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कहानी- सीक्रेट सेविंग 4 (Story Series- Secret Saving 4)

“नहीं है, तो अब याद कर ले और समझ ले. ऐसी सीक्रेट सेविंग औरत को कभी कोई सिक्योरिटी नहीं दे सकती, जिसे घर में रखो, तो नकदी-गहने चोरी हो सकते हैं और बैंक का भी क्या भरोसा. बैंक तो आजकल ख़ुद दिवालिया हो रहे हैं. ज़मीन-जायदाद हो, तो नाते-रिश्तेदार हड़प सकते हैं, तेरी बहन की तरह. स़िर्फ इंसान का सीखा हुआ ही उसकी सिक्योरिटी है, वही उसकी रगों में दौड़ता है. उसे कोई नहीं छू सकता.’’

“तू एक-दो दिन चिल कर, अपना मूड ठीक कर, फिर कोई रास्ता निकालते हैं.”

“चिल कर… तुझे ये सब मज़ाक लग रहा है?” नूपुर आवेश में बोली, तो सुगंधा संजीदा हो उठी.

“नहीं नूपुर, मज़ाक नहीं लग रहा है, मगर तुझे इस परिस्थिति को मज़ाक बनाना है. इसे मज़ाक-मज़ाक में ही पास करना है. देखना, धीरे-धीरे सब ठीक हो जाएगा. मैंने ये समय देखा है, इसीलिए कह रही हूं.”

एक-दो दिन यूं ही गुज़र गए. सुगंधा गणित और संस्कृत की क्लासेज़ लेती थी. उसका अपने क्षेत्र में काफ़ी नाम था. वह दिनभर व्यस्त रहती, बेटी एमबीए ऐंट्रेंस एग्ज़ाम की तैयारी कर रही थी. नूपुर सारा दिन खाली बैठे-बैठे गड़े मुर्दे उखाड़ती रहती. “ऐसा कब तक चलेगा सुगंधा, अपने भविष्य के बारे में कुछ तो सोचना ही पड़ेगा.” उकताई नूपुर बोली.

“तो उसके लिए पहले अपने गुज़रे जीवन से बाहर निकल नूपुर. जो बीत गया, उसे गुज़र जाने दे.”

“ठीक है. पास्ट नहीं सोचूंगी, पर फ्यूचर भी तो कुछ नज़र नहीं आ रहा. मैं तो उन्हीं पैसों के सहारे भारत आई थी.”

“यही तो तेरी सबसे बड़ी ग़लती थी डियर, तूने अपने से ज़्यादा उस धन पर भरोसा किया. तुझे याद है नूपुर स्कूल में संस्कृत की किताब में एक श्‍लोक हुआ करता था, जिसका मतलब था विद्या और गुण इंसान का वो धन है, जिसे न चोर चुरा सकता है, न राजा छीन सकता है, न भाई-बंधु बांट सकते हैं, जो ख़र्च करने पर भी कम नहीं होता.”

“होगा, मुझे याद नहीं.” नूपुर अनमनी-सी बोली.

“नहीं है, तो अब याद कर ले और समझ ले. ऐसी सीक्रेट सेविंग औरत को कभी कोई सिक्योरिटी नहीं दे सकती, जिसे घर में रखो, तो नकदी-गहने चोरी हो सकते हैं और बैंक का भी क्या भरोसा. बैंक तो आजकल ख़ुद दिवालिया हो रहे हैं. ज़मीन-जायदाद हो, तो नाते-रिश्तेदार हड़प सकते हैं, तेरी बहन की तरह. स़िर्फ इंसान का सीखा हुआ ही उसकी सिक्योरिटी है, वही उसकी रगों में दौड़ता है. उसे कोई नहीं छू सकता. मुझे ही देख, क्या था मेरे पास जब मेरे पति गुज़रे? कुछ नहीं, बस मेरा गणित अच्छा था और संस्कृत पढ़ने का शौक था. आज इन्हीं दो चीज़ों के सहारे अपना घर अच्छे-से चला रही हूं.”

“…मगर मेरे पास तो ऐसा कुछ नहीं.”

“क्यों नहीं है, मुझे याद है तू कितना अच्छा डांस किया करती थी. तू कत्थक भी तो सीखती थी.”

“मैंने तो सालों से डांस नहीं किया. शादी के बाद अमेरिका जो गई, तो वहां सब शौक बंद हो गए.”

“वहां जाकर सब गुण गंवा दिए या कुछ सीखा भी?” सुगंधा लगभग डांटते हुए बोली.

“कुछ नहीं सीखा यार. सालों यूं ही निकल गए. दिनेश के साथ सज-धजकर शोपीस जैसे घूमते हुए. उसके क्लाइंट को अटेंड करते. बनावटी हंसी हंसते. अंग्रेज़ी में अदब से खिटपिट करते…” स्वर निराश था.

“अरे वाह, इतना कुछ सीखकर आई है, फिर भी कहती है, कुछ नहीं सीखा.”

“क्या पागलोंवाली बातें कर रही है?”

“पागलोंवाली नहीं, बल्कि बड़े काम की बात कर रही हूं. देहरादून जैसे उभरते शहर में ऐसी क्लासेज़ की कितनी वैल्यू है, जो यहां के युवाओं को कम्यूनिकेशन स्किल सिखा सके. कस्टमर केयर व पर्सनैलिटी ग्रूमिंग के गुर बता सके. तू यह सिखाने लग जाए, तो हज़ारों कमा सकती है.”

“और कौन आएगा सीखने?” नूपुर ने पूछा.

“तेरी पहली शिष्या तो निधि ही बनेगी. पता है कल रात ही कह रही थी कि मौसी की क्या पर्सनैलिटी है और कितने अच्छे ऐक्सेंट और कॉन्फिडेंस के साथ इंग्लिश बोलती हैं. उन्हें कहो ना ज़रा मुझे भी सिखाएं. मेरे इंटरव्यू और ग्रुप डिस्कशन राउंड में काम आएगा.”

तभी निधि वहां फुदकती आई, “सही बात है मौसी, मेरे तो कितने फ्रेंड और क्लासमेट आ जाएंगे आपसे क्लास लेने. हम लोग बस इसी चीज़ में मात खा रहे हैं, मेट्रो के बच्चों से.”

“पर क्लास कहां लूंगी?”

“यहीं जहां मैं क्लासेज़ लेती हूं. हम दोनों थोड़ा टाइमिंग एडजेस्ट कर लेंगे और जब तेरा काम बढ़ेगा, तो कोई अलग जगह रेंट पर ले सकते हैं.”

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“पर मैं तुझ पर यूं बोझ नहीं बनना चाहती.”

“अरे बाबा, बोझ मत बनना. जब कमाने लगेगी, तो मेरे यहां पेइंग गेस्ट की तरह रह लेना, मगर तब तक मेरी सहेली बनकर रह.”

नूपुर की आंखें भर आईं, “यार मैं तेरा ये एहसान…”

“आज ही उतार सकती है, बल्कि अभी.” सुगंधा ने उसकी बात बीच में ही काट दी. “तुझे मेरे साथ पल्टन बाज़ार चलना होगा चाट खाने. ये पिज़्ज़ा-बर्गर जनरेशनवाली मेरी बेटी कभी मेरे साथ चाट खाने नहीं जाती. बिल्कुल अकेली पड़ गई हूं. तू बस मेरे साथ चाट खाने चला कर. इसी में धीरे-धीरे मेरा एहसान बैलेंस हो जाएगा.” सुगंधा की बात सुन नूपुर खिलखिलाकर हंस पड़ी. लगा जैसे बड़े दिनों बाद वह दिल से हंसी थी. उस दिन के बाद से उसकी वह हंसी जारी थी.

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    दीप्ति मित्तल

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कहानी- सीक्रेट सेविंग 3 (Story Series- Secret Saving 3)

नूपुर ने उससे अपने दिल के सारे राज़ शेयर किए हुए थे. अपनी सीक्रेट सेविंग के बारे में भी बताया हुआ था. सुगंधा ने उत्साहित होकर कहा था, “तू घबरा मत, तेरे पास इतना पैसा है और दिल्ली जैसी जगह में प्रॉपर्टी भी है, तो कुछ-न-कुछ नई शुरुआत हो ही जाएगी. तू यहां मेरे पास आ जा, फिर देखते हैं, क्या कर सकते हैं.” वह एक अंतिम आशा बची थी, मगर नूपुर का तो सारी दुनिया पर से विश्‍वास ही उठ चुका था. क्या पता वह भी मेरी सेविंग का सुनकर ही मुझे बुला रही हो. जब सगी बहन ने रंग बदल लिए, फिर पुरानी सहेली क्या चीज़ है…

“हम तो हालात के मारे थे दी, चोरी तो आपने की है इतने साल. क्या जीजाजी को पता है, आप इतने सालों से उनकी जेब काटकर यहां पैसे भेज रही थीं और जहां तक घर की बात है, आप अगर कोर्ट चली गईं, तो भी यह घर नहीं ले पाएंगी, क्योंकि हम यहां सालों से रहकर इसका टैक्स भर रहे हैं.”

“बस करो!” नुपुर ने कानों पर हाथ रख लिया और कुछ सुनने या कहने की शक्ति नहीं बची थी उसमें. उस घर की दीवारें, आंगन अब उसे तीर की तरह चुभ रहे थे, उस हवा में ली जा रही सांसें ज़हरीली लग रही थीं. उसने तुरंत सामान बांधा और रोते हुए अपने मायके की चौखट लांघ गई. हर बार रुकने का अनुग्रह करनेवाली बहन ने इस बार उसे पलटकर भी नहीं देखा.

नूपुर ने एक दिन दिल्ली के एक होटल में गुज़ारा. आगे क्या करेगी, कहां जाएगी कुछ समझ नहीं आ रहा था. उसने हफ़्तेभर बाद की दून शताब्दी की टिकट कराई हुई थी. देहरादून उसकी एक पुरानी कॉलेज फ्रेंड सुगंधा रहती थी. अमेरिका से उससे फोन पर बातें होती रहती थीं. सोचा था कुछ दिन बहन के पास रुक आगे की योजना बनाकर, सुगंधा से पर्सनली जाकर मिलेगी. उसके पति एक रोड एक्सीडेंट में काफ़ी पहले ही गुज़र चुके थे. वह सालों से अपनी बेटी और ख़ुद को अकेले ही संभाल रही थी. वह हर बार नूपुर को अपने पास आने के लिए कहती, मगर नंदिनी उसे छोड़ती ही नहीं थी.

नूपुर ने उससे अपने दिल के सारे राज़ शेयर किए हुए थे. अपनी सीक्रेट सेविंग के बारे में भी बताया हुआ था. सुगंधा ने उत्साहित होकर कहा था, “तू घबरा मत, तेरे पास इतना पैसा है और दिल्ली जैसी जगह में प्रॉपर्टी भी है, तो कुछ-न-कुछ नई शुरुआत हो ही जाएगी. तू यहां मेरे पास आ जा, फिर देखते हैं, क्या कर सकते हैं.” वह एक अंतिम आशा बची थी, मगर नूपुर का तो सारी दुनिया पर से विश्‍वास ही उठ चुका था. क्या पता वह भी मेरी सेविंग का सुनकर ही मुझे बुला रही हो. जब सगी बहन ने रंग बदल लिए, फिर पुरानी सहेली क्या चीज़ है… चलो, उसके रंग भी देख लूं. ताबूत में ये आख़िरी कील भी सही और उसने अगले दिन की तत्काल टिकट करा ली.

