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रिश्तों की बीमारियां, रिश्तों के टॉनिक (Relationship Toxins And Tonics We Must Know)

रिश्ते (Relationships) जीने के आधार हैं… मुहब्बत की शीतल बयार हैं, पर जब इन्हीं रिश्तों में शक, ईर्ष्या, अविश्‍वास की बीमारियां फैलने लगती हैं, तब जीना दूभर हो जाता है. तो क्यों न प्यार, विश्‍वास, समझदारी जैसे टॉनिक से इन बीमारियों को दूर किया जाए और रिश्तों में मुहब्बत की मिठास घोली जाए.

Relationship Toxins And Tonics

आज जहां एक ओर दुनिया सिमट रही है, वहीं दूसरी ओर रिश्ते और परिवार टूट रहे हैं. एक-दूसरे के प्रति हमारी संवेदनाएं कम होती जा रही हैं. हमारी व्यस्तताएं, हमारे अवसादों की छाया हमारे रिश्तों पर दिखने लगी है. नतीज़तन रिश्ते अपना औचित्य, अपनी गरिमा खोते जा रहे हैं. इन सबके बीच हम यह भूल जाते हैं कि स्वस्थ रिश्ते एक परिपक्व समाज की दरक़ार हैं. इसलिए सबसे ज़रूरी यह है कि हम यह जानें कि हमारे रिश्ते किन बीमारियों से जूझ रहे हैं यानी वे कौन-सी भावनात्मक बीमारियां हैं, जो रिश्तों को खोखला कर रही हैं. साथ ही रिश्तों से जुड़े उन पहलुओं के बारे में भी जानें, जो रिश्तों की इन बीमारियों को दूर करने में टॉनिक का काम करती हैं.

रिश्तों की बीमारियां

शक और अविश्‍वास

जी हां, रिश्ते की सबसे बड़ी व भयंकर बीमारी है शक. किसी भी रिश्ते में ख़ासकर पति-पत्नी के रिश्ते में अगर शक पनपने लगे, तो समझ लीजिए कि आपके रिश्ते को आई.सी.यू. की ज़रूरत है. शक या संशय के साथ किसी भी रिश्ते को ़ज़्यादा दिनों तक नहीं निभाया जा सकता. आप जिस व्यक्ति या रिश्ते पर शक कर रहे हैं, उससे आप कभी प्रेम या जुड़ाव नहीं कर पाएंगे. यदि आप किसी रिश्ते से बंधे हैं, तो आपको चाहिए कि उसे पूरे दिल से स्वीकार करें. यदि आपको किसी पर अविश्‍वास है, तो इसका मतलब है कि आपके रिश्ते में खटास है और उस रिश्ते को आपने पूरी तरह से स्वीकार नहीं किया है. अविश्‍वास किसी भी रिश्ते के लिए घातक है. फिर चाहे बात मां-बेटी की होे, सास-बहू की या फिर ननद-भाभी की.

द्वेष या जलन

किसी से द्वेष या जलन की भावना जहां एक ओर आपको आपके प्रियजनों से दूर करती है, वहीं दूसरी ओर आपके व्यक्तित्व को भी ख़राब करती है. किसी से द्वेष या जलन की भावना बीमारी होने से ज़्यादा बुरी है. यह आदत आपके किसी एक रिश्ते को नहीं, बल्कि सारे रिश्तों को बीमार कर सकती है. आप किसी एक से जलना शुरू करेंगे और फिर धीरे-धीरे आप हर किसी से जलने लगेंगे.

बेवफ़ाई

किसी भी रिश्ते में बेवफ़ाई या बेईमानी उस रिश्ते की ज़ड़ों को ही खोखला कर देती है. किसी के विश्‍वास और प्रेम को ठेस पहुंचाकर कोई रिश्ता नहीं निभाया जा सकता.

क्रोध

क्रोध रिश्तों की उम‘ को कम करता है. क्रोध से रिश्तों में दूरियां आती हैं. क्रोधित व्यक्ति अक्सर ग़ुस्से में रिश्तों की मान-मर्यादाओं को भूल जाता है.

अभिमान या ईगो

हमेशा याद रखें कि आत्मसम्मान और ईगो दो अलग-अलग चीज़ें हैं, इसलिए रिश्ते निभाने में किसी भी ज़िम्मेदारी को ईगो या झूठी प्रतिष्ठा से न जोड़ें, जैसे- “हमेशा मैं ही क्यों फ़ोन करूं, वह क्यों नहीं फ़ोन करता या करती.” “हमेशा मैं ही क्यों माफ़ी मांगू.” आदि.

