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पहला अफेयर: रूठ गया वसंत… (Pahla Affair: Rooth Gaya Vasant)

Pahla Affair, Rooth Gaya Vasant

Pahla Affair: Rooth Gaya Vasant

पहला अफेयर: रूठ गया वसंत… (Pahla Affair: Rooth Gaya Vasant)

क्यों रूठा हमसे बसंत
हमने तो सुदूर नीलांबर के इंद्रधनुष में
प्यार के कुछ रंग भरने चाहे थे
ज़माने की आंधी चली कुछ ऐसी
ज़िंदगी में हमेशा के लिए पतझड़ छा गया

फिर वसंत आ गया. बसंत का यह मौसम दिल में एक अजीब-सी हूक जगा देता है. कॉलेज के वो दिन आंखों के सामने घूम जाते हैं, जो मेरी ज़िंदगी में बहार लेकर आए थे.

मेरे लिए यह शहर भी अजनबी था और यहां के लोग भी. मैंने मेडिकल कॉलेज में प्रवेश लिया था. कॉन्वेंट स्कूल के सख़्त अनुशासन के पश्‍चात् यहां का सहशिक्षा वाला वातावरण उन्मुक्त प्रतीत हुआ. शुरू-शुरू में थोड़ी मुश्किलें ज़रूर आईं, पर जल्दी ही मैंने नए माहौल में अपने आप को ढाल लिया, कई साथी भी बन गए.

कॉलेज में सांस्कृतिक सप्ताह का आयोजन होनेवाला था. मेरे एक सहपाठी ने मुझसे उसके साथ युगल गान प्रतियोगिता में भाग लेने का अनुरोध किया. मैंने उससे स्पष्ट कहा कि मुझे गीत-संगीत सुनने का शौक़ तो बहुत है, किंतु मैं स्वयं अच्छा नहीं गा पाती हूं, इसलिए वह कोई और पार्टनर चुन ले. गायन प्रतियोगिता वाले दिन उस छात्र को जब एक ख़ूबसूरत छात्रा के साथ स्टेज पर गाते देखा तो न जाने क्यों कुछ अच्छा नहीं लगा. मुझे ईर्ष्या का अनुभव हुआ. फिर तो मैं भी नृत्य, नाटक, लेखन आदि प्रतियोगिताओं में भाग लेने लगी और इसके लिए अनेक पुरस्कार भी जीते. धीरे-धीरे मैंने उस लड़के से दोस्ती भी बढ़ा ली.

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हम दोनों में ख़ूब पटने लगी. एक गहरे आकर्षण के मोहपाश में हम बंधते चले गए. जूही-चंपा व गुलमोहर से हरी-भरी कॉलेज की बगिया हमारी मुलाक़ातों की मौन साक्षी बनी. एक-दूसरे के साथ के सिवाय हमें कुछ अच्छा ही नहीं लगता. साथ उठते-बैठते, लड़ते-झगड़ते कब हम भावी जीवन के मधुर स्वप्न देखने लगे, पता ही नहीं चला. मगर ख़्वाब देखते हुए शायद हम ये भूल गए कि हमारे समाज में जाति-पाति, वर्ग-भेद बहुत गहरा पैठा हुआ है.

परिवार की रज़ामंदी तो दूर, हमारे प्रेम पथ पर दुखों के कांटे बिछा दिए उन्होंने. जीवनभर अपने प्रियजनों से अलगाव झेलने का सामर्थ्य नहीं था हममें, न ही आर्थिक रूप से हम सक्षम थे कि समाज से दूर अपनी नई दुनिया बसा पाते. कठोर यथार्थ के दानव ने हमारा स्वप्न-लोक नष्ट कर दिया. हमारे ख़्वाब अधूरे रह गए. मेरा राजकुमार स़फेद घोड़े पर सवार हो मुझे ब्याहने नहीं आ पाया. अश्रुओं का अथाह सागर अंदर ही शुष्क हो गया. मैंने आजीवन अविवाहित रहने का निर्णय लिया और मेरे इस निश्‍चय को कोई नहीं डिगा पाया.
मेरा प्यार कहां है, कैसा है, यह जानने की भी हिम्मत नहीं जुटा पाई मैं. नेह के गुलाबों की सुरभित पंखुड़ियां मेरी स्मृतियों की क़िताब के पृष्ठों के बीच आज भी दबी हुई हैं. कभी अनजाने में मेरे पहले और अंतिम प्यार ने गीत गाते हुए जीवन की सच्चाई बयां कर दी थी.

जीवन के सफ़र में राही
मिलते हैं बिछड़ जाने को
और दे जाते हैं यादें
तन्हाई में तड़पाने को.

– डॉ. महिमा

शादीशुदा से प्यार अब परहेज़ नहीं (Having An Affair With Married Man?)

Having An Affair With Married Man
बदलते ज़माने के दौर में बहुत कुछ बदला है. पर सबसे अधिक जीने के नज़रिए में बदलाव आया है. एक व़क़्त था, जब शादीशुदा के प्यार (Having An Affair With Married Man) के बारे में ख़्याल को भी ग़लत माना जाता था, पर अब ऐसा नहीं रहा. आइए, इससे जुड़े विभिन्न पहलुओं पर एक नज़र डालें.

Having An Affair With Married Man

  • एक का हो गया, वह दूसरे का नहीं हो सकता. एक ज़माने में लोग ऐसा ही सोचते थे. इसीलिए एकदो दशक पहले तक ऐसी घटनाएं कम ही देखने को मिलती थीं कि किसी लड़की को शादीशुदा पुरुष से प्यार हो जाए. उस ज़माने में लड़कियों के बुनियादी स्त्रियोचित गुणों में सौतिया डाह का स्थान सर्वोपरि था. यह कल्पना करना मुश्किल था कि अविवाहित लड़की किसी अन्य स्त्री के पति के साथ प्यार की पींगे बढ़ा सकती है.
  • लेकिन स्त्री और पुरुष की इस बनावट और उनके संबंधों की बुनावट में पिछले कुछ अरसे से काफ़ी बदलाव आया है. आज लड़कियां न केवल शादीशुदा पुरुष को प्यार के क़ाबिल समझ रही हैं, बल्कि समाज भी ऐसे संबंधों पर ऐतराज़ करता नज़र नहीं आ रहा. समाज और जीवन के ये फ़लस़फे यूं ही नहीं बदल गए. इनके लिए देशदुनिया में हो रहे तमाम परिवर्तन ज़िम्मेदार हैं.

लड़कियों का कामकाजी होनाः शादीशुदा पुरुष के प्रति लड़की के झुकाव, लगाव और प्यार की सबसे बड़ी वजह आज के ज़माने में लड़कियों का कामकाजी होना है. किसी ऑफ़िस में काम करती लड़की सुबह 10 से शाम 5 बजे तक का समय अपने पुरुष सहकर्मी के साथ बिताती है. लंबे समय तक साथ काम करना, चाय पीना, लंच करना, हंसीमज़ाक जैसी रोज़मर्रा की घटनाएं चाहेअनचाहे दिलों को क़रीब लाती हैं. काम के दौरान एकदूसरे का सहयोग करने, सीखनेसिखाने, सुखदुख बांटने का सिलसिला कब प्यार में तब्दील हो जाता है, पता ही नहीं चलता. इसके अलावा करियर की सीढ़ियां चढ़ने की चाहत भी प्यार का चोला पहनकर आती है.

सीरियल, हॉलीवुड व बॉलीवुड का असरः भारतीय महिलाओं की मनःस्थिति में आए इस बदलाव में धारावाहिकों की भी ख़ास भूमिका रही है. आजकल हर धारावाहिक में मसाला डालने के लिए जो तानेबाने बुने जाते हैं, उनमें विवाहित पुरुषों से रिश्ते बनानेवाली नायिकाओं ने आम युवतियों को भी प्रेरित किया है. आज लड़कियां शादी से पहले अथवा शादी के बाद भी अपनी मर्ज़ी से ऐसा कोई क़दम उठाने में नहीं झिझक रही हैं.

भारतीय महिलाओं के मन को इस रूप में ढालने में दूसरी सबसे अहम् भूमिका बॉलीवुड और हॉलीवुड के सितारों की भी रही है. नायकनायिकाओं को अपनी पसंद की ज़िंदगी जीने और अपनी पसंद की स्त्री/पुरुष को चुनने की आज़ादी ने धारावाहिकों में चल रही काल्पनिक कहानियों पर सच्चाई की मुहर लगा दी है. बदलाव आपके सामने है. आज से दो दशक पहले कोई युवती शादीशुदा पुरुष के साथ संबंध बनाकर अपने घर तो क्या, दूर किसी शहर में भी रहने की नहीं सोच सकती थी जबकि आज ऐसे रिश्ते के बावजूद लड़कियां अपने परिवार में ही रह रही हैं और कहीं से भी विरोध के स्वर उठते नहीं दिखते.

