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कब करें फैमिली प्लानिंग पर बात? (When Is The Best Time To Discuss Family Planning?)

शादी से पहले होनेवाले कपल को तरह-तरह की हिदायतें दी जाती हैं. ट्रेनिंग दी जाती है. नए माहौल में एडजेस्ट होने से लेकर खाना पकाने तक और ससुराल में सबका मन जीत लेने से लेकर पार्टनर को काबू में करने तक के गुरुमंत्र दिए जाते हैं. जिसकी समझ में जो आता है, वो वही स्पेशल टिप देकर चला जाता है. लेकिन इन सबके बीच एक बात जो अक्सर नज़रअंदाज़ कर दी जाती है, वो है फैमिली प्लानिंग की बात.

Family Planning

क्यों नहीं की जाती फैमिली प्लानिंग की बात?

–     दरअसल हमारे समाज में शादी का दूसरा मतलब ही होता है बच्चे. जी हां, शादी होते ही हर कोई गुड न्यूज़ सुनना चाहता है, ऐसे में फैमिली प्लानिंग के बारे में भला कौन सोचे?

–     शादी के बाद यदि एक साल के अंदर गुड न्यूज़ नहीं मिलती, तो लोग बातें बनाने लगते हैं, क्योंकि हम मदरहुड को बहुत ही ग्लोरिफाई करते हैं.

–     मां बनना ही जैसे एक स्त्री की ज़िंदगी का सबसे बड़ा उद्देश्य है, उसके बिना उसके अस्तित्व का कोई महत्व ही नहीं.

–     अक्सर पैरेंट्स अपने बच्चों के मन यह बात डाल देते हैं कि बेहतर होगा कंट्रासेप्शन यूज़ न किया जाए और पहला बच्चा जितना जल्दी हो जाए, उतना अच्छा होगा.

–     अक्सर बच्चे को लोग शादी व रिश्ते की सिक्योरिटी मान लेते हैं, यह भी वजह है कि शादी के बाद गुड न्यूज़ का ही इंतज़ार करते हैं.

क्यों ज़रूरी है फैमिली प्लानिंग?

–     आजकल बिज़ी शेड्यूल के चलते बहुत-सी प्राथमिकताएं बदल रही हैं. इनका असर शादी व फैमिली प्लानिंग पर भी पड़ा है. ऐसे में अनचाहा गर्भ यानी एक्सिडेंटल प्रेग्नेंसी बहुत से ़फैसले बदलने को मजबूर कर सकती है.

–     इन फैसलों में करियर से लेकर फाइनेंशियल प्लानिंग तक शामिल है.

–    पहला बच्चा कब चाहते हैं, दूसरा बच्चा यदि चाहते हैं, तो कितने अंतराल के बाद… बच्चा होने पर किस तरह से ज़िंदगी बदलेगी, ज़िम्मेदारियां बढ़ेंगी, ख़र्चे बढ़ेंगे, काम बढ़ेगा… इन सब पर चर्चा ज़रूरी है.

–     बच्चे की ज़िम्मेदारी व उससे जुड़े काम कपल किस तरह से आपस में बांटेंगे, करियर को किस तरह से मैनेज करेंगे… इन तमाम बातों पर चर्चा बेहद ज़रूरी है.

कब करें फैमिली प्लानिंग की चर्चा?

अब सवाल यह है कि इन बातों पर चर्चा कब करनी चाहिए?

–    ज़ाहिर-सी बात है, ये तमाम बातें कपल को शादी से पहले ही कर लेनी चाहिए.

–     दोनों के क्या विचार हैं, किसकी कितनी सहमति है, यह जानना बेहद ज़रूरी है, ताकि बाद में विवाद न हो.

–     इसी प्लानिंग का एक बड़ा हिस्सा है- कंट्रासेप्शन. किस तरह का कंट्रासेप्शन यूज़ करना है, किसे यूज़ करना है, कब तक यूज़ करना है आदि बातें कपल्स पहले ही डिसाइड कर लें, वरना एक्सिडेंटल प्रेग्नेंसी बहुत से प्लान्स चेंज करवा सकती है.

–     कंट्रासेप्शन यदि फेल हुआ, तो एक्सिडेंटल प्रेग्नेंसी के लिए मानसिक रूप से तैयार रहना होगा. आपका करियर व फाइनांस बहुत हद तक इससे प्रभावित होगा, तो उस पर भी चर्चा ज़रूरी है.

–     आप चाहें तो काउंसलर के पास जाकर भी सलाह ले सकते हैं.

–     लेकिन ज़रूरी है कि शादी से पहले ही इन सब बातों को लेकर आप क्लीयर हो जाएं, ताकि बाद में एक-दूसरे पर टीका-टिप्पणी या आरोप न लगें.

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Family Planning Tips
बेझिझक बात करना है ज़रूरी

–     अक्सर कपल शादी से पहले इन बातों को जान-बूझकर भी अवॉइड करते हैं, क्योंकि उन्हें झिझक होती है.

–     उन्हें यह भी लगता है कि कहीं इतनी-सी बात को लेकर बनता रिश्ता टूट न जाए.

–     लड़कियों में भी हिचक होती है, क्योंकि उन्हें लगता है कि पार्टनर यह न समझे कि वो मर्यादा के बाहर जाकर बात कर रही है.

–     लेकिन बेहतर यही होगा कि आप हिचकिचाहट छोड़कर अपनी सारी शंकाएं दूर कर लें, ताकि बाद में यह महसूस न हो कि काश! पहले ही बात कर ली होती.

–     इससे आपको अपने होनेवाले पार्टनर की परिपक्वता, सोच-समझ व मानसिकता का भी अंदाज़ा हो जाएगा.

–     वो कितना सुलझा हुआ है, उसका थॉट प्रोसेस कितना क्लीयर है, यह आपको पता चल जाएगा.

बदलाव के लिए रहें तैयार

–     आप दोनों को इस बात पर भी चर्चा करनी होगी कि आप दोनों की ही ज़िंदगी बच्चा होने के बाद बहुत ज़्यादा बदल जाएगी.

–     एक तरफ़ ख़ुशख़बरी होगी, पर दूसरी तरफ़ ज़िम्मेदारियां भी.

–     उसी के अनुसार ख़र्च बढ़ेंगे, तो किस तरह से पहले से ही कितना अमाउंट इंवेस्ट करना है, ताकि बच्चा होने पर आपकी फाइनेंशियल हालत स्थिर रहे, उसकी प्लानिंग भी ज़रूरी है.

–     बच्चे के लिए कौन-कौन से प्लान्स लेने हैं, इसकी जानकारी ज़रूरी है.

–     स़िर्फ आर्थिक तौर पर ही नहीं, मानसिक व शारीरिक तौर पर भी बदलाव होंगे.

–     हल्का डिप्रेशन, शरीर में बदलाव, लाइफस्टाइल में बदलाव- इन सब पर भी चर्चा ज़रूरी है.

–     आपकी सेक्स लाइफ भी बदलेगी, जिसे लेकर हो सकता है आपसी तनाव हो जाए, तो यहां यदि आप पहले ही चर्चा करके एक-दूसरे के मन को जान लेंगे, परिपक्वता को परख लेंगे, तो भविष्य की चुनौतियों का सामना बेहतर तरी़के से कर पाएंगे.

–     बच्चा होने पर देर रात तक जागना, उसकी पूरी देखभाल करना शरीर व मन को थका सकता है और यह तनाव भी दे सकता है, जिससे आपस में विवाद भी हो सकते हैं.

–     करियर में बदलाव भी होगा. हो सकता है किसी एक को नौकरी छोड़नी भी पड़े या पार्ट टाइम काम करना पड़े, तो वो किस तरह से मैनेज होगा.

–     बच्चा होने के कितने समय बाद फिर से करियर को महत्व देना है, किस तरह से बच्चे की परवरिश करनी है, ये तमाम बातें छोटी लगती हैं, लेकिन आपके रिश्ते के लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं.

समय ने मानसिकता भी बदल दी है…

यह सच है कि स्त्री को ही प्रकृति ने गर्भधारण का दायित्व दिया है. ऐसे में कंसीव करने के बाद यह सोचना कि यह कोई बड़ी मुसीबत है या यह बच्चा आपकी ही ज़िम्मेदारी नहीं है आदि ग़लत है. यह सच है कि बच्चा दोनों की ज़िम्मेदारी है, लेकिन स्त्री की शारीरिक संरचना व प्रकृति द्वारा प्रदत्त दायित्व के चलते उसकी ज़िम्मेदारी थोड़ी अलग व अधिक हो ही जाती है. निशांक व रिया ने फैमिली प्लानिंग नहीं की थी और न ही उस पर चर्चा की थी. नतीजा- शादी के एक साल के अंदर ही उनको बच्चा हो गया, लेकिन यह बच्चा रिया को बोझ लगने लगा, क्योंकि वो बात-बात पर निशांक से शिकायत करती कि बच्चा दोनों का है, तो तुम तो मज़े से ऑफिस चले जाते हो और मुझे इतना कुछ सहना पड़ता है. जबकि रिया वर्किंग नहीं थी, बावजूद इसके उसे यह अपेक्षा रहती थी कि यदि वो रात में जागकर बच्चे की नैप्पी बदल रही है, तो निशांक को भी यह करना होगा. प्रेग्नेंसी के बाद रिया में शारीरिक बदलाव भी आ गए थे, जिसको लेकर वो डिप्रेशन में रहने लगी थी. निशांक के अलावा रिया के जाननेवाले व सहेलियां भी उसे समझाती थीं कि यह नेचुरल है और समय के साथ सब नॉर्मल हो जाएगा, इसलिए रिया को बदले हालातों को स्वीकारना होगा, वो भी ख़ुशी-ख़ुशी. लेकिन रिया कुछ समझने को तैयार ही नहीं थी. उसे लगता था उसकी आज़ादी छिन गई, उसकी आउटिंग व पार्टीज़ बंद हो गईं, वो मोटी हो गई… जिसका असर दोनों के रिश्ते के साथ-साथ घर में आए नए मेहमान पर भी पड़ रहा था. एक्सिडेंटल प्रेग्नेंसी पर यदि रिया व निशांक ने पहले चर्चा की होती या फिर पहले से ही उन्होंने फैमिली प्लानिंग की चर्चा की होती, तो परिस्थितियां बेहतर होतीं.

