि अब उनका सामना करना भी दूभर हो गया था मेरे लिए. जैसे ही राज सामने दिखते, मैं भागकर अपने घर में घुसकर दरवाज़ा बंद कर लेती.
एक दिन मेरे पीठ दिखाते ही वे बोल पड़े, “नाराज़ हो क्या?” मेरे पांव ठिठक गए. दिल ने कहा, पलटकर देख लूं, पर संस्कारों में मिली मर्यादा मुझे राज को खुलेआम देखने से रोक रही थी.

बस, यहीं से कुछ हलचल-सी हुई मन में. मेरा कवि मन जो प्यार के विषय से अछूता था, कुछ चाहने लगा था. मेरी सारी भावनाएं कलमबद्ध होने लगी थीं. मन में राज के लिए प्यार का अंकुर फूट चुका था, लेकिन मैं उनसे मिलने का साहस नहीं कर पाई. हां, अपनी खिड़की से उनकी एक झलक पाने के लिए हमेशा बेताब रही.

एक दिन मैं अपनी पड़ोस की सहेली के घर बैठी थी कि राज वहां जान-बूझकर पहुंच गए. उन्हें देख मैं घबराहट के मारे सहेली के बाथरूम में जाकर घुस गई. बाथरूम में नल से पानी बह रहा था और नल था कि बंद होने का नाम ही नहीं ले रहा था. मेरे सारे कपड़े भीग गए. मैं फिर भी बाहर नहीं आई. मैं ख़ुद ही नहीं समझ पा रही थी, जिनको देखने के लिए मैं घंटों अपनी खिड़की में खड़ी रहती थी, उनके सामने आते ही मेरी ऐसी हालत क्यों हो जाती है?

वो पहली बार था, जब मैंने प्यार के एहसास को महसूस किया था. आख़िर दो वर्ष बाद इस प्यार की परिणति विवाह में हुई. अब तक डायरी में लिखी सारी भावनाएं शादी के बाद जब मैंने राज के सामने रखीं तो वे आश्‍चर्यचकित रह गए. बोले, “कभी चेहरा भी न दिखानेवाली लड़की अपने मन में इतनी भावनाएं रखती है मेरे प्रति.” आज ज़िंदगी में फूल ही फूल खिले हैं. हम दोनों एक-दूसरे का हाथ थामे अपने पहले प्यार से बनी राहों पर चल रहे हैं.

– संगीता सेठी

 

पहला अफेयर: वो एक पल (Pahla Affair: Wo Ek Pal)

Pahla Affair, Wo Ek Pal
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पहला अफेयर: वो एक पल (Pahla Affair: Wo Ek Pal)

दिल क्यों बेचैन है, आंख नम है क्यूं… शायद दिल का कोई टांका उधड़ा है…

जाने क्यों ये पंक्तियां मेरे ज़ेहन में सरगोशी कर उठीं. शायद इसका कारण यही रहा होगा कि कोई ज़रूरी काग़ज़ात तलाश करते हुए मेरे हाथों में एक पुरानी पारिवारिक तस्वीर लग गई, जिसमें ‘तुम’ भी हो. वही मनमोहक, चित्ताकर्षक मुस्कान, जो मेरी अंतर्मन की गहराइयों में उतर गई थी. मैं अतीत के गलियारे में उतरता चला जा रहा हूं. पीछे छूट रहा है वर्तमान. मेरी बुआजी के नए घर का शुभ मुहूर्त था कानपुर में. मैं सपरिवार शामिल होने पहुंचा. बुआजी ने मुझे घर की डेकोरेशन का काम सौंपा था, क्योंकि मैं इंटीरियर डेकोरेशन का कोर्स कर रहा था. बस, यही एक काम मेरे दिल को लुभानेवाला था. मैंने अपनी समस्त इंद्रियां केंद्रित कर दी थीं, जान लगा दी थी इस काम को अंजाम देने में.

