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कहानी- अस्तित्व 3 (Story Series- Astitva 3)

“अनु, ऐसे कई गुण हैं, जो कुदरत ने स़िर्फ औरत को दिए हैं, उनके महत्व को समझो. तुम हर तरह से क़ाबिल और गुणी हो. यूं चिढ़-कुढ़कर अपने घर का माहौल मत बिगाड़ो और न ही अपने आत्मविश्‍वास को डगमगाने दो.”

“क्या पढ़ाई-लिखाई स़िर्फ नौकरी पाने के लिए की जाती है, ज्ञान पाने के लिए नहीं? और उस ज्ञान का सही उपयोग यदि घर से शुरू हो, तभी तो समाज बदलेगा. तुम जैसी पढ़ी-लिखी, होनहार महिलाएं अपने घर-परिवार को संवारने के साथ ही अपने बच्चों को सही ज्ञान देकर समय का रुख़ बदल सकती हैं. अपने अस्तित्व को एक नई पहचान दे सकती हैं. अपने काम को छोटा मत समझो बेटी, तुम्हारे हाथों में ही भविष्य की नींव है.”

बुआजी की बातों में मुझे सच्चाई नज़र आ रही थी, इसलिए मैं उनका विरोध नहीं कर पाई. सच ही तो कहा था उन्होंने, हम औरतें ही समाज का नक्शा बदल सकती हैं.

बुआजी अपनी रौ में बोले जा रही थीं, “समय हमेशा एक जैसा नहीं रहता बेटी. औरत की ज़िंदगी में कई पड़ाव आते हैं, जहां उसे अलग-अलग रूप में अपनी ज़िम्मेदारियां निभानी होती हैं. बेटी, बहू, पत्नी, मां, बहन, सास… हर रूप में उसे एक नया अनुभव मिलता है.

अपने अनुभव के आधार पर मैं तुम्हें बताना चाहती हूं कि शादी के शुरुआती कुछ साल भले ही संघर्षभरे हों, लेकिन उन सालों में यदि तुमने अपनी ज़िम्मेदारियां बख़ूबी निभा दीं, तो उसके बाद तुम्हें उसका प्रतिसाद मिलना शुरू हो जाता है. पूरा परिवार, रिश्तेदार सभी तुम्हें अच्छी पत्नी, बहू, मां… जैसी तमाम उपाधियों से नवाज़ना शुरू कर देते हैं.

35 की उम्र के बाद औरत की ज़िंदगी का एक नया अध्याय शुरू होता है, जहां परिवार का हर सदस्य उसके काम की सराहना करता है और उसकी ख़ुशी को भी महत्व देता है.

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आज तुम्हें मेरी बातें भले ही कोरी बकवास लगे, लेकिन कुछ सालों बाद तुम्हें मेरी बातें याद आएंगी. बस, अपने कर्त्तव्य से मुंह मत मोड़ना बेटी. ससुराल में ख़ूब नाम कमाना. तुम ऐसा करोगी ना?”

सहमति में सिर हिलाने के अलावा मेरे पास और कोई चारा नहीं था. क्या कहती? बुआ जी की एक-एक बात सच ही तो थी. इंसान की पहचान उसके घर से होती है और चारदीवारी के मकान को घर औरत ही बनाती है.

स्त्री और पुरुष एक-दूसरे के लिए बने हैं, कुदरत ने ही उन्हें ऐसा बनाया है, फिर हम अपनी तरफ़ से खींचातानी क्यों करें? ख़ुशहाल जीवन जीने के लिए स्त्री-पुरुष दोनों को एक-दूसरे की ज़रूरत होती है.

पति-पत्नी के झगड़े की सबसे बड़ी वजह यह होती है कि पुरुष छोटी-छोटी बातों पर ध्यान नहीं देते और औरतों का ध्यान इन्हीं चीज़ों पर जाता है. दोनों की अपनी ख़ूबियां हैं, क्योंकि पुरुष बड़े-बड़े काम कर जाते हैं और औरतें उन्हें बारीक़ी से संवारती हैं. जब स्त्री-पुरुष दोनों ही महत्वपूर्ण हैं, तो बेकार की खींचातानी क्यों..?

बस, उसके बाद से मैंने कुढ़ना छोड़ दिया और अपने परिवार की उन्नति व ख़ुशहाली के लिए हर मुमकिन कोशिश करती रही. पति, सास-ससुर, बेटी के हर काम में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने लगी.

आज मेरे पति एक मशहूर मल्टी नेशनल कंपनी के डायरेक्टर हैं, मेरी बेटी मेडिकल की पढ़ाई कर रही है और मेरे सास-ससुर पूरी तरह स्वस्थ हैं तथा हर काम मुझसे पूछकर करते हैं.

मेरे डांस और लिखने के शौक के बारे में जानने के बाद मेरे पति ने ही मुझे प्रोत्साहित किया और कहा कि अब मैं अपने लिए जीऊं, अपने शौक पूरे करूं और पूरे परिवार ने इसमें मेरा सहयोग किया.

पहले मैं अपनी जिन सहेलियों को देखकर कुढ़ती थी कि मैं घरेलू ज़िम्मेदारियां निभा रही हूं और वो करियर बना रही हैं, आज मैं उन सभी से आगे निकल आई हूं. मेरी कुछ सहेलियां, जिन्होंने 35 की उम्र के बाद शादी करने का मूड बनाया, उनमें से कुछ को मनचाहा जीवनसाथी नहीं मिला, तो कुछ औलाद की ख़ुशी पाने के लिए संघर्ष कर रही हैं.

हम जब-जब कुदरत के साथ खिलवाड़ करते हैं, तब-तब हमें उसका भारी नुक़सान उठाना पड़ता है. करियर तो तुम फिर शुरू कर सकती हो, लेकिन तुम्हारे बच्चे का बचपन क्या फिर लौटकर आएगा? बस, कुछ सालों का संघर्ष है, उसके बाद तुम्हारा परिवार ही तुम्हारी ख़्वाहिश पूरा करेगा. औरत होने के गौरव और उसकी ज़िम्मेदारियों को समझो अनु, हमें मिलकर एक नए समाज का निर्माण करना है. अपनी पढ़ाई का सही इस्तेमाल करना है. अपने ज्ञान को पैसों से मत तोलो. तुम वो कर सकती हो, जो तुम्हारे पति कभी नहीं कर सकते. क्या वो तुम्हारी तरह बच्चे को जन्म दे सकते हैं? उसे अपना दूध पिला सकते हैं? लोरी गाकर सुला सुला सकते हैं..? नहीं ना!

अनु, ऐसे कई गुण हैं, जो कुदरत ने स़िर्फ औरत को दिए हैं, उनके महत्व को समझो. तुम हर तरह से क़ाबिल और गुणी हो. यूं चिढ़-कुढ़कर अपने घर का माहौल मत बिगाड़ो और न ही अपने आत्मविश्‍वास को डगमगाने दो.

मुझे पूरा विश्‍वास है कि जिस तरह बुआजी की बातों ने मेरा जीने का नज़रिया बदल दिया, तुम पर भी मेरी बातों का असर ज़रूर होगा. होगा ना अनु?”

जवाब में अनु की आंखें नम थीं. वो पूजा से लिपटकर ख़ूब रोई, तब तक, जब तक मन की पूरी कड़वाहट धुल नहीं गई.

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अब वो एक नई अनु बन चुकी थी, जिसे अपने परिवार के साथ-साथ समाज, देश, दुनिया का भविष्य संवारना था. औरत की शक्ति का परिचय देना था. अपने अस्तित्व को एक नई पहचान देनी थी.

कमला बडोनी

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कहानी- अस्तित्व 2 (Story Series- Astitva 2)

“हम समाज से नहीं, समाज हमसे है बेटी. महिलाएं स़िर्फ घर नहीं सवांरती, बल्कि समाज, देश, दुनिया को एक नई दिशा भी देती हैं. बच्चे को जन्म देने भर से महिलाओं की ज़िम्मेदारी ख़त्म नहीं हो जाती, उसे क़ाबिल इंसान बनाकर हम समाज की दशा और दिशा दोनों बदल सकते हैं. फिर हमारा काम छोटा कैसे हो गया बेटी? यदि हर मां अपने बच्चों को सही परवरिश, सही संस्कार दे, तो दुनिया की तमाम समस्याएं ख़त्म हो जाएंगी.”

शो के बाद पूजा जैसे ही बाहर निकली, उसके प्रशंसकों की भीड़ ने उसे घेर लिया. सब उसकी तारीफ़ों के पुल बांध रहे थे. अपने पति के साथ खड़ी पूजा सभी के साथ बड़ी सादगी से पेश आ रही थी. उसके सास-ससुर भी बहू की तारी़फें करते नहीं थक रहे थे. अनु चुपचाप यह सब देख रही थी.

फिर जब सब घर चलने लगे, तो अनु को पूजा का व्यवहार कुछ अजीब लगा. उसने अपने परिवार को दूसरी गाड़ी में घर चलने को कहा और अपनी गाड़ी में स़िर्फ अनु को बिठाया. ड्राइव करती हुई पूजा उसे और भी कॉन्फिडेंट नज़र आ रही थी. अनु कुछ बोल नहीं रही थी, इसलिए पूजा ने ही बात शुरू की.

“हां, तो क्या कह रही थी तुम? मेरे भाग्य से तुम्हें ईर्ष्या होती है. क्यों भला? तुम तो मुझसे ज़्यादा पढ़ी-लिखी हो, सुंदर हो, गुणी हो, तुम्हारे पति, सास सब तुम्हें प्यार करते है. फिर किस बात की कमी है तुम्हें?”

“आपकी तरह अपनी पहचान बनाने का मौक़ा कहां मिला है मुझे? मेरी ज़िंदगी तो जैसे घर की चहारदीवारी में सिमटकर रह गई है. दिनभर घर के काम और बच्चे की देखभाल में उलझी रहती हूं. मैंने और आदि ने साथ पढ़ाई की थी. हम दोनों ही पढ़ाई में अव्वल थे, लेकिन शादी के बाद मेरी सारी पढ़ाई धरी की धरी रह गई है. घर का काम करनेवाली नैकरानी बनकर रह गई हूं मैं.”

अनु की बात सुनकर खिलखिलाकर हंस दी पूजा. अनु को पूजा का हंसना अच्छा नहीं लगा. उसने चिढ़ते हुए कहा, “आपको इस तरह मेरा मज़ाक नहीं उड़ाना चाहिए.”

अनु मुंह फुलाए चुपचाप गाड़ी में बैठी रही. तभी पूजा ने गाड़ी एक कॉफी हाउस के बाहर पार्क की और अनु का हाथ पकड़कर उसे अपने साथ ले गई.

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दो कॉफी ऑर्डर करके उसने बड़े प्यार से अनु का हाथ सहलाते हुए कहा, “देखो अनु, तुम मेरी छोटी बहन जैसी हो. तुम्हारा चंचल व्यवहार, मासूम हरकतें मुझे बहुत प्रभावित करती हैं. जब मैं तुम्हारे साथ होती हूं, तो लगता है जैसे अपना बचपन फिर से जी रही हूं. तुम्हारे जैसी प्यारी लड़की को इस तरह कुढ़ते देख मुझे बहुत दुख हुआ, इसीलिए मैं तुमसे अकेले में बात करना चाहती थी.” अनु आश्‍चर्य से पूजा को देखती रह गई. उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था.

वेटर उनकी कॉफी लेकर आ चुका था. कॉफी का सिप लेते हुए पूजा ने बातचीत का सिलसिला आगे बढ़ाया, “चलो, आज मैं तुम्हें अपने अतीत से मिलवाती हूं. कभी मैं भी तुम्हारी ही तरह बिंदास और चुलबुली हुआ करती थी. मैं पढ़ाई में भी अच्छी थी और डांस में भी. साथ ही लिखने का भी शौक़ था, लेकिन ग्रेज्युएशन ख़त्म होते ही अच्छा रिश्ता आया और मेरी शादी तय कर दी गई. मैं और पढ़ना चाहती थी, कुछ कर दिखाना चाहती थी, लेकिन घरवालों ने कहा, ऐसा रिश्ता बार-बार नहीं आता. लड़का मुझे पसंद था इसलिए मैंने भी हां कर दी.

