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कहानी- आईना 1 (Story Series- Aaina 1)

“आत्मनिर्भर? मैं पैसे नहीं कमाती, इसलिए कह रहे हो. अच्छी-ख़ासी डिग्री है मेरे पास. चाहूं तो मैं भी कमा सकती हूं, पर तुम्हीं नहीं चाहते.” रिनी उसकी बात समझे बिना, बातचीत का रुख मोड़ते हुए बोली. श्रीयंत का दिल किया, फट पड़े. ‘एक स्कूटी-कार सीखने के लिए समय नहीं है. घर-बाहर के काम हो नहीं पाते. नौकरी करना क्या आसान है?’ पर यथासंभव स्वर को शांत रखकर बोला, “यह मैंने कब कहा? आत्मनिर्भरता का मतलब स़िर्फ पैसा कमाना ही नहीं होता. स्कूटी या कार ड्राइविंग आने से बाहर के सभी काम तुम ख़ुद कर सकोगी. इन बातों में आत्मनिर्भर होना आज की गृहिणी के लिए कितना आवश्यक है. एक पति को कितनी मदद मिलती है इससे. आजकल तो माता-पिता ही शादी से पहले यह सब सिखा देते हैं लड़कियों को.”

रात के आठ बजनेवाले थे. श्रीयंत सड़क की भीड़ से उलझा हुआ कार ड्राइव करता हुआ ऑफिस से घर जा रहा था, पर दिमाग़ में विचारों का घमासान व दिल में भावनाओं की उठापटक जारी थी. ऑफिस में रिनी का फोन आया था कि कियान की तबीयत ठीक नहीं लग रही. डॉक्टर को दिखाना पड़ेगा, पर चाहते हुए भी वह जल्दी नहीं निकल पाया था. बॉस ने छह बजे मीटिंग रख ली थी.

अति व्यस्त नौकरी और घर-गृहस्थी की गाड़ी पटरी पर बिठाते-बिठाते कभी-कभी उसका हृदय अत्यधिक खिन्न हो जाता था. कार पार्किंग में लगाकर, अपने फ्लैट पर पहुंचकर उसने घंटी बजा दी. रिनी जैसे तैयार ही बैठी थी. दरवाज़ा खोलते ही शुरू हो गई.

“अब आ रहे हो? बच्चे की भी चिंता नहीं है तुम्हें. हर समय बस नौकरी-नौकरी. अगर बच्चे को कुछ हो गया, तो क्या करोगे इस नौकरी का?”

घर आकर उसको पानी भी नहीं पूछा था. दिनभर क्लांत तन-मन रिनी के उलझने से उबल पड़ने को बेचैन हुआ. दिल कर रहा था कपड़े बदलकर, एसी और पंखा चलाकर बिस्तर पर लेट जाए, पर कियान को डॉक्टर को दिखाना ज़रूरी था. उसने कियान का माथा छुआ. बुख़ार से तप रहा था.

“चलो, जल्दी चलो.” वह बिना रिनी की बात का जवाब दिए बाहर निकल गया.

डॉक्टर के पास से वापस आए, तो दिल और भी खिन्न हो गया. पांच वर्षीय कियान को वायरल हो गया था. मतलब कि अगले कुछ दिन व्यस्त से भी व्यस्ततम निकलनेवाले थे.

“रिनी तुम ड्राइविंग क्यों नहीं सीखतीं? कार नहीं, तो स्कूटी ही सीख लो. कई मुश्किलें आसान हो जाएंगी.” एक दिन श्रीयंत रिनी का मूड अच्छा देखकर बोला था.

“घर-गृहस्थी व बच्चा संभालूं या फिर…किस समय जाऊं सीखने तुम्हीं बताओ?”

“सीखने की इच्छा रखनेवालों को पूछना नहीं पड़ता. वो समय निकाल ही लेते हैं.” श्रीयंत भन्नाकर बोला.

“तुम तो बस हवा में बातें करते हो. मुझे नहीं सीखना और सीखने की ज़रूरत क्या है?”

“ज़रूरत तो बहुत है. छोटे-छोटे कामों के लिए मेरा मुंह देखती हो. आजकल महिलाएं कितनी आत्मनिर्भर हैं.”

“आत्मनिर्भर? मैं पैसे नहीं कमाती, इसलिए कह रहे हो. अच्छी-ख़ासी डिग्री है मेरे पास. चाहूं तो मैं भी कमा सकती हूं, पर तुम्हीं नहीं चाहते.” रिनी उसकी बात समझे बिना, बातचीत का रुख मोड़ते हुए बोली.

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श्रीयंत का दिल किया, फट पड़े. ‘एक स्कूटी-कार सीखने के लिए समय नहीं है. घर-बाहर के काम हो नहीं पाते. नौकरी करना क्या आसान है?’ पर यथासंभव स्वर को शांत रखकर बोला, “यह मैंने कब कहा? आत्मनिर्भरता का मतलब स़िर्फ पैसा कमाना ही नहीं होता. स्कूटी या कार ड्राइविंग आने से बाहर के सभी काम तुम ख़ुद कर सकोगी. इन बातों में आत्मनिर्भर होना आज की गृहिणी के लिए कितना आवश्यक है. एक पति को कितनी मदद मिलती है इससे. आजकल तो माता-पिता ही शादी से पहले यह सब सिखा देते हैं लड़कियों को.”

“मेरे पिता ने अच्छा-ख़ासा दहेज दिया था. कार ड्राइविंग नहीं सिखाई तो क्या? कार तो दी थी.” रिनी चिढ़कर बोली.

“उफ़्फ्! तुम्हारे पिता और तुम्हारा दहेज. मांगा किसने था. आजकल इस दहेज की ज़रूरत नहीं होती. ज़रूरत है लड़कियों को ज़माने के अनुसार अंदर-बाहर के कामों के लिए परफेक्ट बनाना, कोरी डिग्री लेना नहीं.तुम्हें ड्राइविंग नहीं आती, सीखना भी नहीं चाहतीं, इसलिए बाहर के छोटे-से-छोटे कामों के लिए मुझ पर निर्भर रहती हो.”

अस्पताल से घर आते, ड्राइव करते हुए श्रीयंत यही सब सोच रहा था. अगर आज रिनी ख़ुद ही समय से कियान को डॉक्टर को दिखा लात, तो न उसकी तबीयत ज़्यादा ख़राब होती और न उसे ऑफिस से घर आकर इस कदर परेशान होना पड़ता.

पर रिनी जैसी लाड़-प्यार में पली लड़कियों की बात ही अलग है. नाज़ुक इतनी कि गृहस्थी भी ठीक से नहीं संभाल पाती. नकचढ़ी इतनी कि रिश्तेदारों या सास-ससुर को पास नहीं फटकने देती और शान-बान इतनी कि घर-बाहर के काम करने में नानी याद आती है. डिग्री भी इस लायक नहीं कि इतना कमा सके कि कोई बहुत अधिक आर्थिक मदद मिल सके.

घर पहुंचकर दिनभर का थका-मांदा श्रीयंत कपड़े बदलकर बिस्तर पर लेट गया. रिनी कियान के साथ थी, पर श्रीयंत के दिमाग़ में अभी भी विचारों का टहलना लगातार जारी था.

छह साल हो गए हैं उसके विवाह को. जब उसके विवाह की बात चली, तो पत्नी के रूप में उसने, एक शिक्षित गृहिणी की ही कामना की. यही सोचकर कि घर व बच्चे संभालना भी एक पूर्णकालिक काम यानी फुल टाइम जॉब ही है और उसकी पत्नी घर संभालेगी, तो वह उसे पूरा तवज्जो व सम्मान देगा, जो उसने अभी तक किसी गृहिणी को मिलते नहीं देखा था.

Sudha Jugran

   सुधा जुगरान

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कहानी- समझौता एक्सप्रेस 3 (Story Series- Samjhota Express 3)

samjhauta express

‘जूते एक साथ उतारकर क्यों नहीं रखते?’ भड़कती नेहा और यश की ठंडी बयार-सी बातें, ‘पूरा दिन तो बेचारे साथ ही रहते हैं, घर पर तो उन्हें कुछ स्पेस दो, पता है दोनों शिकायत कर रहे थे कि जब देखो हमें साथ-साथ चिपकाए रखते हो, हमें भी एक-दूसरे से थोड़ा ब्रेक चाहिए. तुमको अपनी बीवी से हर व़क्त चिपके रहना है तो चिपको, पर हमें माफ़ करो…’ उसकी ऐसी ही न जाने कितनी बातों को यादकर नैना भीगी आंखों से मुस्कुरा उठी, अब वे बातें बचकानी नहीं लग रही थीं, प्यार आ रहा था उन पर.

“होना क्या था. वही समझौता एक्सप्रेस दौड़ानी पड़ी, तुम्हारे मौसाजी ने कूलिंग कम की और हम मोटा कंबल तान के सोने लगे… कह रहे थे ना, पिसती औरत ही है.”

“रहने दो मौसी, कूलिंग तो मौसाजी ने भी कम की ना…” नैना हंसते हुए बोली.

“यही तो बात है बिट्टो, ख़ुशी-ख़ुशी साथ रहना है, तो बीच का रास्ता तलाशना ही पड़ता है.”

“पर मौसी, यश और मैं हर बात में अलग हैं, मुझे ही पता है, कैसे झेल रही हूं उसे… ”

“वैसे ही झेल रही है जैसे वह तुझे झेल रहा है और वह तो तुझे कितने प्यार से झेल रहा है, जबकि तू कितनी शिकायतें करके, ठिनक-ठिनककर झेल रही है…” सुनकर नैना तुनकी, “मुझे झेल रहा है?”

“और नहीं तो क्या, अगर वह तुम्हारी आदतों के हिसाब से नहीं चलता, तो तुम भी कहां उसकी आदतों के हिसाब से चलती हो, पर वह तुम्हें ऐसे छा़ेडकर नहीं भागा, न ही किसी से तुम्हारी शिकायत करता है.”

“वाह, वो शिकायत क्या करेगा… मेरे बिना उसका एक दिन काम ना चले”

“यह तेरी ग़लतफ़हमी है बिट्टो, तू देखना तेरे बिना भी उसके सब काम आराम से हो जाएंगे.”

“देखना तो आप मौसी, कैसे हर घंटे में कॉल आएगी, यह कहां रखा है… वह कहां रखा है… यह कैसे करूं, वह कैसे करूं…”

“इस ग़लतफ़हमी में मत रहना, जब तेरा ब्याह नहीं हुआ था, तब से जानती हूं उसको, हॉस्टल में रहा, अलग-अलग शहरों में नौकरी की. सालों से अकेले ही सब संभाल रहा था. उसकी मां नहीं जाती थी उसकी गृहस्थी जमाने… जानती है, एक दिन तेरी सास मुझे क्या कह रही थी? ”

“क्या कह रही थी?” नैना के कान खड़े हो गए.

“कह रही थी, रज्जो, तुमने बहू के नाम पर थानेदार पल्ले बांध दी. जब देखो मेरे बेटे के पीछे पड़ी रहती है, उसे नियम-क़ानून सिखाती रहती है. अपने घर में भी चैन से नहीं रह सकता बेचारा. यह तो वही है, जो सब हंसते-हंसते झेल रहा है, फिर भी कभी शिकायत नहीं करता.” सुनकर नैना की त्यौरियां चढ़ गईर्ं मगर चुप रही.

