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हिंदी कहानी- यथार्थ (Hindi Short Story- Yatharth)

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क्या लड़का है! कितने अधिकार से अपनी पसंद बताकर लौट गया. सीटी तो ऐसे बजा रहा है, जैसे उसका अपना घर हो और क्या कहकर बोला था- यार… यह वह मुझसे बोला था या पराग से? क्या भाषा हो गई है आजकल के लड़कों की? लगता है, घर में कोई रोकने-टोकनेवाला ही नहीं है.

कहानी समाप्त हुई, तो नीरा का मन दुख, नैराश्य, आक्रोश जैसे मिले-जुले भावों से भर उठा. यह जानते हुए भी कि यह मात्र एक कहानी है, मन तर्क-वितर्क पर उतर आया था. उम्र के इतने अंतराल पर भी कोई कैसे एक-दूसरे की ओर इतना आकर्षित हो सकता है और ऐसी छिछोरी हरकतें कर सकता है. ऐसे ही उदाहरणों से तो समाज विघटित होता है. लड़की तो चलो अल्हड़ और नादान थी, पर उस अनुभवी, प्रौ़ढ़, सद्गृहस्थ को तो सोचना चाहिए था कि ऐसे संबंधों का हश्र पारिवारिक विघटन के अतिरिक्त कुछ नहीं होता.
विचारों की दौड़ थी कि बेलगाम घोड़े की भांति सरपट भागी जा रही थी. नीरा को ही उस पर लगाम कसनी पड़ी. पराग अपने किसी दोस्त के साथ स्टडी रूम में ज़रूरी प्रोजेक्ट तैयार कर रहा था. उनके लिए कुछ बनाने के उद्देश्य से नीरा रसोई की ओर बढ़ गई. मिनटों में ही भेलपूरी तैयार कर वह बच्चों के सम्मुख उपस्थित थी. पराग की उंगलियां कीबोर्ड पर व्यस्त थीं, लेकिन उसके दोस्त साहिल ने तुरंत अपनी प्लेट उठा ली और खाना भी शुरू कर दिया. नीरा पराग की प्लेट रखने के लिए जगह बनाने लगी, तभी साहिल की प्रतिक्रिया ने उसे उत्साह से भर दिया, “वाह, क्या भेलपूरी बनाई है! मज़ा आ गया.”
“और ले लेना, बहुत सारी बनाई है.”
“श्योर, थैंक्स!”
नीरा दूसरे कामों में व्यस्त हो गई. बाहर से कपड़े लाकर तहकर रख रही थी कि पीछे से साहिल की पुकार सुन चौंक उठी, “पानी चाहिए था.”
“अं… हां, अभी देती हूं.”
साहिल पानी पीने लगा, तो नीरा गौर से उसे निहारने लगी. सोलह-सत्रह की वय को छूता बच्चा. नहीं, बच्चा नहीं… हल्की-हल्की उभर रही दाढ़ी-मूंछों और पिंपल्स भरे चेहरे के संग उसे बच्चा तो कतई नहीं कहा जा सकता था. चेहरे की मासूमीयत कहीं खो-सी गई थी और उसका स्थान परिपक्वता ने ले लिया था. आवाज़ भारी और गंभीर थी. शरीर
भरा-भरा…
“छी! यह मैं क्या देखने लगी? ये सारे परिवर्तन तो पराग में भी हो रहे हैं, फिर भी वह तो मुझे बच्चा ही नज़र आता है.”
“और पानी चाहिए बेटा?” अपने विचारों को झटकते हुए नीरा ने पूछा. नीरा ने ग़ौर किया, पानी पीते हुए साहिल की नज़रें उसी पर टिकी हुई थीं. वह घबराकर अपना दुपट्टा संभालने लगी.
“एक ग्लास और, बहुत प्यास लगी है.” साहिल अब भी एकटक उसे ही घूर रहा था.
“हां, लो न.” उसका ग्लास फटाफट भरकर नीरा तह किए हुए कपड़े रखने कमरे में घुस गई. उसके माथे पर पसीने की बूंदें झलक आईं. पसीना पोंछकर उसने चुपके से बाहर झांका. साहिल को स्टडी रूम की ओर लौटते देख उसने राहत की सांस ली.
कुछ देर पूर्व पढ़ी कहानी दृश्य के रूप में रूपांतरित होकर उसकी आंखों के सामने डूबने-उतराने लगी. घबराकर उसने आंखें मूंद लीं और कुछ देर के लिए बिस्तर पर लेट गई, लेकिन बेक़ाबू दिल की धड़कनें उसे बेचैन किए जा रही थीं. नीरा उठ खड़ी हुई और रसोई में जाकर खाना बनाने लगी. पीछे सरसराहट
हुई, तो वह बेतरह चौंककर पीछे की ओर मुड़ी.
“क्या हुआ ममा, इतना घबरा क्यों रही हो? मैं ही हूं.” पराग को देखकर नीरा की जान में जान आई.
“क्या बना रही हो? साहिल भी खाना यहीं खाएगा.”
“क्यों?” नीरा के चेहरे पर फिर से परेशानी के भाव उभर आए थे.
“कुछ दिक़्क़त हो, तो रहने दो.”
“नहीं, खाने की कोई परेशानी नहीं है. मेरा मतलब था, वो घर नहीं जाएगा?”
“जाएगा. प्रोजेक्ट पूरा हो जाए, फिर जाएगा. दरअसल यह हम दोनों का ज्वाइंट प्रोजेक्ट है और सोमवार तक जमा करना है, इसलिए हम दोनों सोच रहे थे कि आज ही पूरा कर लें, ताकि कल उसे फिर से न आना पड़े.”
“हां, यह भी ठीक है. अच्छा, राजमा-चावल बना रही हूं. तुम्हारे उस दोस्त को चलेगा? या और भी कुछ बनाऊं?”
“एक मिनट, पूछकर बताता हूं.” पराग लौट गया. नीरा असमंजस की स्थिति में चावल का डिब्बा हाथ में लिए खड़ी रह गई, तभी छलांग लगाता साहिल ख़ुद आ टपका. “ग्रेट यार! आपको कैसे पता चला कि राजमा-चावल मेरा फेवरेट है? बस, मेरा तो इसी से हो जाएगा. मेरे लिए और कुछ मत बनाना.” वह ख़ुशी से सीटी बजाता लौट गया, तो नीरा हैरानी से उसे ताकती रह गई.
क्या लड़का है! कितने अधिकार से अपनी पसंद बताकर लौट गया. सीटी तो ऐसे बजा रहा है, जैसे उसका अपना घर हो और क्या कहकर बोला था- यार… यह वह मुझसे बोला था या पराग से? क्या भाषा हो गई है आजकल के लड़कों की? लगता है, घर में कोई रोकने-टोकनेवाला ही नहीं है. जाने दो आज इसे, फिर पराग की ख़बर लेती हूं. जाने कैसे-कैसे दोस्त बना रखे हैं? पर पराग बेचारे का भी क्या दोष? सर ने जिसके संग काम करने को दिया है, उसके संग ही करना पड़ेगा न? दोष तो सारा अभिभावकों का है, जो शुरू से ही बच्चे को नियंत्रण में नहीं रखते. फिर बड़े होकर वे आवारा सांड की तरह इधर-उधर मुंह मारते-फिरते हैं और पिता से भी ज़्यादा दोष मैं मां को दूंगी, क्योंकि पिता यदि बच्चे का भौतिक संबल है, तो मां आत्मिक संबल. कद्दावर से कद्दावर शरीर भी तब तक उठकर खड़ा नहीं हो सकता, जब तक कि उसमें अंदर से उठने की प्रेरणा न जागे और यह प्रेरणा जगाती है मां. नीरा का मां के आत्ममंथन का पुराण जाने कब तक जारी रहता, यदि बीच में ही कुकर की सीटी न बजी होती. नीरा कुकर खोलकर राजमा मथने लगी.
