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कहानी- कब तक? (Short Story- Kab Tak)

कहानी- कब तक

कहानी- कब तक

“आनंद चाहता, तो आठ साल पहले तुम्हारे द्वारा अस्वीकार किए जाने के बाद एक नई शुरुआत कर सकता था, पर उसने तुम्हारी माफ़ी का लंबा इंतज़ार किया है. साथ ही तुम्हारी मर्ज़ी को देखते हुए उसने अपने बच्चों से भी दूरी रखी. कब तक तुम जान-बूझकर इन नागफनी के कांटों को गले लगाओगी?”

”अब कैसा लग रहा है तुम्हें?” लतिका के पूछने पर कुमुद ने धीरे से सिर हिलाकर जवाब दिया, “अब मैं ठीक हूं, तुम भी अपना घर देखो. मैं संभाल लूंगी ख़ुद को, वैसे भी तीन-चार दिन में मुझे डिस्चार्ज कर ही देंगे.”
“विहान और मान्या को कुछ दिनों के लिए बुला लूं?”
“नहीं लतिका, विहान की नई-नई नौकरी लगी है और मान्या को ससुराल गए छह महीने ही तो हुए हैं. मैं नहीं चाहती कि उनकी ज़िंदगी में कोई उथल-पुथल हो. अभी यहां आनंद भी हैं, क्या सोचेंगे बच्चे?”
“क्या सोचेंगे मतलब? कुमुद, आनंद पति है तुम्हारा, मान्या और विहान का पिता है. इसमें सोचने जैसी क्या बात है?” लतिका आवेश में आ गई थी.
“लतिका, अब बहुत देर हो चुकी है. बच्चों को क्या जवाब दूंगी कि टूट गई मैं आनंद की माफ़ी के आगे. वैसे भी मैंने अपनी ज़िंदगी अपने तरी़के से जी है. मैं भावुकता में आकर आनंद को अपने अकेलेपन का फ़ायदा नहीं उठाने दूंगी.”
“कुमुद, वो तुम्हारे अकेलेपन का फ़ायदा नहीं उठाना चाहता है. मेरे कहने के बावजूद इन पंद्रह दिनों में एक क़दम भी नहीं रखा उसने तुम्हारे घर में. अपने मन की दुविधा को दूर करके पूछो अपने मन से कि वो क्या चाहता है? क्या एक मौक़ा तुम और नहीं दे सकती आनंद को?”
“नहीं…” कहकर कुमुद ने आंखें मूंद लीं. “प्लीज़ कुमुद, आठ साल से वो तुम्हारी माफ़ी का इंतज़ार कर रहा है. नफ़रत को गले लगाकर तुम थकी नहीं. मैं जानती हूं कि अभी भी आनंद के लिए तुम्हारे दिल में जगह है.”
“जगह थी, तुमसे बेहतर कौन जानता है? मैंने इन आठ सालों में उनसे कितनी नफ़रत की है, क्या तुम नहीं जानती?”
“कुमुद, आनंद के प्रति तुम्हारे प्यार ने ही इस नफ़रत को जन्म दिया है, वरना यूं नीम बेहोशी की अवस्था में तुम्हारे होंठों पर आनंद का नाम नहीं आता.” लतिका के खुलासे पर कुमुद ने अपने कान बंद कर लिए, तभी नर्स भीतर आ गई और लतिका से बोली, “मैडम, आप बाहर जाइए. अभी डॉक्टर सान्याल राउंड पर हैं.” लतिका बाहर आई, तो आनंद मिल गया, “अब कैसी है कुमुद?”
“ठीक ही है.”
“तुम बहुत थकी लग रही हो.” आनंद ने पूछा तो वह बोली, “थकी नहीं, परेशान हूं मैं, कुमुद की वजह से.”
“चाय पियोगी?” आनंद ने पूछा, तो उसने हामी भर दी. चाय का घूंट भरते हुए लतिका कुछ खोई हुई-सी बोली, “आनंद, जानते हो मुझे अब इस बात की ग्लानि होती है कि मैंने कुमुद को तुम्हारे ख़िलाफ़ इस हद तक भड़का दिया कि अब वो मेरी भी कोई बात सुनने को राज़ी नहीं है. काश! तुम्हारे और नेहा के रिश्ते के बारे में मैं आवेश में आकर कुमुद को कुछ न बताती, तो अच्छा होता. कम से कम नेहा से मोहभंग होने पर तुम्हारा कुमुद के पास वापस आना इतना मुश्किल तो न होता.”
“नहीं लतिका, जो मैंने किया है, वो माफ़ी के क़ाबिल नहीं है, इसलिए तुम ख़ुद को दोषी मत समझो. मेरे प्रति तुम सबकी नफ़रत मैं डिज़र्व करता हूं. मैं तुम्हारी सहेली को जानता हूं, वो मुझे कभी माफ़ नहीं करेगी. कुमुद माने या न माने, पर मैं अब भी उससे बहुत प्यार करता हूं. इंतज़ार तो मैं उसका हमेशा करूंगा और अब मैं इसी शहर में रहूंगा, क्योंकि मान्या और विहान उसके साथ नहीं हैं. ऐसे में उसका अकेले रहना ठीक नहीं है.”
कुछ देर की चुप्पी के बाद लतिका बोली, “आनंद सच-सच बताना, कुमुद के प्रति आज तुम्हारी जो भावनाएं हैं, कहीं वो उसके प्रति जन्मी कोई हमदर्दी तो नहीं? तुम्हारे अंदर बैठे गिल्ट को दूर करने का ज़रिया मात्र तो नहीं है?”
“नहीं लतिका, ये मेरा प्यार ही है, जो आठ साल से माफ़ी का इंतज़ार कर रहा हूं. और कितना साबित करूं मैं ख़ुद को. कुमुद के प्यार और समर्पण के बावजूद नेहा के प्रति मेरा आकर्षित होना निस्संदेह ग़लत था. ऐसा क्यूं हुआ, मुझे नहीं पता, पर कुमुद इस बात को कभी नहीं समझेगी कि नेहा की तरफ़ झुकने के बावजूद कुमुद के लिए मेरे मन में प्यार और सम्मान बना रहा. जब कुमुद ने मुझे अपने जीवन से निकाला, तब मुझे एहसास हुआ कि उसके बिना मेरा जीवन एक बड़ा शून्य है.”
