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कहानी- साथी हाथ बढ़ाना 2 (Story Series- Sathi Hath Badhana 2)

‘वह कितनी भी कोशिश कर ले, पर ममा शायद नहीं समझ पाएंगी कि वह क्या चाहती हैं या शायद जानकर भी अनजान बनी रहना चाहती हैं. ममा क्यूं नहीं समझतीं कि शॉपिंग, घूमने-फिरने से मेरी ज़िंदगी में आया शून्य भर नहीं सकता है. ख़ैर, उनका दिल रखने के लिए ही सही, मुझे उनके साथ जाना होगा.’ टिया की सोच का सिलसिला चलता रहा.
कौन किसका दिल रख रहा था इस भ्रम में रहते हुए ही अगले दिन दोनों साथ-साथ हो ली थीं.

“थैंक्यू अंकल! टिया अब घर चलते हैं. बहुत देर हो गई है.”
मुग्धा बाहर तक छोड़ने आई, तो उसने अपनी सहेली की तारीफ़ों के पुल बांध दिए.
“तुझमें ग़ज़ब की हिम्मत और समझदारी है नेहा! घर-बाहर की ज़िम्मेदारियां तो संभाल ही रही हो, सिंगल पैरेंट की ज़िम्मेदारी भी बख़ूबी निभा रही हो. यह तेरा ही मार्गदर्शन है, जो टिया इतनी समझदार और ज़िम्मेदार हो गई है.”
“तुम लोगों का ऐसा ही सहयोग और समर्थन मिलता रहे बस…” नेहा मुग्धा का हाथ थामकर गाड़ी की ओर बढ़ ली. पूरे रास्ते ड्राइव करते वह अपने ही ख़्यालों में खोई रही. अमन से तलाक़ का केस अदालत में चल रहा था. दोनों आपसी सहमति से अलग हो रहे थे. अतीत की यादें आरंभ में मधुर, लेकिन बाद में कड़वाहट भरी थीं. दोनों सुशिक्षित और पेशे से इंजीनियर थे. एक ही कंपनी में होने के कारण रोज़ का मिलना-जुलना शीघ्र ही प्रणय संबंधों में रूपांतरित हो गया. विजातीय होने के कारण घरवालों का सहयोग नहीं मिला, लेकिन फिर भी दोनों ने कुछ दोस्तों के सहयोग से कोर्ट मैरिज कर ली. प्यार की ख़ुमारी में दोनों डूब गए थे. नन्हीं-सी कली टिया आंगन में आई, तो दोनों धन्य-धन्य हो गए. अमन के तो मानो टिया में प्राण बसते थे.

पूरी गर्भावस्था और प्रसूति के दौरान अमन ने नेहा की ख़ूब देखभाल की. समस्या आरंभ हुई नेहा के फिर से ऑफिस जॉइन करने के बाद से. तब भी समस्या इतनी गंभीर नहीं थी. नेहा ने थोड़े कम पैकेज पर पास का ही एक दूसरा ऑफिस जॉइन कर लिया था. नेहा जाते व़क्त सामान सहित टिया को क्रेच में छोड़ जाती थी और अमन आते व़क्त उसे ले आता था. लेकिन इधर समय के साथ-साथ दोनों की ऑफिस की ज़िम्मेदारियां बढ़ती जा रही थीं और उधर टिया का स्कूल जाना आरंभ कर देने पर उसकी ज़िम्मेदारियां भी बढ़ती जा रही थीं. दोनों थके-थके और चिड़चिड़े से रहने लगे थे. ऑफिस से झिड़की सुनकर आते, तो ग़ुस्सा घर लौटकर एक-दूसरे पर उतारते.

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टिया की स्कूल रिपोर्ट ख़राब आती, तो परस्पर दोषारोपण करने लग जाते. उनके झगड़ों का सीधा असर टिया पर पड़ रहा था. उसका न केवल पढ़ाई से मन उचटने लगा, बल्कि स्वास्थ्य ख़राब रहने लगा था. अमन और नेहा का प्रमोशन ड्यू था और दोनों हर हाल में इसे जल्द से जल्द पा लेना चाहते थे. लेकिन घरेलू ज़िम्मेदारियां रोज़ ही कोई न कोई अड़चन खड़ी कर देतीं. टिया गंभीर रूप से बीमार पड़ गई. उस पर अमन का 15 दिन का ऑफिशियल टूर आ गया. नेहा ने उसे टूर पर न जाने की सख़्त हिदायत दे दी, पर अमन के प्रमोशन के लिए यह टूर अत्यंत महत्वपूर्ण था, इसलिए वह नहीं रुका. ज़िद में आकर नेहा ने भी छुट्टी नहीं ली. परिणाम भुगतना पड़ा मासूम टिया को, वो बीमार पड़ गई. उसे आनन-फानन में हॉस्पिटल में भर्ती करवाना पड़ा.

नेहा ने रात-दिन लगाकर टिया की देखभाल की, पर इस चक्कर में प्रमोशन किसी और को चला गया. चोट खाई नेहा ने तभी निश्चय कर लिया था कि अब उसके और अमन के रास्ते हमेशा के लिए अलग-अलग हो जाएंगे. लौटने के बाद अमन ने नेहा को मनाने का बहुत प्रयास किया, लेकिन वह नहीं मानी. लंबे अरसे तक एक ही छत के नीचे दोनों अजनबी की भांति रहते रहे. आख़िर दोनों ने सहमति से तलाक़ की अर्ज़ी दे दी. अमन उसी दिन से बोरिया-बिस्तर लेकर अलग हो गया था.
घर आ गया, तो नेहा की विचार शृंखला भी सिमटकर वर्तमान में लौट आई. उसे अफ़सोस हुआ पूरे रास्ते उसने बेटी से कोई बात नहीं की. वीकेंड ही तो मिलता है दोनों को बात करने का, साथ व़क्त गुज़ारने का.
“टिया, हम कल मॉल चलते हैं. ख़रीददारी भी हो जाएगी और घूमना-फिरना भी.”
टिया यंत्रवत् गर्दन हिलाकर अपने कमरे में चली गई.
‘वह कितनी भी कोशिश कर ले, पर ममा शायद नहीं समझ पाएंगी कि वह क्या चाहती हैं या शायद जानकर भी अनजान बनी रहना चाहती हैं. ममा क्यूं नहीं समझतीं कि शॉपिंग, घूमने-फिरने से मेरी ज़िंदगी में आया शून्य भर नहीं सकता है. ख़ैर, उनका दिल रखने के लिए ही सही, मुझे उनके साथ जाना होगा.’ टिया की सोच का सिलसिला चलता रहा.
कौन किसका दिल रख रहा था इस भ्रम में रहते हुए ही अगले दिन दोनों साथ-साथ हो ली थीं. शॉपिंग करते हुए ही एक पुरानी पड़ोसन मिसेज़ खन्ना टकरा गईं, तो नेहा ने उनका मुस्कुराकर अभिवादन किया.
इधर-उधर की बातचीत के बाद दोनों ने एक-दूसरे को घर आने का निमंत्रण देते हुए विदा ली. जाते-जाते आंटी ने टिया को चॉकलेट भी ख़रीदकर दी.

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“ये तो वही आंटी थीं न, जिनसे आपकी लड़ाई हो गई थी. फिर अभी आप इनसे इतना हंसकर बात क्यों कर रही थीं? और घर आने का निमंत्रण क्यों दे रही थीं?” टिया चॉकलेट पाकर भी मानो ख़ुश नहीं थी. ममा का व्यवहार उसे उलझन में डाल रहा था.
लेकिन नेहा को बेटी को कुछ सीख देने का एक और सुअवसर मिल गया था.

Sangeeta Mathur

        संगीता माथुर

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कहानी- साथी हाथ बढ़ाना 1 (Story Series- Sathi Hath Badhana 1)

पार्टी शुरू होने पर मैं जल्द ही दोस्तों में मशगूल हो गया. कुछ ही देर बाद सावित्री का ख़्याल आया, तो पाया वह महिलाओं से घिरी हुई थी. एक दोस्त ने बताया, “भाभी ने तो महिलाओं पर रंग जमा दिया है. कोई गुलाब जामुन बनाना सीख रही है, तो कोई घर सजाना. कोई क्रोशिए का नमूना मांग रही है, तो कोई बाल लंबे करने के उपाय जान रही है.”

मुग्धा के संग बातों में डूबी नेहा को ध्यान ही नहीं रहा कि टिया कब चुपचाप अंदर खिसक ली थी. लॉबी में मुग्धा के ससुर टीवी में आंखें गड़ाए न्यूज़ देख रहे थे. टिया दबे पांव पीछे जाकर सोफे के एक कोने में दुबक गई और गंभीर मुद्रा में आंखें टीवी पर गड़ा दीं. उसके आश्‍चर्य की सीमा नहीं रही, जब कुछ ही पलों में सामने कार्टून शो आने लगा. उसने नज़रें घुमाई, तो मुग्धा के ससुर उसे ही देखकर मुस्कुरा रहे थे.

“आपको मेरे आने का पता चल गया था?” टिया ने आश्‍चर्य से पूछा.

“हां बिल्कुल! मुझे हर आने-जानेवाले की जानकारी रहती है और उसे क्या पसंद है इसकी भी जानकारी रहती है. ये बाल ऐसे ही धूप में स़फेद नहीं हुए हैं. तुम्हारे दादाजी की उम्र का हूं मैं!”

“किससे बतिया रहे हो?” अब तक मुग्धा की सास भी रसोई से चाय लेकर आ गई थी.

“यह कौन है?” उन्होंने अचकचाकर पूछा.

“मुग्धा की सहेली नेहा आई हुई है. उसी की बेटी है.”

“ओह!” मुग्धा की सास फिर से रसोई में चली गईं और उसके लिए कोल्ड ड्रिंक्स और केक लेकर लौटी.

“कौन-सी क्लास में हो बेटी?”

“सेवेन्थ.” टिया ने कोल्ड ड्रिंक्स थामकर ‘थैंक्यू’ कहा.

चाय की चुस्कियों के साथ दोनों पति-पत्नी बातचीत में रम गए थे. टिया का ध्यान कार्टून से ज़्यादा उनकी ओर था.

उधर नेहा का ध्यान बेटी की ओर गया, तो उसे नदारद पाकर वह चौंक उठी. दोनों सहेलियां उसे ढूंढ़ती हुई लॉबी में पहुंच गईं.

“तुम इधर कब आई?” नेहा ने टिया से पूछा.

तभी अंकल-आंटी पर नज़र पड़ी, तो उन्हें देखकर नेहा बोली, “नमस्ते अंकल-आंटी! कैसे हैं आप लोग? टिया, इन दादा-दादी से मिलीं? यह दादा बहुत बड़े साइंटिस्ट थे. इन्होंने डॉक्टरेट, पोस्ट डॉक्टरेट तक कर रखी है.” नेहा ने सगर्व परिचय करवाया.

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“और दादी आपने?” टिया के प्रश्‍न से सब चौंक से गए.

“मैं तो बेटी मात्र पांचवीं पास हूं.”

“फिर दादा ने आपसे शादी कैसे कर ली? और आप दोनों की इतनी अच्छी केमिस्ट्री कैसे है?”

“टिया!” नेहा ने डांटा. वह बेटी के दुस्साहस पर हैरान थी.

“इसे बोलने दो बेटी. बच्चों की जिज्ञासा का समाधान करना चाहिए, न कि उसे डांटकर चुप करा देना चाहिए.” दादा गंभीर हो उठे थे.

“हमारी शादी तो गुड़िया बचपन में ही तय हो गई थी. तब किसे पता था कि ये इतना आगे बढ़ जाएंगे और मैं गंवार ही रह जाऊंगी.” दादी ने समझाया.

