व्यंग्य

ओरिजनल सावन लापता है. पहले बसंत लापता हुआ, अब सावन. क्या पता दस साल बाद हमें पता चले कि अमेरिका ने सावन को पेटेंट करा लिया है. अब आगे से सावन वहीं पाया जाएगा…

मैंने सावन के बारे में बहुत सुना है. कॉन्फिडेंस से कह सकता हूं कि सावन के बारे में कोरोना से ज़्यादा जिज्ञासा थी. पैदा होने से पच्चीस साल की उम्र तक गांव से जुड़ा रहा. उस दौरान सावन, लाला के तगादा की तरह, बार-बार सामने आता रहा. सावन आते ही गांव में झूले पड़ जाते थे. लड़के झुलाते थे और लड़कियां झूलती थीं. लोग इंतज़ार करते थे, ‘सावन तुम कब आओगे… आकाश में बदली, रिमझिम फुहार और नीचे ‘कजरी’ गाती झूले पर युवा महिलाएं. इस झूले के दौरान इश्क़ की कई क्लासिक कहानियां जन्म लेती थी.
वो गाना याद आ रहा है, ‘बचपन के दिन भुला ना देना… ‘ अरे कैसे भूल सकता हूं भइया. वही ख़ूबसूरत और रंगीन यादें, तो कुपोषित हसरतों को आज भी ऑक्सीजन देती हैं. प्यार-मुहब्बत भी याद है और दोस्तों के साथ लड़ाइयां भी. एक बार तो मोहब्बत इतनी घातक हो गई कि मै अपने अजीज़ दोस्त कमाल अहमद से मारपीट कर बैठा था (दरअसल मामला ‘एक म्यान में दो तलवार ‘ वाला था!). ख़ैर, सावन में बादलों के नज़दीक ‘बिजली’ के आने से इतनी गरज-चमक तो स्वाभाविक है.
गांव क्या छूटा, सावन छूट गया. अड़तीस साल से दिल्ली में हूं. कभी सावन को आते-जाते नहीं देखा. जब-जब सावन ढूंढ़ने की कोशिश की, तो कभी बादलों से आसाराम झांकते नज़र आए, तो कभी बाबा राम रहीम. ओरिजनल सावन लापता है. पहले बसंत लापता हुआ, अब सावन. क्या पता दस साल बाद हमें पता चले कि अमेरिका ने सावन को पेटेंट करा लिया है. अब आगे से सावन वहीं पाया जाएगा. हमें पता है कि कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है. अभी हमें ‘विश्‍व गुरु’ का सिंहासन पाना है. खोने की लिस्ट लंबी है, इसलिए सावन को जाने दो.
पिछले सावन में मैं गांव गया था. बड़ा जोश में था कि सावन से मुलाक़ात होगी. पंद्रह दिन फेरीवालों की तरह हांडता रहा, मगर सावन नज़र नहीं आया. अब नीम के पेड़ पर झूले भी नहीं पड़ते. झूला झुलाने वाले युवा ज़्यादातर शहर चले गए और जो बचे वो झूले पर पींग मारने की जगह ‘गांजे’ की पींग मारकर आसमान में उड़ते हैं. अब इधर सावन की जगह ‘मनरेगा’ आने लगा है. मनरेगा ने सावन को निगल लिया है. तमाम पनघट में नालों का कब्ज़ा है. बसन्त और सावन का पंचांग अब ग्राम प्रधान और बीडीओ साहब बनाते हैं.
बंसत का और बुरा हाल है. अब इसकी भी मोनोपोली ख़त्म कर दी गई है. फरवरी के जिस महीने में पहले बसंत आता था, अब वैलेंटाइन आता है. युवाओं को अब वैलेंटाइन के मुक़ाबले बसंत में चीनी कम नज़र आ रही है. रोना ये है कि वैलेंटाइन का इंफेक्शन कोरोना की रफ़्तार से गांव तक पहुंच गया है. ऐसे में बसंत हो या सावन, उनकी विलुप्त होने की आशंका ‘बाघ’ जैसी होती जा रही है. जहां बंसत है, वहां वैलेंटाइन ने ठीया लगा लिया और सावन बेचारा मनरेगा से दुखी है. जाएं तो जाएं कहां!..
मैं सावन को लेकर संशय में हूं, और बसंत को लेकर दुखी. युवाओं की चिंता वैलेंटाइन को लेकर है. क्या पता गांव से शहर तक ‘सावन’ को निगल चुका कोरोना फरवरी में वैलेंटाइन के साथ क्या करे. सतयुग में सब कुछ संभव है. कल के सूरज और आज की गहराती शाम के बीच ख़्वाबों के पनपने के लिए एक बंजर रात का फ़ासला सामने है.

Sultan Bharti
सुल्तान भारती

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