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कहानी- रिश्तों का दर्पण 4 (Story Series- Rishton Ka Darpan 4)

स्निग्धा बेड पर कभी अपने बच्चों को देखती और कभी कमरे के सूनेपन को. रहा नहीं गया, तो आधी रात के बाद रवीश को फोन मिलाया, “मैं बहुत शर्मिंदा हूं. मैं अपनी ग़लती मान रही हूं. मुझे अपना घर छोड़कर यहां नहीं आना चाहिए था. मुझे माफ़ कर दो. मैं भी यहां नहीं रुकना चाहती. बच्चे भी दुखी हैं. यहां आकर हमें भी ले जाओ.”

“स्निग्धा इसमें तुम्हारी कोई ग़लती नहीं है. मनोज भइया मजबूर हैं, ससुरालवालों को कैसे अनदेखा कर दें. हम तो उसके अपने हैं. हमें यह समझना चाहिए कि कम से कम हमारी ओर से वह निश्‍चिंत तो हैं.” रवीश ने उसे तसल्ली दी. अपने पति के बड़प्पन को देख स्निग्धा की आंखों में आंसू आ गए.

मनोज भइया उनके सामने गिड़गिड़ाते-से लगे. कुछ देर बाद दोनों स्निग्धा के पास आए और उनका सामान उठाकर अपने कमरे में ले गए. “दीदी, एक-दो दिन की ही तो बात है, हम लोग मम्मी-पापा के कमरे में एडजस्ट कर लेंगे.” नेहा ने भारी स्वर में कहा. स्निग्धा इतनी नासमझ नहीं थी कि नेहा के शब्दों का अर्थ नहीं समझती. स्पष्ट था कि उसने एक तरह से उन्हें जल्द से जल्द खिसक जाने का अल्टीमेटम दे दिया था.

होली आने में चार दिन थे, लेकिन नेहा और उसके मायकेवालों के पूरे घर पर आधिपत्य-सा जमा लेने और अपनी उपेक्षा से पीड़ित स्निग्धा के परिवार को एक-एक पल काटना भारी पड़ रहा था. न खुले मन से रहने, खाने-पीने की आज़ादी और न ही बच्चों की पूरी देखभाल. इस घुटनभरे परिवेश के बीच रवीश और स्निग्धा के बीच चिकचिक होने लगी. “तुम्हीं बड़ा दम भर रही थी यहां आने को, अब देख लिया.” रवीश से जब सहन नहीं हुआ, तो खीझ उठा. स्निग्धा के पास चुप बने रहने के अलावा कोई विकल्प नहीं था, लेकिन अंदर ही अंदर वह भी खिन्नता से भरी हुई थी.

दूसरे दिन ही रवीश ऑफिस की अर्जेंट मीटिंग और मीटिंग के तुरंत बाद लौट आने का बहाना बनाकर अपने माता-पिता के पास चला गया. स्निग्धा को साहस नहीं हुआ कि उसे रुक जाने को कह सके. जब उसका अपना मन ही आत्मग्लानि से भरा था, तो साहस आता भी कैसे? उसके जाने के बाद स्निग्धा और बच्चे अधिक एकाकीपन से घिर गए. नतीजतन स्निग्धा की तबियत भी बिगड़ने लगी. मनोज भइया के सास-ससुर अधिकांश समय उनके साथ न जाने क्या गुप्त मंत्रणाएं करते रहते. उनके साले-सालियों ने तो उनकी लगाम पूरी तरह अपने हाथों में ले रखी थी. कभी मार्केट तो कभी पिक्चर हॉल और कभी वैसे ही इधर-उधर घूमना. कभी-कभार ये लोग घर पर रहते, तो दिनभर सालियां मनमर्ज़ी के पकवान बनाकर मुंह चलाती रहतीं. रात होती, तो ताश के पत्तों में जीजा को उलझा लेतीं. मनोज भइया को स्निग्धा से दिलभर कर बात करने का समय ही नहीं मिल पा रहा था.

रवीश के जाने के बाद स्निग्धा काफ़ी दुखी थी. रात में लेटी, तो सिर दर्द से फटा जा रहा था. वह दर्द की गोली खाने के लिए किचन में पानी गरम करने गई, तभी नेहा वहां आ गई. “दीदी, मुझे बता देतीं. त्योहार के लिए बड़े करीने से किचन सजाया है, बर्तन इधर-उधर हो गए, तो अच्छा नहीं लगेगा ना.” नेहा का ताना सुनकर स्निग्धा अंदर ही अंदर दर्द से कराह उठी. गोली खाकर लेटी, तो भी आराम नहीं मिला. बराबर वाले कमरे में तेज़ आवाज़ में म्यूजिक़ सिस्टम बज रहा था और सालियां उस पर डांस कर रही थीं. स्निग्धा ने जब आवाज़ कम करने को कहा, तो सालियां बोल उठीं, “दीदी, मस्ती का त्योहार है, बिना हुड़दंग के कैसी होली. आप कहती हैं, तो थोड़ी देर बाद बंद कर देंगे.”

डांस देख रहे मम्मी-पापा बोले, “बच्चे हैं, इस उम्र में शोर नहीं मचाएंगे, तो क्या संन्यास ले लेंगे. बच्चों के अरमानों को दबाना ठीक थोड़े है.” मम्मी-पापा की शह पर बच्चे आधी रात तक हंगामा मचाते रहे. स्निग्धा बेड पर कभी अपने बच्चों को देखती और कभी कमरे के सूनेपन को. रहा नहीं गया, तो आधी रात के बाद रवीश को फोन मिलाया, “मैं बहुत शर्मिंदा हूं. मैं अपनी ग़लती मान रही हूं. मुझे अपना घर छोड़कर यहां नहीं आना चाहिए था. मुझे माफ़ कर दो. मैं भी यहां नहीं रुकना चाहती. बच्चे भी दुखी हैं. यहां आकर हमें भी ले जाओ.”

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“स्निग्धा इसमें तुम्हारी कोई ग़लती नहीं है. मनोज भइया मजबूर हैं, ससुरालवालों को कैसे अनदेखा कर दें. हम तो उसके अपने हैं. हमें यह समझना चाहिए कि कम से कम हमारी ओर से वह निश्‍चिंत तो हैं.” रवीश ने उसे तसल्ली दी. अपने पति के बड़प्पन को देख स्निग्धा की आंखों में आंसू आ गए. थोड़ी देर बाद रवीश ने कहा, “मेरा अब वहां आना ठीक नहीं है, मनोज भइया रोकना चाहेंगे. ऐसा करो, मेरी तबियत खऱाब होने का बहाना बनाकर चली आओ.”

“मैं आपके स्वास्थ्य का बहाना नहीं बनाऊंगी. मैं तो हमेशा आपकी लंबी उम्र की कामना करती हूं. मुझसे यह नहीं होगा.” स्निग्धा ने भरी आवाज़ में कहा.

“अच्छा तो कुछ मेहमानों के अचानक घर पहुंचने की बात कहकर चली आना. मैं भी शाम तक घर पहुंच जाऊंगा.”

यह तरीका कारगर रहा स्निग्धा के लिए. वह दूसरे दिन बच्चों को लेकर अपने घर चली आई. आते ही उसने रवीश को फोन मिलाया, “मैं पहुंच गई हूं. तुम अपने साथ मम्मी-पापा, अनन्या और मान्यता को ज़रूर लेते आना. मैं उनके बिना होली नहीं खेलूंगी.”

“रीतू और मीनू को भी बुला लो.”

“वो फिर कभी आ जाएंगी. अनन्या और मान्यता ही काफ़ी हैं पूरे घर में होली के रंग बिखेरने को.” कहकर स्निग्धा ने फोन बंद कर दिया. उसके अपने मन के दर्पण ने उसे रिश्तों की वास्तविकता के निकट ला दिया था. विचार स्वतंत्र हो गए. लगा जैसे मन से अपने-पराए के अंतर का बोझ हट गया है. ख़ुशी के अतिरेक में वह आह्लाद से परिपूरित हो उठी है.

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असलम कोहरा

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कहानी- रिश्तों का दर्पण 3 (Story Series- Rishton Ka Darpan 3)

इस उमंग में उन सभी को लग रहा था कि इतने कम समय में मनोज के परिवार से दिल नहीं भरेगा. काश और छुट्टियां होतीं! लेकिन उनका उत्साह उस समय ठंडा पड़ने लगा, जब मनोज कहकर भी उन्हें स्टेशन पर कार से लेने नहीं आया. जब स्निग्धा के धैर्य का बांध टूट गया, तो उसने फोन मिलाया. दूसरी ओर से मनोज बोला, “अरे क्या बताऊं, नेहा की बहनें मार्केट घूमने की ज़िद कर बैठीं. सोचा था जल्दी वापस आ जाऊंगा, मगर उनकी ख़रीददारी और घुमाने में फंस गया. आई एम वेरी सॉरी. ऐसा करो तुम लोग थ्री व्हीलर से आ जाओ. रवीश से कहना नाराज़ न हो.”

इसके बाद तो स्निग्धा के घर पर उसके मम्मी-पापा और बहनों का एकछत्र राज हो गया. तीज-त्योहरों पर उसकी बहनें ही घर की मालकिन बन बैठतीं. इस होली पर भी यही कार्यक्रम था, लेकिन दोनों बहनों के मामाजी के घर चले जाने से स्निग्धा की सारी योजना धरी रह गई. इससे उपजी खिन्नता के कारण उसके मन में फिर से मनोज भइया के घर जाने की आकांक्षा ज़ोर मारने लगी. ‘भइया ही तो हैं, भूल गए होंगे. मेरा तो अधिकार है उन पर, ख़ूब सुनाऊंगी….’ आदि विचारों से अपने आत्मविश्‍वास को सुदृढ़ता देने के बाद उसने मनोज भइया को फोन मिला ही दिया, “क्यों भूल गए भइया? रक्षाबंधन के धागे भी याद नहीं रहे?” “नहीं बेटा, थोड़ा बिज़ी हो गया था. ससुरालवाले आ गए हैं. होली की छुट्टियों से पहले ही और छुट्टियां लेनी पड़ी हैं. नेहा तो उन्हीं में लगी है दिन-रात. लग रहा है मुझे भूल ही गई है, इसी वजह से तुम्हें भी फ़ोन नहीं कर सकी होगी. मैं तुम्हें फोन करता कि तुम्हारा फोन आ गया. यहां बड़ा अच्छा मौसम है, थोड़ी ठंड और थोड़ी धूप. तुम्हें बहुत अच्छा लगेगा. कल ही आ जाओ. रवीश को भी साथ लेते आना. बहुत दिनों से वह भी कहां आया है.” मनोज ने बहन की नाराज़गी को हल्का करते हुए कहा

“हम दोपहर की ट्रेन से पहुंचेंगे. भाभी के भी कान खींचूंगी. कार से लेने आ जाना.”

“यह भी कोई कहने की बात है. रवीश से कहना उसका ग़ुलाम हाज़िर रहेगा प्लेटफॉर्म पर.” मनोज ने अपने शब्दों को आत्मीयता से भर दिया.

रात को सोने से पहले स्निग्धा ने अपनी बहनों के न आ पाने की मजबूरी और उससे उपजे अपने ख़राब मूड की आड़ लेते हुए रवीश को मनोज के घर जाने के लिए राज़ी कर लिया. साथ ही वह रवीश के महिमामंडन से भी नहीं चूकी, “भइया, मुझसे अधिक आपको मानते हैं, वह तो ख़़ासतौर पर आपको बुला रहे हैं. देखना पलकें बिछाए रहेंगे…” और भी न जाने क्या-क्या. इस सबका परिणाम यह हुआ कि रवीश ने भी अपने विभाग से होली के अवकाश से पहले चार दिन का अवकाश और ले लिया.

