जब भी मेरा करवा चौथ का व्रत होता, बचपन के कई दोस्तों की याद मन में ताज़ा हो जाती और सबसे ज़्यादा याद आती सुमी की. जब मैं छलनी में चांद देखती और फिर पति का चेहरा देखती, तब सुमी की छवि आंखों के सामने आ जाती. सुमी धार्मिक आस्था में घुली-मिली बेहद सरल, भावुक और स्नेहिल लड़की थी. मुझे उसकी भावुकता, उसकी धार्मिक आस्था से चिढ़ थी. पर धीरे-धीरे मैं भी उसी की तरह आस्थाओं की पुजारिन बन बैठी थी.
सुमी मेरी सबसे प्रिय सहेली थी. हमदर्द थी, राज़दार थी, इसलिए उसके कुछ ऐसे राज़ मुझे मालूम थे, जो कोई और नहीं जानता था.
बचपन में हमने सुमी का ब्याह रचाया था, कृपाल के साथ. कृपाल को छोड़कर और कोई हमारी नज़र में सुमी के लिए आदर्श लड़का दिखाई नहीं दे रहा था. कृपाल सिख था इसलिए माथे के बीचोंबीच बालों को कसकर उस पर रूमाल बांध लेता. अगर सुमी की कृपाल के साथ ब्याह रचाने में ऐतराज़ था तो इसी चुटिए की वजह से. पर इसका भी हल था असलम के पास. उसने एक टोपी पहनाकर सुमी को मना लिया था कृपाल के लिए. रत्ना, अनूप, माला, सुरेश, प्रीतम और मैं साक्षी थे. इस शादी के वक़्त पर कृपाल ने ख़ूब नखरा किया था. बोला था, "मैं नहीं करूंगा इस सुमी से शादी, खेल-खेल में ही हो, पर है तो शादी ना. फिर इसी को पत्नी मानना पड़ेगा. ना बाबा ना मुझे नहीं बनना दूल्हा."
"तो मत बन. तू नहीं बनेगा तो क्या कोई और नहीं बनेगा मेरा दूल्हा." सुमी भी चिढ़ गई थी. पर हमने उनकी बातों पर ध्यान नहीं दिया. रत्ना के बगीचे से ढेर सारे फूल तोड़कर मैंने और अमित ने हार बना लिए थे. सूखी लकड़ियों को इकट्ठा कर आग जलाने का बंदोबस्त कर लिया था. माला अपनी दीदी की साड़ी उठा लाई थी और मां के ब्लाउज़ को अंदर से सिलकर उसे सुमी के लायक बना लिया था.
सभी अपने-अपने घर से खाने का सामान और नकली गहने ले आए थे. सुरेश को पंडित की भूमिका अदा करनी थी इसलिए अंट-शंट मंत्र जपने की उसकी प्रैक्टिस अलग चालू थी.
शादी शुरू हुई. मंत्र पढ़े गए, हार पहनाए गए और अग्नि के सात फेरे लिए गए. सब कुछ वैसा ही हुआ जैसा हम चाहते थे. उसके बाद की धमाल आज भी मन में ताज़ा है. असलम ने खाना पकाया था. दाल, भात, आलू की सूखी सब्ज़ी, पूरियां, पर बेचारा असलम अनाड़ी था, इसलिए सब्ज़ी में नमक डालना भूल गया था. वैसे ग़लती असलम की नहीं थो, हम सब सामान ले आए थे, पर नमक लाना याद ही नहीं रहा. बिना नमक के सभी मुंह बना-बनाकर खाना खा रहे थे.
यह घटना हफ़्तों हमारे हंसने का कारण बनी रही. कृपाल हमेशा सुमी को चिढ़ाता रहता, हम सबसे कहता, "देख लेना, जब अपनी दुल्हन का गौना करूंगा, तुम सबको शानदार दावत दूंगा." और सुमी शरमा जाती.
धीरे-धीरे जब बचपन से नाता टूटने लगा तो अमित, सुरेश, कृपाल और असलम हमारे दोस्त न रहे. बस कभी मिल जाते तो हल्की सी मुस्कान से हम एक दूसरे को अपनी पहचान की याद दिला देते. ढंग से उठने-बैठने और चलने की शिक्षा के साथ खेलने-कूदने और आवारागर्दी करते हुए रास्ते पर चहलकदमी करती हमारी मज़ेदार शामों पर पाबंदी लग गई.