“एक्सक्यूज़ मी, ज़रा साइड देंगी प्लीज़.” एक मीठे अनुग्रह से विचारों में खोई नूपुर झटके से वापस लौटी. सामने बैठी लड़कियां ऊपर से अपना सामान उतारने की कोशिश कर रही थीं.

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ट्रेन गंतव्य पर पहुंच चुकी थी. नूपुर ने उतरकर ऑटो किया और सुगंधा के घर की ओर चल पड़ी. सुगंधा का एक मध्यमवर्गीय कॉलोनी में छोटा-सा घर था. घर के बाहर गणित व संस्कृत क्लासेज़ का बोर्ड लगा था. उसने अपनी सहेली का गले मिलकर स्वागत किया और अपनी बेटी निधि से उसका परिचय मौसी के रूप में कराया.

थोड़ी-बहुत बातचीत के बाद सुगंधा दोनों के लिए चाय ले आई. “बड़ी बुझी-बुझी-सी लग रही है. सब ख़ैरियत? तेरा अचानक प्रोग्राम प्री प्लान कैसे हुआ?”

रास्तेभर बमुश्किल बांधकर रखा आंसुओं का सैलाब यकायक बह चला. नूपुर ने सारी आपबीती सुना दी. सुगंधा  सब शांति से सुन रही थी. सैलाब थमा, तो सुगंधा ने पूछा, “तो अब आगे क्या करने का सोचा है?”

“कुछ नहीं सोचा.” नूपुर अभी भी सुबक रही थी.

“अच्छी बात है.” सुगंधा ने कहा, तो नूपुर ने उसे घूरा.

“इसमें कौन-सी अच्छी बात है?”

“यही कि तूने कुछ नहीं सोचा, इसलिए कुछ नए सिरे से सोचने और करने का पूरा-पूरा स्कोप है.” सुगंधा चहकते हुए बोली.

“मेरी हालत ख़राब है और तू ख़ुश हो रही है?”

“ख़ुश तो हूं और ऊपरवाले का शुक्र भी मना रही हूं कि तू इतने बड़े झटके के बाद भी ज़िंदा बच गई. तुझे कुछ हार्टअटैक वगैरह नहीं आया.” नूपुर ने उसे पुनः खा जानेवाली नज़रों से देखा. “तुझे पता है जब यहां नोटबंदी हुई थी, तो कितनी औरतों की सीक्रेट सेविंग पर रातोंरात पानी फिर गया था. बैंक में रखते नहीं बनता था, पति को बता नहीं सकते थे. ये सदमा कुछ के लिए तो जानलेवा तक साबित हुआ था. तू तो फिर भी भाग्यशाली निकली. सब एक साथ उड़ जाने के बाद भी सही सलामत है.” नूपुर को सुगंधा पर इतना ग़ुस्सा आ रहा था कि मन किया कुछ उठाकर उस पर फेंक मारे, मगर वह उसी के घर शरणार्थी थी, सो कुछ नहीं कह सकी.

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    दीप्ति मित्तल

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कहानी- सीक्रेट सेविंग 2 (Story Series- Secret Saving 2)

“नंदिनी, तू मेरी फ़िक्र मत कर, बहुत रह ली दबकर, झुककर… पर अब नहीं. वैसे भी मैं सड़क पर तो हूं नहीं, तेरे पास मेरे लाखों रुपये जमा हैं और फिर ये घर भी तो है, इसमें भी तो मेरा आधा हिस्सा बनता ही है. तू चिंता मत कर, मैं अपनी देखरेख कर लूंगी.” नूपुर ने चिंतित नंदिनी को आश्‍वस्त करना चाहा, मगर घर और पैसों की बात आते ही उसकी भाव-भंगिमाएं तेज़ी से बदलने लगीं, “वो तो है दी, मगर आप ऐसे कैसे अपना बसा-बसाया घर छोड़ सकती हैं.’’

 कभी इतना आत्मविश्‍वास नहीं बन पाया था कि सब छोड़-छाड़कर बेटे को ले भारत आ जाए और अपना जीवन नए सिरे से शुरू करे, मगर फिर भी दिल में एक संकल्प कर रखा था, जिस दिन बेटा पढ़-लिखकर आत्मनिर्भर हो गया, उस दिन इस पति नाम की बेड़ी को उतार भारत लौट जाऊंगी.

चोरी-चुपके इस योजना की तैयारी भी कर रही थी वो. हर महीने घर से कुछ-न-कुछ पैसे निकालकर नंदिनी के पास भेजा करती थी. 18 साल हो गए थे उसे ऐसा करते हुए. अब तक लाखों जमा कर चुकी थी. जब उसका 19 साल का बेटा किसी अमेरिकन लड़की के साथ लिव-इन में रहने चला गया, तो नूपुर के पास अब अमेरिका रुके रहने का कोई औचित्य न बचा था. अतः वह अपनी एकमात्र आत्मीय, अपनी बहन नंदिनी के पास आ गई.

हर बार की तरह इस बार भी, नूपुर की ख़ूब आवभगत हुई, लेकिन केवल तब तक, जब तक कि उसने नंदिनी को अपने फैसले के बारे में नहीं बताया. “क्या कह रही हो दी, हमेशा के लिए घर छोड़ आई हो, इतना बड़ा कदम क्यों उठा लिया? वो भी इस उम्र में?” नूपुर ने सारी आपबीती नंदिनी को सुना दी, मगर वह फिर भी सहमत नहीं थी. “जीजाजी के साथ जहां इतनी उम्र बीत गई, बाकी की भी बीत जाएगी. वहां रहते हुए आपका मान-सम्मान बना रहेगा दी, यहां भारत में अकेले कैसे रहोगी, क्या करोगी? जानती हो ना यहां के समाज को. आपका जीना मुश्किल हो जाएगा.” नंदिनी नूपुर को वापस भेजने की जी तोड़ कोशिश कर रही थी, मगर इस बार नूपुर हालात से समझौता करने को बिल्कुल तैयार नहीं थी.

“नंदिनी, तू मेरी फ़िक्र मत कर, बहुत रह ली दबकर, झुककर… पर अब नहीं. वैसे भी मैं सड़क पर तो हूं नहीं, तेरे पास मेरे लाखों रुपये जमा हैं और फिर ये घर भी तो है, इसमें भी तो मेरा आधा हिस्सा बनता ही है. तू चिंता मत कर, मैं अपनी देखरेख कर लूंगी.” नूपुर ने चिंतित नंदिनी को आश्‍वस्त करना चाहा, मगर घर और पैसों की बात आते ही उसकी भाव-भंगिमाएं तेज़ी से बदलने लगीं, “वो तो है दी, मगर आप ऐसे कैसे अपना बसा-बसाया घर छोड़ सकती हैं. आप भारतीय नारी हैं. यह तो सोचिए आपके इस कदम से मम्मी-पापा की आत्मा को कितना दुख पहुंचेगा. पूरी रिश्तेदारी में आपकी थू-थू होगी.” नंदिनी हितैषी बन अभी भी उसकी बुद्धि फेरने की पुरज़ोर कोशिश कर रही थी, मगर उसके चेहरे की घबराहट और स्वर की लड़खड़ाहट नूपुर को कुछ और ही संदेश दे रहे थे.

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“जो चले गए उनका सोच रही है और जो तेरे सामने ज़िंदा बैठी है, उसकी कोई फ़िक्र नहीं. तू मुझे मत समझा, मैं अब वापस नहीं जानेवाली. तू बस ये बता तेरे पास मेरा कुल कितना पैसा जमा है? मेरे ख़्याल से 20-25 लाख तो होगा ही. मैं उससे अपने गुज़ारे लायक कुछ-न-कुछ कर लूंगी.”

नंदिनी का चेहरा सूखकर स़फेद पड़ गया. वह हकलाते हुए बोली, “क्या बताऊं दी, नोटबंदी के समय इनका पूरा बिज़नेस चौपट हो गया था. लेनदारों ने जेल भेजने की नौबत ला दी थी, तब… ”

“तब क्या?” नूपुर सकते में आ गई.

“तब उन्हीं पैसों के सहारे ये बच पाए…” कहते हुए नंदिनी की चोर आंखें झुक गईं.

“क्या कह रही है नंदिनी. मुझसे तो पूछा होता. तुझे क्या पता, मैंने कैसे एक-एक पाई जोड़कर तेरे पास जमा की थी. उसी के भरोसे तो मैं यहां… तूने ये मेरे साथ अच्छा नहीं किया.”

“तो क्या करती दी. पैसा होते हुए भी उन्हें जेल जाने देती? ऐसे समय पर एक पत्नी पर क्या गुज़रती है, आप नहीं समझोगी. आप तो ख़ुद अपने अच्छे-भले पति को बेमतलब छोड़ आई हो.” नंदिनी के सुर और तेवर दोनों बदल चुके थे.

“ओह… यही बाक़ी रह गया था सुनने को. पहले पति, फिर बेटा और अब तू भी…” नूपुर को लगा जैसे उसके हिस्से के आसमान के साथ-साथ पैरों तले ज़मीन भी यकायक छीन ली गई हो. उफ़्फ़! किस पर भरोसा करे इंसान. हर जगह बस धोखा. क्या यही नियति है उसकी. वह वहां से उठ खड़ी हुई.

“मम्मी-पापा का ये पुश्तैनी घर तो है ना… इस पर मेरा भी हक़ है.” इस बार नूपुर भी मुखर हो उठी.

“घर की बात मत करो दी. हम यहां सालों से रह रहे हैं. इसका मेंटेनेंस करवा रहे हैं. आप तो सब कुछ भूलकर अमेरिका में मौज कर रही थीं. मम्मी-पापा की इस धरोहर को हम ही संभाल रहे थे.” नंदिनी की कोमल आंखें अब अंगारे बरसाने लगी थीं.

“संभाल रहे थे या कब्ज़ा कर रहे थे? एक तो चोरी, ऊपर से सीनाजोरी.”

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  दीप्ति मित्तल

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कहानी- सीक्रेट सेविंग 1 (Story Series- Secret Saving 1)

दोनों आपस में चुहलबाज़ियां कर रही थीं. उन्होंने सामने बैठी नूपुर को देखा, तो नूपुर ने एक हल्की-सी स्माइल देते हुए ‘हैलो’ बोला. उन्होंने भी पलटकर स्माइल दी. “आप दोनों सहेलियां हैं?” नूपुर ने पूछा.

“हां, आप यह भी कह सकती हैं… दरअसल, हम दोनों बहनें हैं और साथ ही हम बहुत अच्छे दोस्त भी हैं.” उनके जवाब से नूपुर के चेहरे पर फीकी-सी मुस्कुराहट दौड़ गई. इस मुस्कुराहट के पीछे दिल चीरनेवाला दर्द भी था, जिसे उसने बड़ी मुश्किल से भीतर दबा रखा था.

जैसे ही नूपुर का ऑटो रेलवे स्टेशन पर आकर रुका, कुलियों की भीड़ ने जैसे धावा बोल दिया. इतना शोर सुनकर उसके हाथ-पैर फूल गए. वह ऑटो से संभलकर उतरी और अपना लगेज पकड़ सधे कदमों से चलने लगी. खचाखच भरे रेलवे स्टेशन को देख उसकी वापस हालत पतली हो गई. इतनी भीड़ में चलने, संभलने की आदत ही छूट गई थी उसकी. बरसों से अमेरिका में रह रही थी. वहां इतनी भीड़, इतनी मारामारी नहीं होती. तीन साल बाद भारत आई थी और इस बार तो उसे सड़क पर चलते हुए भी डर लग रहा था. ख़ैर, जैसे-तैसे उसने नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से दून शताब्दी ट्रेन पकड़ी और अपनी सीट पर बैठ राहत की सांस ली.