अपेक्षाएं

रिश्तों में अपेक्षाओं का होना स्वाभाविक है और रिश्ते को ज़िंदा रखने के लिए कुछ हद तक ये ज़रूरी भी है. लेकिन अपेक्षाएं जब हद से ़ज़्यादा बढ़ जाएं तो यह किसी बीमारी से कम नहीं. अपेक्षाओं का बोझ बढ़ने से रिश्ते दम तोड़ देते हैं.

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Relationship Tonics

रिश्तों के टॉनिक

प्रेम

जिस रिश्ते में निःस्वार्थ व निश्छल प्रेम है, उस रिश्ते को किसी और टॉनिक की ज़रूरत ही नहीं. जिस रिश्ते में प्रेम है, उस रिश्ते की उम‘ अपने आप बढ़ जाती है. प्रेम हर रिश्ते को ख़ुशनुमा व तरोताज़ा बनाए रखता है.

समय

रिश्तों को समय देना बहुत ज़रूरी है. आप अपने रिश्तों को कितना समय देते हैं, उससे यह तय होता है कि वह रिश्ता आपके लिए कितना मायने रखता है. एक-दूसरे के साथ, परिवार के साथ समय बिताने से रिश्तों में प्रेम व विश्‍वास बढ़ता है.

विश्‍वास

एक समृद्ध रिश्ते के लिए आपसी विश्‍वास होना बेहद ज़रूरी है. विश्‍वास दोनों तरफ़ से होना चाहिए. रिश्तों में विश्‍वास होने का मतलब है कि आपका कोई भी रिश्ता फल-फूल
रहा है.

संयम

रिश्तों को कभी-कभी विषम परिस्थितियों से भी गुज़रना पड़ता है, ऐसे में संयम बरतें. यदि कोई एक अपना विवेक खोता भी है, तो दूसरा अपना संयम बनाए रखे, ताकि आपके रिश्ते में दरार न प़ड़े.

समझदारी

किसी भी रिश्ते को निभाने के लिए परिपक्व विचारों की आवश्यकता होती है. एक-दूसरे की भावनाओं और परिस्थितियों को समझने की कोशिश करें. हर साझेदारी को पूरी समझदारी से निभाएं. इस तरह रिश्ते की हर छोटी-मोटी समस्या को आप समझदारी से सुलझा सकते हैं.

स्पेस

कुछ समय पहले तक शायद इस टॉनिक की ज़रूरत रिश्तों को नहीं थी, पर आज के बदलते परिवेश में इसकी ज़रूरत हर रिश्ते में है. हर रिश्ते में एक-दूसरे के स्पेस का हमें आदर करना चाहिए. एक-दूसरे के मामलों में ज़्यादा हस्तक्षेप न करें. आज हर किसी को ख़ुद के लिए कुछ स्पेस की ज़रूरत है और इसमें कुछ ग़लत नहीं है. आप अपने रिश्ते को जितनी स्पेस देंगे, उतनी ही उनमें घुटन कम होगी.

इन सबसे ़ज़्यादा ज़रूरी है कि आप में किसी रिश्ते को निभाने की दृढ़ इच्छाशक्ति होनी चाहिए, ताकि आप उन रिश्तों को पूरी ईमानदारी से निभाने का प्रयत्न कर सकें. आप जिनके साथ रिश्ता बांट रहे हैं, उनका आदर, उनकी भावनाओं का आदर, उनके व्यक्तित्व का आदर करें. किसी भी रिश्ते को  टूटने न दें, क्योंकि हर रिश्ता अनमोल है.

– विजया कठाले निंबधे

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ग़ुस्सा कम करने और मन शांत करने के आसान उपाय (Anger Management: How To Deal With Anger)

Anger Management, How To Deal With Anger

आज के कॉम्पटीशन के युग में जितनी सुख-सुविधाएं मौजूद हैं, तनाव उससे भी कहीं ़ज़्यादा हैं. घर में सुख-सुविधाएं जुटाने का तनाव, ऑफ़िस में अच्छे परफ़ॉर्मेंस का तनाव… नतीज़ा, बात-बात में ग़ुस्सा, चिड़चिड़ापन… चाहकर भी हम नॉर्मल नहीं रह पाते. बढ़ते काम के घंटों ने जैसे दिन रात के फ़र्क़ को ही मिटा दिया है, जिसके चलते अक्सर ऑफ़िस का तनाव घर तक आ पहुंचता है और हमारी पर्सनल लाइफ़ को भी डिस्टर्ब करने लगता है. ग़ुस्से की स्थिति में हम बात-बात पर चिढ़ने लगते हैं, किसी का ग़ुस्सा किसी और पर निकालने लगते हैं. इससे न स़िर्फ हमारा मूड ख़राब रहता है, बल्कि सेहत भी बिगड़ने लगती है.