यूं ही मौसी-भांजी की अंतहीन बातों में समय आगे बढ़ता गया, मगर इन दो दिनों में यश का ना कोई मैसेज आया, ना मिस कॉल. नैना का मन वहीं लगा हुआ था, अतः बार-बार फोन चेक कर रही थी. “नहीं आया ना फोन कुछ पूछने के लिए. कर रहा है ना सब ख़ुद. देखा बिट्टो, तुम्हें लगता था वह तुम पर निर्भर है, मगर- असलियत में तो तुम उस पर बुरी तरह निर्भर हो.

“क्या कह रही हो मौसी, आई एम फुली इंडिपेंडेंट.” नैना अकड़ी.

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“अच्छा, सच-सच बताओ, जब से आई हो दो मिनट भी ऐसे गुज़ारे हैं, जो उसके बारे में नहीं सोचा. तुम उस पर इतनी निर्भर हो कि उसके सिवाय न कुछ सोच सकती हो और न देख सकती हो. तुम्हारी पसंद की कढ़ी बनाई थी, मगर तुमने बेमन से खाई, तुम्हारी दी हुई साड़ी पहने हैं और तुमने नोटिस भी नहीं किया.” मौसी शिकायती लहजे में बोलीं. “तुम्हारी पूरी सोच ही उसकी आदतों में उलझकर रह गयी है और देखो वह आराम से यूएस चला गया. मेरे पास फोन आया था कि मैं तुम्हारा ख़्याल रखूं, वह तुम्हें फोन करके डिस्टर्ब नहीं करना चाहता था.”

सुनकर नैना का दिल रो पड़ा. यश को सज़ा देकर आई थी और अब ख़ुद ही सज़ायाफ्ता बनी बैठी थी. मन भीतर से कसमसा रहा था. यश का मुस्कुराता मासूम चेहरा याद कर उसका अहंकार पिघल रहा था. ख़ुद को कोस रही कि उसे सीऑफ किए बिना यूं ही चली आई. अब महीनाभर कैसे रहेगी उसके बिना…?

मौसी की ममताभरी छांव में दो दिन बिता नैना वापस घर की राह चल पड़ी. अनमने से घर का दरवाज़ा खोला, तो हर तरफ़ यश ही यश खड़ा नज़र आ रहा था. हंसता-मुस्कुराता यश… बातें बनाता यश… नैना ने टेबल पर बैग रखा, तो कुर्सी की बैक पर फैले टॉवल पर नज़र पड़ी. एक स्मृति उभरी, ‘कितनी बार कहा है टॉवेल बालकनी में सुखाया करो’ नैना के ग़ुस्से पर यश का जवाब, ‘क्या कह रही हो जान, पता है यह टॉवेल मुझसे मिन्नतें कर रहा था कि मुझे पूरा दिन बाहर टांगे रखते हो, कितनी गर्मी है बाहर, ज़रा 5 मिनट ख़ुद खड़ा होकर देखो, सूखा अचार बन जाओगे, इसीलिए मैंने उसको यहां डाल दिया, वो भी ख़ुश और मैं भी.’

थोड़ा आगे चली, एक जूता इधर, तो एक जूता उधर पड़ा था. एक और स्मृति कौंधी, ‘जूते एक साथ उतारकर क्यों नहीं रखते?’ भड़कती नेहा और यश की ठंडी बयार-सी बातें, ‘पूरा दिन तो बेचारे साथ ही रहते हैं, घर पर तो उन्हें कुछ स्पेस दो, पता है दोनों शिकायत कर रहे थे कि जब देखो हमें साथ-साथ चिपकाए रखते हो, हमें भी एक-दूसरे से थोड़ा ब्रेक चाहिए. तुमको अपनी बीवी से हर व़क्त चिपके रहना है तो चिपको, पर हमें माफ़ करो…’ उसकी ऐसी ही न जाने कितनी बातों को यादकर नैना भीगी आंखों से मुस्कुरा उठी, अब वे बातें बचकानी नहीं लग रही थीं, प्यार आ रहा था उन पर. मौसी के शब्द कानों में गूंज रहे थे, ‘ऊपरवाला ऐसी उलट जोड़ियां ही बनाता है, जिनमें एक की कमी दूसरा पूरी कर दे और दोनों मिलकर संपूर्ण हो जाएं. परफेक्ट हो जाएं.’

‘आप सही कहती हो मौसी, उनकी जोड़ी भी परफेक्ट बनेगी, वह यश की लापरवाही संभाल लेगी और उससे खिलखिलाते हुए जीना सीख लेगी, सोचते हुए नैना भी मौसी-मौसाजी की तरह समझौता एक्सप्रेस में सवार हो गई, जिसका एक ही स्टॉप था- एक सुखी-आनंदित जीवन.

 

   दीप्ति मित्तल

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कहानी- समझौता एक्सप्रेस 2 (Story Series- Samjhota Express 2)

samjhauta express

मौसी अपनी ही धुन में बोले चली जा रही थीं, मगर उनके अंतिम दो वाक्यों पर नैना ठिठक गई, लगा जैसे मौसी ने बात पकड़ ली हो. “एक हंसमुख होगा, तो दूसरा मुंहचढ़ा, बात-बात पर धुआं छोड़नेवाला…” कहते हुए मौसी ने नैना को कनखियों से ऐसे देखा जैसे बुढ़ापेवाली बात का बदला उतार लिया हो.

“अच्छा, आपके और मौसाजी के बीच तो ऐसा कुछ नहीं है. दोनों दो जिस्म एक जान बने घूमते हो.”

“अपनी मौसी से लड़ने की सोचना भी मत बिट्टो, शुरू में ही हार जाओगी. अनुभव से बोल रहे हैं.” मौसाजी ने चुटकी ली, तो मौसी ने आंखें बड़ी कर उन्हें चुप करा दिया. खैर, ऐसी ही हंसी-ठिठोली और लज़ीज़ खाने के साथ नैना का स्वागत हुआ और फिर वह सुस्ताने लगी. मौसी उसके पास आकर बैठीं, तो उनकी गोद में सिर रख आंखें मूंद लीं.

“और सुनाओ बिट्टो, क्या हाल हैं? सब कुशल-मंगल तो है ना? कोई ख़ुशख़बरी…” बड़े-बुज़ुर्गों का दूसरा सेट डायलॉग, जिसे सुन नैना और चिढ़ गई.

“क्या मौसी, आपकी सोच भी आपकी तरह बुढ़ा गई है.”

“बुड्ढी और मैं, उहं… मैं तो अभी जवान हूं. बुढ़ापेवाले लक्षण तो तेरे चेहरे पर डोल रहे हैं. ना जवानी की रंगत, ना ब्याहतावाली चमक… हीरा लड़का खोजकर दिया तुझे, फिर भी ये हाल… कुछ नाराज़गी चल रही है क्या आपस में? तुम्हारी सास बता रही थी कि वह यूएस जानेवाला था, गया क्या? ”

“नहीं दो दिन बाद जाएगा.”

“तो फिर तू यहां कैसे…?” मौसी किसी अनुभवी हकीम की तरह मर्ज़ खंगालने में लग गईं.

“क्यों, नहीं आ सकती क्या? मेरा यहां आने का हक़ नहीं? या मैं उसकी ग़ुलाम हो गई कि हर व़क्त उसकी सेवा में तैनात खड़ी रहूं.” नैना बिफरकर उठ खड़ी हुई.

“मैंने ये कब कहा, मगर उसको विदा करके आ जाती, क्या सोचता होगा वो?” कहते हुए धाकड़ व्यक्तित्ववाली मौसी का स्वर लड़खड़ा-सा गया.

“वह क्या सोचेगा, इसकी बड़ी चिंता है आपको. मैं क्या सोचती हूं, मुझ पर क्या गुज़र रही है, इससे आपको कोई मतलब नहीं… सच तो यह है मौसी, आपने मुझे हीरा लड़का खोजकर नहीं दिया, बल्कि अपनी सहेली के नालायक लड़के को मेरे पल्ले बांध दिया… आप खून के रिश्तों के आगे दोस्ती निभा गईं.” मौसी ऐसा आक्रमण सहने को तैयार न थीं, उन्हें संभलने में कुछ पल लगे, मगर वो इतना ज़रूर समझ गईं कि नैना से बात उगलवाने के लिए फूंक-फूंककर कदम रखने प़ड़ेंगे.

“क्या कहती है बिट्टो, मेरे लिए तू पहले है, मुझे तेरी ज़्यादा चिंता है… उसका क्या है, मर्द जात है… रिश्ते में ग़लती किसी की भी हो, पिसती हमेशा औरत ही है.” अब मौसी ने इमोशन कार्ड खेलना शुरू किया, पर उधर चुप्पी बरकरार रही, “पर हुआ क्या, बता तो… क्या हाल कर दिया मेरी फूल-सी बच्ची का. मिले तो ज़रा, टांगें तोड़कर रख दूंगी उसकी.” मौसी नैना के गाल सहलाते बोलीं.

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“बस… बस… अब इतना भी ड्रामा मत करो. तुम दोनों बहनें सच में ड्रामा क्वीन हो.” मौसी चुप हो गईं, ‘अजीब मुसीबत है. ना इधर से बोलने दे रही है, ना उधर से. करूं तो क्या करूं.’ उन्होंने मन-ही-मन ईश्‍वर को याद किया और आगे की रणनीति तैयार करने लगीं. नैना को वापस खींचकर अपनी गोद में लिटा लिया और उसके बालों में हाथ घुमाने लगीं.

“अच्छा खुलकर बता. कसम से किसी से नहीं कहूंगी. तेरी मां से भी नहीं… तेरा ध्यान नहीं रखता? तुझे प्यार नहीं करता? तुझसे लड़ता है या तेरी बात नहीं सुनता…? कुछ तो बता…?”

लेटे-लेटे नैना सोच रही थी कि मौसी को क्या बताऊं… ध्यान तो रखता है, प्यार भी करता है और कितना भी उकसा लो, लड़ता तो बिल्कुल नहीं… उल्टा दो-चार जोक मारकर खी-खी करता हुआ पतली गली से निकल जाता है. “ऐसी कोई बात नहीं मौसी… बस लगता है जैसे हम दो विपरीत ध्रुव शादी के नाम पर एक साथ बांध दिए गए… हम में कुछ भी एक-सा नहीं… ना आदतें, ना व्यवहार, ना पसंद…”

“हां, तो सही बात है ना बिट्टो, तुम दोनों पति-पत्नी हो, कोई दोस्त नहीं… अलग तो होंगे ही…” नैना ने मौसी को सवालिया नज़रों से घूरा… “देख बिट्टो, हम दोस्त ऐसे बनाते हैं, जो आदतों में, व्यवहार में हमारे जैसे हों, मगर ऊपरवाला पति-पत्नी की ऐसी जोड़ियां बनाता है, जिसमें दोनों बिल्कुल उलट हों, ताकि एक की कमी दूसरा पूरी कर दे और फिर दोनों मिलकर संपूर्ण हो जाएं. सर्वगुण संपन्न हो जाएं. यक़ीन नहीं आता, तो किसी भी जोड़े से पूछ ले. एक को गर्मी ज़्यादा लगेगी, तो दूसरे को सर्दी. एक को मीठा पसंद होगा, तो दूसरे को नमकीन. एक जल्दी उठेगा, तो दूसरा देर तक सोने की ज़िद करेगा. एक पसारा फैलाएगा, तो दूसरा उसे समेटता रहेगा. एक लेटलतीफ़ होगा, तो दूसरा घड़ी से आगे दौड़ेगा…”

मौसी अपनी ही धुन में बोले चली जा रही थीं, मगर उनके अंतिम दो वाक्यों पर नैना ठिठक गई, लगा जैसे मौसी ने बात पकड़ ली हो. “एक हंसमुख होगा, तो दूसरा मुंहचढ़ा, बात-बात पर धुआं छोड़नेवाला…” कहते हुए मौसी ने नैना को कनखियों से ऐसे देखा जैसे बुढ़ापेवाली बात का बदला उतार लिया हो.

