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कहानी- स्पर्श की भाषा… ५ (Story Series- Sparsh Ki Bhasha… 5)

ममता का एक पूरा सागर उनके हाथों से रेवती के मन में प्रवेश कर उसे तृप्त कर रहा था और मां के चेहरे पर बरसों बाद उतनी ही खिली हुई चौड़ी मुस्कान थी, जितनी अपनी नन्ही रेवू को गोद में थपकते समय हुआ करती थी. और एक आश्वस्ति कि वह आज भी किसी के लिए आवश्यक है, स्नेह की पात्र है. स्पर्श अपनी मौन भाषा में दोनों के मन पर अपना काम कर रहा था.

          ... "आज भी वह सागर उनके भीतर लहरा रहा होगा, लेकिन आज कोई नहीं है, जो उसमें भीगना चाहता है. वह ममता का सागर उनके भीतर ही घुमड़ रहा होगा. पता है रेवती हर उम्र में हमारी स्पर्श के प्रति ललक बदल जाती है. जब तक बच्चे रहते हैं, तब तक मां का स्पर्श हमारे लिए जीवन का आधार होता है. फिर हम घर के बाहर स्कूल में, मित्रों में अपनी नई दुनिया बसाने लग जाते हैं, तब उस आयु में मां के स्पर्श का महत्व हमारे लिए कम होने लग जाता है और दोस्तों के धौल-धपाटे और कंधे पर रखी यारियां हमें भाने लगती हैं.   यह भी पढ़ें: 30 बातें जहां महिलाएं पुरुषों से बेहतर हैं (30 things women do better than men)   युवावस्था में स्पर्श का एक भिन्न ही रूप हमें आकर्षित करने लगता है, एक हमवयस्क विपरीत लिंगी का. तब हम स्पर्श के ममत्व भरे भाव से बाहर निकल जादुई रूमानियत भरे भाव के आकर्षण में खो जाते हैं. और जब हम माता-पिता बनते हैं, तब अपनी संतान के प्रति ममता भरे स्पर्श में व्यस्त हो जाते हैं और जन्मदायिनी मां की ममता को भूलने लगते हैं. जबकि इस आयु में उसे भी एक प्यार भरे आलिंगन के स्पर्श की आवश्यकता होती है. इसलिए मैं तो यही कहूंगा कि जब भी मां से मिलने जाओ दो मिनट उनके पास बैठ, उनके कंधे पर सिर रख देना, कभी प्यार से गले लगा लेना उनका मन इतने में ही तृप्त हो जाएगा. बुज़ुर्ग और चाहते ही क्या है हमसे." अंकित ने कहा. तीन दिन बाद मिष्टी की छुट्टी थी. अंकित को कॉलेज में देर हो जाती थी और वे थक भी जाते थे, इसलिए दोपहर को ज़रूरत का कुछ सामान लेने रेवती मिष्टी को लेकर बाज़ार चली गई. कुछ घर की ज़रूरत का सामान, कुछ मिष्टी की फ़रमाइश पूरी कर वह सामान गाड़ी में रख घर की ओर ड्राइव करने लगी. मन में पता नहीं दो दिन से क्या चल रहा था कि वह इस समय भी जाने क्या सोच रही थी. "मां कार इधर क्यों मोड़ ली अपना घर तो सीधे रास्ते पर है." मिष्टी की आवाज़ से उसकी तंद्रा भंग हुई. हाथ पता नहीं कब कैसे मां के घर जानेवाले रास्ते पर स्टेरिंग घुमा चुके थे. उसे लग रहा था मां को ही नहीं उसे भी तो उस ममता भरी सांत्वना की ज़रूरत है, जो उन्हें गले लगाने से मिलती है. भाभी उसे अचानक आया देख आश्चर्यचकित हो गई, क्योंकि वह कभी इतनी जल्दी मायके नहीं आती थी. वह दो मिनट रेवती से बात कर उसके लिए चाय बनाने किचन में चली गई. मिष्टी भैया के छोटे बेटे आरुष के साथ खेलने लगी. रेवती आज सीधे मां के कमरे में चली आई. वे उसे अचानक आया देख ख़ुश हो गईं. रेवती आज नन्ही रेवू बन मां की गोद में सिर रखकर उनसे चिपट गई. मां अपने कांपते झुर्रीदार हाथों से उसे थपकने लगी.   यह भी पढ़ें: 7 वजहें जब एक स्त्री को दूसरी स्त्री की ज़रूरत होती है (Women’s Day Special- 7 Reasons when a woman needs woman)     ममता का एक पूरा सागर उनके हाथों से रेवती के मन में प्रवेश कर उसे तृप्त कर रहा था और मां के चेहरे पर बरसों बाद उतनी ही खिली हुई चौड़ी मुस्कान थी, जितनी अपनी नन्ही रेवू को गोद में थपकते समय हुआ करती थी. और एक आश्वस्ति कि वह आज भी किसी के लिए आवश्यक है, स्नेह की पात्र है. स्पर्श अपनी मौन भाषा में दोनों के मन पर अपना काम कर रहा था. Dr. Vinita Rahurikar डॉ. विनीता राहुरीकर         अधिक कहानियां/शॉर्ट स्टोरीज़ के लिए यहां क्लिक करें – SHORT STORIES         डाउनलोड करें हमारा मोबाइल एप्लीकेशन https://merisaheli1.page.link/pb5Z और रु. 999 में हमारे सब्सक्रिप्शन प्लान का लाभ उठाएं व पाएं रु. 2600 का फ्री गिफ्ट.

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कहानी- स्पर्श की भाषा… ४ (Story Series- Sparsh Ki Bhasha… 4)

 

"मां सीने से लगाकर बच्चों को पालती है. चौबीस घंटे उनमें ही रमी रहती है, लेकिन बड़े होते ही बच्चे अपनी दुनिया में व्यस्त हो जाते हैं. तुम्हारी मां की सारी ज़िम्मेदारियां भी पूरी हो चुकी हैं. नाती-पोते भी बड़े हो गए हैं. सालभर से पिताजी के ना रहने से वे कितना अकेलापन महसूस करती होंगी. भले ही घर में कितने ही लोग क्यों न हो, लेकिन पास बैठकर यदि कोई अपनेपन से कंधे पर ही हाथ रख दे, तो उतने में ही इस उम्र में अपना होना सार्थक लगने लगता है."

