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कहानी- यशोदा का सच 1 (Story Series- Yashoda Ka Sach 1)

आज स्वीटी को सीने से लगाकर जिस गर्माहट और ममता के एहसास से मानी भीगी, उस भीगेपन में सपना की याद हो आई उसे… सपना क्या याद आई, गुज़रे व़क़्त की गंध बहुत पीछे ले गई उसे. कॉलेज की जूनियर थी सपना- बी.एससी. सेकेण्ड ईयर की स्टूडेंट. हर व़क़्त मानी दी… मानी दी कहती उसके आगे-पीछे घूमा करती. कभी नोट्स बनवाने कभी लायब्रेरी से बुक इशु करने, कभी साइंस के फीगर ड्रॉ करने तो कभी प्रैक्टिकल समझने यानी उसके हर काम में मानी दी ज़रूरी होती. जूनियर कम छोटी बहन का अधिकार ज़्यादा था उसमें. इतनी प्यारी और प्यार करनेवाली सपना मानी के दिल और दुनिया का वो हिस्सा बन गई कि उसके बिना सब कुछ अधूरा-सा लगने लगा मानी को.

घड़ी के अलार्म से मानी की आंख खुल गई, घड़ी देखी सात बजे थे. करवट बदलकर उठने को हुई तो पास में सोई सात वर्षीय स्वीटी गले में बांहें डालकर और भी कसकर लिपट गई.

“मम्मीजी प्लीज़ अभी मत उठिये… अभी बहुत नींद आ रही है मुझे… आज सन्डे भी है और पापा भी तो टूर पर हैं.”

कुनमुनाती-सी नन्हीं स्वीटी को छोड़कर उठने का मन नहीं हुआ मानी का. स्वीटी के बाल सहलाती वह फिर से सो गयी.

“उठिये मम्मीजी. आपकी चाय तैयार है, नाश्ता भी तैयार है. उठिये ना मम्मीजी.”

उनींदी-सी मानी उठ बैठी. सामने चाय की ट्रे लिए स्वीटी बैठी थी.

“मम्मी शक्कर कितनी?”

मानी आश्‍चर्य से बेटी को निहार रही थी. दूध का ग्लास पकड़कर उठनेवाली, हज़ारों ख़ुशामदों के बाद आंखें खोलनेवाली स्वीटी आज इतनी सलीकेदार बेटी बनकर पेश आ रही है!

अपनी मोहक मुस्कान के संग स्वीटी बोली, “आज ‘मदर्स डे’ है ना मम्मी. मेरी सारी सहेलियां अपनी मम्मी को बेड टी देनेवाली हैं आज.”

“ओह! तो ये बात है. ‘मदर्स डे’ का तोहफ़ा है ये बेड टी और नाश्ता.” मानी ने देखा प्लेट में बटर लगी ब्रेड और बिस्किट करीने से सजे थे.

ज़ोर से खींचकर बेटी को गले से चिपका लिया मानी ने. भीतर कुछ भरा-भरा-सा महसूस होने लगा था. अचानक कितनी ऊंची जगह बिठाकर महत्वपूर्ण बना दिया स्वीटी ने. भले ही एक दिन के लिए सही, लेकिन नन्हीं-नन्हीं लहरों ने उसके सीने में उछलकर समंदर का एहसास करा दिया है. ममता का आवेग रोके न रुका तो आंखें छलक उठीं.

“लो मैंने चाय बनाई तो मम्मीजी रोने लगीं. अब नाश्ता करेंगी तो और रोएंगी… ओ गॉड, ज़रा शैला से पूछूं क्या उसकी मम्मी भी रो रही हैं?”

कहती-कहती फुदककर ड्रॉइंगरूम में रखे फ़ोन तक पहुंचकर वो नम्बर डायल करने लगी.

आज स्वीटी को सीने से लगाकर जिस गर्माहट और ममता के एहसास से मानी भीगी, उस भीगेपन में सपना की याद हो आई उसे… सपना क्या याद आई, गुज़रे व़क़्त की गंध बहुत पीछे ले गई उसे. कॉलेज की जूनियर थी सपना- बी.एससी. सेकेण्ड ईयर की स्टूडेंट. हर व़क़्त मानी दी… मानी दी कहती उसके आगे-पीछे घूमा करती. कभी नोट्स बनवाने कभी लायब्रेरी से बुक इशु करने, कभी साइंस के फीगर ड्रॉ करने तो कभी प्रैक्टिकल समझने यानी उसके हर काम में मानी दी ज़रूरी होती. जूनियर कम छोटी बहन का अधिकार ज़्यादा था उसमें. इतनी प्यारी और प्यार करनेवाली सपना मानी के दिल और दुनिया का वो हिस्सा बन गई कि उसके बिना सब कुछ अधूरा-सा लगने लगा मानी को.

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लेकिन ज़िंदगी इंसान के मन मुताबिक नहीं चलती ना कभी. फ़ाइनल करते ही मानी के लिए सागर का रिश्ता आया. मेडिकल रिप्रेज़ेंटेटिव सागर बेहद स्मार्ट, एक्टिव और आकर्षक व्यक्तित्ववाला संस्कारी व संयुक्त परिवार का मंझला बेटा था. मानी को देखते ही पूरा परिवार उस पर ऐसा रीझा कि आनन-फानन महीने भर में ही वो दुलहन बनकर अपनी ससुराल आ गई. सागर क्या मिला, मानी का जीवन ही बदल गया. फिर स्वीटी ने आकर उसका परिवार पूरा कर दिया. वर्तमान से ख़ुश और जीवन से संतुष्ट मानी को सपना की कमी फिर भी महसूस होती.

सपना थी ही ऐसी, घर में उसे थोड़ी भी डांट पड़ती या उसकी ज़िद पूरी ना होती तो कॉलेज आकर वहां का चप्पा-चप्पा घूमकर वो मानी को ढूंढ़ निकालती, चुपचाप उसका हाथ पकड़कर कैन्टिन ले जाती. और ख़ामोश होकर बैठी रहती. मानी समझ जाती, आज कुछ गड़बड़ है. फिर धीरे-धीरे पूछना शुरू करती. फिर सपना के मन की गांठें खुलने लगतीं. सच बात सामने आ जाती. मानी उसे समझाती, सही रास्ता बताती. थोड़ी देर बाद रोती-बिसूरती उदास सपना मुस्कुराती-उछलती अपनी क्लास में चल देती. मानी अपने घर-संसार में ख़ुश थी. चार साल की स्वीटी की शरारतों व बातों से तो मानी और सागर का बचपन ही लौट आता.

तीन साल पहले न्यू मार्केट में क्रॉकरी शॉप पर क्रॉकरी ख़रीदती सपना अचानक दिखाई दी. न्यू मार्केट में भोपाल की असली रौनक बसी है वैसे भी. मानी स्वीटी के लिए ड्रेसेस ख़रीद रही थी, क्रॉकरी शॉप के सामने ही, दोनों की नज़रें टकराईं तो लगभग दौड़ती मानी सपना तक पहुंची और सपना…वो तो मानी से क्या लिपटी, हिचकियों में ही डूब गई.

“मानी दी आप यहां?”

“शादी के बाद से यहीं तो हूं मैं. अरे शादी करके तो बड़ी प्यारी दिखने लगी है तू. यहां कहां रहती है? क्या करते हैं तेरे मियां? और कब हुई तेरी शादी? न कार्ड न ख़बर, भूल गई ना मानी दी को?”

“अरे बाप रे मानी दी. सांस तो ले लो. सब बताती हूं. तीन साल हो गए शादी को. यहां जहांगीराबाद में हम लोगों के तीन मेडीकल शॉप हैं.”

“और बच्चे?” मानी की बात पूरी होने से पहले ही स्वीटी उन दोनों के बीच आ खड़ी हुई.

“मम्मीजी… वो बार्बी डॉल दिलवा दीजिए.” सामने दुकान के शोकेस में रखी बार्बी स्वीटी को मोह रही थी.

“अरे ये आपकी बेटी है मानी दी. हाए कित्ती प्यारी कित्ती सुंदर कित्ती स्वीट है.”

स्वीटी शर्मा गई. उसकी मोहक मुस्कान ने सपना को निहाल कर दिया.

“देखो बेटा, मैं तुम्हारी सपना मौसी हूं. चलो हम दोनों लेकर आएंगे तुम्हारी बार्बी डॉल को. और मम्मी को मत देखना, क्योंकि तुम्हारी मम्मी मौसी के आगे कुछ नहीं बोल सकतीं. क्यों है ना मानी दी?”

मानी हंस दी. वो रोकती रही, लेकिन सपना तो वही पुरानी सपना थी. लौटी तो बार्बी के संग-संग खिलौनों का ढेर लेकर लौटी.

“अरे इतना सब क्यों उठा लाई सपना? घर पर खिलौनों का ढेर लगा है.”

सपना का चेहरा उतर गया. मानी को अपनी ग़लती महसूस हुई. बात संभालते हुए वो बोली.

“स्वीटी मौसी को थैंक्यू बोलो और जब वो छोटे भैया के संग घर आएंगी, तब भैया के संग सारे खिलौने खेलना… मौसी को पूछो भैया को लेकर कब आएंगी?”

सपना चुप थी. उसने कोई जवाब नहीं दिया.

– प्रीतरीता श्रीवास्तव

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कहानी- प्रतीक्षा 3 (Story Series- Praktisha 3)

विभोर न जाने क्या-क्या कहता रहा और मैं सुनती रही. मैं जिस विभोर को जानती थी, यह तो वह बिल्कुल न था. मेरे लिए वह पत्थर का नहीं, जीता-जागता देवता का रूप था. लेकिन आज मुझे वह पत्थर से भी ज़्यादा कठोर लग रहा था. मुझे आज पहली बार अपनी पसंद पर दुख हुआ. सोचा, क्या मेरा चुनाव सही था?

मुझे अपने चारों ओर अंधा गहरा जंगल-सा महसूस हुआ, जिसकी सभी राहें मानो गुम हों और मैं जिन संभावनाओं से जुड़ी हुई थी, उसमें मुझे अपना अस्तित्व हवा में झूलते हुए जालों की मानिंद महसूस हुआ. मुझे मेरी ही निराशा लहूलुहान कर रही थी. प्यार का सागर कुछ पलों में ही सूख गया था.

वह पहले तो धीरे-धीरे बोल रहा था, फिर उसका दिमाग़ असंतुलित हो उठा और वह अचानक गुस्से से चीखने-सा लगा.

“क्यों आई हो खाली हाथ? क्या होगा परदेश में बिना पैसे के? कितने दिन से मैं तुम्हें समझा रहा था?…” और जाने क्या-क्या वह कहता चला गया.

उसे इतना असहज होते हुए मैंने पहली बार ही देखा.

मैंने कहा, “पहले मेरी भी तो बात सुनो?”

मैंने प्यार से उसका हाथ पकड़ना चाहा, तो उसने क्रोध में मेरा हाथ झटक दिया. वह कुछ भी सुनने के लिए तैयार न था.

मैंने उसके क्रोध के सागर में एक भंवर उठते देखा, जिसमें मुझे डूबने का ख़तरा नज़र आया.

मैंने सोचा, सच बता ही दूं कि मैं तुम्हारे अनुमान से अधिक धन लेकर आई हूं, लेकिन तभी मन ने कहा, ठहरो, पहले इसे परख तो लो और मन का कहा मानकर मैं चुप ही रही.

विभोर न जाने क्या-क्या कहता रहा और मैं सुनती रही. मैं जिस विभोर को जानती थी, यह तो वह बिल्कुल न था. मेरे लिए वह पत्थर का नहीं, जीता-जागता देवता का रूप था. लेकिन आज मुझे वह पत्थर से भी ज़्यादा कठोर लग रहा था. मुझे आज पहली बार अपनी पसंद पर दुख हुआ. सोचा, क्या मेरा चुनाव सही था?