“अच्छा, आपके और मौसाजी के बीच तो ऐसा कुछ नहीं है. दोनों दो जिस्म एक जान बने घूमते हो.”

“यह सब ऊपर से दिखता है बिट्टो, अब तुम्हें क्या बताएं कि शुरू में हमने कितना बर्दाश्त किया… पता है, जब हमारी शादी हुई थी, तुम्हारे मौसाजी को तो एसी के बिना नींद ही नहीं आती थी और हमको घंटेभर में ठंड के मारे कुड़की बंधने लगती थी. पहले अकेले रहते थे, तो दूसरे कमरे में आकर सो जाते थे. फिर हमारी सासू मां साथ रहने आ गईं, तो कमरे से बाहर भी नहीं निकल सकते थे वरना जाने क्या-क्या कहानियां बनातीं. तो हम उनके सोते ही चुपचाप एसी बंद कर देते. फिर वे बौखलाए उठते और नींद में ही हमको दस बातें सुनाकर वापस एसी चला देते. हमसे कहा करते थे, ‘सुन लो रज्जो, अगर कभी हमारा तलाक़ होगा तो इसी एसी की वजह से होगा.” मौसी हंसते हुए पुरानी यादों में खो गईं.

“फिर क्या हुआ?” नैना को मौसी की बातों में रस आया.

दीप्ति मित्तल

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कहानी- समझौता एक्सप्रेस 1 (Story Series- Samjhota Express 1)

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शादी की शुरुआत में तो सब ठीक रहा, मगर बाद में नैना को यश का व्यवहार बचकाना लगने लगा. वह मां से शिकायत करती, “मां यश में गंभीरता नाम की चीज़ है ही नहीं, बहुत ही लापरवाह है. कोई चीज़ जगह पर नहीं रखता, कोई काम समय पर नहीं करता, कुछ कहो, तो फालतू की बातें बना खी-खी करके हंसकर निकल जाता है. कितना भी समझाओ, समझता ही नहीं… हम पूरी तरह मिसमैच हैं मां.”

नैना मुंबई जानेवाली बस में चढ़ी और अपनी सीट के ऊपर बैग रखने की जगह तलाशने लगी, “किसका सामान है ये?” वह चिल्लाई तो पीछे से एक पैसेंजर आया, “मेरा है.”

“आपकी सीट पीछे है, तो इसे भी पीछे ही रखिए.” नैना तल्ख हो उठी.

“पीछे जगह नहीं थी तो…” याचक स्वर, पर तिलमिलाता जवाब.

“तो मैं क्या करूं? ये मेरी सीट है. इसके ऊपर की जगह मेरी है.” नैना जैसे यश का सारा ग़ुस्सा उस अजनबी पर उतारने को तैयार बैठी थी. उस व्यक्ति ने अपना सामान हटाया, तो नैना बड़बड़ाते हुए अपना सामान रखने लगी. ‘इस दुनिया में जिसे देखो, वो मुझे ही फॉर ग्रांटेड ले रहा है… ऑफिस में, घर में, बस में… जैसे मैं ही फालतू हूं.’ सामान रख वह आंख मूंदकर बैठ गई. मस्तिष्क में बारंबार बीते कुछ दिनों के वे दृश्य घूम रहे थे, जिनसे पीछा छुड़ा वह मुंबई भाग रही थी. यश की हर बात पर लापरवाही और उसकी हर लापरवाही पर नैना का इरिटेट होना…

यश और नैना दोनों ही आईटी प्रोफेशनल थे. नैना की रजनी मौसी यश की मां की पक्की सहेली थीं. उन दोनों ने ही मिलकर यह रिश्ता तय किया था. मौसी अक्सर उससे कहा करतीं, ‘तेरे लिए तो मैंने यश पर बहुत पहले से नज़र रखी हुई थी. इतना ख़ूबसूरत, ख़ुशमिज़ाज, सीधा, सरल, कमाऊ लड़का कहां मिलता है आज? मेरे कहने से तू आंख मूंदकर शादी कर ले. देखना मुझे ज़िंदगीभर दुआएं देगी.’ यश पहली नज़र में ही उसके दिल में घर कर गया था. दोनों अलग-अलग कंपनी में नौकरी करते थे, मगर थे पुणे में, इसलिए प्रोफेशनल फ्रंट पर भी यह शादी उसके अनुकूल थी.

शादी की शुरुआत में तो सब ठीक रहा, मगर बाद में नैना को यश का व्यवहार बचकाना लगने लगा. वह मां से शिकायत करती, “मां यश में गंभीरता नाम की चीज़ है ही नहीं, बहुत ही लापरवाह है. कोई चीज़ जगह पर नहीं रखता, कोई काम समय पर नहीं करता, कुछ कहो, तो फालतू की बातें बना खी-खी करके हंसकर निकल जाता है. कितना भी समझाओ, समझता ही नहीं… हम पूरी तरह मिसमैच हैं मां.”

पर मां को बेटी की शिकायतें समझ नहीं आती थीं. वे तो इसी बात से ख़ुश थीं कि उनका दामाद दिखने में आकर्षक है, अच्छा ख़ासा कमाता है, उनकी बेटी को प्यार करता है, उसे बराबरी का हक़ और सम्मान देता है, ऑफिस से सीधा घर आता है और उसमें सिगरेट, शराब जैसा कोई ऐब नहीं… इससे ज़्यादा एक लड़की को क्या चाहिए भला? मगर नैना को यही सब पसंद नहीं था. वह बेहद अनुशासित, समय की पाबंद और प्लानिंग करके चलनेवाली लड़की थी, ज़रा-सी अव्यवस्था उसे अपसेट कर देती, वहीं यश इसके ठीक विपरीत था. नैना लाइफ को बहुत सीरियसली लेती थी और यश जटिलतम परिस्थितियों में भी ‘टेक इट ईज़ी’ मंत्र न छोड़ता. चाहे कुछ भी हो जाए, उसके चेहरे पर बुद्ध मुस्कान बनी रहती.

यश को अक्सर प्रोजेक्ट के सिलसिले में देश-विदेश ट्रैवल करना पड़ता, मगर ऐसा कोई ट्रिप नहीं होता, जहां उसका कोई-न-कोई कपड़ा होटल में छूट न गया हो… आराम से घर से निकलना और आख़िरी कॉल पर चेक-इन करना… यह था यश. यदि दोनों को कहीं साथ जाना होता, तो नैना तैयार होकर गेट पर खड़ी हो जाती, पर यश की कुछ ना कुछ लास्ट मिनट की तैयारी चल रही होती… दोनों के बीच जो बहस का सबसे बड़ा मुद्दा था, वह था यश का घर में स्लीपर न पहनकर नंगे पैर चलना… “उफ़़्फ् नंगे पैर यहां-वहां चलते हो और फिर यूं ही बिस्तर पर चढ़ जाते हो.” नैना चिढ़ जाती और रोमांटिक रात चढ़े मुंह से बीत जाती.

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तीन दिन बाद यश की यूएस की फ्लाइट थी. वह अलमारी में कुछ खोज रहा था, तो नैना ने पूछा, “क्या नहीं मिल रहा?”

“नहीं नहीं, कुछ नहीं… ऐसे ही…” बाद में पता चला यश को अपना पासपोर्ट नहीं मिल रहा था. नैना बिफर उठी, “हे भगवान, तुम इतने लापरवाह कैसे हो सकते हो?” हर बार नैना उसकी तैयारी कराती, मगर इस बार उसने कसम खा ली कि चाहे कुछ भी हो, वह उसकी कोई मदद नहीं करेगी. वह भी तो अपने सब काम ख़ुद संभालती है. इसी तरह यश को भी सीखना होगा.

उसने यश को सबक सिखाने की सोची और उसकी फ्लाइट से दो दिन पहले अचानक मुंबई अपनी मौसी के घर जाने का प्रोग्राम बना लिया, इस अकड़ में कि ‘करने दो उसे ख़ुद मैनेज. जब सिर पर पड़ेगी, तभी अक्ल आएगी.’

बस मुंबई-पूना एक्सप्रेस हाइवे के हसीन नज़ारों के बीच दौड़ रही थी. नैना का शरीर सफर कर रहा था, मगर मन वहीं अटका पड़ा था, ‘पता नहीं सब डॉक्यूमेंट संभालकर रखेगा या नहीं. लैपटॉप चार्जर, फोन चार्जर, पावर बैंक, पासपोर्ट… और न जाने कितने ज़रूरी डाक्यूमेंट्स, जिनके न होने पर उसे परेशानी का सामना करना पड़ सकता है. हे भगवान! क्या करूं मैं उसका… कैसे करेगा सब…? कहीं उसे अकेला छोड़कर ग़लती तो नहीं कर दी…’ नैना को डरावने विचार आने लगे. ‘उफ़़्फ्…’ उसने सिर झटक उस विचार को बाहर फेंका, गहरी सांस ली और फिर आंख मूंदकर बैठ गई.

मुंबई पहुंचकर नैना ने पाया कि मौसी उसके स्वागत में गेट पर ही खड़ी थीं और मिलते ही बड़े-बुज़ुर्गों का सेट डायलॉग मारा, “अरे ये क्या… ब्याह के बाद तो लड़कियां फूलकर कुप्पा हो जाती हैं,  मगर तुम तो बड़ी दुबला गई हो बिटिया… गालियां पड़वाओगी अपनी अम्मा से कि कहां ब्याह दिया बिटिया को?”

“इस बात के लिए तो मैं भी आपसे लडनेवाली हूं मौसी.” नैना के स्वर में आक्रोश देख मौसी ने चुप्पी साध ली और उसकी आंखें पढ़ने की कोशिश करने लगी.

     दीप्ति मित्तल

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कहानी- इंजूरियस टु हेल्थ 3 (Story Series- Injurious To Health 3)

अचानक राहुल की निगाह उस तरफ़ उठ गई, नीली साड़ी में नीली मैचिंग के साथ सौम्य चेहरा. हां, 20 बरस गुज़र जाने का और काम के असर ने बहुत कुछ बदल दिया था. ब्लू उसका फेवरेट कलर था और इसीलिए दोस्तों के बीच ‘नीलकंठ’ नाम पड़ गया था उसका. तभी छुटकू बोला, “भइया, वो साथ में उनकी छोटी बेटी है, राहिल.”  “क्या?” राहुल चौंका.  “कुछ नहीं भइया, आप चाहें तो मिल लीजिए.”  वह आगे बढ़ा. उसका दिमाग़ ज़ोर से घूम रहा था. बेटी का नाम राहिल, कितना अजीब-सा नहीं है. तो क्या नीलकंठ उसे… और वो… नहीं, नहीं, किसी बात का कोई अर्थ नहीं है.

उसका असली नाम कुछ और था. राहुल को लगा वह बेहोश होकर गिर जाएगा. आज कॉलेज में तीन साल बीतने के बाद नीलकंठ कहकर गई है, ‘तुम मुझे अपने लगे.’ माय गॉड, सचमुच उसे लगा वह ख़ुशी से पागल हो जाएगा और कुछ नहीं, कहीं ऐसा न हो शाम तक उसके मरने की ख़बर आ जाए.

