Archives

कहानी- बहूरानी 2 (Short Story- Bahurani 2)

Short Story, Bahurani kahani

“सुनो कृष्णा, तुम्हें नहीं लगता कि तुम्हें अब एक बहू की ज़रूरत है?” कृष्णा मेरी बात सुनकर फीकी हंसी हंस दी, “मुझे या तुम्हें? थक गए हो मेरी सेवा करते-करते?”

“अरे नहीं यार.” मैं हंस दिया था.

“आजकल बहुएं पति सेवा के लिए लाई जाती हैं, सास-ससुर के लिए नहीं. वह आकर प्रणव को संभाल ले, यही बहुत है.”

कृष्णा की सहमति ले हमने प्रणव से बात की तो पाया कि अनेक महिला मित्रों के बावजूद शादी के मामले में वह पैरेंट्स पर ही निर्भर है. इस बात की हमें ख़ुशी ही हुई थी, किंतु शीघ्र ही हमें पता चल गया कि हमने बिन बुलाई आफत मोल ले ली है.

मुझे तो कर्नल ने वापस पुराने दिनों में खींच लिया था, जहां था फौजी बिरादरी के रिटायर्ड मेम्बर्स का साथ, क्लब की फुर्सत भरी शामें, लॉन के ताज़े फल, सब्ज़ियों की ल़ज़्ज़त और शिवालिक की ठंडी मस्त बयार. मैं हर चिट्ठी में प्रणव को लिखता कि कैसे देहरादून उसकी मां व पिता को रास आया है व कैसे हमें उसका बड़ी शिद्दत से इंतज़ार है. लीचियों की सौग़ात भेजता रहता और प्रणव से भी सुनता कि कैसे उस तक पहुंचने से पहले ही पार्सल गायब हो जाता है.

कुल मिलाकर हम मियां-बीवी हर तरह से सुखी व संतुष्ट थे, पर कहते हैं न कि अपनी नज़र ख़ुद को ही लग जाती है. कुछ-कुछ वैसा ही हमारे साथ भी हुआ. प्रणव… नहीं-नहीं, उसकी आज्ञाकारिता की क्या तारीफ़ करूं? कोर्स पूरा होते ही हमारे पास देहरादून में ही सेटल होने की कोशिश करने लगा. हमने कहा भी कि दिल्ली उसे ़ज़्यादा सूट करेगा, पर उसने हमें अकेले छोड़ने से साफ़ मना कर दिया. प्रणव के आते ही हमारे शांत, घरौंदे में जैसे बहार आ गई. युवा लड़के-लड़कियों का जमावड़ा हर पल हमारे आशियाने को गुलज़ार किए रहता. मैं तो ख़ुश था, पर कृष्णा को कुछ ही दिनों में खीझ होने लगी, क्योंकि उसका अनुशासित स्वभाव उसे आवश्यकता से अधिक किसी से घुलने-मिलने नहीं देता था.

प्रणव की इस बेपरवाह-सी जीवनशैली को देखकर मेरे मन में एक ख़याल आया और मैंने कृष्णा को भी मन की बात कह डाली, “सुनो कृष्णा, तुम्हें नहीं लगता कि तुम्हें अब एक बहू की ज़रूरत है?” कृष्णा मेरी बात सुनकर फीकी हंसी हंस दी, “मुझे या तुम्हें? थक गए हो मेरी सेवा करते-करते?”

“अरे नहीं यार.” मैं हंस दिया था.

“आजकल बहुएं पति सेवा के लिए लाई जाती हैं, सास-ससुर के लिए नहीं. वह आकर प्रणव को संभाल ले, यही बहुत है.”

कृष्णा की सहमति ले हमने प्रणव से बात की तो पाया कि अनेक महिला मित्रों के बावजूद शादी के मामले में वह पैरेंट्स पर ही निर्भर है. इस बात की हमें ख़ुशी ही हुई थी, किंतु शीघ्र ही हमें पता चल गया कि हमने बिन बुलाई आफत मोल ले ली है.

प्रणव की नौकरी बेहद आकर्षक न सही, किंतु उसकी क़द-काठी और चेहरा अनदेखा करना असंभव था. हमारे जान-पहचानवाले यह जानकर कि हम बहू की तलाश में हैं,  बिन बादल बरसात की तरह टपक पड़े थे और मैं व कृष्णा असहाय से, समझ ही नहीं पा रहे थे कि किसे हां करें और किसे ना. किसी की लड़की उच्च शिक्षित, गृहकार्य दक्ष, संगीत-विशारद  थी, तो कोई केवल इस बूते पर अकड़ता था कि प्रणव को सोने में तोल देगा. मेरी अपनी अपेक्षाएं न के बराबर थीं, पर कृष्णा का कहना था कि और कुछ हो, न हो लेकिन बहू सुंदर तो होनी ही चाहिए. प्रणव ने सब कुछ हम पर छोड़ दिया था, इसलिए हमारी ज़िम्मेदारी और बढ़ गई थी.

यह भी पढ़ें: लघु उद्योग- चॉकलेट मेकिंग- छोटा इन्वेस्टमेंट बड़ा फायदा (Small Scale Industry- Chocolate Making- Small Investment Big Returns)

सबसे पहले मुझे पसंद आई मेजर शर्मा की बड़ी बेटी, जो लखनऊ से बी.एड. कर इसी साल लौटी थी. बेहद सुशील व घरेलू क़िस्म की, किंतु कृष्णा का कहना था कि वह प्रणव के सामने बहुत मैच्योर लगेगी. अब मैं इस मैच्योरिटी को क्या नाम देता, समझ नहीं पाया, पर जान गया कि मेरी पत्नी मुझे इस समस्या से जल्दी उबरने नहीं देगी. ऐसा नहीं कि उसे कोई न भाया हो, पर उसकी पसंद की हुई चंपा सिन्हा जैसी चतुर, आकर्षक, स्टेट लेवल की वॉलीबॉल खिलाड़ी को देखते ही मेरा ब्लड प्रेशर बढ़ने लगता था. यूं जान पड़ता था जैसे किसी भी पल वह हमें भी वॉलीबॉल की भांति उछाल देगी और प्रणव को ले उड़ेगी.

और तभी एक दिन प्रणव ‘उसे’ लेकर घर आया. ‘उसे’ यानी इस एपिसोड की प्रधान नायिका को. अब रहस्य बढ़ाने से क्या फ़ायदा? लड़की हर तरह से अच्छी दिख रही थी- प्रणव के कंधों को छूता क़द, गेहुंआ रंग, बड़ी-बड़ी आंखें और रेशमी लहराते खुले बाल. देखते ही मेरी और कृष्णा की बांछें खिल उठीं. कृष्णा तो शायद उसकी नज़र भी उतार बैठती, वह तो प्रणव ने उसे रोक दिया.

“आप ग़लत समझ रही हैं मम्मी. रिया इज़ जस्ट ए फ्रेंड. हम थोड़े दिनों पहले ही मिले हैं. असल में इसके पापा भी आर्मी में हैं- पूना पोस्टेड हैं. इसे पढ़ाई पूरी करते ही देहरादून में जॉब मिल गया, पर रहने की समस्या है. मैंने कहा कि हमारे घर के ऊपर का पोर्शन खाली पड़ा है, वहां पेइंग गेस्ट की तरह रह लो. आप लोगों की परमिशन हो तो…” कहकर उसने बात अधूरी छोड़ दी.

मुझे ‘हां’ कहते ़ज़्यादा देर नहीं लगती और कृष्णा को ‘ना’ कहते. पर इस बार उस लड़की का आर्मी का ठप्पा काम कर गया. आख़िर अपनी बिरादरीवाली की मदद तो हमें करनी ही थी. इस तरह रिया दत्त हमारे आशियाने में पेइंग गेस्ट बनकर आ गई. पेइंग गेस्ट मेरे हिसाब से एक अजीब विरोधाभास है, क्योंकि जो ‘पे’ करे, वह ‘गेस्ट’ कैसे हुआ और जो गेस्ट नहीं, वह तो घरवाला ही माना जाएगा. रिया ने हमें डिनर की पेमेंट भी की थी, पर महीना बीतते-बीतते कृष्णा ने वह ‘क्लॉज़’ स्वयं ही उड़ा डाला.

Short Story, Bahurani kahani

      सोनाली गर्ग

अधिक शॉर्ट स्टोरीज के लिए यहाँ क्लिक करें – SHORT STORIES

कहानी- बहूरानी 1 (Short Story- Bahurani 1)

Short Story, Bahurani kahani

डॉक्टर ने कुछ टेस्ट वगैरह करके यह नतीज़ा निकाला कि श्रीमतीजी घोर डिप्रेशन यानी अवसाद की स्थिति में हैं. यदि उन्हें शीघ्र ही इससे न निकाला गया तो मुश्किल आ सकती है, सुनकर मेरे तो जैसे हाथ-पैर ही फूल गए. किंतु प्रणव ने सही राय दी कि मैं उसे लेकर आबोहवा बदलने किसी नैसर्गिक जगह पर निकल जाऊं. जाने की सोच ही रहा था कि मुझे अपने पुराने दोस्त कर्नल उपप्रेती का ख़याल आया. रिटायरमेंट के बाद वह अपने घर देहरादून चला गया था. कई बार उसने हमें बुलाया, पर किसी न किसी वजह से हम जा न सके थे. आज इस मुसीबत की घड़ी में मुझे वहीं जाना उचित जान पड़ा.

… ॐ नमः शिवाय! अहा! शाम की ताज़ा हवा, बरसाती मिट्टी की सोंधी-सोंधी महक, घर लौटते परिंदों की चहचहाहट… कुछ चीज़ें कभी नहीं बदलतीं… ख़ासकर वे, जो मनुष्य को प्रकृति से जोड़ती हैं.’ यही सब सोचते-सोचते मैं घर की ओर लौट रहा था. मैं यानी रिटायर्ड ब्रिगेडियर अर्जुन अहलावत. क़रीब 36 साल भारतीय सेना की सेवा करने के पश्‍चात्, तीन साल पहले ही रिटायर हुआ हूं. हालात कुछ ऐसे बने कि रिटायरमेंट के बाद दिल्ली में अपना मकान होते हुए भी सब बेच-बाचकर देहरादून श़िफ़्ट होना पड़ा. क्यों? यह मैं आपको बाद में बताऊंगा. फ़िलहाल तो आप इतना ही जान लीजिए कि सेना में उम्रभर नौकरी करने के बावजूद मैं एक बेहद ख़ुशमिज़ाज, सरल व उदार व्यक्ति हूं.

परिवार में कृष्णा है. जी हां, मेरी धर्मपत्नी- कृष्णा अहलावत. नाम रखने में मां-बाप ने अवश्य जल्दबाज़ी की होगी, क्योंकि कृष्णा कहीं से भी कृष्णवर्ण की नहीं है. दूध-धुला रंग, सामान्य क़द-काठी और हल्का भूरापन लिए हुए घुंघराले बाल. एक स्वस्थ जाट परिवार की स्वस्थ पुत्री व बहू, मेरे दोनों बच्चों- प्रणव व प्रज्ञा की ममतामयी मां व मेरे लिए एक धर्मभीरु, गृहकार्य दक्ष पत्नी. उसके व मेरे बाहरी व्यक्तित्व की समानताएं छोड़ दें, तो हमारे विचारों में ज़मीन-आसमान का अंतर मिलेगा. यह दीगर बात है कि ़ज़्यादातर हिंदुस्तानी विवाह इस अंतर के बावजूद सफलता की सिल्वर व गोल्डन जुबली मनाते आ रहे हैं. उसे देहरादून लाने में मुझे कितनी दिमाग़ी मश़क़्क़त करनी पड़ी, यह मैं ही जानता हूं.

