Archives

कहानी- गुल्लक 3 (Story Series- Gullak 3)

‘ये मेरी कहानियां ही तो हैं, जिनमें मैं अपने जीवन के यथार्थ सत्य को पिरो देती हूं और मुझे लगता है कि जैसे मैंने अपना दर्द बांट लिया है. इनके सहारे मैं अपने सभी ग़म को भूल जाती हूं. बस, अब तो इंतज़ार है अपनी कहानियों को अपनी प्रिय पत्रिका में छपे हुए देखने का…’

‘अपने चेहरे पर सदा के लिए मुस्कुराहट का मुखौटा पहन लिया, क्योंकि दुख जीवनयात्रा को कठिन बना देता है और मुझे जीना है अपनी महक के लिए… उसकी ख़ुशी के लिए, उसको सदा मुस्कुराहटें देने के लिए…”

‘आख़िर मैं भी एक इंसान हूं, मेरे भी कुछ अरमान हैं, आरज़ू है… अब मैं थक गई. और बर्दाश्त नहीं होता मुझसे…’

कितनी और भी पर्चियां अभी बाकी थीं, किंतु इन अश्रुभरी आंखों से पढ़ना संभव नहीं हो पा रहा था या फिर अब और पढ़ने की हिम्मत नहीं बची थी मुझमें.

जैसे-जैसे गुल्लक की पर्चियां खुल रही थीं, वैसे-वैसे उनका दर्द गुल्लक से निकलकर बहने को आतुर था. उनका जीवन एक चलचित्र की भांति आंखों के समक्ष चलने लगा…

‘सवेरे से घर का सारा काम पूरा करके रात को बिल्कुल थककर चूर हो जाती हूं, पर इस थकावट का एहसास सिवाय मेरे और किसी को भी नहीं…’

‘आज निलेश ने तीसरी बार गर्भ में कन्या होने के कारण मेरा गर्भपात करवा दिया. बेटियों के प्रति ऐसी छोटी सोचवाले इंसान के साथ दम घुटता है मेरा. क्यों नहीं बचा पाई मैं अपनी बेटियों को…’

‘ईश्‍वर का शुक्र है कि इस बार मेरा गर्भ एक मास अधिक होने के कारण बच गया, मेरी बेटी मेरी गोद में अपनी आंखें खोलेगी. मुझे मां बनाकर मुझे संपूर्ण स्त्री बनाएगी.’

‘निलेश ने मुझे कन्या को जन्म देने का दोषी करार कर मेरी आत्मा को छलनी-छलनी कर दिया.’

‘अरसा हो गया निलेश को मुझसे प्रेम के दो बोल बोले हुए. अगर पति ही ऐसा हो, तो एक स्त्री खोखली हो जाती है.’

‘आज फिर मेरी कहानी मेरी प्रिय पत्रिका में अस्वीकृत हो गई. कोई बात नहीं आज नहीं तो फिर कभी सही.’

‘क्यों अपने अहंकार में डूबकर मेरे मायकेवालों को तुच्छ समझ हर बार निलेश उनका अपमान करते हैं. उनका अपमान मुझसे और नहीं सहा जाता. एक बेटी होने के नाते क्यों नहीं रोक पाती मैं यह सब.’

‘ये मेरी कहानियां ही तो हैं, जिनमें मैं अपने जीवन के यथार्थ सत्य को पिरो देती हूं और मुझे लगता है कि जैसे मैंने अपना दर्द बांट लिया है. इनके सहारे मैं अपने सभी ग़म को भूल जाती हूं. बस, अब तो इंतज़ार है अपनी कहानियों को अपनी प्रिय पत्रिका में छपे हुए देखने का…’

‘अपने चेहरे पर सदा के लिए मुस्कुराहट का मुखौटा पहन लिया, क्योंकि दुख जीवनयात्रा को कठिन बना देता है और मुझे जीना है अपनी महक के लिए… उसकी ख़ुशी के लिए, उसको सदा मुस्कुराहटें देने के लिए…”

‘आख़िर मैं भी एक इंसान हूं, मेरे भी कुछ अरमान हैं, आरज़ू है… अब मैं थक गई. और बर्दाश्त नहीं होता मुझसे…’

कितनी और भी पर्चियां अभी बाकी थीं, किंतु इन अश्रुभरी आंखों से पढ़ना संभव नहीं हो पा रहा था या फिर अब और पढ़ने की हिम्मत नहीं बची थी मुझमें.

आदर्श रूपवाले अपने पापा के दोहरे व्यक्तित्व को देख भीतर तक टूट गई थी मैं. मेरे पापा, उफ़़्फ्! मां की पर्चियों का सत्य मुझे कचोट रहा था. लड़कियों से इतनी घृणा थी पापा को… यह सत्य तो मुझसे सहन नहीं हो रहा था. मुझे मुस्कुराहटें और ख़ुशी देने के लिए वे ख़ुद आजीवन दर्द से लड़ती रहीं. फिर भी सदैव अपने घर को स्वर्ग का दर्जा दिया. सच ही कहा था मां ने, उनकी इस गुल्लक ने एक सच्चा साथी बन उनके अस्तित्व और मान-सम्मान को पूर्ण रूप से सुरक्षित रखा था और उनके जीवन की रिक्तता को भरने में मुख्य भूमिका निभाई थी.

यह भी पढ़े: कोरोनावायरस से बचने के लिए करें ये घरेलू उपाय (10 Home Remedies To Avoid Coronavirus)

अभी मैं गुल्लक और उसकी अमूल्य भूमिका में खोई हुई थी कि फोन की घंटी ने मेरी तंद्रा तोड़ी, “हेलो वृंदाजी! आपके लिए ख़ुशख़बरी है. आपकी कहानी ‘गुल्लक’ हमारी टीम को बेहद पसंद आई है और आगामी अंक में इसको प्रकाशित किया जाएगा.” फोन मां की प्रिय पत्रिकावालों का था. आख़िरकार मां की तमन्ना पूरी हो गई थी. यह सुनकर आंसू सब्र का बांध तोड़कर अविरल झरने की तरह बहने लगे. मुझे समझ नहीं आ रहा था कि इसे ख़ुशख़बरी मानूं या फिर… पर हां, यह सुनकर मां को अवश्य ही मुक्ति मिल गई होगी.

     कीर्ति जैन

अधिक शॉर्ट स्टोरीज के लिए यहाँ क्लिक करें – SHORT STORiES

कहानी- गुल्लक 2 (Story Series- Gullak 2)

मां के कमरे में उनकी सभी चीज़ें करीने से रखी थीं. उनकी समस्त चीज़ों में उनकी ख़ुशबू समाई थी. मैं उनकी आरामकुर्सी पर बैठकर उनके होने के एहसास को महसूस कर रही थी कि अकस्मात् ही मेरी नज़र उनकी गुल्लक पर पड़ी. उनकी गुल्लक, उनकी सहेली, जो उनके जाने के बाद नितांत अकेली हो गई थी. उसने अपने सहेली को खो दिया था. मेरे मन में द्वंद चल रहा था कि गुल्लक खोलूं या नहीं. अंत में बचपन के कौतूहल और जिज्ञासा की जीत हुई और कांपते हाथों से मैंने गुल्लक खोलकर एक-एक करके पर्चियां निकालकर पढ़नी आरंभ की. गुल्लक में छिपा मां का अस्तित्व, उनका दर्द आंसू बन मेरी आंखों से बह रहा था.

अपनी हताशा व उदासी को अपने ऊपर कभी भी हावी मत होने देना, क्योंकि कोई और हमारे लिए नहीं लड़ता, अपितु हमें ख़ुद ही ख़ुद की हिम्मत बन अपने लिए लड़ना पड़ता है.

ये संसार अपने स्वार्थी स्वभाव से विवश होकर तुम्हारी निराशा की नुमाइश कर देगा. बेटा, ये तो वक़्त का पहिया है, जो सदैव घूमता रहता है. हर निराशा एक आशा को साथ लेकर आती है. तुम बस संयम का दामन थामे रखना. उनकी यह अनमोल सीख सदैव उनके एहसास को मेरे क़रीब रख मुझे जीवन में किसी भी हालात में परास्त नहीं होने देती और निरंतर चलने की प्रेरणा देती थी.

“महक, मां को वेंटिलेटर पर डाल दिया है. उनके पास वक़्त बहुत कम है.” समीर, मेरे पति ने मेरे कंधे पर हाथ रख मेरे विचारों की तंद्रा तोड़ी, तो मुझे एहसास हुआ कि मैं तो मां के साथ यादों के गलियारों में घूम रही थी.

आईसीयू में वेंटिलेटर पर लेटी हुई मां के चेहरे से पहली बार मुस्कुराहट गायब थी. उनके हाथ-नाक पर नलियों ने कब्ज़ा कर रखा था. मुंह पर ऑक्सीजन मास्क था. इतना बेबस मैंने उन्हें कभी नहीं देखा था. मेरी नज़र एकटक घड़ी की सुइयों पर टिकी थी. उन घड़ी की सुइयों में मां की सांसें अटकी थीं. चंद घंटों का समय दिया था डॉक्टर ने मां को. उम्मीद रेत की तरह हाथ से फिसलती जा रही थी. हिम्मत जवाब दे रही थी. मन-मस्तिष्क सब शून्य हो गए थे. यह जानते हुए कि मां को अब जाने से कोई रोक नहीं सकता था, फिर भी हृदय ईश्‍वर से निरंतर एक चमत्कार की दुआ कर रहा था. एक साधारण से बुख़ार ने उनके शरीर के सभी ऑर्गन्स फेल कर दिए थे. चट्टान-सी मज़बूत मां आज ज़िंदगी और मौत के बीच झूल रही थीं. एक वीर योद्धा की तरह लड़ते-लड़ते, आख़िर मां अपने जीवन का युद्ध हार गईं. कहते हैं, जानेवाले को अपनी मृत्यु का आभास हो जाता है, कदाचित् मां उदास चेहरे के साथ विदा नहीं होना चाहती थीं, इसलिए जाने से पहले उनके शरीर में मात्र एक हलचल हुई थी और वो थी उनके चेहरे पर मुस्कुराहट के भाव का आना.

सभी अंतिम क्रियाएं पूर्ण हो चुकी थीं. मैं मां के एहसास के साथ एकांत में कुछ समय बिताना चाहती थी. वैसे तो उनको घर का एक-एक कोना प्रिय था, पर उन्हें जो सबसे अत्यधिक प्रिय था, वो था उनका अपना कमरा.

मां के कमरे में उनकी सभी चीज़ें करीने से रखी थीं. उनकी समस्त चीज़ों में उनकी ख़ुशबू समाई थी. मैं उनकी आरामकुर्सी पर बैठकर उनके होने के एहसास को महसूस कर रही थी कि अकस्मात् ही मेरी नज़र उनकी गुल्लक पर पड़ी. उनकी गुल्लक, उनकी सहेली, जो उनके जाने के बाद नितांत अकेली हो गई थी. उसने अपने सहेली को खो दिया था. मेरे मन में द्वंद चल रहा था कि गुल्लक खोलूं या नहीं. अंत में बचपन के कौतूहल और जिज्ञासा की जीत हुई और कांपते हाथों से मैंने गुल्लक खोलकर एक-एक करके पर्चियां निकालकर पढ़नी आरंभ की. गुल्लक में छिपा मां का अस्तित्व, उनका दर्द आंसू बन मेरी आंखों से बह रहा था. आज इस बात का मुझे एहसास हुआ कि कैसे एक निर्जीव गुल्लक स़ि़र्फ रुपए-पैसे संजोकर रखना ही नहीं जानती, बल्कि सजीव होकर किसी का साथी बन उसके जीवन के उतार-चढ़ाव में उसको संभालने की एक अहम् भूमिका भी निभा सकती है.