आनंद का गला भर आया था. कुछ देर की चुप्पी के बाद वह बोला, “लतिका, तुमने कुमुद का बहुत साथ दिया है. क्या तुम कुछ और दिन उसके साथ रह सकती हो?” “आनंद, मुझे कोई प्रॉब्लम नहीं है, पर आज मेरा दिल्ली जाना बहुत ज़रूरी है. मुझे जैसे ही मौक़ा मिलेगा, मैं कुमुद के पास आ जाऊंगी. तुम तो कुमुद के पास हो ही. आज मेरी डॉ. सान्याल से बात हुई थी. वो बता रही थीं कि कल-परसों तक कुमुद को हम घर ले जा सकते हैं. तुम उसे घर तक छोड़ देना. मैं आज ही घर जाकर शांताबाई को समझा दूंगी, बाकी वो संभाल लेगी.”
दूसरे दिन सिस्टर मारिया गुलाब के फूलों का गुलदस्ता लेकर आई, तो कुमुद पूछ बैठी, “ये गुलाब किसने भेजे हैं?” तो मारिया मुस्कुराकर बोली, “आपकी सहेली ने. वो आज नहीं आ पाएंगी, आपके नाम ये चिट्ठी दे गई हैं.” कहते हुए उसने एक लिफ़ाफ़ा उसे पकड़ा दिया.
“अरे, उसने मुझे बताया भी नहीं. मैं घर कैसे…?” कुमुद की बात को बीच में ही काटते हुए नर्स बोली, “अरे! आपके हसबैंड हैं न? भई मानना पड़ेगा. आपकी इतनी सेवा की है, जिसकी कोई मिसाल नहीं है. जब आप होश में नहीं थीं, तब एक पल के लिए भी उन्होंने आपको अकेला नहीं छोड़ा. आप बहुत ख़ुशक़िस्मत हैं कि वे इतना ज़्यादा प्यार करते हैं आपसे.” नर्स की बात पर कुमुद कराह उठी. “अरे क्या हुआ, आज शायद पेनकिलर नहीं लगा है. अब थोड़ा दर्द तो सहना पड़ेगा.”
“दर्द ही तो सहती आई हूं अब तक और कितना…?” आगे के शब्द हिचकियों में डूब गए. सिस्टर कुछ सहम-सी गई थी, “मैं अभी डॉक्टर को बुलाकर लाती हूं.” मारिया के जाने के बाद कुमुद ने लतिका का पत्र खोला, जिसमें लिखा था- कुमुद मुझे माफ़ करना, मैं तुम्हे बिना बताए जा रही हूं, पर मेरा जाना ज़रूरी है. आनंद हैं, इसलिए मुझे तुम्हारी फ़िक्र नहीं है. एक समय था, जब मैंने कहा था कि आनंद को कभी माफ़ मत करना. तुम तो मेरे स्वभाव को जानती थी. मेरी नज़र में इंसान या तो ग़लत होता है या सही. वो कभी परिस्थितियों का शिकार भी हो सकता है, इस बारे में मैंने सोचा ही नहीं.
एक बात तुम्हें माननी पड़ेगी कि आनंद चाहता, तो आठ साल पहले तुम्हारे द्वारा अस्वीकार किए जाने के बाद एक नई शुरुआत कर सकता था, पर उसने तुम्हारी माफ़ी का लंबा इंतज़ार किया है. साथ ही तुम्हारी मर्ज़ी को देखते हुए उसने अपने बच्चों से भी दूरी रखी. कब तक तुम जान-बूझकर इन नागफनी के कांटों को गले लगाओगी? ये गुलाब के फूल देख, मैंने बड़े ध्यान से एक-एक कांटों को चुनकर निकाल फेंका है. अगर कोई रह गया हो, तो हिम्मत दिखाते हुए उसे तुम निकाल देना. मैं जल्दी वापस आऊंगी.
– लतिका
पत्र पढ़कर कुमुद आंखें बंदकर लेट गई. उसे याद आया एक दिन अस्पताल में जाने किस भावुक क्षण वो आनंद से पूछ बैठी थी, “क्या कमी रह गई थी आनंद, मेरे और बच्चों के प्यार में?” तो उसकी बात के जवाब में आनंद फफक पड़ा था. “एक बार मुझे माफ़ करके देखो कुमुद, तुम्हें शांति मिलेगी और मुझे जीवन.” पर इतना आसान कहां था आनंद को माफ़ करना. उसे याद आया, मान्या की शादी से पहले आनंद मान्या से मिलने घर आए थे, तो विहान ने कितनी बेरुखी दिखाते हुए कहा था, “आप क्यूं बार-बार मम्मी को परेशान करने आ जाते हैं? आपके लिए इस घर में कोई जगह नहीं है.” विहान की बात पर क्यूं कुमुद की सांस अटक-सी गई थी. आख़िर यही तो वह चाहती थी. बच्चों के मन में पिता के प्रति नफ़रत उसने ही तो पोषित की थी.
जब आनंद पहली बार माफ़ी की फ़रियाद लेकर आए थे, तो मान्या ने डरते-डरते कुमुद सेे कहा, “मां, प्लीज़ पापा को माफ़ कर दो न.” जवाब में कुमुद का करारा तमाचा उसके गाल पर पड़ा था. उस दिन के बाद आनंद को माफ़ कर देने की बात कभी नहीं उठी. कुमुद के रोष भरे आंसुओं में हमेशा यही प्रश्‍न होता कि क्यूं गए थे तुम, जब मुझे तुम्हारी सबसे ़ज़्यादा ज़रूरत थी? बड़े होते मान्या और विहान को पिता के मार्गदर्शन और संरक्षण की ज़रूरत थी. उम्र के उस पड़ाव में अपने से इतनी छोटी नेहा के आकर्षण में कैसे पड़ गए? काश! उनके बीच टिका ये क्षणिक रिश्ता वो जान ही न पाती, तो अच्छा होता. कम से कम समाज और बच्चों के सामने शर्मिंदा तो न होना पड़ता, पर ये बातें छिपती कहां हैं.