मुझे अपने चारों ओर अंधा गहरा जंगल-सा महसूस हुआ, जिसकी सभी राहें मानो गुम हों और मैं जिन संभावनाओं से जुड़ी हुई थी, उसमें मुझे अपना अस्तित्व हवा में झूलते हुए जालों की मानिंद महसूस हुआ. मुझे मेरी ही निराशा लहूलुहान कर रही थी. प्यार का सागर कुछ पलों में ही सूख गया था.

विभोर बहुत देर तक कुछ सोचता रहा, फिर जल्दी से बोला, “सुनो सोनिया, मैं बिना पैसे के इस शहर से एक क़दम भी बाहर नहीं रख सकता हूं. यदि तुम मेरा प्यार और जीवनभर साथ चाहती हो, तो कल इसी समय इसी ट्रेन से चलेंगे. पर इस बार पूरी तैयारी से आना. मैं टिकट कैंसल करवाकर कल का रिज़र्वेशन करवा लेता हूं.” विभोर की पोल खुल चुकी थी. मैं समझ चुकी थी कि उसके लिए पैसा ही सब कुछ है. अब मैं उसकी बातों के सम्मोहन से पूरी तरह मुक्त हो चुकी थी.

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मैं भी विभोर को बहुत कुछ कहना चाहती थी. लेकिन मैं ख़ामोशी के दामन को ओढ़कर अपने में ही दुबक कर रह गई. मैंने सोच लिया कि ऐसे जीवनसाथी के साथ जीवन काटना मुश्किल ही नहीं, असंभव होगा.

वह न जाने क्या-क्या बड़बड़ाता रहा और अचानक झुंझलाकर तेज़ी से चला गया. उसके जाते ही मैंने एक गहरी सुख की सांस ली. अब मेरा मन शांत होकर एक तूफ़ान के गुज़रने के बाद की शांति महसूस कर रहा था. मुझे लगा कि दुनिया में कहीं जगह हो न हो, लेकिन अभी भी मेरे लिए एक ऐसी छत है, जिसके नीचे मेरा एक कमरा और उस कमरे में मेरा बिस्तर है जो अभी भी मेरा इंतज़ार कर रहा है. मैं अभी इतनी दूर भी नहीं आई थी कि मेरा लौटना असंभव होता.

मैं मन ही मन हंसी और सधे हुए क़दमों से रेलवे स्टेशन से बाहर आई. कब मैंने ऑटो किया, कब बैठी और कब घर आई मुझे बिल्कुल याद नहीं. हां, मुझे इतना अवश्य याद है कि मां के तकिए के नीचे से धीरे-से चाबी निकालकर लॉकर में सारे जेवर और रुपए यथास्थान रखकर मैं अपने बिस्तर पर चली गई. मुझे अब प्रतीक्षा थी आगामी रविवार की और आनेवाले उस नवयुवक की, जो निश्‍चित रूप से मेरा जीवनसाथी होगा, ऐसा मुझे विश्‍वास है.

Prabhat Dubey

      प्रभात दुबे

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कहानी- प्रतीक्षा 2 (Story Series- Praktisha 2)

नहीं, यह पूरी तरह ग़लत है सोनिया. जो चीज़ ग़लत है, उसे चाहे जिस तर्क के लिबास में लपेटा जाए, वह ग़लत ही रहेगी. दिमाग़ बोल रहा था.

कल क्या होगा? तुमने सोचा है कभी? क्या होगा?

जगहंसाई होगी. लोग तुम्हारे नाम पर, तुम्हारे खानदान पर इल्ज़ाम लगाएंगे, अनर्गल बातें करेंगे. कहेंगे- लड़की भाग गई. तुम्हारे लिए इस घर के दरवाज़े सदा के लिए बंद हो जाएंगे. सोनिया दिल से नहीं, दिमाग़ से काम लो. अभी भी व़क़्त है, मत जाओ. अभी घर की बात घर में है… मुझे अपना सिर भारी-सा लगने लगा. मन और दिमाग़ के इस सवाल-जवाब की फेहरिस्त से मैं परेशान होने लगी. मुझे लगा कि यदि और ज़्यादा देर तक सोचती रही, तो शायद फिर मैं कभी भी विभोर के साथ न जा सकूंगी.

अब फैसले की घड़ी नज़दीक आ चुकी थी. मैंने घड़ी को देखा, तो दो-पन्द्रह हो चुके थे. मैंने सोचा, अब चलना चाहिए.

धीरे से लैम्प बुझाया. बिना आवाज़ किए बाहर आंगन में आई तो नीले आसमान में तारे ही तारे छिटके हुए दिखाई दिए. आसमान, नाचते मोर के पंख जैसा लगा. ठंडी हवा का एक झोंका बदन से आकर टकराया. इस झोंके की परवाह न कर मैं आंगन पार कर घर का बंद मुख्य दरवाज़ा खोलनेवाली ही थी कि हृदय की गहराइयों से आवाज़ आई-

यह क्या कर रही हो सोनिया? क्या यही हमारे परिवार की परंपरा है? क्या होगा इस प्रतिष्ठित परिवार की इ़ज़्ज़त का?

कुछ पाने के लिए कुछ खोना ही पड़ता है. यह दूसरी आवाज़ थी.

तुमने कभी अपने पिता को तो नहीं देखा, क्योंकि वे बचपन में ही चल बसे थे, लेकिन मां ने कैसे तुम्हें पाला, क्या यह भी तुझसे छिपा है?

नहीं, मुझे सब पता है. लेकिन यह भी सच है कि जब बच्चे समझदार हो जाते हैं, तो उन्हें इस तरह के क़दम उठाने का पूरा अधिकार होता है. शायद ऐसा ही विभोर भी सोचता है. इस विचार की पुष्टि में मेरा मन मेरे साथ खड़ा था.

अब ज़्यादा सोच-विचार की ज़रूरत नहीं है सोनिया. विभोर तुम्हारा इंतज़ार कर रहा होगा. चलो, जल्दी करो… मन के अंदर से आदेशात्मक आवाज़ आई.

नहीं, यह पूरी तरह ग़लत है सोनिया. जो चीज़ ग़लत है, उसे चाहे जिस तर्क के लिबास में लपेटा जाए, वह ग़लत ही रहेगी. दिमाग़ बोल रहा था.

कल क्या होगा? तुमने सोचा है कभी? क्या होगा?

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जगहंसाई होगी. लोग तुम्हारे नाम पर, तुम्हारे खानदान पर इल्ज़ाम लगाएंगे, अनर्गल बातें करेंगे. कहेंगे- लड़की भाग गई. तुम्हारे लिए इस घर के दरवाज़े सदा के लिए बंद हो जाएंगे. सोनिया दिल से नहीं, दिमाग़ से काम लो. अभी भी व़क़्त है, मत जाओ. अभी घर की बात घर में है… मुझे अपना सिर भारी-सा लगने लगा. मन और दिमाग़ के इस सवाल-जवाब की फेहरिस्त से मैं परेशान होने लगी. मुझे लगा कि यदि और ज़्यादा देर तक सोचती रही, तो शायद फिर मैं कभी भी विभोर के साथ न जा सकूंगी.

मैंने अपने सिर को ज़ोर से झटका देकर विचारों से मुक्त होने का असफल प्रयास किया और दरवाज़ा खोलकर घर से बाहर गली में आ गई. गली पूरी तरह सुनसान थी. मुख्य सड़क पर आई, तो एक ऑटोवाले ने मेरे हाथ में सूटकेस देखकर ऑटो रोक दिया.

मैं ऑटो में बैठी और उसे रेलवे स्टेशन चलने को कहा.

ऑटो ने ऱफ़्तार पकड़ी. धीरे-धीरे शहर छूट रहा था. शहर क्या छूट रहा था? मां छूट रही थी. मेरा अतीत छूट रहा था. वे गलियां छूट रही थीं, जहां मैंने अपना बचपन गुज़ारा था. मैंने आंखों से बहते हुए आंसुओं को रोकने का असफल प्रयास किया. मैं सोच के समंदर में डूबती-उतराती रही.

तभी रेलवे स्टेशन दिखाई देने लगा. ऑटो रुका, मैं उतरी. तभी अंधेरे से विभोर प्रकट हुआ, उसको देख मुझे ऐसा लगा कि वह काफ़ी देर से मेरा इंतज़ार कर रहा था. उसने ही ऑटो के पैसे दिए. मेरा सूटकेस हाथों में लेकर वह तेज़ चाल से प्लेटफॉर्म की ओर बढ़ा. मैं भी उसके पीछे-पीछे तेज़ क़दमों से चलने लगी.

प्लेटफॉर्म नंबर चार पर पहुंचकर उसने एक बेंच के पास सूटकेस रखकर कहा, “बैठो.” मैं ठीक से बैठ भी नहीं पाई थी कि उसने फिर कहा, “सब ठीक है?”

मैंने सहमति में सिर हिलाया.

वह कुछ देर तक चुप रहा. शायद उसका चुप रहना उसे ही असहनीय-सा महसूस हो रहा था. वह फिर बोला, “गाड़ी एक घंटा लेट है.”

मैं कुछ नहीं बोली, तो उसने कहा, “अभी आता हूं.”

वह दौड़कर दो कॉफी ले आया.

हम दोनों ने ख़ामोशी से कॉफी पी.

उसने धीरे-से स्नेह भरे लहजे में पूछा, “रुपए-जेवर तो साथ ले आई हो न?”

अचानक मां की अंतिम सलाह दिमाग़ में कौंधी.

सहसा मेरे मुंह से निकल पड़ा, “नहीं, विभोर. सब कुछ गड़बड़ हो गया था. मैं कुछ भी साथ नहीं ला सकी.”

“क्यों?”

“लॉकर की चाबी मां ने जाने कहां रखी थी, दिनभर ढूंढ़ती रही, मिली ही नहीं.”

उसका सांवला, गोल चेहरा ग़ुस्से से सुलग उठा.

अचानक वह बिफर उठा. उसका इस तरह बिफरना मेरे लिए अप्रत्याशित था.

Prabhat Dubey

     प्रभात दुबे

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कहानी- प्रतीक्षा 1 (Story Series- Praktisha 1)

पूरा मकान अंधकार में डूबा हुआ था. केवल मेरे कमरे में टेबल लैम्प जल रहा था, जिसकी रोशनी में विभोर के प्यार भरे पत्र को मैं कई बार पढ़ चुकी थी. लिखा था- मेरी जीवनसंगिनी सोनिया, कल रात ठीक तीन बजे प्लेटफॉर्म नंबर चार पर मैं तुम्हारा इंतज़ार करूंगा. घबराना मत. मैं तुम्हारे साथ हूं और सदा रहूंगा…

और भी बहुत कुछ लिखा था, जो मुझे रोमांचित करने के लिए काफ़ी था.

कल दोपहर की ही तो बात है, जब हम दोनों कॉफी हाउस में बैठे उस संसार को सजाने की बात कर रहे थे, जो हमारे लिए एक सुंदर स्वप्न की अनुभूति जैसा था.

सारी योजना बन चुकी थी. केवल अब उसे मूर्तरूप देना ही शेष था. विभोर की ही सलाह पर मैंने मेरे दहेज के लिए संभालकर रखे गए रुपयों और जेवरों को सूटकेस में रख लिया था.