“हूं… क्या ख़ुशबू है? पराग यार, कंप्यूटर बंद कर, जल्दी से आ जा. अब और सब्र नहीं हो रहा.” ख़ुुशबू सूंघता साहिल डायनिंग टेबल पर आकर जम गया था. मनपसंद चीज़ बनने पर अक्सर पराग भी ऐसा ही करता था. उसकी ऐसी हरकतों पर नीरा की ममता उमड़ पड़ती थी, लेकिन साहिल की ऐसी हरकत पर प्यार दर्शाने की बजाय वह मन ही मन खीझ उठी थी. ‘कैसा बेशर्म लड़का है. ज़रा भी सब्र नहीं है. जैसे पहली बार राजमा-चावल देख रहा हो.’
तब तक पराग रसोई में आकर खाना ले जा चुका था. “आप भी साथ ही आ जाइए न ममा. फिर अकेले खाना पड़ेगा.” पराग ने इसरार किया, तो नीरा की ममता उमड़ पड़ी. “कोई बात नहीं बेटा, तुम लोग आराम से गपशप करते हुए खाओ. मैं बाद में खाऊंगी.”
“तेरे पापा लंच पर नहीं आते क्या?” पहला चम्मच मुंह में ठूंसने के साथ ही साहिल ने प्रश्‍न उछाल दिया. इसके साथ ही कौर उसके गले में अटक गया और वह बुरी तरह खांसने लगा. तुरंत पानी का ग्लास भरकर उसे पकड़ाते हुए नीरा ग़ुस्से से बोल ही पड़ी, “मुंह में कौर हो, तो बोलना नहीं चाहिए, इतना भी नहीं सिखाया मां ने तुम्हें?”
साहिल ने तुरंत पानी का ग्लास होंठों से लगा लिया और एक ही सांस में खाली भी कर दिया. ग्लास रखने तक आंखों से आंसू निकलकर गालों तक आ गए थे. नीरा सब कुछ भूल दुपट्टे से उसके आंसू पोंछने लगी. “देखो, खांस-खांसकर कितना पानी आ गया है आंखों में? अब तुरंत यह एक चम्मच शक्कर फांक लो.” कहते हुए नीरा ने ज़बरदस्ती उसके मुंह में एक चम्मच शक्कर डाल दी. पराग हतप्रभ-सा कभी ममा को, तो कभी अपने दोस्त को ताक रहा था.
“अब वो ठीक है ममा.”
“हंह… हां.” नीरा भी स्वयं को संयत करती हुई कमरे की ओर बढ़ गई. मैं भी कुछ ़ज़्यादा ही ओवररिएक्ट कर जाती हूं. एक मिनट पहले इसी लड़के पर इतना ग़ुस्सा कर रही थी और दूसरे ही पल ज़रा-सी खांसी आ जाने पर उसी के लिए इतना फ़िक्रमंद हो गई.
नीरा कान लगाकर सुनने का प्रयास करती रही, पर डायनिंग टेबल से फिर किसी उत्साही सीटी का स्वर सुनाई नहीं पड़ा. बस, पराग की ही दबी-सी आवाज़ सुनाई देती रही. शायद बता रहा था कि पापा तो सवेरे ही खाने का डिब्बा लेकर निकल जाते हैं और देर रात घर लौटते हैं. स्कूल से लौटने के बाद उसका सारा समय मां के संग ही गुज़रता है. वे साथ खाना खाते हैं, साथ टीवी देखते हैं, शाम को बगीचे में साथ बैडमिंटन खेलते हैं. यहां तक कि जब वह होमवर्क और पढ़ाई कर रहा होता है, तब भी ममा पास ही बैठी कोई पुस्तक पढ़ रही होती हैं या बुनाई कर रही होती हैं.
“बड़ा लकी है यार तू! तेरे परीक्षा में इतने अच्छे नंबर कैसे आते हैं, अब समझ में आया.” वार्तालाप इसके बाद शायद थम-सा गया था, क्योंकि नीरा को स़िर्फ प्लेट-चम्मच की ही आवाज़ें आती रहीं. दोनों को ही शायद जल्दी खाना ख़त्म कर प्रोजेक्ट पूरा करने की चिंता लग गई थी. उनके स्टडी रूम में चले जाने के बाद नीरा ने उठकर खाना खाया और रसोई समेटकर लेट गई. कुछ ही पलों में वह नींद के आगोश में थी. आंख खुली, तो घड़ी देखकर चौंक उठी. ओह! चार बज गए. पराग को दूध देेने का समय हो गया. देखूं, उसका वह दोस्त गया या अभी यहीं जमा है. नीरा ने चुपके से स्टडी रूम में झांका, तो पाया कंप्यूटर बंद हो गया था यानी काम समाप्त हो गया था. पराग सब पेपर्स समेट रहा था और साहिल दीवार पर लगे उसके और विपुल के फोटो को बड़े ग़ौर से देख रहा था.
“यार पराग, तेरे मम्मी-पापा की लव मैरिज है या अरेंज्ड?”
“तुझे क्या लगता है?” पराग ने मज़ाक के मूड में पूछा.
“यार, तेरी मम्मी जितनी सुंदर और यंग लगती हैं न, लगता है तेरे पापा ने उनसे लव मैरिज ही की होगी.”
साहिल के जवाब से ख़ुुश होने की बजाय न जाने क्यों नीरा चिढ़-सी गई. “नहीं, अरेंज्ड मैरिज है हमारी. कोई प्रॉब्लम?” तीर की तरह नीरा एकदम सामने आई, तो दोनों दोस्त भौंचक्के-से रह गए.
“म… मैं निकलता हूं.” साहिल ने जल्दी से अपने पेपर्स उठाए और बाहर निकल गया. पराग उसे रोकता ही रह गया. नीरा फिर से अपने कमरे में जाकर लेट गई. उसका सिर यह सोचकर भारी होने लगा था कि अभी पराग अंदर आएगा और उस पर ग़ुस्सा होगा कि उसने उसके दोस्त का अपमान क्यों किया? पराग आया.
लेकिन यह क्या? नीरा हैरान रह गई, वह ग़ुस्सा होने की बजाय शर्मिंदगी महसूस कर रहा था. “आपको साहिल पसंद नहीं आया न ममा…? दरअसल, ग़लती उसकी भी नहीं है. शुरू से ही हॉस्टल में रहा है. उसे पता ही नहीं घर पर कैसे रहना चाहिए. उसके मम्मी-पापा की लव मैरिज थी. साहिल के पैदा होने के कुछ वर्ष बाद ही उनमें तलाक़ हो गया. दोनों दूसरी शादी करना चाहते थे, इसलिए कोई उसका संरक्षण लेने को भी तैयार न था. उसके पापा को जबरन उसे रखना पड़ा, तो उन्होंने उसे हॉस्टल में डाल दिया. वह तो छुट्टियों में भी घर जाने से कतराता है. अभी भी प्रोजेक्ट के बहाने रुक गया था, तो मैं उसे घर ले आया. अब आगे से…”
“आगे से जब भी छुट्टी हो, उसे तुरंत घर ले आना. मुझसे पूछने की भी ज़रूरत नहीं है. दरअसल… मुझसे ही उसे समझने में भूल हो गई.” नीरा ने कहा, तो पराग ख़ुशी से मां से लिपट गया.
नीरा सोच रही थी कि हर कहानी को हूबहूू यथार्थ के सांचे में फिट करने का प्रयास करना नादानी है. हां, कहानी से सबक लेकर यथार्थ को सुंदर बनाने का प्रयास करना बुद्धिमानी है. एक कहानी की सार्थकता भी वस्तुतः इसी में है.
anil mathur
       अनिल माथुर

