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कहानी- आज्ञा चक्र 3 (Story Series- Aagya Chakra 3)

“कह देना उन लोगों को, उस समाज को कि मेरे दिव्यांश यहीं कहीं हैं. मेरे आस-पास. मेरी यादों में रचे बसे हैं. चल मेरे साथ मंदिर में.” प्रेरणा घसीटते हुए उसे मंदिर में ले गई.

“देख वो मूरत देख, जो पत्थर की है. हम उसकी पूजा करते हैं और पुजारी लोग इसी के नाम का तिलक लगाते हैं. दिव्यांश भी ऐसे ही हैं… ईश्‍वर हो गए हैं वो… चाहे आसमां का सितारा हो गए हैं… या अमर आत्मा या कोई देह बन गए हैं फिर से, फिर ये रूप क्यों?”

और प्रेरणा ने ईश्‍वर के साक्ष्य में दीपा के आज्ञा चक्र पर गोल मैरून बिंदी रख दी. दोनों सहेलियां गले मिलकर फफक पड़ीं.

प्रेरणा को लगा कि वो अपनी झोली फैला ले और उसकी बिंदी गिरने ना दे, जैसे दीपा अपनी क्लास में प्रोफेसर वालिया के लिए सोचा करती थी.

सच! कोई प्रार्थना काम नहीं आई और दिव्यांश सदा-सदा के लिए सो गए. आंसुओं का सैलाब बाढ़ बनकर उतर आया. दीपा भागकर दिव्यांश के गले लग गई. प्रेरणा ने देखा उसकी लगाई बिंदी भी काम नहीं आई. दीपा का माथा सूना हो गया. प्रेरणा ने दीपा को दिव्यांश से अलग करते हुए अपने सीने से लगा लिया. कहां गई वो बिंदी जो प्रेरणा ने लगाई थी. उसने देखा वो मैरून बिंदी चिरनिद्रा में लीन दिव्यांश की कमीज़ के कॉलर से झांक रही थी.

दिव्यांश के जाने के बाद टूट-सी गई थी दीपा. प्रेरणा दीपा के घर अब ज़्यादा जाने लगी थी. बच्चों का वास्ता देकर उसमें जीने की ललक पैदा करती. फिर से स्कूल में नौकरी के लिए तैयार करती. जीना तो पड़ेगा जैसे दर्शन से रू-ब-रू करवाती, पर उसके ड्रेसिंग टेबल के सामने जाते ही प्रेरणा को जैसे काठ मार जाता. रंग-बिरंगे बिंदी के पत्ते और सजने-संवरने का सामान देखकर प्रेरणा का कलेजा मुंह को आ जाता.

संभल गई थी दीपा इन दो सालों में. अपनी स्कूल की नौकरी पर भी जाने लगी थी. वैभव दसवीं में और विपुल आठवीं में आ गया था. दीपा वैभव के करियर के बारे में सोचती, उसके पापा होते, तो जैसा होता वैसा ही मुझे करके दिखाना है. यही उसके जीवन का उद्देश्य बन गया था.

पर प्रेरणा को उसका सूना माथा बेहद खलता. प्रेरणा ने तो उसी की वजह से बिंदी लगाना सीखा था. वो हर समय अपने आज्ञा चक्र पर उंगली का स्पर्श कर अपनी बिंदी संभालती रहती. एक दिन स्कूल से लौटते हुए प्रेरणा ने दीपा को कहा था, “दीपा, एक बात पूछूं? तू बिंदी क्यों नहीं लगाती.”

“क्या?” दीपा चौंकी थी.

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“बिंदी कहां अब मेरे भाग्य में?”

“क्यों?” प्रेरणा के स्वर में तल्ख़ी थी.

“हमारे समाज में विधवाएं बिंदी नहीं लगातीं.” बेहद कड़े शब्दों में दीपा का जवाब था. इतने कठोर शब्द सुनकर प्रेरणा का दिल छलनी हो गया था. फिर भी प्रेरणा ने हार नहीं मानी थी. वो बोली, “पर बिंदी तो आज्ञा चक्र पर लगाई जाती है ना.”

“तो?” दीपा स्कूल के मेन गेट से बाहर निकलने लगी.

“तो क्या, आज्ञा चक्र पर लगाने से इष्ट का ध्यान होता है ना.” प्रेरणा ने दीपा का हाथ सख़्ती से पकड़ लिया और उसे मेन गेट से बाहर निकलने नहीं दिया. इतने दिनों से मन में चल रहे चक्रवात को प्रेरणा आज मन के बाहर लाना चाहती थी.

“मतलब?”

“मतलब साफ़ है दीपा. तू ही तो कहती थी ना कि इस आज्ञा चक्र के पीछे इष्ट का ध्यान होता है और हम औरतें इसलिए ध्यान की मुद्रा में रहती हैं. सच बताना दीपा. जब से दिव्यांश गए हैं, क्या तू उन्हें एक मिनट के लिए भी भुला पाई. वही थे न तेरे इष्ट?”

“पर अपने समाज में यह प्रावधान नहीं है कि एक विधवा बिंदी लगाए.” दीपा बेहद सजग होकर जवाब दे रही थी.

“तू एक बार सोचकर देख दीपा, दिव्यांश तेरे आस-पास ही रहते हैं, सोते-जागते, उठते-बैठते, चलते-फिरते, वो हमेशा तेरे साथ होते हैं. फिर ये बिंदी हटाकर तुम क्या बताना चाहती हो समाज को?”

“हां प्रेरणा, इस बात से इंकार नहीं कि मुझे हर समय दिव्यांश के अपने आस-पास होने का एहसास होता है. मुझे लगता है वो अमर हैं.”

“फिर बताओ दीपा, एक बिंदी हटाकर तुम दिव्यांश को पीछे क्यों करना चाहती हो? तुमने तो हमेशा बिंदी को दिव्यांश का पर्याय माना है ना. फिर अपने माथे को बिंदी से महरूम करके क्यों हमें भी कष्ट देती हो?”

“पर प्रेरणा, बिंदी तो सुहागन का प्रतीक होती है ना?”

“हां होती है, पर दीपा कहां गया तुम्हारा वो दर्शन कि पुजारी भी अपने इष्ट को याद करके आज्ञा चक्र पर तिलक लगाते हैं. उनका इष्ट तो ईश्‍वर होता है ना, जो दिखाई भी नहीं देता. कहां गया तुम्हारा वो दर्शन कि महिलाएं अपने पति और दायित्वों को अपना इष्ट मानकर आज्ञा चक्र पर बिंदी लगाती हैं और हर समय ध्यान मुद्रा में रहती हैं? क्या हुआ जो तुम्हारे दिव्यांश दिखाई नहीं देते.”

“पर वो लोग? वो समाज?”

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“कह देना उन लोगों को, उस समाज को कि मेरे दिव्यांश यहीं कहीं हैं. मेरे आस-पास. मेरी यादों में रचे बसे हैं. चल मेरे साथ मंदिर में.” प्रेरणा घसीटते हुए उसे मंदिर में ले गई.

“देख वो मूरत देख, जो पत्थर की है. हम उसकी पूजा करते हैं और पुजारी लोग इसी के नाम का तिलक लगाते हैं. दिव्यांश भी ऐसे ही हैं… ईश्‍वर हो गए हैं वो… चाहे आसमां का सितारा हो गए हैं… या अमर आत्मा या कोई देह बन गए हैं फिर से, फिर ये रूप क्यों?”

और प्रेरणा ने ईश्‍वर के साक्ष्य में दीपा के आज्ञा चक्र पर गोल मैरून बिंदी रख दी. दोनों सहेलियां गले मिलकर फफक पड़ीं. अश्रुधार के बीच दीपा के चेहरे पर स्मित रेखा थी.

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कहानी- आज्ञा चक्र 2 (Story Series- Aagya Chakra 2)

“अब ये तेरा कौन-सा नया दर्शन है दीपा.” प्रेरणा ने मीठी झिड़की देते हुए कहा.

“ना रे प्रेरणा, तू नहीं समझेगी. पर तू बिंदी ज़रूर लगाया कर. आर्ट ऑफ लिविंग के श्री श्री रविशंकरजी कहते हैं कि महिलाओं को बिंदी ज़रूर लगानी चाहिए. इससे उन महिलाओं को रोज़गार मिलता है, जो बिंदी के व्यापार में संलग्न हैं.”

“अब ये तेरा कौन-सा नया फंडा है?”

“अरे, इससे भी ऊपर. अपना आज्ञा चक्र है ना जो माथे पर, वहां बिंदी लगाने से अपने इष्ट की तरफ़ ध्यान रहता है. हम महिलाएं इसलिए तो हमेशा ज़िंदगी की भागदौड़ में भी अपने दायित्वों के प्रति ध्यान मुद्रा में रहती हैं.”

“लो भई! ये दर्शन भी सुनो.” प्रेरणा मंत्रमुग्ध हो गई थी दीपा के तर्कों से. “अच्छा भई ज़रूर लगाऊंगी बिंदी. कभी मिस नहीं करूंगी.”

उधर प्रेरणा की शादी भी हो गई थी. वो अपने पति प्रीत के साथ ख़ुश थी. अपने कॉलेज की दोस्ती निभाने कभी-कभार दीपा के घर आ जाती. दिव्यांश और प्रीत जितने संजीदा होते, दीपा और प्रेरणा उतनी ही मुखर हो जातीं.

वर्ष दर वर्ष हंसी-ख़ुशी बीत रहे थे. पर प्रेरणा को बिंदी का शौक़ विवाह के बाद भी नहीं था. वो परवाह भी नहीं करती थी कि बिंदी लगी भी है या नहीं. एक दिन प्रेरणा दीपा के घर बिंदी लगाए बिना ही चली गई, तो वहां जाते ही दीपा ने उसे टोक दिया, “अरे! बिंदी कहां है तेरी?”

“इसका बिंदी का ये जुनून अभी भी नहीं गया, क्यों जीजाजी?” प्रेरणा दिव्यांश की ओर रुख करती हुए बोली.

“हां, पहले तो हमे माथे पर टांगे-टांगे फिरती हैं. और फिर ना जाने कौन-से आज्ञा चक्र का दर्शन हमारे सामने बघारने लगती हैं.”

दीपा अपने ड्रेसिंग टेबल में सजे हुए ढेर सारे बिंदी के कार्ड ले आई. और प्रेरणा के माथे पर उसके नीले सूट से मेल खाती नीली बिंदी रखते हुए बोली, “अरे, ज़िंदगी में इन बिंदियों की तरह ना जाने कितने रंग बिखरे हैं. लाल, पीले, हरे, बैंगनी हमें हर रंग में रहना सीखना है. क्या पता कब कौन-सा रंग इस ज़िंदगी से ख़त्म हो जाए.”

“अरे-अरे, आप तो बड़ी दार्शनिक बातें कर लेती हैं.” प्रीत आज मुखर हो उठे थे.

“ये तो बचपन से ही ऐसी बातें करती आई है. कॉलेज में कभी प्रोफेसर की बिंदी निहारती थी, तो कभी पड़ोस की आंटीजी की.” प्रेरणा आज अपनी पूरी जानकारी दे देना चाहती थी. आज दिव्यांश भी बोलने में पीछे नहीं रहे थे, “प्रेरणाजी! आपकी सहेली ने तो बिंदी के पीछे हमें ना जाने कहां-कहां घुमाया. एक बार तो थ्रीडी बिंदी के चक्कर में सारा शहर ही छान मारा. अब साइंस स्टूडेंट का ये भी तो नुक़सान है कि वो अपनी ही भाषा बोलते हैं. फिर मैंने ही दुकानदार को समझाया कि भैया! वो बिंदी जो चारों तरफ़ से लशकारे मारे और दुकान पर खड़े सारे ग्राहक हंस पड़े.”