अब हमारी दुनिया सिमटकर छोटी हो गई. सुमी और मैं अपनी दोस्ती को कायम रखे हुए थे. हमारे लिए रिश्ते आने लगे थे. मैं अपनी शादी के सुनहरे सपनों में खोई रहती, पर सुमी मेरी रंगीनियों में डूबी बातों में न रुचि विखाती, न उत्साह से भाग लेती. न मेरी तरह सुमी अपने सपने में आने वाले राजकुमार का ज़िक्र करती. न आने वाले दिनों की याद में रोमांचित होती. कभी-कभी मुझे सुमी का चुप रहना खल जाता, पर धीरे-धीरे मैं महसूस करने लगी कि सुमी बदल गई थी.
एक बार सुमी के लिए एक रिश्ता आया. लड़का अच्छे खानदान का था और अच्छे पद पर काम करता था. लड़के वाले देखने आए तो सुमी ने मुझे बुलवा भेजा और मुझे देखते ही गले से लगकर रो पड़ी. बोली, "तृप्ति, मैं यह शादी नहीं कर सकती. मेरी शादी तो तुम लोगों ने करवा दी थी कृपाल के साथ, याद है ना." मैं भौंचक्की सी खड़ी रह गई.
"यह तू क्या कह रही है सुमी! वो तो एक खेल था. कृपाल पंजाबी है. तुम दोनों की भाषा और संस्कृति में फ़र्क़ है. देख सुमी, बचपन की बात को दिल में रखकर बैठने और ऐसे रोने से कुछ नहीं होगा. ये लड़के वाले आए हैं, तो जाकर मुंह दिखा आ. बाद में देखेंगे." मैंने समझाया लो बेचारी मान गई.
पर उस बदक़िस्मत को लड़के वालों ने देखते ही पसंद कर लिया और दूसरे ही हफ़्ते में जवाब भी आ गया. सुमी उन्हें पसंद आ गई थी और जल्दी ही सगाई करना चाहते थे. सुमी अब और चुप रहने लगी. घंटों एकांत में बैठी रहती. सुमी की मां मुझसे पूछतीं, "क्या बात है तृप्ति बेटी. तू तो उसकी सखी है. तुमसे तो कुछ कहा ही होगा, क्या लड़का उसे पसंद नहीं?"
"नहीं चाची... ऐसी कोई बात नहीं. शायद शादी से डरती होगी." मैं बिना सोचे-समझे ही जवाब दे देती.
"पगली है मेरी बिटिया भी..." चाची संतुष्ट होकर हंस देती.
सुमी की हालत के लिए मैं कई बार अपने सभी दोस्तों को और स्वर्य को भी दोषी मानती. न हम पर वह शादी करवाने का भूत चढ़ता, न सुमी की यह हालत होती. सुमी की हालत देखकर मैं अंदर-अंदर घुटने लगी थी. एक दिन मैंने उससे पूछा, "सुमी, क्या तू चाहती है कि मैं कृपाल से इस बारे में बात करूं. पता तो चले कि आख़िर उसके मन में तेरे लिए कुछ है भी या नहीं. हो सकता है वो इस बात को..."
"पूछने की ज़रूरत नहीं तृप्ति, वो भी मुझे..." मेरी बात बीच में ही काटती हुई सुमी बोली और मेरे कंधे से लगकर सिसक पड़ी. उसने एक चिट्ठी ब्लाउज़ से निकालकर मुझे थमा दी. मेरा चौंकना स्वाभाविक था. कृपाल का प्रेम पत्र था. ढेर सारी अपने जज़्बात और प्रणय निवेदन के साथ कृपाल ने लिखा था कि उससे यह वियोग सहन नहीं होता.
"यह पत्र लिखना कब से चल रहा है." मैंने सवाल किया,
"बहुत दिनों से..." सुमी ने घुटने में मुंह छुपाते हुए वो टूक जवाब दिया.