Anger Management, How To Deal With Anger
ग़ुस्से के कारण निवारण के बारे में जानते हुए भी आख़िर क्यों हम इस पर काबू नहीं कर पाते..? क्योंकि हम दूसरों से ही नहीं, अपने आप से भी ज़रूरत से ़ज़्यादा उम्मीदें करने लगते हैं. हम हर बात में बेस्ट और पऱफेक्शन ढूंढ़ने लगते हैं, जोकि हर बार मुमक़िन नहीं होता और ये भी मुमक़िन नहीं है कि किसी व्यक्ति को कभी ग़ुस्सा न आए. ख़ुशी, ग़म, प्यार-दुलार जैसी तमाम भावनाओं की तरह ही ग़ुस्सा आना भी मानव स्वभाव है. हां, जब इसकी अति होने लगती है तो इसके परिणाम भी नकारात्मक होने लगते हैं.

थोड़ा ग़ुस्सा ज़रूरी है
ग़ुस्सा हमारी ताकत बन सकता है, यदि हम उसका सही समय पर सही प्रयोग करें. कई बार हम ग़ुस्से में वो काम भी कर जाते हैं, जिसकी हमने कभी कल्पना भी नहीं की होती है. यानी ग़ुस्सा जब ताकत बन जाए, तो व्यक्ति को असाधारण प्रतिभा का धनी भी बना सकता है, लेकिन ग़ुस्सा तभी असरदार हो सकता है, जब वह किसी का अहित न करे, किसी को आहत न करे. अतः थोड़ा-बहुत ग़ुस्सा आता भी है, तो उसे अपनी ताक़त बनाइए, कमज़ोरी नहीं.

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कब आता है ग़ुस्सा?
जब हम कोई काम बड़ी लगन व मेहनत से करते हैं, लेकिन संतुष्टिजनक नतीज़ा नहीं मिलता.
जब कभी हार का सामना करना पड़ता है.
हालात, आस-पास के लोग या फिर ज़िंदगी की गाड़ी जब हमारे हिसाब से नहीं चलती. शारीरिक कमज़ोरी या लंबी बीमारी.

कैसे पाएं ग़ुस्से पर काबू?
* कारण जानने की कोशिश करें.
* यदि स्थिति आपके अनुरूप नहीं हो सकती तो ख़ुद को स्थिति के अनुरूप ढाल दें.
* जिस माहौल या लोगों के बीच आपको ग़ुस्सा आता है, उनसे दूर रहने की कोशिश करें.
* ग़ुस्से की स्थिति में अपना मन उन चीज़ों में लगाने की कोशिश करें, जिनसे आपको ख़ुशी या संतुष्टि मिलती है.
* जब ग़ुस्सा आए, तो अपने आपको किसी रचनात्मक कार्य में व्यस्त कर दें.
* उल्टी गिनती गिनें. इससे ग़ुस्से पर से आपका ध्यान हट जाएगा.
* लंबी-लंबी सांसें लें. ये एक तरह से डी-टॉक्सीन का काम कर के मन को शांत करता है.

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लड़कियों को अक्षय ने दिया ये दमदार मैसेज, अगर मानेंगी अक्की की बात तो कोई हिम्मत नहीं करेगा छेड़ने की (Akshay Kumar on Bengaluru molestation case: Shares a video with a message for women)

Akshay Kumar

Akshay Kumar

बैंगलुरु में न्यू ईयर सेलिब्रेशन के दौरान 2 लड़कियों के साथ हुए छेड़छाड़ के मामले पर फूटा अक्षय कुमार (Akshay Kumar) का ग़ुस्सा. अक्षय ने एक वीडियो के ज़रिए न सिर्फ़ इस मामले पर नाराज़गी जताई, बल्कि लड़कियों को एक अहम् मैसेज भी दिया.

