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कहानी- अंबर की नीलिमा 3 (Story Series- Ambar Ki Neelima 3)

“अंबर, रुक जाओ.”

अंबर ने पलटकर पीछे देखा. पलभर ठिठकने के बाद वह पुन: तेज़ क़दमों से गेट की ओर बढ़ने लगा.

“अंबर, प्लीज़ रुक जाओ. अंबर के बिना नीलिमा का कोई अस्तित्व नहीं है.” नीलिमा पूरी शक्ति से अंबर की ओर दौड़ पड़ी.   अंबर के बढ़ते क़दम ठिठक गए. उसने एक बार फिर पीछे पलटकर देखा.   

“मम्मी की ग़लती के लिए मुझे इतनी बड़ी सज़ा मत दो. जीवन के अंतिम पलों तक वे अपने आपको माफ़ नहीं कर पाई थीं. अगर आज वे होतीं, तो तुमसे हाथ जोड़कर माफ़ी मांग लेतीं.” नीलिमा ने क़रीब पहुंच फफकते हुए अपने दोनों हाथ जोड़ दिए.

“क्या? आंटी इस दुनिया में नहीं हैं?” अंबर के होंठ हिले.

“मम्मी, यह क्या बोल रही हो?” नीलिमा ने मम्मी के मुंह पर हाथ रख दिया. नीलिमा जब अपने कमरे में पहुंची, तो अंबर वहां नहीं था. नीलिमा फूट-फूटकर रो पड़ी.

दो दिन बाद नीलिमा एग्ज़ाम देने पहुंची. उसकी समझ में ही नहीं आ रहा था कि अंबर का सामना कैसे करेगी, किंतु अंबर तो एग्ज़ाम देने ही नहीं आया. पेपर देकर नीलिमा सीधे उसके कमरे पर पहुंची, तो पता लगा कि वह अपने घर पलिया चला गया है.

अंबर के अचानक चले जाने से नीलिमा का मन घबरा रहा था. मन में अनेकों झंझावत लिए वह घर लौट आई. अंबर के दिए गए नोट्स उसकी मेज़ पर ही रखे थे. उस दिन अंबर के अपमानित होकर चले जाने के बाद नीलिमा ने उनको उठाकर भी नहीं देखा था. उसने कांपते हाथों से नोट्स उठाए, किंतु पहला पन्ना खोलते ही उसकी चेतना जड़ हो गई. ख़ूबसूरत अक्षरों में लिखे एकलौते वाक्य ने उसके अस्तित्व को ही हिला दिया था. ‘फाइनल एग्ज़ाम में प्रथम स्थान पाने की अग्रिम शुभकामनाएं.’ अंबर के हाथों से लिखे अक्षर किसी नश्तर की भांति नीलिमा की आत्मा को बींधे जा रहे थे. इसका मतलब अंबर

जान-बूझकर पेपर देने नहीं आया था. नीलिमा का प्रथम स्थान सुरक्षित करने के लिए उसने अपना करियर ही बर्बाद कर डाला था. नीलिमा को अपने वजूद से ही घृणा होने लगी. क्रोध से फुंफकारती हुई वो बाहर आई और मम्मी को क्या-क्या नहीं कह डाला था उसे ख़ुद याद नहीं.

पूरी बात जान मम्मी भी सन्न रह गईं. उनकी बातों से आहत हो अंबर ऐसा क़दम उठा लेगा, इस बात की उन्हें कल्पना भी नहीं थी. उनकी आंखें भीग गईं. अगले ही दिन मम्मी नीलिमा को लेकर पलिया पहुंची, तो वहां दूसरा आघात प्रतीक्षा कर रहा था. अंबर के माता-पिता की काफ़ी पहले मृत्यु हो गई थी. तीन दिन पहले अचानक वह अपनी ज़मीन-जायदाद कौड़ियों के भाव बेच विदेश चला गया था. नीलिमा ने उसे ढूंढ़ने की हर संभव कोशिश की, लेकिन असफल रही.

धीरे-धीरे बारह वर्ष बीत गए. नीलिमा अब एक मल्टीनेशनल बैंक में अधिकारी थी.  स्नो-स्कीइंग का उसे बचपन से शौक़ था. वह हर साल स्कीइंग करने कुफरी ज़रूर आती. पिछले दो वर्षों से वह यहां की चैंपियन थी. नीलिमा को याद आ रहा था कि एक दिन अंबर ने बताया था कि उसके पूर्वज पंजाब से ‘पलिया’ आए थे. पंजाब में अपने नाम के आगे अपने गांव का नाम जोड़ने का रिवाज़ है, इसलिए उसने नाम अंबर राज के आगे ‘पलिया’ जोड़कर उसे ए. आर. पलिया कर लिया था. इस नाम को सुन नीलिमा को आभास भी नहीं हुआ था कि वह अंबर है, किंतु कुफरी में उस अंजान मददगार के मुंह से निकले शब्दों ‘अपने आप को संभालना सीखो, क्योंकि हर जगह तुम्हें संभालने के लिए मैं मौजूद नहीं रहूंगा…’  ने उसकी यादों को ताज़ा कर दिया था.

उसका नाम प्रतियोगियों की लिस्ट में देख अंबर ने एक बार फिर उसका प्रथम स्थान सुरक्षित करने के लिए इतना बड़ा बलिदान दिया था. वह बिना कुछ कहे जिस तरह चला गया था, उससे स्पष्ट था कि वह अभी तक आहत है. नीलिमा का कलेजा बैठा जा रहा था. वह अंबर को पाकर दोबारा उसे खोना नहीं चाहती थी.  नीलिमा जिस समय एयरपोर्ट पहुंची अंबर अंदर जाने के लिए आगे बढ़ रहा था. उसे देखते ही वह पुकार उठी, “अंबर, रुक जाओ.”

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अंबर ने पलटकर पीछे देखा. पलभर ठिठकने के बाद वह पुन: तेज़ क़दमों से गेट की ओर बढ़ने लगा.

“अंबर, प्लीज़ रुक जाओ. अंबर के बिना नीलिमा का कोई अस्तित्व नहीं है.” नीलिमा पूरी शक्ति से अंबर की ओर दौड़ पड़ी.   अंबर के बढ़ते क़दम ठिठक गए. उसने एक बार फिर पीछे पलटकर देखा.

“मम्मी की ग़लती के लिए मुझे इतनी बड़ी सज़ा मत दो. जीवन के अंतिम पलों तक वे अपने आपको माफ़ नहीं कर पाई थीं. अगर आज वे होतीं, तो तुमसे हाथ जोड़कर माफ़ी मांग लेतीं.” नीलिमा ने क़रीब पहुंच फफकते हुए अपने दोनों हाथ जोड़ दिए.

“क्या? आंटी इस दुनिया में नहीं हैं?” अंबर के होंठ हिले.

“हां, वे तुमसे माफ़ी मांगने तुम्हारे घर पलिया तक गई थीं, मगर तुम वहां से जा चुके थे. मम्मी को जब पता चला कि मैं ख़ुद तुम्हें फर्स्ट आते देखना चाहती थी, तो वे बहुत रोई थीं.”

“क्या कहा? तुम ख़ुद मुझे फर्स्ट आते देखना चाहती थी?” अंबर तड़प उठा. उसकी आंखों में थर्ड ईयर की क्लास का वह दृश्य कौंध उठा, जब हेड ऑफ डिपार्टमेंट मिसेज़ डिसूज़ा ने नीलिमा को डांटते हुए कहा था कि वह टाइम मैनजमेंट सीखे, ताकि एग्ज़ाम में साढ़े चार की बजाय पूरे पांच प्रश्‍नों का उत्तर लिख सके.

भयानक तूफ़ान के बाद जैसे कुहासा हट गया हो. अंबर नीलिमा के कंधों को पकड़ उसे झिंझोड़ते हुए चीख पड़ा, “इसका मतलब तुम जान-बूझकर साढ़े चार प्रश्‍न ही हल करती थी, ताकि मैं प्रथम आ सकूं.”

नीलिमा ने कोई उत्तर नहीं दिया. उसने अपनी आंखें झुका लीं, किंतु अंबर ने उसके चेहरे को अपने हाथों में भर लिया और उसकी आंखों में झांकते हुए भर्राये स्वर में बोला, “इतना बड़ा बलिदान और मुझे ख़बर तक नहीं होने दी?”

“बलिदान तो तुमने भी किया था और मुझे बताया तक नहीं. यह भी नहीं सोचा कि अंबर के बिना नीलिमा कितनी अधूरी है.” नीलिमा की आंखों से अश्रुधार बह निकली.

“नीलिमा, अगर हो सके, तो अंबर को उस गुनाह के लिए माफ़ कर दो, जो उसने तुमसे दूर जाकर किया है.” अंबर का स्वर कांप उठा.

नीलिमा किसी लता की भांति अंबर के चौड़े सीने से लिपट गई. उसके आंसू अंबर को भिगोए जा रहे थे. बारह वर्षों की दूरी मिट चुकी थी. कुछ देर बाद उसने सिसकते हुए कहा, “अंबर, वादा करो कि कल चैंपियनशिप में तुम जीतने की पूरी कोशिश करोगे.”

“तुम्हें भी वादा करना होगा कि तुम हारोगी नहीं.” अंबर ने एक बार फिर नीलिमा के चेहरे को अपने दोनों हाथों में भर उसकी आंखों में झांका.

“वादा रहा.” सिसकियां भरते हुए नीलिमा मुस्कुरा उठी.

एक-दूजे को जीत का तोहफ़ा देने दो प्रेमी वापस लौट पड़े. अंबर में मुस्कुराता हुआ सूर्य दोनों के मिलन का साक्षी था.

Sanjiv Jaiswal

संजीव जायसवाल ‘संजय’

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कहानी- अंबर की नीलिमा 2 (Story Series- Ambar Ki Neelima 2)

अचानक एक चट्टान पर नीलिमा का पैर फिसल गया. इससे पहले कि कोई कुछ समझ पाता, वह गंगा की विकराल लहरों में जा गिरी.

नीलिमा को तैरना नहीं आता था. सभी मदद के लिए चीख रहे थे, किंतु गंगा के प्रचंड वेग के आगे बेबस थे. तभी राफ्टिंग करती अंबर की बोट उधर आ गई. अंबर ने तुरंत छलांग लगा दी. लहरों की विकरालता से लड़ता वह बहुत मुश्किलों से नीलिमा तक पहुंच पाया.

“अपने आपको संभालना सीखो, क्योंकि हर जगह तुम्हें संभालने के लिए मैं मौजूद नहीं रहूंगा.” बेहोश होने से पहले नीलिमा के कानों में अंबर के स्वर गूंजे.

इस दुर्घटना ने नीलिमा और अंबर की दोस्ती की एक नई दास्तान लिख दी थी. दोनों को अब एक-दूसरे को देखे बिना चैन नहीं मिलता था.

नीलिमा ने यह ख़बर सुनी थी, किंतु व्यस्तता के कारण वह उनके बारे में ज़्यादा जानकारी हासिल नहीं कर पाई थी.

वह एक घंटे में कुफरी पहुंच गई. स्कीइंग ग्राउंड पहुंचने पर पता लगा कि पलिया साहब प्रैक्टिस के लिए लास्ट कैंप तक गए हुए हैं. नीलिमा बस आगे बढ़ ही रही थी कि वहां के अनुपम सौंदर्य व नज़ारों को देखने के लिए कुछ पलों के लिए ठहर गई. वो जब भी यहां आती है, तो अक्सर यहां रुककर वादियों के अनुपम सौंदर्य को मन में उतारने के लिए कुछ पलों के लिए यहां ठहर जाती है. इसी बीच उस गुस्ताख़ ने उसका ध्यान भंग कर दिया था. ख़ैर, वह बेस कैंप तक पहुंची ही थी कि एक कार्यकर्ता ने आगे बढ़ते हुए कहा, “मैडम, बधाई हो. अब आपकी जीत पक्की हो गई है.”

“कैसे?”

“थोड़ी देर पहले पलिया साहब ने अपना नाम वापस ले लिया.”

“क्यों?”

“कारण तो नहीं बताया.”

“पलिया साहब कहां हैं?” नीलिमा ने हड़बड़ाते हुए पूछा.

“वे तो शिमला लौट गए.”

नीलिमा का संदेह अब कुछ और गहरा हो गया था. वह भी शिमला लौट पड़ी.  रिसेप्शन पर पहुंचते ही बोली, “पलिया साहब किस रूम में ठहरे हैं? ”

“वे तो चेक आउट करके थोड़ी देर पहले ही एयरपोर्ट के लिए निकले हैं.” रिसेप्शनिस्ट ने कहा.

