Tag Archives: pahla affair

पहला अफेयर: दरमियान (Pahla Affair: Darmiyaan)

Pahla Affair, Darmiyaan
Pahla Affair, Darmiyaan
पहला अफेयर: दरमियान (Pahla Affair: Darmiyaan)

पहले प्यार (FirstLove) का एहसास होता है बेहद ख़ास, अपने फर्स्ट अफेयर (Affair) की अनुभूति को जगाने के लिए पढ़ें रोमांस से भरपूर पहला अफेयर 

किस तरह से कोई शख़्स अचानक ज़िंदगी में चला आता है और कब वो मुहब्बत बनकर आपकी रूह को छूकर निकल जाता है, शायद पता ही नहीं चलता. तुम भी तो इसी तरह से आए थे मेरे जीवन में. एक ताज़े, मदमस्त हवा के झोंके की तरह और मैं सूखे पत्ते की तरह बस उड़ती चली गई, किसी पागल नदी की तरह बस बहती चली गई… न धड़कनों पर काबू रहा था, न क़दमों पर… बहकती चली गई, मचलती चली गई… तुम मेरे लिए क्या थे, शायद तुम कभी समझ ही नहीं पाए… या मैं ही इतनी नासमझ थी कि तुमको समझ नहीं पाई…

वो पहली मुलाक़ात अब तक है याद… एक दोस्त की पार्टी में मिले थे हम. वो पूरी रात मैंने बस तुम्हें सोचते हुए काटी थी. कितनी कशिश थी तुम्हारे व्यक्तित्व में, कितना शालीन था तुम्हारा व्यवहार… पहली नज़र में ही मैंने ख़ुद को खो दिया था. पर तुम्हारे दिल में क्या था, मैं नहीं जानती थी.

एक दिन ऑफिस में काम कर रही थी कि अंजान नंबर से कॉल आया, “हाय, मैं विक्रम, विक्रम शर्मा बोल रहा हूं.”

“जी, मैंने आपको पहचाना नहीं, क्या काम है कहिए.” मैंने बेमन से जवाब दिया.

“आप रितु बोल रही हैं न, हम उस दिन पार्टी में मिले थे… इतनी जल्दी भूल जाएंगी आप मुझे, मैंने सोचा नहीं था.”

“ओ माय गॉड! आपका नाम तक भी नहीं जानती थी मैं, इसलिए नहीं पहचान पाई, मेरा नंबर कहां से मिला आपको?”

“ढूंढ़ने पर तो भगवान भी मिल जाता है… मैं सोच रहा था, अगर आप आज शाम मेरे साथ कॉफी पी सकें, तो मेरी लाइफ बन जाएगी.”

“जी, बात अगर आपकी लाइफ की है, तो मैं मना कैसे कर सकती हूं…” न जाने उसकी बातों में क्या जादू था, मैं बस खिंचती चली गई. उसके बाद न जाने ऐसी कितनी ही मदभरी शामें हमने साथ गुज़ारीं. मैंने तो कल्पना भी नहीं की थी कि मेरी पहली नज़र का पहला प्यार मेरे लिए इतना बेक़रार होगा…

लेकिन पता नहीं मन में कहीं न कहीं मुझे यह महसूस होता था कि कहीं कुछ न कुछ सही नहीं है. तुम्हारा अचानक कहीं खो जाना, कुछ कहते-कहते ख़ुद को रोक लेना… फिर मैंने ही एक दिन सोचा कि अपने दिल की बात कह दूं तुमसे कि हां, मुझे प्यार है और तुम ही वो, जिसके साथ मुझे सारी ज़िंदगी बितानी है… इतने में तुम्हारा भी फोन आ गया कि शाम को कुछ ज़रूरी बात करनी है, मैंने सोचा तुम भी मुझे प्रपोज़ करनेवाले हो…

मेरी ज़िंदगी का सबसे हसीन दिन था वो. सोचा था दोपहर को शॉपिंग के बाद तुमसे कॉफी हाउस में मिलूंगी. पर मेरे लिए यह किसी सरप्राइज़ से कम नहीं था कि तुम मुझे शॉपिंग मॉल में ही नज़र आ गए थे.

“हाय विक्रम, देखो हम शाम को मिलनेवाले थे, पर शायद भगवान भी नहीं चाहता कि अब हम और इंतज़ार करें… विक्रम, क्या हुआ? तुम इतने झिझक क्यों रहे हो?” मैं बस विक्रम से बात ही कर रही थी कि एक 7-8 साल का बच्चा वहां आकर विक्रम से लिपटते हुए बोला, “पापा, मुझे प्लीज़ गेम ज़ोन में ले चलो न, मैं यहां बोर हो रहा हूं…” मुझे अपने कानों पर विश्‍वास नहीं हो रहा था. विक्रम शादीशुदा थे. उनका बेटा भी है. ऐसा कैसे हो सकता है. इतना बड़ा धोखा? मेरी ज़िंदगी का सबसे हसीन दिन तो जैसे मेरे लिए जानलेवा साबित हो गया था. किसी तरह ख़ुद को संभाला मैंने और विक्रम को बाय बोलकर चली आई.

एक महीने से ज़्यादा का समय हो गया, तुमने कई बार फोन किया, मैसेज किए, पर मैंने न मैसेज पढ़े, न ही फोन का जवाब दिया. एक धोखेबाज़ शख़्स से मैं कोई रिश्ता नहीं रखना चाहती थी. मेरी भावनाओं से खेलकर आख़िर क्या मिला… या यह तुम्हारा शौक़ होगा, लड़कियों को अपने आकर्षण में फंसाकर उनका इस्तेमाल करना.

यह भी पढ़ें: पहला अफेयर: आईनेवाली अलमारी

काश! मैं समझ पाती पहले, तो वो सब कुछ भी न हुआ होता, जो एक शाम हमारे बीच हुआ था… इतने में ही डोरबेल बजी, दरवाज़ा खोला, तो हैरानी भी थी और ग़ुस्सा भी…

“विक्रम, तुम अब क्या लेने आए हो? तुम्हें जो चाहिए था, वो तो मिल ही चुका न, मेरा शरीर, मेरा जिस्म… बस यही तो चाहते हो तुम मर्द.”

“रितु, मेरे प्यार को वासना का नाम देकर उसे गाली मत दो. तुम्हें मुझसे बात नहीं करनी, मत करना, रिश्ता नहीं रखना, मत रखना… पर एक बार सफ़ाई देने का मौक़ा तो दे ही सकती हो…”

“सफ़ाई, किस बात की, यही कहोगे न कि तुम्हारी शादी कम उम्र में ही गांव की किसी लड़की से हो गई थी, तुम्हारी बीवी से तुम्हें प्यार नहीं, वो तुम्हें समझ नहीं पाती… अक्सर मर्द अपनी कमज़ोरियों को इसी तरह छिपाते हैं. अपनी बीवी को बदनाम करके नाजायज़ रिश्ते बनाते हैं… मैं किसी की रखैल बनकर नहीं जीना चाहती…”

बस करो रितु, यह कहकर विक्रम ने मुझे बांहों में भरकर मेरे लबों को अपने लबों से बंद कर दिया… मैं छूटने की कोशिश करती रही, पर नाकामयाब रही…

“रितु, तुम इतनी ग़ुस्से में हो कि अपने प्यार से ही तुम्हारा मुंह बंद कर सकता था. अब प्लीज़ सुनो मेरी बात… रोहित मेरा बेटा है यह सच है, मैं शादीशुदा हूं यह भी सच है, हां मेरी शादी मेरी अपनी मर्ज़ी से हुई थी और मेरी पत्नी मेरे जीवन का सबसे अनमोल तोहफ़ा थी. बहुत प्यार करता था उससे मैं. लेकिन राहुल के जन्म के व़क्त ही वो हमें छोड़कर दूसरी दुनिया में चली गई. राहुल को उसके नाना-नानी अपने साथ ले गए, क्योंकि मेरे परिवार में कोई बुज़ुर्ग नहीं था और न ही राहुल को संभालनेवाला कोई था. वो छुट्टियों में आता है मेरे पास. उस रोज़ शाम को मैं तुम्हें यही सब बतानेवाला था, ताकि तुम अपना निर्णय ले सको.

