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जानिए बार-बार पेशाब आने का कारण व निवारण (Frequent Urination: Causes, Symptoms, and Treatment)

ब्लैडर (Bladder) यानी मूत्राशय फुल होने पर वॉशरूम (Washroom) की ओर दौड़ना सामान्य है, लेकिन अगर आपको दिन में कई बार वॉशरूम के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं तो यह गंभीर बीमारी का संकेत हो सकता है.. 

Urination Problems
ख़तरे की घंटी
अगर आप दिनभर से 7 से अधिक बार पेशाब आता है तो यह ख़तरे की घंटी हो सकती है. यदि आपके शौच यानी मूत्र त्यागने की रूटीन में अचानक कोई बड़ा बदलाव तो यह भी किसी समस्या का संकेत हो सकता है. रात में सोने के दौरान दो से अधिक बार मूत्र त्यागने के लिए उठना भी बीमारी का संकेत हो सकता है. मूत्र त्यागने के बाद भी आपको ऐसा लगे कि आपका ब्लैडर खाली नहीं हुआ है तो सावधान हो जाएं. प्रक्रिया जब हमारे ब्लैडर (मूत्राशय) में यूरिन भर जाता है, तो नर्व्स हमारे ब्रेन को सिग्नल भेजकर यूरिन को बाहर निकालने का इशारा करते हैं, लेकिन जिनका ब्लैडर यानी मूत्राशय ओवरएक्टिव होता है ब्लैडर फुल न होने के बावजूद दिमाग तक सिग्नल्स पहुंचने लगते हैं.

कारण
इस समस्या के कई कारण हो सकते हैं. सामान्यरूप से निम्न कारणों के कारण इस समस्या का सामना करना पड़ता है.
डायबिटीज़
पुरुषों को बार-बार पेशाब लगने का सबसे सामान्य कारण डायबिटीज़ होता है. जब शरीर में ग्लूकोज़ लेवल बहुत ज़्यादा बढ़ जाता है तो शरीर मूत्र के माध्यम से उसे बाहर निकालने की कोशिश करता है. यही वजह है कि डायबिटीज़ से पीड़ित लोगों को बार-बार वॉशरूम जाना पड़ता है.
एक्सरसाइज़
जब हम एक्सरसाइज़ करते हैं तो पसीने के माध्यम से शरीर के सारे विषाक्त तत्व बाहर निकल जाते हैं, साथ ही शरीर डिहाइड्रेट भी हो जाता है. ऐसे में शरीर की हाइड्रेट करने के लिए हम ज़्यादा पानी पीते है, नतीजतन बार-बार वॉशरूम की ओर दौड़ना पड़ता है.
ब्लैडर कैंसर
बार बार पेशाब आने की वजह ब्लैडर कैंसर हो सकता है. यह समस्या होने पर मूत्र त्यागने में थोड़ी परेशानी होती है. ब्लैडर कैंसर से पीड़ित पुरुषों बार-बार पेशाब करने की इच्छा होती है.

Urination Problems
प्रोस्टेट कैंसर
प्रोस्टेट कैंसर होने पर भी यह समस्या होती है. आपके लिए यह जानना आवश्यक है कि पेल्विक एरिया में किसी की तरह का कैंसर होने पर यूरेंथ्रा प्रभावित होता है. जिससे बार-बार पेशाब आती है. प्रोसेक्टॉमी करवाने पर कुछ पुरुषों को इस समस्या का सामना करना पड़ता है.
किडनी में इंफेक्शन
किडनी में संक्रमण होने पर भी बार-बार पेशाब आना बेहद आम बात है  इसले अगर आपको यह परेशानी है तो इसकी जांच ज़रूर करवाएं.
यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन
अगर यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन का समय रहते इलाज न कराया जाए तो बार-बार पेशाब आने की वजह बन सकती है. यूटीआई से पीड़ित होने पर सामान्य से अधिक पेशाब आती है और पेशाब करते समय खुजली और जलन जैसी समस्या भी होती है.
मनोवैज्ञानिक कारण
अधिक पेशाब आने के पीछे केवल शारीरिक ही नहीं, बल्कि मानसिक कारण भी  हो सकते हैं. कभी-कभी तनाव, थकान, डर इत्यादि के कारण भी बहुत से लोग बारबार शौचालय की ओर रुख करते हैं.

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ट्रीटमेंट
इस समस्या के इलाज के लिए बहुत-से ट्रीटमेंट्स उपलब्ध हैं. अगर बहुत अधिक बार पेशाब नहीं आती तो इलाज की कोई आवश्यकता नहीं है, कुछ केसेज़ में खानपान के बदलाव करके भी इस समस्या से निजात पाया जा सकता है. ओवरएक्टिव ब्लैडर को कंट्रोल करने के लिए बहुत-सी दवाएं उपलब्ध हैं. अगर डायबिटीज़ के कारण यह समस्या होती है तो ब्लड शुगर को कंट्रोल में रखकर इससे इजात पाया जा सकता है. बैक्टिरियल किडनी इंफेक्शन होने की स्थिति में डॉक्टर्स एंटीबायोटिक्स व पेनकिलर्स का सहारा लेते हैं. ओवएक्टिव ब्लैडर होने पर डॉक्टर दवा देते हैं.