दिसंबर माह की तीस तारीख़ की बेहद ठंडी रात. डेढ़ बज रहे थे. समय काटना बहुत ही कठिन लग रहा था. एक-एक पल, एक-एक सदी की तरह कट रहा था. मैं सोच रही थी कि आज मैं ज़िंदगी के उस चौराहे पर खड़ी हूं, जहां से मुझे अपने लिए नई राह चुननी है. एक तरफ़ प्यार भरे जीवन का अनंत आकाश था, तो दूसरी तरफ़ मां का ममता से भरा हृदय. मुझे ही यह तय करना था कि अपना सारा जीवन विभोर को सौंप दूं या मां की इच्छाओं का सम्मान कर उनके बताए युवक से शादी कर लूं.

यूं तो अक्सर बेटियां मां-बाप के कहने से अपना जीवन एक अनजान युवक को सौंप देती हैं. लेकिन कुछ ही साहसी युवतियां होती हैं, जो स्वयं अपना जीवनसाथी चुनती हैं. मैं विचारों के संसार में विचर रही थी.

मेरी हथेलियां पसीने से भीगी हुई थीं. दिल धड़क रहा था. घबराहट-सी हो रही थी. यह ़फैसले की घड़ी थी. यदि आज विभोर के साथ न जा सकी, तो फिर कभी भी नहीं जा सकूंगी. इस घड़ी का महीनों से मुझे और विभोर को इंतज़ार था. आज तो जाना ही होगा. एक तरफ़ मां का मोह, तो दूसरी ओर विभोर का प्यार भरे सुखद जीवन का आश्‍वासन. विभोर की ज़िद पर ही मैं घर छोड़कर जा रही हूं. ऐसे फैसले में किसी और की राय भी तो नहीं ली जा सकती थी. मुझे मालूम है कि मेरी भोली मां शायद ही यह सदमा सहन कर पाए. लेकिन मैं क्या करूं? मैं अपने दिल के हाथों मजबूर थी.

पूरा मकान अंधकार में डूबा हुआ था. केवल मेरे कमरे में टेबल लैम्प जल रहा था, जिसकी रोशनी में विभोर के प्यार भरे पत्र को मैं कई बार पढ़ चुकी थी. लिखा था- मेरी जीवनसंगिनी सोनिया, कल रात ठीक तीन बजे प्लेटफॉर्म नंबर चार पर मैं तुम्हारा इंतज़ार करूंगा. घबराना मत. मैं तुम्हारे साथ हूं और सदा रहूंगा…

और भी बहुत कुछ लिखा था, जो मुझे रोमांचित करने के लिए काफ़ी था.

कल दोपहर की ही तो बात है, जब हम दोनों कॉफी हाउस में बैठे उस संसार को सजाने की बात कर रहे थे, जो हमारे लिए एक सुंदर स्वप्न की अनुभूति जैसा था.

सारी योजना बन चुकी थी. केवल अब उसे मूर्तरूप देना ही शेष था. विभोर की ही सलाह पर मैंने मेरे दहेज के लिए संभालकर रखे गए रुपयों और जेवरों को सूटकेस में रख लिया था.

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विभोर के कहे हुए शब्द कानों में गूंज रहे थे, “ताक़तवर होने के लिए अपनी शक्ति पर भरोसा रखना ज़रूरी है. उन व्यक्तियों से कमज़ोर और कोई नहीं होता, जिन्हें अपने सामर्थ्य पर भरोसा नहीं होता.”

मैंने पूछा था, “विभोर, कहां जाएंगे?”

बड़े आत्मविश्‍वास से उसने कहा था, “तुम मुझ पर विश्‍वास करो.” और मेरा मन उसकी बातों पर विश्‍वास कर रहा था.

मैंने आज शाम को अपने निर्णय से मां को अवगत कराते हुए बताया था, “मां, तुम विभोर को तो जानती ही हो. वह कई बार आया है हमारे घर. मैं उसी के साथ घर बसाना चाहती हूं, इसलिए मैं आज यह घर छोड़कर जा रही हूं.”

“बेटी, तुम्हारे मामा एक लड़के को देख आए हैं. वह हर दृष्टि से तुम्हारे योग्य है और वह इसी रविवार को आ भी रहा है तुम से मिलने के लिए. हम सभी तुम्हारे विवाह के लिए चिंतित और प्रयत्नशील हैं. थोड़ा-सा हमें व़क़्त दो. सुखद समय की प्रतीक्षा करो. थोड़े-से धैर्य की ज़रूरत है. बस, फिर सब अच्छा ही होगा.” मां एक ही सांस में सब कुछ कह गईं.

पर मैं विभोर के सम्मोहन में इस कदर जकड़ी हुई थी कि मां की हर बात मेरी समझ से परे थी और मैं अपनी ज़िद पर अड़ी रही. इस विषय पर हमारी काफ़ी तीखी बहस हुई. आख़िरकार मां समझ गईं कि मुझ पर एक नासमझ ज़िद सवार है और यह ज़िद किसी अन्य बात को अपने आगे टिकने नहीं देगी.

मां ने फिर कहा, “जिसके भरोसे तुम यह घर और मुझे छोड़कर जा रही हो, कम से कम उसे और उसके प्यार को एक बार जांच-परख ज़रूर लेना. यह मेरी अंतिम सलाह है बेटी.”

मां के स्वर नम पड़ गए थे. मैंने लापरवाही से कहा, “मैं अब बड़ी हो चुकी हूं. विभोर को अच्छी तरह से जानती हूं और मुझे उस पर पूरा भरोसा भी है.”

“धोखा वही खाते हैं, जो विश्‍वास करते हैं.” यह कहते हुए मां रोते हुए अपने कमरे की ओर चली गईं.

Prabhat Dubey

        प्रभात दुबे

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कहानी- बहूरानी 3 (Short Story- Bahurani 3)

Short Story, Bahurani kahani

कहना न होगा, शादी में सबकी नज़रें उसी पर जमी रहीं. साथ ही लोगों के स्पष्ट इशारे थे कि हमने उसे बहू के रूप में चुन लिया है. हम ख़ुद भी इसी खुमार में डूबते-उतराते घर पहुंचे और ख़्वाबों को हक़ीक़त में बदलने का तसव्वुर लिए सो गए.

अगली सुबह, जी हां, वही हवा, वही भीगी महक, वही चहचहाहट सुनता हुआ मैं रिया के इंतज़ार में था कि अचानक कृष्णा हाउसकोट में अस्त-व्यस्त-सी प्रकट हुई. उसे इतनी सुबह जगा देखकर मेरा माथा ठनका.

“क्या हुआ, तबियत तो ठीक है न?” मेरे पूछते ही उसने एक मुड़ा-तुड़ा पर्चा मेरी ओर बढ़ाया और मुझे सिसकियों से दहला दिया. बेहद सुंदर कॉन्वेंटी लिखावट में, अंग्रेज़ी में लिखा ख़त था. अनुवाद ही पेश कर रहा हूं-

‘डियर अर्जुन अंकल व आंटी, आपके साथ जो व़क़्त मैंने गुज़ारा, वह मुझे हमेशा याद रहेगा.

कारण भी कुछ सहज ही थे. एक तो रिया चूज़े जितना खाती, उसमें भी चार दिन नागा रहता. फिर जिस दिन उसका मन होता, ज़िद करके सारा दिन रसोई में डिनर की तैयारी करती रहती. क्या कहूं, कढ़ी और पालक पनीर तो वह इतना लज़ीज़ बनाती थी कि मैं कृष्णा के हाथ का स्वाद ही भूल गया. और भी कई बातें थीं, जो उसे गेस्ट से गृह सदस्य में तब्दील कर गईं. अब सुबह का अख़बार बहादुर नहीं, रिया ही मुझे लाकर देती और साथ रहता हरी चाय का सेहत से लबलबाता प्याला. ठीक आठ बजे वह नहा-धोकर गेट पर ऑफ़िस जाने को तैयार खड़ी मिलती और मेरा फौजी हृदय उसकी नियमबद्धता को मन ही मन सराहने लगता. कृष्णा के लिए उसके पास सदा ऑफ़िस की चटखारों भरी गॉसिप का ख़ज़ाना रहता, सो छह बजते ही वह उसे नीचे उतरने के लिए आवाज़ें देना शुरू कर देती. इन सबके बीच उसे प्रणव से मेलजोल का कितना समय मिलता होगा, आप ख़ुद ही सोच लीजिए. पर इतना बता दूं कि जब-जब रिया रात का खाना हमारे साथ खाती, कोशिश करके वह भी समय पर डाइनिंग टेबल तक पहुंच ही जाता था.

मेरी अनुभवी आंखें लगातार दोनों का पीछा करतीं, पर कहीं कुछ भी ऐसा न मिलता, जो शक की डोर को पुख्ता कर सके. माना एकाध बार प्रणव उसे ऑफ़िस छोड़ने गया और कुछेक बार उसने प्रणव की पसंद की कुछ ख़ास चीज़ें बनाईं, पर इसके आगे कुछ और नोटिस करने का मेरा धैर्य जाता रहा.  कृष्णा अक्सर मुझे उसके पिता से बात करने को उकसाती रहती. जब मैं उसे रिया के पंजाबी होने का हवाला देता तो वह हरियाणा और पंजाब की सम्मिलित संस्कृति की दुहाई देने लगती. मैं जान गया कि वह इस नैया को पार लगाकर ही मानेगी. पर इंसान के चाहने से क्या होता है. ऊपरवाले की तरकीबें इतनी अजीबोगरीब हैं कि हम केवल उन पर आश्‍चर्य कर सकते हैं, शिकायत नहीं.

प्रणव की सहमति की हमने ख़ास आवश्यकता नहीं समझी थी और उसने वैसे भी यह भार हमें ही सौंप रखा था. रिया से उसके पिता का टेलीफ़ोन नंबर तो हमने ले ही रखा था, पर रिश्ते जैसी गंभीर बात एक अजनबी से छेड़ते हुए बेहद झिझक हो रही थी. उस पर अभी हमने अपनी मंशा रिया से भी ज़ाहिर नहीं की थी. कृष्णा बेहद एहतियात से चलने की सोच रही थी, क्योंकि उसे किसी भी क़ीमत पर यह रिश्ता चाहिए था. अब तो रात-दिन उसकी आंखों में बारात और डोली के सपने डोलते रहते. बात करते-करते अक्सर वह रिया के बाल सहलाने लगती, तो कभी उसके ठीक से न खाने पर सौ हिदायतें दे डालती.

इसी बीच मेजर मिश्रा की बेटी की शादी का कार्ड आया. हमारे अच्छे परिचित थे, सपरिवार आमंत्रण था. ‘परिवार’ में अब कृष्णा रिया को भी गिनने लगी थी, सो उसने उसे भी साथ चलने को मना लिया था. मुझे आज भी याद है, कृष्णा की गुलाबी रंग की सिल्क साड़ी पहने जब वह सीढ़ियों से उतरी तो कोई राजकुमारी ही जान पड़ रही थी. गले में कृष्णा की ही दी हुई सच्चे मोतियों की माला, कानों में बूंदे और गालों पर स्वस्थ गुलाबी आभा. सादे सिंगार में भी वह किसी परी से कम नहीं लग रही थी. प्रणव की आंखों में उतरे प्रशंसा के भाव मुझसे छुपे न रहे और मन ही मन मैंने भी फैसला कर ही लिया. ‘सुबह होते ही पूना फ़ोन मिलाना है, बस…’

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कहना न होगा, शादी में सबकी नज़रें उसी पर जमी रहीं. साथ ही लोगों के स्पष्ट इशारे थे कि हमने उसे बहू के रूप में चुन लिया है. हम ख़ुद भी इसी खुमार में डूबते-उतराते घर पहुंचे और ख़्वाबों को हक़ीक़त में बदलने का तसव्वुर लिए सो गए.