फंक्शनवाले दिन डेकोरेशन को देखकर सभी के मुंह से निकला ‘वाह’ शब्द मानो मुझे पुरस्कृत कर रहा था, लेकिन उसी गहमा गहमी में एक सुरीला कंठ मुझे झंकृत कर गया… ‘वाओ! क्या बात है?’ जैसे ही मैंने मुड़कर देखा, तो बुआजी की छोटी बेटी यानी मेरी बहन गरिमा के पास एक ख़ूबसूरत परी-सी हल्के सांवले वर्णवाली लड़की खड़ी थी. वह लगातार कुछ कहे जा रही थी, मगर मेरी श्रवणशक्ति होशोहवास खो बैठी. मेरा दिल पहली बार किसी के लिए धड़का था. पहली नज़र में कोई इस क़दर भा जाए, यह पहला अनुभव था मेरा.

मेरी बहन ने डेकोरेशन का क्रेडिट मुझे देते हुए मेरा उससे परिचय करवाया. मैं अपलक उसे निहारता रहा. लेकिन जब गरिमा ने परिचय के दौरान यह कहा कि ‘तुम्हारी’ मंगनी हो चुकी है और एक हफ़्ते बाद ही तुम्हारी शादी है किसी एनआरआई से, तो मुझे झटका-सा लगा. तुम शादी करके इंग्लैंड चली जाओगी.

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यह भाग्य का कैसा क्रूर मज़ाक था कि एक क्षण पहले कुबेर का ख़ज़ाना सौंपकर अगले ही क्षण सारी ख़ुशियां छीन लीं. मेरे चेहरे पर एक के बाद एक कई रंग आकर चले गए. मैंने एक क्षीण मुस्कान के साथ उसे उज्ज्वल भविष्य की
शुभकामनाएं दीं.

मेरे पहले प्यार का ये कैसा अंजाम था? मैं बस ऊपरवाले से बार-बार यही सवाल कर रहा था. उस पर मेरी बदनसीबी का कटाक्ष देखिए, मुझे न स़िर्फ तुम्हारी शादी में शामिल होना पड़ा, बल्कि सारा डेकोरेशन का काम भी करना पड़ा. मेरे लिए यह मंज़र ही कहर बरपानेवाला था.

ख़ैर, मैं मन में एक टीस और ज़िंदगीभर के लिए नासूर लिए वापस अपने शहर आ गया. आज मैं शादीशुदा ज़िंदगी जी रहा हूं, दो प्यारे बच्चे भी हैं, ज़िंदगी से कोई शिकायत भी नहीं, फिर भी दिल का एक कोना सूना-सा लगता है, मानो वो कोना रिक्त रह गया हो.
तुम जहां भी हो, ख़ुश रहो. तुम्हें तो पता भी नहीं होगा कि दुनिया में कोई ऐसा भी है, जो अपनी ज़िंदगी के उस एक पल की क़ीमत आज तक चुका रहा है, जिस पल उसने तुम्हें देखा था. लाख चाहकर भी मैं तुम्हें भूल नहीं पाया. मुहब्बत भी कभी इम्तिहान लेती है. तुम्हें तो शायद मैं याद भी नहीं और एक मैं हूं, जो तुम्हारी यादों को आज तक सीने में संजोए घूम रहा हूं.

मैं अपनी पत्नी से बेवफ़ाई भी नहीं कर रहा, क्योंकि तुम्हारी तो मैं इबादत करता हूं और मरते दम तक करता रहूंगा. तुम ख़ुश रहो, सलामत रहो, यही दुआ है. मुझे तुम्हारी कोई ख़बर तक नहीं, लेकिन यही यक़ीन है कि मेरी जो सांसें चल रही हैं, वो इस बात का सबूत हैं कि तुम सलामत हो!

– कुलविन्दर वालिया

 

पहला अफेयर: आकर्षण (Pahla Affair: Akarshan)

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पहला अफेयर: आकर्षण ((Pahla Affair: Akarshan)

मैं नौवीं क्लास में पढ़ रही थी. उन दिनों रामलीला का मंचन हो रहा था. बड़ी श्रद्धा से हम रोज़ रामलीला देखने जाते. एक दिन जब राम को युवावस्था में दिखाया गया, तो उनका ओजस्वी, गरिमामय रूप देखकर मैं तो मंत्रमुग्ध हो उन्हें अपलक निहारती रही. दिल में हलचल मच गई. राम का तेजस्वी व्यक्तित्व मुझे हर क्षण विचलित करने लगा. मेरा पढ़ाई में भी मन नहीं लग रहा था.