“तुम्हारी दादी गंवार नहीं है बेटी. बहुत ही सुशील और सुसंस्कृत है. हालांकि आरंभ में मैं भी इन्हें नहीं समझ पाया था… तुम लोग भी बैठो न!”

नेहा और मुग्धा एक-एक कुर्सी खींचकर विराजमान हो गईं. नेहा की उत्सुक निगाहें अंकल के चेहरे पर जम गई थीं.

“सावित्री यानी तुम्हारी दादी जब गौना होकर आई, तब मेरी नई-नई नौकरी लगी थी. हमारा संयुक्त परिवार था. मैं नौकरी और आगे की पढ़ाई में लगा रहा और सावित्री घर के कामों में. हमारा मिलना रात को ही हो पाता था और वो भी केवल औपचारिक तौर पर और रिश्ता निभाने भर का, क्योंकि मन तो हमारे कोसों दूर थे. मैं सावित्री को ऑफिस की पार्टियों में भी नहीं ले जाता था. जब डॉक्टरेट पूरी हुई, तो घर पर एक शानदार पार्टी रखी गई. मैं बहुत घबरा रहा था. हालांकि इतने बरसों में सावित्री में बहुत परिवर्तन आ गया था. वह बहुत सलीके से रहने-बोलने लगी थी, पर फिर भी मुझे उसे सबसे मिलवाने में हिचकिचाहट हो रही थी.

पार्टी शुरू होने पर मैं जल्द ही दोस्तों में मशगूल हो गया. कुछ ही देर बाद सावित्री का ख़्याल आया, तो पाया वह महिलाओं से घिरी हुई थी. एक दोस्त ने बताया, “भाभी ने तो महिलाओं पर रंग जमा दिया है. कोई गुलाब जामुन बनाना सीख रही है, तो कोई घर सजाना. कोई क्रोशिए का नमूना मांग रही है, तो कोई बाल लंबे करने के उपाय जान रही है.”

मेरे दिमाग़ से मानो बोझ उतर गया था. पहली बार मैंने सावित्री को मन के क़रीब आते महसूस किया. व़क्त के साथ यह दूरी घटती गई. दोनों बच्चे ममता और फिर मनोज इस दूरी को पाटने का सबब बने.

हमारी शैक्षणिक योग्यता की दूरी इसमें कहीं आड़े नहीं आई, बल्कि दिनभर ऑफिस में तर्क और तथ्यों में उलझा दिमाग़ शाम को भावनाओं-संवेदनाओं की शरण में राहत महसूस करता था. मैं सोचता यदि घर पर भी वही वातावरण मिलता, तो मैं पागल हो जाता. कुछ बातें दिमाग़ से नहीं दिल से बेहतर महसूस की जाती हैं और उसके लिए किसी औपचारिक डिग्री की आवश्यकता नहीं है.”

“और यदि दोनों बराबर शिक्षित हों तो?” टिया का अगला प्रश्‍न था.

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“तब तो तालमेल बैठाना और आसान हो जाता है. दिमाग़ी स्तर समान होने पर दोनों एक-दूसरे की व्यस्तता और मजबूरी आसानी से समझ सकते हैं. एक-दूसरे को ऑफिस के काम में मदद कर सकते हैं, अपनी परेशानियां शेयर कर सकते हैं, सुलझा सकते हैं… नेहा बेटी, एक बात माननी होगी, आपकी बेटी अपनी उम्र से कहीं ज़्यादा समझदार और परिपक्व है.”

Sangeeta Mathur

      संगीता माथुर

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कहानी- स्क्रीन के उस पार 3 (Story Series- Screen Ke Uss Paar 3)

सब कुछ इतना अप्रत्याशित घटा कि अपर्णा कुछ प्रतिक्रिया नहीं दे पाई. कुछ आंसू पलकों से लुढ़ककर गालों के साथ मन भी भिगो गए. क्या इसीलिए प्रशांत कह रहा था कि तुम्हें यह ट्रिप याद रहेगा.

“वाह! जगह वाक़ई बेहद ख़ूबसूरत है और शांत भी, पर यहां मोबाइल टावर ज़रूर लगना चाहिए. फिर देखना यहां का टूरिज़्म बिज़नेस कितना बढ़ेगा.”

“फिर तो यहां भी वही दुकानदारी और दुनियादारी शुरू हो जाएगी. यह अलग और शांत जगह है, इसलिए अच्छी है.” प्रशांत ने जवाब दिया. दोनों ने फ्रेश होकर सफ़र की थकान उतारी और लंच किया. इसके बाद प्रशांत ने अपर्णा का हाथ पकड़कर उसे बेड पर बैठाया. अपर्णा को लगा कि प्रशांत शायद शरारत के मूड में है, मगर चेहरे की गंभीरता कुछ और ही बयान कर रही थी. वह अपर्णा के हाथों को चूमता हुआ बोला, “अब मुझे तुमसे एक ज़रूरी बात करनी है, ध्यान से सुनना.”

“अरे यार, डराओ नहीं, बोलो क्या बात है?” अपर्णा थोड़ी घबरा गई.

“तो सुनो, मैं तुम्हें इस जगह एक ख़ास कारण से लाया हूं. पिछले चार महीनों से देख रहा हूं कि जिस उद्देश्य को लेकर तुम लगी-लगाई नौकरी छोड़ मेरे साथ आई थी, उसे हाशिए पर छोड़कर बहुत-सी बेवजह बातों में उलझ गई हो. हर व़क्त मोबाइल हाथ में लेकर स्क्रोलिंग करते रहना, इस ऐप से उस ऐप में जंप करते रहना, बस यही तुम्हारा लक्ष्य रह गया है. सोशल मीडिया के आभासी जाल में तुमने ख़ुद को ़कैद कर लिया है और उससे निकलना तुम्हारे लिए बहुत ज़रूरी हो चुका है. मुझे मालूम था कि यहां मोबाइल नेटवर्क नहीं है, इसीलिए मैं तुम्हें यहां लाया हूं, ताकि कुछ दिनों के लिए ही सही, मगर अकेले रहकर तुम सोच सको कि तुम अपनी लाइफ के साथ क्या कर रही हो?” प्रशांत की बात सुन अपर्णा जड़ रह गई. जो कुछ सुन रही थी, वह उसकी कल्पना से परे था. घर से इतनी दूर, इस सुनसान हिल स्टेशन पर प्रशांत उसे घुमाने नहीं, बल्कि आईना दिखाने लाया था.

“तुम बहुत अच्छी लेखिका हो अपर्णा, पर पहले मुंबई में व्यस्तता की आड़ लेकर लिखना टालती रही और यहां भरपूर समय होने के बावजूद तुम कुछ नहीं कर रही हो…” सुनकर अपर्णा की झुकी नज़रें डबडबा गई. ज़रा बताओ तो, झारखंड आने के बाद कितनी बार तुमने अपनी उस नोटपैड को खोलकर देखा, जिसमें तुमने कहानियों के वन लाइनर नोट्स बनाए हुए थे. कितनी बार उस डायरी को छुआ, जो न जाने कितनी आधी-अधूरी रचनाओं से भरी पड़ी है?” बात सच ही थी. वे कहां रखे हैं, अपर्णा को यह याद भी नहीं था.

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“पता है अपर्णा, ईश्‍वर हम सभी को कोई-न-कोई ख़ूबी देकर संसार में भेजता है, ताकि हम उस ख़ूबी को व्यक्त कर उसकी दुनिया को सुंदर बनाएं और हम तभी सुखी और संतुष्ट हो पाते हैं, जब हम ऐसा करते हैं, वरना ज़िंदगी में एक अधूरापन-सा सालता रहता है. तुम्हारी वह ख़ूबी तुम्हारा लेखन है. तुम्हारा जीवन तभी सार्थक होगा, जब तुम भरपूर लिखोगी और अच्छा लिखोगी. इन सात दिनों में तुम्हें अकेले रहकर इसी बात पर चिंतन करना है कि तुमसे कहां ग़लतियां हो रही हैं, उन ग़लतियों को पीछे छोड़कर नई शुरुआत करो.” कहते हुए प्रशांत ने उसका नोटपैड और डायरी उसके हाथों में थमा दी. “तो आज से ही काम पर लग जाओ और हां, मैं तुम्हारे साथ यहां नहीं रहूंगा. यह जंग तुम्हें अकेले ही लड़नी और जीतनी है.” सुनकर अपर्णा घबरा गई, “यह क्या कह रहे हो, मैं यहां अकेले कैसे रहूंगी?”

“देखो, मैं कहीं दूर नहीं जा रहा हूं. तुम्हारे आसपास ही रहूंगा, मगर साथ नहीं. यह गेस्ट हाउस मेरे एक कलीग के पिता का है. तुम्हें यहां कोई तकलीफ़ नहीं होगी. मुझे पूरा यक़ीन है कि सात दिन बाद जब मैं तुमसे मिलूंगा, तो तुम्हारी कलम से नई रचनाएं जन्म ले चुकी होंगी. चलो अब मैं चलता हूं.”

“प्रशांत, रुक जाओ प्लीज़.” उदास अपर्णा ने जाते हुए प्रशांत का हाथ थाम लिया. प्रशांत अपर्णा के माथे को चूमते हुए बोला, “विश्‍वास करो जान, इस समय यह एकांत तुम्हारे लिए बहुत ज़रूरी है. इसमें ना वास्तविक दुनिया का दख़ल होगा, ना आभासी दुनिया का. इस एकांत में तुमको बस ख़ुद के साथ रहना है. ख़ुद से बार-बार पूछना है कि कैसी हो अपर्णा? कैसी लाइफ चल रही है, जो करना चाहती थी, क्या कर पाई? ज़िंदगी को कुछ मायने दे पाई या उसे बस यूं ही खाने, पीने, सोने और फोन में जाया कर रही हो? देखना, तुम्हें तुम्हारे भीतर से ही जवाब मिलेंगे.” कहकर अपर्णा को नि:शब्द बैठा छोड़ प्रशांत वहां से चला गया.

सब कुछ इतना अप्रत्याशित घटा कि अपर्णा कुछ प्रतिक्रिया नहीं दे पाई. कुछ आंसू पलकों से लुढ़ककर गालों के साथ मन भी भिगो गए. क्या इसीलिए प्रशांत कह रहा था कि तुम्हें यह ट्रिप याद रहेगा. उसने कहीं पढ़ा था कि अपनी बुरी लतों पर जीत हासिल करना दुनिया का सबसे मुश्किल काम है, लेकिन यदि पहला कदम सही पड़ जाए, तो रास्ता आसान हो जाता है और यह पहला कदम उसे उठाना था वह भी इन्हीं सात दिनों में. ‘मैं ऐसा करूंगी, अपने लिए ना सही, मगर तुम्हारे लिए ज़रूर करूंगी’ उसने मन ही मन निश्‍चय किया.

अपर्णा को एक दिन संभलने में लगा, मगर जब अगली सुबह सूरज तय समय पर खिड़की से झांक रहा था, तो उसने देखा अपर्णा का जान से प्यारा मोबाइल हैंडबैग के अंदर पड़ा अपनी क़िस्मत पर रो रहा है और उसके हाथों में एक डायरी इतरा रही है. उसने डायरी खोली और लिखने बैठ गई.

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एक ऐसी परी की कहानी, जो अपनी नादानी से एक स्क्रीन में कैद होकर बुत बन गई थी, फिर उसका प्रेमी राजकुमार उसे खोजता हुआ आया. अपनी सूझबूझ से उसने स्क्रीन का तिलिस्म तोड़ा और उसे बाहर निकाल ज़िंदा किया. फिर उसे स़फेद घोड़े पर बैठाकर उस जगह ले गया, जहां स्क्रीन के पार खड़ी हसीन ज़िंदगी बांहें फैलाए उसका स्वागत कर रही थी.