सच कहता हूं रितु, तुम्हें जब पहली बार देखा, तो बेहद अपनापन लगा. मुझे लगा मेरी पत्नी नीलू के बाद अगर किसी लड़की ने मेरे दिल को छुआ है, तो वो स़िर्फ तुम हो… जब तुमसे शादी के बारे में सोचता, तो बस राहुल का ख़्याल आ जाता और तुम्हारी प्रतिक्रिया को लेकर थोड़ा डर जाता. लेकिन जिस रोज़ हम और क़रीब आए, उसके बाद मुझे एक अपराधबोध महसूस होने लगा. मुझे लगा तुम्हें अब तक अंधेरे में रखा और तुम्हारे साथ इतना क़रीब आ गया… बस, यही ग़लती है मेरी. अब तुम जो निर्णय लो, मैं तुम पर ज़ोर नहीं डालूंगा… ”

“तुमने मुझे इस काबिल ही कहां छोड़ा कि अब किसी और की हो सकूं…” यह कहते हुए अपने अधरों को मैंने विक्रम के लबों पर रख दिया… उसके बाद स़िर्फ प्यार ही प्यार था हमारे दरमियान… न कोई दीवार, न कोई ग़लतफ़हमी, न कोई शिकवा, न शिकायत…

आज मैं ख़ुश हूं कि जिसको चाहा उसे ही हमसफ़र बना दिया भगवान ने, राहुल जैसा बेटा और रिनी जैसी बेटी के साथ हम एक हैप्पी फैमिली हैं. मेरा पहला प्यार मेरी ज़िंदगी बन गया… आप भी किसी से प्यार करो, तो उस पर पूरा विश्‍वास करो…

– योगिनी भारद्वाज

यह भी पढ़ें: पहला अफेयर: धूप का टुकड़ा

पहला अफेयर: आईनेवाली अलमारी (Pahla Affair: Aainewali Almaari)

Pahla Affair, Aainewali Almaari

Pahla Affair, Aainewali Almaari

पहला अफेयर: आईनेवाली अलमारी (Pahla Affair: Aainewali Almaari)

पहले प्यार का एहसास होता है बेहद ख़ास, अपने फर्स्ट अफेयर की अनुभूति को जगाने के लिए पढ़ें रोमांस से भरपूर पहला अफेयर

आज फिर दोपहर में फुर्सत होते ही ड्रेसिंग रूम में जाकर अलमारी के सामने खड़ी हो गई. कितने घर बदल गए, घर का पूरा फर्नीचर बदल गया, नहीं बदला कुछ, तो यह अलमारी और इससे मेरा प्यार… अपने पहले प्यार की तरंगित मधुर स्मृतियों को क्या कोई अपने आप से दूर कर पाया है? इसके धुंधला चुके आईने में अब भी तुम्हारा प्रतिबिंब झलकता है. इसके भीतर आज भी दो कुंआरे दिलों के प्रेम की प्रथम अनछुई अनुभूति धड़कती है.

सोलह-सत्रह बरस की, ख़्वाबों में खोई रहनेवाली उम्र थी वो. जब एक दिन ढलती सांझ के रंगों में अपने मन की तूलिका से कुछ अनगढ़ से चित्र गढ़ती मैं छत पर खड़ी थी कि तभी पड़ोसवाली छत पर किसी के आने की आहट सुनकर उत्सुकता से उधर देखा. बगलवाला मकान कई दिनों से खाली था, दो-तीन दिन हुए कोई आया था, लेकिन पहचान नहीं हुई थी. देखा, 20-22 बरस का एक लड़का खड़ा था.

पता नहीं उम्र का तकाज़ा था या प्रकृति ने ही कोई संकेत किया था कि आंखें बरबस ही उस ख़ूबसूरत चेहरे पर अटक गईं. ढलती शाम की लालिमा उसके सुंदर, गोरे चेहरे पर छाई थी और तभी उसका ध्यान मेरी तरफ़ गया. मैंने फ़ौरन अपनी आंखें झुका लीं. दिल ज़ोर से धड़क उठा. देर तक मैं छत पर ही खड़ी रही, मन हवा में किसी के साथ को महसूस कर रोमांचित हो रहा था.

स्कूल आते-जाते अक्सर वो दिखाई देता. मेरी आंखें झुक जातीं, हाथ-पैर कांप जाते, चाल लड़खड़ा जाती और वो हौले से मुस्कुरा देता. मेरी शामें अब छत पर ही गुज़रने लगीं और वो तो मुझसे पहले ही छत पर मिलता, दरवाज़े पर नज़रें गड़ाए हुए. दिल से दिल तक प्रेम शायद कुछ तार जोड़ने लग गया था. जल्द ही दोनों घरों के बीच घनिष्ठता हो गई और हमारे बीच भी. हां, दिल की बातें अब भी बस आंखों तक ही सीमित रहती थीं. साल कब बीत गया पता ही नहीं चला.

यह भी पढ़ें: पहला अफेयर: मेरा प्यार ही मेरी प्रेरणा बन गया…

एक दिन घर के सभी लोग किसी रिश्तेदार के यहां गए हुए थे कि तभी वो आ गया. यूं एकांत में पहली बार उसके साथ… तभी उसने एक किताब मांगी और मैं कमरे में चली आई. वो भी आकर मेरे पीछे ही खड़ा हो गया. हम दोनों के दिल इतनी ज़ोरों से धड़क रहे थे कि हमें एक-दूसरे की धड़कनें सुनाई दे रही थीं. तभी उसने मेरा दुपट्टा उठाया और मेरे सिर पर ओढ़ा दिया. मैंने सामने आईने में देखा, वो मुस्कुरा रहा था, उसकी आंखों में जैसे सारी क़ायनात का प्यार उमड़ आया था. कितना पवित्र, पावन प्रणय निवेदन था. बिना बोले भी सब कुछ तो कह दिया था. जैसे संपूर्ण अधिकारों के साथ मुझे अपने जीवन में शामिल कर लिया था. मौन घोषणा कर दी थी ईश्‍वर के सामने कि मैं स़िर्फ उसकी हूं. मैं देर तक आईने में हम दोनों की छवि निहारती प्रार्थना करती रही कि यह बंधन सात जन्मों तक अटूट रहे. आईना हम दोनों के प्रणय और युगल छवि का मौन साक्षी बन गया.

किंतु 35 बरस पहले की रूढ़ियों ने हमारे प्यार को विवाह में परिणत नहीं होने दिया और टूटा मन लेकर वह शहर छोड़कर ऐसा गया कि फिर कभी नहीं मिला.

जब विवाह हुआ, तो पिताजी से बस यह अलमारी ही मांग ली थी. आज भी पहले प्यार की वह मधुर छवि इस आईने में ज्यों की त्यों मुस्कुराती हुई दिखाई देती है.

– डॉ. विनीता राहुरीकर

यह भी पढ़ें: पहला अफेयर: अब लौट आओ… 

पहला अफेयर: मेरा प्यार ही मेरी प्रेरणा बन गया… (Pahla Affair: Mera Pyar Hi Meri Prerna Ban Gaya)

Pahla Affair, Mera Pyar Hi Meri Prerna Ban Gaya

Pahla Affair, Mera Pyar Hi Meri Prerna Ban Gaya

पहला अफेयर: मेरा प्यार ही मेरी प्रेरणा बन गया… (Pahla Affair: Mera Pyar Hi Meri Prerna Ban Gaya)

पहले प्यार का एहसास होता है बेहद ख़ास, अपने फर्स्ट अफेयर की अनुभूति को जगाने के लिए पढ़ें रोमांस से भरपूर पहला अफेयर

सच्चे प्यार का एहसास भटके हुए को सही राह दिखाता है. कभी किसी की कमज़ोरी नहीं बनता, बल्कि किसी की ताक़त बन उसे जीने की प्रेरणा देता है. ऐसी प्रेरणा, जो उसके जीवन को किसी मुक़ाम तक पहुंचाए. मीना भी मेरे जीवन की वह प्रेरणा है, जिसने  मुझे नई राह दिखाई. इस मुक़ाम तक पहुंचने में मेरी प्रेरणा बनी.

बात उन दिनों की है, जब मैं कॉलेज में पढ़ता था. मीना नाम की बेहद ख़ूबसूरत लड़की मेरी क्लास में पढ़ती थी. उसकी नीली, झील-सी आंखों में ऐसी कशिश थी कि मैं उसमें बंधता जा रहा था. धीरे-धीरे आलम यह हो गया कि उसे देखे बिना मेरा दिन कटना मुश्किल होता जा रहा था. पढ़ने में मेरा मन बिल्कुल नहीं लगता था. बस, हर पल आंखों में उसी की तस्वीर रहती थी. सच पूछो तो मैं उसके प्यार में अंधा हो गया था.