उस कोच में उसकी सेंटर प्लेस पर सीट थी. सामनेवाली सीट पर दो युवा लड़कियां बैठी थीं. देखने में कॉलेज स्टूडेंट लग रही थीं. बैठते ही दोनों ने सेल्फी ली, “चल इसे पापा को व्हाट्सऐप कर दे, उन्हें चैन पड़ जाएगा कि हम ठीक से बैठ गए.” एक ने दूसरी से कहा.

दोनों आपस में चुहलबाज़ियां कर रही थीं. उन्होंने सामने बैठी नूपुर को देखा, तो नूपुर ने एक हल्की-सी स्माइल देते हुए ‘हैलो’ बोला. उन्होंने भी पलटकर स्माइल दी. “आप दोनों सहेलियां हैं?” नूपुर ने पूछा.

“हां, आप यह भी कह सकती हैं… दरअसल, हम दोनों बहनें हैं और साथ ही हम बहुत अच्छे दोस्त भी हैं.” उनके जवाब से नूपुर के चेहरे पर फीकी-सी मुस्कुराहट दौड़ गई. इस मुस्कुराहट के पीछे दिल चीरनेवाला दर्द भी था, जिसे उसने बड़ी मुश्किल से भीतर दबा रखा था. वह ज़रा भी ज़ेहन में आता, तो आंखों से नमकीन पानी टपकने लगता, इसलिए वह अपना मन कहीं और लगाने की भरपूर कोशिश कर रही थी, मगर सामने बैठी इन दो बहनों ने उसके ताज़ा ज़ख़्मों पर जैसे नमक छिड़क दिया था. अपनी छोटी बहन नंदिनी के बारे में भी वह यही सोचा करती थी. हम बहनों से बढ़कर सच्चे दोस्त हैं… एक-दूसरे के सुख-दुख के साथी. एक-दूसरे के विश्‍वसनीय हमराज़, मगर इस बार उसका यह अटूट विश्‍वास बुरी तरह चकनाचूर हुआ था.

यह भी पढ़ेघर को मकां बनाते चले गए… रिश्ते छूटते चले गए… (Home And Family- How To Move From Conflict To Harmony)

एक समय था जब वे दोनों बहनें भी ऐसी ही घुली-मिली खिलखिलाती रहतीं. हर व़क्त हंसी ठट्टा, कभी इसकी खिंचाई, कभी उसका मज़ाक… सारा दिन यूं ही हंसते-खेलते निकल जाता. फिर उनके पिता को एक गंभीर बीमारी ने घेर लिया, जिसके चलते दोनों बहनों के आनन-फानन में मैट्रीमोनियल से देख रिश्ते पक्के कर दिए गए. नूपुर को एक एनआरआई से शादी कराकर अमेरिका भेज दिया गया और नंदिनी दिल्ली के एक बिज़नेसमैन से ब्याह दी गई. उनकी शादी के तीन साल के

अंदर ही पहले पिता और फिर मां, दोनों का देहांत हो गया. अब वे दोनों बहनें ही एक-दूसरे का मायका थीं. नंदिनी तो कभी अमेरिका नहीं जा पाई, मगर नूपुर साल-दो साल में एक चक्कर लगा ही लेती.

मां के गुज़र जाने के बाद नंदिनी अपने पति के साथ मायके के पुश्तैनी मकान में शिफ्ट हो गई. नूपुर को कहा इस घर में रहने से ऐसा लगता है जैसे मम्मी-पापा साथ ही हैं. नूपुर भी ख़ुश थी कि चलो, जब वह भारत आएगी, तो उसे भी मायके की चौखट खुली मिलेगी. भारत आकर वह उस घर की दीवारों को चूमती. पुराने परदों, मां की रखी पुरानी साड़ियों से लिपट जाती और अपने अतीत को जीने की भरपूर कोशिश करती. नंदिनी के पति थोड़े सख़्त स्वभाव के थे और ज़्यादातर अपने बिज़नेस में व्यस्त रहते. नूपुर वहां आती, तो दोनों बहनें खूब घूमती-फिरतीं, शॉपिंग करतीं और जी भरकर गप्पे लड़ातीं. वहां आकर जैसे नूपुर के बुझे दिल में भी थोड़ी उमंग जाग जाती.

नूपुर के पति दिनेश का अमेरिका में इंपोर्ट-एक्सपोर्ट का बिज़नेस था. वह एक प्रैक्टिकल और महत्वाकांक्षी इंसान था. भावनात्मक जुड़ाव क्या होता है, वह जानता ही नहीं था. उसने नूपुर का हमेशा एक शोपीस की तरह अपने व्यापारिक फ़ायदों के लिए ही प्रयोग किया. उसके क्लाइंट को कंपनी देना, उन्हें लंच-डिनर पर ले जाना, अपनी अदाओं और लुभावनी बातों से बहला-फुसलाकर रखना… कभी-कभी क्लाइंट अपनी हद से आगे बढ़ने की कोशिश भी कर जाते, मगर पति से शिकायत करने पर उसे अच्छी-ख़ासी डांट ही मिलती, “कब तक स्मॉल टाउन गर्ल बनी रहोगी? थोड़ी-सी परिपक्वता दिखाओ और प्रैक्टिकल बनने की कोशिश करो. ये सब बाज़ारी हथकंडे हैं. इन्हें इतना गंभीरता से लेने की ज़रूरत नहीं. इसे बस पार्ट ऑफ जॉब समझकर अपना लो.”

दरअसल, दिनेश ने कभी उनकी शादी को भी गंभीरता से लिया ही नहीं था. तभी तो उसने अपनी शादी के बाहर कितने रिश्ते बनाए और तोड़े थे, उसे ख़ुद भी याद नहीं था. सब कुछ तो सहती आ रही है अपने इकलौते बेटे की ख़ातिर.

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कहानी- पतन 3 (Story Series- Patan 3)

hindi short story

रात है. सन्नाटा है. पीड़ा, भय, लज्जा, ग्लानि है.  लेकिन मनोरथ की आंखों में नींद नहीं है. पिटता हुआ कप्तान बेबस, बल्कि घिनौना लग रहा था. प्यारेलाल निकम्मे की तरह भाग आया. इन जैसा बनने की बेवकूफ़ी में मैं क्या से क्या बन गया? कौन मानेगा मैं भले घर का ख़ूब पढ़नेवाला भला लड़का था? परीक्षा नज़दीक है, मेरा कोई पेपर तैयार नहीं है.

अम्मा ने अलग समझाया, “आलीशान रेस्टोरेंट बनेगा मनोरथ. काका मिष्ठान में देखी मिठाइयां बनती रहेंगी. रेस्टोरेंट में पिज़्ज़ा, चाउमीन… क्या-क्या तो चला

है आजकल.”

मनोरथ ऊब गया, “मैं हलवाई नहीं बनूंगा.” बुलाकी हंसी, “छोटे थे तब कहते थे, बड़ा होकर दुकान में बैठूंगा. ख़ूब इमरती खाऊंगा.”

“नो वे जी. इस थियेटरलेस स्मॉल टाउन में कुछ नहीं रखा. लोग एक मूवी देखने को तरस जाते हैं. कस्बे से निकलो और देखो लड़के कितना एंबीशियस हो रहे हैं. ओवरसीज़ जॉब में फ्यूचर देख रहे हैं.”

अम्मा ओवरसीज़ जॉब का अर्थ नहीं समझीं, “तुम एक ही बेटे हो.”

“इकलौता होने की सज़ा मिलेगी? अम्मा, नर्वस मत करो. मेरा दोस्त चंद्रमणि सऊदी अरब चला गया. उसके पैरेंट्स ने तो नहीं रोका. लाखों कमा रहा है.”

“बेकार बातें प्यारे और कप्तान ने सिखाईं?”

“जीना सिखाया है, वरना पप्पू बना रहता.”

मनोरथ ने 20 दिन बोरियत में बिताए. प्यारेलाल और कप्तान सिंह के साथ फ्लैट में कदम रखा, तो लगा दिनों बाद प्राण बहुरे हैं. इस बीच तीन मूवीज़ रिलीज़ हो गई थीं. रिलीज़िंग डेट पर मूवी न देखें, तो तीनों को अपने शरीर से कस्बाई बू आने लगती है. मनोरथ ने अपने गृह प्रवास का सार कहा, “बाबूजी हुक्का-पानी बंद करने की धमकी दे रहे हैं.”

कप्तान सिंह ने उसे दया से देखा, “मेरा भी यही हाल है. मैंने कहा पापा पेट्रोल से लेकर प्याज़ तक हर चीज़ के दाम बढ़ गए हैं. हज़ार-दो हज़ार बग्स अधिक दिया करो, तो कहते हैं मूवी देखने के लिए मैं एक पाई नहीं दूंगा. पढ़ने गए हो, नायक बनने नहीं.”

प्यारेलाल ने मनोबल न गिरने दिया, “बाप लोग हमसे बड़े चालबाज़ हैं. न जाने कैसे जान लेते हैं कि हम बहुत मूवी देखते हैं.”

मनोरथ बोला, “मूवी में हम बहुत पैसा बर्बाद करते हैं. टिफिन न आए, तो फांके

करने पड़ेंगे.”

प्यारेलाल ने ब्लास्ट किया, “फ्री में देखेंगे.”

“कैसे?” दोनों एक साथ बोले.

“ब्लैक में टिकट ख़रीदते हुए मैंने ब्लैक करना सीख लिया है. टिकट ब्लैक करेंगे. जो एक्स्ट्रा मनी मिलेगी, उससे मूवी देखेंगे.

एकदम फ्री.”

सबसे पहले प्यारेलाल ने मैदान मारा था, “आठ टिकट ख़रीदे थे. तीन अपने, पांच एक्स्ट्रा. वो स़फेद शर्टवाला आदमी, जिसके साथ दो औरतें और दो बच्चे खड़े हैं उसे बेच दिए. तीन सौ कमा लिए.”

“चालू है बे.” कप्तान पराजित-सा दिखा.

“जीनियस.”

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“डर नहीं लगा?” मनोरथ सिरपिटाया-सा.

“लोगों के पास पैसा है. फेंकते हैं. मैंने ज़बर्दस्ती टिकट नहीं बेचे.”

प्यारेलाल की पुलक दोनों की प्रेरणा.

पहली बार टिकट ब्लैक करते हुए मनोरथ साहस खो रहा था. टिकट नहीं मिलने से चार उदास लड़कियांएक ओर खड़ी थीं. मनोरथ समीप जाकर फुसफुसाया, “गर्ल्स

टिकिट… बालकनी.”

“चार चाहिए. एक्स्ट्रा कितना?”

“टू फिफ्टी.”

लड़कियां आपस में मशगूल हुईं…

रोज़-रोज़ मम्मी परमिशन नहीं देंगी…

आने-जाने में ऑटो के ढाई-तीन सौ लगते हैं. आज लगेंगे, अगले किसी दिन आते हैं, तो फिर लगेंगे… आज कोचिंग मिस कर दी, रोज़ नहीं कर सकते. मूवी देखते हैं. ठीक तो है. “ओके.”

अतिरिक्त दो सौ पचास रुपए.

मनोरथ की मांसपेशियां मद से फूल गईं.

फिर तो वह, प्यारेलाल और कप्तान सिंह की तरह पेशेवर दबी आवाज़ में सर टिकट… एक्स्ट्रा… मैम… टिकट… कहते हुए ब्लैक करने लगा. नहीं सोचा अशुभ इसी धरा पर घटता है और लपेटे में मनुष्य ही आते हैं. ब्लैक में टिकट ख़रीदनेवाला व्यक्ति रसूखवाला निकला. प्रति टिकट 50 रुपया अतिरिक्त दे रहा था, कप्तान 70 पर अड़ा था. रसूखवालेे ने सहसा कप्तान सिंह की कॉलर पकड़ ली. उसके साथ खड़ी स्त्री डर गई “कॉलर छोड़ो, क्या करते हो?”