मेरे मन में राम से मिलने की इच्छा प्रबल होने लगी. दादू के कारण रामलीला कमेटीवालों का हमारे घर आना-जाना था. एक दिन अवसर पाकर मैंने राम का जो रोल कर रहे थे, उनके बारे में जानकारी हासिल कर ही ली. हमारे स्कूल के पीछे की बिल्डिंग में ही रामलीला के सारे पात्र रहते थे. यह नियम था कि दस दिन तक सब वहीं रहेंगे, रिहर्सल करेंगे, सात्विक भोजन करेंगे और ज़मीन पर सोएंगे.

एक दिन एक सहेली को लेकर मैं वहां पहुंच गई. हमें सबसे मिलवाया गया, लेकिन राम कहां हैं? पता चला राम बारहवीं कक्षा की परीक्षा देनेवाला है, इसलिए पढ़ाई में व्यस्त है. भोजन का समय हो चुका था. सब दरी पर बैठ गए. केले के पत्ते पर खाना परोसा गया. मैं तो राम का ही इंतज़ार कर रही थी. राम को देखा, तो धड़कनें और तेज़ हो गईं, कितना संपुष्ट, बलिष्ट और सुंदर था. सेवा करने के बहाने औरों के साथ-साथ मैंने भी खाना परोसना शुरू कर दिया. राम के पास जाते ही मैंने इशारा कर पूछा राम… “अरे भई, राम तो मैं स्टेज पर हूं, मेरा नाम सत्यम है.” राम बोले.

राम के पत्तल पर मैंने दुगुना खाना परोसा, तो उन्होंने बेख़्याली में मेरा हाथ पकड़ लिया, “बस! इतना खाऊंगा, तो मोटा होकर राम की जगह रावण का रोल मिलेगा.”

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मैं इस स्पर्श के सुखद एहसास से सुध-बुध-सी खोती हुई घर लौटी. अब तो यह रोज़ का क्रम बन गया. राम की जूठी पत्तल मैं ज़बर्दस्ती उठाती, इस प्रयास में जो हल्की-सी छुअन और सामीप्य मिलता, मेरे लिए वो अनुभूति ही अनमोल होती. वहां तो सब लोग इसे मेरी आध्यात्मिकता ही समझ रहे थे.

एक दिन कमेटी के अंकल ने बताया कि कुछ वर्षों तक हम राम-सीता का ब्याह वास्तविक रूप से कर देते थे. आज सीता स्वयंवर का मंचन था, मेरी बेचैनी चरम पर थी, तो क्या आज राम सीता का हो जाएगा? घर आकर मैं ख़ूब रोई, अगले दिन जब मैं रामायण निवास गई, तो मैंने सीता के कमरे में जाना चाहा, क्योंकि मैंने सुना था कि शादी के बाद पति-पत्नी साथ रहते हैं. इतने में ही अंकल ने एक लड़के को आवाज़ दी, “अरे नवीन, ज़रा इधर आना…” फिर मुझसे बोले, “यह रही सीता.”

“पर यह तो लड़का है.” अंकल ने कहा, “हां, लड़के का ही लड़की जैसा मेकअप करते हैं.” मेरी सारी उदासीनता उड़न छू हो गई. लगा जैसे गंगोत्री से ख़ुशियों की गंगा प्रवाहित हो गई. रामलीला समाप्त हो गई, तो मैं पढ़ाई के बहाने राम के घर जाती रही. फिर वो आगे की पढ़ाई के लिए शहर चले गए. पता चला कि राम के गांव में उनकी बहुत बड़ी खेती-बाड़ी है. राम का सपना है फर्टीलाइज़र्स का कारखाना बनवाने का, गांव का विकास करना चाहते हैं. एक दिन राम यानी सत्यम की दादी ने बताया कि सत्यम के दादाजी गांव के सरपंच हैं. यूं तो वहां सभी स्वतंत्र हैं, लेकिन शादी अपनी ही जाति में करनी पड़ती है. दूसरी जाति में शादी करने से जाति की आंतरिक विशेषताएं व गरिमा समाप्त हो जाती है. गांव में पंचायत के ही नियम चलते हैं. एक बार ऐसे ही किसी जोड़े ने गांव से भागकर प्रेम विवाह कर लिया था. पर पंचायत के लठैतों ने उन्हें पकड़ लिया और पंचायत के सामने दोनों को आमने-सामने पेड़ से लटका दिया. मेरा हाथ अचानक गले पर पहुंच गया.