अक्षय कुमार केप टाउन से जब छुट्टियां मनाकर देश लौटे और उन्होंने बैंगलुरु में दो लड़कियों के साथ हुई इव टीज़िग की ख़बर सुनी, तब वो बेहद परेशान हो उठे. उन्होंने अपने वीडियो में कहा, ”मुझे अपने इंसान होने पर शर्म आ रही है. यह न्यूज़ सुनकर मेरा ख़ून खौल उठा है. जो समाज अपनी औरतों को इज्ज़त नहीं दे सकता, उसे अपने आप को इंसानी समाज कहने का कोई हक़ नहीं है.” अक्षय ने उन लोगों पर भी निशाना साधा, जिन्होंने इस मामले पर विवादित बयान दिए थे. अक्षय ने कहा, ”कुछ लोग राह चलती किसी लड़की की हैरेसमेंट को जस्टिफाई करने की औक़ात रखते हैं.”

उन्होंने लड़कियों के कपड़ों पर कमेंट करने वाले लोगों को यह कहते हुए क़रारा जवाब दिया कि लड़कियों के कपड़े छोटे नहीं, बल्कि आपकी सोच छोटी है. 

अक्षय ने देश की बेटियों की तारीफ़ करते हुए कहा, ”याद रखना जिस दिन इस देश की बेटी ने जवाब दिया ना, उस दिन तुम्हारी अक्कल ठिकाने आ जाएगी. सुधरोगे तो बाद में, पहले सीधा ऊपर सिधार जाओगे.”

लड़कियों को भी अपने वीडियो में अक्षय ने एक ख़ास मैसेज दिया है, उन्होंने कहा, ”लड़कियां आप अपने आप को लड़कों से कम न समझें. अपनी सुरक्षा के लिए पूरी तरह काबिल बन सकती हैं आप. मार्शल आर्ट में ऐसी कई टेक्नीक्स हैं, जिससे आप ऐसे लड़कों को संभाल सकती हैं. किसी के बाप में दम नहीं कि आपकी मर्ज़ी के बिना आपको हाथ भी लगा सके. आपको डरना नहीं है. बस, आप अलर्ट रहो, सेल्फ डिफेंस सीखो. और हां, अगली बार आपके कपड़ों पर आपको कोई ज्ञान देनें की कोशिश करे, तो उससे कहना कि अपनी एडवाइस अपने पास रखो और माइंड योर ओन बिज़नेस.”  देखें ये पूरा वीडियो.

– प्रियंका सिंह

इतना ग़ुस्सा क्यों आता है? (Why Is So Much Anger?)

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छोटी-छोटी बात पर चीखना-चिल्लाना, हाथापाई, ख़ून-खराबे पर उतर आना… ये सब ग़ुस्सा ज़ाहिर करने के तरी़के हैं. आख़िर हमें इतना ग़ुस्सा क्यों आता है कि हम अपना आपा खो देते हैं? इसी की जांच-पड़ताल की है मेरी सहेली(Meri Saheli) ने.

 

ये जानलेवा ग़ुस्सा

कई बार ऐसा देखा गया है कि ग़ुस्से से बौखलाए लोग किसी की जान तक लेने से परहेज़ नहीं करते. पेश हैं, ऐसे ही कुछ उदाहरण-

* दिल्ली में एक युवक अपने मोबाइल के स्पीकर को फुल वॉल्यूम में रखकर गाना सुन रहा था. पास खड़े कुछ दूसरे लड़कों ने उसे आवाज़ धीमी करने    को कहा, लेकिन उसने अनदेखी कर दी. इस पर दूसरे लड़कों को इतना ग़ुस्सा आया कि वहीं पास में पड़े एक डंडे को पूरी ताक़त से उस युवक के सिर  पर मारा जिससे उसकी मौत हो गई.

* एक व्यक्ति सब्ज़ी ख़रीदने गया और अपनी आदत के मुताबिक वह दुकानदार से बिना पूछे सब्ज़ी उठाकर खाने लगा. दुकानदार के मना करने पर  उसे ग़ुस्सा आ गया और दोनों में बहस हो गई. विवाद इतना बढ़ गया कि सब्ज़ी खाने वाले शख़्स ने दुकानदार की चाकू से हत्या कर दी.
ये तो चंद उदाहरण हैं, ग़ुस्से में की गई ऐसी हत्याओं की फेहरिस्त बहुत लंबी है.