 

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हिंदी कहानी- लविंग मेमोरी (Hindi Short Story- Loving Memory)

Kahani Short Story Loving Memory

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मैं सोचने लगी- यह एकदम कैसा बदलाव आ गया विजय पाल में. प्रायश्‍चित के किस क्षण ने उनकी आंखों पर पड़ा परदा हटा दिया था. मन में उगे ईर्ष्या और अविश्‍वास के झाड़-झंखाड़ को जला डाला था. लेकिन वह तरुणा से अपना मन बदलने की बात क्यों छिपाना चाहते हैं? क्या पुरुष का थोथा अहम् उन्हें अब भी जकड़े हुए है? उन्हें तरुणा की दृष्टि में अपने छोटे होने का भय सता रहा है? क्या यह प्रायश्‍चित वह जूही के जीवित रहते हुए नहीं कर सकते थे?

 

अक्सर स्कूल से लौटते ही रचना पहले अपने जूते उतारकर, हाथ धोकर, बस्ता तथा दूसरी चीज़ें ठीक जगह पर रखकर मेरे पास आती है और उसका पहला सवाल होता है… आज खाने में क्या मिलेगा? लेकिन आज ऐसा नहीं हुआ. वह सीधी मेरे पास चली आयी. मैंने आश्‍चर्य से उसकी ओर देखा. वह हाथ में एक क़िताब पकड़े हुए थी. नज़रें मिलते ही उसने क़िताब मुझे थमा दी. फिर पन्ने पलटकर एक जगह उंगली टिकाकर मेरी ओर देखने लगी, बोली कुछ नहीं.

मेरी नज़रें उसकी उंगली पर टिक गईं- उस पृष्ठ पर एक लड़की का चित्र छपा हुआ था. बड़ी-बड़ी आंखें, दुबला चेहरा, होंठ सख़्ती के साथ आपस में सटे हुए. उम्र में रचना जितनी ही लग रही थी. फ़ोटो के नीचे एक पंक्ति छपी हुई थी. ‘इन लविंग मेमोरी ऑफ़ जूही… मिसेज़ तरुणा पाल.’
मैंने कहा- “अभी देखती हूं, आओ पहले कुछ खा लो.”
“नहीं, अभी खाने का मन नहीं है.” रचना ने कहा. उसकी उंगली अभी तक चित्र पर टिकी हुई धीरे-धीरे हिल रही थी. मैंने रचना को बांहों में भर लिया. उसके कपोल मेरे होंठों से छू गए. कुछ गीला-गीला लगा…
“अरे, क्या हुआ?” मेरे इतना कहते ही उसके शरीर का कंपन मेरे अंदर पहुंचने लगा. वह सुबक रही थी. मैंने रचना की पीठ थपथपा दी. उसे बांहों में लेकर प्यार करने लगी.
रचना धीरे-धीरे बता रही थी कि यह जूही का चित्र है, जो उसके स्कूल की छात्रा है और दूसरे सेक्शन में पढ़ती है. रचना कह रही थी- “मम्मी, मेरी कभी जूही से बात नहीं हुई. बस प्रेयर या आधी छुट्टी के समय कभी-कभी दिखार्ई दे जाती थी. एक दिन वह प्रेयर के समय बेहोश होकर गिर गई थी. तब प्रिंसिपल ने उसकी मां को बुलाया था. बीच में काफ़ी समय से मैंने उसे नहीं देखा.”
“शायद बीमार रहने के कारण स्कूल नहीं आ रही होगी.” मैंने कहा.
“और फिर सुना.. कि…. ” रचना आंसू पोंछने लगी.
“यह क़िताब तुम्हें कहां मिल गई?”
“लायब्रेरीवाली मैडम ने दी है.” कहकर रचना चुप हो गई. मैंने देखा उसकी आंखें छत पर टिकी थीं- गहराई से सोच रही थी कुछ. कुछ देर बाद रचना को नींद आ गई. मैं क़िताब उठाकर फिर से जूही का चित्र देखने लगी. मन में बार-बार एक ही विचार आ रहा था- जूही की मां तरुणा पाल को कितना दुख हुआ होगा. क्या हुआ होगा नन्हीं जूही को? मुझे याद था, एक बार जब रचना बीमार हो गई थी और काफ़ी समय तक स्कूल नहीं जा सकी थी तो मेरा मन कितना डरा-डरा रहता था. रचना सो रही थी और मैं सोच रही थी- कैसी होंगी मिसेज़ पाल.
दो दिन बाद मैं रचना के स्कूल गई. मैंने रचना से इस बारे में कुछ नहीं कहा था. दूसरी क्लासेस चल रही थीं, इसलिए लायब्रेरी में बस लायब्रेरियन ही बैठी थी. मैंने अपना परिचय दिया. उसका नाम सुलभा पांडे था. मैंने क़िताब दिखाकर जूही के बारे में पूछा तो उसकी आंखें भी गीली हो गईं. बोली- “बहुत अच्छी बच्ची थी. लायब्रेरी के पीरियड में क़िताब लेने अवश्य आती थी. देखने में ही बीमार लगती थी, चुप-चुप रहती थी. एक-दो बार मैंने बात करनी चाही, पर वह ज़्यादा कुछ नहीं बोली. फिर मैंने सुना कि जूही नहीं रही. सुनकर मन बहुत देर तक ख़राब रहा. मैंने कई बार उसे मां के साथ स्कूल में देखा था.”
सुलभा ने आगे बताया कि कैसे एक दिन जूही की मां तरुणा पाल लायब्रेरी में आई थीं. उन्होंने कहा था कि वह जूही की स्मृति में कुछ क़िताबें लायब्रेरी को देना चाहती हैं. “मैंने तरुणा पाल को प्रिंसिपल से मिलवा दिया था. फिर उन्होंने दो हज़ार रुपये दिये थे क़िताबों के लिए. इस बीच उनका कई बार आना हुआ. आज रचना जो क़िताब ले गई थी, यह उन्हीं पुस्तकों में से है.”
कुछ देर मौन छाया रहा. मैंने कहा- “क्या मैं जूही की मां से मिल सकती हूं?”
सुलभा ने कहा- “मिलेंगी तो उनके साथ-साथ आपको भी दुख होगा. रहने दीजिए.” पर मेरा मन नहीं मान रहा था, मैंने कहा- “अच्छा! आप मुझे उनके घर का पता तो दे दीजिए. हो सकता है मैं न जाऊं, पर कभी…”
सुलभा ने मुझे जूही के घर का पता दे दिया. कई दिन बीत गए. जब भी जाने की सोचती तो सुलभा पांडे की सलाह याद आ जाती और मेरे बढ़ते क़दम रुक जाते. फिर जाने का मन हुआ तो पाया कि पता लिखी हुई चिट न जाने मैंने कहां रख दी थी.