एक दिन मीना से मैंने अपने प्यार का इज़हार कर ही दिया. मेरी बात का कोई उत्तर दिए बिना वो चली गई. अगले दिन उसने क्लास में खड़े होकर कहा, “आज सर नहीं आए, तो क्यों न एक परिचर्चा पर विचार-विमर्श हो जाए.” पूरी क्लास ने एक स्वर में कहा, “आइडिया अच्छा है. पर विषय तो बताओ?”

मीना बोली, “हमारी कॉलेज लाइफ़ और प्यार. अब आप लोग इस पर अपने विचार व्यक्त करें.” पीछे की बेंच पर बैठे लड़के चिल्लाए, “बहुत ज़रूरी है प्यार लाइफ़ में…”

नेहा नाम की एक दबंग लड़की बोली, “प्यार का मतलब बकवास है. इसका फेवर वे लोग ही करेंगे, जो कॉलेज को मौज-मस्ती का अड्डा मानते हैं.” यह सुनकर लड़के होहल्ला मचाने लगे. यह सुनकर मीना ने सबको शांत किया और क्लास के सबसे बुद्धिमान लड़के
राकेश की ओर मुखातिब होकर बोली, “तुम अपने विचार व्यक्त करो.”

यह भी पढ़ें: पहला अफेयर: मेरी क्या ख़ता थी…?

यह भी पढ़ें: पहला अफेयर: तुम्हारा जाना…

राकेश बोला, “प्यार वह ख़ूबसूरत एहसास है, जिसके बिना ज़िंदगी जीना संभव नहीं. सबसे पहला और अद्भुत प्यार तो वात्सल्य होता है, जो जन्म से ही हमें माता-पिता से मिलता है. यह प्यार निस्वार्थ और निष्कपट होता है, जो जीवन के अंतिम पड़ाव तक हमें संरक्षण प्रदान करता है. प्यार का दूसरा रूप है- स्नेह. यह हमें अपने भाई-बहनों, गुरुजनों, मित्रों-रिश्तेदारों से मिलता है. यह प्यार हमें अपने गुणों और अच्छे व्यवहार के कारण मिलता है. हां, यदि परिचर्चा का विषय प्रेमी-प्रेमिका वाले प्यार सेे है, तो उससे तो तौबा-तौबा, क्योंकि अभी हमारे पढ़ने की उम्र है. बीता व़क़्त तरकश से निकले तीर की तरह होता है, जो दोबारा लौटकर नहीं आता. कॉलेज लाइफ़ का एक-एक दिन क़ीमती है. हमें ऐसे प्यार के चक्कर में न पड़कर अपना भविष्य संवारना चाहिए.”

मीना के चेहरे पर एक विशेष प्रकार की संतुष्टि थी, वो मेरी तरफ़ मखातिब होकर बोली, “ओमेशजी, क्या आप भी राकेशजी के विचारों से सहमत हैं?” मेरे मुंह से बस इतना ही निकला, “हां, पूरी तरह से.”

उस दिन यदि मीना ने मुझे सही राह न दिखाई होती, तो मैं आज जिस मुक़ाम पर खड़ा हूं, वहां तक कभी न पहुंच पाता. पहले प्यार के एहसास जब याद आते हैं, तो आज भी आंखें उसके प्रति श्रद्धा से झुक जाती हैं.

– डॉ. ओ. पी. दास गुप्ता

 

 

पहला अफेयर: मेरी क्या ख़ता थी…? (Pahla Affair: Meri Kya Khata Thi?)

Pahla Affair: Meri Kya Khata Thi

Pahla Affair, Meri Kya Khata Thi

पहला अफेयर: मेरी क्या ख़ता थी…? (Pahla Affair: Meri Kya Khata Thi?)

लगभग 20 साल पुरानी है. तब मेरी उम्र 17 साल थी. हमारे पड़ोस में एक कपूर परिवार रहता था. उनके परिवार से मैं बहुत घुल-मिल गई थी. उनकी पत्नी अपनी स्कूटी की चाबी हमेशा उसमेंं ही लगाकर भूल जाती थीं. मैं उनकी इस आदत का फ़ायदा उठाते हुए अक्सर उनसे बिना कहे उनकी स्कूटी लेकर घूमने चली जाती थी.

एक दिन इसी तरह मैं उनकी स्कूटी लेकर अपनी बुआ के घर चली गई. वापस लौटी तो पता चला कि कपूर साहब के भाई, जो चंडीगढ़ से यहां किसी इंटरव्यू के लिए आए थे, उनकी ट्रेन छूट गई, क्योंकि उनका टिकट स्कूटी की डिक्की में रखा हुआ था.

मैं अपने किए पर शर्मिंदा हो रही थी कि वो साहब बोले, “शायद वाहे गुरु की मर्ज़ी कुछ और है. मेरी मंज़िल चंडीगढ़ नहीं, कहीं और है.” मैं शरमाकर वहां से भाग गई. पर उनका चेहरा मेरे ख़यालों में और बातें मेरे कानों में गूंज रही थीं. अब तो मैं कुछ न कुछ बहाना करके उनके घर के चक्कर लगाने लगी थी.

उस ज़माने में खुलकर मिलने की बात तो हम सोच भी नहीं सकते थे. अत: हमारी बातों का ज़रिया था- गोलू, कपूर साहब का बेटा. वे लोग आपस में पंजाबी में बातें किया करते थे, जो मुझे समझ में नहीं आती थीं.

यह भी पढ़ें: पहला अफेयर: अधूरे ख़्वाब

यह भी पढ़ें: पहला अफेयर: तुमको न भूल पाएंगे

एक दिन मैंने खीझकर कहा, “रहते बिहार में हो, तो आपको यहां की भाषा अपनानी चाहिए.” बस, उन्होंने झट से एक काग़ज़ पर कुछ लिखा और शरारतभरी मुस्कुराहट के साथ कहा, “अगर आप कहें तो मैं यहीं का बन जाऊं और मुझे तो हिंदी लिखनी भी आती है. आप पढ़कर सुनाओ तो जानूं.” मैंने उस काग़ज़ को पढ़ना शुरू ही किया था कि मेरी बोलती बंद हो गई. उसमें लिखा था, ‘झील-सी आंखों में डूब जाऊं, ऐतराज़ न करना, इन बांहों में ही चाहूं अब जीना-मरना.’

इस तरह हमारा प्यार चुपके-चुपके अपनी मंज़िल की ओेर बढ़ रहा था कि एक आंधी ने सब तहस-नहस कर दिया. मेरी दीदी ने एक तमिल लड़के से कोर्ट-मैरिज कर ली. वे जानती थीं कि इस रिश्ते को हमारा कट्टरपंथी ब्राह्मण परिवार और समाज अपनी स्वीकृति नहीं देगा. पापा इस सदमे को सह नहीं पाए और उन्होंने नींद की गोलियां खाकर अपनी जान देने की कोशिश की.

ईश्‍वर की कृपा से पापा बच गए. पर मैं जैसेे हक़ीक़त के धरातल पर उतर आई थी. मैं भी तो एक पंजाबी लड़के से प्यार करने लगी थी. पापा शायद दूसरे सदमे को सह नहीं पाएंगे. मुझे अपने बढ़ते क़दमों को रोकना होगा. उस दिन से मैंने कपूर साहब के घर जाना बंद कर दिया. लेकिन मैं इतना समझ चुकी थी कि उनके सामने रहूंगी, तो टूट जाऊंगी. अत: मैंने अपनी आगे की पढ़ाई कोलकाता में अपनी मौसी के घर रहकर पूरी करने का निर्णय लिया.

जिस दिन मैं कोलकाता जा रही थी, गोलू ने मुझे एक काग़ज़ का टुकड़ा दिया, जिसमें लिखा था, ‘मेरी क्या ख़ता थी?’ आज भी मैं इसका उत्तर खोजती हूं, तो अपराधबोध से भर जाती हूं. पर इसके लिए भी समाज कम दोषी नहीं. पता नहीं हम ग़लत थे या यह रूढ़िवादी समाज. शायद कच्ची उम्र का प्यार ही ग़लत होता है, जो वास्तविकताओं से दूर केवल दिल को ही पहचानता है. लेकिन ये एक अनमोल ख़्वाब की तरह है, जो कभी भुलाए नहीं भूलता.