दिव्यांश के हर जुमले पर प्रीत अपनी चुटीली टिप्पणियां करने से नहीं चूक रहे थे. प्रीत यह कहने से भी बाज़ नहीं आए कि भई प्रेरणा को तो हमारी परवाह ही नहीं, हम गिरें, टेढ़े हों या उल्टे लटके रहें.

अगले दिन प्रेरणा ने दीपा को फोन किया, “भई, कल तो तेरे घर मज़ा ही आ गया. प्रीत भी ख़ुश थे तेरे बिंदी दर्शन पर. अब तो मुझे हर समय बिंदी का ख़्याल रखना पड़ेगा, वरना प्रीत व्यंग्य करने से नहीं चूकेंगे.”

“हां-हां, बिंदी लगाया कर तू. पता नहीं ज़िंदगी में कितने दिन बिंदी लगाना लिखा है.” दीपा फोन पर ही भावुक हो उठी.

“अब ये तेरा कौन-सा नया दर्शन है दीपा.” प्रेरणा ने मीठी झिड़की देते हुए कहा.

“ना रे प्रेरणा, तू नहीं समझेगी. पर तू बिंदी ज़रूर लगाया कर. आर्ट ऑफ लिविंग के श्री श्री रविशंकरजी कहते हैं कि महिलाओं को बिंदी ज़रूर लगानी चाहिए. इससे उन महिलाओं को रोज़गार मिलता है, जो बिंदी के व्यापार में संलग्न हैं.”

“अब ये तेरा कौन-सा नया फंडा है?”

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“अरे, इससे भी ऊपर. अपना आज्ञा चक्र है ना जो माथे पर, वहां बिंदी लगाने से अपने इष्ट की तरफ़ ध्यान रहता है. हम महिलाएं इसलिए तो हमेशा ज़िंदगी की भागदौड़ में भी अपने दायित्वों के प्रति ध्यान मुद्रा में रहती हैं.”

“लो भई! ये दर्शन भी सुनो.” प्रेरणा मंत्रमुग्ध हो गई थी दीपा के तर्कों से. “अच्छा भई ज़रूर लगाऊंगी बिंदी. कभी मिस नहीं करूंगी.”

समय चक्र कब रुका है. अनवरत चलता है वो, बिना किसी की परवाह किए. 10 वर्ष बीत गए थे दीपा के सुखी वैवाहिक जीवन की सजी-धजी गाड़ी को चलते हुए. एक दिन प्रेरणा को ख़बर मिली कि दिव्यांश की दोनों किडनी फेल हो चुकी हैं. अस्पताल के आईसीयू में वेंटिलेटर पर रखा है. दीपा की हंसती-खेलती ज़िंदगी पर गाज गिरी थी. प्रीत और प्रेरणा ख़बर सुनकर तुरंत अस्पताल भागे थे.

दीपा का आंसुओं से तर चेहरा, कांच की खिड़की से झांकते दिव्यांश की

टूटती-जुड़ती सांसों के बीच झूलता शरीर प्रेरणा को उद्वेलित कर रहा था. कभी ना सूना रहनेवाला दीपा का माथा आज आंसुओं के समुद्र में अपनी बिंदी बहा चुका था और बिंदी का कार्ड हर समय सामने लेकर खड़े रहनेवाले दिव्यांश ज़िंदगी से जंग लड़ रहे थे. प्रेरणा ने अपने छोटे से पर्स से गोल मैरून बिंदी निकालकर दीपा के माथे पर रख दी और भीगे स्वर में बोली, “जब से तूने बिंदी का दर्शन समझाया है न, तब से बिंदी का कार्ड हमेशा अपने पास रखती हूं. चलो, हम दिव्यांश के लिए प्रार्थना करते हैं.”

“पर प्रेरणा, डॉक्टर ने जवाब दे दिया है. वो इस स्टेज पर हैं कि कोई इलाज, कोई ट्रांसप्लांटेशन काम नहीं आएगा.” दीपा के चेहरे पर बनती भंगिमाओं और भावनाओं के सैलाब के बीच में बिंदी उठती-गिरती महसूस हो रही थी.

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कहानी- आज्ञा चक्र 1 (Story Series- Aagya Chakra 1)

प्रेरणा उसके ट्रूज़ों में इतनी सारी बिंदियां देखकर बोली थी, “ओ हो! क्या पूरे मोहल्ले में बांटेगी या शहर के नुक्कड़ पर अपनी बिंदियों की दुकान खोलेगी?

“नहीं-नहीं प्रेरणा, पर मैं चाहती हूं बिंदी कम नहीं होनी चाहिए. पूरा संसार बिंदीमय हो… ये ले…” और उसने बिंदी के कार्ड से गुलाबी रंग की बिंदी निकालकर प्रेरणा के माथे पर रख दी. प्रेरणा झल्ला उठी, “ना…ना… मुझे नहीं लगानी ये बिंदी-विंदी. बहनजी लुक देता है और हर समय ध्यान भी आंखों के बीच रहता है. इरिटेशन-सा लगता है.”

ओजस्वी चेहरा… हिरणी-सी आंखें… तेजस्वी माथा और उस पर गोल मैरून बिंदी दीपा को हमेशा आकर्षित करती थी. दीपा के कॉलेज में बॉटनी की प्रोफेसर वालिया जब पढ़ाते हुए अपने चेहरे के भाव व्यक्त करती थीं, तो उनके माथे पर कभी आड़ी सिलवटें, तो कभी खड़ी शिकन पड़ती और उसका असर उनकी गोल बिंदी पर पड़ता, जो आड़ी सिलवटों से ऊपर-नीचे हिंडोले लेती, तो कभी खड़ी शिकन के साथ दाएं से दबकर बाएं तरफ़ खड़ी हो जाती. ऊपर-नीचे, दाएं-बाएं इस पूरे खेल में दीपा को महसूस होता कि वह बिंदी कहीं गिर ना जाए और वो अपनी चुन्नी की झोली फैलाए उनके चेहरे के नीचे उनकी बिंदी लपक ले और गिरने न दे. क्लास में प्रोफेसर वालिया के आते ही दीपा की नज़रें सबसे पहले उनकी बिंदी पर जातीं. वो अपने नोट्स लेने से पहले कॉपी के दाईं तरफ़ बिंदी का निशान बना लेती. एक दिन क्लास में उसके पास बैठी दीपा की सबसे ख़ास सहेली प्रेरणा ने पूछ ही लिया, “तू क्या बनाती है ये गोल-गोल.” वो बोली, “बिंदी, ये बिंदी कभी नहीं उतरनी चाहिए.” और वो दोनों हंस पड़ीं.

कॉलेज की पढ़ाई पूरी हुई, तो दीपा के माता-पिता ने उसका विवाह रचाकर अपना दायित्व पूरा कर दिया. विवाह की ख़रीददारी में उसने ढेर सारी बिंदियां ख़रीदीं. हर साड़ी के साथ मैचिंग बिंदियां हरी, नीली, पीली, लाल, बैंगनी उसकी कलेक्शन में सब रंग थे. कोई जगमगाती, तो कोई स्टोनवाली, कोई मोतीवाली तो कोई दोहरे रंगवाली, कोई गोल तो कोई लंबी तिलक के आकार में, कोई सितारा, तो कोई चांद के आकार में दीपा को तो बाज़ार में उपलब्ध हर वेरायटी चाहिए थी.

प्रेरणा उसके ट्रूज़ों में इतनी सारी बिंदियां देखकर बोली थी, “ओ हो! क्या पूरे मोहल्ले में बांटेगी या शहर के नुक्कड़ पर अपनी बिंदियों की दुकान खोलेगी?

“नहीं-नहीं प्रेरणा, पर मैं चाहती हूं बिंदी कम नहीं होनी चाहिए. पूरा संसार बिंदीमय हो… ये ले…” और उसने बिंदी के कार्ड से गुलाबी रंग की बिंदी निकालकर प्रेरणा के माथे पर रख दी. प्रेरणा झल्ला उठी, “ना…ना… मुझे नहीं लगानी ये बिंदी-विंदी. बहनजी लुक देता है और हर समय ध्यान भी आंखों के बीच रहता है. इरिटेशन-सा लगता है.”

“ना लाड़ो ना. ऐसा नहीं कहते. बिंदी तो सुहाग की निशानी होती है और कुंआरी लड़कियों के लिए अच्छे सुहाग की आशा भी. देख, तेरा चेहरा बिंदी लगाते ही कितना दमक उठा है.” दीपा की मां चाय लेकर कमरे में आई और दोनों सहेलियों की बातचीत में दख़ल देते हुए बोली. और ना जाने क्या सोचकर प्रेरणा ने अपने माथे की बिंदी नहीं हटाई.

वरमाला के समय जब दीपा तैयार होकर आई, तो उसकी नगवाली बिंदी लशकारे मार रही थी और उसके दोनों ओर कमानीदार भौंहों के सहारे लाल और स़फेद बिंदियों की कतार कनपटी पर जाकर समाप्त हो रही थी. प्रेरणा ने दीपा के कान में फुसफुसाते हुए कहा, “आज तो तेरी बिंदिया की इच्छा ख़ूब पूरी हुई.” दीपा लाज के मारे गुलाबी हो गई.

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दिव्यांश भी दीपा के बिंदी के शौक़ से जल्दी ही वाक़िफ़ हो गए थे, क्योंकि जब भी दिव्यांश दीपा को मोटरसाइकिल पर लॉन्ग ड्राइव पर ले जाते, वो वापसी में तंग गलियोंवाले बाज़ार में चलने की इच्छा ज़रूर प्रकट करती, क्योंकि तंग गलियों में बिंदी के कार्ड अच्छे मिलते हैं. कभी नुक्कड़ पर खड़े अस्थायी दुकान, तो कभी रास्ते पर सजी-धजी दुकानें, तो कभी राह से गुज़रनेवाले ठेले… दीपा कहीं भी बिंदी की ख़रीददारी करने से नहीं चूकती.

कभी-कभी तो दिव्यांश दीपा के इस शौक़ पर चिढ़ जाते, “अरे भाई! बिंदी का इतना भी क्या शौक़. आख़िर बिंदी का ये झंझट पालती ही क्यों हो.” दीपा पहले तो हंसने लगी, फिर आंखें मटकाते हुए बोली, “दिव्य! ये जो मस्तक पर आंखों के बीच और नाक के ऊपर का जो स्थान है ना, इसे आज्ञा चक्र कहते हैं और आज्ञा चक्र के पीछे हमारी ध्यान इन्द्रिय होती है. यहां लगाई गई बिंदी हमें हमेशा अपने इष्ट का ध्यान करवाती है. पुजारीजी भी अपने माथे पर गोल या लंबी बिंदी लगाते हैं ना. उनका इष्ट ईश्‍वर होता है और हमारे इष्ट मालूम है कौन हैं? हमारे इष्ट हैं आप.” और दीपा ने दिव्यांश का नाक पकड़कर अपने समीप खींच लिया. दिव्यांश दीपा के दर्शन पर स्तब्ध थे.

“दीपा, तुम कब से ये दर्शन बघारने लगी?”