यह भी पढ़े: दूसरों को नसीहत देते हैं, ख़ुद कितना पालन करते हैं (Advice You Give Others But Don’t Take Yourself)

उनका जीवन आज उनकी गुल्लक परतों में खोल रही थी. मैं किंकर्त्तव्यविमूढ़ बन विचारों में विचरण करने लगी. कितनी होशियारी से एक कुशल कलाकार की तरह वे हमारे समक्ष मुस्कुराहट और संतुष्टि का मुखौटा पहने ख़ुश होने का सफल नाटक करती रहीं. हमने कभी उस मुस्कुराहट के पीछे छिपे दर्द का मर्म समझने का प्रयास ही नहीं किया. सदैव इसी भ्रम में रहे कि मां का जीवन ख़ूबसूरत रंगोली से सजा है, जिसमें चिंता और ग़म के कोई रंग नहीं हैं.

सच कहा था उन्होंने कि इस गुल्लक में उनका अस्तित्व और उनकी निराशा है. उनके हृदय के भीतर की वेदना का मात्र एक ही साथी एवं साक्षी थी…

उनकी गुल्लक.

कीर्ति जैन

अधिक शॉर्ट स्टोरीज के लिए यहाँ क्लिक करें – SHORT STORiES

कहानी- गुल्लक 1 (Story Series- Gullak 1)

“मैम, इस बार भी अस्वीकृत… पिछले कई सालों से मैं यह अस्वीकृति झेल रही हूं. हर बार कोशिश करती हूं, कुछ नया लिखने की पर… पर हर बार अस्वीकृत हो जाती है.”

“आप निराश मत होइए वृंदाजी! कहानी के अस्वीकृत होने से दिल छोटा मत कीजिए. आप बस लिखती रहिए और इसे अपनी असफलता भी मत मानिए, बल्कि असफलता ही सफलता की मंज़िल पाने की राह बनाता है. आप प्रयास करती रहें.”

“कोई बात नहीं मैम, मैं कुछ और अच्छा लिखने का प्रयास करूंगी और मुझे विश्‍वास है कि एक-न-एक दिन मेरी कहानी को आपकी पत्रिका में ज़रूर जगह मिलेगी. धन्यवाद!” कहकर उन्होंने फोन रख दिया.

“हेलो मैम, मेरा नाम वृंदा है. मैंने आपकी पत्रिका के लिए कुछ दिन पहले अपनी कहानी ‘क्षितिज की ओर’ भेजी थी. क्या मेरी यह कहानी आपको पसंद आई?”

“क्षितिज की ओर… हां… एक मिनट… सॉरी वृंदाजी, आपकी कहानी अस्वीकृत है. दरअसल, आपने लिखा तो अच्छा है, पर कहानी में कुछ नएपन की कमी है. आपने हमारी पत्रिका में छपी कहानियां तो ज़रूर पढ़ी होंगी, तो आप उस हिसाब से भाषा पर भी थोड़ी मेहनत कीजिए.”

“मैम, इस बार भी अस्वीकृत… पिछले कई सालों से मैं यह अस्वीकृति झेल रही हूं. हर बार कोशिश करती हूं, कुछ नया लिखने की पर… पर हर बार अस्वीकृत हो जाती है.”

“आप निराश मत होइए वृंदाजी! कहानी के अस्वीकृत होने से दिल छोटा मत कीजिए. आप बस लिखती रहिए और इसे अपनी असफलता भी मत मानिए, बल्कि असफलता ही सफलता की मंज़िल पाने की राह बनाता है. आप प्रयास करती रहें.”

“कोई बात नहीं मैम, मैं कुछ और अच्छा लिखने का प्रयास करूंगी और मुझे विश्‍वास है कि एक-न-एक दिन मेरी कहानी को आपकी पत्रिका में ज़रूर जगह मिलेगी. धन्यवाद!” कहकर उन्होंने फोन रख दिया.

मां को लिखने का बेहद शौक था, पर अपनी घर-गृहस्थी को संवारने में मां अपने लेखन के शौक को संवारना भूल गई थीं. पिछले कुछ सालों से मां पुऩ: लेखन क्षेत्र में सक्रिय हो गई थीं. वे अक्सर अपनी कहानी व लेख अपनी प्रिय पत्रिका में छपने के लिए भेजती थीं, परंतु हर बार वहां से अस्वीकृत हो जाती थी. उनकी हार्दिक अभिलाषा थी कि उनकी प्रिय पत्रिका में उनकी कहानी या किसी लेख को जगह मिले.

हर बार अस्वीकृति सुनकर वे आहत और निराश होकर कुछ क्षण के लिए बैठ जातीं, पर फिर अचानक उठकर एक पर्ची पर कुछ लिखतीं और फिर उसे अपनी गुल्लक में डाल देतीं. पर्ची गुल्लक में डालकर वे अपने आप को बहुत हल्का महसूस करती थीं. फिर एक नई आशा, नई स्फूर्ति और ख़ुशी के साथ अपने जीवन में व्यस्त हो जातीं. ऐसा वो सालों से करती आ रही थीं.

“वृंदा, लोग गुल्लक में पैसे इकट्ठे करते हैं, पर तुम पर्चियां.” व्यंग्यात्मक टिप्पणी देते हुए उसके पति निलेश हंसने लगे.

मां ने पापा के इस व्यंग्य का उत्तर एक नीरसताभरी मुस्कुराहट से दिया.

“मां, मैं बचपन से आपकी इस गुल्लक को देख रही हूं, आख़िर आप इन पर्चियों में क्या लिखकर गुल्लक में डालती हैं?” मैंने मां से पूछा.

“महक बेटा, यह गुल्लक मेरी सहेली है. इस गुल्लक में मेरा अस्तित्व, मेरी स्मृतियां, मेरा मान-सम्मान सुरक्षित है.”

“मैं समझी नहीं मां…?”

“बेटा, वक़्त आने पर समझ जाओगी, पर हां, एक बात का स्मरण रहे कि तुम लोग मेरी गुल्लक से दूर रहना.” कहकर वो किचन में चली गईं. गुल्लक के विषय में वे कभी भी बात करने में रुचि नहीं लेती थीं.

यह भी पढ़े: क्या आप इमोशनली इंटेलिजेंट हैं? (How Emotionally Intelligent Are You?)

बचपन से आज तक मैंने कभी भी मां को निराश और हताश नहीं देखा. मेरे लिए तो वे सुपर मॉम थीं, जिन्हें हमेशा स़िर्फ मुस्कुराते और ख़ुश देखा था. उनका सर्वस्व तो स़ि़र्फ उनका घर-परिवार था, जिसे वे स्वर्ग का दर्जा देती थीं. बिना किसी शिकायत के वे बड़ी शिद्दत से अपने कर्त्तव्य का निर्वाह कर रही थीं. पूरे घर का एक-एक कोना, एक-एक चीज़ उनके क़रीब थी, परंतु एक छोटी-सी चीज़ उनके लिए सबसे अनमोल थी और वो थी उनकी गुल्लक, जो मेरे लिए सदा जिज्ञासा और कौतूहल का विषय बनी रहती. वो उनकी गुल्लक नहीं, बल्कि उनकी सहेली थी. उनकी गुल्लक को हाथ लगाने की इजाज़त किसी को नहीं थी. अक्सर वे अपनी व्यस्त ज़िंदगी से कुछ लम्हे चुराकर एकांत में अपनी आरामकुर्सी पर बैठकर अपनी गुल्लक को निहारतीं और अपनी यादों के समंदर की लहरों को अपने हृदय से टकराते देखती थीं. इन पलों पर उनका एकाधिकार था, जो उनको अत्यंत सुकून प्रदान करते थे.

मां सदैव मुझे एक बात सिखाती थीं कि महक बेटा, ज़िंदगी पग-पग पर तुम्हारी परीक्षा लेकर तुम पर निराशा की बरसात करेगी, तुम्हारा हौसला तोड़ने का भरसक प्रयत्न करेगी, पर यदि तुम हमेशा हिम्मत, संयम और मुस्कुराहट का छाता लेकर चलोगी, तो अवश्य ही उस बरसात से बची रहोगी और अंत में उस समय पर विजय प्राप्त करोगी, अन्यथा जीवन जीना मुश्किल हो जाएगा.

 कीर्ति जैन

अधिक शॉर्ट स्टोरीज के लिए यहाँ क्लिक करें – SHORT STORiES

 

कहानी- प्रीत के रंग हज़ार 3 (Story Series- Preet Ke Rang Hazar 3)

वेद की परिणीता बनने के लिए मुझे मंगलसूत्र और सिंदूर की कोई आवश्यकता नहीं थी. कितना अपार था उसका प्रेम. शब्दों में तो उसे कभी बांध ही नहीं पाई, फिर जीवन में उसे कहां और कैसे बांध पाती?

रेस्टॉरेंट से निकलने के बाद श्‍लोक का हाथ थामे रेस्टॉरेंट के अहाते में फव्वारे के पास बने पत्थर के चबूतरे पर जाकर बैठ गई और अपने और वेद के बीच के रिश्ते की सारी सच्चाई उसे बता गई. किस तरह अपने मम्मी-पापा को एक साथ खोकर इस पराए देश में उसका अकेला होना. जीने की सारी इच्छाओं का मृतवत हो जाना. वेद के प्यार का सावन बनकर बरस कर उसके जीवन के ताप को हरना. अंधेरी रातों में आकाशदीप बनकर उसके पथ का प्रदर्शन कर सुगम बनाना आदि.

“आंतरिक पलों में कभी कमज़ोर पड़कर उसने अपने संपूर्ण अस्तित्व को वेद में समा देना चाहा, तो अपनी सारी ममता उड़ेेलकर वह उसे सहला दिया करता था. वेद तो सधा हुआ योगी था, जिसमें धरती जैसा धैर्य और आकाश जैसा विस्तार था. कहीं से कोई कलुषता नहीं. उसके इसी ऋषि-मुनी तपस्वी जैसी एकाग्रता ने ही तो उसे बांध रखा था. मेरे जीवन की देहरी पर देव का उतरना मानो सपनों के सावन का ठहर जाना था. सांसों में जैसे ख़ुशबू का मौसम ही समा गया हो. दिन तितलियां बनकर उड़ते थे. मैं बावरी बनी इतरा उठी थी अपने सुख-सौभाग्य पर. किसे भूलती है वो पहली दस्तक! वो पहली आहट. वो पहला प्यार, जो शीत की स्याह रातों में मिला हो. बिखरी प्रीत की केसर गंध को भूल पाना कहीं से भी आसान नहीं होता है श्‍लोक.