“प्लीज़, आप ज़रा अपना लैपटॉप दे सकती हैं क्या?”

“सॉरी मैम, इसे हम किसी कस्टमर को नहीं दे सकते.”

“प्लीज़, यह किसी की ज़िंदगी का सवाल है.” नीलिमा की आवाज़ भर्रा उठी.

रिसेप्शनिस्ट ने नीलिमा के चेहरे के भावों को देखा, तो ना नहीं कर सकी. नीलिमा ने जल्दी से गूगल पर

ए. आर. पलिया टाइप किया. कई फाइलें सामने आ गईं. उसने विकीपीडिया को क्लिक कर दिया. अगले ही पल ए. आर. पलिया की फोटो के साथ-साथ उनका पूरा विवरण दिखने लगा.

पूरा नाम: अंबर राज ‘पलिया’

जन्म स्थान: पलिया,

ज़िला: लखीमपुर-खीरी, उत्तर प्रदेश.

शिक्षा: युवराज दत्त महाविद्यालय.

“वही है.” नीलिमा की आंखों से आंसू टपक पड़े और वह आंधी-तूफ़ान की तरह कार की ओर दौड़ पड़ी.

रीतिका सिन्हा उसी समय होटल में प्रवेश कर रही थी. नीलिमा को इस तरह भागते देख उन्होंने उसे आवाज़ भी दी, लेकिन नीलिमा ने जैसे सुना ही नहीं. थोड़ी ही देर पहले कुफरी के लास्ट-कैंप से ख़बर आई थी कि पलिया साहब ने वहां पहुंच प्रतियोगियों की लिस्ट देखी, फिर अचानक ही अपना नाम वापस ले लिया. यह ख़बर सुन रीतिका सिन्हा पहले से ही परेशान थी और उनसे मिलने ही होटल आई थी. यहां नीलिमा को इस तरह भागते देख उनका दिमाग़ चकरा गया था.

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उधर नीलिमा की कार तेज़ी से एयरपोर्ट की ओर जा रही थी, किंतु उसके अंतर्मन में अतीत के दृश्य उससे भी तेज़ी से चल रहे थे. क्लास वन से लेकर इंटर तक वह हर परीक्षा में प्रथम स्थान पाती रही थी. यह सिलसिला टूटा था बीएससी फर्स्ट ईयर के हाफ ईयरली एग्ज़ाम में. हाफ ईयरली में उस शहर में नए-नए आए अंबर ने उसे दूसरे स्थान पर धकेल दिया था. बुरी तरह चिढ़ गई थी वह अपनी इस पराजय से और हमेशा अंबर को अपमानित करने का अवसर ढूंढ़ती रहती. किंतु अंबर उसकी किसी भी बात का बुरा नहीं मानता था.

फाइनल एग्ज़ाम से पहले उनकी क्लास का टूर ॠषिकेश गया हुआ था. वहां छात्रों ने

वॉटर राफ्टिंग का प्रोग्राम बनाया. नीलिमा और कुछ अन्य लड़कियां राफ्टिंग पर नहीं गईं. वे सब गंगा के किनारे पथरीली चट्टानों पर घ्ाूमते हुए उसके तेज़ बहाव का आनंद ले रही थीं. अचानक एक चट्टान पर नीलिमा का पैर फिसल गया. इससे पहले कि कोई कुछ समझ पाता, वह गंगा की विकराल लहरों में जा गिरी.

नीलिमा को तैरना नहीं आता था. सभी मदद के लिए चीख रहे थे, किंतु गंगा के प्रचंड वेग के आगे बेबस थे. तभी राफ्टिंग करती अंबर की बोट उधर आ गई. अंबर ने तुरंत छलांग लगा दी. लहरों की विकरालता से लड़ता वह बहुत मुश्किलों से नीलिमा तक पहुंच पाया.

“अपने आपको संभालना सीखो, क्योंकि हर जगह तुम्हें संभालने के लिए मैं मौजूद नहीं रहूंगा.” बेहोश होने से पहले नीलिमा के कानों में अंबर के स्वर गूंजे.

इस दुर्घटना ने नीलिमा और अंबर की दोस्ती की एक नई दास्तान लिख दी थी. दोनों को अब एक-दूसरे को देखे बिना चैन नहीं मिलता था.

फाइनल एग्ज़ाम में एक बार फिर अंबर प्रथम आया था. नीलिमा ने दिल खोलकर उसे बधाई दी थी. थर्ड ईयर में एनुअल फंक्शन होनेवाला था. पूरे कॉलेज में तैयारी चल रही थी. नीलिमा ऑडीटोरियम में प्रतिदिन बैले की प्रैक्टिस करती थी. कोरियोग्राफर के निर्देशों पर नीलिमा एक दिन ऑडीटोरियम में थिरक रही थी कि उसका पैर फिसल गया. इससे पहले कि वह गिरती, अपने प्ले की प्रैक्टिस कर रहे अंबर ने दौड़कर उसे अपनी बांहों में संभाल लिया था.

नीलिमा के कानों में एक बार फिर महदोश कर देनेवाले शब्द गूंजे, “अपने आपको संभालना सीखो, क्योंकि हर जगह तुम्हें संभालने के लिए मैं मौजूद नहीं रहूंगा.”  “नीलिमा को संभलने की ज़रूरत नहीं है, क्योंकि उसे मालूम है कि अंबर हर पल उसके साथ ही रहता है.” नीलिमा खिलखिलाकर हंस दी थी. अपनी बांहों में उसे संभाले अंबर एकटक उसके चेहरे को देखता रह गया था.

देखते ही देखते थर्ड ईयर के एग्ज़ाम क़रीब आ गए. नीलिमा के फिज़िक्स के नोट्स गुम हो गए थे. उसे परेशान देख अंबर नोट्स की फोटोकॉपी देने नीलिमा के घर पहुंचा. उसे अपने कमरे में बैठाने के बाद नीलिमा ने मम्मी के पास जाकर कहा, “ममा, जल्दी से चाय और कुछ स्नैक्स बना दो.”

“कौन है ये?”

“मॉम, ये अंबर, मेरा क्लासमेट.”

“तो यही है वो, जिसने तुम्हारी ज़िंदगी हराम कर रखी है.” मम्मी, अंबर का नाम सुनते ही उखड़ गईं.

“यह क्या कह रही हैं आप? वह मेरा बहुत अच्छा दोस्त है.” नीलिमा का स्वर आश्‍चर्य से भर उठा.

“बचपन से तू हमेशा फर्स्ट आती रही है, मगर इस दुष्ट ने तुझे दूसरे स्थान पर धकेल दिया है. पढ़ाई करते-करते मेरी फूल जैसी बेटी की आंखें सूज गईं, मगर इससे जीत न सकी. यह तेरा दोस्त नहीं, दुश्मन है.”

Sanjiv Jaiswal

संजीव जायसवाल ‘संजय’

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कहानी- अंबर की नीलिमा 1 (Story Series- Ambar Ki Neelima 1)

कुफरी की हसीन वादियों में एक दुर्गम घाटी के समीप खड़ी नीलिमा प्रकृति के अनुपम सौंदर्य को अपलक निहारे जा रही थी. अपने स्नो गॉगल को उसने हाथ में ले रखा था. इससे आसमान से गिर रहे ब़र्फ के फाहे सीधे उसके रक्तिम रुख़सारों का स्पर्श कर रहे थे. इससे उसकी मादकता में कुछ और वृद्धि हो रही थी.

“बेइंतहा हसीन हैं ये नज़ारे.” तभी एक मदहोश आवाज़ आई.

“बेइंतहा हसीन.” नीलिमा के होंठ अनायास ही बुदबुदा उठे.

“लेकिन आपसे ज़्यादा हसीन नहीं.” इस बार आवाज़ में शरारत की खनक थी.

नीलिमा चौंक पड़ी.

दूर-दूर जहां तक दृष्टि जा सकती थी ब़र्फ की श्‍वेत चादर बिछी हुई थी. हिमाच्छादित देवदार के वृक्ष शांति दूतों की तरह निशब्द खड़े थे. मेघदूतों की सेना को चीर सूर्य की किरणें जब हिम से ढके पर्वत शिखरों से टकरातीं, तो वे स्वर्ण कलशों की भांति जगमगा उठते थे. मंद-मंद बह रहे पवन के झोंके जब मादक स्पर्श दे समीप से गुज़रते, तो अंतर्मन में एक सिहरन-सी दौड़ जाती थी.

पूरे वातावरण में एक सुकून भरी शांति छाई हुई थी. कुफरी की हसीन वादियों में एक दुर्गम घाटी के समीप खड़ी नीलिमा प्रकृति के अनुपम सौंदर्य को अपलक निहारे जा रही थी. अपने स्नो गॉगल को उसने हाथ में ले रखा था. इससे आसमान से गिर रहे ब़र्फ के फाहे सीधे उसके रक्तिम रुख़सारों का स्पर्श कर रहे थे. इससे उसकी मादकता में कुछ और वृद्धि हो रही थी.

“बेइंतहा हसीन हैं ये नज़ारे.” तभी एक मदहोश आवाज़ आई.

“बेइंतहा हसीन.” नीलिमा के होंठ अनायास ही बुदबुदा उठे.

“लेकिन आपसे ज़्यादा हसीन नहीं.” इस बार आवाज़ में शरारत की खनक थी.

नीलिमा चौंक पड़ी. उसने पीछे पलटकर देखा. सामने उसकी ही तरह स्कीइंग सूट पहने एक व्यक्ति खड़ा था. उसने सिर पर हेलमेट और चेहरे पर बड़ा-सा स्नो गॉगल लगा रखा था, किंतु उसकी आंखों में शरारत के चिह्न साफ़ नज़र आ रहे थे.

“शटअप.” अप्रत्याशित छींटाकशी से नीलिमा ग़ुस्से से चीख उठी.

“ग़ुस्से में तुम्हारा रूप कुछ और निखर आया है. इस ग़ुस्से को कभी अपने से दूर मत करना.” उस व्यक्ति ने कहा और स्की पोल को ब़र्फ पर टकराते हुए तेज़ी से भाग लिया. स्कीइंग-बूट्स के सहारे वह ब़र्फ पर तेज़ी से फिसलता चला जा रहा था.

नीलिमा की आंखें क्रोध से चमक उठीं. उसने अपने स्की पोल को संभाला और स्कीइंग

करते हुए तेज़ी से उस व्यक्ति के पीछे लपकी.

जल्दबाज़ी में उसके स्नो गॉगल और हेलमेट वहीं गिर गए, इसकी उसने परवाह भी नहीं की. वह कुफरी-स्कीइंग स्पोर्ट्स की दो बार चैंपियन रह चुकी थी. उसे विश्‍वास था कि वह जल्द ही उस गुस्ताख़ को पकड़ लेगी.

किंतु नीलिमा का अंदाज़ा ग़लत निकला. उसने बहुत कोशिश की, लेकिन उस मनचले के क़रीब नहीं पहुंच सकी. किंतु वह हार नहीं मानना चाहती थी, इसलिए पूरी शक्ति से आगे बढ़ रही थी. अगले मोड़ पर

छोटा-सा पत्थर ब़र्फ से बाहर निकला हुआ था, नीलिमा उसे देख नहीं पाई.

स्कीइंग-बूट्स के पत्थर से टकराते ही उसके मुंह से तेज़ चीख निकल गई. इससे पहले कि हवा में लहराता हुआ उसका शरीर किसी गहरी खाई में जा गिरता, उसी मोड़ से स्कीइंग करते हुए आ रहे एक व्यक्ति ने उसे अपनी बांहों में संभाल लिया. किंतु वह ख़ुद को संभाल न सका और नीलिमा को बांहों में लिए हुए ब़र्फ पर लुढ़कने लगा. नीलिमा उसकी बांहों में बुरी तरह कसमसा रही थी.

“अपने आप को संभालना सीखो, क्योंकि हर जगह तुम्हें संभालने के लिए मैं मौजूद नहीं रहूंगा.” उस व्यक्ति के होंठों से फुसफुसाहट भरी आवाज़ निकली.

“कौन हो तुम?” नीलिमा चिहुंक उठी.