Deepti Mittal

    दीप्ति मित्तल

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कहानी- स्क्रीन के उस पार 2 (Story Series- Screen Ke Uss Paar 2)

प्रशांत और अपर्णा को झारखंड आए चार महीने हो चुके थे. दोनों की दिनचर्या बदस्तूर जारी थी. आज प्रशांत थोड़ा चहकते हुए ऑफिस से आया. “कहां छिपी हो अपर्णा डियर? तुम्हारे लिए एक ज़बर्दस्त गुड न्यूज़ है.” अपर्णा भागती हुई आई, “क्या हुआ?”

रहती भी हैं, तो हमारे लिए उनकी अहमियत कम हो जाती है. उन्हें करने की बजाय हम तब तक फ़ालतू चीज़ों के पीछे व़क्त जाया करते हैं, जब तक ज़िंदगी हमें दोबारा मसरूफ़ न कर दे. अपर्णा की भी यही कहानी थी.

शाम को तय समय पर प्रशांत घर आ गया, “और सुनाओ क्या गतिविधि रही दिनभर की? सोशल मीडिया पर कमेंट्स के अलावा भी कुछ लिखा या यूं ही टाइमपास कर दिया.”

“एक प्लॉट डेवलप कर रही हूं.” प्रशांत के ताने से आहत अपर्णा ऊंचे स्वर में बोली.

“कहां? डायरी में लिखकर?”

“नहीं दिमाग़ में.”

“फिर तो हो चुका डेवलप.” प्रशांत कुढ़ा.

“अच्छा ये मज़ेदार फोटो देखो.” अपर्णा बात पलटते हुए उसे मोबाइल पर एक फोटो दिखाने लगी.

“याद है ना मेरी सहेली रश्मि, वैसे कभी छपरा से बाहर नहीं निकली, मगर अब अंडमान घूम रही है. सिर पर घूंघट रखनेवाली स्विमिंग सूट में… वो भी इतनी बड़ी बिंदी लगाए हुए… कैन यू इमैजिन.” लहज़ा मज़ाकिया था.

“यार, जब मेरे साथ बैठती हो, तो इस बला को दूर रखा करो.” प्रशांत उसके हाथ में मोबाइल देखते ही चिढ़ जाता था. उसने मोबाइल लेकर दूर स्टडी टेबल पर रख दिया.

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कुछ इधर-उधर की बातों के बाद अपर्णा ने पूछा, “सुनो, क्या तुम्हें कुछ दिनों की छुट्टी नहीं मिल सकती? जब से आए हैं, इसी घर में कैद हूं. इस सुनसान जगह पर कहीं घूमने-फिरने का स्कोप भी नहीं है. कहीं बाहर चलें? सुना है, आसपास बड़े ख़ूबसूरत हिल स्टेशन हैं. मेरा चेंज हो जाएगा.”

“हम्म. देखते हैं.” चाय पीते हुए प्रशांत अपर्णा को बड़े ध्यान से देख रहा था. बड़ी बेचैन और कंफ्यूज़ नज़र आ रही थी वह. उसका मन जैसे हिरण की गति से इधर-उधर कुलांचे भर रहा था. उन सभी जगहों, उन सभी लोगों के बीच, जिनके उसने दिनभर सोशल मीडिया अपडेट देखे थे. वह एक जगह टिककर बैठ भी नहीं पा रही थी.

तभी अपर्णा चाय छोड़ मोबाइल की ओर दौड़ी. प्रशांत हड़बड़ा गया, “अरे, क्या हुआ?”

“दीदी ने शाम को फोन करने के लिए कहा था, कहीं उन्हीं का फोन न हो.” अपर्णा बोली.

“पर मोबाइल पर कोई रिंग नहीं बजी थी. हे भगवान! अब इसके कान भी बजने लगे.” वह चिंतित स्वर में बोला.

“शायद कहीं बाहर से आवाज़ आई होगी. आजकल सभी की रिंग टोन एक-सी ही होती है.” वह झूठी मुस्कुराहट फेंकते हुए वापस आकर चाय पीने लगी.

प्रशांत और अपर्णा को झारखंड आए चार महीने हो चुके थे. दोनों की दिनचर्या बदस्तूर जारी थी. आज प्रशांत थोड़ा चहकते हुए ऑफिस से आया. “कहां छिपी हो अपर्णा डियर? तुम्हारे लिए एक ज़बर्दस्त गुड न्यूज़ है.” अपर्णा भागती हुई आई, “क्या हुआ?”

“तुम कह रही थी ना, कुछ दिनों के लिए कहीं घूमने चलते हैं, तो बस आज उसी की पूरी प्लानिंग करके आया हूं. मेरी लीव एप्लिकेशन भी अप्रूव हो गई है. कहां जा रहे हैं, यह तुम्हारे लिए सरप्राइज़ है, मगर मैं गारंटी के साथ कह सकता हूं कि यह ट्रिप तुम्हारे जीवन का सबसे बेहतरीन और यादगार ट्रिप होगा. ट्रस्ट मी.”

“मैं तुम पर आंख मूंदकर विश्‍वास करती हूं.” प्रशांत की बातें सुन अपर्णा ने ख़ुुशी और उत्साह से उसके गले में अपनी बांहें डाल दीं. “कहां जा रहे हैं, बताओ ना? इंडिया में या कहीं बाहर?” अपर्णा ने पूछा, तो प्रशांत सोचने लगा कि वाह! पहले आसपास के हिल स्टेशन की बात कर रही थी, अब आउट ऑफ इंडिया. सच ही है बीवी को ख़ुश करना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है.

“सरप्राइज़.” वह कुटिल मुस्कान बिखेरते हुए बोला.

अपर्णा ट्रिप को लेकर बेहद उत्साहित थी. वाह! मज़ा आएगा. कितनी नई ड्रेसेस लेकर आई थी, अब तक एक भी नहीं निकली. वे सभी रख लूंगी, मैचिंग एक्सेसरीज़ के साथ. जमकर सेल्फी लूंगी और पोस्ट करूंगी. पिछले चार महीने से दूसरों की पोस्ट देख-देखकर जल रही हूं, अब उन्हें जलाऊंगी.

ख़ैर वह शुभ दिन आ ही गया. दोनों टैक्सी से गंतव्य की ओर बढ़ रहे थे. रास्ता बेहद ख़ूबसूरत था. प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर, लहराता बलखाता पहाड़ी रास्ता. कहीं छोटे-छोटे झरने बह रहे थे, तो कहीं ऊंचे-ऊंचे पेड़ आसमान को छूने की कोशिश कर रहे थे. अपर्णा को रास्ते में जहां भी नज़ारा अच्छा लगता, टैक्सी रुकवाकर अलग-अलग स्टाइल से सेल्फी लेती और हाथोंहाथ सोशल मीडिया पर पोस्ट कर देती. प्रशांत शांत भाव से यह सब देख रहा था. पता नहीं क्यों आज वह हमेशा की तरह अपर्णा को टोक नहीं रहा था.

चलते-चलते दोनों शहर को काफ़ी दूर छोड़ आए थे. टैक्सी गांव-कस्बों से भी आगे सुनसान बियाबान रास्तों पर बढ़ने लगी. मोबाइल और इंटरनेट सिग्नल धीरे-धीरे कम होने लगे और यह क्या, एक बिंदु के बाद सिग्नल गायब. अब अपर्णा परेशान हो गई, “अरे! ये क्या हुआ?”

“रिमोट एरिया है ना, इसलिए सिग्नल का प्रॉब्लम है, मगर जगह बहुत ख़ूबसूरत है.” अब आया ऊंट पहाड़ के नीचे. सोचते हुए प्रशांत के चेहरे पर विजयी मुस्कुराहट खिल गई, पर अपर्णा का मुंह उतर गया. दोनों इसी बात पर नोंकझोंक करते हुए गेस्ट हाउस पहुंचे. टैक्सी से उतर अपर्णा ने चारों ओर नज़र दौड़ाई.

हिंदुस्तान में इतनी ख़ूबसूरत, भीड़भाड़ रहित और साफ़-सुथरी जगह भी है, उसे विश्‍वास ही नहीं हो रहा था, मगर सिग्नल नहीं आते. यह कमी हर ख़ूबी पर भारी थी.

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दोनों ने गेस्ट हाउस में चेक इन किया. वहां दो-चार लोग रुके हुए थे. कमरा देखकर अपर्णा को बड़ी ख़ुशी हुर्ई. कमरे की खिड़की सामने घाटी की ओर खुल रही थी, वहां से आ रही ठंडी सुगंधित हवा उसे छूकर जैसे उसका स्वागत कर रही थी. सामने खड़े देवदार के वृक्ष भी उसकी ख़ातिरदारी में जैसे सिर झुकाए खड़े थे. चिड़ियों का मधुर कलरव कानों में अमृत घोल रहा था. गहरी सांस भरकर उसने प्रशांत को बांहों में भर लिया.

Deepti Mittal

     दीप्ति मित्तल

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कहानी- स्क्रीन के उस पार 1 (Story Series- Screen Ke Uss Paar 1)

“इस दुनिया में सभी बिज़ी हैं, बस एक मैं ही हूं धरती पर बोझ.” बड़बड़ाते हुए वह स्वचालित-सी रसोईघर की ओर चौथी कप चाय बनाने चल दी. प्रशांत के घर से निकलने के बाद उसका यही रूटीन हो गया था. चाय पर चाय और मोबाइल पर स्क्रोलिंग.

ट्रिन… ट्रिन… ट्रिन… सुबह साढ़े नौ बजे भी बिस्तर में दुबकी अपर्णा लैंडलाइन फोन की लगातार बज रही घंटी को अनसुना कर रही थी. वह मोबाइल पर फेसबुक अपडेट देख रही थी. पता नहीं ये प्रशांत की क्या प्रॉब्लम है, मोबाइल पर कॉल क्यों नहीं करता? एक वही तो था, जो आज भी उस बाबा आदम के ज़माने के फोन पर रिंग मारता था. यह कहते हुए कि इस फोन पर तुम्हारी आवाज़ की मिठास बरक़रार रहती है, मोबाइल पर जब तुम चिल्लाकर ऊंचा बोलती हो, तो कोयल से कौआ बन जाती हो.

फोन लगातार बज रहा था. आख़िरकार वह तंग आकर उठी, “यार, कितनी बार कहा है इस पर नहीं, मोबाइल पर कॉल कर लिया करो. कितनी दूर आना पड़ता है इसे अटेंड करने.”

“हां सच में, बेडरूम से लिविंग रूम की दूरी दो किलोमीटर जो है.” प्रशांत ने हंसकर ताना मारा.

“और सुनाओ क्या कर रही थी? तुमने प्रॉमिस किया था कि आज से मॉर्निंग वॉक शुरू करोगी? नहीं गई ना, झूठी.” प्रशांत ने तक़ादा किया. अपर्णा ने हड़बड़ाकर घड़ी देखी, ‘हे भगवान, प्रशांत को ऑफिस गए डेढ़ घंटा हो गया. समय का पता ही नहीं चला. सोचा तो था कि आज से मॉर्निंग वॉक पर जाऊंगी, मगर हाथ में मोबाइल आते ही समय कहां उड़ जाता है, पता ही नहीं चलता.’

“नहीं, नहीं… वो क्या हुआ कि मेड आज जल्दी आ गई, इसलिए नहीं निकल पाई. कल से पक्का प्रॉमिस.”

प्रशांत समझ गया कि फिर इसने अपनी सुबह सोशल मीडिया पर ख़राब कर दी. कल कितना समझाया था कि हर व़क्त मोबाइल स्क्रीन में आंखें न गड़ाए रहा करो. आंखों के साथ दिमाग़ की भी बैंड बज जाएगी. सोशल मीडिया की लत के साइड इफेक्ट्स वाला आर्टिकल भी फॉरवर्ड किया था. सब कुछ देखा होगा, बस वही नहीं देखा होगा. खैर, थोड़ा डांट-डपटकर प्रशांत ने फोन रख दिया.