जानते हो श्‍लोक! जीवन की गहनतम घटनाएं किसी अनजान क्षण में हो जाती हैं. घोर पीड़ा की शुरुआत सदा रहस्यपूर्ण होती है, पर उसकी अनुभूति स्पष्ट होती है. उसका अंकुर कब, कहां, कैसे फूटता है पता नहीं चलता, क्योंकि इसके लिए परिस्थितियां हमें चौकन्ना होने नहीं देतीं. ऐसे तो दुख तमाम जीवनदायिनी शक्तियों का केंद्र है. जीवन में यह नहीं हो, तो जीवन के औचित्य पर ही प्रश्‍न खड़ा हो जाए. यही दुख जीवन से विमुख करनेवाली तमाम शक्तियों का भी मूल कारण है. जीवन में केंद्र से परिधि और परिधि से केंद्र की ओर व्याप्त सभी शक्तियां दुख के अनंत सागर में चक्कर लगाती-सी दिखती हैं और हम सभी इसी व्यूह में फंसे हुए हैं.

ये तो सभी जानते हैं कि दुख सबको मांजता है. कहते हैं, जब दुख से भर जाओ, तो अपने दिल की गहराइयों में उतरकर देखो, शायद उल्लास का कारण वही हो, जिसके लिए तुम रो रहे थे. वही उल्लास बनकर वेद मेरे जीवन में अवतरित हुआ. वेद की परिणीता बनने के लिए मुझे मंगलसूत्र और सिंदूर की कोई आवश्यकता नहीं थी. कितना अपार था उसका प्रेम. शब्दों में तो उसे कभी बांध ही नहीं पाई, फिर जीवन में उसे कहां और कैसे बांध पाती?

वेद जैसे व्यक्ति की आराधना की जाती है श्‍लोक! इन सच्चाइयों के साथ अगर मैं तुम्हें स्वीकृत हूं, तो ठीक है, वरना तुम मेरे सारे बंधनों से आज़ाद हो.” कहते हुए आज भी उसके जीवन में हर रिश्ते का पर्याय देव ही है. संशय की नींव पर खड़ी रिश्ते की यह इमारत उसे किसी भी हालत में स्वीकार नहीं कहते हुए अंतर की सारी वेदनाएं उसकी पलकों पर घनीभूत होकर बरसने ही वाली थीं कि झटके के साथ उठकर अपने दृढ़ क़दमों के साथ सड़क के किनारे की भीड़ में खो गई.

यह भी पढ़े: 10 झूठ पति-पत्नी एक दूसरे से बोलते हैं (10 Lies Husband And Wives Tell Each Other)

उसे आज इस बात का बड़ा संतोष था कि श्‍लोक उसके जीवन के कटु, पर मधुर सत्य से अवगत हो चुका है, जिसे उसने कितनी बार हिम्मत करके उससे कहना चाहा था, लेकिन उसे खो देने के डर से कह नहीं पाई थी.

संत पैट्रिक चर्च में जाकर मोमबत्तियां जलाईं. आज के दिन की आख़िरी मंज़िल यही चर्च था, जहां डिनर के बाद श्‍लोक के साथ वह आनेवाली थी. हर दिन के भय के सलीब को वहीं पर छोड, हल्की-फुल्की होकर वह वहां से निकल गई. अनमनी होकर टाइम स्न्वायर की चकाचौंध में सड़कों पर इधर-उधर घूमती रही. उसके अंतर्मन के अंधेरे जब वहां की चमचमाती रोशनी को झेल नहीं सके, तो वह रॉक फेलर सेंटर में आ गई. फूलों की झाड़ियों के ओट में बनी पत्थर की उसी बेंच पर जा बैठी, जहां वह अक्सर वेद के साथ बैठा करती थी. यह और बात थी कि आज उसकी पीठ पर फिसलने के लिए वेद का प्यारभरा हाथ नहीं था. फिर भी कस्तूरी मृग की तरह उसकी ख़ुशबू, उसकी मौजूदगी को वह महसूस कर रही थी. आंखों से

सावन-भादो भी बरस रहा था. अचानक अपनी पीठ पर किसी का स्पर्श पाकर उसने सिर उठाया, तो श्‍लोक को अपने बगल में बैठे देख चौंक गई.

“कहां मुझे छोड़कर यूं अकेली चली आईं. तुम्हारे और वेद के रिश्ते की सारी सच्चाई का पता मुझे था. वेद ही ने तो बताया था. जब मेरे मन में किसी प्रकार का संशय ही नहीं था, तो मैं तुमसे उसकी तहक़ीक़ात क्या करता. रिश्तों के अवलोकन में वेद जिस ऊंचाई पर आसीन है, वहां मैं पहुंच ही नहीं सकता ऋचा. दुख इसी बात का है कि इधर तुम जैसी जीवनसंगिनी पाकर मैं निहाल हूं, पर वेद को क्या मिला? कितनी ख़ामोशी से नीलकंठ बनकर सबके जीवन का हलाहल पी रहा है. तुम्हारे प्रति उसके निश्छल प्यार का प्रतिदान बनकर ही तो मैं तुम्हारे जीवन में प्रविष्ट हुआ हूं. कुछ नहीं हूं मैं सिवाय वेद के प्रति तुम्हारे प्यार का प्रतिदान के या यूं कहो तुम दोनों के पावन रिश्ते का प्रतिदान ही तो मैं हूं. वेद में अगर ऋचाएं हैं, तो कहीं न कहीं श्‍लोक भी अवश्य ही होगा. हम दोनों के प्यार का प्रतीक ही तो वेद है. अगले महीने ही वेद का आशीर्वाद लेने हम दोनों भारत जाएंगे. कितना चकित व ख़ुश होगा वह अचानक हमें यूं आया देखकर.” कहते हुए ऋचा की आंखों से बहते हुए आंसुओं को अपनी हथेलियों में समेटते हुए श्‍लोक ने उसे अपनी बांहों में भर लिया, तो फिर ऋचा भी रुक नहीं सकी. सारे गिले-शिकवे को भूल श्‍लोक की बांहों में समां गई.

 रेणु श्रीवास्तव

अधिक शॉर्ट स्टोरीज के लिए यहाँ क्लिक करें – SHORT STORiES

कहानी- प्रीत के रंग हज़ार 2 (Story Series- Preet Ke Rang Hazar 2)

विगत के दर्द के फिर से उभरने के डर से वह भारत जाना नहीं चाहती थी. प्रीत के हज़ारों रंग में रंगकर अपने वेद की परिणीता बनने की चाहत को वह इसी दूसरे देश की ज़मीं पर जीना चाहती थी, जिसमें दुख-दर्द का एक नन्हा झरोखा भी उसे स्वीकार नहीं.

उसे क्या पता था कि एक बार फिर से नियति अपनी कुटिल चाल से उसके बन रहे घरौंदे को तहस-नहस करने का कुचक्र रच रही है. उसके लिए तो कोई बंधन नहीं था, लेकिन वेद को अपने परिवार की सहमति लेने भारत जाना था. फिर ऋचा की ज़िद कि शादी वह न्यूयॉर्क में ही करेगी. विगत के दर्द के फिर से उभरने के डर से वह भारत जाना नहीं चाहती थी. प्रीत के हज़ारों रंग में रंगकर अपने वेद की परिणीता बनने की चाहत को वह इसी दूसरे देश की ज़मीं पर जीना चाहती थी, जिसमें दुख-दर्द का एक नन्हा झरोखा भी उसे स्वीकार नहीं. वेद ने भी उसके कहने का मान रखा और अपनी मां को मनाने के लिए अकेले ही भारत जाने के लिए निकल पड़ा. भावुक मन से ऋचा ने वेद को विदाई दी.

मात्र एक हफ़्ते के लिए भारत गया वेद जब हफ़्तों नहीं लौटा, तो वह बुरी तरह तड़प उठी. भावावेश में आकर हडसन नदी में कूदकर प्राणांत कर लेना चाहा, लेकिन पुलिस की नज़रों में आ जाने के कारण वह ऐसा नहीं कर सकी. बाद में न्यूयॉर्क में रह रहे उसी के समाज के द्वारा उसे ज्ञात हुआ कि अपनी मां की अंतिम इच्छा को पूरी करने के लिए वेद को उनके बचपन की सहेली की बेटी रत्ना से शादी करनी पड़ी. कुछ कहने-सुनने का समय ही नहीं बचा था. इधर उसने रत्ना के गले में मंगलसूत्र बांधा और उधर उसकी मां ने अंतिम सांस ले ली. ऋचा को खोकर वेद भी कहां जीवित रह गया था. ऋचा का सामना वह किसी भी हालत में नहीं करना चाहता था. न्यूयॉर्क की नौकरी छोड़ने की सारी औपचारिकता को उसने भारत से ही निभाया.

वेद भारत से ही ऋचा की पल-पल की गतिविधियों की जानकारी लेता रहा. समय के साथ ज़ख़्म कुछ हल्के हुए, तो ऋचा को नियति और अपनी मजबूरियों का वास्ता देते हुए समझाकर नए सिरे से जीवन शुरू करने के लिए प्रेरित करता. उसके बिखरे जीवन को अपनी बेशुमार चाहतों की संजीवनी बूटी से संवारता. उसकी मृत जीजिविषा को जीवित रखने की कोशिश करता. “अपनी पत्नी को लेकर आ जाओ. इससे मुझे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा, हम साथ जी लेंगे. किसी भी हालात में मुझे अपना वेद चाहिए. नहीं जी सकती तुम्हारे बिना मैं वेद.” ऋचा की ज़िद वेद को पिघलाकर रख देती. वह अपनी असमर्थता पर रोकर रह जाता. घबराकर उसने ऋचा से बात करना बंद कर दिया.

समय के साथ ऋचा भी अपनी कठोर नियति से समझौता कर जीने का प्रयास करती रही, लेकिन प्यार में मिला दर्द और अकेलापन उसे टीसता रहा. जिस बैंक में श्‍लोक काम करता था, उस बैंक में कंपनी के काम से ऋचा को लगातार हफ़्तों जाना पड़ा. श्‍लोक की शैक्षणिक योग्यता और कार्य कुशलता पर वह मुग्ध हो गई. एक बार फिर से उसका दिल धड़क उठा किसी की चाहत में और वह उसे पाने के लिए बेक़रार हो उठी. श्‍लोक के कदम आगे क्या बढ़े कि ऋचा ने उसके प्यार को समेट लिया. ऋचा के इस निर्णय पर वेद बहुत ख़ुश हुआ. ऋचा के प्रति स्वयं से हुए अन्याय की आत्मग्लानि से अब वह मुक्त था. श्‍लोक भी उससे कहीं छिन न जाए, ऐसा सोचते ही ऋचा का सर्वांग कांप उठा. घबराकर उसने श्‍लोक को बांहों में भर लिया.

यह भी पढ़े: घर को मकां बनाते चले गए… रिश्ते छूटते चले गए… (Home And Family- How To Move From Conflict To Harmony)

अतीत के झरोखे खुलकर ऋचा को और संतप्त करते, उसके पहले ही श्‍लोक उसे बांहों में लिए उठ खड़ा हुआ. झटपट तैयार होकर वे दोनों एक-दूसरे का हाथ थामे निकल गए. यूं तो न्यूयॉर्क उसके लिए कोई नया शहर नहीं था. वेद के साथ उसके चप्पे-चप्पे को वह देख चुकी थी. पर आज श्‍लोक के साथ इस जादुई नगरी का लुत्फ़ उठाने की बात कुछ और ही थी.