– पूनम

पहला अफेयर: अधूरे ख़्वाब (Pahla Affair: Adhoore Khwab)

Pahla Affair, Adhoore Khwab
Pahla Affair, Adhoore Khwab
पहला अफेयर: अधूरे ख़्वाब (Pahla Affair: Adhoore Khwab)

व़क्त गुज़र जाता है, लेकिन उसकी कुछ यादें दिल के किसी कोने में हमेशा मौजूद होती हैं, जिनमें डूबकर कभी लगता है बहुत हसीन है यह ज़िंदगी, मगर कुछ बेरहम भी है, क्योंकि इनमें तुम्हारी जुदाई के वो कराहते लम्हे ही अधिक हैं… जिनके पार उतरना बहुत असंभव है.
जीवन के संघर्षमय सागर में मुझे अकेला छोड़कर जब तुम चले गए, तो ऐसा कोई नहीं था, जो मेरे जलते हुए निर्विश्राम जीवन पर सांत्वना की दो बूंद छिड़क दे, फिर भी मैं व्यथित नहीं हुई… सर्वथा आमोद-प्रमोद की लहरों में पड़ी रही… मेरा ही दुखी मन और मैं ही समझानेवाली थी. वेदना के शोलों पर मुस्कुराहट की राख बिखेरते हुए हर तरह से मन के भावों को कुचलने की चेष्टा में तुम्हारा इंतज़ार करती रही.

जब तक तुम थे, तभी तक ज़िंदगी थी मेरे आस-पास… लेकिन जब तुम जॉब करने अचानक जर्मनी चले गए, तब मैंने देखा था कैसे किसी शख़्स का चले जाना वीरान कर जाता है सारा शहर!

तुम्हारी योग्यताओं को देखते हुए वहां तुम्हें बहुत बेहतरीन जॉब का ऑफर मिला था, इसलिए वहां तुम्हें जाना पड़ा और तुम चले गए. तुम्हारे इस तरह चले जाने के बाद तुम्हारे ग़म में डूबी मैं ढूंढ़ती रही हूं अपने को! क्योंकि मेरा वजूद तो तुम थे. तुम्हारे बिना मैं आज भी अधूरी हूं.

यह प्यार भी एक अलौकिक सज़ा है… ग़म देनेवाला एक मज़ा है और इसका सिरा मैं कहीं न कहीं से ढूंढ़ ही लेती हूं.

यह भी पढ़ें: पहला अफेयर: रूठ गया वसंत… 

यह भी पढ़ें: पहला अफेयर: वो मेरी तक़दीर बन गया…

मेरा ये पहला प्यार ही मेरे लिए सारा जीवन है. मेरी जिन आंखों में आज आंसू ही आंसू हैं, कभी इनमें वो सपने हुआ करते थे, जिन्हें प्यार की राहों में तुम्हारे साथ चलते हुए मेरी पलकों ने सजाया था. हमारे वो सपने कभी आकाश के तारों से रौशन हुआ करते थे और ये सर्द हवाएं हमारे लिए प्यार के तराने गाया करती थीं. महकते फूलों का संगीत उन रास्तों को जगाया करता था, जिन राहों पर एक-दूसरे की बांहों का सहारा लेकर हम रखते थे अपने क़दम!

बचपन के साथी थे हम, लेकिन हमारे बचपन की कहानी ज़माने से कोई अलग नहीं थी. वही साथ-साथ खेलना… नदी के उस पार की बगिया से आम व अमरूद तोड़कर एक साथ पहाड़ों पर चढ़ते-उतरते हमारा बचपन कैसे बीत गया, हमें पता भी नहीं चला.

तीन वर्ष हो गए तुमको यहां से गए हुए और अब ग़मों से घिर गई हूं मैं. कहां हो तुम? बड़ी वीरान हैं उम्मीदों की राहें… चले आओ मेरी आंखें तुम्हें देखने की चाह में कुछ और देखना ही भूल गई हैं… अपने जल्द आने की बात कहकर भी तुम नहीं आए… न जाने इतना धैर्य तुममें कहां से आ जाता है? लेकिन मेरे साथ ऐसा नहीं है. मेरे साथ पूरा परिवार है और मेरे साथ-साथ मेरे पूरे परिवार ने भी तुम्हारा इंतज़ार किया था. फिर एक दिन रीति-रिवाज़ों के बंधन में बंधकर मैं किसी और की हो गई!

जो प्यार मैंने तुमसे किया और तुम्हारे प्यार ने मुझे जो एहसास, जो यादें दीं शायद इसे ही पहला प्यार कहते हैं… तुम्हारा यही प्यार आज भी ज़िंदा है मेरे मन में. तुम्हारे इस एहसास के साथ-साथ मुझे ‘अधूरे ख़्वाब’ दिखाने के लिए तुम्हारा बहुत-बहुत शुक्रिया!

– दिशा राजवानी

पहला अफेयर: वो मेरी तक़दीर बन गया… (Pahla Affair: Wo Meri Taqdeer Ban Gaya)

Wo Meri Taqdeer Ban Gaya

Pahla Affair: Wo Meri Taqdeer Ban Gaya

पहला अफेयर: वो मेरी तक़दीर बन गया… (Pahla Affair: Wo Meri Taqdeer Ban Gaya)

वो मेरी तक़दीर बन गया…
बरसात में हम पानी बनकर बह जाएंगे
पतझड़ में फूल बनकर झर जाएंगे
क्या हुआ आज तुम्हें इतना तंग करते हैं
एक दिन बिना बताए इस दुनिया से चले जाएंगे.

उसने तो शायरी की चंद पंक्तियां सुनाकर सबकी वाहवाही लूट ली. लेकिन मेरा दिल उन ल़फ़्ज़ों की आंच से धीमे-धीमे पिघलने लगा. कई दिनों से वह मेरा पीछा कर रहा था. वह मुझे अपनी हरकतों से इस अंदाज़ से छेड़ता कि मैं चाहकर भी कुछ न कह पाती. मन ही मन उसकी अदाएं, बदमाशियां और उसका इस तरह से मुझे छेड़ना अच्छा भी लगता, लेकिन मैं यह बात उस पर ज़ाहिर न होने देती. एक दिन वह अचानक मेरे सामने आ खड़ा हुआ और कहने लगा, “आख़िर आप मुझसे बात क्यों नहीं करना चाहती हैं? मैं एक शरीफ़ और अच्छे घर का लड़का हूं. आपको पसंद करता हूं, इसलिए आपसे दोस्ती करना चाहता हूं.”

मैंने कोई जवाब नहीं दिया और पलटकर चल दी. कई दिनों तक वो कोशिश करता रहा कि मैं एक बार नज़र उठाकर उसकी तरफ़ देख लूं. मन तो मेरा भी चाहता था कि सबकी नज़रें चुराकर उसकी एक झलक देख लूं, लेकिन एक अनजाना डर हमेशा मुझे इस बात से रोक देता था.

यह भी पढ़ें: पहला अफेयर: यादों की ख़ुशबू…

यह भी पढ़ें: पहला अफेयर: मासूम परछाइयां 

मैं अपने परिवार से बहुत प्यार करती थी और नहीं चाहती थी कि मेरा कोई भी ग़लत क़दम मुझे उनसे अलग कर दे. हालांकि उसकी लगातार मेरे क़रीब आने और बात करने की कोशिशों से मेरा दिल विद्रोही हो उठा था और बगावत करने पर उतारू हो गया था. लेकिन मैं तो जैसे दिल की बात सुनने को तैयार ही नहीं थी. मैं प्यार के चक्कर में पड़ना नहीं चाहती थी. इतना तो मैं जानती थी कि ख़ुशनसीब होते हैं वो लोग, जिनका प्यार सही अंजाम तक पहुंचता है. मैं प्यार का दर्द लेकर जीना नहीं चाहती थी. इसलिए मैंने उससे दूर रहना ही ठीक समझा.

एक दिन पापा ने मुझसे कहा, “बेटे आज एक पार्टी में जाना है, जहां लड़केवाले आएंगे. मैं चाहता हूं तुम उन लोगों से मिलो. लड़के से भी बात करके देख लो. हमें जल्दी ही तुम्हारी शादी का फैसला लेना है.” मैंने भी पापा की बात को सहमति देते हुए कहा, “पापा, जैसा आप ठीक समझें. मुझे पता है, आपका फैसला ग़लत नहीं होगा.”

