Archives

कहानी- तुम्हारी भी जय जय, हमारी भी जय जय 1 (Story Series- Tumahari Bhi Jai Jai, Humari Bhi Jai Jai 1)

“श्रेष्ठी, अब तो लड़की भी लड़के को देखती है. तुमने भी देखे हैं.”

“ग़लत. लड़की, लड़के को देखती नहीं है, ख़ुद को दिखाती है. लड़की को लड़का पसंद है या नहीं है, कोई नहीं जानना चाहता. तुमने कभी नहीं पूछा, मुझे कौन-सा लड़का पसंद है.”

“समाज का यही चलन है.”

“समाज में क्या-क्या तो बदल गया मां और क्या-क्या नया आ गया. बस, ये कायदा और नियम नहीं बदल रहा है, जबकि इस नियम पर चलनेवालों को मुंह की खानी पड़ती है. मेरा वश चले तो मैं नियम बना दूं कि लड़केवाले लड़कीवालों को दहेज दें. आख़िर लड़की ज़िंदगीभर लड़के और उसके परिवार की ख़िदमत में रहती है.”

दो बेटों के बीच अकेली बेटी श्रेष्ठी. अच्छे संस्थान से एच.आर. में एम.बी.ए., लंबी और ख़ूबसूरत भी. पिता हरे कृष्ण की आर्थिक स्थिति अच्छी है. श्रेष्ठी के विवाह को लेकर सभी अच्छी कल्पना और कामना से भरपूर हैं. श्रेष्ठी और आर्थिक स्थिति दोनों श्रेष्ठ हैं, अतः इस परिवार का अनुमान है कि वे ऐसे लड़के को ढूंढ़ ही लेंगे, जो सबकी चाहतों को पूरा करता हो. श्रेष्ठी ने चुनौती दी, “पापा, आप लड़का तलाशो, मैं नौकरी.”

हरे कृष्ण सुरूर में, “देखें, किसकी तलाश पहले पूरी होती है.” अनुमान अक्सर ग़लत हो जाते हैं.

कल्पनाएं जब यथार्थ की भूमि पर उतरीं, तो ज्ञात हुआ कि श्रेष्ठी जैसी श्रेष्ठ लड़की का विवाह भी उतना आसान नहीं है, जितना सोचा जा रहा था.

श्रेष्ठी की तलाश पहले पूरी हो गई. उसे पूना की अच्छी कंपनी में रिक्रूटमेंट एक्ज़ीक्यूटिव का जॉब मिल गया. कंपनी में नौकरी की चाह लिए आनेवाले आवेदकों का वो बड़ी कुशलता से इंटरव्यू लेने लगी. सिलेक्शन प्रक्रिया के पहले चरण में वह जिसे योग्य पाती, उसे तुरंत बॉस के पास भेजती. जल्दी ही वह अपने काम को एंजॉय करने लगी.

हरे कृष्ण की तलाश ज़ारी है. श्रेष्ठी को अपनी नुमाइश करनी पड़ती है और वह बहुत संस्कारी बनकर लड़केवालों के सम्मुख प्रस्तुत होती है. प्रयास ज़ारी है. उप पुलिस अधीक्षक लड़का, सीए, इंजीनियर हर जगह पर कोशिशें की गईं. कोई न कोई बहाना बना लड़केवाले दो टूक जवाब दे देते. हरे कृष्ण और अनुराधा निराशा और अपमान से गुज़र रहे हैं. श्रेष्ठी मानसिक उत्पीड़न और हीनता बोध से. वह ख़ुद को लेकर आश्‍वस्त थी. सोचा ही नहीं था कि उसे कोई लड़का रिजेक्ट कर सकता है. सोचा ही नहीं रिजेक्शन के कैसे-कैसे कारण होते हैं. वो इस देखने-दिखाने से तंग आ गई थी. एक दिन बहस पर उतर आई, “मां, लड़का ही क्यों लड़की पसंद करता है? लड़की क्यों नहीं लड़का पसंद या नापसंद करती? मेरे पास डिग्री है, नौकरी, कॉन्फिडेंस व क्वालिटीज़ हैं, इन सबके बावजूद मुझे सिलेक्शन का अधिकार नहीं है.”

“श्रेष्ठी, अब तो लड़की भी लड़के को देखती है. तुमने भी देखे हैं.”

यह भी पढ़ेसीखें ब्रेन मैनेजमेंट के कारगर उपाय (Things You Can Do To Care For Your Brain)

“ग़लत. लड़की, लड़के को देखती नहीं है, ख़ुद को दिखाती है. लड़की को लड़का पसंद है या नहीं है, कोई नहीं जानना चाहता. तुमने कभी नहीं पूछा, मुझे कौन-सा लड़का पसंद है.”

“समाज का यही चलन है.”

“समाज में क्या-क्या तो बदल गया मां और क्या-क्या नया आ गया. बस, ये कायदा और नियम नहीं बदल रहा है, जबकि इस नियम पर चलनेवालों को मुंह की खानी पड़ती है. मेरा वश चले तो मैं नियम बना दूं कि लड़केवाले लड़कीवालों को दहेज दें. आख़िर लड़की ज़िंदगीभर लड़के और उसके परिवार की ख़िदमत में रहती है.”

“श्रेष्ठी, तुम भोली हो. तुम्हें हम लोग बहुत-सी बातें नहीं बताते हैं कि तुम्हें बुरा लगेगा. एक लड़के के पिता ने तुम्हारे पापा से यहां तक कह दिया कि एक बार ले-देकर आप तो अपनी लड़की से छुटकारा पा जाएंगे. उसका जीना-मरना, हारी-बीमारी, तमाम ख़र्च जीवनभर हमको उठाने पड़ेंगे.”

श्रेष्ठी लगभग चिल्ला पड़ी, “ओ गॉड! ऐसी कैलक्यूलेशन. मां, मैं शादी नहीं करूंगी.”

“जहां संयोग होगा, आसानी से बात बन जाएगी. परेशान क्यों होती हो?”

“मेरी शादी नहीं हो रही है, इसलिए मैं परेशान हूं, तुम इस तरह क्यों सोच रही हो मां? मैं अपनी नौकरी में ख़ुश हूं. सचमुच शादी नहीं करूंगी.”

“अकेली लड़की का रहना आसान नहीं है. रिश्तेदार वैसे भी जब-तब पूछते रहते हैं कि श्रेष्ठी की शादी कब करेंगे?”

“हम सेमी अरबन, सेमी रूरलवाले सज़ा भोग रहे हैं. सामंती संस्कार हमसे नहीं छूट रहे हैं. हम ख़ुद को बहुत आधुनिक मानते हैं, तब भी ये संस्कार अपभ्रंश के रूप में हमारे दिमाग़ में मौजूद हैं. तुम और पापा लड़केवालों के हाथ जोड़ते फिरते हो. जबकि मेरे ऑफिस की कुछ लड़कियां लिव इन रिलेशनशिप में हैं और ख़ुश हैं. उन्हें कोई द़िक्क़त नहीं है.”

“श्रेष्ठी, कोई भी तरीक़ा या प्रथा ऐसी नहीं है, जहां द़िक्क़त न हो.”

“पर ये लड़कियां मेरी तरह नुमाइश नहीं करतीं. ये लड़केवाले बड़े चालाक बनते हैं. इन्हें सुंदर, शिक्षित, स्वस्थ व सलीकेदार लड़की चाहिए और लाखों का दहेज भी चाहिए, फिर भी तेवर इनका ऐसा होता है, जैसे लड़की का उद्धार कर रहे हैं. बिल्कुल नहीं सोचते कि इस तरह कोई

आत्मविश्‍वासी लड़की अपना आत्मविश्‍वास खो देती है. मुझे लड़केवालों की मेहरबानी नहीं चाहिए. शादी नहीं करूंगी.”

घर में कभी मस्ती का माहौल होता था. अब मातम का है. श्रेष्ठी का जो आत्मविश्‍वास, माता-पिता को प्रभावित करता है, द्रवित करने लगा. सबकी चाहतों को पूरा करनेवाला लड़का आकाश कुसुम की तरह होता है. आकाश कुसुम को पाने की ज़िद नहीं छोड़ेंगे, तो श्रेष्ठी आत्मविश्‍वास खो देगी. समझौता किसे नहीं करना पड़ता? बल्कि करना चाहिए. अपनी कल्पना और कामना को थोड़ा नीचे लाना होगा. तो यह जो श्रेयस अपने माता-पिता व भैया-भाभी के साथ श्रेष्ठी को देखने आ रहा है इकलौता नहीं है, लेकिन अनुराधा को संतोष है बड़े भाई और तीन विवाहित बहनों के बाद सबसे छोटा है.

Sushma Munindra

    सुषमा मुनीन्द्र

अधिक शॉर्ट स्टोरीज के लिए यहाँ क्लिक करें – SHORT STORiES

कहानी- सबसे बड़ी सौग़ात 3 (Story Series- Sabse Badi Saugat 3)

सच पूछिए तो भैया, क़ानून ने स्त्रियों को चाहे जितने अधिकार दिए हों, चाहे वे कितनी ही अत्याधुनिक हों, पर स्त्रियां हमेशा प्यार और स्नेह वश अपना हक़ छोड़ती आई हैं, जिसे कभी उसके कर्त्तव्य का नाम दिया जाता है, कभी उसका धर्म बताया जाता है. फिर भी स्त्रियां सब सहती हैं. कितने ही दुख झेलती हैं, पर अपने प्यार के रिश्तों पर वार नहीं करतीं. भाई का रिश्ता भी तो जन्म से जुड़ा प्यार का रिश्ता ही होता है, फिर भला मैं मरते दम तक यह कैसे चाहूंगी कि मेरे भाई की संपत्ति पर कोई लालच भरी नज़र डाले, चाहे वह मेरा पति और मेरी संतान ही क्यों न हो?

जैसे-जैसे दिन बीत रहे थे, भैया की व्यस्तता शादी के कारण बढ़ती जा रही थी, फिर भी मुझे लगता था जैसे भैया मुझसे कुछ कहना चाह रहे थे, पर कह नहीं पा रहे थे. शादी बहुत ही धूमधाम से हुई, पर एक फांस-सी मेरे गले में हमेशा अटकी रही.

शादी के बाद सभी रिश्तेदार अपने-अपने घर लौटने लगे, तो मैंने भी लौटने की तैयारी शुरू कर दी. मेरे पति अविनाश और बेटा आदित्य एक दिन में ही बारात अटेंड कर लौट गए थे. मैं हिम्मत कर भैया से बोली, “भैया, मैं कल का टिकट मंगवा रही हूं वापस जाने के लिए.”

“इतनी भी क्या जल्दी है, एक-दो दिन और बहू के साथ रह लो.”

“सुनिए भैया, मैं जानती हूं आप को मुझसे कुछ कहना है. इस तरह संकोच करेंगे, तो बरसों गुज़र जाएंगे और आप अपनी बातें नहीं कह पाएंगे. जतिन तुम वह फाइल दो, जिसमें भैया ने मुझे संपत्ति से बेदख़ल करने के काग़ज़ात रखे हैं, मैं उस पर हस्ताक्षर कर दूं, ताकि भैया मेरे जाने के बाद निश्‍चिंत रहें.”

मेरी बातें सुन भैया जड़ से हो गए. जतिन वह फाइल ले आया, जो भैया के कमरे में रखी हुई थी.

“रुको जतिन, निधि तू हस्ताक्षर मत कर. मैं ये विचार छोड़ चुका हूं, वरना तुमसे ज़रूर बात करता.”

अचानक भैया के स्वर की आत्मीयता और बेचैनी महसूस कर इतने दिनों से दिल में जमा मलाल पिघलने लगा था.

“आपको मेरे हस्ताक्षर नहीं चाहिए, पर मुझे हस्ताक्षर करने हैं. न जाने कब अपने शहर की मिट्टी और उसमें बसे अपने घर व संपत्ति का मोह इतना बढ़ जाए कि वह लालच में बदल जाए और जन्म के रिश्ते, प्यार व विश्‍वास सब शक के घेरे में आ जाएं, जो भाई-बहन के रिश्ते को ही बिखेर दें.