हां! दीपा का ये बचकाना आकर्षण अब गहरे दर्शन में बदल गया था और दिव्यांश जब-तब इस दर्शन को छेड़ने लगे थे. यूं कभी तो दीपा का माथा बिंदी के बिना सूना नहीं रहता था, पर कभी अलसायी सुबह दीपा के सोकर उठने से लेकर नहाने तक कभी बिंदी से महरूम माथा देखकर दिव्यांश कहते, “भई, आज तो हम कहीं गिर गए…” तो दीपा हंस पड़ती. कभी लंबे तिलक की दिशा बदल जाती तो दिव्यांश कह उठते, “भई, आज तो हम टेढ़े हो गए हैं…” और कभी उल्टी बिंदी को देखकर दिव्यांश कह उठते, “भई, आज हम उल्टे कैसे लगे हैं.” और कभी-कभी तो दिव्यांश बिंदी के कार्ड से एक बिंदी निकालकर दीपा के माथे पर रखकर चुंबन लेते हुए कहते, “अरे भाई, हम यहां हैं.” और दोनों एक साथ ठहाका मारकर हंस पड़ते.

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कहानी- दिल ढूंढ़ता है 3 (Story Series- Dil Dhoondta Hai 3)

 सभी का इतना स्नेह और प्रेम पा उसके दिल में बुझ रही प्रेम की चिंगारी फिर से भड़क उठी और दिल में प्यार का एक सैलाब-सा उमड़ा और ख़ुशी से उसकी आंखें नम हो गईं.  बालू पर बैठी कावेरी के मन में ऐसे ही अनेक विचार उमड़-घुमड़ रहे थे. तभी योगेशजी दो आइस्क्रीम लेकर आ गए. दोनों चुपचाप बैठे आइस्क्रीम खाते रहे.  हालांकि योगेशजी चुप थे, फिर भी न जाने क्यूं कावेरी को लग रहा था कि योगेशजी कुछ कहना चाह रहे थे, पर अंतस में छिपी बातें उनके होंठों पर आकर जम-सी गई थीं.

 गाहे-बगाहे फोन कर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर देते हैं. बच्चे सुखी व सम्पन्न हैं, अपनी-अपनी दुनिया में मस्त हैं, यही उसके लिए काफ़ी है.

क्यों जाए वो बेटे के यहां? बच्चों को उसे पकड़ाकर दोनों घूमते फिरेंगे. अब नहीं पड़ना उसे रिश्तों के छलावे में. भले ही वे उसके अस्तित्व के ही हिस्से हैं, पर अब उनकी अलग हस्ती है, जिसमें हस्तक्षेप करने के बदले अपने बचे हुए साल स़िर्फ अपने लिए जीएगी. उसे देश के दर्शनीय स्थलों पर घूमने का बहुत शौक़ था. अब अपनी बची हुई शक्ति और धन वह उसी में लगाएगी. अभी वह अपनी योजना को अंजाम देने की सोच ही रही थी कि एक दिन योगेशजी ने बताया कि निधि और वरुण के साथ-साथ उसकी ननद प्रियंका और देवर दिनेश सभी अपने-अपने परिवार के साथ जाड़े की छुट्टियां बिताने पटना आ रहे हैं.

सुनते ही असंतोष की लहर उसके तन-मन में उतरती चली गई. ये लोग कभी उसे उसके मन का नहीं करने देंगे. फिर भी ‘हां’ करने की विवशता थी, उसने मन ही मन ठान लिया था, इस बार वह सारे कामों की ज़िम्मेदारी अपने सिर नहीं लेगी. अब पहले की तरह उसमें ऊर्जा नहीं बची है. सभी से बांटकर काम करवाएगी.

एक ही दिन बारी-बारी से चारों अपने-अपने परिवार के साथ आ गए. आते ही उन सभी ने घर में अपने काम बांट लिए और हंसी-ख़ुशी से उसे पूरा करने में जुट गए. कावेरी के किचन में पहुंचते ही उन लोगों ने ज़बरदस्ती उसे किचन से बाहर कर दिया.

देवरानी बोली, “बहुत काम कर लिया आपने, अब हम लोगों के बनाए खाने का भी आनंद उठाएं.”

रात में सारे काम जल्दी समाप्त कर उसकी बहू नेहा एक बड़े बैग में उसका सामान व्यवस्थित करने लगी.

उसे ऐसा करते देख कावेरी बुरी तरह चौंकी, “नेहा, ये तुम क्या कर रही हो?”

“मैं इस बैग में आपके कपड़े और दूसरे बैग में खाने-पीने का कुछ सामान पैक कर रही हूं, क्योंकि कल सुबह आप और पापा दोनों ही पुरी घूमने जा रहे हैं. उसके आगे तिरुपति तक जाने की व्यवस्था हम लोगों ने करवा दी है. बस, आप बिना किसी हिल-हुज्जत के अपनी पसंद के कुछ कपड़े और दूसरी चीज़ें भी मुझे बता दीजिए, मैं बैग में डाल दूंगी, क्योंकि सुबह नौ बजे ही यहां से ट्रेन पुरी के लिए रवाना हो जाती है.”

“योगेशजी का सामान…?” कावेरी को अपने कानों पर विश्‍वास नहीं हो रहा था.

“पापाजी की चिंता मत कीजिए. उन्होंने पहले से ही अपना सामान व्यवस्थित कर रखा है. जितने दिनों तक आप लोग घर से बाहर रहेंगे, उतने दिनों तक हम सब इस घर की ज़िम्मेदारियां संभालेंगे और साथ-साथ समय बिताने का आनंद उठाएंगे.”

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बहू की बातों ने उसे एक बार फिर चौंका दिया और ताज्जुब हुआ कि योगेशजी भी सभी के साथ इस सब में शामिल थे. कावेरी की समझ में एक बात नहीं आ रही थी कि लोग ये सब करके उसके लिए स्नेह की ज्योति जला रहे थे या फिर उसके जीवन के छीने गए सबसे अच्छे पलों की भरपाई कर रहे थे. जो कुछ भी हो, मन में अब तक पलता आक्रोश और ग़ुस्सा पिघलने लगा था. सभी का इतना स्नेह और प्रेम पा उसके दिल में बुझ रही प्रेम की चिंगारी फिर से भड़क उठी और दिल में प्यार का एक सैलाब-सा उमड़ा और ख़ुशी से उसकी आंखें नम हो गईं.

बालू पर बैठी कावेरी के मन में ऐसे ही अनेक विचार उमड़-घुमड़ रहे थे. तभी योगेशजी दो आइस्क्रीम लेकर आ गए. दोनों चुपचाप बैठे आइस्क्रीम खाते रहे. हालांकि योगेशजी चुप थे, फिर भी न जाने क्यूं कावेरी को लग रहा था कि योगेशजी कुछ कहना चाह रहे थे, पर अंतस में छिपी बातें उनके होंठों पर आकर जम-सी गई थीं. थोड़ी देर बाद योगेशजी ने ही इस चुप्पी को तोड़ा.

“सच कहूं तो कावेरी, मुझे भी ऐसी ही किसी यात्रा की चाह थी, जो बहुत कोशिशों के बाद भी कभी पूरी नहीं हो पाई, अब जाकर पूरी हुई है. कभी तुम्हारी तरह मैं भी तुम्हारे साथ के लिए तरसता था. पुरुष हूं न, प्रकट नहीं कर पाया. तुम तो अपने सारे असंतोष का कारण मुझे ठहराकर मन हल्का कर लेती थी, मैं किसे दोषी ठहराता?”

पहली बार कावेरी पति के दर्द को महसूस कर उनके और पास खिसक आई थी व उनके सीने पर सिर रखकर आंखें बंद करते हुए बोली, “देर से ही सही, पर फुर्सत के वे रात-दिन मिले तो सही, जिनको अब तक हम ढूंढ़ रहे थे.”

Rita Kumari

       रीता कुमारी

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कहानी- दिल ढूंढ़ता है 2 (Story Series- Dil Dhoondta Hai 2)

ऐसा क्यों होता है कि जब भी कोई स्त्री अपने लिए जीना चाहती है, तो ग़लत ठहराई जाती है? दूसरों के लिए जीना ही उसे महान बनाता है. उस महानता के लिए उसे मिलता क्या है? जिन बच्चों के लिए अपना पूरा जीवन होम कर देती है, उन्हें भी उसका अपने लिए जीना अखरता है.

भले ही वह ससुराल द्वारा खींची गई लक्ष्मण रेखा को कभी पार नहीं कर पाई, पर उसके मन के लगाम को कभी कोई थाम नहीं पाता. जब-तब अतीत में गोते लगाता उसका मन कॉलेज में बिताए उन बिंदास लम्हों को ढूंढ़ लाता, जो उसके जीवन के सबसे सुनहरे दिन थे. कितनी अच्छी दोस्ती थी उसकी सुनंदा और सोनाली के साथ. जहां ये तीनों जातीं, उस स्थान को जीवंत बना देतीं. बेफ़िक्र चिड़ियों की तरह चहकतीं, कभी कैंटीन में बैठतीं, तो कभी कॉलेज के प्रांगण में. कभी सिनेमा देखने का प्रोग्राम बनता, तो कभी डोसा खाने का.

ऐसा नहीं था कि कावेरी अलग रहना चाहती थी. उसे भी  घर-परिवार में घुल-मिलकर लोगों के साथ रहना अच्छा लगता था, फिर भी ये तो मानव स्वभाव है कि हर व्यक्ति अपने जीवन में एक व्यक्तिगत एकांत चाहता है, चाहे वे हमेशा साथ रहनेवाले पति-पत्नी ही क्यों न हों. अक्सर पति-पत्नी दोनों की पसंद और रुचियां भी अलग होती हैं, तब यह भी स्वाभाविक है कि उन्हें थोड़ा-सा समय भी अपने शौक़ को पूरा करने के लिए चाहिए, जो कावेरी को कभी मिल नहीं पाता था. अपने उसी निजी फुर्सत के पल को पाने की चाहत में उसका मन कभी-कभी विद्रोह कर उठता. दिल चाहता सारी ज़िम्मेदारियों को झटककर दूर फेंक दे और कुछ फुर्सत के पल निकालकर अपने लिए जी ले, जहां न खाना बनाने का झंझट हो, न ही घर के दूसरे कामों की ज़िम्मेदारियां. बस, वो हो और उसके स्वतंत्र पल हों.

यही कारण था कि जब भी योगेशजी 8-10 दिनों के लिए शहर से बाहर जाते, वह काफ़ी स्वतंत्रता महसूस करती. न नाश्ते में कोई ज़्यादा मीन-मेख निकालनेवाला होता, न ही खाने के समय मिर्च-मसाले पर प्रवचन देनेवाला. कमरे में भी पूरी स्वतंत्रता होती. जब तक चाहो, लाइट जलाकर अपनी पसंद की क़िताबें पढ़ो, म्यूज़िक सुनो या और कोई काम करो, कोई रोकने-टोकनेवाला नहीं होता. कुछ दिनों के लिए मिली इस स्वतंत्रता को वह पूरी तरह आत्मसात् करती. फिर भी इस बेफ़िक्री के आलम का आभास भी किसी को नहीं होने देती, वरना घर के लोग ही उसे ग़लत ठहराने लगते.

ऐसा क्यों होता है कि जब भी कोई स्त्री अपने लिए जीना चाहती है, तो ग़लत ठहराई जाती है? दूसरों के लिए जीना ही उसे महान बनाता है. उस महानता के लिए उसे मिलता क्या है? जिन बच्चों के लिए अपना पूरा जीवन होम कर देती है, उन्हें भी उसका अपने लिए जीना अखरता है.