ग्लोबलाइज़ेशन व सूचना क्रांतिः सूचना क्रांति और वैश्‍वीकरण ने सारी दुनिया को एक गांव की शक्ल दे डाली है. दुनिया की सारी संस्कृतियां एकदूसरे को काफ़ी नज़दीक से देख रही हैं. टीवी चैनलों पर दूरदराज़ की ख़बरें पलभर में हर जगह पहुंच जाती हैं. ऐसे में पश्‍चिमी सभ्यता के खुलेपन का असर भारतीय समाज पर भी पड़ा है और भारतीय युवाओं और युवतियों के मन में भी खुली हवा में सांस लेने की चाहत जागी है. वह अपनी पसंद के पुरुष के साथ जीवन जीना चाहती है. वह पुरुष अविवाहित है या विवाहित, इससे उसे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता.

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Having An Affair With Married Man
बड़े धोखे हैं इस राह में

नोएडा की एक मल्टीनेशनल कंपनी में कार्यरत जयचंद विवाहित है. उसकी पत्नी और बच्चे गांव में हैं. वह और उसके साथ काम करनेवाली वर्षा एक ही बिल्डिंग में रहते हैं. एक ही ऑफ़िस में साथसाथ काम करते हुए और एक ही बिल्डिंग में रहते हुए वर्षा न जाने कब जयचंद के मोहपाश में बंधकर उससे प्रेम करने लगी, वह जयचंद को अपना सर्वस्व मानने लगी. लेकिन क्या ऐसा जयचंद के साथ भी है? क्या वह भी वर्षा को उसी शिद्दत के साथ चाहता है? नहीं! वर्षा अब यह अच्छी तरह जान चुकी है. जिस प्रेम ने उसके अंदर कभी उमंगें भरी थीं, वह अब एक बोझ बनकर रह गया है. वर्षा इस असहनीय स्थिति से छुटकारा पाना तो चाहती है, लेकिन जयचंद से अलग होकर जीने की कल्पना भी नहीं कर सकती. इसलिए इस कशमकश भरे रिश्ते को प्यार के नाम पर निभाए जा रही है.

यह मात्र एक वर्षा और जयचंद की कहानी नहीं है. ऐसी न जाने कितनी वर्षाएं अपने प्यार से न जाने कितने जयचंदों की दुनिया हरीभरी कर रही हैं. लेकिन क्या उनकी अपनी दुनिया हरीभरी है, वे ख़ुद भी आश्‍वस्त होकर नहीं कह सकती हैं.

ज़ाहिर है, शादीशुदा पुरुष से प्यार की राह पर ख़तरे तो हर क़दम पर हैं, लेकिन ज़िंदगी की अजीब दास्तां का क्या ठिकाना? वह ऐसे मोड़ पर पहुंच सकती है, जहां कोई ऐसा मिल जाए, जो हो तो चुका हो किसी और का, पर बना आपके लिए है. ऐसे में क्या करेंगी आप? क्या ज़िंदगी जीने के लिए कभीकभी ख़तरों से नहीं खेलना पड़ता?

भ्रमित जीवन की शिकार

दरअसल अविवाहित लड़कियां अपने प्यार को चाहे जितना सच्चा मानें, ख़ुद को चाहे जितना स्मार्ट समझें, शादीशुदा पुरुष की निगाह में वे बस इच्छाओं की पूर्ति का एक साधन होती हैं. अपनी समझ से जब वे प्यार कर रही होती हैं, तब वस्तुतः वे शिकार बन रही होती हैं. इसके कई कारण हैं

कम उम्र वाली लड़कियों की चाहत होती है कि पुरुष उन पर ध्यान दें, उनके काम की प्रशंसा करें, उनकी ख़ूबसूरती की तारीफ़ करें. शादीशुदा पुरुष की अनुभवी आंखें उनकी इन चाहतों को बख़ूबी भांप जाती हैं. मन में तरहतरह के मंसूबे बांधे हुए पुरुष बाहरी तौर पर तो अच्छा बनते हुए व मदद करते हुए बड़े सहज भाव से लड़की की इच्छाएं पूरी करता है, पर साथ ही प्यार के नाम पर इसकी क़ीमत भी वसूलता जाता है.

स्त्री पुरुष से अपना पूरा वजूद, सारी भावनाएं जोड़ लेती है, लेकिन पुरुष इसका बस दिखावा करता है. स्त्री के दिल व भावनाओं से खेलते हुए पुरुष की असल ज़रूरत महज जिस्मानी होती है. स्त्री को इसका पता तब चलता है, जब बहुत देर हो चुकी होती है. उसके सारे सपने चूरचूर हो जाते हैं और वह डिप्रेशन से घिर जाती है.

अपने प्रेम या यूं कहें कि प्रेमी की ख़ातिर स्त्री को जितना सहना पड़ता है, उसके मुक़ाबले शादीशुदा पुरुष को कोई त्याग नहीं करना पड़ता. प्रेम का खुलासा होने पर लड़की को परिवार, पैरेंट्स की नाराज़गी के साथ समाज की तोहमत और बदनामी भी झेलनी पड़ती है, जिससे आगे चलकर शादी में अड़चनें भी आती हैं. इतना सब कुछ झेलने के बाद आख़िर स्त्री को मिलता क्या है? दोहरी ज़िंदगी जीनेवाले फरेबी पुरुष का दिखावटी और झूठा प्रेम. ऐसा प्रेम जो दूर से तो नज़र आता है, लेकिन नज़दीक जाने पर मृगमरीचिका साबित होता है.

इंडियन साइको सोशल फ़ाउंडेशन की सायकोलॉजिस्ट डॉ. समीक्षा कौर शादीशुदा पुरुषों से बढ़ते प्यार के लिए करियर को लेकर आई जागरूकता और इसके कारण शादी में देर, दहेज व वैवाहिक जीवन की समस्याओं से भागने की प्रवृत्ति को मानती हैं. वे इसे परिस्थितिवश हुआ समझौता करार देती हैं और कहती हैं, ”जहां तक पुरुषों की बात है, तो पार्टनर से विचारों में तालमेल का अभाव, पत्नी का गैरज़िम्मेदाराना रवैया जैसी चीज़ें उन्हें दूसरी स्त्री, ख़ासकर अपनी कलीग की ओर खींचते है. वहीं युवतियों में करियर को लेकर आई जागरूकता व वैवाहिक जीवन के झंझटों से दूर स्वच्छंद जीवन जीने की चाह ने ऐसी परिस्थितियां पैदा की हैं. करियर की भागमभाग में युवतियों को मानसिक, शारीरिक तृप्ति के लिए सुरक्षित बांहों की तलाश होती है, जहां उनकी महत्वाकांक्षाएं प्रभावित न होती हों. ऐसे में उन्हें साथ में काम करनेवाले विवाहित पुरुष ज़्यादा उपयुक्त दिखते हैं.”

डॉ. कौर ऐसे संबंधों में ठगे जाने की बात को भी स्वीकारती हैं. ”स्त्री पहले प्यार करती है और बाद में शारीरिक संबंधों के लिए तैयार होती है, जबकि पुरुष पहले शारीरिक संबंध बनाता है और बाद में वह भावनात्मक रूप से जुड़ भी सकता है, नहीं भी. ऐसी युवतियां ऐसे क़दम उठा तो लेती हैं, लेकिन उनकी सुख की तलाश ख़त्म नहीं होती, क्योंकि उनकी कल्पना में जो प्रेम होता है, वह दूसरी स्त्री के रूप में कभी हासिल नहीं होता. उन्हें सौतिया डाह तो नहीं होता, मगर अपने साथी की पत्नी को नीचा दिखाने की चाह ज़रूर होती है. ऐसे संबंधों को अब मौन सामाजिक स्वीकृति भी मिल चुकी है. अभिभावक तो नहीं, पर भाईबहन ऐसी बातें आपस में शेयर कर ही लेते हैं. कुछ मामलों में मांबाप भी इन संबंधों को स्वीकार कर लेते हैं.”

संजय श्रीवास्तव

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पहला अफेयर: वो मेरी तक़दीर बन गया… (Pahla Affair: Wo Meri Taqdeer Ban Gaya)

Wo Meri Taqdeer Ban Gaya

Pahla Affair: Wo Meri Taqdeer Ban Gaya

पहला अफेयर: वो मेरी तक़दीर बन गया… (Pahla Affair: Wo Meri Taqdeer Ban Gaya)

वो मेरी तक़दीर बन गया…
बरसात में हम पानी बनकर बह जाएंगे
पतझड़ में फूल बनकर झर जाएंगे
क्या हुआ आज तुम्हें इतना तंग करते हैं
एक दिन बिना बताए इस दुनिया से चले जाएंगे.

उसने तो शायरी की चंद पंक्तियां सुनाकर सबकी वाहवाही लूट ली. लेकिन मेरा दिल उन ल़फ़्ज़ों की आंच से धीमे-धीमे पिघलने लगा. कई दिनों से वह मेरा पीछा कर रहा था. वह मुझे अपनी हरकतों से इस अंदाज़ से छेड़ता कि मैं चाहकर भी कुछ न कह पाती. मन ही मन उसकी अदाएं, बदमाशियां और उसका इस तरह से मुझे छेड़ना अच्छा भी लगता, लेकिन मैं यह बात उस पर ज़ाहिर न होने देती. एक दिन वह अचानक मेरे सामने आ खड़ा हुआ और कहने लगा, “आख़िर आप मुझसे बात क्यों नहीं करना चाहती हैं? मैं एक शरीफ़ और अच्छे घर का लड़का हूं. आपको पसंद करता हूं, इसलिए आपसे दोस्ती करना चाहता हूं.”