रसूखवाला वहशी हो रहा था, “लोग लाइन में लगकर समय ख़राब करते हैं और पता चलता है टिकट ख़त्म… लड़कों ने धंधा बना लिया है… एक्स्ट्रा टिकट ख़रीद लेते हैं, फिर ब्लैक करते हैं.”

कप्तान कुछ कहने लगा कि रसूखवाले ने उसे थप्पड़ मार दिया. आसपास मंडरा रहा प्यारेलाल भाग निकला. पिटते हुए कप्तान पर मनोरथ को दया आ गई. बीच-बचाव करने आ गया, “सर, सॉरी… कप्तान चल निकल.”

“पूरा गैंग है.”

रसूखवाले ने मनोरथ के गाल पर झन्नाता हुआ तमाचा मारा. मनोरथ की पतलून गीली. मजमा लग गया. थियेटर के सुरक्षा गार्ड ने रसूखवाले को शांत किया, “माहौल ख़राब होगा सर. थियेटर की बदनामी होगी.”

“कंट्रोल करना चाहिए न. ब्लैक हो रहा है, बदनामी होगी ही. पुलिस को कॉल करो.”

“मैं इन्हें देखता हूं सर.”

सुरक्षा गार्ड ने दोनों को नियंत्रण में ले लिया. शो शुरू होनेवाला था. लोग थियेटर के अंदर चले गए. परिसर प्राय: खाली हो गया. सुरक्षा गार्ड  के हाथ-पैर जोड़, बार-बार माफ़ी मांगकर कप्तान और मनोरथ किसी तरह छूट सके. प्यारेलाल कहीं नहीं दिखा. सेल फोन पर कॉल किया. उसने रिसीव नहीं किया.

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रात है. सन्नाटा है. पीड़ा, भय, लज्जा, ग्लानि है.  लेकिन मनोरथ की आंखों में नींद नहीं है. पिटता हुआ कप्तान बेबस, बल्कि घिनौना लग रहा था. प्यारेलाल निकम्मे की तरह भाग आया. इन जैसा बनने की बेवकूफ़ी में मैं क्या से क्या बन गया? कौन मानेगा मैं भले घर का ख़ूब पढ़नेवाला भला लड़का था? परीक्षा नज़दीक है, मेरा कोई पेपर तैयार नहीं है. ओह! ख़ुद के प्रति ईमानदार बन जाओ, तो ग़लत काम करते हुए झिझक होगी. लगेगा ख़ुद को धोखा दे रहे हो. ‘बेटा, बीता हुआ समय नहीं लौटता और हर काम का एक निश्‍चित समय होता है…’ बाबूजी के शब्द बेतरह याद आ रहे हैं. ओह! मनोरथ ने छटपटाकर पहलू बदला… फिर बदला… फिर… बदलता रहा… जैसे ख़ुद से दूर भाग जाना चाहता हो.

    सुषमा मुनीन्द्र

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कहानी- पतन 2 (Story Series- Patan 2)

hindi short story

कप्तान की शातिर हंसी, “डंडे पड़ने से नज़र खुलती है. सेल्फ कॉन्फिडेंस हाई होता है. डंडे खाकर लोग नेता बन जाते हैं. कोई नहीं पूछता क्या करतूत की थी, जो डंडे पड़े. सुन मनोरथ, मैंने केवल जींस चुराई, दुकानवाला तो लाखों की टैक्स चोरी करता होगा.”

“मंगलवार को ही देखी थी. तुम कर क्या रहे हो?”

प्यारेलाल ने पुचकारा, “एडजस्ट हो रहे हैं. तुम एडजस्ट नहीं हो पा रहे हो, लेकिन पोथन्ना पढ़ना है.”

“रिज़ल्ट बिगड़ा, तो बाबूजी वापस बुला लेंगे. मैं चीकट बनियान पहनकर सुबह से खोआ औटता पाया जाऊंगा.”

प्यारेलाल ने फिर पुचकारा, “रिज़ल्ट बनेगा तब भी खोआ ही औटोगे. काका मिष्ठान भंडार तुम्हारी राह तक रहा है. मेरे कलेजे, तुम पढ़ो. मैं और कप्तान थोड़ा बेव़कूफ़ी करके आते हैं. तुम्हारा थोबड़ा देखकर ऊब गए हैं. मूवी देखेंगे, तो तबीयत हल्की हो जाएगी.”

मनोरथ ने विरोध किया, “तुम दोनों बिगड़ गए हो.”

“हमें बिगड़ने दो. तुम बाबूजी के ऑर्डर को फॉलो करो. एक कप चाय भी पियो, तो उसका ख़र्च डायरी में नोट करो. मासिक बजट और पढ़ने का टाइमटेबल बनाओ. परदेस में हो. लूटनेवाले संगी-साथियों से सावधान रहना.”

कप्तान सिंह ने बाबूजी का ऐसा अभिनय किया कि मनोरथ हंसी न रोक सका, “मेरे बाबूजी को बख़्श दो यार.”

प्यारेलाल ने ज्ञान दिया, “मनोरथ, मैं ये नहीं कहता कि ये बाप लोग बैडमैन हैं, लेकिन हम लोगों को थोड़ा-बहुत अपने तरी़के से जीने का हक़ है. यदि हम मूवी देख लेते हैं, तो ग़ज़ब नहीं करते हैं. तुम इस तरह पप्पू बने रहोगे, तो किसी दिन तुम्हारा अपहरण हो जाएगा. कप्तान गेट रेडी, वरना टिकट नहीं मिलेगी.”

कप्तान सिंह नई जींस पहनकर तैयार हो गया. मनोरथ ने तत्काल पूछा,

“कब ख़रीदी?”

“चुराई है.”

“कब?”

“पिछले हफ़्ते. तुम दोनों भी तो थे. मैंने ट्रायल रूम में छह-सात जींस का ट्रायल लिया था. इस जींस के ऊपर अपना ट्राउज़र पहना और बाक़ी जींस दुकानवाले के सामने रख दी थी कि फिटिंग नहीं जम रही है.”

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प्यारेलाल ने प्रशंसा से देखा, “मैं मोज़े, तौलिया, चॉकलेट जैसी छोटी चीज़ें चुराता हूं. कप्तान, तुमने तो जींस चुरा ली.”

मनोरथ का कस्बाई कच्चापन, “चोरी बुरी बात है.”

“इसे चोरी नहीं मौज-मस्ती कहते हैं.” कप्तान ने इस तरह कहा मानो पदक जीतने का काम किया है.

“टुच्चे हो.”

“इतने बड़े शहर में कौन जानता है कि हम इज़्ज़तदार बाप की औलाद हैं.”

“कभी पकड़े जाओगे, तो डंडे पड़ेंगे.”

कप्तान की शातिर हंसी, “डंडे पड़ने से नज़र खुलती है. सेल्फ कॉन्फिडेंस हाई होता है. डंडे खाकर लोग नेता बन जाते हैं. कोई नहीं पूछता क्या करतूत की थी, जो डंडे पड़े. सुन मनोरथ, मैंने केवल जींस चुराई, दुकानवाला तो लाखों की टैक्स चोरी करता होगा.”

प्यारेलाल ने कप्तान के कंधे ठोके, “तुम्हारे पापा की भी गार्मेंट शॉप है.”

“मैंने कब कहा मेरे बापू दूध के धुले हैं.”

मुश्किल में मनोरथ!

बहकनेवाली उम्र अधिक नहीं सोचने देती.

दिल और दिमाग़ की लड़ाई.

बदलाव की ज़रूरत महसूस होने लगी.

वस्त्र विन्यास, केश विन्यास, चाल-चलन, व्यवहार-आचरण, चेहरे-चरित्र में बदलाव लाते हुए वह पूरी तरह बदल गया. दीपावली पर घर आया मनोरथ दूसरे लोक का वासी जान पड़ता था. चतुर चेहरा, बड़बोली बातें, चपल चाल-ढाल, मशरूम कट बाल, कानों में बालियां, चुस्त जींस और टी-शर्ट.

बुलाकी ने विकृत मुद्रा बनाई, “मनोरथ, ये क्या धजा बनाए हो.”

“अभी रेलवे स्टेशन में इस धजा का बड़ा इंप्रेशन जम गया जी.  मैं, प्यारे, कप्तान एग्ज़िट से बाहर आए कि ब्रदर ऑटो, ब्रदर ऑटो कहते हुए ऑटोवालों ने घेर लिया (खजुराहो समीप होने से विदेशी ट्रेन से यहां उतर सड़क मार्ग से खजुराहो जाते हैं). मैंने ठेठ बघेली में समझाया हम ब्रदर नहीं, यह शहर के लड़िका आहेन. हुलिया से ब्रदर दिखाई दे रहा हूं.”

बाबूजी भस्मीभूत हुए, “मनोरथ, भगवान ने भली सूरत दी है. मूंछें हटाकर, बालियां पहनकर लड़की लग रहे हो.”

“बाबूजी यह लेटेस्ट है. मैं मूंछें नहीं हटाना चाहता था. लड़के ‘दादूलैंड का वासी’ कहकर चिढ़ाने लगे, तो हटाना पड़ा.”

(बघेलखंड में लड़के को दादू कहते हैं)

“फैशन पढ़ाई चौपट कर देगा.”

“बिल्कुल नहीं. मेरे कॉलेज के लड़के एसी कार से आते हैं. महंगे गैजेट्स रखते हैं. रिज़ल्ट भी अच्छा लाते हैं.”

“बकवास…”

अम्मा बचाव कार्य में तैनात, “बाद में समझाना. बच्चा, सफ़र से थका आया है.”

“मैं इसका इंतज़ार कर रहा था. इसने उत्साह ख़त्म कर दिया. यह जनरेशन किसी लायक नहीं. कान, नाक, भौंह, नाभि में बाली, फटी जींस, मशरूम कट, कटोरा कट, ज़ीरो कट बाल… मुझे तिरछी नज़र से मत घूरो. समझे. हुक्का-पानी बंद कर दूंगा. होश में आ जाओगे.”

“पार्ट टाइम जॉब बहुत मिलते हैं. अपनी पढ़ाई का ख़र्च ख़ुद उठा सकता हूं.” कहकर मनोरथ ने बाबूजी को चुप करा दिया. अम्मा ने उनका उठ गया हाथ खींचा, “जवान लड़के पर हाथ चलाओगे?”

“मैं तुम्हारी तरह इसकी मुंह देखी नहीं कर सकता. न इससे डरकर रहूंगा.”