घरेलू उपाय
1. भरपूर मात्रा में पानी पीएं. ताकि यदि किसी प्रकार का इंफेक्शन हो तो वह पेशाब के माध्यम से निकल जाए और आपको इस तरह की परेशानी न झेलनी पड़े.
2. दही, पालक, तिल, अलसी, मेथी की सब्ज़ी आदि का रोज़ाना सेवन करना इस समस्या में फ़ायदेमंद साबित होगा.
3. सूखे आंवले को पीसकर चूर्ण बना लें और इसमें गुड़ मिलाकर खाएं. इससे बार-बार पेशाब आने की समस्या में लाभ होता है. विटामिन सी से भरपूर चीज़ों का सेवन करें.
4. अनार के छिलकों को सुखा लें और इसे पीसकर चूर्ण बना लें. अब सुबह-शाम इस चूर्ण का सेवन पानी के साथ करें. अगर चाहें तो इसका पेस्ट बना सकते हैं.
5. मसूर की दाल, अंकुरित अनाज, गाजर का जूस व अंगूर का सेवन भी इस समस्या के लिए एक कारगर उपाय है.

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रूमेटॉइड आर्थराइटिसः कारण, लक्षण व उपचार (Rheumatoid Arthritis: Symptoms, Causes And Treatment)

आर्थराइटिस (Arthritis) के 100 से अधिक प्रकार हैं और उनमें से एक है रूमेटॉइड आर्थराइटिस (Rheumatoid Arthritis). भारत में क़रीब 1 फ़ीसदी लोग रूमेटॉइड आर्थराइटिस से पीड़ित हैं यानी लगभग 1 करोड़ लोग इस समस्या से जूझ रहे हैं. तेज़ी से पैर फैला रही इस बीमारी के कारण, लक्षण वउपचार के तरीक़ों के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए हमने बात की स्टेमआरएक्स बायोसाइंस सोल्यूशन्स प्राइवेट लिमिटेड के रिजनरेटिव रिसर्चर डॉ. प्रदीप महाजन से.

जब हमारे शरीर में किसी भी तरह का बाहरी कीटाणु या जीवाणु प्रवेश कर जाता है तो उसे इंफेक्शन कहते हैं. इस इंफेक्शन को ख़त्म करने के लिए हमारा इम्यून सिस्टम सेल्स इंफेक्शन वाली जगह पर अटैक करता हैै. इसके कारण उस जगह पर दर्द, सूजन या रेडनेस इत्यादि हो जाती है, जिसे इंफ्लामेशन कहते हैं, लेकिन जब बिना इंफेक्शन के इंफ्लामेशन होता है तो उसे ऑटो इम्यून डिज़ीज़ कहते हैंं. ऐसी स्थिति में शरीर की रक्षा प्रणाली ही शरीर के टिशूज़ पर अटैक करना शुरू कर देती है.

Rheumatoid Arthritis

क्या है यह बीमारी? 

रूमेटॉइड आर्थराइटिस एक ऑटो इम्यून डिज़ीज़ है. जैसा कि  हमने बताया कि आमतौर पर हमारा इम्यून सिस्टम किसी भी बाहरी इंफेक्शन से हमारे शरीर की रक्षा करता है. इस बीमारी में इम्यून सिस्टम सेल्स और एंटीबॉडीज़ शरीर का साथ देना बंद कर देती हैं और शरीर की रक्षा करने की बजाय अपने ही जोड़ों के टिशूज़ पर अटैक करना शुरू कर देती हैं, जिसके कारण हड्डियों के जोड़ों में इंफ्लामेशन, दर्द, सूजन और अकड़न की समस्या होती है. यह बीमारी हमारे शरीर के जोड़ों, जैसे कलाई, घुटने और उंगलियों इत्यादि को प्रभावित करती है. रूमेटॉइड आर्थराइटिस होने पर दो हड्डियों के बीच जो कवरिंग है वो कड़क हो जाती है और दबने लगती है, जिसके कारण ज्वॉइंट नहीं हिल पाता और ज्वॉइंट के आस-पास की टिशूज़ में सूजन आ जाती है.