भले ही वह ससुराल द्वारा खींची गई लक्ष्मण रेखा को कभी पार नहीं कर पाई, पर उसके मन के लगाम को कभी कोई थाम नहीं पाता. जब-तब अतीत में गोते लगाता उसका मन कॉलेज में बिताए उन बिंदास लम्हों को ढूंढ़ लाता, जो उसके जीवन के सबसे सुनहरे दिन थे. कितनी अच्छी दोस्ती थी उसकी सुनंदा और सोनाली के साथ. जहां ये तीनों जातीं, उस स्थान को जीवंत बना देतीं. बेफ़िक्र चिड़ियों की तरह चहकतीं, कभी कैंटीन में बैठतीं, तो कभी कॉलेज के प्रांगण में. कभी सिनेमा देखने का प्रोग्राम बनता, तो कभी डोसा खाने का. उसके खुले विचारवाले मम्मी-पापा ने उसे अपने हिसाब से जीने की पूरी आज़ादी दे रखी थी. अब सोचती है, तो लगता है जाने कहां गए वो दिन और कहां गईं उसकी सखियां? सब दुनिया की भीड़ में ऐसे खो गईं कि फिर दुबारा मुलाक़ात ही नहीं हो पाई. काश! कोई लौटा दे उसे वे खोए हुए पल और उसकी ख़ुशियां, क्योंकि अब भी उसके अंदर ज़िंदा है वह सोलह साल की लड़की.

ऐसे ही छोटे-छोटे पल अपने लिए चुराती, वह कब ज़िंदगी के पचासवें दशक में पहुंच गई, पता ही नहीं चला. बदलते समय के साथ पहले बड़ा संयुक्त परिवार टूटकर छोटा संयुक्त परिवार बना, जिससे काम की ज़िम्मेदारियां और बोझ भी सिमटने लगा. ननद-देवर ने शादी कर अपनी-अपनी अलग गृहस्थी बसा ली. घर के बड़े-बुज़ुर्ग स्वर्गवासी हुए और देखते-देखते बच्चे भी अपने-अपने जीवन में व्यवस्थित हो गए. उसका जीवन भी योगेशजी के आसपास सिमटकर रह गया. घर में ज़्यादा लोग थे, तो अपना पौरुष सिद्ध करने के लिए योगेशजी कुछ ज़्यादा ही गरजते-बरसते थे. अब वो सावन की हल्की फुहार बन गए थे. जो मन का रिश्ता उम्र रहते कायम नहीं कर पाए, अब रिटायरमेंट के बाद बनाने की कोशिश कर रहे थे.

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हालांकि कावेरी को यूं कांटों की झाड़ का फूलों भरी डाल बनना रास नहीं आ रहा था.

अक्सर आस-पड़ोस की औरतें उसका अकेलापन देखकर हमदर्दी जतातीं और उसे बच्चों के पास जाने की सलाह देतीं, पर उसे लगता बहुत जी लिए दूसरों और बच्चों के लिए, अब अपने ढंग से अपने लिए जी रही है, तो इसमें अफ़सोस जैसी क्या बात है? अपना जो दिल चाहता है, बनाती है, मस्ती से खाती-पीती और घूमती है. बच्चों के घर जाकर फिर नई ज़िम्मेदारी संभाले, उससे अब इतिहास दुहराया नहीं जाएगा.

योगेशजी हमेशा कहते, “बहुत अकेले रह लिए, चलो, बच्चों के पास चलकर उनकी गृहस्थी देखें.”

कावेरी को पति की बातें ज़रा भी नहीं सुहातीं. कितना परिश्रम किया था कावेरी ने अपने दोनों बच्चों- निधि और वरुण को योग्य बनाने के लिए. अपने लिए कभी ढंग की एक अच्छी साड़ी भी नहीं ले पाती. उसी का परिणाम था, जो आज निधि और वरुण दोनों इंजीनियर थे, फिर भी अपनी मां के दर्द और चाहत का ख़्याल रखना तो दूर, उन्हें एहसास भी नहीं है कि उनकी मां क्या चाहती है?

Rita kumari

       रीता कुमारी

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कहानी- दिल ढूंढ़ता है 1 (Story Series- Dil Dhoondta Hai 1)

यह सच था कि कावेरी को कभी भौतिक सुख-सुविधा के साधन और अर्थ की ज़्यादा कमी नहीं हुई, पर प्यार और सुकून के दो पल भी कभी नसीब नहीं हुए. विवाह की पहली शर्त होती है कि पति अपनी पत्नी को सुखी रखेगा, लेकिन   योगेजी वही भूल गए. न ही मन के ज़ोर से और न ही रिश्तों की डोर से

योगेशजी उसके साथ पति की तरह बंध पाए. हमेशा उन दोनों के बीच एक परायापन कायम रहा, जो शायद संयुक्त परिवार के रस्मों-रिवाज़ों और मर्यादा की सीमा के साथ-साथ हर समय रिश्तेदारों की बनी भीड़ की देन थी. विरले ही कभी कुछ समय उन दोनों को साथ बिताने के लिए मिल पाता था.

कभी-कभी जीवन में ऐसे पल भी आते हैं, जब अपनी भावनाओं को प्रकट करने के लिए शब्द ही नहीं मिलते. पुरी के विशाल समुद्रतट पर खड़ी कावेरी को भी कुछ वैसा ही महसूस हो रहा था. पचास की उम्र को छूती कावेरी ख़ुशी से आह्लादित अपनी उम्र के आवरण से निकलकर आज फिर से एक बार मासूम षोडसी बनी आती-जाती लहरों के बीच बढ़ती ही जा रही थी. तभी पीछे से आकर योगेशजी ने उसकी बांह थाम ली थी.

“ये क्या बच्चों जैसी हरकतें कर रही हो? ज़रा उम्र का ख़्याल करो. इन लहरों की तेज़ गति कहीं तुम्हारे पांव न उखाड़ दे.” तभी एक ऊंची लहर उन दोनों को भिगोते हुए निकल गई. दोनों के क़दम वहीं ठिठककर रुक गए. फिर धीरे-धीरे चलते हुए बालू पर आ बैठे.

कावेरी की बरसों पुरानी अभिलाषा आज पूरी हुई थी. बचपन से लोगों से यहां के पौराणिक मंदिरों और समुद्रतट के विषय में इतना सुन चुकी थी कि उसे देखने की इच्छा दिनोंदिन और भी बढ़ती जा रही थी, जिसे अब जाकर पूरा करने का मौक़ा मिला था.

समुद्र में उठती-गिरती लहरों पर नज़र जमाए कावेरी के मन में विचारों की तरंग उठ रही थी, जिस पर उसका कोई बस नहीं था, वह उसे भीड़ भरे समुद्रतट पर भी अतीत से जोड़ती चली गई.

बीस वर्ष की उम्र में कावेरी संयुक्त परिवार में ब्याही गई थी, जिसमें योगेशजी के माता-पिता, भाई-बहन के अलावा उसके चाचा-चाची और दादा-दादी भी रहते थे. शादी के बाद उसने कितने जतन किए, पर संयुक्त परिवार की ज़िम्मेदारियों और बच्चों में  ऐसी उलझी कि कहीं भी अपनी मर्ज़ी से घूमने नहीं जा सकी. कभी-कभी किसी शादी-ब्याह जैसे मौक़ों पर ही वह पटना से बाहर निकल पाती थी. पटना में तो सब दिन एक समान थे. सुबह से शाम तक काम का सिलसिला-सा लगा रहता.

उसकी समझ में नहीं आता था, यह कैसी कर्तव्यनिष्ठा उस पर थोपी गई थी, जिसे पूरा करते-करते उसकी सारी इच्छाएं, सारे सपने होम हो रहे थे, फिर भी घर के किसी सदस्य को उसकी इच्छा-अनिच्छा, सुख-दुख की कोई चिंता नहीं थी. उसके ससुराल में स्त्री स्वतंत्रता और उसके अधिकारों की बातें ज़रूर होती थीं, पर वह सब उस घर की आत्मनिर्भर स्त्रियों पर ही लागू होती थीं. स्त्रियों की आत्मनिर्भरता और उनके हक़ की बातें करनेवाली व अपने जीवन में इसे चरितार्थ करनेवाली ये स्त्रियां ही घर-गृहस्थी के काम में व्यस्त औरतों के मानसिक और शारीरिक शोषण का कारण बनती थीं.

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घर की दूसरी स्त्रियों पर बरसों से चले आ रहे वही बने-बनाए क़ानून ही लागू होते थे, सभी की चाकरी करना और घर-गृहस्थी संभालना. योगेशजी की नज़रों में भी औरतों का प्रथम कर्तव्य घर की देखभाल और उसमें रहनेवाले व्यक्तियों की सुविधाओं का ख़्याल रखना होता था. घर के दूसरे लोग भी उससे बस काम की उम्मीद ही रखते थे, जिसे वह अपनी इच्छाओं का दमन कर पूरा करती थी.

शादी के बाद कुछ बरसों तक तो पति ने उसकी इच्छाओं और सुखों का ख़्याल रखा, पर धीरे-धीरे वह उसकी तरफ़ से पूरी तरह बेपरवाह हो गए थे. उसकी समस्याओं को सुनने का उनके पास समय ही नहीं होता. कभी सुनते भी तो कुछ न कर पाने की विवशता जताकर बात समाप्त कर देते. उसकी सारी योग्यता, सारी प्रतिभा उस विवशता के नीचे दबकर रह गई थी.

पति की अवहेलना ने उसे और भी तोड़ दिया था. उसे लगता, यहां कुछ भी अपना नहीं है. सब स्वार्थ के एक धागे मात्र से बंधे हैं. भले ही उसे पत्नी, बहू, मां जैसे कई रिश्तों से बांध दिया गया था, लेकिन वह अच्छी तरह समझती थी कि उसके पैरों के नीचे उसकी अपनी कोई धरती नहीं थी.

यह सच था कि कावेरी को कभी भौतिक सुख-सुविधा के साधन और अर्थ की ज़्यादा कमी नहीं हुई, पर प्यार और सुकून के दो पल भी कभी नसीब नहीं हुए. विवाह की पहली शर्त होती है कि पति अपनी पत्नी को सुखी रखेगा, लेकिन   योगेजी वही भूल गए. न ही मन के ज़ोर से और न ही रिश्तों की डोर से

योगेशजी उसके साथ पति की तरह बंध पाए. हमेशा उन दोनों के बीच एक परायापन कायम रहा, जो शायद संयुक्त परिवार के रस्मों-रिवाज़ों और मर्यादा की सीमा के साथ-साथ हर समय रिश्तेदारों की बनी भीड़ की देन थी. विरले ही कभी कुछ समय उन दोनों को साथ बिताने के लिए मिल पाता था. कहीं भी जाओ, पति के अलावा घर के दो-तीन सदस्य साथ होते ही थे. हर समय की इस भीड़-भाड़ से उसका दम घुटने लगा था. आज जब छोटे-छोटे बच्चे भी पर्सनल स्पेस की बातें करते हैं, तब उसके जैसी प्रबुद्ध महिला अपनी उसी इच्छा का हर रोज़ गला घोंटती थी.

Rita kumari

       रीता कुमारी

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कहानी- जीने की नई राह 3 (Story Series- Jeene Ki Nai Raah 3)

प्रकृति के विरुद्ध जाने का साहस तो कर लिया था, पर आज वह स़िर्फ प्रियंका गिल बनकर रह गई है. विभिन्न रिश्ते जिसमें बंधकर इंसान अपनी जीवन नैया की कठिन से कठिन घड़ियां भी हंसते-हंसते पार कर लेता है, वह उन रिश्तों से दूर थी.

“लेकिन-वेकिन कुछ नहीं दीदी, आपको आना ही होगा… आख़िर आप इनकी बेस्ट फ्रेंड रही हैं… ये जब-तब आपका ज़िक्र करते रहते हैं और आज जब आप मिल ही गई हैं तो आपको हमारा आतिथ्य तो स्वीकार करना ही पड़ेगा.” आरती ने ज़ोर देकर कहा.

