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आप पिछले कुछ दिनों से अपने पति के बर्ताव में बहुत बदलाव महसूस कर रही हैं. कहीं ऐसा तो नहीं कि वे किसी और से प्यार करने लगे हैं? जी हां, किसी के प्रति भरोसेमंद रहने के लिए बहुत प्रयासों की ज़रूरत होती है, लेकिन किसी को धोखा देने के लिए बस थोड़ा-सा बहक जाना ही काफ़ी है. यदि आपको यह डर सता रहा है तो अपने पति में आए बदलाव पर ग़ौर कीजिए और समय रहते ही संभाल लीजिए उन्हें. यदि आपको इस बात का अंदेशा सता रहा है कि आपके पति किसी और के प्यार में पड़ गए हैं, तो इन बातों पर ग़ौर फ़रमाइए. यदि ये बातें उन पर सही बैठती हैं, तो व़क़्त है आपके संभलने का, साथ ही, उन्हें भी संभालकर सही ट्रैक पर लाने का.

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1) क्या आपकी सेक्स लाइफ अब पहले जैसी नहीं है?
पहले आपकी सेक्स लाइफ़ बहुत रोमांटिक थी, लेकिन आजकल उन्हें सेक्स में कोई ख़ास दिलचस्पी नहीं है. पहले आपकी पहल पर वे रोमांटिक हो जाते थे, पर आजकल जब आप पहल करती हैं तो भी वे कहते हैं कि मैं थका हुआ हूं, तनाव महसूस कर रहा हूं, काम का बोझ बहुत है… या फिर ऐसा ही कोई और बहाना. कई बार  इसका कारण होता है वो गिल्ट जो दूसरे अ़फेयर की वजह से होता है. तो सतर्क हो जाइए और पता कीजिए कि उनके ये सेक्स से बचने के बहाने कितने सही हैं?

2) क्या आपके पति घर पर रेस्टलेस हो जाते हैं?
पहले तो वे घर पर आपके साथ व़क़्त बिताने में एंजॉय करते थे, लेकिन आजकल उनकी बॉडी लैंग्वेज और व्यवहार से आपको लगता है कि वे बहुत रेस्टलेस (व्यग्र) हो रहे हैं. आपके साथ बाहर जाना तो उन्होंने लगभग बंद ही कर दिया है, लेकिन जब घर पर भी रहते हैं तो बड़ा बोर फ़ील करते हैं और अकेले बाहर जाने के मौ़के चूकना ही नहीं चाहते.  उनकी आदतों में आए इस बदलाव को नज़रअंदाज़ न करें और इसकी वजह ढूंढ़ने में ज़रा भी देर न लगाएं.

3) क्या आपके पति इन दिनों हमेशा महकते रहते हैं?
वो फैशन कॉन्शियस तो कभी नहीं थे. दिन में एक बार डियो या पऱफ़्यूम लगाना ही उनकी आदत में था, लेकिन अब वे सुबह-शाम, यहां तक कि रात में भी महकते रहते हैं यानी मामला नाज़ुक है… आप को चौकन्ना होना होगा.

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4) क्या आपके पति इन दिनों नए ट्रेंड्स के बारे में जानने लगे हैं?
पहले तो उन्हें ब्रान्ड्स और फैशन का कोई ख़ास आइडिया ही नहीं होता था, पर इन दिनों अचानक ही वे अपने कपड़ों को ले कर ट्रेंडी हो चले हैं. बात यहीं तक सीमित नहीं है, बल्कि अब तो वे आपको भी लेटेस्ट ट्रेंड्स के बारे में मश्‍वरा देने लगे हैं. ये आप के लिए ख़तरे का साइन है और ज़रूरत है कि आप मामले की तह तक जाएं.

5) क्या आपके पति आजकल बनठन कर ऑफिस जाते हैं?
पहले सैटरडे को ऑफ़िस जाना हो तो मुंह बन जाता था, पर आजकल साहब सैटरडे को भी बहुत बनठन कर निकलते हैं. बाज़ार जा रहे हों या जिम… पहले तो कपड़े सलेक्ट करने में इतना टाइम नहीं लगता था जितना अब लगता है. घर से निकलने के पहले बनने-संवरने में इतना समय पहले तो नहीं लगाते थे. तो… अब ये तैयारी किस लिए? जी हां, आपके कान खड़े हो जाने चाहिए, क्योंकि दाल में कुछ तो काला ज़रूर है.

6) क्या आपके पति आजकल कुछ ज्यादा ही एक्सक्यूज़ेस देने लगे हैं?
अक्सर ही वो रात देर से घर आते हैं और आते ही ऑफ़िस कलीग्स, ऑफ़िस कल्चर को कोसना शुरू कर देते हैं. ऑफ़िस की लेट नाइट पार्टीज़ के सिर देर से आने का ठीकरा तो फोड़ देते हैं, लेकिन जब आप उनसे पार्टी के वेन्यू के बारे में पूछती हैं तो उनकी याददाश्त कुछ कमज़ोर-सी हो जाती है और वे अपनी थकान की आड़ लेते हुए आपको सोने की सलाह दे कर ख़ुद झट से गहरी नींद में सो जाते हैं. जितना लंबा एक्सक्यूज़ होगा, उनकी पोल खुलने का ख़तरा भी तो उतना ही ज़्यादा होगा यानी अब आपके डिटेक्टिव बनने का समय आ गया है.

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Heartbreak

7) क्या आपके पति आजकल बात-बात पर चौंक जाते हैं?
जैसे ही आप बेडरूम में एंटर होती हैं, जनाब चौंक कर अपने लैपटॉप की विंडोज़ को बंद कर देते हैं. उनका मोबाइल ऑपरेट करने के लिए लगने वाला पासवर्ड या पिन नंबर अचानक ही बदल गया है. एक तो उन्होंने आपको अपना पिन नंबर बताया नहीं है और यदि बता दिया है तो उसे दोबारा बदल दिया है… यदि अचानक ही उन्होंने एक और मोबाइल ले लिया है और उसके बारे में पूछने से पहले आपको बताया ही नहीं तो समझ जाइए कि आपका शक़ बेबुनियाद नहीं है. ये जो इन दिनों वो आपसे सीक्रेट्स रखने लगे हैं, आपके  सतर्क होनेे के लिए इतना बहुत है. अपने जासूसों का जाल फैलाइए और उनकी इन नई आदतों की वजह जानने की ईमानदार कोशिश कीजिए.

8) क्या आपके पति का डिफेंस दिनोंदिन मज़बूत हो रहा है?
उनके देर से आने को ले कर आप हमेशा ही शिक़ायत करती रही हैं और दस में से पांच बार वे आपको इसका कारण भी बताते रहे हैं, लेकिन इन दिनों एक तो वे अक्सर ही देर से आ रहे हैं और आपकी शिक़ायत पर उनका ड़िफेंस बहुत स्ट्रॉन्ग होता है. वे आपसे कहने लगे हैं कि एक तो वे इतना काम कर के, थक के आते हैं और आप से उन्हें हमेशा शिक़ायत ही मिलती है, प्रोत्साहन कभी नहीं. या फिर वे आप से ही प्रश्‍न करने लगते हैं कि तुम इतनी ओवर पज़ेसिव क्यों हो? या फिर तुम थोड़ा प्रैक्टिकल क्यों नहीं बन जातीं? ऐसे जवाब मिलने पर आपके सेंसर्स को मैसेज मिल जाना चाहिए कि मामला गड़बड़ है.

9) क्या आप दोनों के बीच अब टच थैरेपी अब नहीं रही?
पहले आप सप्ताह में एक बार साथ बैठ कर ढेर सारी बातें करते थे. एक-दूसरे के हाथों का वो स्पर्श किसी टच थैरेपी-सा काम करता था. अब उनके पास समय ही नहीं है कि वे आपके लिए समय निकाल सकें. तो ज़रूरी है कि आप इसकी वजह ढूंढ़ें और उन्हें खोने से पहले ही दोबारा पा लें.