जब हम पार्टी में पहुंचे तो मैं सबसे औपचारिक बातें करने में मशग़ूल थी कि माइक पर आवाज़ गूंजी,
अजनबी लोग भी देने लगे इल्ज़ाम मुझे
कहां ले जाएगी तेरी पहचान मुझे
भुलाना चाहूं तो भुलाऊं कैसे,
लोग ले ले के बुलाते हैं तेरा नाम मुझे.

तालियों की गड़गड़ाहट के बीच जो चेहरा मेरे सामने आया, वो उसका ही था. मैं मुड़कर जाने ही लगी कि पापा बोले, “बेटे, यही मधुर है, जिसे हमने तेरे लिए चुना है. अब फैसला तुझे करना है.” मेरी आंखें छलक पड़ीं. जब पलकें उठाकर उसे मुस्कुराते देखा तो मैं रोते-रोते मुस्कुरा उठी और अपनी क़िस्मत पर इतराने लगी-

जिस प्यार को मैं ठुकरा रही थी
वही मेरी क़िस्मत बन गया
जिसे ज़ुबां पर लाना मुश्किल था
वो नाम मेरे माथे का सिंदूर
मेरी तक़दीर बन गया…

– वीना साधवानी

पहला अफेयर: यादों की ख़ुशबू… (Pahla Affair: Yadon Ki Khushbu)

पहला अफेयर, यादों की ख़ुशबू, Pahla Affair, Yadon Ki Khushbu

पहला अफेयर, यादों की ख़ुशबू, Pahla Affair, Yadon Ki Khushbu

पहला अफेयर: यादों की ख़ुशबू… (Pahla Affair: Yadon Ki Khushbu)

चली हवा छाई घटा, चुनरी क्यों लहराई
बैठी-बैठी सोच रही मैं, बेबात क्यों हिचकी आई
उस रोज़ स्वेटर सीने बैठी उंगली में सुई ऐसी चुभी कि उस चुभन का एहसास आज भी ताज़ा है. ख़ून आज भी रिस रहा है. सूई की पीड़ा की अथाह परतें आज भी मन को मथने लगती हैं. मम्मी उठकर पास चली आईं. शायद उसने मेरा दर्द महसूस किया. मम्मी के बगल में बैठा मनुज ज़ोर-ज़ोर से ठहाका लगाकर हंस पड़ा. कभी-कभी बातों को हंसी में उड़ा देना और फिर एकदम गंभीर हो जाना, जैसे कोई रहस्यमयी क़िताब पढ़ रहा हो, ये सब उसकी आदतों में शामिल था. मैं खीझ उठती, “मनु, किसी नाटक कंपनी में भरती हो जाओ या मंच पर मिमिक्री का रोल…” मेरी बात को काटकर मम्मी से कहता, “भई स्वेटर के उल्टे फंदों में उलझेगी तो हादसा तो होगा ही.” मैं कटकर रह जाती. वह फिर ठहाका लगाता और… मैं उसकी हंसी की आवाज़ में खो जाती.

उसका छोटा-सा परिचय- वह हमारे गेस्ट हाउस में रहने आया. पापा के किसी ख़ास दोस्त का सिरफिरा साहबज़ादा. उसकी कही हुई एक-एक बात आज भी दुधारी तलवार-सी चीरती है मुझे. हर व़क़्त तोते-सी रटी-रटाई बात कहता, “शिल्पी, ज्यों ही मुझे वीज़ा मिल जाएगा, मैं हवा में फुर्र हो जाऊंगा.”

“उ़़फ्! लंदन जाकर पढ़ने का इतना ही शौक़ था तो फिर प्यार की पींगें बढ़ाने का यह जुनून क्यों पाला?” मैं चिढ़कर कहती.
बेशक कसकर बंद कर लूं आंखें. विचार चलचित्र की भांति चलते रहते हैं. चैन कहां लेने देते हैं? सुना था, चूक गए अवसर अपने पीछे पछतावे की लंबी कतारें छोड़ जाते हैं. कैसे यक़ीन की कश्ती पर मुझे बिठा चुपचाप समंदर पार कर गया… और छोड़ गया मेरे लिए यादों की लंबी कतारें. अब तो रूह से एक मायूस गज़ल फूटती है-

अब न लौट के आनेवाला
वो घर छोड़ के जानेवाला
हो गई उधर बात कुछ ऐसी
रुक गया रोज़ का आनेवाला

यह भी पढ़ें: पहला अफेयर: तुम्हारा जाना…

यह भी पढ़ें: पहला अफेयर: पहली छुअन का एहसास 

जिस रोज़ उसे वीज़ा मिला, उस रोज़ वह बेहद ख़ुश आया. हवा के झोंके-सा आया था मेरे घर. छत पर हम कुछ पल बतियाए. रुख़सत होते व़क़्त मेरे दोनों हाथ पकड़कर वह बोला, “शिल्पी, उदासी उतार फेंको. मेडिकल की पढ़ाई ख़त्म होते ही लौटूंगा अपनी शिल्पी के पास, विवाह बंधन में बंधने.” मैं पगली गुलमोहर के फूलों में भी लाल जोड़े की कल्पना करने लगी.

उसका सच इतना झंझावाती था कि सपनों के तमाम घरौंदों को रौंदता आगे निकल गया. वह जा बसा सात समंदर पार…
मैं यहां बिलखती रही अकेली. कभी-कभी मेरी यादों के परिंदे जाकर मेरे पहले प्यार को छू आते हैं. उन हवाओं में आज भी रची-बसी हैं तुम्हारे यादों की ख़ुशबू… डरती हूं. इन यादों को कहां उखाड़ फेंकूं. ये तो कैक्टस की तरह फिर उग आएंगी.

रात आंखों में कटी, पलकों पे जुगनू आए
हम हवा की तरह जा के उसे छू आए.

– मीरा हिंगोरानी

पहला अफेयर: बहुत देर कर दी… (Pahla Affair: Bahot Der Kar Di)

पहला अफेयर, बहुत देर कर दी, Pahla Affair, Bahot Der Kar Di, हिंदी कहानी

पहला अफेयर, बहुत देर कर दी, Pahla Affair, Bahot Der Kar Di, हिंदी कहानी

पहला अफेयर: बहुत देर कर दी… (Pahla Affair: Bahot Der Kar Di)

गुनाहों का देवता यह वही उपन्यास है, जिसे मैं अपने पढ़ाई के दिनों में सबसे ज़्यादा पसंद किया करता था. मुहब्बत की इस दास्तां को न जाने कितनी बार पढ़ डाला था मैंने. रैक पर से क़िताब तो उठा ली, पर याद ही नहीं आ रहा था कि यह उपन्यास मेरे पास कैसे आया? पहला पृष्ठ खोलते ही नज़र पड़ी, सुषमा की ओर से सप्रेम भेंट. ओह! अब याद आया, यह तो सुषमा ने दिया था कॉलेज के दिनों में, जब विदाई समारोह में आई थी और कहा था, “इसे खोलकर ज़रूर पढ़ना.” लेकिन चूंकि दर्जनों बार यह उपन्यास पढ़ चुका था, इसलिए इसे बिना पढ़े रैक में रख दिया. कब नौकरी लगी, कब शादी हुई और कैसे 35 साल गुज़र गए, पता ही नहीं चला.