मैंने कोई जवाब नहीं दिया और पलटकर चल दी. कई दिनों तक वो कोशिश करता रहा कि मैं एक बार नज़र उठाकर उसकी तरफ़ देख लूं. मन तो मेरा भी चाहता था कि सबकी नज़रें चुराकर उसकी एक झलक देख लूं, लेकिन एक अनजाना डर हमेशा मुझे इस बात से रोक देता था.

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मैं अपने परिवार से बहुत प्यार करती थी और नहीं चाहती थी कि मेरा कोई भी ग़लत क़दम मुझे उनसे अलग कर दे. हालांकि उसकी लगातार मेरे क़रीब आने और बात करने की कोशिशों से मेरा दिल विद्रोही हो उठा था और बगावत करने पर उतारू हो गया था. लेकिन मैं तो जैसे दिल की बात सुनने को तैयार ही नहीं थी. मैं प्यार के चक्कर में पड़ना नहीं चाहती थी. इतना तो मैं जानती थी कि ख़ुशनसीब होते हैं वो लोग, जिनका प्यार सही अंजाम तक पहुंचता है. मैं प्यार का दर्द लेकर जीना नहीं चाहती थी. इसलिए मैंने उससे दूर रहना ही ठीक समझा.

एक दिन पापा ने मुझसे कहा, “बेटे आज एक पार्टी में जाना है, जहां लड़केवाले आएंगे. मैं चाहता हूं तुम उन लोगों से मिलो. लड़के से भी बात करके देख लो. हमें जल्दी ही तुम्हारी शादी का फैसला लेना है.” मैंने भी पापा की बात को सहमति देते हुए कहा, “पापा, जैसा आप ठीक समझें. मुझे पता है, आपका फैसला ग़लत नहीं होगा.”

जब हम पार्टी में पहुंचे तो मैं सबसे औपचारिक बातें करने में मशग़ूल थी कि माइक पर आवाज़ गूंजी,
अजनबी लोग भी देने लगे इल्ज़ाम मुझे
कहां ले जाएगी तेरी पहचान मुझे
भुलाना चाहूं तो भुलाऊं कैसे,
लोग ले ले के बुलाते हैं तेरा नाम मुझे.

तालियों की गड़गड़ाहट के बीच जो चेहरा मेरे सामने आया, वो उसका ही था. मैं मुड़कर जाने ही लगी कि पापा बोले, “बेटे, यही मधुर है, जिसे हमने तेरे लिए चुना है. अब फैसला तुझे करना है.” मेरी आंखें छलक पड़ीं. जब पलकें उठाकर उसे मुस्कुराते देखा तो मैं रोते-रोते मुस्कुरा उठी और अपनी क़िस्मत पर इतराने लगी-

जिस प्यार को मैं ठुकरा रही थी
वही मेरी क़िस्मत बन गया
जिसे ज़ुबां पर लाना मुश्किल था
वो नाम मेरे माथे का सिंदूर
मेरी तक़दीर बन गया…

– वीना साधवानी

पहला अफेयर: यादों की ख़ुशबू… (Pahla Affair: Yadon Ki Khushbu)

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पहला अफेयर: यादों की ख़ुशबू… (Pahla Affair: Yadon Ki Khushbu)

चली हवा छाई घटा, चुनरी क्यों लहराई
बैठी-बैठी सोच रही मैं, बेबात क्यों हिचकी आई
उस रोज़ स्वेटर सीने बैठी उंगली में सुई ऐसी चुभी कि उस चुभन का एहसास आज भी ताज़ा है. ख़ून आज भी रिस रहा है. सूई की पीड़ा की अथाह परतें आज भी मन को मथने लगती हैं. मम्मी उठकर पास चली आईं. शायद उसने मेरा दर्द महसूस किया. मम्मी के बगल में बैठा मनुज ज़ोर-ज़ोर से ठहाका लगाकर हंस पड़ा. कभी-कभी बातों को हंसी में उड़ा देना और फिर एकदम गंभीर हो जाना, जैसे कोई रहस्यमयी क़िताब पढ़ रहा हो, ये सब उसकी आदतों में शामिल था. मैं खीझ उठती, “मनु, किसी नाटक कंपनी में भरती हो जाओ या मंच पर मिमिक्री का रोल…” मेरी बात को काटकर मम्मी से कहता, “भई स्वेटर के उल्टे फंदों में उलझेगी तो हादसा तो होगा ही.” मैं कटकर रह जाती. वह फिर ठहाका लगाता और… मैं उसकी हंसी की आवाज़ में खो जाती.

उसका छोटा-सा परिचय- वह हमारे गेस्ट हाउस में रहने आया. पापा के किसी ख़ास दोस्त का सिरफिरा साहबज़ादा. उसकी कही हुई एक-एक बात आज भी दुधारी तलवार-सी चीरती है मुझे. हर व़क़्त तोते-सी रटी-रटाई बात कहता, “शिल्पी, ज्यों ही मुझे वीज़ा मिल जाएगा, मैं हवा में फुर्र हो जाऊंगा.”

“उ़़फ्! लंदन जाकर पढ़ने का इतना ही शौक़ था तो फिर प्यार की पींगें बढ़ाने का यह जुनून क्यों पाला?” मैं चिढ़कर कहती.
बेशक कसकर बंद कर लूं आंखें. विचार चलचित्र की भांति चलते रहते हैं. चैन कहां लेने देते हैं? सुना था, चूक गए अवसर अपने पीछे पछतावे की लंबी कतारें छोड़ जाते हैं. कैसे यक़ीन की कश्ती पर मुझे बिठा चुपचाप समंदर पार कर गया… और छोड़ गया मेरे लिए यादों की लंबी कतारें. अब तो रूह से एक मायूस गज़ल फूटती है-

अब न लौट के आनेवाला
वो घर छोड़ के जानेवाला
हो गई उधर बात कुछ ऐसी
रुक गया रोज़ का आनेवाला

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जिस रोज़ उसे वीज़ा मिला, उस रोज़ वह बेहद ख़ुश आया. हवा के झोंके-सा आया था मेरे घर. छत पर हम कुछ पल बतियाए. रुख़सत होते व़क़्त मेरे दोनों हाथ पकड़कर वह बोला, “शिल्पी, उदासी उतार फेंको. मेडिकल की पढ़ाई ख़त्म होते ही लौटूंगा अपनी शिल्पी के पास, विवाह बंधन में बंधने.” मैं पगली गुलमोहर के फूलों में भी लाल जोड़े की कल्पना करने लगी.

उसका सच इतना झंझावाती था कि सपनों के तमाम घरौंदों को रौंदता आगे निकल गया. वह जा बसा सात समंदर पार…
मैं यहां बिलखती रही अकेली. कभी-कभी मेरी यादों के परिंदे जाकर मेरे पहले प्यार को छू आते हैं. उन हवाओं में आज भी रची-बसी हैं तुम्हारे यादों की ख़ुशबू… डरती हूं. इन यादों को कहां उखाड़ फेंकूं. ये तो कैक्टस की तरह फिर उग आएंगी.

रात आंखों में कटी, पलकों पे जुगनू आए
हम हवा की तरह जा के उसे छू आए.

– मीरा हिंगोरानी

पहला अफेयर: तुम्हारा जाना… (Pahla Affair: Tumhara Jana)

पहला अफेयर: तुम्हारा जाना... (Pahla Affair: Tumhara Jana)

पहला अफेयर: तुम्हारा जाना... (Pahla Affair: Tumhara Jana)

पहला अफेयर: तुम्हारा जाना… (Pahla Affair: Tumhara Jana)

ट्रेन जिस तेज़ी से भाग रही थी, उससे भी ज़्यादा तेज़ी से मन अतीत की ओर दौड़ा जा रहा था. दूर-दूर तक दिखते अलसाए से मैदान और उदासीन खड़े पहाड़ एक अजीब-सा खालीपन पैदा कर रहे थे. रह-रहकर आंखों के कोनों में गीलेपन का एहसास हो रहा था. दिल किसी अपने के कंधे पर सिर रखकर अंदर के गुबार को आंखों के रास्ते बाहर निकाल देना चाहता था. पर नीला, तुम्हारे ये शब्द मुझे रोकने की कोशिश कर रहे थे कि  “लड़के रोते हुए अच्छे नहीं लगते, रोने का काम तो हम लड़कियों का है, सो हमें ही रोने दिया करो.”

इस शहर से जब अजनबीयत का ही रिश्ता था, तब एक अलसाई-सी दोपहर, बस से जाते हुए सड़क के किनारे खड़े देखा था तुम्हें. उस गर्म दोपहर में भी सुबह की ओस जैसी ताज़गी तुम्हारे चेहरे पर खिली हुई थी. इससे पहले कि मैं उस शीतलता को अनुभव कर पाता, बस आगे बढ़ गई थी. लाल बत्ती पर जैसे ही बस रुकी, बिजली-सी फुर्ती से ख़ुद को नीचे खड़ा पाया. आज भी यह सोचकर हैरानी होती है कि मुझ में कहां से इतना साहस आ गया था उस समय. पहली बार मिलने पर भी अजनबीपन को हमारे बीच की दीवार बनने का मौक़ा नहीं मिला. वर्षों पुरानी पहचान के ये संकेत तुम्हें भी मिले थे उस दिन.