इधर नीलकंठ गई, उधर दोस्तों ने घेर लिया, “क्यों बेटा, खा गए डांट, बोलो तो आज कॉलेज से लौटते समया सबक सिखा दें. हिम्मत कैसे हुई उसकी राहुल को लेक्चर देने की. इस बार 90 पर्सेंट आ गए, तो उड़ने लगी है.”

“ख़बरदार जो किसी ने उसे कुछ कहा. याद रखना, अगर उसे कुछ हुआ, तो मुझसे बुरा कोई नहीं होगा.”

“हाय मेरे लाल! लगता है चोट दिल पर लगी है.” रवि बोला. तभी राकेश ने कहा, “चल हट यार, जा ज़रा कोई बाम लेकर आ राहुल को इश्क़ हो गया है. मरहम लगाना पड़ेगा.” इतना कहकर पूरा ग्रुप ठहाके लगाते हुए कैंटीन की तरफ़ चल पड़ा.

“ओय राहुल, ज़रा वापस आ जा, हम कैंटीन जा रहे हैं. आ जाओे, आज का बिल तुम दोगे.”

हां, उस दिन के बाद से कॉलेज में राहुल के होंठों से धुएं के छल्ले नहीं देखे गए.

उसने ख़ुद को देखा, सिगरेट अभी-अभी तो उसके हाथ में आई थी, “छुटके, तुम नीलकंठ को कैसे जानते हो.”

वह हंसा, “राहुल भइया, अब यहां रहकर हमने भी बाल धूप में नहीं सुखाए हैं.”

राहुल सॉफ्ट हो गया, “कुछ और जानते हो उनके बारे में, मेरा मतलब आजकल कहां हैं, कैसी हैं?”

“क्या भइया, अब तो शादी-ब्याह हो गया होगा, बच्चे बड़े हो गए होंगे. अभी भी नीलकंठ को भूले नहीं हैं.”

राहुल के दिल से टीस उठी. उसके हाथ से सिगरेट छूट गई थी. उसे गर्मी महसूस हुई, “छुटके, एक कोल्ड ड्रिंक दे.”

“और हां, बाक़ी छोड़, कुछ और बता नीलकंठ के बारे में.”

“कुछ नहीं भइया, इसी कॉलेज में लेक्चरर हो गई हैं, दो बेटियां हैं, दोनों टॉपर. शादी हुए 20 साल हो गए.

एक-दो बार काफ़ी पहले जब कभी मिनरल वॉटर लेती थीं, तो मुझसे पूछ लेती थीं, “राहुल की कोई ख़बर है क्या? एक बार रवि भइया आए थे, उन्हीं से पता चला कि आप सिविल सर्विसेज़ करके बड़े आदमी बन गए हैं.”

सिगरेट नीचे गिर चुकी थी, उसने अपने हुलिए पर नज़र डाली, गाड़ी पीछे खड़ी थी. न जाने शहर की कितनी निगाहें उसे देख रही थीं. वह अगर सिगरेट पीएगा, तो लोग क्रा सोचेंगे? उससे रहा नहीं गया. उसे ज़ोर की तलब लग रही थी. उसने ऊपरवाली पॉकेट से दूसरी सिगरेट निकाली. उसकी निगाह कॉलेज के गेट और उसके ग्राउंड पर थी. उसका दिल हो रहा था कि एक बार फिर उस ग्राउंड में जाए और आसमान की तरफ़ मुंह करके धुएं के छल्ले बनाए.

तभी छुटकू बोला, “राहुल भइया, वो रहीं नीलकंठ मैडम.”

अचानक राहुल की निगाह उस तरफ़ उठ गई, नीली साड़ी में नीली मैचिंग के साथ सौम्य चेहरा. हां, 20 बरस गुज़र जाने का और काम के असर ने बहुत कुछ बदल दिया था. ब्लू उसका फेवरेट कलर था और इसीलिए दोस्तों के बीच ‘नीलकंठ’ नाम पड़ गया था उसका.

तभी छुटकू बोला, “भइया, वो साथ में उनकी छोटी बेटी है, राहिल.”

“क्या?” राहुल चौंका.

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“कुछ नहीं भइया, आप चाहें तो मिल लीजिए.”वह आगे बढ़ा. उसका दिमाग़ ज़ोर से घूम रहा था. बेटी का नाम राहिल, कितना अजीब-सा नहीं है. तो क्या नीलकंठ उसे… और वो… नहीं, नहीं, किसी बात का कोई अर्थ नहीं है.

वह आगे बढ़ा, लेकिन यह क्या उसने अपनी तरफ़ देखा, सिगरेट जल रही थी, उसने सिगरेट नीचे फेंक दी. पैर से मसला. सिगरेट का पूरा डिब्बा उठाकर उसने कूड़ेदान में डाल दिया. वैसे भी यह सिगरेट करती क्या है, जिगर को जलाती है, लंग्स को ख़राब करती है.

लेकिन उसके पैर आगे बढ़ने से पहले ही पीछे की तरफ़ लौट गए, ‘राहुल, तुम एक अच्छे स्टूडेंट हो, कहीं डिस्प्लिनरी एक्शन हो गया, तो करियर ख़राब हो जाएगा.’

उसकी सिगरेट आज छूट गई थी, कॉलेज का रास्ता भी पीछे छूट गया था और उसका अतीत भी. वह गाड़ी में बैठा था, “सुनील, ज़रा गाड़ी तेज़ चलाओ और हां एसी नहीं चल रहा है क्या?”

सुनील को कुछ समझ में नहीं आ रहा था, एसी तो फुल है और अभी 20 की स्पीड पर कह रहे थे कि गाड़ी तेज़ क्यों चला रहे हो और अब 40 की स्पीड पर कह रहे हैं कि गाड़ी तेज़ चलाओ, साहब लोगों का भी कोई भरोसा नहीं.

उसने मोबाइल स्क्रीन सेवर बनाया- ‘स्मोकिंग एंड लिविंग इन पास्ट इज़ इंजूरियस टु हेल्थ. दोनों से कुछ हासिल नहीं होता, दोनों ही जिगर को जलाती हैं.’

Murali Manohar Srivastava

मुरली मनोहर श्रीवास्तव

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कहानी- इंजूरियस टु हेल्थ 2 (Story Series- Injurious To Health 2)

“राहुल, ये कॉलेज कैंपस है और तुम एक अच्छे स्टूडेंट हो, ऐसे सिगरेट मत पिया करो. कभी डिसिप्लिनरी एक्शन हो गया, तो करियर बर्बाद हो जाएगा. वैसे भी इस सिगरेट से मिलता क्या है, वही धुआं, जो जिगर को जला देता है, लंग्स को ख़राब कर देता है. सच तो ये है कि जिस दिन तुम्हारे पापा को पता चलेगा कि तुम कॉलेज से धुएं के छल्ले बनाने के लिए रेस्टिकेट हुए हो, तो वे जीते जी मर जाएंगे.” उसे ज़ोर का ग़ुस्सा आया था उस पर. “ओय! जा अपना लेक्चर अपने पास रख, बड़ी आई मेरी पैरेंट बननेवाली.” वह भी कुछ नहीं बोली, “कुछ नहीं राहुल, मुझे तुम अपने लगे, इसलिए कह दिया, वरना मुझे क्या.

यहां पिक्चर हॉल होता था और यह जो बड़ा-सा रेस्टोरेंट बन गया है, यहीं टी-स्टॉल था. ओह! अगर वह सब कुछ ढूंढ़ भी ले, तो अपनी वह उम्र कहां से लाएगा, जो उस व़क्त थी और उस उम्र के साथी? शायद कभी नहीं मिलेंगे. कॉलेज रीयूनियन में भी नहीं. अब तो जो मिलते भी हैं, वे आदमी मिलते हैं, साथी कहां? (वह हंसा) हम सोचने में भी ईमानदार कहां हैं. चलो, दोस्त मिल भी गए, तो वह कहां मिलेगी? हां, हां, आज फेसबुक और दुनिया के तमाम साधन मौजूद हैं, किसी को भी ढूंढ़ निकालने के लिए. फिर भी, कोई मिलता कहां है. मिल भी जाए, तो मिलता कहां है.

“सुनील, ज़रा गाड़ी रोको, मैं अभी आया.” वह नीचे उतरा. उसने पॉकेट से एक सिगरेट निकाली. एक बार ग़ौर से उसे देखा. यह वह सिगरेट नहीं, जिसका धुआं वह कॉलेज के ज़माने में होंठों से गोल सर्कल में पूरे रिंग की तरह निकालता था और दोस्त उसे दाद दे-देकर ताली बजाते थे. न जाने कितनी भीड़ उसके इस हुनर को देखने के लिए पेड़ों के नीचे खड़ी रहती थी.

‘आह!’ कई बार उसने अपने कानों से मीठी सिसकारियां सुनी थीं, लेकिन एक स्मार्ट स्टूडेंट के अपने जलवे होते हैं, वह मुड़कर किसी को नहीं देखता था. हुंह- ‘किस-किस का ख़ून होने पे रोया करे कोई, हैं लाखों हसरतें दिले उम्मीदवार में.’

कभी कोई कुर्ते का रंग भा गया, तो कभी कोई बालों की अदा, कभी किसी के बात करने के अंदाज़ ने दिल छीन लिया, तो कभी किसी की मुस्कुराहट दिल में बस गई. उसकी इमेज कोई अच्छी तो नहीं थी, हां नंबर अच्छे आने से गिनती अच्छे स्टूडेंट्स में होती थी और इसीलिए इमेज बुरी भी नहीं थी. कॉलेज के ज़माने में थोड़ी-बहुत छूट तो रहती ही है उस उम्र के नाम पर. आए दिन की बात थी, कभी कोई अकेला पाकर कहता, “सुनो राहुल, जब तुम धुएं के छल्ले उड़ाते हो, तो लगता है मेरा दिल उसके साथ आसमान में उड़ा जा रहा है.”

वह हंसता, “चल, रे बता तुझे फिज़िक्स के नोट्स चाहिए क्या? तू ऐसे ही मांग लेती, कभी तुझे मना किया है कॉपी के लिए.”

“राहुल, ऐसी बात नहीं है. हम लोग भी वही नोट्स पढ़ते हैं, पर हमारे नंबर क्यों नहीं आते.”

वह ज़ोर का ठहाका लगाता, “धुएं के छल्ले देखने में और उसे बनाकर आसमान में उड़ाने में बड़ा फ़र्क़ होता है. तुम बस उड़ते हुए छल्ले देखा करो, कभी मेरे साथ सिगरेट पीकर देखो, तो पता चले.”

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“हाय! तुम कितने बदतमीज़ हो, शर्म नहीं आती, मुझसे सिगरेट पीने के लिए कहते हुए. ये काम तुम्हें और तुम्हारे दोस्तों को ही मुबारक. मुझे नहीं चाहिए कॉपी-वॉपी.”

“तू तो नाराज़ हो गई. तू बस पानीपूरी खाया कर. तेरी ज़िंदगी बस उतनी ही है.”

“नहीं तो क्या, धुएं के छल्ले उड़ाने से कोई आसमान में पहुंच जाता है?”

“तू नहीं समझेगी इसे, जब छल्ले ऊपर उठते हैं, तो लगता है मेरे ख़्वाब उड़ान भर रहे हैं. और सुन, ये मेरे डैडी-मम्मी को मत बता देना. मम्मी को तो वैसे ही मेरे होंठों के काले निशान देखकर शक होने लगा है.”

“सुन, तेरी मम्मी का तो पता नहीं, पर कॉलेज में मेरी सभी फ्रेंड्स को तेरे ये गोल काले होंठ बहुत पसंद हैं.”