बेफ़िक्री दिखाता हुआ मनोरथ अपने कमरे में चला गया. अम्मा ने अरज निवेदन कर बाबूजी को शीतलता प्रदान की, “आजकल के लड़के उतावले होते हैं. प्रेम से समझ जाएं, लेकिन मारपीट से भड़कते हैं. अख़बार में रोज़ पढ़ती हूं लड़के-लड़कियां घर से भाग रहे हैं, फांसी में झूल रहे हैं, मर्डर कर रहे हैं…”

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अम्मा की बातों का असर हुआ या क्रोध अपनी हद छूकर बैठ गया. थोड़ी देर बाद बाबूजी मनोरथ के कमरे में गए. वह बिस्तर पर औंधा पड़ा था. वे उसे सुनाकर बोले, “बेटा, मेरी बात का बुरा न मानना. सही चाल चलोगे तो भला है, वरना लोग हंसेंगे. लड़के को पढ़ने बड़े शहर भेजा, बिगड़ गया. बच्चे नासमझी करें, तो माता-पिता को तकलीफ़ होती है. हमें नहीं मालूम तुम वहां क्या करते हो. ईमानदारी से पढ़ोगे, तो संतोष मिलेगा. मुझे भी, तुम्हें भी. तुम यदि ख़ुद के प्रति ईमानदार बन जाओ, तो ग़लत काम करते हुए झिझक होगी. लगेगा ग़लत कर ख़ुद को धोखा दे रहे हो. बेटा, बीता हुआ समय नहीं लौटता और हर काम का एक निश्‍चित समय होता है. उम्र होती है. तुम्हारे लिए यह समय बहुत महत्वपूर्ण है… जानता हूं बड़ी डिग्री लेकर तुम काका मिष्ठान भंडार में बैठना पसंद नहीं करोगे. मैंने अच्छी लोकेशन में ज़मीन ख़रीद ली है. तुम्हारे लिए बढ़िया रेस्टोरेंट बनवाना है.”

बाबूजी सोच रहे थे मनोरथ कुछ बोलेगा. वह निद्रामग्न होने का अभिनय करता औंधा पड़ा रहा. बाबूजी को आग्रह करते देख उसे विचित्र क़िस्म की तुष्टि मिल रही थी. उसे सोता समझ, उसके सिर पर हाथ फेर वे कमरे से चले गए.

    सुषमा मुनीन्द्र

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कहानी- पतन 1 (Story Series- Patan 1)

hindi short story

अम्मा खाने का कितना प्रबंध करती थीं. अम्मा को याद कर मनोरथ का दिल भर आया. कुछ दिन पहले तक वह सीधा-कुशाग्र बुद्धि लड़का हुआ करता था. घर और स्कूल उसकी दुनिया थी. लड़कियों को सीटी मारनेवाले सहपाठी हंसते, “मनोरथ, तुम पप्पू हो. दुनियादारी सीखो.”

ठिठुरती ठंड और निष्ठुर निशा.

परिस्थितियों से पिद्दी हुए मनोरथ और कप्तान सिंह कोहरे में लुप्तप्राय सिहरती सड़क को तेज़ी से नापना चाह रहे हैं. गति लटपटा रही है.

रसूखवाले ने ऐसा फोड़ा कि किसी तरह बचकर या कुछ लोगों के द्वारा बचाए जाकर रसूखवाले की गिरफ़्त से छूटकर प्यारेलाल को ढूंढ़ते रहे. प्यारेलाल बाइक सहित नदारद. ऑटो करने का ख़्याल न आया. कुछ दूर निकल आने पर ख़्याल आया, लेकिन हाथ दिखाने पर कोई ऑटो नहीं रुका. मनोरथ के चेहरे पर जब से मस्से उपज आए हैं, ख़ुद को प्रबल मानने लगा है.

रसूखवाले ने ऐसा फोड़ा कि पहले तमाचे में पतलून गीली हो गई. गीली पतलून जैसी बाधा संभाले किसी तरह कप्तान सिंह के साथ तीसरी मंज़िल के अपने फ्लैट में पहुंचा. भीतर से प्यारेलाल की डरी हुई आवाज़ आई, “कौन है?”

“कप्तान.”

प्यारेलाल ने द्वार खोल दोनों को फुर्ती से भीतर खींच लिया.

कप्तान सिंह की निलंबित हुई बुद्धि घर की सुरक्षित गरमाहट में बहाल हुई, “अच्छा भाग निकले.”

प्यारेलाल ने प्रबल अपराधबोध प्रदर्शित किया, “भागा नहीं था. एक तरफ़ खड़ा हो गया था. जब देखा वह आदमी तुम दोनों को थाने ले जाने की धमकी दे रहा है, शायद पुलिस को कॉल भी लगाने लगा था, मैं तब भागा कि तुम दोनों को थाने जाना पड़ा, तो बाहर रहकर कुछ उपाय करूंगा. मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था और मैंने अभी थोड़ी देर पहले मनोरथ तुम्हारे बाबूजी को कॉल कर दिया कि…”

“पागल है? बाबूजी नहीं छोड़ेंगे.” दहशत में मनोरथ ने जेब से अपना सेल फोन निकाला.

“लो बैटरी. शुक्रिया शिवशंकर.”

प्यारेलाल ने ग़लती स्वीकार की, “मुझे लगा पुलिस तुम लोगों को नहीं छोड़ेगी.”

“पुलिस तक बात नहीं पहुंची, लेकिन तुमने प्रचार कर दिया.”

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कप्तान ने अपना मोबाइल फोन देखा, “दस मिस्ड कॉल पापा के. मनोरथ के बाबूजी कुछ बोले?”

“इंफॉर्म कर मैंने सेल स्विच ऑफ कर दिया.”

“हम लोगों को हलाल कर अपनी जान बचा लो.” मनोरथ को भय ने बुरी तरह जकड़ लिया.

प्यारेलाल बोला, “थके हो. सो जाओ. यदि नींद आएगी?”

नींद नहीं आ रही है. रजाई की गरमाहट भी मनोरथ के भय को कम नहीं कर पा रही है. इस व़क्त घर में हड़कंप-हड़बड़ी मची होगी. समाचार सुनकर अम्मा ने दम साध लिया होगा. आदत के अनुसार बाबूजी ने अम्मा को दोषी माना होगा, “और भेजो मनोरथ को बाहर. बर्बाद हो गया. पुलिस इसकी चमड़ी उतार ले तो मैं शांति पाऊं.”

अम्मा नि:शब्द हुई होंगी, फिर कुछ देर बाद कुछ बोली होंगी, “प्यारेलाल और कप्तान ने बर्बाद किया. मनोरथ ऐसा नहीं था.”

“एक यही शरीफ़ है. बाक़ी सब बदमाश.”

अम्मा-बाबूजी की जिरह देख बुलाकी जिया ने विद्वता दिखाई होगी, “बाबूजी, मनोरथ का फोन लग नहीं रहा है. कप्तान के पापा से बात करो.”

बाबूजी ने कप्तान के पापा को कॉल किया होगा. ये दो पिता मिलकर अब पता नहीं क्या करनेवाले होंगे…

मनोरथ भयभीत है, पर भूख भयभीत होना नहीं जानती. भोजन की हो, देह की, पैसे की, मान-प्रतिष्ठा की- भूख बहुत बड़ा सत्य है. मनोरथ जैसे बेसुध में बुदबुदा रहा था, “इतना ज़लील होना पड़ा, पूरा शरीर दर्द से टूट रहा है, फिर भी भूख लग रही है.”

प्यारेलाल का अपराधबोध बढ़ गया, “आज रविवार है. टिफिन सेंटर से रात का खाना नहीं आया. घर में एक बिस्किट भी नहीं है.”

निष्ठुर निशा.

अम्मा खाने का कितना प्रबंध करती थीं. अम्मा को याद कर मनोरथ का दिल भर आया. कुछ दिन पहले तक वह सीधा-कुशाग्र बुद्धि लड़का हुआ करता था. घर और स्कूल उसकी दुनिया थी. लड़कियों को सीटी मारनेवाले सहपाठी हंसते, “मनोरथ, तुम पप्पू हो. दुनियादारी सीखो.”

अपनी सरलता में वह अम्मा से दुनियादारी का अर्थ पूछता. अम्मा, तीन पुत्रियों के बाद जन्मे इकलौते पुत्र के केश सहलाने लगतीं, “दुनियादारी बड़े होकर अपने आप आ जाती है. ख़ूब पढ़ो.”

ख़ूब पढ़ा. बारहवीं में 85 प्रतिशत परिणाम लाकर अम्मा-बाबूजी को गौरव से भर दिया, “स्टूडेंट्स बाहर पढ़ने जा रहे हैं. प्यारेलाल और कप्तान सिंह भी. मैं भी

बाहर पढ़ूंगा.”

अम्मा की धड़कन हलक में, “मनोरथ, मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकती. यहीं पढ़ो. अपनी दुकान ही तो संभालनी है. कौन-सा लंदन घूमना है.”

‘दुकान- काका मिष्ठान भंडार.’

मनोरथ को अपने भीतर चीकट बनियानवाला हलवाई नज़र आया. वह काका (दादाजी) फिर बाबूजी की तरह चीकट बनियान, स्याह पैजामा पहनकर घी-तेल से बास मारती देह संभाले धधकती आंच के सम्मुख बैठकर कड़ाही के खौलते तेल में समोसे और इमरती तल रहा है. इस छोटे शहर में तमाम रेस्टोरेंट खुल गए हैं, लेकिन कुछ बेंच और मेज़ोंवाले काका मिष्ठान भंडार की इमरती, लवंगलता, बेसन लड्डू, समोसे और खोए की काली जलेबी का स्वाद लोगों को आज भी ऐसा भाता है कि रात आठ बजे तक बाबूजी को ऐलान करना पड़ता है- समोसे ख़त्म. दुकान की आय से दो बड़ी पुत्रियों के अच्छे दर्जे के विवाह हुए. बुलाकी के विवाह की तैयारी है, लेकिन दुकान की चीकट स्थिति आय के आंकड़े इस कारगर तरी़के से छिपाती है कि आयकर-विक्रयकर विभाग को कल्पना नहीं है, आय प्रति माह एक लाख से ऊपर जाती है.

अम्मा के चीकट प्रस्ताव पर मनोरथ को मानहानि जैसा फील आया था, “अम्मा, मैं ख़ुद को भट्ठी और कड़ाही में नहीं

झोंक सकता.”

बाबूजी निदान पर आए, “तुम्हारे लिए शानदार रेस्टोरेंट बनवाऊंगा. मैं काका मिष्ठान भंडार संभालूंगा, तुम रेस्टोरेंट में मैनेजरी करोगे.”

“अभी तो मुझे स़िर्फ और स़िर्फ पढ़ना है.”

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कस्बाई कच्चापन लेकर मनोरथ महानगर के माहौल में उतरा. घर याद आता. अम्मा बहुत याद आतीं. साथ आए प्यारेलाल और कप्तान सिंह को आज़ादी मनाते देखता, तो हैरान हो जाता, “तुम लोगों को घरवालों की याद नहीं आती?”

कप्तान उसे व्यंग्यात्मक रूप से देख रहा है,

“स्पून फीडिंग कराकर तुम्हारी अम्मा ने तुम्हें पप्पू बना दिया है. अम्मा की याद में दुबरा गए हो. चलो मूवी दिखा लाता हूं.”

   सुषमा मुनीन्द्र

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कहानी- एहसास तुम्हारे प्यार का… 3 (Story Series- Ehsas Tumhare Pyar Ka 3)

कभी-कभी किसी के जीवन में कोई संबंध अचानक इतना आत्मीय हो जाता है कि उसे खो देने का भय बर्दाश्त करना भी मुश्किल हो जाता है. उसने घड़ी की तरफ़ देखा. रात के दो बज रहे थे. कोई बात नहीं अगर गौतम उसे प्यार करता है, तो समझेगा भी. उसने गौतम का नंबर मिलाया. उधर से गौतम की नींद से भरी आवाज़ सुनाई दी, “हैलो… मैडम, इतनी रात को मैं कैसे याद आ गया?”

“गौतम, आई लव यू.” वह जल्दी से एक सांस में ही बोल गई.

थोड़ी देर की ख़ामोशी के बाद एक ज़ोरदार ठहाका गूंज उठा और नेहा पूरी तरह नर्वस हो पसीने-पसीने हो गई.