              ... "यह सच है रेवती कि स्पर्श में शब्दों से अधिक सशक्त भावनाएं होती हैं. आप किसी व्यक्ति की भाषा भले ही न समझ सकते हो, लेकिन उसके स्पर्श से आप उसकी भावनाएं समझ सकते हो कि उसके मन में क्या है. स्पर्श अपनी मौन भाषा में बहुत कुछ कह जाता है. अपनों का स्पर्श तो बहुत ही महत्वपूर्ण होता है. पता है जब मैं छोटा था, तो पूरे समय मां के ही आसपास रहा करता था. जब स्कूल जाने लगा, तो मुझे रोज़ दोपहर में तेज बुखार आ जाता. टीचर घबराकर मुझे घर भिजवा देती. घर आते ही मां की गोद में मेरा बुखार तुरंत उतर जाता. मैं दूसरे दिन सुबह तक बिल्कुल ठीक रहता.   यह भी पढ़ें: आलिंगन के 12 हेल्थ बेनेफिट्स (12 Amazing health benefits of hug)   लेकिन स्कूल में मुझे फिर बुखार आ जाता, क्योंकि मैं मां के प्यारभरे स्पर्श, उनकी गोद से दूर हो जाता था. तब मां मेरी जेब में रुमाल रखने लगी और कहती कि इसमें मैं मेरा प्यार रख रही हूं. मैं हमेशा तुम्हारे साथ ही हूं. उसके बाद मैं उस रुमाल में मां का स्पर्श अनुभव करता और आश्वस्त हो जाता." अंकित भी अपनी मां की याद में भावुक हो गया. "आज मुझे भी मां के स्वर कि वह आर्द्रता बार-बार याद आ रही है. कितनी एकाकी हो गई होंगी वह मन ही मन, तभी तो ज़रा से स्नेह से ही उनका मन छलक उठा. सबसे छोटी थी मैं, इसलिए मां चिपकू थी. हरदम मां से चिपकी रहती थी, लेकिन बड़ी उम्र में सहेलियों में रम गई. बाहरी दुनिया में खो गई, तो मां के इस रूप को ही भुला बैठी." रेवती का गला भर आया. "मां सीने से लगाकर बच्चों को पालती है. चौबीस घंटे उनमें ही रमी रहती है, लेकिन बड़े होते ही बच्चे अपनी दुनिया में व्यस्त हो जाते हैं. तुम्हारी मां की सारी ज़िम्मेदारियां भी पूरी हो चुकी हैं. नाती-पोते भी बड़े हो गए हैं. सालभर से पिताजी के ना रहने से वे कितना अकेलापन महसूस करती होंगी. भले ही घर में कितने ही लोग क्यों न हो, लेकिन पास बैठकर यदि कोई अपनेपन से कंधे पर ही हाथ रख दे, तो उतने में ही इस उम्र में अपना होना सार्थक लगने लगता है." अंकित ने कहा.   यह भी पढ़ें: स्त्रियों की 10 बातें, जिन्हें पुरुष कभी समझ नहीं पाते (10 Things Men Don’t Understand About Women)   "मां के मन में तो स्नेह का अथाह सागर है. अपने बच्चों को ही नहीं, वे तो घरभर के बच्चों, पड़ोस के बच्चों, मेरी सहेलियों के सिर पर भी हमेशा ममता भरा हाथ फेरती थीं." रेवती ने बताया.

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Dr. Vinita Rahurikar डॉ. विनीता राहुरीकर             अधिक कहानियां/शॉर्ट स्टोरीज़ के लिए यहां क्लिक करें – SHORT STORIES           डाउनलोड करें हमारा मोबाइल एप्लीकेशन https://merisaheli1.page.link/pb5Z और रु. 999 में हमारे सब्सक्रिप्शन प्लान का लाभ उठाएं व पाएं रु. 2600 का फ्री गिफ्ट.

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कहानी- स्पर्श की भाषा… ३ (Story Series- Sparsh Ki Bhasha… 3)

 

अकेली बैठी मिष्टी कब सो जाती उसे पता ही नहीं चलता था. आज उसे बहुत अच्छा लग रहा था. लगा इस स्पर्श, इस ममतामयी निकटता की आवश्यकता सिर्फ़ मिष्टी को ही नहीं स्वयं उसे भी तो थी. इतने वर्षों से इस सुख को अपने से व्यर्थ ही दूर रखा. मिष्टी को थपकियां देते हुए वह भी गहरी नींद में सो गई.

          ... मिष्टी चहक-चहककर स्कूल की बातें बता रही थी. ध्यान से उसकी बातें सुनते हुए रेवती को लग रहा था आज खाने का स्वाद दोगुना हो गया है. खाना खाने के बाद उसने मिष्टी का मनपसंद कार्टून लगा दिया और दोनों मां-बेटी सोफे पर बैठ टीवी देखने लगी. रोज़ वह टीवी लगाकर अपने काम में लग जाती थी और मिष्टी कार्टून देखते हुए सोफे पर ही सो जाती थी. आज मां को अपने पास बैठा देख उसने रेवती का दुपट्टा थाम लिया मानो मां को पकड़ कर रखना चाहती हो. रेवती ने उसके कंधे पर हाथ रख उसे पास खींच लिया. मिष्टी आनंद से उससे सट गई और थोड़ी देर बाद पसरकर उसकी गोद में लेट गई. वह अभी भी उसका दुपट्टा थामे थी. रेवती उसका सिर थपथपाने लगी. जल्दी ही मिष्टी सो गई. रेवती उसका निश्चिंत भोला चेहरा देखती रही. अभी भी दुपट्टे का छोर उसके हाथ में था. रोज़ तो वह टीवी चला कर निश्चिंत हो जाती थी कि बच्चे को बस यही तो चाहिए.   यह भी पढ़ें: दोस्ती में बदलता मां-बेटी का रिश्ता (Growing Friendship Between Mother-Daughter)     अकेली बैठी मिष्टी कब सो जाती उसे पता ही नहीं चलता था. आज उसे बहुत अच्छा लग रहा था. लगा इस स्पर्श, इस ममतामयी निकटता की आवश्यकता सिर्फ़ मिष्टी को ही नहीं स्वयं उसे भी तो थी. इतने वर्षों से इस सुख को अपने से व्यर्थ ही दूर रखा. मिष्टी को थपकियां देते हुए वह भी गहरी नींद में सो गई. दरवाज़े पर नॉक करने की आवाज़ सुनकर रेवती की नींद खुली. उसने मिष्टी का सिर धीरे से तकिए पर रखा और दरवाज़ा खोला. सामने अंकित खड़े थे. "आज आप बड़ी जल्दी आ गए." रेवती ने कहा. "कहां ध्यान है मेमसाहब! आज तो आधा घंटा देर से आया हूं. पांच बज चुके हैं." किताबें टेबल पर रखते हुए अंकित ने जवाब दिया. "मुझे तो ऐसी नींद लगी मिष्टी को सुलाते हुए कि बैठे-बैठे ही सो गई. आपको आज देर क्यों हो गई?" रेवती ने कहा. "एक्ज़ाम्स आनेवाले हैं ना, तो स्टूडेंट डिफिकल्टीज़ लेकर आए थे. वही सॉल्व करवा रहा था. अब रोज़ ही परीक्षाएं ख़त्म होने तक देर हो जाया करेगी. उस पर इस साल सिलेबस भी चेंज हो गया है, तो और अधिक कंफ्यूज़न है छात्रों में." अंकित ने बताया.   यह भी पढ़ें: हेल्दी रिलेशनशिप के लिए छोड़ें भावनाओं की ‘कंजूसी’ (Express Yourself For A Healthy Relationship)     "आप हाथ-मुंह धोकर आइए मैं चाय बनाती हूं." कहकर वह चाय बनाने चली गई. जब तक वह चाय-बिस्किट लेकर आई, तब तक अंकित भी आ गए. दोनों सोफे पर बैठ कर चाय पीने लगे. बातों ही बातों में रेवती ने उन्हें मां के फोन के बारे में बताया.

