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कहानी- बदलते समीकरण 1 (Story Series- Badalte Samikaran 1)

समझ में नहीं आ रहा था क्या करूं…? कहां तो मैं उसकी मित्र बनकर उसे पालना चाहती थी, पर अब जब भी कुछ कहती तो सीधा बोल देती, “ममा, आप तो मेरी जासूसी करती रहती हो. क्या आपको मुझ पर विश्‍वास नहीं है?”

“तुझ पर तो विश्‍वास है बेटा, पर दुनियावालों पर नहीं है.”

“ऐसा वही लोग बोलते हैं, जिन्हें स्वयं पर विश्‍वास नहीं होता.”

“अति आत्मविश्‍वास वाले ही धोखा खाते हैं. हो सकता है जिसे तू अपना मित्र समझ रही है, वही तुझे धोखा दे दें.” उसने उसे समझाना चाहा.

“ममा, अगर ऐसा है तो किसी को दोस्त ही न बनाया जाए, क्यों?” आश्‍चर्य चकित मुद्रा में उसने पूछा.

शहर में नित्य अपराधों के बढ़ते ग्राफ़ के मद्देनज़र सुश्री दिव्या खन्ना की नियुक्ति इस शहर में की जा रही है. वे जहां-जहां रही हैं, वहां उनके रहते अपराधों में भारी कमी आई है. अपराधियों पर सख़्ती बरतने के साथ-साथ वह उन्हें सामान्य ज़िंदगी जीने की ओर प्रेरित करने से भी नहीं चूकी हैं. इसके साथ ही वह पुलिस फोर्स को भी अपराधियों से जूझने के नये-नये तरी़के सीखने की ट्रेनिंग लेने के लिए भी प्रोत्साहित करती रही हैं. उनकी नियुक्ति की ख़बर से अपराधियों में अफ़रा-तफ़री मच गई है…’

अख़बार में छपी ख़बर पर आकांक्षा की आंखें ठहर ही गईं. तो क्या दिव्या का स्थानांतरण यहां हो रहा है. कितने दिनों बाद वे सब साथ-साथ रह सकेंगे. उसने इस ख़बर की पुष्टि के लिए दिव्या के घर फ़ोन किया, पता लगा कहीं बाहर गई हैं. देर रात तक लौटेंगी.

बात न हो पाने पर चिंता तो हो ही जाती है, पर उसका कार्य ही ऐसा है. अपराध और अपराधियों के बीच झूलती दिव्या कभी उन्हें स्मरण भी करती होगी, उसे संदेह था. मन अनायास ही अतीत की ओर मुड़ गया.

दिव्या उनकी एकमात्र संतान थी. उसके साथ हुए हादसे ने उन सबको हिला कर रख दिया था. जीवन तो हादसों का ही नाम है. पर अगर जिजीविषा हो. संकटों में भी इंसान टूटे नहीं. निरंतर संघर्ष करता रहे, तो सफलता अवश्य ही मिलती है. उन सबने भी उस स्थिति का सामना बड़ी बहादुरी से किया था.

नन्हीं दिव्या याद आई, जिसकी हर ख़ुशी को पूरा करते वे फूले नहीं समाते थे. शायद उनके इसी अधिक लाड़-प्यार और देखभाल ने उसे ज़िद्दी बना दिया था. जैसे-जैसे वह बड़ी होती गई, वह तुनकमिज़ाज और ज़िद्दी बनती चली गई. जिस बेटी को वह सहेली बनकर पालना चाहती थी, उसके लिए वह पुराने ज़माने की मां बनकर रह गई.

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कॉलेज में पहुंचते ही उसकी नई-नई फरमाइशें शुरू हो गईं. तरह-तरह की नई ड्रेस, मैचिंग जूते, पर्स इत्यादि ख़रीदे गए. टू व्हीलर भी अब आवश्यक हो गया. अब तो मानो उसके पर ही निकल आए. घर में वह टिकती ही नहीं थी, कुछ कहते तो चिढ़ जाती. दुख तो इस बात का था कि अपनी ही बेटी अपने लिए पराई होती चली जा रही थी.

विनय से कहती तो वह कहते, “क्यों चिंता करती हो, यह उम्र ही ऐसी है. इस समय शरीर में होनेवाले हार्मोनल परिवर्तन युवाओं के शरीर के साथ-साथ मानसिक स्थिति में भी परिवर्तन ला देते हैं. इसीलिए बाल्यावस्था और युवावस्था के मध्य के इस काल को संक्रमणकाल भी कहा जाता है. इस उम्र में ज़्यादा टोका-टोकी करने पर बच्चों को अपने ही माता-पिता अपने दुश्मन नज़र आने लगते हैं, इसीलिए कहा गया है कि इस समय बच्चों के साथ माता-पिता का नहीं, बल्कि दोस्ताना व्यवहार करना चाहिए.”

“मैं तो उससे मित्रवत् व्यवहार ही करना चाहती हूं, पर वह कुछ कहे-सुने तब न. उसने तो घर को सराय बना रखा है. आने-जाने का कोई समय ही निश्‍चित नहीं है.” न जाने क्यों वह आवश्यकता से अधिक तिक्त हो चली थी.

“सब ठीक हो जाएगा, तुम चिंता मत करो.” कहकर विनय ने बातचीत का विषय बदल दिया था.

जबकि मेरा सोचना था कि बच्चों को पैसे के महत्व का भी पता होना चाहिए. उनकी उतनी ही इच्छाएं पूरी करनी चाहिए जितनी आवश्यक हों.

इसी बात पर मेरी अक्सर दिव्या से बहस हो जाती.

एक ऐसे ही दिन आने में देर होने पर उसने उस मित्र के घर फ़ोन कर उसके बारे में पता करना चाहा तो पता चला कि वह तो काफ़ी पहले निकल चुकी है. उस दिन मन बहुत ही अशांत रहा. बाहर बरामदे में बैठी उसका इंतज़ार कर ही रही थी कि उसकी स्कूटी गेट पर रुकी, साथ ही दूसरे स्कूटर पर कोई लड़का उसे बाय कहता हुआ निकल गया.

पूछने पर चिढ़कर बोली, “हां मेरा दोस्त था.”

समझ में नहीं आ रहा था क्या करूं…? कहां तो मैं उसकी मित्र बनकर उसे पालना चाहती थी, पर अब जब भी कुछ कहती तो सीधा बोल देती, “ममा, आप तो मेरी जासूसी करती रहती हो. क्या आपको मुझ पर विश्‍वास नहीं है?”

“तुझ पर तो विश्‍वास है बेटा, पर दुनियावालों पर नहीं है.”

“ऐसा वही लोग बोलते हैं, जिन्हें स्वयं पर विश्‍वास नहीं होता.”

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“अति आत्मविश्‍वास वाले ही धोखा खाते हैं. हो सकता है जिसे तू अपना मित्र समझ रही है, वही तुझे धोखा दे दें.” उसने उसे समझाना चाहा.

“ममा, अगर ऐसा है तो किसी को दोस्त ही न बनाया जाए, क्यों?” आश्‍चर्य चकित मुद्रा में उसने पूछा.

“मैं तो तुझे ऊंच-नीच समझा रही थी. स्त्री की दौलत उसका चरित्र ही है. अगर वही नहीं रहा तो मान-सम्मान, धन-दौलत सब व्यर्थ है.”

पर वह तो कब की जा चुकी थी. सच एक लड़की की मां होना कांटों का ताज पहनने के बराबर है. ख़ासतौर से तब, जब लड़की सुंदर हो, नादान हो और जवानी की ओर क़दम बढ़ा रही हो. कितनी ही शंकाएं, कितने ही संदेह मन को घेरे रहते हैं. उस पर भी यदि वह बच्ची मां की परेशानी को समझ नहीं पाए. उसे रूढ़िवादी, परम्परावादी इत्यादि अनेक अलंकरणों से युक्त कर सदैव कटघरे में खड़ा कर अपमानित करे तो बेचारी मां अंत:कवच में सिमटने के अतिरिक्त कर भी क्या सकती है.

परेशानी तो उसे तब होती थी जब वह दिव्या को पढ़ने की बजाय सजने-संवरने में ज़्यादा ध्यान देते हुए देखती. विनय से कहती तो उनका वही रटा-रटाया जवाब होता, “तुम व्यर्थ परेशान हो रही हो, यह उम्र ही ऐसी है. कुछ दिनों बाद सब ठीक हो जाएगा.” एक दिन वह शॉपिंग करके लौट रही थी कि देखा दिव्या किसी के साथ बाइक पर बैठी जा रही है.

अपना स्कूटर होते हुए भी भला वह दूसरे के स्कूटर पर कहां जा रही है? इस समय तो उसका क्लास होना चाहिए, फिर यह बाहर कहां घूम रही है? सोचते हुए उसने ऑटोवाले से उनका पीछा करने के लिए कहा, पर जब तक ऑटो मुड़ता तब तक वे आंखों से ओझल हो गए. मन मारकर घर लौट आई.

– सुधा आदेश

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कहानी- काठ की गुड़िया 3 (Story Series- Kath Ki Gudiya 3)

मैं ख़ामोश बैठी रही. कहती भी क्या? न स्वागत में कुछ कहने को मन किया, न ही कुशलक्षेम पूछने की ज़रूरत. सच कहा गया है कि प्रेम की असली त्रासदी यह नहीं कि प्रेमीजन बिछड़ जाते हैं, अपितु असली त्रासदी यह है कि प्रेमी युगल साथ रहते हुए भी उनका आपसी प्यार ख़त्म हो जाता है. एक दिन यही शख़्स मेरे सामने प्रणय निवेदन लेकर खड़ा था और मैं भी कैसी बावरी ही हो गई थी उसके प्यार में. आज उसे देख न मन मचला है, न ही दिल की धड़कन बेकाबू हुई है. एक बार नज़र भर देख लेने की भी इच्छा नहीं हुई इस स्वार्थी शख़्स को. एक अजब-सी विरक्ति भर चुकी है मन में.

मेरा आत्मसम्मान जाग चुका था. मैं अब विवश और असहाय, आर्थिक और सामाजिक रूप से पति पर आश्रित नहीं रह गई थी.

बहुत देर से बाहर घंटी बज रही थी. कमलाबाई किसी काम में व्यस्त थी, इसलिए मैंने ही जाकर दरवाज़ा खोला. सामने देवव्रत खड़े थे. सोच रही थी कि भीतर आने को कहूं अथवा नहीं कि वह स्वयं चलकर भीतर आ बैठे. थके-हारे से. बेव़क्त बुढ़ा गए थे. चेहरे पर स़िर्फ उम्र ही अपने निशान नहीं छोड़ती, किस भांति जिया गया जीवन इसका निचोड़ भी अंकित हो जाता है चेहरे पर.

मैं ख़ामोश बैठी रही. कहती भी क्या? न स्वागत में कुछ कहने को मन किया, न ही कुशलक्षेम पूछने की ज़रूरत. सच कहा गया है कि प्रेम की असली त्रासदी यह नहीं कि प्रेमीजन बिछड़ जाते हैं, अपितु असली त्रासदी यह है कि प्रेमी युगल साथ रहते हुए भी उनका आपसी प्यार ख़त्म हो जाता है. एक दिन यही शख़्स मेरे सामने प्रणय निवेदन लेकर खड़ा था और मैं भी कैसी बावरी ही हो गई थी उसके प्यार में. आज उसे देख न मन मचला है, न ही दिल की धड़कन बेकाबू हुई है. एक बार नज़र भर देख लेने की भी इच्छा नहीं हुई इस स्वार्थी शख़्स को. एक अजब-सी विरक्ति भर चुकी है मन में. असहज हो उठे उस मौन को तोड़ते हुए देव ने ही बात शुरू की है, “मैं तुम दोनों को लिवाने आया हूं.”

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“क्यों?” मेरे मुंह से बेसाख़्ता निकला.