अब हम बड़े हो चुके थे, कितना विरोधाभास था हमारे परिवारों में. कहां हम खुली सोच रखनेवाले, कहां वो पुरातनवादी सोचवाले. मैंने आगे सोचना ही बंद कर दिया. आज सालों बीत चुके हैं, फिर भी राम का वो नैसर्गिक रूप मुझे झकझोर देता है.

– रेनू भटनागर

पहला अफेयर: तुम ही तो हो मेरी संध्या (Pahla Affair: Tum Hi To Ho Meri Sandhya)

Pahla Affair

Pahla Affair: Tum Hi To Ho Meri Sandhya

पहला अफेयर: तुम ही तो हो मेरी संध्या (Pahla Affair: Tum Hi To Ho Meri Sandhya)

रिश्ते में महेश मेरे दीदी के देवर थे, लेकिन मैं इस बात से पहले अनजान थी. हमारी पहली मुलाक़ात मेरे चचेरे भाई के यहां हुई. उनका शांत और सौम्य व्यक्तित्व पहली मुलाक़ात में ही मेरे मन को भा गया. फिर दीदी की शादी में मुझे पता चला कि वो मेरे जीजाजी के भाई हैं. अब तो जब भी दीदी घर आती, महेश की ढेर सारी तारी़फें करती. उस साल गर्मी की छुट्टियां मैंने दीदी के घर पर बितायीं. इतने दिनों साथ रहकर मैं और महेश बहुत अच्छे दोस्त बन गए.

घर लौटने पर मैंने उन्हें ख़त लिखा और फिर ख़तों का सिलसिला शुरू हो गया. महेश उस व़क़्त मैथ्स से एम. एससी. कर रहे थे और मैं बायोलॉजी से बी.एससी., इसलिए पढ़ाई के बारे में तो हमारी ख़ास बात नहीं होती थी, परंतु मैं अक्सर उनसे पूछती कि मुझे भी एम. एससी. करनी है तो इसके लिए बी.एससी. में कितने प्रतिशत अंक चाहिए.

मेरे मन में महेश के लिए बहुत सम्मान था. पर इस सम्मान में छिपे प्यार से मैं अनजान थी. महेश की बातें कभी मेरी समझ में न आतीं. कभी वो मेरा मज़ाक उड़ातेे तो कभी मुझ पर हक़ जमाते.

एक दिन दीदी ने मुझे संध्या के बारे में बताया कि महेश उससे बेहद प्यार करते हैं और शादी करना चाहते हैं. दीदी ने मुझसे वादा लिया कि महेश और संध्या के रिश्ते के बारे में जीजू को समझाने में मदद करूंगी. मेरे दिल में छन्न से कुछ टूट गया, यानी महेश मुझसे प्यार नहीं करते.

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लेकिन मैंने अपनी भावनाएं किसी पर ज़ाहिर नहीं होने दीं. महेश पर भी नहीं, बल्कि अपनी चाहत छिपाने के लिए मैं उन्हें संध्या के नाम से अक्सर छेड़ती. मन में छिपी चाहत तो हमेशा के लिए ख़त्म हो गई.