Rheumatoid Arthritis Symptoms
अन्य अंगों पर प्रभाव
यह बीमारी शरीर के जोड़ों के साथ-साथ  शरीर के कई अंगों को भी प्रभावित करती है, जिसके कारण इसे सिस्टमिक डिज़ीज़ कहते हैं. यह बीमारी शरीर के दूसरे अंगों, जैसे-आंख, हृदय, किडनी, फेफड़े और रक्त कोशिकाओं को भी प्रभावित करती है. रूमेटॉइड आर्थराइटिस शरीर के किसी भी अंग को प्रभावित कर सकता है.
रूमेटॉइड आर्थराइटिस के कारण
अब तक इस बीमारी का मूल कारण पता नहीं चल पाया है. यह ऑटो इम्यून बीमारी है इसलिए यह किसे होगी और किसे नहीं? यह कहना मुश्क़िल है, लेकिन डॉक्टरों के अनुसार जिन लोगों को लंबे समय तक मसूढ़ों में इंफेक्शन की समस्या रही है या जो लोग बहुत ज़्यादा धूम्रपान करते हैं या शराब पीते हैं, उन्हें रूमेटॉइड आर्थराइटिस होने का ख़तरा ज़्यादा होता है. इसके अलावा जिनके शरीर में हार्मोनल चेंजेज़ ज़्यादा होते हैं, उन्हें भी यह बीमारी होने का ख़तरा ज़्यादा होता है. कहने का अर्थ है कि हमारे शरीर का जो मेंटेनेंस सिस्टम शरीर का तापमान, पीएच लेवल इत्यादि मेंटेन करके संतुलित रखता है. अगर उसमें इंफेक्शन या अन्य किसी भी कारण से बार-बार असंतुलन होता है, तो रूमेटॉइड आर्थराइटिस होने का ख़तरा बढ़ जाता है. यह बीमारी पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं को ज़्यादा होती है. इसके अलावा अगर माता-पिता या घर के किसी क़रीबी रिश्तेदार को यह बीमारी हो तो इसके होने की आशंका बढ़ जाती है.
रूमेटॉइड आर्थराइटिस के मुख्य लक्षण
1. एक या एक से अधिक जोड़ों में दर्द  व सूजन रहना.
2. सुबह उठने पर एक घंटे से ज़्यादा देर तक जोड़ों में जकड़न रहना.
3. जोड़ों के दबाने पर दर्द महसूस होना.
4. जोड़ों को घंटे भर न हिलाने पर उनका जकड़ जाना.
.5. पीठ दर्द.
6. त्वचा में कसाव.
7. बुखार.
8. आंखों में जलन
9. हाथों व पैरों का सुन्न होना.

ख़तरे की घंटी
आमतौर पर हर किसी को कभी न कभी जोड़ों में दर्द की शिकायत होती है और इसमें कोई चिंता की बात नहीं है, लेकिन जब यह दर्द कुछ दिनों या हफ़्तों में ठीक नहीं होता और समय के साथ बढ़ता जाता है, शरीर में सुबह क़रीब आधे घंटे से ज़्यादा समय तक अकड़न महसूस होती है, जोड़ों में सूजन रहती है तो समझ लीजिए कि अब आपको डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए.

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रूमेटॉइड आर्थराइटिस के लिए टेस्ट
वैसे तो ऐसा कोई टेस्ट नहीं है, जिससे रूमेटॉइड आर्थराइटिस की पुष्टि हो सके, लेकिन इसका पता लगाने के लिए डॉक्टर कुछ ब्लडटेस्ट करा सकते हैं.
रूमेटॉइड फैक्टर टेस्टः ब्लड टेस्ट की मदद से शरीर में रूमेटॉइड फैक्टर नामक प्रोटीन की जांच की जाती है. शरीर में इसकी अधिक मात्रा होने पर ऑटोइम्यून बीमारियों का ख़तरा बढ़ जाता है.
एंटीसिट्रुलिनेटेड प्रोटीन एंटीबॉडी टेस्टः इस टेस्ट की मदद से शरीर में एंटीबॉडीज़ की जांच की जाती है, जिसके कारण रूमेटॉइड आर्थराइटिस की समस्या होती है. जिन लोगों के शरीर में ये एंटीबॉडीज़ होते हैं, उन्हें अमूनन यह बीमारी होती है.
एंटीन्यूक्लियर एंटीबॉडी टेस्टः इस टेस्ट की मदद से यह पता लगाया जाता है कि व्यक्ति का इम्यून सिस्टम एंटीबॉडीज़ प्रोड्यूस कर रहा है या नहीं.
सी-रिएक्टिव प्रोटीन टेस्टः शरीर में गंभीर इंफेक्शन या सूजन होने पर लिवर सी-रिएक्टिव प्रोटीन बनाना शुरू कर देता है. शरीर में इस प्रोटीन की मात्रा अधिक होने पर रूमेटॉइड आर्थराइटिस हो सकता है. इस टेस्ट की मदद से सी-रिएक्टिव प्रोटीन के स्तर का पता लगाया जाता है.