यह भी पढ़े: Learn English, Speak English: अंग्रेज़ी होगी शानदार, अगर सीखेंगे ये शब्द व वाक्य (Basic English: Common Phrases That Are Incredibly Useful)

सच पूछिए तो भैया, क़ानून ने स्त्रियों को चाहे जितने अधिकार दिए हों, चाहे वे कितनी ही अत्याधुनिक हों, पर स्त्रियां हमेशा प्यार और स्नेह वश अपना हक़ छोड़ती आई हैं, जिसे कभी उसके कर्त्तव्य का नाम दिया जाता है, कभी उसका धर्म बताया जाता है. फिर भी स्त्रियां सब सहती हैं. कितने ही दुख झेलती हैं, पर अपने प्यार के रिश्तों पर वार नहीं करतीं. भाई का रिश्ता भी तो जन्म से जुड़ा प्यार का रिश्ता ही होता है, फिर भला मैं मरते दम तक यह कैसे चाहूंगी कि मेरे भाई की संपत्ति पर कोई लालच भरी नज़र डाले, चाहे वह मेरा पति और मेरी संतान ही क्यों न हो? इसलिए मैं यह हस्ताक्षर ज़रूर करूंगी. बहन का सामर्थ्य भाई के विश्‍वास में होता है, संपत्ति में नहीं. अगर भाई का फ़र्ज़ बहन की स्मिता और सम्मान की रक्षा करना है, तो बहन का भी फ़र्ज़ है भाई के सुख और समृद्धि के लिए हर संभव प्रयत्न करना. उसे छीनना नहीं.”

“एक बात और… भले ही बदलते समय के साथ आपका विश्‍वास मुझ पर से डगमगा गया है, पर आज भी मुझे पूरा विश्‍वास है कि मेरे सुख-दुख में आप ही मेरे एकमात्र संबल होंगे. यह विश्‍वास मेरे लिए किसी भी संपत्ति से बड़ा है.” बोलते-बोलते मेरा गला भर आया था और सभी भावुक हो उठे थे. भैया और भाभी की आंखें भर आई थीं. मेरे चुप होते ही, एक गहरा सन्नाटा-सा पसर गया, जिसने सभी को अपने-अपने दायरे में कैद कर दिया था. रिश्तों में अचानक उग आया कैक्टस सब को तकलीफ़ दे रहा था.

मैंने बचपन से भैया के प्यार को बहुत ही गहराई से महसूस किया था, जो मुझे अभी तक एक-सा ही लगता था, फिर दोनों भाई-बहन के बीच यह अविश्‍वास कहां से आ गया? शायद संपत्ति के एक टुकड़े ने भाई-बहन के रिश्ते में सेंध लगा दी थी.

जिस प्यार, विश्‍वास और अपनेपन को हम बचपन से रिश्तों में महसूस करते हैं, उनके होने का विश्‍वास रखते हैं, अगर हमारा वही विश्‍वास और भ्रम टूटता है, तो स़िर्फ आश्‍चर्य नहीं होता, गहरी पीड़ा की अनुभूति होती है. सभी कुछ समाप्त हो जाने का एहसास होता है. आज मुझे भी कुछ वैसा ही महसूस हो रहा था. दिल का वह कोना, जिसमें मायका बसता था, तिनका-तिनका बिखर गया था. यह दिल का वही सुरक्षित कोना था, जिस पर कभी मुझे बहुत नाज़ था, जो मेरा स्वाभिमान था, जिसके बिना मैं अपने आप को हमेशा आधी-अधूरी समझती थी.

तभी भैया अचानक उठे और मेरे पास आकर पहले की तरह ही मेरे सिर पर अपना हाथ रखते हुए बोले, “जो हुआ सो हुआ, तू मन में दुख मत रख. मैं तुझे विश्‍वास दिलाता हूं, जब तक मैं ज़िंदा हूं तुम्हारे प्यार, विश्‍वास और अधिकार को कोई ठेस नहीं पहुंचाएगा यह वादा है मेरा तुझसे.”

यह भी पढ़े: लघु उद्योग- इको फ्रेंडली बैग मेकिंग: फ़ायदे का बिज़नेस (Small Scale Industries- Profitable Business: Eco-Friendly Bags)

मेरे मुंह से बेसाख़्ता निकल पड़ा, “मुझे स़िर्फ प्यार का अधिकार चाहिए, संपत्ति का नहीं.”

मेरे इतना बोलते ही, अचानक सभी की हंसी छूट गई, सभी की खिलखिलाहटों से कमरा गूंज उठा. अब तक बोझिल बना वातावरण काफ़ी हद तक हल्का हो गया था.

दूसरे दिन स्टेशन जाने के लिए निकलते समय जब मैं भाभी के पैर छूने के लिए झुकी, तो सीने से लगाते हुए उनकी आंखों से अविरल अश्रुधार बह निकली और अचानक मां की याद ताज़ा हो गई. भैया और जतिन की आंखें भी भर आई थीं. सौम्या ने गले से लिपटते हुए मुझसे फिर से जल्दी आने का आग्रह किया, तो दिल का कोना-कोना प्यार से सराबोर हो गया. मन में जमा अब तक का सारा क्लेश धुल गया. इस भावभीनी विदाई के प्रवाह में सारे गिले-शिकवे मिट गए और रह गया एक सुखद तृप्ति का एहसास, जो मायके की सबसे बड़ी सौग़ात थी.

Rita kumari

     रीता कुमारी

अधिक शॉर्ट स्टोरीज के लिए यहाँ क्लिक करें – SHORT STORiES

कहानी- सबसे बड़ी सौग़ात 2 (Story Series- Sabse Badi Saugat 2)

मुझे लगा अचानक मेरे पांव जैसे किसी दहकते अंगारे पर पड़ गए हों. मैं क्या इतनी पराई हो गई थी कि अब भैया को मुझसे हानि पहुंचने का डर हो गया था. औरों की छोड़ दें, तो भी मेरे भैया ने मेरे लिए ऐसा कैसे सोचा? कभी हम दोनों भाई-बहनों में इतनी नज़दीकियां थीं कि मां-पापा को हम दोनों कोई बात बताएं या न बताएं, एक-दूसरे को ज़रूर बताते थे. भैया अपनी सारी ज़रूरतों को तिलांजलि दे, अपने पॉकेटमनी से मेरी इच्छाओं की पूर्ति करते थे, वही भैया मुझसे पूछे बिना, बाहरवालों से मिलकर अपनी संपत्ति मुझसे ही सुरक्षित कर रहे थे. मैं अपने को बहुत छोटा और पराया महसूस करने लगी थी.

वक़्त के किसी पल में मेरी आंख लग गई और मैं वहीं चारपाई पर ही सो गई. चिड़ियों के कलरव के साथ सुबह नींद खुली, तो मैं चौंककर उठ बैठी. घर के सभी लोग अभी सो रहे थे. मैं दरवाज़ा खोलकर बाहर निकल आई. बगीचे में पहले की तरह ही फूल और फल के पेड़ करीने से लगे हुए थे. कभी पापा ने ये घर और उससे लगा यह बगीचा मां को जन्मदिन के उपहार के रूप में दिया था. मां भी इसे बहुत संभालकर रखती थीं. देर तक मैं वहां बेंच पर बैठी पुरानी यादों को ताज़ा करती रही.

मैं टहलकर वापस आई, तो सभी लोग चाय समाप्त कर रहे थे. भाभी ने वहीं से आवाज़ लगाकर शंकर को चाय लाने के लिए बोला, पर वह किसी काम से कहीं चला गया. कुछ देर इंतज़ार करने के बाद मैं यह सोचकर रसोईघर में चली गई कि अपना घर है, ख़ुद ही बना लूंगी तो क्या होगा?

चाय बनाने के लिए जैसे ही चाय की पत्ती को हाथ लगाया था कि शंकर आ गया. आते ही बोला, “अरे दीदी, इस डिब्बे से चाय मत बनाइए, इस डिब्बे से स़िर्फ साहब और मेमसाहब के लिए चाय बनता है, आप दूसरे डिब्बे से बनाइए.” इतना बोलकर उसने एक दूसरा डिब्बा थमा दिया. शंकर के इस व्यवहार से मुझे ऐसा लगा जैसे किसी ने गर्म सरिया मेरे सीने में उतार दिया हो. फिर भी यह सोचकर कि नौकरों की बातों का क्या ये होते ही हैं झगड़ा लगानेवाले. मैं गोल दाने की कड़क चाय बनाकर डायनिंग टेबल पर आ बैठी. तभी कहीं से भाभी भी वहां पर आ गईं, “ये क्या निधिजी, आज भी आप गोलदानेवाली चाय पी रही हैं. पहले आप लीफ की चाय के अलावा किसी और चाय को हाथ भी नहीं लगाती थीं. लगता है ननदोईजी ने आपकी फ़ितरत ही बदल दी.”

“नखरे तो आज भी मेरे वही हैं भाभी, पर आपके नौकर ने मुझे मेरी औक़ात बता दी.”

यह भी पढ़ेदोराहे (क्रॉसरोड्स) पर खड़ी ज़िंदगी को कैसे आगे बढ़ाएं? (Are You At A Crossroads In Your Life? The Secret To Dealing With Crossroads In Life)

मैंने भी तड़ से नहले पर दहला जड़ दिया. भाभी को वातावरण की गंभीरता समझते देर नहीं लगी. उन्होंने तुरंत शंकर को बुलाकर डांट लगाई और आगे से मुझे लीफ की चाय देने की हिदायत दे दी.

नाश्ते के समय मेरे कहने पर भी भाभी मेरे लाए हुए नमकीन और मिठाइयों के प्रति उदासीन बनी रहीं. मैंने एक-दो डिब्बे निकालकर डायनिंग टेबल पर रख दिए. इतने जतन से चुन-चुनकर ख़रीदी गई मिठाइयां या तो फ्रिज में पड़ी थीं या घर के नौकरों के भोग लग रही थीं. जिस दशहरी आम के लिए ट्रेन में मेरी कई सहयात्रियों से झड़प हो गई थी कि आम दब न जाएं, वही आम अब स्टोररूम में लावारिस पड़े थे. फल और मिठाइयों का हश्र देख मन उदास हो उठा.

नाश्ते के बाद मैं पड़ोस में रहनेवाली यमुना काकी के यहां चली गई. आशा अनुकूल उन्होंने गर्मजोशी से मेरा स्वागत किया और ड्रॉइंगरूम से ही बहुओं को चाय-नाश्ता बनाने के लिए आवाज़ लगाने लगीं. मुझे हंसी आ गई.

“यमुना काकी, आप ज़रा भी नहीं बदली हैं. आज भी आपका अपनी बहुओं पर वही दबदबा है. अभी कुछ मत बनवाइए, मैं तुरंत नाश्ता करके आ रही हूं. अब तो यहां लगभग महीनाभर रहूंगी, फिर कभी आकर खा लूंगी.”

“वो तो मुझे मालूम है, इस बार ज़्यादा दिनों तक रहोगी. तुम्हारे गोविंद भैया ने बताया था. जब वह शेखर से काग़ज़ बनवाने के लिए कहने आए थे.”

यमुना काकी का बड़ा लड़का शेखर वकील है, इसलिए मुझे थोड़ा आश्‍चर्य हुआ. मैं कुछ पूछती उसके पहले वह ख़ुद ही बोलीं, “तुम शायद ऐसा न करो, लेकिन आजकल तो लड़कियों की प्रवृत्ति हो गई है, ससुराल में चाहे कितनी ही सुखी-सम्पन्न हों, पर मायके की संपत्ति पर उनकी नज़रें लगी रहती हैं. बहनें खुलेआम कोर्ट में जाकर अपने हक़ की बातें कर रही हैं. यह सब देखकर तुम्हारे भैया काग़ज़ बनवाने आए थे, ताकि तुम या तुम्हारे बच्चे उन्हें कभी भविष्य में कोर्ट में ना घसीटो.”

मुझे लगा अचानक मेरे पांव जैसे किसी दहकते अंगारे पर पड़ गए हों. मैं क्या इतनी पराई हो गई थी कि अब भैया को मुझसे हानि पहुंचने का डर हो गया था. औरों की छोड़ दें, तो भी मेरे भैया ने मेरे लिए ऐसा कैसे सोचा? कभी हम दोनों भाई-बहनों में इतनी नज़दीकियां थीं कि मां-पापा को हम दोनों कोई बात बताएं या न बताएं, एक-दूसरे को ज़रूर बताते थे. भैया अपनी सारी ज़रूरतों को तिलांजलि दे, अपने पॉकेटमनी से मेरी इच्छाओं की पूर्ति करते थे, वही भैया मुझसे पूछे बिना, बाहरवालों से मिलकर अपनी संपत्ति मुझसे ही सुरक्षित कर रहे थे. मैं अपने को बहुत छोटा और पराया महसूस करने लगी थी.