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अपर्णा अभी अलसाई-सी सोच ही रही थी कि दिन की शुरुआत कहां से करूं? तभी मोबाइल पर नए नोटिफिकेशन दिखाई दिए. उसके हाथ ख़ुद-ब-ख़ुद मोबाइल की तरफ़ बढ़ गए. पुरानी कलीग निशा ने इंस्टाग्राम पर ग्रुप फोटो पोस्ट की थी. उसके पहले ऑफिस का गैंग लोनावला ट्रेकिंग पर गया था. ‘मिसिंग यू डियर’ का मैसेज मुंह चिढ़ाता प्रकट हुआ, तो दिल पर छूरियां चल गईं. जब मैं वहां थी, तब तो किसी ने कोई प्लानिंग नहीं की और जब से यहां आई हूं, हर महीने कहीं न कहीं उड़ते फिर रहे हैं.

पुरानी सहेलियों के व्हाट्स ऐप ग्रुप पर एक फोटो बचपन की सहेली रश्मि ने भी डाली थी. अंडमान आइलैंड के बीच पर जलपरी बनी पड़ी थी. ‘यलो सनग्लासेस और बिंदी लगाकर कौन स्विमिंग करता है. ज़रा भी अक्ल नहीं है. गवार कहीं की.’ दिल में पनपी ईर्ष्या ज़बान के रास्ते फूट पड़ी.

पूरी दुनिया मौज़ उड़ा रही है,  बस एक मैं ही घर में अकेली पागलों की तरह बैठी हुई हूं. सचमुच बेकार ही आ गई प्रशांत की बातों में. मुंबई में अच्छी-ख़ासी जॉब थी. बहुत कुछ नहीं था, लेकिन इतनी भी बुरी नहीं थी.

कम-से-कम दोस्तों के साथ आउटिंग पर तो जा पाती. देखो, सब कितने ख़ुश लग रहे हैं. धड़ाधड़ स्टेटस अपडेट कर रहे हैं और एक मैं… हफ़्तों हो गए स्टेटस अपडेट किए हुए. एक फोटो, एक क़िस्सा भी तो ऐसा नहीं, जो दोस्तों के साथ शेयर कर सकूं. क्या भेजूं? ‘देखो, ये है दिन में भी नाइटी पहने घर की चारदीवारी में भटकती आत्मा अपर्णा.’

अपर्णा जैसे-जैसे दोस्तों के स्टेटस देख रही थी, ख़ुश होने की बजाय दिल की जलन बढ़ती जा रही थी. लग रहा था दुनिया में सबसे मनहूस जीवन उसी का चल रहा है. इसी झुंझलाहट में दीदी को ही फोन घुमा दिया. “और सुनाओ दी, क्या हालचाल है?”

“सुन, मैं तुझे शाम को फ्री होकर फोन करती हूं.” कहकर दीदी ने तुरंत फोन काट दिया.

“इस दुनिया में सभी बिज़ी हैं, बस एक मैं ही हूं धरती पर बोझ.” बड़बड़ाते हुए वह स्वचालित-सी रसोईघर की ओर चौथी कप चाय बनाने चल दी. प्रशांत के घर से निकलने के बाद उसका यही रूटीन हो गया था. चाय पर चाय और मोबाइल पर स्क्रोलिंग.

तीन महीने पहले तक अपर्णा मुंबई में एक प्रसिद्ध पत्रिका में फीचर एडिटर के पद पर कार्यरत थी, पर अब उसका दिल उस काम में लगना बंद हो गया था. वह बेहतरीन लेखिका थी. बेहद क्रिएटिव, एक सिंपल-सी फेसबुक पोस्ट भी ऐसे लिखती कि लोग वाह-वाह कर उठते. बहुत-सी कहानियों, उपन्यासों के कीड़े उसके दिमाग़ में सालों से कुलबुला रहे थे, मगर एडिटर का डिमांडिंग रोल उसे इतना थका देता कि अपने मन का कुछ लिखने का न व़क्त मिलता, न ही उत्साह बचता. जब प्रशांत को सालभर के लिए झारखंड में एक प्रोजेक्ट पर आना था, तो वह कहने लगा,“ख़ूबसूरत जगह है. सालभर की बात है. साथ चलना चाहो तो चलो, वरना दोनों बारी-बारी एक-दूसरे के पास अपडाउन कर लेंगे. जैसी तुम्हारी मर्ज़ी. आई एम विद यू.”

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अपर्णा को यह ईश्‍वर का दिया हुआ अवसर नज़र आया. उसने सोचा कि चलो इसी बहाने जॉब से ब्रेक मिलेगा और वहां प्रकृति की छांव में बैठकर वह सब कुछ पन्नों पर उतार देगी, जो सालों से भीतर छटपटा रहा है. एक पब्लिशर से बात भी करके आई थी कि सालभर के अंदर एक कहानी संग्रह और एक शॉर्ट नॉवेल तैयार करके देगी, मगर पता नहीं ऐसा क्यों होता है कि बेहद मसरूफ़ व़क्त में जिन चीज़ों को करने के लिए हम मरे जा रहे होते हैं, व़क्त मिलने पर वही चीज़ें हमें याद भी नहीं रहतीं.

Deepti Mittal

      दीप्ति मित्तल

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कहानी- मोहभंग 3 (Story Series- Mohbhang 3)

‘’तुम्हारे विवाह के पश्‍चात उसने निखिल को भी भड़काने का प्रयत्न किया. उसने निखिल से कहा कि विवाह से पूर्व तुम्हारे अनेक लड़कों से संबंध रहे हैं. तुम्हारे विरुद्ध और भी अनेक कहानियां गढ़ीं. उसने तुम्हारा विवाह तोड़ने का पूरा प्रयत्न किया, पर निखिल चट्टान की तरह अडिग खड़े रहे. बहुत संस्कारशील हैं वह. उन्होंने तुम्हारे पापा को आश्‍वासन दिया, “आप किसी प्रकार की चिंता न करें. आपकी बेटी के सम्मान की रक्षा करना अब मेरा कर्त्तव्य है और मैं उसका पूरी तरह निर्वाह करूंगा.”

मां बता रही थीं और मेरे कानों में एक-एक शब्द किसी पत्थर की तरह चोट कर रहा था, नहीं मरहम लगा रहा था.

पहला दिन तो यूं ही बीत गया. रात का भोजन करते ही मैं अपने कमरे में जा लेटी. ‘मेरा कमरा! जो मेरे चले जाने के बाद भी, मेरा ही कमरा था. मां ने उसे ज्यों-का-त्यों रखा हुआ था- मेरे कपड़े, किताबें, बचपन की गुड़िया सब कुछ. जो मां नहीं देख पाती थी, मनोज की यादें, वह सब भी वहीं मौजूद थीं. मुझे स्वयं पर क्रोध भी आया कि मैंने आते ही उसे फोन क्यों नहीं किया? पर कैसे करती. मुझे उससे लंबी बातें करनी थी, वह भी एकांत में. और आज वह संभव नहीं था.

मैं योजनाएं बनाने लगी, ‘क्यों न अकस्मात् उसके सामने पहुंच उसे अचरज में डाला जाए?’ मुझे सामने देख वह कैसी प्रतिक्रिया करेगा, यह देखने को आकुल थी मैं.

मां अपना सारा काम समेट मेरे पास आ बैठीं और इधर-उधर की बातें करने लगीं. निखिल की, उनके सब रिश्तेदारों की ख़बर ली. और मैं ‘हां हूं’ करती रही, संक्षिप्त से उत्तर देती रही. उन लोगों से कोई शिकायत तो नहीं थी, पर वहां ख़ुश भी तो नहीं थी मैं. सच पूछो, तो मुझे क्रोध भी पापा पर ही था. बचपन से मेरी हर ज़िद पूरी करते आए थे और मेरे जीवन का सबसे महत्वपूर्ण निर्णय अपनी मर्ज़ी से कर लिया था. मैं क्या पिछली सदी की लड़कियों जैसी हूं कि गाय की तरह जिस खूंटी पर बांध आओगे, वहीं ख़ुश रह लूंगी.

‘यदि मैं निखिल से तलाक़ ले लूं, फिर तो पापा को मनोज से मेरे विवाह के लिए मानना ही पड़ेगा न.’ मैंने सोचा. मेरी चुप्पी देख मां कुछ बेचैन हो उठीं. उन्होंने मुझे सदा मौज-मस्ती करते ही देखा था. वह मेरी आवाज़ में वह खनक नहीं सुन पा रही थीं, जिसकी वह आदी थीं. परेशानीभरे लहज़े में उन्होंने पूछा, “निखिल ने कुछ कहा क्या तुमसे, मनोज के बारे में?”

“निखिल को मैंने बताया ही कब मनोज के बारे में, और बताऊंगी भी क्यों?” मैं समझ नहीं पाई मां का आशय, अत: प्रश्‍नवाचक दृष्टि से उनकी तरफ़ देखा, तो वह बोलीं, “तुम्हारे पापा ने मनोज के बारे में खोज-ख़बर की थी, किसी ने भी उसके बारे में अच्छी राय नहीं दी. अनेक बातें सुनीं. ऐय्याश है, मम्मी-पापा के संग नहीं रहता इत्यादि. उसने हमसे झूठ कहा था कि मम्मी-पापा बाहर गए हुए हैं. ऐसे व्यक्ति का कैसे विश्‍वास किया जाए?  तुम्हारी आंखों पर तो उस समय मनोज के प्यार का चश्मा चढ़ा था, तो तुम्हें उसके वह सब अवगुण बताने से भी दिखाई न देते. परंतु पापा का अन्तर्मन इस रिश्ते की गवाही नहीं दे रहा था. पापा ने दुनिया देखी है और वही हुआ.

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तुम्हें कुछ नहीं बताया, ताकि तुम परेशान न हो जाओ. तुम्हारी मंगनी की ख़बर सुनकर उसने तुम्हारे पापा को धमकीभरा टेलीफोन किया था, पर तुम्हारे पापा डरे नहीं. उन्होंने धमकी का जवाब धमकी से दिया, उसके ख़िलाफ़ रिपोर्ट दर्ज करवाने की धमकी देकर. वकालत का पेशा होने से हम बच गए. वह जानता था कि पापा की पहुंच ऊंचे तक है.

तुम्हारे विवाह के पश्‍चात उसने निखिल को भी भड़काने का प्रयत्न किया. उसने निखिल से कहा कि विवाह से पूर्व तुम्हारे अनेक लड़कों से संबंध रहे हैं. तुम्हारे विरुद्ध और भी अनेक कहानियां गढ़ीं. उसने तुम्हारा विवाह तोड़ने का पूरा प्रयत्न किया, पर निखिल चट्टान की तरह अडिग खड़े रहे. बहुत संस्कारशील हैं वह. उन्होंने तुम्हारे पापा को आश्‍वासन दिया, “आप किसी प्रकार की चिंता न करें. आपकी बेटी के सम्मान की रक्षा करना अब मेरा कर्त्तव्य है और मैं उसका पूरी तरह निर्वाह करूंगा.”

मां बता रही थीं और मेरे कानों में एक-एक शब्द किसी पत्थर की तरह चोट कर रहा था, नहीं मरहम लगा रहा था. कितनी सौभाग्यशाली हूं मैं, जो निखिल को मैंने पाया. मुझे ध्यान आया कि एक दिन निखिल के बहुत देर से घर लौटने पर मुझे बहुत क्रोध आया और मैं निखिल को बहुत जली-कटी सुनाकर ग़ुस्से से भरी सोफे पर जा सोई थी. आंख मूंद लेटी तो थी, परंतु मौसम थोड़ा ठंडा होने के कारण नींद नहीं आ रही थी. इतने में मैंने महसूस किया कि निखिल ने आकर मुझे कंबल ओढ़ा दिया और मुझे सोया जान मेरे माथे और सिर को हल्के से सहला दिया. मेरी हर बात को मेरा बचपना मान माफ़ करते रहे वह. कभी क्रोध तो उन्हें आता ही नहीं था. मेरा मोहभंग हो चुका था.