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कहानी- स्पर्श की भाषा… २ (Story Series- Sparsh Ki Bhasha… 2)

 

आज उसने पहला कौर अपने हाथ से मिष्टी को खिलाया, तो नौ वर्षीय मिष्टी के चेहरे पर प्रसन्नता के अनगिनत रंग छलक पड़े. रेवती को वे रंग बड़े भले लगे. जब से मिष्टी अपने हाथ से खाना सीख गई थी, तब से रेवती ने कभी उसे अपने हाथ से नहीं खिलाया था. हमेशा सोचती थी कि अब वह बड़ी हो गई है, अपने हाथ से खा लेती है. बच्चे के पोषण के लिए उसे तब तक खिलाना मां का दायित्व होता है, जब तक कि वह स्वयं अपने आप खाना नहीं सीख जाता. लेकिन दायित्व से भी अधिक महत्वपूर्ण स्नेह होता है, ममत्व होता है. एक कौर अपने हाथ से खिलाने से ही मिष्टी के चेहरे पर छाई ख़ुशी रेवती को इस बात का एहसास करा रही थी.

            स्पर्श रिश्ते को अटूट बंधन में बांधता है, उसे प्रगाढ़ बनाता है. फिर मां और बच्चे के बीच तो स्पर्श का एक विशिष्ट बंधन होता है. बच्चा तो आकार ही मां की कोख के स्पर्श में लेता है. संसार में वह अपनी मां को सर्वप्रथम स्पर्श से ही तो पहचानता है. मां की गोद उसे संसार का सबसे सुरक्षित स्थान लगती है. बच्चा तब तक रोता रहता है, जब तक मां उसे गोद में उठा न ले. मां का स्पर्श पाकर, उसके गले लग कर ही वह पूर्णतः आश्वस्त होता है. दूर से मां चाहे जितना पुचकार ले, स्नेह भरे बोल बोल ले, लेकिन जब तक मां गोद नहीं लेती, गले नहीं लगाती बच्चा चुप कहां होता है.   यह भी पढ़ें: स्पिरिचुअल पैरेंटिंग: आज के मॉडर्न पैरेंट्स ऐसे बना सकते हैं अपने बच्चों को उत्तम संतान (How Modern Parents Can Connect With The Concept Of Spiritual Parenting)     रेवती को याद है बचपन में जब वह गिर जाती थी या उसे चोट लग जाती थी, तब मां चोट को सहला देती या आंचल से उस पर फाहा रख देती थी, तब तुरंत ही उसका दर्द गायब हो जाता था. कैसी जादुई औषधि होता है मां का स्पर्श, जो संतान की सारी पीड़ा हर लेता है. चाहे खरोंच लगी हो, चाहे आंख में किरकिरी पड़ी हो, मां का हाथ लगते ही सारा दर्द छू हो जाता था. बढ़ती उम्र भी क्या वही आश्वासन चाहती है, जो बचपन चाहता है, स्पर्श का आश्वासन. तीन बजे मिष्टी की आवाज़ सुनकर उसकी तंद्रा भंग हुई. वह दरवाज़े पर खड़ी थी. "मां दरवाज़ा खोलो ना." रेवती ने उठकर दरवाज़ा खोला, मिष्टी का बैग संभाला. जब तक मिष्टी ने जूते-मोजे उतारकर कपड़े बदले, तब तक उसने खाना गर्म करके दो थालियां परोस दी. "आज दो थालियां, तुमने खाना नहीं खाया मां?" मिष्टी ने पूछा, "क्यों नहीं खाया आज, रोज़ तो खा लेती हो." "बस ऐसे ही आज मन किया अपनी बिटिया के साथ खाने का." रेवती बोली. आज उसने पहला कौर अपने हाथ से मिष्टी को खिलाया, तो नौ वर्षीय मिष्टी के चेहरे पर प्रसन्नता के अनगिनत रंग छलक पड़े. रेवती को वे रंग बड़े भले लगे. जब से मिष्टी अपने हाथ से खाना सीख गई थी, तब से रेवती ने कभी उसे अपने हाथ से नहीं खिलाया था. हमेशा सोचती थी कि अब वह बड़ी हो गई है, अपने हाथ से खा लेती है. बच्चे के पोषण के लिए उसे तब तक खिलाना मां का दायित्व होता है, जब तक कि वह स्वयं अपने आप खाना नहीं सीख जाता.   यह भी पढ़ें: प्रेरक प्रसंग- बात जो दिल को छू गई… (Inspirational Story- Baat Jo Dil Ko Chhoo Gayi…)     लेकिन दायित्व से भी अधिक महत्वपूर्ण स्नेह होता है, ममत्व होता है. एक कौर अपने हाथ से खिलाने से ही मिष्टी के चेहरे पर छाई ख़ुशी रेवती को इस बात का एहसास करा रही थी. इन छोटी-छोटी बातों में स्नेह की अपार सांत्वना छुपी होती है, वह तो भूल ही गई थी.

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कहानी- स्पर्श की भाषा… १ (Story Series- Sparsh Ki Bhasha… 1)

 

मां ने फोन कब का रख दिया था, लेकिन रेवती के मन में मां के वही भावुक शब्द और आर्द्र स्वर गूंज रहा था. स्वर की आर्द्रता मन के भीतर कुछ पिघला रही थी. रेवती सोच रही थी हर उम्र को स्नेह के आश्वासन की आवश्यकता होती है, जो स्पर्श से बढ़कर कोई नहीं दे सकता. स्पर्श की अपनी एक मौन भाषा होती है. बिना शब्दों के स्पर्श गहरी सांत्वना, अपनेपन का एहसास देता है.