तुम्हारी गहरी आंखों में अक्सर नीले आसमान-सा सूनापन दिखता था तो कभी नीली झील-सी गहरी ख़ामोशी, जिसका अनुमान लगाना मुश्किल होता था. शायद इसी वजह से मैंने तुम्हें नाम दिया था “नीला.”

गरजती हुई ट्रेन अचानक एक सुरंग में प्रवेश कर गई. घुप्प अंधेरा आंखों के आगे छा गया. पहाड़ी से उतरते हुए उस दिन शायद ऐसा ही अंधेरा तुम्हारी आंखों में भी छाया था. कुछ क्षणों के लिए चेतनाशून्य हो गई थी तुम. चेहरा एकदम पीला पड़ गया था तुम्हारा. थोड़ा ठीक होने पर सिरदर्द का बहाना बनाकर टाल गई थी. उस दिन के बाद तुम्हारे चेहरे के भावों को पढ़ना मुश्किल लगने लगा था. जिस घर की एक-एक चीज़ को तुमने अपने हाथों से संवारा था, अचानक ही उसे मेरे नाम करने की घोषणा कर दी थी तुमने. तब भी तुम्हारी आंखों की भाषा को पढ़ने की बिल्कुल भी कोशिश नहीं की मैंने उस दिन.

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कुछ दिन बाद मुझे दूसरे शहर से पेंटिंग्स की शृंखला तैयार करने का प्रस्ताव मिला. शायद ये तुम्हारी ही कोशिशों का परिणाम था. अपना वास्ता देकर तुमने मुझे वहां भेजा था. छह महीने लग गए थे काम पूरा करने में. सभी ने मेरे काम की ख़ूब सराहना की.

वापस लौटने पर पता चला कि तुम इस शहर से जा चुकी हो. कोई निशान भी बाकी नहीं छोड़े थे तुमने, सारी कोशिशें बेकार गईं तुम्हें ढूंढ़ने की. मन में शायद उम्मीद की किरण बाकी थी, सो महीनों तक भटकने के बाद फिर वापस मैं इसी शहर में आया और अचानक ही तुम्हारी बहन से मुलाक़ात हुई. उन्होंने जो बताया, उसे सुनकर होश उड़ गए थे मेरे. तुम इस शहर को तो क्या, दुनिया को भी अलविदा कह चुकी थी. बहाना ब्रेन ट्यूमर. मेरी भावुकता को तुम जानती थी. इसलिए अपने दर्द में बिल्कुल भी शामिल नहीं किया था तुमने. ऐसा लग रहा था पिघलता हुआ शीशा किसी ने मेरे कानों में उड़ेल दिया होे. शहर खाली कैनवास की तरह लग रहा था-बिल्कुल सूना. आज हमेशा के लिए छोड़ आया हूं मैं इस शहर को.

नीला प्लीज़, आज बिल्कुल भी मत रोकना, मन में घुमड़ते इस सैलाब को बहने से, वरना नासूर बनकर सारे शरीर से रिसने लगेगा. ट्रेन के टॉयलेट में बच्चे की तरह फूट-फूटकर रो रहा हूं मैं और सचमुच रोते हुए बहुत बुरा लग रहा हूं मैं.

– ब्रजेश नामदेव

ये प्यार इतना कॉम्प्लिकेटेड क्यों होता है? देखें वीडियो:

 

 

पहला अफेयर: बहुत देर कर दी… (Pahla Affair: Bahot Der Kar Di)

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गुनाहों का देवता यह वही उपन्यास है, जिसे मैं अपने पढ़ाई के दिनों में सबसे ज़्यादा पसंद किया करता था. मुहब्बत की इस दास्तां को न जाने कितनी बार पढ़ डाला था मैंने. रैक पर से क़िताब तो उठा ली, पर याद ही नहीं आ रहा था कि यह उपन्यास मेरे पास कैसे आया? पहला पृष्ठ खोलते ही नज़र पड़ी, सुषमा की ओर से सप्रेम भेंट. ओह! अब याद आया, यह तो सुषमा ने दिया था कॉलेज के दिनों में, जब विदाई समारोह में आई थी और कहा था, “इसे खोलकर ज़रूर पढ़ना.” लेकिन चूंकि दर्जनों बार यह उपन्यास पढ़ चुका था, इसलिए इसे बिना पढ़े रैक में रख दिया. कब नौकरी लगी, कब शादी हुई और कैसे 35 साल गुज़र गए, पता ही नहीं चला.

ये वही सुषमा थी, जिससे मैं बेइंतहा मुहब्बत करता था, लेकिन कभी कहने की हिम्मत नहीं जुटा पाया. तभी हवा का ज़ोर का झोंका आया और उपन्यास मेरे हाथ से गिरकर फ़र्श पर जा गिरा. काग़ज़ का एक पुर्जा क़िताब के पन्नों से निकलकर बाहर आ गिरा. उठाकर पढ़ा. लिखा था-प्रिय कमल, मुझे ख़ुद नहीं पता कि प्रेम क्या होता है? प्रेम की परिभाषा क्या होती है? लेकिन मैं जब भी तुम्हें देखती हूं मुझे अजीब-सी ख़ुशी होती है और तुम्हारा भोला-भाला चेहरा देखना अच्छा लगता है. शायद यही प्रेम है. आज हमारे कॉलेज का आख़िरी दिन है. तुम मुझे चाहते हो या नहीं, मैं नहीं जानती, लेकिन मैं तुम्हारा इंतज़ार करूंगी. परसों शाम मैं अपने परिवार के साथ यह शहर छोड़कर जा रही हूं. न जाने फिर मिलना हो न हो. तुम कल शाम चार बजे आनंद भवन में आना. मैं तुम्हारा इंतज़ार करूंगी. यह क़िताब हमारी नई पहचान का प्रतीक होगी.
                                             – तुम्हारी सुषमा

पढ़ते ही मेरे पैर लड़खड़ाने लगे. “हे ईश्‍वर कितनी देर कर दी मैंने.” आज से 38 साल पहले के दृश्य किसी चलचित्र की भांति मेरी आंखों के सामने से गुज़रने लगे, जब मैं पहली बार गांव से इलाहाबाद विश्‍वविद्यालय में पढ़ने के लिए आया था. पहली क्लास, पहला साल गांव का सीधा-सादा लड़का, उस पर रैगिंग का डर. मैं क्लास में लड़कों के बीच सहमा-सा बैठा हुआ था. हल्ला होने पर पता चला कि सीनियर्स आ रहे हैं रैगिंग के लिए. मेरा तो डर के मारे ख़ून सूख गया. सीनियर्स तो आए, पर रैगिंग नहीं कर पाए. कारण- लड़कियों की ग्रुप लीडर सुषमा ने सब जूनियर्स को संगठित कर लिया. सीनियर्स अपना-सा मुंह लेकर चले गए और वह लड़की क्लास की लीडर बन गई. उसने गर्व से हेय दृष्टि से मेरी ओर देखा, जैसे मेरा मज़ाक उड़ा रही हो. उस दिन के बाद से वह क्लास की ‘मिस शेरनी’ और मैं ‘मिस्टर दब्बू’ के नाम से मशहूर हो गया. गाहे-बगाहे वह उसे छेड़ दिया करती थी. पहले मुझे ख़राब लगता था, पर धीरे-धीरे अच्छा लगने लगा. लेकिन प्यार का इज़हार करने की हिम्मत नहीं जुटा पाया. कॉलेज के आख़िरी दिन विदाई समारोह में सुषमा ने सभी छात्रों को ग़िफ़्ट दिए, बड़े बाप की बेटी जो ठहरी. अंत में मेरे सामने आकर बोली, “मिस्टर दब्बू, इस ग़िफ़्ट में रखी क़िताब तुम्हारे लिए. शायद यह क़िताब तुमने पहले पढ़ी हो, फिर भी इसे खोलकर ज़रूर पढ़ना.” लेकिन उपन्यास का शीर्षक देखकर ही मैंने क़िताब रैक में रख दी थी.

दो साल बाद मेरी शादी हो गई. दो बच्चे छोड़कर पत्नी दुनिया से विदा हो गई. बच्चे अपनी दुनिया में मस्त हैं. रिटायरमेंट की उम्र में, ज़िंदगी के इस मोड़ पर आज मेरी ज़िंदगी अकेलेपन में गुज़र रही है.

अचानक तेज़ हवा के झोंके के साथ बारिश की बौछारें मेरे चेहरे को भिगो गईं. मेरी तंद्रा टूटी और हाथ से काग़ज़ का टुकड़ा छूटकर उड़ गया, जैसे हवा का झोंका मुझसे कह रहा हो, ‘व़क़्त गुज़र चुका है- शायद इसे पढ़ने में तुमने बहुत देर कर दी…’

– दिलीप द्विवेदी

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पहले प्यार के मीठे एहसास में डूबे ऐसे ही अफेयर्स के लिए यहां क्लिक करें: Pahla Affair

 

क्या करें जब पति को हो जाए किसी से प्यार? (Is Your Husband Having An Affair?)