कहानी- कब तक
ऑफिस ट्रिप के बहाने साथ बिताए नेहा और आनंद के अंतरंग क्षणों के सबूत उसकी प्रिय सहेली लतिका ने दिए, तो शर्म से गड़ गई थी कुमुद. आनंद द्वारा किए गए विश्‍वासघात ने उसके वजूद के मानो टुकड़े कर डाले थे. उस वक़्त समाज, बच्चे, लतिका सब कुमुद के पाले में थे, पर वो किसे बताए कि एक आनंद के न होने से उसका पलड़ा हवा में तैरता प्रतीत होता था. व़क़्त के साथ सभी ने आनंद को माफ़ कर दिया, लेकिन संघर्षपूर्ण रास्ता तय करती कुमुद ने आनंद के प्रति रोष को जीवंत रखा.
विहान ने मां को अच्छा जीवन देने के लिए दिन-रात एक कर दिया. मान्या शुरू से ही होनहार थी. विवाह जैसी संस्था के प्रति उसका मोहभंग हो चुका था. ऐसे में जब आयुष मान्या के जीवन में आया और परिणति विवाह के रूप में हुई, तब कुमुद ने भी चैन की सांस ली.
विहान ने इंजीनियरिंग करके पुणे में अपने पैर जमा लिए थे. ज़िंदगी जैसी भी थी, चल तो रही थी, फिर उसकी ज़िंदगी को दोबारा उथल-पुथल करने आनंद क्यूं आ गए? अस्पताल में बिताए पंद्रह दिनों में वो शारीरिक और मानसिक रूप से कमज़ोर तो नहीं हो गई, जो दोबारा आनंद के प्रति तहों में दबी भावनाएं सिर उठाने लगी हैं. यदि ऐसा है भी, तो वह भयभीत क्यूं है? और किससे है? कहीं वह अपने ही बच्चों को जवाब देने से तो नहीं डर रही है? या डर है उसे आठ साल पहले ख़ुद से किए हुए उस वादे के ख़िलाफ़ जाने का कि वो आनंद को इस जीवन में माफ़ नहीं करेगी. कुमुद का सिर दर्द से फटने लगा था.
दूसरे दिन तमाम हिदायतों के साथ उसे डिस्चार्ज मिल गया था. “कुमुद, अपना ख़्याल रखना.” आनंद के शब्दों के प्रत्युत्तर में कुमुद उसे रोकना चाहती थी, पर उससे पहले ही गाड़ी की आवाज़ सुनकर शांताबाई दौड़ती हुई आई, उसे सहारा देकर अंदर ले आई. कुमुद ने पीछे मुड़कर देखा, तो आनंद दिखाई नहीं दिए. कुमुद ने कमरे में जैसे ही क़दम रखा. ‘वेलकम बैक’ की सम्मिलित आवाज़ ने उसे सुखद आश्‍चर्य में डुबो दिया. “अरे, विहान-मान्या तुम यहां…”
“मम्मी, मैं भी हूं.” आयुष कुमुद के पैर छूते हुए बोला.
“तुम लोग कब आए?”
“दो दिन पहले मेमसाब.” शकुंतला ने बताया, तो कुमुद विस्मय से बोली, “तुम लोग अस्पताल क्यूं नहीं आए?”
“क्योंकि हमें पता चला कि वहां पापा भी थे. हम तो डर गए थे कि कहीं पापा आपके अकेलेपन का फ़ायदा उठाकर आपकी ज़िंदगी में वापस न आ जाएं.” मान्या ने कहा, तो आयुष ने जवाब दिया, “इसमें बुरा क्या है मान्या?”
“तुमने मेरी मम्मी की तकलीफ़ देखी नहीं है आयुष.”
“पापा भी तो आठ साल से तुम लोगों से अलग रहने की सज़ा भोग रहे हैं. अगर इतनी शिद्दत से हम रिश्तों को बचाते, तो इन तकलीफ़ों से किसी को न गुज़रना पड़ता.” आयुष की बात कुमुद को चीर गई थी. सच ही तो कहा है इसने, आनंद की माफ़ी कहां कुमुद के ग़ुस्से को ठंडा कर पाई थी. आशा के विपरीत विहान शांत लगा, मानो हृदय में कोई मंथन चल रहा हो.
दो-तीन दिन सब साथ रहे. आनंद की कोई बात न होना कुमुद को अस्वाभाविक लग रहा था. आज सुबह-सुबह लतिका भी आ गई थी. विहान के पुणे जाने का समय पास आ गया था, एक रात पहले वह कुमुद से बोला, “मम्मी, आज मैं आपके साथ सो जाऊं.” कुमुद भीग-सी गई थी. तभी मान्या की आवाज़ आई, “आज मैं भी आपके साथ सोऊंगी.” कुमुद ने दोनों को प्यार से सीने से लगा लिया.
कुछ देर की चुप्पी के बाद अचानक विहान बोला, “मम्मी, क्या पापा का कसूर इतना बड़ा है कि हम उन्हें माफ़ नहीं कर सकते?”
“लोग क्या कहेंगे?” अनायास कुमुद के मुंह से निकला, तो विहान बोला, “जब पापा गए थे, तब भी तो लोगों ने कुछ नहीं कहा था.”
“पर तुम लोग तो ख़िलाफ़ थे न आनंद के?” तभी विहान ने कुमुद का हाथ अपने हाथों में लेकर कहा, “पापा ने जो किया, उससे आप बहुत आहत थीं. ये हम जानते थे. आप हमें स्वार्थी न कहें इस वजह से हमने उन्हें अपने क़रीब आने नहीं दिया, पर मम्मी वो हमारे पापा हैं. हर बच्चे की तरह हम भी चाहते हैं कि आप दोनों साथ रहें. बचपन में आपके भय ने हमें उनसे दूर रखा, अब ऐसा तो नहीं कि हमारा भय आपको पापा से दूर रख रहा हो.” कुमुद अपने अंतर्मुखी बेटे के मुंह से यह सुनकर अवाक् रह गई. कितनी आसानी से मानवीय रिश्तों के मनोविज्ञान को वह समझ गया था.
तभी मान्या बोली, “उस दिन जान-बूझकर पापा के लिए मेरे कहे शब्दों पर आप विचलित हो गई थीं न मम्मी? हम पापा का विरोध करके यह देखना चाहते थे कि उनके प्रति आपके मन में क्या है. मम्मी, पापा को बुला लो, आपके साथ हम भी उनका सामीप्य पाना चाहते हैं.” कहते हुए वह रो पड़ी, तो कुमुद भी स्वयं को रोक नहीं पाई, तभी लतिका आयुष के साथ अंदर आते हुए बोली, “कुमुद, हम तुम पर कोई दबाव नहीं डालेंगे लेकिन एक बार अपने पूर्वाग्रह से बाहर निकलकर सोचो. बच्चे तुम्हारी एक हां का बेसब्री से इंतज़ार कर रहे हैं.” कुमुद फूट-फूटकर रो पड़ी, तो लतिका ने इशारे से सभी को उसे चुप कराने के प्रयास को मना कर दिया.
कुमुद के बहते आंसू आनंद के प्रति नफ़रत को बहाते रहे. लतिका जानती थी कि अपनों की रज़ामंदी ने आनंद के प्रति जबरन दबाए प्यार को हवा दे दी है, ये बहते आंसू उसी सुकून के प्रतीक हैं. जहां कुमुद का अवचेतन मन इस पल का इंतज़ार कर रहा था, वहीं आनंद को कुमुद और अपने बच्चों की एक पुकार का इंतज़ार था.