ये वही सुषमा थी, जिससे मैं बेइंतहा मुहब्बत करता था, लेकिन कभी कहने की हिम्मत नहीं जुटा पाया. तभी हवा का ज़ोर का झोंका आया और उपन्यास मेरे हाथ से गिरकर फ़र्श पर जा गिरा. काग़ज़ का एक पुर्जा क़िताब के पन्नों से निकलकर बाहर आ गिरा. उठाकर पढ़ा. लिखा था-प्रिय कमल, मुझे ख़ुद नहीं पता कि प्रेम क्या होता है? प्रेम की परिभाषा क्या होती है? लेकिन मैं जब भी तुम्हें देखती हूं मुझे अजीब-सी ख़ुशी होती है और तुम्हारा भोला-भाला चेहरा देखना अच्छा लगता है. शायद यही प्रेम है. आज हमारे कॉलेज का आख़िरी दिन है. तुम मुझे चाहते हो या नहीं, मैं नहीं जानती, लेकिन मैं तुम्हारा इंतज़ार करूंगी. परसों शाम मैं अपने परिवार के साथ यह शहर छोड़कर जा रही हूं. न जाने फिर मिलना हो न हो. तुम कल शाम चार बजे आनंद भवन में आना. मैं तुम्हारा इंतज़ार करूंगी. यह क़िताब हमारी नई पहचान का प्रतीक होगी.
                                             – तुम्हारी सुषमा

पढ़ते ही मेरे पैर लड़खड़ाने लगे. “हे ईश्‍वर कितनी देर कर दी मैंने.” आज से 38 साल पहले के दृश्य किसी चलचित्र की भांति मेरी आंखों के सामने से गुज़रने लगे, जब मैं पहली बार गांव से इलाहाबाद विश्‍वविद्यालय में पढ़ने के लिए आया था. पहली क्लास, पहला साल गांव का सीधा-सादा लड़का, उस पर रैगिंग का डर. मैं क्लास में लड़कों के बीच सहमा-सा बैठा हुआ था. हल्ला होने पर पता चला कि सीनियर्स आ रहे हैं रैगिंग के लिए. मेरा तो डर के मारे ख़ून सूख गया. सीनियर्स तो आए, पर रैगिंग नहीं कर पाए. कारण- लड़कियों की ग्रुप लीडर सुषमा ने सब जूनियर्स को संगठित कर लिया. सीनियर्स अपना-सा मुंह लेकर चले गए और वह लड़की क्लास की लीडर बन गई. उसने गर्व से हेय दृष्टि से मेरी ओर देखा, जैसे मेरा मज़ाक उड़ा रही हो. उस दिन के बाद से वह क्लास की ‘मिस शेरनी’ और मैं ‘मिस्टर दब्बू’ के नाम से मशहूर हो गया. गाहे-बगाहे वह उसे छेड़ दिया करती थी. पहले मुझे ख़राब लगता था, पर धीरे-धीरे अच्छा लगने लगा. लेकिन प्यार का इज़हार करने की हिम्मत नहीं जुटा पाया. कॉलेज के आख़िरी दिन विदाई समारोह में सुषमा ने सभी छात्रों को ग़िफ़्ट दिए, बड़े बाप की बेटी जो ठहरी. अंत में मेरे सामने आकर बोली, “मिस्टर दब्बू, इस ग़िफ़्ट में रखी क़िताब तुम्हारे लिए. शायद यह क़िताब तुमने पहले पढ़ी हो, फिर भी इसे खोलकर ज़रूर पढ़ना.” लेकिन उपन्यास का शीर्षक देखकर ही मैंने क़िताब रैक में रख दी थी.

दो साल बाद मेरी शादी हो गई. दो बच्चे छोड़कर पत्नी दुनिया से विदा हो गई. बच्चे अपनी दुनिया में मस्त हैं. रिटायरमेंट की उम्र में, ज़िंदगी के इस मोड़ पर आज मेरी ज़िंदगी अकेलेपन में गुज़र रही है.

अचानक तेज़ हवा के झोंके के साथ बारिश की बौछारें मेरे चेहरे को भिगो गईं. मेरी तंद्रा टूटी और हाथ से काग़ज़ का टुकड़ा छूटकर उड़ गया, जैसे हवा का झोंका मुझसे कह रहा हो, ‘व़क़्त गुज़र चुका है- शायद इसे पढ़ने में तुमने बहुत देर कर दी…’

– दिलीप द्विवेदी

यह भी पढ़ें: पहला अफेयर: रॉन्ग नंबर 

पहले प्यार के मीठे एहसास में डूबे ऐसे ही अफेयर्स के लिए यहां क्लिक करें: Pahla Affair

 

पहला अफेयर: रॉन्ग नंबर (Pahla Affair: Wrong Number)

पहला अफेयर, रॉन्ग नंबर, Pahla Affair

पहला अफेयर, रॉन्ग नंबर, Pahla Affair

पहला अफेयर: रॉन्ग नंबर (Pahla Affair: Wrong Number)

प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में कभी न कभी ये मखमली, सुकोमल एहसास ज़रूर होता है, जिसमें आपको दुनिया की हर चीज़ अचानक यूं ही अच्छी लगने लगती है. बेवजह मुस्कुराना अच्छा लगता है, जब दिल ज़ोर-ज़ोर से किसी के आने की आहट पर धड़कने लगता है, तो उस पर काबू न कर पाना अच्छा लगता है. मेरे साथ भी कुछ ऐसी ही घटना घटित हुई.

उन दिनों हमारे यहां लैंडलाइन फोन हुआ करता था. उस दिन शाम फोन अचानक घनघनाकर बज उठा था. घर के सभी लोग काम में बिज़ी थे, सो फोन मैंने ही उठाया. उधर से ‘हैलो’ के संबोधन ने मेरे मन-मस्तिष्क के तारों को झंकृत-सा कर दिया था. कितना अपनापन और सुकून था उस आवाज़ में, लेकिन दुर्भाग्य से वो रॉन्ग नंबर था, सो सॉरी कहकर रख दिया. मगर रिसीवर रखने के बाद भी दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़के जा रहा था और मैं समझ नहीं पा रही थी कि ये किस तरह का एहसास है, मगर… वो ‘हैलो’ अभी तक मेरे कानों में गूंज रही थी.

मन कर रहा था कि दोबारा उस अजनबी की आवाज़ सुनने को मिल जाए. मेरे मन की बेचैनी बढ़ती जा रही थी. इसी बीच कई दिन गुज़र गए, मगर कोई फोन नहीं आया. कुछ दिनों के बाद उसी समय फोन ‘ट्रिन ट्रिन’ कर फिर बजा और मुझे भी ये एहसास हुआ कि ज़रूर ये उसी अजनबी का कॉल है. मैंने लपककर कॉल लिया और वही निकला, जिसकी मुझे उम्मीद थी. उसकी ‘हैलो’ सुनकर काफ़ी सुकून मिला. मैं जिस तरह उसकी आवाज़ सुनने को बेचैन थी, उसका भी वही हाल था, इसका मतलब अंजाने में दोनों के दिल के तार एक-दूसरे से जुड़ने की कोशिश में थे. अब तो घरवालों से नज़रें चुराकर, बच-बचाकर घंटों एक-दूसरे से फोन पर हम बातें करते और कब हम इतने क़रीब आ गए कि एक-दूसरे की ज़िंदगी का अहम् हिस्सा बन गए, पता भी नहीं चला. हमारी फोन पर दोस्ती को दो साल बीत चुके थे. काफ़ी कुछ जान गए थे हम एक-दूसरे के बारे में, वो भी बिना मिले और देखे.

यह भी पढ़ें: पहला अफेयर: मासूम परछाइयां 

ख़ैर, व़क्त अपनी रफ़्तार से चल रहा था. घर में सब मेरी शादी के लिए लड़का तलाशने लगे. मेरा दिल तो डूबा जा रहा था. उस अजनबी के बिना जीना मुश्किल लग रहा था. मगर अपने डर और संकोच के आगे घरवालों को कुछ भी नहीं बता पाई मैं उस फोन फ्रेंड के बारे में.

आख़िर वो पल भी आ गया, जब मुझे लड़केवाले देखने आए. मुझे पहली नज़र में ही पसंद कर लिया गया था. मगर लड़के ने मुझसे अकेले में मिलने की मंशा ज़ाहिर की. मिलने के दौरान उसने मुझे बताया कि उसके जीवन में कोई लड़की है, जिसे वो अपनी ज़िंदगी मानता है. घरवालों के दबाव में आकर वो यहां मुझे देखने आ गया था. हमने सोचा इस व़क्त शादी के लिए इंकार किया, तो दोनों के घरवालों को समझाना मुश्किल होगा. उसने मुझे अपनी जेब से एक फोन निकालकर दिया और कहा कि घर जाकर वो फोन करेगा, ताकि सोचा जा सके कि किस तरह से शादी को रोक सकते हैं. मैंने भी अनमने मन से फोन ले लिया.

जाने के लगभग तीन दिन बाद उस मोबाइल पर फोन आया और ‘हैलो’ का संबोधन सुन मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई. अचानक लगा कि वो अजनबी इस फोन पर कैसे हो सकता है, मगर सच्चाई यही थी कि वो अजनबी ही मुझे देखने आया था, लेकिन हम दोनों ही इस बात से अंजान थे. क़िस्मत भी कभी-कभी कितने अजीबो-ग़रीब खेल खेलती है. अब तो हम दोनों ने ही ख़ुशी-ख़ुशी शादी के लिए ‘हां’ कर दी थी. आख़िर करते भी क्यों न, रॉन्ग नंबर मेरे जीवन का राइट नंबर जो बन चुका था.