अब आपसे क्या छिपाना? ज़िंदगीभर की कमाई लगाकर दिल्ली के शालीमार बाग में अपना दोमंज़िला मकान खड़ा किया था. कुछ दिन उसमें रहे भी, पर भाग्य को कुछ और ही मंज़ूर था. बेटी उन दिनों मेडिकल करके यू. एस. जाने की तैयारी में थी व प्रणव आर्किटेक्चर के प्रथम वर्ष में. अचानक हम पर प्रकट हुआ कि प्रज्ञा अपने विजातीय सहपाठी से प्रेमविवाह करना चाहती है. सुनकर मैं तो संयत रहा, पर कृष्णा तो आपा ही खो बैठी. उसकी नज़रों में बेटी की इस साज़िश के पीछे मेरा हाथ था. अब मैं उसे क्या कहता कि मेरी बला से एक करियरशुदा, परिपक्व लड़की करियप्पा से विवाह करे या कुमावत से, मुझे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता. लेकिन कृष्णा की हाय-तौबा से घबराकर प्रज्ञा ने कोर्ट मैरिज कर ली और मैं यह अपराध कर बैठा कि नवविवाहित दंपति को एयरपोर्ट तक सी-ऑफ करने चला गया. इसकी सज़ा यह मिली कि एक महीने तक कृष्णा न मुझसे बोली, न ही उसने ढंग से कुछ खाया-पिया. कुछ रोज़ तो मैंने बर्दाश्त कर लिया, पर जब उसके स्वास्थ्य पर असर पड़ने लगा तो मुझे बड़ी चिंता हुई. डॉक्टर ने कुछ टेस्ट वगैरह करके यह नतीज़ा निकाला कि श्रीमतीजी घोर डिप्रेशन यानी अवसाद की स्थिति में हैं. यदि उन्हें शीघ्र ही इससे न निकाला गया तो मुश्किल आ सकती है, सुनकर मेरे तो जैसे हाथ-पैर ही फूल गए. किंतु प्रणव ने सही राय दी कि मैं उसे लेकर आबोहवा बदलने किसी नैसर्गिक जगह पर निकल जाऊं. जाने की सोच ही रहा था कि मुझे अपने पुराने दोस्त कर्नल उपप्रेती का ख़याल आया. रिटायरमेंट के बाद वह अपने घर देहरादून चला गया था. कई बार उसने हमें बुलाया, पर किसी न किसी वजह से हम जा न सके थे. आज इस मुसीबत की घड़ी में मुझे वहीं जाना उचित जान पड़ा.

यह भी पढ़ें: श्रावण मास में ऐसे करें शिव को प्रसन्न- पूरी होगी हर मनोकामना (How To Worship Lord Shiva During Shravan Month?)

मैं पत्नी सहित बोरिया-बिस्तर बांध देहरादून चला आया. यहां आकर कृष्णा की हालत में आश्‍चर्यजनक गति से सुधार हुआ. एक तो उपप्रेती का खुला हवादार बंगला, दूजे उसकी हंसमुख गढ़वाली पत्नी का साथ, दोनों मिलकर कृष्णा के लिए जैसे रामबाण सिद्ध हुए. कर्नल मुझे किचन गार्डन में उलझाए रखता और उसकी पत्नी कृष्णा को दवाइयां कम और बातों की खुराक अधिक देती. लिहाज़ा हुआ यह कि तीन-चार ह़फ़्तों में ही कृष्णा कुर्सी छोड़ बैडमिंटन खेलने लगी, रसोई में पकौड़े तलने लगी और जब एक दिन उसने अचानक बगीचे से गुलाब तोड़कर जूड़े में खोंसा तो मैं चालीस साल पहले की कृष्णा को याद कर बैठा, जो हमेशा अपने जूड़े में फूल लगाए रहती थी.

जाने का समय निकट जान मैंने उपप्रेती से दिल्ली की टिकटें रिज़र्व कराने को कहा. किंतु आशा के विपरीत, उसे मेेरे निर्णय से कोई ख़ास ख़ुशी नहीं हुई, बल्कि जो कुछ उसने कहा, वह शब्दशः मुझे आज तक याद है. “जाना है तो चले जाओ अर्जुन, पर दिल्ली में तुम अपने बंगले के कैदी होकर रह जाओगे. बच्चे आजकल अपनी ज़िंदगियां संभाल लें, यही बहुत है. हमारी किसे पड़ी है? मेरी मानो तो इसी लेन में एक प्रॉपर्टी हाथोंहाथ बिक रही है. ज़्यादा नहीं तो 12 से 15 लाख में सौदा तय है. मेरे पास यहीं बस जाओ. बुढ़ापे में साथ देंगे एक-दूसरे का, साथ-साथ सुख-दुख बांटेंगे.” मैं आश्‍चर्यचकित था कि उसने इतनी दूर की सोच डाली, पर कृष्णा की मनः स्थिति ने मुझे भी सहमा रखा था. अब यदि दूसरी दफ़ा कुछ गफ़लत हुई तो मैं क्या करूंगा?

कृष्णा को मनाना सहज नहीं था, पर मेरी ज़िद के आगे उसे भी झुकना ही पड़ा. प्रणव हॉस्टल में था ही, उसे हमारे निर्णय से कोई ऐतराज़ नहीं हुआ और हम उपप्रेती के सहारे देहरादून बस ही गए. दिल्ली से उत्तरांचल का स्थानांतरण हमें महंगा नहीं, बल्कि सुविधाजनक ही पड़ा था. घर तुरत-फुरत व्यवस्थित कर डाला उपप्रेती के पहाड़ी नौकर ने, उसी ने एक नौकर हमारे लिए भी जुटा दिया था.

कृष्णा का अधिकांश समय बागवानी में बीतता या मिसेज़ उपप्रेती के साथ… और मैं?

कहानी- बहूरानी 1 (Short Story- Bahurani 1)

        सोनाली गर्ग

अधिक शॉर्ट स्टोरीज के लिए यहाँ क्लिक करें – SHORT STORIES

कहानी- व़क्त का एक टुकड़ा 3 (Story Series- Wqat Ka Ek Tukda 3)

प्यार हार गया था. परंपराओं के आगे, सामाजिक नियमों के आगे, बुज़ुर्गों के आदेशों के आगे मुंह सिये खड़ा रह गया था. पुरुष होने के कारण आंसू भी खुलकर नहीं बहा पाया, भीतर ही पी गया. प्यार क्या योजना बनाकर, जाति-धर्म परखकर किया जाता है? या किया जा सकता है? हमें अपनी ज़िंदगी अपनी मर्ज़ी से जीने का हक़ क्यों नहीं है? हम किसी का अहित करें, ज़ोर-ज़बर्दस्ती करें, तो ज़रूर रोको हमें, सज़ा दो, पर प्रीत-प्यार के बीच जाति का सवाल कहां से आ जाता है? प्यार सामाजिक वर्जनाओं को नहीं स्वीकारता, फिर क्यों वर्जनाओं के कठघरे में खड़ा कर दिया जाता है? कितना नीरस होगा वह जीवन जो स़िर्फ बुद्धि के तर्को के सहारे जिया जाएगा. बुद्धि के साथ-साथ एक मन भी तो दिया है विधाता ने. उसे कोई अच्छा लगता है, तो लगता है बस!

सब कुछ जानते-समझते भी त्रासदी यह थी कि हम एक-दूसरे की तरफ़ खिंचे चले जा रहे थे. मालूम था कि वो मेरी नहीं हो सकती थी, पर दिल पर कहां किसी का बस चलता है. अपने को समझा लेते ‘स़िर्फ मित्र ही तो हैं हम. क्या इतना भी हमारा हक़ नहीं?’

इस बीच एक और बात हो गई, नंदिनी ने स्कूल में अनेक क्लासिक नाटकों का सफलतापूर्वक मंचन करवाया था, जिससे शहर में हमारे स्कूल का नाम हो गया. कालीदास जयंती पर शिक्षा विभाग से कालीदास के लिखे किसी नाटक का मंचन करवाने का विशेष आग्रह आया. शहर के गणमान्य लोग देखने आनेवाले थे. प्रिंसिपल के लिए यह स्कूल की प्रतिष्ठा का सवाल था. नंदिनी को ही

ज़िम्मेदारी सौंपी गई. उसने ‘अभिज्ञान शाकुंतलम्’ को अभिनीत कराने की सोची, क्योंकि उसकी कहानी से लोग परिचित थे और संस्कृत में होने पर भी समझी जा सकती थी. यूं एक विषय के रूप में तो हम सब ने संस्कृत पढ़ रखी थी. छात्रों में से योग्य पात्रों का चयन किया गया. उच्चारण शुद्ध रखने के लिए रिहर्सल के समय संस्कृत के अध्यापक भी उपस्थित रहते थे. मंच सज्जा एवं उस समय के परिधानों का इंतज़ाम मुझे करना था. कुटिया, जंगल, नदी और राजमहल अनेक दृश्य उपस्थित करने थे. महीनाभर अभ्यास चलता रहा, शाम को देर हो जाने के कारण भाग लेनेवाले कलाकारों को घर छोड़ने का प्रबंध किया गया. नंदिनी को घर पहुंचाने का ज़िम्मा मेरा था. उस महीने में हम एक-दूसरे के और क़रीब आ गए थे. भूल गए थे दूरी बनाए रखने के अपने निश्‍चय को.

और फिर नंदिनी के विवाह की तिथि निश्‍चित हो गई. उसने अपना त्यागपत्र भी दे दिया. स़िर्फ एक महीना और बचा था उसका स्कूल आने के लिए. हम मौक़ा मिलते ही कैंटीन में जा बैठते. मन के भीतर गहरी उदासी होने पर भी एक-दूसरे की ख़ातिर सामान्य दिखने का असफल प्रयत्न करते हुए ज़्यादातर ख़ामोश ही बैठे रहते. बातें चुक गई थीं मानो या शायद बेमानी ही हो गई थीं अब.नंदिनी के पापा उसका विवाह अपने ही घर से करना चाहते थे और उसे भाई-भाभी के संग विवाह से 15 दिन पूर्व चले जाना था. अपनी सब ख़रीददारी उसने यहीं से कर ली थी. उसके जाने की पूर्व संध्या को मैं उपहार लेकर उससे मिलने गया. उसके भाई किसी आवश्यक कार्यवश घर से बाहर गए हुए थे. नंदिनी और उसकी भाभी से बातें कर मैं उठा, तो नंदिनी भी मुझे बाहर विदा करने उठी. पर मैंनेे उसे मना कर दिया और पीछे किवाड़ बंद करता हुआ जल्दी से सीढ़ियां उतर आया. मैंने शायद अपने अतीत की ओर किवाड़ बंद कर देना चाहा था यह सोचकर कि मुझे अब नए सिरे से ज़िंदगी शुरू करनी है, पर नंदिनी तो मन में ही बसी हुई थी, उसकी स्मृति तो संग ही चली आई.

यह भी पढ़ें: ज़िंदगी रुकती नहीं (Life Doesn’t Stop And Neither Should You)

प्यार हार गया था. परंपराओं के आगे, सामाजिक नियमों के आगे, बुज़ुर्गों के आदेशों के आगे मुंह सिये खड़ा रह गया था. पुरुष होने के कारण आंसू भी खुलकर नहीं बहा पाया, भीतर ही पी गया. प्यार क्या योजना बनाकर, जाति-धर्म परखकर किया जाता है? या किया जा सकता है? हमें अपनी ज़िंदगी अपनी मर्ज़ी से जीने का हक़ क्यों नहीं है? हम किसी का अहित करें, ज़ोर-ज़बर्दस्ती करें, तो ज़रूर रोको हमें, सज़ा दो, पर प्रीत-प्यार के बीच जाति का सवाल कहां से आ जाता है? प्यार सामाजिक वर्जनाओं को नहीं स्वीकारता, फिर क्यों वर्जनाओं के कठघरे में खड़ा कर दिया जाता है? कितना नीरस होगा वह जीवन जो स़िर्फ बुद्धि के तर्को के सहारे जिया जाएगा. बुद्धि के साथ-साथ एक मन भी तो दिया है विधाता ने. उसे कोई अच्छा लगता है, तो लगता है बस! यहां क्यों का उत्तर नहीं दिया जा सकता, क्योंकि उसका निर्णय मन करता है, बुद्धि नहीं.

दोहरा जीवन जिया मैंने. एक मन के भीतर का, एक बाहर का, छटपटाता ही रहा जीवन भर. कर्त्तव्य भी सब पूरे किए. विडंबना तो देखो, दोहरा जीवन जीकर भी लगता है- अधूरी ही रह गई मेरी ज़िंदगी. जिया तो ज़रूर, पर काट दी, जी नहीं. शालिनी के प्रति अपराधबोध भी तो है. सब गुण हैं मेरी पत्नी में, मेरे प्यार पर तो उसका पहला हक़ था. पर उसकी ख़ूबियों के बावजूद नहीं दे पाया मैं उसे वह स्थान. हां! अपना घाव उससे छुपाए रखा, ताकि उसके मन को ठेस न पहुंचे. बिना किसी कसूर के वो मानसिक यंत्रणा से न गुज़रे.

मेरा बेटा मुझ जैसा दोहरा जीवन नहीं जिएगा, मैंने यह दृढ़ निश्‍चय कर लिया है. तब सवाल मेरी ख़ुशी का था और मैं अपने बाबा के आगे बेबस था. आज सवाल मेरे बेटे की ख़ुशी का है और उसकी ख़ुशी मेरी भी ज़िम्मेदारी है. मुझे साहस करना होगा, जैसे भी हो, शालिनी को समझाना होगा. कुछ ग़लत बात के लिए दबाव नहीं डाल रहा मैं शालिनी पर. शायद इसी से ही मेरे मन को कुछ शांति मिल सके.