दोनों एक-दूसरे में समाए हडसन नदी के किनारे चलते रहे. टाइम स्न्वायर के रंगीन नज़ारों को निहारते हुए वे रॉक फेलर सेंटर पहुंच गए. वहां से खुली बस में सवार होकर न्यूयॉर्क के दर्शनीय स्थानों के लिए निकल पड़े. ऋचा मस्त होकर सभी को निहार रही थी. सारे दर्शनीय स्थल आज उसे अतिरेक आनंद की अनुभूति दे रहे थे. श्‍लोक भी अपनी नवपरिणीता के इस नए रूप पर मुग्ध था. एक पल के लिए भी वह ऋचा को अपनी नज़रों से ओझल होने नहीं दे रहा था. सारे दिन अपनी बांहों में उसे बांधे घूमता रहा.

घूमकर जब वे दोनों रॉक फेलर सेंटर में उतरे, तो शाम का रेशमी अंधेरा, रौशनी में नहा रहा था. इधर-उधर घूमने के बाद डिनर के लिए वे उत्सव रेस्टॉरेंट की ओर जा ही रहे थे कि ऋचा का बोस्टन का सहपाठी सैम टकरा गया, जिसके चंद बोल उसकी ख़ुशियों पर उल्कापात ही कर गए.

“हाय हनी! व्हेयर इज़ वेद?” फिर श्‍लोक की ओर देखते हुए मुस्कुराते हुए पूछा, “न्यू फ्रेंड…” आगे सैम कुछ और कहता कि उसके पहले ही वह बोल पड़ी, “माय हसबैंड श्‍लोक.” और सैम को वहीं हतप्रभ छोड़कर श्‍लोक का हाथ थामे वह आगे बढ़ गई.

श्‍लोक को अनमना-सा देख ऋचा का दिनभर का उत्साह जाता रहा. रेस्टॉरेंट में पहुंचने के बाद भी श्‍लोक की उदासियां कम नहीं हुईं. सारा खाना उसी के पसंद का था, लेकिन खाने में उसकी कोई रुचि नहीं थी. खोया-खोया-सा वह रेस्टॉरेंट की खिड़की से नीचे थिएटर से निकलते लोगों को देखता रहा, तो ऋचा तड़प उठी. उसकी व्याकुलता सिसकियां बनकर उसके व्यथित होंठ पर तैर गई.

किस फेरे में तुमने मुझे डाल दिया वेद? कहां मेरे चेहरे पर मामूली-से शिकन तुम्हें गवारा नहीं थी. पलभर में सोख लेते थे मेरे अंतर के सारे गीलेपन को. श्‍लोक को संदेह के भंवर से मैं कैसे बाहर निकालूं. आज फिर एक बार उलझन से घिर गई हूं. मैं तो तुम्हारी यादों के साथ ही ख़ुश थी… मन-ही-मन बुदबुदाते हुए ऋचा टूटकर बिखर रही थी.

 रेणु श्रीवास्तव

अधिक शॉर्ट स्टोरीज के लिए यहाँ क्लिक करें – SHORT STORiES

कहानी- प्रीत के रंग हज़ार 1 (Story Series- Preet Ke Rang Hazar 1)

श्‍लोक से जुड़ने से पहले जीवन के सूने जलते रेगिस्तान में नंगे पैर अकेली ही तो वह दौड़ रही थी. चारों ओर फैली ख़ामोशियों एवं वर्षों की तन्हाइयों से जूझती हुई वह टूटकर बिखरने ही वाली थी कि श्‍लोक की सबल बांहों ने उसे थाम लिया. ऋचा का बावरा मन एक ओर प्रीत के लहराते समंदर में डूब रहा था, वहीं उसके अंतर्मन में अतीत के चक्रवाती झंझावात भी चल रहे थे.

 ‘’ओह अभी तक उठे भी नहीं! हमें देरी हो रही है.” अपनी प्यारभरी नज़रों से सहलाते हुए ऋचा ने अपने पति श्‍लोक को झकझोर कर उठाते हुए कहा. प्रत्युत्तर में श्‍लोक ने उसे खींचकर अपनी बांहों में भर लिया, तो वह निहाल हो उठी. श्‍लोक के प्रगाढ़ बंधन में बंधने को उसका आतुर मन स्वतंत्र होने की असफल चेष्टा में और बंधता रहा. उसके भीगे बालों में अटकी पानी की बूंद मोती बनकर श्‍लोक के तन पर बिखर रही थी. ऋचा ने आज भरपूर सिंदूर से अपनी मांग सजाई थी, जिसकी लाली श्‍लोक की छाती को रंगे जा रही थी. श्‍लोक की आगोश में सिमटी 33 वर्षीय ऋचा किसी नवयौवना की तरह सिहर रही थी. युगों तक वह अपने पति की आगोश में यूं ही बंधी रहे, उसका रोम-रोम गुनगुना रहा था.

शादी के चार हफ़्ते हो रहे थे, पर उसका तन-मन अभी तक प्यासा सावन ही बना हुआ था. श्‍लोक से जुड़ने से पहले जीवन के सूने जलते रेगिस्तान में नंगे पैर अकेली ही तो वह दौड़ रही थी. चारों ओर फैली ख़ामोशियों एवं वर्षों की तन्हाइयों से जूझती हुई वह टूटकर बिखरने ही वाली थी कि श्‍लोक की सबल बांहों ने उसे थाम लिया. ऋचा का बावरा मन एक ओर प्रीत के लहराते समंदर में डूब रहा था, वहीं उसके अंतर्मन में अतीत के चक्रवाती झंझावात भी चल रहे थे.

10 साल पहले अमरनाथ यात्रा के दौरान मम्मी-पापा को खोने के बाद भारत कहां जा पाई. पापा की सारी संपत्ति के मालिक उसके चाचा थे. दो हफ़्ते बाद श्‍लोक से वह शादी कर रही है, इसकी सूचना अपने चाचा को दे दी थी. उनके लाख समझाने के बावजूद भारत आकर शादी करने के लिए वह तैयार नहीं हुई. शादीवाले दिन अपने गिनती के दोस्तों के साथ गणपति मंदिर के लिए वह प्रस्थान करने ही वाली थी कि नाना प्रकार के तामझाम के साथ उसके चाचा भारत से भागते हुए आए, तो मम्मी-पापा को याद कर उसकी आंखें बरस पड़ी थीं. फिर शादी की सारे रस्मों को उन्होंने सहर्ष निभाया. जाते समय भारत की सारी प्रॉपर्टी को बेचकर जो एक्सचेंज लाए थे, श्‍लोक को आशीर्वाद के रूप में थमा गए. हनीमून के लिए वे स्विट्ज़रलैंड गए. वहां की ख़ूबसूरत वादियों का दोनों ने ख़ूब आनंद उठाया. वहां से आने के बाद आज हफ़्तेभर बाद भी उनके प्यार की ख़ुमारी अभी तक उतरी नहीं थी. न्यूयॉर्क घूमने का आज उनका प्रोग्राम था और श्‍लोक को बिस्तर छोड़ने का मन ही नहीं हो रहा था. मिलन के ऐसे पल कितने मादक होते हैं, उसे इसका एहसास कहां था. श्‍लोक के प्यार ने उस पर अपनी चांदनी क्या बिखेरी, वह समंदर बनकर ही उमड़ पड़ी. ऐसे भी जीवन में उसे जो कुछ भी प्यारा लगा, वक़्त उससे आज तक छीनता ही तो रहा है.

बचपन में अपने से 10 साल छोटे भाई को, उसकी नन्हीं मां बनकर प्यार किया. एक दिन की बीमारी में ही वह छोड़ गया, तो उसका नन्हा-सा मन कितना टूटा था. इस आघात को भूलने में उसे वर्षों लगे थे. भाई की मृत्यु के बाद सभी तरह से टूटे मम्मी-पापा के जीने का आसरा वही बनी. समय के साथ खेल-खेल में ही जब वह फिज़िक्स और मैथ्स के कठिन प्रश्‍नों को हल करने लगी, तो उसकी अद्भुत प्रतिभा को देख सभी दंग रह गए. स्कूल के सारे पिछले रिकॉर्ड को तोड़ते हुए इंजीनियरिंग में प्रथम स्थान लेकर जब वो आईआईटी, कानपुर गई, तो मम्मी-पापा की ख़ुशियों का ठिकाना नहीं था. जिस स्थान पर आज तक लड़के ही विराजते रहे, उस पर अपना आधिपत्य जमाकर उसने सारे देश को चौंका दिया था. फिर बधाइयों का सिलसिला महीनों तक चलता रहा. आईआईटी कानपुर से निकलने के पहले ही हार्वर्ड बिज़नेस स्कूल अमेरिका ने वीजा, लोन और हॉस्टल में रहने की व्यवस्था करके, उसकी प्रतिभा और उपलब्धियों को गगनचुंबी बना दिया. ऋचा ने भी उनके किए का मान रखने में कोताही ना बरती.

यह भी पढ़े: रिश्तों में बदल रहे हैं कमिटमेंट के मायने… (Changing Essence Of Commitments In Relationships Today)

इन छह सालों में न जाने कितनों ने उसकी राहों में आंखें बिछाईं, उसे थामने के लिए कितने हाथ बढ़े, पर वह इन सबसे बेख़बर किसी दूसरे देश में, अपने देश का नाम रौशन करती रही. हार्वर्ड बिज़नेस स्कूल से निकलने के पूर्व ही दुनिया की सबसे नामी कंपनी ने बहुत ऊंचे पद पर उसकी बहाली करते हुए उसके वीज़ा आदि का प्रबंध हाथोंहाथ कर दिया, तो उसकी ख़ुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा. उसके ग्रैजुएशन के प्रोग्राम में उसके मम्मी-पापा आनेवाले थे. टिकट भी बन चुका था. दो साल की लंबी अवधि के बाद उन दोनों से मिलने की आकांक्षा में बड़ी बेसब्री के साथ दिन बीत रहे थे कि उन दोनों की असमय मौत की सूचना बिजली बनकर गिरी. ब़र्फ के प्रचंड तूफ़ान ने ना जाने उनके हल्के-फुल्के शरीर को हज़ारों फीट नीचे किस घाटी में फेंक दिया था कि उनके मृत शरीर भी नहीं मिल सके. बड़े ही बुझे मन से वह भारत गई और मृत्यु के बाद सभी विधियों को पूरा करके वापस लौट आई.

उस नाज़ुक दौर में वेद का उसके जीवन में आना किसी दैविक चमत्कार से कम नहीं था. उसकी बांहों में लिपटकर मम्मी-पापा की मृत्यु की असहनीय वेदना को भूलने की कोशिश करती रही. सारे रिश्तों का पर्याय बना वेद हर प्रतिकूल परिस्थितियों में उसे संभालता रहा. कितना टूटकर प्यार किया था दोनों ने एक-दूसरे को. प्रीत की इंद्रधनुषी कायनात, फूलों और परियों की नगरी न्यूयॉर्क की ज़मीं पर उतर आए थे.

“चलो, आज ही किसी मंदिर में शादी कर लेते हैं.” वेद का ऐसा कहना उसे कितना रोमांचित करके रख देता था. तब उससे एकाकार होने के लिए वह कितनी लालायित हो उठती थी. पर दूसरे पल ही वेद के संपूर्ण व्यक्तित्व पर उतर आई दैविक आभा से वह घुंघरुओं की तरह खनक कर रह जाती.

