पैरेंट्स के लिए बच्चों की परवरिश करना तब और भी आसान हो जाता है. जब वे बच्चों के फ्रेंड बनते हैं. लेकिन बेस्ट फ्रेंड नहीं, क्योंकि बेस्ट फ्रेंड अपने दोस्त को उसी तरह अपनाता है, जैसा कि वो है, जबकि बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए पैरेंट्स को कई बार सख़्ती भी करनी पड़ती है.
बदलते समय के साथ पैरेंटिंग और भी चुनौतीपूर्ण होती जा रही है. बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए ज़रूरी है कि पैरेंट्स अपने बच्चों के साथ दोस्ती वाला रिश्ता कायम करें, तभी बच्चे भी पैरेंट्स के करीब आएंगे, उनसे अपने जीवन की हर
छोटी-बड़ी बात शेयर करेंगे. दूसरी तरफ़ बच्चों के जीवन में क्या चल रहा है, पैरेंट्स को इस बात का पता चलता रहेगा, इसलिए पैरेंट्स बच्चों के फ्रेंड बनें, बेस्ट फ्रेंड नहीं.
एक्सपर्ट्स की राय

बच्चों के फ्रेंड बनें, बेस्ट फ्रेंड नहीं
समय जिस तेज़ी से बदल रहा है, उसे देखते हुए अधिकतर पैरेंटिंग काउंसलर्स और साइकोलॉजिस्ट का यही मानना है कि पैरेंट्स बच्चों के फ्रेंड बनें, न कि बेस्ट फ्रेंड, क्योंकि बेस्ट फ्रेंड का मतलब है कि आपका दोस्त जिस भी हाल में है जैसा भी है,
आप उसे वैसे ही स्वीकार कर रहे हैं. आप उसकी नजरों में हमेशा अच्छा रहना चाहते हैं. लेकिन पैरेंट्स को अपनी पैरेंटिंग और बच्चों के बीच में बैलेंस बैठना आना चाहिए. जब बच्चों को पैरेंट्स की ज़रूरत हो, तो पैरेंट्स उनका मार्गदर्शन करें और जब बच्चों को एक दोस्त की आवश्यकता हो, तो पैरेंट्स दोस्त बनकर उनका साथ दें. यहां पर एक अहम बात बता दें कि पैरेंट्स हमेशा बच्चों के दोस्त बनकर नहीं रह सकते हैं.
लड़का और लड़की के बीच भेदभाव न करें
जैसे-जैसे समय बदल रहा है, समाज में यह सोच विकसित हो रही है कि लड़का हो या लड़की, दोनों की पैरेंटिंग एक समान होनी चाहिए. पैरेंट्स को बेटा और बेटी में भेदभाव नहीं करना चाहिए. बावजूद इसके कुछ पैरेंट्स ऐसा करते हैं. लड़कियों
को पढ़ाई की जगह घर का काम सिखाने में लगा देते हैं और लड़कों को पढ़ने- लिखने और खेल-कूद में. बचपन से ही उन्हें ज़िम्मेदारी से मुक्त रखा जाता है, जो कि सही नहीं है. बेटा हो या बेटी, दोनों को घर और बाहर का काम सिखाना
पैरेंट्स की ज़िम्मेदारी है. यदि लड़की को घर का काम सिखा रहे हैं, तो लड़कों को भी कुकिंग, कपड़े धोना, अपना कमरा साफ करना, प्लांटिंग और ग्रॉसरी शॉपिंग सिखाना चाहिए. कुछ पैरेंट्स ऐसे भी हैं, जो लड़कियों की परवरिश लड़कों की तरह करते हैं. लेकिन ज़रूरी है कि लड़कों को भी लड़कियों की तरह बड़ा करें. जिस दिन पैरेंट्स इस सोच के साथ लड़के और लड़की की परवरिश करेंगे, उसी दिन समाज से लड़का और लड़की के बीच का भेदभाव ख़त्म होगा.

लड़कों की परवरिश पर अधिक ध्यान देना ज़रूरी है
पैरेंटिंग काउंसलर्स और चाइल्ड साइकोलोजिस्ट का मानना है कि भारतीय समाज में पैरेंट्स लड़कों की बजाय लड़कियों पर अधिक नज़र रखते हैं. इस डर से कि कहीं लड़कियों के साथ कुछ ऊंच-नीच न हो जाए. लेकिन पैरेंट्स की जानकारी के लिए बता दें कि लड़कियों की अपेक्षा लड़कों की परवरिश करना ज़्यादा मुश्किल होता है. हमारे समाज की सोच है कि पुरुष स्ट्रॉन्ग होता है… उसकी आंखों में आंसू अच्छे नहीं लगते हैं… मर्द को दर्द नहीं होता है.. बार-बार इस तरह की बातें सुनकर लड़के अपनी फीलिंग को एक्सप्रेस करना छोड़ देते हैं और अपने इमोशंस को दबाना शुरू कर देते हैं. कुछ लड़कों में टेस्टोस्टेरोन हार्मोन का लेवल ज़्यादा होता है, जिसकी वजह से वे बहुत गुस्सैल होते हैं. इसलिए ज़रूरी है कि पैरेंट्स को बेटी की बजाय अपने बेटे की परवरिश पर अधिक फोकस करना चाहिए.