          अंकित के हाथ में टिफिन थमा कर उन्हें रवाना करने के बाद रेवती गुनगुनाती हुई घर के भीतर आई. साढ़े दस बजे थे सुबह के. अंकित कॉलेज से अब साढ़े चार बजे आएंगे और मिष्टी तीन बजे लौटेगी स्कूल से. साढ़े दस से तीन बजे तक का यह समय रेवती का अपना होता है और सप्ताह के पांचों दिन वह इस समय का भरपूर लाभ उठाती है. लिखना, पेंटिंग करना, अच्छी किताबें पढ़ना, घर को अपनी रुचि अनुसार संवारना, ख़ुद को अप टू डेट रखना सभी कुछ इस समय में होता. आज भी वह नहाकर आई और ड्रॉइंगरूम में बैठकर चाय की चुस्कियां लेते हुए आज ही आई नई पत्रिका के पन्ने पलट रही थी कि मोबाइल की रिंग बजने लगी. देखा मां का फोन था. उसे आश्चर्य हुआ कल ही तो वह मां से मिलकर आई है. उसने फोन उठाया.     यह भी पढ़ें: बेटी की शादी का ख़र्च बड़ा हो या पढ़ाई का? (Invest More In Your Daughter’s Education Rather Than Her Wedding)   अंकित और मिष्टी के बारे में पूछने और घर के कामों के बारे में औपचारिक बातचीत करने के बाद मां अचानक बोली, "बेटा, कल तुमने घर वापस लौटते हुए मुझे गले लगाया बहुत अच्छा लगा, कलेजे को बड़ी ठंडक मिली. बहुत दिनों बाद अपनेपन और प्यार के एहसास से मन तृप्त हो गया." कहते हुए मां का गला भर आया. फोन पर उनकी आवाज़ भावुक हो गई. रेवती का जी भर आया. समझ नहीं आ रहा था क्या कहे. एक ही शहर में होने के कारण मां के घर आना-जाना लगा ही रहता है, लेकिन रेवती भाभी-भैया, दोनों भतीजों में व्यस्त हो जाती है. मां के पास भी बैठती है, बातें भी करती है, लेकिन अपनी बढ़ती व्यस्तताओं और ख़ुद को परिपक्व व बड़ी उम्र का समझने के कारण उसने कभी भावनात्मक लगाव का प्रदर्शन नहीं किया था, जबकि मां के लिए तो शायद वह आज भी वही छोटी-सी बेटी है, जो हर समय उनसे चिपकी रहती थी. मां आज भी शायद उसी लगाव को खोजती होंगी, तभी तो कल पता नहीं क्यों मां को पलंग पर अंदर अकेले बैठा देख उसे जाने कैसा लगा. छोड़ कर आते हुए उनके एकाकी उदास चेहरे पर छाई उदास-सी, फीकी मुस्कान ने भीतर तक कचोट लिया और अनायास ही रेवती ने विदा लेते हुए आगे बढ़ मां को गले लगा लिया था. मां ने फोन कब का रख दिया था, लेकिन रेवती के मन में मां के वही भावुक शब्द और आर्द्र स्वर गूंज रहा था. स्वर की आर्द्रता मन के भीतर कुछ पिघला रही थी.   यह भी पढ़ें: जीवन में ख़ुशियों के रंग भरें (Live With Full Of Love And Happiness)     रेवती सोच रही थी हर उम्र को स्नेह के आश्वासन की आवश्यकता होती है, जो स्पर्श से बढ़कर कोई नहीं दे सकता. स्पर्श की अपनी एक मौन भाषा होती है. बिना शब्दों के स्पर्श गहरी सांत्वना, अपनेपन का एहसास देता है. हर रिश्ते में स्पर्श का अपना महत्व होता है, हर रिश्ते के स्पर्श की भाषा भिन्न होती है.

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कहानी- सॉरी मॉम 7 (Story Series- Sorry Mom 7)

 

“जिया, मैं और अमित अच्छे दोस्त हैं और कुछ नहीं... वो बहुत अच्छे इंसान हैं, उन्होंने मुझे इमोशनली बहुत सपोर्ट किया है... मगर दोस्ती से ज़्यादा हमारे बीच कभी कुछ नहीं रहा.” “तो फिर आप मुझे बिना बताए..?”

          ... “यू नो मॉम, सारी प्रॉब्लम की जड़ क्या थी?” “क्या?” “यही कि मैंने आपको हमेशा सिर्फ़ मॉम ही समझा, कभी नहीं सोचा कि आप भी एक ह्यूमन बींग हैं, जिसकी अपनी पर्सनल लाइफ है, कुछ चाहतें... कुछ ख़्वाहिशें हैं! एक काम करते हैं, आज से अपना रिश्ता बदल लेते हैं...” “क्या मतलब?” “आई मीन, अब हम दो मेच्योर वुमन की तरह फ्रेंड्स बनकर साथ रहेंगे... जैसे मैं और तनिषा रहते थे... आप मुझसे कुछ भी शेयर कर सकती हैं और मैं भी... हम एक-दूसरे को सुनेंगे, बिना जजमेंटल हुए, जस्ट लाइक गुड फ्रेंड्स… ठीक है ना मॉम?” वे ऐसे हंसीं जैसे मैंने कोई जोक सुनाया हो. "आई एम डैम सीरियस मॉम.” उन्होंने प्यार से मेरे गालों को चूम लिया.   यह भी पढ़ें: बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए सीखें स्पिरिचुअल पैरेंटिंग (Spiritual Parenting For Overall Development Of Children)     “चल मैं कॉफी बनाकर लाती हूं फिर कहीं बाहर लंच पर चलेगे.” “गुड आइडिया... वैसे मॉम, आप चाहे तो अमित अंकल को भी लंच पर बुला सकती हैं, आई एम फाइन विद दैट.” मैं उन्हें भरोसा दिलाना चाहती थी कि मैं उनके साथ हूं. “जिया, मैं और अमित अच्छे दोस्त हैं और कुछ नहीं... वो बहुत अच्छे इंसान हैं, उन्होंने मुझे इमोशनली बहुत सपोर्ट किया है... मगर दोस्ती से ज़्यादा हमारे बीच कभी कुछ नहीं रहा.” “तो फिर आप मुझे बिना बताए..?” “मैं डरती थी जिया कि कहीं अपने डैड की तरह तू भी मुझ पर शक ना करने लग जाए, मुझे ग़लत ना समझ ले... इसलिए कभी बता नहीं पाई...” “ओह, आई एम सॉरी मॉम.” मैं उनके गले लग अपनी बेवकूफ़ी पर रो पड़ी. “नहीं जिया, ग़लती मेरी थी... मेरा ड़रना ग़लत था... ना छिपाती तो ये सब नहीं होता ना...” वो मेरी कमर सहलाने लगी... सच, मां की गलबहियो में कितना सुकून भरा होता है. “वैसे अगर... तेरी लाइफ में कोई हो, तो बता दे, पढ़ाई हो गई, नौकरी लग गई, अब तेरी शादी भी तो करनी है ना...”   यह भी पढ़ें: पैरेंटिंग गाइड- बच्चों को स्ट्रेस-फ्री रखने के स्मार्ट टिप्स (Parenting Guide- Smart Tips To Make Your Kids Stress-Free)     “लो कर दी ना टिपिकल मांओंवाली बात, आप तो थोड़ी देर भी फ्रेंड बनकर नहीं रह पाई.” मैंने रुठते हुए कहा, तो वे खिलखिला पड़ी. बहुत दिनों बाद हमारा वो घर हंसी से गुलज़ार हुआ था, जिसकी नेमप्लेट पर लिखा था- 'वसुधा एंड जियाज् ड्रीम्स होम'. Deepti Mittal दीप्ति मित्तल         अधिक कहानियां/शॉर्ट स्टोरीज़ के लिए यहां क्लिक करें – SHORT STORIES/           डाउनलोड करें हमारा मोबाइल एप्लीकेशन https://merisaheli1.page.link/pb5Z और रु. 999 में हमारे सब्सक्रिप्शन प्लान का लाभ उठाएं व पाएं रु. 2600 का फ्री गिफ्ट.