इसके अलावा बेहतर होगा कि आज की जेनरेशन भी यह सच्चाई स्वीकारे कि प्रकृति ने स्त्री-पुरुष को अलग-अलग बनाया है और उसे कोई भी बदल नहीं सकता. बेहतर होगा कि अपने बच्चे का ख़ुशी-ख़ुशी स्वागत करें, ताकि वो सकारात्मक माहौल में पल-बढ़ सके.

ज़रूरत महसूस हो, तो काउंसलर की मदद भी ले सकते हैं या घर के बड़े-बज़ुर्गों का मार्गदर्शन लें.

– ब्रह्मानंद शर्मा

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रिश्तों का मनोविज्ञान (The Psychology Of Relationships)

Psychology Of Relationships

रिश्तों का मनोविज्ञान (The Psychology Of Relationships)

मेरी उम्र 27 साल है. सगाई हुए एक साल हो गया है. घरवाले शादी की जल्दी कर रहे हैं, पर मैं अभी भी शादी को लेकर, होनेवाले पति और उनके व्यवहार को लेकर काफ़ी असमंजस में हूं, इसलिए कोई भी फैसला लेने से हिचक रही हूं. मन में एक
अजीब-सा डर है.

– आशालता, चंडीगढ़.

कोई भी नया निर्णय लेना आसान नहीं होता. ख़ासकर तब, जब वह हमारे जीवन और भविष्य से संबंधित हो. शादी का निर्णय लेने से पहले कुछ बातों का ख़ास ख़्याल रखें, जैसे- शादी को लेकर आपकी अपेक्षाएं, आपकी शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक तैयारी, क्या आप पूरी तरह से और यहां तक कि आर्थिक तौर पर भी तैयार हैं नए जीवन, नए रिश्तों व नए परिवार की ज़िम्मेदारी निभाने के लिए? ख़ुद से यह सवाल करें, आत्म विश्‍लेषण करें. घर के बड़ों से, अनुभवी दोस्तों से सलाह लें. परिवार या समाज के दबाव में आकर कोई निर्णय ना लें.

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मेरी दो बेटियां हैं. एक की उम्र है 16 साल और दूसरी 14 साल की है. उनके आजकल के बर्ताव से बहुत परेशान रहती हूं. उनके कपड़ों का, जूते-चप्पलों का चयन भी बहुत बदल गया है. वो अपनी ही दुनिया में रहती हैं. किसी को कुछ समझती ही नहीं. मेरी किसी बात का उन पर कोई असर नहीं होता. दोस्तों का साथ उन्हें ज़्यादा पंसद है. क्या करूं, बेहद परेशान हूं.

– नौशीन, कोलकाता.

किशोरावस्था में बच्चों को संभालना अपने आप में एक चुनौती है. आजकल का इंटरनेट युग इसे और भी मुश्किल बना रहा है. आपको संयम से काम लेना होगा. उनसे बहुत ज़्यादा कठोरता से पेश न आएं. उनकी उम्र को देखते हुए आपको उनसे दोस्ताना व्यवहार करना होगा. घर-परिवार का माहौल प्यारभरा बनाए रखें और उनका विश्‍वास जीतें. बात-बात पर
रोक-टोक न करें. उनकी दोस्त बनकर रहेंगी, तो वो आपसे दूरी नहीं बानएंगी और मन की बात भी शेयर करने से नहीं हिचकिचाएंगी. हां, उनके दोस्तों के बारे में जानकारी ज़रूर रखें, ताकि वो ग़लत संगत में न पड़ जाएं, लेकिन ध्यान रहे कि आपकी बच्चियों को यह न लगे कि आप उनकी जासूसी करती हैं.

मेरे पति काम के सिलसिले में ज़्यादातर बाहर रहते हैं. मेरा एक छोटा बेटा है. घर-बाहर का सारा काम मुझे ही देखना पड़ता है. लगता है मानो मेरा सारा जीवन बस इन्हीं उलझनों में उलझकर रह गया है. अपने लिए तो समय ही नहीं रहा अब.

– रजनी शर्मा, मुंबई.

अभी आपका बेटा छोटा है और मां होने के नाते उसके प्रति आपकी ज़िम्मेदारी बनती है. पति काम के सिलसिले में बाहर रहते हैं, तो यह आपकी ज़िम्मेदारी है कि उनके पास ना होने से उनकी जगह भी आप लें. बेटे का बचपन और भविष्य सवांरने पर ध्यान दें. कुछ ही सालों में जब वह बड़ा हो जाएगा, आपके पास समय ही समय होगा अपने लिए. तब आप अपने बेटे के साथ को तरसेंगी. बेहतर है, आज जब वह आप पर निर्भर है और आप का समय और अटेंशन चाहता है, तो उसे वह सब दें, जिससे वो कामयाब जीवन की ओर बढ़ सके. जीवन के हर दौर का अपना एक अलग ही मज़ा होता है. हर दौर को भरपूर जीएं और उसका आनंद उठाएं. अगर नकारात्मक सोच रखेंगी, तो कभी ख़ुश नहीं रह पाएंगी. हां, यदि आप पर काम का बोझ अधिक बढ़ गया है, तो बेहतर होगा अपने पति से बात करें. हो सकता है वो कुछ अधिक समय आपके व बच्चे के लिए निकाल पाएं.

Zeenat Jahan

ज़ीनत जहान
एडवांस लाइफ कोच व
सायकोलॉजिकल काउंसलर

[email protected]

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पहला अफेयर: ख़ूबसूरत फरेब (Pahla Affair: Khoobsurat Fareb)

Pyaar Ki Kahani

पहला अफेयर: ख़ूबसूरत फरेब (Pahla Affair: Khoobsurat Fareb)

घर में आर्थिक तंगी से मेरी पढ़ाई छूट गई थी. बस, गुज़र-बसर हो रही थी किसी तरह. तभी मकान का आधा हिस्सा एक सरकारी ऑफिस को किराए पर दिया, तो आमदनी का कुछ ठोस ज़रिया हो गया. फिर एक दिन एक आकर्षक युवक को जीप से उतरते देखा, तो बस देखती ही रह गई. पता चला, ये साहब हैं, आलोक नाम है.

कोई काम तो था नहीं, उधर ताक-झांककर मन बहला लेती, पकड़ी जाती, तो मैं झेंप जाती और वो मुस्कुरा देते. बीस दिन बीते होंगे, मैं अचानक बहुत बीमार हो गई. डॉक्टर ने तुरंत ज़िला अस्पताल ले जाने को कहा.

आस-पड़ोस के तमाम हितैषी जमा थे, पर सर्द आधी रात, सभी तरह-तरह की सलाहें देकर बहाने बनाने लगे. अम्मा हताश-निराश होकर रोने लगीं, तभी उधर से पूछा गया, “मांजी, क्या बात हो गई?” नीम बेहोशी में आगे नहीं जान सकी मैं कि क्या और कैसे हुआ. सुबह आंख खुली, तो ख़ुद को अस्पताल में पाया. साहब थके-थके-से सामने बैठे थे. लगा कि रातभर सोये नहीं थे.

उन्होंने पूछा, “अब कैसी हो?” मैंने कहा, “हां, अब आराम है. मेरे कारण आपको बहुत कष्ट हुआ.” वे बोले, “क्यों? रात अगर मुझे कुछ हो जाता, तो क्या तुम मेरी मदद नहीं करतीं?” यह सुनकर अच्छा लगा था. तीन दिन बाद अपना सहारा देकर उन्होंने जीप से घर उतारा तो उन्हीं पड़ोस के हितैषी जनों में चर्चा का आधार भी बन गई.

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पड़ोस में रहते हुए उन्हें मेरे घर में दो वर्ष के भीतर घटित विपदा व दीनदशा की सारी जानकारी हो चुकी थी. अब कभी-कभी आंगन के बीच की दीवार पर कुछ देर बातें भी होने लगीं, जिससे मेरी ताका-झांकी तो बंद हो गई, लेकिन रातों की नींद और चैन गायब हो गया था. और जब एक दिन मुझे बुलाकर मेरा इंटरमीडिएट का फॉर्म भरवा दिया, पढ़ाई शुरू कराई, तो मैं शीशे में बार-बार ख़ुद को निहारती कुंआरे सपनों को संवारती रहती. इंटर पास हो गई, तो उसी ऑफिस में नौकरी भी मिल गई. मेरा बीए का फॉर्म भी भराया गया. अब मकान के किराए व मेरे वेतन से घर को बहुत सहारा हो गया. पुराने घाव भर से गए.

नज़दीकियां प्यार को जन्म देती हैं. ऑफिस में काम बताते, डिक्टेशन देते हुए उनकी आंखों की तरलता में अपने लिए जिज्ञासा देखती और वो अपने पद की मर्यादा व गरिमा से बंधे मेरा मन टटोला करते. मैं हिम्मत करके कुछ कहना चाहती, किंतु कस्बई संकीर्ण संस्कार घर की पुरानी चौखट लांघ ही न पाते.

नानी का निधन हो गया. सुबह छुट्टी मांगने उधर गई, तो मेरे दोनों हाथ पकड़कर पूछा, “कुछ और नहीं कहोगी?” दरिद्रता कृपण भी तो होती है. मैं ठूंठ-सी खड़ी रही, न एतराज़ कर पाई और न उस अनुपम प्यार का प्रतिदान कर अपना व उनका असमंजस ही मिटा पाई. लौटकर आई, तो बड़े बाबू ने एक पत्र देकर बताया, “साहब को दो वर्ष की ट्रेनिंग पर विदेश भेजा गया है.”