अगली सुबह, जी हां, वही हवा, वही भीगी महक, वही चहचहाहट सुनता हुआ मैं रिया के इंतज़ार में था कि अचानक कृष्णा हाउसकोट में अस्त-व्यस्त-सी प्रकट हुई. उसे इतनी सुबह जगा देखकर मेरा माथा ठनका.

“क्या हुआ, तबियत तो ठीक है न?” मेरे पूछते ही उसने एक मुड़ा-तुड़ा पर्चा मेरी ओर बढ़ाया और मुझे सिसकियों से दहला दिया. बेहद सुंदर कॉन्वेंटी लिखावट में, अंग्रेज़ी में लिखा ख़त था. अनुवाद ही पेश कर रहा हूं-

‘डियर अर्जुन अंकल व आंटी, आपके साथ जो व़क़्त मैंने गुज़ारा, वह मुझे हमेशा याद रहेगा. आज लेकिन इस सुहाने सफ़र का आख़िरी पड़ाव है. मैं आपके घर से कुछ नक़द व आंटीजी के गहने लेकर जा रही हूं. कुछ मजबूरियां हैं, वरना यहीं रहकर आजीवन आपकी सेवा करती. मैं जानती हूं, आप प्रणव से मेरा विवाह करना चाहते थे, पर यही समझिएगा कि अपनी मुंह दिखाई मैं स्वयं ले गई. कहा-सुना माफ करना.’

नोट- पूना फ़ोन करना व्यर्थ होगा, नंबर ठीक है, पर मेरे पिता नहीं, पुराने लैंडलॉर्ड मिलेंगे, वे भी नहीं जानते कि मैं कहां हूं.

पढ़ते-पढ़ते मेरी स्वयं यह हालत थी कि कहां खड़ा होऊं, कहां बैठूं? समझना मुश्किल था. कृष्णा का रुदन कब थमा, याद नहीं, पर वह इस बार डिप्रेशन में नहीं गई. कारण यही है कि मैंने तुरंत प्रणव की सगाई एक परिचित परिवार में कर डाली और एक परी की तरह सुंदर न सही, पर ठीक-ठाक बहू घर ले आया. आज भी जल्दी घर पहुंचना है, मेरे बेटे की पहली मैरिज ऐनीवर्सरी जो है. और हां, पेइंगगेस्ट रखने की हमें फिर कभी ज़रूरत ही नहीं पड़ी. ऊपर का कमरा अब हमारी बहू रानी का जो है.

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      सोनाली गर्ग

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कहानी- बहूरानी 2 (Short Story- Bahurani 2)

Short Story, Bahurani kahani

“सुनो कृष्णा, तुम्हें नहीं लगता कि तुम्हें अब एक बहू की ज़रूरत है?” कृष्णा मेरी बात सुनकर फीकी हंसी हंस दी, “मुझे या तुम्हें? थक गए हो मेरी सेवा करते-करते?”

“अरे नहीं यार.” मैं हंस दिया था.

“आजकल बहुएं पति सेवा के लिए लाई जाती हैं, सास-ससुर के लिए नहीं. वह आकर प्रणव को संभाल ले, यही बहुत है.”

कृष्णा की सहमति ले हमने प्रणव से बात की तो पाया कि अनेक महिला मित्रों के बावजूद शादी के मामले में वह पैरेंट्स पर ही निर्भर है. इस बात की हमें ख़ुशी ही हुई थी, किंतु शीघ्र ही हमें पता चल गया कि हमने बिन बुलाई आफत मोल ले ली है.

मुझे तो कर्नल ने वापस पुराने दिनों में खींच लिया था, जहां था फौजी बिरादरी के रिटायर्ड मेम्बर्स का साथ, क्लब की फुर्सत भरी शामें, लॉन के ताज़े फल, सब्ज़ियों की ल़ज़्ज़त और शिवालिक की ठंडी मस्त बयार. मैं हर चिट्ठी में प्रणव को लिखता कि कैसे देहरादून उसकी मां व पिता को रास आया है व कैसे हमें उसका बड़ी शिद्दत से इंतज़ार है. लीचियों की सौग़ात भेजता रहता और प्रणव से भी सुनता कि कैसे उस तक पहुंचने से पहले ही पार्सल गायब हो जाता है.

कुल मिलाकर हम मियां-बीवी हर तरह से सुखी व संतुष्ट थे, पर कहते हैं न कि अपनी नज़र ख़ुद को ही लग जाती है. कुछ-कुछ वैसा ही हमारे साथ भी हुआ. प्रणव… नहीं-नहीं, उसकी आज्ञाकारिता की क्या तारीफ़ करूं? कोर्स पूरा होते ही हमारे पास देहरादून में ही सेटल होने की कोशिश करने लगा. हमने कहा भी कि दिल्ली उसे ़ज़्यादा सूट करेगा, पर उसने हमें अकेले छोड़ने से साफ़ मना कर दिया. प्रणव के आते ही हमारे शांत, घरौंदे में जैसे बहार आ गई. युवा लड़के-लड़कियों का जमावड़ा हर पल हमारे आशियाने को गुलज़ार किए रहता. मैं तो ख़ुश था, पर कृष्णा को कुछ ही दिनों में खीझ होने लगी, क्योंकि उसका अनुशासित स्वभाव उसे आवश्यकता से अधिक किसी से घुलने-मिलने नहीं देता था.

प्रणव की इस बेपरवाह-सी जीवनशैली को देखकर मेरे मन में एक ख़याल आया और मैंने कृष्णा को भी मन की बात कह डाली, “सुनो कृष्णा, तुम्हें नहीं लगता कि तुम्हें अब एक बहू की ज़रूरत है?” कृष्णा मेरी बात सुनकर फीकी हंसी हंस दी, “मुझे या तुम्हें? थक गए हो मेरी सेवा करते-करते?”

“अरे नहीं यार.” मैं हंस दिया था.

“आजकल बहुएं पति सेवा के लिए लाई जाती हैं, सास-ससुर के लिए नहीं. वह आकर प्रणव को संभाल ले, यही बहुत है.”

कृष्णा की सहमति ले हमने प्रणव से बात की तो पाया कि अनेक महिला मित्रों के बावजूद शादी के मामले में वह पैरेंट्स पर ही निर्भर है. इस बात की हमें ख़ुशी ही हुई थी, किंतु शीघ्र ही हमें पता चल गया कि हमने बिन बुलाई आफत मोल ले ली है.

प्रणव की नौकरी बेहद आकर्षक न सही, किंतु उसकी क़द-काठी और चेहरा अनदेखा करना असंभव था. हमारे जान-पहचानवाले यह जानकर कि हम बहू की तलाश में हैं,  बिन बादल बरसात की तरह टपक पड़े थे और मैं व कृष्णा असहाय से, समझ ही नहीं पा रहे थे कि किसे हां करें और किसे ना. किसी की लड़की उच्च शिक्षित, गृहकार्य दक्ष, संगीत-विशारद  थी, तो कोई केवल इस बूते पर अकड़ता था कि प्रणव को सोने में तोल देगा. मेरी अपनी अपेक्षाएं न के बराबर थीं, पर कृष्णा का कहना था कि और कुछ हो, न हो लेकिन बहू सुंदर तो होनी ही चाहिए. प्रणव ने सब कुछ हम पर छोड़ दिया था, इसलिए हमारी ज़िम्मेदारी और बढ़ गई थी.

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सबसे पहले मुझे पसंद आई मेजर शर्मा की बड़ी बेटी, जो लखनऊ से बी.एड. कर इसी साल लौटी थी. बेहद सुशील व घरेलू क़िस्म की, किंतु कृष्णा का कहना था कि वह प्रणव के सामने बहुत मैच्योर लगेगी. अब मैं इस मैच्योरिटी को क्या नाम देता, समझ नहीं पाया, पर जान गया कि मेरी पत्नी मुझे इस समस्या से जल्दी उबरने नहीं देगी. ऐसा नहीं कि उसे कोई न भाया हो, पर उसकी पसंद की हुई चंपा सिन्हा जैसी चतुर, आकर्षक, स्टेट लेवल की वॉलीबॉल खिलाड़ी को देखते ही मेरा ब्लड प्रेशर बढ़ने लगता था. यूं जान पड़ता था जैसे किसी भी पल वह हमें भी वॉलीबॉल की भांति उछाल देगी और प्रणव को ले उड़ेगी.

और तभी एक दिन प्रणव ‘उसे’ लेकर घर आया. ‘उसे’ यानी इस एपिसोड की प्रधान नायिका को. अब रहस्य बढ़ाने से क्या फ़ायदा? लड़की हर तरह से अच्छी दिख रही थी- प्रणव के कंधों को छूता क़द, गेहुंआ रंग, बड़ी-बड़ी आंखें और रेशमी लहराते खुले बाल. देखते ही मेरी और कृष्णा की बांछें खिल उठीं. कृष्णा तो शायद उसकी नज़र भी उतार बैठती, वह तो प्रणव ने उसे रोक दिया.

“आप ग़लत समझ रही हैं मम्मी. रिया इज़ जस्ट ए फ्रेंड. हम थोड़े दिनों पहले ही मिले हैं. असल में इसके पापा भी आर्मी में हैं- पूना पोस्टेड हैं. इसे पढ़ाई पूरी करते ही देहरादून में जॉब मिल गया, पर रहने की समस्या है. मैंने कहा कि हमारे घर के ऊपर का पोर्शन खाली पड़ा है, वहां पेइंग गेस्ट की तरह रह लो. आप लोगों की परमिशन हो तो…” कहकर उसने बात अधूरी छोड़ दी.

मुझे ‘हां’ कहते ़ज़्यादा देर नहीं लगती और कृष्णा को ‘ना’ कहते. पर इस बार उस लड़की का आर्मी का ठप्पा काम कर गया. आख़िर अपनी बिरादरीवाली की मदद तो हमें करनी ही थी. इस तरह रिया दत्त हमारे आशियाने में पेइंग गेस्ट बनकर आ गई. पेइंग गेस्ट मेरे हिसाब से एक अजीब विरोधाभास है, क्योंकि जो ‘पे’ करे, वह ‘गेस्ट’ कैसे हुआ और जो गेस्ट नहीं, वह तो घरवाला ही माना जाएगा. रिया ने हमें डिनर की पेमेंट भी की थी, पर महीना बीतते-बीतते कृष्णा ने वह ‘क्लॉज़’ स्वयं ही उड़ा डाला.

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      सोनाली गर्ग

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कहानी- बहूरानी 1 (Short Story- Bahurani 1)

Short Story, Bahurani kahani

डॉक्टर ने कुछ टेस्ट वगैरह करके यह नतीज़ा निकाला कि श्रीमतीजी घोर डिप्रेशन यानी अवसाद की स्थिति में हैं. यदि उन्हें शीघ्र ही इससे न निकाला गया तो मुश्किल आ सकती है, सुनकर मेरे तो जैसे हाथ-पैर ही फूल गए. किंतु प्रणव ने सही राय दी कि मैं उसे लेकर आबोहवा बदलने किसी नैसर्गिक जगह पर निकल जाऊं. जाने की सोच ही रहा था कि मुझे अपने पुराने दोस्त कर्नल उपप्रेती का ख़याल आया. रिटायरमेंट के बाद वह अपने घर देहरादून चला गया था. कई बार उसने हमें बुलाया, पर किसी न किसी वजह से हम जा न सके थे. आज इस मुसीबत की घड़ी में मुझे वहीं जाना उचित जान पड़ा.