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उस व्यक्ति ने उत्तर देने की बजाय ब़र्फ की एक चट्टान पर पैर अड़ाते हुए ख़ुद को संभाला. इससे पहले कि बौखलाई नीलिमा खड़ी हो पाती, वह स्की पोल को ब़र्फ पर तेज़ी से घ्ाुमाते हुए वहां से चला गया. हतप्रभ नीलिमा उसे दूर जाते देखती रही.

कौन था वो? देवदूत-सा प्रकट हुआ और अचानक ही चला गया. नीलिमा उसका चेहरा नहीं देख पाई थी, किंतु न जाने क्यों उसकी आवाज़ कुछ पहचानी-सी लगी. ऐसी

आवाज़, जो पहले भी उसके कानों में गूंज चुकी थी, किंतु नीलिमा किसी निर्णय पर नहीं पहुंच पा रही थी.

आज सुबह ही नीलिमा स्कीइंग चैंपियनशिप में भाग लेने शिमला आई थी.  ऑर्गनाइज़िंग कमेटी की अध्यक्षा रीतिका सिन्हा ने उसका स्वागत करते हुए कहा, “वेलकम मिस नीलिमा, मुझे विश्‍वास है कि इस बार का मुक़ाबला पिछली बार से कहीं ज़्यादा रोमांचक होगा और आप जीत की हैट्रिक पूरी करेंगी.”

“थैंक्स.” नीलिमा ने सिर को

हल्का-सा झुकाकर आभार प्रकट किया, फिर बोली, “हैट्रिक पूरी होने में कोई शक है आपको?”

“शक हो या न हो, पर दुआ ज़रूर करूंगी.” रीतिका सिन्हा मुस्कुराईं.

“इस मेहरबानी की कोई ख़ास वजह?” नीलिमा खिलखिलाते हुए हंस पड़ी.

“दो वजहें हैं. पहली वजह तो है मेरा स्वार्थ. अगर आप फिर जीतीं, तो वुमन

एम्पावरमेंट का हमारा झंडा कुछ और बुलंद होगा. दूसरी वजह यह है कि हैट्रिक बनते ही आप इंटरनेशनल फिगर बन जाएंगी, क्योंकि आपको यह जीत इंटरनेशनल स्टार ए. आर. पलिया को हराकर हासिल होगी.” रीतिका सिन्हा ने रहस्य से पर्दा उठाया.

“क्या? ए. आर. पलिया इस चैंपियनशिप में भाग ले रहे हैं ?”

“जी हां. वे किसी काम से परसों ही यूरोप से कोलकाता आए थे. हमारे प्रेसिडेंट को पता चला, तो उन्होंने उनसे ‘कुफरी स्कीइंग चैंपियनशिप’ में भाग लेने का अनुरोध किया. वे समय की कमी का हवाला दे रहे थे, लेकिन प्रेसिडेंट साहब ने जब कहा कि वे इंडिया के यूथ आईकॉन बन गए हैं, उनके चैंपियनशिप में भाग लेने से हिमाचल में टूरिज़्म के

साथ-साथ स्पोर्ट्स को भी बढ़ावा मिलेगा, तो वे मान गए.”

“वे कहां रुके हैं?” नीलिमा ने उत्साह से पूछा.

“रुके तो इसी होटल में हैं, लेकिन इस समय प्रैक्टिस के लिए कुफरी गए हैं.”

“तो मैं भी कुफरी निकल रही हूं. चैंपियनशिप से पहले उनसे एक बार ज़रूर मिलना चाहूंगी.”

थोड़ी ही देर में वह तरोताज़ा होकर बाहर निकली. रीतिका सिन्हा ने उसके लिए कार का इंतज़ाम कर दिया था. नीलिमा कुफरी की ओर चल दी. स्कीइंग की दुनिया में ए. आर. पलिया का नाम अचानक ही धूमकेतु की तरह उभरा था, जब पिछले सप्ताह उन्होंने स्विटज़रलैंड में आयोजित यूरोपियन स्कीइंग चैंपियनशिप में जीत हासिल की थी.

संजीव जायसवाल ‘संजय’

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कहानी- रूहानी रिश्ता 3 (Story Series- Ruhani Rishta 3)

“मैंने कृष्णा को लेकर कुछ कविताएं लिखी हैं, सुनोगी?” मेरी स्वीकृति पर वे उठे, भीतर गए. एक डायरी हाथ में लिए लौटे. दीदी के वियोग में लिखी विरह कविता में उन्होंने दीदी के लिए नूरी, फूल, चांदनी जैसी कई उपमाएं दी हुई थीं. दीदी की, उनके प्यार-समर्पण की ख़ूब प्रशंसा की थी. उत्सुकता से मैंने पूछ लिया, “आप पहले भी कविता लिखते थे या…” वे बीच में ही बोल पड़े, “शादी के बाद कृष्णा ने इतना प्यार दिया कि मैं तुकबंदी करने लगा. उसे लिखे हर पत्र में मैं कुछ पंक्तियां ज़रूर लिखता था. कविता बने या शेर- इससे मुझे कुछ लेना-देना नहीं होता था. मुख्य बात होती थी अपनी भावनाओं को उस तक पहुंचाना.”

आख़िर जीजाजी ने ही बताया कि उनके बेटे ने अपनी सहकर्मी से शादी कर ली है और वे विदेश चले गए हैं. इस तनाव को लेकर दीदी अंदर ही अंदर घुल रही थीं.

मैं उन्हें समझाती रही कि बदलते व़क़्त के साथ अब इन बातों को गंभीरता से नहीं लेना चाहिए. अब बच्चे अपनी मर्ज़ी से जीवन जीना चाहते हैं. हमें ही समझौतावादी रुख अपनाना चाहिए, लेकिन दीदी सहज नहीं हो पा रही थीं. तीन-चार दिन रहकर मैं लौट आई.

अगले वर्ष हमारे बड़े बेटे को विदेश में एक अंतरराष्ट्रीय कंपनी में अच्छी नौकरी मिल गई. कुछ समय बाद उसने हमें वहां बुलाया. लगभग दो माह घूम-फिरकर हम वापस लौटे तो मौसी की बहू से ख़बर मिली कि कृष्णा दीदी नहीं रहीं. पिछले माह उन्हें ज़बर्दस्त दिल का दौरा पड़ा था. अस्पताल में चार-पांच दिन मौत से लड़ने के बाद वे हारकर चल बसी थीं. सुनकर गहरा सदमा पहुंचा था. जीजाजी की क्या मनोदशा होगी, यह सोचकर ही मन भारी होने लगा. जब हम उन्हें मिलने गए तो वे उदास व थके से लग रहे थे. मेरी रुलाई फूट पड़ी. “बेटे के विवाह को लेकर दीदी ने इतना तनाव पाल लिया कि ख़ुद ही बीमारी हो गईं.” जीजाजी ने धीरे से कहा, “कृष्णा को ब्रेन कैंसर हो गया था. इस बात का पता काफ़ी देर से चला, तब तक वह लाइलाज हो चुका था. उसे जब इस बात का पता चला तो वह काफ़ी घबरा गई थी. अपनी बीमारी की चिंता की बजाय उसे यह चिंता थी कि उसके जाने के बाद मेरा क्या होगा? कैसे अकेला रह पाऊंगा? अंतिम दिनों में तो वह मुझे समझाती रहती थी, मैं स्वयं को किस प्रकार व्यस्त रख सकता हूं. मुझे अपने स्वास्थ्य का किस प्रकार ख़याल रखना है. मेरी दवाइयां कहां रखी हैं? जरूरी काग़ज़ात, जेवर व अन्य क़ीमती सामान कहां रखे हैं? इसकी जानकारी देती रहती थी. इसी चिंता में उसे ज़बर्दस्त दिल का दौरा पड़ा और वो मुझे छोड़कर चली गई. सचमुच मैं बहुत अकेला हो गया हूं…”

सहज होने पर जीजाजी बोले, “मैंने कृष्णा को लेकर कुछ कविताएं लिखी हैं, सुनोगी?” मेरी स्वीकृति पर वे उठे, भीतर गए. एक डायरी हाथ में लिए लौटे. दीदी के वियोग में लिखी विरह कविता में उन्होंने दीदी के लिए नूरी, फूल, चांदनी जैसी कई उपमाएं दी हुई थीं. दीदी की, उनके प्यार-समर्पण की ख़ूब प्रशंसा की थी. उत्सुकता से मैंने पूछ लिया, “आप पहले भी कविता लिखते थे या…” वे बीच में ही बोल पड़े, “शादी के बाद कृष्णा ने इतना प्यार दिया कि मैं तुकबंदी करने लगा. उसे लिखे हर पत्र में मैं कुछ पंक्तियां ज़रूर लिखता था. कविता बने या शेर- इससे मुझे कुछ लेना-देना नहीं होता था. मुख्य बात होती थी अपनी भावनाओं को उस तक पहुंचाना.”

मैंने उससे एक बार कहा था कि मैं जो भी पत्र लिखता हूं, उन्हें सहेजकर रखना. मुझे बड़ी ख़ुशी होगी, क्योंकि उनमें मैं अपने भीतर का पूरा प्यार, स्नेह, आदर, समर्पण सभी कुछ डाल देता हूं. तुम्हें हैरानी होगी, हृदयाघात होने से एक दिन पहले उसने एक रेशमी बैग में मेरी लिखी सारी चिट्ठयां मुझे सौंपते हुए कहा था, “यह आपकी अमानत आपको सौंप रही हूं, पता नहीं कब सांसों की डोर टूट जाए. इसे संभाल लेना, आपसे किया वादा पूरा कर दिया है.” जीजाजी ने वे पत्र भी हमें दिखाए, जो पैंतीस वर्ष पहले उन्होंने दीदी को लिखे थे.

कमरे में दीदी की मुस्कुराती बड़ी-सी फ़ोटो लगी हुई थी. जीजाजी उसे बड़े प्यार से निहारते हुए बोले, “अस्पताल जाने से दो-चार दिन पहले यह फ़ोटो मैंने ही खींची थी. उस दिन कृष्णा मुझे बेपनाह ख़ूबसूरत लग रही थी. मैंने जब फ़ोटो खींचने की बात की तो फ़ौरन तैयार हो गई. फिर बोली, “इस फ़ोटो पर हार मत चढ़ाना, क्योंकि हार तो उसे चढ़ाया जाता है, जो यह संसार छोड़कर चला जाता है. मैं तो हमेशा आपके संग ही रहूंगी आपकी यादों में, सपनों में, बातों में… आपने इतना प्रेम जो दिया है, क्या मैं आपको अकेला छोड़ सकती हूं…?”

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जीजाजी के चेहरे पर कुछ देर पहले जो उदासी, सूनापन था उसके स्थान पर अब वे सहज, स्थिर और शांत नज़र आने लगे. कुछ देर की चुप्पी के उपरांत वे बोले, “पहले मुझे लगता था कि कृष्णा के बिना मैं जी नहीं पाऊंगा, लेकिन अब महसूस होता है कि वह तो मेरे साथ ही है. उसकी मधुर स्मृतियां मेरे हर क्रियाकलाप में, मेरे आसपास हमेशा रहती हैं. वह केवल शरीर छोड़कर गई है, रूहानी रूप से वह सदा मेरे साथ रहती है. यह फ़ोटो देखो, कैसे मुस्कुरा रही है. उसके आत्मिक प्रेम के सहारे अपना शेष जीवन मैं सहजता से जी लूंगा…”

मैं सोचने लगी, आज जब संसार में प्रेम जैसा पवित्र शब्द एक व्यापार बन कर रह गया है, वहां दीदी-जीजाजी का पावन आत्मिक प्रेम कितना शक्तिशाली है, जो जीवन के बाद भी उतना ही महत्त्व व प्रभाव रखता है. दिल को छूता है उनका यह रूहानी रिश्ता. उनके निश्छल, निर्मल व पावन प्रेम के प्रति मन श्रद्धा से भर उठा.

Narendra Kaur Chhabra

नरेंद्र कौर छाबड़ा

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कहानी- रूहानी रिश्ता 2 (Story Series- Ruhani Rishta 2)

दीदी के साथ जीजाजी अक्सर कार्यक्रमों में शामिल होते थे. वहां उन दोनों का प्रेम चर्चा का विषय बन जाता था. जीजाजी जब तैयार होते तो दीदी के सम्मुख खड़े हो बड़े प्यार से पूछते, “कृष्णा, देखो ठीक लग रहा हूं न?” हम सभी मुस्कुरा उठते. दीदी भी ठीक उसी अंदाज़ में जब पूछतीं, “सुनिए, ठीक लग रही हूं?” तो जीजाजी कहते, “ठीक नहीं, बेहद ख़ूबसूरत लग रही हो. काला टीका भी लगा लेना, कहीं किसी की नज़र न लग जाए.”