पत्र पढ़ा- ‘आरती, इतने दिन साथ रहे. अच्छा लगा. कभी-कभी सफ़र में कुछ ऐसा छूट जाता है, जिसकी भरपाई नहीं हो पाती और वो तुम हो आरती. याद है, अस्पताल से आते ही तुमने कहा था कि अगर रात आप न होते, तो मरी कहानी ख़त्म ही थी. उस कहानी को मैंने आगे बढ़ाना चाहा, पर तुम्हारा अंतर्मन पढ़ न पाया. हो सकता है, तुम्हारे मन में वैसा कुछ न रहा हो, जैसा मैं सोचता रहा. तभी तो जाते समय तुमने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी थी. तुमसे मिल न सका, नौकरी की मजबूरी जानती हो. तुम्हें दुख तो होगा और मुझे तुम्हारी याद आया करेगी. पथराई आंखों से पत्र पकड़े संज्ञा-शून्य-सी बैठी रह गई थी.

कैसा दुख? ग़रीब को तो दुख की आदत होती है. सुख कभी आता भी है, तो अधिक देर ठहरता नहीं. मैं तो स्त्री थी. उपकारों के बोझ से दबी. वे तो पुरुष थे. सबल व समर्थ भी. मेरी दीनदशा से मर्माहत हो मुझसे कौन-सा रिश्ता बनाए रहे, तो जता न सके? तब भी नहीं, जब हमारे प्यार की चर्चा कस्बे में फैली. तब भी इतना ही बोले, “आरती हवन करते हाथ भले ही न जलें, आंच तो आती ही है.” फिर न कोई वादा, न सांत्वना. अपने फर्ज़ से वो तो ़फुर्सत पा गए और मैं ख़ूबसूरत फरेब का ताना-बाना बुनती रह गई.

– आरती सिंह

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फ्लैशबैक: संजय दत्त की बेटी त्रिशाला ने अपनी मां ऋचा को याद किया… (Flashback: Sanjay Dutt’s Daughter Trishala Remembered Her Mother Richa…)

Sanjay Dutt's Daughter Trishala

संजय दत्त की बेटी (Sanjay Dutt’s Daughter) त्रिशाला (Trishala) ने सोशल मीडिया पर अपनी मां ऋचा शर्मा की प्यारी-सी पुरानी फोटो शेयर करते हुए उन्हें याद किया. यह एक क्लासरूम का फोटो है, जिसमें ऋचा बेइंतहा ख़ूबसूरत लग रही हैं.

Sanjay Dutt's Daughter Trishala

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त्रिशाला ने मां को याद करते हुए ऋचा का लिखा हुआ बरसों पुराना नोट्स भी शेयर किया. उनके अनुसार, यह नोट्स मॉम ने तब लिखी थीं, जब वे धीरे-धीरे कैंसर के कारण मौत के क़रीब जा रही थीं. यह लगभग 21 साल पुराना नोट्स है. अब मुझे यह एहसास हो रहा है कि मुझमें लिखने की प्रतिभा कहां से आई. ज़िंदगी बहुत छोटी है. आई मिस हर… इस तरह उन्होंने अपनी मां की पुण्यतिथि (दस दिसंबर) के पहले मां को याद करते हुए श्रद्धांजलि दी.

Sanjay Dutt's Daughter Trishala

ऋचा शर्मा का नोट…

हम सब साथ चलते हैं. हर कोई अपना रास्ता चुनता है. मैंने भी अपना चुना है. लेकिन मैं मौत के अंतिम छोर पर हूं. मैं वापस कैसा जाऊं? क्या मुझे एक और मौक़ा मिलेगा? यह तो व़क्त ही बता पाएगा. मैं फिर भी इसका इंतज़ार करूंगी. वैसे मैं इस बात को गहराई से जानती हूं कि अब कुछ भी नहीं हो सकता. फिर भी मैं उम्मीद कर रही हूं. मेरे मसीहा मझे ऐसी जगह पर ले जाएंगे, जहां पर मेरे सपने पूरे होंगे. वे अपनी बांहों में भरकर न केवल मेरा स्वागत करेंगे, बल्कि मेरा ख़्याल भी रखेंगे…

Sanjay Dutt's Daughter Trishala

मां की तरह लेखनी का हुनर त्रिशाला में भी है, जिसका उदारहण उनके द्वारा मदर्स डे पर मां को याद करते हुए लिखा गया नोट है. त्रिशाला ने मदर्स डे पर मां ऋचा की एक तस्वीर शेयर करते हुए एक इमोशनल नोट लिखा था, जिसमें उन्होंने अपनी भावनाओं को व्यक्त किया था. 21 साल पहले अंतिम बार जब मैंने आपके लिए कुछ किया था. काश जन्नत का फोन नंबर होता. काश, मैं आपको और देख पाती, आपसे बात कर पाती, सच मैंने हमेशा आपको अपने क़रीब होने की ख़्वाहिश की है. हैप्पी मदर्स डे…

Daughter Trishala Dutt

फ़िलहाल त्रिशाला अपने नाना-नानी के साथ न्यूयॉर्क में रह रही हैं. यह अफ़वाह फैलने पर की वे फिल्मों में आ रही है, उन्होंने खारिज किया कि उनका बॉलीवुड में आने का कोई इरादा नहीं है. अपने पिता संजय दत्त व मान्यता दत्त के संबंधों को लेकर उड़ती अफ़वाहों पर भी उन्होंने विराम लगाया. बकौल त्रिशाला पिता और मान्यता के साथ उनके संबंध अच्छे हैं. यह और बात है कि पहले त्रिशाला मान्यता को आंटी बुलाती थीं, लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने अपने संबंधों को सुधारा.

Sanjay Dutt Family Photo

त्रिशाला की मां और संजय दत्त की पहली पत्नी ऋचा शर्मा ने देव आनंद की फिल्म हम नौजवान से अपने करियर की शुरुआत की थी. अनुभव, इंसाफ़ की आवाज़, सड़कछाप फिल्मों से उन्हें अलग पहचान मिली. 1987 में उन्होंने संजय दत्त से शादी कर ली, लेकिन शादी के दो साल के अंदर ही उन्हें ब्रेन ट्यूमर से पीड़ित होने का पता चला और 32 साल की छोटी उम्र में साल 1996 में न्यूयॉर्क में उनका देहांत हो गया, जहां वे अंतिम समय में अपने माता-पिता के साथ रह रही थीं.

Trishala Dutt

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रिश्तों में बदल रहे हैं कमिटमेंट के मायने… (Changing Essence Of Commitments In Relationships Today)

कभी वो ख़्वाब हो जाता है, कभी हक़ीक़त… कभी चाहत बन जाता है, कभी इबादत… मुहब्बत नाम है उसका, इश्क़ अंजाम है उसका… पर व़क्त के साथ-साथ वो कुछ-कुछ बदल जाता है… ताउम्र का साथ है यूं तो, पर अब वो क़समें नहीं हैं, चल रहे हैं हाथों में डाले हाथ, पर अब वो रस्में नहीं हैं…

Relationships Tips

व़क्त के साथ-साथ बहुत कुछ बदलता है, जीवन के प्रति नज़रिया, हमारा दृष्टिकोण, चीज़ों और लोगों को परखना हो या फिर रिश्तों को… हर बात के मायने समय के साथ बदल जाते हैं और आज की तारीख़ में, जहां समाज में इतना सब कुछ बदल रहा है, तो इसका सबसे ज़्यादा असर हमारे रिश्तों पर ही पड़ा है.

हम अक्सर कहते हैं कि रिश्तों में वो पहले जैसी बात नहीं. लेकिन सच तो यह है कि बदले हम हैं, रिश्ते नहीं. दरअसल, रिश्ते तो वही हैं, लेकिन हमारा नज़रिया उनके प्रति अब पहले जैसा नहीं रहा. यही वजह है कि रिश्तों में जो सबसे अहम् कड़ी होती थी- कमिटमेंट, उसके भी मायने बदल गए हैं. कैसे? आइए जानें.

जन्म-जन्मांतर का साथ, पुरानी हो गई अब ये बात: पहले सात फेरों को हम इस जन्म का ही नहीं, सात जन्मों का बंधन मान लेते थे. लेकिन अब यह सोच पुरानी हो चुकी है. रिश्तों को भी हम कैज़ुअली लेने लगे हैं. निभ गया तो ठीक, वरना रास्ते अलग. शादी जैसे रिश्ते की गंभीरता को भी हमने खो दिया है.

प्रैक्टिकल अप्रोच

रिश्तों को लेकर हम सभी काफ़ी इमोशनल होते हैं, लेकिन अब लोग इनके प्रति भी प्रैक्टिकल अप्रोच रखने लगे हैं. बात-बात पर न तो अब भावुक होते हैं और न ही हर चीज़ में इमोशनल फैक्टर ढूंढ़ते हैं. पार्टनर का खाने पर इंतज़ार करना, उसके साथ ही मूवी देखने जाना या उसकी पसंद को ध्यान में रखते हुए कपड़े पहनना… ये तमाम बातें आज की तारीख़ में आपको इमोशनल फूल ही साबित करती हैं.

स्पेस देना

अब लोग स्पेस के नाम पर थोड़ी-बहुत चीटिंग भी कर लेते हैं. इसमें उनको कोई बुराई नज़र नहीं आती. न तो एक-दूसरे को हर बात बतानी होती है, न ही एक-दूसरे के पासवर्ड्स पता होने ज़रूरी हैं. एक पार्टनर को लगता है कि अगर मैंने अपने पार्टनर की पर्सनल लाइफ में ज़्यादा दख़लअंदाज़ी की, तो वो भी करेगा. इसलिए सेफ यही है कि न तो एक-दूसरे के मैसेज चेक करें और न ही एक-दूसरे का सोशल मीडिया अकाउंट.

कम्यूनिकेशन का तरीक़ा बदल गया है

अब साथ बैठकर डिनर के टेबल पर रोज़ की दिनचर्या डिसकस नहीं होती, पति एक कमरे में लैपटॉप पर रहता है, पत्नी टीवी के सामने अपने मोबाइल पर व्यस्त रहती है. हैरानी की बात नहीं है कि एक ही घर में एक-दूसरे को सोशल मीडिया पर ही मैसेज भेजकर बातें कर लेते हैं. फेस-टु-फेस कम्यूनिकेशन लगभग ख़त्म होता जा रहा है. फोन और मैसेजेस ही सबसे बड़ा ज़रिया हैं.