निखिल को नहीं, बदलने की ज़रूरत तो मुझे थी. कितनी परिपक्वता थी निखिल के प्यार में, कितना विश्‍वास! मनोज द्वारा चलाए बाण उसे डिगा नहीं पाए थे. मुझे स्वयं को भी निखिल जैसा बनाना था, जी तो चाह रहा था कि फ़ौरन घर लौट जाऊं, पर कारण क्या बताती?

मम्मी-पापा के पास दो दिन और रुककर मैं लौट आई.

      उषा वधवा

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कहानी- मोहभंग 2 (Story Series- Mohbhang 2)

विवाह तो धूमधाम से हुआ था, बस मेरे ही मन में कोई उत्साह नहीं था. कठपुतली बन सब रीति-रिवाज़ पूरे करती रही. छह माह बहुत मुश्किल से काटे मैंने अपने इस कथित घर में. उकता गई थी मैं इस बेरंग उबाऊ जीवन से. मुझे दिल्ली का अपना जीवन बहुत याद आता. ‘पापा, आप ग़लत थे, जो सोचते थे कि मैं मनोज के संग ख़ुश नहीं रह पाऊंगी. कैसा ख़ुशमिज़ाज था वह. उसके साथ बीता हर पल मेरी याद में बसा है. कैसे मस्ती से भरपूर थे वो दिन.’ मेरे भीतर विद्रोह पनप रहा था.

बीए ख़त्म हुआ, तो विवाह की चर्चा होने लगी. मां को मैंने मनोज के बारे में बताया और मां ने पापा को. पापा ने कहा, “ठीक है, उससे कहो अपने माता-पिता को हमारे घर ले आए, ताकि हम बड़े भी आपस में मिल लें.” समय, दिन सब तय हो गया. वह आया भी, परंतु साथ में अपने किसी मित्र को लेकर. “मम्मी-पापा बाहर गए हुए हैं.” उसने बताया. ढेर सारी बातें हुईं. उसने पापा को प्रभावित करने का पूरा प्रयत्न किया, पर पापा ने जब उससे कहा कि कुछ भी तय करने से पहले उसके मम्मी-पापा से मिलना आवश्यक है, तो उसने उत्तर दिया, “मेरे मम्मी-पापा ने मुझे अपना जीवनसाथी चुनने की पूरी छूट दे रखी है और मैंने आपकी बेटी को पसंद किया है, तो फिर अड़चन क्या है?”

मनोज को गए दो दिन बीत गए थे. पापा बहुत व्यस्त से तो दिखे, पर मुंह से कुछ न बोले. मैंने सोचा था कि पापा को उसने पूरी तरह से प्रभावित कर दिया है और वह सहर्ष हां कर देंगे. परंतु पापा की चुप्पी देख मेरे मन में धुकधुकी होती रही, बस उनसे कुछ पूछने की हिम्मत भी नहीं हो रही थी. तीसरे दिन कोर्ट से लौटकर पापा ने मुझे अपने कमरे में बुलाया और कहा, “क्या तुम्हें मुझ पर विश्‍वास है? यह विश्‍वास है कि मैं जो भी करूंगा, तुम्हारे हित की सोचकर ही करूंगा.” भय और असमंजस से भरी, मैने हां में सिर हिला दिया.

“मैंने दुनिया देखी है, व्यक्ति को पहचानने का अनुभव है मुझे. मनोज अच्छा व्यक्ति नहीं है, तुम उसका इरादा छोड़ दो. अभी तुम यह नहीं समझ पा रही हो, पर मेरा अनुभव यही कहता है. मैंने कुछ जांच-पड़ताल भी की है. वह तुम्हारे योग्य नहीं है.”

मां से कहा, तो उन्होंने भी पापा का पक्ष लिया. बोलीं, “पापा ने कुछ देख और सोचकर ही तो निर्णय लिया होगा.”

पापा ने निखिल से मेरा विवाह तय कर दिया. उसने कुछ वर्ष पूर्व वकालत की अपनी शुरुआती ट्रेनिंग पापा के अधीन ली थी. अब वह मेरठ में अपने पैतृक घर में मां के साथ रहते थे. पापा ने हमारी मुलाक़ात करवाई, बातचीत भी हुई, पर मैं अपने मन से यह बात कैसे निकालती कि मेरा विवाह मनोज से नहीं हो रहा था.

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और मैं ब्याहकर मेरठ आ गई. विवाह तो धूमधाम से हुआ था, बस मेरे ही मन में कोई उत्साह नहीं था. कठपुतली बन सब रीति-रिवाज़ पूरे करती रही. छह माह बहुत मुश्किल से काटे मैंने अपने इस कथित घर में. उकता गई थी मैं इस बेरंग उबाऊ जीवन से. मुझे दिल्ली का अपना जीवन बहुत याद आता. ‘पापा, आप ग़लत थे, जो सोचते थे कि मैं मनोज के संग ख़ुश नहीं रह पाऊंगी. कैसा ख़ुशमिज़ाज था वह. उसके साथ बीता हर पल मेरी याद में बसा है. कैसे मस्ती से भरपूर थे वो दिन.’ मेरे भीतर विद्रोह पनप रहा था. मेरी इच्छा के विपरीत आपने मेरा विवाह निखिल से कर तो दिया, परंतु आप मुझे इससे बंधे रहने को मजबूर नहीं कर सकते.’ मैं मन-ही-मन पापा से कहती.

मैंने दिल्ली जाने का निर्णय लिया. मैंने जब निखिल को अपने जाने की बात कही, तो वह बोले, “मां की तबीयत अभी ठीक नहीं चल रही है. अगले सप्ताह मेरी दो छुट्टी है, एक-दो और ले लूंगा, तब की टिकट ले लेता हूं.” मैंने निखिल पर एहसान जताते हुए उसकी बात मान ली. दरअसल, निखिल इस ग़लतफ़हमी में थे कि मैं दो-चार दिन के लिए जाना चाह रही हूं जबकि मैंने यह तय कर लिया था कि मैं लौटकर नहीं आऊंगी. और मैंने उसी हिसाब से अपना सामान तैयार कर लिया.

निखिल ने मम्मी-पापा को भी सूचित कर दिया था. ख़ूब ख़ुश हुए वह मुझे देखकर. उनके घर रौनक़ लौट आई थी. दिनभर आस-पड़ोस का, मेरी सखियों का तांता लगा रहा. मां ने तरह-तरह के व्यंजन बना रखे थे. सहेलियों के संग ख़ूब मस्ती की,

घूमने-फिरने का, फिल्म देखने का कार्यक्रम भी बना. तरस गई थी मैं इन सब चीज़ों के लिए. मन में निश्‍चय गहरा होता गया कि लौटकर निखिल के पास नहीं जाना है, परंतु मां से अभी कुछ नहीं कहा था.

अभी तो मैं मनोज से मिलने की युक्ति लगा रही थी. उसे मैंने धोखा दिया था. वह अवश्य ही मुझसे नाराज़ होगा. मुझे याद कर उदास होता होगा. मैंने सोचा और मेरे सामने किसी मजनू का सा चेहरा घूम गया.

usha vadhava

       उषा वधवा

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कहानी- मोहभंग 1 (Story Series- Mohbhang 1)

बुआ की बातें वैसे भी अबूझ होती थीं. कभी कहतीं, “पराए घर जाएगी तो…” और कभी कहतीं, “अपने घर जाकर जो मर्ज़ी करना, यहां लड़की बनकर रहो.” मुझ पर बस न चलता, तो बुआ मां को समझाने लगतीं, “लड़की को घर पर बैठना सिखाओ. घर का कुछ कामकाज सीखे. कौन-सा उसे नौकरी करनी है, जो पढ़ाए चले जा रहे हो.” 

बहरहाल, मैं बुआ की बातों को नज़रअंदाज़ करके साइकिल उठा घूमने चली जाती. क्या करूं, मुझे ‘घर घिस्सू टाइप’ लोगों से बहुत कोफ़्त होती थी.

निखिल के काम पर जाते ही मैंने दरवाज़ा बंद किया और जाकर सोफे पर बैठ गई. थोड़ा-बहुत काम अभी बाक़ी था, परंतु सामने पहाड़-सा दिन भी तो पड़ा था- ‘नीरस और उबाऊ.’ इस कमरे से उस कमरे तक, बस इतने में ही सिमट गई थी मेरी दिनचर्या. घर में हम तीन ही तो प्राणी थे. मांजी धार्मिक प्रवृति की थीं. स्नान के पश्‍चात घंटाभर अपने पूजाघर में बितातीं, उसके पश्‍चात ही अन्न ग्रहण करतीं.

छह माह हो गए थे मेरे विवाह को और हर दिन ऐसे ही बीता था, सिवाय पहले के 15 दिन, जब लोगों का आना-जाना रहा. निखिल दिनभर कोर्ट-कचहरी में व्यस्त रहते, छुट्टी के दिन भी कुछ-न-कुछ काम लेकर बैठे रहते. घूमना-फिरना, मित्रमंडली, फिल्मों इत्यादि में उनकी रुचि बिल्कुल नहीं थी, जबकि मुझे इन सबके बिना जीवन बेकार लगता था. मेरे लिए जीवन एक उत्सव यात्रा थी. अपने कर्त्तव्य निभाने से इंकार नहीं था मुझे, परंतु इस जीवन को भरपूर जीना चाहती थी मैं. निखिल की ओर से कोई रोक भी नहीं थी, परंतु मेरे संगी-साथी तो सब पीछे छूट चुके थे और इस छोटे-से शहर में मुझे अभी तक कोई ऐसी संगिनी मिली ही नहीं थी, जिसके साथ मैं मौज-मस्ती कर सकूं. बहुत पारंपरिक क़िस्म के लोग रहते थे हमारे आसपास, जहां स्त्रियां अपनी घर-गृहस्थी में ही ख़ुश थीं. मांजी ने अपनी पूरी उम्र यहीं बिताई थी, इसलिए वह भी उन्हीं विचारों की थीं. मैं उनकी पूरी देखभाल करती थी.

प्याज़-लहसुन बग़ैर उनकी पसंद का भोजन बनाती, समय पर परोसती, पर उसके बाद भी तो बड़ा-सा दिन बच जाता था.

‘आप ग़लत थे पापा जो सोचते थे कि मनोज मेरे लिए उपयुक्त वर नहीं था और निखिल के संग ख़ुश रहूंगी मैं.’ मन-ही-मन मैं अपने पापा से कहती. ‘कुछ भी तो यहां मेरे मन-माफ़िक़ नहीं है.’

विवाह से पहले मैं कभी रसोई में नहीं घुसी थी और यहां आने पर मांजी अपेक्षा करने लगीं कि अब रसोई मैं ही संभालूंगी. पहले दिन वह दाल चढ़ाने को बोल मंदिर चली गईं. यह तो अच्छा था कि छुट्टी का दिन था और निखिल घर पर थे. मैंने उनसे अपनी समस्या बताई, तो उन्होंने रसोई में आकर मेरी सहायता भी की और सब कुछ ब्योरेवार समझाया भी. बाद में भी कोई समस्या आने पर वह मुझे गाइड करते. मांजी की तबीयत ख़राब होने पर विवाह से पूर्व वह ही उनकी सहायता किया करते थे, इसलिए उन्हें भोजन बनाना आ गया था. अच्छे इंसान थे निखिल, परंतु जिस तरह के जीवनसाथी की मैंने कल्पना की थी, उससे बहुत भिन्न.