दीदी के बेटे के पहले जन्मदिन पर मैंने और महेश ने मिलकर ढेर सारी तैयारियां कीं और महेश ने मुझे जी भरकर तंग किया. जाते-जाते मैंने महेश से संध्या की फ़ोटो दिखाने की ज़िद की. सुबह से शाम तक वो चुप रहे, पर रात को जब सब सोने चले गए तो उन्होंने धीरे से मुझसे पूछा, “संध्या की फ़ोटो नहीं देखनी है क्या?” मैं तो उसकी फ़ोटो देखने के लिए बेताब थी ही. वो मुझे छत पर ले गए. मैंने पूछा कि अब तो फ़ोटो दिखा दीजिए. जवाब में उन्होंने एक छोटा-सा आईना मेरे सामने रख दिया और बोले, “मिलिए मेरी संध्या से.” मैं कुछ कह पाती, इससे पहले उन्होंने हमारी मुहब्बत को शब्दों के रंगों से भर दिया.

“प्रिय वर्षा, मैं कोई कवि नहीं हूं जो तुम्हारी सुंदरता पर कविता लिखता. पर तुम जब भी मेरे साथ होती हो, मेरा ख़ुद पर, ज़िंदगी पर यक़ीन बढ़ जाता है. तुम्हारे विचारों व स्वभाव से मैं बहुत प्रभावित हूं और सच्चे मन से तुम्हें अपना जीवनसाथी मान चुका हूं. अब तो इस जीवन की सुबह भी तुम हो और शाम भी. इसलिए तुम ही हो मेरी, स़िर्फ मेरी संध्या.”

आज हमारी शादी को पूरे पांच साल हो गए हैं और हमारी प्यारी-सी बेटी अदा हम दोनों के जीवन की मुस्कान बन गई है.

– वर्षा कोष्टा

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पहला अफेयर: एक अधूरा ख़्वाब… (Pahla Affair: Ek Adhoora Khwab)

Pahla Affair: Ek Adhoora Khwab

Pahla Affair: Ek Adhoora Khwab

पहला अफेयर: एक अधूरा ख़्वाब… (Pahla Affair: Ek Adhoora Khwab)

“शाम को पार्टी में आना न भूलना. एक नामचीन हस्ती को बुलाया है, उनसे तुम्हारी मुलाक़ात करवाऊंगी”, इतना कहने के साथ ही अवनि ने लाइन काट दी. …न जाने इस बार किससे मिलवाने वाली है अवनि? एक क्षण सोचकर मैं फिर अपने काम में मसरूफ़ हो गई. दिनभर के काम निपटाने के बाद पार्टी में जाने की तैयारी करने लगी.

पार्टी में कई चेहरे जाने-पहचाने थे और कुछ बिल्कुल अनजाने. मिलने-जुलने का सिलसिला जारी था. मैं भी इसी सिलसिले में शामिल हो गई. तभी मेरी दोस्त अवनि ने मुझे आवाज़ दी, “अरे राजी, इधर आओ. इनसे मिलो- जाने-माने लेखक शेखरजी.” सामने खड़े शख़्स को देखकर चंद लम्हों के लिए मेरे भीतर एक जलजला-सा महसूस हुआ, फिर मैं सामान्य हो गई.

“आपका नया नॉवेल एक अधूरा ख़्वाब पढ़ा, काफ़ी अच्छा है.” मैंने ख़ुद को समेटकर कहा.

“तारीफ़ के लिए शुक्रिया. कुछ ख़्वाब कभी हक़ीक़त की शक्ल अख़्तियार नहीं करते और कुछ ख़्वाबों को हम ख़ुद अपने हाथों से तार-तार कर देते हैं. कई बार ऐसा होता है, जब हम ख़ुद को बंधनों में न बंधने देकर उस पल तो राहत महसूस करते हैं, पर व़क़्त बीतने के साथ वही आज़ादी हमें काटने-कचोटने लगती है.” इस जुमले के साथ ही शेखर दूसरों से बातचीत करने में मशगूल हो गए.