… ॐ नमः शिवाय! अहा! शाम की ताज़ा हवा, बरसाती मिट्टी की सोंधी-सोंधी महक, घर लौटते परिंदों की चहचहाहट… कुछ चीज़ें कभी नहीं बदलतीं… ख़ासकर वे, जो मनुष्य को प्रकृति से जोड़ती हैं.’ यही सब सोचते-सोचते मैं घर की ओर लौट रहा था. मैं यानी रिटायर्ड ब्रिगेडियर अर्जुन अहलावत. क़रीब 36 साल भारतीय सेना की सेवा करने के पश्‍चात्, तीन साल पहले ही रिटायर हुआ हूं. हालात कुछ ऐसे बने कि रिटायरमेंट के बाद दिल्ली में अपना मकान होते हुए भी सब बेच-बाचकर देहरादून श़िफ़्ट होना पड़ा. क्यों? यह मैं आपको बाद में बताऊंगा. फ़िलहाल तो आप इतना ही जान लीजिए कि सेना में उम्रभर नौकरी करने के बावजूद मैं एक बेहद ख़ुशमिज़ाज, सरल व उदार व्यक्ति हूं.

परिवार में कृष्णा है. जी हां, मेरी धर्मपत्नी- कृष्णा अहलावत. नाम रखने में मां-बाप ने अवश्य जल्दबाज़ी की होगी, क्योंकि कृष्णा कहीं से भी कृष्णवर्ण की नहीं है. दूध-धुला रंग, सामान्य क़द-काठी और हल्का भूरापन लिए हुए घुंघराले बाल. एक स्वस्थ जाट परिवार की स्वस्थ पुत्री व बहू, मेरे दोनों बच्चों- प्रणव व प्रज्ञा की ममतामयी मां व मेरे लिए एक धर्मभीरु, गृहकार्य दक्ष पत्नी. उसके व मेरे बाहरी व्यक्तित्व की समानताएं छोड़ दें, तो हमारे विचारों में ज़मीन-आसमान का अंतर मिलेगा. यह दीगर बात है कि ़ज़्यादातर हिंदुस्तानी विवाह इस अंतर के बावजूद सफलता की सिल्वर व गोल्डन जुबली मनाते आ रहे हैं. उसे देहरादून लाने में मुझे कितनी दिमाग़ी मश़क़्क़त करनी पड़ी, यह मैं ही जानता हूं.

अब आपसे क्या छिपाना? ज़िंदगीभर की कमाई लगाकर दिल्ली के शालीमार बाग में अपना दोमंज़िला मकान खड़ा किया था. कुछ दिन उसमें रहे भी, पर भाग्य को कुछ और ही मंज़ूर था. बेटी उन दिनों मेडिकल करके यू. एस. जाने की तैयारी में थी व प्रणव आर्किटेक्चर के प्रथम वर्ष में. अचानक हम पर प्रकट हुआ कि प्रज्ञा अपने विजातीय सहपाठी से प्रेमविवाह करना चाहती है. सुनकर मैं तो संयत रहा, पर कृष्णा तो आपा ही खो बैठी. उसकी नज़रों में बेटी की इस साज़िश के पीछे मेरा हाथ था. अब मैं उसे क्या कहता कि मेरी बला से एक करियरशुदा, परिपक्व लड़की करियप्पा से विवाह करे या कुमावत से, मुझे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता. लेकिन कृष्णा की हाय-तौबा से घबराकर प्रज्ञा ने कोर्ट मैरिज कर ली और मैं यह अपराध कर बैठा कि नवविवाहित दंपति को एयरपोर्ट तक सी-ऑफ करने चला गया. इसकी सज़ा यह मिली कि एक महीने तक कृष्णा न मुझसे बोली, न ही उसने ढंग से कुछ खाया-पिया. कुछ रोज़ तो मैंने बर्दाश्त कर लिया, पर जब उसके स्वास्थ्य पर असर पड़ने लगा तो मुझे बड़ी चिंता हुई. डॉक्टर ने कुछ टेस्ट वगैरह करके यह नतीज़ा निकाला कि श्रीमतीजी घोर डिप्रेशन यानी अवसाद की स्थिति में हैं. यदि उन्हें शीघ्र ही इससे न निकाला गया तो मुश्किल आ सकती है, सुनकर मेरे तो जैसे हाथ-पैर ही फूल गए. किंतु प्रणव ने सही राय दी कि मैं उसे लेकर आबोहवा बदलने किसी नैसर्गिक जगह पर निकल जाऊं. जाने की सोच ही रहा था कि मुझे अपने पुराने दोस्त कर्नल उपप्रेती का ख़याल आया. रिटायरमेंट के बाद वह अपने घर देहरादून चला गया था. कई बार उसने हमें बुलाया, पर किसी न किसी वजह से हम जा न सके थे. आज इस मुसीबत की घड़ी में मुझे वहीं जाना उचित जान पड़ा.

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मैं पत्नी सहित बोरिया-बिस्तर बांध देहरादून चला आया. यहां आकर कृष्णा की हालत में आश्‍चर्यजनक गति से सुधार हुआ. एक तो उपप्रेती का खुला हवादार बंगला, दूजे उसकी हंसमुख गढ़वाली पत्नी का साथ, दोनों मिलकर कृष्णा के लिए जैसे रामबाण सिद्ध हुए. कर्नल मुझे किचन गार्डन में उलझाए रखता और उसकी पत्नी कृष्णा को दवाइयां कम और बातों की खुराक अधिक देती. लिहाज़ा हुआ यह कि तीन-चार ह़फ़्तों में ही कृष्णा कुर्सी छोड़ बैडमिंटन खेलने लगी, रसोई में पकौड़े तलने लगी और जब एक दिन उसने अचानक बगीचे से गुलाब तोड़कर जूड़े में खोंसा तो मैं चालीस साल पहले की कृष्णा को याद कर बैठा, जो हमेशा अपने जूड़े में फूल लगाए रहती थी.

जाने का समय निकट जान मैंने उपप्रेती से दिल्ली की टिकटें रिज़र्व कराने को कहा. किंतु आशा के विपरीत, उसे मेेरे निर्णय से कोई ख़ास ख़ुशी नहीं हुई, बल्कि जो कुछ उसने कहा, वह शब्दशः मुझे आज तक याद है. “जाना है तो चले जाओ अर्जुन, पर दिल्ली में तुम अपने बंगले के कैदी होकर रह जाओगे. बच्चे आजकल अपनी ज़िंदगियां संभाल लें, यही बहुत है. हमारी किसे पड़ी है? मेरी मानो तो इसी लेन में एक प्रॉपर्टी हाथोंहाथ बिक रही है. ज़्यादा नहीं तो 12 से 15 लाख में सौदा तय है. मेरे पास यहीं बस जाओ. बुढ़ापे में साथ देंगे एक-दूसरे का, साथ-साथ सुख-दुख बांटेंगे.” मैं आश्‍चर्यचकित था कि उसने इतनी दूर की सोच डाली, पर कृष्णा की मनः स्थिति ने मुझे भी सहमा रखा था. अब यदि दूसरी दफ़ा कुछ गफ़लत हुई तो मैं क्या करूंगा?

कृष्णा को मनाना सहज नहीं था, पर मेरी ज़िद के आगे उसे भी झुकना ही पड़ा. प्रणव हॉस्टल में था ही, उसे हमारे निर्णय से कोई ऐतराज़ नहीं हुआ और हम उपप्रेती के सहारे देहरादून बस ही गए. दिल्ली से उत्तरांचल का स्थानांतरण हमें महंगा नहीं, बल्कि सुविधाजनक ही पड़ा था. घर तुरत-फुरत व्यवस्थित कर डाला उपप्रेती के पहाड़ी नौकर ने, उसी ने एक नौकर हमारे लिए भी जुटा दिया था.

कृष्णा का अधिकांश समय बागवानी में बीतता या मिसेज़ उपप्रेती के साथ… और मैं?

कहानी- बहूरानी 1 (Short Story- Bahurani 1)

        सोनाली गर्ग

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कहानी- व़क्त का एक टुकड़ा 3 (Story Series- Wqat Ka Ek Tukda 3)

प्यार हार गया था. परंपराओं के आगे, सामाजिक नियमों के आगे, बुज़ुर्गों के आदेशों के आगे मुंह सिये खड़ा रह गया था. पुरुष होने के कारण आंसू भी खुलकर नहीं बहा पाया, भीतर ही पी गया. प्यार क्या योजना बनाकर, जाति-धर्म परखकर किया जाता है? या किया जा सकता है? हमें अपनी ज़िंदगी अपनी मर्ज़ी से जीने का हक़ क्यों नहीं है? हम किसी का अहित करें, ज़ोर-ज़बर्दस्ती करें, तो ज़रूर रोको हमें, सज़ा दो, पर प्रीत-प्यार के बीच जाति का सवाल कहां से आ जाता है? प्यार सामाजिक वर्जनाओं को नहीं स्वीकारता, फिर क्यों वर्जनाओं के कठघरे में खड़ा कर दिया जाता है? कितना नीरस होगा वह जीवन जो स़िर्फ बुद्धि के तर्को के सहारे जिया जाएगा. बुद्धि के साथ-साथ एक मन भी तो दिया है विधाता ने. उसे कोई अच्छा लगता है, तो लगता है बस!

सब कुछ जानते-समझते भी त्रासदी यह थी कि हम एक-दूसरे की तरफ़ खिंचे चले जा रहे थे. मालूम था कि वो मेरी नहीं हो सकती थी, पर दिल पर कहां किसी का बस चलता है. अपने को समझा लेते ‘स़िर्फ मित्र ही तो हैं हम. क्या इतना भी हमारा हक़ नहीं?’

इस बीच एक और बात हो गई, नंदिनी ने स्कूल में अनेक क्लासिक नाटकों का सफलतापूर्वक मंचन करवाया था, जिससे शहर में हमारे स्कूल का नाम हो गया. कालीदास जयंती पर शिक्षा विभाग से कालीदास के लिखे किसी नाटक का मंचन करवाने का विशेष आग्रह आया. शहर के गणमान्य लोग देखने आनेवाले थे. प्रिंसिपल के लिए यह स्कूल की प्रतिष्ठा का सवाल था. नंदिनी को ही

ज़िम्मेदारी सौंपी गई. उसने ‘अभिज्ञान शाकुंतलम्’ को अभिनीत कराने की सोची, क्योंकि उसकी कहानी से लोग परिचित थे और संस्कृत में होने पर भी समझी जा सकती थी. यूं एक विषय के रूप में तो हम सब ने संस्कृत पढ़ रखी थी. छात्रों में से योग्य पात्रों का चयन किया गया. उच्चारण शुद्ध रखने के लिए रिहर्सल के समय संस्कृत के अध्यापक भी उपस्थित रहते थे. मंच सज्जा एवं उस समय के परिधानों का इंतज़ाम मुझे करना था. कुटिया, जंगल, नदी और राजमहल अनेक दृश्य उपस्थित करने थे. महीनाभर अभ्यास चलता रहा, शाम को देर हो जाने के कारण भाग लेनेवाले कलाकारों को घर छोड़ने का प्रबंध किया गया. नंदिनी को घर पहुंचाने का ज़िम्मा मेरा था. उस महीने में हम एक-दूसरे के और क़रीब आ गए थे. भूल गए थे दूरी बनाए रखने के अपने निश्‍चय को.