         मीनू त्रिपाठी

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कहानी- पासवाले घर की बहू ( Hindi Kahani – Paswale Ghar Ki Bahu )

कहानी- पासवाले घर की बहू

Pama-Malik

                  पमा मलिक

कहानी- पासवाले घर की बहू

वह आराम से आठ बजे सोकर उठती, चाय पीती, फिर नहा-धोकर सज-धजकर बैठ जाती. लोगों से चहक-चहककर बातें करती, क्योंकि मायका बगल में होने के कारण उसे माता-पिता से दूर होने का एहसास ही नहीं हुआ. ग्यारह-बारह बजे अपने कमरे में चली जाती और घंटों सोती रहती, केवल खाने व चाय के लिए निकलती. सुबह-शाम उसके भतीजे-भतीजी डिब्बा लिए हाज़िर रहते, ‘मम्मी ने दिया है, बुआ को बहुत पसंद है.’

बार-बार नाम लेकर पुकारने पर भी ऋषभ ने जवाब नहीं दिया. चाय ठंडी हुई जा रही थी, इसलिए विवश होकर मैं ही ऊपर पहुंच गई, जहां रिया अपनी छत पर खड़ी उससे बतिया रही थी. उनके प्रेमभरे ‘गुटर गूं’ में मेरे तीक्ष्ण स्वर “चाय पीनी है?” ने विघ्न डाल दिया. रिया वहां से टली नहीं, मुस्कुराकर बोली, “नमस्ते आंटीजी.” मैंने अभिवादन का जवाब दिया और पैर पटकती नीचे उतर आई, “बेशरम कहीं की, मां के सामने ही उसके बेटे से प्रेम की पींगें बढ़ा रही है, कोई लिहाज़-संकोच है ही नहीं.”
“मां, कहां है मेरी चाय?” नीचे आकर ऋषभ ने पूछा.
“देख ऋषभ, अब तू बच्चा नहीं है, एक ज़िम्मेदार बैंक ऑफिसर है. छत के उस कोने में खड़े तुम दोनों क्या खुसुर-फुसुर करते रहते हो? बचपन में साथ खेलते थे, मैंने ध्यान नहीं दिया. बड़े हुए तो एक ही कॉलेज में थे, सो मैं चुप रही, लेकिन अब, अब क्या बातें होती हैं?”
“मां, हमने बचपन से लेकर अब तक एक लंबा समय साथ में बिताया है, अब तो हमें एक-दूसरे से बात करने की आदत हो गई है. तुम व्यर्थ ही चिंता करती रहती हो. हमारे बीच ऐसा कुछ भी तो नहीं है. हम स़िर्फ बात ही तो करते हैं.”
“बात बढ़ते समय नहीं लगता.” मेरी भृकुटी में बल पड़ रहे थे. अपने योग्य, सुंदर बेटे की पड़ोस की साधारण-सी रिया से नज़दीकियां मुझसे बर्दाश्त नहीं हो रही थीं. ऋषभ के ‘कुछ भी तो नहीं है’ कहने पर भी मुझे विश्‍वास नहीं हुआ. रिया के बदले रुख पर मैं हैरान-परेशान रहती थी. आजकल आए दिन कभी पकौड़े की प्लेट, तो कभी अचार की शीशी लिए हाज़िर हो जाती थी.
ऐसे ही एक दिन वो घर पर आ धमकी. उसे देख मैंने कहा, “सूट तो बड़ा सुंदर है. इसे दिखाने आई थी या पकौड़े देने?”
“कुछ भी समझिए आंटीजी, वैसे कैसी लग रही हूं?”
“ठीक है.” मुझे कहना पड़ा, उसे देखकर ही मैं शंकाग्रस्त हो जाती. बचपन में दिन-रात साथ खेलते बच्चों को युवावस्था में अलग कर देना मुश्किल होता है.