कब होती है यह समस्या?
हालांकि यह सच है कि उम्रदराज़ लोगों को रूमेटॉइड आर्थराइटिस होने का ख़तरा ज़्यादा होता है, लेकिन यह किसी भी उम्र में हो सकता है. आमतौर पर यह बीमारी 40 से 60 साल की उम्र में होती है. ढेर सारे शोध और अध्ययन के बाद भी इस बीमारी को जड़ से ख़त्म करने का उपाय नहीं ढूंढ़ा जा सका है, तसल्ली की बात यह है कि नियमित रूप से ट्रीटमेंट व थेरेपी की मदद से इसके प्रभावों को कम किया जा सकता है.

रूमेटॉइड आर्थराइटिस के लिए ट्रीटमेंट
रूमेटॉइड आर्थराइटिस का ट्रीटमेंट बहुत मुश्क़िल होता है और बहुत लंबा चलता है. ट्रीटमेंट के लिए दवाएं, फिज़ियोथेरेपी व एक्सरसाइज़ का प्रयोग किया जाता है. जल्दी व सही समय पर ट्रीटमेंट शुरू करने से इसके दुष्प्रभावों को कम किया जा सकता है, ताकि जोड़ों को रिप्लेस करने की आवश्यकता न पड़े. शुरुआती इलाज के लिए डिज़ीज़ मॉर्डिफाइड एंटीरोमैडिक ड्रग्स, जैसे-मेथोट्रेजेट लिफोनोमाइड, हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन  दी जाती हैं. इसके साथ दर्द व सूजन कम करने के लिए एंटीइंफ्लेमेटरी दवाइयों के साथ-साथ एक्सरसाइज़ करने और आराम करने की सलाह भी दी जाती है. इसके अलावा मरीज़ को स्टेरॉइड भी दी जाती है. रूमेटॉइड आर्थराइटिस के मरीज़ों को डॉक्टर के पास नियमित रूप से जाना चाहिए, क्योंकि दवाओं के साइड इफेक्ट होने की आशंका भी होती है.

रूमेटॉइड आर्थराइटिस के लिए डायट
इस बीमारी से पीड़ित मरीज़ों को डॉक्टर एंटीइंफ्लेमेटरी डायट लेने की सलाह देते हैं, ताकि इस बीमारी के लक्षणों को कम किया जा सके. इसके लिए मरीज़ को ओमेगा3 फैटी एसिड के भरपूर खाद्य पदार्थ, जैसे-अखरोट, सॉल्मन व ट्यूना मछली, अलसी खाने की सलाह की जाती है. इसके अलावा विटामिन ए, सी, ई और सेलेनियम भी सूजन कम करने में मदद करते हैं. इसके लिए क्रैनबेरी, स्ट्रॉबेरीज़, डार्क चॉकलेट, पालक, राजमा इत्यादि का सेवन करना चाहिए. इस बीमारी से पीड़ित लोगों के लिए भरपूर मात्रा में फाइबर ग्रहण करना भी बेहद आवश्यक है. फाइबर ग्रहण करने से शरीर में सी-रिएक्टिव प्रोटीन का लेवल कम होता है, जिससे सूजन से आराम मिलता है. इसके लिए साबूत अनाज, हरी सब्ज़ियां, फल इत्यादि का सेवन करना फ़ायदेमंद होता है. फ्लैवोनॉइड्स युक्त खाद्य पदार्थों के सेवन से भी काफ़ी आराम मिलता है.

कैसे बचें?
रूमेटॉइड आर्थराइटिस से पूरी तरह बचना तो आसान नहीं है, लेकिन कुछ उपायों को अपनाकर इसके ख़तरे को कम किया जा सकता है.
एक्सरसाइज़ करेंः नियमित रूप से एक्सरसाइज़ करें. इससे शरीर में रक्त का संचार तेज़ होता है व ज्वॉइंट्स स्वस्थ रहते हैं. पर यदि आपको ज्वॉइंट पेन की समस्या है तो डॉक्टर की सलाह लेकर ही एक्सरसाइज़ करें.
धूम्रपान से बचेंः बहुत से शोधों से यह सिद्ध हुआ है कि धूम्रपान के कारण रूमेटॉइड आर्थराइटिस का ख़तरा दोगुना बढ़ जाता है. यदि आप स्वस्थ रहना चाहते हैं तो धूम्रपान छोड़ दें.

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उच्च रक्तचाप के कारण व निवारण (Causes and Treatment of High Blood Pressure)

उच्च रक्तचाप (High Blood Pressure) कई बीमारियों का जड़ होता है. आख़िर क्यों होती है ये बीमारी और इससे कैसे बचा जा सकता है, बता रहे हैं फोर्टिस एस्कॉर्ट हार्ट इंंस्टिट्यूट, नई दिल्ली के कॉर्डियोलॉजी डिपार्टमेंट के एडिशनल डायरेक्टर डॉ. अर्पित जायसवाल.