Pahla Affair

पहला अफेयर: तुम कभी तो मिलोगे (Pahla Affair: Tum Kabhi To Miloge)

आज फिर मेघों से रिमझिम वर्षा रूपी नेह बरस रहा है. दूर-दूर तक मेरी प्रिय तन्हाई पसरी हुई है. एकाएक रेडियो पर बज रहे गीत पर ध्यान चला गया-
छोटी-सी ये दुनिया पहचाने रास्ते, तुम कहीं तो मिलोगे, कभी तो मिलोगे..

मेरा दिल यूं ही भर आया. कितने साल गुज़र गए आपसे बिछड़े हुए, पर मेरा पागलपन आज भी आपके साथ गुज़ारे उन सुखद पलों की अनमोल स्मृतियां संजोए हुए है.

अल्हड़ उम्र के वो सुनहरे भावुक दिन… चांदनी रात में जागना, अपनी ही बनाई ख़यालों की दुनिया में खो जाना, यही सब कुछ अच्छा लगता था तब. शरत्चंद,विमल-मित्र, शिवानी आदि के उपन्यासों को प़ढ़ना तब ज़रूरी शौक़ों में शामिल थे. को-एज्युकेशन के बावजूद अपने अंतर्मुखी स्वभाव के कारण मैं क्लास में बहुत कम बोलती थी.

उन दिनों कॉलेज में सांस्कृतिक कार्यक्रम चल रहे थे. आप तब मेरे पास आए थे और एक फ़िल्मी गीत के दूसरे अन्तरे को पूरा करने का आग्रह किया था. उसी गीत को गाने पर आपको प्रथम पुरस्कार मिला था. मेरे बधाई देने पर आपने कितनी आसानी से कह दिया था कि यह गीत तो मैंने तुम्हारे लिए ही गाया था. उसके बाद तो मैं आपसे नज़रें चुराती ही फिरती थी. लेकिन अक्सर ऐसा लगता जैसे आपकी ख़ामोश निगाहें हमेशा मेरा पीछा करती रहती हैं.

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फिर परीक्षा के दिनों में जब मुझे एकाएक बुखार हो गया था, तो आपने बिना परीक्षा की चिंता किए मुझे अस्पताल में भर्ती करवाया था और मेरे माता-पिता के आने तक मेरी पूरी देखभाल की थी.

और जाड़ों में जब हमारी पिकनिक गई थी और मुझे आपके स्कूटर पर पीछे बैठना पड़ा था, उस दिन आपकी पीठ की ओर उन्मुख हो, मैंने जी भर कर बातें की थीं. हम पिकनिक स्पॉट पर सबसे देर से पहुंचे थे, आपका वाहन उस दिन चींटी की ऱफ़्तार से जो चल रहा था.

लेकिन तभी आपके चिकित्सक पिता की विदेश में नियुक्ति हुई और आपका परिवार विदेश चला गया. आपने अपनी मां से आपको यहीं छोड़ने के लिए बहुत अनुरोध भी किया, लेकिन आपका प्रयास असफल रहा. अपने मां-बाप के सामने अपनी पसंद ज़ाहिर करने की आपकी उस व़क़्त न उम्र थी न हालात. और आप अनेक सुनहरे सपने मेरी झोली में डाल सात समंदर पार के राजकुमार बन गए. कुछ वर्षों तक आपके स्नेहिल पत्र मुझे ढा़ंढस बंधाते रहे. फिर एकाएक इस छोटी-सी दुनिया की विशाल भीड़ में आप न जाने कहां खो गये. आपके परिवार की भी कोई खोज-ख़बर नहीं मिली. उन दिनों गल्फ वार (खाड़ी युद्ध) चल रहा था. अनेक प्रवासी-भारतीय गुमनामी के अंधेरे में खो
चुके थे.

मैं अपने प्यार की अजर-अमर सुधियों की शीतल छांव तले जीवन गुज़ारती रही. मुझे ऐसा रोग हो चुका है जिसको प्रवीण चिकित्सक भी समझ पाने में असमर्थ हैं. मुझे अटूट विश्‍वास है कि मेरे जीवन के मंदिर की लौ बुझने से पहले आप ज़रूर मिलेंगे और आपका उजला, हंसता- मुस्कुराता चेहरा ही मेरे जीवन के इंतज़ार को सार्थक बनाएगा. मेरे जीवन का सार बच्चन जी की इन पंक्तियों में है-

स्वागत के साथ ही विदा की होती देखी तैयारी
बंद लगी होने खुलते ही मेरी जीवन मधुशाला

– डॉ. महिमा श्रीवास्तव

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Pahla Affair

पहला अफेयर: काश, तुम समझे होते (Pahla Affair: Kash Tum Samjhe Hote)

कभी-कभी अचानक कहे शब्द ज़िंदगी के मायने बदल देते हैं. इसका एहसास पहली बार मुझे तब हुआ जब अचानक एक दिन आदित्य को अपने सामने मेरे जवाब के इंतज़ार में खड़े पाया. मेरी हालत देखकर बोला, ङ्गङ्घदया, ऑफ़िस से जाने के पूर्व सारी औपचारिकताएं होते-होते एक-दो दिन तो लग ही जाएंगे, जाने से पहले तुम्हारा जवाब सुनना चाहता हूं.फफ कहने के साथ वह मुड़ा और मेरे मन-मस्तिष्क में झंझावत पैदा कर गया.

वो तो चला गया, लेकिन मेरी आंखों के सामने वह दृश्य दौड़ गया, जब एक दिन ऑफ़िस में अंतर्जातीय विवाह को लेकर हो रही चर्चा के दौरान मैंने भी घोषणा कर दी थी कि यूं तो मेरे घर में अंतर्जातीय विवाह के लिए सख़्त मनाही है, लेकिन मैं घरवालों के विरुद्ध जा सकती हूं, बशर्ते लड़का क्लास वन ऑफ़िसर हो.

मुझे सपने में भी इस बात का गुमान न था कि आदित्य मेरे कहे को इतनी संजीदगी से ले लेगा. यूं तो मुझे इस बात का मन-ही-मन एहसास था कि आदित्य के मन में मेरे लिए एक ख़ास जगह है और सच कहूं तो मैं भी उसके सौम्य, सरल व परिपक्व व्यक्तित्व के चुंबकीय आकर्षण में बंधने लगी थी. लेकिन जैसे ही घरवालों के दृष्टिकोण की याद आती, मैं अपने मन को समझा देती कि हमेशा मनचाही मुराद पूरी नहीं होती. इसीलिए आदित्य की लाख कोशिश के बावजूद मैं उससे एक निश्‍चित दूरी बनाए रखती और बातों के दौरान उसे घरवालों के विरोध से सचेत करती रहती.

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लेकिन होनी को भला कौन टाल सकता था. जब मुझे पता लगा कि उसने ज़ोर-शोर से प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी शुरू कर दी है तो एक अनजाने भय से मैं कांप उठी. उसकी मेहनत रंग लाई और पी. सी. एस. की परीक्षा को अंतिम रूप से पास कर, जब उसने हाथ मांगा तो मैं एक अजीब-सी उलझन में फंस गई. बड़ी कशमकश में थी मैं- मेरे सामने भावी जीवन का निर्णय पत्र था, उसमें हां या ना की मुहर लगानी थी.

ऑफ़िस वालों से विदा लेने से पूर्व वो मेरे पास आया, लेकिन मेरी आंखों से छलकते आंसुओं ने उसके प्रश्‍न का जवाब स्वयं दे दिया. मैं बहुत कुछ कहना चाह रही थी, पर ज़ुबां साथ नहीं दे रही थी. मेरी ख़ामोशी वो बर्दाश्त न कर सका. आख़िरकार वह छटपटा कर कह उठा, दया, मुझे कमज़ोर मत बनाओ, तुम तो मेरी शक्ति हो. आज मैं जो कुछ भी हूं, स़िर्फ तुम्हारी वजह से हूं. हमेशा ख़ुश रहना. ईश्‍वर करे, कोई दुख तुम्हारे क़रीब भी न फटके. इतना कह कर वह थके क़दमों से बाहर निकल गया. उसे जाते हुए देखती रही मैं. चाहती थी उससे कहना कि जीवन पर सबसे पहले जीवन देनेवाले का अधिकार होता है, इस फलसफे को कैसे झुठला सकती थी. लेकिन कहते हैं ना- कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता कहीं ज़मीं तो कहीं आसमां नहीं मिलता.