हम तीन बहनों की संतानों में ऋषभ इकलौता था. पति के खानदान में भी वह सबसे बड़ा और लाड़-प्यार से पला था. उसकी शादी को लेकर हम सबने बड़े सपने संजोए थे, किंतु हमारे सारे अरमानों पर पानी फिर गया. जल्दी ही ऋषभ ने रिया से विवाह की घोषणा करके हम सबको गहरा आघात दिया. हज़ारों कमानेवाले ऋषभ की अकेली विवाहिता बहन रागिनी ने इसका पुरज़ोर विरोध किया. मैंने तो घर छोड़कर जाने की धमकी तक दे डाली, पर ऋषभ प्रभावहीन रहा. बोला, “आप घर छोड़कर क्यों जाएंगी? मैं ही अलग हो जाऊंगा. बस, रिया से शादी करवा दीजिए.”
“करवा दूंगी. सारे निर्णय तो ख़ुद ले चुका है. शादी भी कर ले.”
“ठीक है, कोर्ट-मैरिज कर लेता हूं. मुझे तो आपके विरोध का कारण समझ नहीं आ रहा है. हमारी जाति की है, पढ़ी-लिखी,
धनी परिवार की है और सबसे बड़ी बात मुझे पसंद है.”
“मैंंने जैसी बहू की कल्पना की थी, वो वैसी नहीं है. सिर चढ़ी- नखरैल, पता नहीं क्या देखा तूने उसमें?”
“शादी तो मुझे करनी है, मुझे पसंद है वह.”
“भइया! आपको मम्मी से ऐसे बात नहीं करनी चाहिए.”
“तू चुप रह, मम्मी की चमची. अभी दो दिन में संदीप के पास चली जाएगी. तूने भी तो की थी अपनी पसंद से शादी, मैंने कोई विरोध
किया था?”
रागिनी चुप हो गई, उसने भी प्रेमविवाह किया था, लेकिन मैंने उसमें अपनी सहमति दी थी. मैं कुछ बोलती उससे पहले ऋषभ के पापा बोले, “ऋषभ की शादी रिया के साथ ही होगी. जवान लड़का घर से चला जाए, यही चाहते हो क्या तुम लोग? यह सब मैं नहीं होने दूंगा. अब कोई एक शब्द नहीं बोलेगा. शादी की तैयारी करो.”
उसके बाद सबने चुप्पी साध ली. शादी, बारात तक मैं बिल्कुल शांत रही. मुंह दिखाई में पांच तोले का हार दिया, लेकिन यह देखकर मेरा मुंह उतर गया कि रिया के माता-पिता ने दान-दहेज काफ़ी कम दिया था. हालांकि बारातियों का स्वागत बढ़िया था. रिया की व्यक्तिगत सभी चीज़ें अच्छी क्वालिटी की थीं, पर हर पारंपरिक सास जैसे घर के अन्य सदस्यों व वर के लिए कीमती गिफ्ट व नक़द की अपेक्षा करती है, मैं भी कुछ उसी तरह की अपेक्षाएं पाले बैठी थी, पर ऋषभ के पिता का सख़्त निर्देश था कि मुंह खोलकर कोई मांग नहीं की जाएगी. बहरहाल, रिया बहू बनकर हमारे घर आ गई. जब तक घर रिश्तेदारों से भरा था, मैंने उसे आराम करने दिया. वह आराम से आठ बजे सोकर उठती, चाय पीती, फिर नहा-धोकर सज-धजकर बैठ जाती. लोगों से चहक-चहककर बातें करती, क्योंकि मायका बगल में होने के कारण उसे माता-पिता से दूर होने का एहसास ही नहीं हुआ. ग्यारह-बारह बजे अपने कमरे में चली जाती और घंटों सोती रहती. केवल खाने व चाय के लिए बाहर निकलती. सुबह-शाम उसके भतीजे-भतीजी डिब्बा लिए हाज़िर रहते, ‘मम्मी ने दिया है, बुआ को बहुत पसंद है.’ ‘दादी ने फूफाजी के लिए भेजा है.’
उन डिब्बों के स्वादिष्ट व्यंजनों से मुझे परहेज़ न था, लेकिन ‘फूफा-बुआ मात्र’ की भावना चुभ जाती. जिस दिन ऋषभ-रिया नैनिताल जा रहे थे, रिया ने आकर मुझसे कहा था, “आप परेशान मत होइएगा, मेरी मम्मी ने रास्ते के लिए खाना बना दिया है.”