– मंजू यादव

 

पहला अफेयर: ख़ामोश मुहब्बत… (Pahla Affair: Khamosh Mohabbat)

Pahla Affair, Khamosh Mohabbat

Pahla Affair, Khamosh Mohabbat

पहला अफेयर: ख़ामोश मुहब्बत… (Pahla Affair: Khamosh Mohabbat)

बात उन दिनों की है, जब मैंने कॉलेज में दाख़िला लिया था. मेरा कोई दोस्त नहीं था, इसलिए थोड़ा अकेलापन-सा लगता. फिर धीरे-धीरे आदत-सी हो चली. कक्षा में मेरी सीट खिड़की के पास थी. कई दिनों से मैं गौर कर रही थी कि रोज़ एक साया मेरे पास से गुज़रता, उसकी निगाहें मुझे ही घूर रही होती थीं. पहले तो मुझे उस पर बहुत ग़ुस्सा आया. सोचा, किसी दिन ऐसी ख़बर लूंगी कि होश ठिकाने आ जाएंगे जनाब के. फिर धीरे-धीरे वह मुझे अच्छा लगने लगा. उसका चेहरा बहुत आकर्षक था. जब भी वह मेरे क्लास रूम के पास से गुज़रता मैं बेचैन हो जाती, उसकी आहटों से मेरी धड़कनें तेज़ हो जातीं.

अब तो ये रोज़ का सिलसिला हो गया था. वह दिन में कई बार उस जगह से गुज़रता और मैं सबकी नज़रें बचाकर उसे देख लिया करती. कई बार तो आते-जाते हमारा आमना-सामना भी हुआ, परंतु कोई बात नहीं हुई. हर समय एक बेक़रारी-सी रहती. कुछ कहना चाहती, पर कह नहीं पाती थी. शायद यही प्यार था. वे मेरे दोस्तों से मेरे बारे में बातें करते. दोस्तों से ही पता चला कि उन्हें मैं बहुत ख़ूबसूरत लगती हूं और जिस तरह के पहनावे में वे मुझे देखना चाहते थे, उसका ज़िक्र भी कर देते. जब बात मुझ तक पहुंचती तो मैं उनकी ही पसंदीदा ड्रेस पहनकर कॉलेज जाती. उनकी प्रशंसा उनकी आंखों में नज़र आ जाती. आंखों ही आंखों में हमारी बातें होतीं. दोनों ही संकोची स्वभाव के थे. न वे कुछ कह पाए, न मैं.

मैं सम्पन्न परिवार से थी और दोस्तों से पता चला कि वे साधारण परिवार के हैं. हमारी जाति में फ़र्क़ था. शायद यही कारण था, जो हम दिल की बात दिल में ही दबाकर रह गए. समय गुज़रता गया. परीक्षाएं हुईं. कॉलेज ख़त्म हो गए. मन में एक कसक लिए हम एक-दूसरे से जुदा हो गए.

कॉलेज के बाद मेरी शादी की बात चलने लगी. मन तो बहुत हुआ कि कहीं से वो सामने आ जाएं और मम्मी-पापा से मेरा हाथ मांग लें, पर ऐसा कुछ नहीं हुआ और मेरी शादी मम्मी-पापा की मर्ज़ी से हो गई. मैंने भी उन्हें पाने की ख़्वाहिश को अपने मन के किसी कोने में दबाकर पति को मन से स्वीकार कर लिया.

यह भी पढ़ें: पहला अफेयर: डायट चार्ट 

यह भी पढ़ें: पहला अफेयर: पहला-पहला प्यार है…

पति स्वभाव से अच्छे थे और मुझे ख़ुश भी रखते. जल्दी ही मैं एक बच्चे की मां भी बन गई. बहुत समय बाद मेरे पति को फुर्सत मिली थी, हमने छुट्टियों में घूमने का प्रोग्राम बना लिया. मेरे बेटे का ट्रेन में ये पहला सफ़र था. मैं और मेरे पति उसे ख़ुश होते, किलकारियां मारते हुए देख आनंदित हो रहे थे. अचानक एक आहट-सी हुई और दिल ज़ोरों से धड़कने लगा. यह तो वही आहट है, जिसका कभी मुझे हर पल इंतज़ार रहता था, धड़कनें बेचैन हो जाया करती थीं. मैंने सिर उठाकर सामने देखा तो देखती रह गई. वही चेहरा नज़र आया, जो आज भी दिल में बसा हुआ है. मेरा प्यार मेरी आंखों के सामने खड़ा मंद-मंद मुस्कुरा रहा था. यही तो वह मुस्कान थी, जिसकी मैं दीवानी थी.

वे मेरे सामने वाली बर्थ पर थे. आज भी फिर वही बात हुई. मैं बहुत-सी बातें करना चाहती थी, पर परिवार के आगे बेबस थी. मेरे पति ने उनसे परिचय किया और बातों-बातों में ही दोस्ती भी कर ली. उनकी बातों से ही पता चला कि उन्होंने मेरी आस में किसी से शादी नहीं की. मेरी आंखें भर आईं.

सफ़र ख़त्म होने को था. अफ़सोस कि आज भी मैं उन्हें नज़रें चुराकर ही देख रही थी. मैं उस मोहिनी मूरत को जीभर के देखना चाहती थी. हमारा स्टेशन आ गया. मैं मन में एक टीस लिए उनसे जुदा हो गई, मेरी तो मंज़िल आ गई थी, पर उनके न सफ़र का पता था, न मंज़िल का.

– अनुपलता श्रीवास्तव

 

पहला अफेयर: डायट चार्ट (Pahla Affair: Diet Chart)

love at first site, pehli nazar ka pyar

love at first site, pehli nazar ka pyar

पहला अफेयर: डायट चार्ट (Pahla Affair: Diet Chart)

बात उन दिनों की है, जब मैं डायटीशियन का कोर्स कर रही थी. कॉलेज की पढ़ाई के बाद हमारी 6 महीने की इंटर्नशिप रहती है, जिसके लिए दिल्ली के मौलाना आज़ाद मेडिकल हॉस्पिटल जाना रहता था. घर से सुबह 9 बजे से हॉस्पिटल के लिए निकलना, फिर शाम 7 बजे तक वापस आना, काफ़ी व्यस्त दिनचर्या रहती थी. पढ़ाई के अलावा कुछ भी सोचने का व़क्त नहीं मिलता था. किसी छुट्टीवाले दिन यह ज़रूर एहसास होता था कि घर में शादी के बारे में सोचा जाने लगा है. हालांकि मुझसे शादी के बारे में जानने का कोई प्रयास नहीं किया गया था. बस, यही कहते थे कि अपनी पढ़ाई मन लगाकर करो, समय आने पर सब काम हो ही जाते हैं.

मिसेज़ इंदू आहूजा, हमारी चीफ डायटीशियन थीं. एक दिन उनसे किसी बात पर विचार-विमर्श कर रही थी कि तभी एक साथ तीन लड़के कमरे में आए. यही सोचकर कि डायट चार्ट बनवाने आए हैं, मैंने उन्हें इंतज़ार करने को कहा. किंतु वे तीनों टेबल पर ही आ गए, यह कहते हुए कि डायट चार्ट बनवाना है और कुछ जानकारी भी लेनी है. वैसे तो इतने लोग आते हैं, मेरा ध्यान किसी पर नहीं जाता, परंतु न जाने क्यूं उनमें से एक लड़के पर मेरी नज़र गई, तो मैं उसे देखती ही रह गई. एक अलग ही आकर्षण था उसमें. मन में अजीब-सी हलचल हुई. शायद यह पहली नज़र के प्यार का हल्का-सा एहसास था.

यह भी पढ़ें: पहला अफेयर: पहली छुअन का एहसास 

यह भी पढ़ें: पहला अफेयर: पहला-पहला प्यार है…

वे तीनों अपना काम पूरा होते ही चले गए, जाते-जाते भी मैं उसी लड़के को देख रही थी, उसने भी मुड़कर देखा और मेरी नज़रें उससे मिलीं, अच्छा लगा. ख़ैर, बात आई-गई हो गई और मैं भी अपने काम में व्यस्त हो गई. बीच-बीच में उसका ख़्याल एक मीठे एहसास की तरह तन-मन को भिगो जाता था.