एक दिन सफ़ाई करते समय अलमारी के पीछे गिरी वही चिट मिल गई, तो मैं ख़ुद को जाने से नहीं रोक सकी. तरुणा पाल के घर पहुंची, तो चार बज रहे थे. अब लग रहा था कि शायद मुझे नहीं आना चाहिए था. मृत जूही के बारे में उसकी मां से बातचीत उनका दुख ही बढ़ाएगी.
कॉलबेल बजाई, तो एक पुरुष ने दरवाज़ा खोला. उनकी आंखों में अपरिचय का भाव देख मैंने अपना नाम बताया और कहा- “मैं मिसेज़ तरुणा पाल से मिलने आई हूं.”
उन्होंने कहा- “आइए, अंदर आइए. तरुणा तो इस समय घर पर नहीं है. मैं हूं विजय पाल.”
विजय पाल यानी तरुणा पाल के पति और मृत जूही के पिता यह जानना चाह रहे थे कि मैंने आने की तकलीफ़ क्यों की थी. मैंने उन्हें रचना के बारे में बताया, फिर क़िताब खोलकर दिखाई- “हालांकि मैं जूही से कभी नहीं मिली, पर मुझे लगा…” मैं अपना वाक्य पूरा नहीं कर सकी. मैंने देखा मि. पाल ने क़िताब उठा ली थी और ध्यान से उस पृष्ठ को देख रहे थे.
कमरे में जैसे एक अशोभनीय मौन छा गया. मि. पाल की नज़रें अपलक जूही के चित्र पर टिकी थीं जैसे उन्हें यह याद ही नहीं रह गया था कि मैं भी उसी कमरे में बैठी थी. मैंने उनके शब्द सुने- “पर…. मैंने तो नहीं दीं ये क़िताबें…….”
उनकी प्रतिक्रिया सुनकर मैं चौंक गई, पर शायद वह ठीक ही कह रहे थे, क्योंकि जूही के चित्र के नीचे छपी पंक्ति में केवल तरुणा पाल का ही नाम था. विजय पाल का नाम नहीं था. उनकी ओर देखती हुई मैं सोच रही थी, आखिर क्यों नहीं था उसका नाम? इसके बाद विजय पाल ने क़िताब वापस मेरे हाथों में थमा दी. उनकी ख़ामोशी मुझे असहज बना रही थी. मैं क्षमा मांगकर उठ खड़ी हुई. विजय पाल ने कुछ नहीं कहा. बस, बाहरी दरवाज़ा खोलकर एक तरफ़ खड़े रहे. क्या यह साफ़ नहीं था कि मुझे वहां नहीं आना चाहिए था? अपने पीछे ज़ोर से दरवाज़ा बंद होने की आवाज़ ने मुझे कुछ चौंका दिया. तभी सामने से एक महिला आती दिखाई दी. उन्होंने मेरी ओर प्रश्‍न सूचक दृष्टि से देखा तो मैंने बता दिया कि मैं कौन हूं और क्यों आई थी.
इतना सुनते ही उनकी आंखों में आंसू आ गए. उन्होंने कहा- “मैं तरुणा हूं, आइए…..” मेरे हाथ पर कसी उनकी उंगलियों में थरथराहट थी. वह मुझे फिर से अंदर ले जाना चाहती थीं. मैंने धीरे से हाथ छुड़ा लिया. “मैं फिर कभी आऊंगी.”
“आइएगा, ज़रूर आइएगा…” तरुणा पाल ने कहा. उनके कपोलों में आंसुओं का गीलापन था और आंखें लाल हो गई थीं. मुझे लायब्रेरियन सुलभा पांडे की बात याद आ रही थी- ‘मिलेंगी तो उनके साथ आपको भी दुख होगा. रहने दीजिए.’ उन्होंने एकदम ठीक सलाह दी थी. अगर विजय पाल के व्यवहार से मुझे अपना आना ग़लत लगा था, तो तरुणा के दुख ने कहीं अंदर तक छू लिया था मुझे. मैं उनके साथ बैठकर कुछ देर तक बातें करना चाहती थी, लेकिन… दोबारा आने की बात कहकर मैं तरुणा पाल के पास से चली आई थी.
एक बात बार-बार परेशान कर रही थी- आख़िर समर्पण की पंक्ति तरुणा पाल के नाम पर ही क्यों ख़त्म हो गई थी. क्या जूही के चित्र के नीचे विजय पाल का नाम नहीं होना चाहिए था? तरुणा पाल बेटी के दुख में इतनी शोकाकुल थीं और विजय पाल… मुझे उनके शब्द याद आए- “पर… मैंने तो नहीं दीं ये क़िताबें.” उनका वाक्य बार-बार कानों में गूंज रहा था. और फिर तरुणा पाल की आंसू भरी लाल आंखें सामने कौंधने लगीं.
फिर पता ही नहीं चला कि मेरे क़दम कब मुझे रचना की स्कूल लायब्रेरी में ले गए. शायद मैं सुलभा पांडे से उनकी सलाह न मानने के लिए क्षमा मांगना चाहती थी.
“मैंने इसीलिए तो आपको जाने से मना किया था.” फिर धीमे स्वर में बोलीं- “जूही को लेकर मिस्टर और मिसेज़ पाल के बीच सदा तनाव रहता था. यूं तरुणा पाल यहां कई बार आईं और उन्होंने अपने और विजय पाल के बारे में सीधे-सीधे कुछ बताया भी नहीं. पर जो कुछ टुकड़ा-टुकड़ा बातें मैंने सुनी थीं, वही काफ़ी थीं.” फिर मेरी ओर झुककर सुलभा ने लगभग फुसफुसाते हुए कहा- “जानती हैं, विजय पाल जूही को अपनी बेटी नहीं मानते थे. न जाने क्यों उनके मन में वहम बैठ गया है कि तरुणा पाल उनके प्रति सच्ची नहीं हैं. तरुणा पाल ने पति को बहुत बार समझाया, लेकिन…”
मैं सोच रही थी- तो इसीलिए दिवंगत जूही के चित्र के नीचे तरुणा के साथ विजय पाल का नाम नहीं है.
“पति-पत्नी के तनाव का सबसे ज़्यादा असर बेचारी जूही पर पड़ा था. शायद उसके अस्वस्थ रहने के पीछे इस बात का सबसे ज़्यादा प्रभाव रहा हो.” सुलभा पांडे कह रही थी.
कैसे सहा होगा मां-बाप के बीच के इस तनाव को जूही ने? शायद पिता की उपेक्षा का दंश उसे सदा ही प्रताड़ित करता रहा हो और यही उसकी बीमारी का सबसे बड़ा कारण भी हो. औरतों के बारे में पुरुषों के पास एक यही तो सबसे बड़ा और धारदार हथियार होता है. औरत बार-बार आहत-मर्माहत होने पर भी उस चक्रव्यूह में रहने पर विवश होती है. मेरा मन हो रहा था कि अभी तरुणा पाल के पास जाऊं और उनसे ढेर सारी बातें करूं. वह बात न करना चाहें तब भी जान लूं कि उन्होंने विजय पाल का विरोध क्यों नहीं किया? नन्हीं जूही को तिल-तिल करके क्यों मर जाने दिया- क्यों?