इतना कहकर वह भागी, “और तुझे पसंद हैं कि नहीं?” उसने पूछा, लेकिन कोई जवाब नहीं आया. यह आए दिन के क़िस्से थे. कॉलेज के ज़माने में कभी किसी हसरत का ख़ून होता, तो कभी किसी और का. यहां तक कि आज तो यह भी नहीं याद कि उस ज़माने की हसरतें क्या-क्या थीं?

उसकी नज़र थोड़ी दूर गई, दुकान नज़र आ गई थी, “एक सिगरेट.”

एक हाथ गुमटी से बाहर आया, बूढ़ी आंखों से झांकते हुए किसी ने जैसे चश्मा साफ़ किया, “राहुल भइया, आप बड़े दिन बाद नज़र आए.” सिगरेट आगे बढ़ाते हुए वह बोला.

राहुल ने भी थोड़ा ध्यान से देखा, “अरे छुटके तू! तू अभी भी यहीं है? और पहचान में नहीं आ रहा, बिल्कुल बदल गया है. मुंह पोपला हो गया, बाल गायब.”

वह हंसा, “हमें कहां जाना है राहुल भइया, हमारी छोड़ो पर अब तो आप बड़े आदमी हो गए हैं. वो एक दिन नीलकंठ मैडम किसी से बात कर रही थीं.”

राहुल चौंका, “नीलकंठ मैडम!” ओह नीलकंठ, वही नीलकंठ, एक दिन जिसने उसे रोककर कहा था, “राहुल, ये कॉलेज कैंपस है और तुम एक अच्छे स्टूडेंट हो, ऐसे सिगरेट मत पिया करो. कभी डिसिप्लिनरी एक्शन हो गया, तो करियर बर्बाद हो जाएगा. वैसे भी इस सिगरेट से मिलता क्या है, वही धुआं, जो जिगर को जला देता है, लंग्स को ख़राब कर देता है. सच तो ये है कि जिस दिन तुम्हारे पापा को पता चलेगा कि तुम कॉलेज से धुएं के छल्ले बनाने के लिए रेस्टिकेट हुए हो, तो वे जीते जी मर जाएंगे.” उसे ज़ोर का ग़ुस्सा आया था उस पर.

“ओय! जा अपना लेक्चर अपने पास रख, बड़ी आई मेरी पैरेंट बननेवाली.”

वह भी कुछ नहीं बोली, “कुछ नहीं राहुल, मुझे तुम अपने लगे, इसलिए कह दिया, वरना मुझे क्या. जिसे जो मर्ज़ी करे, चाहे कुएं में कूदकर जान दे दे या ज़हर खाकर, फ़र्क़ क्या पड़ता है. फाइनल ईयर है, बस, छह महीने बचे हैं. बाक़ी तुम जानो और तुम्हारा काम जाने. वैसे भी मुझे तुमसे कोई नोट्स नहीं चाहिए.”

Murali Manohar Srivastava

मुरली मनोहर श्रीवास्तव

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कहानी- इंजूरियस टु हेल्थ 1 (Story Series- Injurious To Health 1)

कॉलेज की लाइफ स़िर्फ और स़िर्फ क्लास, स्पोर्ट्स ग्राउंड, कल्चरल मीट और किसी मोड़ पर चाय पी लेने भर से पूरी नहीं हो सकती, जब तक कि उसमें लाइफ का वह एंगल न जुड़े, जिसे प्यार कहते हैं. उस प्यार की सीमा हर किसी के लिए अलग होती है, किसी के भीतर वह एक सुखद एहसास, एक अनछुआ-सा पहलू बनकर रह जाता है, कोई इस सागर के किनारे बैठकर मोतियों का इंतज़ार करता है और कोई अंगूर खट्टे हैं, के मुहावरे को चरितार्थ कर कैंपस से बाहर निकल जाता है.

ज़िंदगी स़िर्फ यादों का खेल है क्या?

एक उम्र के बाद जीने के लिए स़िर्फ अतीत ही क्यों बचता है… वह जिस तेज़ी से अपनी कार से सड़क पर गुज़र रहा था, उससे भी तेज़ मन में विचार व भावनाएं दौड़ रही थीं.

अभी-अभी बाईं तरफ़ जो पार्क गुज़रा है, इसमें कहीं एक बड़ा-सा पेड़ था, बहुत घना, इतना कि बस उसके नीचे कहीं छुप जाएं, तो कोई ढूंढ़ ही न सके. और यह रोड, इस रोड पर साइकिल से वह कितना दौड़ा है. इसी रोड पर तो आगे जाकर दाहिनी तरफ़ उसका कॉलेज था. आह! कॉलेज, कौन-सा कॉलेज, वही जिसने उसकी ज़िंदगी बदल दी या वह कॉलेज, जिसने उसे ज़िंदगी दी. कॉलेज तो सभी ज़िंदगी बदलने के लिए बने होते हैं. बात कॉलेज की कम, उस उम्र की ज़्यादा होती है, जो किसी को बना और बिगाड़ देती है.

इसी मोड़ पर चार की दुकान से चार पीते, बिस्किट और समोसे खाते न जाने कितने स्टूडेंट्स इंटरनेशनल फ्लाइट पकड़ देश छोड़ गए, कितने ही शहर छोड़ गए. हां कुछ ऐसे भी हैं, जो आज भी यहीं बने हुए हैं, जस के तस.

वह… वह… उसे हंसी आई. वह कॉलेज छोड़कर दुनि या घूम आया है और एक बार फिर अपने शहर लौटा है, अपनी पोस्टिंग की वजह से.

उसे लगा उसके भूतकाल के चिंतन में और कॉलेज की थ्योरी में कुछ अधूरापन है, जैस कि मैथ्स का कोई सवाल हल तो हो जाए, लेकिन उसका उत्तर किस-किस स्टेप से गुज़रकर आया यह न पता हो, तो वह उत्तर अधूरा-सा लगता है, जैसे कि पाइथागोरस की थ्योरम में जब तक यह न बताया जाए कि एक लाइन पर, जब दूसरी परपेंडिकुलर लाइन पड़ती है ट्राएंगल के लिए, तभी हाईपोटिनस स्न्वैर लेंथ और बिड्स के स्न्वैर जोड़ के बराबर होता है. यह थ्योरम अगर ट्राएंगल में एक एंगल 90 डिग्री नहीं है, तो सही नहीं हो सकती. उसी तरह कॉलेज की लाइफ स़िर्फ और स़िर्फ क्लास, स्पोर्ट्स ग्राउंड, कल्चरल मीट और किसी मोड़ पर चाय पी लेने भर से पूरी नहीं हो सकती, जब तक कि उसमें लाइफ का वह एंगल न जुड़े, जिसे प्यार कहते हैं.

उस प्यार की सीमा हर किसी के लिए अलग होती है, किसी के भीतर वह एक सुखद एहसास, एक अनछुआ-सा पहलू बनकर रह जाता है, कोई इस सागर के किनारे बैठकर मोतियों का इंतज़ार करता है और कोई अंगूर खट्टे हैं, के मुहावरे को चरितार्थ कर कैंपस से बाहर निकल जाता है. हां कुछ होते हैं, जो उम्र के इस पड़ाव पर नदी के बहाव में डरे बिना गोता लगा प्रेम के मोती समेट लाते हैं. उनकी लाइफ कॉलेज में कई तरह से बदलती है. एक तरफ़ जहां सचमुच करियर के लिए लाइफ बदलती है, तो वहीं न जाने कितने दर्द और मिठास के अनुभव उसे पूरी ज़िंदगी जीने की ताक़त दे देते हैं.

हां, व़क्त बीतने के साथ न साथियों के नाम याद रहते हैं, न चेहरा, पर ऐसा भी नहीं होता कि उम्र हर चेहरे और हर नाम पर मिट्टी डाल दे. कुछ नाम, कुछ चेहरे, कभी भूले भी तो नहीं जाते. हां, फिर वही चेहरे इतने बदल जाते हैं कि पहचाने नहीं जाते. ‘आईना वही रहता है, चेहरे बदल जाते हैं’ यह सच बात है. हां, दिल का आईना कभी नहीं बदलता और उस आईने में जब इंसान अपने कॉलेज की लाइफ देखता है, तो सचमुच उसे अपने दिल के आईने में अपने चाहनेवालों के चेहरे बदले नज़र आते हैं.

यह अलग बात है कि दिल हर बदले चेहरे को पहचान तो लेता है, लेकिन उसके बदल जाने को स्वीकार नहीं करना चाहता.

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सामने कॉलेज का गेट नज़र आ रहा है, ओह गॉड! यह ऑडिटोरिरम बिल्डिंग है- इसी में तो एनुअल फंक्शन में उसने गाया था- ‘अब के हम बिछड़े, तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें, जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें…’

उसे हंसी आ गई, जब उसने स्टेज पर यह ग़ज़ल गाई थी, तो उसे कहां एहसास था कि एक दिन उसे अपनी यह ग़ज़ल सचमुच ज़िंदगी में इस रूप में मिलेगी.

ड्राइवर गाड़ी चला रहा था और वह दिल के भीतर साइकिल से गुज़र रहा था, “सुनो सुनील, गाड़ी ज़रा धीरे चलाओ.”

“साहब, गाड़ी तो बहुत धीरे है, स्पीड पंद्रह से ऊपर तो की ही नहीं मैंने.”

“ओह! ठीक है, ठीक है, तुम चलाओ. ग़लती तुम्हारी नहीं है, मेरी है.” वह सोचने लगा इस व़क्त तो उसके चिंतन की स्पीड साइकिल की स्पीड से भी कम हो गई है. लगा जैसे वह इस शहर के हर मोड़ पर एक बार फिर रुक-रुककर ज़िंदगी गुज़ार रहा है.

Murali Manohar Srivastava

 

 

 

 

 

मुरली मनोहर श्रीवास्तव

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कहानी- खुलासा 3 (Story Series- Khulasa 3)

इस खुलासे से मैं सिर से लेकर पांव तक कांप उठी थी. तो यह वजह थी पराग के एकदम से ग़ायब हो जाने की. यह वजह है पूर्वी से शादी करके उसे परेशान करने की. इसी सोच में डूबी मैं बदहवासी में चिल्ला उठी थी. “यह आपने अच्छा नहीं किया अनुज. अब वह हमारी पूर्वी से बदला ले रहा है.” अनुज के चेहरे पर नासमझी के भाव देख मुझे अपनी ग़लती का एहसास हुआ.

तब किसने सोचा था कि यही पराग एक दिन पूर्वी पर बेबात शक़ कर उसे इतना परेशान करेगा कि वह घर छोड़ने पर मजबूर हो जाएगी. और यह भी किसने सोचा था कि पत्नी पर अकारण शक़ करनेवाला इंसान अपनी बहन के पक्ष में ऐसे सीना तानकर खड़ा हो जाएगा. मैं हैरान रह गई थी, जब अगले ही दिन अनुज पूर्वी को लेकर पराग के पास रवाना हो गए थे. पूरे तीन दिन उनके संग गुज़ारकर, सब समझौता आदि करवाकर पूरी तसल्ली के बाद ही वे लौटे थे.

अनुज के लौटने के बाद से ही मैं उनमें आश्‍चर्यजनक परिवर्तन महसूस कर रही थी. शाम को एक-दो घंटे क्लीनिक जाकर वे लगभग पूरी शाम ही मेरे संग गुज़ारने लगे थे. हर व़क़्त मेरे पास बने रहते. मुझे ख़ुश रखने का प्रयास करते नज़र आते. शायद मैं प्रेग्नेंट हूं, इसलिए वे मेरा इतना ध्यान रख रहे हैं, यही सोचकर मैं आश्‍वस्त हो गई थी.