“ठीक है….” उसने कह तो दिया था, पर उसे लग रहा था कि इनको भी अन्य लोगों की तरह उससे कोई काम तो नहीं है, वरना इस तरह आकर मिलना, खाने का आग्रह करना…. अनचाहे विचारों को झटक कर उसने सकारात्मक सोच अपनाई.

मां-पिताजी की मृत्यु के पश्‍चात् पहली बार इतनी आत्मीयता से किसी ने बातें की थीं. अब तक लोग मिलते थे, लेकिन उनके व्यवहार में चापलूसी ज़्यादा रहती थी. किसी से पारिवारिक मित्रता का तो प्रश्‍न ही नहीं था. वैसे उसने स्वयं को सदा रिज़र्व रखा था, जिससे कि उसका नाम व्यर्थ न उछले. उसे अपनी ड्यूटी के अलावा इतना समय ही नहीं मिलता था कि इधर-उधर बैठे. जो समय बचता था, उसमें वह क्लब में ब्रिज खेलती, ड्रिंक करती तथा देर रात लौटकर सो जाती थी. यही उसकी दिनचर्या थी.

राज का उससे इतना अपनत्व से मिलना तथा घर बुलाने के लिये आग्रह करना, वह समझ नहीं पा रही थी कि क्या करे? वह सोच ही रही थी कि नौकर ने राज के आने की सूचना दी. पता नहीं क्यों वह मना नहीं कर पाई तथा साथ चल दी.

आरती उसका इंतज़ार कर रही थी. उनकी दोनों बेटियां भी गाड़ी रुकते ही तुरंत बाहर निकल आईं तथा अभिवादन करते हुए अपना-अपना परिचय दिया. सुरुचि घर के कोने-कोने से झलक रही थी.

खाना भी लज़ीज एवं ज़ायकेदार था. उनका आतिथ्य भोगकर वह घर तो चली आई थी, पर मन वहीं रह गया था. आज सब कुछ है उसके पास- मान-सम्मान, नौकर-चाकर, गाड़ी, पैसा लेकिन घर नहीं है… जहां कुछ पल बैठकर वह तनावमुक्त हो सके… अपना दुख-सुख किसी से बांट सके.

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यह वही राज था, जिसने उससे अपने प्यार का इज़हार करते हुए सदा साथ चलने की इच्छा ज़ाहिर की थी, पर उसने मना कर दिया था. वह उसका मित्र अवश्य था, पर ड्रीममैन नहीं. वैसे भी उस समय उसे विवाह बंधन लगता था.

पता नहीं क्यों राज के परिवार से उसे इतना लगाव हो गया था कि वह अक्सर उनके घर जाने लगी थी. वे भी उसके आने पर ख़ुश होते. बाहर घूमना, खाना भी साथ-साथ होने लगा था. पर आज की स्वस्थ तकरार ने उसके दिल में एक हूक पैदा कर दी थी. काश! उसका भी ऐसा ही घर-परिवार होता, जिसमें एक-दूसरे के प्रति इतना लगाव, इतनी चिंता होती. आज उसे अपना पद ही अपना दुश्मन लगने लगा था. वह अलग-थलग पड़ती जा रही थी. वी.आई.पी. का सम्मान तो उसे मिलता था, पर दिल के इतना क़रीब कोई नहीं था जिसे अपना मित्र, सखा या सहचर कह सके. प्रकृति के विरुद्ध जाने का साहस तो कर लिया था, पर आज वह स़िर्फ प्रियंका गिल बनकर रह गई है. विभिन्न रिश्ते जिसमें बंधकर इंसान अपनी जीवन नैया की कठिन से कठिन घड़ियां भी हंसते-हंसते पार कर लेता है, वह उन रिश्तों से दूर थी.

उसने अपनी मंज़िल भले ही पा ली हो, पर जीवन की उन अकेली और दुरूह राहों को कैसे पार करेगी जो इस मंज़िल के पूरे होने के बाद वृद्धावस्था में आएंगी. सोचकर वह सिहर उठी.

आज उसे मां बहुत याद आ रही थी जो उसके आचार-विचार, लक्षण एवं विवाह के प्रति नकारात्मक रुख देखकर कहती, “तुम ऊंचा अवश्य उठो, पर यह मत भूलो कि तुम एक स्त्री हो, नारीत्व से विमुख स्त्री कहीं की नहीं रहती… सच कहें तो नारीत्व की शोभा मां बनने में है. स्त्री चाहे कितनी भी ऊंची क्यों न उठ जाए, मां बने बिना वह अधूरी ही है.”

आज उसे मां के कहे शब्द अक्षरशः सत्य लग रहे थे. शिल्पी और शिखा की मासूमियत ने उसके अंदर के मातृत्व को जगा दिया था. इस उम्र में विवाह… अब यह संभव नहीं है. जिस स्वतंत्रता से वह आज तक रहती आई है, उसमें बंदिश क्या वह सह पायेगी…? यह ज़िंदगी उसने अपने उसूलों पर चलकर बनाई है, फिर अफ़सोस, दुख और निराशा क्यों…? सोचकर मन को समझाती, पर दूसरे ही पल दूसरा विचार हावी हो जाता… तो क्या पूरी ज़िंदगी यूं ही अकेले, तन्हाइयों में काटनी पड़ेगी? आख़िर किसके लिये इतनी मेहनत कर रही है….  ज़िंदगी निरूद्देश्य नज़र आने लगी थी…. अब दिमाग़ में तरह-तरह के विचार हावी हों तो भला नींद कैसे आती….? ड्रॉवर से नींद की गोली निकालकर खाई तथा सोने की कोशिश करने लगी.

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दिन कट रहे थे, पर फिर भी कभी-कभी मन बेहद उदास हो उठता था. एक दिन पेपर पढ़ते-पढ़ते प्रियंका की निगाह एक लेख पर पड़ी. भारत में भी सिंगल पैरेन्टिंग का प्रचलन बढ़ा है…. अचानक उसे लगा उसके एकाकीपन का एक यही हल है, जिसमें न तो उसे अपने स्व की तिलांजलि देनी होगी और न ही अपने एकाधिकार पर किसी का आधिपत्य स्वीकार करना पड़ेगा. इससे उसे अकेलेपन से भी मुक्ति मिल जायेगी तथा कोई तो ऐसा होगा, जिसे वह स़िर्फ अपना कह सकेगी. सच है, नकारात्मक विचार जहां निराशा का संचार करते हैं, वहीं सकारात्मक विचार आशा का. आशा-निराशा, दुख-सुख तो जीवन में आएंगे ही, पर मनुष्य वही है जो इन सबके

बीच भी सामान्य ज़िंदगी जीने की कोशिश करे. एक सहज मार्ग तलाश ले.

इसी के साथ प्रियंका ने एक निश्‍चय कर लिया, वह अनाथाश्रम से बच्चा गोद लेकर अपने जीवन को नया आयाम देने का प्रयत्न करेगी. वह बच्चा न केवल उसके जीवन के अधूरेपन को दूर करेगा वरन् बुढ़ापे में भी जीने का संबल बनेगा. उसकी मासूम हंसी में अपने दुख, अपनी परेशानियां भूलकर, नये दिन का प्रारंभ नवउमंग, नवउत्साह के साथ किया करेगी. एकाएक ममत्व का सूखा स्त्रोत बह निकला. एकला चलो रे का मूलमंत्र उसने अपने मन से निकाल फेंका. उसी दिन उसने अनाथाश्रम से एक बच्चा गोद ले लिया…. उस अनजाने प्राणी को गोद में लेते ही उसके संपूर्ण व्यक्तित्व में पूर्णता का एहसास जग गया…. उसकी मासूम मुस्कुराहट ने उसे जीवनदान दे दिया…. मन का अवसाद कोसों दूर भाग गया… उसे जीने की नई राह मिल गई थी.

– सुधा आदेश

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कहानी- जीने की नई राह 2 (Story Series- Jeene Ki Nai Raah 2)

अकेले पुरुष के कम-से-कम पुरुष मित्र तो बन जाते हैं, पर अकेली औरत पुरुष मित्र तो क्या स्त्री मित्र भी नहीं बना पाती… ख़ासतौर पर उसकी तरह ऊंचे ओहदे पर बैठी स्त्रियां… स्वयं को श्रेष्ठ समझने के कारण वे आम स्त्रियों से मित्रता कर ही नहीं पातीं. यदि किसी के साथ मित्रता करना भी चाहती हैं तो उक्त स्त्री के अंदर पनपी ईर्ष्या या अपने पति को खोने का डर मित्रता पनपने ही नहीं देता….

अकेले पुरुष के कम-से-कम पुरुष मित्र तो बन जाते हैं, पर अकेली औरत पुरुष मित्र तो क्या स्त्री मित्र भी नहीं बना पाती… ख़ासतौर पर उसकी तरह ऊंचे ओहदे पर बैठी स्त्रियां… स्वयं को श्रेष्ठ समझने के कारण वे आम स्त्रियों से मित्रता कर ही नहीं पातीं. यदि किसी के साथ मित्रता करना भी चाहती हैं तो उक्त स्त्री के अंदर पनपी ईर्ष्या या अपने पति को खोने का डर मित्रता पनपने ही नहीं देता….

आरती उसे इन सबसे अलग लगी… राज से उसे बात करते देखकर न तो उसके अंदर ईर्ष्या जागृत हुई और न ही कभी मन में कोई कड़वाहट जगी. राज भी सहजता से उससे बातें करता था. कभी ऑफ़िस की तो कभी कॉलेज के दिनों की.. वह भी सदा उनकी हंसी में शामिल होती थी. शायद यही कारण था कि ऑफ़िस से आने के बाद वह कभी बताये या बिना बताये उनके घर पहुंच जाती…. दोनों ही स्थितियों में उसका खुलकर स्वागत होता.

जब उसे पता चला कि आरती सी.ए. है तो उसने उससे कैरियर के बारे में पूछा, तब उसने कहा था, “दीदी, विवाह से पूर्व मैं एक प्राइवेट कंपनी में एकाउन्ट ऑफ़िसर थी, लेकिन राज यहां और मैं वहां… क्या फ़ायदा ऐसी नौकरी से, जब अलग-अलग रहना पड़े… इसलिए मैंने नौकरी छोड़ने का निर्णय ले लिया…. और आज मुझे अपने निर्णय पर कोई पछतावा नहीं है… अभी मेरे लिये अपने कैरियर से ज़्यादा बच्चों की उचित देखभाल एवं परवरिश ज़रूरी है. लेकिन अभी भी आवश्यकता पड़ने पर या राज के बाहर रहने पर ऑफ़िस मैं ही संभालती हूं. काम छोड़ा नहीं है, हां दायित्यों के कारण कुछ कमी अवश्य आई है.”

पति-पत्नी के बीच प्यार विश्‍वास और पारदर्शिता पर निर्भर है. राज ने उसे न केवल अपने अतीत के बारे में सब कुछ बता दिया था वरन् वर्तमान में भी उसके साथ पूरी तरह समर्पित था, तभी उनमें न कोई कुंठा थी और न ही कोई डर.