शादी के बाद मेरी हालत भी तुम्हारे जैसी थी. ज़िंदगी जैसे चाहरदीवारी में सिमट गई थी. हर वक़्त इस बात का डर लगा रहता था कि ससुरालवालों को मेरी किसी बात या व्यवहार का बुरा न लग जाए. फिर बेटी के जन्म के बाद तो जैसे सांस लेने की भी फुर्सत नहीं होती थी. इन्हें अक्सर टूर पर जाना होता था. ऐसे में घर के प्रति मेरी ज़िम्मेदारियां और बढ़ जाती थीं. अपने लिए जीना तो जैसे मैं भूल ही गई थी.

मैं जब भी मायके जाती, तो अपने माता-पिता को ख़ूब कोसती थी, उन्हें ताने देती थी कि आप लोगों ने मुझे खुलकर जीने का मौक़ा तक नहीं दिया. मेरी सहेलियां करियर बना रही हैं और मैं चूल्हा-चौकी कर रही हूं. मेरी शादी करके आप लोग अपनी ज़िम्मेदारी से मुक्त होना चाहते थे वगैरह-वगैरह. मेरे माता-पिता चुपचाप मेरी बातें सुनते थे, कभी कुछ कहते नहीं थे.

फिर एक दिन जब मैं अपने मायके गई थी, तो मेरी बुआ भी हमारे घर आई हुई थीं. मुझे यूं खिन्न देखकर जब उन्होंने मां से इसकी वजह पूछी, तो मां ने उन्हें सब बता दिया.

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तब बुआजी मुझे अपने पास बिठाकर जो बातें समझाईं, उनसे मेरे जीने का नज़रिया ही बदल गया. बुआजी ने कहा, “पूजा, हम औरतों इस दयनीय स्थिति के लिए कोई और नहीं, हम ख़ुद ज़िम्मेदार हैं. हम महिलाओं को सदियों से शक्ति का रूप माना जाता है, फिर भी हम अपनी शक्ति को नहीं पहचान पाई हैं. हम समाज से नहीं, समाज हमसे है बेटी. महिलाएं स़िर्फ घर नहीं सवांरती, बल्कि समाज, देश, दुनिया को एक नई दिशा भी देती हैं. बच्चे को जन्म देने भर से महिलाओं की ज़िम्मेदारी ख़त्म नहीं हो जाती, उसे क़ाबिल इंसान बनाकर हम समाज की दशा और दिशा दोनों बदल सकते हैं. फिर हमारा काम छोटा कैसे हो गया बेटी? यदि हर मां अपने बच्चों को सही परवरिश, सही संस्कार दे, तो दुनिया की तमाम समस्याएं ख़त्म हो जाएंगी. बलात्कार, चोरी-डकैती, खून-खराबा, धोखाधड़ी जैसी तमाम सामाजिक बुराइयां ही ख़त्म हो जाएंगी.”

Kamala Badoni

कमला बडोनी

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कहानी- अस्तित्व 1 (Story Series- Astitva 1)

पूजा के परफॉर्मेंस पर पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा. पहली पंक्ति में बैठा उसका पूरा परिवार उसका हौसला बढ़ा रहा था. उनके साथ बैठी अनु भी बहुत ख़ुश थी, लेकिन उसके चेहरे पर छाए मायूसी के बादल लाख छुपाने पर भी साफ़ नज़र आ रहे थे. उसे इस बात का दुख हो रहा था कि इतना पढ़-लिखकर भी वह कुछ नहीं कर पा रही है, उसका अपना कोई अस्तित्व नहीं है. 

“आदि, पड़ोस की पूजा दीदी हैं ना, आज उनका डांस शो है यशवंत राव चव्हाण हॉल में. मुझे भी इनवाइट किया है, लेकिन मैं कैसे जाऊं? मांजी को ये थोड़े ही कह सकती हूं कि आप यश को संभालो और मैं पूजा दीदी का शो देखने जा रही हूं.”

“कुछ घंटों की तो बात है, चली जाओ शो देखने. मां से कह दो, वो यश को संभाल लेंगी.” आदित्य ने बात को संभालते हुए कहा.

“सच कहूं, तो कभी-कभी पूजा दीदी के नसीब पर रश्क होता है. बड़ी क़िस्मतवाली हैं वो. इस उम्र में भी अपने सारे शौक़ पूरे कर रही हैं और परिवार के लोग भी उन्हें पूरा सपोर्ट करते हैं. पिछले महीने ही उनका उपन्यास छपा था. तब भी उनके पति और परिवारवालों ने उनका ख़ूब हौसला बढ़ाया था.

एक मैं हूं, कोई पूछनेवाला नहीं कि मेरी भी कोई ख़्वाहिश है, ज़रूरत है. बस, दिनभर नौकरानी की तरह सबके आगे-पीछे घूमते रहती हूं कि किसी की शान में कोई गुस्ताखी न हो जाए मुझसे. किसी काम में कोई कमी न रह जाए… बच्चे की ज़िम्मेदारी भी जैसे अकेले मेरी ही है. तंग आ गई हूं मैं एक जैसी नीरस ज़िंदगी जीते-जीते.”

“अनु, तुमसे किसने कहा कि नौकरानी की तरह रहो. ये तुम्हारा अपना घर है. तुम जैसे चाहो रह सकती हो. किसी काम में मदद चाहिए तो बेझिझक कह दिया करो. हां, जहां तक बच्चे की ज़िम्मेदारी की बात है, तो उसमें मैं तुम्हारी ज़्यादा मदद नहीं कर सकता. मां की घुटनों की तकलीफ़ से तुम वाकिफ़ हो. वो यश के आगे-पीछे नहीं दौड़ सकती. ऐसे में हम दोनों में से किसी एक को घर पर रहकर बच्चे की देखभाल करनी ही होगी. तुम कहो तो मैं…”

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आदित्य की बात को बीच में ही काटते हुए अनु चिढ़कर बोली, “अब उपदेश देकर महान बनने की कोशिश मत करो. मैंने भी आपकी तरह कड़ी मेहनत करके एमबीए की डिग्री हासिल की है, मुझे भी कई बड़ी कंपनियों से जॉब ऑफर आए थे, लेकिन शादी के बाद सब ख़त्म हो गया. औरत हूं ना, मेरी मेहनत या क़ाबिलियत की क़द्र कौन करेगा? मैं पूजा दीदी जितनी नसीबवाली कहां हूं.”

अब आदित्य को भी ग़ुस्सा आ गया था. वो चिढ़कर बोले, “मैं भी तंग आ गया हूं तुम्हारे रोज़ के झगड़े से. आख़िर तुम चाहती क्या हो? तुम्हारी ख़ुशी के लिए मैं यश को बेबी सिटिंग में भी रखने को तैयार हूं, ताकि तुम जॉब कर सको, लेकिन तुम बच्चे को वहां भी नहीं रखना चाहती. अब तुम ही बताओ कि मुझे क्या करना चाहिए. मैं तुम्हारी हर बात मानने को तैयार हूं.”

“कुछ नहीं… बस, मुझे अकेला छोड़ दो.” कहते हुए अनु कमरे से बाहर निकल गई.

मुंबई शहर के हज़ार स्क्वेयर फीट के फ्लैट में अनु और आदित्य का झगड़ा मां के कानों तक न पहुंचता, ये तो संभव नहीं था, फिर भी उन्होंने चुप्पी साधे रखी. बेटे-बहू के झगड़े में वे कम ही बोलती हैं, ताकि घर में शांति बने रहे.

आदित्य के ऑफ़िस जाने के कुछ देर बाद जब अनु काम करते हुए गुनगुनाने लगी, यश के साथ खिलखिलाते हुए बातें करने लगीं, तो मां को लगा, अब अनु से बात की जा सकती है. वे जानती हैं, अनु दिल की बुरी नहीं है. बस, जब उसे महसूस होता है कि उसकी सारी पढ़ाई, काम का दायरा घर के भीतर ही सिमटकर रह गया है, तो वह चिढ़ जाती है. उसकी जगह कोई भी लड़की होती, वो भी ऐसा ही करती, इसलिए वे उसकी बातों का बुरा नहीं मानतीं, उल्टे आदित्य को ही चुप रहने और शांति बनाए रखने को कहती हैं.

“अनु, तुम पूजा का डांस शो देखने ज़रूर जाओ. 3-4 घंटे की ही तो बात है, फिर आदित्य भी आज जल्दी घर आनेवाला है. मैं यश को संभाल लूंगी. वैसे भी तुम कई दिनों से घर से बाहर नहीं निकली हो.” मां ने अनु के सिर पर प्यार से हाथ फेरते हुए कहा.

“थैंक्यू मॉम..! यू आर सो स्वीट ! सच, बहुत मन था पूजा दीदी का शो देखने का. आपने मेरी ख़्वाहिश पूरी दी.” कहते हुए अनु मां से लिपट गई.

अनु की हरक़तें आज भी बच्चों जैसी हैं. पल में तोला पल में माशा. मन में कुछ नहीं रखती. जो जी में आया कह देती है, इसीलिए मां को उसकी किसी भी बात का बुरा नहीं लगता.

हाल ही में ख़रीदी नई ड्रेस पहनकर जब अनु घर से निकली, तो गुड़िया जैसी प्यारी लग रही थी. उसकी यही चंचल हरक़तें घर में रौनक बनाए रखती हैं.

रास्तेभर वह पूजा से उसके शो के बारे में बातें करती रही. बातों ही बातों में उसने पूजा से यह तक कह दिया कि उसके नसीब और शोहरत से उसे कई बार ईर्ष्या होने लगती है. पूजा रास्तेभर चुपचाप उसकी बातें सुनती रही.

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फिर जब शो शुरू हुआ, तो पूजा के परफॉर्मेंस पर पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा. पहली पंक्ति में बैठा उसका पूरा परिवार उसका हौसला बढ़ा रहा था. उनके साथ बैठी अनु भी बहुत ख़ुश थी, लेकिन उसके चेहरे पर छाए मायूसी के बादल लाख छुपाने पर भी साफ़ नज़र आ रहे थे. उसे इस बात का दुख हो रहा था कि इतना पढ़-लिखकर भी वह कुछ नहीं कर पा रही है, उसका अपना कोई अस्तित्व नहीं है.

Kamala Badoni

कमला बडोनी

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कहानी- चाभी 3 (Story Series- Chabhi 3)

“अच्छा हुआ मम्मी नहीं हैं यहां पर, वरना उनका तो बहू की आरती तक उतारने का प्लान रहा होगा. इस लतिका को देखती, तो क्या होता?”

“अच्छी ग़लतफ़हमी हुई हम सबको. मज़ेदार!” कहते हुए वह मुस्कुराई.

“तू मेहमानों को सब अच्छे-से खिला-पिला देना.” सुलोचना उसे सब समझाकर चली गईं.

‘और मेरे काम का क्या होगा. उफ़़्फ्! अब क्या होगा रिनी तेरा. उस पर ये ज़बर्दस्ती के मेहमान. मैडम लतिका की बारात…’

सुबह निहार चाभी देकर ऑफिस निकल गया था, ये कहते हुए कि ‘वैसे तो मैं उन्हें  स्टेशन लेने जाऊंगा, क्योंकि छोटी लतिका को अकेले ला नहीं पाएगी. वो बड़ी चंचल है. पर बाई चांस…”

बाई चांस… चंचल लतिका… माय फुट…उसे लतिका से जाने क्यों चिढ़-सी होने लगी थी. चाभी की होल्डर पर लटकाई, पर वो तो गले में ही अटक गई हो जैसे.

पौने दो ही बजे होंगे, एक गाड़ी रुकी. फटाफट दरवाज़े खुल गए. एक 17-18 साल की लड़की उतरी. उसकी गोद में एक पमेरियन बिच थी.

