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कहानी- वट पूजा 4 (Story Series- Vat Puja 4)

“शिकायत तो इसी बात को लेकर है कि तुम साथ चलने की बजाय अलग-अलग रास्तों पर चलने में विश्‍वास करते हो, जबकि तुम्हारी मंज़िल एक ही है. तुम उसके साथ शरीर शेयर कर सकते हो, तो मन शेयर करने में क्या प्रॉब्लम है?” मनस्वी ने बहुत कटु होकर पूछा. “तुम मन की पूरी आज़ादी, पूरा स्पेस चाहते हो तो तन का भी बंधन क्यों स्वीकार किया?”

मनस्वी के प्रश्‍न पर अमर निरुत्तर रह गया.

अमर की भाभी मनस्वी से शंभवी और अमर के बीच फैली उदासी छिपी न रह सकी. उन्होंने कई बार चाहा कि हस्तक्षेप करें, पर पति-पत्नी के बीच कहना उन्हें ठीक न लगा. लेकिन जब उन्होंने देखा कि दोनों के बीच दूरियां ब़ढ़ती ही जा रही हैं, तो उनसे रहा न गया. एक दिन अमर को उन्होंने आड़े हाथों ले ही लिया.

“अमर, मेरी बात को ज़रा समझने की कोशिश करो. इस गुरूर में मत रहो कि तुम्हें शंभवी की ज़रूरत नहीं है या तुम्हें दूसरी कोई मिल जाएगी.

शंभवी जितना स्पेस तुम्हें शायद ही कोई और लड़की दे पाएगी. उसने तुम्हारी इग्नोरेंस, तुम्हारे ईगो को बहुत बर्दाश्त किया है. अपने जीवन में उसकी अहमियत महसूस करने के बाद भी तुम अपने ईगो के कारण हर क़दम पर उसकी उपस्थिति को बुरी तरह नकारते रहे. उसने तुम्हें पूरा स्पेस दिया. लेकिन उसके एडजस्टमेंट को सराहने की बजाय तुमने उसके अस्तित्व को, उसके रिश्ते को ही एक शून्य बना डाला. इस शून्य में भटकते हुए अगर उसकी टूटी हुई डोरी कहीं और बंध गई तो शंभवी को दोष मत देना. अगर ऐसा कभी हुआ तो मैं शंभवी का ही साथ दूंगी. लेकिन ऐसा हो इसके पहले संभल जाओ.” मनस्वी ने तीखी नज़रों से अमर की ओर देखते हुए कठोर स्वर में कहा.

“मुझे समझ में नहीं आ रहा है कि आज अचानक आपको हो क्या गया है? मैं आज़ादी में विश्‍वास रखता हूं और उसे भी अपना मनचाहा करने से कभी रोका नहीं है मैंने. तब आख़िर शिकायत किस बात की है?” अमर भौंचक्का-सा होकर बोला.

“शिकायत तो इसी बात को लेकर है कि तुम साथ चलने की बजाय अलग-अलग रास्तों पर चलने में विश्‍वास करते हो, जबकि तुम्हारी मंज़िल एक ही है. तुम उसके साथ शरीर शेयर कर सकते हो, तो मन शेयर करने में क्या प्रॉब्लम है?” मनस्वी ने बहुत कटु होकर पूछा. “तुम मन की पूरी आज़ादी, पूरा स्पेस चाहते हो तो तन का भी बंधन क्यों स्वीकार किया?”

मनस्वी के प्रश्‍न पर अमर निरुत्तर रह गया.

“परसों वट पूर्णिमा है. शंभवी को मार्केट ले जाकर उसे अपनी पसंद की साड़ी दिलाओ. यूं होंठ तिरछे करके हंसने की ज़रूरत नहीं है. ये रीति-रिवाज़, तीज-त्योहार रिश्तों को पास लाने के लिए ही बनाए गए हैं और हो सके तो अपने लिए भी शंभवी की पसंद से कुछ ले लेना. तुमको भी अच्छा लगेगा.” और पलभर को अमर के हाथ पर अपने हाथ का दबाव देकर मनस्वी अमर के केबिन से बाहर निकल गई.

अब शंभवी को भी समझाना ज़रूरी है, यह सोच मनस्वी शंभवी से मिलने निकल पड़ी.

“मैं जानती हूं बरगद की पूजा करने या भूखे रहने से कभी भी किसी आदमी की न तो जान बचाई जा सकती है और न ही उसकी उम्र को लंबा किया जा सकता है. लेकिन देखा जाए तो ये छोटी-छोटी बातें हमें एक-दूसरे से जोड़ने में कितनी अहम् भूमिका निभाती हैं. बरगद की पूजा करके तुम अमर की उम्र भले ही न बढ़ा पाओ, पर अपने और उसके रिश्ते को बरगद की तरह मज़बूत करने की पॉज़ीटिव सोच तो अपने अंदर विकसित कर ही सकती हो न. इन रीति-रिवाज़ों को निभाने के पीछे  मूल भावना बस यही होती है कि हम आपस में एक-दूसरे के प्रति जुड़ाव महसूस करते रहें.” मनस्वी ने चाय का एक लंबा घूंट भरते हुए कहा.

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“अमर को अपने स्पेस के सिवा और किसी बात से कोई मतलब ही नहीं है भाभी. तो फिर मैं अपने भीतर उस रिश्ते के लिए पॉज़ीटिव सोच विकसित करके अपने आपको तकलीफ़ क्यों दूं?” शंभवी दर्दभरे स्वर में बोली.

उसके कंधे पर हाथ रखते हुए मनस्वी ने प्यार से समझाया, “मैं तुम दोनों के बीच दख़लअंदाज़ी नहीं करना चाहती थी, इसलिए अब तक चुप रही, पर अब नहीं. वो स्पेस चाहता था तो तुमने भी उसे जोड़े रखने की कोई कोशिश नहीं की. अब मैं चाहती हूं, तुम उसे जोड़ो. बरगद की पूजा करते समय मैं चाहती हूं कि तुम उसकी मज़बूती और छांव की इच्छा पैदा करो. जहां इच्छाएं होती हैं, वहीं पर उन्हें पूरा करने के लिए मनुष्य प्रयत्न करता है.”

और शंभवी की आंखों के सामने पार्क के कोने में लगा वो विशाल बरगद का पेड़ और उसकी सुकून भरी छांव तैर गई. तब शंभवी को महसूस हुआ कि सच में उसे भी इस छांव की कितनी ज़रूरत है.

“आप पूजा करने कितने बजे जाएंगी? मैं आपके साथ ही चलूंगी.” शंभवी ने चाय का खाली कप टेबल पर रखते हुए मनस्वी से पूछा. और शाम को एडीटर महोदय से अमोल के बारे में निवेदन करके शंभवी अमर के साथ मार्केट चली गई. अपने लिए पीली रंग की  साड़ी लेने और अमर के लिए एक शर्ट ख़रीदने.

•abhilasha

     अभिलाषा

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कहानी- वट पूजा 3 (Story Series- Vat Puja 3)

लेकिन आज अमोल के मन में शंभवी के लिए पलभर की कमज़ोरी पैदा हो गई थी. कल को यदि अमर के साथ अपने रिश्ते के टूटने पर उसके भी मन में एक कमज़ोरी पैदा हो जाए तो? और यदि किसी दिन अमोल और शंभवी के कमज़ोरी के क्षण एक ही हो जाएं तो? अपने-अपने रिश्तों में दोनों जिस तरह घुटते जा रहे हैं, हो सकता है किसी दिन खुलकर सांस लेने के लिए एक-दूसरे के कंधों पर अपना सिर रख लें. 

आज तो वह अडिग थी, इसलिए अमोल की कमज़ोरी को उसने हावी नहीं होने दिया. लेकिन यदि वह किसी दिन अडिग न रह पाई तो…? अमर की उपेक्षा उसे अंदर तक तोड़ दे और वह ख़ुद भी अमोल के आगे बिखर जाए…

अपने घर को तिनका-तिनका जोड़कर बनते देखने का, अपने शौक़ के अनुसार सजाने, घर से जुड़ने का उसका ख़्वाब चूर-चूर हो गया. तभी तो अमर का आलीशान मकान उसे अपना घर कभी नहीं लगा.

अमर के व्यवहार ने शंभवी के रिश्ते में ही नहीं, मन में भी बहुत बड़ा खालीपन, एक शून्य पैदा कर दिया था और इसी शून्य में तैरते हुए एक दिन अचानक ही वह अमोल से जा टकराई.

अमोल ने उसके व्यक्तित्व को, उसकी प्रतिभा को पहचाना.

“अपने भावों को अपने अंदर घुटने मत दो. उन्हें शब्दों के रूप में बहने दो पन्नों पर, बाहर आने दो…”

शंभवी ने लिखा और फिर लिखती ही गई. अमोल ने हर मोड़ पर दोस्त बनकर उसका साथ दिया. शंभवी के भावों को, उसके अंदर ही घुटते जाने से बचाता रहा. अपने अंदर की हताशा-निराशा से बाहर आने पर शंभवी के लिए अमर के व्यवहार को सहन करना थोड़ा आसान हो गया. शब्दों के साथ-साथ अमोल की दोस्ती ने उसके अंदर के खालीपन को काफ़ी हद तक भर दिया था. लेकिन अपने अंदर के खालीपन को भरने के लिए अमोल के साथ कोई रिश्ता बनाकर वह अनन्या के जीवन में कोई खालीपन पैदा नहीं करना चाहती.

बरगद के पे़ड़ पर धूप उतरने लगी थी. लेकिन उसके नीचे अब भी कितनी ठंडी छांव थी. काश, उसके जीवन का सबसे ख़ास रिश्ता भी उसके जीवन को ऐसी ही ठंडी छांव, ऐसा सुकून दे पाता और एक गहरी सांस भरकर शंभवी घर लौट आई. पर पता नहीं क्यों शंभवी का मन बरगद के पेड़ की छांव तले ही छूट गया था. तपती धूप में झुलसते उसके मन और जीवन को भी तो किसी ऐसे ही बरगद के पेड़ की शीतल स्निग्ध छांव की ज़रूरत है.

आज पलभर को अमोल के कमज़ोर पड़े मन ने शंभवी को अंदर तक आहत कर दिया. वह जानती थी कि अनन्या के दमघोंटू प्यार से त्रस्त होकर अमोल कुछ पलों के लिए उसके सामने भावनाओं में बह गया था. मन की गहराइयों से तो वह भी ऐसा कुछ नहीं चाहता है.

लेकिन आज अमोल के मन में शंभवी के लिए पलभर की कमज़ोरी पैदा हो गई थी. कल को यदि अमर के साथ अपने रिश्ते के टूटने पर उसके भी मन में एक कमज़ोरी पैदा हो जाए तो? और यदि किसी दिन अमोल और शंभवी के कमज़ोरी के क्षण एक ही हो जाएं तो? अपने-अपने रिश्तों में दोनों जिस तरह घुटते जा रहे हैं, हो सकता है किसी दिन खुलकर सांस लेने के लिए एक-दूसरे के कंधों पर अपना सिर रख लें.

आज तो वह अडिग थी, इसलिए अमोल की कमज़ोरी को उसने हावी नहीं होने दिया. लेकिन यदि वह किसी दिन अडिग न रह पाई तो…? अमर की उपेक्षा उसे अंदर तक तोड़ दे और वह ख़ुद भी अमोल के आगे बिखर जाए…

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हम बाहर से तभी बिखरते हैं, जब अंदर से टूटे हुए हों. ऊपर से अपने आपको संपूर्ण रखने के लिए हमें अंदर से ख़ुद को मज़बूती से जोड़े रखना होगा, अपनी-अपनी धुरियों के साथ. इन धुरियों से ज़रा-सा भी पांव बाहर निकला तो ताउम्र अंधेरे निर्वात में तिनके की तरह उड़ते रहेंगे.