आज माता-पिता की इच्छा के फलस्वरूप अपने आशियाने में ख़ुश भी हूं, पर सीने में दबी पहले प्यार की चोट आज भी ये एहसास कराती है कि पहले तोलो, फिर बोलो. आज भी लगता है जैसे पहले प्यार की दस्तक अब भी मन- मस्तिष्क में अपनी गूंज दे रही हो.

– दया हीत

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Benefits Of Cooking

कुकिंग थेरेपी: हेल्दी रहने का बेस्ट फॉर्मूला (Cooking Therapy: Benefits Of Cooking)

खाना बनाना और उसे दूसरों को खिलाना कई लोगों के शौक में शुमार होता है, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि खाना बनाने का यह शौक आपको हेल्दी भी रखता है, इसीलिए इसे कुकिंग थेरेपी का नाम दिया गया है. साइंटिस्ट्स अब यह दावे के साथ कहते हैं कि कुकिंग दरअसल एक थेरेपी है, जो आपको हेल्दी रखती है और आपके रिश्तों को भी बेहतर बनाती है.

साइंस के अनुसार कुकिंग दरअसल मेडिटेशन सेशन की तरह है: क्या कभी आपने इस ओर ध्यान दिया है कि स्ट्रेस से भरा दिन और आपकी थकान घर पर आने के बाद कुछ अच्छा पकाने की सोच मात्र से ही कम हो जाती है. बहुत बार ऐसा होता है कि आप कुछ स्वादिष्ट या अपना मनपसंद खाना बनाने की तैयारी करने की सोचते हैं और उसे बनाने के बाद जो संतुष्टि आपको मिलती है, उससे आपके दिनभर की थकान व तनाव दूर होता है. आप भले ही नियमित रूप से खाना न भी बनाते हों, लेकिन यदि आप ऐसा करते हैं, तो पाएंगे कि कुकिंग सेशन एक तरह से आपके लिए मेडिटेशन का काम करता है.

थेरेपिस्ट कुकिंग को मानसिक समस्याओं के इलाज के लिए प्रयोग में लाते हैं: डिप्रेशन, घबराहट, तनाव आदि के इलाज में अब बहुत-से सायकोलॉजिस्ट व थेरेपिस्ट कुकिंग कोर्सेस को थेरेपी की तरह यूज़ करने लगे हैं, क्योंकि जो व़क्त आप कुकिंग में लगाते हो, उससे आपका ध्यान नकारात्मक स्थितियों व बातों से हट जाता है और आप रिलैक्स महसूस करते हैं.

क्रिएटिव बनाती है आपको कुकिंग: एक्सपर्ट्स ने अपने शोधों में यह भी पाया है कि कुकिंग आपको क्रिएटिव बनाती है, क्योंकि आप अपने अनुसार रेसिपी को बनाने के नए-नए तरी़के सोचते हो, नया स्वाद क्रिएट करने की कोशिश करते हो, जिससे आपकी भी क्रिएटिविटी बढ़ती है. दूसरे, कुकिंग आपको पूरे माहौल में कंट्रोल का अनुभव महसूस कराती है. आपको लगता है कि अब आप अपने अनुसार स्वाद में बदलाव ला सकते हो और जब आपको तारी़फें मिलती हैं, तो आप पॉज़िटिव महसूस करते हो.

कुकिंग और मेंटल हेल्थ का सबसे बड़ा कनेक्शन है न्यूट्रिशन: जब आप कुकिंग करते हो, तो आप अपने पोषण, डायट व हेल्थ के प्रति अपने आप ही सचेत हो जाते हो. आपके हाथ में होता है कि कितना ऑयल डालना है, कितना नमक, कितने मसाले और आपका ब्रेन यही सोचने लगता है कि किस तरह से अपनी डिश को आप और हेल्दी बना सकते हो. इससे आपको संतुष्टि महसूस होती है कि आपका खाना हेल्दी है, क्योंकि आप अपने खाने की क्वालिटी को कंट्रोल करते हो.

कुकिंग जो ख़ुशी देती है, वो घर के अन्य काम नहीं देते: एक्सपर्ट्स कहते हैं कि भले ही आप कुकिंग का शौक न रखते हों, लेकिन आप जब कुकिंग करते हैं, तो यह फ़र्क़ ज़रूर महसूस करते हैं कि खाना बनाने से जो ख़ुशी व संतुष्टि का अनुभव होता है, वह बिस्तर ठीक करने, कपड़े धोने या अन्य कामों से नहीं होता. इसके पीछे की वजह यह है कि कुकिंग अपने आप में रिवॉर्डिंग एक्सपीरियंस होता है, क्योंकि कहीं-न-कहीं सबकॉन्शियस माइंड में भी यह बात रहती है कि खाना बनाने के बाद आपको इसका स्वाद भी मिलेगा. खाना बनाने के दौरान जो ख़ुशबू आती है, उसे बनता देखने का जो अनुभव होता है और यहां तक कि फल व सब्ज़ियों को काटने-छीलने के दौरान उनके रंग व आकार हमें आकर्षित करते हैं, वो मस्तिष्क में पॉज़िटिव वाइब्रेशन्स पैदा करते हैं.

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पार्टनर के साथ कुकिंग आपके रिश्ते को भी बेहतर बनाती है: जब आप साथ में खाना बनाते हो या फिर घर के कोई भी सदस्य मिल-जुलकर खाना बनाने में हाथ बंटाते हैं, तो अपने आप उनके मतभेद कम होने लगते हैं. वो नकारात्मक बातों को एक तरफ़ रखकर खाना बेहतर बनाने व उसे परोसने की तरफ़ ध्यान देने लगते हैं. ऐसे में यदि आप अपने पार्टनर के साथ किचन में काम करेंगे, तो आपके रिश्ते भी बेहतर बनेंगे. आप एक-दूसरे के साथ अधिक समय बिता पाओगे, जिससे कम्यूनिकेशन बेहतर होगा. यदि खाने में आप दोनों की पसंद-नापसंद एक नहीं है, तब भी आपके विवाद को कम करने में कुकिंग एक थेरेपी की तरह काम करेगी, क्योंकि वहां आप एक-दूसरे के बारे में सोचोगे कि चलो आज तुम्हारी पसंद का खाना बनाते हैं या फिर आज तुम्हारी फेवरेट डिश तैयार करते हैं, पर कल तुम मेरी फेवरेट डिश बनाने में मेरी मदद करोगे… आदि.

कुकिंग से बढ़ते व बेहतर होते हैं आपके कनेक्शन्स: आपके जन्मदिन पर आपके पड़ोस में रहनेवाली दोस्त आपके लिए गिफ्ट लाती है और दूसरी ओर आपकी सास आपके लिए अपने हाथों से आपका मनपसंद खाना बनाती है, तो ज़ाहिर है आपके मन को सास का खाना बनाना ज़्यादा छुएगा, क्योंकि उन्होंने आपके बारे में सोचा और ख़ुद मेहनत करके आपके लिए खाना तैयार किया. इसी तरह आप देखेंगी कि अपनी बेस्ट फ्रेंड को यदि आप अपने हाथों से कुछ बनाकर देती हैं, तो उसकी ख़ुशी दोगुनी हो जाती है. इस तरह से कुकिंग आपके कनेक्शन्स को बेहतर बनाती है. इसलिए कुक करें और कनेक्टेड रहें.