मम्मी-पापा की लाडली थी मैं और मुझे हर तरह की आज़ादी मिली हुई थी. पापा मुझे अपनी शहज़ादी कहते. न भाई, न बहन, उनका पूरा प्यार मेरे लिए था. थोड़ा बिगड़ गई थी मैं शायद. लड़कों की तरह घूमना, मनमर्ज़ी करना. मां तो कुछ न कहतीं, पर बुआ जब भी आतीं, मम्मी-पापा को एक लंबा-सा भाषण दे जातीं. ‘बिगाड़ रहे हो बेटी को’ वह कहतीं. “पराए घर जाएगी, तो नाक कटवाएगी तुम्हारी.” उनकी यह पराए घरवाली बात मेरी समझ न आती. यहां तो फिर भी मम्मी-पापा को बताना पड़ता था कि कहां जा रही हूं, विवाह के बाद तो किसी से पूछने की आवश्यकता ही नहीं रहेगी. वह तो मेरा अपना घर होगा. बुआ की बातें वैसे भी अबूझ होती थीं. कभी कहतीं, “पराए घर जाएगी तो…” और कभी कहतीं, “अपने घर जाकर जो मर्ज़ी करना, यहां लड़की बनकर रहो.” मुझ पर बस न चलता, तो बुआ मां को समझाने लगतीं, “लड़की को घर पर बैठना सिखाओ. घर का कुछ कामकाज सीखे. कौन-सा उसे नौकरी करनी है, जो पढ़ाए चले जा रहे हो.”

बहरहाल, मैं बुआ की बातों को नज़रअंदाज़ करके साइकिल उठा घूमने चली जाती. क्या करूं, मुझे ‘घर घिस्सू टाइप’ लोगों से बहुत कोफ़्त होती थी.

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इन्हीं मौज-मस्ती से भरे दिनों में मेरी मनोज से दोस्ती हुई थी. कॉलेज का वार्षिक उत्सव था. मुझे खेलकूद में बहुत सारे इनाम मिलने थे. पारितोषिक वितरण के पश्‍चात चाय-नाश्ते का प्रबंध भी था. कॉलेज यूनियन का अध्यक्ष था मनोज, मुझसे तीन वर्ष सीनियर. चाय के दौरान मेरे पास आकर बोला, “कल कॉफी पीने चलें, ठीक चार बजे?” और मेरे उत्तर देने से पहले ही जोड़ दिया, “मैं इंतज़ार करूंगा कैफेटेरिया में.” पहली बार एहसास हुआ दिल की धड़कन तेज़ होना किसे कहते हैं. मेरा दिमाग़ सातवें आसमान पर. लड़कियां दीवानी थीं उसकी और उसने स्वयं मुझे आमंत्रित किया था. हमारी यह छोटी-सी मुलाक़ात कॉफी से शुरू होकर गहरी मैत्री तक पहुंच गई. ख़ूब पटती थी हम दोनों की. वह भी घूमने-फिरने का बहुत शौकीन था और उसके पास निजी कार भी थी. हमारा कोई-न-कोई कार्यक्रम बना ही रहता. उसके पिता का अपना कारोबार था, पढ़ाई तो वह बस डिग्री पाने के लिए कर रहा था. और मुझे भी घर में स्पष्ट कर दिया गया था कि बीए कर लो बहुत है, नौकरी थोड़े ही करनी है.

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        उषा वधवा

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कहानी- आख़री सवाल 3 (Story Series- Aakhari Sawal 3)

मानसी ने मन ही मन दृढ़ निश्‍चय कर लिया कि अब वो कठपुतली की ज़िंदगी नहीं जीएगी. उसने जैसे अपने आपसे कहा, ‘अगर सूत्रधार की मज़बूत पकड़ से डोर नहीं खींच सकती तो क्या हुआ… अपने साथ जुड़ी डोर तो तोड़कर फेंक सकती हूं न… बस बहुत हो गया… अब मैं वही करूंगी, जो मुझे करना है. अपनी अस्मिता… अपने अस्तित्व… और बकौल प्रभात के मेरे भीतर समाहित ‘मैं’ का भी तो कोई मूल्य है न.’

मां मानसी का नीरस और एकाकी जीवन देख कर मन ही मन जैसे अंगारों पर लोटती रहती. कल ही तो विह्वल होकर मानसी से कहा था मां ने, “मेरे बाद पहाड़ जैसा एकाकी जीवन कैसे जीएगी मेरी बेटी. सच कहती हूं, कभी-कभी तो जी करता है तेरा दूसरा ब्याह रचा दूं… टकरा जाऊं समाज की बनाई सारी रीतियों से.”

मानसी की आंखें पीड़ा की अधिकता से भर आयीं. उसने धीमे स्वर में कहा, “पहले ये तो बताओ मां, समाज मुझे क्या दर्ज़ा देता है? ब्याहता का, परित्यक्ता का या विधवा का..? मेरी तो कोई पहचान ही नहीं. कभी-कभी सोचती हूं, माथे पर बिंदिया, मांग में सिंदूर क्यों लगाती रही हूं वर्षों से…? क्यों जीती रही हूं दोहरी ज़िंदगी? विवाहिता के छद्म आवरण में लिपटे अपने कौमार्य को, अपने सपनों को क्यों छलती आयी हूं आज तक..?”

कहते-कहते वो बिलख-बिलख कर रो पड़ी थी. परित्यक्ता शब्द जब किसी नारी के साथ जुड़ जाता है, तो वो किसी नासूर से कम पीड़ा नहीं देता. लाख जतन कर लिए जाएं, पर समाज एक नश्तर की तरह इस घाव को कभी भरने नहीं देता. क्या-क्या नहीं भोगा है मानसी ने. आज… पंद्रह वर्षों के बाद… ज़िंदगी के इस मोड़ पर प्रभात पुनः उसके जीवन में साधिकार प्रवेश चाहता है? और वो भी ऐसी स्थिति में, जब वो एक दुर्घटना में अपनी पत्नी और बच्चे को खो चुका है. आज जो सामाजिक संवेदना प्रभात के साथ है, वो वर्षों पहले मानसी के साथ नहीं थी. मां ने कहा था, “बेचारा…”

कल रात पहली बार मानसी ने घरवालों के सामने मुंह खोला, “मैं प्रभात के साथ नहीं जाऊंगी… अब बहुत देर हो चुकी है.” सब की आंखें हैरत से फटी रह गयीं. बड़े भैया ने क्रोध से कहा- “कुछ भी हो, तुम्हें उसके साथ जाना ही होगा… आख़िर वो तुम्हारा पति है.”

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मानसी के परिवार वाले उसकी चुप्पी को स्वीकृति समझकर ख़ुशी-ख़ुशी प्रभात के आगमन की प्रतीक्षा करने लगे, पर मानसी ने मन ही मन दृढ़ निश्‍चय कर लिया कि अब वो कठपुतली की ज़िंदगी नहीं जीएगी. उसने जैसे अपने आपसे कहा, “अगर सूत्रधार की मज़बूत पकड़ से डोर नहीं खींच सकती तो क्या हुआ… अपने साथ जुड़ी डोर तो तोड़कर फेंक सकती हूं न… बस बहुत हो गया… अब मैं वही करूंगी, जो मुझे करना है. अपनी अस्मिता… अपने अस्तित्व… और बकौल प्रभात के मेरे भीतर समाहित ‘मैं’ का भी तो कोई मूल्य है न.”

“मानसी, नीचे आओ न… क्या कर रही हो इतनी देर से?” बड़ी भाभी ने पुकारा तो उसकी तंद्रा भंग हुई. न जाने कब से वो ख़यालों में गुम थी. उसने अपनी सूनी मांग  को देखा, फिर कुछ सोचकर ड्रेसिंग टेबल की दराज से सिंदूर की डिबिया निकाली और थोड़ा-सा सिंदूर मांग में भर लिया.

कितना आसान होता है पुरुष के लिए बंधन तोड़ देना, पर स्त्री का तो सारा वजूद ही सिंदूर की लाल रेखा के साथ बंध जाता है. सिंदूर और भावना का बड़ा गहरा नाता है. भावना कोई खर-पतवार नहीं, जिसे सहज ही उखाड़ कर फेंक दिया जाए. भावना तो विशाल वट वृक्ष की तरह होती है, जिसकी जड़ें गहरे तक मन में जमी होती हैं.

मानसी तैयार होकर नीचे हॉल में चली आयी और नौकर से कहा, “ऊपर जाकर मेरा सामान नीचे ले आ… और हां, एक टैक्सी भी ले आना.”

“अच्छा… जाने की इतनी उतावली? अभी तक तो प्रभात आया भी नहीं है.” छोटी भाभी ने चुहल की तो मानसी ने निर्विकार भाव से कहा, “मां… मैं जा रही हूं… कॉलेज कैम्पस में ही मुझे एक क्वार्टर मिल गया है, अब मैं वहीं रहूंगी… मैं जानती हूं, न तो ये घर मेरा है और न प्रभात का… मैं अपने घर जा रही हूं. और हां बड़े भैया, प्रभात आएं तो कह दीजिएगा, मैंने तो उनके लिखे पत्र का अक्षरशः पालन किया है. अपने भीतर समाहित ‘मैं’ का मूल्य ज्ञात है मुझे…. कभी उन्होंने जिस बंधन से मुझे आज़ाद करने की बात कही थी, आज उसी बंधन से मैं उन्हें मुक्त कर रही हूं.”

“तेरा दिमाग चल गया है क्या? लोग क्या कहेंगे?” बड़े भैया चीख पड़े.

“बेटी, सुबह का भूला अगर शाम को घर आ जाए तो उसे भूला नहीं कहते.” मां ने समझाना चाहा तो मानसी बिफर कर बोली, “सुबह का भूला? सुबह और शाम के बीच पंद्रह वर्षों का अंतराल नहीं होता मां. उस अंतराल की वेदना, उसकी चुभन, उसकी कसक का हिसाब मुझे कौन देगा मां? ये समाज..? परिवार..? या खुद प्रभात? प्रभात तो एक पुरुष है, अच्छी तरह जानता है कि वो चाहे जिस तरह से नारी की अस्मिता को रौंद डाले, नारी हर परिस्थिति में उसे अंगीकार करने पर विवश ही होगी. मां, आज तक मैंने आपके, भैया-भाभी के, समाज के और अपने मन में उठे हर प्रश्‍न का उत्तर दिया है, पर आज एक आख़री सवाल पूछती हूं… आख़िर स्त्री कब तक सहेगी? कभी तो विद्रोह का स्वर मुखर होगा ही… फिर शुरुआत मुझ से ही क्यों नहीं..? बोलो मां, शुरुआत मुझसे ही क्यों नहीं..?”

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अपने आंसुओं को रोकने की नाकाम कोशिश करती हुई मानसी तेज़ क़दमों से घर की दहलीज़ लांघ बाहर चली आयी. टैक्सी में बैठी तो न चाहते हुए भी अब तक अवरुद्ध अश्रु प्रवाह सारे बांध तोड़कर बह निकला. आंसू की हर बूंद एक ही सच्चाई को बयान कर रही थी कि नारी किसी भी बंधन को तोड़ना नहीं चाहती. हर बंधन में समा जाना ही तो नारीत्व है. पर आज की नारी अपनी अस्मिता और अपने

वजूद को अहमियत देती हुई हर बंधन निभाना चाहती है, इनकी क़ीमत पर नहीं.

डॉ. निरूपमा राय

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कहानी- आख़री सवाल 2 (Story Series- Aakhari Sawal 2)

“क्या मुझे अपनी ख़ुशियां पाने का हक़ नहीं…? किसी भी दबाव से परे….किसी के हस्तक्षेप से अलग… जीवन को अपने ढंग से जीना ही आनंद देता है. हो सके तो मुझे माफ़ कर देना…. मैं शायद तुम्हारे लिए बना ही नहीं था. तुम्हें पत्र लिखने का उद्देश्य यही है कि तुम भी आज से स्वतंत्र हो… मैंने तुम्हें हर बंधन से मुक्त किया.”