स्टडी रूम में खड़ी शंभवी ने परदा एक ओर सरकाकर खिड़की खोल दी. ताज़ी हवा का एक झोंका आकर कमरे में पसर गया. इससे पहले कि अनन्या का प्रगाढ़ प्यार अमोल में कमज़ोरी के इन क्षणों का इज़ाफ़ा करता जाए और शंभवी भी फिर उसे संभाल न पाए, अमोल को सांस लेने और जीने के लिए एक स्पेस का मिलना बहुत ज़रूरी है. जब वह खुलकर सांस लेगा, तभी तो अनन्या के साथ अपने रिश्ते को भी ज़िंदा रख पाएगा.

पागल है अनन्या! नहीं समझती कि इस तरह ज़बर्दस्ती अपने साथ बांधे रखकर किसी को भला अपना बनाया जा सकता है क्या? नहीं, इस तरह किसी भी रिश्ते को सफल नहीं बनाया जा सकता. रिश्ते और प्यार की सफलता तो तब है, जब सामनेवाले को पूरी तरह से मुक्त कर देने के बाद भी वह लौटकर आप ही के पास आ जाए.

पर इस तरह से इतना बंधन में जकड़ने से तो वह अमोल के लौट आने के सारे रास्ते ही बंद कर देगी. अमोल अनन्या के पास लौट जाए, इसके लिए अनन्या को बंधन ढीले करने ही होंगे. अमोल को स्पेस देना ही होगा.

शंभवी ने तय किया कल ही एडीटर से कहेगी कि अमोल को महीनेभर के लिए किसी आर्टिकल या स्टोरी पर काम करने के लिए शहर से दूर भेज दे, ऑफ़िशियल टीम के साथ.

 

अभिलाषा

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कहानी- वट पूजा 2 (Story Series- Vat Puja 2)

उसे चाहिए एक ऐसा साथी, जो उसे पल्लू में बांधकर न चले, बल्कि साथ चले. स्वयं भी स्वतंत्र रहे और उसके क़दमों को भी स्वतंत्रता से चलने की अनुमति दे. अनन्या स्पेस के लिए अमोल की इस छटपटाहट को नहीं समझती. शंभवी स्पेस के महत्व को समझती है. तभी वह अमोल की छटपटाहट को भी समझ गई थी. वह अमोल को पूरा स्पेस देती है. वह अमोल को सुनती है, जब वह बताना चाहता है. वह कभी भी उसकी मर्ज़ी के ख़िलाफ़ उसे किसी बात के लिए कुरेदती नहीं है.

शंभवी के अपने रिश्ते को लेकर जो सपने थे, वे भी कहां पूरे हो पाए. अमोल और शंभवी दोनों ही तो रिश्तों में अपनी अपेक्षाओं के पूरे न हो पाने की वजह से दुखी थे.

 अमोल की अपने रिश्ते से ‘स्पेस’ की जो अपेक्षा थी, वो उसे कभी नहीं मिला. अमोल सांस लेने के लिए थोड़ा-सा स्पेस चाहता था. उसके लिए रिश्ते में थोड़ा स्पेस का होना बहुत ज़रूरी था. स्पेस मिलने पर वह रिश्तों को बेहतर ढंग से निभाने के बारे में सोच सकता था. अनन्या रिश्तों में स्पेस के महत्व को बिल्कुल भी नहीं समझती. वह हर समय अमोल के गले में अपने बांहों का घेरा डालकर उसे अपने साथ जकड़कर रखना चाहती है.

अमोल की हर सांस पर अनन्या की नज़र रहती है. वह सामनेवाले को अपने साथ कसकर बांधे रखने को ही रिश्ते की मज़बूती मानती है. वह समझती है कि रिश्ता तभी सफल व प्रगाढ़ होता है जब दोनों को एक-दूसरे की हर सांस की ख़बर हो, एक-दूसरे से कुछ भी छुपाने को वह बेवफ़ाई मानती है. अनन्या का ऐसा साथ ख़ुशनुमा न रहकर दमघोंटू हो गया है अमोल के लिए. हरदम वह अनन्या के पल्लू से बंधकर उसके पीछे-पीछे नहीं चल सकता. उसके क़दम अपना रास्ता नापना चाहते हैं. उसका अपना स्वतंत्र व्यक्तित्व है, विचार है और उनके विकास के लिए उसे स्पेस चाहिए.

उसे चाहिए एक ऐसा साथी, जो उसे पल्लू में बांधकर न चले, बल्कि साथ चले. स्वयं भी स्वतंत्र रहे और उसके क़दमों को भी स्वतंत्रता से चलने की अनुमति दे. अनन्या स्पेस के लिए अमोल की इस छटपटाहट को नहीं समझती. शंभवी स्पेस के महत्व को समझती है. तभी वह अमोल की छटपटाहट को भी समझ गई थी. वह अमोल को पूरा स्पेस देती है. वह अमोल को सुनती है, जब वह बताना चाहता है. वह कभी भी उसकी मर्ज़ी के ख़िलाफ़ उसे किसी बात के लिए कुरेदती नहीं है.

शंभवी के अपने रिश्ते को लेकर जो सपने थे, वे भी कहां पूरे हो पाए. अमोल और शंभवी दोनों ही तो रिश्तों में अपनी अपेक्षाओं के पूरे न हो पाने की वजह से दुखी थे.

शंभवी को अपने रिश्ते में बहुत ज़्यादा स्पेस मिली है, इतनी ़ज़्यादा कि दोनों के बीच बहुत जगह खाली पड़ी है. और दूर-दूर तक फैली इस जगह में ढेर सारी इग्नोरेंस है. इतनी ज़्यादा कि शंभवी को अपने अस्तित्व के होने में ही संदेह होने लगता है. उसे लगता है कि अमर जहां खड़ा है, उस ओर से कोई भी डोर शंभवी तक नहीं पहुंचती है. बहुत ढूंढ़ने पर भी इस स्पेस में वह आज तक अपना रिश्ता खोज नहीं पाई है. बस, इस स्पेस में वह तिनका-तिनका बिखरती जा रही थी. अमर की ज़िंदगी में उसकी कोई जगह है भी या नहीं, वह आज तक समझ नहीं पाई. उसके साथ एक अजनबी की तरह रहती आ रही है.

इस एहसास से खीझकर एक दिन शंभवी बिफर पड़ी थी. “आख़िर तुम चाहते क्या हो अमर? तुम्हारी ज़िंदगी में मेरी कोई अहमियत, कोई जगह है भी या नहीं? एक ही घर में रहते हुए तुम इस तरह से मुझे नज़रअंदाज़ करते हो, जैसे कि मैं यहां हूं ही नहीं. पति-पत्नी का रिश्ता स़िर्फ बिस्तर तक ही नहीं होता, उसके आगे भी बहुत कुछ होता है.”

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अमर ने तब उसकी ओर ऐसे देखा था जैसे कि वह किसी दूसरी ही दुनिया से आई हो और दूसरी भाषा में बोल रही हो. फिर होंठों पर एक तिरछी हंसी लाकर बोला, “कब किस बात के लिए टोका है तुम्हें मैंने? कैसी अजीब बातें कर रही हो. किस दुनिया में रहती हो? मैं बच्चा नहीं हूं और न ही तुम छोटी बच्ची हो, जो किसी की उंगली पकड़कर चलते रहें. बी बोल्ड. अपने ़फैसले, अपनी लाइफ़ को ख़ुद हैंडल करना सीखो. मैं उस टिपिकल मैंटेलिटी वाला हसबेंड नहीं हूं, जो शाम को घर आते ही बीवी को दिनभर का पुराण सुनाने बैठ जाए. मैं जो तुम्हें बताना ज़रूरी समझूंगा, वही बताऊंगा.”

और शंभवी को बताने लायक ज़रूरी बातों में ‘शाम को खाना नहीं खाऊंगा’ और ‘आठ बजे तैयार रहना, फलाने के साथ डिनर पर जाना है’ के अलावा कुछ नहीं होता. रिश्ते के बीच का सहज वार्तालाप और पूछ-परख अमर को हमेशा ही बेवजह दख़लअंदाज़ी करना लगता और आख़िरकार शंभवी ने भी  बेवजह का दख़ल देना बंद कर दिया.

अमर ऑफ़िस के अलावा कहां आता-जाता है, किससे मिलता-जुलता है, शंभवी को कोई ख़बर नहीं होती. कई बार अमर के बारे में उसे दूसरों से पता चलता है. तब वह ख़ुद को कितना पराया महसूस करने लगती है. तब कितनी सोचनीय स्थिति हो जाती है उसकी, जब कोई अमर के बारे में कोई बात पूछता है और उसे पता ही नहीं होता.

अमर के सारे फैसले अकेले के होते हैं, शायद शंभवी से पूछने या उसकी राय लेने की ज़रूरत महसूस ही नहीं हुई कभी. जब मकान तैयार हो गया, तब बेजान फ़र्नीचर और बाकी सामान के साथ ही उसे भी उठाकर नए मकान में श़िफ़्ट कर दिया गया.

abhilasha

अभिलाषा

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कहानी- वट पूजा 1 (Story Series- Vat Puja 1)

लेकिन शंभवी अब भी अमोल की तरफ़ न देखकर सामनेवाले बरगद के पेड़ को ही देखे जा रही थी. वह जानती थी कि इस समय अमोल के चेहरे पर कुछ-कुछ याचना के भाव होंगे और विश्‍वास से दमकते जिस चेहरे ने आज तक उसे संबल दिया है, ‘चाहने’ की कमज़ोरी से ऊपर उठाकर उसे ‘देने’ के लायक बनाया है, आज उसी चेहरे पर वह ‘चाहने’ की कमज़ोरी नहीं देख पाएगी.

“हम इसीलिए तो दुखी नहीं रहते हैं, बल्कि टूटते जाते हैं, क्योंकि अपने बहुत ख़ास रिश्तों से हमें जो अपेक्षा होती है, वो पूरी नहीं हो पाती. मुझे समझ में नहीं आ रहा है कि हमारे बीच अच्छी अंडरस्टैंडिंग है, हम एक-दूसरे को अच्छी तरह से समझते हैं, एक-दूसरे के सुख-दुख बांटते हैं, हमें एक-दूसरे पर भरोसा है, यही काफ़ी है. फिर अपने रिश्तों में बेकार उलझनें बढ़ाकर क्या फ़ायदा?’’

हर रिश्ते से कोई न कोई अपेक्षा होती है अमोल. रिश्ते का दूसरा नाम ही अपेक्षा है. जहां रिश्ता होता है, वहां न चाहते हुए भी अपेक्षा अपने आप ही रिश्तों को घेर कर खड़ी हो जाती है और इतनी तेज़ी से बढ़ती जाती है कि रिश्ते का दम ही घुट जाता है और हमारा भी. और एक दिन ख़ुद को बचाने के लिए हमें रिश्ता तोड़ देना पड़ता है. मैं नहीं चाहती कि हमारे बीच भी ऐसा कुछ हो.” शंभवी ने अमोल की ओर न देखकर सामने लगे बरगद (वट) के विशालकाय पेड़ को देखते हुए कहा.

“मैं वादा करता हूं, अपने रिश्ते में तुमसे कभी कोई अपेक्षा नहीं रखूंगा. बस, एक सांत्वना चाहता हूं कि तुम…” आगे अमोल के शब्द कहीं खो गए, पर उसकी आंखें बराबर शंभवी के चेहरे पर टिकी थीं.

लेकिन शंभवी अब भी अमोल की तरफ़ न देखकर सामनेवाले बरगद के पेड़ को ही देखे जा रही थी. वह जानती थी कि इस समय अमोल के चेहरे पर कुछ-कुछ याचना के भाव होंगे और विश्‍वास से दमकते जिस चेहरे ने आज तक उसे संबल दिया है, ‘चाहने’ की कमज़ोरी से ऊपर उठाकर उसे ‘देने’ के लायक बनाया है, आज उसी चेहरे पर वह ‘चाहने’ की कमज़ोरी नहीं देख पाएगी.