दूसरे दिन सुबह से ही स्निग्धा मनोज के घर जाने की तैयारी में जुट गई. बैगों को साड़ियों और बच्चों के कपड़ों से ठूंस दिया. रवीश के मना करने के बावजूद उसके भी कई जोड़े कपड़े एक अलग सूटकेस में भर दिए. लगा जैसे महीनों के लिए जा रही है. सभी उत्साहित थे कि रोज़ नए कपड़े पहनकर मौज मनाएंगे. बच्चे भी मामा-मामी की रट लगाए थे. इस उमंग में उन सभी को लग रहा था कि इतने कम समय में मनोज के परिवार से दिल नहीं भरेगा. काश और छुट्टियां होतीं! लेकिन उनका उत्साह उस समय ठंडा पड़ने लगा, जब मनोज कहकर भी उन्हें स्टेशन पर कार से लेने नहीं आया. जब स्निग्धा के धैर्य का बांध टूट गया, तो उसने फोन मिलाया. दूसरी ओर से मनोज बोला, “अरे क्या बताऊं, नेहा की बहनें मार्केट घूमने की ज़िद कर बैठीं. सोचा था जल्दी वापस आ जाऊंगा, मगर उनकी ख़रीददारी और घुमाने में फंस गया. आई एम वेरी सॉरी. ऐसा करो तुम लोग थ्री व्हीलर से आ जाओ. रवीश से कहना नाराज़ न हो.”

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स्टेशन से मनोज के घर तक पहुंचने का जो रास्ता आधे घंटे का था, वह थ्री व्हीलर पर गड्ढों से भरी सड़क और जाम के कारण एक घंटे में पूरा हुआ. थककर स्निग्धा, रवीश और बच्चों का हाल बेहाल हो गया. स्निग्धा को चक्कर-सा आने लगा और बच्चे उल्टियां करने लगे. सोचा था कि मनोज के घर पर आराम मिलेगा, लेकिन वहां पहुंचे, तो लगा जैसे पहले से ही उसके ससुरालवालों का कब्ज़ा हो चुका था. सास, ससुर, एक साला और दो सालियों के अलावा चचिया सास-ससुर भी आ धमके थे इस बार. तीन रूम और एक छोटे बरामदे में घिचपिच-सी हो गई थी. कमरे सभी भरे हुए थे. एक में चचिया सास-ससुर, दूसरे में नेहा के माता-पिता और साले-सालियां और तीसरे कमरे में मनोज का अपना परिवार. मनोज सालियों को लेकर अभी भी बाज़ार से वापस नहीं आया था. नेहा अपने मायकेवालों की सेवा में लगी हुई थी. उन्हें अंदर आता देख बोली, “अरे दीदी, जीजाजी, आ गए आप लोेग. सामान बरामदे में रख दीजिए. वो आते ही होंगे, तब तक आप लोेग भी यहीं बैठिए, कमरों में तो बहुत भीड़-भड़ाका है.” इतना कहकर वह चली गई चाचा-चाची के कमरे में.

बच्चों की तबियत अभी भी ढीली ही थी. रवीश और स्निग्धा बरामदे में पड़े लंबे सोफे पर बैठ गए और दोनों बच्चों को अपने बीच में जगह बनाकर लिटा दिया अगल-बगल. थोड़ी देर बाद नेहा ने मेहरी से पानी भिजवा दिया और उससे कुछ देर बाद चाय और बिस्किट. नेहा के मम्मी-पापा ने कमरे से बाहर आकर स्निग्धा, रवीश और बच्चों की औपचारिक कुशलक्षेम पूछी और फिर अपने कमरे में घुस गए. एक घंटे दरवाज़े पर टकटकी लगाए रखने के बाद मनोज अपनी सालियों के साथ घर में आया, तो सामान के थैलों से लदा हुआ था. उन्होंने ख़ूब खऱीददारी करवाई थी मनोज से. वह स्निग्धा और रवीश की तरफ़ बढ़ता, उससे पहले ही सालियों ने टोक दिया, “जीजू, पहले सामान तो हमारे कमरों में रख दीजिए.”

सालियों से छुटकारा पाकर वह रवीश के पास आए, “आई एम वेरी सॉरी यार, वो क्या करूं, फंस गया शॉपिंग के झमेले में. मैं आप लोगों के ठहरने की व्यवस्था करता हूं.” वह अपने कमरे में गए और नेहा से न जाने क्या-क्या फुसफुसाते रहे. स्निग्धा ने कनखियों से देखा, तो नेहा का भृकुटी तना चेहरा नज़र आया.

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असलम कोहरा

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कहानी- रिश्तों का दर्पण 2 (Story Series- Rishton Ka Darpan 2)

रवीश के माता-पिता और बहनें शुरू-शुरू में तो स्निग्धा के पास आए थे, लेकिन बहुत जल्दी ही स्निग्धा ने उपेक्षित व्यवहार करके उनके आने से पल्ला झाड़ लिया था. ऐसा उदासीन व्यवहार दिखाया कि ससुरालवालों ने भविष्य में आने से तौबा कर ली. छोटे बच्चे के पहले जन्मदिन की बात है. इस मौ़के पर रवीश के परिवारवाले भी उसके कहने पर आ गए थे, लेकिन क्या मिला उन्हें उपेक्षा के सिवा.

“ठीक है, लेकिन रीतू और मीनू स्वयं ही इच्छुक थीं यहां आने को. उन्होंने पहले से ही कह रखा है. छोटा घर है, ऐसे में अनन्या और मान्यता की भरपूर सेवा नहीं हो पाएगी, जो मुझे अच्छा नहीं लगेगा. ऐसा करते हैं, इस बार रीतू, मीनू को बुला लेते हैं, अनन्या और मान्यता को किसी और अवसर पर बुला लेंगे… वैसे जैसा आप कहें…”

“ठीक है, जैसा तुम्हें अच्छा लगे, वैसा करो. मैं तुमसे अलग थोड़े ही हूं.” रवीश ने समर्पण कर दिया. ऐसे अवसरों पर थोड़े से भी विवाद और बहस से वह बचता ही था. पति के समर्पण के लिए जो भूमिका स्निग्धा ने बनाई थी, उसका परिणाम मनोनुकूल पाकर वह अंदर ही अंदर प्रसन्नता से भर गई.

चाय के बाद रवीश टीवी पर समाचारों में व्यस्त हो गया. स्निग्धा मौक़ा पाकर बहनों को बुलाने की ख़ुशी से लबरेज़ दोबारा मोबाइल लेकर लॉन में आ गई. उत्साहित हो उसने मोबाइल से अपने घर पर फोन मिलाया. उधर मम्मी थीं. औपचारिक बातों के बाद मम्मी बोलीं, “बेटा, होली में आ रही है यहां? घर बड़ा सूना-सा है. मनोज को तो नौकरी से ़फुर्सत नहीं है और रीतू और मीनू अपने मामा के घर पर चली गई हैं. कह तो रही थीं तुम्हारे पास जाने को, लेकिन तभी मामी का फोन आ गया.” मम्मी से मिली जानकारी ने स्निग्धा की सारी योजना पर पानी-सा फेर दिया. मन खिन्नता से भर गया. थोड़ा इंतज़ार नहीं कर सकती थीं दोनों. वह अपनी बहनों पर ही झुंझला पड़ी और निढाल-सी लॉन की मखमली घास पर पसर गई. रिश्तों के ताने-बाने से उलझे विचार फिर मंडराने लगे उसके इर्द-गिर्द.

रवीश के संयुक्त परिवार में स्निग्धा ब्याही थी. चार बरस हो गए इस बात को. वह बचपन से ही कुछ खुले विचारों की थी. संयुक्त परिवार की तो उसने कल्पना ही नहीं की थी. उसने मन में ऐसा घरौंदा बना रखा था, जिसमें वह, उसका पति और दो बच्चे हों. उस घरौंदे में आने की इजाज़त भी हो, तो उसके घरवालों को ही. उसमें ससुरालवालों के लिए कोई जगह नहीं थी. रवीश पहले से ही अपने घर से दूर एक मल्टीनेशनल कंपनी में असिस्टेंट मैनेजर के पद पर नियुक्त था. सो स्निग्धा के घरवालों ने रवीश के परिवार की सभी शर्तों को स्वीकार करते हुए उसे रवीश के बंधन में बांध दिया. स्निग्धा भी इस रिश्ते से बेहद ख़ुश थी. दूसरे शहर में नौकरी ने संयुक्त परिवार में रहने की संभावना स्वयं ही समाप्त कर दी थी. शुरू के कुछ दिन ही वह संयुक्त परिवार में रही, फिर रवीश उसे अपने नौकरी से मिले क्वार्टर में ले आया.

धीरे-धीरे अपने लटकों-झटकों से स्निग्धा ने रवीश को अपना गु़लाम बना लिया. वह हर समय उसकी हां में हां मिलाता रहता. अपने घर भी बहुत कम जाता. अधिकतर हर तीज-त्योहार पर स्निग्धा उसे अपने घर ले जाती या फिर उसके मायकेवाले आ धमकते. ऐसे अवसरों पर रवीश के परिवार के लोग, विशेष रूप से दोनों छोटी बहनों की आंखें भइया-भाभी की आस लगाए-लगाए पथरा जातीं. रवीश के घर नहीं आने को तो उसके घरवाले कुछ सह भी लेते, लेकिन स्निग्धा के माता-पिता और भाई-बहनों को रवीश के घर पर आए दिन पड़े रहने को वे आत्मसात नहीं कर पाते.

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स्निग्धा के दोनों बच्चे ससुराल से बाहर ही जन्में. पहला बच्चा मायके में और दूसरा उसके अपने क्वार्टर में. दोनों बच्चों के जन्म के समय स्निग्धा के घरवालेे ही जमे रहे. बच्चों के जन्म से जुड़े सारे संस्कार भी मायके में ही किए गए. बच्चों के जन्म के समय एकाध बार रवीश ने अपने घर चलने को कहा भी, लेकिन स्निग्धा ने इस प्रस्ताव को बड़ी चालाकी से यह कहकर ख़ारिज़ कर दिया था कि बच्चे उसकी मम्मी से हिले-मिले हैं, वह पूरा ख़्याल रखती हैं, उनसे अलग होने पर बीमार पड़ सकते हैं. वह दोनों बच्चों को लेकर औपचारिकता निभाने के लिए 4-5 बार ही ससुराल गई थी और वह भी एक-दो दिन के लिए. ससुराल से लौटकर जब भी वापस आती, तो कुछ दिनों तक उसका मुंह चढ़ा रहता, सही देखभाल नहीं हो पाती वहां, बच्चे बीमार पड़ गए. कोई तवज्जो भी नहीं देता है. अपना ही घर ठीक रहता है.

रवीश के माता-पिता और बहनें शुरू-शुरू में तो स्निग्धा के पास आए थे, लेकिन बहुत जल्दी ही स्निग्धा ने उपेक्षित व्यवहार करके उनके आने से पल्ला झाड़ लिया था. ऐसा उदासीन व्यवहार दिखाया कि ससुरालवालों ने भविष्य में आने से तौबा कर ली. छोटे बच्चे के पहले जन्मदिन की बात है. इस मौ़के पर रवीश के परिवारवाले भी उसके कहने पर आ गए थे, लेकिन क्या मिला उन्हें उपेक्षा के सिवा. केक काटने, खाना खाने, अतिथियों से बातचीत और ठहरने सहित सारे कार्यक्रम पर स्निग्धा और उसके घरवालों का आधिपत्य बना रहा. बच्चे को अपने ही हाथों में उठाए रहे. रवीश के घरवालों को छूने भी नहीं दिया. रात होने पर तो स्निग्धा ने बखेड़ा ही खड़ा कर दिया था, “बड़ी आफ़त में जान है. कहां लेटेंगे, बैठेंगे, समझ में नहीं आता. छोटा घर है, कम से कम यह तो ख़्याल रखना चाहिए लोगों को. सारे कार्यक्रम में शामिल हो लिए, तो शाम को चले जाना चाहिए.” रवीश के घरवालों ने जैसे-तैसे रात काटी और सुबह होते ही चले गए.