मस्तिष्क को शांत करती है कुकिंग: साइंटिस्ट्स कहते हैं कि कुकिंग के समय आपको कभी भी अकेलापन महसूस नहीं होगा. उस व़क्त आपकी चिंताएं दूर हो जाती हैं और आपका मस्तिष्क शांति का अनुभव करता है, क्योंकि आपका पूरा ध्यान अपने टास्क पर लग जाता है, जिससे कई तरह की चिंताएं व दबाव की तरफ़ ध्यान नहीं जाता और आप बेहतर महसूस करते हैं. यही नहीं कुकिंग की प्रैक्टिस आपके शरीर को भी रिलैक्स करती है. कुकिंग के समय आप फ्लो में आ जाते हो, जिससे व्यर्थ के डर, चिंताओं व तनाव से उपजा दर्द, शरीर की ऐंठन व थकान भी दूर हो जाती है.

दूसरों के लिए कुछ करने का अनुभव बेहतर महसूस कराता है: ज़ाहिर-सी बात है कि आप खाना अपने लिए नहीं बनाते, बल्कि पूरे परिवार के लिए बनाते हैं. ऐसे में उनकी पसंद-नापसंद को ध्यान में रखकर उनके लिए कुछ अच्छा करने का अनुभव आपको कुकिंग से मिलता है. कुकिंग के ज़रिए आप अपनी भावनाएं व केयर भी सामनेवाले को ज़ाहिर कर सकते हैं. यह एक तरह से मूक प्रदर्शन है प्यार व देखभाल का.

भावनाओं का प्रभाव भी होता है कुकिंग में: आप जिस भाव से खाना बनाते हैं, उसका असर आपके खाने में नज़र आता है. लेकिन खाना बनाते समय हर कोई यही चाहता है कि उसके खाने को तारीफ़ ज़रूर मिले, इसलिए जब आप बच्चों के लिए कुछ ख़ास बनाते हो, तो उनके स्वाद व पोषण का ध्यान रखते हो, लेकिन जब आप बुज़ुर्गों के लिए कुछ बनाते हो, तो स्वाद के अलावा उनकी उम्र व सेहत का भी ख़्याल रखते हो. उन्हें क्या नहीं खाना चाहिए, इस तरफ़ भी आपका पूरा ध्यान रहता है.

कुकिंग से आप पैसे भी बचाते हो: होटल या बाहर से कुछ अनहेल्दी मंगाकर खाना आपको वो संतुष्टि नहीं देगा, जो अपने हाथों से कुछ हेल्दी बनाकर खाना देता है और इसके साथ ही आप अपने पैसे भी बचाते हो. हेल्थ और वेल्थ साथ-साथ सेव होने का एहसास आपके रिश्तों को भी बेहतर बनाता है और आपकी सेहत को भी.

– गीता शर्मा

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Pahla Affair Kahaniya

पहला अफेयर: उसकी यादें दिल में समाए हूं (Pahla Affair: Uski Yaden Dil Mein Samaye Hoon)

वह अक्सर कहा करता था… मैं आकाश की ऊंचाई को छूना चाहता हूं. इन बादलों में गुम हो जाने पर मैं उस मधुर आवाज़ का इंतज़ार करूंगा, जो तुम मुझे बुलाने के लिए दोगी. तुम गाओगी… न जाओ सैंया, छुड़ाके बहियां, कसम तुम्हारी मैं रो पड़ूंगी… और मैं गाऊंगा… सारंगा तेरी याद में नैन हुए बेचैन, मधुर तुम्हारे मिलन बिना दिन कटते न ही रैन… इसी तरह की अठखेलियों में हंसते-गाते हमारे दिन बीत रहे थे. सौरभ बहुत ही ज़िंदादिल इंसान था. मैंने उसे जितने क़रीब से देखा था, उससे ऐसा आभास होने लगा था कि हम दोनों एक-दूसरे के लिए ही बने हैं और एक-दूसरे के लिए ही हमारा जन्म हुआ है.

उन दिनों सौरभ और मैं रविन्द्र कॉलेज में बी.ए. अंतिम वर्ष में प़ढ़ते थे. सौरभ एयरविंग में सीनियर डिविज़न में था तथा कॉलेज की विंग का कैप्टन था. बुधवार और शनिवार को एयरविंग की परेड होती थी. उस ड्रेस में वो बहुत अच्छा लगता था और सुबह आते ही मुझे सैल्यूट करता था. उसकी इस हरकत पर पूरी क्लास में हंसी का फव्वारा फूट पड़ता था.

सौरभ कहता था, अवनि, तुम्हारे प्रति एक अनजाना-सा आकर्षण महसूस करता हूं मैं. एक किताब में भी पढ़ा था मैंने कि यूं तो दुनिया में करोड़ों स्त्री-पुरुष हैं, लेकिन किसी विशेष के प्रति हमारा आकर्षण इसलिए होता है, क्योंकि कुछ हार्मोन्स हमें आकर्षित करने के लिए प्रेरित करते हैं- और उससे आकर्षित होने को ही हम कहते हैं कि मुझे उससे प्यार हो गया है. दिल की धड़कनें बढ़ जाती हैं, उसके इंतज़ार में दिन-रात एक हो जाते हैं.

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फिर सौरभ ने एयरविंग के माध्यम से एयरक्राफ्ट की ट्रेनिंग शुरू कर दी थी. वह छोटे प्लेन उड़ाने लगा था. उसका सपना पायलेट बनकर वायुसेना में जाने का था, जहां वह हिमालय की ऊंची-ऊंची वादियों में उड़ सके. लेकिन जब भी वो प्लेन उड़ाने जाता, मेरा दिल बहुत डरता. एक अनजाने भय से मैं कांप जाती.

इसी बीच हमारे फाइनल ईयर की परीक्षाएं ख़त्म हो गई थीं. सौरभ ने वायु सेना में जाने के लिए फॉर्म भरा था, जिसमें उसका सिलेक्शन भी हो गया था. उस समय वो बहुत ख़ुश था. और बोला था, ङ्गङ्घबस मेरी ट्रेनिंग पूरी हुई, नौकरी लगी कि इसके बाद हमारी शादी पक्की समझो.फफ हमारे घरवालों को भी हमारी पसंद पर कोई ऐतराज़ नहीं था.

उसके जाने के बाद रात-रात मैं सौरभ की कुशलता की कामना किया करती थी. हर पल मन बोझिल-सा रहता था, किसी काम में मन नहीं लगता था.

दिसंबर की ठंडी सुबह थी वो. फ़ोन की घंटी लगातार बज रही थी, बेमन से मैंने फ़ोन का रिसीवर उठाया. फ़ोन कानपुर से था. सौरभ के पिताजी बोल रहे थे, अवनि, एक प्रशिक्षण उड़ान के दौरान सौरभ का प्लेन क्रेश हो गया है… इसके आगे कुछ सुुनने की मेरी हिम्मत नहीं हुई और रिसीवर मेरे हाथ से छूट गया.

सौरभ हम सबसे बहुत ऊंचाई पर पहुंच गया था. इस आकाश, इस ब्रह्मांड से भी ऊपर. एक सुखद स्वप्न की तरह कॉलेज की यादें अब केवल यादें ही रह गई हैं. सौरभ की ज़िंदादिली, हंसमुख स्वभाव इतने सालों के बाद भी ज़ेहन में अपना सुरक्षित स्थान बनाये हुए है.

– अवनि

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Pahla Affair

पहला अफेयर: पहले प्यार की आख़िरी तमन्ना (Pahla Affair: Pahle Pyar ki Akhri Tamanna)

कहते हैं, इंसान कितना भी चाहे, पर वो अपने पहले प्यार को कभी नहीं भुला पाता. पहले प्यार का एहसास, उसकी यादें उम्रभर जेहन में ज़िंदा रहती हैं. उम्र के किस मोड़ पर, कब कोई अपना-सा लगे कोई नहीं जानता. मुझे भी कहां पता था कि आज से बीस बरस पीछे छूट गई उन यादों की गलियों में मुझे फिर से भटकना पड़ेगा, जिन्हें मैं पीछे छोड़ आई थी.