सोचा अनेक बार, मैं गई नहीं… जा नहीं सकी. इस बार सुलभा पांडे की सलाह नहीं थी, पर मैं जान रही थी कि मेरे प्रश्‍नों के तीर तरुणा पाल को कहीं गहरे घायल न कर दें. पति का अविश्‍वास सहते-सहते ही उन्होंने जूही को खो दिया था. इस दुख का कोई मरहम नहीं था, हो भी नहीं सकता था.
मैं तरुणा पाल से नहीं मिल पा रही थी, पर अंदर से कुछ बार-बार कचोटता था. समझ में नहीं आता था कि मुझे क्या करना चाहिए. जब मन ज़्यादा बेचैन हुआ तो मैं सुलभा पांडे के पास फिर जा पहुंची. मैं ख़ुद नहीं जानती थी कि आख़िर मैं उनके पास क्यों आई थी.
मुझे देखते ही सुलभा पांडे की आंखें चमक उठीं. बोलीं- “मैं आपके बारे में ही सोच रही थी?”
“वह क्यों?”
“असल में मेरे अलावा केवल आप ही हैं, जो तरुणा पाल के बारे में जानती हैं.”
मुझे अब महसूस हो रहा है कि आपकी सलाह न मानकर मैंने तरुणा के घाव कुरेदने के साथ ही अपने मन पर भी भारी बोझ बैठा लिया है.” मैंने कहा.
“नहीं-नहीं, ऐसी बात नहीं है. बल्कि आपका जाना शायद अच्छा ही रहा. मेरे मना करने पर भी आप गईं, शायद इसीलिए….” सुलभा ने कहा.
सुलभा पांडे की बात मुझे आश्‍चर्य में डाल रही थी. “साफ़-साफ़ कहिए- क्या बात है?”
सुलभा पांडे ने मेरी बात का जवाब नहीं दिया, बस एक साथ कई पुस्तकें खोलकर मेरे सामने रखती चली गईं- एक ही वाक्य कहते हुए- “देखिए… देखिए.”
मैंने देखा और देखती रह गई- एक-दो नहीं आठ-नौ तस्वीरें जूही की मेरे सामने थीं और समर्पण की पंक्ति कुछ ज़्यादा ही चमक रही थी.
“इन लविंग मेमोरी ऑफ़ जूहीः तरुणा पाल, विजय पाल.”
“यह क्या!” मैंने सुलभा पांडे की ओर देखा.
“हां, आपने ठीक देखा. तरुणा पाल के नाम के आगे विजय पाल का नाम- और यह किसी और ने नहीं, स्वयं विजय पाल ने अपने हाथों से लिखा है.”
“विजय पाल ने लिखा है अपना नाम! कब?” मेरी उत्सुकता बांध तोड़ रही थी.
सुलभा पांडे चमकती आंखों से मुझे देख रही थीं. “एक दिन एक व्यक्ति यहां आया और उसने कहा कि वह विजय पाल है- तरुणा पाल का पति, जूही का पिता.”
मुझे अपने कानों पर विश्‍वास नहीं हो रहा था.
सुलभा का स्वर गंभीर था. बोली- “आने के बाद कुछ देर विजय पाल चुपचाप बैठे रहे जैसे अपनी बात कहने के लिए शब्द तलाश रहे हों, फिर झिझकते हुए कहा कि वह जूही के चित्र के नीचे अपना नाम लिखना चाहते हैं. सुनकर मैं तो हैरान रह गई. अगर यह वही विजय पाल थे, तरुणा पाल के पति, तो फिर… फिर… लेकिन मुझे @ज़्यादा कुछ पूछना नहीं पड़ा. उन्होंने धीरे-धीरे मन की सारी परतें खोल दीं मेरे सामने. उनके शब्द अभी तक मेरे कानों में गूंज रहे हैं. ‘जूही को मैंने मारा है. तरुणा मेरे कारण ही परेशान है. काश, मैंने पहले समझ लिया होता.’ और उनकी आंखों से आंसू गिरने लगे.
मैं क्या कहती, चुप रही. फिर मैंने जूही को समर्पित सारी पुस्तकें अलमारियों से निकालकर उनके सामने रख दीं और वे तरुणा पाल के नाम के आगे अपना नाम लिखते चले गए. मैं चुपचाप देखती रही. भला कहती भी क्या. सब पुस्तकों पर अपना नाम लिखने के बाद विजय पाल ने कहा- ‘एक बात है, मेहरबानी करके मेरे यहां आने और इस तरह अपना नाम लिखने की बात तरुणा को मत बताइएगा.’
“क्यों?”
‘कुछ मत पूछिए. बोलिए, क्या मेरी बात रख सकेंगी? मैं आपके किसी प्रश्‍न का उत्तर नहीं दे पाऊंगा.’ मैं कुछ कहती, इससे पहले ही विजय पाल यहां से चले गए.” कहकर सुलभा चुप हो गई.
मैं सोचने लगी- यह एकदम कैसा बदलाव आ गया विजय पाल में. प्रायश्‍चित के किस क्षण ने उनकी आंखों पर पड़ा परदा हटा दिया था. मन में उगे ईर्ष्या और अविश्‍वास के झाड़-झंखाड़ को जला डाला था. लेकिन वह तरुणा से अपना मन बदलने की बात क्यों छिपाना चाहते हैं? क्या पुरुष का थोथा अहम् उन्हें अब भी जकड़े हुए है? उन्हें तरुणा की दृष्टि में अपने छोटे होने का भय सता रहा है? क्या यह प्रायश्‍चित वह जूही के जीवित रहते हुए नहीं कर सकते थे?
न जाने कितनी बातें चक्रवात की तरह दिमाग में घूम गईं और मैंने सुलभा के सामने रखी पुस्तकों में से एक पुस्तक उठा ली, जिस पर लिखा था- ‘इन लविंग मेमोरी ऑफ़ जूही- तरूणा पाल, विजय पाल.’
सुलभा ने मुझे पुस्तक उठाने से रोका नहीं, पर प्रश्‍नभरी आंखों से मेरी ओर अपलक देखती रही. मैं उसका प्रश्‍न समझ रही थी- क्या मैं फिर से तरुणा के पास जाने की सोच रही थी?
मैंने सुलभा की आंखों का प्रश्‍न वहीं रहने दिया और चली आई. लेकिन नहीं, घर पहुंचने से पहले ही मेरे पैर तरुणा पाल के घर की ओर बढ़ गए थे. क़िताब मेरे हाथ में थी. विजय पाल ने सुलभा से कहा था कि लायब्रेरी में आकर पुस्तकों पर तरुणा के आगे अपना नाम लिखने की बात रहस्य ही रहने दें, लेकिन मैं कुछ और सोच रही थी.
तरुणा का दरवाज़ा बंद है. मेरी उंगलियां कॉलबेल दबाने के लिए कसमसा रही हैं. मैं विजय पाल का रहस्य तरुणा को अवश्य बताऊंगी. शायद तब तरुणा की आंखों में उनका क़द छोटा होने के बदले कुछ बड़ा ही हो जाए. शायद जूही को लेकर उनका अपना संताप भी कुछ कम हो जाए. चाहे मरने के बाद ही सही, जूही को उसके पिता मिल गए थे. मेरी उंगली कॉलबेल दबा चुकी थी.