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कहानी- रिश्तों का दर्पण 1 (Story Series- Rishton Ka Darpan 1)

स्निग्धा को लगा कि बहनों को बुलाने के निर्णय को अमलीजामा पहनाने के लिए पति रवीश को पटाना ज़रूरी था, सो ऑफिस से आते ही स्निग्धा ने रवीश के साथ चुहल शुरू कर दी, “कभी-कभी मेरे दिल की आवाज़ सुनकर जल्दी भी आ जाया करो. कब-से धड़क रहा है तुम्हारे लिए, मेरे हमदम मेरे दोस्त!”

“आज बड़ी मस्ती चढ़ रही है, क्या बात है?” रवीश ने भी उसे आलिंगन में बांध लिया. किसी तरह शरीर की गर्माहट से मुक्ति पाकर वह किचन में चली गई चाय बनाने. चाय लाकर वह फिर सोफे पर उससे सटकर बैठ गई, “कुछ दिन मेरे बिना रह लोगे ना?”

“क्यों, क्या हुआ, कहां जा रही हो?”

मोबाइल फोन की रिंगटोन सुनकर स्निग्धा कमरे की ओर भागी. ‘ज़रूर मनोज भइया का होगा. ऐसे मौक़ों पर तो वह उसे कभी नहीं भूलते हैं’ उसने सोचा, लेकिन दूसरी ओर फोन पर उसकी अंतरंग सहेली रूपसी थी, “सिनी, मैं हूं तुम्हारी रूप. कई दिनों से तुम्हारा फोन नहीं आया, तो सोचा मैं ही कसम तोड़ दूं.” फिर हंसती-सी बोली, “बुरा मत मानना. मैं तो ऐसे ही छेड़ रही हूं तुझे. एक तू ही तो अपनी है, जिससे कोई पर्दा नहीं है, तेरे दिल की सुन लेती हूं और अपना दिल तेरे सामने खोल देती हूं. अच्छा यह बता, होली की छुट्टियों में यहीं है या कहीं जा रही है?” वह प्यार से मुझे सिनी और मैं उसे रूप कहती हूं.

“सोच तो रही थी कि मनोज भइया के घर चली जाऊं, लेकिन उनका और नेहा भाभी का फोन ही नहीं आया अभी तक. अपने आप क्या फोन करूं. कोई बुलाए तो ही ठीक लगता है. बिन बुलाए अपने आप जाने से हेटी नहीं होती क्या?”

“बिज़ी होंगे भइया, वरना वह घर में अगर किसी को सबसे ज़्यादा चाहते हैं, तो वह तू ही तो है.” रूपसी ने बात हल्की कर तसल्ली देनी चाही.

“अरे यार, चार-पांच दिन बाद तो छुट्टियां आ ही रही हैं. जाने से पहले घर की सारी व्यवस्था करनी होती है. तू तो जानती ही है, पति नाम का प्राणी घर में सारी सुविधाएं चाहता है, लेकिन जब ख़ुद अकेला रहता है, तो घर को कबाड़ा बना देता है. आते ही फिर जुटो पहले की व्यवस्था बनाने में. देर से गई, तो छुट्टियां तो आई-गई हो जाएंगी. अच्छा बता तू जा रही है कहीं?”

“सिनी, माई डार्लिंग, मैं कहीं नहीं जा रही. सच कहूं, तो जाने की ज़रूरत ही नहीं है. मैंने दोनों ननदों को ही यहां बुला लिया है. घर में ही धमाचौकड़ी का आनंद मिलेगा, तो किसी और के घर जाने की क्या ज़रूरत है.”

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“बहनों को बुलाती, ननदों में तो ऊपरवाले ने न जाने कौन-से जींस इनबिल्ट कर दिए हैं कि भाभी को खाने को दौड़ती हैं. सुना नहीं तूने, कहते हैं ननद यानी गले का फंदा.” वह हंसते हुए बोली, “मैं तो सोच रही हूं कि अगर मनोज भइया ने नहीं बुलाया, तो अपनी दोनों छोटी बहनों को बुला लूंगी.” स्निग्धा ने तर्क दिया.

फोन रखने के बाद स्निग्धा बाहर लॉन में चली गई मन हल्का करने. रूपसी के मस्तमौला अंदाज़ ने उसके मन में हलचल मचाकर रख दी थी. उसे रूपसी से कुछ चिढ़ भी हो गई थी. सबसे घनिष्ठ सहेली और उसी ने उसकी बात को सहारा नहीं दिया. भला बताओ, ननदें भी कभी भाभी के लिए बहन बन सकी हैं? सच्चाई से परे बात कर रही है रूप. होली आने में कुछ दिन थे, लेकिन बाहर सबने, विशेष तौर पर युवा शक्ति ने हुड़दंग मचा रखा था. लड़के भी सराबोर और लड़कियां भी. लड़कियों के बीच उसे अपनी बहनों के चेहरे नज़र आने लगे. मन में उमड़ते विचारों के बीच उसका निर्णय बार-बार फिसल रहा था. मनोज भइया के पास स्वयं चली जाए या फिर बहनों को बुलाए, लेकिन भइया का निमंत्रण नहीं आने पर दूसरा विकल्प अधिक उपयुक्त लगा. उसने निश्‍चय किया कि दोनों छोटी बहनों रीतू और मीनू को ही अपने पास बुला लेगी, फिर सब मिलकर ख़ूब गुल-गपाड़ा करेंगी. भइया के उपेक्षित व्यवहार के कारण वह अपना मन क्यों मारे? तभी तो भइया को भी पता चलेगी उसकी वैल्यू!

स्निग्धा को लगा कि बहनों को बुलाने के निर्णय को अमलीजामा पहनाने के लिए पति रवीश को पटाना ज़रूरी था, सो ऑफिस से आते ही स्निग्धा ने रवीश के साथ चुहल शुरू कर दी, “कभी-कभी मेरे दिल की आवाज़ सुनकर जल्दी भी आ जाया करो. कब-से धड़क रहा है तुम्हारे लिए, मेरे हमदम मेरे दोस्त!”

“आज बड़ी मस्ती चढ़ रही है, क्या बात है?” रवीश ने भी उसे आलिंगन में बांध लिया. किसी तरह शरीर की गर्माहट से मुक्ति पाकर वह किचन में चली गई चाय बनाने. चाय लाकर वह फिर सोफे पर उससे सटकर बैठ गई, “कुछ दिन मेरे बिना रह लोगे ना?”

“क्यों, क्या हुआ, कहां जा रही हो?”

“सोच रही हूं, होली की छुट्टियों में घर चली जाऊं. रीतू और मीनू को देखने का बड़ा मन हो रहा है. चली जाऊं?” स्निग्धा ने पति के बालों में उंगली फिराते हुए पूछा.

“जैसी तुम्हारी मर्ज़ी, लेकिन डार्लिंग तुम जाओगी तो मैं यहां अकेले क्या करूंगा, मैं भी अपने घर निकल जाऊंगा.”

“आप भी चलिए मेरे साथ.” स्निग्धा ने तीर छोड़ा, “लेकिन फिर यह घर सूना हो जाएगा. ”

“ठीक कह रही हो तुम. अगर हम सभी चले गए, तो फिर अपने इस घर का क्या होगा? हमारे-तुम्हारे मायके, ससुराल और दूसरे लोगों के घर होली के रंगों से सजेंगे और अपना घर भूतों का डेरा बन जाएगा. लोग मिलने आएंगे, तो क्या सोचेंगे?”

“तो फिर रीतू और मीनू को बुला लूं यहां? कुछ समय की बात है, फिर तो वो पराए घर की हो जाएंगी. जितना साथ रह लें.” स्निग्धा ने धीरे से कहा.

“अरे भई, हम तो तुम्हारे और तुम्हारी बहनों के गु़लाम हैं. साली तो वैसे भी आधी घरवाली होती है. वैसे भी डार्लिंग, पूरा घर तुम्हारा है, जिसे चाहो बुला लो.” रवीश ने अपनी उंगलियां उसकी उंगलियों में पिरोते हुए कहा. फिर थोड़ा रुककर बोला, “तुम कहो, तो इस बार अनन्या और मान्यता को बुला लें?” अनन्या और मान्यता रवीश की छोटी बहनें.

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कहानी- खोया हुआ-सा कुछ 4 (Story Series- Khoya Hua-Sa Kuch 4)

‘’जिस तड़प और तकलीफ़ से तुम्हें गुज़रना पड़ा होगा, उसे सोचता तो आत्मा तक कांप उठती मेरी. इसी से आज तक अपने को माफ़ नहीं कर सका मैं! न जाने कितनी बार मैंने ईश्‍वर से दुआ मांगी कि बस एक बार मुझे पीहू से मिला दो. तुमसे मिल पाता तो कहता कि पीहू मुझे माफ़ कर दो! मैं सचमुच कायर था, जो कुछ न कर सका, न अपने प्यार के लिए, न तुम्हारे विश्‍वास के लिए.’’

मां बिना कुछ कहे बस मेरे सिर पर हाथ फेरती रही. शायद वह भी समझ गई थी कि अब इसके लिए भी देर हो गई है.

तुम्हारे भरोसे पर पूरा न उतर सकने के अपराधबोध ने मुझे व्यथित कर दिया था. हर पल बस एक ही ख़याल रहता मेरे मन में कि मैंने तुम्हारा भरोसा तोड़ दिया पीहू…! जिस तड़प और तकलीफ़ से तुम्हें गुज़रना पड़ा होगा, उसे सोचता तो आत्मा तक कांप उठती मेरी. इसी से आज तक अपने को माफ़ नहीं कर सका मैं! न जाने कितनी बार मैंने ईश्‍वर से दुआ मांगी कि बस एक बार मुझे पीहू से मिला दो. तुमसे मिल पाता तो कहता कि पीहू मुझे माफ़ कर दो! मैं सचमुच कायर था, जो कुछ न कर सका, न अपने प्यार के लिए, न तुम्हारे विश्‍वास के लिए. और जब मैं पूरी तरह टूट गया, तो एक रात न जाने कहां से आकर तुमने ही मुझसे कहा, “समीर, मैंने सदा तुम्हें एक पेंटर के रूप में देखना चाहा था. मेरा यह सपना पूरा कर दो न समीर…” और उस सुबह जब मैं उठा तो मन में तुम्हारा सपना पूरा करने का लक्ष्य बना चुका था… बस यही है इस मामूली-से पेंटर का सफ़र पीहू…!” इतना कहकर वह ख़ामोश हो गया, तो अपनी आंखों से बह चले आंसुओं को पोंछते हुए मैंने कहा, “क्यों दी अपने आपको इतनी बड़ी सज़ा समीर…? क्यों अपने साथ मुझे भी गुनहगार बना दिया तुमने?” समीर ने मेरा हाथ थामकर कहा, “मुझे तुमसे कोई शिकायत नहीं पीहू, वह तो मैं ही था जो तुम्हारी अपेक्षाओं पर खरा न उतर सका, और जब यह बात समझ आई तब तक व़क़्त मेरे हाथों से फिसल चुका था.