Is Your Husband Having An Affair

आजकल पतियों का परस्त्री के प्रति आकर्षित हो जाना आम-सी बात होती जा रही है. ऐसे में पत्नियां समय पर सचेत हो जाएं, तो बहुत कुछ बिगड़ने से बच सकता है. साथ ही वे अपने प्यार, समझदारी, धैर्य व विश्‍वास से पति को सही रास्ते पर ला सकती हैं.

Is Your Husband Having An Affair

आज के महानगरीय जीवन की त्रासदी है- पति-पत्नी का अपने-अपने प्रोफेशन में ज़रूरत से अधिक ध्यान देना, परिवार का आकर्षण धीरे-धीरे कम होना और एक अच्छी लाइफस्टाइल जीने के लिए कम से कम समय में बहुत अधिक पैसा कमाना. ये कुछ ऐसे कारण हैं, जो पति और पत्नी के बीच में एक मज़बूत दीवार बनकर खड़े हो रहे हैं. इन सब से ऊपर आज की बिज़ी लाइफ में जो चीज़ अधिक सेंध लगा रही है, वह है जीवनसाथी के जीवन में किसी और का आज के महानगरीय जीवन की त्रासदी है- पति-पत्नी का अपने-अपने प्रोफेशन में ज़रूरत से अधिक ध्यान देना, परिवार का आकर्षण धीरे-धीरे कम होना और एक अच्छी लाइफस्टाइल जीने के लिए कम से कम समय में बहुत अधिक पैसा कमाना. ये कुछ ऐसे कारण हैं, जो पति और पत्नी के बीच में एक मज़बूत दीवार बनकर खड़े हो रहे हैं. इन सब से ऊपर आज की बिज़ी लाइफ में जो चीज़ अधिक सेंध लगा रही है, वह है जीवनसाथी के जीवन में किसी और का आ जाना.

किसी तीसरे का आगमन इस बंधन में मुश्किलें पैदा करने के लिए काफ़ी है. अपने जीवनसाथी के प्रति बेवफ़ाई करना भी आज आम-सी बात हो गई है. जब आपके पति के मन में किसी अन्य महिला के लिए दोस्ती से अधिक की भावनाएं जन्म लेती हैं, तो यह वैवाहिक संबंधों में स्लो पॉयज़न का काम करता है. इस ज़हर को अपने परिवार में आने से पहले ही रोकना बेहद ज़रूरी है. इसके लिए आपको थोड़ा सावधान रहने की ज़रूरत है. कुछ संकेत व बातों पर ध्यान देने से ही आपको पता चल जाएगा कि आपके पति किसी दूसरी महिला के प्रति आकर्षित हो रहे हैं. आइए, इसके बारे में जानते हैं.

– जब आपको लगे कि आपके पति के व्यवहार में अचानक परिवर्तन आ गया है, तो समझ लीजिए कि आपके पति के मानसिक और भावनात्मक धरातल पर उथल-पुथल मची हुई है.

– जब आपके प्रति उनका व्यवहार बदल जाए और वह पहले की तुलना में आपसे प्यार से बात न करें, तो समझ जाएं कि यह प्यार कहीं और बांटा जा रहा है.

– जब आपके पति अचानक खोये-खोये-से रहने लगें, तो यह इस बात का संकेत है कि उनके मन में आपके अलावा कोई और बस गया है.

– ख़ुद का ज़रूरत से अधिक ध्यान रखना भी इस बात का संकेत देता है कि आपके पति को किसी और से प्यार हो गया है.

– जब आपको लगे कि आपके पति अपनी सेहत का ज़रूरत से अधिक ध्यान दे रहे हैं और अगर कारण पूछने पर एकदम सही जवाब न दे पाएं, तो समझ जाएं कि यह सब सजना-धजना आपके लिए नहीं है. वह इतने स्मार्ट बनकर किसी और के लिए जाते हैं.

– कहीं बाहर जाते हुए उनके मन में सुंदर दिखने की चाह का बने रहना.

– सुबह-शाम अपनी पर्सनैलिटी को निखारने की कोशिश करना इस बात का संकेत है कि आपके पति, आपके अलावा किसी और के लिए अपने को संवारकर रखना चाहते हैं.

– रोज़ ऑफिस के नाम से देर से घर आना और पूछने पर हर रोज़ कोई न कोई बहाना बनाना या फिर ग़ुस्सा करना भी इस बात की ओर इशारा करता है कि आपके पति की ज़िंदगी में किसी और ने जगह बना ली है.

– अक्सर घर से बाहर खाना या काम से शहर से बाहर जाना या घर से जल्दी से जल्दी निकल जाने का मतलब है कि उन्हें किसी और से मिलने की उत्सुकता है.

– किसी और से प्यार होने पर सबसे ज़्यादा असर सेक्स संबंधों पर पड़ता है. पत्नी के साथ संबंध बनाने में वह कम दिलचस्पी दिखाने लगते हैं और पत्नी के कहने पर ‘थका हुआ हूं’ कह मुंह फेरकर सो जाते हैं.

– यही नहीं, अगर पति पत्नी के मायके जाने में रुचि दिखाए और पहले की तरह यह न कहे कि वह उसके बिना नहीं रह सकता या परेशानी हो जाएगी, तो समझ लें कि उनकी ज़िंदगी में कोई और आ चुका है.

– बेवजह पति चिड़चिड़े रहने लगें या अधिक चुप रहने लगें और आपसे बात करने में कतराएं, तो भी संभव है कि उन्हें किसी से प्यार हो गया है.

ये तमाम बातें इस बात का संकेत हैं कि पति महाशय किसी और को अपना दिल दे बैठे हैं. ऐसे में आपकी थोड़ी-सी समझदारी इन परिस्थितियों को बदलने में सार्थक सिद्ध हो सकती है.

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Is Your Husband Having An Affair
एक पहलू यह भी…

बहुत कम उम्र में शादी हो जाने की वजह से भी दूसरी स्त्री से संबंध बन जाता है. घरवालों और समाज की वजह से अक्सर कुछ लोगों की शादी बहुत कम उम्र में हो जाती है. नौकरी हुई नहीं कि शादी कर दी जाती है. ऐसे लोग जब ज़िंदगी के अगले पड़ाव पर पहुंचते हैं, तो उन्हें ये लगने लगता है कि उन्होंने काफ़ी कुछ मिस कर दिया है. ऐसे में जब उनकी मुलाक़ात किसी ऐसी महिला से होती है, जो उनकी हर बात को पसंद करती है, तो उनके बीच प्यार पनप जाता है, क्योंकि वह उसे पत्नी से ज़्यादा इंपोर्टेंस देती है.

समाधान के लिए निम्न बातों पर ग़ौर करें…

– बेशक पति की बेवफ़ाई के बाद आप उनके साथ रहना नहीं चाहतीं, लेकिन क्या आवेश में आकर तलाक़ जैसा कठिन निर्णय आपके परिवार के हित में होगा, ये निर्णय आपको करना है. लेकिन याद रखें इस निर्णय से जहां दो दिल अलग होंगे, वहीं बच्चों की स्वाभाविक परवरिश भी प्रभावित होगी.

– किसी के प्रति आकर्षण होना एक अलग चीज़ है, लेकिन उस आकर्षण के चलते अपनी शादीशुदा ज़िंदगी को ताक पर रख देना बिल्कुल ग़लत है.

– हालांकि किसी भी बात को सही-ग़लत ठहराने से पहले ये जान लेना बहुत ज़रूरी है कि उस बात की वजह क्या है.

– एक्स्ट्रा-मैरिटल अफेयर होने के बहुत से कारण हो सकते हैं, लेकिन अगर समय रहते उन कारणों को जान लिया जाए, तो इस मुसीबत से पार पाया जा सकता है.

– ज़्यादातर मामलों में एक्स्ट्रा-मैरिटल अफेयर शादीशुदा ज़िंदगी में कलह होने की वजह से होते हैं, इसलिए घर में शांति का वातावरण और आपसी प्यार को बनाए रखना बेहद ज़रूरी है.

– सेक्सुअल संतुष्टि न मिलने पर भी पति का झुकाव परस्त्री के प्रति हो जाता है. तो क्यों न उनकी चाहतों को समझा जाए और अपनी इच्छाओं के बारे में भी बताया जाए.

– जहां पति और पत्नी के बीच एक-दूसरे की मांगों को पूरा करने में असमर्थता आ जाती है, वहां उनके रिश्ते में प्यार ख़त्म हो जाता है. अतः भरसक कोशिश करें कि ऐसी स्थिति ही न बनने पाए.

– रिश्तों में खटास आने पर ही पुरुष दूसरी स्त्री की ओर आकर्षित होता है. अगर कोई पुरुष अपनी पत्नी से ख़ुश नहीं है, तो उसकी आंखें किसी दूसरे पर हमेशा टिकी रहेंगी, जो उसे समझ सके या उतना प्यार दे सके. इसलिए यह बहुत ज़रूरी है कि पति की भावनाओं को समझें और उन्हें भी अपने जज़्बात से रू-ब-रू कराएं. उन पर इतना प्यार लुटाएं कि वे आपके सिवा किसी और के बारे में सोच ही न सके.