उसे वह दिन याद आया जब वह राज से मिली थी. इस शहर में आये कुछ ही दिन हुए थे कि उसे अपने सहयोगी पाठक के पुत्र के विवाह के स्वागत समारोह में जाना पड़ा. पार्टी पूरे जोश पर थी. वर-वधू को आशीर्वाद देने के पश्‍चात् खाना खा ही रही थी कि एक जोड़ा उसके सामने आकर खड़ा हो गया. वह कुछ सोच पाती, उससे पहले ही वह व्यक्ति अभिवादन करते हुए बोला, “क्या आपने मुझे पहचाना? मैं आपका सहपाठी…. राज सक्सेना…”

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“ओह, राज…. बहुत बदल गये हो… कैसे हो? क्या कर रहे हो आजकल?” अचानक फ्लैश की तरह सब कुछ सामने आ गया था. राज उसका सहपाठी था… स्कूल से दोनों का साथ रहा. उसकी इच्छा सिविल सेवा में जाने की थी, वहीं राज सी.ए. कर अपनी एक अलग कंपनी खोलना चाहता था, क्योंकि उसे लगता था सिविल सेवाओं में आज योग्यता की नहीं वरन् चापलूसी करने वाले व्यक्तियों की आवश्यकता है, जो स्थितियों के अनुकूल गिरगिट की तरह रंग बदलते रहें… जबकि वह सोचती थी कि अगर व्यक्ति में योग्यता है, आंतरिक शक्ति है, कुछ कर गुज़रने की क्षमता है तो वह दूसरों से अपनी बात मनवा सकता है, कायर लोग ही दूसरों के सामने घुटने टेकते हैं.

मंज़िलें अलग-अलग थीं, अतः अलग हो गये थे… फिर भी जब भी समय मिलता, अवश्य मिलते. अपनी ख़ुशी, अपने ग़म एक-दूसरे के साथ बांटते… अपनी मंज़िल पाने के पश्‍चात् उसने अपने प्यार का इज़हार करते हुए विवाह का पैग़ाम उसके पास भेजा था. उसके मन के किसी कोने में भी उसके लिये सॉ़फ़्ट कॉर्नर था, पर विवाहरूपी बंधन में बंधकर वह अपना कैरियर नष्ट नहीं करना चाहती थी. उसका तटस्थ व्यवहार देखकर राज ने भी उसके द्वारा निर्मित लक्ष्मण-रेखा को कभी पार करने की चेष्टा नहीं की थी और वह स्वयं भी सिविल सेवाओं की कोचिंग के लिये दिल्ली चली गई थी, जिसके कारण उनका संपर्क भी टूट गया था.

“मैं तो ठीक हूं.. वही- वैसा ही, पर आप वैसी नहीं रहीं…?” उसने उसी ज़िंदादिली से अपनी बात कही.

“मैं वैसी नहीं रही…?” उसकी बात सुनकर अतीत से वर्तमान में आते हुए आश्‍चर्य से प्रियंका ने पूछा.

“मेरे कहने का मतलब था- अब आप पहले वाली प्रियंका नहीं रहीं. अब तो मेरे लिये प्रियंका गिल हो, एक जानी-मानी हस्ती, हमारे शहर की कमिश्‍नर…” एक बार फिर स्वर में ख़ुशी झलक उठी थी.

उसकी बात सुनकर चेहरे पर अनायास ही मुस्कान आ गई थी. इतने दिनों में पहली बार उसे सहज और स्वाभाविक स्वर सुनने को मिला था, वरना ‘यस मेम, आपने बिल्कुल ठीक कहा….’ जैसे शब्द ही सुनने को मिलते थे.

वह कुछ कहती, इससे पहले उसने एक स्त्री से उसे मिलवाते हुए कहा, “इनसे मिलो… यह हैं मिसेज़ आरती सक्सेना…. मेरी धर्मपत्नी.” प्यार से अपनी पत्नी की ओर देखते हुए राज ने कहा.

“इन्होंने देखते ही आपको पहचान लिया और मुझे आपसे मिलवाने ले आए.” आरती ने उसका अभिवादन करते हुए कहा.

कहीं कोई ईर्ष्या या द्वेष की भावना उसके स्वर या आंखों में नहीं झलकी जैसा कि आम औरतों की निगाहों में उसने देखा था जब वह उनके पतियों से बातें कर रही होती थी. आरती उसे बेहद आकर्षक एवं सुलझी हुई लगी.

वह कुछ उत्तर दे पाती कि वह पुनः बोली, “दीदी, यदि आपको कोई आपत्ति न हो तो कल का डिनर हमारे यहां करें. ये आपको लेने पहुंच जाएंगे.”

“लेकिन…” प्रियंका समझ नहीं पा रही थी कि  वह उनका आतिथ्य स्वीकार करे या न करे.

– सुधा आदेश

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कहानी- जीने की नई राह 1 (Story Series- Jeene Ki Nai Raah 1)

राज और आरती की नोक-झोंक में आज उसे रिश्तों की गर्माहट का एहसास हो चला था. शायद यही कारण था कि मां-पापा दो अलग-अलग व्यक्तित्व होते हुए भी सदा साथ-साथ रहे. कहीं-न-कहीं उनके बीच प्यार का सेतु अवश्य रहा होगा, जिसे पापा का उग्र स्वभाव भी नहीं तोड़ पाया. अगर ऐसा नहीं होता तो क्या वे पूरी ज़िंदगी एक साथ बिता पाते…? वही उनके दिलों में छिपे प्यार को पहचान नहीं पाई थी.

प्रियंका गिल कमरे में बेचैनी से चहलक़दमी कर रही थी… दिसंबर की कड़क सर्दी में भी माथे पर पसीने की बूंदें झलक आई थीं. अपनी बेचैनी कम करने के इरादे से ग्लास में पैग बनाकर कमरे में पड़ी आरामकुर्सी पर बैठ गई.

राज-जिसके घर जाने से न तो वह स्वयं को रोक पाती थी, न ही वहां से आने के पश्‍चात् सहज हो पाती थी. आज उसने जो देखा-सुना, उसे महसूस कर वह आश्‍चर्यचकित थी… क्या किसी रिश्ते में इतना माधुर्य, एक-दूसरे के प्रति चिंता एवं समर्पण भी हो सकता है?

आज प्रियंका राज के घर बिना बताये चली गई थी. संयोग से दरवाज़ा खुला था, वह बिना घंटी बजाये ही अंदर चली गई. उसने देखा कि राज की पत्नी आरती उससे चाय पीने का आग्रह कर रही है, वहीं उसकी बड़ी बेटी शिखा उसके माथे पर बाम लगा रही है तथा छोटी बेटी शेफाली अपने नाज़ुक हाथों से उसके पैर दबा रही है.

उसे देखते ही राज उठ खड़ा हुआ तथा झेंपती हंसी के साथ बोला, “ज़रा बुखार क्या हो गया, तीनों ने घर आसमान पर उठा लिया है… चाय के नाम पर काढ़ा पीना पड़ रहा है.”

“देखिये ना, तीन दिन से बुखार है… ऑफ़िस जाने के लिए मना किया था, पर माने ही नहीं…. न ही डॉक्टर को दिखाया, ऑफ़िस से भी अभी-अभी आये हैं…. स्वास्थ्य की ओर बिल्कुल भी ध्यान नहीं है…” आरती ने राज की ओर देखते हुए शिकायती स्वर में कहा.

“ज़ुकाम की वजह से थोड़ी-सी हरारत हो गई थी… अब इतनी-सी बात के लिये डॉक्टर के पास क्या जाना…?” राज ने सफ़ाई देते हुए कहा.

सवाल-जवाब में छिपे प्यार ने उसे झकझोर कर रख दिया था… ज़रा-से ज़ुकाम में पत्नी की पति के लिये इतनी चिंता उसे सुखद एहसास दे गई थी. उसे याद आये वे दिन जब वह मलेरिया से पीड़ित हो गई थी… यद्यपि पूरा स्टाफ उसके स्वास्थ्य के बारे में चिंतित था… डॉक्टर घंटे-घंटे पर फ़ोन कर उसका हाल लेते रहते थे, पर उसमें यह अपनत्व और चिंता कहां थी…? वह तो अपना-अपना कर्त्तव्य निभा रहे थे… उसकी जगह यदि और कोई भी होता तो उसके साथ भी उनका वही व्यवहार होता.. उनका व्यवहार उनकी कुर्सी के प्रति था, न कि उसके प्रति लगाव के कारण..

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आज उसका यदि स्थानांतरण हो जाए तो ऐसी स्थिति में इनमें से शायद ही कोई उसका हालचाल पूछने आये. उसने नाम और शोहरत तो बहुत कमा लिया था, पर दिल एकदम खाली था… इस पूरी दुनिया में अपना कहने लायक मां-बाप के बाद शायद ही कोई बचा था. अपने अहंकार और अहम् के कारण वह स्वयं अपने परिवार से दूर होती गई थी. वैसे भी परिवार के नाम पर बस एक चाचा और एक बुआ ही तो थे.. पर जब भी वे आते, उसे लगता कि उससे कोई काम होगा…. तभी आये हैं… यह सोच उसे उनसे दूर करती चली गई… धीरे-धीरे उनका आना भी बंद हो गया. पिछले दस वर्षों से तो वह उन सबसे मिली भी नहीं है.

राज और आरती की नोक-झोंक में आज उसे रिश्तों की गर्माहट का एहसास हो चला था. शायद यही कारण था कि मां-पापा दो अलग-अलग व्यक्तित्व होते हुए भी सदा साथ-साथ रहे. कहीं-न-कहीं उनके बीच प्यार का सेतु अवश्य रहा होगा, जिसे पापा का उग्र स्वभाव भी नहीं तोड़ पाया. अगर ऐसा नहीं होता तो क्या वे पूरी ज़िंदगी एक साथ बिता पाते…? वही उनके दिलों में छिपे प्यार को पहचान नहीं पाई थी.

प्रियंका को लग रहा था कि वह पापा की उम्मीदों पर अवश्य खरी उतरी थी, पर मन का एक कोना इतना सब पाने के पश्‍चात् भी सूना रह गया था. सीढ़ी-दर-सीढ़ी सफलता के सोपानों पर चढ़ती स्वयं को आम औरतों से अलग समझने के कारण उसका रहन-सहन और बात करने का तरीक़ा भी अलग हो चला था. स्त्री सुलभ लज्जा का उसमें लेशमात्र भी अंश नहीं था. पर क्या वह मन के नारीत्व को मार पाई…?

यह सच है कि पिता उसके आदर्श रहे थे. वह उन्हीं के समान स्वतंत्र और निर्भीक जीवन व्यतीत करना चाहती थी, वह मां की तरह बंद दरवाज़े के भीतर घुटन और अपमानभरी, चौके-चूल्हे तक सीमित ज़िंदगी नहीं जीना चाहती थी. पर अब लगता है कि पापा ने न मां के साथ न्याय किया और न ही उसके साथ… मां से ज़्यादा पढ़ा होने के कारण वह सदा उन्हें नीचा दिखाते रहे. उनकी सही बात को भी अपने पुरुषोचित अहंकार के कारण ग़लत साबित करते रहे. अपनी कमी को उसके द्वारा पूरी करने की धुन में उन्होंने उसके नारीत्व को भी रौंद डाला…. बचपन से लड़कों के कपड़े पहनने के कारण उसका स्वभाव भी लड़कों जैसा ही बन चला था.

ये पिता के उपदेशों का ही असर था कि जब भी मां विवाह की बात चलाती, वह बिगड़ उठती. उसे लगता कि क्या वह किसी अनजान आदमी के साथ समझौता कर पायेगी? क्या वह अपनी पूरी ज़िदगी उसके बच्चों को बड़ा करने में बिता देगी? उसके अपने कैरियर का क्या होगा…? वह विवाह करके अपने कैरियर को तहस-नहस नहीं करना चाहती थी और न ही अपनी स्वतंत्रता में किसी का दख़ल चाहती थी. उसे लगता था बंधन हमेशा इंसान को कमज़ोर बनाते हैं… आख़िर क्या कमी है उसे, अच्छा पद है, पैसा है, फिर क्यों किसी का आधिपत्य स्वीकारे? ‘एकला चलो रे’ का मूलमंत्र अपनाते हुए उसने स्वयं को विवाहरूपी बंधन से मुक्त रखने का निश्‍चय कर लिया था.