अक्सर मैंने उनकी आंखों में पश्‍चाताप के भाव देखे थे और जिस दिन लेडी डॉक्टर ने यह बता दिया कि बच्चे की पोज़ीशन में फ़र्क़ आ जाने के कारण केस थोड़ा जटिल हो गया है, कभी भी ऑपरेशन करना पड़ सकता है, तब से अनुज हर पल मेरे पास बने रहने लगे. कॉलेज से उन्होंने अवकाश ले लिया था. अक्सर मेरी तीमारदारी करते वे भावनाओं में बह जाते थे. ऐसे ही एक नाज़ुक पल में वे एक नाज़ुक से रहस्य का खुलासा कर बैठे थे. “याद है सरू, तुम किसी लड़के के साथ बैडमिंटन खेलने जाती थी. फिर एक दिन वो तुम्हें बाइक पर छोड़ने घर आ गया था…” मैं चौंक उठी थी, अनुज उस बात को अब तक ज़ेहन से नहीं निकाल पाए हैं.

“उस व़क़्त पज़ेसिवनेस के कारण मैं अपना आपा खो चुका था. जिन लोगों ने मुझे भड़काया था, मैंने उन्हीं से कहकर गुंडों के माध्यम से उस लड़के को धमकाया था कि घर तो दूर, वह अगर कभी इस कॉलेज परिसर में भी नज़र आया, तो उसका ऐसा बुरा हाल करेंगे कि ज़िंदगीभर अपने पैरों पर खड़ा तक नहीं हो पाएगा. आज सोचता हूं, जिससे कभी प्रत्यक्ष मिला नहीं, जिसका नाम-पता तक कभी पूछा नहीं, उससे क्यों व्यर्थ ही लोगों के बहकावे में आकर दुश्मनी मोल ले बैठा?”

इस खुलासे से मैं सिर से लेकर पांव तक कांप उठी थी. तो यह वजह थी पराग के एकदम से ग़ायब हो जाने की. यह वजह है पूर्वी से शादी करके उसे परेशान करने की. इसी सोच में डूबी मैं बदहवासी में चिल्ला उठी थी. “यह आपने अच्छा नहीं किया अनुज. अब वह हमारी पूर्वी से बदला ले रहा है.” अनुज के चेहरे पर नासमझी के भाव देख मुझे अपनी ग़लती का एहसास हुआ.

“पराग ही वह लड़का है, जिसे आपने गुंडों के माध्यम से धमकाया था. अब वह हमारी पूर्वी को नहीं छोड़ेगा… आप पूर्वी को फोन लगाइए. वह ठीक तो है न?”

“अभी रात में? ठीक है, लगाता हूं.” उन्होंने तुरंत पूर्वी को फोन लगाकर उसकी कुशलता पूछी.

“मैं बिल्कुल ठीक हूं भैया. पराग बिल्कुल सुधर गए हैं. आप बस भाभी का ध्यान रखिएगा.” पूर्वी की निश्छल हंसी और बीच-बीच में पराग से होती चुहल ने हमें आश्‍वस्त कर दिया था.

पर हमारी सोच की दिशा भी बदल दी थी.

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अचानक कुछ याद आने पर मैं चौंकी, “जिस समय पूर्वी यहां थी, मैंने उसे रात को फोन पर दबी आवाज़ में किसी से बात करते और हंसते देखा था. तब मुझे शक़ हुआ था कि कहीं वाक़ई इसका किसी से चक्कर तो नहीं है, जैसा कि पराग कह रहा है. पर फिर तुरंत मैंने ख़ुद को समझाया कि अगर मैं ही उस पर भरोसा नहीं करूंगी, तो दूसरा कौन करेगा? अब लगता है, वो पराग से बातें कर रही थी और यह तुम्हें सुधारने का उनका मिला-जुला नाटक था.”

“मैं भी यही सोच रहा था, क्योंकि तीन दिन मैं वहां रहा और मुझे उनका झगड़ा बनावटी लगा. मैं उन्हें समझाता, तो वे हामी भरकर वही बात मुझे समझाने लग जाते थे. लगता था, आपसी विश्‍वास की ज़रूरत उन्हें नहीं हमें है. तभी तो मैंआने के बाद से इतना बदल गया हूं.”

“अभी दूध का दूध और पानी का पानी हुए जाता है.” कहते हुए मैंने पूर्वी को फोन लगाया और डरते-डरते ‘हेलो’ कहा.

“हां भाभी, क्या हुआ? अभी तो भैया से बात हुई थी.”

“अच्छा! मुझे नहीं पता. मैं तो दूसरे कमरे में सोती हूं. तुम्हारे श़क्क़ी भैया हर व़क़्त मेरी जासूसी करते हैं.”

“क्या, अब भी? हमारे इतने नाटक के बावजूद भी भैया नहीं सुधरे?”

“नाटक?”

और पूर्वी ने सारा सच उगल डाला था. इस बार तीर निशाने पर लगा था. “हम जल्दी से जल्दी आने का प्रयास करेंगे भाभी. तब तक आप अपना ख़्याल रखिएगा.”

“बेचारी! हम सता रहे हैं उन्हें.” मैंने फोन रखते हुए कहा.

“उन्होंने भी हमें बहुत सताया है. फ़िलहाल तो तुम्हें सताने का मन हो रहा है.” कहते हुए अनुज ने मुझे बांहों में भर लिया था.

   शैली माथुर

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कहानी- खुलासा 2 (Story Series- Khulasa 2)

‘अनुज समझते क्या हैं अपने आपको? मुझसे ज़िम्मेदार और समझदार पत्नी होने की उम्मीद रखते हैं, पर ख़ुद उन्होंने पति होने की कौन-सी ज़िम्मेदारी निभाई है? सुबह तैयार होकर घर से निकलते हैं, तो देर रात तक घर की तरफ़ झांकते तक नहीं हैं. नई-नवेली पत्नी किस तरह अकेले पूरा दिन गुज़ारती है, कभी ख़्याल भी आया है इन्हें? रोज़ वही नीरस और उबाऊ रूटीन. कभी अनुज ने जानने की कोशिश भी की कि मेरी क्या हॉबी है? उन्हें तो शायद पता भी नहीं होगा कि मैं राज्य स्तर पर खेली हुई बैडमिंटन खिलाड़ी हूं. मेरी संतुष्टि, मेरी ख़ुशी उनके लिए कोई मायने नहीं रखती.’

“सॉरी मैम! मुझे खेलने के लिए आप पर ज़्यादा ज़ोर नहीं डालना चाहिए था.”

“कोई बात नहीं. मेरा अपना भी तो मन था. तुम्हारी ग़लती नहीं है.”

“फिर भी मैम, मुझे माफ़ कर दीजिए. मैं वाक़ई बहुत शर्मिंदा हूं. चलिए, मैं आपको बाइक पर घर छोड़ देता हूं.”

“अरे नहीं, मैं चली जाऊंगी. दस मिनट का तो रास्ता है. अब मैं ठीक हूं.”

“नहीं मैम, आप बाइक तक चलिए. और अगर आप कहें, तो मैं आपको उठाकर ले चलता हूं.” मुझे उठाने के लिए उसने जैसे ही हाथ बढ़ाए, तो मैं संकोच से भर उठी.

“नहीं, नहीं, मैं चली जाऊंगी.” मैंने ग्लास का पूरा पानी ख़त्म किया. दिमाग़ कुछ ठंडा हुआ, तो मुझे लगा पराग का प्रस्ताव मान लेने में ही समझदारी है. पैदल चलने जैसी मेरी स्थिति नहीं थी. अनुज को इतनी दूर क्लीनिक से गाड़ी लेकर बुलाना बेव़कूफ़ी थी और किसी और को बुलवाना बेकार ही तिल का ताड़ बनाने जैसा था. मैं पराग की बाइक पर बैठ घर लौट आई थी. उस व़क़्त मुझे

अनुमान नहीं था कि यह छोटी-सी बात इतना तूल पकड़ लेगी. किसी ने नमक-मिर्च लगाकर पूरा वाक़या अनुज को बता दिया था. अगले दिन ही अनुज ने मुझसे इस बारे में पूछ लिया. उनके स्वर में नाराज़गी साफ़ झलक रही थी और उन्होंने इसे छुपाने की भी कोई कोशिश नहीं की.

“मुझे नहीं मालूम था कि अपनी बीवी के बारे में मुझे दूसरों से पता चलेगा.”

“आप बेकार में परेशान हो जाते, इसलिए मैंने तुरंत आपको नहीं बताया. सोचा किसी दिन आराम से बैठकर बातें होंगी, तब बता दूंगी.”

अनुज एक पल मौन रहे फिर बोले, “तुम्हें मेरे और अपने स्टेटस का ख़्याल रखना चाहिए. आगे तुम ख़ुद समझदार हो. अपनी ज़िम्मेदारी समझ सकती हो.” इतना बोलकर बिना मेरे जवाब का इंतज़ार किए अनुज ने गाड़ी की चाबी उठाई और चलते बने. मैं बौखला उठी थी. मुझे मुजरिम की तरह कठघरे में खड़ा कर, बिना सफ़ाई पेश करने का मौक़ा दिए ये अपना एकतरफ़ा फैसला सुनाकर चल दिए थे. आज सोचती हूं, तो लगता है अगर उस व़क़्त अनुज ने शांति से बात की होती, तो शायद मैं अपनी लापरवाही मान भी लेती, पर उनके ग़ैरज़िम्मेदारानापूर्ण आक्षेप से मेरा आक्रोश उबल पड़ा था.

‘अनुज समझते क्या हैं अपने आपको? मुझसे ज़िम्मेदार और समझदार पत्नी होने की उम्मीद रखते हैं, पर ख़ुद उन्होंने पति होने की कौन-सी ज़िम्मेदारी निभाई है? सुबह तैयार होकर घर से निकलते हैं, तो देर रात तक घर की तरफ़ झांकते तक नहीं हैं. नई-नवेली पत्नी किस तरह अकेले पूरा दिन गुज़ारती है, कभी ख़्याल भी आया है इन्हें? रोज़ वही नीरस और उबाऊ रूटीन. कभी अनुज ने जानने की कोशिश भी की कि मेरी क्या हॉबी है? उन्हें तो शायद पता भी नहीं होगा कि मैं राज्य स्तर पर खेली हुई बैडमिंटन खिलाड़ी हूं. मेरी संतुष्टि, मेरी ख़ुशी उनके लिए कोई मायने नहीं रखती.’

अगले दो दिन तक तो मैं ख़ुद ही तबीयत ठीक न होने के कारण बाहर नहीं निकली. तब तक आक्रोश का उफ़ान भी बुलबुलों में तब्दील हो गया था. उसके बाद जब गई, तो पराग नदारद था. जब काफ़ी दिनों तक वह नज़र नहीं आया, तो मैंने एक दिन चौकीदार से पूछा था. “परीक्षाएं नज़दीक हैं न मैडम, तो आजकल बच्चे कम ही आते हैं.” फिर मैंने उधर जाना ही छोड़ दिया था. व़क़्त के साथ स्मृतियां भी धुंधलाती चली गई थीं.

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पेट में नन्हें शिशु के आने की हलचल मिली, तो घूमने जाना भी कम हो गया. उसी समय पूर्वी का रिश्ता तय हो जाने की सूचना आई थी. मैं उल्टियों से बेहाल थी, इसलिए अनुज अकेले ही घर गए थे और शगुन का दस्तूर हो गया था.