मानसी कटे पेड़ की तरह बिस्तर पर ढह-सी गयी. आंखों के सामने घना अंधेरा छा गया था.

फिर सब कुछ अनचाहा घटता गया. पगफेरे की रस्म के लिए भाई के साथ मायके आयी मानसी फिर लौटकर ससुराल नहीं गयी. ससुरालवालों ने मानसी की विदाई पर ज़ोर डाला था, पर आंतरिक पीड़ा से विकल, रोती-बिलखती बेटी की दशा ने पिता के हृदय को वेदना की ज़ंजीर से बांध लिया था. “नहीं, मेरी मानसी अब तभी वहां जाएगी, जब प्रभात आदर-सम्मान के साथ इसे वहां ले जाएगा…अन्यथा नहीं.” उन्होंने कहा तो मानसी के जेठ विफर कर बोल पड़े थे, “प्रभात का ग़ुस्सा आज नहीं तो कल ठंडा हो ही जाएगा… वो ख़ुद ही वापस लौट आएगा. क्या तब तक बेटी को घर पर बिठाएंगे? समाज क्या कहेगा? आपके साथ-साथ हमारी भी बदनामी होगी.”

“मैं इन ओछी बदनामियों की परवाह नहीं करता. मानसी प्रभात के साथ ही वहां जाएगी. ये मेरा आख़री फैसला है…” कहते-कहते मानसी के पिता क्रोध और वेदना की मिली-जुली अभिव्यक्ति के कारण हांफ से उठे थे.

इस घटना के बाद मानसी के जीवन में जैसे सुख का प्रवेश निषेध हो गया. ज़िंदगी कभी-कभी ऐसा दर्द दे जाती है, जिसे सह पाना बेहद कठिन होता है. और ये दर्द हथेली पर उगे उस फोड़े से कम पीड़ादायक नहीं होता, जो अपनी टीस से सर्वांग को सिहरा देता है. मानसी जानती थी कि ज़िंदगी बहुत बड़ी नियामत है, इसे यूं ही गंवा देना अच्छी बात नहीं है, पर पीड़ा की अधिकता के कारण आंसू बेइख़्तियार आंखों से बहने लगते थे.

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उसे धैर्य बंधाती मां भी फूट-फूट कर रो पड़ती थी. बेटी को बार-बार पति के पुनरागमन का विश्‍वास दिलाती मां भीतर-ही-भीतर किसी अनहोनी की आशंका से भी कांप उठती थी. अगर प्रभात नहीं लौटा तो… कैसे काटेगी मानसी पहाड़ जैसा जीवन? ये प्रश्‍न मां के हृदय को वेदना से मथ डालता था.

दरवाज़े पर होनेवाली हर आहट पर, हर दस्तक में मानसी प्रभात को तलाशती रहती. मन बार-बार कहता, वो ज़रूर आएंगे, पर नियति को कुछ और ही मंज़ूर था. एक दिन मानसी को प्रभात का पत्र मिला. पढ़कर वो हतप्रभ रह गयी. सारी आशाएं पल भर में मिट्टी के ढेर की तरह ढह गयीं. उसकी दशा ठीक उस परकटे परिंदे की तरह हो गयी जो उड़ने की अदम्य लालसा लिए पेड़ की डाल पर बैठा ही था कि बहेलिये ने उसके पंख कतर डाले. प्रभात ने बिना किसी संबोधन के लिखा था-

“मैं जानता हूं…. तुम्हारे साथ अच्छा नहीं हुआ. पर मैं खुद को दोषी नहीं मानता. अपने भीतर समाहित ‘मैं’ का भी कुछ मूल्य होता है या नहीं? मैं कहीं और शादी करना चाहता था, पर मां के दबाव के कारण तुम से शादी करनी पड़ी. क्या मुझे अपनी ख़ुशियां पाने का हक़ नहीं…? किसी भी दबाव से परे….किसी के हस्तक्षेप से अलग… जीवन को अपने ढंग से जीना ही आनंद देता है. हो सके तो मुझे माफ़ कर देना…. मैं शायद तुम्हारे लिए बना ही नहीं था. तुम्हें पत्र लिखने का उद्देश्य यही है कि तुम भी आज से स्वतंत्र हो… मैंने तुम्हें हर बंधन से मुक्त किया.”

मानसी गश खाकर गिर पड़ी. मां ने उसके हाथ से चिट्ठी लेकर पढ़ी तो वो भी सन्न रह गयी. इस अप्रत्याशित घटना से अवाक रह गए मानसी के पिता और बड़े भाई क्रोध से भरे उसके ससुराल पहुंचे. चिट्ठी पढ़कर प्रभात के घर में भी सबको सांप सूंघ गया. दूसरे ही दिन मानसी और प्रभात के पिता मुंबई के लिए निकल गए, जहां एक फर्म में प्रभात कार्यरत था. पर निराशा ही हाथ लगी. एक सहकर्मी से पता चला कि प्रभात ने ये नौकरी छोड़ दी है और अपनी पत्नी के साथ कहीं और चला गया है.

पत्नी के साथ…? ये दूसरा वज्रपात था, जिसे सुनकर मानसी के पिता संज्ञाशून्य से हो गए. किसी तरह घर तो लौट आए, पर सप्ताह भर के भीतर ही हृदयाघात से उनकी मृत्यु हो गयी. बेटी की पीड़ा सहन करने में असमर्थ पिता ने दुनिया से ही विदा ले ली थी. मानसी पर तो जैसे दुखों का पहाड़ ही टूट पड़ा था. जिस पिता की प्रेरणा से उसमें जीने की उमंग पैदा हुई थी, वो उसे मंझधार में छोड़ गए थे. मानसी टूट गयी थी. दुख और अपमान की पीड़ा का दंश सर्पदंश से कम होता है क्या?

अपनी सारी पीड़ा को आत्मसात कर मानसी मां की सेवा में लग गयी थी. समय अपनी गति से चलता गया. धीरे-धीरे पंद्रह साल गुज़र गए. उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद मानसी स्थानीय कॉलेज में प्रवक्ता बन गयी थी. दोनों भाइयों ने शादी करके घर बसा लिया था. इन पंद्रह वर्षों में बहुत कुछ बदल गया था. सबकी ज़िंदगी एक ढर्रे पर गतिमान थी. पर मानसी? क्या-क्या नहीं भोगा था उसने इन वर्षों में. तिल-तिल कर जली थी वो… सब कुछ सहा था उसने… भाभियों के व्यंग्य-ताने… भाइयों की अवहेलना…मां की पीड़ा… नौकरानियों से भी बदतर स्थिति…समाज के लोगों की प्रश्‍नवाचक निगाहें… जो उसके मन को तार-तार कर देती थीं… सब कुछ झेलती रही वो, उस दिन की प्रतीक्षा में, जब उसे एक पहचान मिली.

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जिस दिन उसे कॉलेज में व्याख्याता का पद मिला वो दिन उसके लिए अविस्मरणीय बन गया. उसने ज़िंदगी से जूझकर अपनी मंज़िल पायी थी. जो लोग ताने देते नहीं थकते थे, उन्हें अब मानसी कर्मठ और जीवट लगने लगी थी. कभी-कभी मानसी के अधरों पर एक विद्रूप-सी मुस्कान आकर ठहर जाती. वो सोचती, समाज के लोगों के विचार कितने क्षणभंगुर होते हैं. समय, परिस्थिति और विचारधारा का अटूट संबंध है… शायद तभी समय और परिस्थिति विचारधारा को बदल कर रख देती है.

डॉ. निरूपमा राय

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कहानी- आख़री सवाल 1 (Story Series- Aakhari Sawal 1)

क्या न करे? दुनिया… समाज… परिवार… अपनी अस्मिता…अपनी भावनाएं किस-किस से ल़ड़े मानसी और कैसे? कहते हैं, प्रभात का आगमन जीवन के हर अंधेरे को मिटा देता है, सर्वत्र प्रकाश ही प्रकाश होता है, पर क्या मानसी के जीवन में प्रभात का प्रथम आगमन एक नव जीवन की शुरुआत थी?

नहाने के बाद गीले बालों को तौलिए से पोंछकर मानसी ने ड्रेसिंग टेबल पर रखी सिंदूर की डिबिया उठायी. फिर न जाने क्या सोचकर वापस रख दी. आज सुबह से ही उसके मन में हलचल-सी मची हुई थी. उसने आदमकद आईने में अपना अक्स देखा तो आंखों में कुछ सवाल नज़र आए. क्या वो प्रभात के वापस आने पर ख़ुश है? चिरप्रतीक्षित और अभिलाषित चीज़ पाने की ख़ुशी इन आंखों में क्यों नहीं झलकती? क्यों छाया है एक वीरान सन्नाटा? जिसकी प्रतीक्षा में जीवन के पंद्रह बहुमूल्य साल यूं ही गंवा दिए, उसके आने की आहट मन को एक मधुर सिहरन से क्यों नहीं भर देती? क्यों आज वेदना और कुढ़न का आवरण मन पर छाया हुआ है?

मानसी ने दीवार पर टंगी घड़ी की ओर देखा. घड़ी की टिक-टिक के साथ समय सरकता जा रहा था… कुछ ही देर में प्रभात यहां पहुंच रहे होंगे. घर में सब कितने उत्साहित हैं. मानो गड़ा ख़ज़ाना मिल गया हो… और मैं? मेरी मनोदशा से किसी को क्या लेना देना…? मानसी ने सोचा.

मानसी के मन में चल रहे बवंडर से अनजान परिवार के लोग प्रभात के स्वागत की तैयारियों में व्यस्त हैं. ऊपर अपने कमरे में अकेली बैठी मानसी ने गौर से आईने में अपना चेहरा निहारा. बालों में स़फेदी कहीं-कहीं से झांकने लगी है. चेहरे में अब वो लावण्य कहां रहा, जो कभी उसे गर्व से भर दिया करता था. गोरा भरा-भरा चेहरा अब सांवला और लंबोतरा-सा लगने लगा है. पिछले वर्ष ही तो पैंतीस वर्ष पूरे किए हैं उसने. क्या उम्र के इस पड़ाव में कोई उस साथी के साथ को सार्थक मान सकता है, जिसने जीवन की शुरुआत में ही दामन छुड़ा लिया हो. जीवन की उमंगें अब मृतप्राय हो चुकी हैं. वैसे भी जीवन की कठोर पाषाणी राह में नितांत एकाकी चलना… टूट कर गिरना… फिर उठना… अपनी हिम्मत से मंज़िल तक पहुंचना, क्या सब के नसीब में होता है..? पर मानसी ने कभी कठिनाइयों में आंसू नहीं बहाए. जीवन की हर विसंगति से लड़ी है वो, तभी तो आज एक मुक़ाम पर है और आज, जीवन के इस मोड़ पर प्रभात का आगमन? मानसी का मन क्षुब्ध हो गया. क्या करे…

क्या न करे? दुनिया… समाज… परिवार… अपनी अस्मिता…अपनी भावनाएं किस-किस से ल़ड़े मानसी और कैसे? कहते हैं, प्रभात का आगमन जीवन के हर अंधेरे को मिटा देता है, सर्वत्र प्रकाश ही प्रकाश होता है, पर क्या मानसी के जीवन में प्रभात का प्रथम आगमन एक नव जीवन की शुरुआत थी?