राह नहीं है आसान

वजह चाहे जो भी हो, पर अलग हो जाना इसका समाधान नहीं है. पति को ऐसे संबंध के परिणामों के बारे में झगड़े या धमकी से नहीं, प्यार से ही समझाएं. अपनी ग़लतियों का अवलोकन करें कि आख़िर पति क्यों आपसे दूर रहने पर मजबूर हुए. उस दूसरी महिला के बारे में जानकारी हासिल करें और हो सके, तो उससे मिलकर उसे भी समझाएं.

पति का किसी और स्त्री से प्यार हो जाने की बात स्वीकारना या सहना आसान बात नहीं है. ऐसे में गुस्से में आप तुरंत उन्हें छोड़ने के लिए भी तैयार हो जाएंगी, पर यह भी जान लें कि ऐसे संबंध बहुत लंबे समय तक नहीं चलते हैं. अतः बेहतर होगा कि धैर्य से काम लें. जब दूसरी स्त्री एक सोशल सिक्योरिटी और रिश्ते को नाम देने की मांग करेगी, तो पति अपने परिवार की प्रतिष्ठा को दांव पर लगाने से पहले कई बार सोचेंगे. उस समय आपको उनका साथ देना होगा न कि ताने. अपने रिश्ते की मज़बूती को थामे आपको ही उस राह पर चलना होगा, जो आसान बिल्कुल नहीं है, पर यक़ीन मानिए मंज़िल मिलेगी ही. ध्यान रहे, अपने प्यार व विश्‍वास से ही आप अपने पति को वापस पा सकेंगी.

– सुमन बाजपेयी

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पहला अफेयर: डायट चार्ट (Pahla Affair: Diet Chart)

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पहला अफेयर: डायट चार्ट (Pahla Affair: Diet Chart)

बात उन दिनों की है, जब मैं डायटीशियन का कोर्स कर रही थी. कॉलेज की पढ़ाई के बाद हमारी 6 महीने की इंटर्नशिप रहती है, जिसके लिए दिल्ली के मौलाना आज़ाद मेडिकल हॉस्पिटल जाना रहता था. घर से सुबह 9 बजे से हॉस्पिटल के लिए निकलना, फिर शाम 7 बजे तक वापस आना, काफ़ी व्यस्त दिनचर्या रहती थी. पढ़ाई के अलावा कुछ भी सोचने का व़क्त नहीं मिलता था. किसी छुट्टीवाले दिन यह ज़रूर एहसास होता था कि घर में शादी के बारे में सोचा जाने लगा है. हालांकि मुझसे शादी के बारे में जानने का कोई प्रयास नहीं किया गया था. बस, यही कहते थे कि अपनी पढ़ाई मन लगाकर करो, समय आने पर सब काम हो ही जाते हैं.

मिसेज़ इंदू आहूजा, हमारी चीफ डायटीशियन थीं. एक दिन उनसे किसी बात पर विचार-विमर्श कर रही थी कि तभी एक साथ तीन लड़के कमरे में आए. यही सोचकर कि डायट चार्ट बनवाने आए हैं, मैंने उन्हें इंतज़ार करने को कहा. किंतु वे तीनों टेबल पर ही आ गए, यह कहते हुए कि डायट चार्ट बनवाना है और कुछ जानकारी भी लेनी है. वैसे तो इतने लोग आते हैं, मेरा ध्यान किसी पर नहीं जाता, परंतु न जाने क्यूं उनमें से एक लड़के पर मेरी नज़र गई, तो मैं उसे देखती ही रह गई. एक अलग ही आकर्षण था उसमें. मन में अजीब-सी हलचल हुई. शायद यह पहली नज़र के प्यार का हल्का-सा एहसास था.

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वे तीनों अपना काम पूरा होते ही चले गए, जाते-जाते भी मैं उसी लड़के को देख रही थी, उसने भी मुड़कर देखा और मेरी नज़रें उससे मिलीं, अच्छा लगा. ख़ैर, बात आई-गई हो गई और मैं भी अपने काम में व्यस्त हो गई. बीच-बीच में उसका ख़्याल एक मीठे एहसास की तरह तन-मन को भिगो जाता था.

क़रीब एक महीने बाद एक दिन मम्मी-पापा ने अपने पास बुलाया और कहने लगे, “अब पढ़ाई पूरी हो गई, इंटर्नशिप भी ख़त्म होनेवाली है, तो सोचा क्यों न शादी के बारे में तुमसे बात करें.” मेरा मन तैयार नहीं हो रहा था, क्योंकि मैं जॉब करना चाहती थी. मम्मी-पापा भी शायद समझ गए थे, सो उन्होंने कहा, “एक लड़का देखा है. घर-परिवार भी अच्छा है. सारी बातें पक्की हैं, लेकिन तेरा फैसला ही अंतिम होगा. अगर लड़का पसंद न आए, तो जैसा तू चाहेगी, वैसा ही होगा.” मैंने भी हां कर दी, लेकिन इस बीच रह-रहकर मेरी आंखों के सामने उसी हॉस्पिटलवाले लड़के की तस्वीर घूम जाती. मुझे अपने ऊपर हंसी भी आती कि ये तो बचपना है.

ख़ैर, दिल्ली के बिड़ला मंदिर में देखने की बात तय हुई. निश्‍चित समय पर हम लोग वहां पहुंच गए. थोड़ी ही देर में लड़केवाले भी आ गए. उनके बीच अचानक उस परिचित चेहरे पर मेरी नज़र पड़ी, मुझे तो विश्‍वास ही नहीं हो रहा था. मैंने सबसे नज़रें चुराकर दो-तीन बार आंखें उठाकर उसे देखने की कोशिश की. जैसे ही उसने भी मुझे देखा, तो मेरे मुंह से अनायास ही निकल गया, “अरे, आप? आप तो हॉस्पिटल में आए थे. यहां कैसे?” मैं कुछ समझ ही नहीं पा रही थी, इसी बीच मुझे सम्मिलित हंसी के ठहाके सुनाई दिए. मेरी तंद्रा भंग हुई, तो देखा सबकी नज़रें मेरी ओर ही थीं और अब चौंकने की मेरी बारी थी. मुझे बताया गया कि दरअसल ये अपने दोनों भाइयों के साथ मुझे देखने ही हॉस्पिटल आए थे. मां ने बताया, “तुम्हें फोटो में सबने पसंद कर लिया था, लेकिन सबने सोचा कि एक बार तुम दोनों आमने-सामने एक-दूसरे को देख लो, तो बेहतर होगा.”

मुझे तो विश्‍वास ही नहीं हो रहा था कि जिसे पहली नज़र में चाहा, वही मुझे मिल गया. हम दोनों की हां थी, सो शादी भी जल्दी हो गई. आज मैं अपनी गृहस्थी में सुखी-संतुष्ट हूं और बार-बार ऊपरवाले का शुक्रिया अदा करती हूं कि मेरा पहला प्यार ही मेरे जन्म-जन्मांतर का प्यार बन गया.

– प्रीता जैन

 

पहला अफेयर: वो एक पल (Pahla Affair: Wo Ek Pal)

Pahla Affair, Wo Ek Pal
Pahla Affair, Wo Ek Pal
पहला अफेयर: वो एक पल (Pahla Affair: Wo Ek Pal)

दिल क्यों बेचैन है, आंख नम है क्यूं… शायद दिल का कोई टांका उधड़ा है…

जाने क्यों ये पंक्तियां मेरे ज़ेहन में सरगोशी कर उठीं. शायद इसका कारण यही रहा होगा कि कोई ज़रूरी काग़ज़ात तलाश करते हुए मेरे हाथों में एक पुरानी पारिवारिक तस्वीर लग गई, जिसमें ‘तुम’ भी हो. वही मनमोहक, चित्ताकर्षक मुस्कान, जो मेरी अंतर्मन की गहराइयों में उतर गई थी. मैं अतीत के गलियारे में उतरता चला जा रहा हूं. पीछे छूट रहा है वर्तमान. मेरी बुआजी के नए घर का शुभ मुहूर्त था कानपुर में. मैं सपरिवार शामिल होने पहुंचा. बुआजी ने मुझे घर की डेकोरेशन का काम सौंपा था, क्योंकि मैं इंटीरियर डेकोरेशन का कोर्स कर रहा था. बस, यही एक काम मेरे दिल को लुभानेवाला था. मैंने अपनी समस्त इंद्रियां केंद्रित कर दी थीं, जान लगा दी थी इस काम को अंजाम देने में.

फंक्शनवाले दिन डेकोरेशन को देखकर सभी के मुंह से निकला ‘वाह’ शब्द मानो मुझे पुरस्कृत कर रहा था, लेकिन उसी गहमा गहमी में एक सुरीला कंठ मुझे झंकृत कर गया… ‘वाओ! क्या बात है?’ जैसे ही मैंने मुड़कर देखा, तो बुआजी की छोटी बेटी यानी मेरी बहन गरिमा के पास एक ख़ूबसूरत परी-सी हल्के सांवले वर्णवाली लड़की खड़ी थी. वह लगातार कुछ कहे जा रही थी, मगर मेरी श्रवणशक्ति होशोहवास खो बैठी. मेरा दिल पहली बार किसी के लिए धड़का था. पहली नज़र में कोई इस क़दर भा जाए, यह पहला अनुभव था मेरा.