Usha Vadhava

          उषा वधवा

अधिक शॉर्ट स्टोरीज के लिए यहाँ क्लिक करें – SHORT STORIES

 

कहानी- व़क्त का एक टुकड़ा 2 (Story Series- Wqat Ka Ek Tukda 2)

एक बार हिम्मत करके मैंने बाबा के सम्मुख अपने मन की बात रखी. उन्होंने मां से कहा, “ऐसा कुछ किया, तो उस लड़की की जान की ख़ैर नहीं, कह देना उससे.”

मैंने नंदिनी से तो यह बात नहीं कही, पर उससे विवाह का सपना पूरी तरह से त्याग दिया. अपनी ख़ुशी की ख़ातिर मैं उसकी जान ख़तरे में नहीं डाल सकता था. मैं जब कभी देर सांझ नंदिनी को उसके घर छोड़ने जाता, तो कभी-कभी उसके भाई से मुलाक़ात भी हो जाती. इस तरह उनसे भी परिचय हो गया था. मैंने उनसे स्पष्ट कह दिया कि नंदिनी का विवाह जहां तय है, वहीं होने दिया जाए, क्योंकि हमारे विवाह की कोई संभावना नहीं है.

बेटे का प्यार सच्चा है, मेरा नहीं था क्या? न! उंगली मत उठाओ मेरे प्यार की सच्चाई पर, चाहत की गहराई पर. शिद्दत से न चाहा होता, तो उसकी कमी यूं महसूस न करता आज तक? आज भी उसे यादकर अकेले में आंखें भर आती हैं. कितना अंतर आ गया है आज की पीढ़ी और हमारी पीढ़ी में.

बाबा ने दफ़्तर से हेड क्लर्क के पद से अवकाश प्राप्त किया था. दोनों बहनों का विवाह स्कूल पास करते ही कर दिया गया था- अपनी ही जाति के वर ढूंढ़कर. उन्होंने कोई ऐतराज़ भी नहीं किया था. मेरी शिक्षा बिना अवरोध चलती रही. बीएड कर लिया, एमए करने लगा और यूं मेरे लिए अध्यापन का रास्ता खुल गया, जो कि मेरा ध्येय था. यूं रुचि तो मेरी प्रारंभ से ही साहित्य पढ़ने-पढ़ाने में थी, परंतु बाबा ने विज्ञान पढ़ने पर दबाव डाला. उनका कहना था कि विज्ञान पढ़ानेवाले अध्यापकों की मांग रहती है. उनका तर्क था, सो विज्ञान पढ़ाता रहा. घर की आलमारियां साहित्यिक पुस्तकों से भरी रहीं. ख़ैर, इस बात से उन्हें कोई आपत्ति नहीं थी.

मुझे स्कूल में पढ़ाते दो-ढाई वर्ष बीत चुके थे, नंदिनी उसी स्कूल में हिंदी की अध्यापिका बनकर आई. विद्यार्थियों को स़िर्फ शब्दार्थ बताकर और प्रश्‍न-उत्तर तैयार करवाकर नंबर दिलवाना उसका लक्ष्य नहीं था. गद्य पढ़ाती अथवा पद्य, जान डाल देती उसमें. जो बच्चे पहले हिंदी पढ़ने से कतराते थे, उन्हें भी रुचि आने लगी. स्कूली कार्यक्रमों में वह नाटकों का मंचन करवाती. अपने मधुर स्वर में गीत एवं ग़ज़ल गाकर सुनाती. स्वयं भी कविताएं लिखती थी, अतः शहर की गोष्ठियों में बुलाई जाने लगी. मुझे तो इन सबमें रुचि थी ही, मैं भी श्रोता के रूप में ऐसे कार्यक्रमों में जाने लगा.

धीरे-धीरे हमारी मैत्री बढ़ने लगी. हमारी बातों का मुख्य विषय पुस्तकें ही होतीं. एक-दूसरे से अदला-बदली कर क़िताबें पढ़ते. उसका तो विषय ही साहित्य था, सो नई पुस्तकों के बारे में मुझसे अधिक जानकारी रहती. हिंदी के अलावा अंग्रेज़ी एवं कुछ अन्य भाषाओं के साहित्य का भी उसे पता होता. उसकी स्वयं की लिखी रचनाओं का मैं पहला श्रोता एवं विवेचक होता और वह मेरी राय को मान्यता देती. इस बीच मैंने बाइक ख़रीद ली थी. कवि सम्मेलनों एवं अन्य साहित्यिक गोष्ठियों से लौटते हुए मैं उसे घर भी छोड़ देता.

यह भी पढ़ें: बच्चों की परवरिश को यूं बनाएं हेल्दी (Give Your Child A Healthy Upbringing)

धीरे-धीरे हम अपने सुख-दुख और परेशानियां एक-दूसरे से बांटने लगे. क़रीब पांच वर्ष पहले नंदिनी की मां कैंसर से लंबी लड़ाई लड़ते हुए चल बसी थीं. उसके दो वर्ष पश्‍चात् भाई का विवाह हुआ. उसके पापा को जाने क्या सूझी कि बेटे के विवाह के क़रीब छह माह पश्‍चात् उन्होंने अपनी एक सहकर्मी से कोर्ट मैरेज कर ली. विमाता ने अपनी तरफ़ ़से नंदिनी की तरफ़ दोस्ताना हाथ बढ़ाया था, पर नंदिनी ही अपने पापा को दूसरी स्त्री के संग देख असहज हो उठती. उसके मन में अपनी मां की स्मृति अभी बहुत ताज़ा थी. संवेदनशील तो वह थी ही, बीएड समाप्त होते ही वह भाई-भाभी के पास आ गई और यहीं के स्कूल में आवेदन-पत्र दे दिया. समान रुचियों के कारण हमारे बीच मैत्री हुई, जो गहरी होती चली गई. यूं समझो, एक-दूसरे की ज़रूरत ही बन गए हम. किसी दिन वह स्कूल न आ पाती, तो मेरे लिए दिन बिताना मुश्किल हो जाता. यही बात उस पर भी लागू होती थी.

यह वह समय था जब परंपराओं का निर्वाह बड़ी कड़ाई से किया जाता था. समाज की पकड़ सख़्त थी, विशेषरूप से मध्यम वर्ग पर भिन्न जाति में विवाह सरल नहीं था. हां! कहीं-कहीं अपवाद ज़रूर होते थे, पर अनेक बार उनके माध्यमिक परिणाम भी सामने आते. मैं अपने बाबा के विचारों से भली-भांति परिचित था. मां को तो किसी तरह मना भी लेता, लेकिन बाबा के हुकुम के आगे बोलना असंभव था. जिन्होंने मुझे मनभावन विषय नहीं लेने दिए थे, वे दूसरी जाति में विवाह की इजाज़त कैसे दे सकते थे? ऐसा भी नहीं कि मैंने नंदिनी को किसी तरह के धोखे में रखा हो. मैंने शुरू से ही पूरी बात उससे स्पष्ट कर दी थी. नंदिनी के पापा ने भी उसका रिश्ता अपने एक मित्र के बेटे के साथ मौखिक रूप से तो तय कर ही रखा था, घर छोड़ आने के कारण अभी तक कोई रस्म नहीं हुई थी.

एक बार हिम्मत करके मैंने बाबा के सम्मुख अपने मन की बात रखी. उन्होंने मां से कहा, “ऐसा कुछ किया, तो उस लड़की की जान की ख़ैर नहीं, कह देना उससे.”

मैंने नंदिनी से तो यह बात नहीं कही, पर उससे विवाह का सपना पूरी तरह से त्याग दिया. अपनी ख़ुशी की ख़ातिर मैं उसकी जान ख़तरे में नहीं डाल सकता था. मैं जब कभी देर सांझ नंदिनी को उसके घर छोड़ने जाता, तो कभी-कभी उसके भाई से मुलाक़ात भी हो जाती. इस तरह उनसे भी परिचय हो गया था. मैंने उनसे स्पष्ट कह दिया कि नंदिनी का विवाह जहां तय है, वहीं होने दिया जाए, क्योंकि हमारे विवाह की कोई संभावना नहीं है. और मन ही मन निश्‍चय किया, उससे दूरी बनाने का.

         उषा वधवा

अधिक शॉर्ट स्टोरीज के लिए यहाँ क्लिक करें – SHORT STORIES

कहानी- व़क्त का एक टुकड़ा 1 (Story Series- Wqat Ka Ek Tukda 1)

… पर आज मेरे रातभर जागने एवं करवटें बदलने का कारण मां-बेटे के बीच मन-मुटाव नहीं है, बल्कि बहुत निजी है. सोऊं कैसे? पलकें बंद करते ही तो सामने नंदिनी आ खड़ी होती है. कहते हैं, व़क्त बीत जाता है, पर हमेशा ऐसा होता है क्या? कभी-कभी व़क्त का एक टुकड़ा तमाम उम्र हमारे साथ ही चलता रहता है. उम्रभर विलग नहीं हो पाता वह हमसे. उससे जुड़े व्यक्ति वैसे ही ताज़ा रहते हैं हमारी स्मृति में- उम्र और समय के प्रभाव से अछूते.

सौभाग्यशाली होते हैं वे लोग, जो तकिये पर सिर रखते ही गहरी नींद की आगोश में चले जाते हैं. मैं तो घंटों जगा रहता हूं, करवटें बदलता हुआ, दिनभर की घटनाओं का लेखा-जोखा करता हुआ और इन्हीं में से कोई बात अतीत के किसी क़िस्से की उंगली पकड़ लेती है. मन ही मन इतनी बार दोहरा चुका हूं पुरानी घटनाओं को कि वे आज भी मन-मस्तिष्क में ताज़ा हैं. खुली आंखों से छत को निहार रहा हूं, मानो वहां कोई फिल्म चल रही हो, जिसे मैं पूरे मनोयोग से देख रहा हूं.

मेरी पत्नी शालिनी उन सौभाग्यशाली लोगों में से एक है, जो तकिये पर सिर रखते ही सो जाते हैं. धर्मपरायणा, स्नेहमयी, किसी से राग-द्वेष नहीं. भीतर-बाहर से एकदम खरे सोने की तरह. अपने कर्त्तव्यों के प्रति बहुत निष्ठावान है शालिनी. चाहूं भी तो कोई दोष नहीं ढूंढ़ पाऊंगा उसमें. पर क्या करूं? अपने अतीत को भुला भी तो नहीं पाया हूं आज तक. बहुत प्रयत्न किया है भूल जाने का, पर अनचाहे भी पुराना ज़ख़्म टीस मारने लगता है. धर्म और विज्ञान दोनों कहते हैं कि संसार की हर एक चीज़ नश्‍वर है- हर चीज़ का अंत है, फिर इन यादों का अंत क्यों नहीं है?

शालिनी मेरा तो पूरा ख़्याल रखती ही है, दोनों बच्चों की भी बहुत अच्छी परवरिश की है उसने. दोनों बच्चे डॉक्टर बन चुके हैं. बेटी का तो अपनी ही जाति के डॉक्टर लड़के से धूमधाम से विवाह भी हो चुका है. मां जैसी ही है बेटी शीरी भी. सरल स्वभाव और मृदु भाषिणी. वो ख़ूब ख़ुश है अपने परिवार में. माता-पिता के लिए इससे बड़ी तसल्ली और क्या हो सकती है? पर बेटा अरविंद वैसा नहीं है न! बेटा जान के मां ने बिगाड़ा हो, यह बात भी नहीं है. वह स्वतंत्र विचारों का है.

यह भी पढ़ें: श्रावण मास में ऐसे करें शिव को प्रसन्न- पूरी होगी हर मनोकामना (How To Worship Lord Shiva During Shravan Month?)

जात-पात के विरुद्ध अनेक तर्क हैं उसके पास. इस विषय पर बहस में आप उससे जीत नहीं सकते. इतने तक तो ठीक था, पर आज तो उसने अपनी बात को अमल में लाकर दिखा दिया है. वह वैशाली से विवाह करना चाहता है- यह कहकर उसने ऐसा झटका दिया है, जिसे सुन शालिनी सकते में आ गई है. ऐसा नहीं कि हम वैशाली को जानते नहीं. जानते हैं, तभी तो धक्का लगा है. इस अपार्टमेंट में हम सब एक ही दफ़्तर के लोग रहते हैं और किसी कारण उस पूरे परिवार से मैत्री है. परंतु मैत्री होना अलग बात है और विजातीय की बेटी को घर की बहू बनाकर लाना एकदम अलग और उसी बात पर बेटा आमादा है. ‘तो इसमें हर्ज क्या है?’ यही आ रहा है न आपके अत्याधुनिक मन में? अरविंद की मां से कह देखिए ज़रा! उसके हिसाब से तो यह संबंध ही सही नहीं है. कहां हम शुद्ध ब्राह्मण और लड़की कायस्थ परिवार की. बेटे के सब कसूर माफ़ सिवाय इस एक के. और बेटा है कि इसी पर आमादा है. और उम्मीद कर रहा है कि मैं किसी तरह शालिनी को राज़ी कर लूंगा, जो मुझे नामुमकिन लग रहा है, क्योंकि शालिनी का मानना है कि सामाजिक व पारिवारिक परंपराओं की रक्षा करना परम आवश्यक है. यह उसका कर्त्तव्य भी है और हमारे परिवार में आज तक तो कभी जाति के बाहर विवाह हुआ नहीं.