शादी अब ज़रूरी नहीं

पहले अगर दो लोग प्यार करते थे, तो ज़ाहिर है उनकी मंज़िल शादी ही होती थी, लेकिन अब शादी के बारे में शायद बहुत बाद में सोचा जाता है, प्यार भी जब तक है, तब तक ठीक है, मनमुटाव हुआ, तो आसानी से लोग रास्ता बदल देते हैं. दूसरी ओर, लड़कियां भी अब शादी का कमिटमेंट रिश्तों में नहीं ढूंढ़तीं. दरअसल, सभी लोग एक्सपेरिमेंट करते हैं, अगर कामयाबी मिली, तो शादी भी हो ही जाएगी और यदि नहीं, तो ग़लत रिश्ते में बंधने से बच जाएंगे, इसी सोच के साथ आगे बढ़ते हैं.

फ्लर्टिंग से अब परहेज़ नहीं

अगर पार्टनर को पता है कि उसका पार्टनर अपनी कलीग या ऑनलाइन दोस्तों से फ्लर्ट करता है, तब भी वो इसे ग़लत नहीं मानती. इसे रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा समझकर लाइट मोड पर नज़रअंदाज़ कर देती है, क्योंकि इतनी-सी बात के लिए रिश्ते में अनबन को जगह क्यों देना. लोगों की सोच बदल रही है, उन्हें लगता है कि फ्लर्टिंग में कोई बुराई नहीं, यह स्ट्रेस को कम करने का मात्र एक तरीक़ा है, जो आपको रिफ्रेश कर देती है.

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Relationships Goals
परफेक्शन अब ज़रूरी नहीं

शुरू से ही हमारे समाज में पार्टनर को लेकर यही सोच बनी हुई है कि वो हर लिहाज़ से परफेक्ट होना चाहिए, उसमें कोई बुराई या ऐब नहीं होना चाहिए, लेकिन अब ऐसा नहीं है. लोग न तो एक-दूसरे को बदलने की सोचते हैं और न ही उस तरह से जज करते हैं. अगर पार्टनर में कोई कमी भी है, तो उसे अपना लेते हैं, क्योंकि दुनिया में कोई भी परफेक्ट नहीं होता.

हमेशा साथ-साथ नहीं हैं

हर निर्णय पार्टनर से पूछकर ही करना, हर चीज़ और हर बात शेयर ही करना, मूवी, डिनर, पार्टीज़ साथ करना… नहीं, अब ऐसा नहीं है. पहले ये तमाम बातें कमिटमेंट का हिस्सा थीं, पर अब नहीं. अब दोनों वर्किंग होते हैं और वर्किंग न भी हो, तो अपनी सुविधा व समयानुसार ही चीज़ें प्लान करते हैं, जिसमें ज़रूरी नहीं कि वो दोनों हमेशा साथ ही रहें. कभी अपने फ्रेंड्स के साथ, तो कभी कलीग्स के साथ पार्टनर्स अपना वीकेंड, हॉलीडेज़ या बाकी फन एक्टिविटीज़ प्लान कर लेते हैं. इसमें दोनों ही कंफर्टेबल फील करते हैं और बुरा नहीं मानते. उन्हें यह ज़्यादा आसान लगता है, क्योंकि हमेशा एक-दूसरे के सिर पर सवार रहने से बेहतर उन्हें लगता है कि एक-दूसरे को पर्सनल स्पेस दिया जाए.

इस बदलाव के क्या मायने हैं?

क्या ये बदलाव सही है या ग़लत? ये तो बहस का मुद्दा है, क्योंकि एक तरफ़ जहां प्रैक्टिकल होने के चक्कर में भावनाएं ख़त्म हो रही हैं, वहीं रिश्ते टूटने का दर्द भी कम होने लगा है अब लोगों को. फ्लर्टिंग, एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर्स, डिजिटल रिश्ते, बढ़ते तलाक़ आदि इस बदलाव के ही साइड इफेक्ट्स हैं. लेकिन इस बदलाव को रोका नहीं जा सकता, पर हां, निजी तौर पर हर कोई यह प्रयास कर सकता है कि हम अपने रिश्तों में ईमानदार रहें, क्योंकि रिश्तों का दूसरा नाम ही बंधन और अनुशासन होता है. यदि आपको यह अनुशासन और बंधन पसंद नहीं, तो बेहतर होगा कि रिश्तों में बंधें ही नहीं. आज़ाद रहें, अकेले रहें… क्योंकि इस तरह के रिश्ते ही साथी होते हुए भी अकेलेपन को और बढ़ाते हैं. यही वजह है कि आज हर कोई साथी के होते हुए भी कहीं-न-कहीं ख़ुद को अकेला पाता है.

ज़िंदगी के किसी मोड़ पर तो आकर ठहरना होता ही है, लेकिन यह ठहराव अब रिश्तों में नहीं नज़र आता, ऐसे में आप उस मोड़ पर नितांत अकेले रह जाते हैं, जहां सबसे ज़्यादा आपको प्यार, अपनेपन और साथ की ज़रूरत
होती है.

बेहतर होगा कि रिश्तों में समय, कम्यूनिकेशन, कमिटमेंट और प्यार इंवेस्ट करें, ताकि आपका रिलेशनशिप बैंक बैलेंस कभी खाली न हो.

– विजयलक्ष्मी

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क्यों बढ़ रहा है सेक्स स्ट्रेस? (Why Sex Stress Is Increasing In Our Society?)

आज कहां नहीं है स्ट्रेस? घर-परिवार, करियर, नौकरी… हर जगह तनाव का मकड़जाल फैला हुआ है. और धीरे-धीरे इसने अंतरंग लम्हों में भी घुसपैठ कर दी है. क्या एक हेल्दी रिलेशन के लिए सेक्स स्ट्रेस को दूर करने की ज़रूरत नहीं है?

Sex Stress

मनोचिकित्सक डॉ. अजीत दांडेकर के अनुसार, “स्ट्रेस लेवल बढ़ने के कारण शरीर के कई ऐसे हार्मोंस प्रभावित होते हैं, जिनकी वजह से सेक्स स्ट्रेस बढ़ जाता है. यदि पति-पत्नी अपनी रोज़ाना की ज़िंदगी का विश्‍लेषण करने के लिए कुछ समय निकाल सकें तो सेक्स स्ट्रेस का कारण ख़ुद ही समझ में आ जाएगा. सेक्स स्ट्रेस का कोई एक कारण नहीं है. मॉडर्न लाइफ़स्टाइल व अनेक चाही-अनचाही परिस्थितियां इसके लिए ज़िम्मेदार हैं.” आइए, उन विभिन्न स्थितियों को समझें.

समय की कमी व अपनों की फ़िक्र

सेक्स क्रिया के लिए समय व तनावरहित वातावरण चाहिए, जो आजकल लोगों को नहीं मिलता है. यदि समय मिल भी गया तो मन तरह-तरह की चिंताओं से घिरा रहता है. बच्चों का प्रेशर, माता-पिता का प्रेशर, ऑफ़िस की चिंताएं अनेक ऐसी बातें हैं, जो व्यक्ति को तनावमुक्त होने ही नहीं देतीं. फिर अपनी-अपनी अलग सोच और थकान के कारण तालमेल की कमी भी सेक्स के प्रति उदासीनता की स्थिति पैदा करती है.

काम का प्रेशर

ऑफ़िस या बिजनेस में ख़ुद को बेहतरीन साबित करने का जुनून, प्रमोशन की चाह, बॉस की नज़रों में योग्य बने रहने के प्रयास में कभी-कभी व्यक्ति अपनी सारी एनर्जी ख़र्च कर डालता है. वैसे भी बड़े-बड़े पैकेज यानी लाखों में मिलने वाली सालाना तनख़्वाह व्यक्ति को निचोड़कर रख देती है. अधिक आमदनी के लिए 8 की जगह 12-15 घंटे काम करना पड़ता है. ऑफ़िस के बाद कभी-कभी घर पर भी काम पूरा करना पड़ता है. इस तरह के हाईप्रेशर जॉब के साथ प्रायः संतुलन बनाए रखना कठिन हो जाता है. ऑफ़िस व घर दोनों ही ज़िम्मेदारियों को निभाने के चक्कर में व्यक्ति इतना थक जाता है कि बिस्तर पर लेटते ही सो जाता है. इसका सीधा असर उसकी सेक्स लाइफ़ पर
पड़ता है.

करियर की चाह

करियर में आगे बढ़ने की चाह एक ओर सफलता की मंज़िल तक पहुंचने का उत्साह बढ़ाती है, तो दूसरी ओर रिश्तों की गर्माहट में बाधक भी बनती है. करियर के कारण कभी-कभी पति-पत्नी को एक-दूसरे से अलग रहना पड़ता है. वे वीकएंड पर ही साथ रह पाते हैं. ऐसे कपल्स अनेक कुंठाओं के शिकार होते हैं, भले ही यह स्थिति उन्होंने स्वेच्छा से चुनी हो. ऐसे में साथ होते हुए भी तरह-तरह की शंका-आशंका (जैसे- विवाहेतर संबंध) या अपराधबोध उन्हें जकड़ने लगता है, अनेक ऐसी बातें सेक्स लाइफ़ को प्रभावित करती हैं.

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Sex Stress
असुरक्षा की भावना

आज की शादीशुदा ज़िंदगी में वर्किंग पति-पत्नी के रिश्तों में आजीवन साथ रह पाने की निश्‍चिंतता नहीं है. डर बना ही रहता है कि कब अलग हो जाना पड़े, क्योंकि दोनों के अहं होते हैं, जो कभी भी टकरा सकते हैं. दोनों में कोई भी समझौते के लिए तैयार नहीं होना चाहता है. लिहाज़ा महिलाओं के मन में अधिक बचत की चिंता रहती है. वे ज़्यादा से ज़्यादा कमाने की कोशिश में रहती हैं. वे सुरक्षित होना चाहती हैं. पुरुषों को स्त्रियों की सोच में स्वार्थ नज़र आता है. इस तरह की स्थिति तनाव व टकराहट को जन्म देती है.