वे दोनों हनीमून रवाना हो गए. रिश्तेदार भी जा चुके थे. रागिनी ने जाने से पहले मुझसे कहा, “वहां से लौटकर आएं, तो भाभी से खाना बनवाना शुरू कर दीजिए, वरना ज़िंदगीभर आप उसे बिठाकर खिलाती रहेंगी.”
“हां, और क्या उसे तो करना ही है.” मैंने कह तो दिया, लेकिन मन ही मन असमंजस में भी थी. कुछ दिनों बाद ऋषभ-रिया लौटकर आए. काफ़ी गिफ्ट्स, मेवे-मिठाइयां लेकर आए थे. रिया शाम को ही मायके जाकर काफ़ी कुछ दे आई.
“अब तुम दोनों आराम करो. ऋषभ, कल तुम्हें बैंक जाना है. रिया, कल का नाश्ता तुम्हें बनाना है. इंतज़ाम मैं कर दूंगी.” मैंने कहा.
रिया ने सिर तो हिला दिया, लेकिन आशंकित थी. दूसरे दिन नाइटी उतारकर सूट पहनने और ब्रश करने में ही उसने अच्छा-ख़ासा समय लगा दिया, फिर जिस मंथर गति से वह परांठा सेंकने लगी थी, लगा कि आज ऋषभ ऑफिस ही नहीं जा पाएगा. हारकर मुझे ही सब्ज़ी छौंकनी पड़ी. रसोई में काम करते हुए मैं उसे फुर्ती से काम करने की सलाह देती रही, जिसे वह अनमने भाव से सुनती रही.
अगले दिन उसे फ्राइड राइस और पनीर बनाना था. सारी तैयारियां करके मैंने उसे आवाज़ दी, तो पाया कि वह घर में कहीं है ही नहीं. अचानक सीढ़ियों पर उसके पदचाप ने मुझे सतर्क किया. वह हाथ में एक बड़ा डिब्बा लिए उतर रही थी.
“मम्मीजी! मेरी मम्मी ने आलू दम और पूरियां भेजी हैं. सुबह का नाश्ता हो जाएगा.”
“तुम दोनों का तो हो जाएगा, पर हमारा नहीं. कब तक कुछ सीखने की जगह डिब्बा लाती रहोगी. अब छोड़ो यह सब.”
लेकिन रिया ने मेरी एक न सुनी. छत पर उसका मायकेवालों से लेन-देन चलता रहा. कभी-कभी तो वह कचौड़ी, हलवा-पोहा का डिब्बा लिए अपने कमरे में चली जाती और खा-पीकर छत से डिब्बा पुनः देने के अनुरोध के साथ लौटा दिया जाता. उसका पेट भरा रहता, तो खाना बनाने में उसकी दिलचस्पी कम रहती. मुझे ग़ुस्सा आता, लेकिन कुछ कह न पाती. ऋषभ की शह जो मिल रही थी उसे. नई-नवेली अर्द्धांगिनी के सौ ख़ून माफ़ होते हैं, लेकिन असली ग़लती रिया की मां कर रही थीं, सो एक दिन बिना पूर्व सूचना के मैं उनके घर पहुंच गई. मेरी गंभीर मुखमुद्रा से वे तनिक विचलित दिखीं. ख़ूब आवभगत हुई, उसी दौरान मैंने कहा, “आपने रिया को कामकाज नहीं सिखाया, कोई बात नहीं, लेकिन छतों से डिब्बे देना, लड़की को ‘केवल मैं और मेरा पति’ का पाठ पढ़ाना, क्या यह उचित है?”
“अरे बच्ची है, जो कुछ उसे पसंद है घर में बनता है, तो दे देती हूं. धीरे-धीरे सब सीख जाएगी.”
“धीरे-धीरे उसमें अलगाव की प्रवृत्ति आ जाएगी. वह आप पर निर्भर हो जाएगी और कभी अपने घर के प्रति समर्पित न होगी.”
“आप बहुत आगे की सोच रही हैं? एक मां की तरह सोचें, तो आपको लगेगा कि कुछ भी ग़लत नहीं हो रहा है.”
रिया की मां अपनी बात पर अड़ी रहीं. मैंने गहरी सांस ली और जाने के लिए उठ खड़ी हुई. बाहर तक मुझे रिया की भाभी छोड़ने आई. उसने कहा, “आप चिंता न करें, वह घर की छोटी है, इसलिए दायित्व-भाव नहीं है, लेकिन शादी के बाद यह भाव हर स्त्री में ज़रूरी है, वरना वह उस परिवार से जुड़ नहीं पाएगी. मैं उसे समझाऊंगी.”
मैं घर वापस आ गई, रिया ने इधर एक नई रट लगा रखी थी कि वह नौकरी करना चाह रही है. घर से सहमति मिलने पर उसने एक स्कूल में नौकरी कर ली. अब वह भी ऋषभ के साथ टिफिन लेकर निकल जाती. दोपहर में बना-बनाया मेरे द्वारा परोसा खाना खाकर सो जाती. शाम की चाय मैं ही बनाती. चाय पीकर वह खाने के लिए पूछती तो ज़रूर, पर बस रोटियां बनाकर चलती बनती.