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घर लौटने पर उनके शब्द मेरे कानों में गूंजने लगे. गुज़रा हुआ व़क़्त करवटें लेने लगा-
पहली बार मैं और शेखर एक काव्य सम्मेलन में मिले थे. मुझे कविताएं लिखने का शौक़ था और शेखर तो अपने फन में माहिर थे ही. मैं शेखर की लेखनी से बहुत प्रभावित थी. धीरे-धीरे शेखर मेरे दिलो-दिमाग़ पर छाने लगे. अक्सर हम लोगों का मिलना-जुलना लगा रहता.
एक दिन हल्की बारिश हो रही थी और हम दोनों कॉफ़ी हाउस में बैठे हुए थे. सहसा शेखर ने कहा, “तुम्हें नहीं लगता कि हम दोनों में बहुत कुछ एक-सा है. कहीं ऐसा तो नहीं कि हमारी पसंद भी एक-सी है.” बहुत देर तक शेखर मेरी आंखों में आंखें डाले देखते रहे. मैं लाजवश कुछ न कह सकी.

“मैं तुम्हें बेहद प्यार करता हूं.” प्रेम का इज़हार इस तरह सुनकर मेरा चेहरा सुर्ख हो गया. फिर तो मेरे दिल में हरदम शेखर की बातें और उसका ख़याल रहने लगा. देखते-देखते अरसा बीत गया. जब घरवालों ने शादी के लिए मुझ पर दबाव डालना शुरू किया तो मैंने शेखर से कहा, “हमारे प्रेम को अगर सामाजिक स्वीकृति मिल जाए तो…”

“राजी, मुझे बंधन पसंद नहीं. मैं खुले आकाश में आज़ादी से उड़ना चाहता हूं. मैंने अभी तक वो मुक़ाम हासिल नहीं किया है, जिसकी मुझे तमन्ना है. यदि शादी की, तो आगे बढ़ने का कोई सवाल ही कहां रहेगा? हम दोनों चाहें तो ताउम्र अच्छे दोस्त बनकर रह सकते हैं, पर हमारे प्यार को रिश्ते में बांधने की कोशिश न करो, प्लीज़…” मेरा दिल तोड़ने में शेखर ने ज़रा भी संकोच नहीं किया. मैं हतप्रभ रह गई. आंखों से आंसू थमे ही नहीं. वो हमारी आख़िरी मुलाक़ात थी.

जब रास्ते ही बदल गए तो शेखर के वजूद को भी मैंने अपनी ज़िंदगी और अपने दिल से अलग कर दिया. कहते हैं, व़क़्त के साथ ज़ख़्म भर जाते हैं. शेखर ने शोहरत व दौलत कमाई और मैंने अपना घर बसाया. जब उसने रिश्ता तोड़ा था तो कितना आहत हुई थी मैं, लेकिन आज शेखर से मिलने के बाद लगा कि उसके ज़ख़्म नासूर बन चुके हैं और वो आज अपने फैसले पर पछता रहा है. दिल ने कहा, “शेखर, तुम मेरी ज़िंदगी का ऐसा ख़्वाब हो, जिसे मैं भूल से भी याद नहीं करना चाहती और मैं तुम्हारी आंखों का वो अधूरा ख़्वाब हूं, जिसे तुमने कभी पूरा करना ही नहीं चाहा. तुम्हें बद्दुआ भी तो नहीं दे सकती. आख़िर मेरे जीवन का पहला प्यार हो तुम.”

– राजेश्‍वरी शुक्ला

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पहला अफेयर: आवाज़ की दुल्हन (Pahla Affair: Awaaz Ki Dulhan)

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“उर्दू में ग़ज़ल सीखने के लिए कुछ क़िताबों से देखनी, पढ़नी-समझनी होगी. ज़रा अपना नाम बताएं.” मुझे लगा जैसे उसने मेरी पूरी शख़्सियत को उछाला है. बस ज़रा-सी हिली कि मेरी दुनिया कांधों पर से लुढ़क ज़र्रा-ज़र्रा हो जाएगी. “जी, चांदनी है.” पापा से मालूमात हुई- सलीम नाम से जाने जाते हैं. चुनांचे उर्दू के उस्ताद हैं और उर्दू उनकी ज़ुबान पर फिसलती रहती है.