जीवन सहजता से गुज़रता रहा. शादी के पश्‍चात् मैं भी दूसरे शहर चली गई, लेकिन हमारे बीच पत्र-व्यवहार और फ़ोन द्वारा संपर्क बना रहा. पारिवारिक कार्यक्रमों में साल-दो साल में मिलना हो ही जाता था. दीदी के साथ जीजाजी अक्सर कार्यक्रमों में शामिल होते थे. वहां उन दोनों का प्रेम चर्चा का विषय बन जाता था. जीजाजी जब तैयार होते तो दीदी के सम्मुख खड़े हो बड़े प्यार से पूछते, “कृष्णा, देखो ठीक लग रहा हूं न?” हम सभी मुस्कुरा उठते. दीदी भी ठीक उसी अंदाज़ में जब पूछतीं, “सुनिए, ठीक लग रही हूं?” तो जीजाजी कहते, “ठीक नहीं, बेहद ख़ूबसूरत लग रही हो. काला टीका भी लगा लेना, कहीं किसी की नज़र न लग जाए.”

मौसी बताती थीं कि जब कृष्णा दीदी मायके आती थीं तो जीजाजी की लिखी एक चिट्ठी रोज़ डाकिया लेकर आता. छोटे भाई-बहन उसे छेड़ते थे कि इतना भी क्या दीवानापन है, रोज़ चिट्ठी लिखने बैठ जाते हैं. उनसे कहो थोड़ा सब्र रखें. पंद्रह-बीस दिन इतने लंबे तो नहीं होते… दीदी केवल मुस्कुरा देतीं, लेकिन उनके चेहरे की लालिमा और ख़ुशी देख सभी संतुष्ट होते कि बेटी अपने घर सुखी है.

समय का चक्र अपनी गति से चलता रहा. दीदी के बच्चे पढ़-लिखकर उच्च शिक्षित हो गए. बेटे की एक अच्छी कंपनी में नौकरी लग गई, लेकिन दूसरे शहर में. इधर बेटी के लिए अच्छा वर मिल गया तो उसकी  भी आनन-फानन में शादी हो गई. अब दीदी-जीजाजी अकेले रह गए थे. कई बार उनका फ़ोन आता, “क्या कर रही हो? अब तो तुम्हारे दोनों बेटे भी बड़े हो गए हैं. कॉलेज जा रहे हैं. आ जाओ न कुछ दिनों के लिए, साथ रहेंगे.” पति व बच्चों की तरफ़ से हरी झंडी मिलने पर मैं सप्ताह भर के लिए कृष्णा दीदी के पास चली गई.

कृष्णा दीदी कभी चाय नहीं पीती थीं. यहां मैंने देखा, सवेरे ट्रे में तीन प्याले चाय व बिस्किट रखकर वे बोलीं, “अनु, चलो बेड टी ले लें.” मैंने हैरानी से पूछा, “दीदी, आप तो चाय के नाम से ही चिढ़ती थीं. ज़िंदगी में कभी चाय पीते आपको नहीं देखा. यह करिश्मा कब से हो गया?” वे मुस्कुराते हुए बोलीं, “जब ज़िंदगी में कोई टूटकर चाहनेवाला मिल जाए, जिसे आपसे शारीरिक नहीं आत्मिक प्रेम हो तो जीवन में करिश्मे होते ही रहते हैं. मैं तो स़िर्फ चाय पीने लगी हूं, जबकि ये तो मेरी पसंद की फ़िल्में, नाटक, प्रदर्शनी तक देखने चल पड़ते हैं. इनको ऐसा कोई शौक़ ही नहीं था. क्रिकेट मैच से मेरा कभी वास्ता नहीं रहा, लेकिन अब इनके साथ बैठकर टी.वी. पर पूरा मैच शौक़ से देखती हूं. इन्हें बहुत पसंद है न!” मैं मंत्रमुग्ध-सी उनकी बातें सुनती रही.

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“जीवनसाथी का अर्थ ही होता है- जीवन साथ-साथ जीना. जिनमें परस्पर प्यार, विश्‍वास, समर्पण, आदर, अपनत्व होगा, उन्हीं का जीवन सहज होगा, उमंग-उत्साह से भरा होगा, वरना दो ध्रुवों की तरह हो जाएगा, जो आपस में कभी नहीं मिलते. अब तक बिताई अपनी ज़िंदगी से मैंने यही अनुभव किया है. अगर सच्चे दिल व पूरे निष्ठा से प्रयास किया जाए तो हम जीवन को बड़ी ख़ूबसूरती से अपने ढंग से जी सकते हैं.”

रात के खाने के बाद हम दोनों बैठ पुरानी स्मृतियों को यादकर गपशप में मशगूल थीं. ठंड के शुरुआती दिन थे. हल्की ठंडी हवा खिड़की के रास्ते बीच-बीच में आकर ख़ुशनुमा एहसास दिला रही थी. दीदी शायद थक गई थीं. कुछ देर बाद ही उनींदी-सी हालत में बोलीं, “मुझे नींद आ रही है. तुम भी सो जाओ, बाकी बातें कल करेंगे?” मुझे अभी नींद नहीं आ रही थी. अतः क़िताब पढ़ने लगी. कुछ देर बाद जीजाजी वहां आए. दीदी को सोते हुए देखा तो आलमारी में से कंबल निकालकर उन पर ओढ़ाते हुए बोले, “जब से कृष्णा को थायरॉइड की बीमारी हुई है, इसे ठंडी अधिक लगती है, पर अपना ख़याल ही नहीं रखती. ऐसे ही सो गई, लेकिन मेरे नाश्ते से लेकर खाने, पहनने-ओढ़ने, दवा आदि सब का ख़याल इसे रहता है. हर कार्य समय से करती है. सचमुच इसके बगैर तो मैं अधूरा हूं.”

अगले दिन दीदी उठीं तो बोलीं, “रात को नींद तो अच्छी आई, फिर भी न जाने क्यों सिरदर्द हो रहा है.” जीजाजी फौरन बोले, “तुम आराम करो. मैं चाय बना लेता हूं.” मैं जब चाय बनाने के ख़याल से उठने लगी तो उन्होंने यह कहकर मुझे बैठा दिया कि सालीजी कभी हमारे हाथ की चाय पीकर भी देखिए. ट्रे में चाय के साथ मठरी व बिस्किट लेकर वे कुछ ही देर में प्रकट हो गए. चाय वाकई बहुत अच्छी बनी थी. मैंने कहा, “दीदी, सचमुच तुम ख़ुशक़िस्मत हो, जिसे जीजाजी जैसा जीवनसाथी मिला है.” दीदी स्वीकृति में मुस्कुरा दीं. उनकी शादी के बाद से जीजाजी का दीदी के प्रति जो निर्मल, निश्छल प्रेम-स्नेह देखा था, वह ज्यों का त्यों बरक़रार था.

अब दो वर्षों के बाद दीदी से मिलने गई थी. ताज्जुब हुआ कि इस बार वे पहले की तरह चुस्त, ख़ुश व उत्साहित नहीं हैं. चेहरे से ही स्पष्ट हो रहा था कुछ तनाव में हैं.

Narendra Kaur Chhabra

नरेंद्र कौर छाबड़ा

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कहानी- रूहानी रिश्ता 1 (Story Series- Ruhani Rishta 1)

जो भी लोग शादी में शामिल थे, सभी ने दबी ज़ुबान से जीजाजी के व्यक्तित्व को लेकर अलग-अलग प्रतिक्रिया की थी. जीजाजी का व्यक्तित्व दीदी के सामने एकदम बौना था. गहरा रंग, छोटा क़द और कुछ भारी शरीर. कुछ महिलाओं ने तो दबी ज़ुबान में यह भी कह दिया था, “कृष्णा के लिए यही लड़का इनको नज़र आया? चांद में ग्रहण लग गया-सा प्रतीत होता है.” कुछेक इससे भी आगे निकल गईं, “अपनी कृष्णा की तो छूने भर से मैली हो जानेवाली रंगत है. इसके साथ रहकर तो वह भी काली हो जाएगी. संगत का असर तो होता ही है न…” कनखियों से इशारेबाज़ी, हंसी-ठट्ठा होता रहा, लेकिन इन सबसे बेख़बर मौसा-मौसी बड़े चाव, उत्साह, उमंग से शादी की रस्मों को पूरा करने में व्यस्त रहे.

जीजाजी यानी मेरी मौसेरी बहन कृष्णा के पति का फ़ोन था, “क्या बात है सालीजी, आजकल याद ही नहीं करतीं? तुम्हारी दीदी कुछ बीमार चल रही है, बहुत याद कर रही है तुम्हें. थोड़ा समय निकालकर मिलने आ जाओगी तो उसे अच्छा लगेगा.”

“क्या हो गया दीदी को? कोई सीरियस बात तो नहीं…” अनायास मेरी आवाज़ में गंभीरता आ गई थी.

“नहीं, ऐसी भी कोई सीरियस बात नहीं है, तुम परेशान मत हो, लेकिन आ जाओगी तो उसे ख़ुशी होगी.”

“ठीक है जीजाजी, मैं जल्दी ही आने का प्रोग्राम बनाऊंगी.” कहकर मैंने फ़ोन रख दिया. सोचने लगी, कितने दिन हो गए कृष्णा दीदी से मिले. हां, लगभग दो साल का व़क़्त बीत चुका है. यह तो विज्ञान की मेहरबानी है कि फ़ोन, मोबाइल, कंप्यूटर, इंटरनेट पर चैटिंग, वेब कैम से प्रत्यक्ष बातचीत हो जाती है. दीदी और मेरे बीच भी फ़ोन पर महीने में एक-दो बार तो अवश्य बातचीत होती थी. अभी कुछ दिन पहले फ़ोन लगाया था, पर दीदी से बात नहीं हो सकी थी. जीजाजी ने ही फ़ोन उठाया था और कहा था, “तुम्हारी दीदी सोई हुई हैं. आजकल थोड़ा-सा काम करने पर ही थक जाती हैं.”

“तबियत तो ठीक है न? डॉक्टर को दिखाया…?” मेरी आवाज़ में चिंता महसूस कर वे बोले, “पूरा चेकअप कराया है, चिंता की कोई बात नहीं.” फिर मैं भी अपनी पारिवारिक और सामाजिक व्यस्तताओं में खो गई और दीदी का भी फ़ोन नहीं आया.

बेशक जीजाजी ने दीदी के स्वास्थ्य के बारे में चिंता जैसी बात से इंकार किया था, लेकिन मुझे अंदर से महसूस हो रहा था कि दीदी के साथ ज़रूर कुछ प्रॉब्लम है, वरना वे ख़ुद फ़ोन पर बात करतीं. उनसे मिलने की इच्छा बलवती होने लगी. दो वर्ष में तो मनुष्य के जीवन में कितना कुछ बदल जाता है. पता नहीं, दीदी के साथ सब ठीक चल रहा है या नहीं?

कृष्णा दीदी और मेरी उम्र में चार-पांच वर्ष का अंतर था. एक ही शहर और एक ही मोहल्ले में रहने के कारण हमारा रोज़ ही मेल-मिलाप होता था. हम दोनों एक ही स्कूल में पढ़ती थीं. स्कूल घर से एक किलोमीटर से भी अधिक दूरी पर था, लेकिन हम दोनों पैदल ही बड़ी सहजता से जाती-आती थीं. मोहल्ले की और दो-तीन लड़कियां भी हमारे साथ चल पड़तीं. बातें करते, गप्पे लड़ाते दूरी का एहसास ही नहीं होता था. शाम को हम सब मोहल्ले के सार्वजनिक बगीचे में इकट्ठे होते. कुछ देर खेलते, कुछ क़िस्से-कहानियां सुनते-सुनाते और शाम ढलने से पहले अपने-अपने घर लौट जाते. कितने ही वर्षों तक हमारी यही दिनचर्या रही. चूंकि हमारे घर फ़िल्में, नाटक आदि देखने पर पाबंदी थी, अतः दीदी जब भी कोई फ़िल्म देखकर आती तो उसकी कहानी हमें बगीचे में बैठकर सुनाती. हम सब बड़े चाव से सुनते. ऐसा महसूस होता, जैसे वास्तव में हम फ़िल्म ही देख रहे हों. दीदी की हायर सेकेंडरी की स्कूली शिक्षा पूरी हुई तो उनकी पढ़ाई बंद करा दी गई. घरेलू काम, जैसे- खाना बनाना, सिलाई-बुनाई उन्हें सिखाया जाने लगा, क्योंकि साल-दो साल में उनकी शादी होनी थी. दीदी काफ़ी सुंदर थीं- गोरा रंग, ऊंची क़द-काठी, आकर्षक नैन-ऩक़्श. उन्हें तो कोई भी पहली नज़र में ही पसंद कर लेता. मौसी का कहना था- स़िर्फ सूरत से कुछ नहीं होता, सीरत ज़रूरी है. लड़की में सभी गुण होने चाहिए.