यह भी पढ़ेरिश्तों की बीमारियां, रिश्तों के टॉनिक (Relationship Toxins And Tonics We Must Know)

यह सही है कि भाई-बहन के प्रेम को लोग गुज़रते समय के साथ नए सिरे से सीमाबद्ध करने लगे हैं. बहन के अधिकारों को लेकर बनाए गए नए क़ानूनों से इस रिश्ते के असहज और नैसर्गिक रूप को शक के दायरे में लाकर खड़ा कर दिया है, जिसने रेशम की डोर से बंधे इस रिश्ते को भावनाविहीन कर दिया है. भैया ने काग़ज़ों पर विश्‍वास किया, मुझ पर नहीं. यह बात मुझे बहुत खल रही थी. पलभर में हम दोनों भाई-बहन के बीच एक पथरीली दीवार खड़ी हो गई थी, जो ऊंची और अगम्य है. उस दिन आहत मन लिए मैं घर लौटी, लेकिन भैया को कुछ भी न बताया, न ही कुछ पूछा.

Rita kumari

       रीता कुमारी

अधिक शॉर्ट स्टोरीज के लिए यहाँ क्लिक करें – SHORT STORiES

कहानी- सबसे बड़ी सौग़ात 1 (Story Series- Sabse Badi Saugat 1)

बात भाभी ठीक ही बोल रही थीं, पर न जाने क्यूं ये बात शूल की तरह मेरे अंतस में कहीं चुभ रही थी. थोड़ी देर आराम करने के बहाने मैं अपने कमरे में चली गई. यह मेरा वही कमरा था, जहां मैंने अपने जीवन के सबसे बहुमूल्य समय गुज़ारे थे. कमरे का रंग-रोगन और फर्नीचर सब बदल गया था, रह गई थीं चंद यादें और मेरे अनगढ़ हाथों से बनी पेंटिंग, जिसमें मैं भैया को राखी बांध रही थी. उस समय मैं छठी या सातवीं में पढ़ती थी. भैया ने बड़े शौक़ से उस पेंटिंग पर फ्रेमिंग करवाया था.

औरत उम्र के चाहे जिस पड़ाव पर हो, अपने जीवन में कितनी ही व्यस्त क्यों न हो, उसके दिल में तब अलग ही ख़ुशी छा जाती है, जब उसके मायके से कोई ख़ुशी का संदेशा आता है और वह सब कुछ छोड़-छाड़ मायके का रुख कर लेती है.

आज मेरी भी स्थिति कुछ वैसी ही हो गई थी. जब भैया ने जतिन यानी अपने लड़के की शादी की सूचना मुझे फोन पर दी थी. मेरा मन मयूर नाच उठा. भैया ने बहुत दबाव डालकर शादी से एक महीने पहले ही बुलाया था. साथ ही बड़े अधिकार से दशहरी आम की फ़रमाइश भी की थी. भैया की आवाज़ में वही चिर-परिचित प्यार-मनुहार पाकर मन ख़ुशी से आह्लादित हो उठा. फिर तो मेरा मन पूरे दिन पीछे छूट गए मासूम बचपन और बेफ़िक्र जवानी के दिनों में डुबकी लगाता रहा. मैं उसी समय से अपनी सारी व्यस्तता को झटक बड़े ही उत्साह से शादी में जाने की तैयारियों में व्यस्त हो गई.

एक ही हफ़्ते में लखनऊ की विशेष साड़ियां, सूट और बहू के लिए सोने के कड़े के साथ-साथ ढेरों नमकीन, मिठाइयां और दशहरी आम के टोकरे बंधवा लिए थे. एक बार फिर सारे घर की ज़िम्मेदारियां सासू मां को सौंप निश्‍चिंत होकर पटना के लिए रवाना हो गई थी. आशा के अनुकूल भैया ख़ुद स्टेशन पर मुझे लेने आए थे. स्टेशन से निकलते ही एक बार फिर नज़र आया, अपना वही पुराना पटना शहर, ट्रैफिक की चिर-परिचित कानफोड़ आवाज़ें, सड़क के किनारे छोटी-छोटी दुकानें, भागते व्यस्त लोगों की भीड़, समोसे और जलेबियों के तले जाने की पहचानी ख़ुशबू के साथ आसपास फैली अस्त-व्यस्तता भी अपने आप में अपनापन समेटे मुझे रोमांचित कर रही थी. इन सबके बीच से गुज़रती गाड़ी तेज़ी से घर की तरफ़ दौड़ रही थी. जहां पहुंचने का दिल बेसब्री से इंतज़ार कर रहा था. घर पहुंच, फ्रेश होकर बैठते ही चाय-पानी के साथ-साथ बातों का सिलसिला शुरू हो गया था. भैया भी मुझे कुछ ज़्यादा भाव देते हुए भाभी से बोले, “सुनती हो नैना, निधि के आने से सबसे बड़ा फ़ायदा तुम्हारा ही होगा. तुम्हारे काम में हाथ बंटाने के साथ-साथ सारे रस्मो-रिवाज़ निभाने में भी तुम्हारी सारी परेशानियां दूर कर देगी. अम्मा के साथ शादी-ब्याह में भाग लेने से इसे सारे रस्मो-रिवाज़ याद हैं.” यह सब बोलकर भैया शायद पहले की तरह मुझे महत्व देना और अपना अटूट प्यार जताना चाह रहे थे, लेकिन न जाने क्यूं मुझे उनके शब्द खोखले लगे.

“अब रस्मों का क्या है? निभाए ही कितने जाते हैं?” भाभी अपने चेहरे पर एक ज़बरदस्ती की मुस्कान लाते हुए बोलीं. भाभी की आंखें और बोलने के लहज़े ने मेरे सारे उत्साह पर पानी फेर दिया. मैं उठकर नमकीन और मिठाइयां निकालकर टेबल पर रखने लगी, जिसे देखकर भैया बोले, “अरे, ये क्या रे छुटकी, ये तूने क्या किया है? पूरी की पूरी लखनऊ शहर की मिठाइयां ही ख़रीदकर ले आई है, लखनऊवालों के लिए कुछ छोड़ा भी है या नहीं.”

यह भी पढ़े: स्त्रियों की 10 बातें, जिन्हें पुरुष कभी समझ नहीं पाते (10 Things Men Don’t Understand About Women)

“बस… बस… भैया, इतना भी नहीं है. शादी-ब्याह का घर है, देखते-देखते ये सारी समाप्त हो जाएंगी.”

मेरे बोलने के साथ ही भाभी का कटाक्ष चल पड़ा, “पहले की बात कुछ और थी, अब किसके पास इतना समय है कि महीनाभर अपना घर छोड़कर शादी-ब्याह में रौनक़ बढ़ाने और पकवान खाने आएगा. एक-दो दिनों के लिए कोई आ जाए, यही बहुत है.”

बात भाभी ठीक ही बोल रही थीं, पर न जा ने क्यूं ये बात शूल की तरह मेरे अंतस में कहीं चुभ रही थी. थोड़ी देर आराम करने के बहाने मैं अपने कमरे में चली गई. यह मेरा वही कमरा था, जहां मैंने अपने जीवन के सबसे बहुमूल्य समय गुज़ारे थे. कमरे का रंग-रोगन और फर्नीचर सब बदल गया था, रह गई थीं चंद यादें और मेरे अनगढ़ हाथों से बनी पेंटिंग, जिसमें मैं भैया को राखी बांध रही थी. उस समय मैं छठी या सातवीं में पढ़ती थी. भैया ने बड़े शौक़ से उस पेंटिंग पर फ्रेमिंग करवाया था. मैं यूं ही कमरे में लेटी यहां-वहां की बातें याद करती रही. रात के समय जब सब के साथ खाने बैठी, तो मुझे आशा थी कि भाभी ने भी मां की तरह ही मेरी पसंद की एक-दो खाने की डिशेज़ तो अवश्य बनवाई होंगी, पर खाना देखते ही सारा उत्साह ठंडा पड़ गया. सूखी रोटी के साथ एक सब्ज़ी और रायता था. हां, खाने के बाद भैया ने रसमलाई खिलाकर मेरी मायूसी थोड़ी-सी कम कर दी थी.

भैया-भाभी जब शादी की किसी चर्चा में व्यस्त हो गए, तो मैं पापा के पास जा बैठी. बुढ़ापे ने उन्हें इतना अशक्त बना दिया था कि ख़ुशी-ग़म सब उनके लिए समान हो गए थे. उनका ध्यान दुनिया की हर ख़ुशी और ग़म से विरक्त हो, अपने खाने और सोने पर आकर थम-सा गया था, बस घिसे हुए रिकॉर्ड की तरह एक ही प्रश्‍न बार-बार पूछ रहे थे. “सब ठीक है न.” थोड़ी देर बाद मैं सोने चली गई. पर आंखों में नींद कहां थी? उठकर आंगन में पड़ी चारपाई पर आ बैठी. सभी सोने चले गए थे. पूरे आंगन में सन्नाटा पसरा हुआ था. यह वही आंगन था, जिसमें कभी हमने न जाने कितने खेल खेले थे. एक पैर पर कूद कर पूरे आंगन का क्षेत्रफल नापा था, घरौंदे बनाए थे और कई तरह के खेल खेले थे. किसी आत्मीय स्वजन-सा प्यारा यह आंगन जाने क्यूं आज पराया-सा लग रहा था.

Rita kumari

रीता कुमारी

अधिक शॉर्ट स्टोरीज के लिए यहाँ क्लिक करें – SHORT STORiES

कहानी- आंखें बोलती हैं 3 (Story Series- Aankhen Bolti Hain 3)

“हां गुड़िया, पर मुझे एक बात आज तक समझ नहीं आई कि बिन बताए उनकी परेशानी तुम कैसे समझ गई थी, कितनी छोटी थी तुम.”

“समझनेवाली बात क्या थी मां, इंसान की आंखें सब बोलती हैं. बस पढ़नेवाला चाहिए.”

“हां, यही कारण होगा. बड़े लोग अपने जीवन की आपाधापी में इतने व्यस्त हो जाते हैं कि किसी की आंखों की तो क्या, मुंह से कही बात भी पकड़ नहीं पाते. अच्छा एक बात बता, तुझे आज चंदा की आंखों में कुछ नज़र नहीं आया? वो कितनी थकी हुई, खोई-खोई सी काम कर रही थी, जैसे कोई ज़िंदा लाश हो. तभी उसकी नज़र हम पर नहीं पड़ी.”

रूबी को सुनकर थोड़ा धक्का लगा.

“हां मां, याद है. काका की वो झूठी खोखली हंसी, उदास पनीली आंखें… कितना दर्द छिपा था उनमें.” रूबी उदास हो चली, उसकी आंखों के सामने वह दृश्य जीवंत हो उठा, जब वह काका की चिंता में दादाजी के पास भागी-भागी गई थी. “दादाजी, देखो मेरे रघु काका को क्या हुआ है. आज अच्छे से बात भी नहीं कर रहे हैं. ज़रूर उनकी तबीयत ख़राब है. उन्हें डॉक्टर को दिखाओ.” पीछे पड़ गई थी उनके. मजबूरन दादाजी को सब काम छोड़कर पहले रघु काका से बात करनी पड़ी, उनका हाल जानना पड़ा. तब पता चला कि उनका बेटा बहुत बीमार था. इलाज के लिए पैसों की सख़्त ज़रूरत थी, मगर उनका स्वाभिमान किसी के आगे हाथ फैलाने में कतरा रहा था. तब दादाजी ने उन्हें पैसे देकर मेरी ओर देखा था और बोले थे, “अब ख़ुश. अब तो मेरा पीछा छोड़ मेरी मां.”

“हां गुड़िया, पर मुझे एक बात आज तक समझ नहीं आई कि बिन बताए उनकी परेशानी तुम कैसे समझ गई थी, कितनी छोटी थी तुम.”

“समझनेवाली बात क्या थी मां, इंसान की आंखें सब बोलती हैं. बस पढ़नेवाला चाहिए.”

“हां, यही कारण होगा. बड़े लोग अपने जीवन की आपाधापी में इतने व्यस्त हो जाते हैं कि किसी की आंखों की तो क्या, मुंह से कही बात भी पकड़ नहीं पाते. अच्छा एक बात बता, तुझे आज चंदा की आंखों में कुछ नज़र नहीं आया? वो कितनी थकी हुई, खोई-खोई सी काम कर रही थी, जैसे कोई ज़िंदा लाश हो. तभी उसकी नज़र हम पर नहीं पड़ी.”

रूबी को सुनकर थोड़ा धक्का लगा, “नहीं मां. मुझे तो उसे वहां देखकर ऐसी आग लगी कि इसके बाद मुझे न कुछ दिखा, न मैंने कुछ सुना. तुम्हें ऐसा क्या नज़र आया उसकी आंखों में?”

“मैंने उसकी आंखों में और चेहरे पर वही रघु काकावाली उदासी देखी थी गुड़िया.”

“क्या कह रही हो मां.”

यह भी पढ़े: Interview: अंग्रेज़ी में इंटरव्यू देने का तरीक़ा (Learn English, Speak English: How To Answer Questions In Interview)

“हां बेटा, एक बात कहती हूं, परसों जब वह आएगी, तो पहले उससे बात करना, उसकी सुनना, फिर कोई निर्णय लेना.”