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कहानी- सॉरी मॉम 6 (Story Series- Sorry Mom 6)

 

यह सुनकर भीतर कुछ चटक गया. मॉम डैड के साथ ख़ुश नहीं थीं, आई नो दैट...और अमित अंकल के साथ कितनी रिलैक्स रहती थीं, हंसती थीं, खुलकर बातें करती थीं... फिर क्यों मुझे उनका साथ होना अच्छा नहीं लगा? क्यों वे अपनी मर्ज़ी से ज़िंदगी नहीं जी सकती? पिछले कुछ दिनों से जिस कठघरे में मैंने मॉम को खड़ा कर रखा था, आज वहां ख़ुद को खड़ा देख रही थी.

          ... “वो मेरा कलीग है और मुझे पंसद है... जब कोई ऐसा मिल जाए, जो आपको सुन सके, समझ सके, जिसके साथ आपको प्रिटेंड ना करना पड़े, आप जैसे हो, वैसे रह सको... तो फिर लगता है, लाइफ में कुछ और नहीं चाहिए...” “गुड यार, आई एम सो हैप्पी फॉर यू...” मैंने उसे एक ज़ोर की झप्पी दी. बहुत अच्छा लगा उसे यूं ख़ुश देखकर... राहुल के साथ उसे इतना ख़ुश, ऐसे रिलैक्स नहीं देखा था... सच मनपसंद साथी मिल जाए, तो और क्या चाहिए लाइफ में... मॉम भी तो कितनी रिलैक्स, कितनी सहज थीं अमित अंकल के साथ... लेकिन डैड की प्रजेंस में... कितनी सहमी चुपचाप-सी रहतीं.. “कहां खो गई जिया?”तनिषा ने मुझे टोका. “एक बात बता यार, दोस्तों के साथ हम इतने कंफर्टेबल होते हैं, तो फिर खून के रिश्तों में इतनी कॉप्लीकेशन, इतनी उलझनें क्यों हो जाती हैं?” मैं अपनी उलझनों के सिरे खोज रही थी. “दोस्तों से कोई एक्सपेक्टेशन नहीं होती ना, ना हम उनको लेकर जजमेंटल होते हैं. अब देख ना, मैंने तुझे अपनी डेट के बारे में बताया तो तू ख़ुश हुई... जस्ट इमेजिन, अगर मैं अपनी मॉम को बताती, तो वे कितना ओवर रिएक्ट करतीं... नसीहतों की झड़ी लगा देतीं मुझ पर, इसीलिए तो उन्हें अब तक कुछ नहीं बताया...”   यह भी पढ़ें: पत्नी की कौन-सी 6 आदतें पसंद नहीं करते पति?( 6 Habits which your husband never likes)     यह सुनकर भीतर कुछ चटक गया. मॉम डैड के साथ ख़ुश नहीं थीं, आई नो दैट...और अमित अंकल के साथ कितनी रिलैक्स रहती थीं, हंसती थीं, खुलकर बातें करती थीं... फिर क्यों मुझे उनका साथ होना अच्छा नहीं लगा? क्यों वे अपनी मर्ज़ी से ज़िंदगी नहीं जी सकती? पिछले कुछ दिनों से जिस कठघरे में मैंने मॉम को खड़ा कर रखा था, आज वहां ख़ुद को खड़ा देख रही थी. जहाज के पंछी को देखा है कभी... दूर उड़ान भरकर लौट आता है... मैं भी लौट आई थी... अपने घर, अपनी दुनिया में... जहां मेरी मॉम थीं. मैं उनकी गोद में सिर रखकर लेटी थी. “आई एम सॉरी मॉम, मैंने आपको ना जाने क्या-क्या कह दिया... मुझे माफ़ कर दोगी ना!” मेरी आंखों की नमी उनकी आंखों में भी उतर आई थीं. “सच कहूं जिया, बहुत डर गई थी मैं...” उन्होंने मेरी हथेली को कसकर पकड़ लिया, जैसे उसके छूटने का डर अभी भी ज़िंदा हो. “जब तेरे डैड का साथ छूटा था, तो मैं संभल गई थी... तब तू जो मेरे साथ थी... मगर जब तू गई ना, तो लगा जैसे अब कुछ नहीं बचा मेरे पास.”   यह भी पढ़ें: 7 वजहें जब एक स्त्री को दूसरी स्त्री की ज़रूरत होती है (7 Reasons when a woman needs woman)   “मुझे आपसे शिकायत है मॉम... आपने मुझे रोका क्यों नहीं? मुझे डांट लेती, लड़ लेती मुझसे… पर रोक लेती ना?” मैं रुठते हुए सीधे बैठ गई. “ज़बरदस्ती थामे गए रिश्ते कहां टिकते हैं बेटा... तेरे डैड के साथ कोशिश की थी, पर क्या हुआ? लेकिन जानती है, मुझे उम्मीद थी कि तू लौट आएगी... ज़्यादा देर नहीं रूठी रहेगी.” उनके होंठ मुस्कुरा उठे.

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Deepti Mittal दीप्ति मित्तल         अधिक कहानियां/शॉर्ट स्टोरीज़ के लिए यहां क्लिक करें – SHORT STORIES       डाउनलोड करें हमारा मोबाइल एप्लीकेशन https://merisaheli1.page.link/pb5Z और रु. 999 में हमारे सब्सक्रिप्शन प्लान का लाभ उठाएं व पाएं रु. 2600 का फ्री गिफ्ट.