“उम्र के इस पड़ाव पर हम दोनों को ही एक-दूसरे की ज़रूरत है इला…”

बहुत कुछ कहना चाहा मैंने, मसलन- ‘ज़रूरत तो मुझे तब भी थी देव और देखा जाए, तो कुछ अधिक ही थी. यूं भी हमारे समाज में स्त्री को हर उम्र में पुरुष रूपी कवच की ज़रूरत रहती ही है. तब आपने यह क्यों नहीं सोचा? मेरे लिए न सही अपनी बेटी के लिए ही सोचा होता. परंतु पंद्रह वर्ष पूर्व यह सब सुनने का इनमें धैर्य नहीं था और आज कहने का कुछ लाभ नहीं.’ मैंने बस इतना ही कहा, “मुझे आपकी ज़रूरत तब थी, क्योंकि मैंने स्वयं को आप पर निर्भर बना रखा था, पर आज नहीं है. इतने वर्षों के संघर्ष ने मुझे इतना मज़बूत तो बना ही दिया है कि मैं पुरुष के सहारे बिना जी सकूं.”

इस बीच पारुल भी वहां आ बैठी थी. देव ने आशापूर्ण निगाह उस पर डाली, जिसका मतलब समझ पारुल ने स्वयं ही कहा, “मां की बात तो आप सुन ही चुके हैं. अब रही मेरी बात, तो मुझे आपकी वह कोठी नहीं चाहिए. जब मुझे उस घर की सुरक्षा की ज़रूरत थी, तब तो वह मुझे मिली नहीं और आज मुझे उसकी ज़रूरत नहीं है. मां को बेटी पैदा करने की सज़ा दी थी आपने. बहुत ़िज़ल्लत व कष्ट झेलने पड़े थे मां को इस अपराध के लिए, पर अब मैं बड़ी हो गई हूं. यथासंभव प्रयत्न करूंगी कि मां का शेष जीवन सुखमय बीते. इस तरफ़ से आपको चिंता करने की बिल्कुल ज़रूरत नहीं और अपने लायक घर भी बनवा ही लूंगी, इतना सामर्थ्य है मुझमें. अब रही बात आपकी, यदि आपको अपने बेटे पर भरोसा न हो, यदि वह आपकी देखभाल करने में सक्षम न हो, तो मुझे बताइएगा. बेटी हूं तो क्या, मैं करूंगी आपकी देखभाल की व्यवस्था. मानवता के नाते हम अजनबियों की देखभाल भी तो करते ही हैं न!”

“अपने किए की सज़ा भुगत रहा हूं आज. क्या तुम मुझे माफ़ नहीं करोगी?” देवव्रत ने एक बार फिर एक दयनीय दृष्टि मुझ पर डाली, पर वह मेरा मन नहीं पिघला सकी.

“इंसान अपनी ग़लती मान ले, तो अवश्य वह माफ़ी का अधिकारी है, लेकिन मैं यह जानती हूं कि तुम जो आज मेरे द्वार पर आए हो, तो इसलिए नहीं कि मेरे लिए तुम्हारा प्रेम जगा है या कि तुम्हें अपने किए पर पछतावा है, बल्कि अपना बिखरा घर संभालने के लिए आज तुम्हें मेरी ज़रूरत आन पड़ी है. प्यार तो तुम स़िर्फ अपने से ही करते हो बस. पर मैं भी कोई काठ की गुड़िया नहीं, जिससे जब चाहा खेल लिया, जब चाहा उठाकर ताक पर रख दिया.

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तुम यह अपेक्षा करते हो कि बीच के इतने वर्ष जब मैं अकेली जूझती रही, वह सब रातें, जो मैंने अपने और पारुल के भविष्य की चिंता में जाग कर गुज़ारी हैं, वे सब अपनी स्मृति से पोंछ दूं, तो चलो मैं यह भी प्रयत्न कर सकती हूं, लेकिन मुझे एक बात का सही उत्तर दो. यदि मैं तुम्हारा त्याग कर किसी और के साथ रहने लगती, तो तुम मुझे माफ़ कर देते क्या?”

उत्तर इतना स्पष्ट था कि मौन रहने को विवश हो गए देवव्रत.

usha vadhava

     उषा वधवा

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कहानी- काठ की गुड़िया 2 (Story Series- Kath Ki Gudiya 2)

समय यदि भाग नहीं रहा था, तो भी आगे तो खिसक ही रहा था और एक दिन पारुल ने अपनी पढ़ाई भी पूरी कर ली और नौकरी करने लगी. घर भी हमने बड़ा ले लिया था. पारुल चाहती थी कि अब मैं काम बंदकर आराम करूं, पर अब तक मेरा काम काफ़ी फैल चुका था, उसमें अनेक महिलाओं को रोज़गार मिला हुआ था. काम बंद करने से वह सब बेरोज़गार हो जातीं.

पारुल को खिला-पिलाकर मैं कमरे में परेशान बैठी थी. सबसे बड़ी चिंता तो मुझे अपनी नन्हीं-सी बिटिया की थी. कितने नाज़ों से पाला था मैंने इसे. हरदम गुड़िया की तरह सजाकर रखती. नित नए डिज़ाइन्स के कपड़े बनाती. फ्रॉकों पर तो क्या, उसकी बनियानों पर भी कढ़ाई करती. उसी के भविष्य को लेकर परेशान थी मैं. अभी तो नासमझ है. समझने लगेगी, तो कैसी हीनभावना से ग्रस्त हो जाएगी वह. लड़की होने का दंड मिला था उसे व उसकी मां को. लेकिन लड़की होना अपराध क्यों है? कैसे समझा पाऊंगी उसे यह बात? बेटों से यदि वंश चलता है, तो यह परंपरा, तो हमारे समाज की स्वयं की बनाई हुई है न? काश! मैं इस क़ाबिल होती कि अपनी बेटी को इस माहौल से कहीं दूर ले जाकर स्वयं उसकी परवरिश कर सकती.
अवसाद से घिरी बैठी थी कि किवाड़ खटका और कुछ पल बाद मिताली मेरे सामने थी. मेरी पहली प्रतिक्रिया तो उससे मुख मोड़ लेने की हुई, पर उसके चेहरे के भाव ने मेरा निश्‍चय डिगा दिया. मेरी हमउम्र है वह. मृदुभाषी और सीधी लीक पर चलनेवाली. लेकिन आज मैंने उसका आत्मविश्‍वास से भरा एक नया रूप ही देखा. सबसे पहले तो वह थाली में भोजन परोस लाई और आग्रहपूर्वक मुझे खिलाने लगी. स्नेहसिक्त इस धमकी के साथ कि यदि मैं नहीं खाऊंगी, तो वह भी भूखी रहेगी. बोली, “पारुल को पालने की पूरी ज़िम्मेदारी अब तुम्हारे कंधों पर है, पर यह मत सोचना कि तुम अकेली हो. मैं दूंगी तुम्हारा साथ.”
मिताली मुझे उस घुटन से निकालकर अपने साथ मेरठ ले आई और अपने घर के पास ही एक कमरा किराए पर दिलवा दिया. नौकरी करने लायक तो कोई डिग्री थी नहीं मेरे पास, सो अपने पैरों पर खड़ा होने के लिए कोई अन्य उपाय सोचना था. मैंने अपने शौक़ को ही अपनी आमदनी का ज़रिया बनाना तय किया. इसमें बहुत अधिक निवेश की भी ज़रूरत नहीं थी. एक सिलाई की मशीन ख़रीद मैंने अपना काम शुरू कर दिया. मिताली ने अपने परिचितों से कहकर शुरू में कुछ काम भी दिलवा दिया. मैंने स्वयं को अपने पुराने जीवन से बिल्कुल काट दिया, उन यादों को भी पास न फटकने दिया और स्वयं को काम में डुबो दिया. रात देर तक लगी रहती. दिन में कमरा सिलाई के काम आता और लोगों का आना-जाना लगा रहता. रात को सब कुछ किनारे कर हम मां-बेटी वहीं सो जातीं.
धीरे-धीरे कई स्थायी ग्राहक बन गए और सहायता के लिए मुझे अन्य कारीगरों को लगाना पड़ा.

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मिताली ने न स़िर्फ मेरी आर्थिक सहायता की थी, बल्कि मेरा मनोबल भी बढ़ाए रखा था. पैसा तो मैंने बाद में लौटा भी दिया, पर उसके एहसान किसी भी तरह लौटा नहीं पाऊंगी. सोचती हूं इसी तरह यदि सब स्त्रियां एक-दूसरे की सहायता करें, तो स्त्रियों की अनेक समस्याएं हल हो जाएं. मिताली ने भी अपने प्रयत्नों से पारुल को अच्छे स्कूल में भर्ती करवा दिया. मैंने निश्‍चय कर रखा था कि पारुल को अपने पैरों पर खड़ा होने में सक्षम बनाऊंगी, ताकि उसे किसी पुरुष पर पूर्ण रूप से आश्रित न होना पड़े. एकदम परिवर्तित रूप से ही सही, जीवन एक बार फिर ढर्रे पर चल पड़ा था. समय यदि भाग नहीं रहा था, तो भी आगे तो खिसक ही रहा था और एक दिन पारुल ने अपनी पढ़ाई भी पूरी कर ली और नौकरी करने लगी. घर भी हमने बड़ा ले लिया था. पारुल चाहती थी कि अब मैं काम बंदकर आराम करूं, पर अब तक मेरा काम काफ़ी फैल चुका था, उसमें अनेक महिलाओं को रोज़गार मिला हुआ था. काम बंद करने से वह सब बेरोज़गार हो जातीं.
दूसरे विवाह से देवव्रत को बेटा तो मिल गया और कुछ वर्ष मौज-मस्ती में भी बीते, पर बेटा जब लगभग बारह वर्ष का हुआ, तो उसकी मां समीरा को गर्भाशय का कैंसर हो गया. ऑपरेशन हुआ और वर्षों इलाज भी चलता रहा, लेकिन तब तक बीमारी काफ़ी फैल चुकी थी और उस पर विजय पाना डॉक्टरों के बस में न रहा. और समीरा देवव्रत का साथ छोड़ गई. बेटा तो पहले ही अधिक लाड़-प्यार में बिगड़ चुका था, अब तो उसे देखनेवाला भी कोई न था. कुछ बिगड़ैल क़िस्म के लड़कों के साथ उसकी दोस्ती हो गई थी, जिनका एकमात्र शग़ल धन उड़ाना ही था. देव उस पर नियंत्रण नहीं रख पा रहे थे, तो मिताली के ज़रिए मुझ तक संदेशे भिजवाने शुरू किए. वे चाहते थे कि मैं आकर घर संभाल लूं और उनके बेटे को भी. यह भी इशारा किया कि वह अपनी कोठी पारुल के नाम कर देंगे.

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मिताली अपने भाई का संदेशा अवश्य मुझ तक पहुंचा देती, पर निर्णय सदैव उसने मुझ पर ही छोड़ा.
देव को शायद लगता था कि मैं उनका निमंत्रण पा फ़ौरन लौट आऊंगी. तलाक़ की क़ानूनी कार्रवाई तो कभी हुई नहीं थी, सो वह शायद अब तक मुझ पर अपना अधिकार समझते थे. भूल गए थे कि जिसे उन्होंने मात्र अपनी कठपुतली समझ रखा था, उसकी डोर उनके हाथों से कब की छूट चुकी है. मैं उस घर में लौटने को कतई तैयार नहीं थी, जहां से एक दिन अपमानित होकर निकली थी.

 

usha vadhava

     उषा वधवा

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कहानी- काठ की गुड़िया 1 (Story Series- Kath Ki Gudiya 1)

कितना अस्थिर हो सकता है मानव मन! एक दिन यही देवव्रत मेरे प्यार में इतने बावले थे कि मुझे अपनी पढ़ाई भी पूरी नहीं करने दी. एक संबंधी के घर विवाह में देव ने मुझे देखा, तो अपने अभिभावकों को हमारे घर मेरा रिश्ता मांगने ही भेज दिया. मैं तब बीए के अंतिम वर्ष में थी. पापा कहते थे कि मेरे पास अपने पैरों पर खड़ा होने लायक डिग्री अवश्य होनी चाहिए. वह भी नहीं तो कम से कम मैं अपना बीए तो पूरा कर ही लूं, लेकिन देव उतना भी रुकने को तैयार नहीं थे.