“ठीक है मां. अच्छा ये तो बताओ आपके मोबाइल में ये फोटो पहुंची कैसे?” चंदा प्रकरण से असहज हो चली रूबी ने बातों का रुख बदला.

“इस बार तेरा भाई जब घर आया था, तो सारी पुरानी एलबम बैठकर स्कैन कर डाली और मोबाइल में डाल दी. कहने लगा मम्मी एलबम में रखे-रखे इनमें दीमक लग जाएगी, इसलिए इन्हें डिजिटल बना रहा हूं. हमेशा साथ और पास रहेंगी. जब मर्ज़ी देख लो.”

मां-बेटी की ऐसी ही बातों में दो दिन गुज़र गए. रूबी का मन अब शांत था. सुबह चंदा अपने तय समय पर आ गई. रूबी ने बड़े सहज भाव से पूछा, “अरे चंदा, तेरा गांव का काम ख़त्म हुआ कि नहीं?”

“हां दीदी, हो गया.” चंदा नीची नज़रें किए थोड़ा हकलाते हुए बोली.

“अच्छा, मुझे नहीं पता था तेरा गांव सनसिटी सोसायटी में ही है…” रूबी ने मुस्कुराते हुए कहा.

सुनकर चंदा के पैरों तले ज़मीन निकल गई, चेहरे पर ऐसी हवाइयां उड़ीं जैसे किसी चोर की हालत रंगे हाथों पकड़े जाने पर होती है. वो बुरी तरह घबराकर बोली, “दीदी वो…”

“मैं भी वहां गई थी. तुझे वहां काम करते देखा, इसीलिए पूछ रही हूं.” रूबी बिल्कुल संयत थी. “ऐसी क्या बात हो गई चंदा, जो तुझे वहां काम करना पड़ा? पहले ही तेरे पास इतने काम हैं, ज़्यादा काम करेगी, तो शरीर थकेगा. पिछले महीने ही तुझे बुख़ार आया था. अभी कमज़ोरी पूरी तरह गई भी नहीं है.”

चंदा बेहद आश्‍चर्य में थी. उसका झूठ और धोखा पकड़ने के बाद भी दीदी इतने प्यार से बोल रही हैं. उसका अपराधबोध आंखों के रास्ते बह निकला. सुबकते हुए कहने लगी, “क्या करती दीदी. छोटे की फीस भरनी थी. फीस न भरने पर मास्टरजी ने उसे पूरे दिन कक्षा से बाहर खड़ा रखा था.”

“पर तेरा तो बड़ा बेटा भी नौकरी करता है ना? फिर…?”

“कहां दीदी, वो तो चार महीने से घर पर बैठा है. आपसे जो फीस भरने के लिए एडवांस लिया था, वह पूरा मेरी बीमारी पर ही ख़र्च हो गया था.”

“अरे, तो मुझसे क्यों नहीं बोली?” रूबी ने उसके कंधे थपथपाए.

“क्या बोलती दीदी. एक आप ही हो, जो ज़रूरत पर मदद कर देती हो. बाकीलोगों ने तो बीमारी की छुट्टी के भी पैसे काट लिए. आप से कितना मांगूं. मुझे शर्म आती है दीदी.” चंदा बुरी तरह फफकने लगी.

“मुझे माफ़ कर दो दीदी.”

यह भी पढ़ेअपने ग़ुस्से पर कितना काबू कर पाती हैं आप? (Anger Management: 10 Easy Tips To Control Your Anger)

“माफ़ी किस बात की चंदा. तू आख़िर मां है. अकेले अपने बच्चों को पाल रही है. मैं तो तुझे वहां देखकर ही समझ गई थी कि तू बहुत परेशानी में ही आई है, वरना कभी ऐसा न करती. आगे से ऐसी कुछ बात हो, तो बता दिया कर. मुझसे शर्माने की ज़रूरत नहीं. तू भी तो मेरी ज़रूरत पर कितना एक्स्ट्रा काम कर देती है. लोग ऐसे ही एक दूसरे के काम आते हैं. चल अब चुप हो जा, मैं पहले तेरे लिए चाय बनाती हूं. चाय पीकर काम शुरू करना.”

दिल का बोझ उतर चुका था. चंदा का भी और रूबी का भी. रूबी रसोई में चाय बनाने जा रही थी, चंदा पल्लू से आंख-नाक पोंछ रही थी और निर्मलाजी अपनी बिटिया को देख मंद-मंद मुस्कुरा रही थीं, क्योंकि उन्हें वहां 35 साल की सेल्फ सेंटर्ड आधुनिका रूबी नहीं, बल्कि छह साल की गुड़िया नज़र आ रही थी, जो आंखों की बोली समझती थी.

Deepti Mittal

    दीप्ति मित्तल

अधिक शॉर्ट स्टोरीज के लिए यहाँ क्लिक करें – SHORT STORiES

कहानी- आंखें बोलती हैं 2 (Story Series- Aankhen Bolti Hain 2)

नौकर को नौकर न कहूं, तो क्या कहूं?” निर्मलाजी ने तुनककर कहा, तो रूबी ने उन्हें घूरा.

“नौकर भी इंसान होते हैं और ये आपके लिए नौकर होंगे. मेरे लिए मेरे दादा से भी बढ़कर थे.” निर्मलाजी को रूबी की प्रतिक्रिया देखकर ख़ुशी हुई कि वह अभी भी वे मानवीय भावनाएं महसूस करती है, जो बचपन में किया करती थी. “कितना प्यार-दुलार दिया इन्होंने मुझे…” कहते हुए रूबी की आंखों में पूरा बचपन उतर आया. 

“अच्छा, कितना लेती है एक दिन का? अच्छी है, तो मैं भी कभी आगे बुला सकती हूं.” रूबी अंजान बनकर पूछने लगी.

“500 पर डे पर बात हुई है. सुबह छह बजे आ गई थी, रात तक रहेगी. इसने मेरी समय पर बड़ी मदद की, इसलिए सोच रही हूं, कल जाते समय कुछ खाना-पीना और एक साड़ी दे दूंगी. रिश्तेदारों को बांटने के लिए थोक में मंगाई थी, कुछ बच गई हैं.” स्मिता अपनी धुन में बोलती जा रही थी, मगर रूबी के तन-बदन में जैसे आग लग गई थी. वाह, मेरे यहां से छुट्टी लेकर यहां अपनी जेब गरम कर रही है. दो दिन में हज़ार कमा लेगी. आए तो वापस एक बार, बताती हूं इसे… रूबी का मन ही मन भुनभुनाना शुरू हो गया.

सुंदरकांड शुरू हो चुका था. लंका दहन की चौपाईयां पढ़ी जा रही थीं. उधर रूबी के भीतर सुलगी आग में भी लपटें उठ रही थीं. ‘तीन साल में कितना ख़्याल रखा उसका. पिछले महीने बीमारी में हफ़्तेभर की छुट्टी दी थी. बाकी सब पैसे काटती हैं, मगर मैंने कभी नहीं काटे. अपने बेटे के बर्थडे पर उसके बच्चों के लिए भी केक, चॉकलेट भिजवाती हूं. काम बाद में शुरू करवाती हूं, पहले चाय पिलाती हूं. हर दूसरे महीने एडवांस पैसे ले लेती है. अभी भी दो महीने का एडवांस ले रखा है. बड़ा बेटा भी कमा रहा है. फिर भी पैसों के लिए इतनी हाय-हाय. मुझसे झूठ बोला…’ रूबी मन ही मन बुदबुदा रही थी.

हनुमानजी लंका जलाने के बाद अपनी पूंछ सागर में डुबोकर बुझा चुके थे, मगर रूबी के हृदय की आग अभी भी नहीं बुझी थी. वह मन ही मन निर्णय कर चुकी थी कि कल से ही दूसरी बाई देखेगी और अपने पैसे वापस लेकर उसे बाहर करेगी. बेटी का यह हाल निर्मलाजी समझ रही थी, मगर यहां कुछ भी कहना-सुनना बेकार था.

ख़ैर, दोनों घर पहुंचे, तो निर्मलाजी हल्की-फुल्की बातचीत कर बेटी का मन बहलाने का प्रयास करने लगीं. कुछ रिश्तेदारों की गप्पे, कुछ बचपन के क़िस्से, पर रूबी अभी भी नॉर्मल नहीं थी. तभी निर्मलाजी ने अपने मोबाइल पर फोटो गैलरी खोली और रूबी को दिखाने लगीं. इतनी पुरानी ब्लैक एंड व्हाइट फोटो देखकर रूबी को बड़ा आश्‍चर्य हुआ, “अरे मां, ये फोटो मोबाइल में कैसे? मुझसे भी शेयर करो ना.”

“हां, हां करूंगी. पूरी एलबम है मेरे मोबाइल पर. ज़रा देख तो, ये वाली फोटो, कैसी लग रही है तू इस फ्रॉक में और ये पापा के साथ आइस्क्रीम खाते हुए. खा कम रही थी और गिरा ज़्यादा रही थी.” निर्मलाजी हंसते हुए बोलीं, “और ये वाली तो ग़ज़ब है, नौकर के साथ. वो घोड़ा बनकर तुझे पीठ पर सवारी करा रहा है. तब तू पांच-छह बरस की रही होगी.”

यह भी पढ़ेधार्मिक कार्यों में शंख बजाने की परंपरा क्यों है? (Did You Know Why We Blow Shankh Before Puja?)

“अरे, ये तो रघु काका हैं. इन्हें नौकर क्यों बोल रही हो?” रूबी ने थोड़ा ग़ुस्से से कहा.

“नौकर को नौकर न कहूं, तो क्या कहूं?” निर्मलाजी ने तुनककर कहा, तो रूबी ने उन्हें घूरा.

“नौकर भी इंसान होते हैं और ये आपके लिए नौकर होंगे. मेरे लिए मेरे दादा से भी बढ़कर थे.” निर्मलाजी को रूबी की प्रतिक्रिया देखकर ख़ुशी हुई कि वह अभी भी वे मानवीय भावनाएं महसूस करती है, जो बचपन में किया करती थी. “कितना प्यार-दुलार दिया इन्होंने मुझे…” कहते हुए रूबी की आंखों में पूरा बचपन उतर आया.

रूबी के दादा गांव के बड़े ज़मींदार थे. वैसे वे भले इंसान थे, मगर ज़मींदारी की अकड़ और सख़्ती उनके व्यक्तित्व पर हावी रहा करती थी. रूबी का आरंभिक बचपन गांव की साफ़-सुथरी आबोहवा और सरलता में बीता. रघु काका दादा के मुलाज़िम थे. वैसे तो वे बिल्कुल घर के सदस्य जैसे थे, मगर ज़मींदार साहब की नज़र में तो नौकर ही ठहरे. रूबी का दिन रघु काका की मीठी बोली से ही शुरू होता था, “गुड़िया रानी दिन चढ़ आया है और अभी तलक बिस्तर में दुबकी हो. घोड़े की सवारी करनी है ना, तो जल्दी-जल्दी उठो,

नहा-धोकर तैयार हो जाओ, फिर सैर पर चलेंगे.” यह उन दोनों की दिनचर्या थी. काका तड़के पांच बजे ही हवेली आ जाते और गाय-भैसों का काम करते, मसलन- दूध निकालना, चारा डालना, सफ़ाई करना. फिर आठ-नौ बजे के लगभग एक-दो घंटे छोटी गुड़िया की सेवा में हाज़िर रहते. उसे घुमाना-फिराना, उससे मीठी-मीठी बातें करना.

रूबी को बचपन में खोया देख निर्मलाजी ने उसे झंझोड़ा… “अरे कहां खो गई? सीधे गांव पहुंच गई लगता है.”

“हां मां, सच कितने अच्छे दिन थे वो. रघु काका के चले जाने के बाद तो गांव में बिल्कुल अच्छा नहीं लगता था.”

“हां, कितना रोई थी तू उनके जाने पर.” रघु काका को याद कर रूबी अभी भी रुआंसी हो चली थी. “अच्छा तुझे वो क़िस्सा याद है जब एक दिन रघु काका बड़े उदास आए थे, बेमन से काम कर रहे थे. किसी ने इस बात पर ध्यान नहीं दिया, मगर तू इतनी छोटी होते हुए भी उनकी उदासी को भांप गई थी. कैसे बार-बार उनका मुंह ऊपर कर आंखों में झांकती हुई पूछ रही थी कि क्या हुआ काका, इतने उदास क्यों हो? वो कह रहे थे कि कहां उदास हूं, ये देखो मैं तो हंस रहा हूं… और फिर ज़ोर-ज़ोर से हंसने की ऐक्टिंग करने लगे थे.”