आज उनके अचानक मिले इस संक्षिप्त पत्र ने फिर से मुझे उनके क़रीब पहुंचा दिया है. उनसे मेरी मुलाक़ात कॉलेज फंक्शन में हुई थी. वो मेरे सीनियर थे. मुलाक़ातें धीरे- धीरे दोस्ती में बदलीं और दोस्ती कब प्यार में बदल गयी, पता ही नहीं चला.

एक दिन वो मेरे पास आए और अपने प्यार का इज़हार कर दिया. मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि मैं क्या कहूं. दिल के ज़ज़्बात ज़बान तक लाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी. कैसे कहती उनसे कि उनके सिवा कोई ख़यालों में आता ही नहीं, उनके अलावा किसी और को चाहा ही नहीं. पर बात दिल की दिल में ही रह गयी, मैं उनसे कुछ नहीं कह पायी. मेरे जवाब न देने की स्थिति में उन्होंने अपना फ़ोन नंबर देते हुए कहा कि वो मेरे फ़ोन का इंतज़ार करेंगे.

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घर पहुंच कर आईने के सामने न जाने कितनी बार ख़ुद को उनके जवाब के लिए तैयार किया, पर दिल की बात ज़बान तक नहीं ला सकी. मैं जितना ही उनके बारे में सोचती, उतना ही ख़ुुद को उनके क़रीब महसूस करती.
लेकिन मेरे प्यार के परवान चढ़ने से पहले ही उसे मर्यादाओं की बेड़ी में जकड़ जाना पड़ा. माता- पिता ने रिश्ता पक्का करने के साथ-साथ शादी की तारीख़ भी पक्की कर दी. मुझमें विरोध करने का साहस नहीं था, इसलिए चुपचाप घरवालों की मर्ज़ी से शादी कर ली- जवाब देना तो दूर, आख़िरी बार उन्हें देखना तक नसीब न हुआ.

शादी के बाद ज़िम्मेदारियों के बोझ तले कभी- कभार पहले प्यार की यादें ताज़ा हो भी जातीं तो मैं उन्हें ख़ुुद पर हावी न होने देती. पति-ससुराल वालों से कोई शिकायत नहीं थी, फिर भी हमेशा ये लगता कि कहीं कुछ छूट गया है. पति बहुत प्यार करते, लेकिन फिर भी मेरे मन में किसी और का ख़याल रहता. मगर तक़दीर का लिखा कौन टाल पाया है. आज इतने सालों बाद अचानक उनका पत्र आया है जिसमें लिखा है-
प्रिये,
सदा ख़ुुश रहो. मैंने तुम्हारा बहुत इंतज़ार किया,पर अब और न कर सकूंगा, क्योंकि शरीर ने साथ न देने का ़फैसला कर दिया है. व़क़्त बहुत कम है, आख़िरी बार तुम्हें देखने की तमन्ना है. हो सके तो आ जाओ.
तुम्हारा-आकाश

पत्र पढ़कर मुझे अपने कायर होने का एहसास हो रहा है. मुझमें तो अब भी साहस नहीं कि मैं दुनिया वालों को क्या, उन्हें ही बता सकूं कि मैं उन्हें कितना प्यार करती हूं. आज एक बार फिर मुझे औरत होने का हर्जाना चुकाना है, अपने पहले प्यार की आख़िरी तमन्ना भी पूरी न करके. शायद ङ्गमेरी सहेलीफ के माध्यम से ही उन्हें मेरा जवाब मिल जाए- और उनकी ज़िंदगी से पहले उनका इंतज़ार ख़त्म
हो जाए.

– दीपमाला सिंह

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Pyar Ki Kahani
पहला अफेयर: ख़ामोशियां चीखती हैं… (Pahla Affair: Khamoshiyan Cheekhti Hain)

हमारी दोस्ती का आग़ाज़, शतरंज के मोहरों से हुआ था. जब शबीना अपने प्यादे से मेरे वज़ीर को शह देती, तो पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठता… और कहीं मेरा ऊंट उसके प्यादे को भगा-भगाकर बेहाल कर देता, तब उसके ग़ुस्सैल चेहरे की मायूसी देखती बनती.

आज उसकी वही बचकाना हरक़तें याद आती हैं, तो मन से एक हूक उठती है. एक साथ घूमना-फिरना, मौज-मस्ती के वो दिन… न जाने कहां गुम हैं? नहीं जानता वो दोस्ताना हाथ क्यों पीछे हट गया. उफ़़्फ्! व़क्त की गर्द ने मुझे अपनी आग़ोश में लपेट लिया है.
जब-जब मैंने गंभीर हो उसके भविष्य के बारे में कुछ कहा, तो उसने हर बात हंसकर हवा में उड़ा दी. जैसे कोई जासूसी किताब पढ़ रही हो. मैं नादान कहां पढ़ पाया उसके भीतरी निबंध!

न जाने कितने ख़त लिख-लिख पानी में बहाए हैं और कितने किताबों में ़कैद हैं. जो उसकी सहेली शमीम के हाथ भेजे, उनका भी कोई जवाब न आया. व़क्त मुट्ठी से रेत-सा कैसे फिसलता रहा… मैं कहां जान पाया! बस, उसकी चुप्पी अंदर-ही-अंदर सालती है.

शमीम की बातों ने मेरा पूरा वजूद हिला दिया. शमीम से जाना कि उसने किसी अमीर साहिबज़ादे से दोस्ती कर ली है. इस ख़बर ने तो जैसे मेरे जीवन में सूनामी-सा बवंडर ला खड़ा किया.

“जब भंवर में आ गई कश्ती मेरी, नाख़ुदा ने क्यों किनारा कर लिया…”

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हिम्मत जुटाकर एक दिन मैंने फोन घुमाया… उधर से मर्दाना आवाज़ थी, “हैलो, अरे तुम… राशिद! कहो कैसे फोन किया?”

मैं जल्द ही बोला, “अब्बाजान आदाब! ज़रा सबीना से बात कराएंगे?”

उनके अब्बा की आवाज़ अटकी, “उनसे मिलने कोई आया है. वे गुफ़्तगू में मशग़ूल हैं.”

“आप कहें राशिद का फोन था.” मेरी बात काट उन्होंने खट से फोन रख दिया. कुछ समय मुझ पर बेख़ुदी का आलम रहा, फिर एक दिन

मैंने रात को फोन घुमाया. उधर से सबीना की आवाज़ थी,“कौन?”

“हम हैं राशिद! अरे, इतनी जल्दी आवाज़ भी भूल गई.”

उसने तरकश से ज़हर बुझा तीर छोड़ा, “सुनो, मैंने अपनी ज़िंदगी का मक़सद पा लिया है. अच्छा होगा, तुम भी अपनी कश्ती का रुख मोड़ दो…” और खटाक से फोन कट गया.

उसका फेंका हुआ वह एक जुमला मेरा जिगर चाक-चाक कर गया. उफ़़्फ्! हुस्न पर इतना ग़ुरूर? जी चाहा सबीना को पकड़कर पूछूं कि ये सुनहरे सपनों का जाल क्यों बिछाया? इतने रंगीन नज़ारों की सैर क्यों कराई? यूं शतरंज के मोहरे-सा उठाकर पटकना कहां की वफ़ादारी है? वाह! क्या दोस्ती निभाई!

अब तो हर तरफ़ दमघोंटू माहौल है… उसकी बेवफ़ाई का कारण अब तक नहीं जान पाया और अगर उसने तय ही कर रखा था कि साथ नहीं निभाना, तो मन से, भावनाओं से क्यों ऐसा खेलकर चली गई. साफ़-साफ़ कह देती कि बस दोस्ती रखनी है, उसके बाद हमारे रास्ते अलग हैं… क्यों मुझे मुहब्बत की हसीन दुनिया दिखाई और क्यों मैं उसकी आंखों को ठीक से पढ़ नहीं पाया. अब तो बस, मैं हूं और मेरी तन्हाई! ये ख़ामोशियां अब चीखने लगी हैं. मेरे पहले प्यार का यह हश्र होगा… नहीं जानता था. अब तो ये ख़ामोशियां ही मुझसे बतियाती हैं… मेरा मन बहलाती हैं…!

