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लघुकथा- व्यथा… (Short Story- Vyatha)

"सच है, इन इंसानों ने तो नाक में दम कर रखा है. मुझमें भी दुनियाभर की ऐसी गंदगी डालते हैं कि पूछो मत. ख़ुद से ही घिन आने लगी है अब तो. ऊपर से..."

हांफती, खांसती हवा आकर जल के किनारे पसर गई.

"क्या बात है बहन बहुत थकी हुई लग रही हो." जल ने स्नेह से पूछा.

"क्या करूं भाई इन इंसानों ने तो जीना दुश्वार कर दिया है. इतना विषैला धुआं, वाहनों, फैक्ट्रियों और न जाने कितनी दुर्गंध... अब तो इतना बोझा लेकर चला भी नहीं जाता." हवा थकी सी आवाज़ में बोली.

"सच है, इन इंसानों ने तो नाक में दम कर रखा है. मुझमें भी दुनियाभर की ऐसी गंदगी डालते हैं कि पूछो मत. ख़ुद से ही घिन आने लगी है अब तो. ऊपर से..." अपने भीतर बीमार और मरे जीव जंतुओं को देखते हुए जल भी दुखी स्वर में बोला.

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"और मेरा तो हाल ही मत पूछो. कहीं डामर, कंक्रीट से छाप दिया तो कहीं लोहे के सरिए मेरे बदन में उतार दिए. ऊपर से हर थोड़ी दूरी पर कचरे का ढेर. पॉलीथिन से मेरी उपजाऊ क्षमता भी ख़त्म करके ख़ूब ज़हर फैलाते जा रहे हैं मुझमें." धरती कराही.

"तब भी तुम तीनों तो कभी तूफ़ान बनकर, कभी बवंडर के रूप में, कभी भूस्खलन करके कुछ तो सबक सिखा ही देते हो इंसानों को. मैं जो तुम तीनों को स्वच्छ रखता हूं, जल को बरसात के रूप में, हवा का प्रदूषण साफ़ करता हूं, मिट्टी की जड़ें बांधकर उसे बचाता हूं मौसम को संतुलित रखता हूं और बदले में इंसान मुझे देता है कुल्हाड़ी..."

बूढ़े पेड़ की व्यथा पर बाकी सबकी भी आंखें भर आईं.

- विनीता राहुरीकर

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Photo Courtesy: Freepik

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