High Blood Pressure

1. मोटापा इसकी प्रमुख वजह है. 40 से अधिक इंच की कमर वाले पुरुष व 35 से अधिक इंच की कमर वाली महिलाओं को उच्च रक्तचाप का ख़तरा ज़्यादा होता है. अतः दिल की बीमारियों से बचना है तो वज़न को नियंत्रित रखें. वज़न घटाकर और कमर का आकार कम करके हार्ट अटैक का ख़तरा कम किया जा सकता है.
2. ज़्यादा तनाव लेने से कोलेस्ट्रॉल बढ़ता है, जिसके परिणामस्वरूप उच्च रक्तचाप की शिकायत पैदा होती है.
3. धूम्रपान व शराब का सेवन भी दिल की सेहत पर बुरा प्रभाव डालता है. शराब का सेवन कम करें और धूम्रपान छोड़ दें. हफ़्ते में एक-दो शराब पीने में कोई हर्ज़ नहीं है, लेकिन इससे ज़्यादा शराब दिल के लिए हानिकारक होता है.
4. जिन लोगों की लाइफस्टाइल एक्टिव नहीं होती, उन्हें भी हृदय रोग और उच्च रक्तचाप का ख़तरा अन्य लोगों की तुलना में ज़्यादा होता है. इसलिए सप्ताह में कम से कम 5 दिन व्यायाम करें और संतुलित भोजन करें.
5. चाय, एनर्जी ड्रिंक और कैफीन युक्त खाद्य पदार्थ इंस्टेंट एनर्जी तो देते हैं, लेकिन इससे ब्लड प्रेशर बढ़ने का ख़तरा भी रहता है. अतः संतुलित मात्रा में कैफीन ग्रहण करें.

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रक्तचाप संतुलित रखने के लिए लें ये आहार 

केला
केला एक ऐसा फल है जिसका हाई ब्लडप्रेशर के मरीज़ों को नियमित रूप से सेवन करना चाहिए. केले में पोटैशियम प्रचुर मात्रा में होता है जो कि सोडियम के असर को कम करता हैे. रोज़ एक से दो केले का सेवन शुरू करें. केले के साथ आप सूखे खुबानी, किशमिश, संतरे का रस, पालक, बेक्ड आलू और कैंटोलॉप का भी सेवन कर सकते हैं.
अजवायन
अजवायन में मौजूद फाइटोकेमिकल उच्च रक्तचाप को नियंत्रित करने में मदद करता है. यह धमनी की दीवारों और आस-पास की मांसपेशियों को आराम देता है, जिससे धमनियों में अधिक स्थान बनाने के साथ बिना बाधा के रक्त प्रवाह होता है. इसके
साथ-साथ यह तनाव पैदा करने वाले हार्मोन, जो कि रक्त वाहिकाओं को सिकोड़ते हैं, को नियंत्रित करने में मदद कर सकता है.
नारियल पानी
उच्च रक्तचाप से पीड़ित लोगों को शरीर में पानी की कमी नहीं होने देना चाहिए. रोज़ाना आठ से दस गिलास पानी पीना अच्छा होता है. रक्तचाप को कम करने के लिए नारियल का पानी विशेष रूप से फ़ायदेमंद है. नारियल के पानी के साथ, आप खाना पकाने में नारियल तेल का उपयोग भी कर सकते हैं.
काली मिर्च
हल्के उच्च रक्तचाप से पीड़ित लोगों को काली मिर्च खाने से फ़ायदा होगा. यह प्लेटलेट्स के साथ मिलकर रक्त के थक्के बनने से रोकती है. आप फलों या सब्ज़ियों में कुछ काली मिर्च डाल सकते हैं या सूप में भी एक चुटकी काली मिर्च डाल सकते हैं.
प्याज़ का रस
प्याज़ भी आपके रक्तचाप को कम करने के लिए मददगार है. इसमें फ्लेवेनोल नामक एंटीऑक्सीडेंट मौजूद होता है. एक मध्यम आकार की कच्ची प्याज़ नियमित रूप से खाने की कोशिश करें. आप एक से दो सप्ताह तक प्रतिदिन दो बार आधा चम्मच प्याज़ का रस शहद के साथ ले सकते हैं.
शहद
शहद दिल पर रक्त के दबाव को कम करती है. शहद रक्त वाहिकाओं पर असर करती है और यह उच्च रक्तचाप को कम करने में सहायक होती है. हर सुबह खाली पेट दो चम्मच शहद खाएं.
लहसुन
कई अध्ययनों में यह साबित हुआ है कि लहसुन में ब्लडप्रेशर कम करने की क्षमता होती है. कच्चा हो या पका हुआ, दोनों तरह का लहसुन उच्च रक्तचाप को नियंत्रित करने में मददगार होता है. साथ ही यह कोलेस्ट्रॉल के स्तर को भी कम करता है. लहसुन नाइट्रिक ऑक्साइड और हाइड्रोजन सल्फाइड के उत्पादन को उत्तेजित करके रक्त वाहिकाओं को आराम पहुंचाने में मददगार होता है. रोज़ाना एक या दो कुचले हुए लहसुन खाएं. आप इसे अपने हाथों से भी कुचल सकते हैं. लहसुन को कुचलने से हाइड्रोजन सल्फाइड पैदा होता है. यह रक्त प्रवाह को सामान्य रखता है, गैस निकालता है और दिल पर दबाव कम करता है.
मेथी के बीज
मेथी के बीज में उच्च पोटैशियम और फाइबर होने के कारण यह उच्च रक्तचाप को कम करने के लिए प्रभावी है. दो चम्मच मेथी के बीजों को पानी में लगभग दो मिनट तक उबालें और फिर इसे ठंडा कर लें. इसके बाद इसके बीज निकालकर उसका पेस्ट बना लें. इस पेस्ट को रोज दो बार खाएं. अपने रक्तचाप के स्तर में महत्वपूर्ण सुधार के लिए इस उपाय को दो से तीन महीनों तक करें.
नींबू
नींबू धमनियों को नरम रखने में सहायक होता है. जब रक्त वाहिकाओं में कठोरता नहीं होगी तो उच्च रक्तचाप स्वाभाविक रूप से कम हो जाएगा. इसके अलावा आप नींबू के नियमित सेवन से हार्टफेल की संभावना को भी कम कर सकते हैं. विटामिन सी एक एंटीऑक्सीडेंट है, जो मुक्त कणों के हानिकारक प्रभावों को बेअसर करने में मदद करता है.
तरबूज के बीज
तरबूज के बीज में कूक्रोबोकिट्रिन नामक एक यौगिक होता है, जो कि रक्त कोशिकाओं को चौड़ा करने में मदद करता है. यह किडनी के कामकाज को बेहतर बनाने में भी मदद करता है, साथ ही यह रक्तचाप के स्तर को कम करता है.