अपने फ्लैट में आकर कपड़े बदलकर सोने की कोशिश करने लगी, पर नींद आंखों से कोसों दूर थी. गौतम की छुअन में जाने ऐसा क्या था कि वह देर तक प्यार से अपनी बांह सहलाती रही, जैसे सारे जहां की ख़ुशियां उसके दामन में भर गई हों.

तभी अचानक उसकी सारी सोच पर जैसे लगाम लग गया, जब उसे याद आया कि उसकी मम्मी इस रिश्ते के लिए कभी इजाज़त नहीं देंगी. उन्होंने अब तक उसके दिमाग़ में भी यही डाला था कि उसके पापा की अच्छी नौकरी के कारण वह एक ग़लत परिवार में फंस गई, जिसका समाज में कोई स्टेटस ही नहीं था. वह गौतम के लिए भी वैसा ही सोचेंगी, पर नेहा क्या करे? उसका मन ख़ुद-ब-ख़ुद एक अनजाने, अनकहे प्यार की डोर में बंधता चला जा रहा था.

एक दिन ऑफिस स्टाफ नमन की शादी में ऑफिस के सभी लोग आमंत्रित थे. नेहा वहां पहुंची, तो कोई परिचित चेहरा नज़र नहीं आ रहा था, तभी उसकी नज़र गौतम पर पड़ी. वह झट से उसके पास पहुंचकर बोली, “बहुत देर कर दी आने में.”

“क्यों, मुझे मिस कर रही थी? वैसे आज साड़ी में बहुत सुंदर लग रही हो.”

गौतम के शरारतभरे जवाब ने उसे शर्मसार कर दिया. वह इधर-उधर देखती हुई अपने मन की बात छुपाने के लिए बोली, “ऑफिस के और लोग दिख नहीं रहे हैं…”

तभी आसपास जमा भीड़ में से किसी ने उसे ज़ोर का धक्का दिया और वह सीधे गौतम की बांहों में जा गिरी. दोनों की नज़रें मिलीं और उसी पल जैसे दोनों के दिल जुड़ गए. वह चाहकर भी उसके आलिंगन से अपने को मुक्त नहीं कर पा रही थी. दिल चाह रहा था कि समय रुक जाए और वह यूं ही उसकी बांहों में पड़ी रहे. न अपना होश था, न आसपास की भीड़ का. जीवन में पहली बार वो किसी के लिए ऐसा महसूस कर रही थी.

पर लोगों की बेधती नज़रें और व्यंग्यात्मक मुस्कानों ने जल्द ही उसे होश में ला दिया और वह ख़ुद को संभालती हुई गौतम से अलग जा खड़ी हुई. देखते-देखते ऑफिस के और लोग भी आ गए. फिर तो हंसी-मज़ाक, खाने और बातों का सिलसिला शुरू हो गया. अंत में जब सब घर चलने को तैयार हो गए, तो वह गौतम से बोली कि उसे घर तक छोड़ दे. तभी नैना को जैसे कुछ याद आ गया. वह अपने बैग से एक लिफ़ाफ़ा निकालकर गौतम को देते हुए बोली, “गौतम, तुम्हारी शादी के लिए आंटी ने जिस लड़की की फोटो और कुंडली मंगवाई थी, इस लिफ़ा़फे में है, उन्हें दे देना और तुम भी देख लेना. एक बात और,  इन लोगों को जल्दी जवाब भी चाहिए, तो एक-दो दिन में अपना जवाब मुझे बता देना.”

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नैना तो चली गई, पर उसे गहरा झटका दे गई. अब तक जो वह सोच-समझ और महसूस कर रही थी, क्या वह सब झूठ था?  क्या गौतम उसके विषय में गंभीर नहीं है? तभी गौतम ने उसे चलने के लिए कहा, तो वह यंत्रचालित-सी उसके बगल में जा बैठी. रास्तेभर दोनों चुप ही रहे. घर आकर कपड़े बदलकर बिस्तर पर लेटी, तो उसके मन में बवंडर-सा मचा था. कभी  मम्मी के आग्नेय नेत्रों का आतंक, तो कभी गौतम का आकर्षण, उसका प्यारभरा चेहरा. फैसला तो उसे लेना ही पड़ेगा. उसकी मम्मी ने अपना जीवन हमेशा अपने हिसाब से जिया. न पापा की ख़ुुशियों का ध्यान रखा, न ही दादी के सम्मान का. उन्होंने हमेशा उसे यही समझाया कि अपनी ख़ुशी ही आदमी के लिए सर्वोपरि होती है. रिश्तों में त्याग की बातें आडंबर के अलावा कुछ नहीं हैं, फिर मम्मी की ख़ुशी के लिए वह क्यों त्याग करे? मन के आक्रोश से अब कालिमा छंटने लगी थी. ऐसा न हो कि यही सब सोचने-समझने में गौतम को ही खो दे. कभी-कभी किसी के जीवन में कोई संबंध अचानक इतना आत्मीय हो जाता है कि उसे खो देने का भय बर्दाश्त करना भी मुश्किल हो जाता है. उसने घड़ी की तरफ़ देखा. रात के दो बज रहे थे. कोई बात नहीं अगर गौतम उसे प्यार करता है, तो समझेगा भी. उसने गौतम का नंबर मिलाया. उधर से गौतम की नींद से भरी आवाज़ सुनाई दी, “हैलो… मैडम, इतनी रात को मैं कैसे याद आ गया?”

“गौतम, आई लव यू.” वह जल्दी से एक सांस में ही बोल गई.

थोड़ी देर की ख़ामोशी के बाद एक ज़ोरदार ठहाका गूंज उठा और नेहा पूरी तरह नर्वस हो पसीने-पसीने हो गई. गौतम जैसे बिना देखे ही उसकी स्थिति समझ गया. “घबराओ मत. मैं भी तो इसी दिन का इंतज़ार कर रहा था, जब तुम अपने दिल की बात मुझसे कहो. अब सो जाओ. कल मिलते हैं.”

“ज़रूर…” नेहा ने इत्मीनान की एक लंबी सांस ली. ज़िंदगी में शायद पहली बार उसने सही समय पर अपने लिए सही स्टैंड लिया था.

Rita kumari

        रीता कुमारी

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कहानी- एहसास तुम्हारे प्यार का… 2 (Story Series- Ehsas Tumhare Pyar Ka 2)

उनका निश्छल प्यार और अपनापन देखकर उसका मन भीग उठा. न जाने क्यूं दादी मां की यादें ताज़ा होने लगीं, तभी तेज़ बारिश के कारण गाड़ी ने एक ज़ोर का हिचकोला खाया और वह गौतम की बांहों में जा गिरी. गौतम उसे मुस्कानभरी नज़रों से देखते हुए बोला, “मैडम, सीट बेल्ट लगाओ. बारिश का फ़ायदा मत उठाओ. कहीं किसी ट्रैफिक पुलिसवाले की नज़र पड़ गई कि आपने बेल्ट नहीं लगाई है, तो हम दोनों की रात हवालात में गुज़रेगी.”

जब भी दादी मां गांव से आतीं मम्मी के परायों जैसे व्यवहार से दुखी भले ही उनके मुख पर अनाधिकार का बोझ नज़र आता, पर उनका शालीन व्यवहार और शीतल ममत्वभरी दृष्टि उनके प्रति श्रद्धा और आत्मीयता की भावना जगाता था. उन्हें भी अपने बेटे और पोती से बेहद प्यार था, फिर भी उनकी ख़ुशी और घर की सुख-शांति के लिए वे गांव के एक मामूली-से मकान में रहती थीं. उसके पापा एक प्रशासानिक अधिकारी थे और मां एक कॉलेज में पढ़ाती थीं. नेहा उन दोनों की इकलौती संतान थी.

उसके पापा एक अतिसाधारण परिवार से थे. उन्होंने बचपन में ही अपने पिता को खो दिया था. बहुत कठिनाइयों का सामना करके उनकी मां ने उन्हें पढ़ाया था. नेहा की मम्मी ने उच्च पद पर देखकर उनसे शादी ज़रूर की थी, पर पति के विपन्न और गंवई परिवार को कभी अपना नहीं पाई थीं, जिसकी वजह से उसके पापा चाहकर भी अपनी मां तक को भी अपने साथ नहीं रख पाते थे.

उसने जब से होश संभाला, यही देखा था कि मम्मी हमेशा पापा से असंतुष्ट रहतीं. एक तो पुरुष वर्चस्व को स्वीकारना उनके स्वभाव में नहीं था. दूसरे, उन्हें लगता कि पापा के अतिसाधारण परिवार के साथ उनके उच्चवर्गीय परिवार का कोई मेल ही नहीं. नेहा को संभालने के लिए उन्होंने एक आया को रखा था, पर उसकी मां दादी मां को अपने घर में टिकने नहीं देती थीं. जबकि नेहा, दादी मां के रहने से अपने को ज़्यादा सुरक्षित महसूस करती और ज़्यादा ख़ुश रहती, पर जब भी दादी मां आतीं एक हफ़्ते में ही, उसकी मम्मी किसी-न-किसी बहाने से उन्हें गांव भेज देतीं. वह अंदर से तिलमिला उठती. चाहती तो थी कि मम्मी के इस फैसले के विरुद्ध आवाज़ उठाए, पर उसके मन का विरोध मन में ही घुटकर रह जाता.

एक डर, तनाव और असुरक्षा की भावना हमेशा उसके दिलो-दिमाग़ में बनी रहती. जड़ता से भरी घुटन, उसके अंदर एक अनजानी-सी छटपटाहट भर रही थी. हालात से मर्माहत और टूटी हुई नेहा ने एक ख़ामोशी का आवरण ओढ़ लिया था. धीरे-धीरे वही ख़ामोशी उसके वजूद का हिस्सा बन गया. अचानक उसे लगा कि उसकी आंखें भीगने लगी हैं. वह अपनी हथेलियों से अपनी आंखें सुखाती हुई सोने की कोशिश करने लगी.

दूसरे दिन ऑफिस गई, तो सुबह से ही बारिश हो रही थी. नेहा को ऑफिस से लौटने के लिए कोई टैक्सी नहीं मिल रही थी. गौतम ने लिफ्ट देने की पेशकश की, तो वह झट से मान गई. पहले गौतम का घर पड़ता था, फिर नेहा का. रास्ते में गौतम ने अपने घर के सामने कार रोकते हुए उसे घर में चलकर एक कप चाय पीने के लिए आमंत्रित किया, तो वह मना न कर सकी.

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गौतम के पापा नहीं थे. घर में उसकी मां गायत्री देवी और एक छोटी बहन गौरी थी. दोनों ने उसका स्वागत बड़े प्यार से किया. घर का वातावरण तो साधारण ही था, पर उसकी सीधी-सादी और धीर-गंभीर मां के चेहरे पर झलकनेवाले प्यार और ममता में ऐसा आकर्षण था कि नेहा को वह अत्यंत आत्मीय लगीं. चाय पीने के बाद वह चलने लगी, तो बड़े प्यार से गायत्रीजी ने गौतम को घर तक छोड़ आने की हिदायत देकर भेजा.

उनका निश्छल प्यार और अपनापन देखकर उसका मन भीग उठा. न जाने क्यूं दादी मां की यादें ताज़ा होने लगीं, तभी तेज़ बारिश के कारण गाड़ी ने एक ज़ोर का हिचकोला खाया और वह गौतम की बांहों में जा गिरी. गौतम उसे मुस्कानभरी नज़रों से देखते हुए बोला, “मैडम, सीट बेल्ट लगाओ. बारिश का फ़ायदा मत उठाओ. कहीं किसी ट्रैफिक पुलिसवाले की नज़र पड़ गई कि आपने बेल्ट नहीं लगाई है, तो हम दोनों की रात हवालात में गुज़रेगी.”