अरविंद अठारह वर्ष का भी नहीं हुआ था, तभी से शालिनी उसके विवाह के सपने संजोने लगी थी. कैसी लड़की होगी, बहू व अपने लिए क्या-क्या गहने बनवाएगी से लेकर कितना बड़ा जश्‍न होगा इन सब का लेखा-जोखा वह मन ही मन सैकड़ों बार दोहरा चुकी है. और इन सबसे बढ़कर यह कि एक लंबी लिस्ट है उसके मन में अपनी बहू के गुणों को लेकर. बहुत छांटकर लानेवाली थी वह बहू.

आज अरविंद ने एक बेटे की मां होने का सबसे बड़ा हक़- ‘बहू ढूंढ़ने का हक़’ उससे छीन लिया है. मुझे शालिनी के साथ पूरी हमदर्दी है.

पर आज मेरे रातभर जागने एवं करवटें बदलने का कारण मां-बेटे के बीच मन-मुटाव नहीं है, बल्कि बहुत निजी है. सोऊं कैसे? पलकें बंद करते ही तो सामने नंदिनी आ खड़ी होती है. कहते हैं, व़क्त बीत जाता है, पर हमेशा ऐसा होता है क्या? कभी-कभी व़क्त का एक टुकड़ा तमाम उम्र हमारे साथ ही चलता रहता है. उम्रभर विलग नहीं हो पाता वह हमसे. उससे जुड़े व्यक्ति वैसे ही ताज़ा रहते हैं हमारी स्मृति में- उम्र और समय के प्रभाव से अछूते. मेरी यादों में नंदिनी आज वैसी ही है. उसकी इकहरी देहयष्टि और सलोने चेहरे पर नीला रंग ख़ूब फबता था. मेरी उम्र ढल गई, तो वो भी…! अरसा बीत गया उसे देखे. न उम्मीद है उसे देखने की, न कभी कोशिश ही की है. फिर भी एक अदृश्य तार से जुड़ा हूं आज भी. मैं क्यों नहीं हो पाया बेटे जैसा साहसी? क्यों नहीं कर पाया मां-बाबा के सम्मुख विद्रोह?

Usha Vadhava

          उषा वधवा

अधिक शॉर्ट स्टोरीज के लिए यहाँ क्लिक करें – SHORT STORIES

कहानी- प्रतिबद्ध 3 (Story Series- Pratibadh 3)

पुष्कर के घर छोड़ने के वर्षों बाद तक वह रात्रि की नीरवता में सोचती, ‘कहीं वह आतंकवादी तो नहीं बन गया?’ घर-द्वार छोड़ने के बाद दिशाहीन व्यक्ति आख़िर जाएगा कहां? ईश्‍वर से वह उसके जीवित रहने की कामना करती. पुष्कर को अगर कुछ हो गया तो वह स्वयं को आजीवन क्षमा न कर सकेगी. उसे जीवित देख उसने राहत की सांस ली.

पुष्कर के प्रति उसके मन में श्रद्धा के भाव जाग उठे, ‘राग-द्वेष, हर्ष-विषाद से यह इंसान बहुत दूर जा पहुंचा है. गंगा के समान पवित्र हृदय आज आकाश सदृश बृहद हो गया है. हृदय पर एक चोट खाकर इंसान इस तरह महान भी हो सकता है!  भस्मीभूत हुए अपने सपनों से आहत उसने वैराग्य की धूनि रमा ली.

“खाना अब तक शुरू नहीं किया न… दाल में घी देना भूल ही गई थी.” उसने कमरे में प्रवेश करते ही कहा.

कटोरे से वह घी निकाल रही थी तभी उसकी दृष्टि पुष्कर से जा टकराई. मुग्ध दृष्टि से उसे अपनी ओर देखते पाकर वह घबरा उठी. घबराहट में अधिक घी छलक कर दाल में जा गिरा.

“वाह! क्या प्रेम है… ख़ूब घी पिलाया जा रहा है पुष्कर भैया को.” पुष्कर की बहन सुमेधा हंस रही थी. तब तक कमरे में ताऊ भी आ गए. मयूरी अप्रस्तुत हो उठी. दुपट्टे को संभालती वह जो भागी तो घर जाकर ही दम लिया.

उस दिन के बाद से उसने मधुसूदनजी के घर की ओर जाना ही छोड़ दिया. विवाहोत्सव में मग्न होकर वह उस घटना को भूल गई.

बारात निकलने की तैयारी ज़ोर-शोर से हो रही थी. मयूरी ने आसमानी ज़रीदार लहंगा पहन रखा था. चाय की ट्रे लेकर आ रही थी कि एक मोहक स्वर उभरा,

“मुझे भी चाय मिलेगी?”

“क्यों नहीं…” चाय बढ़ाते हुए मयूरी ने दृष्टि ऊपर की तो सामने पुष्कर था. वह मयूरी को अपलक निहार रहा था.

“मुझसे ब्याह करोगी?” चाय का कप मयूरी के हाथ से लेकर उसने सीधा प्रश्‍न पूछा.

घबराई मयूरी ट्रे लेकर आगे बढ़ने लगी तो उसने रास्ता रोक लिया, “मयूरी मुझे तुम्हारा जवाब चाहिए. प्रथम भेंट में ही मैंने तय कर लिया था कि तुम नहीं तो कोई नहीं. विश्‍वास मानो मेरा, मैं आजीवन कुंआरा रह जाऊंगा.”

देवदूत से दुर्लभ सौंदर्य को देख मयूरी मुग्ध हो उठी. उसके कान गर्म हो उठे, चेहरा लाल हो गया, पर भावनाओं पर नियंत्रण रखकर वह वहां से चली गई.

चाचा के ब्याह के बाद ही मधुसूदनजी उसके विवाह का प्रस्ताव लेकर आए. सभी बेहद ख़ुश हो उठे. मयूरी की आंखों में इंद्रधनुषी सपने जाग उठे.

सारे सपने क्षणभर में ही चूर हो गए जब दादाजी ने कहा कि वह सजातीय होने के बाद भी उपजाति का है, इसलिए यह शादी नहीं हो सकती. उस दिन से दोनों परिवार के संबंधों में दरार-सी पड़ गई.

मयूरी के बीए करते ही उसका ब्याह दिल्ली में कार्यरत एक इंजीनियर से हो गया. मयूरी ब्याह के बाद दिल्ली आ गई. पति उसे बेहद प्यार करते. पहले निहार का जन्म हुआ, फिर सागरिका का.

सागरिका के जन्म के कुछ दिनों बाद ही अचानक उसकी पुष्कर की बहन से कनाट प्लेस में भेंट हो गई. उसके पति भी दिल्ली में ही कार्यरत थे. “तुम्हारे ब्याह के बाद ही भैया घर छोड़कर चले गए. बहुत खोज की गई, पर उनका पता नहीं चला.” अश्रुपूरित नेत्रों से पुष्कर की बहन ने बताया.

यह भी पढ़ें: ज्ञानी होने का दावा (Gyani Hone Ka Dawa)

मयूरी स्तब्ध रह गई. उसके हृदय में एक टीस-सी उठी, “मेरे लिए उसने अपने जीवन की आहुति दे दी. मैं तो अपने संसार में रमी रही, कभी उसकी सुध न ली. संस्कारों से जकड़ी मैं कर भी क्या सकती थी. शादी-ब्याह के फैसले तो परिवार के बुज़ुर्ग करते हैं. हे ईश्‍वर वे कहीं भी रहें, उनके साथ रहना.”

समय ने करवट ली, बच्चे बड़े हो गए. सागरिका ब्याह कर मुंबई अपने पति के पास चली गई और निहार का ब्याह दिल्ली में ही हो गया. अपने जीवन की उलझनों के बीच कभी पुष्कर की याद आने से वह अपराधबोध से भर उठती. उसने पुष्कर से न तो कोई वादा ही किया था और न उसे धोखा ही दिया था, पर उसके घर छोड़ने का कारण तो वही थी. पुष्कर के परिवारवाले भी उसे ही कलंक लगाते होंगे.

वर्षों के लंबे अंतराल के बाद पुष्कर की याद अतीत के गर्भ में दफ़न हो गई थी. आज जब स्मिता की बुआ वगैरह स्वामीजी के जीवन से वैराग्य की कथा सुन रही थी तो वह भी बहुत लगन से सब सुन रही थी. उसे क्या पता था कि जिस स्वामी के दर्शनार्थ वह स्मिता की बुआ के घर जा रही है, वह कोई और नहीं, पुष्कर है. उसके परिवार वालों के कारण ही पुष्कर के हृदय को चोट पहुंची है. अपनी एकांगी प्रेम में असफलता के कारण ही उसे जीवन से वैराग्य हो गया और फिर हताशा में स्वतः ईश्‍वर की ओर रुख कर लिया. चोट खाने के बाद ही तो इंसान ईश्‍वर की शरण में जाता है.

पुष्कर के घर छोड़ने के वर्षों बाद तक वह रात्रि की नीरवता में सोचती, ‘कहीं वह आतंकवादी तो नहीं बन गया?’ घर-द्वार छोड़ने के बाद दिशाहीन व्यक्ति आख़िर जाएगा कहां? ईश्‍वर से वह उसके जीवित रहने की कामना करती. पुष्कर को अगर कुछ हो गया तो वह स्वयं को आजीवन क्षमा न कर सकेगी. उसे जीवित देख उसने राहत की सांस ली.

पुष्कर के प्रति उसके मन में श्रद्धा के भाव जाग उठे, ‘राग-द्वेष, हर्ष-विषाद से यह इंसान बहुत दूर जा पहुंचा है. गंगा के समान पवित्र हृदय आज आकाश सदृश बृहद हो गया है. हृदय पर एक चोट खाकर इंसान इस तरह महान भी हो सकता है!  भस्मीभूत हुए अपने सपनों से आहत उसने वैराग्य की धूनि रमा ली. उमड़ती भावनाओं व आकांक्षाओं को किस तरह उसने हृदय के गहनतम कोने में दफ़नाया होगा? उस क्षण कैसी मर्मांतक पीड़ा की तीव्र अनुभूति उसे हुई होगी.’

उसे महसूस हुआ आज प्रतिबद्ध लहनासिंह अपनी सूबेदारनी के सम्मुख खड़ा हो,  सूबेदारनी के कथन का मान रखने के लिए लहनासिंह ने अपनी जान दे दी और पुष्कर ने जो कहा वह अपने जीवन की पूर्णाहूति देकर निभाया. उसे पुष्कर से लहनासिंह जैसी प्रतिबद्धता की आशा न थी. एक कसक के साथ उसका रोम-रोम सिहर उठा.

– लक्ष्मी रानी लाल

अधिक शॉर्ट स्टोरीज के लिए यहाँ क्लिक करें – SHORT STORIES

 

 

कहानी- प्रतिबद्ध 2 (Story Series- Pratibadh 2)

मयूरी स्वामीजी की चर्चा में शामिल नहीं होना चाहती थी, पर सभी उनके प्रवचन का सार उससे सुनना चाहते थे. क्या सुनाए वह? उसके जीवन में एक तूफान आ गया था. जिस अपराध को उसने किया ही नहीं, उसी का कहर उस पर टूटा जिसके पश्‍चाताप की ज्वाला में वह आजीवन जलती रही.

रात्रि का दूसरा पहर समाप्त होने को था, पर उसकी आंखों से नींद कोसों दूर थी. हवा का एक तीव्र झोंका आया और अतीत पर जमी गर्द ऊपर उठती गई, जिसने भूली-बिसरी स्मृतियों  को तीक्ष्ण कर दिया. रात की घनी नीरवता में सिमट कर वह अतीत के गलियारे में भटकती अपनी किशोरावस्था में जा पहुंची.

उसने चोर दृष्टि से उन्हें देखा. उनकी निष्पाप दृष्टि को देख उसे अपनी भूल का एहसास हुआ. उनके चेहरे पर एक दिव्य मुस्कान थी. उन्होंने अपनी मोहक एवं शांत दृष्टि मयूरी के चेहरे पर टिका कर पूछा, “कैसी हो मयू? परिवार में सभी कुशल-मंगल से हैं?”