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अट्ठारह वर्ष की होते ही कृष्णा दीदी की शादी तय हो गई. उनके पति पढ़े-लिखे, कॉलेज में प्राध्यापक थे. उन दिनों लड़के-लड़की के माता-पिता ही शादी तय करते थे. लड़के-लड़की का आपस में देखना, मिलना, बातचीत करने जैसी औपचारिकताओं का महत्व नहीं होता था. अगर माता-पिता को रिश्ता पसंद आ गया तो लड़के-लड़की को केवल सूचित किया जाता था. उनकी राय जानने की आवश्यकता नहीं समझी जाती थी. शादी के बाद ही दीदी व जीजाजी ने एक-दूसरे को देखा था. जो भी लोग शादी में शामिल थे, सभी ने दबी ज़ुबान से जीजाजी के व्यक्तित्व को लेकर अलग-अलग प्रतिक्रिया की थी. जीजाजी का व्यक्तित्व दीदी के सामने एकदम बौना था. गहरा रंग, छोटा क़द और कुछ भारी शरीर. कुछ महिलाओं ने तो दबी ज़ुबान में यह भी कह दिया था, “कृष्णा के लिए यही लड़का इनको नज़र आया? चांद में ग्रहण लग गया-सा प्रतीत होता है.” कुछेक इससे भी आगे निकल गईं, “अपनी कृष्णा की तो छूने भर से मैली हो जानेवाली रंगत है. इसके साथ रहकर तो वह भी काली हो जाएगी. संगत का असर तो होता ही है न…” कनखियों से इशारेबाज़ी, हंसी-ठट्ठा होता रहा, लेकिन इन सबसे बेख़बर मौसा-मौसी बड़े चाव, उत्साह, उमंग से शादी की रस्मों को पूरा करने में व्यस्त रहे.

शादी के बाद जब-जब दीदी मायके आतीं, उनकी खिली-खिली रंगत और दमकता चेहरा उनकी ख़ुशहाल ज़िंदगी के सबूत पेश करते. पांच वर्षों में वे दो बच्चों की मां बन अपनी घर-गृहस्थी में पूरी तरह रम गई थीं. अपने सुखी वैवाहिक जीवन के बारे में बताते हुए वे हमेशा कहतीं, “मैं बड़ी भाग्यशाली हूं, जो मुझे ऐसा पति मिला है, जिसमें सभी मानवीय गुण हैं. मुझे उनसे प्रेम, अपनापन, सहयोग, प्रेरणा सभी कुछ मिला है.”

Narendra Kaur Chhabra

नरेंद्र कौर छाबड़ा

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कहानी- पतंग 4 (Story Series- Patang 4)

“… मैं तुझे रोते हुए नहीं देख सकता. दिल की दुनिया में कुछ भी सही-ग़लत, नैतिक-अनैतिक नहीं होता. मेरी ओर से तू पतंग की तरह उन्मुक्त आकाश में उड़ान भरने को स्वतंत्र है. मुझे तुझसे कभी कोई शिकायत नहीं होगी. बस, तू ख़ुश रह.” निवेदन की उंगलियां बहुत हौले से उसके आंसू पोंछने के लिए उसके गालों पर सरक रही थीं और वो ऐसे अभिभूत हुई जा रही थी जैसे उनकी पहली रात का प्रथम स्पर्श हो. वो इन लम्हों को और जीना चाहती थी…जीते रहना चहती थी… हिचकियों के बीच बोली, “मुझे नहीं चाहिए तेरे ये बचकाने गिफ्ट.”

मांझा निकाले बिना वो आकाश छू नहीं सकती. वो परेशान हो जाती है, तभी मांझा उसे मुक्त कर देता है. पतंग ऊंचे जाती है और ऊंचे. तब उसे पता चलता है कि आकाश छुआ नहीं जा सकता. वो एक दृष्टि भ्रम है. अचानक उसे एहसास होता है कि जिसे वो सबसे बड़ा बंधन समझ रही थी, वो मांझा ही तो उसका सबसे बड़ा सहारा था. उस पर सवार होकर ही तो वो तनावमुक्त, सुरक्षित महसूस कर उड़ान भर सकती थी. वो सिहर उठती है. मांझा पकड़ने की कोशिश करती है. तब आकाश की ऊंचाइयों से मांझा थामे ज़मीन पर खड़ा बौना-सा दिखनेवाला इंसान अचानक आकाश जितना बड़ा हो जाता है. हाथ बढ़ाकर मांझा दोबारा उसके गले में बांध देता है और पतंग निश्‍चिंत हो जाती है. निपुणा इतनी रम गई इस बिंब में कि बुत-सी खड़ी रही. उसकी आंखों से आंसू झर-झर बह रहे थे.

सहसा उसे ध्यान आया. निवेदन एक अरसे से उसके क़रीब नहीं आया था. शायद उसका मन पढ़ने के बाद से. किसी तरह अस्फुट शब्दों में ये भाव ढले, “तुम किस मिट्टी के बने हो निवेदन? तुम्हारी अपनी ख़्वाहिशें? उनका कोई मोल नहीं?” अब निवेदन जैसे डगमगा गया. निपुणा से थोड़ी दूरी बनाकर खड़ा था, लेकिन अब क़रीब आ गया. उसका चेहरा बड़ी कोमलता से अपने हाथों में पकड़कर उसकी आंखों में आंखें डालकर बोला, “मोल क्यों नहीं? बचपन से आज तक दो ही तो ख़्वाहिशें रही हैं मेरी- एक तुम्हें कुछ ऐसा दे पाने की, जिससे तुम ख़ुश हो जाओ और दूसरी तुम्हारी आंखों में अपने लिए तड़प देखने की. आज तुम्हें मुक्ति देकर अपनी ही तो पहली ख़्वाहिश पूरी कर रहा हूं और क्या पता मुझसे दूर और आकाश से नज़दीक होने पर यही टीस तुम्हारे मन में मेरे लिए जग जाए और मेरी दूसरी ख़्वाहिश भी पूरी हो जाए.”

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इतना कहकर उसने निपुणा के माथे पर बहुत हौले से एक चुंबन अंकित कर दिया, जो मन से होता हुआ सीधा दिल के उस कुंवारे कोने में पहुंचा, जहां आकाश रहने लगा था और वहां खलबली-सी मच गई. आज निवेदन के स्पर्श में ऐसा रोमांच था, उसके चुंबन से ऐसे पुलकित हुई थी वो, जैसे पहली बार छू रहा हो. उसका प्यार तो हमेशा से ऐसा ही रहा होगा, पर इससे पहले वो इसे कभी महसूस नहीं कर पाई, क्योंकि अपने बड़प्पन का, ज्ञान का, अभिमान का आवरण होता था शायद. एक पल में सारे आवरण तार-तार हो गए. अभिमान का काला चश्मा उतरा तो प्यार का सुर्ख़ रंग नज़र आने लगा, जो वो अब तक देखकर भी अनदेखा करती आई थी, जिसे वो लंपट और अपरिपक्व समझती आई थी, वो इतनी परिपक्वता से सोच सकता था, इतनी समझदारी और धैर्य से अपने जीवन की इस विकराल समस्या का सामना कर सकता था. और वो? वो उसे अपने लायक नहीं समझती थी. क्या नहीं था निवेदन में?

थोड़ा-सा किताबी ज्ञान या वो जीवन दर्शन और अभिरुचि जिसे वो एलीट का नाम देकर अपने को दूसरों से श्रेष्ठ समझती आई थी? किस समझदारी का घमंड था उसे? कौन-सी परिपक्वता दिखाई थी उसने विवेक से चिढ़कर शादी के लिए हां करके? मनपसंद जीवनसाथी मिलने तक इंतज़ार करने से किसने रोका था उसे? समझदारी से तो निवेदन ने काम लिया था उसे व़क्त देकर. बचपन से उसकी हर

व्यावहारिक समस्या का समाधान निवेदन ने किया. शादी के बाद भी उसकी उड़ान स़िर्फ इसलिए पूरी हो सकी, क्योंकि निवेदन हर पल उसके साथ था. कितनी गहरी जगह बना चुका था निवेदन दिल में? क्या इस प्यार को भुला पाएगी वो कभी? जिसे वो अयोग्य समझती थी उसने हमेशा दिया ही था, फिर भी और देने की ही ख़्वाहिश थी उसकी. और ख़ुद को बड़ी योग्य समझनेवाली वो फिर भी तृप्त नहीं थी.

निवेदन उसे किंकर्त्तव्यविमूढ़-सी खड़ी कुछ देर तक देखता रहा, फिर धीरे से बोला, “ड्राइवर का फोन है. कैब आ गई है. अब आंसू पोछ ले. मैं तुझे रोते हुए नहीं देख सकता. दिल की दुनिया में कुछ भी सही-ग़लत, नैतिक-अनैतिक नहीं होता. मेरी ओर से तू पतंग की तरह उन्मुक्त आकाश में उड़ान भरने को स्वतंत्र है. मुझे तुझसे कभी कोई शिकायत नहीं होगी. बस, तू ख़ुश रह.” निवेदन की उंगलियां बहुत हौले से उसके आंसू पोंछने के लिए उसके गालों पर सरक रही थीं और वो ऐसे अभिभूत हुई जा रही थी जैसे उनकी पहली रात का प्रथम स्पर्श हो. वो इन लम्हों को और जीना चाहती थी…जीते रहना चहती थी… हिचकियों के बीच बोली, “मुझे नहीं चाहिए तेरे ये बचकाने गिफ्ट. शादी क्या गुड़ियों का खेल है, बुद्धू कद्दू.” इतना कहते-कहते सारा गुमान पलकों के रास्ते बह चला और उसने अपना सिर निवेदन के सीने पर रख दिया, तो निवेदन की बांहों का घेरा कसने लगा. ड्राइवर के, बॉस के, आकाश के फोन बजते रहे, पर एक-दूसरे की कसमसाती आगोश और चुंबनों की बारिश में खोए आलिंगनबद्ध युगल को आज क्या सुनाई देनेवाला था.

bhavana prakash

भावना प्रकाश

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कहानी- पतंग 3 (Story Series- Patang 3)

“मैं जानता था कि तुम बैंगलुरू आकाश के साथ के लिए जाना चाहती थी. देख नहीं रहा हूं कि जब से वो तुम्हारी ज़िंदगी में आया है तब से तुम हंसना सीख गई हो. सजने-संवरने का मन करने लगा है तुम्हारा. उसने चंद महीनों में वो कर दिखाया, जो मैं इतने सालों की शिद्दत से की कोशिशों से भी नहीं कर पाया. उसने तुम्हें कंप्यूटर से इंसान बना दिया है, सोणिए! ज़िंदगी जीना सिखा दिया है. है न?”

निपुणा की आंखों में आंसू आ गए. “मैं… मैं… आई एम सॉरी, मैं नहीं जानती ये सब कब और कैसे… मगर मेरे संस्कार मुझे सीमा-रेखा तोड़ने से रोकते रहे… मैं थक गई हूं, मैं क्या करूं?” फिर जैसे अचकचाहट में भीगी पलकों पर रखे भावों ने करवट बदली.

शादी की थी, तो समर्पण भी ज़रूरी रस्म थी. इसे भी तो निभाना होगा. लेकिन उस रात निवेदन का एक ऐसा रूप देखा था, जिसके बारे में उसने कभी सोचा ही नहीं था.

कमरे में आते ही बिना किसी भूमिका के उसे एक ज़ेवर का डिब्बा पकड़ाते हुए बोला था वो, “ये तो तू जानती ही है कि मैं तुझे प्यार करता हूं और मैं जानता हूं कि तू मुझे प्यार नहीं करती. आज इतना बताना चाहता हूं कि मेरे लिए प्यार का मतलब तुझे पाना नहीं, ख़ुश देखना है और समझना चाहता हूं कि तेरे लिए प्यार का मतलब क्या है? कैसे मैं तेरे लायक बनने की कोशिश कर सकता हूं? जब तुझे लगे कि ये समझौता करके तूने कोई ग़लती नहीं की है, तो मेरा उपहार पहन लेना. मैं इसे तेरे क़रीब आने की इजाज़त समझूंगा.”