Deepti Mittal

     दीप्ति मित्तल

अधिक शॉर्ट स्टोरीज के लिए यहाँ क्लिक करें – SHORT STORiES

कहानी- आंखें बोलती हैं 1 (Story Series- Aankhen Bolti Hain 1)

“क्यों इतना खून जला रही हो गुड़िया. ऐसा क्या ग़ज़ब हो गया? वो भी इंसान है, बाल-बच्चोंवाली है. क्या उसे कोई ज़रूरी काम नहीं हो सकता? काम का क्या है. वापस आकर हम दोनों निपटा लेंगे. चल अब तू शांत हो जा. मैं तेरे लिए अदरक की चाय बनाती हूं. उसे पीकर रिलैक्स हो और आराम से तैयार हो जा.” मां के समझाने पर रूबी उखड़े मन से ही सही, मगर मुस्कुरा पड़ी.

रूबी बर्तन ऐसे मांज रही थी जैसे कुछ खुन्नस निकाल रही हो… ज़ोर-ज़ोर से बर्तन पटकने की आवाज़ें, एक-आध हाथ से छूटकर गिर जाने की टनटनाहट, धीमी-धीमी बड़बड़ाहट की गुनगुन, झल्लाए तेवर और तेज़ी से चलते हाथ. रूबी का हाल वही था, जो अक्सर कामवाली बाइयों के अचानक से न आने की ख़बर सुन किसी भी गृहस्थन का हो जाता है और सोने पर सुहागा तब होता है, जब घर में मेहमान भी आए हुए हों.

कितना भी पहले बोलकर रखो इन लोगों को, मगर ठीक ऐन टाइम पर छुट्टी मारती हैं. दो महीने से बोल रखा था चंदा को, मई के पहले दो हफ़्ते कोई छुट्टी मत लेना, मां आ रही हैं. वैसे भी मां मेरे पास नहीं आतीं. बड़ी मुश्किलों से राज़ी किया था कि कभी तो बेटी के पास भी रह जाया करो. बच्चे भी बोलते हैं, सबकी नानियां आती हैं, एक हमारी ही नहीं आती. तब जाकर पूरे पांच साल बाद आई हैं. सोचा था, उनके आने पर चंदा से कुछ एक्स्ट्रा काम करा लिया करूंगी, ताकि उन्हें ज़्यादा समय दे सकूं, कुछ घुमा-फिरा सकूंगी. मगर ये महारानीजी तो अपना काम करने से भी रही. घर कितना गंदा पड़ा है, बर्तन भी मुझे ही मांजने पड़ रहे हैं… बड़बड़ाते हुए रूबी की नज़र बार-बार घड़ी की ओर जा रही थी. घड़ी की सुइयों के साथ उसके हाथों की गति भी बढ़ रही थी. ओह! कितना लेट हो गया. लगता है आरती तक ही पहुंच पाएंगे.

रूबी की मम्मी निर्मलाजी अपने गृहनगर बरेली से बाहर कम ही आती-जाती थीं. वे अधिकतर पूजा-पाठ और सेवा कार्यों में ही व्यस्त रहतीं. मुंबई तो जैसे उन्हें दुनिया का दूसरा कोना लगता, इसलिए बेटी-दामाद के लाख आग्रह के बाद भी उन्हें टाल दिया करती थीं. वैसे भी मुंबई की भागती-दौड़ती ज़िंदगी और उमस उन्हें बिल्कुल पसंद नहीं थी. फिर भी इस बार आ गई थीं. रूबी बहुत कोशिश करती कि उन्हें कहीं घुमा लाए, मगर भीड़ से उनका जी घबराता था.

आज पास की ही सोसायटी में रूबी की एक पुरानी परिचिता स्मिता के यहां गृहप्रवेश की पूजा चल रही थी. निर्मलाजी वहां जाने के लिए तैयार हो गईं. रूबी ने वहां समय से पहुंचना तय किया था, मगर सुबह उसकी बाई चंदा का फोन आ गया कि उसे बहुत ज़रूरी काम से गांव जाना पड़ रहा है, अतः वह दो दिन काम पर नहीं आ पाएगी. फोन सुनकर रूबी का जो हाल हुआ, उसका वर्णन शब्दों में नहीं किया जा सकता. उसे वही समझ सकता है, जो ऐसी मुसीबत से गुज़रा हो.

यह भी पढ़ेलघु उद्योग- कैंडल मेकिंग: रौशन करें करियर (Small Scale Industries- Can You Make A Career In Candle-Making?)

रूबी का मन तो किया आज ही निकाल बाहर करे चंदा को, पर कैसे? आज से पहले तो उसने ऐसा धोखा कभी नहीं दिया. पैसे तो काट ही लूंगी, पर कैसे काट सकती हूं. महीने की दो छुट्टियां तो मान्य हैं. मगर कुछ मां के आने का तो लिहाज़ करती… उसकी बड़बड़ जब निर्मलाजी के कानों में पहुंची, तो वे रूबी को समझाने आ गईं.

“क्यों इतना खून जला रही हो गुड़िया. ऐसा क्या ग़ज़ब हो गया? वो भी इंसान है, बाल-बच्चोंवाली है. क्या उसे कोई ज़रूरी काम नहीं हो सकता? काम का क्या है. वापस आकर हम दोनों निपटा लेंगे. चल अब तू शांत हो जा. मैं तेरे लिए अदरक की चाय बनाती हूं. उसे पीकर रिलैक्स हो और आराम से तैयार हो जा.” मां के समझाने पर रूबी उखड़े मन से ही सही, मगर मुस्कुरा पड़ी.

दोनों जब पूजा में पहुंचे, तो आरती ही चल रही थी. रूबी को पूजा हॉल में प्रवेश करते हुए बड़ी शर्म महसूस हुई. जब कोई उसके घर ऐसे सीधे आरती में पहुंचता था, तो वह मन ही मन चिढ़ती थी, ‘लो आ गए सीधा प्रसाद खाने…’ और अब वही ऐसे आई है, स्मिता क्या सोचेगी.

आरती के बाद भोजन का आयोजन था और उसके कुछ देर बाद सुंदरकांड शुरू होना था. भोजन के लिए बाहर एक अलग पंडाल की व्यवस्था थी. स्मिता को बधाई और गिफ्ट देकर रूबी और निर्मलाजी ने लंच की प्लेट लगाई और पंडाल के एक कोने में सही जगह देखकर बैठ गए. खाना खाते हुए यूं ही रूबी की नज़र हवा से हिल रहे पर्दों के बाहर चली गई, तो वह चौंक पड़ी… ‘अरे ये क्या, चंदा यहां.’ बाहर उसकी बाई चंदा बैठी बर्तन मांज रही थी. यह देख रूबी के भीतर यकायक जो ज्वालामुखी फूटा, यदि उसका लावा बाहर आ जाता, तो चंदा के साथ-साथ सभी बर्तन-भांडे भी बहाकर ले जाता, मगर रूबी कैसे बहने देती. सामने उसकी मां जो बैठी थी. मां के सामने अपनी छवि कैसे ख़राब होने देती कि उसकी इतनी समझदार, मैच्योर, टफ बेटी एक बाई के धोखे से हिल गई.

ख़ैर, रूबी ने जैसे-तैसे ख़ुद को संभाला और प्लेट में बचा खाना लगभग निगला और स्मिता के पास जाकर बातचीत करने लगी. “यार स्मिता, एक बात तो बता, ये जो मेड बाहर बर्तन मांज रही है, ये तेरी परमानेंट मेड है क्या?”

“अरे नहीं, ये मेरी मेड की पहचानवाली है. मुझे दो दिन के लिए एक्स्ट्रा कामों के लिए एक मेड चाहिए थी, तो वह इसे ले आई. भली औरत है, सुबह से चुपचाप काम कर रही है. जो बोलो कर देती है.”

Deepti Mittal

    दीप्ति मित्तल

अधिक शॉर्ट स्टोरीज के लिए यहाँ क्लिक करें – SHORT STORiES

कहानी- सुज़ैन 3 (Story Series- Suzanne 3)

“कुछ नहीं किया मामी…” वह बेशर्मी से हंसता हुआ बोला, “ज़रा-सी हंसी-मज़ाक में भी साली नाटक करती है. अपने देश में आए दिन बॉयफ्रेंड और हसबैंड बदलती रहती हैं. समुद्र के किनारे नंगे पड़े रहती हैं. सड़क पर चलते-चलते प्रेमालाप करती हैं. खुले सेक्स के आदी हैं और हमारे देश में आकर, लाजवंती बनने में हमारे देश की लड़कियों को भी मात कर देती हैं…”

“सूरज…” मैंने ग़ुस्से में चीखकर एक ज़ोर का चांटा उसके दाएं गाल पर जड़ दिया इतनी ज़ोर से कि उसकी आंखों के आगे सितारे नाच उठे होंगे.

“शर्म नहीं आती तुम्हें. उनके देश में कुछ भी होता है, पर जो कुछ होता है उनकी इच्छा से होता है. अपनी इच्छा और दूसरे की ज़बर्दस्ती में फ़र्क़ नज़र नहीं आता तुम्हें, पर तुम जैसे पुरुष नारी की इच्छा का सम्मान करना क्या जानो?

“सुज़ैन…” मैंने ज़ोर से सुज़ैन को आवाज़ दी. मेरी आवाज़ सुनकर शायद पकड़ ढीली होने के कारण सुज़ैन एकाएक छूटकर चिल्लाती हुई भागी, “रैमा…”

वह सीढ़ियों से भागती-दौड़ती उतरकर नीचे मेरे पास आकर मेरे गले से चिपक गई. उसकी सांसें बहुत ज़ोरों से चल रही थी और बदन डर से थर-थर कांप रहा था.

“कौन है ऊपर?” मैं पूरी ताक़त से चीखी, “जो भी है नीचे आ जाओ, वरना मैं अभी शोर मचा दूंगी.”

तभी सूरज के दोनों दोस्त तेज़ी से सीढ़ी उतरकर बाहर निकलकर गायब हो गए. मैं भौंचक्की-सी उन्हें देखती रह गई. ये दोनों ऊपर थे, तो इसका मतलब सूरज भी अवश्य ही ऊपर होगा.

“सूरज, नीचे आ जा… तेरी ख़ैरियत इसी में है, वरना तू मुझे जानता है. मैं शादीवालेे घर में हंगामा कर दूंगी. सबके सामने तेरी बेइज़्ज़ती हो जाएगी.”

सूरज धीरे-धीरे सीढ़ी उतरकर मेरे सामने खड़ा हो गया. उसे देखकर सुज़ैन मुझसे और भी चिपक गई.

“सच-सच बता… क्या किया तूने इसके साथ?”

“कुछ नहीं किया मामी…” वह बेशर्मी से हंसता हुआ बोला, “ज़रा-सी हंसी-मज़ाक में भी साली नाटक करती है. अपने देश में आए दिन बॉयफ्रेंड और हसबैंड बदलती रहती हैं. समुद्र के किनारे नंगे पड़े रहती हैं. सड़क पर चलते-चलते प्रेमालाप करती हैं. खुले सेक्स के आदी हैं और हमारे देश में आकर, लाजवंती बनने में हमारे देश की लड़कियों को भी मात कर देती हैं…”

यह भी पढ़ेरिश्तों में मिठास बनाए रखने के 50 मंत्र (50 Secrets For Happier Family Life)

“सूरज…” मैंने ग़ुस्से में चीखकर एक ज़ोर का चांटा उसके दाएं गाल पर जड़ दिया इतनी ज़ोर से कि उसकी आंखों के आगे सितारे नाच उठे होंगे.

“शर्म नहीं आती तुम्हें. उनके देश में कुछ भी होता है, पर जो कुछ होता है उनकी इच्छा से होता है. अपनी इच्छा और दूसरे की ज़बर्दस्ती में फ़र्क़ नज़र नहीं आता तुम्हें, पर तुम जैसे पुरुष नारी की इच्छा का सम्मान करना क्या जानो? लेकिन आज अपनी बहन के विवाह में आई हुई मेहमान, वो भी दूसरे देश से, तुम्हारी इस हरकत ने न स़िर्फ पूरे परिवार को, बल्कि देश को भी शर्मसार कर दिया है. कम से कम देश की इज़्ज़त का ख़्याल तो किया होता…

“तुम चाहते हो कि मैं इस बात को लेकर घर में हंगामा न करूं, तो इन विदेशी मेहमानों के जाने तक तुम तीनों मुझे घर में नज़र नहीं आने चाहिए.” मैं भस्म करनेवाली आग्नेय दृष्टि से उसे घूरती हुई बोली. सूरज गाल पर हाथ रखकर चला गया. मैंने सुज़ैन को कमरे में ले जाकर बिस्तर पर बैठाकर पानी पिलाया. वह रोते-रोते लगातार बोल रही थी, “मैं पुलिस में जाऊंगी… छोडूंगी नहीं उन तीनों को…” उसे गले से लगाए पीठ सहलाते हुए मैं सांत्वना दे रही थी और मन ही मन मना रही थी कि कोई इस समय अंदर न आ जाए. थोड़ी देर बाद सुज़ैन रोकर शांत हो गई. फिर मैं धीरे-धीरे उसे समझाने लगी कि यदि वह इस समय इस बात को बढ़ाएगी, तो घर में बारात है, पूरे परिवार व दुल्हन की ज़िंदगी पर इस बात का क्या असर पड़ सकता है. दुल्हन के भाई की करतूत की सज़ा मानसिक रूप से सबको भुगतनी पड़ेगी.

