कविता

आज के हालातों में
हर कोई ‘बचा’ रहा है कुछ न कुछ
पर, नहीं सोचा जा रहा है
‘प्रेम’ के लिए
कहीं भी..

हां, शायद
‘उस प्रलय’ में भी
नाव में ही बचा रह गया था ‘कुछ’
कुछ संस्कृति..
कुछ सभ्यताएं..
और
.. थोड़ा सा आदमी!

प्रेम तब भी नहीं था
आज भी नहीं है
.. वही ‘छूटता’ है हर बार
हर प्रलय में
पता नहीं क्यों…

Hindi Kavita
Namita Gupta
नमिता गुप्ता

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लो बीत गया
दिन एक और
चाहे जैसा गुज़रा
यह दिन
अब बंद हो चुका है
मेरी स्मृति की क़ैद में
और भी जाने कितने
अनगिनत दिन
बंद है इस क़ैद में
कब मिलेगा इन
छटपटाते दिनों को
इस क़ैद से छुटकारा
शायद तब, जब मौत करेगी
आकर आलिंगन मेरा
ये दिन तो छूट जाएंगे
इस क़ैद से
किंतु मैं स्वयं,
क़ैद होकर रह जाऊंगा
एक शून्य में…

दिनेश खन्ना
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