ज़रूर ये छोटी ही होगी. ड्राइवर उसके कहने पर बैग उतारकर उसके साथ आने लगा. पर लतिका मैडम कहां हैं. ज़रूर मियांजी के साथ आ रही होंगी.

इससे पहले वह बेल बजाती, रिनी ने दरवाज़ा खोल दिया.

“छोटी?”

“हम्म… आप रिनी दी?”

“हां… बड़ी प्यारी डॉगी है. काटेगी तो नहीं?” उसने सहलाया था. “मैं चाभी लाई… पर भाभी कहां है तुम्हारी?”

“भाभी?”

“हां, चंचल लतिका…”

डॉगी कूदकर उसके पांव पर कूदने लगी.

“अपना नाम सुनकर उछलने लगती है लतिका… स्टॉप! स्टॉप!”

“क्या?… ओह! तो लतिका इसका नाम है.”

“हां, पर ये मेरी भाभी नहीं.” वह हंसी, तो रिनी भी हैरान-सी हंस पड़ी.

“आंटीजी कहां हैं? भैया ने मुझे आप लोगों के बारे में सब बताया था. बड़ी तारीफ़ करते हैं आप लोगों के खाने की, आप लोगों की. बड़े अच्छे लोग हैं, कहते नहीं थकते.”

“वो मम्मी को अचानक जाना पड़ गया. उनकी एक मुंहबोली मामी की डेथ हो गई.”

“ओह!”

“अच्छा हुआ मम्मी नहीं हैं यहां पर, वरना उनका तो बहू की आरती तक उतारने का प्लान रहा होगा. इस लतिका को देखती, तो क्या होता?”

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“अच्छी ग़लतफ़हमी हुई हम सबको. मज़ेदार!” कहते हुए वह मुस्कुराई.

“फ्रेश होकर नीचे आ जाना. मम्मी खाना बनाकर गई हैं.”

निहार आया, तो उसके हाथ में दूध की थैली और बड़ा-सा पेडिग्री पैकेट था.

“तू चली आई इसे लेकर. मैं तो पहुंच ही रहा था, लतिका का इंतज़ाम कर.”

वह भी छोटी के साथ नीचे रिनी के घर आ गया. तीनों ने मिलकर खाना खाया,

बर्तन-टेबल साफ़ किए और लतिका का निहार की पत्नी होने की गलतफ़हमी पर वे देर तक ख़ूब हंसते रहे.

“मुझे तो कम, पर मम्मी को इतना ग़ुस्सा आता था तुम्हारी लतिका भाभी पर कि ज़रा भी चिंता नहीं है हसबैंड की. उसे छोड़कर बैठी है मस्ती से. कैसे खाता-पीता है, कैसे रहता है, कोई मतलब नहीं उसे? और निहार ने भी कभी क्लीयर नहीं किया.”

“कई बार आंटी के ग़ुस्से को देख बताना चाहा, पर बातों का रुख मुड़ जाता. दूसरी बातें होने लगतीं.”

तीसरे दिन ही सुलोचना मुन्ना की टैक्सी में कम्मो के साथ वापस आ गईं. लतिका को मिलने को बड़ी बेताब थीं. ‘अच्छी ख़बर लूंगी. अच्छे-ख़ासे लड़के की क्या हालत बनाकर रखी है.’ पर असलियत मालूम होने पर वह भी ख़ूब हंसीं.

रिनी ख़ुश थी कि मम्मी ख़ुश हैं, क्योंकि छोटी से उनकी ख़ूब पटती. उन्हें कोई बातें करनेवाला मिल गया था. नई-नई चीज़ें बनातीं, तो ऊपर उसके यहां ज़रूर भिजवातीं. लतिका भी उन सबसे ख़ूब हिलमिल गई थी. छोटी के हॉस्टल जाने का समय आ गया था.

छोटी और निहार नीचे ही डिनर पर थे. सुलोचना से रहा नहीं गया, “छोटी, तू चली जाएगी, तो इसका क्या होगा. अब किसके लिए इंतज़ार करेगा? मम्मी-पापा इसका ब्याह क्यों नहीं करा देते. ज़रूरत नहीं समझते क्या? लतिका पर तो हम नाहक ही नाराज़ हुए.” वह यादकर हंसी थीं.

“आंटीजी, ज़रूरत तो है ही एक श्रीमती की, जो इनका ख़्याल रखे, इनको संवारे, घर संवारे और चाभी ही नहीं, चाभियों का पूरा गुच्छा कमर में लटकाकर रखे. पर भइया भी हैं न. पता नहीं कैसे चाभी रिनी दी को दे दी, वरना भैया तो इतनी-सी चीज़ भी कभी किसी को नहीं देते. बचपन में तो पेन-पेंसिल क्या रबर, बॉल तक किसी को छूने नहीं देते थे. मुझे भी नहीं. दूसरी भले ख़रीदकर दे दें, पर अपनी नहीं छूने देते थे कभी. आप पर पता नहीं कैसे इतना विश्‍वास कर लिया?” वह निहार को चिढ़ाते हुए हंस पड़ी.

“एक आइडिया है.”

“क्या?” रिनी कंप्यूटर पर कुछ चेक करते हुए यूं ही बोल गई.

“मेरी, आपकी, आंटीजी की,

मम्मी-पापा, भइया सबकी चिंता एक साथ दूर हो सकती है.”

“क्या? कैसे?” सुलोचना कौतूहल से भर उठीं.

छोटी रिनी के कान पर हाथ रखकर फुस़फुसाई, “इनकी सारी चाभियों का गुच्छा आप ही क्यों नहीं रख लेतीं दी? भइया को कोई ऐतराज़ न होगा. आपके लिए उनकी आंखों में प्यार पढ़ लिया है मैंने. मैं पक्का जानती हूं, आपको पसंद करते हैं. आप भी अच्छे से सोच लो. जल्दी नहीं है.” कहकर वो मुस्कुराई, तो रिनी भी मुस्कुरा दी.

निहार उन दोनों को हैरानी से देख रहा था.

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“कोई मुझे भी तो बताओ. क्या ख़ुसर-फुसर लगा रखी है.” सुलोचना अपने मन की बात उनके मुंह से जानने को उत्सुक हो उठीं.

“ओ बेचारे भोलूचंद भइया! कुछ नहीं बस, चाभी रखने की ही बात कह रही थी आंटीजी. मैं पूरे टाइम थोड़े ही रहूंगी यहां. हॉस्टल में रहूंगी न. यहां आती-जाती रहूंगी.”

“खाली ये बात तो नहीं हो सकती.” सुलोचना अपने अनुभव से मुस्कुराईं.

“छोटी, इतना मूर्ख़ तो मैं भी नहीं. सब समझ रहा हूं.” वह मन ही मन मुस्कुराया था. पेट के रास्ते ही सही, उसके भी दिल में घंटी बज चुकी थी. मोबाइल पर कोई गाना सुनता जा रहा था- ‘….मेरे सीने में जो दिल है, आज से तेरा हो गया, आज से मेरी…’ “चाभियां तेरी हो गईं…” छोटी ने हंसते हुए लाइन पूरी कर दी थी.

 Dr. Neerja Srivastava

डॉ. नीरजा श्रीवास्तव ‘नीरू’

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कहानी- चाभी 2 (Story Series- Chabhi 2)

“आप और आपकी रिपोर्टर कम्मो.कॉलोनीभर की ख़बरें आपको देती रहती है. आपको तो किसी एनजीओ में होना चाहिए था. कितनी समाजसेवा दिल में भरी है.”

“जी, ऐसा कुछ भी नहीं जैसा आप समझ रही हैं. हां, घर में गंदगी देखकर पैर रखने में रोना ज़रूर आता है, पर कपड़े हफ़्ते-दस दिन पर लॉन्ड्री करा लेता हूं. फिर उन्हें रखना, उठाना, सहेजना मेरे बस की बात नहीं. लौटकर घर ठीक करूं, खाना बनाऊं, रिलैक्स करूं या अगले दिन की तैयारी. थका होता हूं, तो कुछ समझ में नहीं आता. दोनों आ जातीं, तो ठीक रहता.”

“छोटी को भले न समझ आए, पर ये बात लतिका को क्यों समझ नहीं आती?”

“जी, वो समझे या न समझे, क्या फ़र्क़ पड़ना है. अच्छा मैं चलता हूं. थैंक्यू बढ़िया नाश्ते के लिए. उपमा बहुत टेस्टी था.” उसने थोड़ा बचा हुआ उपमा भी मुंह में डाल लिया.

“कैसा भुक्खड़ है, सब चटकर गया? कचरी-नमकीन-पेड़े सब…” रिनी टेबल को देखते हुए बोली.

“लगता है कि लतिका की इससे बनती न होगी, तभी तो कह रहा है क्या फ़र्क़ पड़ता है, नाटक करता है कि प्यार करती है.” विचार आते ही सुलोचना बोल उठीं.

“लतिका आए न आए, बला से. तुम क्यों गंदे में रहोगे? तुम चाहो तो अपनी कामवाली कम्मो से तुम्हारे फ्लैट की साफ़-सफ़ाई करवा दिया करूं. चोर वो बिल्कुल भी नहीं. चाभी तो हमारे पास रहती ही है.” मम्मी तपाक से बोल पड़ीं. रिनी ने मां को घूरकर देखा. अब कहीं मां ये न कह दें कि चार परांठे भी मैं बनाकर रख आया करूंगी.

“जी, यह तो बहुत अच्छा होगा. मगर आपको कष्ट होगा, टाइम भी ख़राब होगा. ये मैं नहीं चाहता.”

“अरे, इसमें क्या, मैं खाली ही तो रहती हूं. यहां से उठी, वहां बैठ जाऊंगी, मेड काम कर लेगी, तो चली आऊंगी.”

“ओह! थैंक्यू आंटीजी. आप तो मेरी मां जैसी ही हैं.” उसने झुककर सुलोचना के पैर छुए, तो वह गदगद हो गईं.

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“ये रामासरे सर्विस का नंबर है. मोबाइल में सेव कर लीजिए 9313… जब भी आपको ज़रूरत हो खाने की, आधे घंटे में पहुंचा देता है, नौ से चार फिर छह से नौ, हर दिन.” रिनी ने जल्दी-जल्दी सब डिटेल बता दी. उसे डर था कि मम्मी भावनाओं में बहकर उसका खाना भी न बनाने लगें. उसने नंबर नोट कराके बाय कहा और डोर बंद करके मम्मी की ख़बर ली.

“क्या ज़रूरत थी आपको उसके घर के मामले में राय देने की? कमरदर्द से परेशान रहती हैं, पर मानती नहीं. यहां भी काम करती ही रहती हैं. थोड़ी-थोड़ी देर पर आराम करने को बोला है न डॉक्टर ने. अब आपने उसका भी ज़िम्मा ले लिया. अभी तो आप उसका खाना भी बनाने की हामी भर देतीं. कमाल हो मम्मी आप तो. मैंने उसे रामासरे का नंबर दे दिया है. आपको ज़्यादा दयावान बनने की ज़रूरत नहीं.” रिनी झल्ला उठी थी.

रामासरे का खाना खाकर भी निहार का पेट अपसेट हो गया. दो दिन जब वो चाभी देने नहीं आया, तो सुलोचना चिंतित हो उठीं.

“देख के आ न रिनी, तबीयत ठीक नहीं लगती उसकी. चाभी देने नहीं आया. खाना भी नहीं मंगाया उसने.”

“आपको कैसे पता?”

“अरे, मेरे बेडरूम की खिड़की से दिखता नहीं क्या? आते-जाते सबका पता रहता है. रामासरे का कोई लड़का नहीं आया टिफिन ले के और फिर कम्मो भी बता रही थी कि दो दिन से वहां उसे साफ़ करने के लिए बर्तन भी नहीं मिले.”

“आप और आपकी रिपोर्टर कम्मो.कॉलोनीभर की ख़बरें आपको देती रहती है. आपको तो किसी एनजीओ में होना चाहिए था. कितनी समाजसेवा दिल में भरी है.”