Renu Srivastava

     रेणु श्रीवास्तव

अधिक शॉर्ट स्टोरीज के लिए यहाँ क्लिक करें – SHORT STORiES

कहानी- अब लंदन दूर कहां 3 (Story Series- Ab London Dur Kahan 3)

“… हम अपना जीवन अपने हिसाब से जीते हैं. जब मन होता है, बच्चों से मिलने चले जाते हैं. वे वहां ख़ुश हैं, हम यहां, तो समस्या क्या है अकेले रहने में? वैसे भी आजकल इंटरनेट के कारण दूरियां समाप्त हो गई हैं. जब चाहे बच्चों से बातें कर लो, जब चाहे उनको वेबकैम पर देख लो. मेरी सोच भी यहां आने के बाद ही बदली है.” उन्होंने एक सांस में मेरे सामने अपने जीवन की रूपरेखा खींच दी.

“… बढ़ती उम्र के अनुसार शरीर को कोई रोग लग जाता है, तो वे अधिक-से-अधिक डॉक्टर को दिखा देंगे, हर समय हमारा ध्यान तो नहीं रख सकते. ऊपर से इलाज के लिए अनाप-शनाप बेहिसाब ख़र्च करना पड़ता है. यहां तो बीमार पड़ने पर सरकार घर पर निशुल्क नर्स का इंतज़ाम करने के साथ बढ़िया-से-बढ़िया इलाज की भी ज़िम्मेदारी लेती है.

इस उम्र में बच्चों के मोह को छोड़कर अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखना सबसे ज़रूरी है. वहां बच्चों के साथ रहकर ज़िम्मेदारी निभाने के कारण अपने स्वास्थ्य का ध्यान भी नहीं रख सकते और बीमार पड़ने पर बच्चों पर आश्रित होकर उनके लिए हम बोझ बन जाते हैं. यहां पर रिश्तेदारों के कब, क्यों और कहां… जैसे प्रश्‍नों की बौछार के बिना बहुत मानसिक शांति है. हम अपना जीवन अपने हिसाब से जीते हैं. जब मन होता है, बच्चों से मिलने चले जाते हैं. वे वहां ख़ुश हैं, हम यहां, तो समस्या क्या है अकेले रहने में? वैसे भी आजकल इंटरनेट के कारण दूरियां समाप्त हो गई हैं. जब चाहे बच्चों से बातें कर लो, जब चाहे उनको वेबकैम पर देख लो. मेरी सोच भी यहां आने के बाद ही बदली है.” उन्होंने एक सांस में मेरे सामने अपने जीवन की रूपरेखा खींच दी.

उसके बाद भी कई परिवार ऐसे मिले, जिनके बच्चे भारत के अतिरिक्त अन्य देशों में बसे हुए थे, लेकिन वे उनके साथ रहने से अधिक लंदन की सुविधाओं के साथ स्वतंत्र जीवन व्यतीत करना अधिक पसंद करते थे. यह देखकर मुझे आश्‍चर्य के साथ सुखद अनुभूति हुई कि पहले अधिकतर वरिष्ठ लोग अपने बच्चों पर आश्रित रहकर जीवनयापन करते थे, लेकिन नई टेक्नोलॉजी के कारण बच्चों की जीवनशैली में परिवर्तन आने से उनकी अत्यधिक व्यस्तता को स्वीकार करते हुए प्रौढ़ावस्था में बच्चों से अपेक्षा ना रखकर  आत्मनिर्भर रहकर ख़ुशहाल जीवन बिता रहे हैं.

लंदन के निवासियों का कहना है, यहां रहकर ना हमें बच्चों के भविष्य की चिंता है, क्योंकि उनके करियर की और निशुल्क चिकित्सकीय सुविधा देना सरकार की ज़िम्मेदारी होती है. ना हमें अपने भविष्य की चिंता है, क्योंकि रिटायरमेंट के बाद हमारे रख-रखाव की ज़िम्मेदारी भी सरकार लेती है. विपरीत इसके भारत में बच्चों के करियर बनाने के लिए भारी फीस और महंगी चिकित्सा के ख़र्चे से ही लोगों का जीवन चिंताग्रस्त ही व्यतीत होता है और उसके बाद भी ना बच्चों के अच्छे भविष्य की और ना ही सही इलाज की गारंटी होती है.

यह भी पढ़ेSuccessful लॉन्ग डिस्टेंस रिलेशनशिप के टॉप सीक्रेट्स (Top Secrets Of Successful Long Distance Relationship)

लंदन में तीन महीने घूमने-फिरने में, वहां की जीवनशैली की जानकारी लेने में और बच्चों के साथ समय बिताने में कब बीत गए पता ही नहीं चला और लौटने का दिन भी आ गया. बेटा और बहू उदास होने लगे कि हम उनके बिना अकेले भारत में कैसे रहेंगे, तो मैंने कहा, “नितीश, तेरी बेटी अभी दो वर्ष की है, एक वर्ष बाद उसे किस स्कूल में भेजना है, इसकी तुझे चिंता नहीं होगी, क्योंकि घर के पासवाले स्कूल में ही यहां दाख़िला लेना आवश्यक है और ना ही तुझे फीस की चिंता होगी. स्कूल दूर नहीं होने के कारण किसी यातायात के साधन पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा, जिससे समय की बचत होगी और उसकी सुरक्षा के प्रति भी शंकित नहीं रहना पड़ेगा. सबसे अच्छी बात तो यह है कि यहां बच्चों को किताबों के बोझ नहीं उठाने पड़ते. तुम भी ट्रैफिक जाम न होने के कारण ऑफिस से लौटकर थके हुए और चिड़चिड़े से दिखाई नहीं पड़ते, क्योंकि भारत में रहकर यहां की कंपनी में, यहां के समयानुसार काम करने से तुम्हारी जीवनशैली बिगड़ी हुई थी. अब तुम सुबह ऑफिस जाते हो और शाम को लौट आते हो, इसलिए दिनचर्या ठीक हो गई है, जिसका तुम्हारी सेहत पर सकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है. बहू भी मेड रखने के झंझट से मुक्त बिना किसी रोक-टोक के अपनी सुविधानुसार अपनी दिनचर्या निर्धारित करने के लिए स्वतंत्र है.

हम माता-पिता को इससे अधिक और क्या चाहिए. तुम लोगों की जीवनशैली से आश्‍वस्त होकर हम लौट रहे हैं. मैं तो तुम लोगों के बिना कभी रहने की कल्पना भी नहीं कर सकती थी, लेकिन यहां के वरिष्ठ नागरिकों के दैनिक क्रिया-कलापों में आत्मनिर्भरता और सक्रियता देखकर हमें भी प्रेरणा मिली है. तुम लोग लंदन में हो, तो हमें भी यहां आने का मौक़ा मिला है और अब लंदन दूर कहां है? सोशल नेटवर्किंग के ज़रिए कभी भी बात कर सकते हैं और वीडियो कॉल करके एक साथ रहने की अनुभूति का भी आनंद ले सकते हैं. वैसे भी भारत से लंदन की हवाई जहाज़ से दूरी ही कितनी है. जब चाहे तुम्हारे पास छह महीने के लिए आ सकते हैं.” मेरी बात सुनकर दोनों आश्‍वस्त हुए. उनके चेहरे पर मुस्कुराहट खिल गई और हम भारत लौटने के लिए एयरपोर्ट के लिए रवाना हो गए.

      सुधा कसेरा

अधिक शॉर्ट स्टोरीज के लिए यहाँ क्लिक करें – SHORT STORiES

कहानी- अब लंदन दूर कहां 2 (Story Series- Ab London Dur Kahan 2)

हिंदी भाषी लोग भी हर स्थान पर बहुतायत में दिख जाने के कारण कभी-कभी तो लगता ही नहीं था कि हम विदेश में हैं. वहां के भारतीय निवासी किसी भी भारतीय को देखकर थोड़ी देर में ही उनसे ऐसे घुल-मिल जाते, जैसे बहुत पुरानी जान-पहचान है. मुझे भी वहां किसी अनजान भारतीय निवासी से बात करके लंदन की जीवनशैली के बारे में अधिक से अधिक जानना बहुत अच्छा लगता था.

सड़क पर भारी संख्या में लोग पैदल चल रहे थे, ऐसा लग रहा था जैसे किसी मेले में आ गई थी. यह दृश्य अधिकतर छुट्टीवाले दिन सुबह से शाम के सात बजे तक दिखाई पड़ता था, बाकी के दिन घर में रहनेवाले लोग ही अपने बच्चों के साथ दिखाई पड़ते थे.

भारत में तो लोगों का पूरा जीवन ट्रैफिक जाम में फंसे रहने के कारण, सामाजिक गतिविधियों  और बेकार की गॉसिप तथा लोग क्या कहेंगे की सोच में ही बीत जाता है. उनके  जीवन की गतिविधियों की डोर दूसरों के हाथों में होती है. वे जीवन जीते नहीं, काटते हैं. इसके विपरीत लंदन में मुझे एहसास हुआ कि यहां के लोग जीवन अपने लिए जीते हैं. वे किसी को अपने जीवन में हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं देते. ना लोगों की प्रतिक्रिया की परवाह करते हैं, इसीलिए सभी काम अपने हाथों से करके भी इनके पास अपने तथा परिवार के साथ बिताने के लिए भरपूर समय होता है.

मुझे आरंभ से ही सब्ज़ी और अनाज की ख़रीदारी करना नहीं भाता, इसलिए मेरे पति और बच्चे जब भी इन सब चीज़ों की ख़रीदारी करने जाते, तो मुझे घर में बैठने से अधिक इन सब वस्तुओं को बेचने के लिए बने स्टोर्स के बाहर सड़क पर बनी बेंच पर बैठकर लोगों की गतिविधियों को देखना भाता था. मैंने पाया कि वहां पर भारत के अतिरिक्त अन्य देशों के लोग बहुतायत में रहते हैं. महिलाएं

रंग-बिरंगी तथा विभिन्न डिज़ाइन की बनी पोशाकों में मुझे बहुत आकर्षित करती थीं. वे नवजात शिशु को भी प्रैम में बैठाकर ख़रीदारी करने या घूमने निकली हुई दिखाई पड़ती थीं. स्टोर्स में भी हर प्रकार के कपड़े बिकते थे. वहां ख़रीदारी करना भी घूमने जाने जैसा सुखद एहसास देता था. यह सब मुझे स्वप्नलोक में विचरण करने जैसा लगता था.

यह भी पढ़ेदूर होते रिश्ते, क़रीब आती टेक्नोलॉजी (Technology Effecting Negatively On Relationships)

हिंदी भाषी लोग भी हर स्थान पर बहुतायत में दिख जाने के कारण कभी-कभी तो लगता ही नहीं था कि हम विदेश में हैं. वहां के भारतीय निवासी किसी भी भारतीय को देखकर थोड़ी देर में ही उनसे ऐसे घुल-मिल जाते, जैसे बहुत पुरानी जान-पहचान है. मुझे भी वहां किसी अनजान भारतीय निवासी से बात करके लंदन की जीवनशैली के बारे में अधिक से अधिक जानना बहुत अच्छा लगता था.

एक दिन मैं ऐसे ही किसी स्टोर के बाहर बैठने लगी, तो मैंने देखा कि मेरे बगल में भारतीय वरिष्ठ दंपत्ति बैठे थे. मुझे देखकर वरिष्ठ महिला चिहुंककर बोली, “आप क्या यहीं रहती हैं?”

“नहीं, मैं तो अपने बेटे-बहू के पास तीन महीनों के लिए आई हूं. आप?” मैंने भी प्रत्युत्तर में मुस्कुराते हुए पूछा.

“हम तो यहां के स्थाई निवासी हैं.” उन्होंने सपाट आवाज़ में उत्तर दिया.