सहनशक्ति की कमी
मुंबई की पूजा कहती हैं, “लोकल ट्रेन में पीक आवर (ऑफिस टाइम) के दौरान कई बार बेहद मामूली बात, जैसे- तुम्हारा बैग टच हो रहा है, बाल टच हो रहे हैं, धक्का लग रहा है आदि पर यात्रियों में कहासुनी होना आम बात है और कई बार तो बात इतनी बढ़ जाती है कि मारपीट तक की नौबत आ जाती है. एक बार दो महिलाओं में झगड़ा इस क़दर बढ़ गया कि दोनों एक-दूसरे को चलती ट्रेन से धक्का देने लगीं.” ऐसे मामले इस बात की ओर इशारा करते हैं कि लोगों की सहनशक्ति कितनी तेज़ी से ख़त्म होती जा रही है. साइकोलॉजिस्ट माया कृपलानी के मुताबिक, “जिन लोगों में सहनशक्ति कम होती है उन्हें बेहद मामूली बात पर भी ग़ुस्सा आ जाता है. इसके अलावा आजकल लोगों की उम्मीदें बहुत ज़्यादा बढ़ गई हैं और जब वे पूरी नहीं होतीं, तो वे अपना आपा खो देते हैं.”

क्यों आता है ग़ुस्सा?
साइकोलॉजिस्ट नीमिषा रस्तोगी कहती हैं, “आजकल लोगों के जीवन में इतना तनाव है कि उन्हें छोटी-छोटी बात पर भी ग़ुस्सा आ जाता है. दरअसल, हर इंसान के अंदर बहुत-सी भावनाएं होती हैं, जिन्हें वो ज़ाहिर नहीं कर पाता. उदाहरण के लिए- हमें अपने बॉस या दोस्त की किसी बात पर ग़ुस्सा तो बहुत आता है, लेकिन उनके सामने हम उसे ज़ाहिर नहीं कर पाते. यही दबाया हुआ ग़ुस्सा कई बार ज्वालामुखी बनकर ग़लत जगह फूट पड़ता है. इसके अलावा हम ऐसी जगह ग़ुस्सा दिखाते हैं जहां हमें किसी चीज़ का डर नहीं होता. कई बार हम अपने प्रियजनों (माता-पिता, भाई-बहन आदि) के सामने ग़ुस्सा ज़ाहिर करते हैं, क्योंकि हमें पता होता है कि वो हमें प्यार करते हैं इसलिए हमारे इस व्यवहार को बर्दाश्त कर लेंगे.”
शहरी जीवनशैली ने लोगों की ज़िंदगी को बेहद जटिल और व्यस्त बना दिया है, जिसके चलते वे इंसानी भावनाओं से परे मशीनी होते जा रहे हैं, ख़ासकर मुंबई, दिल्ली जैसे मेट्रोज़ में जहां लोग अपने पड़ोसी तक को नहीं पहचानते, उनके पास किसी की बात सुनने, समझने का व़क्त नहीं होता. साइकोलॉजिस्ट मिलिंद करंजकर कहते हैं, “बदलती लाइफस्टाइल के कारण अब लोगों की ज़रूरतें और प्राथमिकताएं बदल गई हैं. लोग अब सफलता की ऊंचाइयों तक जल्दी पहुंचना चाहते हैं और जब ऐसा नहीं हो पाता तो वे खीझ जाते हैं. किसी भी व्यक्ति के व्यवहार पर उसकी परवरिश और आसपास के माहौल का बहुत असर पड़ता है.”

जब क़ाबू में न हों हालात
आपको मीटिंग के लिए देर हो रही है, उस पर बस नहीं मिल रही. जैसे-तैसे आपको ऑटो तो मिल गई, लेकिन आगे जाकर आप ट्रैफिक में फंस गए. ऐसी स्थिति में ग़ुस्सा आना स्वाभाविक है, लेकिन इस ग़ुस्से से आपको कुछ हासिल होने वाला नहीं है. साइकोलॉजिस्ट मिलिंद कहते हैं, “ऐसी स्थिति में शांत रहने की कोशिश करें. आपको ऑफिस पहुंचने में देर होगी, इसकी सूचना ऑफिस में दे दें. यदि कोई दूसरा रास्ता या विकल्प है, तो उस पर विचार करें. बार-बार ये मत सोचें कि मैं लेट हो रहा हूं. ऐसा सोचने से आपकी चिंता बढ़ेगी, जो आपकी सोचने-समझने की शक्ति कम कर देती है. बेकार में ग़ुस्सा करने से अच्छा है कि आप ख़ुद को हालात का सामना करने के क़ाबिल बनाएं.”
आजकल लोगों की ज़िंदगी बहुत उलझ गई है, घर-ऑफिस की दस ज़िम्मेदारियों के बीच ख़ुद के लिए सेट किए टारगेट को अचीव करने का तनाव उन पर लगातार बना रहता है. इन सबके बीच वे अपने व्यवहार को परखना भूल जाते हैं.