मयूरी क्षणभर को जड़वत रह गई. उसकी चेतना ने उसका दामन छोड़ दिया. अपनी सुध-बुध बिसरा कर उसने भी उस समंदरी आंखों की गहराई में झांका. उसके मस्तिष्क में जैसे भूचाल-सा आ गया. आंखों में अनेक प्रश्‍न कौंधने लगे. किसी तरह से उसने संयतपूर्वक सजल नेत्रों से कहा, “सभी ठीक हैं.”

“सोचा नहीं था कि जीवन की इस प्रौढ़-गोधूली में तुमसे भेंट हो जाएगी. मन पर नियंत्रण रखो मयू… ईश्‍वर जो करता है, अच्छा करता है. ईश्‍वर तुम्हें सुखी रखें.”

स्वामीजी से मिलने कुछ लोग वहां पर आ गए. सबों को बातों में मशगूल देख मयूरी पीछे जाकर बैठ गई. प्रसाद लेकर स्मिता जब आयी तो वह मयूरी को देख घबरा उठी, “क्या बात है मयूरी? तबीयत तो ठीक है?”

“हां, यूं ही ज़रा सर चकरा गया था.” मयूरी ने टालने के उद्देश्य से कहा. “कितनी बार कहा है ब्लड प्रेशर चेक करवा लो. बत्रा अस्पताल में मेरे अंकल डॉक्टर हैं… चलो तुम्हारा कल चेकअप करवा दूं.”

“अरे नहीं यूं ही…”

“मयूरी जीवन के जिस पड़ाव पर अभी हम हैं, उसमें सतर्कता की बेहद आवश्यकता है अन्यथा वृद्धावस्था भयावह हो जाएगी… अभी से ध्यान रख… मैं तो हमेशा अपना चेकअप कराती हूं. वृद्धावस्था का भय मुझे अभी से खाए जा रहा है.”

कमरे में हलचल बढ़ जाने से उन्होंने दृष्टि फेरी तो देखा सभी स्वामीजी को विदा करने कमरे से बाहर जा रहे हैं. स्मिता तेज़ी से द्वार की तरफ़ बढ़ गई, पर मयूरी वहीं शिला सदृश बैठी रही. शिष्टाचारवश उसने भी उठने की चेष्टा की तो दृष्टि उस स्वामी से जा मिली.

स्वामीजी के जाने के बाद सभी उनकी विद्वता का बखान करने में लगे थे. मयूरी ने स्मिता को घर लौटने का अनुरोध किया. मयूरी की अस्वस्थता को देख स्मिता मयूरी को लेकर लौट गई.

मयूरी स्वामीजी की चर्चा में शामिल नहीं होना चाहती थी, पर सभी उनके प्रवचन का सार उससे सुनना चाहते थे. क्या सुनाए वह? उसके जीवन में एक तूफान आ गया था. जिस अपराध को उसने किया ही नहीं, उसी का कहर उस पर टूटा जिसके पश्‍चाताप की ज्वाला में वह आजीवन जलती रही.

यह भी पढ़ें: मन का रिश्ता: दोस्ती से थोड़ा ज़्यादा-प्यार से थोड़ा कम (10 Practical Things You Need To Know About Emotional Affairs)

रात्रि का दूसरा पहर समाप्त होने को था, पर उसकी आंखों से नींद कोसों दूर थी. हवा का एक तीव्र झोंका आया और अतीत पर जमी गर्द ऊपर उठती गई, जिसने भूली-बिसरी स्मृतियों  को तीक्ष्ण कर दिया. रात की घनी नीरवता में सिमट कर वह अतीत के गलियारे में भटकती अपनी किशोरावस्था में जा पहुंची.

उस वर्ष उसने कॉलेज में दाख़िला लिया था. गर्मी की छुट्टियां होते ही उसे अपने चाचा की शादी में गांव जाना पड़ा. जीवन में पहली बार वह किसी गांव को देख रही थी. गांव के स्वच्छ एवं उन्मुक्त वातावरण में उसने बेहद आनंद का अनुभव किया.

गांव का सामाजिक जीवन आपसी रिश्तों की सुनहरी डोर से बंधा था. हर रिश्ते का एक नाम था. पड़ोस में रहनेवालों को सभी चाचा, ताऊ या मामा कहकर पुकारते, उनमें किसी प्रकार का दुराव-छिपाव नहीं था. बच्चे अपने आंगन में कम पड़ोसी के आंगन में अधिक खेलते थे. जहां भूख लगती, वहीं खा लेते.

मयूरी के दादाजी के निकटतम पड़ोसी थे मधुसूदन दास. दोनों परिवारों में बेहद घनिष्ठता थी. मधुसूदनजी की पत्नी शादी के रस्मो-रिवाज़ को निभाने की वजह से मयूरी के दादाजी के घर पर ही अधिकांश समय बिताती. ब्याह के गहनों को देखते हुए अचानक उसे शहर से आए अपने पुत्र पुष्कर का ध्यान आया. वह हड़बड़ाकर उठ बैठी.

“गहनों को मैं बाद में देखूंगी. अपनी पढ़ाई ख़त्म करके पुष्कर कल ही शहर से वापस आया है. वह भूखा मेरी राह देख रहा होगा.”

“अरे बैठो भी… बार-बार गहनों को निकालना इतना आसान नहीं होता… मयूरी… जा पुष्कर का खाना परोस दे.”

मयूरी दिनभर पुष्कर के बरामदे में सहेलियों के साथ गप-शप लड़ाया करती थी.

उस परिवार के सभी सदस्य उसे बेहद स्नेह देते थे. पुष्कर चूंकि पिछली रात ही आया था, इसलिए परिचय नहीं हुआ था. वह स्नान करके तुरंत निकली ही थी कि उसे पुष्कर के घर जाना पड़ा.

पुष्कर अपने कमरे में बैठा किसी पत्रिका के पन्ने पलट रहा था. मयूरी को अचानक देख वह आश्‍चर्यचकित हो उठा. मयूरी साधिकार रसोई में जाकर उसका खाना परोस लाई.

“ताई ने कहा है खाना खा लें. उन्हें आने में देर होगी.” कहती हुई वह फिर रसोई में चली गई.

उसके अप्रतिम सौंदर्य को देख पुष्कर अभिभूत हो उठा. उसने कमरे की खिड़की से रसोई की ओर झांका. अपने खुले लहराते केश को लपेटने में बार-बार असफल होती मयूरी उसे बेहद भोली-सी लगी. दुपट्टे को संभालते उसे कमरे की ओर आता देख पुष्कर अपनी जगह पर पुनः जा बैठा.

– लक्ष्मी रानी लाल

अधिक शॉर्ट स्टोरीज के लिए यहाँ क्लिक करें – SHORT STORIES

कहानी- प्रतिबद्ध 1 (Story Series- Pratibadh 1)

“मुझे समझ में नहीं आता कि लोग संन्यास क्यों लेते हैं?” मयूरी ने कुछ सोचते हुए पूछा.

“सीधी-सी बात है- मन पर चोट लगी होगी. चोट खाकर ही कोई लेखक, कवि या संन्यासी बन जाता है.” स्मिता ने कार को दाहिनी ओर मोड़ते हुए कहा.

“साधु-संत के दर्शन की बात करते ही सभी पुरुष चिढ़ उठते हैं. मैंने इन्हें फ़ोन पर अपने जाने की सूचना दे दी.” मयूरी ने कहा.

“वे सच्चाई समझते हैं, पर सभी ढोंगी नहीं होते. ये संत पहुंचे हुए हैं सुनकर सोचा मिल ही लूं.” स्मिता अपनी ही बात पर हंस पड़ी.

 

सुबह-सुबह ही फ़ोन की घंटी बज उठी. मयूरी ने बेसन सने अपने हाथों को धोकर फोन उठाया.

“हैलो…”

“मयूरी… मैं स्मिता बोल रही हूं… सुबह-सुबह परेशान किया, क्षमा करना… जनकपुरी चलोगी?”

“जनकपुरी… क्यों क्या बात है? मयूर विहार से जनकपुरी जाने में समय भी व्यर्थ में नष्ट होता है… पर बात क्या है?”

“मेरी बुआ के घर एक पहुंचे हुए संत आए हैं, चलकर दर्शन करने में क्या हर्ज़ है?”

“कल स्वतंत्रता दिवस है, सबकी छुट्टी होने से सभी घर में रहेंगे. कल ही चलें तो कैसा रहेगा?”

“क्या बात कह रही है! कल क्या दिल्ली जैसे जगह पर निकलना सुरक्षा की दृष्टि से सही होगा? आतंकवादियों के हमले की आशंका के मद्देनज़र सुरक्षा-व्यवस्था कड़ी कर दी गई है. आज चलो न.”

“इन आतंकवादियों ने तो जीना मुश्किल कर दिया है, ऐसा करो तृषा स्कूल से लौटती ही होगी. जब तक स्कूल में रहती है, चिंकी को मुझे ही संभालना पड़ता है. उसके आते ही चलूंगी.”

“कोई बात नहीं तुम तैयार रहो. मैं तुम्हें पिकअप कर लूंगी.”

फ़ोन रखते ही मयूरी दुविधा में पड़ गई, ‘कौन-सी साड़ी पहनूं? इन संतों के सामने सादगी ही अच्छी.’ उसने एक बादामी रंग की साड़ी निकाली. उसके आंचल से मैच करती कत्थई रंग की बिंदी लगाई. शीशे में ख़ुद को देख मुस्कुरा उठी, ‘कौन कहेगा, मैं दादी बन गई?’

कार का हॉर्न सुन उसने खिड़की से झांका. ज़ेन का द्वार खोल स्मिता अपनी बिखरी लटों को ठीक कर रही थी. बहू तृषा पर गृहस्थी का भार डाल वह स्मिता के साथ कार में जा बैठी.

स्कूल-कॉलेज और द़फ़्तर का समय न होने के कारण उन्हें लाल बत्ती पर कहीं रुकना नहीं पड़ा. दोनों सहेलियां कभी किसी साधु-संतों के चक्कर में नहीं पड़ती थीं. पर इस ब्रह्मचारी संत के विषय में इतना कुछ सुन रखा था कि दोनों उनके दर्शनार्थ जनकपुरी जाने को निकल पड़ीं.

“मुझे समझ में नहीं आता कि लोग संन्यास क्यों लेते हैं?” मयूरी ने कुछ सोचते हुए पूछा.

“सीधी-सी बात है- मन पर चोट लगी होगी. चोट खाकर ही कोई लेखक, कवि या संन्यासी बन जाता है.” स्मिता ने कार को दाहिनी ओर मोड़ते हुए कहा.

यह भी पढ़ें: श्रावण मास में ऐसे करें शिव को प्रसन्न- पूरी होगी हर मनोकामना (How To Worship Lord Shiva During Shravan Month?)

“साधु-संत के दर्शन की बात करते ही सभी पुरुष चिढ़ उठते हैं. मैंने इन्हें फ़ोन पर अपने जाने की सूचना दे दी.” मयूरी ने कहा.

“वे सच्चाई समझते हैं, पर सभी ढोंगी नहीं होते. ये संत पहुंचे हुए हैं सुनकर सोचा मिल ही लूं.” स्मिता अपनी ही बात पर हंस पड़ी.

स्मिता को बुआ द्वार पर ही मिल गई. अंदर कमरे में पूर्ण शांति थी. सामने एक

ऊंचे आसन पर स्वामीजी विराजमान थे. स्मिता एवं मयूरी शालीनतापूर्वक पीछे जाकर बैठ गईं. स्वामीजी शांत चित्त से मनोनिग्रह के विषय में बता रहे थे,

“मनोनिग्रह के लिए एकाग्रता संपादन की अपेक्षा मन के कषाय-कल्मषों को धोया, हटाया व सुधारा जाए. अपनी प्रकृति रूखी, स्वार्थी और चिड़चिड़ी न हो तो सबके साथ सहज सज्जनोचित्त संबंध बने रहेंगे और मित्रता का क्षेत्र सुविस्तृत बनता जाएगा.”

स्वामीजी की बातों से प्रभावित व सहमत स्मिता एवं मयूरी ने एक-दूसरे की आंखों में देखा मानो कह रही हों, ‘हमारा आना सार्थक हुआ.’ दोनों ने फिर स्वामीजी की बातों पर अपना ध्यान केंद्रित किया.

“कुविचारों और दुःस्वभावों से पीछा छुड़ाने के लिए सद्विचारों के संपर्क में निरंतर रहा जाए.”