साक्षात भूकंप का अनुभव किया है अभी? कहते हैं, जब भूकंप आता है, तब धरती कांपती है, इमारतें टूटती हैं और बस्तियां की बस्तियां वीरान हो जाती हैं. मेरे निजी जीवन में भी ऐसा भूकंप आया था, जिसमें मेरा घर उजड़ा था, मन टूटा था और सपने तहस-नहस हो गए थे, लेकिन चारों ओर पूर्ववत् शांति बनी रही. आसपास किसी को न तो कुछ दिखाई दिया और न उन्होंने कोई आवाज़ ही सुनी.
एक बात और- भूकंप के गुज़र जाने के पश्‍चात् कई हाथ सहायतार्थ आगे बढ़ आते हैं, जबकि मैं तो नितांत अकेली खड़ी रह गई थी- अतीत के खंडहरों पर.सात वर्ष के ख़ुशहाल विवाह के बाद देवव्रत ने अचानक ऐलान कर दिया कि वह दूसरा विवाह कर रहे हैं. यूं उन्हें मुझसे कोई शिकायत नहीं थी, उन्हें एक बेटा चाहिए था बस. और पांच वर्ष पूर्व पारुल के जन्म के समय डॉक्टर ने आगाह कर दिया था कि मैं अब दोबारा मां नहीं बन पाऊंगी. अभी तक तो मजबूरन ख़ामोश रहे देव, पर अब उन्हें अपनी एक पुरानी सहपाठिन मिल गई थी- समीरा, जिसने अपना करियर बनाने के जुनून में अब तक विवाह नहीं किया था और अब करना चाहती थी.
कितना अस्थिर हो सकता है मानव मन! एक दिन यही देवव्रत मेरे प्यार में इतने बावले थे कि मुझे अपनी पढ़ाई भी पूरी नहीं करने दी. एक संबंधी के घर विवाह में देव ने मुझे देखा, तो अपने अभिभावकों को हमारे घर मेरा रिश्ता मांगने ही भेज दिया. मैं तब बीए के अंतिम वर्ष में थी. पापा कहते थे कि मेरे पास अपने पैरों पर खड़ा होने लायक डिग्री अवश्य होनी चाहिए. वह भी नहीं तो कम से कम मैं अपना बीए तो पूरा कर ही लूं, लेकिन देव उतना भी रुकने को तैयार नहीं थे.
“मेरा अपना कारोबार है, मुझे कौन-सा इससे नौकरी करवानी है, जो डिग्री की आवश्यकता पड़े.” उनका तर्क था. मैं भी तो बह गई थी उनके प्यार में. ऐसा तो मैंने अब तक कहानियों में ही प़ढ़ा था और रजत पटल पर ही देखा था. वही सब अब मेरे जीवन में घट रहा था और मैं उस बयार में बिना पंख उड़ने लगी थी.

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दुल्हन बन इस घर में आई, तो प्रिय का ढेर सारा अनुराग मिला मुझे. वह सब झूठ था क्या? बस, इतनी-सी ही होती है प्यार की वास्तविक उम्र? हम इन्हीं रिश्तों को जन्म-जन्मांतर तक निभाने की बात करते हैं! प्यार में पूर्ण समर्पण ही करती है स्त्री. बिना संदेह, बिना किसी प्रश्‍न के तन से, मन से और यदि संभव हो, तो शायद आत्मा से भी. मेरी जगह यदि देव होते तो? वही किसी कारणवश पिता बनने में अक्षम हो गए होते, तो क्या मैं उन्हें छोड़ जाती? कदापि नहीं. मेरे मन में तो शायद उनके प्रति क्रोध भी न उपजता और कितनी निष्ठुरता से मुंह मोड़ लिया था देव ने!
यूं तो पुरुष चाहता है कि स्त्री कोमलांगी छुईमुई-सी केवल उसी को समर्पित रहे, पर वह जब चाहे उसे सड़क पर खड़ा कर सकता है- अकेली और असहाय!
निष्ठा और प्रतिबद्धता क्या स़िर्फ स्त्रियों के लिए ही होती है?
मेरे भीतर सवालों का एक बवंडर उमड़ रहा था.
अपने ऊंचे सिंहासन पर बैठ देव ने इतनी कृपा अवश्य की थी कि मुझे घर छोड़ने को नहीं कहा था. मैं और पारुल ऊपर की मंज़िल पर शिफ्ट कर दिए गए थे. दूसरे ही दिन देवव्रत मंदिर में समीरा को ब्याह घर भी ले आए. पत्थर के देवता सब देखते रहे और मुस्कुराते रहे. मंदिर के पुजारी, जो मुझे अच्छी तरह से पहचानते थे, उन्होंने भी कोई आपत्ति नहीं की फेरे डलवाने में. अपने धनी यजमान को नाख़ुश कैसे कर देते?
बड़ा-सा घर था हमारा और बीच में चौक. सो नीचे की गतिविधियां ऊपर दिखाई देती थीं. क्या लगता था देव को? मैं कोई काठ की गुड़िया हूं कि उन्हें किसी अन्य स्त्री के साथ देख बुरा नहीं लगेगा मुझे? अपमानित महसूस नहीं करूंगी मैं? क़ानूनन तो मैं देव पर दूसरा विवाह करने पर मुक़दमा भी चला सकती थी, पर न तो मुझमें इतना मनोबल था, न ही धन. अपनी रोज़ाना की ज़रूरतों के लिए भी मैं व पारुल उन्हीं पर निर्भर थे और यह कटु सत्य जानते थे देवव्रत.
कहते हैं कि जब हमारे लिए कोई किवाड़ बंद कर दिया जाता है, तो कहीं न कहीं कोई खिड़की अवश्य खुल जाती है. मेरे लिए तो बहुत अनपेक्षित जगह पर खुली थी यह खिड़की.

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देवव्रत ने शायद मेरठ रहती अपनी मां एवं विवाहिता छोटी बहन मिताली को अपने नए विवाह की ख़बर कर दी थी. अगले दिन सुबह ही मैंने देव के साथ उन दोनों को नीचे आंगन में चाय पीते देखा. मां तो बहुत प्रसन्न लग रही थीं. उनकी बरसों से पोता पाने की संभावना जो बन गई थी. पोते के बिना उनका वंश कैसे चलेगा और श्राद्ध कौन करेगा? इस बात की उन्हें सदैव चिंता रहती थी, जो क्रोध बनकर अक्सर मुझ पर निकलती थी. मिताली अपने बड़े भाई का बहुत सम्मान करती थी. बचपन में ही अपने पिता को खो देने से उन्हें पितृतुल्य ही मानती थी. मैंने उसे कभी भाई के साथ ऊंची आवाज़ में बात करते नहीं सुना था. किंतु आज बातें समझ न आने पर भी उसकी भाई के साथ विवाद करने की आवाज़ स्पष्ट आ रही थी.

 

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      उषा वधवा

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कहानी- हस्तक्षेप 3 (Story Series- Hastakshep 3)

प्रमोद ने मुझे अपने बाहुपाश में बांध लिया और मैं भी उनकी बाहों में सिमटती चली गई. आंखों में ख़ुशी के आंसू लिए यह सोचने लगी कि यह कौन-सा रिश्ता था, जो मुझे अपने मां-पिताजी और भाई के रिश्ते से कहीं अधिक मज़बूत और आत्मीय लग रहा था.

“तो मैं भी अब और सहन नहीं करूंगी. आप हठधर्मिता दिखाओगे तो किसके पास जाऊंगी? वे मुझे अपने प्राणों से अधिक चाहते हैं. वो आएंगे भी और आपकी करतूतों को रोकेंगे भी. आपके लिए मैंने सब कुछ छोड़ दिया और अब आप मुझे…”

मैं तकिये पर औंधा सिर रखकर रोने लगी.

“अब नौटंकी शुरू कर दी.” इन शब्दों ने मेरे आंसुओं की धार और तेज़ कर दी. सारी रात रोती रही. दूसरे दिन मैं मायके आ गई थी. कुछ दिनों बाद प्रमोद भी अपने परिजनों के पास चले गए थे. यह मुझे एक परिचित से पता चला.

मैं मम्मी-पापा के घर से बस से जाकर नौकरी करने लगी, लेकिन यहां कुछ ही दिनों में अपनापन खोने-सा लगा. पापा, भइया और भाभी तीनों नौकरी करते थे. सुबह चले जाते, शाम को लौटते. बच्चों को मम्मी और नौकरानी संभालती थी. एक दिन भाभी काम से लौटीं, तो नौकरानी पर बरस पड़ीं, “क्या हाल बना रखा है बच्चों का. ठीक से देखभाल नहीं कर रही हो. अगर दो की जगह तीन बच्चे हो गए हैं, तो पापा से कुछ पैसे बढ़वा लो, लेकिन लापरवाही मत बरतो, समझीं. और मीना, तुम भी तो काम कर सकती हो, थोड़ा तो सहयोग तुम्हें भी देना चाहिए.” मैं चुप रही.

मैं भाभी के बदलते व्यवहार को देख हतप्रभ थी. एक दिन जब भइया घर आए, तो उनके हाथ में लटकी पारदर्शी थैली में आम देखकर कृष्णा ज़िद करने लगा. भइया ने थैली मेरी तरफ़ बढ़ाई, तो बीच में ही भाभी ने ले ली. एक छोटा आम देते हुए बोलीं, “कई दिनों से बच्चे कह रहे थे, उनके लिए तो ये भी कम पड़ेंगे. मीना, तुम भी तो बाहर जाती हो, कभी-कभार कुछ चीज़ें ले आया करो.” उनकी बात से उतना दुख नहीं हुआ, जितना भइया के चुप रह जाने से हुआ. न जाने क्यों प्रमोद का चेहरा मेरी आंखों में तैर गया. घर में सबके अपने-अपने कमरे थे. मेरे लिए अम्मा-बाबूजी के कमरे के पास स्टोर को खाली कर जगह बनाई गई थी.

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शुरू में तो सब ठीक था, लेकिन कुछ दिनों बाद ही ख़र्चे में खींचातानी होने लगी. सीधे मुंह तो नहीं, लेकिन गाहे-बगाहे भाभी ने ऐसी स्थिति पैदा कर दी कि घर में व्यय और मिल-जुलकर काम करना संभव नहीं रह गया. मैंने बिना किसी हील-हुज्जत के अपने कमरे और उसके सामने कॉमन बरामदे में अपने जीवनयापन की व्यवस्था कर ली. जिस घर में मैं पदा हुई, पली-बढ़ी, उसी में बेगानी खानाबदोश-सी ज़िंदगी हो गई थी मेरी. अपनेपन के सारे रिश्ते न जाने कहां तिरोहित हो गए. कहां खो गया मेरा अपना घरौंदा, जहां तक़रार और रूठने-मनाने में भी आनंद आता था.

शनिवार को हाफ डे था, इसलिए मैं दोपहर में ही स्कूल से आ गई. कल रविवार है और उसके अगले दिन तीज का पर्व. घर में घुसी, तो वही उदासीन माहौल. भइया-भाभी पकवान बनाने में जुटे थे. तीज की तैयारियां चल रही थीं. मुझे पूछा तक नहीं. अपना बैग स्टूल पर रखकर, कमरे में जाकर सो रहे कृष्णा के पास बेड पर औंधी लेट गई. थोड़ी देर में प्रमोद की स्मृतियां सताने लगीं. मेरी आंखों से आंसू निकलकर तकिये को भिगोने लगे. सो रहे कृष्णा का चेहरा देखा, लगा जैसे प्रमोद लेटे हैं. अचानक मैंने एक दृढ़ संकल्प लिया. उठकर हाथ-मुंह धोया और ज़रूरी सामान बैग में रखने लगी.

“कहीं जाना है?” बरामदे में आकर मम्मी ने पूछा.

“हूं. सोच रही हूं अपना घर संभालूं.”

“वहां अकेले रहोगी? परेशानी होगी तुम्हें.” मम्मी ने कहा. उनके स्वर में अब वह खनक नहीं थी, जिसके सहारे उन्होंने मुझे अपना घरौंदा छोड़ यहां आने को कहा था.

“मम्मी, खाली घर भूतों का डेरा बन जाता है, हवा-धूप मिलती नहीं. सीलन और बदबू से जर्जर होने लगता है. दो दिन की छुट्टी है, सोचा थोड़ा संभाल आऊं.”

“कृष्णा भी जाएगा?”