कभी-कभी सब्ज़ी, चटनी या रायता आदि बनाती. इसके बाद सब मुझे ही समझाते, “अरे जैसा बना है, खा लो. सब पेट में ही तो जाएगा. तुम सोचती हो, वह अभी से तुम्हारी तरह एक्सपर्ट हो जाएगी.”
“पापा ठीक कहते हैं मां.” ऋषभ बोलता.
रिया उनकी कृतज्ञ रहती और मुझसे कुपित. रात में कहती, “मैं रोटियां बना दूंगी, सलाद काट दूंगी, बाकी मेरे हाथ की बनी सब्ज़ी तो आपको पसंद नहीं आएगी.”
अब मैं घर में मुफ़्त की नौकरानी थी. तीनों टाइम खाने की व्यवस्था, घर की सफ़ाई और सजावट, महरी के पीछे-पीछे घूमना, मैं चाहकर भी उससे कुछ न कह पाती. वह हमेशा मुझसे एक निश्‍चित दूरी बनाकर रखती. घर में एक और औरत के आ जाने से मेरी अपेक्षा बनी रहती कि रिया मेरी कुछ मदद करे. इसके लिए विरोध स्वरूप कभी सिरदर्द, तो कभी कमरदर्द का बहाना बनाकर पड़ी रही कि रिया कुछ करे, लेकिन इसका विपरीत प्रभाव पड़ा. उसके घर से सुबह-शाम टिफिन आने लगे, वह टिफिन लेकर स्कूल जाती, वहां से लौटकर सीधे मायके जाती, खा-पीकर लौटती. कभी-कभी स्कूल में काम ज़्यादा होने पर मायके ही रुक जाती. अब घर में एक अलग ही सुगबुगाहट शुरू हो गई थी कि रिया ऋषभ के साथ अलग रहने की योजना बनाने लगी है, कहीं और, जहां से ऋषभ का बैंक पास पड़ता हो. मैं यह सब बातें सुनकर सन्न रह गई. ऋषभ से पूछा तो उसने इसे हल्के में लिया, “मम्मी! मैं रिया के योजनानुसार तो नहीं चलूंगा. हां, उसके पापा का फ्लैट है, तो दो-चार दिन जाकर रह सकते हैं.”
ऋषभ से बात करके कुछ तसल्ली हुई. छत पर कपड़े सुखाते रिया की भाभी से बात हुई, वह चुपचाप ननद की योजनाओं को सुनती रही, लगा जैसे किसी अलग ही सोच में गुम है.
रिया की मेरे प्रति बेरुखी से मैं आहत थी. मैं भी आदर्श सास बनने में असमर्थ थी, सो उससे कुछ कहना भी मैंने छोड़ दिया, लेकिन इधर कुछ दिनों से मुझे रिया खोई-खोई-सी लगती. उसका चहकना, उछलना-कूदना, उधम मचाना सब बंद हो गया था. कुछ सोचती रहती, उसने छत के चक्कर लगाना और टिफिन लाने का क्रम भी रोक दिया था. सुबह उठकर चाय, खाना सबके लिए बनाती, अपना टिफिन लेकर मुंह लटकाए चली जाती. लौटने पर मायके न जाकर सीधे घर आती. दोपहर का दाल-चावल बनाने में मदद करती. परोसती, बटोरती, शाम को जल्दी सोकर उठ जाती. घर व्यवस्थित करती. मैं चाय बनाती, तो उदास चेहरा लिए बगल में खड़ी रहती. चाय पीकर स्कूल का काम करती. रात का खाना बनाने जाती, तो तुरंत किचन में पहुंच जाती, “आप आराम करें, मैं खाना बना लेती हूं.”
“जैसी तुम्हारी इच्छा.” मैं उल्टे पांव लौट आती. वह मसाला पीसती, भरसक स्वादिष्ट सब्ज़ी बनाने का प्रयास करती, पतली रोटियां सेंकती, कोई मीठा ज़रूर बनाती. इस दौरान बराबर मेरा मुंह ताकती रहती कि मेरी प्रतिक्रिया क्या है. मैं उसमें सकारात्मक परिवर्तन से आश्‍चर्यचकित थी. कहती, “रिया, आज की सब्ज़ी अच्छी बनी है.” तो वह ख़ुश हो जाती, “थैंक्यू मम्मीजी.”
मेरी उत्सुकता बढ़ गई. एक दिन मैंने रिया के स्कूल जाने पर ऋषभ को पकड़ा, “मामला क्या है ऋषभ? जिस लड़की को मैं समझा-समझाकर थक गई, उसमें अचानक इतना परिवर्तन कैसे आ गया?”
“मां, उसकी कुछ फैमिली प्रॉब्लम है.”
“अच्छा, अब तू सीधे शब्दों में बता, बातें घुमा-फिराकर कहना छोड़.”
“उसकी भाभी जो सब काम-धाम करती थी और भइया जो एकमात्र कमानेवाले मेंबर हैं, उन लोगों ने अलग रहने का निर्णय ले लिया है. रिया कुछ समझाने की कोशिश करती है, तो भाभी हत्थे से उखड़ जाती हैं कि तुम अपने ससुराल में क्या कर रही हो, जो मैं यहां मरती रहूं. रिया की मां दिन-रात रोती रहती हैं, इसलिए वह बहुत परेशान रहती है.”