“अरे बेटा, पड़ोसी ही पड़ोसी के…”

“अभी बहुत काम है मम्मी, शाम को देखूंगी. चिंता करने को इतने सारे घरवाले हैं न उसके. लतिका… छोटी… उनको नहीं पड़ी?”

“मैं खिचड़ी बना रही हूं उसके लिए भी. दही और नींबू का अचार साथ में लेती जाना.” सुलोचना का स्वर कड़क था.

“उसकी वजह से हमें भी रोज़ खिचड़ी खानी पड़ेगी अब, ये क्या बात हुई मम्मी? दही और अचार वाह! क्या ठाठ हैं जनाब के यहां और लतिका की बच्ची के वहां! दे आओ, आप ही दे आओ. कल भी आप मुझसे छुप के देकर आई होंगी. मैं आपको जानती नहीं क्या… कुछ न कुछ रोज़ ही बनाकर दे आती हैं.”

“तो और क्या? कोई है नहीं उसका यहां, तो हम भी न पूछें… इंसानियत भी कोई चीज़ है.”

“ठीक है, जाइए, सेवा कीजिए. दर्द बढ़ेगा, तो उसी से पैर दबवाना आप…” रिनी सोच रही थी कि कितनी बार अपनों से धोखा खा चुकी हैं मम्मी. बाहर बेवकूफ़ बनानेवालों की कमी नहीं, फिर भी उदार हृदया मेरी मम्मी बिना कुछ सोचे चल पड़ती हैं सबकी मदद को. उसे अपनी निश्छल मम्मी पर प्यार भी आ रहा था.

सुलोचना निहार को खिलाकर लौटीं, तो बहुत ख़ुश थीं.

“सुन रिनी, ख़ुशख़बरी है. कल उसकी लतिका और छोटी एक बजे पहुंच रही हैं. मेरे सामने ही फोन आया था. मैंने सारी बातें सुनीं. दो बजे तक वे घर पर होंगे.”

“चलो, अच्छा है फांस कटी.” वह बेरूखी से बोली.

“कैसी पत्थर दिल लड़की है तू? मना मत करना. कल मैं सबका खाना यहीं बना दूंगी. भरी दोपहरी में बेचारी कहां परेशान होगी. घर में सब सामान भी तो नहीं होगा.”

“अरे मम्मी, घर से आ रहे हैं. मां ने बांधकर सब दिया होगा, नहीं तो रास्ते में पैक करा लेंगे. ये उनका सिरदर्द है. आपको क्या चिंता, जैसे कि आपकी अपनी ही बहू आ रही हो.”

पर दूसरे दिन सुलोचना मानी नहीं. सबका खाना तैयार कर दिया.

फोन की घंटी बजी. रिनी ने उठाया. मम्मी के लिए एक बैड न्यूज़ थी. मम्मी की मुंह बोली सबसे प्यारी मामी नहीं रही थीं.

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“सुनो मम्मी, रोना नहीं. मंझरी का फोन आया था. दया मामी नहीं रहीं. आप जाना चाहोगी ही. मैं कैब बुक कर दूंगी. दो-ढाई घंटे में आप पहुंच जाओगी. मैं तो साथ नहीं जा पाऊंगी. अर्जेंट कमिटमेंट्स पूरे करने हैं. कम्मो को बोल दिया है, आपके साथ चली जाएगी. ठीक है न? अरे, रोइए मत मम्मी, नाती-पोता देखकर गई हैं दया मामी. 80 साल की थीं न? चलिए तैयार हो जाइए, मैं आपका सामान रख देती हूं. दवा भी ऊपर ही पर्स में रख दी है. याद से खा लेना. जब भी आना होगा, मुन्ना को बोल दूंगी. वह अपनी टैक्सी में भेज देगा यहां.”

 Dr. Neerja Srivastava

डॉ. नीरजा श्रीवास्तव ‘नीरू’

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कहानी- चाभी 1 (Story Series- Chabhi 1)

“कैसी औरत है आपकी लतिका! आज भी नहीं आई!! आप बेकार ही उसका इंतज़ार करते हैं. वो नहीं आनेवाली. गांठ बांध लो बेटा… महीनेभर तो हमें चाभी रखते हो गए.”

‘टिंग-टॉन्ग…’ रोज़ की तरह ठीक नौ बजे बेल बज उठी थी. रिनी ने दरवाज़ा खोला, तो पड़ोसी निहार ने सकुचाते हुए फिर चाभी उसे थमा दी.

“वो लतिका छोटी बहन समीरा के साथ शायद आज आ जाए, तो आप चाभी दे देना. सॉरी, मैं आपको रोज़ परेशान करता हूं.”

“नहीं, इसमें परेशानी की क्या बात. हैव अ गुड डे. वैसे दो दिन तो आप गए ही नहीं, फिर तबीयत बिगड़ गई थी क्या?” कहकर रिनी मुस्कुरा दी.

“वही बाहर का खाना खा-खाकर फिर से…” उसने मुस्कुराते हुए अपने पेट की ओर इशारा किया.

वह चला गया, तो रिनी दरवाज़ा बंद करके सोचने लगी. ‘अजीब बात है, आज महीनेभर हो गए उसे चाभी देते-देते. बेचारा रोज़ ही पत्नी का इंतज़ार करता है. और वो है कि इसे बेवकूफ़ बनाए जा रही है. उसकी अंजान पत्नी के लिए ग़ुस्सा उसके मन में भरता जा रहा था. एक दिन ज़रूर पूछंगी कि ऐसी पत्नी का वो इंतज़ार ही क्यों करता है. ख़ुद जाकर उसे ले ही क्यों नहीं आता? अच्छा-ख़ासा दिखता है. टिपटॉप रहता है. गाड़ी भी रखी है. अच्छा कमाता ही होगा, स्वभाव भी

ठीक-ठाक लगता है, पर बीवी आना क्यों नहीं चाहती इसके पास? जाने कैसे मैनेज करता है. कभी उल्टा-सीधा बनाकर खाता होगा, तो कभी बाज़ार से अनहाइजीनिक फूड ले आता होगा. इससे अच्छा, तो रामासरे टिफिन ही लगा ले.

कम-से-कम थोड़ा बेहतर तो होता है उसका खाना. शुरू में एक महीना पहले मैंने भी कुछ दिनों के लिए उसका टिफिन लगाया था. पर ऐसे किसी को राय देना ठीक नहीं… चल अपने को क्या…’ उसने चाभी अपने की होल्डर पर लटका दी. ‘चल यार जल्दी. आज तो बहुत सारे तैयार आर्टिकल्स मेल करने हैं, फटाफट नाश्ता करके बैठ जाती हूं.’

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रिनी स्वतंत्र लेखिका थी. पेपर और मैगज़ीन के लिए लिखा करती. उसके पांच-छह उपन्यास, कुछ अनुवाद की हुई पुस्तकें व एनसीईआरटी के लिए लिखी पुस्तकें भी मार्केट में आ चुकी थीं. अधिकतर वह घर ही में रहती. घर पर किताबों की

अच्छी-ख़ासी लाइब्रेरी बना रखी थी. साथ में बस, मम्मी सुलोचना रहती थीं, जो पापा के गुज़रने के बाद से ही उसके साथ थीं. और कोई था नहीं.

एक दिन रिनी घर पर नहीं थी. निहार चाभी वापस लेने आया, तो सुलोचना ने चाभी थमाते हुए लतिका के लिए चार बातें अच्छे-से सुना दीं उसे, “कैसी औरत है आपकी लतिका! आज भी नहीं आई!! आप बेकार ही उसका इंतज़ार करते हैं. वो नहीं आनेवाली. गांठ बांध लो बेटा… महीनेभर तो हमें चाभी रखते हो गए.”

“जी, वो… छोटी को कुछ काम ही होगा वहां, छुट्टियां हैं उसकी अभी.”

“छोटी को काम है, तो लतिका फोन कर सकती है. कौन-से जंगल में रहती है? तुम कैसे रह रहे हो? क्या खाते हो? कोई फ़िक्र ही नहीं उसे… एक भले इंसान को बेवकूफ़ बनाए जा रही है… बैठो, मैं चाय बनाकर लाती हूं. रिनी भी आती ही होगी. वैसे भी जाकर क्या करोगे, जैसे कि तुम्हारी लतिका प्रतीक्षा में बैठी हो.” वह अपनेपन से लतिका पर ग़ुस्सा दिखाते हुए किचन की ओर बढ़ गईं.

सुलोचना चाय, कचरी नमकीन, पेड़े के साथ गरमागरम उपमा भी बना लाईं. “लो कुछ खा लो पहले. भूख लगी होगी… उपमा पसंद है न?”

“जी, मां अक्सर बनाती थीं. बहुत दिनों बाद उपमा खाऊंगा.”

“ये तुम्हारी लतिका को कुछ बनाना भी आता है या बस, खाली मेकअप कर ऑफिस में बैठना जानती है?”

“अरे नहीं, बिल्कुल नहीं. जी वो…” वह अचकचा गया. कुछ कहना चाह रहा था कि लौट आई रिनी बोल पड़ी, “अरे मम्मी, ऐसे कोई बात करता है क्या? कितना जानती हैं इनके घर-परिवार के बारे में… कोई नहीं. आप बुरा न मानें. मम्मी को बड़ा बुरा लगता है जब आपकी चाभी लेने और कोई नहीं आता तो… जिसका आपको रोज़ ही इंतज़ार रहता है.”

“जी… वो…”

“अच्छा छोड़िए ये सब. पहले नाश्ता कीजिए और चाय पीजिए. ठंडी हो रही है.”

“कहां काम करते हैं आप?” वह इधर-उधर की बातें करने लगी. “आप रामासरे टिफिन सर्विस लगवा लो. ठीक-ठाक खाना देता है, रीज़नेबल भी है. शुरू में मैंने भी लगाया था, जब तक मम्मी नहीं आई थीं.”

“पत्नी को छोड़ आपके घर में कौन-कौन है? किसी को बुला क्यों नहीं लेते?” सुलोचना ने बहुत देर से पेट में रोका प्रश्‍न पूछ

ही लिया.

“उसे छोड़कर सब हैं न.” वह झटके में बोल गया.

“मतलब?”

“मेरा मतलब भैया-भाभी, मम्मी-पापा और एक छोटी बहन समीरा. उसे ही सब छोटी कहते हैं.”

“कहां पर?”

“हम लोग कोटा के रहनेवाले हैं, वहीं पर.”

“तो लतिका को किसी की परवाह नहीं, सास-ससुर की भी नहीं?”

“नहीं, ऐसा बिल्कुल नहीं है. वो तो मेरे साथ ही रहना चाहती है, बहुत प्यार करती है मुझे, पर…”

“पर क्या?”

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“छोटी उसे आने नहीं देती और वो छोटी के साथ ही आ सकती है. छोटी के बोर्ड्स के एग्ज़ाम ख़त्म हुए हैं. यहां फाइन आर्ट्स में एडमिशन लेने आनेवाली है. अभी छुट्टियां एंजॉय कर रही है. रोज़ ही कहती है, पर आने का मन नहीं बन पाता उसका. वो आ जाए, तो घर में नौकरानी रख दूं. साफ़-सफ़ाई करे और खाना बनाकर चली जाए. मैं भी सुकून से रह सकूं कि घर में कोई है. अकेला आदमी हूं, तो नौकरानी से काम कराने में अजीब लगता है.”

“आपकी लतिका और छोटी दोनों ही अजीब हैं. लतिका आती क्यों नहीं और वह छोटी उसे आने क्यों नहीं देती? आपका ज़रा भी ख़्याल नहीं उन्हें? मम्मी-पापा भी अजीब हैं, जो कुछ बोलते नहीं. न लतिका को और न छोटी को…” सुलोचना को अच्छा नहीं लग रहा था. वह हैरान थीं.