“लड़का बहुत अच्छा है. अपनी ही यूनिवर्सिटी से डॉक्टर है.” अनुज ने बताया था.

“फिर तो आप जानते होंगे?”

“अरे नहीं. हर साल हज़ारों लड़के निकलते हैं, कहां ध्यान रहता है? फिर वह तो दूसरी ब्रांच से है. हां, वह मुझे पहचानता है.”

“हूं..! प्रधानमंत्री को सब जानते हैं, पर वे किसी को नहीं जानते.” मैंने चुहल की थी. दो महीने बाद ही शादी थी. पूर्वी के दूल्हे के रूप में पराग को देख मैं चौंकी थी. मन हुआ अनुज को बताऊं. पर फिर लगा जब वैसी कोई बात ही नहीं है, तो ऐसे में उस अप्रिय प्रसंग को कुरेदने से क्या मतलब? बेकार में ही पूर्वी की ज़िंदगी में कोई बवंडर न आ जाए. पराग ने भी कहीं ऐसा ज़ाहिर नहीं होने दिया कि वह मुझसे पूर्व परिचित है.

shaile mathur

  शैली माथुर

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कहानी- खुलासा 1 (Story Series- Khulasa 1)

मेरा दिल डूबने लगा. मर्दों की तो फ़ितरत ही है बेवजह शक़ करना. ख़ुद अनुज ही कौन-से अपवाद हैं? तभी तो मैं अनुज को आज तक यह बताने का साहस नहीं कर पाई हूं कि पराग वही लड़का है… वही… मेरी आंखों के सामने बैडमिंटन खेलते पराग का चेहरा उभर आया था. ज़्यादा व़क़्त कहां हुआ है उस बात को?

पूर्वी को अचानक आया देख हम दोनों के चेहरे प्रसन्नता से खिल उठे थे, पर उसका उतरा चेहरा और भारी सूटकेस तो कुछ और ही कहानी बयां कर रहे थे. इससे पहले कि हम दोनों में से कोई उससे कुछ पूछने का साहस कर पाता, वह अपने भैया यानी अनुज के सीने से लग सिसक पड़ी. अनुज ने हमेशा अपनी छोटी बहन को बेटी जैसा स्नेह दिया है. पूर्वी ने जो खुलासा किया, उसे सुनकर तो हम दोनों हैरान ही रह गए. पर फिर ठंडे दिमाग़ से सोचा, तो लगा समस्या इतनी भी गंभीर नहीं है. थोड़ा ही व़क़्त तो हुआ है उसकी शादी को और फिर शादी कोई परिपक्वता आ जाने की गारंटी तो है नहीं. पूर्वी ने सिसकियों के बीच बताया कि उसके पति पराग उस पर बात-बात पर शक़ करते हैं.

अभी कुछ दिनों पहले ही वह वॉक से लौट रही थी, तो उसका दुपट्टा एक कंटीली झाड़ी में उलझ गया था. वहां से गुज़रते एक अनजान युवक ने उसे निकालने में मदद की. उसी का शुक्रिया अदा करने में थोड़ी देर हो गई, तभी पराग वहां आ धमके और उसे बिना दुपट्टे के एक अजनबी युवक से हंसते-बोलते देख तैश में आ गए. पूर्वी के लाख सफ़ाई देने पर भी उनके दिमाग़ से शक़ का कीड़ा नहीं निकला और व़क़्त-बेव़क़्त वे पूर्वी को ताने मारते ही रहते हैं.

मेरा दिल डूबने लगा. मर्दों की तो फ़ितरत ही है बेवजह शक़ करना. ख़ुद अनुज ही कौन-से अपवाद हैं? तभी तो मैं अनुज को आज तक यह बताने का साहस नहीं कर पाई हूं कि पराग वही लड़का है… वही… मेरी आंखों के सामने बैडमिंटन खेलते पराग का चेहरा उभर आया था. ज़्यादा व़क़्त कहां हुआ है उस बात को?

शादी के बाद मैं अनुज के संग यहां मेडिकल कॉलेज परिसर स्थित आवास में रहने आई थी. जल्दी ही आस-पास की महिलाओं से मेरी दोस्ती हो गई और मैं भी उनके संग शाम को घूमने जाने लगी. अनुज की तरह ही परिसर के ज़्यादातर डॉक्टर्स शाम को कॉलेज से फ्री होकर क्लीनिक में प्रैक्टिस के लिए चले जाते थे और देर रात घर लौटते थे.

एक शाम हमारा ग्रुप जिम्नेज़ियम की ओर निकल गया. वहां बैडमिंटन खेलते लड़के-लड़कियों को देखकर मेरा मन भी खेलने को मचल उठा. कारण, मैं बैडमिंटन  की राज्य स्तर की खिलाड़ी रह चुकी थी. बमुश्किल एक साथी महिला साथ खेलने को तैयार हुई. पर चूंकि वह मेरे स्तर की नहीं थी, इसलिए मुझे खेल में मज़ा नहीं आ रहा था. वहां मौजूद एक लड़के को शायद मेरी प्रतिभा और उकताहट का अंदाज़ा हो गया था. उसने साथी महिला से आग्रह कर रैकेट हथिया लिया. उसके बाद जो खेल का समा बंधा, तो आस-पासवाले भी अपना खेल रोककर हमें निहारने लगे. पूरे तीन सेट खेलने के बाद ही मैं घर लौट सकी थी.

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दिल में बेपनाह उत्साह और ख़ुशी थी, जो चेहरे से छलक रही थी, पर अनुज इतने व्यस्त रहते थे कि उनके पास मेरे चेहरे को पढ़ने का व़क़्त ही नहीं था. यह सब देखकर मन बुझ-सा जाता था, पर एक डॉक्टर की पत्नी का कर्तव्य याद कर मैं उनसे कोई शिकायत न करती थी. मैंने अपनी ख़ुशियां अपनी हॉबी में तलाश ली थी. मैं बेसब्री से शाम का इंतज़ार करती और महिलाओं के झुंड के संग निकल पड़ती. पर खेलते-खेलते इतनी देर हो जाती कि लौटती अक्सर अकेली ही थी. जिस तरह शराबी को शराब की और जुआरी को जुए की लत पड़ जाती है, उसी तरह मुझे भी रोज़ शाम को खेलने की लत पड़ गई थी. यदि कभी किसी वजह से ऐसा नहीं हो पाता, तो मैं अंदर ही अंदर बहुत छटपटाहट महसूस करती. हमें साथ खेलते इतने दिन हो गए थे, पर अब भी मैं अपने साथी खिलाड़ी के बारे में मात्र इतना जानती थी कि उसका नाम पराग है और वह मेडिकल फाइनल ईयर का स्टूडेंट है.उस दिन मेरी तबीयत ठीक नहीं थी. दिनभर लेटी रही, पर शाम होते ही घर काटने को दौड़ने लगा. मैंने सोचा, चलो आज खेलूंगी नहीं, सबके साथ घूमकर ही लौट आऊंगी. जिम के आगे से हम निकल ही रहे थे कि पराग की नित्य की पुकार ‘खेलें मैम?’ सुनाई पड़ी. मेरे हाथ रैकेट थामने को मचलने लगे. पर मैंने अपने मचलते अरमानों को क़ाबू किया, “नहीं, आज नहीं. तबीयत थोड़ी नासाज़ है.”

“एक सेट मैम, प्लीज़!” पराग का निवेदन करता चेहरा देखकर, मैं मना नहीं कर सकी. एक सेट हारने, दूसरा जीतने के बाद मैं लत से मजबूर तीसरा सेट खेलने को कोर्ट में कूद पड़ी. खेल लगभग समाप्त होने को था कि मुझे लगा मेरे अंदर की सारी ऊर्जा ख़त्म हो गई है. मुझे चक्कर आया और मैं वहीं ढेर हो गई. होश आया, तो मेरा सिर पराग की बांहों पर टिका था और वह मुझे ज़बरदस्ती पानी पिलाने का प्रयास कर रहा था. मुझे होश में आया देख उसने राहत की सांस ली.

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शैली माथुर

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कहानी- भ्रांति 3 (Story Series- Bhranti 3)

वे शायद नहीं जानतीं कि उनकी गिरती हालत देखकर मैं कितनी बार अंदर से कमज़ोर हुआ हूं, टूटा हूं, बिखरा हूं, ख़ुद को नितांत एकाकी पाकर रोया भी हूं. पर उनके सामने मज़बूत बना रहा हूं. सच, कभी-कभी भ्रांति में जीना भी कितना सुकून देता है… डॉक्टर से मिलने के बाद मन हो रहा था उड़कर मां के पास पहुंच जाऊं और उनके गले लगकर फफक पडूं. पर अब लग रहा था कि अच्छा हुआ ऐसा नहीं किया. यदि कोई भ्रांति इंसान को सुकून की मौत दे सकती है, तो क्यों न उस भ्रांति को बने ही रहने दिया जाए.

मुझे लगा, मैं चक्कर खाकर गिर पड़ूंगा. मां भी आम इंसान की तरह कोमल हृदय रखती हैं, उनमें भी वात्सल्य कूट-कूटकर भरा है, भावनाएं उन पर भी हावी होती रही हैं और मैं समझता रहा कि वे हाड़-मांस की नहीं, फौलाद की बनी हैं. वे अमृत पीकर इस धरा पर अवतरित हुई हैं और हमेशा मेरी ढाल बनकर खड़ी रहेंगी.

मां का आत्ममंथन जारी था. “जब सुशील का साथ छूटा, तो एकबारगी तो यह दुनिया छोड़ने का मन हुआ था. यह तो नन्हें मेहुल की मासूम आंखें और मेरे पल्लू पर उसके नन्हें हाथों की मज़बूत पकड़ थी, जिसने मुझे वह कायराना हरक़त करने से रोका और दुनिया का सामना करने की ताक़त दी. तब से आज तक मैं हर पल मेहुल के लिए जी रही हूं. कितना तड़पी थी मैं उस व़क्त, जब मेहुल उच्च शिक्षा के लिए विदेश चला गया था. वह तो बार-बार यही कहता रहा- ‘मां, मैं तुम्हें छोड़कर नहीं जाऊंगा. यहीं पढ़ लूंगा…’ पर मैं जानती थी ऐसा सुअवसर कितनों के नसीब में होता है? अपनी प्रतिभा के बल पर वह उन्नति के इस पायदान पर पहुंचा है और मैं अपने प्यार की बेड़ियां डालकर उसके बढ़ते क़दमों को वहीं थाम लूं? नहीं, मैं इतनी स्वार्थी नहीं हो सकती थी.”

“पर मेहुल के लिए तुम्हें विदा करना इतना आसान नहीं होगा दीदी. तुम नहीं जानतीं ऊपर से वह लड़का मज़बूत बना रहता है, पर तुम्हारी बीमारी ने कुछ ही दिनों में उसे अंदर से तोड़कर रख दिया है.”

“जानती हूं. मां हूं उसकी. इसीलिए तो तुमसे कह रही हूं कि उसका ख़्याल रखना. मैं चाहती हूं जिस तरह मैंने उसे ख़ुशी-ख़ुशी विदेश के लिए विदा किया था, वैसे ही वह भी मुझे ख़ुशी-ख़ुशी विदा करे. जिस तरह मैंने यह सोचकर ख़ुद को मज़बूत बनाए रखा कि मेरा बेटा जहां भी है ख़ुश है, आराम से है. वैसे ही वह भी अपने मन को समझा ले कि और कष्ट झेलने की बजाय मां अपने पूरे होशोहवास में शांतिपूर्वक इस दुनिया से विदा हुई.”