और फिर नंदिनी के विवाह की तिथि निश्‍चित हो गई. उसने अपना त्यागपत्र भी दे दिया. स़िर्फ एक महीना और बचा था उसका स्कूल आने के लिए. हम मौक़ा मिलते ही कैंटीन में जा बैठते. मन के भीतर गहरी उदासी होने पर भी एक-दूसरे की ख़ातिर सामान्य दिखने का असफल प्रयत्न करते हुए ज़्यादातर ख़ामोश ही बैठे रहते. बातें चुक गई थीं मानो या शायद बेमानी ही हो गई थीं अब.नंदिनी के पापा उसका विवाह अपने ही घर से करना चाहते थे और उसे भाई-भाभी के संग विवाह से 15 दिन पूर्व चले जाना था. अपनी सब ख़रीददारी उसने यहीं से कर ली थी. उसके जाने की पूर्व संध्या को मैं उपहार लेकर उससे मिलने गया. उसके भाई किसी आवश्यक कार्यवश घर से बाहर गए हुए थे. नंदिनी और उसकी भाभी से बातें कर मैं उठा, तो नंदिनी भी मुझे बाहर विदा करने उठी. पर मैंनेे उसे मना कर दिया और पीछे किवाड़ बंद करता हुआ जल्दी से सीढ़ियां उतर आया. मैंने शायद अपने अतीत की ओर किवाड़ बंद कर देना चाहा था यह सोचकर कि मुझे अब नए सिरे से ज़िंदगी शुरू करनी है, पर नंदिनी तो मन में ही बसी हुई थी, उसकी स्मृति तो संग ही चली आई.

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प्यार हार गया था. परंपराओं के आगे, सामाजिक नियमों के आगे, बुज़ुर्गों के आदेशों के आगे मुंह सिये खड़ा रह गया था. पुरुष होने के कारण आंसू भी खुलकर नहीं बहा पाया, भीतर ही पी गया. प्यार क्या योजना बनाकर, जाति-धर्म परखकर किया जाता है? या किया जा सकता है? हमें अपनी ज़िंदगी अपनी मर्ज़ी से जीने का हक़ क्यों नहीं है? हम किसी का अहित करें, ज़ोर-ज़बर्दस्ती करें, तो ज़रूर रोको हमें, सज़ा दो, पर प्रीत-प्यार के बीच जाति का सवाल कहां से आ जाता है? प्यार सामाजिक वर्जनाओं को नहीं स्वीकारता, फिर क्यों वर्जनाओं के कठघरे में खड़ा कर दिया जाता है? कितना नीरस होगा वह जीवन जो स़िर्फ बुद्धि के तर्को के सहारे जिया जाएगा. बुद्धि के साथ-साथ एक मन भी तो दिया है विधाता ने. उसे कोई अच्छा लगता है, तो लगता है बस! यहां क्यों का उत्तर नहीं दिया जा सकता, क्योंकि उसका निर्णय मन करता है, बुद्धि नहीं.

दोहरा जीवन जिया मैंने. एक मन के भीतर का, एक बाहर का, छटपटाता ही रहा जीवन भर. कर्त्तव्य भी सब पूरे किए. विडंबना तो देखो, दोहरा जीवन जीकर भी लगता है- अधूरी ही रह गई मेरी ज़िंदगी. जिया तो ज़रूर, पर काट दी, जी नहीं. शालिनी के प्रति अपराधबोध भी तो है. सब गुण हैं मेरी पत्नी में, मेरे प्यार पर तो उसका पहला हक़ था. पर उसकी ख़ूबियों के बावजूद नहीं दे पाया मैं उसे वह स्थान. हां! अपना घाव उससे छुपाए रखा, ताकि उसके मन को ठेस न पहुंचे. बिना किसी कसूर के वो मानसिक यंत्रणा से न गुज़रे.

मेरा बेटा मुझ जैसा दोहरा जीवन नहीं जिएगा, मैंने यह दृढ़ निश्‍चय कर लिया है. तब सवाल मेरी ख़ुशी का था और मैं अपने बाबा के आगे बेबस था. आज सवाल मेरे बेटे की ख़ुशी का है और उसकी ख़ुशी मेरी भी ज़िम्मेदारी है. मुझे साहस करना होगा, जैसे भी हो, शालिनी को समझाना होगा. कुछ ग़लत बात के लिए दबाव नहीं डाल रहा मैं शालिनी पर. शायद इसी से ही मेरे मन को कुछ शांति मिल सके.

Usha Vadhava

          उषा वधवा

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कहानी- व़क्त का एक टुकड़ा 2 (Story Series- Wqat Ka Ek Tukda 2)

एक बार हिम्मत करके मैंने बाबा के सम्मुख अपने मन की बात रखी. उन्होंने मां से कहा, “ऐसा कुछ किया, तो उस लड़की की जान की ख़ैर नहीं, कह देना उससे.”

मैंने नंदिनी से तो यह बात नहीं कही, पर उससे विवाह का सपना पूरी तरह से त्याग दिया. अपनी ख़ुशी की ख़ातिर मैं उसकी जान ख़तरे में नहीं डाल सकता था. मैं जब कभी देर सांझ नंदिनी को उसके घर छोड़ने जाता, तो कभी-कभी उसके भाई से मुलाक़ात भी हो जाती. इस तरह उनसे भी परिचय हो गया था. मैंने उनसे स्पष्ट कह दिया कि नंदिनी का विवाह जहां तय है, वहीं होने दिया जाए, क्योंकि हमारे विवाह की कोई संभावना नहीं है.

बेटे का प्यार सच्चा है, मेरा नहीं था क्या? न! उंगली मत उठाओ मेरे प्यार की सच्चाई पर, चाहत की गहराई पर. शिद्दत से न चाहा होता, तो उसकी कमी यूं महसूस न करता आज तक? आज भी उसे यादकर अकेले में आंखें भर आती हैं. कितना अंतर आ गया है आज की पीढ़ी और हमारी पीढ़ी में.

बाबा ने दफ़्तर से हेड क्लर्क के पद से अवकाश प्राप्त किया था. दोनों बहनों का विवाह स्कूल पास करते ही कर दिया गया था- अपनी ही जाति के वर ढूंढ़कर. उन्होंने कोई ऐतराज़ भी नहीं किया था. मेरी शिक्षा बिना अवरोध चलती रही. बीएड कर लिया, एमए करने लगा और यूं मेरे लिए अध्यापन का रास्ता खुल गया, जो कि मेरा ध्येय था. यूं रुचि तो मेरी प्रारंभ से ही साहित्य पढ़ने-पढ़ाने में थी, परंतु बाबा ने विज्ञान पढ़ने पर दबाव डाला. उनका कहना था कि विज्ञान पढ़ानेवाले अध्यापकों की मांग रहती है. उनका तर्क था, सो विज्ञान पढ़ाता रहा. घर की आलमारियां साहित्यिक पुस्तकों से भरी रहीं. ख़ैर, इस बात से उन्हें कोई आपत्ति नहीं थी.

मुझे स्कूल में पढ़ाते दो-ढाई वर्ष बीत चुके थे, नंदिनी उसी स्कूल में हिंदी की अध्यापिका बनकर आई. विद्यार्थियों को स़िर्फ शब्दार्थ बताकर और प्रश्‍न-उत्तर तैयार करवाकर नंबर दिलवाना उसका लक्ष्य नहीं था. गद्य पढ़ाती अथवा पद्य, जान डाल देती उसमें. जो बच्चे पहले हिंदी पढ़ने से कतराते थे, उन्हें भी रुचि आने लगी. स्कूली कार्यक्रमों में वह नाटकों का मंचन करवाती. अपने मधुर स्वर में गीत एवं ग़ज़ल गाकर सुनाती. स्वयं भी कविताएं लिखती थी, अतः शहर की गोष्ठियों में बुलाई जाने लगी. मुझे तो इन सबमें रुचि थी ही, मैं भी श्रोता के रूप में ऐसे कार्यक्रमों में जाने लगा.

धीरे-धीरे हमारी मैत्री बढ़ने लगी. हमारी बातों का मुख्य विषय पुस्तकें ही होतीं. एक-दूसरे से अदला-बदली कर क़िताबें पढ़ते. उसका तो विषय ही साहित्य था, सो नई पुस्तकों के बारे में मुझसे अधिक जानकारी रहती. हिंदी के अलावा अंग्रेज़ी एवं कुछ अन्य भाषाओं के साहित्य का भी उसे पता होता. उसकी स्वयं की लिखी रचनाओं का मैं पहला श्रोता एवं विवेचक होता और वह मेरी राय को मान्यता देती. इस बीच मैंने बाइक ख़रीद ली थी. कवि सम्मेलनों एवं अन्य साहित्यिक गोष्ठियों से लौटते हुए मैं उसे घर भी छोड़ देता.

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धीरे-धीरे हम अपने सुख-दुख और परेशानियां एक-दूसरे से बांटने लगे. क़रीब पांच वर्ष पहले नंदिनी की मां कैंसर से लंबी लड़ाई लड़ते हुए चल बसी थीं. उसके दो वर्ष पश्‍चात् भाई का विवाह हुआ. उसके पापा को जाने क्या सूझी कि बेटे के विवाह के क़रीब छह माह पश्‍चात् उन्होंने अपनी एक सहकर्मी से कोर्ट मैरेज कर ली. विमाता ने अपनी तरफ़ ़से नंदिनी की तरफ़ दोस्ताना हाथ बढ़ाया था, पर नंदिनी ही अपने पापा को दूसरी स्त्री के संग देख असहज हो उठती. उसके मन में अपनी मां की स्मृति अभी बहुत ताज़ा थी. संवेदनशील तो वह थी ही, बीएड समाप्त होते ही वह भाई-भाभी के पास आ गई और यहीं के स्कूल में आवेदन-पत्र दे दिया. समान रुचियों के कारण हमारे बीच मैत्री हुई, जो गहरी होती चली गई. यूं समझो, एक-दूसरे की ज़रूरत ही बन गए हम. किसी दिन वह स्कूल न आ पाती, तो मेरे लिए दिन बिताना मुश्किल हो जाता. यही बात उस पर भी लागू होती थी.

यह वह समय था जब परंपराओं का निर्वाह बड़ी कड़ाई से किया जाता था. समाज की पकड़ सख़्त थी, विशेषरूप से मध्यम वर्ग पर भिन्न जाति में विवाह सरल नहीं था. हां! कहीं-कहीं अपवाद ज़रूर होते थे, पर अनेक बार उनके माध्यमिक परिणाम भी सामने आते. मैं अपने बाबा के विचारों से भली-भांति परिचित था. मां को तो किसी तरह मना भी लेता, लेकिन बाबा के हुकुम के आगे बोलना असंभव था. जिन्होंने मुझे मनभावन विषय नहीं लेने दिए थे, वे दूसरी जाति में विवाह की इजाज़त कैसे दे सकते थे? ऐसा भी नहीं कि मैंने नंदिनी को किसी तरह के धोखे में रखा हो. मैंने शुरू से ही पूरी बात उससे स्पष्ट कर दी थी. नंदिनी के पापा ने भी उसका रिश्ता अपने एक मित्र के बेटे के साथ मौखिक रूप से तो तय कर ही रखा था, घर छोड़ आने के कारण अभी तक कोई रस्म नहीं हुई थी.

एक बार हिम्मत करके मैंने बाबा के सम्मुख अपने मन की बात रखी. उन्होंने मां से कहा, “ऐसा कुछ किया, तो उस लड़की की जान की ख़ैर नहीं, कह देना उससे.”

मैंने नंदिनी से तो यह बात नहीं कही, पर उससे विवाह का सपना पूरी तरह से त्याग दिया. अपनी ख़ुशी की ख़ातिर मैं उसकी जान ख़तरे में नहीं डाल सकता था. मैं जब कभी देर सांझ नंदिनी को उसके घर छोड़ने जाता, तो कभी-कभी उसके भाई से मुलाक़ात भी हो जाती. इस तरह उनसे भी परिचय हो गया था. मैंने उनसे स्पष्ट कह दिया कि नंदिनी का विवाह जहां तय है, वहीं होने दिया जाए, क्योंकि हमारे विवाह की कोई संभावना नहीं है. और मन ही मन निश्‍चय किया, उससे दूरी बनाने का.