उसकी बातों से नेहा तो जैसे पानी-पानी हो गई. “नहीं… वो गाड़ी के हिचकोले…” उसकी ज़बान न जाने क्यों लड़खड़ा गई. गौतम ने प्यारभरी मुस्कान से नेहा को देखा, तो वह और भी नर्वस हो गई. बारिश तेज़ होती जा रही थी. गौतम की सतर्क नज़रें अब सड़क पर जम-सी गई थीं और नेहा की चोर नज़रें गौतम के चेहरे पर. एक अनजानी-सी अनुभूति उसे मोहित करने लगी थी. तभी गौतम द्वारा अपनी चोरी पकड़े जाने का ख़्याल मन में आते ही उसके गाल सुर्ख हो गए और उसने नज़रें घुमा लीं, पर दिल चाह रहा था कि वे दोनों उम्रभर ऐसे ही चलते रहें, लेकिन मंजिल आ ही गई. उसके फ्लैट के कैंपस में काफ़ी पानी भर गया था. कहीं ऐसा न हो कि नेहा पानी में चलते हुए गिर जाए. यह सोचकर गौतम बेझिझक उसकी बांह पकड़कर उसे लिफ्ट तक छोड़ आया.

Rita kumari

       रीता कुमारी

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कहानी- एहसास तुम्हारे प्यार का… 1 (Story Series- Ehsas Tumhare Pyar Ka 1)

उसे लगता कि उसके मन की संवेदनशीलता, उसके दुख-दर्द और प्यार की भावना को मन की परतों में कहीं गहरे चुन दिया गया था, जिसे वह महसूस तो कर पाती थी, पर प्रकट नहीं कर पाती थी. उस दिन घर लौटी, तो उसे याद आया कि आज उसका बर्थडे था. देर तक इंतज़ार करती रही, पर मम्मी-पापा में से किसी का फोन नहीं आया. दोनों कहीं किसी पार्टी में व्यस्त होंगे, उसकी आंखें भर आईं. तभी कॉलबेल बजी. दरवाज़ा खोला, तो अचंभित रह गई. सामने गौतम खड़ा था, हाथों में केक थामे हुए. इसे कैसे पता चला कि आज उसका बर्थडे है?

खिड़की के परदों के अगल-बगल से घुसपैठ करती सूरज की किरणों के कारण नेहा की नींद उचटने लगी थी. वह थोड़ी देर और सोना चाहती थी, पर एक बार नींद उचट जाए, तो फिर सोना मुश्किल हो जाता है. नेहा ने चुपचाप लेटे-लेटे घड़ी की तरफ़ नज़रें दौड़ाईं, तो दस बज चुके थे. उस दिन रविवार था और छुट्टी की सुबह वैसे भी आलसभरी होती है. वह उठकर एक कप कॉफी बना लाई. यह कॉफी ही तो उसके रसहीन जीवन में बचा एकमात्र रस था.

वह कॉफी लेकर बालकनी में आ खड़ी हुई. रूम से बाहर निकलते ही 14वीं मंज़िल के फ्लैट के सामने फैली कॉलोनी की सड़कों पर भागती गाड़ियां और लोग नज़र आने लगे. बाहर के शोर-शराबे तो उस तक नहीं पहुंच पाते थे, फिर भी उनकी गति उसे जीवित होने का एहसास ज़रूर करा देती थी. तभी कॉलबेल की आवाज़ से उसकी तंद्रा भंग हुई. कमला होगी, वह  छुट्टी के दिन देर से आती थी. उसने दरवाज़ा खोला, तो कमला अंदर आकर ख़ामोशी से अपने काम में जुट गई.

हल्के-फुल्के बर्तनों का शोर और वॉशिंग मशीन की खटपट, कभी-कभी आसपास फैली ख़ामोशी को तोड़ रही थी. कमला ने अपना काम समाप्त कर दोपहर का खाना बनाकर डायनिंग टेबल पर रख दिया. फिर दरवाज़ा बंद करने के लिए उसे बोलकर चली  गई. कमला के जाने के बाद वह सीधे बाथरूम में घुसी. नहाने के बाद फ्रेश होकर बाहर निकली, तो मन काफ़ी हल्का हो गया था.

नाश्ता करके वह फिर बिस्तर पर आ लेटी. पास पड़ी पत्रिका को उलटती-पलटती रही. फिर लैपटॉप निकालकर ऑफिस के कुछ अधूरे काम पूरे करके खाना खाया ओैर एक बार फिर बालकनी में आ बैठी.

समय से आकर कमला रात का खाना बनाकर चली गई. माहौल में फिर वही एकाकीपन और ख़ामोशी पसर गई.

तभी उस ख़ामोशी को चीरती मोबाइल फोन की घंटी बज उठी. उसकी मम्मी का फोन था. वही पुराना राग कि जल्दी शादी के बारे में सोचो. फिर उन लड़कों की जानकारियां देने लगीं, जो उनकी गुड लिस्ट में थे. नेहा ने हां-हूं कर अपना मोबाइल रख दिया. मोबाइल रखते ही उसे याद आया कि कल ऑफिस जाना है. जल्दी नहीं सोई, तो समय पर ऑफिस नहीं पहुंच पाएगी. मन में उपजे अवसाद को झटक वह सोने की कोशिश करने लगी.

दूसरे दिन ऑफिस में घुसते ही, गुडमॉर्निंग की आवाज़ ने उसे चौंका दिया. नज़रें घुमाई तो गौतम था. पिछले हफ़्ते ही कानपुर से ट्रांसफर होकर आया था. जब से इस ऑफिस को जॉइन किया था, तब से किसी-न-किसी बात की जानकारी हासिल करने के बहाने उसके पास चला आता. शायद नेहा का सबसे कटे-कटे रहकर अपने काम में मशगूल रहना उसे खटकता था, पर चाहकर भी नेहा उससे खुलकर बातें नहीं कर पाती थी. हालांकि वह चाहती थी कि वह भी बाहर के शोर-शराबे का हिस्सा बने, ज़ोर-ज़ोर से ठहाके लगाए और सबसे तर्क-वितर्क करे और अपने अंदर जमा अकुलाहट और छटपटाहट को बाहर आने दे, पर स्वभाव के अनुरूप बात होंठों तक आकर रुक जाती थी.

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उसे लगता कि उसके मन की संवेदनशीलता, उसके दुख-दर्द और प्यार की भावना को मन की परतों में कहीं गहरे चुन दिया गया था, जिसे वह महसूस तो कर पाती थी, पर प्रकट नहीं कर पाती थी. उस दिन घर लौटी, तो उसे याद आया कि आज उसका बर्थडे था. देर तक इंतज़ार करती रही, पर मम्मी-पापा में से किसी का फोन नहीं आया. दोनों कहीं किसी पार्टी में व्यस्त होंगे, उसकी आंखें भर आईं. तभी कॉलबेल बजी. दरवाज़ा खोला, तो अचंभित रह गई. सामने गौतम खड़ा था, हाथों में केक थामे हुए. इसे कैसे पता चला कि आज उसका बर्थडे है? फिर भी दरवाज़े से हटकर उसे अंदर आने के लिए जगह बना दी. वह इत्मीनान से अंदर आकर केक को टेबल पर रखते हुए बोला, “बैठने के लिए नहीं कहोगी?”

नेहा का दिल चाहा कि उससे कहे कि अब तक सब कुछ क्या तुम मेरी इजाज़त से कर रहे थे, जो अब तुम्हें इजाज़त की ज़रूरत पड़ गई, पर मुस्कुराकर उसे बैठने के लिए कहना ही पड़ा. फिर नेहा ने केक काटने की औपचारिकता निभाई और दोनों ने मिलकर केक खाया. अब तक दोनों के बीच की झिझक भी काफ़ी कम हो गई थी. देर तक वे इधर-उधर की बातें करते रहे. थोड़ी देर बाद गौतम चला गया, पर नेहा की सोच बहुत देर तक गौतम के आसपास ही घूमती रही. उसे लगा कि कुछ तो दम है गौतम में, क्यों उसके मन में गौतम के लिए सम्मोहन बढ़ने लगा था. बरसों से दिल के अंदर छुपे निश्छल प्यार की चाह की

संभावना शायद उसे गौतम में दिखने लगी थी. वह बिस्तर पर आ लेटी, पर आज उसका मन कहीं ठौर ही नहीं पा रहा था. मन के झरोखे से दादी मां का प्यारभरा चेहरा उसके दिलो-दिमाग़ पर दस्तक देने लगा था. कितना सुकून मिलता था उसे दादी मां की गोद में.

Rita kumari

      रीता कुमारी

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कहानी- किसी से जुड़कर 3 (Story Series- Kisi Se Judkar 3)

“वह भावुक होकर सोच रही है. बाद में पछताएगी.”

“तो यही होगा न, हम फिर वहीं आ जाएंगे जहां से चले थे. इस डर से हम चलना नहीं छोड़ देंगे. बेटे, अब जो भी होगा, उतना बुरा नहीं होगा, जितना हो चुका है. सच कहती हूं. इस घर को तीसरे की ज़रूरत है. कुछ उम्मीद जागेगी. किसी के किए की सज़ा हम क्यों भोगें? हमें ज़िंदगी को सही तरी़के से जीने का हक़ है.”

“पर मौसी…”

“निर्गुण, मेरे भी कुछ अरमान हैं.”

“मौसी, मैं शून्य में बदल चुका हूं.

मुझसे किसी को कोई लाभ न होगा.”

“शून्य कहीं पर जुड़ता है, तो बढ़त दिलाता है.”

अब उसे लगता है कि वह समस्या ठीक से बता नहीं पाया था, पर अधिक जानकारी रखने के कारण विराम समझ गया था.

“निर्गुण, तू बेव़कूफ़ है क्या? मौसा को दो लात रसीद कर. मौसी को बता. बेव़कूफ़,  बताने से मां-बाप नहीं मरते. चीख-चिल्ला, शोर मचा. मेरा बड़ा भाई शहर का दादा है. कहे तो चार जूते मौसा को मरवा दूं…”

मौसा को कल्पना नहीं थी कि निर्गुण योजना बना रहा है. निर्गुण ने मौसा की भुजा पर दांत गड़ा दिए और तब तक काटता-चिल्लाता रहा, जब तक जागकर मौसी न आई. मौसी के आदर्श पुरुष का यह अब तक का सबसे घिनौना रूप था. वे डर और अविश्‍वास से मौसा को देखती रह गई थी. यह बच्चा पता नहीं कब से यातना सह रहा है और इस पिशाच को झिझक न हुई. मौसी ख़ूब रोने लगी थी. फिर निर्गुण को लेकर अपने कमरे में आ गई थी. वह नहीं जानता मौसी और मौसा के बीच फिर क्या बहस हुई. बस, इतना जानता है कि दोनों फिर अजनबियों की तरह रहने लगे थे. आज सोचता है, तो हैरान होता है. अल्प शिक्षित मौसी में दृढ़ता आ गई थी या मौसी में मौसा का सामना करने का साहस नहीं था. मौसी की वह कई स्तरों पर हार थी. मौसी का विश्‍वास भंग हुआ था. बच्चा गोद में लेने-देने जैसी सामाजिक आस्था को धक्का लगा था. वे तो मौसा के साथ रहना ही नहीं चाहती थी, किंतु नितांत निजी फैसले भी व्यक्ति ख़ुद नहीं कर पाता. कुटुंब की राय को मानना पड़ता है. अब उसे लगता है कि ननिहाल में यह बात मौसी ने ही बताई होगी. मौसा का जादू सभी पर चल जाता था, अतः कोई भी सहसा विश्‍वास न कर सका. किया तो सुझाव दिए जाने लगे. नाना बोले, “गंगा, तुम्हारी बेव़कूफ़ी और लापरवाही कम नहीं रही, जो तुमने जानने की कोशिश नहीं की कि निर्गुण डरा हुआ रहने लगा है. अब चुप रहने में बेहतरी है. इस कलंक का असर पूरे परिवार पर पड़ेगा. हम लोगों को क्या जवाब देंगे? निर्गुण की ज़िंदगी भी कठिन हो जाएगी?”