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सिरदर्द के प्रकार, कारण और उनसे छुटकारा पाने के अचूक उपाय(Types of Headaches: Causes & How to Get Rid of Them)

Types of Headaches Causes & remedies

सिरदर्द (Headaches) की समस्या बहुत आम है. हममें से ज़्यादातर लोगों को कभी को कभी न कभी सिरदर्द (Sirdard) तो होता ही है, लेकिन इससे छुटकारा पाने के लिए हर बार पेनकिलर घोंट लेना ख़तरनाक हो सकता है, क्योंकि कभी-कभी पेनकिलर भी सिरदर्द का कारण हो सकता है. चौंक गए ना आप! पर सच्चाई यही है. इसलिए सिरदर्द का कारण और उसे ठीक करने का सही तरीक़ा जानना बहुत ज़रूरी है. इसी बात को ध्यान में रखते हुए कुछ प्रमुख सिरदर्द (Types of Headaches) और उनसे निजात पाने के उपाय बता रहे हैं.

Types of Headaches Causes & remedies

टेंशन हेडेक
यह सिरदर्द का सबसे सामान्य प्रकार है. हर कोई अपने जीवन में कम से कम एक बार इसका अनुभव करता है.
लक्षणः इसमें सिर के दोनों ओर या कनपटी के आस-पास हल्का दर्द महसूस होता है. टेंशन हेडेक होने पर सिर पर दबाव जैसा महसूस होता है और ऐसा लगता है कि माथे पर टाइट बैंड बंधा हुआ है. इसमें सामान्यतः दर्द धीरे-धीरे बढ़ता है.
कारणः यह अनेक कारणों से होता है. तनाव, थकान, ग़लत पोश्‍चर, नींद की कमी, चाय-कॉफी की आदत होने पर समय से पीना और सिर को बहुत अधिक समय तक ग़लत पोजिशन में रखना इसके प्रमुख कारण हैं.
इलाजः टेंशन हेडेक का इलाज उसके कारण पर निर्भर करता है. अगर नींद की कमी के कारण सिरदर्द है तो आराम कीजिए. अगर इसका कारण तनाव है तो एक्सरसाइज़ व मेडिटेशन कीजिए. अगर आप ठीक तरी़के से खाना नहीं खा रहे तो खाना समय पर खाइए या फिर पर्याप्त मात्रा में पानी नहीं पी रहे हैं तो ख़ूब पानी पीजिए. आप टेंशन हेडेक दूर करने के लिए उपयुक्त पेन किलर भी ले सकते हैं, लेकिन ध्यान रहे पेन किलर का सेवन कभी-कभार ही करना चाहिए. ज़्यादा पेन किलर का सेवन करने से लिवर के क्षतिग्रस्त होने, हार्ट अटैक या स्ट्रोक का ख़तरा रहता है. अगर इस तरह का सिरदर्द बार-बार हो और ज़्यादा समय तक रहे तो डॉक्टर से संपर्क करें. फिजिकली ऐक्टिव रहने की कोशिश करें. अपने कंधों व गर्दन को नियमित रूप से स्ट्रेच करते रहें.