         उषा वधवा

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कहानी- व़क्त का एक टुकड़ा 1 (Story Series- Wqat Ka Ek Tukda 1)

… पर आज मेरे रातभर जागने एवं करवटें बदलने का कारण मां-बेटे के बीच मन-मुटाव नहीं है, बल्कि बहुत निजी है. सोऊं कैसे? पलकें बंद करते ही तो सामने नंदिनी आ खड़ी होती है. कहते हैं, व़क्त बीत जाता है, पर हमेशा ऐसा होता है क्या? कभी-कभी व़क्त का एक टुकड़ा तमाम उम्र हमारे साथ ही चलता रहता है. उम्रभर विलग नहीं हो पाता वह हमसे. उससे जुड़े व्यक्ति वैसे ही ताज़ा रहते हैं हमारी स्मृति में- उम्र और समय के प्रभाव से अछूते.

सौभाग्यशाली होते हैं वे लोग, जो तकिये पर सिर रखते ही गहरी नींद की आगोश में चले जाते हैं. मैं तो घंटों जगा रहता हूं, करवटें बदलता हुआ, दिनभर की घटनाओं का लेखा-जोखा करता हुआ और इन्हीं में से कोई बात अतीत के किसी क़िस्से की उंगली पकड़ लेती है. मन ही मन इतनी बार दोहरा चुका हूं पुरानी घटनाओं को कि वे आज भी मन-मस्तिष्क में ताज़ा हैं. खुली आंखों से छत को निहार रहा हूं, मानो वहां कोई फिल्म चल रही हो, जिसे मैं पूरे मनोयोग से देख रहा हूं.

मेरी पत्नी शालिनी उन सौभाग्यशाली लोगों में से एक है, जो तकिये पर सिर रखते ही सो जाते हैं. धर्मपरायणा, स्नेहमयी, किसी से राग-द्वेष नहीं. भीतर-बाहर से एकदम खरे सोने की तरह. अपने कर्त्तव्यों के प्रति बहुत निष्ठावान है शालिनी. चाहूं भी तो कोई दोष नहीं ढूंढ़ पाऊंगा उसमें. पर क्या करूं? अपने अतीत को भुला भी तो नहीं पाया हूं आज तक. बहुत प्रयत्न किया है भूल जाने का, पर अनचाहे भी पुराना ज़ख़्म टीस मारने लगता है. धर्म और विज्ञान दोनों कहते हैं कि संसार की हर एक चीज़ नश्‍वर है- हर चीज़ का अंत है, फिर इन यादों का अंत क्यों नहीं है?

शालिनी मेरा तो पूरा ख़्याल रखती ही है, दोनों बच्चों की भी बहुत अच्छी परवरिश की है उसने. दोनों बच्चे डॉक्टर बन चुके हैं. बेटी का तो अपनी ही जाति के डॉक्टर लड़के से धूमधाम से विवाह भी हो चुका है. मां जैसी ही है बेटी शीरी भी. सरल स्वभाव और मृदु भाषिणी. वो ख़ूब ख़ुश है अपने परिवार में. माता-पिता के लिए इससे बड़ी तसल्ली और क्या हो सकती है? पर बेटा अरविंद वैसा नहीं है न! बेटा जान के मां ने बिगाड़ा हो, यह बात भी नहीं है. वह स्वतंत्र विचारों का है.

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जात-पात के विरुद्ध अनेक तर्क हैं उसके पास. इस विषय पर बहस में आप उससे जीत नहीं सकते. इतने तक तो ठीक था, पर आज तो उसने अपनी बात को अमल में लाकर दिखा दिया है. वह वैशाली से विवाह करना चाहता है- यह कहकर उसने ऐसा झटका दिया है, जिसे सुन शालिनी सकते में आ गई है. ऐसा नहीं कि हम वैशाली को जानते नहीं. जानते हैं, तभी तो धक्का लगा है. इस अपार्टमेंट में हम सब एक ही दफ़्तर के लोग रहते हैं और किसी कारण उस पूरे परिवार से मैत्री है. परंतु मैत्री होना अलग बात है और विजातीय की बेटी को घर की बहू बनाकर लाना एकदम अलग और उसी बात पर बेटा आमादा है. ‘तो इसमें हर्ज क्या है?’ यही आ रहा है न आपके अत्याधुनिक मन में? अरविंद की मां से कह देखिए ज़रा! उसके हिसाब से तो यह संबंध ही सही नहीं है. कहां हम शुद्ध ब्राह्मण और लड़की कायस्थ परिवार की. बेटे के सब कसूर माफ़ सिवाय इस एक के. और बेटा है कि इसी पर आमादा है. और उम्मीद कर रहा है कि मैं किसी तरह शालिनी को राज़ी कर लूंगा, जो मुझे नामुमकिन लग रहा है, क्योंकि शालिनी का मानना है कि सामाजिक व पारिवारिक परंपराओं की रक्षा करना परम आवश्यक है. यह उसका कर्त्तव्य भी है और हमारे परिवार में आज तक तो कभी जाति के बाहर विवाह हुआ नहीं.

अरविंद अठारह वर्ष का भी नहीं हुआ था, तभी से शालिनी उसके विवाह के सपने संजोने लगी थी. कैसी लड़की होगी, बहू व अपने लिए क्या-क्या गहने बनवाएगी से लेकर कितना बड़ा जश्‍न होगा इन सब का लेखा-जोखा वह मन ही मन सैकड़ों बार दोहरा चुकी है. और इन सबसे बढ़कर यह कि एक लंबी लिस्ट है उसके मन में अपनी बहू के गुणों को लेकर. बहुत छांटकर लानेवाली थी वह बहू.

आज अरविंद ने एक बेटे की मां होने का सबसे बड़ा हक़- ‘बहू ढूंढ़ने का हक़’ उससे छीन लिया है. मुझे शालिनी के साथ पूरी हमदर्दी है.

पर आज मेरे रातभर जागने एवं करवटें बदलने का कारण मां-बेटे के बीच मन-मुटाव नहीं है, बल्कि बहुत निजी है. सोऊं कैसे? पलकें बंद करते ही तो सामने नंदिनी आ खड़ी होती है. कहते हैं, व़क्त बीत जाता है, पर हमेशा ऐसा होता है क्या? कभी-कभी व़क्त का एक टुकड़ा तमाम उम्र हमारे साथ ही चलता रहता है. उम्रभर विलग नहीं हो पाता वह हमसे. उससे जुड़े व्यक्ति वैसे ही ताज़ा रहते हैं हमारी स्मृति में- उम्र और समय के प्रभाव से अछूते. मेरी यादों में नंदिनी आज वैसी ही है. उसकी इकहरी देहयष्टि और सलोने चेहरे पर नीला रंग ख़ूब फबता था. मेरी उम्र ढल गई, तो वो भी…! अरसा बीत गया उसे देखे. न उम्मीद है उसे देखने की, न कभी कोशिश ही की है. फिर भी एक अदृश्य तार से जुड़ा हूं आज भी. मैं क्यों नहीं हो पाया बेटे जैसा साहसी? क्यों नहीं कर पाया मां-बाबा के सम्मुख विद्रोह?

Usha Vadhava

          उषा वधवा

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कहानी- प्रतिबद्ध 3 (Story Series- Pratibadh 3)

पुष्कर के घर छोड़ने के वर्षों बाद तक वह रात्रि की नीरवता में सोचती, ‘कहीं वह आतंकवादी तो नहीं बन गया?’ घर-द्वार छोड़ने के बाद दिशाहीन व्यक्ति आख़िर जाएगा कहां? ईश्‍वर से वह उसके जीवित रहने की कामना करती. पुष्कर को अगर कुछ हो गया तो वह स्वयं को आजीवन क्षमा न कर सकेगी. उसे जीवित देख उसने राहत की सांस ली.

पुष्कर के प्रति उसके मन में श्रद्धा के भाव जाग उठे, ‘राग-द्वेष, हर्ष-विषाद से यह इंसान बहुत दूर जा पहुंचा है. गंगा के समान पवित्र हृदय आज आकाश सदृश बृहद हो गया है. हृदय पर एक चोट खाकर इंसान इस तरह महान भी हो सकता है!  भस्मीभूत हुए अपने सपनों से आहत उसने वैराग्य की धूनि रमा ली.

“खाना अब तक शुरू नहीं किया न… दाल में घी देना भूल ही गई थी.” उसने कमरे में प्रवेश करते ही कहा.

कटोरे से वह घी निकाल रही थी तभी उसकी दृष्टि पुष्कर से जा टकराई. मुग्ध दृष्टि से उसे अपनी ओर देखते पाकर वह घबरा उठी. घबराहट में अधिक घी छलक कर दाल में जा गिरा.

“वाह! क्या प्रेम है… ख़ूब घी पिलाया जा रहा है पुष्कर भैया को.” पुष्कर की बहन सुमेधा हंस रही थी. तब तक कमरे में ताऊ भी आ गए. मयूरी अप्रस्तुत हो उठी. दुपट्टे को संभालती वह जो भागी तो घर जाकर ही दम लिया.

उस दिन के बाद से उसने मधुसूदनजी के घर की ओर जाना ही छोड़ दिया. विवाहोत्सव में मग्न होकर वह उस घटना को भूल गई.

बारात निकलने की तैयारी ज़ोर-शोर से हो रही थी. मयूरी ने आसमानी ज़रीदार लहंगा पहन रखा था. चाय की ट्रे लेकर आ रही थी कि एक मोहक स्वर उभरा,

“मुझे भी चाय मिलेगी?”

“क्यों नहीं…” चाय बढ़ाते हुए मयूरी ने दृष्टि ऊपर की तो सामने पुष्कर था. वह मयूरी को अपलक निहार रहा था.

“मुझसे ब्याह करोगी?” चाय का कप मयूरी के हाथ से लेकर उसने सीधा प्रश्‍न पूछा.

घबराई मयूरी ट्रे लेकर आगे बढ़ने लगी तो उसने रास्ता रोक लिया, “मयूरी मुझे तुम्हारा जवाब चाहिए. प्रथम भेंट में ही मैंने तय कर लिया था कि तुम नहीं तो कोई नहीं. विश्‍वास मानो मेरा, मैं आजीवन कुंआरा रह जाऊंगा.”

देवदूत से दुर्लभ सौंदर्य को देख मयूरी मुग्ध हो उठी. उसके कान गर्म हो उठे, चेहरा लाल हो गया, पर भावनाओं पर नियंत्रण रखकर वह वहां से चली गई.

चाचा के ब्याह के बाद ही मधुसूदनजी उसके विवाह का प्रस्ताव लेकर आए. सभी बेहद ख़ुश हो उठे. मयूरी की आंखों में इंद्रधनुषी सपने जाग उठे.

सारे सपने क्षणभर में ही चूर हो गए जब दादाजी ने कहा कि वह सजातीय होने के बाद भी उपजाति का है, इसलिए यह शादी नहीं हो सकती. उस दिन से दोनों परिवार के संबंधों में दरार-सी पड़ गई.

मयूरी के बीए करते ही उसका ब्याह दिल्ली में कार्यरत एक इंजीनियर से हो गया. मयूरी ब्याह के बाद दिल्ली आ गई. पति उसे बेहद प्यार करते. पहले निहार का जन्म हुआ, फिर सागरिका का.

सागरिका के जन्म के कुछ दिनों बाद ही अचानक उसकी पुष्कर की बहन से कनाट प्लेस में भेंट हो गई. उसके पति भी दिल्ली में ही कार्यरत थे. “तुम्हारे ब्याह के बाद ही भैया घर छोड़कर चले गए. बहुत खोज की गई, पर उनका पता नहीं चला.” अश्रुपूरित नेत्रों से पुष्कर की बहन ने बताया.