उस रात मैं सो न सकी, रह-रहकर बचपन के खेल की घटना याद आ जाती. हम सभी ने उस दिन बिल्कुल एक शादी सा मज़ा लूटा था. मैं भी पता नहीं कितनी बार उस घटना को याद करती रहती हूं, फिर सुमी और कृपाल का इस घटना से इस तरह जुड़े रहना आश्चर्य तो नहीं. मैंने निर्णय लिया कि सवेरे कृपाल से ज़रूर मिलूंगी.
कृपाल से मिलने उसके दफ़्तर जाना मुझे अधिक उचित लगा, क्योंकि घर में जाने से उसकी मां से बात करने के बाद इतने समय का मिलना संभव भी नहीं था कि कृपाल से कुछ बोल सकू.
कृपाल काफ़ी बदल गया था. रौबदार चेहरे पर बढ़ी हुई दाढ़ी और उम्र के साथ आई गंभीरता ने उसे अधिक आकर्षक बना दिया था. चेहरे पर वहीं पहले सी प्यारी मुस्कान थी. बचपन की दोस्ती को याद करता हुआ बोला, "कभी सोचा भी नहीं था कि तुम इस तरह मिलने आओगी."
"हां कृपाल, दरअसल मैं सुमी के बारे में..." मैं संकोचवश पूरी बात न कर सकी.
"सुमी को क्या हुआ..." सुमी का नाम लेते ही ढेर सारा स्नेह स्पष्ट झलक आया कृपाल के चेहरे पर.
"कृपाल... वो तुम्हें चाहती है और बचपन की शादी को अब तक भूल नहीं पाई है, जो सिर्फ़ एक खेल था और कुछ नहीं."
"नहीं तृप्ति. वो तुम सबके लिए शायद एक खेल रहा हो, पर हम दोनों ने उस घटना को अपने जीवन की एक महत्वपूर्ण घटना की तरह स्वीकारा है."
"पर, कृपाल..." मैंने अपने एक-एक शब्द पर ज़ोर देते हुए उसे समझाने का प्रयास किया, "मंत्र पढ़ने वाला तो सुरेश ही था ना... वो कोई पुजारी तो नहीं."
"हां तृप्ति, सुरेश तो पुजारी नहीं.. न ही सुमी उस दिन से मेरी ज़िंदगी बन जाएगी... पर उस घटना के बाद मैंने जब भी सुमी की तरफ़ देखा, वो मुझे एकदम अपनी लगी."
"पर कृपाल अब क्या होगा, सुमी की तो अगले हफ़्ते सगाई है."
"नहीं..." वह इस तरह बोला, जैसे अपनी प्रिय वस्तु खो जाने की कल्पना मात्र से घबरा गया हो.
हम दोनों ने ख़ूब सोचा, मेरे ख़्याल से सुमी से कृपाल का विवाह असंभव था, पर कृपाल का नज़रिया दूसरा था. उसने फ़ैसला सुनाया कि वह सुमी के पिता से मिलकर सुमी का हाथ मांगेगा. कृपाल गया भी, पर वहां उसे सिवाय अपमान के कुछ नहीं मिला. सुमी के पिता ने उसे धक्के देकर घर से निकाला था. कृपाल के घरवालों ने भी कृपाल को ही कोसा था कि क्यों गया था वहां अपनी नाक कटवाने.
सुमी ख़ूब रोती रहती. वह अपने आपको कमरे में बंद कर रोया करती. मुझे सुमी से ज़्यादा कृपाल से हमदर्दी थी. सुमी की सगाई कृपाल नहीं रोक सका था और न ही सुमी अपने घरेलू संस्कारों को तोड़ पाई.
सुमी शादी के पहले एक बार कृपाल को देखना चाहती थी, पर ब्याह हुआ, तब भी कृपाल नहीं आया. विदाई के समय भी सुमी अपनी बेबस निगाहों से कृपाल को तलाशती रही. मैंने उसे समझाया था, "चिंता मत कर सुमी, इस नई ज़िंदगी को शुरू करते ही तू कृपाल को भूल जाएगी." मेरी बात पर वह एक अजीब सी नज़रों से मुझे देखती रही, जैसे मैंने उसे समझने में कोई भूल की है.