बेटों को सिखाएं ये बातें
- लड़कियों की इज्ज़त करना
- एंगर मैनेजमेंट.
- अपनी फीलिंग को एक्सप्रेस करना, ताकि वह अपने दिल की बात बता सकें.
- हर चीज़ पर अपना हक़ जमाने की बजाय उनमें दया का भाव पैदा करें.
- उन्हें लड़कियों की तरह केयरिंग और ज़िम्मेदार बनाएं.
बेटियों को बनाएं आत्मनिर्भर
लड़कियों में ऐसे हॉर्मोन्स होते हैं, जो उन्हें भावनात्मक रूप से कमज़ोर और इमोशनल बनाते हैं. यही वजह है कि बेटियां पिता की बजाय अपनी मां के ज़्यादा करीब होती हैं. हर मां की ज़िम्मेदारी बनती है कि अपनी बेटी की परवरिश इस तरह से करें कि वो कॉन्फिडेंट और इंडिपेंडेंट बने, न कि इनसिक्योर. इसके पीछे कारण यह है कि लड़कों की तुलना में लड़कियों के मूड स्विंग अधिक होते हैं. इसलिए उन्हें मूड स्विंग मैनेजमेंट और इमोशंस पर कंट्रोल कैसे किया जाए, ये
सीखना बहुत ज़रूरी है.
पैरेंट्स रखें इन बातों का ध्यान
बच्चों को अपने कंट्रोल न रखें अधिकतर पैरेंट्स की ये आदत होती है कि वे बच्चों को अपने कंट्रोल में रखना
चाहते हैं, जो कि सही नहीं है. पैरेंट्स को चाहिए कि वे अपने बच्चों को एडल्ट की तरह ट्रीट करें. उनके साथ तमीज़ से पेश आएं, क्योंकि बच्चों की भी अपनी एक पर्सनैलिटी होती है. उनका सोचने का तरीका, पसंद-नापसंद, रुचि, शौक़ सब अलग
होते हैं. अपने नियंत्रण में रखने की बजाय कुछ बातों के लिए उन्हें फ्री छोड़ दें. अपने निर्णय उन पर न थोपें.
- बच्चों को अपने कंट्रोल में रखने की बजाय उनके साथ बैठकर मूवी देखें. गेम्स खेलें. दोनों मिलकर अपने विचार एक-दूसरे से शेयर करें, एक-दूसरे के बारे में जानें. तभी बच्चों और पैरेंट्स की सोच-समझ एक-दूसरे के लिए विकसित होगी
और दोनों एक-दूसरे के अच्छे दोस्त बन पाएंगे. - बच्चों की ग़लतियों पर डांटें या चिल्लाएं नहीं, उन्हें समझाएं
- बात-बात पर बच्चे की ग़लती निकालने और उस पर चीखने-चिल्लाने की बजाय उसको प्यार से अकेले में समझाएं. उससे बात करें. जब पैरेंट्स बार-बार ऐसा करते हैं, तो बच्चा भी पैरेंट्स की बात को ध्यान में रखता है और कोशिश करता है कि
वह अगली बार उन ग़लतियों को न दोहराएं. यहां पर पैरेंट्स की ज़िम्मेदारी बनती है कि बच्चों पर नज़र रखें, ताकि वह फिर से पिछली ग़लतियों से सीखें. - बच्चों से लगातार बातें करें. पैरेंट्स की ज़िम्मेदारी बनती है कि वे चाहे कितना भी व्यस्त क्यों न रहें, बच्चों के लिए समय निकालें, उनके साथ बैठकर ढेर सारी बातें करें. तभी बच्चे भी धीरे-धीरे पैरेंट्स को समझने लगते हैं. जब वे बड़े होंगे, तो पैरेंट्स से एक ख़ास जुड़ाव और कंफर्ट महसूस करेंगे और वे खुद-ब-खुद अपनी बातें पैरेंट्स से शेयर करने लगेंगे.
- देवांश शर्मा