साइनस हेडेक

Types of Headaches Causes & remedies
इस तरह का सिरदर्द सामान्यतौर पर साइनस इंफेक्शन या एलर्जी के कारण होता है. इसमें सिरदर्द के साथ-साथ बुखार व चेहरे पर सूजन भी होता है. सरल शब्दों में कहें तो जब हमारे साइनस एरिया यानी माथे, चीकबोन्स व दोनों आंखों के बीच के हिस्से पर दबाव पड़ता है तो सिरदर्द होता है.
लक्षणः इस तरह के सिरदर्द में माथे के बीचों-बीच यानी आइब्रोज़ के आस-पास व आंखों के निचले हिस्से पर गहरा दबाव व दर्द महसूस होता है. जल्दी से सिर घूमाने पर दर्द बढ़ जाता है. इसमें सिरदर्द के साथ नाक बहना या ब्लॉक भी हो जाता है और थकान भी महसूस होती है.
कारणः साइनस हेडेक साइनसाइटिस के कारण होता है. कभी-कभी सर्दी या सीज़नल एलर्जी के कारण भी साइनस हेडेक की समस्या होती है.
इलाजः साइनस के कारण होनेवाला सिरदर्द सामान्यतः अपनेआप ठीक हो जाता है. कुछ लोगों को सैलाइन नेज़ल स्प्रे से आराम मिल जाता है, अगर आपको एजर्ली है तो एंटीहिस्टामाइन्स टैबलेट्स से आराम मिल सकता है. अन्य केसेज में बेहतर होगा कि आप डॉक्टर से संपर्क करें, जो कि आपको अमूमन एंटीबायोटिक्स का सेवन करने की सलाह देंगे.

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माइग्रेन
माइग्रेन में बहुत तेज़ सिरदर्द होता है.यह दर्द कुछ घंटों से लेकर कुछ दिनों तक रह सकता है. माइग्रेन के समय सिर के नीचे की धमनी बड़ी हो जाती है और कभी-कभी सिरदर्द वाले हिस्से में सूजन भी आ जाती है.
लक्षणः सिर के किसी एक हिस्से में बहुत तेज़ दर्द आंखों में दर्द, धुंधला दिखाई देना, आंखों के सामने बिजली चमकना, उल्टी, जी मिचलाना, भूख कम लगना, कमज़ोरी, ज़्यादा पसीना निकलना, आवाज़ और रोशनी के प्रति संवेदनशील बढ़ जाना, पसीना आना इत्यादि इसके प्रमुख लक्षण हैं.
कारणः माइग्रेन की बीमारी का प्रमुख कारण अभी तक पता नहीं चल पाया है, लेकिन आमतौर पर यह आनुवांशिक होता है यानि यदि आपके परिवार के किसी सदस्य को माइग्रेन हो तो आपको माइग्रेन होने की आशंका बढ़ जाती है, इसके लिए तनाव, उच्च रक्तचाप, असंयम, खान-पान की आदतें, पीरियड्स इत्यादि के कारण से भी माइग्रेन अटैक आता है. कभी-कभी हार्मोनल असंतुलन के कारण भी माइग्रेन होता है.
इलाजः अभी तक माइग्रेन का कोई इलाज नहीं है. माइग्रेन के अटैक से बचने के लिए संतुलित आहार लें, ज़्यादा देर तक भूखे न रहें. भरपूर मात्रा में पानी पीएं. र्प्याप्त नींद लें. अधूरी नींद या ज़्यादा समय तक सोने से भी माइग्रेन का दर्द बढ़ जाता है. डॉक्टर की सलाह लेकर दवाई लें. कुछ दवाओं के कारण भी माइग्रेन उभर जाता है इसलिए डॉक्टर की सलाह के बिना कोई दवा नहीं लेनी चाहिए. तनावमुक्त रहने की कोशिश करें. योग, प्राणायाम या संगीत सुनकर मन को शांत रखने की कोशिश करें. दर्द वाले हिस्से पर ठन्डे पानी की पट्टी रखने से रक्त की धमनियां फैल जाती हैं और दर्द कम हो जाता है. इसके अलावा तेज धूप में बाहर न जाएं. तेज़ रौशनी की तरफ़ न देखें. गर्मी के दिनों में बाहर जाते समय टोपी का इस्तेमाल करें. ज़्यादा नज़दीक से टीवी या कंप्यूटर न देखें. ज़्यादा ऊंचाईवाली जगह पर न जाएं. तेज़ गंध वाले परफ्यूम या डियोड्रेंट का इस्तेमाल न करें.