प्लानिंग की कमी

आज का व्यक्ति अपनी चादर देख कर पैर नहीं पसारता, बल्कि पैर पसारने के बाद चादर की खींचातानी शुरू करता है. आधुनिक सुख-साधन जुटाना, रिसॉर्ट या विदेश में छुट्टियां बिताना हर दंपति की इच्छा होती है. संभव हो, न हो, उसकी कोशिश व चाह तो होती ही है. आज विकल्प के रूप में लोन व क्रेडिट कार्ड की उपलब्धता व बाद में उनकी किश्तें चुकाने का प्रेशर शरीर व मन दोनों को थका डालता है, बिना प्लानिंग के जो फ़ायनेंशियल स्ट्रेस झेलना पड़ता है, वो अंततः व्यक्ति की ज़िंदगी को पूरी तरह से प्रभावित करता है. सेक्स लाइफ़ के प्रति उदासीन कर देता है.

पोर्नोग्राफ़ी का असर

पोर्नोग्राफ़ी (यानी कामवासना संबंधी साहित्य, फ़ोटो, फ़िल्म आदि) के प्रभाव के कारण व्यक्ति सेक्स लाइफ़ फैंटेसी की दुनिया से जुड़ जाता है. उस तरह की इच्छा करने लगता है, जबकि वास्तविकता उससे कहीं दूर होती है. ऐसी फैंटेसी के कारण पार्टनर का सेक्स स्ट्रेस बढ़ने लगता है. वे साथ होकर भी काम-सुख या आनंद से वंचित रह जाते हैं. एक-दूसरे की उम्मीदों पर खरा न उतरने व पूर्ण संतुष्ट न कर पाने का तनाव व अनजाना भय रिश्तों में उदासीनता ले आता है.

मीडिया का रोल

आधी-अधूरी जानकारी व ग़लतफ़हमियां भी स्ट्रेस को बढ़ाती हैं. आज हर मैग़जीन में सेक्स कॉलम को ज़रूरी माना जाता है. कॉलम में सेक्सोलॉजिस्ट द्वारा पाठकों के प्रश्‍नों के उत्तर दिए जाते हैं. लेकिन पढ़ने वाला ये भूल जाता है कि संबंधित लेख या कॉलम में दी गई जानकारी एक सामान्य जानकारी होती है जबकि हर व्यक्ति दूसरे से भिन्न होता है. इसके अलावा इंटरनेट सेक्स, होमोसेक्सुअलिटी आदि भी आम व्यक्ति के मन को भ्रमित करने में ख़ास रोल निभा रहे हैं और सेक्स स्ट्रेस को बढ़ा रहे हैं. इसलिए आज यह बेहद ज़रूरी हो गया है कि कपल्स एक-दूसरे के लिए थोड़ा व़क़्त निकालें. साथ ही उपरोक्त सभी मुद्दों पर एकबारगी विचार-विमर्श भी करें, ताकि सेक्स
स्ट्रेस पनपने ही न पाए और ज़िंदगी ख़ुशनुमा बन जाए.

– प्रसून भार्गव

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करिश्मा कपूर- स्टेटस सिंबल के तौर पर संजय कपूर मुझे इस्तेमाल करना चाहते थे… (Karishma Kapoor- Sanjay Kapoor Wanted To Use Me As A States Symbol…)

करिश्मा कपूर ने अपने पूर्व पति संजय कपूर से अलग होने की वजह बताई, जो बेहद चौंकानेवाली है. उनके अनुसार, संजय उन्हें अपने रौब व स्टेटस सिंबल के तौर पर यूज़ करने की चाहत रखते थे, इसी कारण उन्होंने शादी की. साथ ही उनका कामयाब अभिनेत्री होना भी एक बहुत बड़ी वजह रही.

Karisma Kapoor and Sanjay Kapoor

शादी के शुरुआती दिन ठीक रहे, लेकिन धीरे-धीरे संजय कपूर बात-बेबात करिश्मा से झगड़ते रहते थे. कभी-कभी हाथापाई तक की नौबत आ जाती थी. बकौल करिश्मा दिल्लीवालों पर रौब दिखाने के लिए संजय कपूर उन्हें ट्रॉफी की तरह इस्तेमाल करने की कोशिश करते थे. सफल एक्ट्रेस के साथ शादी करके मैं भी मशहूर और कामयाब हो जाऊंगा… कुछ इस तरह की सोच थी संजय की. यही लालच उन्हें रिश्ते में बांधे हुए थी.

Karisma Kapoor and Sanjay Kapoor

संजय छोटे-मोटे वाद-विवाद, लड़ाई-झगड़े के अलावा करिश्मा कपूर को शारीरिक व मानसिक प्रताड़ना भी ख़ूब देते थे. बात यहां तक बढ़ गई कि करिश्मा ने संजय के ख़िलाफ़ एफआईआर तक दर्ज़ कराई, क्योंकि वे रोज़-रोज़ के लड़ाई-झगड़े व मारपीट से तंग आ गई थीं. उस पर समायरा और कियान दो बच्चों के परवरिश की चिंता भी उन्हें सताने लगी. आख़िरकार उनकी परेशानियों का अंत तलाक़ के रूप में हुआ.

करिश्मा सिंगल पैरेंटिंग की भूमिका निभाते हुए आज अपने दोनों बच्चों की बेहतरीन परवरिश कर रही हैं. लेकिन अतीत को याद करते हुए आज भी दुखी व घबरा-सी जाती हैं. जहां डिवोर्स होने के बाद करिश्मा ने अपने बच्चों को ही अपनी दुनिया बना ली, वहीं संजय कपूर ने प्रिया सचदेव से शादी कर ली.

Karisma Kapoor and Sanjay Kapoor

ग़ौर करनेवाली बात है कि आज भी अधिकतर महिलाएं अपने बच्चों में ही ख़ुशियां और ज़िंदगी का सूकून ढूंढ़ती हैं, वहीं पुरुष वर्ग एक जीवनसाथी के अलग होने पर जल्द दूसरा साथी तलाश ही लेता है. ये उनकी कमज़ोरी कहें या फिर अकेले न रह पाने की लाचारगी… फिर भी अपवाद कई हैं.

Karisma Kapoor and Sanjay Kapoor

 

करिश्मा की शादी साल 2003 में संजय कपूर से हुई थी. अनके मतभेद व कलह के चलते अंततः सालों बाद करिश्मा ने संजय से अलग होने का कड़ा ़फैसला ले ही लिया. अब इतने समय बाद उन्होंने खुलकर अपने अलग होेने के कारण व दर्द को बयां किया है. रिश्ते यूं ही नहीं बिखरते पल-पल मरने व टूटने के बाद ही कितने एहसास को दरकिनार कर दो लोग अपने रास्ते बदलते हैं. वैसे भी स्वार्थ की बुनियाद पर रिश्ते कम ही टिकते हैं.

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पहला अफेयर: लम्हे तुम्हारी याद के (Pahla Affair: Lamhe Teri Yaad Ke)

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पहला अफेयर: लम्हे तुम्हारी याद के (Pahla Affair: Lamhe Teri Yaad Ke)

प्यार, यूं तो इस शब्द से हर शख़्स वाकिफ़ होता है, पर इसका एहसास तो होता है तब, जब किसी का इंतज़ार यूंं ही करते रहना अच्छा लगने लगता है. प्यार का एहसास मुझे इस रूप में होगा, मैंने कभी सोचा भी न था. ज़िंदगी की बीस बहारें यूूं ही गुज़र गईं और इस बहार ने मेरी ज़िंदगी के मायने ही बदल दिए.

हमने घर हाल में ही बदला था. कुछ दूर मोड़ पर जाकर ही उनका घर था. एक संपूर्ण व्यक्तित्व – सुंदर, बोलने में इतनी आत्मीयता कि कोई भी प्रभावित हुए बिना रह न सके. देखते-देखते कब बातें शुरू हुईं और कब एक अजनबी अपनों से बढ़कर मेरे इतने क़रीब आ गया, पता ही नहीं चला.

हर सुबह एक नई उमंग लेके आती और हर शाम नए ख़्वाब. उनके बिना कुछ भी सोच पाना मुमकिन न था. दिल के एक कोने में जीवनसाथी की तस्वीर उनके रूप में परिपूर्ण थी. उनकी आंखों में छिपी चाहत को मैंने कई बार महसूस किया, पर उन्होंने कभी कुछ कहा नहीं. वैसे तो निगाहों की भाषा काफ़ी होती है मोहब्बत के इज़हार के लिए, पर शायद वज़ूद के लिए शब्द भी ज़रूरी हैं, इसलिए शब्दों के सहारे मैंने अपनी इच्छाएं उनके सामने रख दीं. वो सुनते रहे और चुप रहे, पर जब उनका मौन टूटा तो मेरी ज़िंदगी, मेरा वज़ूद सब बिखर कर रह गया.

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‘कृति मैं भी तुमसे बहुत प्यार करता हूं. तुमने मेरी ज़िंदगी को एक नई दिशा दी है, पर एक सच्चाई जिसे मैं तुम्हें खोने के डर से आज तक नहीं बता पाया कि मैं एक शादीशुदा पुरुष हूं. तुम्हारे साथ, तुम्हारे प्यार और अपनेपन ने मुझे अंदर तक छू लिया. मेरी भावनाएं, मेरी इच्छाएं जो अब तक अधूरी थीं, तुमने उन सबको परिपूर्ण किया है. तुम्हारे साथ ने ही मुझे प्यार का एहसास कराया है. तुम ही मेरी ज़िंदगी का पहला प्यार हो, जिसे मैं हमेशा चाहूंगा, पर तुम्हारे इस साथ में मैं अपने यथार्थ को भूल गया था और उससे भाग रहा था. तुम्हें खोने के डर ने मुझे बहुत स्वार्थी बना दिया था, इसलिए चाहकर भी मैं तुम्हें आज तक ये नहीं बता पाया और जाने-अनजाने में तुम्हारी भावनाओं को आहत किया. काश! हमारी ज़िंदगी हमारी सोच की तरह आसान होती और जो हम चाहते, हमें मिल जाता. हो सके तो मुझे माफ़ कर देना…’ इतना कहकर वो चले गए.