“सूरज को सज़ा देने की बात तुम मुझ पर छोड़ दो सुज़ैन. तुम्हारे साथ जो अभद्रता उसने की है, उसकी सज़ा पुलिस व क़ानून उसको उतना नहीं दे पाएगा, जो उसका परिवार उसे देगा. मैं तुम्हारे सामने हाथ जोड़ती हूं सुज़ैन…” मैंने अपने दोनों हाथ जोड़ दिए.

“नो… नो रैमा…” उसने मेरे दोनों हाथ पकड़ लिए. तभी ऊली सुज़ैन को ढूंढ़ता हुआ अंदर आ गया. हमें ऐसे बैठा देखकर पूछ बैठा.

“क्या हुआ?” मैं अचकचाकर सुज़ैन को देखने लगी. अब सब कुछ सुज़ैन पर निर्भर था कि आगे आनेवाला घटनाक्रम क्या होगा.

“कुछ नहीं…” वह मुस्कुराती हुई बोली,

“मैं बिल्ली से डरकर सीढ़ी से गिर गई थी, बस…”

“ओह! बाहर आ जाओ आप लोग.”

“अभी आते हैं.” ऊली चला गया. मेरी आंखों में आंसू आ गए. सूरज को अपनी बहन, अपने परिवार, अपने देश की मान-मर्यादा का ख़्याल नहीं रहा और एक विदेशी लड़की ने, जो यहां से जाने के बाद कभी हमें मिलेगी भी या नहीं, कैसे मेरी बात का मान रखकर हम सबको भविष्य में आनेवाली एक अप्रिय स्थिति से बचा लिया था. मैंने सुज़ैन को गले से लगा लिया.

यह भी पढ़े10 छोटी बातों में छुपी हैं 10 बड़ी ख़ुशियां (10 Little Things Can Change Your Life)

शादी शांतिपूर्वक संपन्न हो गई. दूसरे दिन एक-एक करके सभी रिश्तेदार विदा होने लगे. सुज़ैन और ऊली के भी जाने का समय हो गया. ऊली ने अपना कैमरा निकाला और हम सबके साथ फोटो खींच ली. उनका हमारा नाता स़िर्फ एक इंसान का इंसान से नाता था, जिन्होंने इस धरती पर जन्म लिया था. प्यार, स्नेह, भावनाएं, इंसानियत कुछ भी देश की सीमाओं में बंधा हुआ नहीं होता. चाहे वह हमारे पड़ोसी देश हों या सात समंदर पार के देश. जब एक इंसान दूसरे इंसान से प्यार करता है, तो किसी भी देश की सीमाएं मिट जाती हैं. ऐसा न होता तो अलग देश, धर्म, भाषा, रंग-रूप होते हुए भी हमारा दिल सुज़ैैन और ऊली को विदा करते समय यूं न रोता और उनकी आंखें भी न भीगतीं.

कार काफ़ी दूर चली गई. सुज़ैन पीछे देखकर देर तक हाथ हिलाती रही और हम हाथ हिलाते हुए अपनी नम आंखों को पोंछते रहे. मेरी आंखों से आंसू निकलकर गालों पर लुढ़क गए. इन आंसुओं में सुज़ैन से बिछड़ने के अतिरिक्त और भी बहुत कुछ था. बहुत-सी अप्रिय घटनाओं का टल जाना. सुज़ैन का सकुशल वापस चले जाना आदि.

गालों पर गीलापन होने से मैं वर्तमान में लौट आई. सुज़ैन और ऊली एक मीठी याद के रूप में मेरे अतीत का एक हिस्सा बन गए थे. कभी नहीं सोचा था कि आज फिर दुबई में उनसे मुलाक़ात हो जाएगी. ज़िंदगी बहुत छोटी है और दुनिया गोल है. हो सकता है फिर कभी, कहीं, किसी मोड़…पर सोचकर मैं भी उठकर सोने के लिए बेडरूम की तरफ़ चली गई.

sudha jugaran

सुधा जुगरान

अधिक शॉर्ट स्टोरीज के लिए यहाँ क्लिक करें – SHORT STORiES

कहानी- सुज़ैन 2 (Story Series- Suzanne 2)

“मैं सब कुछ अपने पति की पसंद से ही करती हूं.” सुज़ैन बोली, तो हम सब हतप्रभ हो उसका चेहरा देखने लगे, “तुमने हमें बहुत इंप्रेस कर दिया सुज़ैन. यह तो हमारी भारतीय संस्कृति है.” मैं बोली.

दो दिन में सुज़ैन हमारे साथ ख़ूब घुल-मिल गई थी. प्यार जताने व चुंबन लेने में खुलेपन की संस्कृति के आदी सुज़ैन व ऊली ने भारतीय संस्कृति को समझकर यहां कोई अभद्र हरकत नहीं की थी. सुज़ैन की उपस्थिति ने विवाह के उल्लासमय वातावरण को आनंद के साथ-साथ एक अलग तरह के कौतूहल व रोमांच से भर दिया था.

फिर तो शुरू हुआ सुज़ैन को कपड़े पहनाने और बदलने का सिलसिला. किसके कपड़े यानी ब्लाउज़, लहंगा, सूट वगैरह उस पर फिट आएंगे. सुज़ैन बार-बार ड्रेसिंग रूम में जाती और कुछ पहनकर आ जाती. फिर उसे कुछ और थमा दिया जाता और वह उसे ट्राई करती, फिर ड्रेसिंग रूम में घुस जाती व कुछ और पहनकर आ जाती. और कमरे में हंसी का फव्वारा फूट पड़ता. ख़ूबसूरत सुज़ैन जो भी पहनती उसमें सुंदर लगती. हम सबकी सम्मिलित हंसी से परेशान सुज़ैन कह उठी, “मेरा मज़ाक मत बनाओ प्लीज़.” वह अंग्रेज़ी में बोली.

“तुम्हारा मज़ाक नहीं बना रहे हैं स़ुजैन.” पारुल बोली, “बल्कि हर कोई तुम्हें अपना कुछ न कुछ देना चाहता है. तुम सबको बहुत अच्छी लग रही हो.”

“थैंक्यू-थैंक्यू.” सुज़ैन सबकी तरफ़ गर्दन घुमाकर बोली.

कई ड्रेसेस ट्राई करने के बाद सुज़ैन को किसी न किसी का कुछ न कुछ फिट आ ही गया. तभी दरवाज़े पर आहट सुनकर मैंने उधर देखा. दुल्हन का भाई सूरज यानी शिखा का बेटा व उसके दो दोस्त खड़े थे.

“अंदर क्या हो रहा है मामी?” अपनी बदतमीज़ियों के लिए रिश्तेदारों में प्रसिद्ध सूरज खींसे निपोरता हुआ बोला.

“कुछ भी हो रहा हो, पर तुम यहां क्या कर रहे हो?”

“क्यों मामी अपने ही घर में मैं क्या कर रहा हूं? हम भी अंदर आ जाते हैं.” वह बेशर्म नज़रें बीच कमरे में लहंगा-चोली पहन सबको दिखाती सुज़ैन पर डालता हुआ बोला.

“तुम लोग जाते हो यहां से या नहीं?” मैं ग़ुस्से में बोली.

यह भी पढ़ेरिश्तों की बीमारियां, रिश्तों के टॉनिक (Relationship Toxins And Tonics We Must Know)

“जाते हैं मामी, जाते हैं. हम क्या कर लेंगे अंदर आकर.” कहकर वह ढीठ हंसी हंसता हुआ मुड़ गया, पर उसकी व उसके दोस्तों की नज़रें मुझे अंदर तक आहत व आशंकित कर गईं कि ये विदेशी मेहमान आदर-सम्मान के साथ अपने देश लौट जाएं. कुछ अप्रिय न हो इनके साथ.

दूसरे दिन हल्दी की रस्म पर सबको साड़ी पहनते देख सुज़ैन ने भी साड़ी पहन ली और चूड़ी-बिंदी भी लगाई. हल्दी की रस्म में भी सुज़ैन व ऊली कुर्सियों पर बैठे सब कुछ बड़े ध्यान से देख रहे थे. तभी ऊली किसी काम से उठकर अंदर चला गया. मौक़ा देखकर सूरज व उसके दोस्त सुज़ैन को घेरकर बैठ गए. उनके इरादों से अनजान सुज़ैन उन्हें देखकर मुस्कुराने लगी. वे उससे तरह-तरह की बातें कर रहे थे. मैं जानती थी कि मेरे वहां जाने से तीनों उठनेवाले नहीं हैं, इसलिए मैंने बेटे को बुलाया और उसके कान में कहा कि ऊली को बुला लाए रस्म देखने के लिए. कहां है वह?

बेटा गया और ऊली को बुला लाया. उसके आते ही सूरज ने सुज़ैन के बगलवाली सीट छोड़ दी. थोड़ी बहुत औपचारिक बातें करके तीनों उठ गए. शाम को शादी थी. तैयार होने सब ब्यूटीपार्लर जाने लगे, तो हमने सुज़ैन को भी साथ ले लिया, तभी ऊली सामने से आता दिखाई दिया.

“मेरी वाइफ को कहां लेकर जा रहे हो?”

“ब्यूटीपार्लर जा रहे हैं.” पारुल उससे अंग्रेज़ी में बोली. फिर हमसे हिंदी में बोली, “मुझे आज पता चला कि ये दोनों पति-पत्नी हैं.” सुनकर हम सब हंसने लगे. सुज़ैन भी बिना कुछ समझे हमारे साथ हंसने लगी. उसे हंसता देख हम सब और ज़ोर से हंसने लगे. पार्लर में भी सुज़ैन ने हम सबके जैसा मेकअप व जूड़ा बना लिया. तभी पारुल बोली, “अब बस करो सुज़ैन, पता नहीं ऊली को यह सब अच्छा लगेगा या नहीं.”

“मैं सब कुछ अपने पति की पसंद से ही करती हूं.” सुज़ैन बोली, तो हम सब हतप्रभ हो उसका चेहरा देखने लगे, “तुमने हमें बहुत इंप्रेस कर दिया सुज़ैन. यह तो हमारी भारतीय संस्कृति है.” मैं बोली.

दो दिन में सुज़ैन हमारे साथ ख़ूब घुल-मिल गई थी. प्यार जताने व चुंबन लेने में खुलेपन की संस्कृति के आदी सुज़ैन व ऊली ने भारतीय संस्कृति को समझकर यहां कोई अभद्र हरकत नहीं की थी. सुज़ैन की उपस्थिति ने विवाह के उल्लासमय वातावरण को आनंद के साथ-साथ एक अलग तरह के कौतूहल व रोमांच से भर दिया था.

यह भी पढ़ेलघु उद्योग- पोटैटो वेफर मेकिंग क्रंची बिज़नेस (Small Scale Industries- Start Your Own Potato Wafer-Making Business)   

बारात आ गई थी. सभी ख़ुश व उल्लासित थे. पर उस उल्लासभरे वातावरण में एक काली घटना ने सुज़ैन की सारी ख़ुशियों को जैसे रौंद डाला और मैं सोचती रह गई कि ‘अतिथि देवो भव’ की हमारी गौरवशाली संस्कृति आख़िर इतनी खोखली क्यों हो गई. हमारी युवापीढ़ी स़िर्फअपने स्वार्थ व क्षणिक सुख के लिए इस महान संस्कृति की जड़ें खोदने पर क्यों तुली हुई है? कई समन्वित परंपराओं की संस्कृतिवाला हमारा देश अपनी इस महान सभ्यता से निकलकर बलात्कारियों का देश कहलाने की तरफ़ क्यों अग्रसर है? महिला सशक्तिकरण की बड़ी-बड़ी बातें आख़िर जन-जन के मानसपटल पर कब आकार लेंगी?