कहीं दूर से एक आवाज़ आ रही है…

“धीरे-धीरे अंदर आना… बिल्कुल शोर न करना तुम…
तन्हाई को थपकी देकर… मैंने अभी सुलाया है…”

– मीरा हिंगोरानी

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Pahla Affair

पहला अफेयर: मंज़िल (Pahla Affair: Manzil)

आज भी दिल का एक कोना सुरक्षित है उसके लिए, जो मेरे लिए केवल एक एहसास है. बात उन दिनों की है, जब मैंने उम्र की दहलीज़ पर सत्रहवां सावन पार किया था और उसे पहली बार अपने नज़दीक से गुज़रते देखा था. एक साधारण-सा लंबा, गोरा शख़्स, गहरी आंखें, घनी पलकें मानो समा जाऊं और वो उन पलकों में मुझे छुपा ले. उसके चेहरे पर ग़ज़ब की मासूमियत थी. उसके चौड़े सीने पर सशक्त बाजू मन में ये अरमान जगा जाते कि वो मुझे अपनी बांहों में कस ले और मेरा रोम- रोम खिल उठे.

वहीं से सिलसिला शुरू हुआ उसके गुज़रने का और मेरा चुपके से उसे निहारने का. वो एक ख़्वाब था मेरे लिए, लेकिन एक लंबे अंतराल के बाद हमने साथ- साथ कुछ घंटों की दूरी तय की थी. फिर क्या था- वो मेरा अच्छा दोस्त बन गया. लगभग रोज़ ही फ़ोन पर बातें होतीं. उसे अपनी ज़िंदगी में यूं शामिल कर लेने के बाद कब मैं उससे प्यार कर बैठी, कुछ ख़बर नहीं. उसके बाद तो जैसे मेरी दुनिया ही बदल गयी.
लेकिन समय के साथ मेरा प्यार एक अनकहा दर्द बनकर मेरी नस- नस में दौड़ने लगा. उसके साथ होकर भी मैं ख़ुद को अकेला महसूस करने लगी. उसने भी कभी कुछ नहीं कहा. आख़िर ऐसा क्यों होता है, जब हम किसी से प्यार करने लगते हैं तो ज़ुबां ख़ामोश हो जाती है और आंखें बोलने लगती हैं. पर आंखों की भाषा भी तो कोई समझे. भीतर-ही-भीतर टूटकर बिखर रही थी. मेरी एक सहेली ने उस तक मेरे दिल की बात पहुंचा दी.

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मैं बहुत ख़ुश थी उस दिन, जब वो मुझसे मिलने आ रहा था.पहली बार मैंने उसे अपने बहुत क़रीब महसूस किया था. रोम-रोम खिल उठा था मेरा, जब उसकी गर्म हथेलियों को मैंने अपने ब़र्फ से ठंडे हाथों पर महसूस किया था. उसने कहा- देखिये, मैं आपसे बस इतना कहना चाहता हूं कि मेरी नज़र में उसी को प्यार करोे, जिसे ताउम्र अपने पास रखो. लेकिन मैं अपने परिवार की मर्यादाओं की मज़बूत जंजीरों को अपने प्यार के लिए नहीं तोड़ सकता. अच्छा होगा कि प्यार की छोटी-सी ज़िंदगी की जगह दोस्ती की लंबी उम्र को स्वीकारा जाए. आपमें बहुत प्रतिभाएं हैं और मैं आपको आसमां की बुलंदियों पर देखना चाहता हूं.

उसके प्यार को भुलाना तो ख़ैर मेरे वश में नहीं, लेकिन उसकी ख़्वाहिश को मैंने ज़िंदगी का मक़सद बना लिया. समय गुज़र रहा था, हम दोनों ही अपने कैरियर को बुलंदियों तक पहुंचाने में मसरूफ़ थे. मगर तब भी हर व़क़्त उसकी यादें दिल के दरवाज़े पर दस्तक दे ही जाती थीं. अब उसके बगैर उस शहर में रहना मुश्किल हो रहा था. फिर ख़ुद से समझौता कर मैंने उसे अपना फैसला सुना दिया- प्रकाश, मैं जोधपुर पढ़ने जा रही हूं. मेरा स्वर इतना भारी था कि वाक्य पूरा होने से पहले ही मेरी आंखें भर आईं- और उसने मेरे आंसुओं को अपनी हथेली में क़ैद कर शुभकामनाओं के साथ मुझे विदा किया.

और मैं चली आई. ईश्‍वर से बस इतनी प्रार्थना है कि इस जनम में ना सही अगले जनम में उसका नाम मेरी हथेली पर लिखना.
आज इस बात को दो साल गुज़र गये- मैं अपनी मंज़िल के बहुत नज़दीक हूं. लेकिन आज भी तन्हाई में अतीत के पन्नों को पलटती हूं तो मेरा प्रकाश मुझे प्रकाशित कर देता है- और थक- हार कर मैं फिर अपनी मंज़िल की तरफ़ बढ़ जाती हूं.

– शमिता त्रिपाठी

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Psychology Of Relationships

रिश्तों का मनोविज्ञान (The Psychology Of Relationships)

मेरी उम्र 27 साल है. सगाई हुए एक साल हो गया है. घरवाले शादी की जल्दी कर रहे हैं, पर मैं अभी भी शादी को लेकर, होनेवाले पति और उनके व्यवहार को लेकर काफ़ी असमंजस में हूं, इसलिए कोई भी फैसला लेने से हिचक रही हूं. मन में एक
अजीब-सा डर है.

– आशालता, चंडीगढ़.

कोई भी नया निर्णय लेना आसान नहीं होता. ख़ासकर तब, जब वह हमारे जीवन और भविष्य से संबंधित हो. शादी का निर्णय लेने से पहले कुछ बातों का ख़ास ख़्याल रखें, जैसे- शादी को लेकर आपकी अपेक्षाएं, आपकी शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक तैयारी, क्या आप पूरी तरह से और यहां तक कि आर्थिक तौर पर भी तैयार हैं नए जीवन, नए रिश्तों व नए परिवार की ज़िम्मेदारी निभाने के लिए? ख़ुद से यह सवाल करें, आत्म विश्‍लेषण करें. घर के बड़ों से, अनुभवी दोस्तों से सलाह लें. परिवार या समाज के दबाव में आकर कोई निर्णय ना लें.

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मेरी दो बेटियां हैं. एक की उम्र है 16 साल और दूसरी 14 साल की है. उनके आजकल के बर्ताव से बहुत परेशान रहती हूं. उनके कपड़ों का, जूते-चप्पलों का चयन भी बहुत बदल गया है. वो अपनी ही दुनिया में रहती हैं. किसी को कुछ समझती ही नहीं. मेरी किसी बात का उन पर कोई असर नहीं होता. दोस्तों का साथ उन्हें ज़्यादा पंसद है. क्या करूं, बेहद परेशान हूं.

– नौशीन, कोलकाता.

किशोरावस्था में बच्चों को संभालना अपने आप में एक चुनौती है. आजकल का इंटरनेट युग इसे और भी मुश्किल बना रहा है. आपको संयम से काम लेना होगा. उनसे बहुत ज़्यादा कठोरता से पेश न आएं. उनकी उम्र को देखते हुए आपको उनसे दोस्ताना व्यवहार करना होगा. घर-परिवार का माहौल प्यारभरा बनाए रखें और उनका विश्‍वास जीतें. बात-बात पर
रोक-टोक न करें. उनकी दोस्त बनकर रहेंगी, तो वो आपसे दूरी नहीं बानएंगी और मन की बात भी शेयर करने से नहीं हिचकिचाएंगी. हां, उनके दोस्तों के बारे में जानकारी ज़रूर रखें, ताकि वो ग़लत संगत में न पड़ जाएं, लेकिन ध्यान रहे कि आपकी बच्चियों को यह न लगे कि आप उनकी जासूसी करती हैं.