“मेरे बिना कैसे रहेगा. सबको परेशान करके रख देगा.” मैं जानती थी कि जब अपनी लाडली से कुछ ही दिनों में सब उकता गए, तो कृष्णा तो उनके लिए एक बोझ ही बनता. मम्मी के साथ हो रही बातचीत भइया-भाभी भी सुन रहे थे. “अपना ख़्याल रखना बेटा!” भइया ने भाभी की उपस्थिति से डरते-डरते इतना ही कहा. मुझसे नज़रें न मिलें, इसलिए भाभी कृत्रिम व्यस्तता में रमी रहीं. जाने की कुछ ख़ास तैयारी नहीं करनी थी. असली तैयारी तो करनी थी मन को और वह इस कैद से उड़ने को तैयार बैठा था.

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जब मैं अपने घर के पास पहुंची, तो शाम घिर आई थी. रिक्शा छोड़ आगे बढ़ी, तो अचंभित हो उठी. घर का बाहरी हिस्सा साफ़-सुथरा था. कमरों की लाइटें भी जल रही थीं. बाहरी दरवाज़े पर ताला पड़ा था. इसका मतलब कोई यहां रह रहा था. कोई क्यों, प्रमोद रह रहे होंगे. दूसरी चाबी तो उन्हीं के पास थी. फिलहाल किसी काम से बाहर गए होंगे. अपनी चाबी से ताला खोलकर मैं जब अंदर गई, तो घर की सुंदर व्यवस्था को देखती ही रह गई. बेडरूम में साइड में रखे तिकोने स्टूल पर कृष्णा के साथ प्रमोद और मेरा क़रीब दो वर्ष पहले खिंचा वह फोटो सलीके से रखा था, जिसे मेरे घर छोड़कर जाने से पहले हुए विवाद के दौरान प्रमोद ने क्रोध में सोफे पर फेंक दिया था और मैंने भी उसे उठाना गंवारा नहीं समझा था.

सोते कृष्णा को बेड पर लिटाकर मैं भी उसी के बराबर लेट गई. लगा जैसे घर की दरों-दीवारें मेरे आने से खिल उठी हों और मुझे अपने आलिंगन में लेने को आतुर हों. कितना अंतर था, मायके के घनिष्ठ संबंधी कितने अजनबी थे और इस घर की हर चीज़ में जैसे आत्मीयता बसी हो. आह्लाद के अतिरेक से आंखों में आए पानी में बहुत-सी सुखद यादें तैर गई. तभी कॉलबेल ने मुझे चौंका दिया. दरवाज़ा खोला, तो आशानुरूप प्रमोद थे. क़रीब चार महीने के बाद हम दोनों ने एक-दूसरे को देखा था. हम दोनों ही कुछ क्षण एक-दूसरे को देखते रह गए.

“मुझे विश्‍वास था कि जिस तरह मैं अपने घर वापस आ गया हूं, उसी तरह तुम भी अपने घर ज़रूर लौटोगी, इसीलिए पूरे घर को सजाकर तुम्हारा इंतज़ार कर रहा था.” प्रमोद ने मुझे अपने बाहुपाश में बांध लिया और मैं भी उनकी बाहों में सिमटती चली गई. आंखों में ख़ुशी के आंसू लिए यह सोचने लगी कि यह कौन-सा रिश्ता था, जो मुझे अपने मां-पिताजी और भाई के रिश्ते से कहीं अधिक मज़बूत और आत्मीय लग रहा था.

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असलम कोहरा

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कहानी- हस्तक्षेप 2 (Story Series- Hastakshep 2)

मैं, मीना अभी अपने पति प्रमोद का घर छोड़कर तीन साल के बेटे कृष्णा के साथ मायके आई हूं. शादी के बाद रोज़-रोज़ की कलह से तो यह होना ही था. आज सुबह विवाद की पराकाष्ठा से तंग आकर जब मैंने फोन पर मम्मी-पापा को बताया, तो उन्होंने तुरंत घर आने को कहा, “छोड़ ऐसे आदमी को. हमने तो पहले ही समझाया था बेटा. तू यहां आ जा, अपने आप अकल ठिकाने आ जाएगी.”

बड़े से पुश्तैनी घर में थे, तो तीन परिवार- अम्मा-बाबूजी, बड़े भइया और उनसे छोटे भइया, लेकिन तक़रीबन मिला-जुला-सा परिवेश था. एक तरह से अर्द्ध संयुक्त परिवार था. सब मेरे लिए आंखें बिछाए बैठे थे.

कुछ दिनों बाद दशहरा और दीवाली की छुट्टियां भी पड़ गई थीं. बड़ी जीजी अपने तीनों बच्चों के साथ आ गई थीं. मुझे लगा कि मैं मरुस्थल से हरितिमा में आ गया हूं. सब मुझे अक्सर बहलाते रहते, “अच्छा किया जो यहां आ गया. ऐसी पत्नी मिली है कि इसकी तक़दीर ही फूट गई. अब यहां मौज से रह.” मैं इतनी आत्मीयता पाकर आत्मविभोर हो उठा, लेकिन मुझे क्या पता था कि यहां की उपजाऊ ज़मीन कुछ ही दिनों में बंजर होनेवाली है. धीरे-धीरे सब अपने-अपने कामों में व्यस्त हो गए. छुट्टियां शेष बचने के बावजूद जीजी ने कहना शुरू कर दिया, “अम्मा, मुझे जाने दो, वह पता नहीं कैसे रह रहे होंगे. बच्चों के बिना तो एक पल नहीं रह पाते…” आदि-आदि. सबके आग्रह को अनदेखा करके वह चली गईं.

बड़े और छोटे भइया भी अपने परिवारों के रूटीन में रम गए. ऑफिस से आते, तो सीधे भाभी और बच्चों के पास चले जाते. बच्चों को झूले या ट्राइसाइकिल पर बैठाकर जब तक बहला नहीं लेते, वे पीछा ही नहीं छोड़ते. ऐसा देख मुझे कृष्णा की याद सताने लगती. मैं अक्सर भाइयों, भाभियों और बच्चों के बीच हंसी-ठिठोलियां देखता, लेकिन उनमें शामिल भी तो नहीं हो सकता था. उनके नितांत व्यक्तिगत आनंद में दख़ल देना ठीक भी तो नहीं. ऑफिस से आता, तो बरामदे पर पड़ी खटिया पर बैठ जाता. बड़ी और मंझली भाभी तभी खाना-पीना करतीं, जब उनके पतियों की मर्ज़ी होती. मुझे जल्दी खाने की आदत थी, लेकिन भाभियां अपने पतियों को ताज़े फुलके खिलाने के लिए टाइम-बेटाइम खाना बनातीं. अम्मा-बाबूजी का परहेज़ी खाना वे पहले बनाकर उनके कमरे में पहुंचा देतीं, जिसे खाकर वे दोनों सो जाते. मैं घर में अम्मा-बाबूजी के बगलवाले कमरे में बेवजह लोटता-पोटता रहता.

क़रीब चार महीने हो गए हैं मुझे मीना से अलग हुए और अपना घर छोड़े हुए. एक माह पहले कॉलेज से अवकाश मिलने पर उस घर में गया, तो लगा कि खंडहर में आ गया हूं. फ़र्श पर धूल की मोटी परत, दीवारों पर उखड़ी पपड़ी, सीलन और बदबू. अम्मा-बाबूजी के बड़े घर में सबको अपने-अपने घरौंदों की चिंता थी. अम्मा-बाबूजी, बड़े भाई-भाभियां और बड़ी जीजी सभी अपना घर संवारने में लगे हैं. मेरा अपना घरौंदा कहां खो गया? यह प्रश्‍न मेरे अंतस को चीरने लगा है, पल-प्रतिपल खाए जा रहा है.

मैं, मीना अभी अपने पति प्रमोद का घर छोड़कर तीन साल के बेटे कृष्णा के साथ मायके आई हूं. शादी के बाद रोज़-रोज़ की कलह से तो यह होना ही था. आज सुबह विवाद की पराकाष्ठा से तंग आकर जब मैंने फोन पर मम्मी-पापा को बताया, तो उन्होंने तुरंत घर आने को कहा, “छोड़ ऐसे आदमी को. हमने तो पहले ही समझाया था बेटा. तू यहां आ जा, अपने आप अकल ठिकाने आ जाएगी.” मेरे घर पहुंचते ही भइया ने कृष्णा को गोद में ले लिया, “मेरा राजा बेटा है, मेरे साथ रहेगा.” भाभी भी उसके गाल चूमने लगीं. थोड़ी देर तक प्रमोद को सब कोसते रहे, “क्या हम अपनी बेटी को पाल नहीं सकते, क्या समझता है वह अपने आपको. ऐसी सीधी और होनहार लड़की मिल गई, तो दिमाग़ चढ़ गया…” आदि-आदि.

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माहौल शांत होने पर मैं चाय पीने के बाद छत पर चली गई. नीले आकाश में दो पक्षियों का जोड़ा उड़ रहा था. दोनों में कितना प्रेम था! शादी से पहले हम दोनों भी तो ऐसे ही थे. पक्षियों की साम्यता ने पल भर में मुझे वर्तमान से पीछे धकेल दिया.

उस दिन की ख़ुशी को मैं संभाल नहीं पा रही थी, जिस दिन तमाम विरोधों के बाद प्रमोद मुझे ब्याहने आए थे. मुझे याद आ रहा है, एक दिन जब हम दोनों कड़कड़ाती ठंड की रात में कॉलेज के एक प्राध्यापक के घर बच्चे की बर्थडे पार्टी में गए थे. लौटते समय एकांत में हम एक पुलिया की मुंडेर पर बैठ गए. ठिठुरता देख उन्होंने मुझे आलिंगन में बांध लिया, “इससे पहले कि ठंड तुम्हें जकड़ ले, मैं जकड़ लेता हूं.” मैं कसमसायी, तो आलिंगन और कसता चला गया. उस सुखद अनुभूति को मैं आज तक नहीं भूल सकी हूं.

हम आगे बढ़े, तो उन्होंने अपना ओवरकोट मुझे पहना दिया, “मैडम,

अमूल्य निधि हो तुम. कितने जन्म लिए होंगे, तब तुम्हें पाया है. तुम ख़ुश रहो, बस, यही चाहता हूं. मुझे कुछ हो जाए, कोई परवाह…” उनके शायराना शब्दों को बीच में ही मैंने हथेली से होंठों को दबाकर रोक दिया,

“आपको कुछ हो, उससे पहले मैं मर जाना चाहूंगी.” क्या दिन थे वो! घंटों नैनीताल की झील के किनारे पर खड़े होकर पेड़ों और पर्वतों को निहारना, कभी ठंडी सड़क पर धुंध में खो जाना, कभी भोवाली रोड पर कत्थई घास पर पेड़ों के नीचे बैठे रहना… और अब… कहां खो गया वो सब कुछ?

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मेरी समझ में नहीं आता कि विवाह के बाद क्या लड़की के परिवारवालों और संबंधियों से रिश्ता-नाता हमेशा के लिए समाप्त हो जाता है? क्या पति को यह अधिकार है कि वह अपनी पत्नी, बच्चों और घर को अपनी मिल्कीयत समझे और इस बात का निर्धारण करे कि पत्नी के परिजन आएंगे या नहीं? लेकिन प्रमोद ने यही सब तो चाहा है और किया भी है, नहीं तो मैं अपना बसा-बसाया घर छोड़कर मायके क्यों आती? आख़िर तानाशाही और तानों को भी कोई कब तक सहेगा? विवाह से पहले प्रमोद ने क्या-क्या वायदे नहीं किए थे. ‘तुम रानी बनकर रहोगी. दोनों परिवारों का कोई भी व्यक्ति हमारे प्यार के घरौंदे में घुसपैठ नहीं करेगा.’ लेकिन कुछ दिनों बाद ही इस समझौते से मुकर गए. वह अक्सर अपने परिवार के बीच जाने लगे और उनके घरवाले भी जब-तब हमारे परिवार में हस्तक्षेप करने लगे.

मजबूरी में मैंने उस दिन मम्मी-पापा और भइया-भाभी को बुला लिया. वह सुबह आए और शाम को चले गए. उन्होंने प्रमोद को काफ़ी समझाया भी, लेकिन उन्होंने उसका उल्टा मतलब निकाला. “अब तुम अपने घरवालों से मुझे प्रताड़ित कराओगी. मैं दबनेवाला नहीं हूं. घर का मालिक हूं.”

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असलम कोहरा

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कहानी- हस्तक्षेप 1 (Story Series- Hastakshep 1)

गाहे-बगाहे उसके मुंह से विरोध के स्वर फूटने लगे, “आख़िर कब तक चलेगा यह?”