स्वामीजी की बातों से मयूरी ने अनुमान लगाया कि इनके अध्ययन व चिंतन का क्षेत्र बहुत विस्तृत है. विद्वता का आभास उनके चेहरे से हो रहा था- गौर वर्ण के ललाट पर चंदन व रोली का तिलक, गले में रूद्राक्ष की माला और शरीर पर केसरिया वस्त्र सुशोभित थे. छोटी-छोटी दाढ़ी पर सुनहरे फे्रम का चश्मा उनके व्यक्तित्व की शोभा को द्विगुणित कर रहा था.

प्रवचन समाप्त होते ही मयूरी और स्मिता ने श्रद्धापूर्वक संत को नमस्कार किया.

“तू यहीं रुक, मैं प्रसाद बांटने में बुआ के हाथ बंटा कर अभी आई.” मयूरी को वहीं पर छोड़ स्मिता अपनी बुआ की मदद करने चली गई.

अचानक स्वामीजी को जैसे कोई झटका लगा हो. चेहरे पर हर्ष-विषाद की रेखाएं आने-जाने लगीं. गांभीर्य का एक झीना-सा आवरण उनके चारों तरफ़ सिमट आया. मयूरी उनके चेहरे के उतार-चढ़ाव को समझने में पूर्णतया असमर्थ थी. उसे एहसास हुआ कि स्वामीजी की दृष्टि उस पर ही केन्द्रित है. वह असहज हो उठी. उसके दिल ने धिक्कारा, ‘क्यों चली आई वह इस तरह के लोगों का दर्शन करने? नारी पर दृष्टि पड़ते ही इनका सारा पांडित्य तिरोहित हो जाता है.’

– लक्ष्मी रानी लाल

अधिक शॉर्ट स्टोरीज के लिए यहाँ क्लिक करें – SHORT STORIES

 

 

 

 

 

कहानी- स्वांग 3 (Story Series- Swang 3)

उसे दम घुटता जान पड़ा. उसने खुली हवा का स्पर्श पाने के लिए आंगन में खुलनेवाली खिड़की खोल दी.

सामने नीति थी. हौज के पास हाथ-पैर धो रही थी. इसके मन में क्या कभी भी तमन्ना नहीं जागी मुझे पाने की? मैं कभी भी इसका काम्य नहीं रहा? नीति आंगन की डोरी में सूख रहा तौलिया निकालने के लिए मुड़ी और उसकी दृष्टि मनुहरि पर पड़ गई.

“आ जाइए. बाथरूम खाली है.” इसका सरोकार बस इतना ही रहा है- बाथरूम खाली है? “आं… हां… नहीं… विवाह की शुभकामनाएं.”

“धन्यवाद.” नीति पूरी तरह सहज स्वाभाविक दिखी. कोई पछतावा नहीं, पीड़ा नहीं, खेद नहीं.

मनुहरि खिड़की से हटकर बिस्तर पर आ गया. आत्ममुग्धता, विशिष्टता का बोध उसे सुहा नहीं रहा है, बल्कि अस्वाभाविक लग रहा है. स्वांग की तरह.

मनुहरि पुस्तक पढ़ रहा था, तभी बीच के द्वार को किसी ने खटखटाया. गुरुजी अस्वस्थ हैं, उन्हें कोई परेशानी तो…? उसने तत्परता से द्वार खोला.

“क्या बात है चाची?”

“निधि अपनी सहेली की शादी में गई है. अब तक नहीं लौटी. रात बहुत हो गई है, जी घबरा रहा है.” चाची चिंतित थी.

“मैं ले आता हूं. पता बताइए.” उसने बाइक स्टार्ट की और चल पड़ा. क्या एकांत उपलब्ध कराया जा रहा है? पूरी तैयारी- नीति या निधि वह जिसमें चाहे रुचि ले.

उसे देख निधि की दुविधा दूर हुई, “अच्छा हुआ आप आ गए. यहां कोई खाली नहीं है, जो मुझे घर छोड़े. मैं परेशान थी.” “आइए.” वह पीछे बैठी निधि के स्पर्श को महसूस करता रहा.

निधि कहने लगी, “मैं भी पीएससी देना चाहती हूं, पर बाबूजी कहते हैं यह कठिन परीक्षा है. आप टॉपर रहे हैं, जब आप ही फर्स्ट कैटेगरी में नहीं आ सके तो… नहीं मेरा मतलब मैं तो ऐवरेज ही हूं. हिम्मत नहीं कर पाती.”

यह बेवकूफ़ लड़की इस एकांत में याद दिला रही है कि मैं पूरी तरह सफल नहीं हूं. गुरुजी आप सोचते हैं कि मैं इस मूढ़मति से अनुराग रखूं, तो यह न होगा.

तनिख तल्ख होकर बोला, “अब चयन प्रणाली निष्पक्ष नहीं रही और आप कॉम्पटीशन से घबराती क्यों हैं? चयन होगा, नहीं होगा, कोशिश की जानी चाहिए.”

“आपसे मुझे हौसला मिला.”

घर पहुंचा तो रुक्मणी चाची दरवाज़े पर मिल गईं. “मनु, तुम्हारा बड़ा सहारा है. तुम्हें तकलीफ़ हुई.”

“फिर तो मैं भी आप लोगों को तकलीफ़ दे रहा हूं.”

“नहीं, नहीं. तुम्हारे आ जाने से अच्छा लगने लगा है.”

कोई दो दिन को आ जाए, तो लोगों को अड़चन होती है, लेकिन यह परिवार उसे निशुल्क रखकर आनंद पा रहा है. स्पष्टतः इस घर में एक सपना पल रहा है. प्रत्येक सदस्य, हां छोटी भी अपने स्तर पर कोशिश कर रही है, सपना पूरा हो.

छोटी पढ़ने आई. मनुहरि के बिस्तर पर दो- तीन बर्थडे कार्ड रखे हुए थे. छोटी ने उठा लिए, “कल आपका बर्थडे है?”

“हां, कार्ड मेरे मित्रों ने भेजे हैं.”

“आप बर्थडे सेलिब्रेट नहीं करते?”

“यहां अकेले क्या करूंगा.”

दूसरे दिन सायंकाल कार्यालय से लौटा, तो रुक्मणी ने पुकार लिया, “छोटी ने बताया आज तुम्हारा जन्मदिन है. हाथ-मुंह धोकर आ जाओ. मुंह मीठा कराना है.”

“जी.” वह हाथ मुंह धोकर पहुंच गया. चाची ने नीति को आवाज़ दी, “नीति, लाओ, क्या ला रही हो?”

नीति तश्तरियों में गुलगुले, हलुवा, कटलेट लिए आ पहुंची, “जन्मदिन शुभ हो.” “धन्यवाद, आप लोगों ने मेरा जन्मदिन याद रखा, मुझे अच्छा लगा.” नीति वहीं बैठ गई, “गुनाहों का देवता मिल जाएगी?”

“आपने नहीं प़ढ़ी?”

“बहुत पहले पढ़ी थी.”

गुनाहों का देवता पढ़ चुकी है, पुनः पढ़ना चाहती है. क्या बनना चाहती है? बिनती या सुधा? इस क़िताब के बहाने कोई संदेश तो नहीं देना चाहती? अभी कल ही तो आंगन में कपड़े सुखाते हुए गा रही थी, ‘जोगी हम तो लुट गए तेरे प्यार में, जाने तुझको ख़बर कब होगी.. प्रेम सम्प्रेषण.’

यह भी पढ़ें: कहीं आपको भी तनाव का संक्रमण तो नहीं हुआ है? (Health Alert: Stress Is Contagious)

“खाइए न.”

“हां-हां.” पाकशाला निधि और छोटी संभाले हुई थी. उन्होंने रुक्मणी को भी वहीं बुला लिया.

रचना रची जा रही है. योजनाबद्ध तरी़के से नीति को अकेला छोड़ा जा रहा है कि लड़का पटाओ. वह स्पष्ट कहेगा, आप लोगों के बहुत उपकार हैं, पर मैं आपके इस महाजनी प्रस्ताव की निंदा करता हूं. मैं मानता हूं, प्रत्येक माता-पिता अपनी लड़की का मंगल चाहते हैं और प्रत्येक लड़की की कुछ कामनाएं होती हैं, पर मैं प्रस्तुत नहीं हूं.

रामराज गुरुजी के द्वारा बताए गए फूड इन्स्पेक्टर लड़के के साथ दीप्ति के विवाह की तिथि निकल आई. मनुहरि छुट्टी लेकर घर चला गया. गुरुजी ने कहा था विवाह में पहुंचेंगे. नहीं पहुंचे. मनुहरि वापस लौटा, तो गुरुजी ने उसे शुभ समाचार दिया, “मनुहरि, आयोजन अच्छा रहा न? मैं पहुंच न सका. उन्हीं दिनों नीति को देखने लड़केवाले आ गए. वे लड़की देखने के इरादे से आए थे, पर उन्हें नीति इतनी भा गई कि यहीं के बाज़ार से साड़ी, अंगूठी ख़रीदकर रिश्ता पक्का कर गए. लड़का ग्रामीण बैंक में शाखा प्रबंधक है. इसी व्यस्तता में मैं नहीं पहुंच सका.”

मनुहरि के लिए सूचना अप्रत्याशित थी. तो उसे हथियाने का इन्होंने विचार नहीं किया? यह परिवार उससे प्रभावित नहीं है? इन लोगों को उसका एक भी गुण दिखाई नहीं दिया? तो…? ये लोग उसके प्रति इतने निर्लिप्त कैसे रह सकते हैं? कैसे? मनुहरि को लगा ठीक इसी क्षण वह पूरी तरह अयोग्य, अकर्मण्य, अक्षम साबित हुआ है. इस लायक भी नहीं है कि किसी मामूली परिवार की मामूली लड़की के दिल में अपने लिए ललक जगा सके. लगा ये लोग उसे अनदेखा कर रहे हैं, बल्कि उपेक्षित… अपमानित, खारिज ही कर दिया है. वह कुछ कहने की स्थिति में नहीं था. पूरी तरह आहत होकर कमरे में चला आया. बहुत से दृश्य उसके सामने आए… निःशुल्क आवास व्यवस्था, मुनगे की कढ़ी, गुलगुले, हलुवा, गुनाहों का देवता. स्नेह, सहयोग, सौहार्द्र, सदाशयता. इनकी भलमनसाहत किसी फलप्राप्ति के लिए नहीं, बल्कि उस आदमीयत के लिए थी, जो इनके दिलों में, संस्कारों में है? उसे दम घुटता जान पड़ा. उसने खुली हवा का स्पर्श पाने के लिए आंगन में खुलनेवाली खिड़की खोल दी.

सामने नीति थी. हौज के पास हाथ-पैर धो रही थी. इसके मन में क्या कभी भी तमन्ना नहीं जागी मुझे पाने की? मैं कभी भी इसका काम्य नहीं रहा? नीति आंगन की डोरी में सूख रहा तौलिया निकालने के लिए मुड़ी और उसकी दृष्टि मनुहरि पर पड़ गई.

“आ जाइए. बाथरूम खाली है.” इसका सरोकार बस इतना ही रहा है- बाथरूम खाली है? “आं… हां… नहीं… विवाह की शुभकामनाएं.”

“धन्यवाद.” नीति पूरी तरह सहज स्वाभाविक दिखी. कोई पछतावा नहीं, पीड़ा नहीं, खेद नहीं.

मनुहरि खिड़की से हटकर बिस्तर पर आ गया. आत्ममुग्धता, विशिष्टता का बोध उसे सुहा नहीं रहा है, बल्कि अस्वाभाविक लग रहा है. स्वांग की तरह. स्वांग. वह ख़ुद को ही ठगते-झुठलाते, ख़ुद से छिपाते हुए नीति से प्रेम कर बैठा है- निहायत रहस्यमय तरी़के से. और इस रहस्य को ठीक उस क्षण समझ पा रहा है, जब समझने का कोई अर्थ नहीं बचा.

Sushma Munindra

     सुषमा मुनीन्द्र

अधिक शॉर्ट स्टोरीज के लिए यहाँ क्लिक करें – SHORT STORIES

 

कहानी- स्वांग 2 (Story Series- Swang 2)

“मानस का हंस, छोटी ने बताया आप पढ़ नहीं पाई थीं.” वह नहीं समझ सका, उसे स्थिति का खुलासा करना चाहिए था या नहीं.

नीति की बरौनियां झपक गईं. जैसे चोरी पकड़ी गई हो, “हम लोगों को पुस्तकें नहीं मिल पातीं, इसलिए ये…”

“पढ़ लिया करें, पुस्तकें आनंद देती हैं.”

“मृत्युंजय मिल सकती है?”

पुस्तकों का मामला उलझा न दे. ऊंहूं. यह तब तक नहीं होगा, जब तक वह स्वयं इस परिवार में इन्वॉल्व न हो.