फिर कुछ पलों की ख़ामोशी के बाद बोला, “अच्छा हुआ तुम मुझे मिल गईं, बहुत इच्छा थी तुमसे मिलने की, तुमसे माफ़ी मांगने की और यह बताने की कि देखो पीहू मैं तुम्हारा सपना पूरा कर रहा हूं…” तभी मेरी 5 साल की नन्हीं-सी बिटिया ‘मां…मां…’ कहती हुई आकर मेरे गले में झूल गई. मैंने समीर से उसे मिलवाते हुए कहा, “समीर… यह है मेरी बिटिया परी…” परी को गोद में लेते हुए वह चौंक उठा, “परी…?” मैंने उसकी बात समझकर कहा, “हां समीर, परी… वही नाम जो तुम हमारी बिटिया का रखना चाहते थे. तुम्हें तो न पा सकी, पर परी के नाम में तुम्हें सदा अपने क़रीब पाती हूं मैं.” मेरी बात पर समीर मुस्कुरा उठा. तभी दरवाज़े की घंटी बजी. देखा तो नील थे, आते ही उन्होंने पूछा, “समीर आ गए?” “हां…”

अंदर आकर वे समीर से बोले, “जानता हूं कि आप सोच रहे होंगे कि जान-पहचान न होने पर भी मैंने आपको घर खाने पर क्यों बुलाया है?” उनकी बात पर मैंने समीर की ओर देखा. फिर उत्सुकता से नील के आगे कहने का इंतज़ार करने लगी, “कल जब मैं आपकी पेंटिंग देख रहा था तो मैंने वहां पीहू की भी एक पेंटिंग देखी. उसे देख मैं चौंक पड़ा. फिर जब आपके सेक्रेटरी से मैंने उस पेंटिंग को ख़रीदने की इच्छा जताई, तो उसने यह कह कर इंकार कर दिया कि समीर साहब ने इस पेंटिंग को बेचने से मना किया है. वहीं आपके शादी न करने के बारे में, अच्छी-ख़ासी नौकरी छोड़ पेंटर हो जाने के बारे में सुना, तो लगा कि कहीं इसका संबंध पीहू से ही तो नहीं? प्यार किसी का भी हो, सम्मान करने लायक होता है और फिर जो कुछ आपने अपने प्यार के लिए किया था, उसने आपको मेरी नज़रों में बहुत ऊंचा उठा दिया था. तब सोचा कि जिसके लिए यह सब किया जा रहा है, कम-से-कम उसका तो हक़ बनता ही है यह सब जानने का! बस यही सोच कर आपको यहां बुलाया था. आशा है आप मुझे अन्यथा न लेंगे.”

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समीर ने नील का हाथ पकड़ कर कहा, “आप सोच भी नहीं सकते नीलजी कि आपने मुझ पर कितना बड़ा एहसान किया है. आठ बरस से अपनी आत्मा पर एक बोझ लिए जी रहा था और आज उससे कुछ हद तक निजात पा सका हूं, तो स़िर्फ आपके कारण! अगर पीहू से माफ़ी न मांगता तो शायद चैन से मर भी न पाता. नीलजी, कई बार अपनी नासमझी में इंसान जान ही नहीं पाता कि उसके पास कुछ अनमोल है, वह तो उसके चले जाने के बाद ही समझ में आता है कि उसने क्या खो दिया है? आप सच में बहुत क़िस्मत वाले हैं, जो आपके पास पीहू जैसी जीवनसाथी है.”

नील ने मुस्कुराकर मेरे गले में बांह डालते हुए कहा, “वह तो मैं हूं, क्यों पीहू?” उनकी बात पर हम मुस्कुरा पड़े. तभी समीर ने कहा, “अब मैं चलता हूं. आज की शाम जीवन भर मीठी याद बनकर मेरे साथ रहेगी. समीर को छोड़ने मैं और नील बाहर तक आये, तो मैंने समीर से कहा, “समीर, बहुत सज़ा दे चुके अपने आपको, अब तो कोई अच्छा-सा जीवनसाथी चुन लो.” समीर ने मुस्कुरा कर कहा, “पीहू, तुम बहुत क़िस्मतवाली जो तुम्हें नील जैसा समझदार पति मिला है. जो सम्मान, जो प्यार तुम्हारा हक़ था, जो मैं तुम्हें नहीं दे सका था, वह नील तुम्हें दे रहा है. पर अगर मुझे भी वैसा ही साथी न मिला जो तुम्हारे प्रति मेरी भावना को वही सम्मान दे सके तो…? इसलिए मैं अकेला ही ठीक हूं. बस एक इच्छा है कहो, पूरी करोगी?” मैंने अपनी प्रश्‍नचिह्न-सी आंखें उसकी ओर उठा दीं, “चाहता हूं कि एक बार, बस एक बार तुम मेरी पेंटिंग देखने आओ… देखो कि मैं तुम्हारा सपना पूरा कर सका या नहीं? आओगी पीहू?”

“आऊंगी, ज़रूर आऊंगी समीर…” मेरी बात सुन समीर के चेहरे पर तृप्ति के भाव उभर आए. हम दोनों दूर तक समीर को जाता देखते रहे. मैंने हौले से अपना सिर नील के कंधे पर टिका दिया तो नील ने मुझे अपनी बांहों में भर लिया.

– कृतिका केशरी

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कहानी- खोया हुआ-सा कुछ 3 (Story Series- Khoya Hua-Sa Kuch 3)

“कैसी हो पीहू…?” मैंने मुस्कुराकर कहा, “बहुत अच्छी… बहुत ख़ुश!”

“पीहू… क्या कभी माफ़ कर सकोगी मुझे…?” मैंने व्यंग्य से कहा, “माफ़ी… किस बात की माफ़ी समीरजी…? आपको जो सही लगा, सो आपने किया. उससे किसी पर क्या गुज़री इससे आपको क्या? छो़ड़ो वह सब… आप अपनी सुनायें. जहां तक मुझे याद है, आप तो एक बहुत अच्छी कंपनी में थे. फिर वह छोड़कर पेंटर कैसे बन गए?”

“हम तो समीरजी की एग्ज़बीशन भी देखकर आ गए हैं. पीहू तुम्हें चलना चाहिए था मेरे साथ, कितनी सुंदर पेंटिंग थी उनकी. मैं मिला समीरजी से, पर वह भी अजीब इंसान लगे मुझे. जानती हो, यह महाशय पहले किसी बड़ी कंपनी में काम करते थे, फिर अचानक सब कुछ छोड़कर पेंटर हो गए. और पता है अब तक शादी नहीं की है. लोग कहते हैं कि किसी से बहुत प्यार करते थे, पर उसे पा न सके, बस उसकी याद में कभी शादी न करने का फैसला ले बैठे…”

नील अपनी ही रौ में पता नहीं क्या-क्या कहे जा रहे थे, पर मेरा मन तो उन्हीं चंद शब्दों में अटक गया था, ‘शादी नहीं की… तो क्या अब तक समीर मुझे भूला नहीं पाया…?’

नील मेरे मन की बेचैनी भांपते हुए बोले, “पीहू, क्या हुआ. तुम कुछ परेशान-सी लग रही हो?”

“कुछ नहीं, बस ज़रा थकावट लग रही है.” यह कह कर मैं बात को टाल गई. अगली दोपहर नील का फ़ोन आया, “पीहू, आज शाम मेरा एक मित्र आएगा. ज़रा अच्छी-सी तैयारी कर लेना.” मेरा मन तो अब तक समीर में ही उलझा हुआ था. कितने सवाल थे, जो पूछने थे, मन हुआ एक बार जाकर मिल आऊं उससे. फिर लगा जाकर भी क्या हासिल होगा? मैं बेमन से घर का काम करने में लग गई.

शाम होने पर मैं नील के आने का इंतज़ार करने लगी. तभी फ़ोन बजा. फ़ोन नील का था, “पीहू, मुझे कुछ काम आ गया है, थोड़ी देर हो जाएगी. मेरा मित्र आए तो तुम उसका ख़याल रखना.” मैं झल्ला गई. जान न पहचान बस कह दिया कि ख़याल रखना. ठीक 6 बजे दरवाज़े की घंटी बजी. दरवाज़ा खोलते ही मैं सामने खड़े इंसान को देखकर चौंक पड़ी, “समीर… तुम यहां?” मुझे देखते ही समीर के हाथ में फंसे रजनीगंधा के फूल कांप उठे, “पीहू…!”

कुछ पल हम दोनों बिना कुछ कहे यूं ही खड़े रह गए. मुझे समझ ही नहीं आ रहा था कि क्या करूं? मेरी परेशानी भांपकर उसने कहा, “मुझे यहां नीलजी ने बुलाया है. यह उन्हीं का घर है न?”

मैंने उसे अंदर आने का रास्ता देते हुए कहा, “हां… उन्हीं का घर है और मैं उनकी पत्नी…!”

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मैंने मुस्कुराकर कहा, “बहुत अच्छी… बहुत ख़ुश!”

“पीहू… क्या कभी माफ़ कर सकोगी मुझे…?”

मैंने व्यंग्य से कहा, “माफ़ी… किस बात की माफ़ी समीरजी…? आपको जो सही लगा, सो आपने किया. उससे किसी पर क्या गुज़री इससे आपको क्या? छो़ड़ो वह सब… आप अपनी सुनायें. जहां तक मुझे याद है, आप तो एक बहुत अच्छी कंपनी में थे. फिर वह छोड़कर पेंटर कैसे बन गए?”

समीर व्यंग्य से हंसकर बोला, “व़क़्त के साथ बहुत कुछ छूट जाता है और बहुत कुछ छोड़ना पड़ जाता है. कोई थी जो मुझे पेंटर के रूप में देखना चाहती थी, पर एक दिन वही मुझसे रूठ कर, न जाने कहां चली गई, इसलिए उसके इस सपने को पूरा करके, उसे अपनी पेंटिंग के रंगों में बांधने की कोशिश करता रहता हूं.”

मैंने तड़पकर कहा, “इतना प्यार करते थे उससे, तो उसे जाने ही क्यों दिया?”

समीर सिर झुकाकर बोला, “अगर जानता कि मेरी एक पल की कमज़ोरी से यह हादसा घटित हो जाएगा, तो शायद…! जानती हो पीहू… उस दिन तुमसे दूर जाते व़क़्त एक-एक क़दम उठाते हुए ऐसा लग रहा था मानो, मेरे हाथों से कुछ बहुत ही अनमोल चीज़ छूटी जा रही है. छ: माह, जो सिंगापुर में गुज़ारे मैंने तुम्हारे बिना, ऐसे थे मानो छ: बरस बीत गए हों. तभी मुझे एहसास हुआ कि तुम मेरे जीवन का कितना अहम हिस्सा हो चुकी थी. वहां से लौटते हुए मैं निर्णय कर चुका था कि चाहे सारी दुनिया मेरे ख़िलाफ़ हो जाए, पर मैं तुम्हें अपना बना कर ही रहूंगा. आते ही तुम्हारे घर गया. पर जब तुम्हारी बहन ने बताया कि तुम्हारी…!” इतना कहकर समीर रुक गया.

फिर एक लंबी सांस लेकर बोला, “उस पल ऐसा लगा था पीहू मानो किसी ने मुझसे मेरे हिस्से की ज़मीन और आकाश दोनों छीन लिए हों. याद है पीहू, तुम ही कहती थी कि अपनी लापरवाही की बहुत बड़ी क़ीमत चुकानी पड़ेगी मुझे, पर वह क़ीमत तुम होगी पीहू… यह तो मैंने सोचा भी नहीं था. तुम्हारा साथ मुझे जीने की वजह देता था, पर तुम्हारे चले जाने पर लगता था कि मैं तुम्हारे लिए मर जाऊं. हर पल, हर क्षण मैं तुम्हें अपने आस-पास देखना चाहता था. कैसा पागलपन था वह, जो मुमकिन नहीं था वही सब चाहता था मैं.

घरवाले समझा-समझाकर हार गए, पर मैं शादी के लिए तैयार न हुआ. फिर एक दिन मां ने कहा, “ठीक है समीर जाओ, जिसे तुम अपनाना चाहते हो, उसे ही हमारी बहू बनाकर ले आओ.” मां की बात सुनकर पहले मैं बहुत ज़ोर से हंसा और फिर उनके गले लगकर, बच्चों की तरह फूट-फूट कर रो पड़ा.

– कृतिका केशरी

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कहानी- खोया हुआ-सा कुछ 2 (Story Series- Khoya Hua-Sa Kuch 2)

मैं झुंझलाकर बोली, “समय ही तो नहीं है मेरे पास. अब तो मेरी पढ़ाई भी पूरी हो गई है. अब क्या बहाना बना कर रोकूं अपनी शादी? और फिर अभी मेरी छोटी बहन रिया भी तो है.”