सब कुछ रेत की तरह हाथों से निकल गया. उनके इस झूठ ने मेरी ज़िंदगी के मायने ही बदल दिए. सच है पहला प्यार कभी भी भुलाया नहीं जा सकता. सब कुछ जानते हुए आज भी मैं उनसे बेइंतहा मोहब्बत करती हूं और वो लम्हे जो हमने साथ गुज़ारे थे, वो अनमोल पल आज भी मेरी स्मृतियों में यूं ही कायम हैं और हमेशा रहेंगे.

हंसना तो बड़ी शै है, रोने भी नहीं देते
लम्हे तुम्हारी याद के, कुछ ऐसे भी आते हैं

– कृति

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गुम होता प्यार… तकनीकी होते एहसास… (This Is How Technology Is Affecting Our Relationships?)

अभी कुछ दशकों पहले तक हाल यह था कि त्योहारों की आहट सुनाई देते ही घर-परिवार, समाज- हर जगह रौनक़ की झालरें लहराने लगती थीं, ख़ुशी, उमंग और ऊर्जा से भरे चेहरों की चमक व उत्साह यहां-वहां बिखर जाता था. क्या करना है, कहां जाना है, किसे क्या उपहार देने हैं और रसोई में से कितने पकवानों की ख़ुुशबू आनी चाहिए- सबकी सूची बनने लगती थी. महीनों पहले से बाज़ार के चक्कर लगने लगते थे और ख़रीददारी का लंबा सिलसिला  चलता था.

Technology and Relationships

समय बदला, हमारी परंपराओं, संस्कृति और सबसे ज़्यादा हमारी सोच पर तकनीक ने घुसपैठ कर ली. हर समय किसी-न-किसी रूप में तकनीक हमारे साथ रहने लगी और फिर वह हमारी सबसे बड़ी ज़रूरत बन गई. अब आलम यह है कि त्योहारों का आगमन होता है, तो माहौल में चहल-पहल बेशक दिखाई देती है, पर उसमें से उमंगवाला अंश गायब हो गया है और तनावभरा एक शोर यहां-वहां बिखरा सुनाई देता है. दूसरों से बढ़-चढ़कर दिखावा करने की होड़ ने त्योहारों के महत्व को जैसे कम कर दिया है. त्योहार अब या तो अपना स्टेटस दिखाने के लिए, दूसरों पर रौब जमाने के लिए कि देखो हमने कितना ख़र्च किया है, मनाया जाता है या फिर एक परंपरा निभाने के लिए कि बरसों से ऐसा होता आया है, इसलिए मनाना तो पड़ेगा.

फॉरवर्डेड मैसेजेस का दौर

पहले लोग त्योहारों की शुभकामनाएं अपने मित्र-संबंधियों के घर पर स्वयं जाकर देते थे. बाज़ारवाद के कारण पहले तो इसका स्थान बड़े और महंगे ग्रीटिंग कार्ड्स ने लिया, फिर ई-ग्रीटिंग्स ने उनकी जगह ली. ग्रीटिंग कार्ड या पत्र के माध्यम से अपने हाथ से लिखकर जो बधाई संदेश भेजे जाते थे, उसमें एहसास की ख़ुशबू शामिल होती थी, लेकिन उसकी जगह अब फेसबुक और व्हाट्सऐप पर मैसेज भेजे जाने लगे हैं. ये मैसेज भी किसी के द्वारा फॉरवर्ड किए हुए होते हैं, जो आगे फॉरवर्ड कर दिए जाते हैं. कई बार तो बिना पढ़े ही ये मैसेजेस फॉरवर्ड कर दिए जाते हैं. उनमें न तो कोई भावनाएं होती हैं, न ही भेजनेवाले की असली अभिव्यक्ति. ये तो इंटरनेट से लिए मैसेज ही होते हैं. इसी से पता लगाया जा सकता है कि तकनीक कितनी हावी हो गई है हम पर, जिसने संवेदनाओं को ख़त्म कर दिया है.

रिश्तों की गढ़ती नई परिभाषाएं

परस्पर प्रेम और सद्भाव, सामाजिक समरसता, सहभागिता, मिल-जुलकर उत्सव मनाने की ख़ुुशी, भेदभावरहित सामाजिक शिष्टाचार आदि अनेक ख़ूबियों के साथ पहले त्योहार हमारे जीवन को जीवंत बनाते थे और नीरसता या एकरसता को दूर कर स्फूर्ति और उत्साह का संचार करते थे, पर आजकल परिवार के टूटते एकलवाद तथा बाज़ारवाद ने त्योहारों के स्वरूप को केवल बदला नहीं, बल्कि विकृत कर दिया है. सचमुच त्योहारों ने संवेदनशील लोगों के दिलों को भारी टीस पहुंचाना शुरू कर दिया है.

सोशल मीडिया के ज़रूरत से ज़्यादा इस्तेमाल ने जहां हमारी एकाग्रता को भंग किया है, वहीं सामाजिकता की धज्जियां उड़ा दी हैं. फोन कर बधाई देना भी अब जैसे आउटडेटेड हो गया है. बेवजह क्यों किसी को फोन कर डिस्टर्ब किया जाए, इस सोच ने मैसेज करने की प्रवृत्ति को बढ़ाकर सामाजिकता की अवधारणा पर ही प्रहार कर दिया है. लोगों का मिलना-जुलना जो त्योहारों के माध्यम से बढ़ जाता था, उस पर विराम लग गया है. ज़ाहिर है जब सोशल मीडिया बात कहने का ज़रिया बन गया है, तो रिश्तों की संस्कृति भी नए सिरे से परिभाषित हो रही है.

हो गई है सामाजिकता ख़त्म

‘मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है’, यह वाक्य हमें बचपन से रटाया गया, परंतु तकनीक ने शायद अब हमें असामाजिक बना दिया है. सोशल मीडिया के बढ़ते वर्चस्व ने मनुष्य की सामाजिकता को ख़त्म कर दिया है. देखा जाए, तो सोशल मीडिया आज की ज़िंदगी की सबसे बड़ी ज़रूरत बन गया है. व्हाट्सऐप, ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम और न जाने क्या-क्या? स़िर्फ एक टच पर दुनिया के इस हिस्से से उस हिस्से में पहुंचा जा सकता है. देश-दुनिया की दूरियां सिमट गई हैं, लेकिन रिश्तों में दूरियां आ गई हैं.

संवादहीनता और अपनी बात शेयर न करने से आपसी जुड़ाव कम हो गया है और इसका असर त्योहारों पर पड़ा है. माना जाता था कि त्योहारों पर सारे गिले-शिकवे दूर हो जाते थे. एक-दूसरे से गले मिलकर, मिठाई खिलाकर मन की सारी कड़वाहट ख़त्म हो जाती थी. पर अब किसी के घर जाना समय की बर्बादी लगने लगा है, इसलिए बहुत ज़रूरी है तो ऑनलाइन गिफ़्ट ख़रीद कर भेज दिया जाता है.

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Technology and Relationships
रसोई से नहीं उठती ख़ुशबू

आजकल प्रत्येक क्षेत्र में बाज़ारवाद हावी हो रहा है. इस बनावटी माहौल में भावनाएं गौण हो गई हैं. ऑनलाइन संस्कृति ने अपने हाथों से उपहार को सजाकर, उसे स्नेह के धागे से बांधकर और अपनी प्यार की सौग़ात के रूप में अपने हाथों से देने की परंपरा को पीछे धकेल दिया है. बाज़ार में इतने विकल्प मौजूद हैं कि ख़ुद कुछ करने की क्या ज़रूरत है.

एक समय था कि त्योहारों पर घर में न जाने कितने तरह के पकवान बनाए जाते थे. न जाने कितने नाते-रिश्तेदारों के लिए लड्डू, मठरी, नमकपारे, नमकीन, बर्फी, गुलाब जामुन और न जाने कितने डिब्बे पैक होते थे और यह भी तय किया जाता था कि कौन किसके घर जाएगा.

पर एकल परिवारों ने त्योहारों की रौनक़ को अलग ही दिशा दे दी. महंगाई की वजह से त्योहार फ़िज़ूलख़र्ची के दायरे में आ गए हैं. ऐसे में मिठाइयां या अन्य चीज़ें बनाने का कोई औचित्य दिखाई नहीं पड़ता. पहले के दौर में संयुक्त परिवार हुआ करते थे और घर की सारी महिलाएं मिलकर पकवान घर पर ही बना लिया करती थीं. लेकिन अब न लोगों के पास इन सबके लिए व़क्त है और न ही आज की हेल्थ कॉन्शियस पीढ़ी को वह पारंपरिक मिठाइयां पसंद ही आती हैं.

कोई घर पर आ जाता है, तो झट से ऑनलाइन खाना ऑर्डर कर उनकी आवभगत करने की औपचारिकता को पूरा कर लिया जाता है. कौन झंझट करे खाना बनाने का. यह सोच हम पर इसीलिए हावी हो पाई है, क्योंकि तकनीक ने जीवन को आसान बना दिया है. बस फ़ोन पर एक ऐप डाउनलोड करने की ही तो बात है. फिर खाना क्या, गिफ़्ट क्या, घर को सजाने का सामान भी मिल जाएगा और घर आकर लोग आपका हर काम भी कर देंगे. यहां तक कि पूजा भी ऑनलाइन कर सकते हैं. डाक से प्रसाद भी आपके घर पहुंच जाएगा. हो गया फेस्टिवल सेलिब्रेशन- कोई थकान नहीं हुई, कोई तैयारी नहीं करनी पड़ी- तकनीक के एहसास ने मन को झंकृत कर दिया. बाज़ार से आई मिठाइयों ने मुंह का स्वाद बदल दिया और बाज़ारवाद ने उपहारों की व्यवस्था कर रिश्तों को एक साल तक और सहेजकर रख दिया- नहीं हैं इनमें जुड़ाव का कोई अंश तो क्या हुआ, एक मैसेज जगमगाते दीयों का और भेज देंगे और त्योहार मना लेंगे.