मेरे पति काम के सिलसिले में ज़्यादातर बाहर रहते हैं. मेरा एक छोटा बेटा है. घर-बाहर का सारा काम मुझे ही देखना पड़ता है. लगता है मानो मेरा सारा जीवन बस इन्हीं उलझनों में उलझकर रह गया है. अपने लिए तो समय ही नहीं रहा अब.

– रजनी शर्मा, मुंबई.

अभी आपका बेटा छोटा है और मां होने के नाते उसके प्रति आपकी ज़िम्मेदारी बनती है. पति काम के सिलसिले में बाहर रहते हैं, तो यह आपकी ज़िम्मेदारी है कि उनके पास ना होने से उनकी जगह भी आप लें. बेटे का बचपन और भविष्य सवांरने पर ध्यान दें. कुछ ही सालों में जब वह बड़ा हो जाएगा, आपके पास समय ही समय होगा अपने लिए. तब आप अपने बेटे के साथ को तरसेंगी. बेहतर है, आज जब वह आप पर निर्भर है और आप का समय और अटेंशन चाहता है, तो उसे वह सब दें, जिससे वो कामयाब जीवन की ओर बढ़ सके. जीवन के हर दौर का अपना एक अलग ही मज़ा होता है. हर दौर को भरपूर जीएं और उसका आनंद उठाएं. अगर नकारात्मक सोच रखेंगी, तो कभी ख़ुश नहीं रह पाएंगी. हां, यदि आप पर काम का बोझ अधिक बढ़ गया है, तो बेहतर होगा अपने पति से बात करें. हो सकता है वो कुछ अधिक समय आपके व बच्चे के लिए निकाल पाएं.

Zeenat Jahan

ज़ीनत जहान
एडवांस लाइफ कोच व
सायकोलॉजिकल काउंसलर

[email protected]

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Pyaar Ki Kahani

पहला अफेयर: ख़ूबसूरत फरेब (Pahla Affair: Khoobsurat Fareb)

घर में आर्थिक तंगी से मेरी पढ़ाई छूट गई थी. बस, गुज़र-बसर हो रही थी किसी तरह. तभी मकान का आधा हिस्सा एक सरकारी ऑफिस को किराए पर दिया, तो आमदनी का कुछ ठोस ज़रिया हो गया. फिर एक दिन एक आकर्षक युवक को जीप से उतरते देखा, तो बस देखती ही रह गई. पता चला, ये साहब हैं, आलोक नाम है.

कोई काम तो था नहीं, उधर ताक-झांककर मन बहला लेती, पकड़ी जाती, तो मैं झेंप जाती और वो मुस्कुरा देते. बीस दिन बीते होंगे, मैं अचानक बहुत बीमार हो गई. डॉक्टर ने तुरंत ज़िला अस्पताल ले जाने को कहा.

आस-पड़ोस के तमाम हितैषी जमा थे, पर सर्द आधी रात, सभी तरह-तरह की सलाहें देकर बहाने बनाने लगे. अम्मा हताश-निराश होकर रोने लगीं, तभी उधर से पूछा गया, “मांजी, क्या बात हो गई?” नीम बेहोशी में आगे नहीं जान सकी मैं कि क्या और कैसे हुआ. सुबह आंख खुली, तो ख़ुद को अस्पताल में पाया. साहब थके-थके-से सामने बैठे थे. लगा कि रातभर सोये नहीं थे.

उन्होंने पूछा, “अब कैसी हो?” मैंने कहा, “हां, अब आराम है. मेरे कारण आपको बहुत कष्ट हुआ.” वे बोले, “क्यों? रात अगर मुझे कुछ हो जाता, तो क्या तुम मेरी मदद नहीं करतीं?” यह सुनकर अच्छा लगा था. तीन दिन बाद अपना सहारा देकर उन्होंने जीप से घर उतारा तो उन्हीं पड़ोस के हितैषी जनों में चर्चा का आधार भी बन गई.

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पड़ोस में रहते हुए उन्हें मेरे घर में दो वर्ष के भीतर घटित विपदा व दीनदशा की सारी जानकारी हो चुकी थी. अब कभी-कभी आंगन के बीच की दीवार पर कुछ देर बातें भी होने लगीं, जिससे मेरी ताका-झांकी तो बंद हो गई, लेकिन रातों की नींद और चैन गायब हो गया था. और जब एक दिन मुझे बुलाकर मेरा इंटरमीडिएट का फॉर्म भरवा दिया, पढ़ाई शुरू कराई, तो मैं शीशे में बार-बार ख़ुद को निहारती कुंआरे सपनों को संवारती रहती. इंटर पास हो गई, तो उसी ऑफिस में नौकरी भी मिल गई. मेरा बीए का फॉर्म भी भराया गया. अब मकान के किराए व मेरे वेतन से घर को बहुत सहारा हो गया. पुराने घाव भर से गए.

नज़दीकियां प्यार को जन्म देती हैं. ऑफिस में काम बताते, डिक्टेशन देते हुए उनकी आंखों की तरलता में अपने लिए जिज्ञासा देखती और वो अपने पद की मर्यादा व गरिमा से बंधे मेरा मन टटोला करते. मैं हिम्मत करके कुछ कहना चाहती, किंतु कस्बई संकीर्ण संस्कार घर की पुरानी चौखट लांघ ही न पाते.

नानी का निधन हो गया. सुबह छुट्टी मांगने उधर गई, तो मेरे दोनों हाथ पकड़कर पूछा, “कुछ और नहीं कहोगी?” दरिद्रता कृपण भी तो होती है. मैं ठूंठ-सी खड़ी रही, न एतराज़ कर पाई और न उस अनुपम प्यार का प्रतिदान कर अपना व उनका असमंजस ही मिटा पाई. लौटकर आई, तो बड़े बाबू ने एक पत्र देकर बताया, “साहब को दो वर्ष की ट्रेनिंग पर विदेश भेजा गया है.”

पत्र पढ़ा- ‘आरती, इतने दिन साथ रहे. अच्छा लगा. कभी-कभी सफ़र में कुछ ऐसा छूट जाता है, जिसकी भरपाई नहीं हो पाती और वो तुम हो आरती. याद है, अस्पताल से आते ही तुमने कहा था कि अगर रात आप न होते, तो मरी कहानी ख़त्म ही थी. उस कहानी को मैंने आगे बढ़ाना चाहा, पर तुम्हारा अंतर्मन पढ़ न पाया. हो सकता है, तुम्हारे मन में वैसा कुछ न रहा हो, जैसा मैं सोचता रहा. तभी तो जाते समय तुमने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी थी. तुमसे मिल न सका, नौकरी की मजबूरी जानती हो. तुम्हें दुख तो होगा और मुझे तुम्हारी याद आया करेगी. पथराई आंखों से पत्र पकड़े संज्ञा-शून्य-सी बैठी रह गई थी.

कैसा दुख? ग़रीब को तो दुख की आदत होती है. सुख कभी आता भी है, तो अधिक देर ठहरता नहीं. मैं तो स्त्री थी. उपकारों के बोझ से दबी. वे तो पुरुष थे. सबल व समर्थ भी. मेरी दीनदशा से मर्माहत हो मुझसे कौन-सा रिश्ता बनाए रहे, तो जता न सके? तब भी नहीं, जब हमारे प्यार की चर्चा कस्बे में फैली. तब भी इतना ही बोले, “आरती हवन करते हाथ भले ही न जलें, आंच तो आती ही है.” फिर न कोई वादा, न सांत्वना. अपने फर्ज़ से वो तो ़फुर्सत पा गए और मैं ख़ूबसूरत फरेब का ताना-बाना बुनती रह गई.