वह बात बदलते हुए बोला, “अच्छा छोड़ो यह बात, सुनो मुझे कंपनी के काम से सिंगापुर जाना है.”

“समीर तुम जाने से पहले बात करके जाओगे न?” वह उलझन भरे स्वर में बोला, “कह नहीं सकता, पर कोशिश ज़रूर करूंगा.”

“ठीक है, तुम मेरे घरवालों से बात करने अभी मत आओ, पर जाने से पहले तुम्हें अपने घरवालों को मेरे बारे में बताना होगा, ताकि मैं आश्‍वस्त हो सकूं. अपने घरवालों से कह सकूं कि मैं तुम्हारा इंतज़ार करूंगी. बोलो कर सकोगे बात?” कुछ पलों की ख़ामोशी के बाद उसने कहा, “ठीक है, मैं करूंगा बात…”

तब एक दिन मैंने उससे कहा, “समीर, तुम इतने अच्छे कवि हो, पेंटर हो, फिर इसी को अपना प्रो़फेशन क्यों नहीं बना लेते? क्यों नौकरी के लिए ठोकरें खा रहे हो?”

वह हंस कर बोला, “मैं भी यही चाहता था पीहू, पर मां-पापा का सपना है कि मैं भी बड़े भैय्या की तरह नौकरी ही करूं. उनका मानना है कि कला संतुष्टि तो देती है, पर पेट नहीं भरती.”

मैंने उससे असहमत होते हुए कहा, “पता नहीं समीर, पर मैं तुम्हें एक पेंटर के रूप में ही देखना ज़्यादा पसंद करूंगी. तुम्हारी पेंटिंग की प्रदर्शनी लगे, लोग तुम्हें सराहें, कलाकार के रूप में जानें, मेरा यही सपना है समीर.”

“कुछ और समय तक नौकरी नहीं मिली न पीहू, तो तुम्हारा यही सपना सच कर दिखाऊंगा.” उसने कहा था.

जल्दी ही समीर को एक बड़ी कंपनी में नौकरी मिल गई थी. अपने काम में व्यस्त समीर को अब मेरे लिए कम ही समय मिल पाता था, पर मैं उसका सपना पूरा होते देख ख़ुश थी. तभी पता नहीं कैसे, मेरे घरवालों को हमारे रिश्ते के बारे में पता चल गया था, मां ने कहा, “कुछ सोचा है कि अगर तुम अंतर्जातीय शादी करोगी तो रिया का क्या होगा? और चलो हम मान भी जाएं तो क्या उसके घरवाले अपना लेंगे तुझे?” मैंने शांत स्वर में कहा, “मां, आप चिंता मत  करो, अगर वह सच में प्यार करता है, तो न स़िर्फ अपने घरवालों को मनायेगा, बल्कि ख़ुद आकर आपसे मेरा हाथ भी मांगेगा. मुझे भरोसा है उस पर…” मां ने पूछा था, “पर अगर ऐसा न हुआ तो…?”

“अगर वह सारे रीति-रिवाज़ निभाते हुए मुझे लेने न आया, तो जैसा आप कहोगे, वही करूंगी.”

पापा ने मेरा साथ देते हुए कहा था, “ठीक है पीहू, जैसा तुम ठीक समझो. हम तो बस तुम्हारी ख़ुशी चाहते हैं.”

जब मैंने समीर को इस बारे में बताया, तो समीर ने कहा, “मैं अभी अपने घरवालों से बात नहीं कर सकता पीहू. अभी तो मैं अपनी नौकरी में ठीक से सेट भी नहीं हो पाया हूं, थोड़ा और व़क़्त दे दो मुझे पीहू.”

मैं झुंझलाकर बोली, “समय ही तो नहीं है मेरे पास. अब तो मेरी पढ़ाई भी पूरी हो गई है. अब क्या बहाना बना कर रोकूं अपनी शादी? और फिर अभी मेरी छोटी बहन रिया भी तो है.”

वह बात बदलते हुए बोला, “अच्छा छोड़ो यह बात, सुनो मुझे कंपनी के काम से सिंगापुर जाना है.”

“समीर तुम जाने से पहले बात करके जाओगे न?” वह उलझन भरे स्वर में बोला, “कह नहीं सकता, पर कोशिश ज़रूर करूंगा.”

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“ठीक है, तुम मेरे घरवालों से बात करने अभी मत आओ, पर जाने से पहले तुम्हें अपने घरवालों को मेरे बारे में बताना होगा, ताकि मैं आश्‍वस्त हो सकूं. अपने घरवालों से कह सकूं कि मैं तुम्हारा इंतज़ार करूंगी. बोलो कर सकोगे बात?” कुछ पलों की ख़ामोशी के बाद उसने कहा, “ठीक है, मैं करूंगा बात…”

सिंगापुर जाने से पहले वह मुझसे मिलने आया. मैंने पूछा, “समीर, क्या तुमने बात की घर पर…?”

उसने बुझे स्वर में कहा, “हां पीहू… बात की है मैंने… पर मेरी बात सुनते ही मां-पापा भड़क उठे. बहुत बुरा-भला कहा मुझे. वे इस रिश्ते के लिए तैयार नहीं हो रहे पीहू.” समीर की बात सुन मैं कांप उठी.

उसका हाथ थाम कर कहा, “अब क्या होगा समीर, क्या करेंगे हम?”

“कुछ नहीं सोचा कि क्या करूंगा! पर पीहू मैं मां-पापा के ख़िलाफ़ नहीं जाना चाहता… और उनके मानने की कोई उम्मीद नहीं दिखती!”

“समीर?” मैं चौंक पड़ी थी. मैंने उसका चेहरा अपनी ओर उठाया तो उसने नज़रें झुका लीं, उस पल लगा कि सब कुछ ख़त्म हो गया. मैं लड़खड़ा कर वहीं बैठ गई. और समीर बिना कुछ कहे चला गया. जिस समीर के प्यार और भरोसे के बल पर मैं इतनी बड़ी बात कह सकी थी अपने घरवालों से, आज वही समीर अपना वादा, मेरा भरोसा सब तोड़कर चला गया था.

मैं अपने घरवालों से नज़रें भी नहीं मिला पा रही थी. न जाने कितनी बातें थीं, जो फांस बनकर चुभी थीं मन के अंतस में. न जाने कितनी शिकायतें, चाहतें और सवाल उमड़ रहे थे मन में. न जाने कितने आंसू ठहरे हुए थे मेरी पलकों में, पर मैं इतनी असहाय थी कि उन्हें बहा भी न सकती थी, किसी को अपना हाल बता भी न सकती थी. ठीक ऐसे ही व़क़्त पर नील का रिश्ता आया था मेरे लिए. और फिर जल्द ही मैं नील की पत्नी बनकर उसके घर की मर्यादा बन गई…! पर तब से आज तक मुझे बस एक ही सवाल का जवाब न मिलता था कि ‘समीर तुम मेरे दिल का सुकून हो सकते थे, फिर ज़ख़्म क्यों हो गये…?’

दरवाज़े की घंटी बजी तो मैं अपने अतीत के गलियारों से बाहर आई. देखा तो शाम ढल रही थी. कमरे में लाइट जला कर मैंने दरवाज़ा खोला, “नील… तुम आ गए?” नील ने मुस्कुराकर कहा, “कहां खोई थीं सरकार, जो व़क़्त का पता ही नहीं?”

– कृतिका केशरी

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कहानी- खोया हुआ-सा कुछ 1 (Story Series- Khoya Hua-Sa Kuch 1)

“ऐ स़फेद सूट…!” मैं ठिठक गई. समीर मेरी ओर ही आ रहे थे. मैं डर गई कि पता नहीं क्या बात है? उन्होंने मेरे पास आकर कहा, “तुम जूनियर हो न?” मैंने कांपते हुए कहा, “जी सर!” “क्या नाम है तुम्हारा?” “पीहू गुप्ता…”

“पीहू… अच्छा नाम है. पीहू थोड़ी देर में पेंटिंग कॉम्पिटिशन है, तुम ज़ल्दी से वहां पहुंचो, आज मैं तुम्हारा पोट्रेट बनाऊंगा. “ठीक है?” मैंने चौंककर उनकी ओर देखा, “जी… जी सर!” और समीर चला गया. मैं हक्की-बक्की-सी उसे जाता देखती रह गई.

“पीहू… ओ पीहू…” नील ने अख़बार पढ़ते हुए तीसरी बार आवाज़ लगाई, तो मुझे काम छोड़ कर आना ही पड़ा.

“क्या है…? क्यों शोर मचा रहे हो?”

नील ने उत्साहित होते हुए कहा, “तुम्हारे काम की ही बात बता रहा हूं, शहर में एक बहुत बड़े पेंटर की पेंटिंग एग्ज़िबिशन लगी है, चलोगी देखने?”

“नेकी और पूछ-पूछ… आज ही चलते हैं, पेंटर का नाम तो बताओ?”

“समीर ठाकुर….अच्छा सुनो मैं शाम को जल्दी आ जाऊंगा, तुम तैयार रहना.”

“समीर ठाकुर… समीर…!” मैंने दोहराया, तो नील बोले, “क्या हुआ?”

“कुछ नहीं… नील, मैं आज न चल सकूंगी. अभी याद आया, आज मुझे मिसेज़ शर्मा के साथ कहीं और जाना है.”

“ठीक है तो कल चलेंगे.” मैंने जल्दी से कहा, “नहीं… मेरा मतलब तुम अपना प्रोग्राम मत ख़राब करो, तुम हो आना.”

“जैसी आपकी मर्ज़ी सरकार, हम अकेले ही चले जाएंगे.” नील के ऑफ़िस निकलते ही मैंने अख़बार उठाया.

‘समीर ठाकुर की पेंटिंग एग्जिबिशन…’ समीर… मेरे समीर की एग्ज़िबिशन… तुमने मेरा सपना पूरा कर दिखाया समीर…’ अख़बार हाथों में लिए मेरा मन अतीत की ग़लियों में खो गया.

तब मैं एम. कॉम प्रीवियस में पढ़ती थी. मेरे एक सीनियर थे-समीर ठाकुर, बहुत ही आकर्षक व्यक्तित्व, लंबी क़द-काठी और बेहद हंसमुख. हमारी क्लास की सारी लड़कियों की तरह वे मुझे भी बहुत अच्छे लगते थे, पर वे कभी हम पर ध्यान नहीं देते थे. मुझे याद है, उस रोज़ हमारे कॉलेज में आर्ट कॉम्पिटिशन था. मैंने स़फेद रंग का सूट पहना था, मैं उनके सामने से होकर थोड़ी दूर ही गई थी कि उन्होंने मुझे पुकारा, “ऐ स़फेद सूट…!” मैं ठिठक गई. समीर मेरी ओर ही आ रहे थे. मैं डर गई कि पता नहीं क्या बात है? उन्होंने मेरे पास आकर कहा, “तुम जूनियर हो न?” मैंने कांपते हुए कहा, “जी सर!”

“क्या नाम है तुम्हारा?” “पीहू गुप्ता…”

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“पीहू… अच्छा नाम है. पीहू थोड़ी देर में पेंटिंग कॉम्पिटिशन है, तुम ज़ल्दी से वहां पहुंचो, आज मैं तुम्हारा पोट्रेट बनाऊंगा. ठीक है?” मैंने चौंककर उनकी ओर देखा, “जी… जी सर!” और समीर चला गया. मैं हक्की-बक्की-सी उसे जाता देखती रह गई. समीर ने मेरा बहुत सुंदर पोट्रेट बनाया. मैं उनके इस रूप को देखकर चकित थी. कुछ देर बाद जब कविताओं की प्रतियोगिता में भी समीर का नाम पुकारा गया, तो मैं फिर चौंकी थी. वह मेरे बगल से निकला, तो मैंने उससे धीरे से पूछा, “पोट्रेट तो मेरा बनाया था आपने, कविता किस पर लिख डाली है?” उसने मुस्कुराकर मेरी ओर देखकर कहा, “उसी पर… जिसका पोट्रेट बनाया था.” मुस्कुराने से उसके गालों पर पड़े भंवरों में मैं अपना मन खो बैठी थी. धीरे-धीरे हमारी बातों-मुलाक़ातों का सिलसिला चल पड़ा था.