मामा ने विरोध किया, “जीजा को समाज से बेदख़ल करना चाहिए.”

निर्गुण की मां व्याकुल थी, “गंगा, मैं सोचती थी कि निर्गुण सुख से है. मैं इसे वापस घर ले जाऊंगी.”

मौसी अकुला गई, “लीला, मेरे पास अब निर्गुण के अलावा कोई आधार नहीं है. तुम्हें डर है, तो मैं उस घर में नहीं रहूंगी.”

नाना ने चेताया, “…तो कहां रहोगी? अलग रहने का लोगों को कारण क्या बताओगी? शांति से काम लो और सतर्कता बरतो.”

उस समय तो वह इन बातों का मतलब समझ नहीं पाया था. आज सोचता है कि अपने कहे जानेवाले लोग भी अपनी पोज़ीशन, हित, स्वार्थ ही देखते हैं. तभी तो नाना को कुटुंब की चिंता हो आई थी. मामा मौखिक विरोध करके रह गए. मां ज़िद कर उसे वापस न मांग सकी. मौसा कुछ भी न बोल सके. मौसी की नज़र में गिरने से मौसा की ताक़त जाती रही या ग्लानि महसूस हो रही थी. नींद की गोलियां खाईं या हृदयाघात हुआ. वे एक रात कमरे में मृत पाए गए. मौसी यही बोली, “लोग ऐसा काम करते क्यों हैं कि फिर जी नहीं पाते.”

निर्गुण ने बी.कॉम अंतिम साल की तैयारी और परिमल बुक सेंटर एक साथ संभाला. कभी इस प्रतिष्ठान में मौसा की कुर्सी पर बैठना उसका सपना था. अब उसने वह रिवॉल्विंग चेयर बदल दी, जिस पर मौसा बैठा करते थे. उसे चेयर में मौसा के होने का बोध होता था. जल्दी ही वह बुक सेंटर स्थापित हो गया. उसे अपने काम में आनंद आने लगा था. वह तो इसी तरह से ज़िंदगी बिता देना चाहता था, लेकिन लहर का पत्र आने से घर परिवर्तन के दौर से गुज़र रहा था. मौसी उत्साहित थी, “निर्गुण, मैं लहर के बारे में बात करना चाहती हूं.”

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“वह भावुक होकर सोच रही है. बाद में पछताएगी.”

“तो यही होगा न, हम फिर वहीं आ जाएंगे जहां से चले थे. इस डर से हम चलना नहीं छोड़ देंगे. बेटे, अब जो भी होगा, उतना बुरा नहीं होगा, जितना हो चुका है. सच कहती हूं. इस घर को तीसरे की ज़रूरत है. कुछ उम्मीद जागेगी. किसी के किए की सज़ा हम क्यों भोगें? हमें ज़िंदगी को सही तरी़के से जीने का हक़ है.”

“पर मौसी…”

“निर्गुण, मेरे भी कुछ अरमान हैं.”

“मौसी, मैं शून्य में बदल चुका हूं.

मुझसे किसी को कोई लाभ न होगा.”

“शून्य कहीं पर जुड़ता है, तो बढ़त दिलाता है.”

“तुम्हें विश्‍वास है मौसी?”

“यह तो मानी हुई बात है.”

“तो क्या इस मानी हुई बात को आज़माया जाना चाहिए?”

निर्गुण के भीतर इच्छा हो आई है, यह जानने की कि किसी से जुड़ने पर अंततः लगता कैसा है?

Sushma Munindra

    सुषमा मुनीन्द्र

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कहानी- किसी से जुड़कर 2 (Story Series- Kisi Se Judkar 2)

एक रात मौसा बिल्कुल बदले हुए रूप में थे. उनकी आंखों में मुग्धता थी, हाथों में मज़बूत पकड़ थी, उसका रोना उन पर असर न डाल रहा था, उसके दर्द की अनसुनी ध्वनियां वायुमंडल में अब भी कहीं होंगी. मौसा धीरे से बोले थे, “निर्गुण, तुम मुझे राक्षस समझ रहे होगे, पर मैं राक्षस नहीं हूं. यह सब सभी बच्चों के साथ होता है, पर वे किसी से बताते नहीं हैं. बता देने से मां-बाप तुरंत मर जाते हैं.” वह उसके बचपन पर हमला था. उस दिन से वह एक बड़े शून्य में बदलने लगा.

जीत निर्गुण की हुई. वह गौरव के साथ उस आलीशान घर में स्थापित हुआ. उसे पता नहीं क्या-क्या होता था. उसे मोटे तौर पर याद है, आरंभिक अरुचि के बाद मौसा उससे अनुराग रखने लगे थे. उस अनुराग पर वह संदेह क्या करता, जब मौसी ही न कर पाई. और एक दिन यह अनुराग कठिन खेल में बदल गया. नानाजी बीमार थे. मौसी उन्हें देखने चली गई. परीक्षा के कारण वह न जा सका… एक रात मौसा बिल्कुल बदले हुए रूप में थे. उनकी आंखों में मुग्धता थी, हाथों में मज़बूत पकड़ थी, उसका रोना उन पर असर न डाल रहा था, उसके दर्द की अनसुनी ध्वनियां वायुमंडल में अब भी कहीं होंगी. मौसा धीरे से बोले थे, “निर्गुण, तुम मुझे राक्षस समझ रहे होगे, पर मैं राक्षस नहीं हूं. यह सब सभी बच्चों के साथ होता है, पर वे किसी से बताते नहीं हैं. बता देने से मां-बाप तुरंत मर जाते हैं.”

वह उसके बचपन पर हमला था. उस दिन से वह एक बड़े शून्य में बदलने लगा. बचपन की मासूमियत, मस्ती, मोहकता ख़त्म हो गई. हृदय खाली हो गया, कभी न भरने के लिए. वापस आई मौसी ने मौसा को उलाहना दिया, “निर्गुण कुंभला गया है, तुमने इसका ध्यान नहीं रखा.” मौसा हंसे, “रोज़ होटल से इसकी पसंद का खाना लाता था. पूछ लो.”

मौसी आश्‍वस्त हो गई, पर वह कभी आश्‍वस्त न हो सका. हरदम डरा हुआ होता. बिस्तर गीला कर देता. इसी बीच उसे दस्त लग गए. गंदा बिस्तर देख मौसी खीझ गई, “निर्गुण, क्या हो गया है तुम्हें? बिस्तर भी गीला कर देते हो और आज बिस्तर में दस्त? इतने बड़े हो गए हो?”

मौसा बीच में कूद पड़े, “इतना बड़ा भी नहीं हो गया है. नींद में दस्त छूट गया होगा. यह परेशान है. इससे सहानुभूति रखो.”

“हां, पर अचानक क्या हो गया है? बेटा, तुम्हें मेरे पास अच्छा नहीं लगता क्या?”

“गंगा, बच्चे से सहानुभूति रखो. परेशान है.”

निर्गुण सचमुच परेशान था. मौसी उसकी याचना को पहचानती क्यों नहीं? लेकिन मौसी ऐसे किसी संदर्भ के बारे में सोच तक नहीं सकती थी. रिश्तों में इस तरह की भूल, भ्रम, अज्ञानता, असावधानी, अति विश्‍वास पनप जाता है, कथित संस्कारशील घरों में शोषण निर्बाध रूप से जारी रहता है. प्रत्येक पुनरावृत्ति पर निर्गुण का हृदय भर आता- भगवान, नरसिंह की तरह किसी खंभे से निकलकर मौसा को दो फाड़ कर दो. कई बार सोचा चुपचाप अपनी मां के पास चला जाए, पर नहीं जानता था किस बस में बैठकर जाए. कारण क्या बताए? अब उसे लगता है कि वह तय नहीं कर पाता था, क्या करना चाहिए. यह बात बताएगा, तो मां-बाप मर जाएंगे, यह भ्रम इतना प्रभावी था कि जब छुट्टियों में मां के पास गया, तब भी कुछ न बता पाया. बस, इतना कहा, “मां मैं यही रहूं?”

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मां ने पुचकारा, “वहां अच्छा नहीं लगता? बेटा, तुम भाग्यवान हो, जो ग़रीब घर से उस अच्छे घर में चले गए. अपने बाबू को देखते तो हो, कभी इधर काम ढूंढ़ते हैं, कभी उधर. मेरी क़िस्मत में गंगा की तरह सुख नहीं है. बेटा, तुम बड़े हो गए हो, तुम्हें समझदारी सीखनी होगी. अपने कुछ कपड़े अपने छोटे भाई को दे जाना. मौसी तुम्हें नए ख़रीद देगी.”

चूंकि वह तीन भाई-बहनों में सबसे बड़ा था, अतः उसे छोटी उम्र में ही बोध कराया जाने लगा था कि वह बड़ा है. अब उसे लगता है कि उसने बचपन ठीक से जीया ही नहीं. उसकी नादानियां कभी माफ़ हुई ही नहीं, क्योंकि वह घर का बड़ा बच्चा था. मौसा उसे लेने आ गए. छोटे भाई व बहन के लिए कपड़े और मिठाई लाए थे. इसी कारण मौसा का जादू सभी पर चल जाता था. उसे वापस भेजते हुए अम्मा-बाबू बहुत प्रसन्न थे.

वह फिर बर्बर घर में था. डरा हुआ. मौसा उसे घेरते, वह दूर भागता. बात करते, वह जवाब न देता. मौसी को लगता अनादर कर रहा है, “निर्गुण, मौसाजी कुछ पूछ रहे हैं.”

मौसा हंसते, “गंगा, बात को तूल न दिया करो. बच्चे ऐसे ही होते हैं. इसे स्वाभाविक भाव में रहने दो.”

आज सोचता है, सब कुछ अस्वाभाविक बनाकर मौसा किस स्वाभाविक भाव की बात करते थे? मौसा ने ऐसा क्यों किया? कौन-सी कुंठा, अतृप्ति, विकार, प्रतिरोध

रहा जो…?

उसका चित्त अशांत रहने लगा. अंक कम आने लगे. वह मौसी के साथ बैठकर मूवी देख रहा था. मौसी फिल्मों की शौक़ीन थीं. कैसेट मंगाकर देखा करती थीं. रेप सीन था. निर्गुण भय और घबराहट से कांपने लगा.

“मौसी यह सब तो बच्चों के साथ…”

मौसी ने वीसीआर बंद कर दिया, “निर्गुण तुम पागल हो.”

“मैं जानता हूं न.”

“लगता है गंदे लड़कों की सोहबत में पड़ गए हो. यह सब बच्चों के साथ नहीं, लड़कियों के… अच्छा जाओ यहां से. बच्चे मूवी नहीं देखते.” मौसी क्रुद्ध हो गईं.

निर्गुण की परेशानी बढ़ गई. मौसी क्या ठीक कहती हैं? किससे पूछे? उसे अपने मित्र विराम की याद आई. विराम दो साल बड़ा था और बहुत अधिक जानकारी रखता था.

Sushma Munindra

  सुषमा मुनीन्द्र

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