क़रीब एक महीने बाद एक दिन मम्मी-पापा ने अपने पास बुलाया और कहने लगे, “अब पढ़ाई पूरी हो गई, इंटर्नशिप भी ख़त्म होनेवाली है, तो सोचा क्यों न शादी के बारे में तुमसे बात करें.” मेरा मन तैयार नहीं हो रहा था, क्योंकि मैं जॉब करना चाहती थी. मम्मी-पापा भी शायद समझ गए थे, सो उन्होंने कहा, “एक लड़का देखा है. घर-परिवार भी अच्छा है. सारी बातें पक्की हैं, लेकिन तेरा फैसला ही अंतिम होगा. अगर लड़का पसंद न आए, तो जैसा तू चाहेगी, वैसा ही होगा.” मैंने भी हां कर दी, लेकिन इस बीच रह-रहकर मेरी आंखों के सामने उसी हॉस्पिटलवाले लड़के की तस्वीर घूम जाती. मुझे अपने ऊपर हंसी भी आती कि ये तो बचपना है.

ख़ैर, दिल्ली के बिड़ला मंदिर में देखने की बात तय हुई. निश्‍चित समय पर हम लोग वहां पहुंच गए. थोड़ी ही देर में लड़केवाले भी आ गए. उनके बीच अचानक उस परिचित चेहरे पर मेरी नज़र पड़ी, मुझे तो विश्‍वास ही नहीं हो रहा था. मैंने सबसे नज़रें चुराकर दो-तीन बार आंखें उठाकर उसे देखने की कोशिश की. जैसे ही उसने भी मुझे देखा, तो मेरे मुंह से अनायास ही निकल गया, “अरे, आप? आप तो हॉस्पिटल में आए थे. यहां कैसे?” मैं कुछ समझ ही नहीं पा रही थी, इसी बीच मुझे सम्मिलित हंसी के ठहाके सुनाई दिए. मेरी तंद्रा भंग हुई, तो देखा सबकी नज़रें मेरी ओर ही थीं और अब चौंकने की मेरी बारी थी. मुझे बताया गया कि दरअसल ये अपने दोनों भाइयों के साथ मुझे देखने ही हॉस्पिटल आए थे. मां ने बताया, “तुम्हें फोटो में सबने पसंद कर लिया था, लेकिन सबने सोचा कि एक बार तुम दोनों आमने-सामने एक-दूसरे को देख लो, तो बेहतर होगा.”

मुझे तो विश्‍वास ही नहीं हो रहा था कि जिसे पहली नज़र में चाहा, वही मुझे मिल गया. हम दोनों की हां थी, सो शादी भी जल्दी हो गई. आज मैं अपनी गृहस्थी में सुखी-संतुष्ट हूं और बार-बार ऊपरवाले का शुक्रिया अदा करती हूं कि मेरा पहला प्यार ही मेरे जन्म-जन्मांतर का प्यार बन गया.

– प्रीता जैन

 

पहला अफेयर: पहला-पहला प्यार है… (Pahla Affair: Pahla Pahla Pyar Hai)

Pahla Affair, Pahla Pahla Pyar Hai
Pahla Affair, Pahla Pahla Pyar Hai
पहला अफेयर: पहला-पहला प्यार है… (Pahla Affair: Pahla Pahla Pyar Hai)

भारतीय नारी के लिए पहला प्यार ही उसके जीवन का आधार होता है. मम्मी-पापा ने भी बचपन से यही सिखाया था कि भारतीय संस्कृति में लड़कियां पहले शादी करती हैं और बाद में उन्हें प्यार होता है. उस वक़्त तक मैं प्यार के एहसास से भी अनजान थी. मेरा तो शौक़ था पढ़ाई और कविताएं लिखना.

जब मम्मी ने मेरी शादी का फैसला सुनाया, तब मेरी उम्र मात्र 17 वर्ष थी.

“पर अभी तो मुझे पढ़ना है.” मैं चिल्लाई थी.

“अभी कौन-सा शादी कर रहे हैं? तू अपनी पढ़ाई पर ध्यान दे.”  मां ने मुझे आश्‍वस्त किया. आख़िर मैं भी जानना चाहती थी कि वो शख़्स कौन है? जब नाम सुना तो पैरों तले ज़मीन ही खिसक गई. हमारे सामनेवाले मकान में रहनेवाले राज ही मेरे होनेवाले पति थे.
मेरी ख़ामोशी को मेरी हां मान लिया गया था. बात आगे चली तो उनकी तरफ़ से भी हां कर दी गई. मेरी दो शर्तें थीं- एक तो मुझे पढ़ाई जारी रखनी है और दूसरी ये कि कॉलोनी में इस रिश्ते की चर्चा नहीं होनी चाहिए. .

हमारी सगाई कर दी गई, परंतु बाकी लोगों से इस बात को छुपाए रखा गया. एक दिन मम्मी से मिलने उनकी सहकर्मी आईं. उनको विदा करने मैं और मम्मी दरवाज़े तक आए तो सामने राज को खड़ा देखकर मैं छुपकर भागना ही चाहती थी कि मम्मी ने अपना पांव मेरे पांव पर ज़ोर से रख दिया. मैं घबरा-सी गई. मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि मैं क्या करूं. मम्मी ने पांव तब तक दबाए रखा, जब तक वो सहकर्मी विदा नहीं हो गई. उनके जाने के बाद मम्मी ने डांटा कि इस तरह भागने की क्या ज़रूरत थी. ऐसे तो किसी को न मालूम हो तो भी पता चल जाएगा.

यह भी पढ़ें: पहला अफेयर: वो एक पल

यह भी पढ़ें: पहला अफेयर: नाज़ है इश्क़ पर

आख़िर इस रिश्ते का ऐलान तो करना ही था. ऐलान होते ही चारों तरफ़ हंगामा हो गया था. इस तरह आमने-सामने घरों में रिश्ता होने का कॉलोनी में यह एक अनोखा उदाहरण था. लेकिन मैं इन सबसे दूर पढ़ाई में व्यस्त थी. मुश्किल ये थी कि अब उनका सामना करना भी दूभर हो गया था मेरे लिए. जैसे ही राज सामने दिखते, मैं भागकर अपने घर में घुसकर दरवाज़ा बंद कर लेती.
एक दिन मेरे पीठ दिखाते ही वे बोल पड़े, “नाराज़ हो क्या?” मेरे पांव ठिठक गए. दिल ने कहा, पलटकर देख लूं, पर संस्कारों में मिली मर्यादा मुझे राज को खुलेआम देखने से रोक रही थी.

बस, यहीं से कुछ हलचल-सी हुई मन में. मेरा कवि मन जो प्यार के विषय से अछूता था, कुछ चाहने लगा था. मेरी सारी भावनाएं कलमबद्ध होने लगी थीं. मन में राज के लिए प्यार का अंकुर फूट चुका था, लेकिन मैं उनसे मिलने का साहस नहीं कर पाई. हां, अपनी खिड़की से उनकी एक झलक पाने के लिए हमेशा बेताब रही.

एक दिन मैं अपनी पड़ोस की सहेली के घर बैठी थी कि राज वहां जान-बूझकर पहुंच गए. उन्हें देख मैं घबराहट के मारे सहेली के बाथरूम में जाकर घुस गई. बाथरूम में नल से पानी बह रहा था और नल था कि बंद होने का नाम ही नहीं ले रहा था. मेरे सारे कपड़े भीग गए. मैं फिर भी बाहर नहीं आई. मैं ख़ुद ही नहीं समझ पा रही थी, जिनको देखने के लिए मैं घंटों अपनी खिड़की में खड़ी रहती थी, उनके सामने आते ही मेरी ऐसी हालत क्यों हो जाती है?

वो पहली बार था, जब मैंने प्यार के एहसास को महसूस किया था. आख़िर दो वर्ष बाद इस प्यार की परिणति विवाह में हुई. अब तक डायरी में लिखी सारी भावनाएं शादी के बाद जब मैंने राज के सामने रखीं तो वे आश्‍चर्यचकित रह गए. बोले, “कभी चेहरा भी न दिखानेवाली लड़की अपने मन में इतनी भावनाएं रखती है मेरे प्रति.” आज ज़िंदगी में फूल ही फूल खिले हैं. हम दोनों एक-दूसरे का हाथ थामे अपने पहले प्यार से बनी राहों पर चल रहे हैं.

– संगीता सेठी