व़क़्त के बीतते-बीतते हम कब एक-दूसरे से प्यार कर बैठे, हम ख़ुद नहीं समझ पाये. पर न कभी उसने अपने प्यार का इज़हार किया था, न मैंने इकरार किया था. देखते-देखते एक साल बीत गया. उसकी पढ़ाई पूरी हो गई थी और मैं जूनियर से सीनियर हो गई थी. इसके साथ ही उसकी नौकरी की तलाश तेज़ हो गई और मेरे घर में मेरे लिए योग्य वर की. मैं समीर के सिवा किसी और को अपने जीवनसाथी के रूप में सोच भी नहीं पाती थी. मैं समीर से इस बारे में बात करना चाहती थी, पर उसका खिलंदड़ स्वभाव मुझे कुछ भी कहने से रोक देता था. मैं उसे कितना समझाती कि समीर कभी तो सीरियस हुआ करो, कहीं ऐसा न हो कि इस लापरवाही के कारण एक दिन तुम्हें बहुत बड़ा नुक़सान उठाना पड़े. पर वह मेरी इस बात को भी मज़ाक मान कर हंस देता था. एक रोज़ कुछ लोग मुझे देखने आने वाले थे. मैं कॉलेज से निकली ही थी, कि समीर आता दिखा, “इतनी जल्दी कहां जा रही हो पीहू?”

“आज कुछ लोग शादी के लिए मुझे देखने आनेवाले हैं.”

वह चौंक पड़ा, “ऐसा मज़ाक मत किया करो पीहू, मुझे पसंद नहीं.”

“मज़ाक…? मज़ाक तुम करते हो समीर, मैं नहीं!”

वह तड़पकर बोला, “तुम किसी और से शादी नहीं कर सकती पीहू!”

मैंने अनजान बनते हुए कहा, “क्या मतलब, मैं किसी और से शादी नहीं कर सकती?”

“पीहू, तुम जानती हो कि मैं तुमसे… तुमसे…”

मैं झुंझला कर बोली, “मुझसे… क्या समीर?” समीर एक लंबी सांस लेकर, आंख बंद करके, जल्दी-जल्दी बोला, “मैं तुमसे प्यार करता हूं पीहू, तुमसे शादी करना चाहता हूं, क्या तुम मुझसे शादी करोगी?” इतना कहकर उसने आंखें खोलीं, मुझे मुस्कुराता देखकर उसने चैन की सांस ली. फिर तुनककर बोला, “जब सब जानती थी तो इस तरह अनजान क्यों बनी?”

“सब जानती थी, पर तुम्हारे मुंह से सुनकर इस पर सच की मोहर लगवाना चाहती थी. अब चलो मेरे घर… मेरे घरवालों से बात करने.” समीर ने मेरा हाथ अपने हाथ में लेकर कहा, “आऊंगा… ज़रूर आऊंगा, पर उस दिन जिस दिन कुछ बन जाऊंगा. प्लीज़ पीहू, थोड़ा-सा व़क़्त दो मुझे.” मुझे भी उसकी बात सही लगी थी, सो मैं मान गई. छ: माह बीतने को आए थे, पर उसे तब तक कोई नौकरी नहीं मिली थी.

– कृतिका केशरी

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कहानी- अभी मंज़िल दूर है 3 (Story Series- Abhi Manzil Door Hai 3)

नारी को वस्त्रों और अपने संस्कारों से नहीं, मानसिक दासता से मुक्ति चाहिए, अपनी बेचारगी से मुक्ति चाहिए. उसके बढ़े हुए क़दमों की सही दिशा चाहिए. हमारे आंदोलन को एक ऐसी ज्योति चाहिए जो एक-एक कर हर घर में जल उठे, जो हमें एक-दूसरे का अकेलापन बांटना सिखाए, जो हमें दूसरे के दर्द का सहचर बनना सिखाए.

“क्या ऽ ऽ ऽ” मैं बुरी तरह चौंक गयी थी.

“विश्‍वास नहीं हो रहा न? मेरी पीड़ा कोई नहीं समझ सकता, इसीलिए मैंने निर्णय लिया है, न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी.” विद्रुप हंसी के साथ वह बोली.

“तुम होश में नहीं हो अनु.”

“मुझे तो अब होश आया है दीदी.”

“पागल मत बनो. आत्महत्या तो पलायन है. जीवन में दुख-सुख तो लगा ही रहता है.”

“सब बातें क़िताबों में लिखी अच्छी लगती हैं, परंतु जब जीवन में भुगतना पड़ता है तो ख़ैर, मैंने पलायन का मार्ग ही चुना है.” उसने अपनी बात स्वयं ही काट कर समाप्त कर दी. शायद कोई सफ़ाई नहीं देना चाहती थी.

“नहीं अनु, तुम्हारे जैसी प्रतिभावान लड़की पलायन नहीं कर सकती.”

“कौन-सी प्रतिभा? जिसे जंग लग जाए, उसे आप प्रतिभा कहेंगी? छोड़िए दीदी, मेरी चेतना को जगाने का व्यर्थ प्रयास मत कीजिए. मैंने अपनी मंज़िल चुन ली है.”

“अरे अनु, तुम्हारे इस आत्महत्या के चक्कर में मैं तो असली बात भूल ही

गई, जिसके लिए मैंने तुम्हें बुलाया था.” मैंने चौंकने का अभिनय किया.

लेकिन उसने किसी प्रकार की कोई उत्सुकता नहीं जताई.

यह भी पढ़ेलघु उद्योग- पोटैटो वेफर मेकिंग क्रंची बिज़नेस (Small Scale Industries- Start Your Own Potato Wafer-Making Business) 

“अनु, मेरी एक सहेली है, वह अपना बुटीक खोल रही है. उसे कुछ सहयोगी चाहिए. मुझे तुम्हारा ध्यान आया कि तुम खाली भी रहती हो. इस काम के लिए तुम्हें घर से बाहर भी नहीं निकलना पड़ेगा. इसलिए घरवालों को भी कोई ऐतराज़ नहीं होगा. सिलाई-कढ़ाई तुम्हें आती ही है. कपड़े बना-बना कर उसकी बुटीक पर रखती रहना, उसकी मदद हो जाएगी और तुम्हारी आमदनी.”

“सच दीदी, क्या यह संभव है?” उसकी आंखों में पल भर को चमक आ गई.

“हां! क्यों नहीं? बस तुम्हें थोड़ी-सी ट्रेनिंग लेनी होगी.”

“नहीं! ट्रेनिंग कैसे ले पाऊंगी? घर वालों को तो आप जानती ही हैं.” वह पुनः बुझ गई थी.

“अरे, पड़ोस की कॉलोनी की श्रीमती खन्ना को तो जानती हो न? उनके पति ने उन्हें एक-एक पैसे के लिए तरसा दिया था. उन्होंने भी तो पत्राचार के द्वारा ही सीखा है, अब पास-पड़ोस के कपड़े सिलती हैं और देखो अपनी मेहनत से कितना बढ़िया घर चला रही हैं.

“दीदी… मैं… क्या मैं यह कर सकूंगी?” उसकी उत्सुकता आंखों में छलक उठी थी.

“हां अनु, तुम ज़रूर कर लोगी. बस एक फॉर्म भर कर भेजना होगा. लेकिन तुम अब कोई ग़लत क़दम नहीं उठाओगी.”

“नहीं दीदी, अब जब आप जैसा मार्गदर्शक मिल गया है तो मैं अपनी राह स्वयं बना लूंगी.”

एक नई आशा की डोर थामे अनुश्री मेरे घर से वापस अपने घर चली गई. परंतु मैं चिंतित थी. उसे आशा का दीप तो थमा दिया था, परंतु ऐसी सहेली कहां से लाऊंगी जो बुटीक खोल रही हो या जिसका बुटीक हो. फिर भी मैं अपने त्वरित झूठ पर प्रसन्न थी, जिसने एक कोमल कली के जीवन को मृत्यु का ग्रास बनने से बचा लिया था. यह आशा भी मन के किसी कोने में दबी बैठी थी कि ट्रेनिंग के बाद बने अच्छे वस्त्र कोई भी बुटीकवाला अपने यहां रख लेगा. अनु का हुनर तो मैंने अपनी आंखों से देखा है. बिना सीखे वो इतना अच्छा बनाती है तो सीख कर उसकी कला और निखर जाएगी.

अतीत में मैं पूरी तरह डूब चुकी थी. अनुश्री की ट्रेनिंग अच्छी चल रही?थी. श्रीमती खन्ना ने ख़ुद भुगता था, सो दूसरे का दर्द समझती थीं, वह भी मदद कर लेती थीं. अनु यह जान चुकी थी कि मेरा किसी बुटीक में कोई परिचय नहीं है, फिर भी वह आशावान थी. अपनी मेहनत और हुनर पर भरोसा था उसे. उसके साथ अनेक बुटीक के चक्कर मैं भी काट चुकी थी. आशा-निराशा के झूले में हम झूल रहे थे, तभी मेरे पति का स्थानांतरण महजगंराज हो गया और हम अपना बोरिया-बिस्तर बांध कर नए

परिवेश और नए लोगों के बीच आ कर बस गए. और मैं नारी मुक्ति मंच की उपाध्यक्षा का गरिमामय पद संभालने पर भी विचार करने लगी.

परंतु बनारस की इस बार की यात्रा से मेरे विचारों को गहरा झटका लगा था. अनुश्री का अकेलापन और उसके जीवन में आई शून्यता ने मेरी चेतना को हिला दिया था. हम नारी मुक्ति तक सीमित होते रहे हैं, जबकि पूरे समाज को ही अपनी बुराई से मुक्ति की आवश्यकता है. अपने एकाकीपन से निपटने की ज़रूरत है.

अतीत से बाहर आकर अब मुझे अपनी अंतरात्मा की आवाज़ स्पष्ट सुनाई दे रही थी. नारी ही क्या, हर इंसान को जीने के लिए एक सहृदय समाज की आवश्यकता होती है. जब तक पनघट पर रहकर कोई प्यासा रह जाए, पनघट का होना सार्थक नहीं. नारी को ही क्या पूरे समाज को सामाजिक चेतना की आवश्यकता है.

मैं धीमी चाल से आगे बढ़ी और मेज़ पर रखे नारी मुक्ति मंच की उपाध्यक्षा पद का नियुक्ति पत्र मैंने हाथ में उठा लिया. एक गहरी नज़र उस पर डाल कर मैं उसे छोटे-छोटे टुकड़ों में बदलने लगी. नारी को वस्त्रों और अपने संस्कारों से नहीं, मानसिक दासता से मुक्ति चाहिए, अपनी बेचारगी से मुक्ति चाहिए. उसके बढ़े हुए क़दमों की सही दिशा चाहिए. हमारे आंदोलन को एक ऐसी ज्योति चाहिए जो एक-एक कर हर घर में जल उठे, जो हमें एक-दूसरे का अकेलापन बांटना सिखाए, जो हमें दूसरे के दर्द का सहचर बनना सिखाए. मैं सधे हुए क़दमों से खिड़की तक पहुंची और उन नन्हें टुकड़ों को खिड़की के बाहर हवा में उछाल दिया. हवा में तैरते श्‍वेत पत्रों के बीच मुझे अपना लक्ष्य स्पष्ट दिख रहा था.