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कहानी- सॉरी मॉम 5 (Story Series- Sorry Mom 5)

 

“हां आया था, अमित अंकल का... कह रहे थे, कल की कॉफी अच्छी थी...” मैंने तल्खी से कहा. मॉम बुरी तरह हड़बड़ा गई. “क्या बकवास कर रही है?” उन्होंने मेरे हाथों से अपना फोन छीन लिया और मेरी पलकों में रूका सैलाब बह चला. “क्यों किया आपने ऐसा मॉम? पहले डैड को, फिर मुझे धोखा देती रही... आख़िर कौन हैं वे आपके... आपका रिश्ता क्या है उनसे?” “जिया, तू भी अपने डैड की तरह मुझ पर शक करने लगी?”

        ... आई हेट यू अमित अंकल... आपने मुझसे पहले डैड छीने और आज... आज मेरी मॉम भी छीन ली... एंड आई हेट यू मॉम, मैंने आप पर अंधा विश्वास किया, एक बार भी डैड के बारे में नहीं सोचा कि उन्होंने कैसा महसूस किया होगा... वे किस तकलीफ़ से गुज़रे होगें... आपके आगे डैड कभी नज़र ही नहीं आए... और आपने क्या किया, डैड के साथ मुझे भी चीट किया? “ऐसे क्यों बैठी है जिया और मेरे फोन में क्या देख रही है, कॉल आया था क्या किसी का?” मॉम उतनी ही नार्मल थी जितनी पांच मिनट पहले, मगर इन पांच मिनट में मेरी दुनिया हिल चुकी थी. “हां आया था, अमित अंकल का... कह रहे थे, कल की कॉफी अच्छी थी...” मैंने तल्खी से कहा. मॉम बुरी तरह हड़बड़ा गई. “क्या बकवास कर रही है?” उन्होंने मेरे हाथों से अपना फोन छीन लिया और मेरी पलकों में रूका सैलाब बह चला. “क्यों किया आपने ऐसा मॉम? पहले डैड को, फिर मुझे धोखा देती रही... आख़िर कौन हैं वे आपके... आपका रिश्ता क्या है उनसे?” “जिया, तू भी अपने डैड की तरह मुझ पर शक करने लगी?” “शक की गुंजाइश ही कहां छोड़ी आपने. कल मैंने आप दोनों को अपनी आंखों से देखा था, हंसते हुए, बातें करते हुए... आपके मैसेजेज... आपकी कॉल हिस्ट्री सब देखी हैं मैंने... डैड सही थे, मगर मैंने हमेशा आपको सही समझा एंड यू चीटेड मी...” भीतर भरा गुबार बाहर फेंक मैं अपने कमरे में चली आई. उनसे कोई झूठी सफ़ाई नहीं सुनना चाहती थी.   यह भी पढ़ें: सर्वगुण संपन्न बनने में खो न दें ज़िंदगी का सुकून (How Multitasking Affects Your Happiness) उस सुबह के बाद मैंने मॉम से कुछ नहीं पूछा. उन्होंने भी कहां कुछ बात की... ना अंकल से अपने रिश्ते के बारे में और न मेरे तनिषा के साथ शिफ्ट होने को लेकर... मैं अपना बैग लेकर चुपचाप उनके सामने से निकल आई... अपनी एक दुनिया बसाने, जिसमें अब सिर्फ़ मैं थी... और वो... वो बेज़ुबान बनी मुझे जाते देखती रही... महीना गुज़र गया था मॉम का घर छोड़े, जॉब भी ज्वॉइन कर ली थी. वर्किंग डेज् तो जैसे-तैसे कट जाते, मगर छुट्टी के दिन मन सीला-सीला रहता... घर की, मॉम की याद आती... जितनी याद आती दर्द उतना ही बढ़ता... “अरे, मत फेंक, इसमें मनी प्लांट लगाएंगे.” तनिषा कॉफी का खाली हुआ ग्लास ज़ार फेंकने लगी, तो मैंने उसे रोक दिया. “मनी प्लांट?” “हां, यू नो मॉम कभी खाली ग्लास ज़ार फेंकने नहीं देती, उसमें मनी प्लांट लगा लेती हैं.” मैं याद कर हंस पड़ी और दूसरे ही पल आंखें भर आईं. “आंटी को मिस करती है, तो मिल क्यों नहीं आती?” तनिषा मेरा हाथ दबाते हुए बोली. मैंने गहरी सांस लेते हुए ना में सिर हिला दिया. “फोन कॉल ही कर ले... देख यार मुझे नहीं पता कि तुझे उनसे क्या नाराज़गी है, मगर वो तेरी मॉम हैं…” मैं उसे अनसुना कर बाहर बालकनी में चली आई.   यह भी पढ़ें: बेटी की शादी का ख़र्च बड़ा हो या पढ़ाई का? (Invest More In Your Daughter’s Education Rather Than Her Wedding)   रैलिंग पर कोहनियां टिका आसमान ताकने लगी. रिश्ता जितना क़रीबी होता है ना, शिकायतों की, नाराज़गी की नींव उतनी ही गहरी खुदी होती है, इतनी आसानी से नहीं हिलती. “आज मैं लंच पर बाहर जा रही हूं... डेट है मेरी.” तनिषा कॉफी की सिप भरते हुए बगल में आ खड़ी हुई. उसकी आंखों में प्यार की खुमारी झलक रही थी. “राहुल से पैचअप हो गया तेरा?” “नहीं यार, अब हम साथ नहीं हैं...ऐक्च्युअली हम बहुत अलग थे, साथ रहते भी तो ज़्यादा दिन नहीं रह पाते...” “तो फिर?”

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कहानी- सॉरी मॉम 4 (Story Series- Sorry Mom 4)

 

खिड़की से दिखता आसमान घिरकर काला हुआ जा रहा था, ठीक मेरे मन की तरह... बारिश की मोटी-मोटी बूंदें टैरस की टीन शेड पर तड़कने लगी थी. बारिश होती देख मॉम टैरस से कपड़े लाने चली गई और मेरी नज़र डायनिंग टेबल पर रखे उनके फोन पर अटक गई... मेरे सवालों के जवाब शायद उसके सीने में दफ़न थे.