“आपके बच्चे?” मैंने उत्सुकता से पूछा.

“मेरे बच्चे इंडिया में रहते हैं.” उन्होंने मेरा वाक्य पूरा होने से पहले ही उत्तर दिया.

“ऐसा कैसे?” यह तो बड़ी अजीब बात है. यह तो सुना था, बच्चे यहां और माता-पिता भारत में, लेकिन…”

“हुआ ऐसा कि मेरे पति को लंदन में नौकरी का प्रस्ताव मिला, तो ये यहां आकर नौकरी करने लगे. तब तक मेरे दो बच्चे हो गए थे. वे यहां से वापिस भारत नहीं जाना चाहते थे. मैं यह सोचकर अपने बच्चों के साथ भारत में ही रही कि हमारे बिना ये अधिक दिन यहां नहीं रहेंगे और जल्दी ही भारत लौट आएंगे, लेकिन मेरा सोचना ग़लत निकला. इनको लंदन इतना भाया कि ये यहीं रहना चाहते थे. बेटा बड़ा हो गया और उसका विवाह भी हो गया. ये भारत आते रहे, लेकिन नौकरी लंदन में ही करने की ज़िद रही. मेरी बेटी भी कॉलेज में पढ़ने लगी, तो बच्चों ने मुझे यहां आने के लिए बाध्य किया, जिससे कि इनको प्रौढ़ावस्था में घर का सुख मिले. पहले तो मैंने बहुत मना किया, लेकिन बच्चे परिपक्व और ज़िम्मेदार हो गए हैं, यह सोचकर मैं यहां आ गई.” अपनी बात समाप्त करके उनके चेहरे के भाव ऐसे थे, जैसे अपने निर्णय के प्रति उनके मन में किसी प्रकार की दुविधा नहीं थी. वे बहुत संतुष्ट दिखाई दीं.

“लेकिन अब रिटायरमेंट के बाद तो आप दोनों अपने बच्चों के पास जा सकते थे?”

“यहां पर वरिष्ठ नागरिकों को सरकार की ओर से निशुल्क इलाज के अतिरिक्त लंदन में कहीं से भी कहीं जाने के लिए बस और ट्रेन के निशुल्क पास की सुविधा मिलती है. और भी कई तरह की सुविधाएं मिलती हैं, इसलिए स़िर्फ बच्चों के साथ रहने के मोह के कारण भारत में रहना कोई समझदारी का काम नहीं है. वहां पर बच्चे साथ ज़रूर रहेंगे, लेकिन अपनी व्यस्त जीवनशैली के कारण हमारे लिए उनके पास समय ही कहां है…”

      सुधा कसेरा

अधिक शॉर्ट स्टोरीज के लिए यहाँ क्लिक करें – SHORT STORiES

कहानी- अब लंदन दूर कहां 1 (Story Series- Ab London Dur Kahan 1)

लंदन में गर्मी का मौसम बहुत सुहावना और कुछ ही महीनों के लिए होता है, इसलिए घरों में पंखे तक दिखाई नहीं देते. इस मौसम का लोग भरपूर आनंद लेते हैं और इन दिनों लोग अधिक-से-अधिक बाहर घूमने जाते हैं. वहां मौसम का मिज़ाज निश्‍चित नहीं है, गर्मी में भी अचानक ठंड हो जाती है. बारिश भी मुंबई की बरसात की तरह है, इसलिए घर से निकलते समय लोग पहनने के लिए कोई मोटा कपड़ा और छतरी अधिकतर साथ रखते हैं.

कभी-कभी जीवन में कुछ ऐसा घटित हो जाता है, जो ख़ूबसूरत सपने के सच होने से भी अधिक चमत्कृत कर देता है. ऐसा ही कुछ मुझे अनुभव हुआ, जब मैं भारत से कंपनी की तरफ़ से भेजे गए अपने बेटे नितीश के पास लंदन पहुंची. मुझे अपार्टमेंट में पहुंचते-पहुंचते देर रात हो गई थी. यात्रा की थकान के कारण बिस्तर पर लेटते ही गहरी नींद ने मुझे अपनी आगोश में ले लिया. मुझे यह सोच अद्भुत व सुखद अनुभूति दे रही थी कि मैं लंदन में हूं, इसलिए सुबह उठते ही अपने पांचवीं मंज़िल के अपार्टमेंट की बालकनी से बाहर का दृश्य देखने का लोभ संवरण नहीं कर पाई. नीचे सड़क पर कारों और बसों का आवागमन, छोटे बच्चों को प्रैम से प्ले स्कूल छोड़ने के लिए जाती हुई अधिकतर महिलाएं, बड़े बच्चे दो और तीन पहिए की एक पैर से चलानेवाली गाड़ी, जिसे वहां स्कूटर कहा जाता है, से स्कूल जाते हुए. बैग संभाले हुए कार्यक्षेत्र के लिए ट्रेन या बस पकड़ने के लिए सड़क पर चलते हुए युवा. दूर खिलौने जैसी दिखती आती-जाती ट्रेनें. मैं ट्रेन के डिब्बे गिनने लगी एक, दो, तीन… कुल छह थे. रातभर बारिश होने के कारण सड़कें नहाई हुई-सी, सब कुछ नया और अद्भुत लग रहा था.

सुबह बहू के हाथ से चाय का प्याला पीकर मन और भी पुलकित हो गया.

धीरे-धीरे उस शहर की जीवनशैली से परिचित होने लगी. लंदन जाने से पहले ही नितीश ने मुझे जानकारी दे दी थी कि वहां कार ख़रीदना आसान है, लेकिन उसका रख-रखाव और पार्किंग इतनी अधिक महंगी और मुश्किल है कि उसको रखना सिरदर्द मोल लेना है और वहां सार्वजनिक यातायात की इतनी अधिक सुविधा है कि कार रखने की आवश्यकता भी नहीं है. मैं यह सोचकर घबरा रही थी कि लंदन में पैदल कैसे चलूंगी, क्योंकि भारत में तो कहीं भी गाड़ी से ही जाना होता था, सड़क पर तो पैदल चलना जैसे भूल से गए थे, यह सोचकर अच्छा भी लगा कि इसी बहाने पैदल चलेंगे, क्योंकि यह स्वास्थ्य के लिए अच्छा रहेगा. घर से बाहर निकलकर लगभग एक किलोमीटर के अंदर बस स्टैंड और ट्रेन पकड़ने जाने के लिए साफ़-सुथरी चौड़ी सड़कों के दोनों ओर पटरियों पर नियमों का पालन करते हुए पैदल चलना सुखद अनुभूति दे रहा था. ट्रेन या बस में चढ़ने तथा अंदर बैठने के लिए प्रैम में बैठे छोटे बच्चों, व्हीलचेयर इस्तेमाल करनेवाले वृद्धों तथा विकलांगों के लिए विशेष व्यवस्था होती थी. यातायात के साधन बहुतायत में होने के कारण भीड़ का सामना भी नहीं करना पड़ता था, इसलिए यात्रा बहुत सुविधाजनक लगती थी.

यह भी पढ़ेलाइफस्टाइल ने कितने बदले रिश्ते? (How Lifestyle Has Changed Your Relationships?)

मुझे यह देखकर बहुत आश्‍चर्य हुआ कि लंदन में बहुत से दर्शनीय तथा सार्वजनिक स्थानों में जगह-जगह सड़क के बीचोंबीच और किनारे लकड़ी, लोहे और सीमेंट से निर्मित बेंचें लगी थीं, जिनमें कुछ गोलाकार भी थीं, जिन पर पैदल चलते हुए थक जाने पर बैठकर थोड़ी देर के लिए विश्राम किया जा सकता था. मुझे यह सोचकर बहुत सुकून मिला कि वहां अनावश्यक थकने की आवश्यकता भी नहीं थी. उन सड़कों पर बच्चों के प्रैम, पैर से चलानेवाले लकड़ी से बने स्कूटर और साइकिल के अतिरिक्त अन्य यातायात के साधन ही निषिद्ध थे.

लंदन भयंकर जाड़े की लिए प्रसिद्ध है. उन दिनों सूरज दोपहर को तीन बजे ही ढल जाता और रात का अंधेरा पसर जाता. अंधेरा और शीत लहर होने के कारण लोग घरों में कैद हो जाते, इसलिए वहां कोई कहीं बाहर जाने के लिए शाम का इंतज़ार नहीं करता. यहां लोग धूप के लिए तरसते हैं, इसलिए ज़रा-सी धूप निकलते ही घरों से निकल पड़ते हैं और धूप का भरपूर आनंद लेते हैं. उन दिनों को वहां सनी-डे कहा जाता है. दुकानें भी शाम को छह से अधिकतम आठ बजे तक खुली रहती हैं.

लंदन में गर्मी का मौसम बहुत सुहावना और कुछ ही महीनों के लिए होता है, इसलिए घरों में पंखे तक दिखाई नहीं देते. इस मौसम का लोग भरपूर आनंद लेते हैं और इन दिनों लोग अधिक-से-अधिक बाहर घूमने जाते हैं. वहां मौसम का मिज़ाज निश्‍चित नहीं है, गर्मी में भी अचानक ठंड हो जाती है. बारिश भी मुंबई की बरसात की तरह है, इसलिए घर से निकलते समय लोग पहनने के लिए कोई मोटा कपड़ा और छतरी अधिकतर साथ रखते हैं.

घर से आधे किलोमीटर की दूरी पर ही हाई स्ट्रीट नाम से बाज़ार था. इस नाम का बाज़ार लंदन के प्रत्येक एरिया में होता है. वहां जाकर मैंने देखा कि सड़क के दोनों ओर घर-गृहस्थी से संबंधित सभी सामान के स्टोर और हर प्रकार के रेस्तरां थे, जिनके बाहर भी लोग कुर्सियों पर बैठे हुए खाने के साथ बातचीत का आनंद ले रहे थे. देखकर नहीं लग रहा था कि किसी को भी वहां से उठने की जल्दी है.

      सुधा कसेरा

अधिक शॉर्ट स्टोरीज के लिए यहाँ क्लिक करें – SHORT STORiES

कहानी- तुम न करना… 3 (Story Series- Tum Na Karna… 3)

अस्थाई रूप से उपजे मन-मुटाव को बेटियों से साझा करने की बजाय मन में रखना बेहतर था. भाई-बहन बचपन में परस्पर ख़ूब लड़ते-झगड़ते हैं, फिर एक हो जाते हैं, क्योंकि उस समय उनके वैचारिक मतभेदों को कोई हवा नहीं देता. 

हर भाई-बहन की अपनी ख़ासियत, अच्छाइयां-बुराइयां, उनके  व्यवहार का हिस्सा होती हैं. बचपन में उसी व्यवहार के साथ वह एक-दूजे संग अनेक मतभेदों के बीच रहते हैं. पर विवाह के बाद मतभेद जब बच्चों तक पहुंचते हैं, तब वे कई गुना बढ़ जाते हैं.

सुलभा ने कई बार कभी हंसकर, तो कभी संजीदा होकर आभा के तुनकमिज़ाज बर्ताव को बढ़ा-चढ़ाकर बड़ी होती बेटियों के समक्ष रखा. अपनी मौसी की दख़लंदाज़ी और तुनकमिज़ाज व्यवहार का उनके मन में ऐसा खांचा खिंचा कि उनकी छवि तेज़तर्रार और मां सुलभा की सीधी-सादी छवि बनी.