– सुमन बाजपेयी

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पहला अफेयर: पहले प्यार की ख़ुशबू (Pahla Affair: Pahle Pyar Ki Khushbu)

Pyaar Ki Kahaniya

पहला अफेयर: पहले प्यार की ख़ुशबू (Pahla Affair: Pahle Pyar Ki Khushbu)

आज भी मेरे हाथों पर तेरे प्यार की मेहंदी का रंग बरक़रार है. वह सिंदूरी शाम. डूबते सूरज की पहली लाली, वो तेरा छत पर पतंग की डोर थाम बार-बार मुझे देख मुस्कुराना….वह मुस्कुराहट आज भी मेरे मन के भीतोें पर रंगीन चित्रों-सी उकरी है. तेरा वो दिलकश क़ातिलाना अंदाज़, बार-बार मुड़कर मुझे निहारना, मुझसे नज़रें मिलाना फिर चुराना सब कुछ याद है मुझे.

याद है तुम्हें, एक दिन अचानक शाम के धुंधलके में तुमने गली के मोड़ पर मेरा हाथ पकड़कर कहा था, ङ्गङ्घशालू मैं तुम्हें तहेदिल से चाहता हूं. मैं तुम्हारे दिल की बात सुनना चाहता हूं.फफ लगा था जैसे गोली की आवाज़ से कई परिंदे पंख फड़फड़ाकर उड़ चले हों. मेरा दिल ज़ोर से धड़क उठा था. मैं सुरमई अंधेरों की गुलाबी खनक में खो-सी गई थी. हाथ छुड़ाकर भागने की कोशिश में मेरी चुन्नी का कोना तुम्हारे हाथ में आ गया था. वही कमबख़्त कोना जैसे तुम्हारी ज़िंदगी का मक़सद बन गया.

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बहुत चाहा तुम्हारा दामन थाम ज़िंदगी का ख़ुशनुमा सफ़र तय करूं, लेकिन क़िस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था- मेरे पिता की असमय दिल के दौरे से मौत ने सब कुछ ख़त्म कर दिया. मैं टूटकर बिखर गई, हमारी मोहब्बत बिखर गई.

पिता ने मरते समय मां से वचन लिया था- मैं उनके बताए लड़के से विवाह करने को मज़बूर कर दी गई. वह एक लम्हा, तुम्हारा मेरा हाथ थामना मेरे लिए क़ातिलाना साबित हुआ. मां की आंखों में तैरती बेबसी की नावें और तुम्हारी आंखों में मोहब्बत का बेइंतहा समंदर मेरे लिए ज़िंदगी कशमकश का दरिया बन गई. तुम्हारी यादों की गहरी खाइयों में मैं गिरती चली गई.

याद है, मैंने तुम्हें ख़त लिखा था, यदि मेरा विवाह अन्यत्र हुआ तो मैं आत्महत्या कर लूंगी. छत पर तुमने जो पुर्जा फेंका था, आज वही मेरे पास तुम्हारी धरोहर है-

मेरी अपनी शालू,
ज़िंदगी जीने का नाम है, वे बुज़दिल होते हैं, जो ज़िंदगी से हार मान मौत को गले लगा लेते हैं. तुम्हें अभी ज़िंदगी की कई बहारें देखनी हैं. प्यार तो कुर्बानी मांगता है. अगर तुम्हें कुछ हो गया तो मैं किसके सहारे जीऊंगा, बोलो.
तुम्हारा पहला प्यार,
पीयूष

हमारे पहले प्यार की ख़ुशबूओं से लबालब वह पुर्ज़ा आज भी मेरे पास तुम्हारी अमानत है, जैसे- वह काग़ज़ का टुकड़ा न होकर छोटा-सा टिमटिमाता जुगनू हो, जो मेरी ज़िंदगी का रहबर बना है. शायद इसी के सहारे ही मैं ज़िंदगी के बीहड़ बियाबान जंगल लताड़ती आगे बढ़ती रही हूं. अब तो मैंने ज़िंदगी की हर मुश्किल से लड़ना सीख लिया है.

कांप उठती हूं मैं ये
सोचकर तनहाई में
मेरे चेहरे पे कहीं
पहला प्यार न
पढ़ ले कोई

– मीरा हिंगोरानी

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इन लव फूड्स से बनाएं अपनी सेक्स लाइफ को और भी स्पाइसी (Spice Up Your Sex Life With These Love Foods)

यूं तो आपने अनेक तरह के फूड के बारे में सुना होगा, जैसे- चाइनीज़ फूड, मुगलई फूड, इटालियन फूड, थाई फूड आदि. लेकिन क्या आपने ‘लव फूड’ (Love Food) के बारे में सुना है? आइए, ऐसे ही कुछ लव रेसिपीज़, लव फ्रूट्स और ड्रिंक्स के बारे में जानें मुंबई की डायटीशियन ममता शर्मा से.

Love Foods

लव रेसिपीज़

अ‍ॅायस्टर ड्रमस्टिक करी: ड्रमस्टिक यानी सहिजन में लव फीलिंग्स को बढ़ाने की ख़ूबियां होती हैं और अ‍ॅायस्टर के साथ ड्रमस्टिक मिलकर रोमांटिक फीलिंग्स को दोगुना कर देती है.

खीर: दूध और ड्राय़फ्रूट्स से बनी इस स्वीट डिश का मीठा टेस्ट मूड को हल्का करता है. ड्राय़फ्रूट्स का ए़फ्रोडिसियक (प्यार की कामना) नेचर दूध के साथ मिलकर लव फीलिंग्स को बढ़ाता है.

हलवा: सूजी या बेसन और ड्रायफ्रूट्स से बनी इस स्वीट डिश से लव हार्मोन रिलीज़ होने में मदद मिलती है और रोमांटिक फीलिंग्स बढ़ती है.

आइस्क्रीम विद नट्स: आइस्क्रीम में मिले नट्स- बादाम, अखरोट आदि रोमांटिक फीलिंग्स को बढ़ाने में सहायक होते हैं.

चीज़ केक विद स्ट्रॉबेरी: स्ट्रॉबेरी को चीज़ केक के साथ मिलाकर भी रोमांटिक फूड के रूप में सर्व किया जाता है.

स्ट्रॉबेरी विद चॅाकलेट: स्ट्रॉबेरी के साथ चॅाकलेट मिलाकर सर्व करना सबसे अधिक रोमांटिक माना जाता है. चॅाकलेट इंसान के मूड को हल्का-फुल्का बनाता है, जबकि स्ट्रॉबेरी उत्तेजना को बढ़ाता है. इसलिए स्ट्रॉबेरी को शैंपेन के साथ सर्व करते हैं. इसे किसी अन्य ड्रिंक के साथ सर्व नहीं किया जाता.

चॅाकलेट: यह इंसान के मूड को जॅाली और फ्रेश करती है. इसलिए इसको ‘मूड चेंजिंग फूड’ भी कहते हैं. इससे व्यक्ति के अंदर रोमांटिक फीलिंग्स बढ़ती है.

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Sex Foods
लव फ्रूट्स

स्ट्रॉबेरी: इसमें विटामिन ‘सी’ होता है, जो एंटी-अ‍ॅाक्सीडेंट का काम करता है. यह एंटी-अ‍ॅाक्सीडेंट शरीर की मांसपेशियों और टिशू के लिए आवश्यक होता है.

केला: केले में पोटैशियम और विटामिन ‘बी’ होता है, जो सेक्सुअल हार्मोन बनाने में मदद करता है.

पपीता: इसमें ऐसे केमिकल होते हैं, जो फीमेल हार्मोन के प्रोडक्शन में मदद करतेे हैं और ये हार्मोन रोमांटिक फीलिंग्स बढ़ाने में सहायक होते हैं.

एवोकेडो: इसके आकार की वजह से इसे लव फूड कहते हैं. इसमें विटामिन ई और बी6 होता है, जो रोमांटिक फीलिंग्स और एनर्जी के लिए ज़रूरी है.

अंजीर: मॅाडेस्टी और सेक्सुअलिटी का प्रतीक है अंजीर. इसमें बहुत अधिक मात्रा में पोषक तत्व होते हैं, जो स्वस्थ शरीर और लव फीलिंग्स के लिए अनिवार्य हैं.

रसबेरी: गुलाब की फैमिली का होने के कारण इसे ‘फ्रूट अ‍ॅाफ़ लव’ भी कहते हैं. इसमें फ़ायबर, विटामिन ‘सी’ और मैग्नीज़ होते हैं, जो शरीर को स्वस्थ रखने और रोमांटिक फीलिंग्स को बढ़ाने के लिए ज़रूरी होते हैं. इसका प्रयोग केक, शेक और आइस्क्रीम में किया जाता है

अनार: इसको फ़र्टिलिटी का प्रतीक मानते हैं. इसका प्रयोग कस्टर्ड और शेक के साथ किया जाता है. इसमें आयरन होता है, जो मेल हार्मोन के लिए अनिवार्य होता है.

लव वेजीटेबल्स

स्वीट पोटैटो: इसमें पोटैशियम होता है, जो महिलाओं में रोमांटिक फीलिंग्स को बढ़ाने में सहायक होता है. इसे ज़्यादा नमक के साथ नहीं खाना चाहिए, क्योंकि नमक पोटैशियम के असर को कम कर देता है.

ड्रायफ्रूट्स

पाइन नट्स: इसको न्यूट्रीशन का ‘पावर हाउस’ कहते हैं, क्योंकि इसकी न्यूट्रीशियस वैल्यू बहुत अधिक होती है. इसका सेवन भी प्यार की भावनाओं को बढ़ाता है.

अखरोट: इसमें आर्जीनीन होता है. यह एक अमीनो एसिड है, जो मेल हार्मोन के प्रोडक्शन में मदद करता है. इसका प्रयोग केक, शेक आदि में किया जाता है.

बादाम: इसमें आयरन, मैग्नीज़ और विटामिन्स होते हैं, जो लव फीलिंग्स को बढ़ाने में सहायक होते हैं.

– अभिषेक शर्मा

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शादीशुदा ज़िंदगी में कैसा हो पैरेंट्स का रोल? (What Role Do Parents Play In Their Childrens Married Life?)