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मयूरी स्तब्ध रह गई. उसके हृदय में एक टीस-सी उठी, “मेरे लिए उसने अपने जीवन की आहुति दे दी. मैं तो अपने संसार में रमी रही, कभी उसकी सुध न ली. संस्कारों से जकड़ी मैं कर भी क्या सकती थी. शादी-ब्याह के फैसले तो परिवार के बुज़ुर्ग करते हैं. हे ईश्‍वर वे कहीं भी रहें, उनके साथ रहना.”

समय ने करवट ली, बच्चे बड़े हो गए. सागरिका ब्याह कर मुंबई अपने पति के पास चली गई और निहार का ब्याह दिल्ली में ही हो गया. अपने जीवन की उलझनों के बीच कभी पुष्कर की याद आने से वह अपराधबोध से भर उठती. उसने पुष्कर से न तो कोई वादा ही किया था और न उसे धोखा ही दिया था, पर उसके घर छोड़ने का कारण तो वही थी. पुष्कर के परिवारवाले भी उसे ही कलंक लगाते होंगे.

वर्षों के लंबे अंतराल के बाद पुष्कर की याद अतीत के गर्भ में दफ़न हो गई थी. आज जब स्मिता की बुआ वगैरह स्वामीजी के जीवन से वैराग्य की कथा सुन रही थी तो वह भी बहुत लगन से सब सुन रही थी. उसे क्या पता था कि जिस स्वामी के दर्शनार्थ वह स्मिता की बुआ के घर जा रही है, वह कोई और नहीं, पुष्कर है. उसके परिवार वालों के कारण ही पुष्कर के हृदय को चोट पहुंची है. अपनी एकांगी प्रेम में असफलता के कारण ही उसे जीवन से वैराग्य हो गया और फिर हताशा में स्वतः ईश्‍वर की ओर रुख कर लिया. चोट खाने के बाद ही तो इंसान ईश्‍वर की शरण में जाता है.

पुष्कर के घर छोड़ने के वर्षों बाद तक वह रात्रि की नीरवता में सोचती, ‘कहीं वह आतंकवादी तो नहीं बन गया?’ घर-द्वार छोड़ने के बाद दिशाहीन व्यक्ति आख़िर जाएगा कहां? ईश्‍वर से वह उसके जीवित रहने की कामना करती. पुष्कर को अगर कुछ हो गया तो वह स्वयं को आजीवन क्षमा न कर सकेगी. उसे जीवित देख उसने राहत की सांस ली.

पुष्कर के प्रति उसके मन में श्रद्धा के भाव जाग उठे, ‘राग-द्वेष, हर्ष-विषाद से यह इंसान बहुत दूर जा पहुंचा है. गंगा के समान पवित्र हृदय आज आकाश सदृश बृहद हो गया है. हृदय पर एक चोट खाकर इंसान इस तरह महान भी हो सकता है!  भस्मीभूत हुए अपने सपनों से आहत उसने वैराग्य की धूनि रमा ली. उमड़ती भावनाओं व आकांक्षाओं को किस तरह उसने हृदय के गहनतम कोने में दफ़नाया होगा? उस क्षण कैसी मर्मांतक पीड़ा की तीव्र अनुभूति उसे हुई होगी.’

उसे महसूस हुआ आज प्रतिबद्ध लहनासिंह अपनी सूबेदारनी के सम्मुख खड़ा हो,  सूबेदारनी के कथन का मान रखने के लिए लहनासिंह ने अपनी जान दे दी और पुष्कर ने जो कहा वह अपने जीवन की पूर्णाहूति देकर निभाया. उसे पुष्कर से लहनासिंह जैसी प्रतिबद्धता की आशा न थी. एक कसक के साथ उसका रोम-रोम सिहर उठा.

– लक्ष्मी रानी लाल

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कहानी- प्रतिबद्ध 2 (Story Series- Pratibadh 2)

मयूरी स्वामीजी की चर्चा में शामिल नहीं होना चाहती थी, पर सभी उनके प्रवचन का सार उससे सुनना चाहते थे. क्या सुनाए वह? उसके जीवन में एक तूफान आ गया था. जिस अपराध को उसने किया ही नहीं, उसी का कहर उस पर टूटा जिसके पश्‍चाताप की ज्वाला में वह आजीवन जलती रही.

रात्रि का दूसरा पहर समाप्त होने को था, पर उसकी आंखों से नींद कोसों दूर थी. हवा का एक तीव्र झोंका आया और अतीत पर जमी गर्द ऊपर उठती गई, जिसने भूली-बिसरी स्मृतियों  को तीक्ष्ण कर दिया. रात की घनी नीरवता में सिमट कर वह अतीत के गलियारे में भटकती अपनी किशोरावस्था में जा पहुंची.

उसने चोर दृष्टि से उन्हें देखा. उनकी निष्पाप दृष्टि को देख उसे अपनी भूल का एहसास हुआ. उनके चेहरे पर एक दिव्य मुस्कान थी. उन्होंने अपनी मोहक एवं शांत दृष्टि मयूरी के चेहरे पर टिका कर पूछा, “कैसी हो मयू? परिवार में सभी कुशल-मंगल से हैं?”

मयूरी क्षणभर को जड़वत रह गई. उसकी चेतना ने उसका दामन छोड़ दिया. अपनी सुध-बुध बिसरा कर उसने भी उस समंदरी आंखों की गहराई में झांका. उसके मस्तिष्क में जैसे भूचाल-सा आ गया. आंखों में अनेक प्रश्‍न कौंधने लगे. किसी तरह से उसने संयतपूर्वक सजल नेत्रों से कहा, “सभी ठीक हैं.”

“सोचा नहीं था कि जीवन की इस प्रौढ़-गोधूली में तुमसे भेंट हो जाएगी. मन पर नियंत्रण रखो मयू… ईश्‍वर जो करता है, अच्छा करता है. ईश्‍वर तुम्हें सुखी रखें.”

स्वामीजी से मिलने कुछ लोग वहां पर आ गए. सबों को बातों में मशगूल देख मयूरी पीछे जाकर बैठ गई. प्रसाद लेकर स्मिता जब आयी तो वह मयूरी को देख घबरा उठी, “क्या बात है मयूरी? तबीयत तो ठीक है?”

“हां, यूं ही ज़रा सर चकरा गया था.” मयूरी ने टालने के उद्देश्य से कहा. “कितनी बार कहा है ब्लड प्रेशर चेक करवा लो. बत्रा अस्पताल में मेरे अंकल डॉक्टर हैं… चलो तुम्हारा कल चेकअप करवा दूं.”

“अरे नहीं यूं ही…”

“मयूरी जीवन के जिस पड़ाव पर अभी हम हैं, उसमें सतर्कता की बेहद आवश्यकता है अन्यथा वृद्धावस्था भयावह हो जाएगी… अभी से ध्यान रख… मैं तो हमेशा अपना चेकअप कराती हूं. वृद्धावस्था का भय मुझे अभी से खाए जा रहा है.”

कमरे में हलचल बढ़ जाने से उन्होंने दृष्टि फेरी तो देखा सभी स्वामीजी को विदा करने कमरे से बाहर जा रहे हैं. स्मिता तेज़ी से द्वार की तरफ़ बढ़ गई, पर मयूरी वहीं शिला सदृश बैठी रही. शिष्टाचारवश उसने भी उठने की चेष्टा की तो दृष्टि उस स्वामी से जा मिली.

स्वामीजी के जाने के बाद सभी उनकी विद्वता का बखान करने में लगे थे. मयूरी ने स्मिता को घर लौटने का अनुरोध किया. मयूरी की अस्वस्थता को देख स्मिता मयूरी को लेकर लौट गई.

मयूरी स्वामीजी की चर्चा में शामिल नहीं होना चाहती थी, पर सभी उनके प्रवचन का सार उससे सुनना चाहते थे. क्या सुनाए वह? उसके जीवन में एक तूफान आ गया था. जिस अपराध को उसने किया ही नहीं, उसी का कहर उस पर टूटा जिसके पश्‍चाताप की ज्वाला में वह आजीवन जलती रही.

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रात्रि का दूसरा पहर समाप्त होने को था, पर उसकी आंखों से नींद कोसों दूर थी. हवा का एक तीव्र झोंका आया और अतीत पर जमी गर्द ऊपर उठती गई, जिसने भूली-बिसरी स्मृतियों  को तीक्ष्ण कर दिया. रात की घनी नीरवता में सिमट कर वह अतीत के गलियारे में भटकती अपनी किशोरावस्था में जा पहुंची.

उस वर्ष उसने कॉलेज में दाख़िला लिया था. गर्मी की छुट्टियां होते ही उसे अपने चाचा की शादी में गांव जाना पड़ा. जीवन में पहली बार वह किसी गांव को देख रही थी. गांव के स्वच्छ एवं उन्मुक्त वातावरण में उसने बेहद आनंद का अनुभव किया.

गांव का सामाजिक जीवन आपसी रिश्तों की सुनहरी डोर से बंधा था. हर रिश्ते का एक नाम था. पड़ोस में रहनेवालों को सभी चाचा, ताऊ या मामा कहकर पुकारते, उनमें किसी प्रकार का दुराव-छिपाव नहीं था. बच्चे अपने आंगन में कम पड़ोसी के आंगन में अधिक खेलते थे. जहां भूख लगती, वहीं खा लेते.

मयूरी के दादाजी के निकटतम पड़ोसी थे मधुसूदन दास. दोनों परिवारों में बेहद घनिष्ठता थी. मधुसूदनजी की पत्नी शादी के रस्मो-रिवाज़ को निभाने की वजह से मयूरी के दादाजी के घर पर ही अधिकांश समय बिताती. ब्याह के गहनों को देखते हुए अचानक उसे शहर से आए अपने पुत्र पुष्कर का ध्यान आया. वह हड़बड़ाकर उठ बैठी.

“गहनों को मैं बाद में देखूंगी. अपनी पढ़ाई ख़त्म करके पुष्कर कल ही शहर से वापस आया है. वह भूखा मेरी राह देख रहा होगा.”

“अरे बैठो भी… बार-बार गहनों को निकालना इतना आसान नहीं होता… मयूरी… जा पुष्कर का खाना परोस दे.”

मयूरी दिनभर पुष्कर के बरामदे में सहेलियों के साथ गप-शप लड़ाया करती थी.

उस परिवार के सभी सदस्य उसे बेहद स्नेह देते थे. पुष्कर चूंकि पिछली रात ही आया था, इसलिए परिचय नहीं हुआ था. वह स्नान करके तुरंत निकली ही थी कि उसे पुष्कर के घर जाना पड़ा.

पुष्कर अपने कमरे में बैठा किसी पत्रिका के पन्ने पलट रहा था. मयूरी को अचानक देख वह आश्‍चर्यचकित हो उठा. मयूरी साधिकार रसोई में जाकर उसका खाना परोस लाई.

“ताई ने कहा है खाना खा लें. उन्हें आने में देर होगी.” कहती हुई वह फिर रसोई में चली गई.

उसके अप्रतिम सौंदर्य को देख पुष्कर अभिभूत हो उठा. उसने कमरे की खिड़की से रसोई की ओर झांका. अपने खुले लहराते केश को लपेटने में बार-बार असफल होती मयूरी उसे बेहद भोली-सी लगी. दुपट्टे को संभालते उसे कमरे की ओर आता देख पुष्कर अपनी जगह पर पुनः जा बैठा.

– लक्ष्मी रानी लाल

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