“हम इसीलिए तो दुखी नहीं रहते हैं, बल्कि टूटते जाते हैं, क्योंकि अपने बहुत ख़ास रिश्तों से हमें जो अपेक्षा होती है, वो पूरी नहीं हो पाती. मुझे समझ में नहीं आ रहा है कि हमारे बीच अच्छी अंडरस्टैंडिंग है, हम एक-दूसरे को अच्छी तरह से समझते हैं, एक-दूसरे के सुख-दुख बांटते हैं, हमें एक-दूसरे पर भरोसा है, यही काफ़ी है. फिर अपने रिश्तों में बेकार उलझनें बढ़ाकर क्या फ़ायदा? हम उस स्टेज पर नहीं हैं, जहां अपने रिश्ते को कोई अंजाम दे पाएंगे. हम दोनों ही अपनी-अपनी धुरियों से बंधे हुए हैं, वहां से उखड़कर नई धुरी पर पांव जमा पाना मुश्किल होगा.” बरगद के पे़ड़ से नज़रें हटाकर अमोल के चेहरे पर उन्हें जमाते हुए शंभवी ने अपनी बात कही.

“मैं धुरियों से उखड़ने को नहीं कह रहा हूं, मगर कुछ देर के लिए हम एक-दूसरे का हाथ तो थाम ही सकते हैं ना. अपनी-अपनी धुरियों पर जमे रहने के लिए शायद कुछ सहारा, कुछ बल ही मिल जाएगा.”

शंभवी के चेहरे का तनाव कुछ ढीला हुआ.

“सहारा और बल तो आज भी है ही. हम दोनों एक-दूसरे के साथ से ख़ुश हैं, क्योंकि हमारे बीच कोई रिश्ता नहीं है. जिस दिन हम दोनों के बीच की भावनाओं को कोई नाम मिल जाएगा, हम एक रिश्ते में बंध जाएंगे और शुरू हो जाएगा एक-दूसरे से अपेक्षाओं का सिलसिला, जो आख़िर में घूमते हुए हमें इसी मोड़ पर छोड़ जाएगा, जहां आज हम अपने-अपने वर्तमान रिश्तों के साथ खड़े हैं. बेहतर होगा कि एक-दूसरे के प्रति जो हमारे मन में आज सम्मान है, उसे कोई भी नाम न दें.”

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अमोल के चेहरे पर पलभर पहले जो कमज़ोरी के ‘कुछ चाहने’ के भाव आए थे, वे दूर हो गए और उसका चेहरा फिर विश्‍वास से चमकने लगा.

“तुम मुझे कितनी अच्छी तरह समझती हो शंभवी. मेरी पलभर की कमज़ोरी को भी तुमने कितने सहज तरी़के से दूर कर दिया.” अमोल ने शंभवी का हाथ अपने हाथ में लेते हुए कहा.

उस दिन अमोल के जाने के बाद भी देर तक शंभवी बगीचे की बेंच पर बैठकर बरगद के उस विशाल व म़ज़बूत पेड़ को देखती रही. बड़े घेरे में फैले हुए इस पेड़ की जड़ें चारों ओर से ज़मीन में उतरकर मुख्य तने को सहारा दे रही थीं. और अचानक शंभवी ने सोचा कि काश, रिश्ते भी बरगद के पेड़ की तरह होते- विशाल, मज़बूत, जिनकी जड़ें इतनी गहरी हों कि बड़ी से बड़ी आंधी भी उन्हें हिला न पाए और जो इतनी प्राणवायु पैदा करें कि उनमें बंधनेवालों का दम कभी भी न घुटे, बल्कि रिश्तों से पैदा हुई ऑक्सीजन उनमें हमेशा ऊर्जा और ताज़गी का संचार करती रहे. उन्हें छांव देती रहे, ताकि वे विपरीत परिस्थितियों में भी कुम्हलाएं नहीं.

परसों वट पूर्णिमा है, लेकिन शंभवी में कोई उत्साह नहीं है. वह ये सब ढोंग क्यों करे? किसके लिए? कोई तीज-त्योहार नहीं मनाती. जब रिश्ते में कुछ बचा ही नहीं है तो फिर ये सब… और न चाहते हुए भी शंभवी के मुख से एक गहरी निश्‍वास निकल गई.

उसके और अमर के रिश्ते की तो जड़ ही नहीं है. पता नहीं कब अपनी ज़मीन से उखड़कर उनका रिश्ता, उनके जीवन में अवांछित-सा औंधा पड़ा हुआ है, जिसे वह चाहकर भी न तो पुनः ज़मीन में रोप पा रही है और न ही उखाड़कर फेंक पा रही है. पता नहीं ज़मीन के किस अनछुए कोने में बिना जड़ और पत्तियों का उनका रिश्ता एक ठूंठ की तरह पड़ा हुआ है.

Abhilasha

अभिलाषा

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कहानी- नई राह नई मंज़िल 3 (Story Series- Nayi Raah Nayi Manzil 3)

“हर उम्र की अपनी एक सोच होती है. ग़लत कुछ भी नहीं है. ग़लत स़िर्फ यह है कि उम्र के उस दौर से गुज़रने के पश्‍चात् हम अपने एहसास को भूल जाते हैं. भूल जाते हैं कि कभी हमारी भी यही सोच थी, यही चाहतें थीं, यही उमंगें थीं. व़़क़्त गुज़र जाता है और हम अपने बच्चों की भावनाओं को न समझने की भूल कर बैठते हैं. विनीत और प्रिया ने तुम्हारा बहुत साथ निभाया है. अब तुम्हारी बारी है. तुम उनकी भावनाओं को समझो. इन छोटी-छोटी बातों से ऊपर उठो. अपने खालीपन को भरने के लिए दूसरे की स्वतंत्रता को ख़त्म कर देना कहां की समझदारी है? हमारे प्रति अपने कर्त्तव्य को बच्चे बोझ न समझने लगें, यह बहुत कुछ हमारे व्यवहार पर भी निर्भर करता है.”

“आपने तो बिल्कुल भुला दिया. कहां खो गए थे आप इन दो वर्षों में?” अपनत्व भरा उलाहना उसने दिया.

“क्या कहूं संध्या? हालात की साज़िश का शिकार हो गया था.” बेंच पर बैठते हुए मोहनजी बोले.

“क्या मतलब?” संध्या उनकी बात का अर्थ न समझ सकी.

“सविता के स्वर्गवास के तीन माह बाद मेरा भी एक्सीडेंट हो गया, जिसमें मेरा एक पैर जाता रहा. पूरे आठ माह तक हॉस्पिटल में रहा. पैर में स्टील की रॉड डाली गई.” “इतना सब कुछ हो गया और आपने ख़बर भी नहीं की.” मोहनजी के साथ हुए हादसे को सुनकर संध्या अपना दर्द भूल गई.

“कैसे ख़बर देता, एक्सीडेंट के व़क़्त मेरा मोबाइल खो गया था. तुम लोगों का नंबर उसी में फीड था.” मोहनजी ने एक गहरी सांस ली.

“ख़ैर, छोड़ो ये सब, तुम अपनी कहो, यहां पूना में कैसे? जतिन कैसा है? अब तो रिटायर हो गया होगा.” संध्या कुछ क्षण ख़ामोश रही, फिर धीमे स्वर में बोली, “रिटायर भी हो गए और मुझे छोड़कर भी चले गए.”

“यह क्या कह रही हो तुम?” विचलित हो उठे मोहनजी. संध्या की आंखों में आंसू छलक आए. रुंधे कंठ से वो बोली, “रिटायर हुए दो माह बीते थे कि एक रात सीवियर हार्ट अटैक आया. हॉस्पिटल भी नहीं पहुंच पाए, रास्ते में ही…” कहते-कहते वो सिसक उठी.

पीड़ा का आवेग कुछ कम हुआ, तो वो बोली, “उसके बाद विनीत और उसकी पत्नी प्रिया मुझे पूना ले आए.”

मोहनजी कुछ देर ख़ामोशी से सिर झुकाए परिस्थितियों को आत्मसात करने का प्रयास करते रहे, फिर धीमे स्वर में बोले, “अपनी कहो, कुछ मन लगा पूना में? क्या दिनचर्या रहती है?” संध्या ख़ामोश रही. क्या कहती? सुबह से दिल में उमड़-घुमड़ रहे वेदना के बादल बरस पड़ने को हुए, लेकिन उसने ख़ुद को रोक लिया. इतने दिनों बाद मिले हैं, क्या वो आज ही अपना रोना लेकर बैठ जाए? नहीं, यह शोभनीय नहीं होगा.

इससे पहले कि वो कोई संतोषजनक उत्तर सोच पाती, उसके मनोभावों को भांप चुके थे मोहनजी. उन्होंने कहा, “संध्या, तुम कल भी मेरी छोटी बहन थी और आज भी छोटी बहन ही हो. व़क़्त के अंतराल के साथ रिश्तों के मायने नहीं बदल जाते हैं. रिश्ते वही रहते हैं. जिस तरह तुम खोई-खोई-सी बैठी थीं, अवश्य ही कोई परेशानी है, बताओ मुझे.”

मोहनजी का सहारा पाकर संध्या भावनाओं के आवेग में बह गई. सब कुछ शांत भाव से सुनने के उपरांत मोहनजी गंभीरतापूर्वक बोले, “सच पूछो तो यह कोई समस्या है ही नहीं. यह बात उठती भी नहीं, यदि तुम शुरू से ही बीच का रास्ता अपनाती. कभी बच्चों के साथ जाना, कभी उन्हें प्राइवेसी देना ही समझदारी है. संध्या, हर इंसान अपनी प्राइवेसी और आज़ादी चाहता है. तुम्हारे बच्चे भी ऐसा चाहने लगे तो इसमें क्या ग़लत है? याद करो वो दिन, जब तुम्हारी नई-नई शादी हुई थी. जब भी जतिन फ़िल्म देखने या कहीं घूमने का प्रोग्राम बनाता, उसकी छोटी बहन तुम लोगों के साथ हो लेती थी. कितना बुरा लगता था उस समय तुम दोनों को, याद है न…?” संध्या ने गर्दन हिलाई.

मोहनजी ने अपनी बात जारी रखी, “हर उम्र की अपनी एक सोच होती है. ग़लत कुछ भी नहीं है. ग़लत स़िर्फ यह है कि उम्र के उस दौर से गुज़रने के पश्‍चात् हम अपने एहसास को भूल जाते हैं. भूल जाते हैं कि कभी हमारी भी यही सोच थी, यही चाहतें थीं, यही उमंगें थीं. व़़क़्त गुज़र जाता है और हम अपने बच्चों की भावनाओं को न समझने की भूल कर बैठते हैं. विनीत और प्रिया ने तुम्हारा बहुत साथ निभाया है. अब तुम्हारी बारी है. तुम उनकी भावनाओं को समझो. इन छोटी-छोटी बातों से ऊपर उठो. अपने खालीपन को भरने के लिए दूसरे की स्वतंत्रता को ख़त्म कर देना कहां की समझदारी है? हमारे प्रति अपने कर्त्तव्य को बच्चे बोझ न समझने लगें, यह बहुत कुछ हमारे व्यवहार पर भी निर्भर करता है.”