बड़ी मुश्किल से समझाया था दिल को, पर डिब्बा खोलते ही खिन्नता और बढ़ गई थी. उ़फ्! इतना मंहगा पर इतना बचकाना? पर जैसा भी था, पहनना तो था ही.

“लो, तुम्हारा तोहफ़ा आ गया.”  निवेदन का उत्साहित स्वर सुनकर निपुणा जैसे सोते से जगी. अपनी ही कशमकश कम थी, जो इसके बचकाने गिफ्ट को… लिफ़ाफ़ा एक तरफ़ रखते हुए वो बोली, “सुनो निवेदन, मुझे तुमसे कुछ कहना है. नहीं मांगना है, नहीं समझाना है, नहीं…” और निपुणा के शब्द फिर गले में अटक गए, पर आज निवेदन अपनी आदतानुसार ठहाका मारकर हंसा नहीं, आंखों में आंखें डालकर प्यार से बोला, “ओए सोणिए! पहले तू तय कर ले कि तुझे करना क्या है? न हो तो पहले गिफ्ट खोलकर देख ही ले, क्या पता वही हो जो तुझे मांगना हो.”

निपुणा ने शायद ज़िंदगी में पहली बार निवेदन के चेहरे पर संजीदगी के भाव देखे.

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लिफ़ाफ़ा आगे बढ़ाते समय उसके हाथ कांप गए, तो निपुणा की उत्सुकता जगी. मगर खोलकर पढ़ा, तो जैसे व़क्त थम गया, धड़कन रुक गई, निगाहें निवेदन की निगाहों से जा टकराईं, तो देखा उनमें ओस की बूंद से दो आंसू ठहरे थे, पर होंठों पर गर्वमयी मुस्कान, “यही चाहती थी न तू? अब ख़ुश?” निपुणा जैसे जड़-सी हो गई. कभी निवेदन के हस्ताक्षरों के साथ तलाक़ के उन काग़ज़ों को, कभी प्यार के उस सागर को निरखती जा रही थी, “और तुम्हारा प्यार? तुम भी तो मुझे प्यार करते हो.” आख़िर कुछ शब्द हिचकिचाहट का बांध तोड़कर बाहर आए.

“बिल्कुल करता हूं, पर प्यार कोई ज़ंजीर थोड़े ही है, जो अपने प्यार को जकड़कर घायल कर दे. इंसान का मन पतंग है और प्यार उस मांझे की तरह है, जो अपने प्यार को उन्मुक्त हवा में लहराते देखकर ख़ुश होता है. उसका सहारा बनता है. वो उसे खींचता नहीं, क्योंकि जानता है इससे पतंग टूट जाएगी. वो तो बस, उसे हवाओं में छोड़कर उसके साथ बना रहता है, ताकि जब हवाएं थम जाएं या पतंग थक जाए, तो उसे वापस ला सके. मैं जानता था कि तुम बैंगलुरू आकाश के साथ के लिए जाना चाहती थी. देख नहीं रहा हूं कि जब से वो तुम्हारी ज़िंदगी में आया है तब से तुम हंसना सीख गई हो. सजने-संवरने का मन करने लगा है तुम्हारा. उसने चंद महीनों में वो कर दिखाया, जो मैं इतने सालों की शिद्दत से की कोशिशों से भी नहीं कर पाया. उसने तुम्हें कंप्यूटर से इंसान बना दिया है, सोणिए! ज़िंदगी जीना सिखा दिया है. है न?”

निपुणा की आंखों में आंसू आ गए. “मैं… मैं… आई एम सॉरी, मैं नहीं जानती ये सब कब और कैसे… मगर मेरे संस्कार मुझे सीमा-रेखा तोड़ने से रोकते रहे… मैं थक गई हूं, मैं क्या करूं?” फिर जैसे अचकचाहट में भीगी पलकों पर रखे भावों ने करवट बदली.

“तुम सब जानते थे. तुम मुझसे भी पहले जान गए थे कि… तुमने मुझे रोका क्यों नहीं? मुझे डांटते, बुरा-भला कहते, अब भी कह सकते हो. हक़ है तुम्हारा, मुझे चाहे कुछ कह लो. हो सके तो मेरे मन को रोक लो, निवेदन, उसे बांध लो. मैं तो अपने मन को बहुत डांटती हूं, बहुत समझाती हूं, मगर मेरा कहा मानता ही नहीं, बिल्कुल बच्चों की तरह…”

“बस, यही तो ग़लती करती हो तुम. मन कोई परिंदा थोड़े ही है, जो पकड़ा और पिंजरे में बंद कर दिया. ये ग़ुलाम नहीं, राजा है और वो भी दुनिया का सबसे तानाशाह राजा. ये तो वो नदी है, जिस पर जितने बांध बनाओगी, इसका वेग उतना ही बलवान होता जाएगा. तुम तो वैज्ञानिक हो, जानती हो कि प्रकृति के नियमों को बदला नहीं जा सकता. अगर मेरी क़िस्मत में तुम्हारा प्यार होगा, तो मुझसे दूर होने के बाद तुम्हें मेरे प्यार का एहसास हो जाएगा और नहीं होगा तो मेरी बांहों में होकर भी तुम्हारी पलकों में किसी और के सपने होंगे.”

निवेदन बोल रहा था और निपुणा के ज़ेहन में एक बिंब बनता जा रहा था. एक मस्ती से भरी पतंग आकाश में उड़ रही है. वो ऊंचे और ऊंचे जाना चाहती है. नीले आकाश को छूना चाहती है, लेकिन गले में अटका मांझा उसे रोक रहा है.

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भावना प्रकाश

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कहानी- पतंग 2 (Story Series- Patang 2)

निवेदन दिन-रात अपने प्यार का इज़हार करता रहता और वो उसे ऐसे डांट देती, “मेरा-तेरा मानसिक स्तर नहीं मिलता, अभिरुचि, रहन-सहन, जीवनशैली कुछ भी तो नहीं मिलते.”     

“और मैं सोचता था सोणिए कि दिल मिलना चाहिए, रोबोट बुद्धि.” निवेदन की इस बात को निपुणा हंसी में उड़ा देती.

समय तेज़ी से बढ़ रहा था. निपुणा ने करियर में तो कामयाबी हासिल कर ही ली थी, अब शुरू हुई जीवनसाथी ढूंढ़ने की शुरुआत. निपुणा को कोई लड़का अपने योग्य ही नहीं लगता. धीरे-धीरे मम्मी-पापा की दबी ज़बान पर निवेदन का नाम आने लगा. 

वो कमरे से बाहर निकल गया और निपुणा एक ठंडी सांस लेकर आरामकुर्सी पर पसर गई. कैसे अपनी बात को शब्दों में पिरोएगी, सोचते हुए अतीत के समुद्र में उतरती जा रही थी.

उसे कभी पड़ोसी निवेदन का जन्मदिन याद नहीं रहा और वो कभी उसका जन्मदिन भूला नहीं. उसने कभी वो उपहार खोलकर भी नहीं देखा, जो मम्मी उसे देने के लिए थमा देती थीं और वो एक महीने पहले से निपुणा की पसंद का उपहार सोचने और ढू़ंढने की जद्दोज़ेहद करके भी उसे कभी ख़ुश नहीं कर पाया. पहली बार यही कोई सात-आठ साल के रहे होंगे वो, जब रिमोट से उड़नेवाले हवाई जहाज पर वो चिढ़ गई थी, “मुझे नहीं पसंद हैं तू और तेरे ये बचकाने गिफ्ट्स.”

मगर निवेदन इतनी आसानी से पीछा छोड़ता न था, “मैं जब पतंग उड़ाने को कहता हूं, तू मना कर देती है कि मांझे से हाथ कट जाएगा. देख ये रिमोट से चलता है. तू ये उड़ाना, मैं पतंग.”

“मुझे बख़्श दे. समझने की कोशिश कर. मुझे उड़ाने का नहीं, उड़ने का शौक़ है. मैं पतंग की तरह ऊंचे आकाश में उड़ना चाहती हूं. देखना एक दिन मैं वहां होऊंगी, आकाश पर और तू ज़मीन पर पतंग ही उड़ाता रहेगा, बुद्धू कद्दू.”

“कितनी देर आकाश पर रहेगी? लौटकर तो ज़मीन पर ही आना है, रोबोट बुद्धि.” ये कहते हुए एक-दूसरे के सिर पर टीप मारकर वे अपनी राह मुड़ जाते थे.

निपुणा उन गिने-चुने व्यक्तियोंे में से थी, जो कभी बच्चे नहीं होते और निवेदन उन लोगों में से जिनमें कभी परिपक्वता नहीं आती. अंतर्मुखी निपुणा का

छोटी-सी उम्र में भी हंसने-खेलने को समय का दुरुपयोग मानना उसकी मां की सबसे बड़ी चिंता थी, तो बहिर्मुखी निवेदन को पढ़ने बिठाना, समय का सदुपयोग सिखाना उसकी मां की सबसे बड़ी समस्या. निपुणा का जीवन और दिनचर्या जितनी व्यवस्थित थी, निवेदन की उतनी ही अस्त-व्यस्त. निपुणा पढ़ाई में जितनी मेधावी थी, सभी गतिविधियों और कलाओं में भी उतनी ही प्रतिभाशाली. दूसरी ओर निवेदन पढ़ाई का सबसे बड़ा दुश्मन था. उसकी एक ही प्रतिभा थी, मज़ेदार बातें करके लोगों को हंसाना और उनकी सहायता करना.

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निपुणा का तो वो छोटे से छोटा काम करने को आतुर रहता. स्कूल पैदल जाते थे वे. निपुणा का एक बैग तो हमेशा पुस्तकालय से ली किताबों से भरा रहता, जिसे हमेशा निवेदन ही उठाता. सालभर सारे अटपटे, समय गंवानेवाले काम वो करता, लेकिन साल के अंत में जब परीक्षाएं सिर पर आतीं और निवेदन रोना शुरू करता, तो निपुणा उसे एक घुड़की लगाकर पढ़ने बैठाती और इतना घोलकर पिला देती कि वो बस उत्तीर्ण हो जाता.

निवेदन दिन-रात अपने प्यार का इज़हार करता रहता और वो उसे ऐसे डांट देती, “मेरा-तेरा मानसिक स्तर नहीं मिलता, अभिरुचि, रहन-सहन, जीवनशैली कुछ भी तो नहीं मिलते.”

“और मैं सोचता था सोणिए कि दिल मिलना चाहिए, रोबोट बुद्धि.” निवेदन की इस बात को निपुणा हंसी में उड़ा देती.

समय तेज़ी से बढ़ रहा था. निपुणा ने करियर में तो कामयाबी हासिल कर ही ली थी, अब शुरू हुई जीवनसाथी ढूंढ़ने की शुरुआत. निपुणा को कोई लड़का अपने योग्य ही नहीं लगता. धीरे-धीरे मम्मी-पापा की दबी ज़बान पर निवेदन का नाम आने लगा.

तभी विवेक से पहचान पसंद में बदली, तो विवेक के प्रस्ताव पर पापा को उनके पापा से बात करने भेज दिया था. पापा उसके पिता की दी दहेज की एक लंबी लिस्ट के साथ लौटे थे. विवेक से बात की, तो उसने बड़ी आसानी से कंधे उचकाए, “अकेली बेटी हो, इतने समय से कमाकर मां-बाप को ही तो दे रही हो. अगर कुछ मेरे मम्मी-पापा ने मांग लिया तो…” उसी शाम बहुत धनाढ्य घर में शादी तय होने की बात गर्व के साथ सुनाते हुए विवेक का फोन आया था और वो चिढ़ उठी थी. इतना गुरूर? ऐसे इंसान को पसंद किया था उसने जीवनसाथी बनाने के लिए? क्या मम्मी ठीक कहती हैं कि उसने किताबी कीड़ा बनकर व्यावहारिक बुद्धि बढ़ाने की ओर कभी ध्यान न देकर कुछ तो ग़लत किया है? निवेदन एक अच्छा इंसान तो है…

दुख, ग़ुस्से और अपमान से सुलगी बैठी थी कि निवेदन ने उसे हंसाने की बचकानी कोशिशें शुरू कर दी थीं, “क्या हुआ सोणिए, मैं तो पहले ही कहता था कि सपनों के राजकुमार सपनों में ही होते हैं. असल ज़िंदगी में तो मेरे जैसा टेढ़ा है, पर तेरा है ही मिलते हैं. अब तू इस निवेदन के निवेदन पर विचार कर ही डाल. सुन, तू फ़िलहाल के लिए मुझसे शादी कर ले, जब कोई सपनों का राजकुमार मिल जाए, तो मुझे तलाक़ दे देना.” निपुणा ने आग्नेय नेत्रों से घूरा था उसे, “तेरे लिए तो हर चीज़ बच्चों का खेल है, यहां तक कि शादी भी.”