– छवि गुप्ता

 

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कहानी- पासवाले घर की बहू ( Hindi Kahani – Paswale Ghar Ki Bahu ) | Hindi Short Story

कहानी- पासवाले घर की बहू

Pama-Malik

                  पमा मलिक

Hindi Short Story

वह आराम से आठ बजे सोकर उठती, चाय पीती, फिर नहा-धोकर सज-धजकर बैठ जाती. लोगों से चहक-चहककर बातें करती, क्योंकि मायका बगल में होने के कारण उसे माता-पिता से दूर होने का एहसास ही नहीं हुआ. ग्यारह-बारह बजे अपने कमरे में चली जाती और घंटों सोती रहती, केवल खाने व चाय के लिए निकलती. सुबह-शाम उसके भतीजे-भतीजी डिब्बा लिए हाज़िर रहते, ‘मम्मी ने दिया है, बुआ को बहुत पसंद है.’

बार-बार नाम लेकर पुकारने पर भी ऋषभ ने जवाब नहीं दिया. चाय ठंडी हुई जा रही थी, इसलिए विवश होकर मैं ही ऊपर पहुंच गई, जहां रिया अपनी छत पर खड़ी उससे बतिया रही थी. उनके प्रेमभरे ‘गुटर गूं’ में मेरे तीक्ष्ण स्वर “चाय पीनी है?” ने विघ्न डाल दिया. रिया वहां से टली नहीं, मुस्कुराकर बोली, “नमस्ते आंटीजी.” मैंने अभिवादन का जवाब दिया और पैर पटकती नीचे उतर आई, “बेशरम कहीं की, मां के सामने ही उसके बेटे से प्रेम की पींगें बढ़ा रही है, कोई लिहाज़-संकोच है ही नहीं.”
“मां, कहां है मेरी चाय?” नीचे आकर ऋषभ ने पूछा.
“देख ऋषभ, अब तू बच्चा नहीं है, एक ज़िम्मेदार बैंक ऑफिसर है. छत के उस कोने में खड़े तुम दोनों क्या खुसुर-फुसुर करते रहते हो? बचपन में साथ खेलते थे, मैंने ध्यान नहीं दिया. बड़े हुए तो एक ही कॉलेज में थे, सो मैं चुप रही, लेकिन अब, अब क्या बातें होती हैं?”
“मां, हमने बचपन से लेकर अब तक एक लंबा समय साथ में बिताया है, अब तो हमें एक-दूसरे से बात करने की आदत हो गई है. तुम व्यर्थ ही चिंता करती रहती हो. हमारे बीच ऐसा कुछ भी तो नहीं है. हम स़िर्फ बात ही तो करते हैं.”
“बात बढ़ते समय नहीं लगता.” मेरी भृकुटी में बल पड़ रहे थे. अपने योग्य, सुंदर बेटे की पड़ोस की साधारण-सी रिया से नज़दीकियां मुझसे बर्दाश्त नहीं हो रही थीं. ऋषभ के ‘कुछ भी तो नहीं है’ कहने पर भी मुझे विश्‍वास नहीं हुआ. रिया के बदले रुख पर मैं हैरान-परेशान रहती थी. आजकल आए दिन कभी पकौड़े की प्लेट, तो कभी अचार की शीशी लिए हाज़िर हो जाती थी.
ऐसे ही एक दिन वो घर पर आ धमकी. उसे देख मैंने कहा, “सूट तो बड़ा सुंदर है. इसे दिखाने आई थी या पकौड़े देने?”
“कुछ भी समझिए आंटीजी, वैसे कैसी लग रही हूं?”
“ठीक है.” मुझे कहना पड़ा, उसे देखकर ही मैं शंकाग्रस्त हो जाती. बचपन में दिन-रात साथ खेलते बच्चों को युवावस्था में अलग कर देना मुश्किल होता है.
हम तीन बहनों की संतानों में ऋषभ इकलौता था. पति के खानदान में भी वह सबसे बड़ा और लाड़-प्यार से पला था. उसकी शादी को लेकर हम सबने बड़े सपने संजोए थे, किंतु हमारे सारे अरमानों पर पानी फिर गया. जल्दी ही ऋषभ ने रिया से विवाह की घोषणा करके हम सबको गहरा आघात दिया. हज़ारों कमानेवाले ऋषभ की अकेली विवाहिता बहन रागिनी ने इसका पुरज़ोर विरोध किया. मैंने तो घर छोड़कर जाने की धमकी तक दे डाली, पर ऋषभ प्रभावहीन रहा. बोला, “आप घर छोड़कर क्यों जाएंगी? मैं ही अलग हो जाऊंगा. बस, रिया से शादी करवा दीजिए.”
“करवा दूंगी. सारे निर्णय तो ख़ुद ले चुका है. शादी भी कर ले.”
“ठीक है, कोर्ट-मैरिज कर लेता हूं. मुझे तो आपके विरोध का कारण समझ नहीं आ रहा है. हमारी जाति की है, पढ़ी-लिखी,
धनी परिवार की है और सबसे बड़ी बात मुझे पसंद है.”
“मैंंने जैसी बहू की कल्पना की थी, वो वैसी नहीं है. सिर चढ़ी- नखरैल, पता नहीं क्या देखा तूने उसमें?”
“शादी तो मुझे करनी है, मुझे पसंद है वह.”
“भइया! आपको मम्मी से ऐसे बात नहीं करनी चाहिए.”
“तू चुप रह, मम्मी की चमची. अभी दो दिन में संदीप के पास चली जाएगी. तूने भी तो की थी अपनी पसंद से शादी, मैंने कोई विरोध
किया था?”
रागिनी चुप हो गई, उसने भी प्रेमविवाह किया था, लेकिन मैंने उसमें अपनी सहमति दी थी. मैं कुछ बोलती उससे पहले ऋषभ के पापा बोले, “ऋषभ की शादी रिया के साथ ही होगी. जवान लड़का घर से चला जाए, यही चाहते हो क्या तुम लोग? यह सब मैं नहीं होने दूंगा. अब कोई एक शब्द नहीं बोलेगा. शादी की तैयारी करो.”
उसके बाद सबने चुप्पी साध ली. शादी, बारात तक मैं बिल्कुल शांत रही. मुंह दिखाई में पांच तोले का हार दिया, लेकिन यह देखकर मेरा मुंह उतर गया कि रिया के माता-पिता ने दान-दहेज काफ़ी कम दिया था. हालांकि बारातियों का स्वागत बढ़िया था. रिया की व्यक्तिगत सभी चीज़ें अच्छी क्वालिटी की थीं, पर हर पारंपरिक सास जैसे घर के अन्य सदस्यों व वर के लिए कीमती गिफ्ट व नक़द की अपेक्षा करती है, मैं भी कुछ उसी तरह की अपेक्षाएं पाले बैठी थी, पर ऋषभ के पिता का सख़्त निर्देश था कि मुंह खोलकर कोई मांग नहीं की जाएगी. बहरहाल, रिया बहू बनकर हमारे घर आ गई. जब तक घर रिश्तेदारों से भरा था, मैंने उसे आराम करने दिया. वह आराम से आठ बजे सोकर उठती, चाय पीती, फिर नहा-धोकर सज-धजकर बैठ जाती. लोगों से चहक-चहककर बातें करती, क्योंकि मायका बगल में होने के कारण उसे माता-पिता से दूर होने का एहसास ही नहीं हुआ. ग्यारह-बारह बजे अपने कमरे में चली जाती और घंटों सोती रहती. केवल खाने व चाय के लिए बाहर निकलती. सुबह-शाम उसके भतीजे-भतीजी डिब्बा लिए हाज़िर रहते, ‘मम्मी ने दिया है, बुआ को बहुत पसंद है.’ ‘दादी ने फूफाजी के लिए भेजा है.’
उन डिब्बों के स्वादिष्ट व्यंजनों से मुझे परहेज़ न था, लेकिन ‘फूफा-बुआ मात्र’ की भावना चुभ जाती. जिस दिन ऋषभ-रिया नैनिताल जा रहे थे, रिया ने आकर मुझसे कहा था, “आप परेशान मत होइएगा, मेरी मम्मी ने रास्ते के लिए खाना बना दिया है.”