 Dr. Neerja Srivastava

डॉ. नीरजा श्रीवास्तव ‘नीरू’

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कहानी- धुंधलका 4 (Story Series- Dhundhlka 4)

इस व़क़्त तो मुझे ख़ुश होना चाहिए था कि अपर्णा राज़दान की देह मेरी मुट्ठी में थी. उसके जिस्म की सीढ़ियां चढ़कर जीत हासिल की थी. ये मेरे ही शब्द थे शुरू-शुरू में. पर नहीं, कुछ नहीं था ऐसा. अपर्णा बिल्कुल भी वैसी नहीं थी, जैसा उसके बारे में कहा जाता था. यह रिश्ता तो मन से जुड़ गया था.

सूरज उसकी आंखों में उतर आया और उसने आंखें बंद कर लीं. जैसे एक मोती को प्यार करना चाहिए वैसे ही किया था मैंने. धीरे-धीरे झील-सी शांत हो गयी थी वह. बिजली फिर से लौट गयी थी, पर मैं जानता था कि वह अब इधर-उधर इतराती रहेगी, कैद नहीं रह सकती. वह देखती रही मुझे और मैं उसे.

इस व़क़्त तो मुझे ख़ुश होना चाहिए था कि अपर्णा राज़दान की देह मेरी मुट्ठी में थी. उसके जिस्म की सीढ़ियां चढ़कर जीत हासिल की थी. ये मेरे ही शब्द थे शुरू-शुरू में. पर नहीं, कुछ नहीं था ऐसा. अपर्णा बिल्कुल भी वैसी नहीं थी, जैसा उसके बारे में कहा जाता था. यह रिश्ता तो मन से जुड़ गया था.

अपर्णा ने धीरे से कहा, “अब तक तो खुले आसमान के नीचे रहकर भी उम्रकैद भुगत रही थी मैं. सारी ख़ुशियां, सारी इच्छाएं इतने सालों से पता नहीं देह के किस कोने में क़ैद थीं. तुम्हारा ही इंतज़ार था शायद.”

और यही अपर्णा, जिसने मुझे सिखाया कि दोस्ती के बीजों की परवरिश कैसे की जाती है, वह जा रही थी. उसी ने कहा था, इस परवरिश से मज़बूत पेड़ भी बनते हैं और महकती नर्म नाज़ुक बेल भी.

“तो तुम्हारी इस परवरिश ने पेड़ पैदा किया या फूलों की बेल?” पूछा था मैंने.

यही अपर्णा जो मेरे व़क़्त के हर लम्हे में है, अब नहीं होगी मेरे पास. उसके पास आकर मैंने मन को तृप्त होते देखा है- मर्द के मन को. देह कैसे आज़ाद होती है जाना. पता चला कि मर्द कितना और कहां-कहां ग़लत होता है. मुझे चुप-चुप देखकर नवनीता ने ही एक दिन कहा था, “उससे क्यों कट रहे हो सौरभ? उसे क्यों दुख पहुंचा रहे हो. इतने सालों बाद उसे ख़ुश देखा तुम्हारी वजह से. उसे फिर दुखी न करो.” दोस्ती का बरगद बनकर मैं बाहर आ गया अपने खोल से.

मैंने उसका पासपोर्ट, वीज़ा बनवाने में मदद की. मकान-सामान बेचने में उसका हाथ बंटाया. ढेरों और काम थे, जो उसे समझ नहीं आ रहे थे कि कैसे होंगे. मुझे खुद को अच्छा लगने लगा. वह भी ख़ुश थी शायद.

उस शाम हम बाहर धूप में बैठे थे. कोयल इधर-उधर घूमती पैकिंग वगैरह में व्यस्त थी.

अपर्णा चाय बनाने अंदर चली गयी. बाहर आई तो वह एक पल मेरी आंखों में बस गया. दोनों हाथों में चाय पकड़े, खुले बाल, नीली जीन्स, स्वैटर में वह बिल्कुल उदास मासूम बच्ची लग रही थी, पर साथ ही ख़ूबसूरत भी.

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“बहुत याद आओगे तुम.” चाय थमाते हुए वह बोली थी. मैं मुस्कुरा दिया. वह भी. कई दिन से उसकी खिलखिलाहट नहीं सुनी थी. अच्छा नहीं लग रहा था. क्या करूं कि वह हंस दे? चाय पीते-पीते धूप की गर्माहट कुछ कम होने लगी थी शायद, इसलिए ज़मीन पर उतर रही थी….

“चलो अपर्णा एक छोटी-सी ड्राइव पर चलते हैं.”

“चलो.” वह एकदम खिल गयी. अच्छा लगा मुझे.

“कोयल चलो, घूमने चलें,” मैंने बुलाया उसे.

“नहीं अंकल, आप दोनों जाएं, मुझे ढेरों काम हैं और रात को हम इकट्ठे डिनर पर जा रहे हैं. याद है न आपको?”

“अच्छी तरह याद है.” मैंने देखा था कि वह हम दोनों को कैसे देखती रही थी. एक बेबसी-सी थी उसके चेहरे पर. थोड़ा आगे जाने पर मैंने अपर्णा का हाथ अपने हाथ में लिया तो वह लिपट कर रो ही पड़ी. मैंने गाड़ी रोक दी. “क्या हो गया अपर्णा?” उसके आंसू रुक ही नहीं रहे थे.

“मुझे लगा कि तुम अब अच्छे-से नहीं मिलोगे, ऐसे ही चले जाओगे. नाराज़ जो हो गए थे, ऐसा लगा मुझे.”

“तुमसे नाराज़ हो सकता हूं मैं कभी? मैं क्या, तुमसे तो कोई भी नाराज़ नहीं हो सकता. हां, उदास ज़रूर होंगे सभी. ज़रा जाकर तो देखो द़फ़्तर में, बेचारे मारे-मारे फिर रहे हैं.” वह मुस्कुरा दी.

“अब अच्छा लग रहा है रोने के बाद?” मैंने मज़ाक में कहा तो हंस दी. शाम की धूप खिली हो जैसे. अपर्णा मुझे आज धूप की तरह लग रही है.

“अपर्णा तुम ऐसे ही हंसती रहना, बिल्कुल सब कुछ भुलाकर, समझीं?” उसने एक बच्ची की तरह हां में सिर हिलाया.

“और तुम? तुम क्या करोगे?”

“मैं तुम्हें अपने पास तलाश करता रहूंगा. कभी मिल गईं तो बातें करूंगा तुमसे. वैसे तुम कहीं भी चली जाओ, रहोगी मेरे पास ही.”

“और क्या करोगे?”

“और परवरिश करता रहूंगा उन रिश्तों की, जिनकी जड़ें हम दोनों के दिलों में हैं.”

वह चुप रही. मैं भी. मेरा प्यार, जो पिछले कई दिन से रात की रौशनी में किसी छाया-सा लरज रहा था. अब स्थिर लग रहा था मुझे. मैंने अपर्णा से कहा भी, “जानती हो, तुम्हारे जाने के ख़याल से ही डर गया था. रोकना चाहता था तुम्हें. इतने दिनों घुटता रहा, पर अब… अब सब ठीक लग रहा है…”

अपर्णा ने कार रोकने के लिए कहा. फिर बोली, “हर रिश्ते की अपनी जगह होती है. अपनी क़ीमत. जो तुम्हें पहले लगा वह भी ठीक था, जो अब लग रहा है वह भी ठीक है. पर एक बात याद रखना कि इस प्यार की बेचैनी कभी ख़त्म नहीं होनी चाहिए. मुझे पाने की चाह बनी रहनी चाहिए तुम्हारे दिल में… क्या पता अपर्णा कब आ टपके तुम्हारे चैम्बर में…. कभी भी आ सकती हूं मैं अपना हिसाब-किताब करने….”

और वह खिलखिलाकर हंस दी.

– अनिता सभरवाल

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कहानी- धुंधलका 3 (Story Series- Dhundhlka 3)

चाय पीकर वह मेरे एकदम पास बैठ गई. उसने मेरा हाथ पकड़ लिया और मेरे कंधे से सिर टिकाकर बैठ गयी. मैंने उसे अपनी बांहों में भर लिया. कभी उसका हाथ तो कभी बाल सहलाता रहा. तभी मैं उठने लगा तो वह लिपट गयी मुझसे. पिंजरे से छूटे परिंदे की तरह. एक अजीब-सी बेचैनी दोनों महसूस कर रहे थे. मैंने उसे हल्के से चूम लिया और घर आ गया. मैं बदल गया था क्या? सारी रात सुबह के इंतजार में काट दी.

“सुनो, मैंने स़िर्फ तुम्हें ही बुलाया है. मेरा मतलब ऑफ़िस में से. और एक नवनीता को. नवनीता को तो खैर आना ही है. वह नहीं तो बर्थ डे नहीं.” मेरी उत्सुकता चौकन्नी हो गयी थी. उसकी चमकती आंखों में क्या था, मेरे प्रति भरोसा या कुछ और? क्यों सिर्फ मुझे ही बुलाया है? उसे लेकर अतुल सिन्हा से झगड़ा भी कर बैठा.

“क्यों, पटा लिया तितली को?” कितने गंदे तरीके से कहा था उसने.

“किसकी और क्या बात कर रहे हो?”

“उसकी, जिससे आजकल बड़ी घुट-घुटकर बातें हो रही हैं. वही जिसने स़िर्फ तुम्हें दावत दी है. गज़ब की चीज़ है न?”

बस बात तो बढ़नी ही थी और अच्छे-खासे झगड़े में भी बदल गई थी. मैं यह सब न चाहता था, न ही कभी मेरे साथ यह सब हुआ था. ख़ुद पर ही शर्म आ रही थी मुझे. मैं सोचता रहा, हैरान होता रहा कि यह सब क्या हो गया. क्यों बुरा लगा मुझे? ख़ैर, इन सारी बातों के बावजूद मैं गया था. नवनीता की मदद से कोयल के लिए ड्रेस ख़रीदी थी. उसी ने बताया था कि इस जन्मदिन पर पंद्रह साल की हो जाएगी वह. मेरी आंखों के सामने मेरी बेटी का चेहरा आ गया. वह भी तो इसी उम्र की है.

मैंने देखा था कि कोयल के दोस्तों के अलावा मैं और नवनीता ही आमंत्रित थे. नवनीता को तो होना ही था, बस मैं ही था. अच्छा भी लगा और अजीब भी.थोड़ी देर बाद पूछा था मैंने, “कोयल के पापा कहां हैं?”

“हम अलग हो चुके हैं. उन्होंने दूसरी शादी भी कर ली है. मैं अपनी बिटिया के साथ रहती हूं.”

कायदे से, अपनी मानसिकता के हिसाब से तो मुझे यह सोचना चाहिए था कि तलाक़शुदा औरत और ऐसे रंग-ढंग? कहीं कोई दुख-तकलीफ़ नज़र नहीं आती. ऐसे रहा जाता है भला? जैसे कि तलाक़शुदा या विधवा होना कोई कसूर हो जाता है और ऐसी औरतों को रोते-बिसूरते ही रहना चाहिए. लेकिन यह जानकर पहली बात मेरे मन में आई थी कि तभी इतना कॉन्फ़ीडेंस है. आज के व़क़्त में अकेले रहते हुए अपनी बच्ची की इतनी सही परवरिश करना वाकई सराहनीय बात है. वह मुझे और ज़्यादा अच्छी लगने लगी, बल्कि इ़ज़्ज़त करने लगा मैं उसकी. एक और बात भी आई थी मन में कि ऐसी ख़ूबसूरत और अक्लमंद बीवी को छोड़ने की क्या वजह हो सकती है.

अब मैं उसके अंदर की अपर्णा तलाशने में लग गया. उसके जिस्म का आकर्षण ख़त्म तो नहीं हुआ था, पर मैं उसके मन से भी जुड़ने लगा था. मेरी आंखों की भूख, मेरे जिस्म की उत्तेजना पहले जैसी न रही. हम काफ़ी करीब आते गए थे. मैं उसके घर भी जाने लगा था कभी-कभार. उसने भी आना चाहा था, पर मैं टालता रहा. अब उसे लेकर मैं पहले की तरह नहीं सोचता था. मैं उसे समझना चाहता था.