“मम्मी, आपने एक बात नोटिस की. मौसी ने नानी की कांजीवरम साड़ी पहनी थी. प्योर में थी. अब ये साड़ी तीस हज़ार से कम नहीं होगी. आप इसी साड़ी के बारे में बता रही थीं न.”

एक बार शुभ्रा ने सुलभा से पूछा, तो वह संभलकर बोली थी, “देख शुभ्रा अच्छा है, जो अम्मा से यह साड़ी आभा ने ली. आज उसने पहनी, तो अम्मा की याद आ गई. वह शौक से साड़ी पहन रही है, तो ख़ुशी है कि इस्तेमाल हो रही है, वरना जैसे मां ने बक्से में बंद रखी, वैसे ही मैं भी बक्से में बंद रखती. न मैं पहनती, न तुम लोग.”

काश! कभी उसने बेटियों के सामने यह न कहा होता… “ये आभा भी न. बड़ी चालू है. अम्मा की सबसे महंगी और सुंदर साड़ी उनसे निकलवा ली. दूर रहती है, इसीलिए अम्मा भी अपना सारा प्यार उस पर उड़ेल देती हैं.

“आप मांगतीं, तो नानी न देतीं वो साड़ी आपको?” पंद्रह साल की शुभ्रा ने उससे पूछा था, तब ही उसे संभल जाना चाहिए थी.

अस्थाई रूप से उपजे मन-मुटाव को बेटियों से साझा करने की बजाय मन में रखना बेहतर था. भाई-बहन बचपन में परस्पर ख़ूब लड़ते-झगड़ते हैं, फिर एक हो जाते हैं, क्योंकि उस समय उनके वैचारिक मतभेदों को कोई हवा नहीं देता.

हर भाई-बहन की अपनी ख़ासियत, अच्छाइयां-बुराइयां, उनके  व्यवहार का हिस्सा होती हैं. बचपन में उसी व्यवहार के साथ वह एक-दूजे संग अनेक मतभेदों के बीच रहते हैं. पर विवाह के बाद मतभेद जब बच्चों तक पहुंचते हैं, तब वे कई गुना बढ़ जाते हैं.

भाई-बहन एक-दूसरे के प्रति व्यावहारिक बनते हैं. यही व्यावहारिकता उनके बीच के नैसर्गिक अपनत्व को ख़त्म कर देती है.

विवाह के बाद क्यों हमारा-तुम्हारा अलग-अलग परिवार होता है. उसने भी कभी नासमझी की… छोटी बहन के प्रति अंतर्विरोधों को अपनी बेटियों  से साझा करना उसकी ग़लती थी.   अपने मन में आते-जाते हर प्रकार के विचारों को  बेटियों से साझा करने की ललक का परिणाम है कि अपनी ही मौसी के प्रति उनके मन में दुर्भावना है. आभा ज़ाहिर करे न करे, पर क्या शुभ्रा-भावना की तल्ख़ी और खिंचाव महसूस नहीं करती होगी.

यह भी पढ़े: 7 वजहें जब एक स्त्री को दूसरी स्त्री की ज़रूरत होती है (7 Reasons When A Woman Needs Woman)

ये बेटियां कहां से समझेंगी हम भाई-बहनों के प्रेम की जड़ों की गहराई. हमारी आपसी बॉन्डिंग… ये बॉन्डिंग ही है, जो आज भी अनेक गतिरोधों के बाद भी रह-रहकर एक-दूसरे के पास ले आती है और जो दिलों में दूरियां आ जाएं, तो मन को सालती है.

उसे याद आया जब भावना-शुभ्रा छोटी थीं, तब शिशिर और आभा में होड़ होती कि कौन सुलभा के घर जाएगा. आभा बच्चों के मोहवश सुलभा के पास  जब-तब खिंची आती थी. उनको दुलाराना-संभालना, खाना खिलाना… सब तो किया है आभा ने…

उसने भावना-शुभ्रा को अपनी बेटियों की तरह माना… पर वह सब तो उनके बचपन के साथ रीत गया. रह गया तो सब कुछ सयाना…

बड़ी होती शुभ्रा-भावना ने अपनी मां की रिश्तों के प्रति व्यक्त प्रतिक्रिया के अनुरूप ही अपनी समझ को विस्तार दिया और उसी के अनुसार मौसी को परखा…

आज बेटियों के लिए आभा महज़ मौसी है… ‘मां सी’ का जज़्बा सुलभाकोमल मन में कभी पनपा ही नहीं पाई, बल्कि वह आभा को लेकर जाने-अनजाने अनेक भ्रामक तथ्यों, प्रपंचों से उन्हें भ्रमित करती रही… तो बेटियों का क्या दोष…

बेटियों के लिए आभा वह है जिससे उनकी मां जाने-अनजाने आहत हुई, वो कैसे अपनी मौसी को माफ़ कर देतीं. सुलभा तो आभा के पीठ पीछे उसकी खिंचाई करने के बावजूद उससे कभी मन से दूर न हुई… जब भी आभा सामने आती है, मन में स्वाभाविक प्रेम की ऊष्मा आती है. यह बहनों के बीच स्वाभाविक है, पर बेटियां बहनों के बीच की प्रतिबद्धता से अंजान उनके सहज-स्वाभाविक प्रेमपूर्ण व्यवहार को भी दुनियादारी मानती हैं.

“क्या हुआ, आप तो सीरियस हो गईं. बहन है मेरी… ग़ुस्से में बोल गई.”

भावना की आवाज़ सुनकर सुलभा विचारों के घेरे से बाहर आ गई. कुछ देर के मौन के बाद वह भावना से बोली, “तुम ख़ुशक़िस्मत हो कि तुम्हारी बेटी है… बेटियां मां से मन से जुड़ी होती हैं. मां हर छोटी-बड़ी बात अपनी बेटी से साझा कर सकती हैं, पर याद रखना बालमन पर अपने अस्थाई रूप से उपजे रोष के बीज पड़ते हैं, तो वह आगे चलकर बबूल बन जाते हैं. बड़े तो बोल-बालकर भूल जाते हैं, पर बच्चे नहीं भूलते.”

“ओह मां, तुम भी न बहुत संवेदनशील हो…” भावना बोलकर चली गई, तो सुलभा फुसफुसाई, ‘ये जो रिश्ते हैं न ये बड़े संवेदनशील होते हैं. नेह-प्रेम की खाद-पानी न पड़े, तो सूख जाते हैं. मेरी तरह तेरी भी एक ही बहन है, जो ग़लती मैंने की ‘तुम न करना…’

Meenu Tripathi

    मीनू त्रिपाठी

अधिक शॉर्ट स्टोरीज के लिए यहाँ क्लिक करें – SHORT STORiES

कहानी- तुम न करना… 2 (Story Series- Tum Na Karna… 2)

क्यों बेटियों को अंदेशा हुआ कि आभा विवेक के राजपूत न होने पर मुंह बनाएगी, जबकि सच यह था कि विवेक के बारे में जान-सुनकर उसकी फोटो देखकर आभा ख़ुशी से बोली थी, “इतना अच्छा दामाद हमारी ख़ुशक़िस्मती से मिल रहा है. वैसे भी आजकल जाति-वाति कौन पूछता है, बस लड़का और फैमिली अच्छी हो…”

सुलभा ने आभा की प्रतिक्रिया के विषय में बताया तो भावना ठंडेपन से बोली, “ख़ुशी ज़ाहिर करने के अलावा उनके पास कोई चारा भी तो नहीं था. हम लोग उनकी निगेटिव प्रतिक्रिया कब सुनने लगे.”

भावना की इस टिप्पणी की भी पृष्ठभूमि वह समझती थी.

आभा जब जाने लगी, तो सुलभा ने भावुकता से कहा, “फोन पर कभी-कभी बात कर लिया करो.” यह सुन आभा उसके गले लगते हुए बोली, “हां दीदी, अब जल्दी-जल्दी फोन करूंगी… सच बताऊं, नाराज़ थी तुमसे… तुमने भी कब से मुझे फोन नहीं किया. मैंने भी सोच लिया था, जब तक तुम बात नहीं करोगी, मैं भी फोन नहीं करूंगी… बेटियां हैं, तो क्या बहन को भूल जाओगी..”

पल में रूठने और पल में माननेवाली छोटी बहन हमेशा की तरह साफ़गोई से मन की बात कह गई.

“बेटियां अपनी जगह और बहन अपनी जगह समझी. फ़िलहाल छोटी बहन से ख़ूब काम करवाने का समय आ गया है…”

“हां दीदी, शुभ्रा की शादी में ख़ूब धमाल करेंगे…”

आभा के कहने पर उसने स्नेह से उसके हाथों को सहलाया.

आभा के जाने से घर सूना लग रहा था. शुभ्रा भी विदा हो जाएगी, तो घर कैसा लगेगा, यह सोचकर उसने सिर सोफे से टिका दिया. शुभ्रा अपनी मां को थका-थका-सा देख चिंता से बोली थी, “मौसी के आने पर बेवजह ख़ुद को इतना थका लिया… खाना बाहर से भी आ सकता था या फिर मेड से बनवा लेतीं, पर नहीं आप लोगों को तो सारा प्यार खाने में ही उड़ेलना अच्छा लगता है.

और हां मम्मी, मेरी शादी में मौसी की दख़लंदाज़ी ज़्यादा न होने देना. पिछली बार भावना दी की शादी में कमरा सुधारने के चक्कर में हमारे सामान की ऐसी की तैसी कर दी थी. भावना दी तो कितना चिढ़ गई थीं. उनके रहने का इंतज़ाम कहीं और कर देना सही रहेगा. घर में रहेंगी, तो हमारी प्राइवेसी नहीं रहेगी.”

‘मौसी कोई बाहर की हैं क्या…’ वह चाहकर भी कह न पाई. उसी समय भावना का फोन आया था.

सुलभा के ‘हेलो’ कहते ही, “मौसी गर्ईं क्या?” भावना ने प्रश्‍न दे मारा.

“अभी-अभी बस निकली ही है.” सुलभा के कहने पर भावना चहककर बोली, “बढ़िया है, अब मैं अपना प्रोग्राम बना सकती हूं. मैं और कुहू घर आ रहे हैं.” यह सुनकर सुलभा  बोली, “आना ही था तो अभी आती, मौसी से मिल लेती. तुझे बहुत पूछ रही थी.”

यह भी पढ़ेरिश्तों में बचें इन चीज़ों के ओवरडोज़ से (Overdose Of Love In Relationships)

“रहने दो मम्मी उनका ड्रामा. याद नहीं, बैंगलुरू आई थीं, तब मिलने तक नहीं आई.”

“छोड़ न पुरानी बातें… बताया तो था उसने. सेमीनार था समय नहीं मिला. मोबाइल नेटवर्क भी गड़बड़ था.”

“ये सब तो कहनेवाली बातें हैं.” भावना अपने मन में पुरानी खिन्नता अभी भी पाले थी. अपनी मौसी के साथ ढेर सारे ख़ूबसूरत और स्नेहिल क्षणों को भुलाकर वह उस क़िस्से को सीने से लगाए बैठी थी, जब भावना बैंग्लुरू में कॉलेज में थी. आभा सेमीनार के लिए वहां आई, पर उससे नहीं मिली ,इस बात पर सुलभा ने त्वरित टिप्पणी की थी.