वे दोनों हनीमून रवाना हो गए. रिश्तेदार भी जा चुके थे. रागिनी ने जाने से पहले मुझसे कहा, “वहां से लौटकर आएं, तो भाभी से खाना बनवाना शुरू कर दीजिए, वरना ज़िंदगीभर आप उसे बिठाकर खिलाती रहेंगी.”
“हां, और क्या उसे तो करना ही है.” मैंने कह तो दिया, लेकिन मन ही मन असमंजस में भी थी. कुछ दिनों बाद ऋषभ-रिया लौटकर आए. काफ़ी गिफ्ट्स, मेवे-मिठाइयां लेकर आए थे. रिया शाम को ही मायके जाकर काफ़ी कुछ दे आई.
“अब तुम दोनों आराम करो. ऋषभ, कल तुम्हें बैंक जाना है. रिया, कल का नाश्ता तुम्हें बनाना है. इंतज़ाम मैं कर दूंगी.” मैंने कहा.
रिया ने सिर तो हिला दिया, लेकिन आशंकित थी. दूसरे दिन नाइटी उतारकर सूट पहनने और ब्रश करने में ही उसने अच्छा-ख़ासा समय लगा दिया, फिर जिस मंथर गति से वह परांठा सेंकने लगी थी, लगा कि आज ऋषभ ऑफिस ही नहीं जा पाएगा. हारकर मुझे ही सब्ज़ी छौंकनी पड़ी. रसोई में काम करते हुए मैं उसे फुर्ती से काम करने की सलाह देती रही, जिसे वह अनमने भाव से सुनती रही.
अगले दिन उसे फ्राइड राइस और पनीर बनाना था. सारी तैयारियां करके मैंने उसे आवाज़ दी, तो पाया कि वह घर में कहीं है ही नहीं. अचानक सीढ़ियों पर उसके पदचाप ने मुझे सतर्क किया. वह हाथ में एक बड़ा डिब्बा लिए उतर रही थी.
“मम्मीजी! मेरी मम्मी ने आलू दम और पूरियां भेजी हैं. सुबह का नाश्ता हो जाएगा.”
“तुम दोनों का तो हो जाएगा, पर हमारा नहीं. कब तक कुछ सीखने की जगह डिब्बा लाती रहोगी. अब छोड़ो यह सब.”
लेकिन रिया ने मेरी एक न सुनी. छत पर उसका मायकेवालों से लेन-देन चलता रहा. कभी-कभी तो वह कचौड़ी, हलवा-पोहा का डिब्बा लिए अपने कमरे में चली जाती और खा-पीकर छत से डिब्बा पुनः देने के अनुरोध के साथ लौटा दिया जाता. उसका पेट भरा रहता, तो खाना बनाने में उसकी दिलचस्पी कम रहती. मुझे ग़ुस्सा आता, लेकिन कुछ कह न पाती. ऋषभ की शह जो मिल रही थी उसे. नई-नवेली अर्द्धांगिनी के सौ ख़ून माफ़ होते हैं, लेकिन असली ग़लती रिया की मां कर रही थीं, सो एक दिन बिना पूर्व सूचना के मैं उनके घर पहुंच गई. मेरी गंभीर मुखमुद्रा से वे तनिक विचलित दिखीं. ख़ूब आवभगत हुई, उसी दौरान मैंने कहा, “आपने रिया को कामकाज नहीं सिखाया, कोई बात नहीं, लेकिन छतों से डिब्बे देना, लड़की को ‘केवल मैं और मेरा पति’ का पाठ पढ़ाना, क्या यह उचित है?”
“अरे बच्ची है, जो कुछ उसे पसंद है घर में बनता है, तो दे देती हूं. धीरे-धीरे सब सीख जाएगी.”
“धीरे-धीरे उसमें अलगाव की प्रवृत्ति आ जाएगी. वह आप पर निर्भर हो जाएगी और कभी अपने घर के प्रति समर्पित न होगी.”
“आप बहुत आगे की सोच रही हैं? एक मां की तरह सोचें, तो आपको लगेगा कि कुछ भी ग़लत नहीं हो रहा है.”
रिया की मां अपनी बात पर अड़ी रहीं. मैंने गहरी सांस ली और जाने के लिए उठ खड़ी हुई. बाहर तक मुझे रिया की भाभी छोड़ने आई. उसने कहा, “आप चिंता न करें, वह घर की छोटी है, इसलिए दायित्व-भाव नहीं है, लेकिन शादी के बाद यह भाव हर स्त्री में ज़रूरी है, वरना वह उस परिवार से जुड़ नहीं पाएगी. मैं उसे समझाऊंगी.”
मैं घर वापस आ गई, रिया ने इधर एक नई रट लगा रखी थी कि वह नौकरी करना चाह रही है. घर से सहमति मिलने पर उसने एक स्कूल में नौकरी कर ली. अब वह भी ऋषभ के साथ टिफिन लेकर निकल जाती. दोपहर में बना-बनाया मेरे द्वारा परोसा खाना खाकर सो जाती. शाम की चाय मैं ही बनाती. चाय पीकर वह खाने के लिए पूछती तो ज़रूर, पर बस रोटियां बनाकर चलती बनती.
कभी-कभी सब्ज़ी, चटनी या रायता आदि बनाती. इसके बाद सब मुझे ही समझाते, “अरे जैसा बना है, खा लो. सब पेट में ही तो जाएगा. तुम सोचती हो, वह अभी से तुम्हारी तरह एक्सपर्ट हो जाएगी.”
“पापा ठीक कहते हैं मां.” ऋषभ बोलता.
रिया उनकी कृतज्ञ रहती और मुझसे कुपित. रात में कहती, “मैं रोटियां बना दूंगी, सलाद काट दूंगी, बाकी मेरे हाथ की बनी सब्ज़ी तो आपको पसंद नहीं आएगी.”
अब मैं घर में मुफ़्त की नौकरानी थी. तीनों टाइम खाने की व्यवस्था, घर की सफ़ाई और सजावट, महरी के पीछे-पीछे घूमना, मैं चाहकर भी उससे कुछ न कह पाती. वह हमेशा मुझसे एक निश्‍चित दूरी बनाकर रखती. घर में एक और औरत के आ जाने से मेरी अपेक्षा बनी रहती कि रिया मेरी कुछ मदद करे. इसके लिए विरोध स्वरूप कभी सिरदर्द, तो कभी कमरदर्द का बहाना बनाकर पड़ी रही कि रिया कुछ करे, लेकिन इसका विपरीत प्रभाव पड़ा. उसके घर से सुबह-शाम टिफिन आने लगे, वह टिफिन लेकर स्कूल जाती, वहां से लौटकर सीधे मायके जाती, खा-पीकर लौटती. कभी-कभी स्कूल में काम ज़्यादा होने पर मायके ही रुक जाती. अब घर में एक अलग ही सुगबुगाहट शुरू हो गई थी कि रिया ऋषभ के साथ अलग रहने की योजना बनाने लगी है, कहीं और, जहां से ऋषभ का बैंक पास पड़ता हो. मैं यह सब बातें सुनकर सन्न रह गई. ऋषभ से पूछा तो उसने इसे हल्के में लिया, “मम्मी! मैं रिया के योजनानुसार तो नहीं चलूंगा. हां, उसके पापा का फ्लैट है, तो दो-चार दिन जाकर रह सकते हैं.”
ऋषभ से बात करके कुछ तसल्ली हुई. छत पर कपड़े सुखाते रिया की भाभी से बात हुई, वह चुपचाप ननद की योजनाओं को सुनती रही, लगा जैसे किसी अलग ही सोच में गुम है.