रात को फेरे के समय सभी परिवारजन बेदी के चारों तरफ़ कुर्सियां लगाकर दूल्हा-दुल्हन को फेरे लेते देख आपस में चुहलबाज़ी करने में मस्त थे. ऊली और सुज़ैन भी बहुत ध्यान से सब कुछ देख रहे थे. थोड़ी देर में मैंने देखा कि सुज़ैन और ऊली अपनी कुर्सियों से नदारद हैं. मैंने इधर-उधर देखा, फिर सोचा शायद दोनों सोने चले गए होंगे. तभी मुझे ऊली अंदर से बाहर आता दिखाई दिया. मैं थोड़ी देर सुज़ैन के आने का इंतज़ार करती रही. अनायास ही मेरा ध्यान सूरज व उसके दोस्तों की तरफ़ गया. वे तीनों कहीं दिखाई नहीं दे रहे थे.

मुझसे अब बैठा नहीं जा रहा था.

मैं बहाने से उठकर घर के अंदर चली गई. अंदर सुनसान था. सुज़ैन और ऊली का कमरा ऊपर की मंज़िल पर था. अभी मैं ऊपर जाने का सोच ही रही थी कि मुझे एक अजीब-सी कसमसाहटभरी आहट सुनाई दी, जैसे कहीं छीना-झपटी हो रही है. तभी मुझे सुज़ैन के ग़ुस्से में कुछ बोलने व बड़बड़ाने की आवाज़ सुनाई दी. वह अंग्रेज़ी में ग़ुस्से में कुछ बोल रही थी. लग रहा था जैसे वह ख़ुद को छुड़ाने का प्रयास कर रही है.

sudha jugaran

   सुधा जुगरान

अधिक शॉर्ट स्टोरीज के लिए यहाँ क्लिक करें – SHORT STORiES

कहानी- सुज़ैन 1 (Story Series- Suzanne 1)

आख़िर मैं सुज़ैन तक पहुंच ही गई. “सुज़ैन…” युवती भी अपना नाम सुनकर पीछे पलटकर मुझे घूरने लगी और एकाएक पहचान की मीठी मुस्कुराहट से उसका चेहरा दमकने लगा.

“यू… रैमा…?” वह रमा की बजाय मुझे रैमा ही कहती थी.

“येस. आई एम रैमा. यू रिमैंबर मी?”

जवाब में सुज़ैन मुझसे लिपट गई और मैंने भी उसे बांहों में भींच लिया. मैं पति के साथ एक महीने के लिए दुबई आई थी बेटे-बहू के पास. सोचा भी न था कि सुज़ैन से यहां मुलाकात हो जाएगी.

दोनों की आंखें नम थीं. हिंदुस्तानी तो भावुकता के लिए प्रसिद्ध होते ही हैं, पर वह जर्मन लड़की कैसे इतने वर्षों के लंबे अंतराल के बाद भी मुझसे मिलकर अपनी गीली हो आई आंखों को पोंछ रही थी.

बच्चों व पति के साथ दुबई के इब्नबतूता मॉल के अंदर घुसी ही थी कि सामने से आती एक गोरी युवती को देखकर मैं चौंक गई. ‘इतनी जानी-पहचानी सूरत? कहां देखा है इसे? पर यह गोरी लड़की और मैं खालिस हिंदुस्तानी. सारा जीवन भारत में काट दिया. भला इस लड़की से मैं कहां मिल सकती हूं?’

तभी क्षणों में स्मृतिपटल के कपाट खुल गए. यादों के झरोखों से एक नाम दिमाग़ को झंकृत कर गया, ‘सुज़ैन. हां, यह तो सुज़ैन ही है…’ मैं पलभर में ही पीछे पलट गई.

“कहां जा रही हो मम्मी?”

“एक मिनट… अभी आई…” बेटा भी मेरे पीछे दौड़ गया. कहीं मॉल में टूरिस्ट की असीमित भीड़ में उसकी मम्मी खो न जाए.

आख़िर मैं सुज़ैन तक पहुंच ही गई. “सुज़ैन…” युवती भी अपना नाम सुनकर पीछे पलटकर मुझे घूरने लगी और एकाएक पहचान की मीठी मुस्कुराहट से उसका चेहरा दमकने लगा.

“यू… रैमा…?” वह रमा की बजाय मुझे रैमा ही कहती थी.

“येस. आई एम रैमा. यू रिमैंबर मी?”

जवाब में सुज़ैन मुझसे लिपट गई और मैंने भी उसे बांहों में भींच लिया. मैं पति के साथ एक महीने के लिए दुबई आई थी बेटे-बहू के पास. सोचा भी न था कि सुज़ैन से यहां मुलाकात हो जाएगी.

दोनों की आंखें नम थीं. हिंदुस्तानी तो भावुकता के लिए प्रसिद्ध होते ही हैं, पर वह जर्मन लड़की कैसे इतने वर्षों के लंबे अंतराल के बाद भी मुझसे मिलकर अपनी गीली हो आई आंखों को पोंछ रही थी.

“तुम यहां कैसे?”

“घूमने आई हूं. ऊली भी आया है. सामनेवाली शॉप में है.” इतने में संकल्प भी उसे पहचान गया था.

“हैलो सुज़ैन.”

“इज़ ही सैंकी?” उसने मुझसे पूछा. संकल्प बोलना जर्मन लड़की के लिए शायद कठिन था, इसलिए वह उसे सैंकी ही कहती थी.

“येस. आई एम सैंकी.” संकल्प ने अपना हाथ आगे बढ़ा दिया. सुज़ैन ने उससे हाथ मिलाया.

यह भी पढ़े: हैप्पी फैमिली के लिए न भूलें रिश्तों की एलओसी (Boundaries That Every Happy Family Respects)

तब तक मेरे पति व बहू भी वहीं पहुंच गए और ऊली भी आ गया. वह भी हम सबसे मिलकर बहुत ख़ुश हुआ. हमने कुछ समय उनके साथ बिताया. कॉफी पी. फोन नंबर लिए-दिए और घर आ गए.

घर वापस आते हुए कार में मैं ख़ामोश बैठी थी. सुज़ैन किसी भी तरह दिल-दिमाग़ से नहीं उतर पा रही थी. जो यादें दिल में समय की अंधेरी गलियों में दफ़न हो चुकी थीं, वे एकाएक जैसे समय की गर्त झाड़कर चमत्कृत हो उठी थीं. घर पहुंची, तो डिनर बनाने में व्यस्त हो गई. डिनर के बाद बच्चे भी सोने चले गए और पति भी. पर मुझे आज नींद नहीं आ रही थी. लॉबी में बैठकर मैं पुरानी यादों में खो गई.

यह विदेशी जोड़ा, जर्मनी के फ्रेंकफर्ट शहर से भारत मेरी चचेरी ननद शिखा की बेटी के विवाह में शामिल होने आया था. फ्रेंकफर्ट में वे मेरी ननद पारुल व ननदोई के मित्रों में एक थे. सुज़ैन की कई यादें, उसकी भाव-भंगिमाएं, शादी में भारतीय परिधान ही पहनने की ज़िद, बिंदी-चूड़ी पहनने की ज़िद, मेहंदी लगवाना जैसे कई मासूम लम्हे मेरे मानसपटल पर साकार हो उठे, लेकिन उन ख़ूबसूरत यादों के बीच एक स्याह याद भी थी, जिसे मैं इतने सालों में कभी नहीं भुला पाई.

आज से लगभग सात-आठ साल पहले की बात है. शिखा की बेटी के विवाह में जब पति व बेटे के साथ मैं कानपुर पहुंची, तो घर दुल्हन की तरह सजा हुआ था. जर्मनी से पारुल भी परिवारसहित पहुंच गई थी. सभी परिवारजनों के पहुंचने से घर में उत्सव का माहौल बन गया था.

“भाभी, पता है जर्मनी से मेरी एक मित्र भी आनेवाली है, आज दोपहर को पहुंचेगी.” पारुल बोली.

“अच्छा?” मुझे उत्सुकता हुई, “अकेली आ रही है क्या?”

“नहीं नहीं… उसके साथ एक लड़का भी है.”

“लड़का? मतलब… उसका बॉयफ्रेंड या हसबैंड? कौन है?”

“मुझे नहीं पता…” पारुल हंसते हुए बोली, “वहां पर यह सब नहीं पूछा जाता.”

“क्यों?” मैं आश्‍चर्य से बोली. पारुल हंसने लगी, “क्योंकि उनके साथ ज़िंदगीभर एक पुरुष या एक महिला नहीं दिखाई देती.” पारुल ने रहस्योद्घाटन किया और किसी काम में लग गई.

यह भी पढ़ेये हैं भारत के 5 सबसे सुंदर बीचेज़, विदेशी भी हैं इनके दीवाने (Top 5 Indian Beaches, You Must Go)

शाम के समय सभी परिवारजन विवाह के माहौल में बैठे हंसी-मज़ाक कर आनंदित हो रहे थे कि मुझे गेट से एक गोरा जोड़ा आता दिखाई दिया. मैं समझ गई कि यही है पारुल के आनेवाले विदेशी मित्र. तभी पारुल अंदर से आई और उनसे हाथ मिलाने लगी. थोड़ी देर में पारुल उन दोनों को लेकर हमारे सामने आ गई, “यह सुज़ैन है और यह ऊली.” पारुल हमसे बोली. फिर उनसे अंग्रेज़ी में बोली, “ये मेरी भाभी यानी मेरे भाई की पत्नी… ये फलां… ये फलां…

वगैरह-वगैरह.” सुज़ैन और ऊली मुस्कुराकर सबको गर्दन झुका-झुकाकर ‘हैलो-हैलो’ कहते रहे.

पहली मुलाक़ात में सुज़ैन हमें अच्छी तो लगी, लेकिन फिर भी परिचय महज़ रस्मी तौर पर रहा. हां, मेरे दिल में सुज़ैन को लेकर एक अजीब-सी उत्सुकता जाग गई थी. शाम को घर में महिला संगीत का कार्यक्रम था. तभी पारुल होंठोंे ही होंठों में कुछ बुदबुदाते हुए आई.

“अब क्या हुआ?” मैंने पूछा.

“कुछ नहीं.” पारुल परेशान-सी बोली, “सुज़ैन कह रही है कि वह शादी के सभी मौक़ों पर स़िर्फ भारतीय परिधान ही पहनेगी. अब मैं इतनी जल्दी इसके नाप के ड्रेसेस कहां से लाऊं?” मुझे बहुत अच्छा लगा सुनकर. जहां हमारी युवा पीढ़ी पश्‍चिमी परिधान के पीछे पागल है. विदेशी हमारे रंग-बिरंगे ख़ूबसूरत परिधानों में दिलचस्पी रखते हैं.

sudha jugaran

   सुधा जुगरान

अधिक शॉर्ट स्टोरीज के लिए यहाँ क्लिक करें – SHORT STORiES

कहानी- ज़िंदगी के मोड़ 3 (Story Series- Zindagi Ke Mod 3)

नलिन मेरा पहला प्यार था, मेरा मार्गदर्शक, बंधू, सखा, सब कुछ. उसी से तो मैंने जीना सीखा था, स्वयं से पहले दूसरों के बारे में सोचना. प्रीत-प्रेम से अधिक हमारा मैत्री संबंध था. उससे इस विषय पर बात करना ज़रूरी था. हमने हमेशा एक-दूसरे की उलझनें बांटी थीं. भविष्य की योजनाओं की चर्चा की थी. नलिन कहा करता था कि अपने से कम की सहायता करना सदैव उसके जीवन की प्राथमिकता रहेगी और इस व़क्त गुड्डू की मां बनना मेरी प्राथमिकता है.

तारा को गए महीनाभर हो गया. धीरे-धीरे लोगों का आना-जाना भी कम हो गया. गुड्डू इन सबसे बेख़बर बढ़ रहा था. दहाड़ मारकर वह अपनी ज़रूरतें पूरी करवा ही लेता था. चाहे वह दूध हो या फिर लंगोट गीला होने पर बदलवाना हो. आया कभी सुनती, तो कभी अनसुना कर देती.

उस दिन मैं स्कूल से लौटने पर हाथ-मुंह धोने भीतर गई कि दूसरे कमरे से गुड्डू के रोने की आवाज़ आई. चाची रसोई में व्यस्त थीं और आया भी नज़र नहीं आ रही थी, सो मैं उस ओर बढ़ गई. देखा वह गीला था और इसलिए गुहार लगा रहा था. मैंने उसका लंगोट बदला, तो वह मुस्कुराने लगा. मुझमें उस दिन बिन मां के शिशु पर स्नेह छलक आया और उसे गोदी में लेकर मैंने उसके माथे को चूम लिया. इसी बीच चाची भीतर आ गईं. वह भी गुड्डू की आवाज़ सुनकर आई थीं. हमें देखते कुछ देर खड़ी रहीं, जैसे कुछ कहना चाह रही हों. चेहरे से स्पष्ट था कि उनके मन में कुछ घुमड़ रहा है. फिर शायद विचार त्याग लौट गईं.