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मोहनजी की बातों से संध्या को मानो परिस्थितियों को समझने के लिए एक नई दृष्टि मिल गई. समस्या वो नहीं, जिसे वो मान बैठी थी. समस्या तो उसका ग़लत दृष्टिकोण था. उ़फ्, एक मां होते हुए भी वो इतनी स्वार्थी कैसे हो गई? अपनी नासमझी पर लज्जित-सी होते हुए वो बोली, “मोहनजी, नियति ने एक बार पुनः आपसे मिलवाकर मेरे घर की सुख-शांति को बिखरने से बचा लिया. अब से मैं…”

“रुको संध्या, अभी मेरी बात पूरी नहीं हुई है.” मोहनजी ने उसकी बात बीच में ही काट दी, “संध्या, सारी ज़िंदगी हम स़िर्फ अपने लिए जीते हैं. अपनी नौकरी, अपना परिवार, अपने बच्चे. इन सबसे आगे कभी सोच ही नहीं पाते. अभी वह समय है, जब समाज के प्रति भी हम अपने कर्त्तव्य का निर्वाह कर सकते हैं. दूसरों के काम आ सकते हैं. दो वर्ष पूर्व मैं भी तुम्हारी जैसी स्थिति में था. उस समय अपने बेटे-बहू के सहयोग से मैंने ‘नवनिर्माण’ नामक एक संस्था बनाई. आज इस संस्था से 15-16 लोग जुड़ चुके हैं. लोगों में चेतना जागृत करना, अपने शहर  को साफ़-सुथरा रखना, पेड़-पौधे लगाना और आसपास के लोगों की समस्याओं को दूर करना इस संस्था का काम है. कुछ महिलाएं गरीब बच्चों को पढ़ाती हैं. माह में दो बार सब लोग मिलकर आसपास ही कहीं पिकनिक मनाने भी जाते हैं. संध्या, तुम इस संस्था को ज्वाइन करोगी, तो नए-नए लोगों से मिलने से तुम्हारा समय भी अच्छा कटेगा और लोगों की समस्याओं से जुड़ने से तुम्हारी सोच की दिशा भी बदलेगी. किसी के काम आने पर आत्मसंतुष्टि तो मिलती ही है, साथ ही जीने का एक मक़सद भी मिल जाता है. लीक से हटकर कुछ अच्छा करने से तुम्हारे बच्चों को भी तुम पर गर्व होगा.” मोहनजी की बातों से संध्या की आंखों में एक नई चमक पैदा हो गई. उसे जीने की एक नई राह मिल गई थी. “मोहनजी, आप घर चलिए. विनीत आपको देखकर बहुत ख़ुश होगा.”

“संध्या, मैं कल तुम्हारे घर अवश्य आऊंगा.” संध्या ने उन्हें अपने घर का पता बताया. काफ़ी देर हो चुकी थी. उसे लग रहा था, बच्चे परेशान हो रहे होंगे. मोहनजी से विदा लेकर संध्या तेज़ क़दमों से घर की ओर चल पड़ी. ये क़दम उसे घर की ओर ही नहीं, एक नए संकल्प के साथ नई मंज़िल की ओर भी ले जा रहे थे.

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         रेनू मंडल

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कहानी- नई राह नई मंज़िल 2 (Story Series- Nayi Raah Nayi Manzil 2)

घर से तो निकल आई थी, अब कहां जाए, क्या करे, कुछ समझ नहीं आ रहा था. बस, निरुद्देश्य सड़क पर चलती जा रही थी. उसके क़दमों से भी तेज़ गति थी मस्तिष्क में उठ रहे विचारों के तूफ़ान की. कुछ तो उसे स्वयं के लिए निर्णय लेना ही होगा.

सड़क के किनारे घने छायादार वृक्ष थे. ठंडी हवा चल रही थी. काफ़ी दूर निकल आने के कारण संध्या को कुछ भय-सा लगने लगा था. कुछ थकान-सी भी महसूस हो रही थी. सड़क के किनारे बेंच दिखाई दी तो उस पर बैठ गई और आती-जाती कारों को देखने लगी.

महीनेभर में उन्होंने दिल्लीवाले घर को बेचा और उसे अपने साथ पूना ले आए. कुछ माह तक तो यहां पर भी उसका मन उचाट ही रहा. बेटा-बहू दोनों इंजीनियर थे. सुबह ऑफ़िस के लिए निकलते, तो शाम तक घर आते थे. सारा दिन वह अकेली पड़ी बोर हो जाती थी.

प्रिया ने कई बार कहा भी कि वह आसपासवालों से मेलजोल बढ़ाए, सुबह-शाम घूमने जाया करे, किंतु उसका दिल ही नहीं करता था अकेले कहीं जाने का. अपनी ओर से तो विनीत और प्रिया मां को प्रसन्न रखने का भरसक प्रयास करते. प्रिया उसके लिए पत्रिकाएं लाकर रखती. शनिवार या रविवार को तीनों कभी िफ़ल्म, तो कभी कहीं घूमने निकल जाते. अब तो उनके कलीग्स भी संध्या से काफ़ी घुल-मिल गए थे. कुल मिलाकर नए माहौल में वह रच-बस गई थी. ज़िंदगी की गाड़ी एक बार पुनः पटरी पर आ गई थी. बेटे-बहू के घर में वो सुख का अनुभव करने लगी थी, किंतु आज प्रिया के एक ही वाक्य ने उसके शांत हो चले जीवन में हलचल मचा दी थी. काश! जो कुछ भी उसने सुना, वो सच न होता. उसका मन विरक्ति से भर उठा. दुनिया में कुछ भी अपना नहीं है. नाते-रिश्ते सभी स्वार्थ की बुनियाद पर टिके हुए हैं.

अच्छा ही हुआ, जो उसका भ्रम टूट गया. कम से कम अब स्वयं को बेटे-बहू पर थोपेगी तो नहीं. न जाने कब तक वो विचारों के ताने-बाने में खोई रहती कि प्रिया ने दरवाज़ा खटखटाया. उसने आंसू पोंछे, मुंह धोया और दरवाज़ा खोल दिया. “ओह मम्मी, मैंने कितनी आवाज़ें दीं आपको. जल्दी से आइए, मैंने आपकी पसंद की खस्ता कचौरी मंगवाई है.” बोलते-बोलते यकायक रुक गई प्रिया. गौर से उसका चेहरा देखते हुए बोली, “मम्मी, आपकी तबियत ख़राब है क्या? आंखें लाल हो रही हैं.” उसकी बात को अनसुना करती हुई, वो अपने कमरे में चली गई. बुद्धि तो कह रही थी, उसे अपना व्यवहार सामान्य रखना चाहिए, ताकि बेटे-बहू को पता न चल सके कि उसने उनकी बातें सुन ली हैं, लेकिन मन साथ नहीं दे रहा था. यहां तक कि खाना भी वो ठीक से नहीं खा पाई.

सारा दिन अनमनी-सी रही. रह-रहकर जतिन याद आते रहे. काश! वो आज होते तो उसे यूं बेटे-बहू पर आश्रित न रहना पड़ता. शाम के छह बजनेवाले थे. मन में विचार कौंधा, फ़िल्म साथ जाने में प्रिया को ऐतराज़ है. हो सकता है उसका यूं उनके मित्रों के बीच बैठना भी उसे नागवार लगता हो. विनीत के कमरे में जाकर उसने कहा, “बेटे, कॉलोनी की एक परिचित महिला के साथ मैं घूमने जा रही हूं. देर से लौटूंगी. तुम लोग खाना खा लेना.”

“लेकिन मम्मी, आज अचानक? किसके साथ जा रही हो?” विनीत को आश्‍चर्य हुआ. संध्या की ओर से कोई जवाब न पाकर वो बोला, “मम्मी, कुछ देर में सभी मित्र आ जाएंगे. आप नहीं होंगी, तो किसी को अच्छा नहीं लगेगा.”

“तुम दोनों तो हो, एंजॉय करना.” कहते हुए वो कमरे से बाहर निकल गई. विनीत और प्रिया का चेहरा उतर गया. इतना तो वे दोनों भी समझ गए थे कि हो न हो मम्मी ने सुबह उनकी बातें अवश्य सुन ली हैं, तभी आज इतनी ख़ामोश और बदली-बदली लग रही हैं… और संध्या, उसका मन तो बेहद बेचैन था. घर से तो निकल आई थी, अब कहां जाए, क्या करे, कुछ समझ नहीं आ रहा था. बस, निरुद्देश्य सड़क पर चलती जा रही थी. उसके क़दमों से भी तेज़ गति थी मस्तिष्क में उठ रहे विचारों के तूफ़ान की. कुछ तो उसे स्वयं के लिए निर्णय लेना ही होगा.

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सड़क के किनारे घने छायादार वृक्ष थे. ठंडी हवा चल रही थी. काफ़ी दूर निकल आने के कारण संध्या को कुछ भय-सा लगने लगा था. कुछ थकान-सी भी महसूस हो रही थी. सड़क के किनारे बेंच दिखाई दी तो उस पर बैठ गई और आती-जाती कारों को देखने लगी. हिंजेवाड़ी रोड पर बहुत-सी आईटी कंपनियां हैं. रोज़ तो सुबह और शाम के समय यहां कारों और बसों की रेलपेल मची रहती है, किंतु आज रविवार होने के कारण सड़क पर ट्रैफिक बहुत कम था. यहां शांति से बैठकर अपने बारे में वो कुछ सोच सकती थी, लेकिन सोचे भी तो क्या? बच्चों की बातों में आकर मकान बेचने की भारी भूल वो कर बैठी थी. अब उसका ख़ामियाज़ा सारी ज़िंदगी उसे भुगतना पड़ेगा. उसने एक ठंडी सांस भरी, तभी एक पुरुष स्वर से अपना नाम सुन वो चौंक पड़ी. उसने गर्दन उठाकर देखा. पैंट-कमीज़ पहने हाथ में छड़ी थामे क़रीब पैंसठ वर्षीय पुरुष को पहचानने में उसे तनिक भी देर न लगी. “अरे मोहनजी आप?” आश्‍चर्य मिश्रित ख़ुशी उसके चेहरे पर फैल गई.

मोहनजी और उनकी पत्नी सविता के साथ अपने रिश्ते को क्या नाम दे संध्या. विवाह होकर इस घर में आई, जतिन और अपने आसपास ही पाया उसने मोहनजी और सविता भाभी को. जतिन के हृदय के तार उस परिवार से पूरी तरह जुड़े हुए थे. उस स्नेह बंधन को पल्लवित और पोषित करने में संध्या ने अपना भरपूर सहयोग दिया था. उसे आज भी याद है, कैसे उसकी हर समस्या का समाधान मोहनजी और सविता भाभी मिनटों में कर दिया करते थे. दसवीं क्लास में था विनीत जब मोहनजी ट्रांसफ़र होकर पूना आ गए थे, फिर भी उनसे संपर्क बना रहा. दो वर्ष पूर्व सविता भाभी के स्वर्गवास के समय जतिन पूना आए भी थे, किंतु फिर न जाने क्यों मोहनजी से संपर्क टूट गया.

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         रेनू मंडल

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कहानी- नई राह नई मंज़िल 1 (Story Series- Nayi Raah Nayi Manzil 1)

संध्या को लगा, पूरा घर जैसे घूम रहा है. उसने दीवार का सहारा न लिया होता, तो शायद चक्कर खाकर गिर ही पड़ती. लड़खड़ाती हुई वो बाथरूम में चली गई और दरवाज़ा बंद करके नल खोल दिया, ताकि पानी के शोर में कोई उसका रुदन सुन न सके.

आज तक उसे लगता था, बच्चे उसके सान्निध्य में ख़ुश हैं. लेकिन आज पता चला कि उसे साथ रखना उनकी विवशता है. तो क्या प्रिया का उससे स्नेह रखना, उसकी ज़रूरतों का ख़याल रखना, ये सब दिखावा है? इसमें लेशमात्र भी सच्चाई नहीं. उसे लगता था विनीत और प्रिया के साथ उसका शेष जीवन आराम से कट जाएगा, पर नियति हमेशा से ही उसके साथ अजीब खेल खेलती रही है. वो सोचती कुछ है और होता कुछ और है.