एक शाम को कोयल का फ़ोन आया था, “अंकल, मां को बुखार है, नवनीता आंटी हैं नहीं शहर में. आप आ सकते हैं क्या?” चार-पांच दिन लग गए थे उसे ठीक होने में. मैं अच्छी तरह से उसकी देखभाल करता था और वह मना भी नहीं करती थी. हम दोनों को ही अच्छा लग रहा था. इस दौरान कितनी बार मैंने उसे छुआ. दवा पिलाई. सहारा देकर उठाया-बिठाया, लेकिन मन बिल्कुल शांत रहा.

उस दिन वह काफ़ी ठीक लग रही थी. मेरे आने पर उसी ने चाय बनाई. चाय पीकर वह मेरे एकदम पास बैठ गई. उसने मेरा हाथ पकड़ लिया और मेरे कंधे से सिर टिकाकर बैठ गयी. मैंने उसे अपनी बांहों में भर लिया. कभी उसका हाथ तो कभी बाल सहलाता रहा. तभी मैं उठने लगा तो वह लिपट गयी मुझसे. पिंजरे से छूटे परिंदे की तरह. एक अजीब-सी बेचैनी दोनों महसूस कर रहे थे. मैंने उसे हल्के से चूम लिया और घर आ गया. मैं बदल गया था क्या? सारी रात सुबह के इंतजार में काट दी.

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सुबह अपर्णा ऑफ़िस आई थी. बदली-बदली-सी लगी वह. कुछ शर्माती-सी, कुछ ज़्यादा ही ख़ुश. उसके चेहरे की चमक मुझे बता रही थी कि उसके मन की ज़मीन को छू लिया है मैंने. मुझे समझ में आ रही थी यह बात, यह बदलाव. अपर्णा से मिलकर मैंने यह भी जाना था कि कोई भी रिश्ता मन की ज़मीन पर ही जन्म लेता है और पनपता है. स़िर्फ देह का देह से रिश्ता रोज़ जन्म लेता है और रोज़ दफ़न भी हो जाता है. रोज़ दफनाने के बाद रोज़ कब्र से से कोई कब तक निकालेगा उसे. इसलिए जल्दी ही ख़त्म हो जाता है यह… कितनी ठीक थी यह बात. मैं ख़ुद ही मुग्ध था अपनी इस खोज से.

फिर मन से जुड़ा रिश्ता देह तक भी पहुंचा था. कब तक काबू रखता मैं ख़ुद पर. अब तो वह भी चाहती थी शायद. उसका बदन तो जैसे बिजलियों से भर गया था. अधखुली आंखें, तेज़ सांसें, कभी मुझसे लिपट जाती, तो कभी मुझे लिपटा लेती. यहां-वहां से कसकर पकड़ती अपर्णा जैसे आंधी हो कोई, या कि बादलों से बिजली लपकी हो और बादलों ने झरोखा बंद कर लिया अपना, आज़ाद कर दिया बिजली को. कैसे आज़ाद हुई थी देह उसकी. कोई सीपी खुल गयी हो जैसे और उसका चमकता मोती पहली बार सूरज की रोशनी देख रहा हो.

– अनिता सभरवाल

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कहानी- धुंधलका 2 (Story Series- Dhundhlka 2)

ऑफ़िस में भी उसके बारे में कोई बहुत अच्छी राय नहीं थी. ख़ासतौर से मर्दों में. उन्हें झटक जो देती थी वह, अपने माथे पर आए हुए बालों की तरह. खैर, कभी-कभी की हाय-हैलो, गुड मार्निंग में बदली. एक दिन उसने चाय के लिए कहा. उसी के चैम्बर में बैठे थे हम. मुझे बात बनती-सी नज़र आई थी, पर तभी चोपड़ा साहब आ पहुंचे थे. कई बातें हुईं, पर मेरे मतलब की कोई नहीं. मैंने मन ही मन हज़ारों गालियां दे डाली थीं उन्हें.

कितनी अलग लगी थी अपर्णा ऐसी बातें करते हुए? पहले मैं क्या-क्या सोचता था उसके बारे में.

इस ऑफ़िस में पहले दिन अपर्णा राज़दान को देखा तो आंखों में चमक आ गयी थी. चलो रौनक तो है. तन-मन दोनों की सेहत ठीक रहेगी. पहले दिन तो उसने देखा तक नहीं. बुझ-सा गया मैं. फिर ‘ऐसी भी क्या जल्दी है’ सोचकर तसल्ली दी ख़ुद को. पहले पता तो चल जाए कि चीज़ क्या है यह, फिर उसी हिसाब से पटाया जाए. उससे अगले दिन फॉर्मल इन्ट्रोडक्शन हुआ था. हाथ मिलाते हुए बड़ी प्यारी मुस्कान आई थी उसके होंठों पर. देखता रह गया मैं. कुल मिलाकर मैं इस नतीज़े पर पहुंचा कि यह मस्ती करने के लिए बहुत बढ़िया चीज़ है.

ऑफ़िस में भी उसके बारे में कोई बहुत अच्छी राय नहीं थी. ख़ासतौर से मर्दों में. उन्हें झटक जो देती थी वह, अपने माथे पर आए हुए बालों की तरह. खैर, कभी-कभी की हाय-हैलो, गुड मार्निंग में बदली. एक दिन उसने चाय के लिए कहा. उसी के चैम्बर में बैठे थे हम. मुझे बात बनती-सी नज़र आई थी, पर तभी चोपड़ा साहब आ पहुंचे थे. कई बातें हुईं, पर मेरे मतलब की कोई नहीं. मैंने मन ही मन हज़ारों गालियां दे डाली थीं उन्हें. आगे चलकर चाय-कॉफी का दौर जब बढ़ गया तो अतुल सिन्हा ने कहा था, “स़िर्फ चाय तक ही हो या आगे भी बढ़े हो….” मैंने गर्दन अकड़ा ली और टेढ़ी-सी स्माइल दी. मैं ख़ुद को यक़ीन दिलाने में जुटा रहता कि मैं उसे कुछ ज़्यादा ही पसंद हूं.

कभी कोई कह देता, सिगरेट-शराब पीती है. तो कोई कह देता ढेरों मर्द हैं इसकी मुट्ठी में. कोई कहता, “साड़ी देखो, कहां बांधती है? सेंसर बोर्ड इसे नहीं देखता क्या?”

जवाब आता, “इसे जी.एम. देखता है न!”

ऐसी बातें मुझे उत्तेजित कर जातीं. कब वह आएगी मेरे हाथ? और तो और अब तो मुझे अपनी बीवी के सारे दोष जो मैं भूल चुका था या अपना चुका था, कांटों की तरह चुभने लगे. उसे देखता तो लगता कि कैक्टस पर पांव आ पड़ा है.

कितनी अलग है वह अपर्णा से. कितना फ़र्क़ है दोनों में. पहला फ़र्क़ तो बीवी होने का ही था. बीवियां ऐसी क्यों होती हैं? वह कितनी सख़्त दिल और अपर्णा में कितनी नर्मी. वह किसी शिकारी परिन्दे-सी चौकस और चौकन्नी… और अपर्णा नर्म-नाज़ुक प्यारी मैना-सी. कुछ ख़बर रखने की कोशिश नहीं करती कि कहां क्या हो रहा है और कोई उसके बारे में क्या कह रहा है.

अपर्णा का फिगर कमाल का. ग्रेट! और इसे लाख कहता हूं एक्सरसाइज़ करने को, डाइटिंग करने को पर नहीं. कैसी लगेगी वह नीची साड़ी में? उसकी कमर तौबा? मोटी तो नहीं है, पर शरीर में कोई कर्व ही नहीं. यह सब दिखने के बाद भी घर में मेरा बिहेवियर ठीक रहा. मैंने उस पर कुछ भी ज़ाहिर नहीं होने दिया.

एक दिन अपर्णा ने पूछ ही लिया परिवार के बारे में. मैंने बताया कि बीवी के अलावा एक बेटा और एक बेटी है. तो उसने भी बताया कि उसकी भी एक बिटिया है. कोयल नाम है उसका.

पति के बारे में न उसने कुछ बताया, न ही मैंने पूछा. पूछकर मूड नहीं ख़राब करना चाहता था. हो सकता है कह देती, “मैं आज जो कुछ हूं न उन्हीं की वजह से हूं या बहुत प्यार करते हैं मुझे. उनके अलावा मैं कुछ सोच ही नहीं सकती.” अनूमन बीवियां यही कहती हैं. मेरे ख़याल से पति भी. ऐसे ही कहने के लिए या सच में? हां, अगर वह ऐसा कह देती तो यह जो थोड़ी-बहुत नज़दीकी बढ़ रही है, वह भी ख़त्म हो जाती.

लेकिन एक बात हुई थी, वह मुझे कहीं से भी वैसे नहीं लग रही थी, जैसा सब कहते थे. पहली बार मुझे लगा कि मैं अपर्णा के जिस्म के अलावा कुछ और भी सोच सकता हूं. क्या मेरी राय बदल रही थी?

फिर ऑफ़िस की ओर से न्यू ईयर की पार्टी अरेंज की गयी थी. अपर्णा गज़ब की ख़ूबसूरत लग रही थी. उसने गुलाबी रंग की पारदर्शी साड़ी पहनी हुई थी, लो कट ब्लाऊज के साथ. कैसे बेतकल्लुफ़ी से वह सिगरेट पी रही थी. उसने जिन भी पी थी शायद. मेरी सोच फिर डगमगा सी गयी.

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अजीब-सी ख़ुशी भी हो रही थी, एक उत्तेजना भी थी. यह तो बहुत बाद में जान पाया कि सिगरेट-शराब पीने से औरत बदचलन नहीं हो जाती. अगली सुबह अपर्णा फिर वैसी की वैसी. पहले जैसी, थोड़ी सोबर, थोड़ी चंचल.

चाय पीते हुए मैंने उससे कहा, “कल तुम बहुत ख़ूबसूरत और ग्रेसफुल लग रही थीं. मैंने पहली बार किसी औरत को इतनी सिगरेट-शराब पीते देखा है. कुछ ख़ास था कल तुममें.”

अपर्णा ने आंखें फैलाते हुए कहा, “मैं तुम्हें शराब पीते हुए ग्रेसफुल लगी? वेरी स्ट्रेंज, बट दिस इज़ ए नाइस कॉम्पलीमेंट. मैं तो उम्मीद कर रही थी कि आज सुनने को मिलेगा, “जानेमन कल बहुत मस्त लग रही थी या क्या चीज़ है यार यह औरत भी.” उसकी हंसी रोके न रुक रही थी. अब मैं उससे कैसे कहूं कि मैं भी उन्हीं मर्दों में से एक था. मस्त तो लग ही रही थी. चीज़ तो मैं भी कहता था उसे. अगले दिन उसने अपनी बेटी कोयल के जन्मदिन पर बुलाया था.

– अनिता सभरवाल

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कहानी- धुंधलका 1 (Story Series- Dhundhlka 1)

इन दो सालों में तुमने बहुत कुछ किया है मेरे लिए… तुम्हारी जगह कोई नहीं ले सकता. तुम समझ सकते हो मुझे कैसा लग रहा होगा… तुम भी ऐसे उदास हो जाओगे तो मैं कैसे जा पाऊंगी भला?”

उसके चेहरे पर उदासी छा गई. कितनी जल्दी रंग बदलती है उसके चेहरे की धूप. रंग ही बदलती है, साथ नहीं छोड़ती. अन्धेरे को नहीं आने देती अपनी जगह.

अपर्णा आज रात की फ्लाइट से बोस्टन जा रही है. पता नहीं, अब कब मिलेगी, मिलेगी भी या नहीं. मैं नहीं चाहता कि वह जाए. मुझे पक्का यक़ीन है कि वह भी नहीं चाहती, लेकिन अपनी बेटी की वजह से जाना ही है उसे. अपर्णा ने कहा था, “सौरभ, अकेले पैरेंट की यही समस्या होती है. फिर कोयल तो मेरी इकलौती बेटी है. एक-दूसरे के बिना हम नहीं रह सकते. एक व़क़्त के बाद शायद वह अकेले रहना सीख जाए, पर मैं तो बिल्कुल नहीं एडजस्ट कर सकती. इधर वह कुछ ज़्यादा ही इन्सिक्योर फील करने लगी है. पिछले दो-तीन साल में उसमें बहुत बदलाव आया है. यह बदलाव उम्र का भी है. फिर भी मैं नहीं चाहती कि वह कुछ ऐसा सोचे या समझे, जो हम तीनों के लिए तकलीफ़देह हो.”