सुमी की शादी के बाद मुझे ही सबसे ज़्यादा अकेलापन लगता. जब भी सुमी की याद आती, कृपाल भी याद आता. मेरी भी शादी हुई तो सुमी की याद में थोड़ी सी कमी ज़रूर आ गई थी, पर जब भी सुमी याद आती, मन बेचैन हो जाता. नए शहर में मेरी ज़िंदगी शांति और चैन से कट रही थी. पति भी इतना स्नेह देने वाले मिले कि सारी कमी पूरी हो गई, अपनी नन्हीं सी बेटी के साथ तीन वर्ष बाद जब मायके गई तो पता चला कि सुमी भी आई है. ख़ुशी की सीमा न रही. सालों बाद सुमी से मिलने के उत्साह में शाम तक का समय बड़ी मुश्किल से कटा. इससे पहले कि मैं सुमी के घर जाऊं, वही मेरे घर आ गई. हम दोनों एक दूसरे से लिपट गए. सुमी काफ़ी स्वस्थ और प्रसन्न नज़र जा रही थी. अपनी भी बताती रही, मेरी बातें भी सुनती रही और अचानक मेरा ध्यान सुमी के दाहिनी बांह के नीचे गया. जहां की चमड़ी कुछ सिकुड़ी और काली सी लगी.
"अरे... यह क्या..." मैंने आश्चर्य से पूछा था.
कुछ देर सुमी चुपचाप उस निशान को देखती रही फिर बोली, "तृप्ति... प्रेम में पागल होकर मैंने इस बांह पर कृपाल का नाम गुदाया था. उस समय लगा था कि यहां कोई नहीं देख सकेगा, पर पतिदेव ने इस नाम की देख लिया और मुझे विवश किया कि मैं उस नाम को जला दूं."
"और... तूने जला भी दिया..."
"नहीं जला सकी तृप्ति! जलती लकड़ी से बनाकर भी उस नाम को नष्ट न कर सकी. सिर्फ़ उसे छिपा लिया मैंने और ऐसे छिपा लिया कि कोई न देख सके..." कहकर उसने सिर झुका लिया.
मैं स्तब्ध रह गई, "तो क्या सुमी तुम अब भी कृपाल को भूल नहीं पाई."
मैंने देखा सुमी की मांग में सिंदूर चमक रहा था और आंखों में आंसू भर आए थे. सिंदूर पति के लिए था और आंसू कृपाल के लिए. कितना अजीब सा सामंजस्य था. मैं अपलक सुमी को ताकती रह गई. मासूम और प्यारी सी सुमी अचानक उठकर चलने लगी.
"अरे कहां चल दी..." मैंने उसे रोक लिया, "चल घर, कुछ खा लेना फिर जाना."
"नहीं री, याद नहीं आज करवा चौथ है. तेरा भी तो होगा."
"नहीं..." मैंने कहा.
"अरे कैसी हिंदू स्त्री है तू." यह हंस दी. उस हंसी में एक व्यंग्य था, जो मुझे अंदर तक भेद गया.
पर मैं सोचती रही कि सुमी करवा चौथ का व्रत तो करती थी, पर किसके लिए? सिर्फ़ अपने पति के लिए या कृपाल के लिए भी, जिसे उसने पति तुल्य ही माना था. कई बार सोचती सुमी से पूछु, पर पूछने का साहस न कर सकी.
गांव से ससुराल वापस जाने के पहले मैं सुमी से मिलने उसके घर गई, तो बीती बातों के बाद अंत में उसने कहा था, "तृप्ति, तुझे भी यह व्रत करना चाहिए."
और तभी से मैंने यह व्रत करना शुरू कर दिया.
हर साल व्रत के रोज़ सुमी बहुत याद आती और जब भी सिर पर पगड़ी बांध कोई सिख पुरुष आंखों के सामने से गुज़रता, कृपाल का चेहरा याद आ जाता और यह सोचकर पलकें गीली हो जातीं कि क्या सुमी का करवा चौथ का व्रत कृपाल को सुखी रख पाएगा?
- निर्मला सुरेंद्रन