संध्या अपने बेटे विनीत और बहू प्रिया के साथ फ़िल्म देखकर घर लौटी, तो बहुत ख़ुश थी. उस दिन शनिवार था. बेटे-बहू की छुट्टी थी. दोपहर में उसने अपने हाथों से बेटे-बहू की पसंद का लंच तैयार किया था. विनीत फ़िल्म की टिकट ले आया था. शाम को तीनों फ़िल्म देखने गए और रात का खाना भी बाहर ही खाया. फ़िल्म बहुत अच्छी थी. रास्तेभर कार में तीनों फ़िल्म पर चर्चा करते रहे. संध्या को लगा, प्रिया कुछ चुप-चुप-सी थी. उसने कारण जानना चाहा तो प्रिया ने कहा, “कुछ ख़ास नहीं मम्मी. बस, थोड़ा सिरदर्द है.”

अगले दिन रविवार था, सो प्रिया और विनीत देर तक सोते रहे. आदत के मुताबिक संध्या जल्दी उठ गई. चाय पीकर उसने रात में भिगोई दाल पीस ली और झटपट दही वड़े बना लिए. शाम को घर में पार्टी थी. विनीत और प्रिया के कलीग्स आनेवाले थे. जब भी बेटे-बहू के कलीग्स घर में आते हैं, संध्या का वो दिन बहुत अच्छा कटता है. वो देर तक उनसे बातें करती. नौ बजनेवाले थे. पर्स उठाकर वह दूध लेने चली गई. सोसायटी के गेट के बाहर ही दुकान थी. दूध लेकर वो वापस लौटी, तो उसे लगा विनीत और प्रिया जाग चुके हैं. वो उनके कमरे की ओर बढ़ी, तभी प्रिया की आवाज़ उसके कानों में पड़ी. वह विनीत से कह रही थी, “मम्मी को यहां आए एक साल हो चुका है. जब से मम्मी यहां आई हैं, क्या हम लोग कभी भी अकेले कहीं गए हैं? हर व़क़्त, हर जगह मम्मी साथ होती हैं. क्या मेरा मन नहीं करता, कभी बस मैं और तुम…?”

“कैसी बातें करती हो प्रिया? तुम जानती हो, पापा के जाने के बाद मम्मी कितनी टूट गई थीं. अभी तो वो ज़रा संभली हैं और तुम ऐसी बातें कर रही हो.”

“प्लीज़ विनीत, मुझे ग़लत मत समझो. मुझे मम्मी के दुख का एहसास है, तभी तो मैंने इतने दिनों से तुमसे कुछ नहीं कहा. साथ ही मैं यह भी मानती हूं कि जितना मम्मी मेरा ख़याल रखती हैं, उतना कोई सास नहीं रख सकती. लेकिन विनीत, तुम ये क्यों नहीं समझते कि हमें भी प्राइवेसी की ज़रूरत है. रिश्ते में कुछ बैलेंस तो तुम्हें रखना ही चाहिए.”

“अब मैं भी क्या करूं प्रिया? मम्मी का कोई सर्कल भी तो नहीं है, जिसमें वो बिज़ी रह सकें.”

“अपना सर्कल वो बनाना ही कब चाहती हैं? हमारी सोसायटी की कितनी बुज़ुर्ग महिलाएं सुबह-शाम पार्क में आकर बैठती हैं, मम्मी चाहें, तो उनसे मेलजोल बढ़ा सकती हैं. लेकिन वो अकेले कहीं जाना ही नहीं चाहतीं.”

“धीरे बोलो प्रिया, मम्मी कहीं सुन न लें.”

“मम्मी दूध लेने गई हैं.” प्रिया निश्‍चिंतता से बोली. संध्या को लगा, पूरा घर जैसे घूम रहा है. उसने दीवार का सहारा न लिया होता, तो शायद चक्कर खाकर गिर ही पड़ती. लड़खड़ाती हुई वो बाथरूम में चली गई और दरवाज़ा बंद करके नल खोल दिया, ताकि पानी के शोर में कोई उसका रुदन सुन न सके.

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आज तक उसे लगता था, बच्चे उसके सान्निध्य में ख़ुश हैं. लेकिन आज पता चला कि उसे साथ रखना उनकी विवशता है. तो क्या प्रिया का उससे स्नेह रखना, उसकी ज़रूरतों का ख़याल रखना, ये सब दिखावा है? इसमें लेशमात्र भी सच्चाई नहीं. उसे लगता था विनीत और प्रिया के साथ उसका शेष जीवन आराम से कट जाएगा, पर नियति हमेशा से ही उसके साथ अजीब खेल खेलती रही है. वो सोचती कुछ है और होता कुछ और है. पता नहीं क्या लिखा है उसके हाथ की इन आड़ी-तिरछी लकीरों में कि सुख हमेशा उससे दो क़दम आगे चलता है.

जतिन का उसे यूं असमय छोड़कर चले जाना इस बात का प्रमाण है कि उसकी क़िस्मत में सुख है ही नहीं. जतिन जब तक नौकरी में थे, बेहद व्यस्त रहते थे. उनके साथ व़क़्त गुज़ारने की, अपने सभी अधूरे अरमान पूरे करने की ख़्वाहिश लिए वह उनके रिटायरमेंट की प्रतीक्षा कर रही थी. जतिन रिटायर हुए, पर अधिक दिनों तक संध्या का साथ न निभा सके. दो माह बाद ही मौत के क्रूर हाथों ने उन्हें उससे छीन लिया. स्तब्ध-सी संध्या फटी-फटी आंखों से बस देखती रह गई थी.

कब पूना से विनीत और प्रिया आए, कब जतिन का अंतिम संस्कार हुआ, उसे कुछ पता नहीं चला. होश तो तब आया, जब सब कुछ समाप्त हो चुका था. रिश्तेदार जा चुके थे. विनीत और प्रिया ने उसे अपने साथ पूना ले जाना चाहा, लेकिन वह नहीं मानी. पिछले बीस वर्षों से वह उस घर में रह रही थी. वहां की आबोहवा में जतिन की सांसें रची-बसी हुई थीं. कितनी यादें जुड़ी हुई थीं उस घर के साथ. इन्हीं यादों के सहारे वो अपना शेष जीवन गुज़ारना चाहती थी, पर अकेले रहना इतना सहज भी नहीं था.

सूना घर उसे काट खाने को दौड़ता. अकेले के लिए खाना बनाने की भी उसकी इच्छा नहीं होती थी.

उधर मां की चिंता में विनीत भी अपने काम पर ध्यान नहीं दे पा रहा था. कुछ दिनों में ही वह बीमार पड़ गई, तब विनीत और प्रिया ने उसकी एक नहीं सुनी.

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        रेनू मंडल

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कहानी- भंवर 3 (Story Series- Bhanwar 3)

कितना आहत होता होगा उसका हृदय, यह सोचकर कि एक दूसरी औरत उसके अधिकार क्षेत्र में प्रवेश कर उसके पति की अंकशायिनी बन गयी है.

और भी न जाने कितनी बातें सोचते-सोचते मुझे ख़ुद से ही घिन आने लगी. कितनी स्वार्थी हो गयी थी मैं? मैंने बस अपने दिल की चाह देखी. खैर, किरण तो परायी थी, मैं तो अपने जन्मदाताओं के हृदय की पीड़ा को भी नहीं समझ पायी, जो आज मेरे कारण स्वयं को लोगों के बीच कितना अपमानित महसूस करते हैं. उनकी वर्षों की प्रतिष्ठा को मैंने अपने एक क़दम से ही धूल-धूसरित कर दिया था.

अपनी ग़लती पर पश्‍चाताप के सिवा कुछ नहीं बचा था, पर प्रायश्‍चित करूं भी तो कैसे?

जल्द ही अमित ने मेरे लिए एक अलग घर की व्यवस्था कर दी थी, जहां कुछ ही घन्टे वह मेरे क़रीब होते थे. उन पलों में भी उनसे दूर होने का ख़ौफ़ मुझ पर छाया रहता था.

“अब मैं चलता हूं, किरण मेरा इन्तज़ार कर रही होगी.” अपनी पत्नी के लिए कहे गए उनके शब्द मेरे हृदय को, मेरे वज़ूद को तार-तार कर देते थे.

कभी जी चाहता था कि उन्हें अपने आप से दूर नोंच-नोंच कर फेंक दूं, तो कभी पागलों की तरह उन्हें अपने आलिंगन में कस कर जकड़ लेती थी.

साथ तो मुझे उनका ठीक से मिल ही नहीं पा रहा था. धीरे-धीरे प्रेम भी दम तोड़ता नज़र आने लगा था. उनकी पत्नी का स्नेह, उनका परिवार उन्हें वापस अपनी ओर खींचने लगा था, मेरी पकड़ दिन-ब-दिन ढीली पड़ती जा रही थी.

इधर मेरे विचारने की दिशा में भी परिवर्तन हुआ और मैं किरण की मनोस्थिति का अनुमान लगाने लगी. कितना आहत होता होगा उसका हृदय, यह सोचकर

कि एक दूसरी औरत उसके अधिकार क्षेत्र में प्रवेश कर उसके पति की अंकशायिनी बन गयी है.

और भी न जाने कितनी बातें सोचते-सोचते मुझे ख़ुद से ही घिन आने लगी. कितनी स्वार्थी हो गयी थी मैं? मैंने बस अपने दिल की चाह देखी. खैर, किरण तो परायी थी, मैं तो अपने जन्मदाताओं के हृदय की पीड़ा को भी नहीं समझ पायी, जो आज मेरे कारण स्वयं को लोगों के बीच कितना अपमानित महसूस करते हैं. उनकी वर्षों की प्रतिष्ठा को मैंने अपने एक क़दम से ही धूल-धूसरित कर दिया था.

अपनी ग़लती पर पश्‍चाताप के सिवा कुछ नहीं बचा था, पर प्रायश्‍चित करूं भी तो कैसे?

भयंकर मानसिक तनाव के तहत एक रात अपनी ज़िन्दगी के अंधेरे साये के साथ मैंने वह शहर छोड़ दिया था.

अपने गन्तव्य से अन्जान मैं एक ट्रेन में बैठ गयी. हालांकि मन के एक कोने में यह डर भी था कि ये क़दम किसी और गहरी खाई की ओर न ले जाए, पर इत्तेफ़ाक कहें या मेरे किसी अच्छे कर्म का फल कि उस ट्रेन में मुझे मेरी बचपन की सहेली सपना मिल गयी, जो मुझे अपने साथ यहां इस शहर में ले आयी. नितांत अन्जान लोगों के बीच, जिन्हें मेरे बीते हुए कल से कोई सरोकार नहीं था.

यह भी पढ़ेदोस्ती में बदलता मां-बेटी का रिश्ता (Growing Friendship Between Mother-Daughter)

समाज में ख़ुद को रहने लायक बनाए रखने के लिए मुझे विधवा का झूठा चोला पहनना पड़ा और तुम्हें भी इसी भुलावे में रखा कि तुम्हारे पिता एक दुर्घटना में हमें छोड़ कर हमेशा के लिए चल बसे हैं.”

अपने अतीत के पन्ने पलटते-पलटते शालिनी हांफने लगी, फिर कुछ क्षण रुक बोली, “अप्रत्यक्ष रूप से देखने-सुनने में तो आज मेरी ज़िन्दगी शान्त और व्यवस्थित है, पर अब भी उन पलों में व्यथित हो उठती हूं जब किसी स्त्री को गर्व से मांग में सिन्दूर सजाए हुए देखती हूं.

हूक उठती है एक ऐसी औरत को देखकर, जो किसी की विवाहिता के सम्बोधन से स्वयं को गौरवान्वित महसूस करती है, जिसे अपने बच्चों से पिता के विषय में झूठ नहीं बोलना पड़ता. जिसके पास हर रिश्ता है, तीज-त्योहार, उत्सव हर मौ़के पर अपने लोग आस-पास होते हैं.