अगले दिन रविवार था. चाचा-चाची दोनों लॉन में बैठे चाय पी रहे थे और मुझे बुलावा भेजा. चाचू ने मुझे अपने पास बैठाया पर ख़ामोश रहे. चाची ने भी एक-दो बार मेरी ओर नज़र उठाकर देखा, पर कहा कुछ नहीं. पता नहीं किस बात का संकोच हो रहा था उन्हें? थोड़ी देर में चाचू ने बात शुरू की, “तुमसे एक बात कहनी थी… पता नहीं तुम्हें ठीक लगेगी कि नहीं… विजयन दूसरा विवाह तो करेगा ही, अभी उम्र ही क्या है उसकी… पता नहीं कैसी लड़की आए, गुड्डू को प्यार दे या नहीं… क्या ऐसा हो सकता है… कि तुम ही विजयन से विवाह कर लो?… गुड्डू को एक स्नेहमयी मां मिल जाएगी, पर मैं तुम पर कोई दबाव नहीं डाल रहा. एक इच्छा व्यक्त कर रहा हूं बस. यदि तुम हां कहो तो ही…”

मैंने कल जब गुड्डू को उठाया था, तो मेरे मन में भी यही ख्याल आया था कि इस बच्चे को मैं ही पाल लूं, पर फिर नलिन का ध्यान आया, उससे पूछना ज़रूरी था. लेकिन चाचू तो विजयन से ही शादी करने की बात कर रहे हैं. शायद उनकी बात ही व्यवहारिक है. मां का प्यार देकर मैं उससे उसके पिता का प्यार तो नहीं छीन सकती न! फिर विजयन या गुड्डू के दादाजी बच्चा देने के लिए राज़ी हों, यह ज़रूरी तो नहीं.

ज़िंदगी एक नए मोड़ पर आ खड़ी थी, पर इस बार मुड़ने अथवा न मुड़ने का फैसला  मेरे हाथ में था और मैंने फैसला ले लिया था. मैं दूंगी गुड्डू को मां का प्यार. मेरी प्यारी बहन तारा की एकमात्र निशानी है वह. उसी तारा की, जिससे मुझे बहन का प्यार मिला था, जिसने बचपन में न जाने कितनी बार अपने हिस्से की चॉकलेट मुझे खिलाई थी. उसी तारा का रूप है इसमें. मैं न स़िर्फ इसे पालूंगी, बल्कि अपने हृदय से भी लगाके रखूंगी, ताकि इसे कभी भी अपनी मां की कमी महसूस न हो.

यह भी पढ़ें: दूसरों का भला करें (Do Good Things For Others)

नलिन मेरा पहला प्यार था, मेरा मार्गदर्शक, बंधू, सखा, सब कुछ. उसी से तो मैंने जीना सीखा था, स्वयं से पहले दूसरों के बारे में सोचना. प्रीत-प्रेम से अधिक हमारा मैत्री संबंध था. उससे इस विषय पर बात करना ज़रूरी था. हमने हमेशा एक-दूसरे की उलझनें बांटी थीं. भविष्य की योजनाओं की चर्चा की थी. नलिन कहा करता था कि अपने से कम की सहायता करना सदैव उसके जीवन की प्राथमिकता रहेगी और इस व़क्त गुड्डू की मां बनना मेरी प्राथमिकता है. उसने मेरी इच्छा का सम्मान किया और हमने हमेशा अच्छे दोस्त बने रहने का वादा कर एक-दूसरे से विदा ली.

न बारात सजी और न ही ढोल-धमाका हुआ. आठ-दस रिश्तेदारों की उपस्थिति में हो गया मेरा विवाह विजयन के संग. विदाई के समय चाची ने कसकर सीने से भींच लिया. उनके नेत्रों से निरंतर अश्रुधारा बह रही थी, बोलीं, “आज से तुम ही मेरी तारा हो मेरी बेटी.”

स्त्री-पुरुष प्रेम में जब हम किसी से प्रेम करते हैं, तो स्वाभाविक है उससे प्रतिकार की कामना भी करते हैं, पर अबोध शिशु को दुलारते समय ऐसी कोई भावना नहीं रहती. देते रहकर ही पूर्ण तृप्ति होती है. अनंत सागर-सा विशाल है प्यार का हर रूप. जी भरकर एक को दे देने पर भी दूसरों के लिए कभी कम नहीं पड़ता.

आज गुड्डू दो साल का हो गया है. मैं सोचती थी कि मैंने ही उसे असीम एवं

निःस्वार्थ प्यार दिया है, पर आज लगता है कि जितना प्यार मैंने उसे दिया, उससे कई गुना बढ़कर पाया है- मासूम, निश्छल एवं असीम प्यार. और अब मालूम हुआ कि प्यार का असली रूप तो यही है.

usha vadhava

      उषा वधवा

अधिक शॉर्ट स्टोरीज के लिए यहाँ क्लिक करें – SHORT STORiES

कहानी- ज़िंदगी के मोड़ 2 (Story Series- Zindagi Ke Mod 2)

उसे देखकर मुझे अपनेपन का एहसास होने लगा था. एक ऐसा साथी, जिसके साथ मैं अपने मन की हर बात कह सकती हूं. अपनी उलझनें बांट सकती हूं- एक अभिन्न मित्र की तरह. एक ऐसा मित्र, जिसे मैं सृष्टि के आदि से जानती आई हूं. सहसा ज़िंदगी सुंदर लगने लगी थी. कैसे लोग कहते हैं कि प्रेम अंधा होता है, जबकि प्रेम होने पर तो दुनिया सुंदर लगने लगती है. मेरा मन करने लगा मैं अपनी एक अलग दुनिया बसाऊं.

और वह भी तो मुझे बहन का पूरा प्यार देती थी. अक्सर अपने टिफिन में से चॉकलेट निकालकर खिलाई थी उसने मुझे. सो उसके चले जाने से मन का खाली कोना अब टीस मारने लगा था. इसी मनःस्थिति में मेरी मुलाक़ात नलिन से हुई.

बीएड करने के बाद जिस स्कूल में मेरी नौकरी लगी, वह घर से काफ़ी दूर था. लेकिन स्कूल अच्छा था, इसलिए मैं उसे छोड़ना नहीं चाहती थी. सौभाग्यवश मेट्रो स्टेशन घर के पास था. मेरे पास अक्सर ही कॉपियों का बंडल होता. कभी टेस्ट की कॉपियां, कभी होमवर्क, तो कभी क्लासवर्क की. भारी बैग कंधे पर लटकाए रॉड पकड़े खड़ी रहती कि एक दिन नलिन ने मुझे दूर से देखा और अपने साथी से सीट रुकवा मुझ तक पहुंच मेरा बैग लेने का उपक्रम करने लगा. उसने कुछ बोला भी, जो भीड़ की वजह से मुझे सुनाई नहीं पड़ रहा था. मैं घबरा गई, “यह क्या कर रहे हो?”

“आपके नाज़ुक कंधों पर तरस खा रहा हूं.” कहते हुए सीधे अपने सीट पर ले जाकर बैठा दिया. मेरा डांटता स्वर आभार जताने में बदल गया. इसके बाद वह रोज़ मेरे लिए सीट रखने लगा और यह संभव न होता, तो अपनी सीट मुझे दे देता. हमारी मुलाक़ात स़िर्फ सुबह के समय ही हो पाती थी. शाम को तो दोनों के लौटने का समय अलग-अलग होता था.

सौम्य, मृदु व्यवहार, निश्छल आंखें,  हल्के घुंघराले बाल, कंघा न किया हो, तो भी पता न चले, पर नलिन की सबसे ब़ड़ी ख़ूबी थी उसकी सहृदयता, जिसकी मैं क़ायल हो गई थी. उसकी नई-नई नौकरी लगी थी और वह दो बहनों से बड़ा था व अपनी ज़िम्मेदारी ख़ूब समझता था. अच्छी आय होने पर भी मेट्रो में सफ़र करता था, ताकि बहनों के विवाह में वह आर्थिक योगदान दे सके. वह स्वभाव से ही सहृदय था. किसी स्त्री को खड़ा देखता, तो अपनी सीट उन्हें दे देता, किसी के पास भारी बैग होने पर अपने पास रखवा देता या थोड़ा खिसकाकर जगह बना देता. हर रोज़ शाम को ऑफिस के बाद वह पास की झोपड़पट्टी में दो घंटे ग़रीब बच्चों को पढ़ाने के बाद ही घर लौटता था.

उसे देखकर मुझे अपनेपन का एहसास होने लगा था. एक ऐसा साथी, जिसके साथ मैं अपने मन की हर बात कह सकती हूं. अपनी उलझनें बांट सकती हूं- एक अभिन्न मित्र की तरह. एक ऐसा मित्र, जिसे मैं सृष्टि के आदि से जानती आई हूं. सहसा ज़िंदगी सुंदर लगने लगी थी. कैसे लोग कहते हैं कि प्रेम अंधा होता है, जबकि प्रेम होने पर तो दुनिया सुंदर लगने लगती है. मेरा मन करने लगा मैं अपनी एक अलग दुनिया बसाऊं. चाचा-चाची ने बहुत किया मेरे लिए, मैं उनकी अनुग्रहित थी, पर अब मैं अपना घर-संसार चाहती थी, जिसमें मैं एक आश्रिता की तरह न रहकर, साधिकार रहूं. मैं अपनी आय का एक हिस्सा बचाने लगी, ताकि मेरे विवाह का चाचू पर कम से कम बोझ पड़े. लेकिन मैं पहले चाचा-चाची से इस विषय में बात कर लेना चाहती थी. उनके पास दुनिया का अनुभव था, पारखी नज़रें थीं. यूं तो इंकार का कोई कारण न था, फिर भी मैं नहीं चाहती थी कि उन्हें ऐसा लगे कि मैंने स्वयं निर्णय ले लिया है.

यह भी पढ़ें: रिश्तेदारों से कभी न पूछें ये 9 बातें (9 Personal Questions You Shouldn’t Ask To Your Relatives)

इसी बीच तारा के प्रथम प्रसव की सूचना मिली. ससुराल में तो कोई स्त्री थी नहीं, इसलिए उसकी ज़िम्मेदारी चाची पर आन पड़ी. वह तो चाहती थीं कि तारा उनके पास आ जाए, लेकिन उसके ससुर का मन था कि डिलीवरी उनके पास ही हो, ताकि बच्चे के साथ घर में रौनक़ आ जाए. चाची उत्साहपूर्वक देवलाली जाने की तैयारी करने लगीं. तारा के लिए पंजीरी, शिशु के लिए छोटे-छोटे कपड़े, स्वेटर, लंगोट, नन्हीं-नन्हीं चादरें-कंबल मानो किसी गुड़िया का दहेज बन रहा हो. मैने भी अपनी क्षमता के अनुसार मदद की. फ्रॉक और चादरों पर बेल-बूटे काढ़े. जल्दबाज़ी में चाची चली गईं और संकोचवश मेरी बात कुछ दिन के लिए स्थगित हो गई.

प्रसव के समय कुछ द़िक्क़त आ जाने पर डिलीवरी सीज़ेरियन करवाने का ़फैसला लिया गया और तुरंत ऑपरेशन भी हो गया, लेकिन उसके बाद रक्तस्राव किसी भी तरह से काबू में ही नहीं आ रहा था. डॉक्टर ने तुरंत तारा को पुणे के बड़े अस्पताल ले जाने का इंतज़ाम किया, पर तब तक बहुत देर हो चुकी थी. अत्यधिक रक्तस्राव के कारण तारा ने रास्ते में ही दम तोड़ दिया.

सब कुछ चाची की मौजूदगी में हुआ था. किसे दोष देतीं वह? हफ़्तेभर बच्चे को अस्पताल में ही रखा गया, नर्सों की देखरेख में. पर उसके बाद? दादी तो थी ही नहीं, इसलिए चाची नवजात को अपने साथ ले आईं. सबका हाल बेहाल था, लेकिन चाची तो ऐसे सदमे में थीं कि उनका ध्यान भी औरों को रखना पड़ रहा था. इसलिए आया का इंतज़ाम भी किया गया. बच्चे के नामकरण का अभी किसी को होश नहीं था बस, गुड्डू के नाम से ही बुलाने लगे सब.

ऐसे माहौल में भला मैं अपनी बात कैसे कर सकती थी?

usha vadhava

        उषा वधवा

अधिक शॉर्ट स्टोरीज के लिए यहाँ क्लिक करें – SHORT STORiES