मैं उसे देखता रहा. पिछले दो साल से उसमें बदलाव आया है यानी कि जब से मैं अपर्णा से मिला हूं. हो सकता है कि उसकी बात का मतलब यह न हो, पर मुझे कुछ अच्छा नहीं लगा-दुख हुआ.

अपर्णा ने मेरा चेहरा पढ़ लिया था, “सौरभ, तुम्हें छोड़कर जाने का दुख मुझे भी है. दरअसल कोयल वहीं पढ़ना चाहती है. कुछ साल पहले जब उसकी कज़िन वहां से आई थी तभी से उसने मन बना लिया था. अब मेरे लिए अपना नहीं कोयल का करियर ज़्यादा ज़रूरी है.”

“कोयल हॉस्टल में भी रह सकती है… तुम्हारा जाना ज़रूरी है?” मैंने अपर्णा का हाथ पकड़ते हुए कहा था. उसकी पनीली आंखें देखकर मुझे ख़ुद पर ग़ुस्सा आ गया. मैं कितना स्वार्थी हो गया हूं. वैसे भी मैं उसे किस हक़ से रोक सकता हूं? सब कुछ होते हुए भी वह मेरी क्या है, आज समझ में आ रहा है. हम दोनों की एक-दूसरे की ज़िन्दगी में क्या जगह है? दोनों के रिश्ते का दुनिया की नज़र में कोई नाम भी नहीं है. अगर मेरे सामने यही हालात होते तो? मेरी बीवी की कोई समस्या या मेरी ही बेटी को जाना होता पढ़ने तो? क्या मैं भेज देता झट से उसे बोस्टन या किसी भी हॉस्टल में? मैं आसपास के शहर में भी नहीं भेज पाता. मुझे चुप देखकर अपर्णा ने भरे और नर्म स्वर में कहा था, “हमें अच्छे और प्यारे दोस्तों की तरह अलग होना चाहिए. इन दो सालों में तुमने बहुत कुछ किया है मेरे लिए… तुम्हारी जगह कोई नहीं ले सकता. तुम समझ सकते हो मुझे कैसा लग रहा होगा… तुम भी ऐसे उदास हो जाओगे तो मैं कैसे जा पाऊंगी भला?”

उसके चेहरे पर उदासी छा गई. कितनी जल्दी रंग बदलती है उसके चेहरे की धूप. रंग ही बदलती है, साथ नहीं छोड़ती. अन्धेरे को नहीं आने देती अपनी जगह.

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मैं उसे उदास नहीं देख सकता. मुस्कुराते हुए कहा था, “दरअसल बहुत प्यार करता हूं न तुम्हें, इसीलिए पजेसिव हो गया हूं और कुछ नहीं. तुमने बिल्कुल ठीक फैसला किया है. मैं तुम्हें जाने से रोक नहीं रहा, पर इस फैसले से ख़ुश भी कैसे हो सकता हूं.” यह कहकर मैं एकदम उठकर अपने चैम्बर में आ गया. अपने इस बर्ताव पर मुझे ख़ुद पर बहुत ग़ुस्सा आया. मुझे उसे दुखी नहीं करना चाहिए.

यह वही अपर्णा तो है, जिसने पिछली बार अपना प्रमोशन स़िर्फ इसीलिए छोड़ दिया था, क्योंकि उसे दूसरे शहर जाना पड़ता और वह मुझे छोड़कर जाना नहीं चाहती थी. तब मैं उसे जाने के लिए कहता रहा था.

“तुम्हें कहां पाऊंगी वहां?” उसकी आंखें घने बादलों से ढंकी शाम हो गई थीं जैसे.

जब मैं अपनी कम्पनी की इस ब्रांच में नया-नया आया था, अच्छा-भला था. अपने काम और परिवार में मस्त. घर में सारी सुख-सुविधाएं थीं. बीवी और दो बच्चों का वह परिवार जो अमूमन सुखी कहलाता है, सुखी ही था. हां, मेरी कस्बाई तौर-तरीक़ोंवाली बीवी मुझे कभी-कभी निराश कर देती थी. और वह शादी के बाद से ही ख़ुद को बदलने में लगी है. पता नहीं यह प्रक्रिया कब ख़त्म होगी. शायद कभी नहीं.

बच्चे हर लिहाज़ से एक उच्च अधिकारी के बच्चे दिखते हैं. मानसिकता तो मेरी भी न पूरी तरह महानगरीय है, न ही कस्बाई पूर्वाग्रहों से पीछा छूटता है मेरा. मेरा टूटा-फूटा घर और गांव-कस्बा हमेशा मुझ पर हावी रहा. कुछ मामलों में अभी तक यहीं आकर अटक जाता था. वह तो मेरे छोटे-से कस्बे की तारी़फें और वहां के माहौल की बातें सुनकर अपर्णा ने मुझे काफ़ी हद तक बदल दिया था. उसने कहा था, “तुम्हारे जैसे लोग पढ़ने-लिखने बड़े शहरों के कॉलेज और हॉस्टल में आते हैं. नौकरी उससे भी बड़े शहर में ढूंढ़ते हैं. इन शहरों में पैसा कमाते हैं, ऐश करते हैं, लेकिन बातें टूटे-फूटे घरों, फटे कपड़ों और गिरवी पड़े खेतों की ही करते हैं. तुम भी वैसे ही हो. यहां रहकर यहां की कितनी बुराइयां करते हो. अरे, हम लोग तुम्हारे गांव-कस्बों की पैरवी नहीं करते तो गालियां भी तो नहीं देते. यहां रहकर अमीरों को कोसने से अच्छा है कि उन ग़रीबों के लिए वाकई कुछ करो, जिनकी स़िर्फ बातें ही करते हो.”

मैं उसका मुंह देखता रह गया. मैंने तो बड़े जोश से बोलना शुरू किया था, उसे इम्प्रेस करने के लिए. वह ठीक ही तो कह रही थी. आगे से मैंने ऐसी बातें करना बंद कर दिया था. अब उन लोगों से भी झगड़ा हो जाता था, जो ऐसी भाषणबाजी करते थे.

– अनिता सभरवाल

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कहानी- मुझे सब था पता मैं हूं मां 3 (Story Series- Mujhe Sab Tha Pata Main Hu Maa 3)

दुनिया में कदम-कदम पर नाइंसाफ़ियां हैं, नाकामियां हैं. तू मेरी सफल बेटी है. मन की प्रतिरोधक क्षमता को इतना बढ़ाने की कोशिश करना कि नाकामियां तेरे विकास की प्रेरणा बन जाएं और हो सके तो अब संवाद की इस रस्सी को थाम लेना और फिर कभी न छोड़ना. ज़िंदगी में कभी भी कोई भी समस्या आए तो सबसे पहले अपनी मां को बताना.

मेरा उत्साह बढ़ा और मैं तुझे नई कहानियों में गढ़कर ये समझाने में लग गई कि स्पर्धा के लिए अतिरिक्त मेहनत की ज़रूरत होती है, इसलिए अध्यापिकाएं उन बच्चों का चुनाव करती हैं, जो अच्छे अंकों द्वारा श्रम के प्रति अपनी संजीदगी प्रमाणित कर चुके होते हैं. आह! लेकिन बच्चा वो पौधा होता है, जिसे कब कितना खाद-पानी चाहिए, अभिभावकों को पता नहीं होता. बस, प्रयोग करके ही सीखा जा सकता है. मेरा ये प्रयोग भी असफल होने लगा. तूने कुछ समय तक तो मेहनत की, पर अपेक्षित फल न मिलने पर तू ज़्यादा निराश हो गई. तुझे अध्ययन से ही नहीं, मेरी कहानियों से, मेरे समझाने से भी चिढ़ हो गई और तूने कहीं चुनाव के लिए असफल होने पर अपना दर्द मेरे साथ बांटना बंद कर दिया. अब तेरा दर्द मुझे तेरे चिड़चिड़े बोलों या सोते समय तेरे गालों पर सूखे आंसुओं से पता चलता. तेरी सहेलियों से अपने अनुमानों के सच होने का पता चलता, तो मैं भीतर तक आहत हो जाती. शिक्षा व्यवस्था के दिए विशेषण ‘औसत’ के तीर ने तेरे मासूम दिल की श्रम की इच्छाशक्ति को, तेरे आत्मविश्‍वास को कुचल दिया था, जानती थी.

तालियों की गड़गड़ाहट में खो जाने का, किसी शाम का सितारा होने का तेरा अरमान पूरा करने के मेरे पास दो ही सही रास्ते बचे थे. तेरे लिए स्वस्थ स्पर्धाओं के अधिक से अधिक अवसर खोजना और तेरे भीतर की अभिरुचि का पता लगाना, इसीलिए मैंने तेरे लिए तरह-तरह के हॉबी कोर्स जॉइन कराना और स्कूल से इतर प्रतियोगिताओं के अवसर ढू़ंढना शुरू किया, लेकिन जब वो उपलब्धियां भी तेरे भीतर श्रम की निरंतरता की प्रेरणा न जगा पाईं, तो मेरी ममता की चिंता बढ़ गई. तूने उन्हें स्कूल में दिखाकर अध्यापिकाओं का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने की कोशिश की. मैं तेरे स्कूल में महत्व पाने के प्यासे अबोध मन को समझा नहीं पा रही थी कि इससे उन्हें क्या और क्यों फ़र्क़ पड़ता. यदि किसी बच्चे ने स्कूल के बाहर कोई पुरस्कार जीता है, तो वे उसे देखकर शाबाशी देने के अलावा और कह या कर भी क्या सकती थीं.

एक बात और तुझे बताना ज़रूरी है कि बिना तेरी जानकारी में आने दिए मैंने तेरे स्कूल जाकर, दूसरे अभिभावकों से बात करके, स्कूल काउंसलर से मिलकर ये पक्का किया था कि स्कूल के पक्षपाती वातावरण को लेकर तेरी शिकायतों में सच्चाई तो नहीं है या तुझे कोई वास्तविक समस्या तो नहीं है, जिससे तेरा मन अध्ययन में नहीं लगता. जब मैं आश्‍वस्त हो गई, तब मैंने तुझमें असफलताओं पर कुंठित होने की बजाय उन्हें प्रेरणा बनाने और छोटी उपलब्धियों पर ख़ुश रहने का नज़रिया विकसित करने के लिए पौराणिक कथाओं का सहारा लिया.

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किशोर वय की आंधी, तथाकथित प्यार ने इस उम्र की दहलीज़ पर कदम रखते ही तेरे जीवन में भी दस्तक दी. मैं भी इस आंधी के ख़तरों से परिचित मां की तरह चौकन्नी हो गई. ये वो कठिन घड़ी है, जो हर पीढ़ी के अभिभावकों के सामने सबसे बड़ी चुनौती रही. वो किशोरवय के शारीरिक और भावनात्मक आकर्षण की अनिवार्यता को पहचानते हैं, इसीलिए दोस्ताना माहौल बनाकर उसे सही मार्गदर्शन देने की कोशिश करते हैं, लेकिन जैसे ही किशोर आज़ादी की अपनी परिभाषा बताते हैं, उनकी आंखों में पहाड़ की चोटी पर खड़े उस अबोध इंसान का बिंब उभरने लगता है, जिसे अंदाज़ा नहीं है कि एक कदम फिसला और कितनी गहरी घाटी में गिर सकता है. हम जानते हैं कि न तो बच्चा इतना छोटा है कि उसे गोद में उठाकर वापस ले आया जाए और न इतना बड़ा कि उसे इन ख़तरों के बारे में समझाया जा सके. तो बस इतना चाहने लगते हैं कि एक रस्सी उसकी कमर में बांधकर पकड़ लें, ताकि वो फिसले तो उसे संभाल सकें. वो रस्सी है सतर्कता की, हर समय उसकी हर हरकत पर नज़र रखने की और इन सबसे बढ़कर संवाद की. और इन्हीं चीज़ों से किशोर सबसे ज़्यादा चिढ़ते हैं.