कहते हैं, घर की ख़ुशहाली व आपसी रिश्तों की मज़बूती में पैरेंट्स का आशीर्वाद, सहयोग व प्यार काफ़ी मायने रखता है. लेकिन जब बच्चों की शादीशुदा ज़िंदगी में पैरेंट्स का सहयोगपूर्ण रवैया दख़लअंदाज़ी-सा लगने लगे, तो उनकी भूमिका सोचनीय हो जाती है. ऐसे में क्या करें पैरेंट्स? आइए, जानते हैं.

Childrens Married

आज के बदले माहौल में पति-पत्नी की विचारधारा काफ़ी बदल गई है. शादी के बाद पति-पत्नी अलग घर बसाना चाहते हैं. स्वतंत्रता व आत्मनिर्भरता दोनों ही उनके लिए अहम् हैं. सब कुछ वो ख़ुद ही करना चाहते हैं. लेकिन ऐसे एकल परिवारों में भी समय-असमय पैरेंट्स या बुज़ुर्गों की ज़रूरत आन ही पड़ती है और पैरेंट्स को भी उनकी मदद  करनी पड़ती है, फिर चाहे वो ख़ुशी से हो या कर्त्तव्यबोध के कारण. ऐसी स्थिति आज के पैरेंट्स को दुविधा में डाल रही है. वे समझ नहीं पाते हैं कि आत्मनिर्भर बच्चों की ज़िंदगी में उनका क्या स्थान है? उनकी क्या भूमिका
होनी चाहिए?

अधिकतर पैरेंट्स के लिए बच्चे हमेशा बच्चे ही रहते हैं. उनकी हर संभव मदद करना वे अपना कर्त्तव्य समझते हैं, जबकि अन्य लोगों का मानना है कि जब बच्चे बड़े हो जाते हैं और उनकी शादी हो जाती है, तब पैरेंट्स की ज़िम्मेदारियां ख़त्म हो जाती हैं. बच्चों को अपनी ज़िंदगी ख़ुद संभालनी चाहिए. पैरेंट्स से कोई उम्मीद नहीं रखनी चाहिए.

देखा गया है कि पैरेंट्स को जब विवाहित बच्चों की ज़िंदगी में परेशानियां व असुविधाएं दिखाई देती हैं, तब कभी तो वे तुरंत मदद के लिए हाथ बढ़ा देते हैं और कभी-कभी उन्हें समय व हालात के भरोसे छोड़ अपना हाथ खींच लेते हैं. ख़ासकर तब, जब ज़रूरत आर्थिक मदद की होती है.

काफ़ी समय पहले कोलकाता की एक एज्युकेशन रिसर्च संस्था अल्फा बीटा ओमनी ट्रस्ट द्वारा एक सर्वे किया गया था, जिसमें लगभग 200 पैरेंट्स से बातचीत की गई थी. 150 से भी ज़्यादा पैरेंट्स का कहना था- यदि संभव हो और सहूलियत हो, तो हर प्रकार की मदद की जानी चाहिए, क्योंकि बच्चे तो हमेशा ही हमारे लिए बच्चे रहेंगे. साथ ही उनका मानना था कि शादीशुदा ज़िंदगी का शुरुआती दौर कई बार मुश्किलों व असंतुलन से भरा होता है. कई प्रकार के पारिवारिक व भावनात्मक एडजस्टमेंट करने पड़ते हैं. कभी-कभी अनचाहे आर्थिक संकट भी ज़िंदगी को कठिन बना देते हैं. ऐसे में आर्थिक सहायता से ज़िंदगी आसान व ख़ुशहाल हो सकती है. दूसरे मत के अनुसार, शादी तभी की जानी चाहिए, जब व्यक्ति शादी के बाद आनेवाली हर परिस्थिति का मुक़ाबला करने के लिए तैयार हो, आर्थिक रूप से सुरक्षित व ठोस हो. बच्चों को पढ़ाना-लिखाना, ज़िम्मेदारियों के लिए तैयार करना पैरेंट्स की ज़िम्मेदारी है. उसके बाद पैरेंट्स की ज़िम्मेदारी ख़त्म. फिर तो बच्चों की ज़िम्मेदारी बनती है कि वो पैरेंट्स की देखभाल करें.

समाजशास्त्री डॉ. कामेश्‍वर भागवत का मानना है कि पैरेंट्स हमेशा ही पैरेंट्स रहते हैं. अपने बच्चों की ज़िंदगी में हमेशा ही उनकी भूमिका बनी रहती है. कभी मुख्य, तो कभी सहयोगी के तौर पर. इसलिए न तो पूरी तरह इनसे अलग हों और न ही रोज़मर्रा की हर बात में अपनी राय दें. यानी रास्ता बीच का होना चाहिए. वैसे भी भारतीय परिवार एक कड़ी की तरह जुड़े रहते हैं, एक तरफ़ हम अपने बच्चों की ज़िम्मेदारियां पूरी करते हैं, तो दूसरी तरफ़ पैरेंट्स के साथ जुड़े रहकर उनके प्रति दायित्व निभाते हैं. दरअसल शेयरिंग व केयरिंग की भावना ही परिवार है. पैरेंट्स का रोल कभी ख़त्म नहीं होता है, बस उनका स्वरूप बदल जाता है. आर्थिक योगदान के अलावा भी विवाहित बच्चों के जीवन में पैरेंट्स की एक सुखद भूमिका हो सकती है.

–    पति-पत्नी यदि अकेले व समर्थ हैं, तो भी उन्हें अपने पैरेंट्स के भावनात्मक सहयोग, उनके प्यार व आशीर्वाद की ज़रूरत होती है.

–    पति-पत्नी दोनों वर्किंग हैं, तो बच्चे की सुरक्षा व देखभाल की ज़िम्मेदारी लेकर आप उन्हें चिंतामुक्त कर सकते हैं. पैरेंट्स की मदद से वे लोग अपना काम बेहतर तरी़के से कर सकेंगे.

–   तकलीफ़ या बीमारी के दौरान आपका समय व अनुभव उनके लिए किसी वरदान से कम न होगा.

–   तनाव व संघर्ष के दौरान आपका भावनात्मक सहयोग व ज़िंदगी के अनुभव उन्हें संबल व हौसला प्रदान कर सकते हैं.

–   बच्चों को स्कूल से लाना व छोड़ना प्रायः ग्रैंड पैरेंट्स को भी अच्छा लगता है और ग्रैंड चिल्ड्रेन भी दादा-दादी का साथ एंजॉय करते हैं.

–   बच्चों में आध्यात्मिक व नैतिक गुणों तथा शिक्षा की शुरुआत भी ग्रैंड पैरेंट्स द्वारा बेहतर रूप से होती है.

–   आज अकेला बच्चा हर समय टीवी, कंप्यूटर, प्ले स्टेशन जैसे गैजेट्स से चिपका रहता है, ऐसे में आपका साथ व मार्गदर्शन  उसे समय का बेहतर उपयोग करना सिखा सकता है.

–    बच्चे जिज्ञासु होते हैं, उनकी जिज्ञासा ग्रैंड पैरेंट्स बहुत अच्छी तरह से शांत कर सकते हैं.

–    इन बातों के अलावा आपके विवाहित बच्चों की और भी अनेक व्यक्तिगत समस्याएं व ज़रूरतें हो सकती हैं, जिनका समाधान आपकी सहयोगी भूमिका से हो सकता है और बच्चों की विवाहित ज़िंदगी ख़ुशहाल हो सकती है.

–    आर्थिक सहायता निश्‍चय ही जटिल व निजी मामला है. इससे हालात सुधर भी सकते हैं और पैरेंट्स बुढ़ापे में स्वयं को सुरक्षित भी कर सकते हैं.

याद रखें, बच्चे आपके ही हैं, फिर भी पराए हो चुके हैं. एक नए बंधन में बंध चुके हैं. एक नई दुनिया बसा रहे हैं. तो बस, पास रहकर भी दूर रहें और दूर रहकर भी अपने स्पर्श का एहसास उन्हें कराते रहें.

आपकी सहयोगी भूमिका आपके शादीशुदा बच्चों को कैसी लग रही है, यह जानने के लिए इन बातों पर ध्यान दें-

–    क्या बच्चे आपकी मदद से ख़ुश हैं? आपकी भूमिका को सराहते हैं? आपके प्रति आभार व्यक्त करते हैं? यदि नहीं, तो आप मदद नहीं दख़ल दे रहे हैं.

–     अब आपके बच्चे अकेले नहीं हैं, उनकी ज़िंदगी उनके जीवनसाथी के साथ जुड़ी है. क्या उनके साथी को भी आपका रोल पसंद है? यदि नहीं, तो एक दूरी बनाना बेहतर होगा.

–     मदद के दौरान क्या आपको ऐसा महसूस होता है कि आपका फ़ायदा उठाया जा रहा है या आपको इस्तेमाल किया जा रहा है? ऐसी स्थिति कुंठा को जन्म देती है.

–     मदद के दौरान होनेवाला आपका ख़र्च आपको परेशानी में तो नहीं डाल रहा है? यदि ऐसा है तो हाथ रोक लें, वरना पछतावा होगा.

–     उनकी व्यस्तता को कम करने के लिए, उनकी ज़िंदगी को ख़ुशहाल बनाने के लिए अपनी ज़िंदगी को जीना न छोड़ें. अपनी दिनचर्या, अपनी हॉबीज़ पर भी ध्यान दें.

–     बिना मांगे, आगे बढ़कर ख़ुद को ऑफ़र न करें, न ही उनकी ज़िंदगी में दख़लअंदाज़ी करें, वरना रिश्ते बिगड़ सकते हैं, आपके साथ भी और आपस में उनके भी.

–     हर व़क़्त उनकी ज़िंदगी में झांकने की कोशिश न करें. जब वो शेयर करना चाहें, तो खुले मन से आत्मीयता बरतें.

–     अपनी चिंताओं व कुंठाओं का रोना भी हर व़क़्त उनके सामने न रोएं. चाहे वो स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां हों या पारिवारिक रिश्तों की कड़वाहट.

–     बदलते समय के साथ अपने व्यवहार व सोच में परिवर्तन लाएं, ताकि बच्चे आपसे खुलकर बात कर सकें.

 

– प्रसून भार्गव

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