वैसे तो आज हमारा समाज काफ़ी आधुनिक हो गया है, पर आज भी ऐसे संबंधों की समाज में कोई जगह नहीं. यदि अब भी किसी को मेरे गुज़रे हुए कल के विषय में पता लग गया तो उनके मन-मस्तिष्क में मेरे लिए घृणा के सिवाय कुछ शेष नहीं बचेगा और लोगों की नकारात्मक प्रतिक्रिया से तुम्हें भी अपना जीवन कलुषित प्रतीत होने लगेगा.

नेहा, तुम पढ़ी-लिखी और समझदार हो, साथ ही आत्मनिर्भर भी. अपने निर्णय स्वयं करने का अधिकार है तुम्हें, इसलिए मुझे उम्मीद है कि तुम अपनी ज़िन्दगी में ऐसा कोई क़दम नहीं उठाओगी, जो तुम्हारी आनेवाली ज़िन्दगी को नासूर बना दे.”

शालिनी ने प्यार और सांत्वना भरे स्पर्श के साथ कुछ पल नेहा के कन्धे पर हाथ रखा और फिर धीमे क़दमों से अन्दर कमरे में जा निढाल हो बिस्तर पर लेट गयी. उसका संपूर्ण तन-मन अतीत की असहनीय पीड़ा से कराह उठा था.

उधर नेहा अपने जन्म और मां की ज़िन्दगी से जुड़े इस पहलू से परिचित हो हतप्रभ बैठी थी. स्वयं को संयत करने में उसे घंटों लग गए. घर में एक अजीब-सा सन्नाटा व्याप्त हो गया, दोनों की पूरी रात इसी ख़ामोशी में बीत गयी.

अगली सुबह नेहा ने खिड़की से परदा सरकाया तो सूरज की रूपहली किरणें उसके मुखमंडल पर छितर, उसे दमकाने लगी थी. वहां रात्रि के अंधकार की मलिनता का कोई अंश शेष न था.

उसका चेहरा अपूर्व शान्ति और लिए गए निर्णय के प्रभाव से दैदीप्यमान हो रहा था. शालिनी की निगाहों से झांकते हुए प्रश्‍नों का उत्तर देने के लिए, उसने शालिनी का हाथ अपनी दोनों हथेलियों के बीच समेट जो कुछ कहा, उसे सुनकर शालिनी का हृदय इस सुखानुभूति से आल्हादित हो उठा कि उसने गहरे भंवर की ओर बढ़ते अपनी बेटी के क़दमों को पहले ही थाम लिया.

– गीता जैन

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कहानी- भंवर 2 (Story Series- Bhanwar 2)

बेबस हो मैंने फिर उनके समक्ष अपने हाथ फैला दिए, स़िर्फ उनका प्यार और साथ पाने की चाहत में. यहीं पर… कोई भी पुरुष हो कमज़ोर पड़ जाता है. शायद पुरुष का प्रकृति प्रदत्त नैसर्गिक स्वरूप है कि वह अपनी तरफ़ बढ़ते किसी स्त्री के क़दमों को चाह कर भी नहीं रोक पाता.

उनकी पत्नी का आकंठ में डूबा प्रेम और अटूट विश्‍वास भी उनके चारों ओर  वह रक्षा कवच नहीं बना पाया था, जो मुझे उनके सानिध्य और स्नेह के स्पर्श से दूर रख पाता.

मैं उनके प्रेम को अंगीकार कर भविष्य की कालिमा से बेख़बर हो वर्तमान के सतरंगी इन्द्रधनुषी सपनों में खो गयी थी.

मैं मूर्ख उस व़क़्त यह भी नहीं समझ पायी कि किसी के हरे-भरे आशियाने में सेंध लगा कर, उसे रौंद कर मैं अपनी ख़ुशियों का महल कैसे बना पाऊंगी.

“क्या पापा पहले से विवाहित थे…?” आश्‍चर्य से नेहा ने पूछा.

“हां.”

“क्या आप पहले इस सच से परिचित नहीं थीं.”

“जानती थी… पर उनके प्रेम में अंधी हो आग में हाथ जला बैठी थी.

हां, हाथ ही तो जला था मेरा, केमेस्ट्री लैब में एक्सपेरिमेन्ट करते समय, तब अमित, तुम्हारे पापा जो कि रिसर्च कर रहे थे, हमारे प्रैक्टीकल की क्लास लिया करते थे. उन्होंने ही थामा था उस समय मेरा हाथ. हाथ की जलन तो उन्होंने शान्त कर दी थी, पर जो आग मेरे हृदय में भड़क उठी थी, उसे नहीं बुझा पाये थे वो.

दिन-रात उनका ख़याल मुझे बेचैन किए रहता. मैं उन्हें जितना परे झटकती उनका अक्स उतना ही क़रीब आ मुझे झिझोड़ जाता.

स्वयं को असहाय पा एक दिन उनके सामने मैंने अपने हृदय के उद्गार आवरणहीन कर दिए थे. विस्मय से देखते रहे थे वह मेरी ओर, फिर गम्भीरता से बोले, ये नहीं हो सकता, कभी नहीं, मैं विवाहित हूं.

गहरा आघात लगा था मुझे यह सुनकर, कुछ दिन मैं ख़ामोश रही. उनसे दूर-दूर रहने का असफल प्रयास भी किया, पर सब व्यर्थ. मेरा मन किसी विष-बेल की तरह उनके इर्द-गिर्द लिपटा जा रहा था. एक रोज़ मैं स्वयं को उनसे किंचित दूर करती तो दूसरे रोज मैं उनके और नज़दीक पहुंच जाती.

बेबस हो मैंने फिर उनके समक्ष अपने हाथ फैला दिए, स़िर्फ उनका प्यार और साथ पाने की चाहत में. यहीं पर… कोई भी पुरुष हो कमज़ोर पड़ जाता है. शायद पुरुष का प्रकृति प्रदत्त नैसर्गिक स्वरूप है कि वह अपनी तरफ़ बढ़ते किसी स्त्री के क़दमों को चाह कर भी नहीं रोक पाता.

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उनकी पत्नी का आकंठ में डूबा प्रेम और अटूट विश्‍वास भी उनके चारों ओर वह रक्षा कवच नहीं बना पाया था, जो मुझे उनके सानिध्य और स्नेह के स्पर्श से दूर रख पाता.

मैं उनके प्रेम को अंगीकार कर भविष्य की कालिमा से बेख़बर हो वर्तमान के सतरंगी इन्द्रधनुषी सपनों में खो गयी थी.

मैं मूर्ख उस व़क़्त यह भी नहीं समझ पायी कि किसी के हरे-भरे आशियाने में सेंध लगा कर, उसे रौंद कर मैं अपनी ख़ुशियों का महल कैसे बना पाऊंगी.

किसी के दाम्पत्य की नींव हिलाने के फेर में, मैं स्वयं ही अपने लिए गड्ढा खोद रही हूं, पल-दो पल के साथ, निगाहों से बरसती रूमानियत और उनके स्नेहिल स्पर्श को ही मैं अपनी ज़िन्दगी समझने लगी थी.

शायद यही एक नवयौवना का दुर्बल पहलू है कि वह एक प्यारभरी नज़र पाने के लिए विवेक शून्य हो जाती है. अपनी अस्मिता, अपना भविष्य सब हृदय के वशीभूत हो दांव पर लगा बैठती है.

यही वह दौर था, जब मेरे सोचने-समझने की शक्ति विलुप्त हो गयी थी. छुपते-छिपाते मिलने और उनका इन्तज़ार करने में, मैं स्वयं को खासा रोमांचित महसूस करती थी. उनकी बांहों का घेरा मुझे अन्दर तक बसंत-बहार का एहसास दे जाता था.

शनै-शनै उनका प्रेम मेरे चेहरे की लालिमा में बढ़ोत्तरी करने लगा. स्वयं को आईने में निहार-निहार कर, मैं ख़ुद से ही शर्माने लगी थी. उनके प्रेम की सुगन्ध मेरे तन-मन में पूरी तरह व्याप्त हो चुकी थी.

और जब एक दिन… मुझे अपने वजूद के भीतर एक और अस्तित्व का एहसास हुआ तो जैसे आसमान से गिर पड़ी मैं, मेरे पांवों तले की ज़मीन खिसक गयी थी.

दिन का चैन और रातों की नींद दोनों ही कपूर की तरह उड़ गए थे. अजीब-अजीब-सी भयानक आकृतियां मुझे भयभीत करने लगीं. समाज, परिवार, दोस्त, लोक-लाज सबका डर सताने लगा था मुझे.

जब इस वस्तुस्थिति के विषय में अमित को बताया तो मौन बैठे रहे थे बहुत देर तक.

“तुम इसे…” अटकते हुए उन्होंने कहना चाहा था, सिहर उठी थी मैं, “नहीं-नहीं, मैं अपने प्रेम की निशानी को ख़त्म नहीं करूंगी. इसमें उस मासूम जान की क्या ग़लती है?”

फिर आनन-फानन में ही अपने कुछ मित्रों की उपस्थिति में हमने विवाह की रस्म निभा ली थी, जब कि हम दोनों ही जानते थे कि यह अर्थहीन है.

विवाह के बाद मेरे परिवार में जैसे हडकंप मच गया. किसी विवाहित पुरुष से विवाह…

“अरे हमारी इ़ज़्ज़त का नहीं तो कम-से-कम अपने भविष्य का तो ख़याल किया होता. एक शादीशुदा पुरुष प्यार और ऐशो-आराम भले ही दे दे, पर मान-सम्मान और सुरक्षा का एहसास नहीं दे सकता.”

“यदि अपनी मर्ज़ी से ही विवाह करना था तो चुनाव तो सोच-समझ कर करना चाहिए था, किसी को मुंह दिखाने के लायक नहीं छोड़ा हमें..”

“जानती हो, किसी शादीशुदा आदमी से जुड़ी दूसरी औरत को किस सम्बोधन से पुकारा जाता है..?”

आगे के शब्द भले ही भैया के मुंह से नहीं निकले थे. पर मेरे कानों में पिघले शीशे की तरह बहने लगे थे.

सालों से पाली-पोसी मैं लाडली बेटी पल-भर में सबकी वितृष्णा का कारण बन गयी थी. हर कोई अछूत की तरह मुझे अपने से दूर छिटक देना चाहता था. घर में भाभी अपनी बेटी को मेरे साये से भी दूर रखने लगी थीं कि कहीं मेरे व्यक्तित्व के कीटाणु उसे भी संक्रमित न कर दें.

– गीता जैन

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कहानी- भंवर 1 (Story Series- Bhanwar 1)

“नेहा, मैं जो पूछूंगी सच बताओगी?”

“कैसी बात कर रही हैं मां…, आख़िर बात क्या है. आप इतनी परेशान क्यों हैं…?”

“तुम्हारे और शशांक के बीच क्या चल रहा है…?” सीधे और सपाट शब्दों में शालिनी ने पूछा.

एक पल के लिए नेहा का चेहरा स़फेद हो गया. उसे इस प्रश्‍न की उम्मीद नहीं थी. कुछ देर कमरे में सन्नाटा छाया रहा, जो शायद तूफ़ान से पहले की ख़ामोशी का संकेत था.

थूक निगलते हुए नेहा बोली, “मैं और शशांक एक-दूसरे से प्रेम करते हैं.”

“नहीं…” एक घुटी-सी चीख शालिनी के अधरों से निकल पड़ी. वह आशान्वित थी कि शायद नेहा इन्कार करेगी, पर उसकी स्वीकारोक्ति से वह थरथरा उठी, अन्धकारमय भविष्य की ओर बेटी के बढ़ते क़दमों से उसका अन्तर्मन असीम वेदना से कराह उठा.

अनायास ही पुरानी स्मृतियों ने अंगड़ाई ली और शालिनी अपने विवाह का जोड़ा और तस्वीरें लेकर बैठ गयी.