मैं काठ की तरह खड़ा रह गया था. न शरीर हिल-डुल रहा था और न ही दिमाग़ चल रहा था.

मैं उल्टे क़दमों से लौट पड़ा. बाहर आकर एक ग्लास ठंडा पानी पीया, तो तन-मन को कुछ राहत मिली. अब दिमाग़ भी कुछ सक्रिय हुआ. मां इतने बरसों तक अंदर से टूटती-बिखरती रहीं, पर मेरे सम्मुख हमेशा एक मज़बूत स्तंभ की भांति खड़ी रहीं. जिसके साये में मैंने ख़ुद को हमेशा महफूज़ महसूस किया, अपने अंत समय में भी उन्हें अपना नहीं, मेरे कमज़ोर पड़ जाने का भय है. वे शायद नहीं जानतीं कि उनकी गिरती हालत देखकर मैं कितनी बार अंदर से कमज़ोर हुआ हूं, टूटा हूं, बिखरा हूं, ख़ुद को नितांत एकाकी पाकर रोया भी हूं. पर उनके सामने मज़बूत बना रहा हूं. सच, कभी-कभी भ्रांति में जीना भी कितना सुकून देता है… डॉक्टर से मिलने के बाद मन हो रहा था उड़कर मां के पास पहुंच जाऊं और उनके गले लगकर फफक पडूं. पर अब लग रहा था कि अच्छा हुआ ऐसा नहीं किया. यदि कोई भ्रांति इंसान को सुकून की मौत दे सकती है, तो क्यों न उस भ्रांति को बने ही रहने दिया जाए.

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मैंने एक गहरी सांस ली और सधे क़दम फिर से मां के कक्ष की ओर बढ़ गए. इस बार वे पर्दे के पास जाकर रुके या हिचकिचाए नहीं, बल्कि पर्दा हटाकर सीधे अंदर प्रविष्ट हो गए. मुझे सामने पाकर मां और गीता मौसी के वार्तालाप को विराम लगना ही था. पर मैं हर परिस्थिति का सामना करने के लिए तैयार था. वार्तालाप शायद किसी बेहद नाज़ुक मोड़ पर पहुंच चुका था, क्योंकि दोनों की आंखें नम थीं. मैं मां की नम आंखों को पूरी तरह नज़रअंदाज़ करते हुए गीता मौसी की ओर बढ़ा और उन्हें सीने से लगा लिया. “क्या गीता मौसी, आप भी… बच्चों की तरह हर बात पर रोने लग जाती हैं. मां को देखिए! इंसान के रूप में वे फौलाद हैं फौलाद! मां की ज़िंदगी के सागर में कितने ही तूफ़ान आए और निकल गए, पर वे तनिक भी विचलित नहीं हुईं, बल्कि और भी निखरकर सामने आईं. क्यूं मां?” ऐसा कहते हुए मैंने गीता मौसी को छोड़ा और मां को अपने से लिपटा लिया, दिल की बेक़ाबू धड़कनों को तब तक क़ाबू किए उन्हें अपने सीने से लिपटाए रहा, जब तक मुझे भरोसा नहीं हो गया कि मां ने अपनी नम आंखें पोंछ ली हैं. फिर मां के सीने से अलग होते हुए मैंने गर्व से उनका माथा चूम लिया.

एक चमत्कार हुआ. कुछ पल पूर्व आंसुओं से भीगा मां का चेहरा अब आत्मविश्‍वास से चमक रहा था. उनके चेहरे पर चिरपरिचित सहज मुस्कान लौट आई थी. उन्होंने सिर उठाकर गर्व से गीता मौसी की ओर नज़रें घुमाईं. चुनौतीपूर्ण नज़रें कह रही थीं, ‘देखा, मेरे बहादुर बेटे को.’

गीता मौसी भौचक्की-सी कभी मां को देख रही थीं, तो कभी मुझे.

Sangeeta Mathur

  संगीता माथुर

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कहानी- भ्रांति 2 (Story Series- Bhranti 2)

“बस चिंता है, तो मेहुल की. मैं उसे टूटता-बिखरता नहीं देख सकती. उसका आत्मविश्‍वास बिखरने न पाए, इसके लिए मैंने क़दम-क़दम पर अपने आत्मसंयम को बांधे रखा. अंदर से आम औरत की तरह अपने दुर्भाग्य पर आंसू बहाती रही, पर उसके सामने हमेशा सुपर वुमन बनकर खड़ी रही. उसका हर बढ़ता क़दम मुझे जीने का हौसला देता. उसके बढ़ते क़दमों का एक-एक पल मेरी आंखों के सामने आज भी तस्वीर की भांति अंकित है…’’

मौसाजी के देहांत के बाद गीता मौसी अकेली हो गई थीं, तो मैंने उन्हें मां की देखरेख हेतु हमेशा के लिए अपने पास रहने के लिए बुला लिया. इससे मां को पर्याप्त व़क्त न दे पाने का अपराधबोध भी काफ़ी कुछ कम हो गया था. दोनों बहनें सारा दिन दुनिया-जहां की बातों में खोई रहतीं. मां की ओर से निश्ंिचत हो, मैं एक बार फिर अपने काम में डूब गया था.

और तभी एक दिन मां पर यह हृदयाघात का हमला हो गया था. स्ट्रेचर पर आईसीयू में ले जाते समय भी मां मुझे बेहद निरीह और मासूम नज़र आ रही थीं. उनके इस रूप को पचा पाना मेरे लिए बेहद मुश्किल हो रहा था, क्योंकि मैं ही उनके सर्वशक्तिमान दैवीय रूप से लेकर इस असहाय अवस्था तक के सफ़र का एकमात्र साक्षी रहा हूं. इसलिए ज़ेहन में दोनों स्मृतियां बार-बार आ-जा रही थीं. कभी टूव्हीलर, फोरव्हीलर चलाती मां, तो कभी व्हीलचेयर और स्ट्रेचर पर ले जाई जाती मां… अचानक मैंने देखा परिदृश्य बदल गया है. चार लोगों के कंधों पर मां की अर्थी जा रही है. मैं सबसे आगे हूं. लोग ‘राम नाम सत्य है’ बोल रहे हैं. मैं चिल्ला उठता हूं, “नहीं.”

“क्या हुआ? मेहुल, होश में आओ बेटा! मां ठीक हो जाएंगी.” गीता मौसी मेरा कंधा झिंझोड़ रही थीं. अब मुझे होश आया. मैं आईसीयू के बाहर बेंच पर बैठे-बैठे ख़्यालों की दुनिया में जाने कहां पहुंच गया था. इससे पहले कि अंदर का भय मुझ पर फिर से हावी हो, मैं उठकर टहलने लगा था. तभी डॉक्टर आती दिखीं, तो मैं और गीता मौसी उनकी ओर लपके. कान जो नहीं सुनना चाह रहे थे, आख़िर वही उन्हें सुनना पड़ा. मां कुछ ही दिनों की मेहमान थीं. मैं अपने आंसू छुपाता बाहर निकल गया था. मन हो रहा था इसी व़क्त मां के पास जाकर, उनके गले लगकर फूट-फूटकर रोऊं. पर बुद्धिजीवी मस्तिष्क ऐसा करने की इजाज़त नहीं दे रहा था.

मां को कॉटेज वॉर्ड में शिफ्ट कर दिया गया था. मैं उनके सामने जाने से कतरा रहा था. कैसे सामना कर पाऊंगा उनका? कैसे दिलासा दे पाऊंगा उनको? अभी तो मुझे दिलासा की सख़्त आवश्यकता थी. मन हो रहा था मां के आंचल में मुंह छुपाकर फूट-फूटकर रोऊं. भारी क़दमों से मैं कमरे के बाहर आकर रुक गया था. अंदर जाने का साहस नहीं हो रहा था. लहराते हरे पर्दे के पीछे खड़ा मैं अंदर जाने का साहस जुटा रहा था, तभी अंदर से आते मां और गीता मौसी के स्वरों ने मेरे कान खड़े कर दिए, क्योंकि उसमें बार-बार मेरे ही नाम का उल्लेख हो रहा था. मां धीमे स्वर में गीता मौसी से मेरा ख़्याल रखने को कह रही थीं.

…तो क्या गीता मौसी ने मां को डॉक्टर की बात बता दी? मैं मन ही मन गीता मौसी पर ग़ुस्सा होता, इससे पूर्व ही उनके स्वर ने मेरा ग़ुस्सा ठंडा कर दिया, “ऐसी दिल दुखानेवाली बातें क्यों कर रही हो दीदी? तुम जल्दी ही ठीक हो जाओगी.”

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“मैं कोई बच्ची हूं, जो तू मुझे बहला रही है? मुझे अपनी मृत्यु का पूर्वाभास हो चुका है. मुझे दुनिया छोड़कर जाने का डर भी नहीं है. जो आया है, वो तो जाएगा ही. मैंने कोई अमृत तो पी नहीं रखा है?”

“हैं?” मैं चौंका था. मैं तो बचपन से इसी भ्रांति में जीता आ रहा हूं कि मां अमृत पीकर इस दुनिया में आई हैं. मेरी दुविधा से सर्वथा अनजान मां अपने प्रलाप में व्यस्त थीं. “बस चिंता है, तो मेहुल की. मैं उसे टूटता-बिखरता नहीं देख सकती. उसका आत्मविश्‍वास बिखरने न पाए, इसके लिए मैंने क़दम-क़दम पर अपने आत्मसंयम को बांधे रखा. अंदर से आम औरत की तरह अपने दुर्भाग्य पर आंसू बहाती रही, पर उसके सामने हमेशा सुपर वुमन बनकर खड़ी रही. उसका हर बढ़ता क़दम मुझे जीने का हौसला देता. उसके बढ़ते क़दमों का एक-एक पल मेरी आंखों के सामने आज भी तस्वीर की भांति अंकित है. कब और कैसे वह पहली बार घुटनों के बल चला, फिर दो पांवों पर खड़ा हुआ, फिर तीन पहियों की साइकिल पर, फिर दो पहियों की साइकिल, फिर टूव्हीलर, फिर फोरव्हीलर…” मां की सांस भरने लगी थी. गीता मौसी ने उठकर उन्हें पानी पिलाया और आगे बोलने से मना किया. मैं अंदर जाकर मां को ढांढ़स बंधाना चाहता था. मैंने चुपके  से झांककर देखा, मां का चेहरा आंसुओं से तर था. मुझे पहली बार वे बेहद असहाय-सी नज़र आईं. मन भर आया. मां के आगे के सधे शब्दों ने मेरे क़दम फिर रोक दिए. मैंने फिर पर्दे की आड़ ले ली.

“आज मत रोक गीता मुझे. बरसों का दबता-सुलगता लावा है, आज सब बहकर निकल जाने दे… उसे चढ़ते, गिरते-उठते देखती तो आशंकित मन हर बार कांप उठता. दिल करता उसे बांहों में भींच लूं और कोख से नीचे उतरने ही न दूं. पर फिर मन कड़ा कर लेती. कोख में ढांपकर रख लूंगी, तो ज़िंदगी की चिलचिलाती धूप में चलने का साहस कैसे जुटा पाएगा वह? मैं अपनी कमज़ोरी को ख़ुद पर हावी होने से पहले ही रोक लेती. स़िर्फ इसलिए कि मेहुल कमज़ोर न पड़ जाए.”

Sangeeta Mathur

   संगीता माथुर

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