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क्लस्टर हेडेक

Types of Headaches Causes & remedies
क्लस्टर हेडेक के बारे में ज़्यादा लोगों को जानकारी नहीं है. मात्र 1 प्रतिशत जनसंख्या ही क्लस्टर हेडएक की शिकार है. यह महिलाओं की तुलना में पुरुषों में ज़्यादा कॉमन है.
लक्षणः जैसा कि नाम से पता चलता है कि इसमें नियमित अंतराल पर यानी बार-बार कई दिनों तक सिरदर्द होता है. इसमें आंखों के आस-पास या पिछले हिस्से या सिर के एक तरफ दर्द होता है. यह आमतौर पर नींद के दौरान शुरू होता है. आंखों का लाल होना, पुतलियों का सिकुड़ना, आंखों से पानी निकलना, चेहरा का लाल होना, पसीना आना, नाक बहना, आवाज़ व प्रकाश के प्रति संवेदनशीलना इसके प्रमुख लक्षण है. यह दर्द 15 मिनट से लेकर 1 घंटे तक रहता है. इसमें सामान्यतौर पर रोज़ाना एक ही समय पर दर्द उभरता है. इसलिए इसे अलार्मक्लॉक हेडेक भी कहते हैं.
कारणः अभी तक इसकी प्रमुख वजह के बारे में पता नहीं लगाया जा सकता है. लेकिन आनुवांशिक, तंबाकू का सेवन, शरीर के बायोलॉजिकल क्लॉक में गड़बड़ी इसके प्रमुख कारण हैं.
ट्रीटमेंटः क्लस्टर हेडेक की समस्या होने पर तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए. क्योंकि डॉक्टर की इसका सही इलाज कर सकता है. कुछ केसेज़ में डॉक्टर्स ऑक्सिजन थेरैपी भी देते हैं.

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मेन्ट्रुअल माइग्रेन्स


कुछ महिलाओं को माहवारी के एक-दो दिन, माहवारी के दौरान या ओवल्यूशन के दौरान सिरदर्द होता है.
लक्षणः इसके लक्षण माइग्रेन की तरह की होते हैं. सिर के एक तरफ़ तेज़ दर्द, नॉज़िया और प्रकाश व आवाज़ के प्रति संवेदनशीलता इसके प्रमुख लक्षण हैं.
कारणः जैसा कि नाम से ही पता चलता है इसका संबंध महावारी से है. माहवारी के पहले महिलाओं के शरीर में एस्ट्रोजेन व प्रोजेस्टेरॉन का स्तर अचानक से कम हो जाता है, जिसके कारण यह दर्द उभरता है. कुछ केसेज़ में गर्भनिरोधक दवाइयों के सेवन के कारण भी यह दर्द उभर जाता है, क्योंकि लगातार तीन हफ़्तों तक ये इन हार्मोन्स के स्तर को नियंत्रित रखते हैं. ऐसे में माहवारी के पहले इनका सेवन नहीं करने पर इन हार्मोन्स का स्तर अचानक घट जाता है, नतीजतन सिरदर्द होता है.
उपचारः मेन्ट्रुअल माइग्रेन होने पर नॉन स्टेरॉइडल एंटी-इंफ्लेमेटरी ड्रग, जैसे-आइब्रुफेन का सेवन किया जा सकता है. यह माइग्रेन के साथ-साथ पीरियड्स क्रैम्प्स को कम करने में भी मदद करते हैं. इसके अलावा यदि आप गर्भनिरोधक दवा का सेवन करती हैं तो डॉक्टर की सलाह लेकर ऐसे पिल लें, जिसमें एस्ट्रोजेन की मात्रा कम हो.

रीबाउंड हेडेक
इसे मेडिकेशन ओवरयूज़ हेडेक के नाम से भी जाना जाता है. जब आप बहुत ज़्यादा दर्द निवारक दवाइयों का सेवन करते हो, तो इन दवाइयों के कारण ही सिरदर्द शुरू हो जाता है.
लक्षणः इसके लक्षण माइग्रेन की तरह ही होते हैं और यह सामान्यतः प्रतिदिन होता है. ज़्यादातर सुबह के व़क्त. हालांकि दवा लेने से सिरदर्द से आराम मिलता है, लेकिन दवा का असर खत्म होते ही फिर से दर्द शुरू हो जाता है.
कारणः ज़रूरत से ज़्यादा दर्द निवारक दवाइयों का सेवन.
उपचारः रीबाउंड हेडेक से बचने का एकमात्र उपाय है कि पेनकिलर्स से दूरी. सुनने में भले ही थोड़ा अजीब लगे, लेकिन इसका यही सही इलाज है. शुरुआत के 1-2 हफ़्ते आपको समस्या होगी, लेकिन फिर धीरे-धीरे आपका शरीर दवाओं के साइडइफेक्ट से बाहर आ जाएगा.

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चाहे आपको किसी भी प्रकार का सिरदर्द हो, अगर आपको यह समस्या अक्सर और बहुत ज़्यादा होती है तो बेहतर होगा कि डॉक्टर से कंस्लट करके अपनी परेशानी बताएं और उसी के अनुसार ट्रीटमेंट कराएं.