छोटी अपनी अल्हड़ता और लापरवाही में तेज़ बोलती है, “अब नहीं ले रहे हैं.” नीति का अस्फुट स्वर, “कह, एक लेना पड़ेगा.” छोटी फुलका ले आई, “एक तो लेना ही पड़ेगा.” उसने ले लिया. एक फुलका और के बहाने नीति फतह पाना चाहती है. गुरुजी कहने लगे, “बेटा, कभी फुर्सत में छोटी को गणित पढ़ा दिया करो. इसकी गणित कमज़ोर है.” “पढ़ा दूंगा. गणित आज भी मेरा प्रिय विषय है.”

छोटी बीच का द्वार खोलकर मनुहरि के कमरे में आ जाती. जब तक पढ़ती, द्वार खुला रहता. खुले द्वार से उधर की गतिविधि का आभास मिलता. नीति और निधि उधर से गुजरतीं, तो मनुहरि को लगता उसे देखने के लिए दोनों इधर-उधर हो रही हैं. हां, उसका तो अनुमान, बल्कि धारणा है कि वह इस परिवार के लिए आकर्षण का केंद्र बनता जा रहा है. उसकी उपस्थिति ज़बर्दस्त परिवर्तन की तरह है.

तो इस स्वप्नविहीन घर में कच्चे रूप में एक सपना जन्म ले रहा है, जो इन्हें किसी मुक़ाम तक नहीं पहुंचाएगा.

“फिर गड़बड़. भैया आन्सर नहीं निकल रहा.” छोटी पस्त थी. मनुहरि ने चौंककर कॉपी पर ध्यान केंद्रित किया, “छोटी तुमने ग़लती दोहराई है. बीजगणित बहुत सरल है, बस तुम्हें चिह्नों पर ध्यान देना होगा.” “यहीं तो गड़बड़ा जाती हूं.” फिर मनुहरि ने आंगन की खिड़की से सुना. छोटी बता रही थी, “दीदी, मुझे तो

मालूम ही नहीं था कि गणित इंट्रेस्टिंग हो सकता है. मैं गणित समूह लूंगी यह पक्का रहा. पीईटी में बैठूंगी. यह भी पक्का रहा.”

नीति और निधि ने हाथ के संकेत से छोटी को धीमे बोलने को कहा. फिर छोटी ने क्या बताया, लड़कियों ने क्या पूछा, वह सुन न सका. अनुमान पुष्ट हुआ, लड़कियां उससे संबद्ध-असंबद्ध जानना चाहती हैं.

मनुहरि अनायास सोचने लगा, यदि चयन की स्थिति बने, तो नीति उपयुक्त होगी या निधि? क्या नीति?, क्यों?, पता नहीं. निधि क्यों नहीं? पता नहीं. लेकिन इस तरह की बेवकूफ़ी भरी बातें क्यों सोचनी चाहिए, जबकि सर्वश्रेष्ठ प्रस्तावों की सूची लंबी है.

मनुहरि ने पुस्तक उठाई और बिस्तर पर अधलेटा होकर पढ़ने लगा. देखा पृष्ठ चौरासी का ऊपरी कोना मुड़ा हुआ है. उसे ध्यान आया पुस्तक कई बार दूसरे स्थान पर रखी मिलती है. क्या उसके जाने के बाद लड़कियां उसके कमरे में आती हैं? पुस्तक पढ़ती हैं? कमरे में नीति आती है या निधि? या दोनों? गुरुजी और छोटी दोपहर में स्कूल में रहते हैं. चाची सो जाती होंगी और लड़कियां कमरे में दाख़िल हो जाती होंगी. लड़कियां कुछ संकेत सम्प्रेषित करना चाहती हैं?

यह भी पढ़ें: कम बजट में उठाएं घूमने का आनंद ( Tips For Budget Travelling)

उसके अनुमान को सत्यापित करने के लिए ही पढ़ते समय छोटी अप्रत्याशित रूप से कह बैठी, “भैया, आप मानस का हंस वापस कर आए? नीति दीदी पूरा पढ़ नहीं पाईं.”

“मैं नहीं जानता था तुम्हारी दीदी पुस्तकें पढ़ती हैं. मैं फिर ले आऊंगा.”

मनुहरि दूसरे दिन शाम को पुस्तक लेकर लौटा, तो दूध का पैकेट नीति ने पकड़ाया.

“मानस का हंस, छोटी ने बताया आप पढ़ नहीं पाई थीं.” वह नहीं समझ सका, उसे स्थिति का खुलासा करना चाहिए था या नहीं.

नीति की बरौनियां झपक गईं. जैसे चोरी पकड़ी गई हो, “हम लोगों को पुस्तकें नहीं मिल पातीं, इसलिए ये…”

“पढ़ लिया करें, पुस्तकें आनंद देती हैं.”

“मृत्युंजय मिल सकती है?”

पुस्तकों का मामला उलझा न दे. ऊंहूं. यह तब तक नहीं होगा, जब तक वह स्वयं इस परिवार में इन्वॉल्व न हो. यदि कहें, तो इस परिवार से उसका इन्वॉल्वमेेंट बस इतना भर है कि कई बार पीने का पानी चुक जाता है और उसे मांगना पड़ता है.

आज ही शाम को एक मित्र आ गया. घड़ा खाली. मनुहरि बाहरवाले दरवाज़े से निकलकर गुरुजी के अहाते में पहुंचा. वह अपने कार्य प्रयोजन से बीचवाले द्वार को प्रयोग नहीं करता है. निधि अहाते में थी.

“चाची नहीं हैं? पीने का पानी ख़त्म हो गया है.”

“आप चलिए, मैं लाती हूं.” निधि स्टील की बाल्टी में पानी लिए हुए बीचवाला द्वार खोलकर आ गई.

मनुहरि ने उसके हाथ से बाल्टी ली, घड़े में पानी डाला, बाल्टी वापस कर दी. निधि द्वार उढ़काकर चली गई.

मित्र बोला, “उधर वो चुप, इधर तुम चुप. तुम लोग आपस में बोलते-चालते नहीं हो या इशारों-इशारों में…”

“यह कला मुझे नहीं आती.”

“पटा लो.”

“यह कला भी मुझे नहीं आती.”

“उन लोगों को आती होगी. सजातीय, कुलीन, प्रशासनिक अधिकारी… ऐसे लड़के को कोई नहीं छोड़ता.”

“मैं हाथ नहीं आनेवाला.”

मनुहरि मित्र के साथ ही बाहर चला गया. फिर रात्रि भोजन के बाद लौटा. घर में बिजली नहीं थी. असहनीय गर्मी और बिजली का जब तब मुकर जाना. आहट पाकर रामराज गुरुजी ने छत से नीचे झांका, “ऊपर चले आओ मनुहरि.”

“आया चाचाजी.”

मनुहरि को छत का खुलापन अच्छा लगा. गुरुजी बोले, “आओ बेटा, यह छत हमारे लिए एक नियामत है.”

“बिल्कुल.” मनुहरि निवाड़ की खटिया पर बैठ गया.

बात शायद शादी-ब्याह की चल रही थी, क्योंकि गुरुजी उसी तारतम्य में कहने लगे, “मनुहरि, तुम लोग दीप्ति के लिए लड़का तलाश रहे हो न? है एक लड़का फूड इंस्पेक्टर है. मैंने नीति की बात चलाई थी, किंतु हमारा और लड़केवालों का गोत्र एक है. विवाह नहीं हो सकता. दीप्ति के लिए चर्चा की जा सकती है.”

“प्रस्ताव अच्छा है.” कहते हुए मनुहरि ने अनायास नीति को ताका. वैवाहिक चर्चा पर यह कैसा महसूस कर रही है? अंधेरे में उसकी दशा न जान सका, किंतु लक्ष्य किया वह उसे ही देख रही थी और अब आंखें झुका ली हैं. क्या नीति उसके प्रति मृदुभाव रखती है?

गुरुजी बोले, “हां, मुझे लगता है सुयोग बैठेगा.”

बिजली आ गई. मनुहरि अपने कमरे में चला आया. यदि दीप्ति का विवाह यहां तय हो जाता है, तो इस परिवार का एक उपकार और हो जाएगा. क्या यह परिवार दबाव बना रहा है? उसे घेर रहा है? गुरुजी नीति या निधि का प्रस्ताव रख दें, तो स्पष्टतः मना करना कठिन होगा. कैसी व्यूह रचना है? यदि इनसे मुक्त होकर कहीं अलग रहना चाहे, तो गुरुजी को क्या कारण बताएगा कि आप नीति या निधि को मेरे सिर थोपें, इससे बेहतर है मैं अपना प्रबंध कहीं और कर लूं. ओह…

 

Sushma Munindra

  सुषमा मुनीन्द्र

अधिक शॉर्ट स्टोरीज के लिए यहाँ क्लिक करें – SHORT STORIES

कहानी- स्वांग 1 (Story Series- Swang 1)

जब कभी लड़कियों की उंगलियों का स्पर्श हो जाता, उसे अच्छा लगता. फिर वह पुस्तक पढ़ते हुए सो जाता.

वह छुट्टियों में घर गया, तो पूरा परिवार ब्योरा लेने लगा. अम्मा बोलीं, “मनु, रामराज गुरुजी भले हैं, पर ध्यान रहे तुम्हें अपनी लड़कियों के लिए फंसा न लें.” अम्मा की विशेषता है, वे संभावित-असंभावित पर विचार करते हुए अपने मस्तिष्क को सदैव चौकन्ना रखती हैं.

मनुहरि मध्य प्रदेश की पब्लिक सर्विस कमीशन की परीक्षा पासकर पहले अटेम्प्ट में ही नायब तहसीलदार बन गया. यह उसके लिए बहुत बड़ी उपलब्धि थी. उसे ट्रेनिंग पीरियड में सीधी में रहने का आदेश मिला. उसके पिता ख़ुश हुए, “रामराज और मैं सालों एक स्कूल में शिक्षक रहे हैं. सेवानिवृत्त हो रामराज सीधी में रहने लगे हैं. मनु, मैं तुम्हारे साथ चलूंगा. रामराजजी के मकान के पास कुछ बंदोबस्त कर देंगे.”

पिता-पुत्र को देखकर रामराज गुरुजी ख़ुश हो गए, “मैं मनुहरि के लिए कोई और

मकान क्यों तलाशूं? मेरा मकान क्यों नहीं?” “तब लड़का आपके हवाले. मैं निश्‍चिंत हुआ.” पिताजी बोले.

रामराज गुरुजी अपने आधे कच्चे, आधे पक्के मकान में अपने प्रिय मित्र के पुत्र के लिए स्थान बनाने में उत्साहपूर्वक जुट गए. उत्तर की ओर का आयताकार कमरा, जिसकी खिड़की कच्चे आंगन में, एक दरवाज़ा बाहर, दूसरा बीचवाले कमरे में खुलता था, के बीचवाले द्वार को बंदकर कमरे को अलग-सा बना दिया गया. जल्दी ही उसकी दिनचर्या तय हो गई. वह सुबह बड़ी फुर्सत से उठता. चाय बनाकर इत्मीनान से पीता. फिर आंगन में खुलनेवाली खिड़की से झांकता. आंगन में कुछ काम कर रही दोनों बड़ी लड़कियां नीति और निधि कई बार, बल्कि अक्सर ही एक साथ कह उठतीं, “आ जाइए, बाथरूम खाली है.”

सामूहिक बोलने से वे झेंप जातीं और एक-दूसरे को देखकर हंसती. आंगन पार कर स्नानगृह तक जाते हुए मनुहरि को लगता दोनों लड़कियां उसे देख रही हैं. तैयार होकर वह घर से निकलता और एक भोजनालय में मासिक भुगतान पर खाना खाते हुए ऑफिस चला जाता. उसने निशुल्क आवास स्वीकार कर लिया था, किंतु गुरुजी के दबाव के बावजूद निशुल्क भोजन स्वीकार नहीं किया. शाम को वह कार्यालय से लौटकर सुस्ताता, फिर पुस्तकालय चला जाता. कुछ पुस्तकें इश्यू कराता और रात का खाना खाकर घर वापसी. इस बीच दूधवाला दूध का पैकेट रामराज गुरुजी के घर पर दे जाता. गुरुजी की पत्नी रुक्मणी नीति, निधि या सबसे छोटी लड़की, जिसको छोटी ही पुकारा जाता है, उसे पैकेट थमाती. जब कभी लड़कियों की उंगलियों का स्पर्श हो जाता, उसे अच्छा लगता. फिर वह पुस्तक पढ़ते हुए सो जाता.

वह छुट्टियों में घर गया, तो पूरा परिवार ब्योरा लेने लगा. अम्मा बोलीं, “मनु, रामराज गुरुजी भले हैं, पर ध्यान रहे तुम्हें अपनी लड़कियों के लिए फंसा न लें.” अम्मा की विशेषता है, वे संभावित-असंभावित पर विचार करते हुए अपने मस्तिष्क को सदैव चौकन्ना रखती हैं. पिताजी का आशय भी वही, “मनु, रामराजजी से मेरे अच्छे संबंध रहे हैं. तुम ऐसा आचरण न करना कि उन पर भद्दा प्रभाव पड़े.”