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मानसी ने फिर से घड़ी की ओर देखा, “चार बजकर तीस मिनट… यानी आधे घंटे में प्रभात यहां होगा. हे ईश्‍वर! मुझे शक्ति दे… ख़ुद से लड़ने की शक्ति… ज़माने से लड़ने की शक्ति… सही निर्णय लेने की शक्ति… अपनी अस्मिता की रक्षा करने की शक्ति…” उसने कांपते हाथों से एक बार फिर सिंदूर की डिबिया उठायी और फिर वापस रख दी. दोनों हथेलियों में चेहरा छिपाकर वो फूट-फूट कर रो पड़ी. न चाहते हुए भी मन विगत की ओर भागा चला जा रहा था.

कितनी गहमागहमी और ख़ुशी का माहौल था मानसी के विवाह के दिन. पांच भाई-बहनों में सबसे छोटी मानसी सबकी लाड़ली थी. इंटर पास करते ही पिता ने प्रभात के साथ उसका विवाह तय कर दिया था.

“लड़का इंजीनियर है… लाखों में एक… मेरी मानसी के तो भाग खुल गए…” पिता कहते नहीं थकते थे. पर विवाह की रात ही मानसी की पुष्पित आशाओं पर तुषारापात हो गया, जब प्रभात ने सपाट स्वर में उससे कहा, “ये शादी मेरी मर्ज़ी के ख़िलाफ़ हुई है. वैसे मैं जानता हूं… इसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं, फिर भी न चाहते हुए भी मुझे अपने माता-पिता की इच्छा के आगे झुकना पड़ा. अगर मां ने आत्महत्या की धमकी नहीं दी होती तो….”

अवाक मानसी के पैरों तले जैसे ज़मीन खिसक गयी. प्रेम, मनुहार और समर्पण के स्वप्न में खोई मादक आंखों से आंसू बहने लगे. पल भर में सब कुछ बदल गया. उसने भीगी पलकें उठाकर देखा, प्रभात सोफे पर अधलेटा लगातार सिगरेट फूंके जा रहा था. मन की बेचैनी चेहरे पर स्पष्ट थी. मानसी ने धीरे से अपने आंसू पोंछ लिए. ‘कोई बात नहीं, भले ही इनकी मर्ज़ी से शादी नहीं हुई हो, मैं अपने प्रेम से इन्हें वश में कर लूंगी…’ सोचते-सोचते कब उसकी आंख लग गयी, पता ही नहीं चला.

सुबह आंखें खुलीं तो देखा प्रभात कमरे में नहीं थे. संकोचवश वो किसी से कुछ पूछ भी नहीं पायी. पर उसे लगा जैसे घर में एक अजीब-सा सन्नाटा छाया हुआ है. लगता ही नहीं जैसे कल ही नववधू इस घर में आयी हो. घर के हर सदस्य के चेहरे पर एक अजीब-सी चुप्पी थी. पर शाम को मानसी को हर एक प्रश्‍न का जवाब मिल गया, जब उसने अपनी बड़ी ननद को अपनी मां से ये कहते हुए सुना कि प्रभात इस शादी के कारण घर छोड़कर चला गया.

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उसकी सास बैठी रो रही थी और बड़ी ननद बिलखते हुए कह रही थी, “मां, मैंने कहा था न… प्रभात की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ कुछ मत करो… वही हुआ जिसका डर था. प्रभात तो बचपन से ही ज़िद्दी है, पर किसी ने मेरी बात नहीं मानी. लाख रोकने पर भी वो चला गया…देखना अब वो शायद ही कभी लौटकर घर आए. न जाने बेचारी मानसी का क्या होगा….?”

डॉ. निरूपमा राय

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कहानी- फ्यूचर 3 (Story Series- Future 3)

“देखो बच्चों, कल तुम्हारी ज़रूरत हमें होगी ये सच है, पर अभी से उस मुद्दे पर बात करना कुछ ऐसा है, जैसे बदलते ख़ुशगवार मौसम को नज़रअंदाज़ कर आंधी-तूफ़ान, बाढ़ की आशंका में परेशान होना. जब तक मौसम ख़ुशगवार है उसका लुत्फ़ उठाओ… कल की कल देखना. अभी से कल को बोझ की तरह उठाए फिरना सही नहीं.”

नलिनीजी भी उनका समर्थन करते हुए बोलीं, “ये तो हद ही है. पहले जल्दी शादी होती थी, तो हम अपने साथ सद्भावनाएं और बड़ों के प्रति आदर लेकर आते थे.

रस्मों-रिवाज़ों की गठरी में एक-दूसरे के प्रति सम्मान, कुछ समझौते और समर्पण लेकर आते थे. कम उम्र में एक-दूसरों की ज़रूरतों के हिसाब से ढलना कमज़ोरी नहीं, हमारे दांपत्य की मज़बूती होती थी. वर्तमान के मीठे लम्हों में डूबे हम भविष्य की चर्चा करके इतनी दूर भी नहीं देखते थे कि धुंधले और उलझे दृश्यों के विवाद में घिरकर उन स्नेही लम्हों को गंवा दें.  समय के साथ और हिसाब से चलकर अपना परिवार देखते थे. मैंने तुम्हारे पापा से कभी ये तय नहीं किया कि तुम्हारे नाना-नानी की देखभाल ये करेंगे, नहीं करेंगे… पर जब ज़रूरत पड़ी, तो तुम्हारे पापा और मैंने अपना फ़र्ज़ उनके प्रति निभाया… मेरे और तुम्हारे पापा के बीच जो भी था हमारा था.  तुम्हारी आज़ादी, करियर-पढ़ाई, स्वयं निर्णय लेने की छूट ये सोचकर दी थी कि इन सब के साथ बेहतर जीवन का निर्वाह करोगी… आत्मनिर्भर बनते-बनते तुम कब इतनी आत्मकेंद्रित और निरंकुश हो गई कि हमसे जुड़े फैसले करने लगी. सबके सामने ख़ुद पर लगते आक्षेप तीर की तरह चुभे, तो अपूर्वा की आंखों में आंसू आ गए, ये देख अभिमन्यु तुरंत बोला, “बात इतनी भी बड़ी नहीं थी. ग़लती अपूर्वा से ज़्यादा मेरी है. मैंने मुद्दे की संवेदनशीलता का आकलन ठीक से नहीं किया. प्रैक्टिकली बात करते हुए ध्यान ही नहीं दिया कि कब इसके मन को ठेस पहुंची और शायद तभी बात बिगड़ गई. आप लोगों को दुख पहुंचा हो, तो दिल से सॉरी…” अभिमन्यु के शब्द अपूर्वा पर असर करते उसके पहले ही विमलजी बोल पड़े, “संवेदनशीलता भरी आपसी समझ किसी शादी की सफलता के लिए ज़रूरी है. मेरे हिसाब से बच्चों के निर्णय का हमें समर्थन करना चाहिए. वैसे ये वैचारिक मतभेद इनके दिमाग़ की उपज थी. ना मैं और ना आप लोग इनके भरोसे जीवन बिताने के इच्छुक हैं. आज इस बेमतलब के विवाद को हम पैरेंट्स सुलझा लेंगे, पर कल को कोई और विवाद उत्पन्न हुआ, तो फिर से ये दोनों अपने अहं की तलवारें खींच लेंगे, क्या पता विवाह की परिणति तलाक़ हो तब… दोनों एक-दूसरे को समझने-समझाने में विफल हुए हैं, ऐसे में विवाह रोक देने में ही भलाई है. कामना करता हूं कि भविष्य में तुम्हारी आकांक्षाओं पर कोई खरा उतरे और तुम घर बसाओ.”

विमलजी के कहने पर प्रशांत बोले, “फिर अपने यूरोप ट्रिप का क्या करें?” यह सुनकर विमलजी इत्मीनान से बोले, “इनकी शादी टूटने से हमारा संबंध थोड़े टूट जाएगा. हां, पहले तय था कि इनकी शादी होने की ख़ुशी में यूरोप यात्रा करेंगे, पर अब शादी कैंसिल होने की ख़ुशी में टूर पर निकलेंगे. इन बच्चों की वजह से कब तक फंसे रहेंगे…” इस अप्रत्याशित वार्तालाप पर अपूर्वा-अभिमन्यु चौंके, “यूरोप..? आप लोग क्या बात कर रहे हैं मैं समझा नहीं…” अभिमन्यु ने पूछा, तो अपूर्वा भी उलझन से भरी बोली, “हां, मुझे भी इस बारे में कुछ पता नहीं.”

“तुम दोनों की शादी के बाद हम लोगों ने कुछ फुर्सत के पल सेलिब्रेट करने की योजना बनाई थी, तुम हनीमून पर जाते और हम यूरोप…” प्रशांत के कहने पर शुभ्रा ठंडी सांस लेकर बोली, “जाने क्यों आज की संतानें इतना आत्मकेंद्रित होती जा रही हैं कि हमारी ख़ुशी इनसे देखी नहीं जाती.

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माता-पिता के प्रति संवेदनशीलता रह ही नहीं गई… कहां तो मैं और अभिमन्यु के पापा प्लान बनाए बैठे थे कि अपनी धर्मशालावाली ज़मीन पर फार्म हाउस बनवाएंगे और कहां ये अपने थ्री बेडरूम के फ्लैट में हमारी सांसें घोटने की तैयारी में हैं…” वो चुप हुईं, तो नलिनीजी बोल पड़ीं, “आप लोग धर्मशाला की सोच रहे हैं, यहां देखो, कब अपूर्वा शादी करती है और कब हमें अपने घर में अपने तरी़के से जीने का स्पेस मिलेगा, हम तो यही सोच रहे थे, पर…” इस  टिप्पणी पर अपूर्वा विस्मय से आंखें बड़ी-बड़ी करती हुई बोली, “हे भगवान! इनके तो अपने बड़े-बड़े प्लान हैं और हम बेव़कूफ़ इनकी वजह से अपनी शादी तोड़ रहे हैं.” उतावलेपन में अपूर्वा ने अभिमन्यु का हाथ पकड़ लिया, तो वह बेबस-सा बोला, “मुझे माफ़ कर दो यार…” एक दबी-सी मुस्कान अभिभावकों के चेहरे पर आई देख अपूर्वा ने विमलजी  से कहा, “मुझे माफ़ कर दीजिए, अभिमन्यु से बेहतर अंडरस्टैंडिंग रखनेवाला जीवनसाथी तो फिर भी मुझे शायद मिल जाए, पर आप जैसे पैरेंट्स मिलना मुश्किल है. मैं बेवजह मम्मी-पापा को लेकर इतना इनसिक्योर हो रही थी.” अपूर्वा के कहने पर विमलजी ने झट आशीर्वाद भरा हाथ उठाया. शुभ्रा भावुक-सी  बोली, “देखो बच्चों, कल तुम्हारी ज़रूरत हमें होगी ये सच है, पर अभी से उस मुद्दे पर बात करना कुछ ऐसा है, जैसे बदलते ख़ुशगवार मौसम को नज़रअंदाज़ कर आंधी-तूफ़ान, बाढ़ की आशंका में परेशान होना. जब तक मौसम ख़ुशगवार है उसका लुत्फ़ उठाओ… कल की कल देखना. अभी से कल को बोझ की तरह उठाए फिरना सही नहीं.”

“जी मम्मीजी.” कहकर अपूर्वा उनके गले लग गई. अभिमन्यु ने भी झट प्रशांत और नलिनी के पैर छुए, तो प्रशांत उसकी पीठ पर स्नेह से धौल जमाते बोले, “आज तुम दोनों डेट पर जाओ, पर हां फ्यूचर मत डिसकस करना…” “बिल्कुल नहीं पापा…” कहते हुए उसने अपने कानों को हाथ लगाया, तो अपूर्वा भी उसी अंदाज़ में अपने कानों को हाथ लगाते हुए मुस्कुरा दी. यह देख सब हंस पड़े.

Meenu Tripathi

      मीनू त्रिपाठी

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