“सोणिए, मैं शादी तो क्या, ज़िंदगी को भी खेल समझता हूं.”

कब उसने शादी के लिए हां की, कब तैयारियां हुईं उसे याद नहीं. गीत-संगीत, रस्म और रिवाज़ से गुज़रती जब सुहाग की सेज तक पहुंची, तब जैसे होश आया था. क्यों किया उसने ये सब? और अब उसे ख़ुद को निवेदन के हाथों सौंपना है?

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भावना प्रकाश

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कहानी- पतंग 1 (Story Series- Patang 1)

दहलीज़ पर क़दम रखते ही गुलाबों की पंखुड़ियों की वर्षा के साथ जन्मदिन मुबारक का संगीत सुनाई दिया और एक सुवासित माधुर्य उसके रोम-रोम में समाता चला गया. निवेदन एकटक खड़ा होकर उसे निहार रहा था. उंगली में आकाश की पहनाई अंगूठी अभी उसके हाथों के मादक स्पर्श से मुक्त नहीं हो पाई थी और मन अभी आकाश की बांहों के घेरे से बाहर नहीं निकला था. अभी निवेदन आगे बढ़कर उसे बांहों में भर लेगा और वो… नहीं, आज तो उसे सब कुछ बताना ही है. बस, तीन घंटे ही हैं उसके पास.

निपुणा घर पहुंची, तो घर देखकर दंग रह गई. ऑफिस में गुज़ारे इतने मधुसिक्त दिन की ख़ुमारी एक पल में काफूर हो गई. वो तो भूल ही गई थी कि कोई घर पर उसका इंतज़ार कर रहा होगा, पर निवेदन कैसे भूल सकता था, जो आज तक निपुणा को ख़ुश कर सकने का कोई भी अवसर नहीं भूला.

उसने सारी सज्जा पर नज़र दौड़ाई. एकदम उसकी अभिरुचि के अनुरूप था सब कुछ. नहीं, ये निवेदन नहीं कर सकता. उसके पास तो इतना दिमाग़ भी नहीं था, जो उसकी अभिरुचि को समझ पाए… पर अब? अब तो वो सब कुछ कह सकना और भी कठिन हो गया था, जो उसे कहना था. उ़फ्! कहां लेकर जाएगी उसे उसके गुस्ताख़ दिल की गुस्ताख़ियां?

दहलीज़ पर क़दम रखते ही गुलाबों की पंखुड़ियों की वर्षा के साथ जन्मदिन मुबारक का संगीत सुनाई दिया और एक सुवासित माधुर्य उसके रोम-रोम में समाता चला गया. निवेदन एकटक खड़ा होकर उसे निहार रहा था. उंगली में आकाश की पहनाई अंगूठी अभी उसके हाथों के मादक स्पर्श से मुक्त नहीं हो पाई थी और मन अभी आकाश की बांहों के घेरे से बाहर नहीं निकला था. अभी निवेदन आगे बढ़कर उसे बांहों में भर लेगा और वो… नहीं, आज तो उसे सब कुछ बताना ही है. बस, तीन घंटे ही हैं उसके पास. बिना बताए वो बैंगलुरू नहीं जा सकती.

बैंगलुरू जाने की बात उठाई थी, तो निवेदन ने हमेशा की तरह स्वागत ही किया था उसकी उड़ान का. ‘तू घर और बच्चों की ओर से बिल्कुल निश्‍चिंत रह, छुट्टियों में तो आते-जाते रहेंगे ही.’ सारी तैयारियां निवेदन ने ही की थी. ख़ुद आकाश से फोन करके कहा था कि बैंगलुरू में वो अकेली होगी, तो उसका ध्यान रखे. ये सब सुनकर कैसे कहती कि…

मधुर संगीत और ख़ूबसूरत सज्जा के साथ कैंडल लाइट डिनर के दौरान क़रीब बीसवीं बार निपुणा के होंठ हिले और शब्दों की कायरता पर खीझकर बंद हो गए, तभी ध्यान घड़ी की ओर गया. बस, आधा घंटा और? कैब आने का समय हो ही गया. कैसे शुरू करे बात? कैसे बताए कि उसे प्यार हो गया है? बंध गया है उसका पत्थर कहलाया जानेवाला मन? वो भी इस उम्र में? एक पराए मर्द से? बचपन से कोई उसे चलता-फिरता पुस्तकालय कहता आया है, तो कोई किताबी कीड़ा. कोई पत्थर, तो कोई कंप्यूटर. हां, मगर आकाश को भी तो सब इन्हीं नामों से बुलाते हैं, तो क्या उस रोमांटिक फिल्म में ठीक ही कहा गया था कि दुनिया में कोई न कोई बंदा तो ऐसा होता है, जो बिल्कुल हमारी तरह होता है और जब वो हमारी ज़िंदगी में आता है, तो दिल के बंद दरवाज़े ख़ुद-ब-ख़ुद खुल जाते हैं. मगर उसमें तो ये भी कहा गया था कि वो हमारे लिए बना होता है, पर हम दोनों तो… पर नहीं, निवेदन के ज़िद्दी अनुरोध पर ऐसी फिल्में देखते हुए वो ऐसी बातों को बचपना कहती रही. फिर आज कैसे?

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सारे विकल्प उसके सामने रख दिए थे आकाश ने, पर किसी भी राह जाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी वो. निवेदन से तलाक़ मांगने की बात शुरू करते ही ज़ुबान पर ताला लग जाता था और बैंगलुरू का प्रोजेक्ट लेने का मतलब… आकाश का इशारा स्पष्ट था, ‘एक साल की अवधि है प्रोजेक्ट की. उसके लिए बच्चों की पढ़ाई छुड़ाकर वहां शिफ्ट होने की बात तो व्यावहारिक है नहीं. तो निवेदन यहीं रहेगा. तुम वीकेंड्स पर आती रहना. वहां हमको कंपनी की ओर से एक ही गेस्ट हाउस में कमरे मिलेंगे. पूरा समय और एकांत…’ नहीं… निपुणा के संस्कार उसे इसकी इजाज़त नहीं देते. तलाक़ मांगने के लिए तो ज़िद्दी दिल ने मना लिया था, पर धोखा देने के लिए नहीं. उसने सिहरकर एक लंबी सांस छोड़ी. काश! आकाश उसे पहले मिला होता और तब नहीं मिला था, तो अब भी न मिलता. अच्छे ख़ासे जीवन में ये कौन-सी ख़लिश पाल ली है उसने. दिमाग़ कहो या संस्कार, उसे इस रिश्ते में आगे बढ़ने नहीं देते और दिल वापस लौटने नहीं देता. वो उस पतंग की तरह हो गई थी, जो ललचाई निगाहों से आकाश ताकती हुई अपनी डोर से टूटकर उसकी ऊंचाइयों में खो जाने के लिए फड़फड़ाती लहूलुहान हुई जाती थी, मगर मांझे को तोड़ना… निवेदन जैसे चाहनेवाले पति से ये कहना कि वो किसी और को चाहने लगी है. कैसे? तभी उसका ध्यान गया कि निवेदन आज अपने स्वभाव के विपरीत ख़ामोश था. बस, उसे देखकर मुस्कुरा रहा था. निगाहें कुछ देर पर दरवाज़े की ओर चली जाती थीं. इतना ख़ामोश तो वो बचपन से आज तक कभी नहीं रहा. आख़िर बात निपुणा को ही शुरू करनी पड़ी, “किसी का इंतज़ार है क्या?”

“हां, तुम्हारे लिए एक उपहार मंगाया है. दावा है कि इस बार तुम्हें ज़रूर पसंद आएगा. तुम उसे बचकाना नहीं कह पाओगी. बहुत सोच-समझकर तैयार कराया है.”

उफ़्! इसकी ये सोच और ये समझ.

निपुणा अपनी झल्लाहट चेहरे पर आने से रोकने के लिए मेहनत कर ही रही थी कि निवेदन का मोबाइल बज उठा.

bhavana prakash

भावना प्रकाश

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कहानी- गणित का घर 3 (Story Series- Ganit Ka Ghar 3)

“दीदी, आपके घर का ख़र्च कौन चलाता है?”

“कौन का क्या अर्थ है. अरे! ये तो घर है, इसमें कौन की तो कोई जगह ही नहीं है.”

“फिर भी….!” अब की गौरव ने सवाल किया.

“अरे भई, एक आलमारी में पैसा रखा रहता है, उसी में से, जब काम पड़ता है, कोई भी निकाल लेता है.”

“फिर भी कोई हिसाब तो रखता ही होगा?”

“इसमें हिसाब कैसा और किसी से पूछने की भी क्या ज़रूरत?”

“अरे दीदी, आप और भाईसाहब दोनों कमा रहे हैं, कुछ तो….”

“सुमन, दोनों कौन? पति-पत्नी तो एक ही होते हैं. अगर अलग-अलग हुए, तो घर कहां रह जाएगा, नरक हो जाएगा. अरे यार, ये कोई ऑफिस या दुकान थोड़ी है जो गुणाभाग हो.”

एकाएक मन के विचारों को व्यावहारिक रूप देना कभी-कभी बहुत मुश्किल होता है, लेकिन अंदर के आह्लाद ने उसे तितली-सा बना दिया था. गौरव के लिए गीज़र ऑन कर दिया और उसकी मेज़ पर फैली फाइलें दुरुस्त करने लगी. बार-बार मन हुआ, जगा ले उसे और चाय बनाने को कहे, लेकिन ऐसा कर ना सकी. नहाकर आई, तो गौरव अभी भी सोया हुआ था. चेहरा देखा, तो छोटा भोला-भाला बच्चा-सा नज़र आया. वात्सल्य उमड़ पड़ा, जिससे वशीभूत हो वह उसके पास ही लेेट गई. गौरव इससे अनजान बेसुध सोता रहा. थोड़ी देर तक वह उसके चेहरे को निहारती रही, लगा लिपट जाए, लेकिन ऐसा कर नहीं सकी. थोड़ी देर में उठी और कमरा ठीक करने लगी.

गौरव जागा तो उसे सुमन की पीठ दिखाई दी, काफ़ी कुछ खुली हुई. एकटक निहारने के बाद उसने ठंडी-सी आह भरी, फिर बाथरूम में घुस गया. फ्रेश होकर आया, तो डाइनिंग टेबल पर सुमन बैठी उसका इंतज़ार कर रही थी. गौरव ने एक पल उसके चेहरे को देखा, बोला कुछ नहीं. बहुत दिनों से बंजर पड़ी संवादों की ज़मीन पर एकाएक शब्दों की हरियाली आए भी तो कैसे!

अहं से मुक्त हो बात शुरू की सुमन ने ही, “चलो, सुलेखा दीदी के घर चलते हैं, बहुत दिन हो गए मिले.”

गौरव चौंका. कई दिनों से ना तो वो दोनों किसी के घर गए थे और ना ही कोई उनके घर आया था, फिर किसी के मानने-ना मानने की वजह ही कैसी? सुमन की बढ़ती आत्मीयता से उसके अंदर भी प्रेम उमड़ पड़ा, बोला, “ठीक है.”

कॉलोनी में सुलेखा का परिवार क़रीब दो साल पहले ही आया था, जब उसके पति अभिनव की एक कंपनी में अकाउंट विभाग में नौकरी लगी थी. कुछ दिनों बाद सुलेेखा ने घर में ही प्ले स्कूल खोल लिया था. दो बच्चों की ज़िम्मेदारी को दोनों बख़ूबी निभा रहे थे. आज शाम को विवाह की पांचवीं सालगिरह थी उनकी, ऐसा सुलेखा ने उसे दो दिन पहले बताया था.