“मेरे परिवार के लोग हैं, कोई ग़ैर नहीं. उनका अधिकार है मुझ पर.”

“लेकिन आपने तो कहा था कि उन लोगों से कोई वास्ता नहीं रहेगा. जब आपके घरवाले डेरा डालेंगे, तो मेरे घरवाले भी जब तक जी चाहेगा यहां रुकेंगे.”

“यह मेरा घर है. जिसे चाहूंगा, वही आएगा.”

“हिम्मत हो, तो रोककर देख लीजिए मेरे घरवालों को.” मीना ने जल्द ही इस धमकी को चरितार्थ भी कर दिखाया.

मैं, प्रमोद जब कॉलेज से घर लौटा, तो बाहरी दरवाज़े पर ताला पड़ा मिला. अंदर खाने की मेज़ पर कॉपी से फाड़े गए काग़ज़ पर लिखा था- ‘अब और सहन नहीं कर सकती, हमेशा के लिए अपने घर जा रही हूं. वो लोग पूरी उम्र मुझे और मेरे बच्चे को पाल लेंगे.’ कल जो विवाद हुआ था, उसी की परिणति थी यह. माना कि आज विवाद उग्र हो उठा था, लेकिन इसका यह मतलब तो नहीं कि अपना घर छोड़…

मीना के साथ शादी को 4 साल हो गए हैं. लव मैरिज की थी हमने, जिसे दोनों परिवारों ने स्वीकार नहीं किया था. हम दोनों नैनीताल में एम.एससी. में क्लासफेलो थे. जाति बंधन तोड़कर अनजाने ही एक-दूसरे के दिलों में जगह बनाई थी, घरवालों के तमाम विरोधों के बावजूद. मैं पिछड़ी जाति का था और मीना शुद्ध ब्राह्मण. मैं मानता हूं कि इस तरह से उसने मुझे पाने के लिए कहीं ज़्यादा त्याग किया था. मुझे याद है, फाइनल ईयर के अंतिम दिनों में कॉलेज के पीछे पहाड़ की आड़ में धुंध से लिपटी मीना अलगाव के डर से सहमी हुई थी. उसकी आंखों में आंसू थे, “मैंने घरवालों के सम्मान और अरमानों का गला घोंटकर आपको चुना है. कभी मुझसे अलग मत होना.”

“तुम्हारे लिए मैं सब कुछ छोड़ सकता हूं. कुछ भी कर सकता हूं.” उसे बांहों में जकड़ते हुए मैंने दिलासा दिया. साथ ही यह वचन भी दिया कि उसकी ख़ातिर अपने घरवालों को भी छोड़ दूंगा. डिग्री लेने के बाद मीना अपने घर चली गई और मैं अपने. लेकिन फोन पर और कभी-कभी नैनीताल में आकर दोनों मिलते रहते. बाद में मीना कॉन्वेंट स्कूल में अध्यापिका बन गई और मैं राजकीय इंटर कॉलेज में प्राध्यापक. दोनों के घरवालों ने हम दोनों की दृढ़ इच्छा को ध्यान में रखते हुए अपनी इच्छाओं को दबा डाला और कुछ विरोध करने के बाद विवाह कर दिया, लेकिन यह ताना देने से भी नहीं चूके कि कर लो अपनी मर्ज़ी, दोनों को इसका परिणाम भुगतना होगा. हम अपने भावी संबंधों की मज़बूती को लेकर आश्‍वस्त थे, इसलिए इन तानों का हम पर कोई असर नहीं हुआ.

लेकिन जैसा सोचा था वैसा हुआ नहीं. साथ रहने के लिए मीना ने अपना स्थानांतरण मेरे पास करवा लिया. सोचा था कि हम दोनों आनंद का जीवन गुज़ारेंगे. कृष्णा के आने के मौ़के पर परिवारवालों के साथ बातचीत शुरू हो गई. मुझे भी होम सिकनेस ने आ घेरा. उनके प्रति मुझे अपने कर्तव्य याद आने लगे. बीच-बीच में मैं घर भी जाने लगा और वो लोग भी आने लगे. इस पर मीना ने थोड़े दिनों में अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया.

गाहे-बगाहे उसके मुंह से विरोध के स्वर फूटने लगे, “आख़िर कब तक चलेगा यह?”

“मेरे परिवार के लोग हैं, कोई ग़ैर नहीं. उनका अधिकार है मुझ पर.”

“लेकिन आपने तो कहा था कि उन लोगों से कोई वास्ता नहीं रहेगा. जब आपके घरवाले डेरा डालेंगे, तो मेरे घरवाले भी जब तक जी चाहेगा यहां रुकेंगे.”

“यह मेरा घर है. जिसे चाहूंगा, वही आएगा.”

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“हिम्मत हो, तो रोककर देख लीजिए मेरे घरवालों को.” मीना ने जल्द ही इस धमकी को चरितार्थ भी कर दिखाया. कारण, पहले मेरे भइया-भाभी और बच्चे आ गए. ज़िद में मीना ने अपना पूरा परिवार बुलवा लिया. दोनों परिवारों में तनातनी तो थी ही. जून के पूरे महीने खींचातानी बनी रही. जब स्कूलों के खुलने का समय आया, तो दोनों परिवार लौटे, लेकिन महीनेभर जो घुटन मैंने महसूस की थी, वह उबलकर बाहर आ ही गई, “थोड़ा सब्र करके बुला लेतीं, तो क्या बिगड़ जाता. अपनी ज़िद करके ही मानीं.”

“पिछले साल की छुट्टियों का हिसाब लगा लो, तुम्हारे ही घरवाले पड़े रहे. न जाने क्या दुश्मनी है मेरे घरवालों से.”

“तुमसे ज़्यादा यह मेरा घर है. मेरे घरवाले आएंगे, तुम उन्हें रोककर देखो.”

धीरे-धीरे दोनों परिवारों का जमघट लगने लगा. कभी-कभी तो दोनों परिवार एक ही समय पर आ जाते. तब हम दोनों में अघोषित युद्ध और बढ़ जाता. अतिथियों के जाने के बाद तो घर में कई दिनों तक वाक्युद्ध चलता रहता. ऐसे ही दोनों के परिवारों के सदस्यों के आने-जाने से उपजे तानों व नोक-झोंक को समायोजित करते-करते चार साल बीत गए. हमारे बीच चल रही तकरार अम्मा, बाबूजी और परिवार के दूसरे लोगों से छुपी नहीं रह सकी. पिछले रविवार को जब मैं घर गया, तो बाबूजी, अम्मा और बड़े भैया बोले, “कैसे जीएगा ऐसे? यह औरत तो तुझे बर्बाद कर देगी. पीछा छुड़ा जैसे भी हो. इससे तो अच्छा है कि तू यहीं रहकर आ-जाकर नौकरी कर ले. आने-जाने में थोड़ी परेशानी तो होगी, लेकिन कम से कम मन की शांति तो मिलेगी.” मैं चुप रहा. मन में भी इन बातों को लेकर जब वापस मीना के पास लौटा, तो वह नाराज़ बैठी थी. घर में क़दम रखते ही बरस पड़ी, “पड़ गई कलेजे में ठंडक! सबने जी भरकर मेरी ख़ूब बुराइयां की होंगी. उन्हीं से चिपटे रहना था, तो शादी क्यों की?”

“मैं उन्हें नहीं छोड़ सकता. तुमने तो घर में जीना हराम कर रखा है. अगर वो लोग अपनापन न देते, तो कभी का मर गया होता.”

“तो रहते उन्हीं के पास, यहां आए ही क्यों?”

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“तुम क्यों नहीं चली जातीं. रात-दिन मम्मी-पापा रटती रहती हो. हमेशा के लिए उन्हीं के पास चली जाओ. मुझे भी शांति मिलेगी. मैं तो तुम्हारी सूरत भी नहीं देखना चाहता. कृष्णा और नौकरी की ख़ातिर टिका हूं.” मैं बड़बड़ाता हुआ घर से बाहर निकल गया. बाहर ही खाना खाकर जब देर रात घर लौटा, तो सन्नाटा पसरा हुआ था. मीना बेडरूम में लेटी थी. पता नहीं उसने खाना खाया था या नहीं. खिसियाहट में मैंने पूछना गंवारा भी नहीं समझा. इसी विवाद से उपजे क्रोध को मीना ने दूसरे दिन मायके जाकर चरितार्थ कर दिया.

एक सप्ताह तक मीना की कोई ख़ैर-ख़बर नहीं मिलने पर घर उजड़ा-उजड़ा-सा लगने लगा. सारी दिनचर्या ही बिगड़ गई. हारकर बाबूजी और अम्मा के पास चला गया और वहीं से आ-जाकर नौकरी करने लगा. अपना घरौंदा छोड़ने पर उदासीनता इतनी बढ़ गई कि उसमें दीया-बत्ती करने के लिए भी जाने की इच्छा नहीं हुई.

जब मैं अपने परिजनों के बीच पहुंचा था, तो घर भरा-पूरा लगा था.

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असलम कोहरा

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कहानी- परिदृश्य 3 (Story Series- Paridrishay 3)

ख़ुशी की तरंग मेरे मन को, समूचे जिस्म को रोमांचित कर रही थी. मेरे जीवन की फिल्म का परिदृश्य यकायक ही बदल गया था. तभी मुझे पायल का ख़्याल आया. यह सब क्या चक्कर है? अभी पूछती हूं उससे. मैं उसके कमरे की ओर बढ़ी. दरवाज़े तक पहुंची ही थी कि कानों में पायल के स्वर टकराए.

अगले दिन संडे था. दोपहर में पायल को पूरे मनोयोग से तैयार होता देख मैंने पूछा, “कहीं जा रही हो क्या?”

“ओह, मैं तुम्हें बताना ही भूल गई काव्या. अभिनव पूना आए हुए हैं और आज मैं उनसे मिलने जा रही हूं.”

मेरे पांव तले ज़मीन खिसक गई. अभिनव पूना आए हुए हैं, किंतु मुझे बताना, मुझसे मिलना उन्हें ज़रूरी नहीं लगा और इस लड़की से… क्षोभ और पीड़ा से मेरी आंखें डबडबा गईं. तभी अंतरात्मा की आवाज़ एक बार पुन: मुझे कठघरे में खींच ले आई. चार माह होने को आए अभिनव से अलग हुए. क्या इस बीच मैंने कभी उनसे उनकी ख़ैरख़बर ली? फिर उनसे ऐसी अपेक्षा क्यों? जबकि भूल भी मेरी ही थी. यह सारा दुख और पछतावा इसलिए है न, क्योंकि वे अपने लिए एक नए क्षितिज की तलाश में निकल गए हैं.

नहीं-नहीं यह इल्ज़ाम सरासर ग़लत है. दुख और पछतावा तो उसी दिन से है, जब सारी बातें जानकर मम्मी ने कहा था, “शादी के पश्‍चात् बहुत-सी लड़कियों को ससुराल में स्नेह नहीं मिलता, किंतु वो अपना घर छोड़कर नहीं आ जातीं, बल्कि अपने मधुर व्यवहार और सेवाभावना से ससुराल में अपनी जगह बनाती हैं और तुम, जिसे अभिनव जैसा पति मिला, इतने स्नेहिल सास-ससुर मिले, फिर भी निभा नहीं पाईं. तुम्हारी जैसी सोच की सभी लड़कियां हो जाएं, तो गली-गली में वृद्धाश्रम खुल जाएं.” मम्मी की बातें मेरी आत्मा को झकझोर गई थीं और मैं पछतावे की अग्नि में जलने लगी थी. कुछ ही दिनों में मम्मी-पापा की उम्र मानो 10 वर्ष बढ़ गई थी. परिचितों और रिश्तेदारों के चुभते प्रश्‍नों ने दिल्ली में रहना कठिन कर दिया और मैंने पूना की कंपनी में जॉब जॉइन कर लिया. दिन तो ऑफिस में बीत जाता, किंतु तन्हा रातें आंसुओं के सैलाब में डूबी रहतीं. दिल चाहता, अभिनव से क्षमा मांगकर वापस लौट जाऊं अपने घर, किंतु क्या वह अब क्षमा करेंगे, इसी कश्मकश में दिन गुज़रते जा रहे थे.