“देख तो आभा को, बैंग्लुरू आकर भी तुमसे नहीं मिली.” उस समय भावना ने कहा भी था, “मम्मी, उनकी लोकेशन यहां से बहुत दूर थी.”

“दूर-पास क्या, आई थी तो मिल लेती…” काश! उस व़क्त वह भावना के मन में दुर्भावना के बीज बोने की जगह पहले ही कहकर रखती कि आभा से बात कर लेना. अगर उसे आने में द़िक्क़त हो, तो तुम ही उससे मिल आना.. पर उस समय बेवजह की क्षणिक निंदा समय व्यतीत का कारण बन मन को सुकून दे गई.

“और हालचाल बताओ, शुभ्रा की शादी की बात सुनकर क्या कहा मौसी ने. कोई मीनमेख तो नहीं निकाली? आदत है न उनकी…”

“कैसी बात कर रहे हो तुम लोग, मौसी है तुम्हारी, मीनमेख क्यों निकालने लगी…”

“नहीं, विवेक गैर राजपूत है न…”

“ऐसा कुछ नहीं है. शादी की बात सुनकर बहुत ख़ुश हुई. अच्छा सुन, थोड़ी देर में फोन करती हूं, कुछ काम है…”

बेटियों का अपनी ही मौसी के प्रति संदेह और अवांछित व्यवहार देखकर सुलभा दुखी हो गई. बात करने का मन नहीं था, सो काम का बहाना बनाकर भावना को टाल दिया.

“ओके बाय…” कहकर भावना ने फोन रखा, तो सुलभा आंखें मूंदकर आत्ममंथन करने लगी कि क्योंकर आभा के प्रति ऐसी धारणा बेटियों के मन में बनी.

क्यों बेटियों को अंदेशा हुआ कि आभा विवेक के राजपूत न होने पर मुंह बनाएगी, जबकि सच यह था कि विवेक के बारे में जान-सुनकर उसकी फोटो देखकर आभा ख़ुशी से बोली थी, “इतना अच्छा दामाद हमारी ख़ुशक़िस्मती से मिल रहा है. वैसे भी आजकल जाति-वाति कौन पूछता है, बस लड़का और फैमिली अच्छी हो…”

सुलभा ने आभा की प्रतिक्रिया के विषय में बताया तो भावना ठंडेपन से बोली, “ख़ुशी ज़ाहिर करने के अलावा उनके पास कोई चारा भी तो नहीं था. हम लोग उनकी निगेटिव प्रतिक्रिया कब सुनने लगे.”

भावना की इस टिप्पणी की भी पृष्ठभूमि वह समझती थी.

तीन भाई-बहनों में आभा घर में सबसे छोटी और सबसे मुंहफट है. आभा से दो साल बड़े और उससे चार साल छोटे भाई शिशिर ने लव मैरिज की थी. बेटे की शादी धूमधाम से करने के सपने संजोए अम्मा-बाबूजी बेटे के कोर्ट मैरिज से दुखी थे. अम्मा-बाबूजी की मायूसी देख पहले तो आभा ने शिशिर को कोर्ट मैरिज करने पर फटकार लगाई, फिर स्वयं ही अथक प्रयास कर शिशिर और उसकी पत्नी को अम्मा-बाबूजी का आशीर्वाद दिलवाया.

Meenu Tripathi

     मीनू त्रिपाठी

अधिक शॉर्ट स्टोरीज के लिए यहाँ क्लिक करें – SHORT STORiES

कहानी- तुम न करना… 1 (Story Series- Tum Na Karna… 1)

“दुश्मन नहीं होगी ये जानती हूं, पर तुम नहीं जानती कि ऐसी बातों का प्रभाव बच्चों पर अच्छा नहीं पड़ता है. बहन ही क्यों हर रिश्ते के लिए हमें सजग रहना चाहिए. हमें बच्चों के साथ आपसी रिश्तों में मधुरता बांटनी चाहिए न कि तल्ख़ी और कड़वाहट. जानती हूं, तू शुभ्रा से बहुत प्यार करती है. ये भी समझती हूं कि उसी प्यार के चलते तुम लोग एक-दूसरे को अधिकारपूर्ण उलाहना दे देते हो. हमारे मन में एक-दूसरे के प्रति द्वेष की भावना नहीं है, ये हम समझते हैं, पर ये अबोध बच्चे नहीं… ”

“नानी, घूमने  कब जाएंगे…”  छह साल की नन्हीं कुहू ने अपनी नानी से मायूसी से पूछा, तो सुलभा बोली, “क्या बताऊं, अभी तक तेरी मौसी नहीं आई. लगता है किसी काम में फंस गई.”

“तेरी मौसी के कारण सारा प्रोग्राम चौपट हो गया…” ग़ुस्से में झुंझलाती  भावना ने अपनी बेटी कुहू से कहा, तो   सुलभा के चेहरे पर नागवार भाव उभरे.

भावना छोटी बहन शुभ्रा पर भड़ास निकालते हुए बोलती रही, “शुभ्रा की शादी क्या हो गई, अपने ससुरालवालों को इंप्रेस करने के चक्कर में हमें नज़रअंदाज़ कर देती है. उस दिन भी बेचारी कुहू कितनी देर तक अपने जन्मदिन पर उसका इंतज़ार करती रही, पर मैडम चाची बन गई हैं न… सो अपनी जेठानी के बेटे के बर्थडे में व्यस्त हो गई और हम यहां बेवकूफ़ की तरह उसकी राह देखते रहे.”

“हां नानी, मौसी मेरे बर्थडे पर नहीं आई थीं…” नन्हीं कुहू अपनी मम्मी की हां में हां मिलाती दिखी, तो सुलभा हैरानी से बोली, “हे भगवान, क्या हो गया है तुम लोगों को… नई-नई  ससुराल के साथ तालमेल बैठाना भी तो ज़रूरी है. क्यों बेवजह उस बेचारी के पीछे पड़ गई हो.”

“ज़्यादा बेचारी-वेचारी कहकर उसकी तरफ़दारी मत करो…” भावना के तल्ख़ अंदाज़ पर सुलभा सन्न रह गई.

दो दिन पहले ही सुलभा कुछ दिनों के लिए अपनी बड़ी बेटी भावना के पास आई है. भावना अपने पति और छह साल की बेटी कुहू के साथ जयपुर में रहती है. छह महीने पहले ब्याही छोटी बेटी शुभ्रा की ससुराल भी जयपुर में ही है. शुभ्रा की ससुराल में उनके साथ सास-ससुर जेठ-जेठानी और उनका बेटा भी रहता है. शुभ्रा और भावना के एक ही शहर में होने से सुलभा बहुत ख़ुश थी… पर आज की परिस्थिति देखकर उसे लग रहा था कि ये दोनों बहनें दूर ही रहतीं, तो सही था.

शुभ्रा आज अपना दिन मां और बहन के साथ बितानेवाली थी. जयपुर दर्शन के साथ सबका डिज़नी फेयर देखने का कार्यक्रम था. कुहू दोपहर बारह बजे से अपने मौसी-मौसा के आने पर डिज़नी फेयर जाने की राह देख रही थी. पर शाम के पांच बज गए, शुभ्रा का कहीं कोई अता-पता नहीं था… उसके समय से घर न पहुंचने की वजह से सारा प्रोग्राम खटाई में पड़ता देख कुहू उदास हो कह रही थी, “मौसी से कट्टी… बहुत गंदी हैं मौसी. उनकी वजह से आज हम घूमने नहीं जा पाएंगे…”

यह भी पढ़ेगुम होता प्यार… तकनीकी होते एहसास… (This Is How Technology Is Affecting Our Relationships?)

“सच में बहुत गंदी है तेरी मौसी…” भावना के कहते ही सुलभा का मन दरक गया. कहे बिना वह रह न पाई. “भावना, ये क्या तरीक़ा है, शुभ्रा तेरी छोटी बहन है और कुहू की मौसी. इस रिश्ते का लिहाज़ करते हुए कुहू को समझाओ कि मौसी किसी ज़रूरी काम में फंस गई होगी. आज नहीं गए, तो क्या कल चले जाएंगे…”

“हे भगवान! मम्मी आप भी न… अरे, हम बहनों के बीच का मामला है, आप क्यों परेशान हो. सोचो, उसकी वजह से गड़बड़ा गया सारा कार्यक्रम. ग़ुस्सा नहीं आएगा क्या. आप भी पता नहीं क्या-क्या सोच लेती हो. मैंने तो कुहू से यूं ही कह दिया. आप तो ऐसे कह रही हो, जैसे कुहू आज से अपनी मौसी की दुश्मन हो जाएगी.”

“दुश्मन नहीं होगी ये जानती हूं, पर तुम नहीं जानती कि ऐसी बातों का प्रभाव बच्चों पर अच्छा नहीं पड़ता है. बहन ही क्यों हर रिश्ते के लिए हमें सजग रहना चाहिए. हमें बच्चों के साथ आपसी रिश्तों में मधुरता बांटनी चाहिए न कि तल्ख़ी और कड़वाहट. जानती हूं, तू शुभ्रा से बहुत प्यार करती है. ये भी समझती हूं कि उसी प्यार के चलते तुम लोग एक-दूसरे को अधिकारपूर्ण उलाहना दे देते हो. हमारे मन में एक-दूसरे के प्रति द्वेष की भावना नहीं है, ये हम समझते हैं, पर ये अबोध बच्चे नहीं…

आपसी रिश्तों में यदि किसी बात पर ग़ुस्सा आ भी गया, तो इन बच्चों के सामने उसे प्रकट मत करो. तुम्हारा ग़ुस्सा कल प्रेम में बदल जाएगा, पर इनके मन में पनपा ईर्ष्या-द्वेष-क्रोध का अंकुर इनके मन में अपनी जड़ें पसार लेगा.”

भावना अपनी मां की तीव्र प्रतिक्रिया देख हतप्रभ थी. सुलभा की इस तीव्र प्रतिक्रिया के पीछे उसे कोई कारण समझ में नहीं आया, पर सुलभा के अवचेतन मन में एक ग्लानि थी अपनी छोटी बहन आभा के प्रति…

कभी उसने भी जाने-अनजाने में बड़ी होती बेटियों के साथ मन की कही-अनकही साझा करने के चक्कर में आभा के प्रति हंसी-मज़ाक या संजीदगी के साथ कुछ नकारात्मकता भरी थी.

बेटियों के मन में अपनी ही मौसी के प्रति प्रतिस्पर्धा भरती चली गई.

“मौसी का फोन तो आता नहीं है. फिर आपको क्या पड़ी है उनसे बात करने की…” बड़ी होती बेटियों की दुनियादारी देख वह फूली न समाती थी. पर समय के साथ छोटी बहन ने उसके मन के कोमल हिस्से को तब स्पर्श किया जब शुभ्रा की शादी पक्की हुई.

शुभ्रा की शादी के क़रीब छह महीने पहले आभा घर आई, तब  रात के दो-ढाई बजे तक गप्पे मारते  व़क्त बहन के प्रति सुप्त प्रेम का स्रोत बह निकला. ठंड़े पड़े रिश्ते एक-दूसरे का साथ पाकर गरमा गए. एक-दूसरे की अहमियत जो भुला दी गई थी, वह महसूस हुई, तो दोनों भावुक हो उठीं.

Meenu Tripathi

     मीनू त्रिपाठी

अधिक शॉर्ट स्टोरीज के लिए यहाँ क्लिक करें – SHORT STORiES