मेरी बहन ने डेकोरेशन का क्रेडिट मुझे देते हुए मेरा उससे परिचय करवाया. मैं अपलक उसे निहारता रहा. लेकिन जब गरिमा ने परिचय के दौरान यह कहा कि ‘तुम्हारी’ मंगनी हो चुकी है और एक हफ़्ते बाद ही तुम्हारी शादी है किसी एनआरआई से, तो मुझे झटका-सा लगा. तुम शादी करके इंग्लैंड चली जाओगी.

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यह भाग्य का कैसा क्रूर मज़ाक था कि एक क्षण पहले कुबेर का ख़ज़ाना सौंपकर अगले ही क्षण सारी ख़ुशियां छीन लीं. मेरे चेहरे पर एक के बाद एक कई रंग आकर चले गए. मैंने एक क्षीण मुस्कान के साथ उसे उज्ज्वल भविष्य की
शुभकामनाएं दीं.

मेरे पहले प्यार का ये कैसा अंजाम था? मैं बस ऊपरवाले से बार-बार यही सवाल कर रहा था. उस पर मेरी बदनसीबी का कटाक्ष देखिए, मुझे न स़िर्फ तुम्हारी शादी में शामिल होना पड़ा, बल्कि सारा डेकोरेशन का काम भी करना पड़ा. मेरे लिए यह मंज़र ही कहर बरपानेवाला था.

ख़ैर, मैं मन में एक टीस और ज़िंदगीभर के लिए नासूर लिए वापस अपने शहर आ गया. आज मैं शादीशुदा ज़िंदगी जी रहा हूं, दो प्यारे बच्चे भी हैं, ज़िंदगी से कोई शिकायत भी नहीं, फिर भी दिल का एक कोना सूना-सा लगता है, मानो वो कोना रिक्त रह गया हो.
तुम जहां भी हो, ख़ुश रहो. तुम्हें तो पता भी नहीं होगा कि दुनिया में कोई ऐसा भी है, जो अपनी ज़िंदगी के उस एक पल की क़ीमत आज तक चुका रहा है, जिस पल उसने तुम्हें देखा था. लाख चाहकर भी मैं तुम्हें भूल नहीं पाया. मुहब्बत भी कभी इम्तिहान लेती है. तुम्हें तो शायद मैं याद भी नहीं और एक मैं हूं, जो तुम्हारी यादों को आज तक सीने में संजोए घूम रहा हूं.

मैं अपनी पत्नी से बेवफ़ाई भी नहीं कर रहा, क्योंकि तुम्हारी तो मैं इबादत करता हूं और मरते दम तक करता रहूंगा. तुम ख़ुश रहो, सलामत रहो, यही दुआ है. मुझे तुम्हारी कोई ख़बर तक नहीं, लेकिन यही यक़ीन है कि मेरी जो सांसें चल रही हैं, वो इस बात का सबूत हैं कि तुम सलामत हो!

– कुलविन्दर वालिया

 

पहला अफेयर: आकर्षण (Pahla Affair: Akarshan)

Akarshan

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पहला अफेयर: आकर्षण ((Pahla Affair: Akarshan)

मैं नौवीं क्लास में पढ़ रही थी. उन दिनों रामलीला का मंचन हो रहा था. बड़ी श्रद्धा से हम रोज़ रामलीला देखने जाते. एक दिन जब राम को युवावस्था में दिखाया गया, तो उनका ओजस्वी, गरिमामय रूप देखकर मैं तो मंत्रमुग्ध हो उन्हें अपलक निहारती रही. दिल में हलचल मच गई. राम का तेजस्वी व्यक्तित्व मुझे हर क्षण विचलित करने लगा. मेरा पढ़ाई में भी मन नहीं लग रहा था.

मेरे मन में राम से मिलने की इच्छा प्रबल होने लगी. दादू के कारण रामलीला कमेटीवालों का हमारे घर आना-जाना था. एक दिन अवसर पाकर मैंने राम का जो रोल कर रहे थे, उनके बारे में जानकारी हासिल कर ही ली. हमारे स्कूल के पीछे की बिल्डिंग में ही रामलीला के सारे पात्र रहते थे. यह नियम था कि दस दिन तक सब वहीं रहेंगे, रिहर्सल करेंगे, सात्विक भोजन करेंगे और ज़मीन पर सोएंगे.

एक दिन एक सहेली को लेकर मैं वहां पहुंच गई. हमें सबसे मिलवाया गया, लेकिन राम कहां हैं? पता चला राम बारहवीं कक्षा की परीक्षा देनेवाला है, इसलिए पढ़ाई में व्यस्त है. भोजन का समय हो चुका था. सब दरी पर बैठ गए. केले के पत्ते पर खाना परोसा गया. मैं तो राम का ही इंतज़ार कर रही थी. राम को देखा, तो धड़कनें और तेज़ हो गईं, कितना संपुष्ट, बलिष्ट और सुंदर था. सेवा करने के बहाने औरों के साथ-साथ मैंने भी खाना परोसना शुरू कर दिया. राम के पास जाते ही मैंने इशारा कर पूछा राम… “अरे भई, राम तो मैं स्टेज पर हूं, मेरा नाम सत्यम है.” राम बोले.

राम के पत्तल पर मैंने दुगुना खाना परोसा, तो उन्होंने बेख़्याली में मेरा हाथ पकड़ लिया, “बस! इतना खाऊंगा, तो मोटा होकर राम की जगह रावण का रोल मिलेगा.”

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मैं इस स्पर्श के सुखद एहसास से सुध-बुध-सी खोती हुई घर लौटी. अब तो यह रोज़ का क्रम बन गया. राम की जूठी पत्तल मैं ज़बर्दस्ती उठाती, इस प्रयास में जो हल्की-सी छुअन और सामीप्य मिलता, मेरे लिए वो अनुभूति ही अनमोल होती. वहां तो सब लोग इसे मेरी आध्यात्मिकता ही समझ रहे थे.

एक दिन कमेटी के अंकल ने बताया कि कुछ वर्षों तक हम राम-सीता का ब्याह वास्तविक रूप से कर देते थे. आज सीता स्वयंवर का मंचन था, मेरी बेचैनी चरम पर थी, तो क्या आज राम सीता का हो जाएगा? घर आकर मैं ख़ूब रोई, अगले दिन जब मैं रामायण निवास गई, तो मैंने सीता के कमरे में जाना चाहा, क्योंकि मैंने सुना था कि शादी के बाद पति-पत्नी साथ रहते हैं. इतने में ही अंकल ने एक लड़के को आवाज़ दी, “अरे नवीन, ज़रा इधर आना…” फिर मुझसे बोले, “यह रही सीता.”

“पर यह तो लड़का है.” अंकल ने कहा, “हां, लड़के का ही लड़की जैसा मेकअप करते हैं.” मेरी सारी उदासीनता उड़न छू हो गई. लगा जैसे गंगोत्री से ख़ुशियों की गंगा प्रवाहित हो गई. रामलीला समाप्त हो गई, तो मैं पढ़ाई के बहाने राम के घर जाती रही. फिर वो आगे की पढ़ाई के लिए शहर चले गए. पता चला कि राम के गांव में उनकी बहुत बड़ी खेती-बाड़ी है. राम का सपना है फर्टीलाइज़र्स का कारखाना बनवाने का, गांव का विकास करना चाहते हैं. एक दिन राम यानी सत्यम की दादी ने बताया कि सत्यम के दादाजी गांव के सरपंच हैं. यूं तो वहां सभी स्वतंत्र हैं, लेकिन शादी अपनी ही जाति में करनी पड़ती है. दूसरी जाति में शादी करने से जाति की आंतरिक विशेषताएं व गरिमा समाप्त हो जाती है. गांव में पंचायत के ही नियम चलते हैं. एक बार ऐसे ही किसी जोड़े ने गांव से भागकर प्रेम विवाह कर लिया था. पर पंचायत के लठैतों ने उन्हें पकड़ लिया और पंचायत के सामने दोनों को आमने-सामने पेड़ से लटका दिया. मेरा हाथ अचानक गले पर पहुंच गया.

अब हम बड़े हो चुके थे, कितना विरोधाभास था हमारे परिवारों में. कहां हम खुली सोच रखनेवाले, कहां वो पुरातनवादी सोचवाले. मैंने आगे सोचना ही बंद कर दिया. आज सालों बीत चुके हैं, फिर भी राम का वो नैसर्गिक रूप मुझे झकझोर देता है.

– रेनू भटनागर

पहला अफेयर: तुम ही तो हो मेरी संध्या (Pahla Affair: Tum Hi To Ho Meri Sandhya)

Pahla Affair

Pahla Affair: Tum Hi To Ho Meri Sandhya

पहला अफेयर: तुम ही तो हो मेरी संध्या (Pahla Affair: Tum Hi To Ho Meri Sandhya)

रिश्ते में महेश मेरे दीदी के देवर थे, लेकिन मैं इस बात से पहले अनजान थी. हमारी पहली मुलाक़ात मेरे चचेरे भाई के यहां हुई. उनका शांत और सौम्य व्यक्तित्व पहली मुलाक़ात में ही मेरे मन को भा गया. फिर दीदी की शादी में मुझे पता चला कि वो मेरे जीजाजी के भाई हैं. अब तो जब भी दीदी घर आती, महेश की ढेर सारी तारी़फें करती. उस साल गर्मी की छुट्टियां मैंने दीदी के घर पर बितायीं. इतने दिनों साथ रहकर मैं और महेश बहुत अच्छे दोस्त बन गए.