विचारों के भंवर में डूबते-उतराते तीन घंटे कब गुज़र गए, पता ही नहीं चला. पायल लौट आई थी. बेहद प्रसन्न नज़र आ रही थी. क्या मुझे पूछना चाहिए, कैसी रही अभिनव के साथ मीटिंग. शायद नहीं. लिफ़ाफ़ा देखकर ही ख़त का मजमून समझ में आ रहा था. अपनी आंखों के सम्मुख अपनी ख़ुशियां दूसरे की झोली में जाते देखना ही क्या मेरी सज़ा है? अपनी विवशता पर मेरी रुलाई फूट पड़ी. भावनाओं की एक प्रचंड लहर ने मुझे अपने कमरे में पहुंचा दिया और बिना सोचे-विचारे मैं अभिनव को फोन मिला बैठी. दूसरी ओर से अभिनव की आवाज़ आते ही मैं बिफर पड़ी, “शर्म नहीं आती, पूना आए बैठे हो और मुझसे मिलना भी आवश्यक नहीं समझा. अभी हमारा डिवोर्स हुआ भी नहीं और लड़कियां देखना शुरू कर दिया. क्या इसी प्यार का दम भरते थे तुम? प्यार वह नहीं होता कि पार्टनर से ज़रा-सी भूल हुई और तुरंत डिवोर्स की एप्लीकेशन डाल दी. प्यार वह होता है कि एक से ग़लती हो जाए, तो दूसरा उसे संभाल ले.” भावावेश में बोलते-बोलते मैं यकायक रुक गई. दूसरी ओर से अभिनव ने एक गहरी सांस ली और बोले, “तुमसे किसने कह दिया कि मैं पूना में हूं. अभी वीडियो कॉल करके चेक कर लो. मैं न्यूयॉर्क में ही हूं और यह क्या अनाप-शनाप बोल रही हो कि मैं लड़कियां देख रहा हूं. कहीं सपना तो नहीं देख लिया.”

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“किंतु पायल तो कह रही थी…”

“अरे कौन पायल? मैं किसी पायल को नहीं जानता और हां सुनो काव्या, प्यार क्या होता है, यह मुझे मत समझाओ. मैंने तुम्हें लाख संभालना चाहा, किंतु तुम तो… ख़ैर, छोड़ो.”

मेरे मुंह से एक सिसकी निकली. रुंधे कंठ से मैं बोली, “अभि, मैं अपनी भूल सुधारना चाहती हूं. अपना प्यार वापस पाना चाहती हूं.”

“कैसे मान लूं कि तुम सच कह रही हो.”

“मेरा यक़ीन करो अभि, मुझे अपनी भूल का एहसास हो गया है. मुझे माफ़ कर दो. मैंने तुम्हारे प्यार की, मम्मी-पापा के स्नेह की कद्र नहीं की.”

“मैं टिकट का इंतज़ाम करता हूं.”

ख़ुशी में अभिनव की आवाज़ कांप रही थी. मैंने फोन रखा. कुछ क्षण मैं चुपचाप खड़ी रही. दिल की धड़कन बढ़ गई थी. सब कुछ नया-नया-सा प्रतीत हो रहा था. कहीं यह सपना तो नहीं? क्या सचमुच अभिनव ने मुझे माफ़ कर दिया? ख़ुशी की तरंग मेरे मन को, समूचे जिस्म को रोमांचित कर रही थी.

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मेरे जीवन की फिल्म का परिदृश्य यकायक ही बदल गया था. तभी मुझे पायल का ख़्याल आया. यह सब क्या चक्कर है? अभी पूछती हूं उससे. मैं उसके कमरे की ओर बढ़ी. दरवाज़े तक पहुंची ही थी कि कानों में पायल के स्वर टकराए. वह फोन पर कह रही थी, “तुम्हारा प्लान कामयाब रहा प्रीशा. हमारी काव्या को अपनी भूल समझ आ गई है और वह जीजू के पास जा रही है.” मेरी आंखों में ख़ुशी के आंसू आ गए. मेरी सोई हुई भावनाओं को जगाने के लिए, यह सब प्रीशा का प्लान था, ताकि मैं संकोच त्यागकर अभिनव के सम्मुख अपनी भूल स्वीकार कर लूं और पायल इस प्लान की कर्ताधर्ता थी. अब मुझे समझ आया, क्यों प्रीशा बार-बार कहती थी कि अपनी सहेली पायल से बात करवा दो. अपनी दोनों सहेलियों के अपनत्व से अभिभूत मैं आगे बढ़ी और पायल के गले लग गई.

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 रेनू मंडल

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कहानी- परिदृश्य 2 (Story Series- Paridrishay 2)

काश, मैं व़क्त के इस अंतराल को मिटाकर अपनी भूल को सुधार पाती, किंतु गुज़रा व़क्त क्या कभी लौट पाया है? अभिनव को लेकर मैं आज भी पज़ेसिव हूं. वे मुझे अपना मानें या न मानें, किंतु आज भी मैं उन्हें अपना ही मानती हूं, फिर कैसे मैं उन्हें किसी और का हो जाने दूं. आंसुओं से मेरा चेहरा भीग उठा.

एक शाम अभिनव ऑफिस से लौटे, तो बेहद प्रसन्न थे. मेरे गले में बांहें डाल बोले, “काव्या, इस माह की 20 तारीख़ को मम्मी-पापा आ रहे हैं.” मुझे बिजली का करंट-सा लगा. स्वयं को उनके बंधन से मुक्त करते हुए बोली, “तुमने ख़ुुद ही प्रोग्राम बना लिया. मुझसे पूछना भी ज़रूरी नहीं समझा?” आश्‍चर्यमिश्रित क्रोध के भाव मेरे चेहरे पर थे.

“काव्या, इसमें पूछने जैसी क्या बात है? विवाह के बाद तुम मात्र सात दिन ससुराल में रहीं, फिर यहां आ गईं. बहुत दिनों से उनकी अपनी बहू के साथ रहने की इच्छा थी. मेरा ख़्याल था, इस ख़बर से तुम प्रसन्न हो उठोगी, किंतु तुम्हारे चेहरे का तो रंग ही उड़ गया.” अभिनव गौर से मेरा चेहरा देख रहे थे. मैं उन्हें क्या बताती कि सास-ससुर से निभाना, उनका दायित्व उठाना मेरे बस की बात नहीं है. अगले दिन अभिनव के ऑफिस जाने पर मैं अपनी कॉलेज फ्रेंड प्रीशा के घर गई, जो न्यूयॉर्क में ही थी. उसके और मेरे बीच काफ़ी अंतरंगता थी. सारी बातें सुनकर वह बोली, “देख काव्या, पति से जुड़े रिश्तों को निभाना पत्नी का कर्त्तव्य भी है और समझदारी भी. ख़ुशक़िस्मत है तू, जो तुझे अभिनव जैसे केयरिंग पति मिले हैं. स़िर्फ तीन महीने की ही तो बात है. मम्मी-पापा के साथ अच्छे से निभा लेना, ताकि तेरे और अभिनव के रिश्ते की डोर और मज़बूत हो जाए.”

“यही बात तू नहीं समझ रही है प्रीशा. एक बार उनका यहां मन लग गया, तो वे बार-बार आएंगे. रही अभिनव की बात, तो उन्हें मैं बाद में मना लूंगी.” प्रीशा के

बार-बार समझाने के बावजूद मैंने मम्मी-पापा का स्वागत बेमन से किया. मेरी उदासीनता को महसूस करते हुए भी वे दोनों मुझसे प्यार से बात करते, मेरा ख़्याल रखते. अक्सर दोपहर में अभिनव के बचपन की, तो कभी कॉलेज टाइम की बातें बताने बैठ जाते. उन्होंने हमारे रिश्ते के इस पौधे को अपने स्नेह द्वारा सींचने का भरपूर प्रयास किया, किंतु मैंने बहुत ही चतुराई से उनके इस प्रयास को विफल कर दिया. लंच बनाने से बचने के लिए दोपहर में कभी अपनी किसी फ्रेंड के घर, तो कभी शॉपिंग करने के बहाने से मैं घर से निकल जाती थी. शाम के समय भी मैं बेमन से ही किचन में जाती थी. इस पर मेरी अक्सर अभिनव से कहा-सुनी हो जाती थी. उन्हें इस बात का बहुत मलाल था कि मैं मम्मी-पापा का ख़्याल नहीं रख रही थी. न्यूयॉर्क के आसपास घुमाने के बाद उन्होंने कैलिफोर्निया जाने का प्लान बनाया था, जिसे मैंने सहजता से पापा के कानों में यह बात डालकर कि वहां जाना बहुत ख़र्चीला है, प्रोग्राम कैंसिल करवा दिया. इसी खींचतान में तीन माह गुज़र गए और उनके वापस लौटने का दिन आ गया. अपनी ख़ुशी को मन में दबाए मैं पैकिंग में व्यस्त थी, तभी मैंने अभिनव को पापा से कहते सुना, “आप दोनों अपना मुंबई का घर बेचने का प्रयास कीजिए, क्योंकि मैं आपका ग्रीन कार्ड लगवा रहा हूं.”

“नहीं बेटा, हम दोनों वहीं ठीक हैं. यहां रहना संभव नहीं हो सकेगा.”

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“पापा, आप दोनों वहां अकेले रहते हैं. मुझे आपकी चिंता रहती है. अपने काम पर भी ठीक से ध्यान नहीं दे पाता. आप क्या चाहते हैं, मैं सदैव तनाव में रहूं.” अभिनव का आर्द्र स्वर मेरे कानों से टकराया.

“काव्या की सलाह ली क्या तुमने? बेटा, वह तुम्हारी पत्नी है. उसकी सहमति भी आवश्यक है. हम नहीं चाहते, हमारी वजह से तुम्हारे आपसी मतभेद हों.” मुझे लगा, ऐसा कहकर मम्मी अभिनव की नज़रों में ऊंचा उठना चाह रही हैं.

“मम्मी, काव्या की आप चिंता मत कीजिए. वह अपने मां-बाप की इकलौती बेटी है. उसमें अभी बचपना है. साथ में रहेगी, तो धीरे-धीरे उसे रिश्तों की अहमियत समझ में आ जाएगी.” अभिनव बोल रहे थे. क्रोध में मेरा सर्वांग कांप उठा. मम्मी-पापा को एयरपोर्ट छोड़कर रात में अभिनव लौटे, तो मुझे आलिंगनबद्ध करना चाहा. मैंने उनका हाथ झटक दिया. अचरज से वह बोले, “क्या बात है? इतना ग़ुस्सा किसलिए? तुम्हें तो ख़ुश होना चाहिए, मम्मी-पापा चले गए हैं.” उनके चेहरे पर व्यंग्यभरी मुस्कुराहट थी.

“हां, चले गए हैं. यहां परमानेंटली सेटल होने के लिए…” आग्नेय नेत्रों से घूरते हुए मैं बोली और फिर जमकर हम दोनों के बीच झगड़ा हुआ. काफ़ी दिनों तक अभिनव मुझे समझाते रहे, किंतु मैं मम्मी-पापा को अपने पास बुलाने के लिए सहमत नहीं हुई. यहां तक कि मैंने उनसे फोन पर बात करना भी बंद कर दी. प्रीशा ने कहा भी था, “काव्या, विवाह स़िर्फ पति-पत्नी को ही रिश्ते में नहीं बांधता, पूरे परिवार को बांधता है. अभिनव की बात मान जा. ऐसा न हो, तुम दोनों के बीच दूरियां बढ़ जाएं.” किंतु कहते हैं न विनाश काले विपरीत बुद्धि. मैंने उसकी बात को अनसुना कर दिया. धीरे-धीरे अभिनव के हृदय के कपाट मेरे लिए कुछ इस तरह बंद हो गए कि मेरे आंसुओं का तीव्र वेग भी उन्हें खोल न सका. काश, मैं समझ पाती कि स्त्री की तरह पुरुष भी मात्र हाड़-मांस का शरीर नहीं होते, बल्कि उस शरीर में एक मन भी होता है, जिसमें कोमल भावनाएं होती हैं. अपनों के लिए स्नेह होता है. क्यों मैंने चाहा कि अभिनव स़िर्फ मेरे होकर रहें और अपने माता-पिता को छोड़ दें.