रिया की मेरे प्रति बेरुखी से मैं आहत थी. मैं भी आदर्श सास बनने में असमर्थ थी, सो उससे कुछ कहना भी मैंने छोड़ दिया, लेकिन इधर कुछ दिनों से मुझे रिया खोई-खोई-सी लगती. उसका चहकना, उछलना-कूदना, उधम मचाना सब बंद हो गया था. कुछ सोचती रहती, उसने छत के चक्कर लगाना और टिफिन लाने का क्रम भी रोक दिया था. सुबह उठकर चाय, खाना सबके लिए बनाती, अपना टिफिन लेकर मुंह लटकाए चली जाती. लौटने पर मायके न जाकर सीधे घर आती. दोपहर का दाल-चावल बनाने में मदद करती. परोसती, बटोरती, शाम को जल्दी सोकर उठ जाती. घर व्यवस्थित करती. मैं चाय बनाती, तो उदास चेहरा लिए बगल में खड़ी रहती. चाय पीकर स्कूल का काम करती. रात का खाना बनाने जाती, तो तुरंत किचन में पहुंच जाती, “आप आराम करें, मैं खाना बना लेती हूं.”
“जैसी तुम्हारी इच्छा.” मैं उल्टे पांव लौट आती. वह मसाला पीसती, भरसक स्वादिष्ट सब्ज़ी बनाने का प्रयास करती, पतली रोटियां सेंकती, कोई मीठा ज़रूर बनाती. इस दौरान बराबर मेरा मुंह ताकती रहती कि मेरी प्रतिक्रिया क्या है. मैं उसमें सकारात्मक परिवर्तन से आश्‍चर्यचकित थी. कहती, “रिया, आज की सब्ज़ी अच्छी बनी है.” तो वह ख़ुश हो जाती, “थैंक्यू मम्मीजी.”
मेरी उत्सुकता बढ़ गई. एक दिन मैंने रिया के स्कूल जाने पर ऋषभ को पकड़ा, “मामला क्या है ऋषभ? जिस लड़की को मैं समझा-समझाकर थक गई, उसमें अचानक इतना परिवर्तन कैसे आ गया?”
“मां, उसकी कुछ फैमिली प्रॉब्लम है.”
“अच्छा, अब तू सीधे शब्दों में बता, बातें घुमा-फिराकर कहना छोड़.”
“उसकी भाभी जो सब काम-धाम करती थी और भइया जो एकमात्र कमानेवाले मेंबर हैं, उन लोगों ने अलग रहने का निर्णय ले लिया है. रिया कुछ समझाने की कोशिश करती है, तो भाभी हत्थे से उखड़ जाती हैं कि तुम अपने ससुराल में क्या कर रही हो, जो मैं यहां मरती रहूं. रिया की मां दिन-रात रोती रहती हैं, इसलिए वह बहुत परेशान रहती है.”
“रिया ने कुछ चर्चा करने से मना किया है. वह यह सब सोच-सोचकर हलकान है कि उसके मां-बाप कैसे अकेले रहेंगे, घर का ख़र्चा कैसे चलेगा? रात में वह ठीक से सोती भी नहीं.”
“ओह! यह बात है.” मेरे मन में भी बहुत सारी बातें उठीं, लेकिन मैं चुप रही. रिया का घर के कामों में मन न लगना, अकेले रहने की बात करना, फिर अचानक एक सुखद परिवर्तन, लेकिन यह परिवर्तन भी उसकी भाभी के अलगाववादी नीतियों के कारण हुआ, जो ठीक नहीं था. रिया ने जो कुछ यहां किया था, वही सब कुछ जब उसकी भाभी ने किया, तो वह परेशान हो गई.
मैंने चुप्पी साध ली थी. रिया स्वयं मेरे नज़दीक आने की कोशिश करने लगी. स्कूल और घर दोनों संभालनेवाली बहू के प्रति मेरे मन में सहानुभूूति उमड़ने लगी. मैं उससे बोलने-बतियाने लगी. वही सारी बातें जब उसने मुझे बताईं, तो मैंने उसे समझाया कि यह सब कुछ दिनों की मुश्किलें हैं. कटुता कम होने पर सब ठीक हो जाएगा.
“नहीं मम्मीजी! भाभी मेरे बूढ़े मां-बाप को छोड़कर जाने की बात कहने लगी हैं. भइया की सैलरी से ही तो घर चलता है. भाभी मुझे अपने दोनों बच्चों बंटी-नेहा जैसा मानती थीं, इसीलिए तो मैं भी मायके से जुड़ी थी, अब न जाने क्यों उनमें ऐसा परिवर्तन आ गया. मुझे भी आप सबसे न निभा पाने का ताना देती रहती हैं.”
मैंने उसे दिलासा देने के लिए कंधे पर हाथ रखा, तो वह मुझसे लिपट गई. मेरा मन भीग गया. लगा रागिनी मेरे गले लगकर खड़ी है.
“मम्मीजी, मैंने भी इस घर और आप सबके प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वाह नहीं किया. यह नहीं सोच पाई कि मैं जो कुछ अपनी भाभी से अपेक्षा कर रही हूं, वैसी ही आशा आप सब भी मुझसे करते होंगे. जीवन का केवल एक पक्ष देखा था मैंने, लेकिन अब मैं सब कुछ समझने लगी हूं.”
मैंने उसे सांत्वना दिया. आगे संक्षेप में यह कि अब मैं पति, पुत्र, बहू के साथ सानंद जीवनयापन कर रही थी. एकाध महीने बाद सुना कि रिया के मायके में भी सब कुछ ठीक हो गया है. रिया की भाभी ने अलग होने की रट छोड़ दी है और सास के साथ मेल-मिलाप पूर्वक रहने लगी है. उसका बार-बार रूप बदलना मुझे आश्‍चर्यजनक लगा, लेकिन एक दिन छत पर सूखे कपड़े समेटते बगल की छत पर रिया की भाभी खड़ी दिखी. उसने पूछा, “आंटीजी! घर में सब ठीक है न?”
“हां, अच्छा चल रहा है. तुम बताओ तुम्हारे परिवार में सब कुशल मंगल है न?”
“यहां तो हमेशा ही कुशल मंगल था.”
“लेकिन मैंने तो सुना था कि…”
उसने होंठों पर उंगली रखकर चुप रहने का इशारा करते हुए पास बुलाया और बोली, “हमारे परिवार में कुछ भी गड़बड़ नहीं थी. वह तो मैंने और मेरी सास ने मिलकर गृह-कलह का नाटक किया था, ताकि रिया को अपने दायित्वों का एहसास हो.”
मेरी आंखें बड़ी-बड़ी हो गईं. स्वयं को संभालकर मैंने दबे स्वर में कहा, “बेटी! मैं किस प्रकार तुम्हें धन्यवाद दूं, समझ में नहीं आ रहा है. तुमने मेरे घर की ख़ुशी के लिए स्वयं को बुरी साबित करने का प्रयास किया.”
“कोई बात नहीं आंटी. मेरे सास-ससुर तो सब जानते हैं, अभी रिया को कुछ नहीं पता चलना चाहिए. बाद में जानने पर कुछ न होगा.”
“तुम ठीक कह रही हो, मैं उसे कानों-कान ख़बर नहीं होने दूंगी.” और हम दोनों नीचे उतर गए.
मैं कृतज्ञ थी, ज़िंदगी की गाड़ी हंसी-ख़ुशी, ग़म-मुसीबत लिए चलती रहती है, उसमें ठहराव नहीं आता, किंतु संतोष व कृतज्ञता के भाव तब उत्पन्न होते हैं, जब कोई शख़्स निःस्वार्थ भाव से दूसरों की मुश्किलें आसान करता है और गाड़ी पटरियों पर सरपट दौड़ने लगती है.

 

कहानी- मन की सुहागरात (Short Story- Maan Ki Suhagrat)

 

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