कॉलबेल बजाने पर सुलेखा ने दरवाज़ा खोला, “अरे आओ, आओ. बहुत दिनों बाद दर्शन दिए महारानीजी ने!” उसके साथ दोनों लॉबी के सोफे पर बैठ गए.

“शाम को डिनर तो याद है ना! छोटा-सा कार्यक्रम है.” शब्दों में ना कोई औपचारिकता, ना कोई तनाव.

“अभिनव भाईसाहब कहां हैं?” सुमन ने पूछा.

“शाम के प्रोग्राम के लिए कुछ सामान लेने गए हैं.”

चाय पीने के दौरान बात घूम-फिरकर आ गई घर के ख़र्च पर. “दीदी, आपके घर का ख़र्च कौन चलाता है?”

“कौन का क्या अर्थ है. अरे! ये तो घर है, इसमें कौन की तो कोई जगह ही नहीं है.”

“फिर भी….!” अब की गौरव ने सवाल किया.

“अरे भई, एक आलमारी में पैसा रखा रहता है, उसी में से, जब काम पड़ता है, कोई भी निकाल लेता है.”

“फिर भी कोई हिसाब तो रखता ही होगा?”

“इसमें हिसाब कैसा और किसी से पूछने की भी क्या ज़रूरत?”

“अरे दीदी, आप और भाईसाहब दोनों कमा रहे हैं, कुछ तो….”

“सुमन, दोनों कौन? पति-पत्नी तो एक ही होते हैं. अगर अलग-अलग हुए, तो घर कहां रह जाएगा, नरक हो जाएगा. अरे यार, ये कोई ऑफिस या दुकान थोड़ी है जो गुणाभाग हो.”

सुमन कुछ कहती कि तब तक अभिनव आ गया. “अरे भई, तुम्हें तो शाम को बुलाया था, अभी से आ धमके.” अभिनव की चुटकी पर सभी ठहाका लगा बैठे.

“बस छुट्टी थी, आप लोगों की याद आई, चले आए.” सुमन बोली.

“और आते ही घर का हिसाब-किताब मांगने लगी.” सुलेखा की बात पर सब हंस पड़े.

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“अरे नहीं, मैं तो….”

“कैसा हिसाब-किताब भई ?” अभिनव ने हंसते हुए पूछा.

“यही कि घर का ख़र्चा कौन चलाता है, कैसे मैनेज होता है, मैंने तो कह दिया कि सारा मैं ही ख़र्च करती हूं.” सुलेखा ने अभिनव को चिकोटी काटी.

“ठीक कहा, अरे डार्लिंग, जब मैं तुम्हारा हो गया, तो जो मेरा है वो सब तुम्हारा ही तो है. अपन तो तुम्हारे टुकड़ों पर ही पल रहे हैं मोहतरमाजी.”

फिर सब खिलखिला पड़े. थोड़ी देर में सुलेखा बोली, “नहीं, नहीं, मेरा कुछ नहीं, सब इन्हीं के कारण है. ॠणी और निर्भर हूं इन पर. इनके बिना तो एक क़दम नहीं चल सकती. मैं तो धन्य हूं इन्हें पाकर.”

अभिनव के फ्लैट से लौटते समय गौरव और सुमन को लगा जैसे हवा में उड़ रहे हों. सारा तनाव, सारा भारीपन और गंभीरता न जाने कहां चली गई. विला में पहुंचने पर सुमन ने अपनी आलमारी से सारे पैसे निकालकर गौरव की आलमारी में रख दिए.

“ये क्या कर रही हो?”

“मुझे नहीं रखना हिसाब-किताब. एक तो घर का काम करो और फिर पैसों और ख़र्च में माथापच्ची करो.” सुमन ने प्यारभरी उलाहना दी, “मेरी सारी ज़िम्मेदारी तुम उठाओगे, पत्नी हूं तुम्हारी, समझे!”

“अरे, हर हाइनेसजी, मैं भी तो आपके बिना एक क़दम नहीं चल सकता. नज़रें इनायत बनाए रखना मैडम.” गौरव ने उसकी बांहें पकड़कर सीने से लगा लिया. सुमन ने खुद को छुड़ाने की कोशिश की, लेकिन असफल रही. गौरव ने उसे कसकर बांहों में भींच लिया और फिर थोड़ी ही देर में दोनों बेड पर गिर पड़े.

Asalam Kohara

असलम कोहरा

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कहानी- गणित का घर 2 (Story Series- Ganit Ka Ghar 2)

बच्चों को देखते ही सुमन को गौरव से दूरी कचोटने लगी. यह क्या हो गया घर को! क्या उसे घर कहा जा सकता है? शायद नहीं, क्योंकि अब घर में ख़ूबसूरत दीवारें हैं, कालीन, पर्दे, सुविधाएं हैं, लेकिन सब बेजान-से हैं. उनका जीवन तो कहीं खो गया है. अब वह घर नहीं, सिर्फ़ और स़िर्फ मकान है और वो दोनों मालिक-मालकिन न होकर अपने ही घर में पेइंग गेस्ट हैं. आत्मनिर्भरता तो मिली, लेकिन बंधन कहीं खो गए थे, वो बंधन जो वैवाहिक जीवन का मुख्य आधार होते हैं और एक-दूसरे की निर्भरता के मोहताज होते हैं. ऐसे बंधन जिनमें बंधकर भी आज़ादी और स्वाभिमान का भास होता है. आत्मनिर्भर बनने और उससे उपजे अहं की संतुष्टि की कितनी बड़ी क़ीमत चुकानी पड़ रही थी दोनों को!

इंस्टीट्यूट के चल निकलने पर दोनों की दिनचर्या काफ़ी व्यस्त हो गई. फ्लैट पर आते तो भी वेतन और इंस्टीट्यूट की आमदनी पर चर्चा होती. आगे बढ़ने के लिए गौरव ने कई कंपनियां बदल डालीं और सुमन के इंस्टीट्यूट में भी छात्र-छात्राएं बढ़ गए. आमदनी बढ़ी, तो फ्लैट बेचकर विला ख़रीद लिया. तीन साल ऐसे ही भागदौड़ में बीत गए. लेकिन बीते वर्षों में अगर उन्हें बहुत कुछ मिला था, तो काफ़ी-कुछ खोया भी तो था. धन कमाने के गणित ने विला में सुख-सुविधाएं तो भर दीं, लेकिन बच्चे की किलकारी से घर सूना था.

व्यस्तता और बढ़ती आत्मनिर्भरता ने दोनों के बीच रिश्तों को ठंडा करना शुरू कर ही दिया. बातचीत के लिए समय के अभाव के साथ ही एक-दूसरे पर निर्भर रहने से जुड़ी ज़रूरतों में भी कमी आती जा रही थी. आए दिन छोटी-छोटी बात पर दोनों के बीच पहले बहस, फिर आरोप-प्रत्यारोप और बाद में बोलचाल बंद होने लगी…

इतवार के दिन गौरव ने मूवी देखनी चाही, मन हुआ कि सुमन से पूछ ले, लेकिन हिम्मत नहीं पड़ी. अकेले ही मूवी देखने चला गया. बात खुली, तो दूसरे दिन सुमन ने कोहराम मचा दिया, “तुम समझते हो, मैं अकेले कुछ नहीं कर सकती? मैं तुम्हारी मोहताज नहीं हूं.”

“मैं ही कौन-सा तुम्हारे सहारे जी रहा हूं. ज़्यादातर काम तो ख़ुद ही करता हूं. तुमसे कोई उम्मीद भी नहीं रखता.” गौरव भी झल्ला उठा.

“उम्मीद रखना भी मत, मैंने तो पहले ही अपने दम पर जीने का मन बना लिया है. ख़ुद कमाती हूं और घर-बाहर के सारे अपने काम ख़ुद ही करती हूं, समझे… धौंस किसी और को देना.”

“घर का ख़र्चा कौन चलाता है?”

“आ गए अपने पे? मैं तो जानती ही थी कि तुम्हारे मन में क्या पक रहा है.” ग़ुस्से से बोली सुमन.

सुमन के कर्कश शब्दों ने उसे अंदर तक चीर दिया, “हर बात का ग़लत अर्थ निकालती हो. कुछ तो समझदारी हो…!”

“मैं ग़लत हूं, तो क्यों साथ रख रहे हो इस बोझ को, अलग करो.”

“अगर तुम्हारी यही मर्ज़ी है, तो अपने-अपने ख़र्चे अलग कर लो, मुझे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता.” गौरव को भी क्रोध आ ही गया, “शायद इसी से घर में शांति आ जाए.”

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दो दिन बोलचाल बंद रही. इसी बीच गौरव के ऑफिस का दोस्त निखिल आ गया. बात छुपनी तो थी नहीं. कुछ देर औपचारिकता के बाद तू-तू, मैं-मैं शुरू होनी ही थी, हो गई. बात बढ़ी तो निखिल ने समझौता कराने की कोशिश की, लेकिन बातचीत ने बहस का रूप ले लिया. बहुत समझाने पर समझौता तो हुआ, लेकिन ख़र्चे और काम के बंटवारे के बाद ही तय हुआ कि घरेलू सामान की पूरी ख़रीददारी गौरव करेगा, जबकि दूध, गैस, नौकरानी और घर का मेंटेनेंस सुमन के हिस्से में आया.

बंटवारा यहीं तक रहता तो ठीक था, लेकिन संबंधों का यंत्रीकरण इतना बढ़ गया कि धीरे-धीरे प्रेम और केयरिंग में भी शिथिलता आती गई. महीने के पहले सप्ताह में गौरव महीनेभर का सामान लाकर रख देता. बाकी चीज़ें. शर्त के मुताबिक़ सुमन जुटाती. अब जब घर में गणित घुस गया, तो हर बात उसी की नज़र से देखी जाने लगी. ऐसे में जीवन के कई अवसर कहीं खोते चले गए. मूवी देखना, कहीं घूमने जाना, बाहर खाना खाना और यहां तक कि विवाह समारोहों में शामिल होने पर भी ख़र्चे को लेेकर बहस होने लगी. बाद के दिनों में तेज़ बहस के तनाव से बचने के लिए दोनों चुप्पी साधने लगे. मन और उचाट हुआ, तो पहले एक बेड पर अलग-अलग हुए, फिर अलग-अलग बेड और बाद में कमरे भी अलग हो गए.

…सुमन बीते दिनों के ताने-बाने में डूबी थी, तभी कॉलोनी का एक परिवार सामने की बेंच पर बैठ गया.

पति-पत्नी बैठे, तो बेटा-बेटी उनसे छिटक कर झूले पर चढ़ गए. बच्चों को देखते ही सुमन को गौरव से दूरी कचोटने लगी. यह क्या हो गया घर को! क्या उसे घर कहा जा सकता है? शायद नहीं, क्योंकि अब घर में ख़ूबसूरत दीवारें हैं, कालीन, पर्दे, सुविधाएं हैं, लेकिन सब बेजान-से हैं. उनका जीवन तो कहीं खो गया है. अब वह घर नहीं, सिर्फ़ और स़िर्फ मकान है और वो दोनों मालिक-मालकिन न होकर अपने ही घर में पेइंग गेस्ट हैं. आत्मनिर्भरता तो मिली, लेकिन बंधन कहीं खो गए थे, वो बंधन जो वैवाहिक जीवन का मुख्य आधार होते हैं और एक-दूसरे की निर्भरता के मोहताज होते हैं. ऐसे बंधन जिनमें बंधकर भी आज़ादी और स्वाभिमान का भास होता है. आत्मनिर्भर बनने और उससे उपजे अहं की संतुष्टि की कितनी बड़ी क़ीमत चुकानी पड़ रही थी दोनों को! न प्रेम, न सहानुभूति, न परवाह और न ही संबंध. क्या सोचा था और क्या हो गया ये? तो क्या एक-दूसरे पर निर्भर बने रहना ही ठीक था? प्रश्‍न कौंधा मन में.

सुमन ने एक बार फिर सामने बैठे परिवार को देखा, तो मन ईर्ष्या और खिन्नता की बजाय प्रफुल्लता से भर गया. उस परिवार में उसे अपना हंसता-खेलता परिवार नज़र आने लगा. ख़ुद-ब-ख़ुद क़दम घर की ओर चल दिए. घर में आते ही लॉबी से कमरे में झांका, गौरव अभी भी बेसुध सोया हुआ था. अचानक उसके मन में गौरव के लिए प्रेम उमड़ पड़ा. उसने उसके पास जाना चाहा, लेकिन जा ना सकी.

Asalam Kohara

असलम कोहरा

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