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…और अब जबकि सब कुछ समाप्त होनेवाला है, पश्‍चाताप से मेरा मन रात-दिन कलपता है. मेरे द्वारा मम्मी-पापा की अवहेलना करने पर अभिनव का वह निरीह और बेबस-सा चेहरा जब-जब स्मृतियों में कौंधता है, मन में एक हूक-सी उठती है. क्या अभिनव से यह अपेक्षित था कि वह मेरे मम्मी-पापा का अनादर करते… फिर मैंने क्यों…? एक आह-सी निकली मुख से. काश, मैं व़क्त के इस अंतराल को मिटाकर अपनी भूल को सुधार पाती, किंतु गुज़रा व़क्त क्या कभी लौट पाया है? अभिनव को लेकर मैं आज भी पज़ेसिव हूं. वे मुझे अपना मानें या न मानें, किंतु आज भी मैं उन्हें अपना ही मानती हूं, फिर कैसे मैं उन्हें किसी और का हो जाने दूं. आंसुओं से मेरा चेहरा भीग उठा.

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कहानी- परिदृश्य 1 (Story Series- Paridrishay 1)

काश क़ानून की किताब में कोई ऐसा प्रावधान होता, जो मन पर रोक लगाने में भी सक्षम होता. मन तो अभी भी प्यार करता है, अभिनव से. प्यार…? उस समय यह प्यार रसातल में क्यों चला गया था, जब अभिनव के साथ समझौता नहीं किया था. उफ़़्फ्! बेचैनी में मैंने करवट बदली.

लैपटॉप के स्क्रीन पर नज़र पड़ते ही मैं हतप्रभ रह गई. शरीर और दिमाग़ दोनों ही चेतनाशून्य से हो गए. पायल की आवाज़ किसी गहरे कुएं से आती प्रतीत हो रही थी, “क्यों रह गई न दंग, कितनी डैशिंग पर्सनैलिटी है न. बस, एक ही हिचक है पापा-मम्मी को. अभिनव का तलाक़ होनेवाला है, किंतु मैंने कह दिया है मुझे कोई एतराज़ नहीं है.”

“एक तलाक़शुदा से शादी करेगी? दिमाग़ ख़राब तो नहीं हो गया तेरा.” अपने स्वर की उत्तेजना पर मैं स्वयं ही संकुचित हो उठी. क्या सोचेगी पायल, किंतु प्रसन्नता के अतिरेक में पायल अपनी ही धुन में बोल रही थी, “डिवोर्सी होने से क्या? है तो अमेरिकन सिटिज़न. अमेरिका में बस जाऊंगी मैं. यह ख़्याल ही रोमांचित करने के लिए काफ़ी है.”

“…और उसके पैरेंट्स?” धीमे स्वर में पूछा मैंने. “इस समय वे लोग मुंबई में हैं. अभिनव ने उनका ग्रीन कार्ड अप्लाई कर दिया है.”

“ओह, फिर अमेरिका में बसने का क्या फ़ायदा, जब वहां भी सास-ससुर का झंझट झेलना पड़े.”

“नहीं काव्या, यह पूर्वाग्रह से ग्रसित मन की सोच है और इसी सोच के चलते लड़कियां सास-ससुर के साथ संतुलन नहीं बैठा पातीं और दुखी रहती हैं. जिन लोगों को अभी परखा नहीं, उनके बारे में राय कायम कर लेना क्या ग़लत नहीं?”

“पायल, आदर्शवाद और यथार्थ में ज़मीन-आसमान का अंतर होता है. जब सास की टोका-टाकी, बंदिशें और रात-दिन उसका अपने बेटे से तुम्हारी शिकायतें करना झेलोगी, तो सारा जोश उतर जाएगा…” मैंने उसे निरुत्साहित करना चाहा, किंतु वह बोली, “अपने जीवन की नई शुरुआत मैं पॉज़िटिव सोच के साथ करना चाहती हूं काव्या. सास-ससुर भी माता-पिता के समान होते हैं. उनके साथ बंधन है, तो उस बंधन में सुख भी है. ममता और स्नेह की छांव भी है. सहयोग और सुरक्षा भी है.” उसकी बातों ने मुझे निरुत्तरित कर दिया. पायल मेरे साथ मेरे ही ऑफिस में काम करती थी, किंतु अपने अतीत के बारे में मैंने उसे कभी कुछ नहीं बताया था.

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रात में सोने के लिए बिस्तर पर लेटी, तो एक अजीब-सी हलचल हो रही थी मन में, अजीब-सी बेचैनी, मानो कोई नितांत अपना ख़ुद से दूर जा रहा हो. अपना? हां, अपने ही तो हैं अभिनव. दो वर्ष साथ गुज़ारे हैं हमने. पायल उन्हें मुझसे नहीं छीन सकती. किंतु किस अधिकार से रोक सकती हूं मैं उसे? रोक क्यों नहीं सकती? पति हैं अभिनव मेरे… पति नहीं, पूर्व पति कहो. कोर्ट में उन्होंने डिवोर्स की एप्लीकेशन डाली हुई है. उनकी ज़िंदगी पर अब तुम्हारा कोई

अधिकार नहीं. अधिकार कैसे नहीं? एप्लीकेशन ही तो डाली है. डिवोर्स हुआ तो नहीं न. अभी तो हमारा कूलिंग पीरियड चल रहा है. आज भी अभिनव मेरे हैं, स़िर्फ मेरे… स्वसंवादों में उलझा हुआ मन. भावनाओं के तेज़ प्रवाह को बुद्धि यथासंभव अपने तर्कों के बांध से रोकने का प्रयास कर रही थी, किंतु मन को कोई बंधन स्वीकार्य नहीं था. वह तो उन्मुक्त होकर बहा जा रहा था अपने अभिनव के पास. काश क़ानून की किताब में कोई ऐसा प्रावधान होता, जो मन पर रोक लगाने में भी सक्षम होता. मन तो अभी भी प्यार करता है, अभिनव से. प्यार…? उस समय यह प्यार रसातल में क्यों चला गया था, जब अभिनव के साथ समझौता नहीं किया था. उफ़़्फ्! बेचैनी में मैंने करवट बदली.

सवालों और जवाबों के प्रहार से क्लांत मन सुकून की तलाश में पुन: अभिनव के साथ बिताए दिनों की शीतल छांव में जा बैठा. कितने ख़ूबसूरत और मदमस्त दिन थे वो. अभिनव, मैं और न्यूयॉर्क की जगमगाती शामें. स्मार्ट होने के अलावा उनका अमेरिकन सिटिज़न होना इस रिश्ते को स्वीकार करने की बहुत बड़ी वजह था. न सास-ससुर का दायित्व, न ही ननद की दख़लअंदाज़ी. सब कुछ मेरे मन मुताबिक़ नियति ने मुक्त हाथों से मेरे जीवन में ख़ुशियां बिखेरी थीं, किंतु कहां सहेज पाई मैं उन ख़ुशियों को. मेरी हठधर्मिता और अहम् ने तिनका-तिनका बिखेर दिया.

प्रारंभ में अभिनव ने समझौते का काफ़ी प्रयास किया. सब कुछ भुलाकर एक नई शुरुआत करना चाहते थे वो, किंतु सौंदर्य के दर्प में चूर मैंने उनकी एक न सुनी. न जाने कौन-सा जुनून सवार था मुझ पर, जिसने मेरी सोचने-समझने की शक्ति को कुंद कर मुझे एक अनिश्‍चित भविष्य की ओर धकेल दिया. जब तक मेरा विवेक जागता, बहुत देर हो चुकी थी. विमुख हो गए थे अभिनव मुझसे और फिर एक शाम अप्रत्याशित रूप से अभिनव ने जो कुछ भी कहा, वह मेरे अस्तित्व को झकझोर देने के लिए काफ़ी था. मैं कभी सोच भी नहीं सकती थी कि वह मुझे डिवोर्स देने का निश्‍चय कर लेंगे. मैंने उन्हें मनाने का प्रयास किया, किंतु अभिनव का हृदय नहीं पसीजा. फिर मेरा अहम् भी आड़े आ गया. जब उन्हें मेरी परवाह नहीं, तो मैं ही क्यों झुकूं और मैं इंडिया चली आई. कहां तो मैं उन पर पूर्ण रूप से आधिपत्य चाहती थी और कहां उन्होंने स्वयं को इस बंधन से मुक्त करने की दिशा में कदम बढ़ा दिया है. वह भले ही अपने अतीत के उस सुनहरे अध्याय को भुला चुके हों, किंतु मैं… मैं आज भी अभिनव के साथ गुज़ारे दिनों की मधुर स्मृतियों को थामे अलगाव के रेगिस्तान में तन्हा भटक रही हूं, जहां मेरी भूलों के न जाने कितने नागफनी के दंश मुझे हर पल लहूलुहान करते रहते हैं.

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बहुत प्यार करनेवाले और केयरिंग क़िस्म के इंसान थे अभिनव. ऑफिस से लौटकर हर पल मेरे साथ बने रहते. मैं किचन में जाती, तो वहां भी मेरी मदद को पहुंच जाते. चुहलबाज़ी और हंसी-मज़ाक के बीच मिल-जुलकर हम दोनों खाना बना लेते, किंतु उनके स्नेह और सहयोग को मैं बहुत हल्के में लेती थी. अपनी मनमानी करना और उनकी हर बात का विरोध करना मेरा स्वभाव बनता जा रहा था. वह चाहते थे, हर वीकेंड मैं उनके मम्मी-पापा को वीडियो कॉल करके उनसे अपनत्व भरा रिश्ता कायम करूं. दूर रहते हुए भी उन्हें अपने पास होने का एहसास कराऊं, किंतु मैं दो-चार औपचारिक बातें करके फोन उन्हें पकड़ा देती थी. मेरे इस व्यवहार से उन्हें दुख होता, किंतु वे ख़ामोश रहते. उनकी इस ख़ामोशी को मैं उनकी कमज़ोरी समझने लगी थी. विवाह की पहली सालगिरह हम दोनों ने नायाग्रा फॉल के नैसर्गिक सौंदर्य के बीच मनाई. पांच दिनों के उस टूर में हम दोनों ने जी भरकर मस्ती की थी. मुझे लग रहा था पति को मुट्ठी में रखने का मेरा प्रयास कामयाब हो गया है. आज एहसास हो रहा है, बहुत कसकर बंद की हुई मुट्ठी से भी रेत फिसल जाती है.

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कहानी- प्रभाती 4 (Story Series- Prabhati 4)

मैं अब तक यह सोच रही थी कि शशि पर से मेरी यादों का विषम ज्वर उतर गया होगा, किंतु मैं ग़लत सोच बैठी थी. अत: कल जब ईमेल के इस दौर में मेरे घर डाकिया पत्र लेकर आया था, मैं चिहुंक गई थी. सुंदर व गोल लिखावट के साथ ही परिचित मंजुल सुगंध मेरे गले में बांहें डालकर झूल गई थी. पत्र में कोई संबोधन नहीं था और न ही भेजनेवाले का नाम था, किंतु मात्र एक वाक्य से लिखनेवाले ने मेरे मन के तारों को झंकृत कर दिया था…

“… प्रभाती साथ गाने का समय हो गया है, जाग रही हो ना!…”

दरवाज़े पर हुई तेज़ दस्तक ने हमें पुनः यथार्थ में ला पटका था. द्वार पर पुलिस की एक छोटी टीम खड़ी थी. उन्होंने न कुछ पूछा और न हम कुछ कह पाए. अकारण लगभग घसीटते हुए नीचे गाड़ी में बैठा दिया गया था.

थाने जाने पर ज्ञात हुआ कि शशि के पड़ोसी के बुलाने पर पुलिस आई थी. उनकी धारणा थी कि शशि ने घर में वारांगना बुलाई थी. उस रात मैं दो बातें समझ गई थी.

एक- मिथ्या आरोप लगाकर समाज के सामने किसी को चरित्रहीन सिद्ध करना प्रतिकार पाने का सुगम और द्रुतगामी मार्ग था, दो- मैं इतने सालों से स्वयं को छल रही थी. मैं वह थी ही नहीं, जिसकी भूमिका मैं इतने वर्षों से निभा रही थी. समय हो गया था वास्तविक भूमिका को अंगीकार करने का.

उस रात के बाद मेरी पुलिस के उच्च अधिकारियों से बातचीत हुई.