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       नीलम राकेश

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कहानी- अभी मंज़िल दूर है 2 (Story Series- Abhi Manzil Door Hai 2)

अतीत मुझ पर हावी होता जा रहा था. मेरी आंखों के आगे वह दृश्य साकार हो उठा जब तपती दोपहरी में किसी कामवश मैं बालकनी में निकली तो अनुश्री को तेज़ी से सामने सड़क पर जाते देखा. आश्‍चर्य के वशीभूत बरबस मैंने उसे ऊपर बुला लिया. आते ही वह फूट पड़ी. उसके आंसू रुक ही नहीं रहे थे. गहरी निराशा की घड़ी में वह आत्महत्या करने जा रही थी, इस सत्य से अनजान मैं पूछ बैठी, “अरे, रो क्यों रही हो अनु? इतनी धूप में कहां जा रही थी? सब ठीक तो है?”

“मैं आत्महत्या करने जा रही थी?”

समाज-सेवा के क्षेत्र में अलग-अलग तरह की समस्याओं से मेरा परिचय होता रहा है. अब वही सब शोभित की बातों का समर्थन करती प्रतीत हो रही थीं. पांच पुत्रियों को जन्म देनेवाली रमिया की सास उसके नाक में दम किए रहती थी, किंतु उसकी सास को समझाना मेरे लिए टेढ़ी खीर था. ग्यारह वर्षीय संजू का विवाह इतनी कम उम्र में न करने के लिए उसके पिता को तो समझा लिया, किंतु उसकी मां और दादी कहां कुछ सुनने को तैयार थीं. काश, ये सारी महिलाएं भी कुछ पढ़ी-लिखी होतीं.

बनारस की भागम-भाग में अनुश्री से मिलना हुआ. अनुश्री से मिलना उसके एकाकीपन से मिलना था. उसकी निराशाओं से साक्षात्कार था. बुरी तरह हिला कर रख दिया उसने मुझे. मेरे अंदर एक तूफान उठ खड़ा हुआ. कहां जाना चाहते हैं हम?… एक ओर नितांत अकेले अपना-अपना युद्ध लड़ते अनुश्री जैसे अनेक लोग हैं तो दूसरी ओर हर गली-मोहल्ले में खुली समाज-सेवा की अनगिनत दुकानें? बैनर, जुलूस, नारेबाज़ी और अख़बार में फ़ोटो, लेकिन परिणाम वही ढाक के तीन पात. बनारस से वापसी की यात्रा मानसिक रूप से मेरे लिए एक अंधेरी सुरंग से गुज़रने का कष्टप्रद अनुभव थी. अनुश्री का अकेलापन, उसकी पीड़ा उस अकेली की पीड़ा नहीं थी. समाज का हर व्यक्ति अपने-अपने स्तर पर अपने-अपने युद्ध लड़ रहा है और दूसरे को, यहां तक कि उसके साथ रहनेवाले दूसरे व्यक्ति को भी उसकी पीड़ा का एहसास ही नहीं है. क्या हमारी संवेदना पूरी तरह मर गई है?

अपने में खोई-खोई-सी मैं अपने स्टडी के दरवाज़े तक चली आई और हवा से फड़फड़ाते काग़ज़ों की आवाज़ मुझे मेज़ के पास खींच लाई. सामने मेज़ पर नारी मुक्ति मंच की उपाध्यक्षा पद पर नियुक्ति का, पत्र रखा था. जब से बनारस से लौटी हूं यह नियुक्ति पत्र और अनुश्री का चेहरा मेरी नज़रों के सामने बार-बार गडमड होने लगे हैं. नियुक्ति पत्र के साथ जुड़ा रुतबा और सामाजिक प्रतिष्ठा अपनी ओर खींचती है तो अनुश्री का चेहरा याद दिलाता है कि अभी बहुत कुछ करना बाकी है, वो भी बिना किसी बंधन में बंधे हुए. यह निर्णय की घड़ी थी और मेरे अंदर समुद्र मंथन जैसी हलचल मची थी.

“कहां खोई हुई हो?” शोभित की आवाज़ से मैं चौंक उठी.

“क्या बात है, तुम कुछ परेशान लग रही हो?” कुछ पल पति की ओर देखकर मैंने अपनी उलझन को शब्दों का जामा पहना दिया.

“अनुश्री के कहे शब्दों की अनुगूंज, मेरे कानों में अब भी गूंज रही है. जब से बनारस से वापस आई हूं घर को सजाते-संवारते, कुछ भी करते अनुश्री का भोला मुखड़ा, दुर्बल काया मेरी आंखों के आगे हर पल तैरती रहती है. उसके शब्दों में छुपी निराशा मुझे विचलित कर रही है.”

“… दीदी, मेरी प्रेरणा तो महराजगंज चली गई… अब सब ख़त्म! यही कहा था ना उसने?” शोभित ने अनुश्री के शब्द दोहरा दिए थे.

“हां.”

“तो तुम इतनी विचलित क्यों हो रही हो? ये तो बहुत बड़ा कॉम्प्लीमेंट है तुम्हारे लिए.” शोभित के चेहरे पर सहज मुस्कान थी.

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“कॉम्प्लीमेंट! आप इसे कॉम्प्लीमेंट कह रहे हैं? मैं तो यह सोचने पर विवश हूं कि आख़िर मैंने ऐसा क्या कर दिया उसके लिए कि वह इतना विह्वल हुई जा रही?थी. इतनी बड़ी बात कहनेवाली लड़की को आख़िर मैंने दिया ही क्या है?”

“तुमने उसके अंदर हिम्मत और विश्‍वास जगाया है.”

“वो तो उसके अंदर पहले से ही था, मैंने तो स़िर्फ प्यार के दो मीठे बोल दिए थे. निराशा के पल में प्यार का स्नेहिल स्पर्श और ‘मैं तुम्हारे साथ हूं’ का एहसास, एक विश्‍वास, बस इतना ही न!”

“… और तुम इसे छोटी-सी साधारण बात समझती हो? हक़ीक़त यह है कि आज हमारे समाज में इसी भावनात्मक सहारे का नितांत अभाव हो गया है, जो तुमने उसे दिया. इसी कारण तुम्हारे चले आने से उसके जीवन में एक गहरी शून्यता घिर

आई है जो उसे विचलित कर रही है.” शोभित ने सरल शब्दों में स्थिति का विश्‍लेषण कर दिया.

“मैं चलता हूं. तुम भी किसी काम में मन लगाने की कोशिश करना, शाम को बात करेंगे.” मेरे विचारों से सहमति जताते हुए शोभित बाहर चल दिए.

मैं पति को गाड़ी तक छोड़ कर लौटी तो अनुश्री के जीवन में डूबने-उतराने लगी. अनुश्री एक साधन-संपन्न परिवार की तीन संतानों में सबसे बड़ी संतान है. प्रखर बुद्धि वाली इस लड़की की शिक्षा बी.ए. करते ही बंद करा दी गई और आरंभ हो गया एकसूत्री कार्यक्रम- ‘योग्य वर की तलाश’. समय बीतने के साथ-साथ योग्य शब्द लुप्त हो गया  और ‘वर की तलाश’ में परिवर्तित हो गया. सुंदर, सुशील इस कन्या हेतु वर की तलाश द्रौपदी के चीर-सी खिंचती गई. साथ ही बढ़ती गई अनुश्री की उम्र, उसकी कुंठा और परिजनों की चिंता. परिवार की लाडली बेटी से वह बेचारी बन गई. चेहरे पर पड़ती उम्र की थाप को वह कैसे रोक सकती थी? अब तो बालों में कुछ चांदी के तार भी झांकने लगे हैं. जो भी आता, कुछ उम्र को रोकने के सुझाव उसकी ओर उछाल देता. दर्द की तेज़ चुभन उसके हृदय को भेद जाती. डर जाती वह इनसे, अतः आगंतुकों से कतराना उसकी नियति बनती गई, परंतु उसके अकेलेपन का एहसास किसी को नहीं है. आज भी वर की खोज जारी है, परंतु कन्या को उसके पैरों पर खड़ा करने का किसी परिजन को स्वप्न में भी ख़याल नहीं आता. संस्कारी परिवार की नाक जो कट जाएगी.

अतीत मुझ पर हावी होता जा रहा था. मेरी आंखों के आगे वह दृश्य साकार हो उठा जब तपती दोपहरी में किसी कामवश मैं बालकनी में निकली तो अनुश्री को तेज़ी से सामने सड़क पर जाते देखा. आश्‍चर्य के वशीभूत बरबस मैंने उसे ऊपर बुला लिया. आते ही वह फूट पड़ी. उसके आंसू रुक ही नहीं रहे थे. गहरी निराशा की घड़ी में वह आत्महत्या करने जा रही थी, इस सत्य से अनजान मैं पूछ बैठी, “अरे, रो क्यों रही हो अनु? इतनी धूप में कहां जा रही थी? सब ठीक तो है?”

“मैं आत्महत्या करने जा रही थी?”

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       नीलम राकेश

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कहानी- अभी मंज़िल दूर है 1 (Story Series- Abhi Manzil Door Hai 1)

“तुम नारी मुक्ति आंदोलन की पक्षधर कब से हो गई?”

“मतलब?” मैं चौंक गयी थी.

“मतलब, तुम तो घर-परिवार को समेटकर चलनेवाली स्त्री हो. नारी मुक्ति

जैसा मुहावरा तुम पर फ़िट नहीं बैठता.”

मैं अपलक शोभित को निहार रही थी.

“मेरे प्रश्‍न ने तुम्हें सोच में डाल दिया न? किसी भी आंदोलन से जुड़ने से पहले उस पर विश्‍वास होना आवश्यक है. यदि आंदोलनकर्ता और विशेष रूप से आंदोलन का नेतृत्व करनेवालों को ही अपने उद्देश्य पता नहीं होंगे, यदि उनके सामने अपना लक्ष्य स्पष्ट नहीं होगा तो पूरा आंदोलन अपने लक्ष्य से भटक जाएगा और इस आंदोलन की त्रासदी यही है.

महजगंराज आए मुझे अभी कुछ ही दिन हुए थे कि एक दिन अचानक नारी मुक्ति मंच की कुछ महिलाएं मेरे पास आईं और मुझसे नारी मुक्ति मंच की उपाध्यक्षा का पद स्वीकारने का अनुरोध करने लगीं. मेरे विगत पंद्रह वर्षों के समाज-सेवा के कार्यों का पूरा कच्चा-चिट्ठा था उनके पास. समाज-सेवा के क्षेत्र में जाने का निर्णय मेरा अपना था. बड़ा सुकून मिलता था मुझे किसी पीड़ित को थोड़ी भी राहत पहुंचा कर. मेरे पति ने मेरी इस भावना को समझा, सराहा और प्रोत्साहन दिया. परिणामतः मेरा वैवाहिक जीवन समाज-सेवा में बाधक न बन कर सहायक बन गया. मैं डेढ़ दशक से निरंतर अपने स्तर पर समाज-सेवा के कार्य करती आ रही हूं बिना किसी प्रतिदान की चाह के, बिना किसी प्रचार के. मैं चकित थी, गुपचुप किए मेरे सभी छोटे-बड़े कार्यों की इतनी विस्तृत रिपोर्ट उनके पास कहां से आई.

मेरी मौखिक स्वीकृति पाकर वे सब प्रसन्न मन से विदा हो गईं.

अजब आलम था, एक अनोखी अनुभूति. पति के कार्यालय से वापस आने तक की प्रतीक्षा भी कठिन जान पड़ रही थी. ख़ुशी थी कि छुपाए नहीं छुप रही थी. जैसे-तैसे सांझ घिरी, पति को अपने नीड़ में घुसते ही कुछ नया घटित होने का आभास हो गया. होता भी क्यों न?

मेरा तो रोम-रोम पुलकित था, हर हाव-भाव मेरी प्रसन्नता दर्शा रहे थे.

“क्या बात है? आज चेहरे पर नूर कुछ ज़्यादा ही छलक रहा है.” शोभित मुझे देखते ही बोले.