“रिया ने कुछ चर्चा करने से मना किया है. वह यह सब सोच-सोचकर हलकान है कि उसके मां-बाप कैसे अकेले रहेंगे, घर का ख़र्चा कैसे चलेगा? रात में वह ठीक से सोती भी नहीं.”
“ओह! यह बात है.” मेरे मन में भी बहुत सारी बातें उठीं, लेकिन मैं चुप रही. रिया का घर के कामों में मन न लगना, अकेले रहने की बात करना, फिर अचानक एक सुखद परिवर्तन, लेकिन यह परिवर्तन भी उसकी भाभी के अलगाववादी नीतियों के कारण हुआ, जो ठीक नहीं था. रिया ने जो कुछ यहां किया था, वही सब कुछ जब उसकी भाभी ने किया, तो वह परेशान हो गई.
मैंने चुप्पी साध ली थी. रिया स्वयं मेरे नज़दीक आने की कोशिश करने लगी. स्कूल और घर दोनों संभालनेवाली बहू के प्रति मेरे मन में सहानुभूूति उमड़ने लगी. मैं उससे बोलने-बतियाने लगी. वही सारी बातें जब उसने मुझे बताईं, तो मैंने उसे समझाया कि यह सब कुछ दिनों की मुश्किलें हैं. कटुता कम होने पर सब ठीक हो जाएगा.
“नहीं मम्मीजी! भाभी मेरे बूढ़े मां-बाप को छोड़कर जाने की बात कहने लगी हैं. भइया की सैलरी से ही तो घर चलता है. भाभी मुझे अपने दोनों बच्चों बंटी-नेहा जैसा मानती थीं, इसीलिए तो मैं भी मायके से जुड़ी थी, अब न जाने क्यों उनमें ऐसा परिवर्तन आ गया. मुझे भी आप सबसे न निभा पाने का ताना देती रहती हैं.”
मैंने उसे दिलासा देने के लिए कंधे पर हाथ रखा, तो वह मुझसे लिपट गई. मेरा मन भीग गया. लगा रागिनी मेरे गले लगकर खड़ी है.
“मम्मीजी, मैंने भी इस घर और आप सबके प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वाह नहीं किया. यह नहीं सोच पाई कि मैं जो कुछ अपनी भाभी से अपेक्षा कर रही हूं, वैसी ही आशा आप सब भी मुझसे करते होंगे. जीवन का केवल एक पक्ष देखा था मैंने, लेकिन अब मैं सब कुछ समझने लगी हूं.”
मैंने उसे सांत्वना दिया. आगे संक्षेप में यह कि अब मैं पति, पुत्र, बहू के साथ सानंद जीवनयापन कर रही थी. एकाध महीने बाद सुना कि रिया के मायके में भी सब कुछ ठीक हो गया है. रिया की भाभी ने अलग होने की रट छोड़ दी है और सास के साथ मेल-मिलाप पूर्वक रहने लगी है. उसका बार-बार रूप बदलना मुझे आश्‍चर्यजनक लगा, लेकिन एक दिन छत पर सूखे कपड़े समेटते बगल की छत पर रिया की भाभी खड़ी दिखी. उसने पूछा, “आंटीजी! घर में सब ठीक है न?”
“हां, अच्छा चल रहा है. तुम बताओ तुम्हारे परिवार में सब कुशल मंगल है न?”
“यहां तो हमेशा ही कुशल मंगल था.”
“लेकिन मैंने तो सुना था कि…”
उसने होंठों पर उंगली रखकर चुप रहने का इशारा करते हुए पास बुलाया और बोली, “हमारे परिवार में कुछ भी गड़बड़ नहीं थी. वह तो मैंने और मेरी सास ने मिलकर गृह-कलह का नाटक किया था, ताकि रिया को अपने दायित्वों का एहसास हो.”
मेरी आंखें बड़ी-बड़ी हो गईं. स्वयं को संभालकर मैंने दबे स्वर में कहा, “बेटी! मैं किस प्रकार तुम्हें धन्यवाद दूं, समझ में नहीं आ रहा है. तुमने मेरे घर की ख़ुशी के लिए स्वयं को बुरी साबित करने का प्रयास किया.”
“कोई बात नहीं आंटी. मेरे सास-ससुर तो सब जानते हैं, अभी रिया को कुछ नहीं पता चलना चाहिए. बाद में जानने पर कुछ न होगा.”
“तुम ठीक कह रही हो, मैं उसे कानों-कान ख़बर नहीं होने दूंगी.” और हम दोनों नीचे उतर गए.
मैं कृतज्ञ थी, ज़िंदगी की गाड़ी हंसी-ख़ुशी, ग़म-मुसीबत लिए चलती रहती है, उसमें ठहराव नहीं आता, किंतु संतोष व कृतज्ञता के भाव तब उत्पन्न होते हैं, जब कोई शख़्स निःस्वार्थ भाव से दूसरों की मुश्किलें आसान करता है और गाड़ी पटरियों पर सरपट दौड़ने लगती है.

 

कहानी- मन की सुहागरात (Short Story- Maan Ki Suhagrat)

 

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