“तुमने मनु को लड़कियोंवाले घर में रखा ही क्यों? रामराज बड़े चतुर बनते हैं, तभी लड़के को मुफ़्त में रख लिया. आजकल अच्छे लड़के मिलते कहां हैं?”

पिताजी को उलाहना दे अम्मा मनुहरि से कहने लगीं, “मनु, हम तो परेशान हैं. रा़ेज ही कोई न कोई तुम्हारे ब्याह की बात लेकर चला आता है. हम चाय-पानी देते-देते थक रहे हैं.”

आगे का हाल मनुहरि की बहन दीप्ति ने कहा, “हां भैया, अभी एक दिन पीएससी के मेंबर अपनी लड़की का प्रस्ताव लेकर आए थे. लाखों की शादी होगी और तुम अगली बार पीएससी में बैठो, तो फर्स्ट कैटेगरी पक्की है. और तुम्हारे कॉलेज के प्रोफेसर आते ही बोले, ‘आपका लड़का मांगने आए हैं और रीवा के वे जो सबसे बड़े वकील हैं…”

यह भी पढ़ें: मल्टी टास्किंग के १० ख़तरे महिलाओं के लिए हैं हानिकारक (10 Risks Of Multitasking Every Woman Must Know)

पिताजी बोले, “इतने बड़े-बड़े लोगों को मना करते नहीं बनता और तुम अभी शादी के लिए तैयार नहीं.”

“पहले दीप्ति और ताप्ति की शादी होगी पिताजी, मैं कह चुका हूं.”

मनुहरि को ख़ुद पर गर्व हो आया. वह कितना ख़ास है. ‘अम्मा गुरुजी की लड़कियों को लेकर बेकार चिंता कर रही हैं. रामराज गुरुजी का औसत स्तर है. उनके संदर्भ में वह सोचेगा ही नहीं. यहां तो आदर्श स्थापना का भी मौक़ा नहीं है, जब लोग कहें लड़के ने मामूली घर की लड़की से विवाह कर उदाहरण प्रस्तुत किया है. लोग तो कहेंगे, लड़का इश्क़ में पड़ गया, शादी करनी पड़ेगी.’

वर्जनाएं मनुष्य को लुभाती हैं. अम्मा ने रामराज गुरुजी की लड़कियों से सावधान न किया होता, तो शायद मनुहरि का ध्यान प्रयत्नपूर्वक लड़कियों की ओर न जाता. उसे लड़कियों की उपस्थिति का बोध अनायास होने लगा. वह मोहग्रस्त नहीं है, किंतु लड़कियों की बातों में वह कहीं होगा, यह विचार उसे अधीर करने लगा.

आंगन पार कर स्नानगृह की ओर जाते हुए उसने सतर्कता बरती तथापि उसका ध्यान सायास लड़कियों की ओर चला गया. उसकी नज़र लड़कियों पर पड़ने से पहले छत पर चढ़े मुनगा तोड़ रहे गुरुजी पर पड़ी. गुरुजी ज़ोर से बोले, “मनुहरि, पिताजी ठीक हैं न?”

“पिताजी आप को याद कर रहे थे.”

“अच्छा-अच्छा. तुमने मुनगे की कढ़ी खाई है? और मसलहा? नीति बहुत बढ़िया बनाती है.”

मनुहरि चौकस हुआ, लड़की के गुणधर्म बताए जाने लगे.

इधर आंगन में खड़ी रुक्मणी ने आदतन कहा, “मुनगा बहुत बढ़िया क्यों न हो, आपके गुरुजी को सब्ज़ी लाने का झंझट जो नहीं करना पड़ता. मनुहरि इनका बस चले, तो हम लोगों को दोनों व़क्त मुनगा खाना पड़े.” वह मुस्कुरा दिया. दोनों लड़कियों का मुस्कुराना भी लक्ष्य किया.

गुरुजी पत्नी की वक्रोक्ति न सुन पाए, “आज छुट्टी है न. तो होटल में क्यों खाओगे? दोपहर का भोजन मेरे साथ करोगे.”

“आप परेशान न हों.” रुक्मणी तत्परता से बोल पड़ी, “मनुहरि, तुमको लेकर हम परेशान नहीं होते.”

खाना खाते हुए मनुहरि को लगा इस स्वप्नविहीन घर में कुछ नहीं है, किंतु कुछ पारंपरिक नियम और तरी़के हैं. पीढ़े पर रखी भरी हुई थाली भव्य जान पड़ती है. रुक्मणी चाची आग्रह से खिला रही हैं. छोटी मुस्तैदी से परोस रही है. नीति-निधि रसोई से गरम-गरम फुलके भेज रही हैं.

मनुहरि ने रसोई की आहट सुनी.

Sushma Munindra

    सुषमा मुनीन्द्र

अधिक शॉर्ट स्टोरीज के लिए यहाँ क्लिक करें – SHORT STORIES

कहानी- वर्जनाएं 3 (Story Series- Varjanaye 3)

“राजीव, पति-पत्नी का रिश्ता कांच की तरह होता है. एक बार चटक जाए, तो उसका निशान कभी नहीं जाता.”

“तुम ग़लत कह रही हो अनु. यह इंसान के व्यक्तिगत प्रयासों पर निर्भर करता है कि वह किस रिश्ते को क्या रूप देता है, कांच की तरह कमज़ोर या पानी जैसा समतल, जिसमें कितनी भी लकीर खींचो, वह कभी दो हिस्सों में बंट नहीं सकता. यही तो होता है पति-पत्नी का रिश्ता, एक रास्ता भटक जाए, तो दूसरा उसे सम्भाल लेता है.” कातर दृष्टि से देखती रही वह मुझे. फिर गंभीर स्वर में बोली, “नहीं राजीव, अब रहने दो. मैं नहीं चाहती, मेरी मां किसी की दया का पात्र बनें.”

कुछ क्षण की प्रतीक्षा के बाद मैं पुन: बोला, “अनु, तुमसे एक फेवर चाहता हूं. आज हमारी मैरिज एनीवर्सरी है और मेरे मित्र डिनर पर आना चाहते हैं. तुम घर आ जाओगी, तो मेरी इ़ज़्ज़त बच जाएगी.” वह कुछ नहीं बोली. मैंने कहा, “प्लीज़ अनु, इंकार मत करना.”

“कितने बजे आना है?” उसने पूछा.

“मैं अभी तुम्हें लेने आ रहा हूं.” मैं उत्साह से भर उठा. किंतु वह ठंडे स्वर में बोली, “मैं स्वयं आ जाऊंगी.”

एक घंटे बाद अनु आई. वह पहले से काफ़ी कमज़ोर लग रही थी. उसकी आंखों में एक तटस्थ-सी उदासी थी, जिसे देख मेरा हृदय द्रवित हो उठा. अपनी एनीवर्सरी के दिन उसे हृदय से लगाकर प्यार करना तो दूर, मैं उसे शुभकामनाएं भी न दे सका.

कभी-कभी चाहकर भी इंसान अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति नहीं कर पाता. कहीं न कहीं उसके आगे स्वयं को बहुत छोटा महसूस कर रहा था. जब अपनी इ़ज़्ज़त पर आई, तो अपने अहम् को दरकिनार कर उसे बुला लिया.

अनु की दी हुई लिस्ट के अनुसार मैं मार्केट से सामान ले आया और उसने खाना बनाना प्रारंभ कर दिया. सारा दिन मैं किचन के आसपास ही मंडराता रहा, शायद अनु कुछ बोले. किंतु हम दोनों के बीच पड़ी दरार में शब्द कहीं गुम हो गए थे. क्या यह दरार पाटना अब संभव था?

शाम सात बजे मेरे मित्र अपनी-अपनी पत्नियों के साथ घर पर आ गए. मैं यह देखकर अचंभित रह गया कि सुबह से जिस अनु के मुंह से एक भी शब्द नहीं निकला था, मेरे मित्रों के आते ही उसके व्यवहार में आश्‍चर्यजनक रूप से परिवर्तन आ गया था. अचानक ही वह बेहद प्रसन्न नज़र आने लगी थी और दूसरों के साथ-साथ मुझसे भी बहुत हंस-हंसकर बात कर रही थी. उसने एक ख़ूबसूरत-सी साड़ी चेंज कर ली थी, जिसमें वह बेहद सुंदर नज़र आ रही थी. उसकी समझदारी और व्यवहारिकता का मैं क़ायल हो गया. किसी को तनिक भी संदेह नहीं हो पाया था कि हम दोनों के बीच झगड़ा था. जब तक मेहमान घर से रुख़सत हुए, रात्रि के दस बज चुके थे.

बाहर बूंदाबांदी शुरू हो गई थी. उसने जल्दी-जल्दी किचन समेटा और पर्स उठाकर घर जाने के लिए दरवाज़े की ओर बढ़ी. मेरे हृदय में हूक-सी उठी. मैंने तुरंत आगे बढ़कर उसकी बांहों को थाम लिया और भर्राए कंठ से बोला, “मुझे क्षमा कर दो अनु. मुझे छोड़कर मत जाओ. मुझे अपनी भूल का एहसास हो गया है. मैं बेहद शर्मिंदा हूं यह सोचकर कि मैंने तुम्हें कितना दुख पहुंचाया. तुम्हारी सेवा और कर्त्तव्य को मैंने अपना अधिकार समझा. किंतु बात जब मेरे कर्त्तव्य की आई, तो उससे किनारा कर तुम्हारे विश्‍वास को खंडित किया. सच-सच बताना, तुमने क्या मम्मी को सब कुछ बता दिया?”

“नहीं, उन्हें बताकर मैं उनके हृदय को आघात पहुंचाना नहीं चाहती थी.”

“ओह! तुम कितनी अच्छी हो अनु. तुमने मेरे हृदय पर से बहुत बड़ा बोझ हटा दिया. अब हम कल सुबह ही उन्हें यहां ले आएंगे.” कहते हुए भावावेश में मैंने उसके दोनों हाथ थाम लिए.

अनु ने अपने हाथ छुड़ा लिए और बोली, “राजीव, पति-पत्नी का रिश्ता कांच की तरह होता है. एक बार चटक जाए, तो उसका निशान कभी नहीं जाता.”

“तुम ग़लत कह रही हो अनु. यह इंसान के व्यक्तिगत प्रयासों पर निर्भर करता है कि वह किस रिश्ते को क्या रूप देता है, कांच की तरह कमज़ोर या पानी जैसा समतल, जिसमें कितनी भी लकीर खींचो, वह कभी दो हिस्सों में बंट नहीं सकता. यही तो होता है पति-पत्नी का रिश्ता, एक रास्ता भटक जाए, तो दूसरा उसे सम्भाल लेता है.” कातर दृष्टि से देखती रही वह मुझे. फिर गंभीर स्वर में बोली, “नहीं राजीव, अब रहने दो. मैं नहीं चाहती, मेरी मां किसी की दया का पात्र बनें.”

यह भी पढ़ें: मरीज़ जानें अपने अधिकार 

उसके शब्द मेरे हृदय को बींध गए. रुंधे कंठ से मैं बोला, “मेरे पश्‍चाताप को दया का नाम देकर मुझे मेरी ही नज़र में मत गिराओ अनु. मैं सच कह रहा हूं कि…” मैं तलाश रहा था उन शब्दों को जो मेरे पश्‍चाताप को बयां कर पाते. किंतु मेरी आवाज़ की कंपकंपाहट मेरे अंतस के दर्द को बयां कर रही थी. भावनाएं सच्ची हों, तो उनकी अभिव्यक्ति के लिए शब्दों की बैसाखी की आवश्यकता नहीं पड़ती. वे जीवनसाथी के हृदय तक पहुंचने की राह स्वयं बना लेती हैं. ऐसा ही कुछ हुआ था हमारे साथ भी, तभी तो अनु की आंखें सावन के मेघों जैसी बरस पड़ी थीं. व्याकुल होकर वह मेरी ओर बढ़ी. मैंने उसे कसकर अपने सीने से लगा लिया. वर्जनाओं की बेड़ियों से स्वयं की ऊंचाई पर जा पहुंचा था, जहां पति-पत्नी स़िर्फ शरीर से ही नहीं, वरन मन से भी एकाकार होते हैं. कहने को यह हमारी तीसरी एनीवर्सरी थी, किंतु वास्तविक मिलन तो हमारा आज ही हुआ था.

Renu Mandal

         रेनू मंडल

अधिक शॉर्ट स्टोरीज के लिए यहाँ क्लिक करें – SHORT STORIES