येन-केन-प्रकारेण मैं और शशि वहां से बाहर आए, किंतु पौ फटने तक सारा चित्र बदल गया था. अर्थ के बहुत सारे सूत्र मेरे हाथ में थे, लेकिन देह जैसे झर गई थी. अतएव मैं अपनी सहेली के घर चली गई थी. पिता के घर नहीं गई थी. कारण आपको स्पष्ट होगा. वहां भी मेरा स्वागत लांछनों से ही होना तय था. इस समय मैं एकांत और शांति चाहती थी.

थककर, किंतु शांति पाकर मैं सो गई थी और संभवतः दो-तीन दिन तक कुछ और नहीं किया था. जब मैं उठी, मैं जाग चुकी थी. मैंने संभवतः इतने वर्षों में पहली बार स्वयं को दर्पण में निहारा था. अपने जीवन के 33 वर्षों का लेखा-जोखा निकला और निर्णय ले लिया था.

कहना न होगा कि मेरे तलाक़ का मार्ग सरल और सहज नहीं था. अवहेलना, लांछन, बहिष्कार, तिरस्कार और अपमान की आंधियों का सामना करना पड़ा था. शशि मेरे साथ था. हर परीक्षा और उपेक्षा हमने साथ ही झेली थी.

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मेरा संघर्ष चलता रहा और मेरे अंधकार के पट पर बिजली की तरह थिरकती हुई एक रेखा- शशि. मेरी अनेक चिंताओं और पीड़ा में पीड़ित शशि, अपनी पीड़ा से अंजान शशि, अपने भविष्य को मेरे वर्तमान पर बलि चढ़ाता हुआ शशि. उसने जैसे मेरे भीतर की शून्यता को विधाता से अपने लिए मांग लिया था.

उसके स्वप्नों से आलिंगनबद्ध मैं, शायद उसकी वास्तविकता को कभी समझ ही नहीं पाती, यदि एक दिन शशि की मां मुझसे मिलने न आतीं तो. आज सोचती हूं, तो लगता है उन्होंने मुझे कुछ भी ग़लत नहीं कहा था. उनके अपशब्दों में भी उनका अपने पुत्र के प्रति प्रेम ही तो था. यदि वे जानकारी नहीं देतीं, तो मैं कहां जान पाती कि शशि को पेरिस से इतना अच्छा ऑफर आया था. यदि वे नहीं बतातीं, तो मैं कहां जान पाती कि मैं ही वह कारण थी, जो शशि को अपने परिवार के प्रति विद्रोही और अपने स्वप्नों के प्रति लापरवाह बना रही थी.

शशि स्वयं को धीरे-धीरे खो रहा था और मुझसे अधिक स्वयं को खोने की पीड़ा का अनुभव किसे था.

मैंने स्वयं को शशि से दूर कर लिया था. आरंभ में उसने मुझसे संपर्क करने का प्रयास किया था, किंतु मेरे प्रमाद ने शीघ्र ही हमारे मध्य एक अबोला कीदीवार बना दी थी. वह चला गया था. जाने से पूर्व न वह मुझसे मिलने आया और न ही मैंने उसे फोन किया. कुछ ही महीनों बाद मैंने भी तेलंगाना के एक छोटे-से शहर में स्थानांतरण ले लिया और यहीं बस गई. कभी-कभी प्रेम की पूर्णता उसके अधूरेपन में ही होती है.

प्रेम! मैं शशि से प्रेम करती थी और आज भी करती हूं, तभी तो उसे जाने दिया. जहां बंधन आ जाता है, प्रेम वहीं समाप्त हो जाता है. साहित्य में, यात्रा में, कला में, जीवन में- सब जगह वही मनमोहक प्रवाह और आरंभ है प्रेम. प्रेम पक्षी के समान उड़ान भरने की स्वतंत्रता देता है, देवता बनाकर उसे इमारत में कैद नहीं करता.

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पिछले पांच वर्षों में मैं उससे मिली नहीं थी और न ही कभी उसका फोन आया था. हालांकि मैं उसकी कुशलता की सूचना अवश्य लेती रहती थी. वह पेरिस में कब तक रहा, फ्रांस के किस शहर को उसने अपना निवास स्थान बनाया, कब-कब वह भारत आया और यहां तक कि कनाडा से लेकर श्रीलंका तक के उसके हर प्रदर्शन की मुझे जानकारी थी, किंतु मैं चतुरा सूचनाओं का स्रोत भांप न सकी थी. जहां मैंने विरह में प्रेम को पूर्ण मान लिया था, वहीं उसने अपने स्वप्नों के साथ मेरे स्वप्नों को जोड़कर प्रेम की संपूूर्णता को अंगीकार कर लिया था.

मैं अब तक यह सोच रही थी कि शशि पर से मेरी यादों का विषम ज्वर उतर गया होगा, किंतु मैं ग़लत सोच बैठी थी. अत: कल जब ईमेल के इस दौर में मेरे घर डाकिया पत्र लेकर आया था, मैं चिहुंक गई थी. सुंदर व गोल लिखावट के साथ ही परिचित मंजुल सुगंध मेरे गले में बांहें डालकर झूल गई थी. पत्र में कोई संबोधन नहीं था और न ही भेजनेवाले का नाम था, किंतु मात्र एक वाक्य से लिखनेवाले ने मेरे मन के तारों को झंकृत कर दिया था…

“… प्रभाती साथ गाने का समय हो गया है, जाग रही हो ना!…”

Pallavi Pundir

पल्लवी पुंडीर

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कहानी- प्रभाती 3 (Story Series- Prabhati 3)

तेरी यादों की ख़ुशबू से भीगा मेरा तकिया

आज भी तेरी सांसों की राह तकता है

तू जो सपने टांग आई थी मेरे कमरे की खूंटी पर

आज भी हर आहट पर हिलता है.

वो तू ही थी या कोई और थी

आज भी क्या वह तुझमें ज़िंदा है… आ… आ…

मैं मंत्रमुग्ध होकर अपनी रचना को उसके मुख से सुन रही थी. स्वयं के लिखे शब्द जैसे अपरिचित बन उससे मित्रता निभा रहे थे. उसके सुरों ने जैसे मेरे शब्दों को रूह प्रदान कर दी थी. मुझे यूं निहारता देखकर वह रुक गया था.

“क्या बात है, संगीत अच्छा नहीं लगा क्या?”

“तुमने मुझे आश्‍चर्यचकित कर दिया. ऐसा लग रहा था, जैसे- मेरी देह को रूह मिल गई हो.”

कहना नहीं होगा कि कमरे की सज्जा मुझे पसंद आई थी. मेरे अंदरूनी उत्साह को मैंने तनिक भी छिपाया नहीं था.

“शशि, तुम्हारा यह कमरा, मकान तो नहीं लगता.”

“फिर?” उसने मुस्कुराते हुए पूछा था.

“घर लगता है, यहां की नीरवता में सुंदरता है.”

शशि की दोनों आंखों में चमक थी. मेरे लिए इस चमक का अर्थ अंजाना नहीं था. मैंने इसके पहले भी यह चमक देखी थी. कई वर्षों पहले अपनी आंखों में. उन आंखों की चमक का सामना कर पाने में मैं असमर्थ हो गई थी, इसलिए बातों का रुख दूसरी तरफ़ करने की चेष्टा की थी.

“चलो चाय पिलाओ और गाना सुनाओ.”

“आपकी आज्ञा को ठुकरा नहीं सकता, परंतु यदि आप साथ दें, तो आनंद

आ जाएगा.”

“तुम शुरू तो करो…”

शशि ने इंडक्शन कुकर पर केतली चढ़ाई और भरी आवाज़ में गाना शुरू किया-

तेरी यादों की ख़ुशबू से भीगा मेरा तकिया

आज भी तेरी सांसों की राह तकता है

तू जो सपने टांग आई थी मेरे कमरे की खूंटी पर

आज भी हर आहट पर हिलता है.

वो तू ही थी या कोई और थी

आज भी क्या वह तुझमें ज़िंदा है… आ… आ…

मैं मंत्रमुग्ध होकर अपनी रचना को उसके मुख से सुन रही थी. स्वयं के लिखे शब्द जैसे अपरिचित बन उससे मित्रता निभा रहे थे. उसके सुरों ने जैसे मेरे शब्दों को रूह प्रदान कर दी थी. मुझे यूं निहारता देखकर वह रुक गया था.

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“क्या बात है, संगीत अच्छा नहीं लगा क्या?”

“तुमने मुझे आश्‍चर्यचकित कर दिया. ऐसा लग रहा था, जैसे- मेरी देह को रूह मिल गई हो.”

बड़ी नम्रता से उसने गर्दन झुका ली थी और फिर चाय का कप मेरी तरफ़ बढ़ाता हुआ बोला था.

“जब लोग आपकी इस रचना को पढ़ेंगे, तो प्रथम दृष्टि में उन्हें यह विरह में डूबी हुई रोमानी कविता प्रतीत होगी, परंतु वास्तविकता भिन्न है.”

उसकी आवाज़ में पता नहीं ऐसा क्या था कि मैं मुग्ध होकर उसे अपलक देखती रह गई थी.

“बोलो शशि, अब मौन मत रहो.” मैंने उसका नाम लिया और वह मुझे एकटक देखता रह गया था.

“आरोही, यह एक रोमानी कविता है, जो स्वयं से स्वयं को प्रेम करने को कह रही है.”

यह अलौकिक प्रेम था. मेरी इस कविता को न कोई समझ पाया था और न कभी मैंने समझाने का प्रयत्न ही किया था. यथार्थ में प्रियतम भी मैं थी और प्रेयसी भी मैं. प्रियतम मेरा अतीत था और प्रेयसी मेरा वर्तमान. अतीत मुझे मेरे वास्तविक रूप, मेरे सपनों और मेरी भावनाओं से पुनः समागम कराना चाहता है और मेरा वर्तमान उन्हें मस्तिष्क के किसी अंधे कोने में बंद कर चुका था.

आप कभी दर्पण के सम्मुख मैं के साथ खड़े हुए हैं. कभी मैं को निहारा है. कभी अपनी आंखों से मैं को देखा है. कभी मैं के साथ समय व्यतीत किया है. मेरे साथ उस पल यही सब हो रहा था.

मैं उस क्षण को खोना नहीं चाहती थी, हाथ बढ़ाकर थाम लेना चाहती थी. मैंने वही किया भी था.

उसके होठों से अपना नाम सुनना कानों को मधुरता प्रदान कर रहा था. कब चाय का कप नीचे गिरकर बिखर गया, मुझे पता ही नहीं चला. मैं तो स्वयं को समेटने में व्यस्त थी. आगे बढ़कर मैंने उसके गर्म कपोलों को अपनी ठंडी हथेलियों में भर लिया था.

वह मेरा प्रथम पुरुष स्पर्श अथवा प्रथम परपुरुष स्पर्श नहीं था. इसका तात्पर्य यह नहीं है कि मेरे अपने पति के अतिरिक्त अन्य पुरुषों से भी संबंध थे, किंतु पुरुष सहकर्मियों के साथ कभी-कभी तो हाथ मिलाने अथवा किसी भी वस्तु के आदान-प्रदान के दौरान आंशिक रूप से स्पर्श तो हो ही जाता था, परंतु आज के इस स्पर्श ने जैसे मुझे वास्तव में छू लिया था. कभी खिलते हुए फूल की पंखुड़ियों को देखा है. जब वे खिल रहे होते हैं, तो अपनी सभी पंखुड़ियों को फैला देते हैं, जैसे सूर्य की किरणों को अपने अंदर समेट लेना चाहते हों.

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मैं भी वही चाहती थी. उसके सीने से लगकर आंखें बंद किए हुए मैंने उसकी गर्माहट का आनंद लिया था. जब उसकी उंगलियां मेरे केशों का स्पर्श करतीं, तो मैं सिहर उठती थी. कमरे में और कोई नहीं. स़िर्फ हम दोनों थे. उसने मुझे और सघनता के साथ जकड़ रखा था. मेरी काया की अभियाचना को मैं आज स्पष्ट सुन पा रही थी. अभी बहुत कुछ कहना शेष था, परंतु इसी बीच वे आ गए थे.

‘ठक-ठक-ठक-ठक…’

Pallavi Pundir

   पल्लवी पुंडीर

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