मैं कतई नहीं कहती कि मैंने उस दौरान जो किया, वो पूरी तरह सही था. पर बेटा, इतना ज़रूर यकीन दिलाना चाहूंगी कि मक़सद केवल तुझे गिरने पर संभाल लेना था, लेकिन प्यार में चोट खाने पर भी तूने संवाद की रस्सी को नहीं थामा. तूने उसे चिढ़ाने के लिए किसी और का साथ लिया, वो कोई और तुझे ब्लैकमेल करने लगा. तूने मुझे कुछ नहीं बताया, तो मेरे पास केवल सतर्कता की रस्सी बची, जिसने तेरी नज़र में मुझे जेलर बना दिया.

कोई बड़ी उपलब्धि पाने के लिए ज़रूरी योजनाबद्ध परिश्रम की चाह विकसित करने का अंतिम उपाय है प्रताड़ना. ईश्‍वर का लाख-लाख धन्यवाद है कि दिल पर पत्थर रखकर डरते-डरते अपनाया ये उपाय कामयाब हो गया.

लेकिन बेटा, ये तो एक नई यात्रा की, नए संघर्षों की शुरुआत है. दुनिया में कदम-कदम पर नाइंसाफ़ियां हैं, नाकामियां हैं. तू मेरी सफल बेटी है. मन की प्रतिरोधक क्षमता को इतना बढ़ाने की कोशिश करना कि नाकामियां तेरे विकास की प्रेरणा बन जाएं और हो सके तो अब संवाद की इस रस्सी को थाम लेना और फिर कभी न छोड़ना. ज़िंदगी में कभी भी कोई भी समस्या आए तो सबसे पहले अपनी मां को बताना. मैं तुझे यक़ीन दिलाती हूं कि तुझे उपदेश नहीं दूंगी. जब तेरी गढ़ने की उम्र थी, तब तुझे तेरी ग़लतियां बताती थी. अब तेरी बढ़ने की उम्र है, तो मां तेरा सहारा बनेगी. यक़ीन रखना कि मां तुझे बहुत प्यार करती है और हमेशा करती रहेगी. चाहे तू सारी दुनिया की नज़र में निरर्थक हो जाए, सारी अध्यापिकाओं की नज़र में नाक़ाबिल हो जाए, सारे समाज की नज़रों में ग़लत हो जाए, पर मां के लिए हमेशा अनमोल रहेगी. वो तुझे संवारने की कोशिश कभी नहीं छोड़ेगी. जब डॉक्टर ने पहली बार तुझे मेरी गोद में दिया था और मैंने तुझे बड़ी सावधानी से पकड़कर सीने से लगाया था, मन से मां तुझे वैसे ही पकड़े रहेगी. तेरी हंसी पर निछावर होती रहेगी, तेरे दर्द से परेशान, तेरी सुरक्षा को लेकर चिंतित होती रहेगी…

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कुछ ही पलों में झर-झर बहते आंसुओं को संभालती आकांक्षा वीडियो कॉल करके कैमरे पर मां के आंसू पोछे जा रही थी – अब रोने के नहीं, गर्वित होने के दिन हैं, मेरी सफल मां!

bhavana prakash

भावना प्रकाश

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कहानी- मुझे सब था पता मैं हूं मां 2 (Story Series- Mujhe Sab Tha Pata Main Hu Maa 2)

जो लोग आराम पसंद भी होते हैं और महत्वाकांक्षी भी, उन्हें अगर सही दिशा न मिले, तो कुंठित या आपराधिक होने की संभावना सबसे अधिक होती है. तू उनमें से ही थी. तब तक हमने तेरी हर इच्छा पूरी की थी, पर उस दिन मुझे उन सच्चाइयों का एहसास हुआ जिन्हें मेरी मां अक्सर दोहराया करती थीं. सफलता या उपलब्धियां मां बच्चे को दिला नहीं सकती, स़िर्फ उन्हें अर्जित करना सिखा सकती है.

तुम अपनी जीत पर ख़ुश थीं. मुझे हर समय दुलराती रहतीं, मुझसे बात करने की कोशिश करती रहतीं. पर मुझे बात करने से, अपना दर्द बांटने से एलर्जी हो गई थी.

और तब शुरू हुए तुम्हारे ताने. मेरे अंकों में अप्रत्याशित गिरावट पर तुमने कोई हौसला नहीं दिया. तुम्हारे दिल की बात ज़ुबां पर आ ही गई. तुमने साफ़ कह ही दिया कि मैं किसी भी क़ाबिल नहीं हूं. वो नश्तर दिल में जा धंसा और लहूलुहान आत्मा का एक ही संकल्प बन गया कि तुम्हें ग़लत साबित करके दिखाना है और देखो मैंने कर दिखाया. मैं आगे और सक्षम होकर दिखाऊंगी और तुम्हें ग़लत साबित करती रहूंगी. बस, एक इच्छा बची है, एक दिन तुम अपनी सारी नाइंसाफ़ियों के लिए सफ़ाई दो.

तुम्हारी सफल बेटी

आकांक्षा

मेल में बचपन से आज तक का सारा ग़ुस्सा उतार तो दिया आकांक्षा ने, लेकिन बिदा के समय मां की सूजी आंखें देखकर सेंड पर क्लिक नहीं किया गया. एक तो वैसे ही मां की ख़ुद को संभालने की हर कोशिश बेकार हो रही थी. उस पर दिल दुखानेवाला ये ख़त कैसे भेज देती. प्यार भी तो मां से उतना ही है, जितना ग़ुस्सा है मन में. सोचा, जब मां का क्षणिक प्यार ख़त्म हो जाएगा और वो डांट लगाएंगी, तो भेजेगी.

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कमरे पर पहुंचकर सारा सामान सेट करते-करते भूख लग गई थी. मुंह में मां के बनाए लड्डू भरकर लैपटॉप खोला, तो मां का मेल आया हुआ था.

मेरे जिगर का टुकड़ा, मेरी दिली आकांक्षा,

सदा ख़ुश रहो

तुमने उड़ान भरने के लिए इतना ऊंचा आकाश जीता है. मेरी बरसों की तपस्या सफल हुई है. तुम सोच रही होगी कि इतना बड़ा वरदान पाकर भी मैं इतनी उदास क्यों हूं? क्या बताऊं, लग रहा है जैसे अपने शरीर का एक अंग काटकर कहीं और रखने जा रही हूं. ऐसा सूनापन, ऐसी कचोट तब महसूस की थी, जब पहली बार तुझे प्लेस्कूल छोड़कर आई थी. इतने सुरक्षित वातावरण में, स़िर्फ दो घंटे के लिए तुझे छोड़ने पर दिल संभलने नहीं आ रहा था तो आज! आज तो मन में हज़ार चिंताएं हैं. गिनी-चुनी सब्ज़ियां अच्छी लगती हैं तुझे. दूध, फल, मेवे कुछ भी तो ख़ुद से खाने की आदत नहीं डाल पाई तेरी. ठीक से रज़ाई ओढ़ना तक नहीं सिखा पाई. तू बात-बात पर चिढ़ जाती है और जल्दी निराश हो जाती है. कैसे ध्यान रख पाएगी अपने शरीर और मन का! दिल को किसी करवट चैन नहीं है. मां का दिल अपने बच्चे को दुनिया की हर ख़ुशी दे देना चाहता है, उसे हर ख़तरे से, हर दर्द से दूर रखना चाहता है, इसीलिए उसे अपनी नज़रों से दूर करने में डरता है, पर संभालना होगा मुझे अपने दिल को. जानती हूं, तेरी भलाई के लिए ज़रूरी है. अगर हम पौधे को गमले से निकालकर यथार्थ की क्रूर ज़मीन में रोपने का जोख़िम नहीं उठाएंगे, तो वो अपने संपूर्ण विकास को कभी नहीं पाएगा. और ये तो प्यार नहीं है.

जानती हूं, तू पिंजरे से आज़ाद हुए पंछी की तरह उत्साहित है. तुझे तेरे प्रिय खिलौने बिना किसी रोकटोक के मिले हैं. ख़ुश है न! ईश्वर करे, हमेशा ऐसे ही ख़ुश रहे, पर बेटा, पिंजरे के पंछी के पास एक ही ग़म है, ग़ुलामी. दाने-पानी की खोज की परेशानी, धूप-घाम की तकली़फें, शिकारियों के ख़तरे का तनाव तो आज़ादी पाने के बाद ही समझ आता है. पता नहीं इन सारे संघर्षों के लिए तैयार करने की कोशिश कितनी सफल रही है. जानती हूं, तुझे मुझसे बहुत शिकायतें हैं. ये शिकायतें मेरी इन्हीं कोशिशों के कारण हैं. तू चाहती थी न कि मां कभी तो सारी नाइंसाफ़ियों के लिए दुखी हो, सफ़ाई दे. ख़ुश हो ले, आज जब तू मां की देखभाल से दूर हो रही है, तो तेरी उन सारी शिकायतों का जवाब देना चाहती हूं. तेरी ज़रूरत की सारी चीज़ें पैक कर दी हैं. कुछ आंसू छिपा कर रखे थे. ख़त के साथ भेज रही हूं, इस उम्मीद के साथ कि ये संवादहीनता की उस दीवार को पिघला देंगे, जो तूने कैशोर्य से हमारे बीच खींच दी है.

याद है मुझे तू बहुत छोटी थी, तो तू भी हर बच्चे की तरह अध्यापिकाओं के मुंह से चंद प्रशंसा के वाक्यों के लिए तरसती थी. प्रतियोगिताओं में भाग लेने का बहुत शौक था तुझे. एक बार तूने मुझसे अपने नाम का मतलब पूछा. मैंने बताया कि जब कोई चाह बहुत गहरी हो जाती है, तो उसे आकांक्षा कहते हैं. फिर तुझसे तेरी आकांक्षा पूछने पर तूने कहा, मुझे प्रिंसिपल मैम कोई पुरस्कार दें और सारा स्कूल मेरे लिए ताली बजाए, मैं बहुत भावुक होकर तुझे देखती रह गई. बेटा, तेरा व्यक्तित्व मस्तमौला था. जो लोग आराम पसंद भी होते हैं और महत्वाकांक्षी भी, उन्हें अगर सही दिशा न मिले, तो कुंठित या आपराधिक होने की संभावना सबसे अधिक होती है. तू उनमें से ही थी. तब तक हमने तेरी हर इच्छा पूरी की थी, पर उस दिन मुझे उन सच्चाइयों का एहसास हुआ जिन्हें मेरी मां अक्सर दोहराया करती थीं. सफलता या उपलब्धियां मां बच्चे को दिला नहीं सकती, स़िर्फ उन्हें अर्जित करना सिखा सकती है. मैं तुझमें वो श्रम-निष्ठा विकसित करने में लग गई, जिससे तेरी आकांक्षाएं पूरी हो सकें.

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जब तेरा चुनाव किसी प्रतियोगिता के लिए न होता, तो तेरे मन की मासूम चोटें मां की सहानुभूति का मरहम चाहती थीं, लेकिन मैं जानती थी कि ये मरहम तुझे और आलसी व अपनी कमियों को दूसरों या क़िस्मत के सिर मढ़ने का आदी बना देंगे. तुझे मरहम नहीं, उपलब्धि अर्जित करने के लिए ज़रूरी श्रम की प्रेरणा की ज़रूरत थी. हर प्रकार से समझाकर भी जब कोई असर नहीं हुआ, तो मैंने बच्चों में नैतिक मूल्यों की स्थापना का सबसे पुराना तरीक़ा चुना- कहानियां. इस तरी़के ने कुछ असर दिखाया और तू कम से कम किसी प्रतियोगिता की बात आने पर नियोजित श्रम में रुचि दिखाने लगी.

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भावना प्रकाश

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