– सुधा आदेश

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कहानी- हरी गोद 3 (Story Series- Hari Godh 3)

“आत्मा की मुक्ति अपने अच्छे-बुरे कर्मों से होती है, किसी कर्मकांड से नहीं और आज एक बात कान खोलकर सुन लो मां, अगर तुमने उमा की प्रेग्नेंसी में किसी भी तरह की कोई भी बाधा खड़ी की या उसे किसी भी तरह का तनाव दिया तो हमारी मुक्ति हो या न हो, तुम्हारी नहीं होगी, क्योंकि फिर मैं तुम्हारे मरने पर ना तो तुम्हारा क्रिया-कर्म करूंगा और न ही पिंडदान.”

उमा की पिछली प्रेग्नेंसी में भी देवी ने उन्हें सपने में आकर पोते की ख़बर दी थी, जो बाद में निर्मूल सिद्ध हुई थी.

“मैं गीता को फ़ोन कर देती हूं, वो समय पर जांच कर लेगी…” मां की बात सुन मनोज ने निर्विकार भाव से उमा की ओर देखा. उमा के मन की पीड़ा उसकी आंखों में साफ़ छलक रही थी, जिसे समझकर भी वो कुछ न कह सकी.

उमा को तीसरा महीना चढ़ चला था. मांजी ने उमा की सोनोग्राफ़ी का अपॉइंटमेंट लिया हुआ था और परिणाम अनुकूल न होने पर गिराने का इंतज़ाम भी पुख्ता था. वैसे तो हमारे देश में लिंग परीक्षण अपराध की श्रेणी में आता है, मगर कुछ अतिरिक्त सुविधा शुल्क देकर कौन-सी ऐसी सुविधा है, जो ख़रीदी नहीं जा सकती है. उमा के साथ क्लीनिक में मनोज को न भेजकर मांजी स्वयं जा रही थीं, क्योंकि उन्हें अपने बेटे पर पूरा भरोसा न था. कहीं उमा की बातों में आकर पलट गया तो उसकी उम्मीदों पर पानी फिर जाएगा.

उमा की सोनोग्राफ़ी हो चुकी थी. आशाओं पर एक बार फिर पानी फिर गया था, मगर वो नियति के आगे घुटने टेकने को तैयार नहीं थी. जैसे-जैसे गर्भपात का समय पास आ रहा था, उमा की बेचैनी बढ़ती जा रही थी. उसका अंतर्मन चित्कार रहा था. मत होने दे ये अनर्थ उमा, बहुत हुआ… कब तक यूं अपने ही ख़ून की हत्याओं का पाप ढोती रहेगी? क्या तू शगुना से भी गई-गुज़री है? जब वो अपनी कोख की रक्षा केे लिए सब कुछ त्याग सकती है तो तू क्यों नहीं? क्या होगा? ज़्यादा से ़ज़्यादा, यही न कि तुझे घर छोड़ना पड़ेगा, मगर अपनी बच्ची को कम से कम जीवित तो देख पाएगी. वो नन्हीं-सी जान पूरी तरह से तुझ पर आश्रित है. सोचती होगी कि मैं अपनी मां की कोख में सुरक्षित हूं. मेरी मां है तो कोई मेरा क्या बिगाड़ सकता है? चैन से सोई होगी वो. क्या बीतेगी उस पर, जब जानेगी कि अपनी कोख में सहेजनेवाली मां ही आज प्राणघातिनी बनी हुई है? मत कर ऐसा अन्याय उसके साथ. आज मनोज के प्यार की भी परीक्षा होने दे. हर बार ग़लत ़फैसलों के लिए मातृ-सम्मान के नाम पर मां के साथ खड़ा होनेवाला आदमी क्या एक सही फैसले के लिए तेरे साथ नहीं खड़ा हो सकता? और अगर वो अभी तेरे साथ खड़ा नहीं हो सका, तो फिर ऐसे पति से क्या उम्मीद करना? वो तो जीवन के किसी भी मोड़ पर तेरा साथ छोड़ सकता है. तू इतनी असक्षम भी नहीं कि अपनी बच्चियों का भार न उठा सके. बस, ज़रा-सी हिम्मत कर उमा.

“उमा चलिए.” नर्स की आवाज़ सुन उमा का शरीर जैसे काठ का हो गया. जैसे-तैसे वो खड़ी हुई, मगर पांव नहीं हिला पा रही थी.

“यह मुझसे नहीं होगा मांजी. मैं यह नहीं करूंगी.” कंठ में फंसा निर्णय पूरे आवेश के साथ बाहर निकला.

मनोज जिस क्लेश के आगे नतमस्तक था, वो आज पूरे उफान पर था. “बहुएं घर बसाने के लिए होती हैं, उजाड़ने के लिए नहीं. मेरे वंश का खात्मा करने पर तुली है ये. कहे देती हूं मनोज, या तो इसे समझा ले, वरना इसका हमसे कोई नाता नहीं रहेगा.” मांजी ग़ुस्साई आवाज़ में बोलीं.

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“न रहे तो न सही मांजी. मैं इसके लिए तैयार हूं. मगर इस बार अपनी कोख पर आंच न आने दूंगी. मेरा निर्णय नहीं बदलनेवाला, आगे जैसी आपकी मर्ज़ी. मैं आज ही यहां से अपनी बेटी को लेकर चली जाऊंगी.” उमा की वाणी और भाव दोनों शांत थे. अनवरत् मानसिक द्वंद्वों के तूफ़ान एक निर्णय पर आकर ठहर गए थे. अब वो हर परिस्थिति का सामना करने के लिए तैयार थी.

“कोई कहीं नहीं जाएगा मां. उमा ने जो किया ठीक किया. मैं ख़ुद भी यही चाहता था, मगर न जाने क्यों चाहकर भी साहस नहीं कर पा रहा था. अपनी दो बेटियों की हत्या की ग्लानि अभी तक है मुझे. तीसरी की झेलने की शक्ति नहीं है मुझमें.” हिम्मत करके मनोज बोला.

“ये क्या कह रहा है तू? इसके साथ-साथ तेरा भी सिर फिर गया क्या? मरने के बाद कोई क्रिया-कर्म, श्राद्ध करनेवाला भी नहीं होगा तेरा. आत्मा को मुक्ति नहीं मिलेगी…” मां की बातें सुन इस बार मनोज की सहनशक्ति जवाब दे गई.

“आत्मा की मुक्ति अपने अच्छे-बुरे कर्मों से होती है, किसी कर्मकांड से नहीं और आज एक बात कान खोलकर सुन लो मां, अगर तुमने उमा की प्रेग्नेंसी में किसी भी तरह की कोई भी बाधा खड़ी की या उसे किसी भी तरह का तनाव दिया तो हमारी मुक्ति हो या न हो, तुम्हारी नहीं होगी, क्योंकि फिर मैं तुम्हारे मरने पर ना तो तुम्हारा क्रिया-कर्म करूंगा और न ही पिंडदान.” आज मनोज के दिल में फंसा बरसों का गुबार भी फूटकर बाहर निकल गया. मांजी उसके जवाब से जड़वत् रह गईं.

“उमा, अगर तुम्हारे साथ किसी भी प्रकार का दुर्व्यवहार हुआ, तो तुम्हारे साथ मैं भी ये घर छोड़ दूंगा.” मनोज की अप्रत्याशित प्रतिक्रिया से उमा भावविह्वल हो गई और उससे लिपटकर रो पड़ी. आज उसकी सूनी गोद फिर हरी हो गई थी. आज उसने अपनी कोख के साथ अपने सुहाग पर भी अधिकार पा लिया था.

Deepti Mittal

      दीप्ति मित्तल

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कहानी- हरी गोद 2 (Story Series- Hari Godh 2)

“वो क्या रोकता. वो तो अपनी मां का पिछलग्गू था. मैंने भी सोचा, परे हटाओ ऐसे मरद को, जो दुख-दरद में अपनी जोरू का साथ न देकर मां के पीछे जा छुपे. जो अब काम न आया, कुछ बुरी पड़े पे क्या काम आएगा? बस दीदी, अब तो ख़ुद कमा-खा रही हूं और बिटिया को पढ़ा-लिखा रही हूं. इक ही बात कहती हूं उसे. दुनिया से कुछ उम्मीद मत करियो. ख़ुद मज़बूत बन.” उमा शगुना की बातें सुन अवाक् रह गई. इस बुराई की जड़ें उसके घर तक ही नहीं, दूर बसी गरीबों की बस्ती में भी फैली थी.

घर की हर बात मांजी रो-धोकर नमक-मिर्च लगाकर ऐसे पूरे कुटुंब में पेश करतीं कि सबकी नज़रें उमा और मनोज की ओर तन जातीं. रोज़-रोज़ के कलह से बचने के लिए उमा ने भारी मन से परिस्थिति से समझौता कर लिया था. तब से अब तक दो बार गर्भहत्या का दंश झेल चुकी उमा फिर से उसी मोड़ पर आ खड़ी हुई थी.

आपबीती सोच-सोचकर उमा का सिर भारी हो चला. वो रसोई में चाय बनाने चल दी. रसोई में कामवाली बाई शगुना बर्तन धो रही थी. चाय बनाते व़क़्त उमा को मितली आ गई और वो बाथरूम की ओर भागी. “का दीदी, कोई ख़ुसख़बरी है का?” शगुना उमा की शारीरिक भाषा से समझ गई थी. उमा ने उसे एक नज़र देखा, पर कुछ न कहा. उमा की चुप्पी को ‘हां’ समझ शगुना ने अपना अंदाज़ा पक्का मान लिया.

“चलो, अच्छा ही है दीदी. गुड़िया कब तक अकेले खेलेगी? उसे भी तो कोई साथी चाहे संग खेलन वास्ते. अकेले बच्चे का घर में बिल्कुल जी न लगे है.”

“अच्छा… तेरे कितने बच्चे हैं?” उमा ने चाय छानते हुए पूछा.

“कित्ते का? बस, एक ही बिटिया है मेरी. अब तो सयानी हो गई है. दसवीं में पढ़े है.” बताते हुए शगुना का चेहरा गर्व से दमक उठा.

“क्यों? दूसरा नहीं किया उसके बाद?”

“का बताऊं दीदी, इसके जनम पर ही इत्ती कलेस पड़ गई थी घर में. इसके बखत धोके से डॉक्टरी जांच करा दी मेरी. मैं ठैरी अनपढ़-गंवार, मुझे तो कुछ पता न था. छोरी जान पेट गिराने को पीछे पड़ गए कमीने. मगर मैं तैयार न हुई. भला बताओ तो दीदी, अगर मेरे मां-बाप मेरे साथ ऐसा करते तो मैं कैसे आती इस दुनिया में?”

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“फिर क्या हुआ?” उमा उत्सुक थी.

“होना का था दीदी, मैंने अपनी सास और मरद को जो खरी-खोटी सुनाई के पूछो मत. मैंने सा़फ़ कै दिया कि माना मैं अनपढ़-गंवार हूं, मगर हाथ-पैर से सलामत हूं. केसे भी करके अपना और छोरी का पेट पाल लूंगी. तेरे दरवाज़े पर न आऊंगी रोटी मांगने. मेरी कोख की तरफ़ आंख उठा के भी देखा तो अच्छा न होगा. बस, मेरी सास ने मुझे घर से निकलवा दिया.”