छह माह तक मैं उर्दू की चट्टानों पर सिर पटकती रही, तब कहीं जाकर कुछ पल्ले पड़ा. उनकी पहली ग़ज़ल का मतला था-एक ग़लती कर गया, आ गया तेेरे शहर मेंकट चुके पेड़ थे, बस शोर था तेरे शहर मेंयह ग़ज़ल मुझे बड़ी अटपटी-छटपटी-सी लगी. पेड़ों का कटना फिर शोर! जिस इलाके में मैं रहती हूं, वहां क्या कम शोरगुल होता है? बच्चों की चिल्ल-पों, बुज़ुर्गों की खों-खों.अब सलीम मियां ने एक कव्वाली भी सीखने की हिदायत दी. जैसे मुझे कव्वाल बनना हो. अलबत्ता कव्वाल का तख़ल्लुस (उपनाम) जोड़ा. जब वे कोई ग़ज़ल गुनगुनाते, उनकी पुरसोज़ आवाज़ कमरे में थिरकने लगती.

धीरे-धीरे उनकी आवाज़ का जादू, मेरे सिर चढ़ बोलने लगा और मैं उनकी आवाज़ की दुल्हन बन चली. यह जानते हुए भी कि 23 की उम्र पार करने के बाद मेरे लिए रिश्तों का तांता ज़ारी है.उस आवाज़ में ऐसी कशिश थी कि मैं मीलों दूर तक बंधी चली गई. कभी-कभी लगता यह एक ख़ुशनुमा ख़्वाब है. ख़ुदा से बस यही दुआ मांगती कि यह ख़्वाब बिखरने न पाए.

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उस दिन जब मैंने अपने मामाजी को उनकी लिखी ग़ज़ल गाकर सुनाई-बंद क़िताबें खोलो तुम, खुलकर मेरे हो लो तुमउड़ना हम सिखला देंगे, पर अपने भी खोलो तुम…मामाजी ने मेरी आंखों में उनके लिए जो प्रशंसा के भाव थे को पढ़ लिया. “माशा अल्लाह! यह ग़ज़ल आप पर ही लिखी गई है.” मैं शर्म से पानी-पानी हो गई.बस! फिर क्या था. मास्टरजी का हमारे यहां आना कम और मेरा दूल्हा ढूंढ़ने की मुहीम तेज़ हुई.

अब समझ में आया कि क्यों मियां ग़ालिब इतनी ग़मज़दा ग़ज़लें कहते थे-ये न थी हमारी क़िस्मत कि वसल-ए-यार होताअगर और जीते रहते यही इंतज़ार होताइसी ग़म में घुट-घुट हमने भी कुछ ग़ज़लें लिख मारीं. हमें लगता कि हर मौत इतनी क़ातिलाना क्यों होती है कि छाती पीट-पीट रोने का अंदाज़ तक बदल जाता है.

मैं भटकी चिड़िया-सी फ़िज़ाओं में कुछ ढूंढ़ने चल पड़ी!मेरी तड़प व रुलाई पर क़िस्मत को ज़रा भी तरस न आया. आनन-फानन में मां व मामाजी ने मिल मेरे लिए एक महंगा और टिकाऊ दूल्हा तलाश लिया. वाह रे, क़िस्मत के मदारी! नाक में नकेल डाल, नचाने का इतना ही शौक़ था तो मुझे ही क्यों बलि का बकरा बनाया?बस! मैंने सलीम को अपने ङ्गपहले प्यारफ के इज़हार में ख़त लिखा. शायद वो मेरा पहला और आख़िरी ख़त था-

मेरे अज़ीज़ दोस्त!आपकी सोहबत में जितनी कटी, अच्छी कटी. बाकी भी कट जाएगी. आपसे कट कर भी, यह पर कटी चिड़िया, उड़ने की कोशिश करेगी! नहीं जानती! कोशिशें सदा क़ामयाब होती हैं. ख़ुदा हाफिज़!आपकी मुरीद  चांदउनके ग़ज़ल के अल्फाज़ आज भी मेरे दिल में ख़लिश पैदा कर देते हैं-उड़ना हम सिखला देंगे, पर अपने भी खोलो तुम…

– मीरा हिंगोरानी

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