सब कुछ सुनकर शोभित कुछ पल मुझे देखते रहे. मेरी छोटी-छोटी उपलब्धि से खिल उठनेवाले शोभित की प्रतिक्रिया अप्रत्याशित रूप से चौंकानेवाली थी.

“तुम नारी मुक्ति आंदोलन की पक्षधर कब से हो गई?”

“मतलब?” मैं चौंक गयी थी.

“मतलब, तुम तो घर-परिवार को समेटकर चलनेवाली स्त्री हो. नारी मुक्ति

जैसा मुहावरा तुम पर फ़िट नहीं बैठता.”

मैं अपलक शोभित को निहार रही थी.

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“मेरे प्रश्‍न ने तुम्हें सोच में डाल दिया न? किसी भी आंदोलन से जुड़ने से पहले उस पर विश्‍वास होना आवश्यक है. यदि आंदोलनकर्ता और विशेष रूप से आंदोलन का नेतृत्व करनेवालों को ही अपने उद्देश्य पता नहीं होंगे, यदि उनके सामने अपना लक्ष्य स्पष्ट नहीं होगा तो पूरा आंदोलन अपने लक्ष्य से भटक जाएगा और इस आंदोलन की त्रासदी यही है. यह आंदोलन से अधिक मुहावरा बन कर रह गया है.”

मैंने प्रतिवाद किया, “आज मेरी उन लोगों से बहुत विस्तार से बात हुई है, ऐसा नहीं है. दरअसल इस आंदोलन को लेकर पुरुषों में एक डर बैठ गया है. इसी कारण इसका इतना विरोध होता है. यहां तक कि आंदोलन को मुहावरे का नाम दे दिया गया है. वे लोग बता रही थीं कि कितनी ही पीड़ित महिलाओं को उनके मंच ने राहत पहुंचाई है. दहेज उत्पीड़न के विरुद्ध जेहाद छेड़ रखा है इस मंच ने. अभी पिछले ह़फ़्ते ही एक बहू को जला कर मारने वाले अपराधियों को इस मंच ने जेल पहुंचाया है.”

“अच्छा! किस-किस को जेल की सज़ा हुई है?”

“बहू की सास, ननद और पति-तीनों को. उसके पति की शह पर सास और ननद ने मिल कर बेचारी को जला दिया था.”

“उसके पति को तो फांसी होनी चाहिए. जिसके साथ जीवन बिताने का वादा किया, उसी की हत्या के षड्यंत्र में शामिल होना अक्षम्य अपराध है. मगर तुम देखो तो, उसे जलाया किसने… एक स्त्री को दूसरी स्त्री ने मतलब पीड़ित और प्रताड़क एक ही समुदाय के हैं. फिर मुक्ति किसको किससे चाहिए?”

“यानी आप चाहते हैं मैं इस आंदोलन से न जुडूं?”

“जुड़ना न जुड़ना यह तुम्हारा अपना निर्णय है. अगर तुम्हें लगता है कि इस मंच से जुड़ कर तुम बेहतर काम कर सकती हो तो ज़रूर जुड़ो. मैं तो स़िर्फ यह कह रहा हूं कि अत्याचार किसी पर भी हो और कोई भी करे, उसके विरुद्ध आवाज़ उठानी ही चाहिए. इस काम में मैं हमेशा तुम्हारे साथ रहूंगा. नारी को यदि सचमुच मुक्ति दिलानी है तो उसे शिक्षा का हथियार थमा दो. उसके अकेलेपन को बांटो, उसके मानसिक उत्पीड़न को रोको. इस तरह की भ्रामक बातों का क्या लाभ कि साड़ी पहनना नारी को बंधन में जकड़ना है या विभिन्न सुहाग चिह्न बेड़ियां हैं, इन्हें तोड़ फेंको. ये कौन-सी आज़ादी है भला? क्या लाभ होगा इससे? वैसे तुम यदि इन्हें उतारना चाहो तो मुझे कोई ऐतराज़ नहीं होगा, परंतु क्या तुम अपना मंगलसूत्र, पायल, बिछिया, चूड़ियां और नाक की लौंग उतारना चाहोगी?”

मैं अवाक-सी मुंह बाए अपने पति को देख रही थी. उनकी बातों ने मेरे विचारों को उद्वेलित कर दिया था.

“अरे, कहां खो गई तुम? अभी फैसला करने को बहुत समय है, आराम से करना.” शोभित मेरी आंखों के आगे चुटकी बजा रहे थे.

“मुझे दो दिन के लिए बनारस जाना है, चलोगी?”

“हां-हां, कब जाना है?”

“बस एक घंटे में निकलेंगे.”

बनारस जाते हुए मैं रास्ते भर शोभित की बातों का मंथन करती रही. उनकी बातों में सार दिखाई दे रहा था. मन विचलित होने लगा.

neelam rakesh

      नीलम राकेश

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कहानी- अनमोल धरोहर 3 (Story Series- Anmol Dharohar 3)

बचपन में मेरी सारी सहेलियां अपने चाचा, मामा, ताऊ आदि के यहां छुट्टियों में रहने जाती थीं या उनके हमउम्र भाई-बहन उनके घर आते थे, पर तुमने न मुझे कहीं जाने दिया, न किसी को अपने यहां आने दिया. मेरा पूरा जीवन बिना नाते-रिश्तों, भाई-बहनों के सूना और अकेला ही बीत गया.” सौम्या का स्वर अब सौम्य नहीं रह गया था.

“मैंने तो जो किया, तुम्हारे भले के लिए किया. आख़िर में पैसा ही काम आता है.” माया ने सूखे स्वर में कहा.

“रिश्तों और भाई-बहनों के लिए तड़पते हुए अकेला बचपन देकर कौन-सा भला किया है. मेरा मां?

“अरे नहीं, ये तो तेरा हार है, इसे मैं कैसे…” बुआ असमंजस में कुछ कहने ही जा रही थीं कि मिताली ने उनका हाथ खींचकर बाहर ले जाते हुए कहा, “अरे मालती, यह समय व्यर्थ के सोच-विचार में पड़ने का नहीं है. सौम्या ठीक कहती है, चल यह हार रूपाली को पहना दें.” मिताली की आंखों में सौम्या के लिए प्रशंसा और आभार के भाव थे.

उनके जाने के बाद माया सौम्या पर फट पड़ी. “यह क्या पागलपन मचा रखा है तूने सौम्या! ऐसे ही चीज़ें लुटाती रही, तो कंगाल हो जाएगी. सास-ससुर को अपने साथ रहने का आग्रह करना, क़ीमती गहने-कपड़े बांटते रहना और अब तो हद ही हो गई, तूने अपना शादी का क़ीमती हार ही उठाकर दे दिया.”

“तो क्या हुआ मां, शादी के बाद परिस्थिति बताकर रूपाली का हार उसे देकर मुझे अपना हार वापस मिल जाएगा. अभी का समय संभालना ज़रूरी था.” सौम्या लापरवाही भरे स्वर में बोली.

“तुझसे मुझे ऐसी उम्मीद नहीं थी. मैंने तुझे हमेशा चीज़ें संभालकर रखने की सीख दी है और तू इन्हें ही लुटा रही है.” माया ग़ुुस्से से बोली.

“बस करो मां, मैं अच्छी तरह से समझ रही हूं, पहले ही दिन से कि आप क्या कहना चाह रही हो. आपने ख़ुद तो कभी रिश्तों की कद्र नहीं की. हमेशा भौतिक वस्तुओं और पैसों की ही परवाह की. आपकी नज़रों में हमेशा पैसे, गहने-कपड़े यही धरोहर हैं. आपने पापा को दादा-दादी के पास नहीं रहने दिया. आपने बेटे को तो माता-पिता से दूर रखा ही, मुझे भी दादा-दादी के प्यार-दुलार से वंचित रखा. उनकी कहानियां, डांट-अपनेपन व संस्कारों से अलग कर दिया.

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बचपन में मेरी सारी सहेलियां अपने चाचा, मामा, ताऊ आदि के यहां छुट्टियों में रहने जाती थीं या उनके हमउम्र भाई-बहन उनके घर आते थे, पर तुमने न मुझे कहीं जाने दिया, न किसी को अपने यहां आने दिया. मेरा पूरा जीवन बिना नाते-रिश्तों, भाई-बहनों के सूना और अकेला ही बीत गया.” सौम्या का स्वर अब सौम्य नहीं रह गया था.

“मैंने तो जो किया, तुम्हारे भले के लिए किया. आख़िर में पैसा ही काम आता है.” माया ने सूखे स्वर में कहा.

“रिश्तों और भाई-बहनों के लिए तड़पते हुए अकेला बचपन देकर कौन-सा भला किया है. मेरा मां? पड़ोस व मुहल्ले के बच्चों को अपने बुआ, चाचा व मौसी के बच्चों के साथ खेलते देख कितना अकेलापन लगता था मुझे. मैं कितना रोती थी. मन की बातें किसी के साथ बांटने को तरसती रहती. रूठती तो कोई प्यार से मान-मनुहार करके मनानेवाला भी न था.

और अपने स्वभाव की वजह से आपने क्या कम परेशानियां उठाई हैं. याद है, जब एक बार पापा टूर पर गए थे और मैं बीमार पड़ गई थी. कितनी परेशान हो गई थीं और कितना कोसा था आपने मुझे कि तुम्हें भी उसी व़क़्त बीमार पड़ना था.” सौम्या दुखी स्वर में बोली.

“परेशानियां तो आती ही रहती हैं, पर तेरे जन्म से लेकर धूमधाम से तेरी शादी तक सब कुछ मैंने अकेले और व्यवस्थित तरी़के से किया था.” माया गुरूर के साथ बोली. “ये तुम्हारी ग़लतफ़हमी है मां. तुम्हें तो विवाह के रस्म-रिवाज़ों के बारे में कुछ पता ही न था. वो तो पापा के प्यार की वजह से बुआ, दादी और चाचा ने बिना तुम्हें पता चले पापा के साथ चुपचाप बाहर ही बाहर सभी तैयारियां करवा दीं, इसीलिए मेरी शादी आराम से हो गई.” सौम्या ने मानो पलभर में ही सच्चाई बताकर माया का गुरूर भंग कर दिया. माया निरुत्तर रह गई.

“हार-कपड़े तो जीवन में कभी भी ख़रीदे जा सकते हैं, इन्हें सहेजने की ज़रूरत नहीं. ये यदि खो भी गए, तो फिर से ख़रीदे जा सकते हैं, लेकिन यदि रिश्ते खो गए, तो वापस नहीं मिल सकते. जीवन की अनमोल धरोहर भौतिक वस्तुएं नहीं, रिश्ते-नाते हैं. मेरी दौलत तो यही है. मैं बस, इन्हें ही सहेजना चाहती हूं और सबके स्नेह की छांव में रहना चाहती हूं. सौवीर के माता-पिता को भी मैं अपने साथ ही रखूंगी, ताकि मेरे आनेवाले बच्चों को भरे-पूरे परिवार का सुख मिले, जो मुझे तुम्हारी वजह से कभी नहीं मिला.” सौम्या दृढ़ स्वर में बोली.

“मुझे गर्व है अपनी बेटी पर कि उसने अपने जीवन की सच्ची धरोहर को पहचान लिया है. मुझे तसल्ली हुई कि इस पर अपनी मां के संस्कारों और प्रवृत्ति का साया नहीं पड़ा. आज मैं बहुत ख़ुश हूं. बेटी, सदा इस अनमोल धरोहर को सहेजकर रखना और सुखी संतुष्ट रहना, यही मेरा आशीर्वाद है.” मनीष ने अंदर आकर सौम्या के सिर पर हाथ रखते हुए कहा. उनकी आंखों में ख़ुशी के आंसू थे. माया ठगी-सी पिता-पुत्री को देखती रह गई.

Dr. Vineeta Rahurikar

डॉ. विनीता राहुरीक

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