        ... “जिया तुम बाहर जाओ बेटा.” मॉम के कहने पर मैं बाहर चली गई थी, मगर मुझे उनके लिए डर लग रहा था... लगा था कहीं डैड उन्हें हर्ट ना करें, इसलिए बाहर से झांकने लगी. “ये क्या कह रहे हैं? आप होश में नहीं हैं...” मॉम ने उनसे मुंह फेरते हुए कहा. “आज ही तो होश में आया हूं... बताओ, कब से चल रहा है ये सब? तुम्हारी कॉल हिस्ट्री, मैसेजेज् सब देखे मैंने... मना किया था ना उससे बात करने के लिए... शर्म नहीं आती तुम्हें इतना गिरते हुए?” डैड ने मॉम की बांह ज़ोर से खिंची. “शर्म क्यों आएगी... क्या ग़लत किया मैंने? तुम्हारे दोस्त हो सकते हैं, तो क्या मेरे नहीं? क्या मैं किसी से अपने सुख-दुख शेयर नहीं कर सकती?” मॉम ने भी तल्खी से ज़वाब दिया. “चली जाओ यहां से... मैं तुम्हारे साथ नहीं रह सकता...” वे दांत पीसते हुए धीमे से बोले और मॉम भरी आंखें लिए चुपचाप कमरे से निकल आई. उस रात वो मुझ पर हाथ धरे, मुझे सहलाते हुए सुबकती रही... मैं भी...   यह भी पढ़ें: क्या है आपकी ख़ुशी का पासवर्ड? (Art Of Living: How To Find Happiness?)   कौन सही है, कौन ग़लत, मैं ये नहीं समझती थी, मगर एक बात थी, जो मुझे परेशान कर रही थी... डैड नहीं चाहते, तो मॉम क्यों अमित अंकल से बात करती हैं... ज़रूरत क्या है? कितना ग़ुस्सा हुए ना डैड... चाहे जैसे भी थे, वे मेरे डैड थे, मॉम के साथ मैं डैड के सिवाय किसी और की कल्पना भी नहीं कर सकती थी. अगले दिन मॉम ने डैड को... उस घर को छोड़ने का डिसीज़न ले लिया और हम दोनों एक-दूसरे का हाथ थामे वहां से निकल आए... अपनी एक नई दुनिया बसाने... अपनी इस दुनिया में मुझे किसी तीसरे की मौजूदगी बिल्कुल बर्दाश्त नहीं थी, अमित अंकल की तो बिल्कुल भी नहीं. खिड़की से दिखता आसमान घिरकर काला हुआ जा रहा था, ठीक मेरे मन की तरह... बारिश की मोटी-मोटी बूंदें टैरस की टीन शेड पर तड़कने लगी थी. बारिश होती देख मॉम टैरस से कपड़े लाने चली गई और मेरी नज़र डायनिंग टेबल पर रखे उनके फोन पर अटक गई... मेरे सवालों के जवाब शायद उसके सीने में दफ़न थे. मेरा हाथ बढ़-बढ़कर रूक रहा था... नहीं चाहती थी उनकी कॉल हिस्ट्री, चैट हिस्ट्री चेक करना... मगर ख़ुद को रोक भी कहां पा रही थी... फोन से कुछ जवाब मिले, कुछ अधूरे छूट गए. मॉम ने अंकल से मिलना, बात करना कभी छोड़ा ही नहीं था... जब डैड नहीं चाहते थे तब भी नहीं... जब घर छोड़ा, ना तब... वो हर बात उनसे शेयर करती रही... तो क्या वो एक इंसान मॉम की लाइफ का इतना ज़रूरी हिस्सा है कि उसे बचाए रखने के लिए उन्होंने सब दांव पर लगा दिया...   यह भी पढ़ें: हर वर्किंग वुमन को पता होना चाहिए ये क़ानूनी अधिकार (Every Working Woman Must Know These Right)   अपनी शादी, अपना घर और अब... अपनी बेटी भी? दुनिया में सबसे बुरा होता है अपनों से छला जाना... उन अपनों से जिन पर हम आंख मूंद कर भरोसा करते हैं, मैं भी आज ख़ुद को छला महसूस कर रही थी...

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कहानी- सॉरी मॉम 3 (Story Series- Sorry Mom 3)

 

“मैं किसी की साइड नहीं लेता यार, जो दिखता है, वही कहता हूं... वसुधा अच्छी पत्नी है... परिवार को कितने अच्छे से संभाल रही है... प्यार ना सही, कम से कम उसके साथ ऐसे रूड बिहेव तो मत कर...” “ओह, तो आजकल तेरे कंधे पर सिर रखकर रोना रोया जा रहा है...” वे और भी कुछ कहते हुए रूक गए, मगर उनकी आंखें बहुत कुछ कह गई थीं. अमित अंकल चले गए और फिर कभी मैंने उन्हें दोबारा नहीं देखा... और फिर कुछ दिनों बाद एक रात ने हमारी दुनिया बदल दी.