– आरती सिंह

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Love Stories

पहला अफेयर: लम्हे तुम्हारी याद के (Pahla Affair: Lamhe Teri Yaad Ke)

प्यार, यूं तो इस शब्द से हर शख़्स वाकिफ़ होता है, पर इसका एहसास तो होता है तब, जब किसी का इंतज़ार यूंं ही करते रहना अच्छा लगने लगता है. प्यार का एहसास मुझे इस रूप में होगा, मैंने कभी सोचा भी न था. ज़िंदगी की बीस बहारें यूूं ही गुज़र गईं और इस बहार ने मेरी ज़िंदगी के मायने ही बदल दिए.

हमने घर हाल में ही बदला था. कुछ दूर मोड़ पर जाकर ही उनका घर था. एक संपूर्ण व्यक्तित्व – सुंदर, बोलने में इतनी आत्मीयता कि कोई भी प्रभावित हुए बिना रह न सके. देखते-देखते कब बातें शुरू हुईं और कब एक अजनबी अपनों से बढ़कर मेरे इतने क़रीब आ गया, पता ही नहीं चला.

हर सुबह एक नई उमंग लेके आती और हर शाम नए ख़्वाब. उनके बिना कुछ भी सोच पाना मुमकिन न था. दिल के एक कोने में जीवनसाथी की तस्वीर उनके रूप में परिपूर्ण थी. उनकी आंखों में छिपी चाहत को मैंने कई बार महसूस किया, पर उन्होंने कभी कुछ कहा नहीं. वैसे तो निगाहों की भाषा काफ़ी होती है मोहब्बत के इज़हार के लिए, पर शायद वज़ूद के लिए शब्द भी ज़रूरी हैं, इसलिए शब्दों के सहारे मैंने अपनी इच्छाएं उनके सामने रख दीं. वो सुनते रहे और चुप रहे, पर जब उनका मौन टूटा तो मेरी ज़िंदगी, मेरा वज़ूद सब बिखर कर रह गया.

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‘कृति मैं भी तुमसे बहुत प्यार करता हूं. तुमने मेरी ज़िंदगी को एक नई दिशा दी है, पर एक सच्चाई जिसे मैं तुम्हें खोने के डर से आज तक नहीं बता पाया कि मैं एक शादीशुदा पुरुष हूं. तुम्हारे साथ, तुम्हारे प्यार और अपनेपन ने मुझे अंदर तक छू लिया. मेरी भावनाएं, मेरी इच्छाएं जो अब तक अधूरी थीं, तुमने उन सबको परिपूर्ण किया है. तुम्हारे साथ ने ही मुझे प्यार का एहसास कराया है. तुम ही मेरी ज़िंदगी का पहला प्यार हो, जिसे मैं हमेशा चाहूंगा, पर तुम्हारे इस साथ में मैं अपने यथार्थ को भूल गया था और उससे भाग रहा था. तुम्हें खोने के डर ने मुझे बहुत स्वार्थी बना दिया था, इसलिए चाहकर भी मैं तुम्हें आज तक ये नहीं बता पाया और जाने-अनजाने में तुम्हारी भावनाओं को आहत किया. काश! हमारी ज़िंदगी हमारी सोच की तरह आसान होती और जो हम चाहते, हमें मिल जाता. हो सके तो मुझे माफ़ कर देना…’ इतना कहकर वो चले गए.

सब कुछ रेत की तरह हाथों से निकल गया. उनके इस झूठ ने मेरी ज़िंदगी के मायने ही बदल दिए. सच है पहला प्यार कभी भी भुलाया नहीं जा सकता. सब कुछ जानते हुए आज भी मैं उनसे बेइंतहा मोहब्बत करती हूं और वो लम्हे जो हमने साथ गुज़ारे थे, वो अनमोल पल आज भी मेरी स्मृतियों में यूं ही कायम हैं और हमेशा रहेंगे.

हंसना तो बड़ी शै है, रोने भी नहीं देते
लम्हे तुम्हारी याद के, कुछ ऐसे भी आते हैं

– कृति

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Pyaar Ki Kahaniya

पहला अफेयर: पहले प्यार की ख़ुशबू (Pahla Affair: Pahle Pyar Ki Khushbu)

आज भी मेरे हाथों पर तेरे प्यार की मेहंदी का रंग बरक़रार है. वह सिंदूरी शाम. डूबते सूरज की पहली लाली, वो तेरा छत पर पतंग की डोर थाम बार-बार मुझे देख मुस्कुराना….वह मुस्कुराहट आज भी मेरे मन के भीतोें पर रंगीन चित्रों-सी उकरी है. तेरा वो दिलकश क़ातिलाना अंदाज़, बार-बार मुड़कर मुझे निहारना, मुझसे नज़रें मिलाना फिर चुराना सब कुछ याद है मुझे.

याद है तुम्हें, एक दिन अचानक शाम के धुंधलके में तुमने गली के मोड़ पर मेरा हाथ पकड़कर कहा था, ङ्गङ्घशालू मैं तुम्हें तहेदिल से चाहता हूं. मैं तुम्हारे दिल की बात सुनना चाहता हूं.फफ लगा था जैसे गोली की आवाज़ से कई परिंदे पंख फड़फड़ाकर उड़ चले हों. मेरा दिल ज़ोर से धड़क उठा था. मैं सुरमई अंधेरों की गुलाबी खनक में खो-सी गई थी. हाथ छुड़ाकर भागने की कोशिश में मेरी चुन्नी का कोना तुम्हारे हाथ में आ गया था. वही कमबख़्त कोना जैसे तुम्हारी ज़िंदगी का मक़सद बन गया.

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बहुत चाहा तुम्हारा दामन थाम ज़िंदगी का ख़ुशनुमा सफ़र तय करूं, लेकिन क़िस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था- मेरे पिता की असमय दिल के दौरे से मौत ने सब कुछ ख़त्म कर दिया. मैं टूटकर बिखर गई, हमारी मोहब्बत बिखर गई.

पिता ने मरते समय मां से वचन लिया था- मैं उनके बताए लड़के से विवाह करने को मज़बूर कर दी गई. वह एक लम्हा, तुम्हारा मेरा हाथ थामना मेरे लिए क़ातिलाना साबित हुआ. मां की आंखों में तैरती बेबसी की नावें और तुम्हारी आंखों में मोहब्बत का बेइंतहा समंदर मेरे लिए ज़िंदगी कशमकश का दरिया बन गई. तुम्हारी यादों की गहरी खाइयों में मैं गिरती चली गई.

याद है, मैंने तुम्हें ख़त लिखा था, यदि मेरा विवाह अन्यत्र हुआ तो मैं आत्महत्या कर लूंगी. छत पर तुमने जो पुर्जा फेंका था, आज वही मेरे पास तुम्हारी धरोहर है-

मेरी अपनी शालू,
ज़िंदगी जीने का नाम है, वे बुज़दिल होते हैं, जो ज़िंदगी से हार मान मौत को गले लगा लेते हैं. तुम्हें अभी ज़िंदगी की कई बहारें देखनी हैं. प्यार तो कुर्बानी मांगता है. अगर तुम्हें कुछ हो गया तो मैं किसके सहारे जीऊंगा, बोलो.
तुम्हारा पहला प्यार,
पीयूष

हमारे पहले प्यार की ख़ुशबूओं से लबालब वह पुर्ज़ा आज भी मेरे पास तुम्हारी अमानत है, जैसे- वह काग़ज़ का टुकड़ा न होकर छोटा-सा टिमटिमाता जुगनू हो, जो मेरी ज़िंदगी का रहबर बना है. शायद इसी के सहारे ही मैं ज़िंदगी के बीहड़ बियाबान जंगल लताड़ती आगे बढ़ती रही हूं. अब तो मैंने ज़िंदगी की हर मुश्किल से लड़ना सीख लिया है.

कांप उठती हूं मैं ये
सोचकर तनहाई में
मेरे चेहरे पे कहीं
पहला प्यार न
पढ़ ले कोई

– मीरा हिंगोरानी

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