घर लौटने पर मैंने उन्हें ख़त लिखा और फिर ख़तों का सिलसिला शुरू हो गया. महेश उस व़क़्त मैथ्स से एम. एससी. कर रहे थे और मैं बायोलॉजी से बी.एससी., इसलिए पढ़ाई के बारे में तो हमारी ख़ास बात नहीं होती थी, परंतु मैं अक्सर उनसे पूछती कि मुझे भी एम. एससी. करनी है तो इसके लिए बी.एससी. में कितने प्रतिशत अंक चाहिए.

मेरे मन में महेश के लिए बहुत सम्मान था. पर इस सम्मान में छिपे प्यार से मैं अनजान थी. महेश की बातें कभी मेरी समझ में न आतीं. कभी वो मेरा मज़ाक उड़ातेे तो कभी मुझ पर हक़ जमाते.

एक दिन दीदी ने मुझे संध्या के बारे में बताया कि महेश उससे बेहद प्यार करते हैं और शादी करना चाहते हैं. दीदी ने मुझसे वादा लिया कि महेश और संध्या के रिश्ते के बारे में जीजू को समझाने में मदद करूंगी. मेरे दिल में छन्न से कुछ टूट गया, यानी महेश मुझसे प्यार नहीं करते.

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लेकिन मैंने अपनी भावनाएं किसी पर ज़ाहिर नहीं होने दीं. महेश पर भी नहीं, बल्कि अपनी चाहत छिपाने के लिए मैं उन्हें संध्या के नाम से अक्सर छेड़ती. मन में छिपी चाहत तो हमेशा के लिए ख़त्म हो गई.

दीदी के बेटे के पहले जन्मदिन पर मैंने और महेश ने मिलकर ढेर सारी तैयारियां कीं और महेश ने मुझे जी भरकर तंग किया. जाते-जाते मैंने महेश से संध्या की फ़ोटो दिखाने की ज़िद की. सुबह से शाम तक वो चुप रहे, पर रात को जब सब सोने चले गए तो उन्होंने धीरे से मुझसे पूछा, “संध्या की फ़ोटो नहीं देखनी है क्या?” मैं तो उसकी फ़ोटो देखने के लिए बेताब थी ही. वो मुझे छत पर ले गए. मैंने पूछा कि अब तो फ़ोटो दिखा दीजिए. जवाब में उन्होंने एक छोटा-सा आईना मेरे सामने रख दिया और बोले, “मिलिए मेरी संध्या से.” मैं कुछ कह पाती, इससे पहले उन्होंने हमारी मुहब्बत को शब्दों के रंगों से भर दिया.

“प्रिय वर्षा, मैं कोई कवि नहीं हूं जो तुम्हारी सुंदरता पर कविता लिखता. पर तुम जब भी मेरे साथ होती हो, मेरा ख़ुद पर, ज़िंदगी पर यक़ीन बढ़ जाता है. तुम्हारे विचारों व स्वभाव से मैं बहुत प्रभावित हूं और सच्चे मन से तुम्हें अपना जीवनसाथी मान चुका हूं. अब तो इस जीवन की सुबह भी तुम हो और शाम भी. इसलिए तुम ही हो मेरी, स़िर्फ मेरी संध्या.”

आज हमारी शादी को पूरे पांच साल हो गए हैं और हमारी प्यारी-सी बेटी अदा हम दोनों के जीवन की मुस्कान बन गई है.

– वर्षा कोष्टा

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पहला अफेयर: एक अधूरा ख़्वाब… (Pahla Affair: Ek Adhoora Khwab)

Pahla Affair: Ek Adhoora Khwab

Pahla Affair: Ek Adhoora Khwab

पहला अफेयर: एक अधूरा ख़्वाब… (Pahla Affair: Ek Adhoora Khwab)

“शाम को पार्टी में आना न भूलना. एक नामचीन हस्ती को बुलाया है, उनसे तुम्हारी मुलाक़ात करवाऊंगी”, इतना कहने के साथ ही अवनि ने लाइन काट दी. …न जाने इस बार किससे मिलवाने वाली है अवनि? एक क्षण सोचकर मैं फिर अपने काम में मसरूफ़ हो गई. दिनभर के काम निपटाने के बाद पार्टी में जाने की तैयारी करने लगी.

पार्टी में कई चेहरे जाने-पहचाने थे और कुछ बिल्कुल अनजाने. मिलने-जुलने का सिलसिला जारी था. मैं भी इसी सिलसिले में शामिल हो गई. तभी मेरी दोस्त अवनि ने मुझे आवाज़ दी, “अरे राजी, इधर आओ. इनसे मिलो- जाने-माने लेखक शेखरजी.” सामने खड़े शख़्स को देखकर चंद लम्हों के लिए मेरे भीतर एक जलजला-सा महसूस हुआ, फिर मैं सामान्य हो गई.

“आपका नया नॉवेल एक अधूरा ख़्वाब पढ़ा, काफ़ी अच्छा है.” मैंने ख़ुद को समेटकर कहा.

“तारीफ़ के लिए शुक्रिया. कुछ ख़्वाब कभी हक़ीक़त की शक्ल अख़्तियार नहीं करते और कुछ ख़्वाबों को हम ख़ुद अपने हाथों से तार-तार कर देते हैं. कई बार ऐसा होता है, जब हम ख़ुद को बंधनों में न बंधने देकर उस पल तो राहत महसूस करते हैं, पर व़क़्त बीतने के साथ वही आज़ादी हमें काटने-कचोटने लगती है.” इस जुमले के साथ ही शेखर दूसरों से बातचीत करने में मशगूल हो गए.

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घर लौटने पर उनके शब्द मेरे कानों में गूंजने लगे. गुज़रा हुआ व़क़्त करवटें लेने लगा-
पहली बार मैं और शेखर एक काव्य सम्मेलन में मिले थे. मुझे कविताएं लिखने का शौक़ था और शेखर तो अपने फन में माहिर थे ही. मैं शेखर की लेखनी से बहुत प्रभावित थी. धीरे-धीरे शेखर मेरे दिलो-दिमाग़ पर छाने लगे. अक्सर हम लोगों का मिलना-जुलना लगा रहता.
एक दिन हल्की बारिश हो रही थी और हम दोनों कॉफ़ी हाउस में बैठे हुए थे. सहसा शेखर ने कहा, “तुम्हें नहीं लगता कि हम दोनों में बहुत कुछ एक-सा है. कहीं ऐसा तो नहीं कि हमारी पसंद भी एक-सी है.” बहुत देर तक शेखर मेरी आंखों में आंखें डाले देखते रहे. मैं लाजवश कुछ न कह सकी.

“मैं तुम्हें बेहद प्यार करता हूं.” प्रेम का इज़हार इस तरह सुनकर मेरा चेहरा सुर्ख हो गया. फिर तो मेरे दिल में हरदम शेखर की बातें और उसका ख़याल रहने लगा. देखते-देखते अरसा बीत गया. जब घरवालों ने शादी के लिए मुझ पर दबाव डालना शुरू किया तो मैंने शेखर से कहा, “हमारे प्रेम को अगर सामाजिक स्वीकृति मिल जाए तो…”

“राजी, मुझे बंधन पसंद नहीं. मैं खुले आकाश में आज़ादी से उड़ना चाहता हूं. मैंने अभी तक वो मुक़ाम हासिल नहीं किया है, जिसकी मुझे तमन्ना है. यदि शादी की, तो आगे बढ़ने का कोई सवाल ही कहां रहेगा? हम दोनों चाहें तो ताउम्र अच्छे दोस्त बनकर रह सकते हैं, पर हमारे प्यार को रिश्ते में बांधने की कोशिश न करो, प्लीज़…” मेरा दिल तोड़ने में शेखर ने ज़रा भी संकोच नहीं किया. मैं हतप्रभ रह गई. आंखों से आंसू थमे ही नहीं. वो हमारी आख़िरी मुलाक़ात थी.

जब रास्ते ही बदल गए तो शेखर के वजूद को भी मैंने अपनी ज़िंदगी और अपने दिल से अलग कर दिया. कहते हैं, व़क़्त के साथ ज़ख़्म भर जाते हैं. शेखर ने शोहरत व दौलत कमाई और मैंने अपना घर बसाया. जब उसने रिश्ता तोड़ा था तो कितना आहत हुई थी मैं, लेकिन आज शेखर से मिलने के बाद लगा कि उसके ज़ख़्म नासूर बन चुके हैं और वो आज अपने फैसले पर पछता रहा है. दिल ने कहा, “शेखर, तुम मेरी ज़िंदगी का ऐसा ख़्वाब हो, जिसे मैं भूल से भी याद नहीं करना चाहती और मैं तुम्हारी आंखों का वो अधूरा ख़्वाब हूं, जिसे तुमने कभी पूरा करना ही नहीं चाहा. तुम्हें बद्दुआ भी तो नहीं दे सकती. आख़िर मेरे जीवन का पहला प्यार हो तुम.”

– राजेश्‍वरी शुक्ला

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