गहरी सांस लेते हुए वह सुर्ख साड़ी को धीरे-धीरे सहलाने लगी, कोमल एहसास अचानक ही चुभन में तब्दील हो गए. उसने झटके से साड़ी एक ओर रख दी और एलबम उठाकर पन्ने पलटने लगी. एक-एक तस्वीर बीते पलों को सजीव कर हृदय को कचोटने लगी थी. धुंधलाती निगाहों से जब और तस्वीरें दिखनी बंद हो गईं तो उसने उन्हें भी एक ओर सरका दिया.

अपने कन्धे पर जाने-पहचाने स्पर्श के एहसास से उसने पीछे मुड़ कर देखा, नेहा थी, उसकी बेटी.

“मां, फिर वही सब… कितनी बार आपको कहा है, क्यों आप इन चीज़ों को खोलकर बैठ जाती हैं? जिन यादों से दिल दुखता है, क्यों आप उन्हें बार-बार कुरेदती हैं? क्यों नहीं इन्हें हमेशा के लिए दफ़न कर देतीं?”

“काश, इन्हें दफ़न करना इतना आसान होता.” कहकर शालिनी आंसू पोंछती हुई उठ खड़ी हुई.

सुबह उठकर शालिनी कॉलेज के लिए तैयार थी. आज उसे कुछ जल्दी पहुंचना था, वह इन्टर कॉलेज में शिक्षिका थी और आज वार्षिक परीक्षा के सन्दर्भ में मीटिंग थी.

नेहा को कुछ हिदायतें देकर वह घर से निकल गयी. नेहा अपनी पढ़ाई ख़त्म करने के बाद एक प्राइवेट कम्पनी में नौकरी करने लगी थी और अब शालिनी को अपनी लाडली बेटी के लिए एक अच्छे जीवनसाथी की तलाश थी.

अपनी सहकर्मी मिसेज गुप्ता के कहने पर एक मल्टीनेशनल कम्पनी में कार्यरत रोहन से मिलकर वह काफ़ी प्रभावित हुई थी.

उसके माता-पिता से मिलने का निर्णय ले, वह कम्पनी की बिल्डिंग से बाहर निकली ही थी कि उसकी नज़र सामने के रेस्टॉरेन्ट से निकले एक युगल पर पड़ी.

उसने ध्यान से देखा और अपने आप में ही बुदबुदायी, “ये तो नेहा है, पर उसके साथ… शशांक… हां शशांक ही तो है… नेहा के साथ काम करने वाली, नेहा की सहेली मीनल का पति. पर ये दोनों एक साथ मीनल के बिना…!” वह कुछ और सोच पाती तब तक दोनों कार में बैठ कर, उसकी नज़रों से ओझल हो चुके थे.

नेहा जिस अन्दाज़ से शशांक के साथ बैठी थी, उसे देख शालिनी के दिमाग़ में ढेरों प्रश्‍न कौंध गए थे. अचानक ही किसी अनहोनी की आशंका से उसका हृदय कांप उठा.

अपनी बेचैनी को नियंत्रित करते हुए उसने घर का दरवाज़ा खोला और बैग एक ओर पटक वह सो़फे पर लुढ़क गयी. उसे लगा जैसे किसी ने उसकी पूरी शक्ति निचोड़ ली है, शरीर बेजान प्रतीत होने लगा.

“तो क्या नेहा भी वही ग़लती करने जा रही है…? क्या शालिनी की कहानी एक बार फिर से शुरू हो जाएगी…?”

कब से भटक रही है वह, क्या मिल पाया है उसे? जो उसका था, वह भी खो दिया उसने सारे रिश्ते-नाते पलभर में बिखर गए. घृणा-नफ़रत, ज़िल्लत, बदनामी यही सब तो पाया था उसने, एक परछाईं के पीछे भागते हुए.

जब होश आया तो चेतना जागी और अपने क्षत-विक्षित अस्तित्व के साथ उसे अपना शहर, अपने लोग, दोस्त, परिचित सबको छोड़ मुंह छिपाना पड़ा था.

नेहा के क़दमों की आहट से उसने ख़ुद को संभालने का प्रयत्न किया.

“मां, क्या हुआ… आप इस तरह क्यों लेटी हैं…?”

“तबीयत तो ठीक है आपकी.” क़रीब बैठ मां के माथे पर हाथ रखते हुए चिन्तित स्वर में नेहा बोली.

बदहवास होती दिल की धड़कनों को काबू करते हुए उसने नेहा से प्रश्‍न किया, “नेहा, मैं जो पूछूंगी सच बताओगी?”

“कैसी बात कर रही हैं मां…, आख़िर बात क्या है. आप इतनी परेशान क्यों हैं…?”

यह भी पढ़ेशादीशुदा से प्यार अब परहेज़ नहीं (Having An Affair With Married Man?)

“तुम्हारे और शशांक के बीच क्या चल रहा है…?” सीधे और सपाट शब्दों में शालिनी ने पूछा.

एक पल के लिए नेहा का चेहरा स़फेद हो गया. उसे इस प्रश्‍न की उम्मीद नहीं थी. कुछ देर कमरे में सन्नाटा छाया रहा, जो शायद तूफ़ान से पहले की ख़ामोशी का संकेत था.

थूक निगलते हुए नेहा बोली, “मैं और शशांक एक-दूसरे से प्रेम करते हैं.”

“नहीं…” एक घुटी-सी चीख शालिनी के अधरों से निकल पड़ी. वह आशान्वित थी कि शायद नेहा इन्कार करेगी, पर उसकी स्वीकारोक्ति से वह थरथरा उठी, अन्धकारमय भविष्य की ओर बेटी के बढ़ते क़दमों से उसका अन्तर्मन असीम वेदना से कराह उठा.

“पर शशांक तो विवाहित है…” गहरी पीड़ा से भर वह बोली.

“मैं जानती हूं.” नेहा ने भावहीन स्वर के साथ संक्षिप्त-सा उत्तर दिया.

“क्या वह मीनल से संबंध-विच्छेद कर तुमसे विवाह करेगा?”

“नहीं…, पर मुझे इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता, मुझे तो बस उसका प्यार और साथ चाहिए.” शालिनी के सीने में घुमड़ते बवंडर से अन्जान नेहा ने बेतकल्लुफ़ी से स्पष्ट किया.

“प्यार और साथ ये तो वह मृग-मरीचिका है, जिस तक तुम कभी नहीं पहुंच पाओगी नेहा…” गहरी सांस भरते हुए शालिनी बोली, “जिस राह पर तुम्हारी मां चली, आज तुम भी उसी मुहाने पर खड़ी हो.”

“क्या…! ये आप क्या कह रही हैं…?” विस्फरित नेत्रों से नेहा शालिनी को देखती रह गयी.

– गीता जैन

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कहानी- बड़े पापा 3 (Story Series- Bade Papa 3)

‘’मैं धीरे-धीरे दूर होता गया और सबने मुझे सहजता से दूर होने दिया. किसी ने मुझे खींचकर अपनी चौकड़ी में शामिल नहीं किया और अगर आज तुम भी मुझे मनाने नहीं आतीं, तो मैं पूरी तरह से टूट जाता.” मन की पीड़ा कहते-कहते बड़े पापा की आंखों से अविरल अश्रुधारा बह रही थी, जो न जाने कितने बरस का जमा गुबार पिघलाकर बाहर ला रही थी.

बमुश्किल संभलकर बोले, “सुन बेटी, दिल छोटा मत कर, तू ख़ुशी-ख़ुशी जा. अगर ज़रूरी काम न होता, तो मैं भी आ जाता. ख़ैर, मेरा होना तेरे लिए ज़रूरी है, मैं तो यह सुनकर ही गदगद हो गया हूं. बाकी किसी ने तो मुझसे एक बार भी साथ चलने को नहीं कहा.”

“साथ चलने को तो मैं भी नहीं कह रही हूं बड़े पापा.” नम्रता का स्वर गंभीर था.

“तो फिर?” कृष्णचंद्र को नम्रता की बात कुछ समझ नहीं आई.

“मैं जानती हूं बड़े पापा, अगर मैं कहूंगी भी तो आप साथ नहीं आएंगे, इसलिए मैं आपको साथ चलने को कहने नहीं आई हूं. मैं तो यह कहने आई हूं कि आपके बग़ैर यह रोका नहीं होगा. उस समय, उस मुहूर्त पर आप जहां होंगे, मेरा रोका वहीं होगा. आप घर पर होंगे, तो घर में, ऑफिस में होंगे, तो ऑफिस में, कार में, शोरूम पर… आप जहां होंगे बस हमें पांच मिनट दे देना, हम वहीं रोका कर लेंगे.”

“पागल हो गई है क्या? सब व्यवस्थाएं हो चुकी हैं, आयुष के घरवाले क्या सोचेंगे.”

“वो कुछ भी सोचें, मुझे परवाह नहीं. मेरे लिए आप सबसे इंपॉर्टेंट हैं और इस बार मैं आपको यूं बच के नहीं जाने दूंगी.”

यह सब सुन कृष्णचंद्र पत्थर से जम गए. उन्हें यूं चुप खड़ा देख नम्रता जाने लगी, “चलिए ये ख़ुशख़बरी मैं बाकी सभी को भी दे आऊं कि रोका मसूरी में नहीं, बल्कि यहीं होगा, बड़े पापा के साथ.”

नम्रता को जाता देख कृष्णचंद्र पीछे से बोले, “रुक, सुन तो… मैं चलूंगा तेरे साथ.”

“क्या कहा, फिर से कहिए… मैंने ठीक से सुना नहीं.” नम्रता ने न सुनने की एक्टिंग की.

“मैंने कहा कोई ज़रूरत नहीं है किसी से कुछ कहने की, मैं साथ चलूंगा.”

“और आपके सो कॉल्ड ज़रूरी काम, उनका क्या होगा?”

“कोई ज़रूरी काम नहीं है. परिवार के आगे मेरे कभी कोई ज़रूरी काम नहीं रहे.”

“तो फिर ये न जाने का ड्रामा क्यों कर रहे थे?” नम्रता झूठा ग़ुस्सा ज़ाहिर करते हुए बोली.

“इसलिए कि कोई तो मुझे भी पूछे, मेरे साथ ज़िद करे. मेरी मान-मनुहार करे. मैं इतने सालों से तुम सभी का दुख-दर्द बिन कहे समझता आया हूं. बिन मांगे सब देता आया हूं… क्यों? क्योंकि यह परिवार मेरे लिए बहुत मायने रखता है. इस परिवार के बिना मेरा वजूद अधूरा है, मगर क्या मैं भी इस परिवार के लिए कुछ मायने रखता हूं? क्या मेरी उपस्थिति भी इस परिवार के लिए ज़रूरी है?

मैंने जब भी तुम लोगों के साथ कहीं जाने को मना किया, तो बस यह जानने के लिए कि मेरे होने या न होने से तुम लोगों को कुछ फ़र्क़ पड़ता भी है या नहीं… पर हर बार मेरे हाथ बस निराशा ही लगी.” बड़े पापा की बातें सुनकर नम्रता स्तब्ध रह गई.

“ये क्या कह रहे हैं बड़े पापा. आप हम सभी के लिए बहुत मायने रखते हैं.”

“नहीं, सभी के लिए नहीं. वरना जब भी मैंने किसी फैमिली आउटिंग या फंक्शन पर आने में असमर्थता जताई, तो क्या किसी ने मुझे साथ चलने के लिए मनाया? किसी ने कहा कि आप नहीं जाएंगे, तो हम भी नहीं जाएंगे. नम्रता, मैं भले ही बूढ़ा होता जा रहा हूं, पर मेरे अंदर अभी भी एक बच्चा छिपा है, जो तुम सबकी आंखों में अपने लिए प्यार और अहमियत देखना चाहता है. जो चाहता है कि कोई उसके कामों को, उसके योगदान को सराहे, उसकी कमी को महसूस करे. उसे यक़ीन दिलाए कि वह उनके लिए कितना महत्वपूर्ण है, मगर अफ़सोस! इस घर में सबने मुझे हमेशा फॉर ग्रांटेड ही लिया.