“और तेरे आदमी ने नहीं रोका तुझे?” उमा ने पूछा.

“वो क्या रोकता. वो तो अपनी मां का पिछलग्गू था. मैंने भी सोचा, परे हटाओ ऐसे मरद को, जो दुख-दरद में अपनी जोरू का साथ न देकर मां के पीछे जा छुपे. जो अब काम न आया, कुछ बुरी पड़े पे क्या काम आएगा? बस दीदी, अब तो ख़ुद कमा-खा रही हूं और बिटिया को पढ़ा-लिखा रही हूं. इक ही बात कहती हूं उसे. दुनिया से कुछ उम्मीद मत करियो. ख़ुद मज़बूत बन.” उमा शगुना की बातें सुन अवाक् रह गई. इस बुराई की जड़ें उसके घर तक ही नहीं, दूर बसी गरीबों की बस्ती में भी फैली थी.

“तुम लोगों में भी होता है ये सब?” उमा ने हैरानी से पूछा.

“होता क्यों नहीं दीदी. हम ठैरे गरीब. जिस सौदे में सिर पर ख़रच आ पड़े, वो किसे भाएगा? ख़ैर जाने दो, हम लोगों में तो ये सब चलता ही रहता है. हम अनपढ़ों में कहां इत्ती अकल कि छोरे-छोरी का भेद न करें. जिस छोरी की क़िस्मत भली होगी, उसे भगवान आप जैसों के घर भेजे है. अपनी गुड़िया को ही देख लो. रानी बनकर राज करे है घर भर पर.” शगुना दर्द भरी आवाज़ में बोली.

शगुना की आख़िरी बात उमा के दिल को तीर की तरह भेद गई. इसे क्या पता गुड़िया के अस्तित्व की रक्षा के लिए कितने प्रयत्न करने पड़े थे उसे. बेटियों को मारने का चलन अनपढ़ों से ़ज़्यादा पढ़े-लिखे, संपन्न परिवारों में है, जो अपना जीवन भगवान की इच्छा से नहीं, बल्कि अपने समीकरणों पर जीना चाहते हैं. क्यों हर तरह से संपन्न परिवार भी लड़की के जन्म को भारी मन से लेता है. पता नहीं वो कौन-सी मानसिकता है, जो उन्हें अपने ही अंश को नष्ट करने के लिए उकसाती है.

उमा चाय लेकर अपने कमरे में आ गई. मगर अब उसे पीने का मन न हुआ. जो कुछ उसके सामने आनेवाला था, उसके लिए वो अभी तैयार नहीं थी. शगुना की बातें उसके कानों में अभी भी गूंज रही थीं. दिखने में पतली-दुबली, क्षीण-सी काया वाली शगुना, मगर भीतर कितनी हिम्मती, कितनी साहसी है. एक अनदेखे, अजन्मे बच्चे के लिए एक ही झटके में सब कुछ छोड़ दिया. न समाज की चिंता, न सिर पर छत की फ़िक्र, न पति का मोह. मुझमें क्यों नहीं है इतनी हिम्मत? मैं तो मनोज के बिना रहने की कल्पना भी नहीं कर सकती. मैं तो पढ़ी-लिखी होकर भी शगुना के आगे कुछ नहीं. क्या हूं मैं? एक जीती-जागती इंसान या एक खिलौना, जिसे चलानेवाला रिमोट कंट्रोल दूसरों के हाथ में है? उमा स्वयं के विचारों में बुरी तरह से उलझी थी. बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं सूझ रहा था.

मनोज उठकर अपने दैनिक कार्यों में व्यस्त हो गया. उमा उससे कुछ न कह सकी, पर वो अजीब-सी कशमकश में थी. थोड़ी देर में मांजी भी आ गईं. उमा की ख़राब तबियत की वजह समझ आते ही मांजी ख़ुशी से फूली नहीं समाईं और बोलीं, “मैं जानती थी, ऐसा ही होनेवाला है. देवी मां मुझे निराश नहीं करेंगी. उसने तो रात ही को मुझे ध्यान में बता दिया था कि मेरे घर पोता आनेवाला है.”

अपनी तीव्र इच्छाओं की पूर्ति की ख़बर सपने या कल्पना में अपने इष्ट देवी-देवता से सुनी ईश्‍वर वाणी नहीं, बल्कि अपने ही मन का बुना भ्रमजाल है. ये बात मांजी नहीं समझती थीं.

Deepti Mittal

      दीप्ति मित्तल

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कहानी- हरी गोद 1 (Story Series- Hari Godh 1)

कहने को तो पूरा परिवार देवी मां का परम भक्त था, लगभग रोज़ ही किसी न किसी घर में देवी मां के नाम पर कुछ न कुछ कर्मकांड होता ही रहता. मगर जब बात देवी के वास्तविक रूप कन्या के जन्म की होती तो घर के बड़े-बूढ़ों के मुंह ऐसे उतर जाते, जैसे किसी ने उनकी समस्त संपत्ति छीन ली हो.

आज सवेरे उठने के बाद से ही उमा को कुछ ठीक नहीं लग रहा था. एसिडिटी भी हो रही थी, लगता है फिर से प्रेग्नेंसी… छह दिन ऊपर हो चले हैं, पीरियड्स भी नहीं आए हैं… प्रेग्नेंसी के बारे में सोचकर ही उसका दिल घबराने लगा. धड़कनें तेज़ हो गईं.

वो मां बनना चाहती थी. चाहती थी कि पांच साल से सूनी पड़ी उसकी गोद एक बार फिर हरी हो जाए, मगर पिछले दो बार से उसे जिस पीड़ा और क्षोभ भरे अनुभवों से गुज़रना पड़ा था, उसकी याद आते ही उसका मन खिन्न हो गया. कहीं इस बार भी वही सब दोहराया गया तो… हे ईश्‍वर, रक्षा करना… वो गहरी सांस भरकर बिस्तर पर बैठ गई.

गुड़िया और मनोज अभी सोए हुए थे. आज रविवार था, दोनों के लिए देर तक सोने का दिन. मांजी बड़े ताऊजी के घर गई हुई थीं. नवरात्रि चल रही थी. पोते के जन्म की मन्नत पूरी करने के लिए उनके यहां देवी का जागरण था. जाते हुए मांजी प्रसन्न नहीं थीं, “पता नहीं देवी की हम पर कब कृपा होगी? मुझे पोते का मुंह दिखा दे तो मैं भी जागरण कराऊं.” देवी मां की परम भक्त मांजी ने कोई मंदिर, कोई उपवास नहीं छोड़ा था. हालांकि घर हर तरह से संपन्न था, किसी चीज़ की कोई कमी नहीं थी. फिर भी मांजी को लगता था कि देवी की उन पर कृपा नहीं है, तभी तो घर में उनके पोते की जगह पांच साल की पोती गुड़िया लिए बैठी थी.

उमा की भरी-पूरी ससुराल थी. चार बहुओं में तीसरी थी मांजी. सबके घर आसपास थे, साझा व्यापार था और रोज़ का साथ उठना-बैठना था. हर घर की रत्ती-रत्ती ख़बर दूसरे के घर को रहती. मांजी के अनुसार बाकी सब पर देवी मां की असीम कृपा थी, क्योंकि खानदान की सभी बहुएं बेटे जन रही थीं सिवाय उमा के. पांच साल पहले गुड़िया को जना था. उसके बाद दो प्रयासों में लड़के को गर्भ में धारण करने में असफल रही थी, इसलिए उमा उनकी नज़रों में हीन व तिरस्कृत थी.

बाकी सभी बहुओं ने कैसे गर्भ में आई कन्या का सफ़ाया कर मात्र लड़कों को पैदा करने का गौरव प्राप्त किया है, ये बात उमा से छिपी नहीं थी. वो गर्भ परीक्षण कर लिंग भेद के आधार पर होनेवाले गर्भपात की घोर विरोधी थी. आख़िर उसके पापा ने उसे और उसकी बहन को बड़े लाड़-दुलार से पाला है. अतः ऐसी नीच मानसिकता के बीज उसके मस्तिष्क में कभी नहीं पड़े थे. मगर उसकी संपन्न और पढ़ी-लिखी ससुराल में तो माजरा ही उल्टा था. कहने को तो पूरा परिवार देवी मां का परम भक्त था, लगभग रोज़ ही किसी न किसी घर में देवी मां के नाम पर कुछ न कुछ कर्मकांड होता ही रहता. मगर जब बात देवी के वास्तविक रूप कन्या के जन्म की होती तो घर के बड़े-बूढ़ों के मुंह ऐसे उतर जाते, जैसे किसी ने उनकी समस्त संपत्ति छीन ली हो.

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उमा को जब भी किसी भाभी के गर्भपात की ख़बर मिलती तो उसका मन घृणा और क्रोध से भर जाता. ऐसा कोई कैसे कर सकता है अपने ही बच्चे के साथ? मगर जब उसने पहली बार गर्भधारण किया तो समझ में आया कि बेचारी भाभियों का कोई कसूर नहीं था. संयुक्त परिवार में घर के बड़ों के भीषण दबाव को झेलना कोई बच्चों का खेल नहीं. अच्छे-अच्छे चित्त हो जाते हैं, फिर घर में एक लाचार पशु-सी बंधी बहू की हैसियत ही क्या है, जो अपना विरोध जताकर मुसीबतों को आमंत्रित करे.

फिर भी उमा ने हिम्मत नहीं हारी, “मनोज, प्लीज़ ये हमारा पहला बच्चा है, मैं इसे अवश्य जन्म दूंगी.”

“मैं तुम्हारी मनोस्थिति समझता हूं उमा. ये तुम्हारा ही नहीं, मेरा भी बच्चा है. मां को तो मना लूंगा, मगर ये जो रिश्तेदारों की फौज आसपास जमा है, जो आग में घी डालती है, उससे कैसे निपटूं?” मनोज भी परेशान था.

“चाहे जो भी हो, मैं सोनोग्राफ़ी नहीं कराऊंगी. जैसे भी हो, मांजी को तुम्हें मनाना ही पड़ेगा,” उमा बोली.

बच्चे को लेकर उमा किसी भी समझौते को तैयार नहीं थी. अतः एक योजना के तहत उमा मायके चली गई और जब मांजी को उसके गर्भ की ख़बर लगी, तब तक गर्भपात के लिए बहुत देर हो चुकी थी. पहला बच्चा था, इसलिए उमा की नासमझी का नाटक मांजी समझ नहीं पाईं. फिर गुड़िया का जन्म हुआ था, जिसे मांजी ने बुझे मन से स्वीकार किया. उसके जन्म पर न तो कोई जागरण हुआ, न ही बधाई के गीत गाए गए. मगर उमा और मनोज ख़ुश थे. कोई और करे न करे, वो अपनी नन्हीं-सी जान को बेहद प्यार करते थे.

दो साल बाद उमा फिर गर्भवती हुई. पर इस बार मांजी पूरी तरह से सजग थीं. वो पहली भूल को किसी भी क़ीमत पर दोहराना नहीं चाहती थीं. उमा की छोटी से छोटी हरकत पर भी उनकी पैनी नज़र थी, वो बच न सकी. मां के इमोशनल ड्रामे, रोने-धोने और क्लेश से बचने के लिए मनोज अनचाहे मन से ही सही, उमा पर दबाव डालने लगा. “उमा, मां को हर बार संभालना मेरे लिए असंभव है. पिछली बार हमारी बात रह गई थी. लेकिन इस बार मां के मन की हो जाने दो. घर का तनाव मुझसे बर्दाश्त नहीं होता. मैं शांति से जीना चाहता हूं.”

Deepti Mittal

    दीप्ति मित्तल

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