        ... “कल मैंने आपको बहुत मिस किया, वैसे... कल इतना लेट क्यूं हुआ मॉम?” मैंने हिचकते हुए मन में फंसी बात छेड़ी. “हां, बस वो लॉस्ट मिनट पर एक ज़रूरी मीटिंग आ गई थी, अवॉइड नहीं कर सकती थी...” कहते हुए वे फ्रिज खोलकर कुछ देखने लगी... या मुझसे नज़रें बचाने लगी... झूठ नज़रें नहीं मिला पाता, तो कोने ढूंढ़ने लगता है, वो भी ढूंढ़ रही थीं शायद. बहुत बुरा लगा था मुझे... दिल चाहा उनका हाथ थाम सीधे पूछ लूं, क्या छिपा रही हैं मुझसे और क्यों? याद है ना, आपके एक बार कहने पर डैड को छोड़ आपके साथ चली आई थी... बिना कोई सवाल पूछे... बिना ऐतराज़ किए, तो फिर आज मुझसे ये झूठ क्यों? क्या आपके मन का कोई ऐसा भी हिस्सा है जहां अमित अंकल तो आ सकते हैं, मगर मैं नहीं?   यह भी पढ़ें: मन का रिश्ता: दोस्ती से थोड़ा ज़्यादा-प्यार से थोड़ा कम (10 Practical Things You Need To Know About Emotional Affairs)     कभी-कभी मन किसी लम्हे में अटक जाता है... जैसे मेरा अटका था. चूल्हे पर चढ़ी चाय में चम्मच घुमाते हुए मॉम ना जाने कहां-कहां की बातें कर रही थीं… मेरी ज्वॉइनिंग के बारे में, पैकेज के बारे में, मगर मैं तो उनसे कुछ और ही सुनना चाह रही थी. वे चाय ले आईं और उसे पीते हुए अख़बार के पन्ने पलटने लगीं और मैं... मैं अतीत के... मॉम-डैड सोशल गैदरिंग में भले ही परफेक्ट कपल नज़र आते हो, मगर घर के अंदर दो अजनबी से थे. उनके बीच बस ज़रूरी भर बातचीत हुआ करती थी. प्यार की गरमाहट से परे बस एक समझौते जैसा रिश्ता था जिसे दोनों निभाए जा रहे थे. अमित अंकल दोनों को समझाते थे... डैड को कुछ ज़्यादा ही. देखा था मैंने एक बार, डैड उनसे कह रहे थे, “अब तू मेरा दोस्त नहीं रहा, जब देखो उसी की साइड लेता है... सारी कमियां तुझे मुझमें ही नज़र आती हैं...” “मैं किसी की साइड नहीं लेता यार, जो दिखता है, वही कहता हूं... वसुधा अच्छी पत्नी है... परिवार को कितने अच्छे से संभाल रही है... प्यार ना सही, कम से कम उसके साथ ऐसे रूड बिहेव तो मत कर...” “ओह, तो आजकल तेरे कंधे पर सिर रखकर रोना रोया जा रहा है...” वे और भी कुछ कहते हुए रूक गए, मगर उनकी आंखें बहुत कुछ कह गई थीं. अमित अंकल चले गए और फिर कभी मैंने उन्हें दोबारा नहीं देखा... और फिर कुछ दिनों बाद एक रात ने हमारी दुनिया बदल दी.   यह भी पढ़ें: पति-पत्नी और शक (How Suspicion Can Ruin Your Marriage?)     मेरे हाई स्कूल एग्ज़ाम पूरे हो गए थे. अगले दिन मैं और मॉम मौसी के घर जानेवाले थे... मॉम पैकिंग कर रही थी. उस रात डैड लड़खड़ाते हुए घर आए... उनकी आंखें लाल थी, वे मॉम को बड़ी अज़ीब तरह से घूरते हुए बोले, “कहां की तैयारी हो रही है... अपने दोस्त के घर जा रही हो… उस अमित के घर? उसके कंधे पर रोने... वैसे चल क्या रहा है तुम दोनों के बीच?” मॉम बुरी तरह हडबड़ा गई, उनका चेहरा सफ़ेद पड़ गया था.

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कहानी- सॉरी मॉम 2 (Story Series- Sorry Mom 2)

 

पूरे गैंग में गपशप चल रही थी, फ्यूचर प्लैन बन रहे थे, मगर मेरे दिमाग़ की सुई तो एक ही ज़गह अटक गई थी. मॉम अमित अंकल से अभी भी संपर्क में हैं? ये सवाल मेरे कंधे पर सवार हो साथ घर चला आया. मुझे एक अजीब-सी बेचैनी ने घेर लिया था.

      ... लेकिन मॉम के साथ ये कौन हैं? अमित अंकल जैसे लग रहे हैं... मैंने पहचानने की कोशिश की, हां वहीं तो हैं... दोनों एक कॉफी शॉप में जाकर बैठ गए थे, गर्मजोशी से बातें करते हुए, जैसे पुराने दोस्त करते हैं. हां, दोस्त ही तो थे वे, डैड के दोस्त... मगर इतने सालों बाद यहां... मॉम के साथ? क्या, महज़ इक्तफ़ाक था या कुदरत की साज़िश... मेरा यूं अचानक मॉल आना… और मॉम को देखना, वो भी अमित अंकल के साथ? आज उन्हें 6-7 साल बाद देख मन की कितनी पुरानी तहें खुलने लगी. अमित अंकल अक्सर हमारे घर आया करते थे. बिल्कुल फैमिली मेंबर जैसे थे... सच कहूं तो मैंने डैड को सिर्फ़ उन्हीं के साथ हंसते हुए, खुलकर बातें करते हुए देखा था. मॉम और मेरे साथ तो वे बस काम भर की बातें करते थे.   यह भी पढ़ें: महिलाओं को क्यों चाहिए मी-टाइम? (Why Women Need Me-Time?)   याद है मुझे, जब एक बार डैड टूर पर गए हुए थे, मैं बहुत बीमार हो गई थी, तब अंकल ने मॉम के साथ दिन-रात खड़े रहकर मेरा ध्यान रखा था. मॉम भी उनसे घुल-मिल गई थी. वो डैड की गैरहाज़िरी में भी चाय पीने आ जाया करते और हमारे साथ ख़ूब बतियाते... मगर उस रात के बाद तो मॉम ने उनसे मिलना, बात करना छोड़ दिया था ना... तो फिर आज ये दोनों साथ क्यों? "क्या हुआ, यहां क्यों खड़ी है?" तनिषा ने पीछे से मेरा कंधा थपथपाया. "नथिंग... लेट्स गो..." मैं अपनी हैरानी छिपाकर उसके साथ चल पड़ी. पूरे गैंग में गपशप चल रही थी, फ्यूचर प्लैन बन रहे थे, मगर मेरे दिमाग़ की सुई तो एक ही ज़गह अटक गई थी. मॉम अमित अंकल से अभी भी संपर्क में हैं? ये सवाल मेरे कंधे पर सवार हो साथ घर चला आया. मुझे एक अजीब-सी बेचैनी ने घेर लिया था. थोड़ी देर बाद बाहर से मेनडोर खुलने की आवाज़ आई, मॉम आ गई थीं. “जिया...” मॉम की आवाज़ सुन मैंने ज़बरन आंखें मींच ली. वो मेरे बेडरूम में आई और सिराहने बैठ सिर सहलाने लगी. “आज जल्दी सो गई, तेरे कैंपस इंटरव्यू का क्या रहा बेटा?” मैं अनसुना कर दम साधे पड़ी रही. वो मेरे सिराहने टेबल पर रखा ऑफर लेटर बुदबुदाते हुए पढ़ने लगी.   यह भी पढ़ें: महिलाएं बन रही हैं घर की मुख्य कमाऊ सदस्य (Women Are Becoming Family Breadwinners)   “तेरी जॉब लग गई जिया, इतनी बड़ी कंपनी में... और तू सो रही है...” वे ख़ुशी से चिल्लाई और मुझे बांहों में भर झिंझोड़ दिया. “सोने दो मॉम, बहुत थक गई हूं, कल बात करते हैं ना...” मैं उनींदी सी बोली. कुछ बताने का, पूछने का मन नहीं था... कुछ सवालों को उठाने की हिम्मत जुटानी होती है. रात का सवाल सुबह भी सिर भारी किए था. मैं उठकर रसोई में आई, तो उन्होंने मेरी बेआव़ाज आहट सुन ली. “उठ गई तू, बहुत-बहुत बधाई हो!” वे मुझे बांहों में कसते हुए बोली. “आज तूने मेरे सारे सपने पूरे कर दिए. अब मुझे कोई चिंता, कोई फ़िक्र नहीं.”

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