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मैं धीरे-धीरे दूर होता गया और सबने मुझे सहजता से दूर होने दिया. किसी ने मुझे खींचकर अपनी चौकड़ी में शामिल नहीं किया और अगर आज तुम भी मुझे मनाने नहीं आतीं, तो मैं पूरी तरह से टूट जाता.” मन की पीड़ा कहते-कहते बड़े पापा की आंखों से अविरल अश्रुधारा बह रही थी, जो न जाने कितने बरस का जमा गुबार पिघलाकर बाहर ला रही थी.

उनकी पीड़ा से वाक़िफ़हो नम्रता की भी आंखें और दिल दोनों भर आए. सच ही तो कह रहे थे बड़े पापा, आज तक पूरे परिवार ने उन्हें पिता समान होने का तमगा पहनाकर एक सर्विस प्रोवाइडर ही तो बना कर रखा है, जो उनके बदले मर-खपकर उनके लिए धन और सुविधाएं जुटा रहा है. उनकी भावनाओं को कब किसी ने सुनने-समझने का प्रयास किया? पर अब ऐसा नहीं होगा, वह सबसे इस बारे में बात करेगी.

भारी हुए माहौल को हल्का करने के लिए नम्रता आंखें पोंछकर उनकी आलमारी खोलते हुए बोली, “चलिए, इमोशनल बातें बहुत हुईं, अब आपकी ड्रेस देखते हैं कि कल क्या पहन सकते हैं, आपने तो कोई नई ड्रेस बनवाई नहीं होगी.”

“क्यों नहीं बनवाई. ज़रूर बनवाई है. यह देख.” बड़े पापा ने एक बेहद सुंदर एंब्रॉयडरीवाला सिल्क कुर्ता-पायजामा आलमारी से निकालकर दिखाते हुए कहा. उसे देख नम्रता की आंखें खुली की खुली रह गईं.

“ओह, तो आप सारी तैयारी किए बैठे थे.”

“हां, क्योंकि मेरे दिल के किसी कोने में उम्मीद थी कि कोई और मुझे मनाए या न मनाए, मगर तू मुझे ज़रूर मनाकर संग ले जाएगी. तू मेरी प्यारी बिटिया जो है.” यह सुनकर नम्रता अपने बड़े पापा से किसी छोटे बच्चे की तरह लिपट गई. वह मन ही मन ऊपरवाले को शुक्रिया अदा कर रही थी कि अच्छा हुआ, जो उसे सही समय पर बुद्धि आ गई और वह उन्हें मनाने चली आई, वरना आज वे कितनी बुरी तरह टूटकर बिखर जाते और किसी को कानोंकान ख़बर भी न होती. खिड़की से कमरे में आ रही चांदनी गवाह थी कि आज नम्रता की एक पहल से बड़े पापा के दिल में पैठ किया अंधकार सदा के लिए दूर हो रहा था.

Deepti Mittal

     दीप्ति मित्तल

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कहानी- बड़े पापा 2 (Story Series- Bade Papa 2)

नम्रता को याद आ रहा था कैसे बड़े पापा घर के सभी सदस्यों की ज़रूरतों का, उनकी सुविधाओं का ख़्याल रखते हैं. अपने लिए तो शायद ही कभी कुछ चाहा या मांगा हो. मेरे लिए तो वे मेरे पापा से भी बढ़कर हैं. वे सच में मेरे बड़े पापा हैं और वही मेरे जीवन के इतने बड़े पड़ाव पर मेरे साथ खड़े नहीं होंगे! नहीं, ऐसा नहीं हो सकता. उन्हें होना ही होगा. इस दृढ़ निश्‍चय के साथ नम्रता उठी और बड़े पापा के कमरे में चली गई. वे खिड़की पर खड़े आकाश को निहार रहे थे. एक अजीब-सी तन्हाई और उदासी उनके चेहरे पर फैली थी.

बात ग़लत भी नहीं थी. बड़े पापा का नम्रता से कुछ विशेष लगाव था, जो मौ़के-बेमौ़के ज़ाहिर हो ही जाता. बाकी बच्चों के साथ सख़्त कायदे-क़ानून से पेश आनेवाले बड़े पापा नम्रता की बात आते ही मोम की तरह पिघल जाते. इसका एक सबूत तो तब देखने को मिला था, जब नम्रता का आईआईटी में सिलेक्शन हुआ था. पूरा परिवार चाहता था कि नम्रता रुड़की आईआईटी में ही पढ़ाई करे. इस तरह वह घर में रहकर इंजीनियरिंग कर लेगी, मगर उसने मुंबई आईआईटी जाने की ज़िद पकड़ी थी. ऐसे में उसने अपने मन की बात बड़े पापा को बताई, तो वे सबको अपना फ़रमान सुनाते हुए बोले, “घर में यह सबसे समझदार बच्ची है, अगर इसने आईआईटी मुंबई जाने का फैसला लिया है, तो कुछ सोच-समझकर ही लिया होगा… इसे जाने दो.” यह सुनकर सब हैरान रह गए. बाकी बच्चे तो नम्रता के मुक़ाबले नासमझ ठहराए जाने पर ईर्ष्या से जल उठे. बड़े पापा के सपोर्ट से नम्रता आईआईटी मुंबई से पासआऊट होकर निकली और दिल्ली की एक कंपनी में जॉइन कर लिया.

दूसरी बार उनका लगाव तब देखने को मिला, जब नम्रता ने अपने विजातीय सहकर्मी आयुष से प्रेमविवाह करने की ठानी. एक बार फिर पूरा परिवार उसके विरुद्ध हो गया. मगर बड़े पापा ने आयुष की छानबीन कराई, उसके परिवार से जाकर मिले और अकेले ही रिश्ता पक्का कर आए. घर आकर इतना भर कहा, “जिसमें बेटियों की ख़ुशी हो, वही करना चाहिए.” एक बार फिर उनकी बात सबको स्वीकारनी पड़ी.

इन्हीं पूर्व अनुभवों ने नम्रता को आश्‍वस्त कर दिया था कि बड़े पापा उसका यह आग्रह भी मान लेंगे… मगर वह स्वयं अपने रोके की योजना कैसे बताती, सो यह ज़िम्मेदारी निर्मला बुआ के कंधों पर डाली गई. उन्होंने बड़े भाईसाहब से बात की और वे वाकई बिना किसी किंतु-परंतु के तैयार हो गए. साथ ही यह भी कह डाला, “ध्यान रहे, इंतज़ाम में कोई कमी न रह जाए, जो भी ख़र्च होगा उसकी मैं व्यवस्था कर दूंगा.”

निर्मला ने सबको यह ख़ुशख़बरी सुनाई, तो उनके चेहरे खिल उठे. “बस, एक ही बात है, जो खटक रही है.” निर्मला बोली, तो सबके चेहरे पर प्रश्‍न चिह्न लग गया. “बड़े भाई साहब हमारे साथ मसूरी नहीं आ पाएंगे, कह रहे थे बिज़नेस में कुछ ज़रूरी डीलिंग चल रही है, तो किसी को तो देखनी पड़ेगी. तुम लोग जाओ, मैं यहां संभाल लूंगा.”

“ओह! भाईसाहब भी ना, हमेशा ऐसा ही करते हैं. मुझे तो याद ही नहीं कि कभी वे हमारे साथ कहीं बाहर गए हों…” रामेश्‍वर के स्वर से नाराज़गी फूट रही थी.

“वो भी क्या करें, सारा व्यापार वही तो संभालते हैं, कितने काम रहते हैं उन्हें,” कुसुम की बात दोनों भाइयों को तंज की तरह चुभ गई. बात सही भी थी. सारा बोझ बड़े भाईसाहब के कंधों पर डालकर सभी अपने संपन्न जीवन का आनंद उठा रहे थे. दोनों भाई सहयोग करते थे, मगर किसी सहायक से ज़्यादा नहीं. अपनी पत्नी और बच्ची को खोने के बाद बड़े भाईसाहब काम में डूब गए और दोनों भाइयों ने बजाय उन्हें उबारने के, अपने-अपने कंधे के बोझ भी उनके ऊपर डाल दिए और ख़ुद ज़िम्मेदारियों से मुक्त होते चले गए.

“हमेशा की बात अलग थी, पर ये नम्रता के रोके की बात है. अगर नम्रता की जगह उनकी अपनी बेटी होती तो…” कहते-कहते नम्रता की मां रुक गई.

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“अरे भाभी दुखी न हों. हम हैं ना. हम सब संभाल लेंगे. भाईसाहब वैसे भी कहीं आते-जाते नहीं हैं, इसलिए उनसे कुछ कहना-सुनना बेकार ही है. सालों से ऐसे ही चल रहा है और आगे भी ऐसा ही चलेगा. तुम उनके बारे में सोचकर जी छोटा मत करो. अब तो रोके की तैयारी के बारे में सोचो. स़िर्फ चार दिन बचे हैं.” मनमोहन के समझाने पर बड़े भाईसाहब के न चलने की बात को हमेशा की तरह सबने स्वीकार कर लिया.

दिन तेज़ी से गुज़रने लगे. सभी अपनी-अपनी तैयारियों में जुटे थे, नम्रता भी. लेकिन इस बात से वह अंदर ही अंदर दुखी थी कि उसके रोके पर बड़े पापा साथ नहीं होंगे. आज रात जब वह सोने की कोशिश कर रही थी, तो बचपन से लेकर अब तक की वे समस्त मधुर स्मृतियां उसकी नज़रों के आगे तैरने लगीं, जो बड़े पापा से जुड़ी थीं. मां कहती थीं, उस एक्सीडेंट के बाद वे पहली बार तब मुस्कुराए थे, जब तुझे गोद में लिया था. तू जन्मी तो कहने लगे, ‘चलो कम से कम मेरी खोई हुई बिटिया तो वापस आई.’ उसका नम्रता नाम भी बड़े पापा का ही दिया हुआ था, जो उनकी अपनी बेटी का था.

नम्रता को याद आ रहा था कैसे बड़े पापा घर के सभी सदस्यों की ज़रूरतों का, उनकी सुविधाओं का ख़्याल रखते हैं. अपने लिए तो शायद ही कभी कुछ चाहा या मांगा हो. मेरे लिए तो वे मेरे पापा से भी बढ़कर हैं. वे सच में मेरे बड़े पापा हैं और वही मेरे जीवन के इतने बड़े पड़ाव पर मेरे साथ खड़े नहीं होंगे! नहीं, ऐसा नहीं हो सकता. उन्हें होना ही होगा. इस दृढ़ निश्‍चय के साथ नम्रता उठी और बड़े पापा के कमरे में चली गई. वे खिड़की पर खड़े आकाश को निहार रहे थे. एक अजीब-सी तन्हाई और उदासी उनके चेहरे पर फैली थी. नम्रता को आता देख वे थोड़े संयत हुए, “आओ बेटी.”

“बड़े पापा, कल मेरे जीवन का इतना महत्वपूर्ण दिन है और आप ही की वजह से यह दिन आया है, पर आप ही वहां नहीं होंगे मुझे अपना आशीर्वाद देने के लिए.”

“ये क्या कह रही हो बेटी, मैं वहां रहूं या न रहूं, इससे क्या फ़र्क़ पड़ता है, मेरा आशीर्वाद तो हमेशा ही तुम्हारे साथ है. वैसे भी, मैं नहीं तो क्या, बाकी सभी तो होंगे ही तुम्हारे साथ.”

“बाकी सभी भले हों, मगर आप तो नहीं होंगे न और इस बात से मुझे फ़र्क़ पड़ता है. बहुत फ़र्क़ पड़ता है.” नम्रता आंखों में अनुग्रह लिए उदास स्वर में बोली.

यह सुनकर बड़े पापा की आंखें भर आईं, स्वर रुंध गया.

Deepti Mittal

       दीप्ति मित्तल

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