बेवजह नहीं आता ग़ुस्सा
ग़ुस्सा कभी भी अकारण नहीं आता, कारण बड़ा या छोटा हो सकता है. साइकोलॉजिस्ट नीमिषा कहती हैं, “हर इंसानी भावना के पीछे कोई न कोई कारण ज़रूर होता है. कई रिसर्च से भी ये बात साबित हो चुकी है. इसी तरह ग़ुस्से के पीछे भी कोई वजह ज़रूर होती है, जैसे- हमारी सोच या पिछले अनुभव, लेकिन हम कई बार उन कारणों को समझ नहीं पाते. जब आपको छोटी-छोटी बातों पर ग़ुस्सा आने लगे तो ख़ुद को परखिए और जानने की कोशिश कीजिए कि आपको ग़ुस्सा क्यों आता है? कहीं बात-बात पर ग़ुस्सा करना आपकी आदत तो नहीं बन गई है? यदि ऐसा है, तो साइकोलॉजिस्ट की मदद से इससे छुटकारा पाने की कोशिश करें.”

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तुनकमिजाज़ लोगों के लिए तरक़ीब

* जिन लोगों को बहुत ग़ुस्सा आता है उन्हें योगा, फिज़िकल एक्सरसाइज़, जैसे- दौड़ना, चलना, कोई खेल (बैडमिंटन/फुटबॉल/टेनिस) आदि को अपनी दिनचर्या में शामिल करना चाहिए. इसके अलावा आप ट्रेडमिल पर दौड़कर, कोई म्यूज़िकल इंस्ट्रूमेंट बजाकर भी अपने ग़ुस्से को वश में कर सकते हैं.

* ड्रॉइंग, पेंटिंग, राइटिंग, सिंगिंग, डांसिंग आदि के ज़रिए अपनी भावनाओं को व्यक्त कर ग़ुस्से की भावना को दूर रख सकते हैं.

* आमतौर पर ग़ुस्से में इंसान किसी दूसरे व्यक्ति से बात करने की स्थिति में नहीं होता, फिर भी आपके पास यदि कोई ऐसा दोस्त या प्रियजन है, जो  उस स्थिति में भी आपसे अच्छी तरह बात कर सके तो उससे दिल की बात शेयर करें. आपको अपने ग़ुस्से को समझने और उससे डील करने में  आसानी होगी.

गरम मिजाज़ को बनाएं नरम
ग़ुस्से पर क़ाबू पाने के लिए पहले ये जानना ज़रूरी है कि आपको ग़ुस्सा आया किस बात पर? किसी भी चीज़ के प्रति ग़ुस्सा हमारी सोच और चीज़ों के प्रति हमारे नज़रिए को दर्शाता है.
साइकोलॉजिस्ट मिलिंद का कहना है कुछ बातों का ध्यान रखकर आप ग़ुस्से पर क़ाबू रख सकते हैं, जैसे-
* अपनी सहनशक्ति बढ़ाएं.
* ग़ुस्सा आपके लिए कितना घातक हो सकता है ये समझने की कोशिश करें.
* घटनाओं व चीज़ों के प्रति अपने विचार बनाएं.
* जब भी ऐसी स्थिति आए कि आप अपना आपा खोने लगे हैं, तो कोई भी प्रतिक्रिया देने के पहले कुछ पल रुकें और सोचें कि क्या नाराज़गी ज़ाहिर  करने का इसके अलावा कोई और रास्ता है? कुछ पल का ये ब्रेक आपके ग़ुस्से को कम कर देगा.
* जब भी ज़्यादा ग़ुस्सा आए तो 100 से 1 तक की उल्टी गिनती शुरू कर दें.
* ज्यादा ग़ुस्सा आ रहा हो, तो एकांत जगह, जैसे- बंद कमरा या टैरेस पर जाकर चिल्लाएं, ग़ुस्सा शांत हो जाएगा.
* जो कुछ हुआ वो ज़िंदगी का हिस्सा था, ज़िंदगी नहीं, यही सोचकर आगे बढ़ें.

थोड़ा ग़ुस्सा ज़रूरी है
ग़ुस्सा किसी को भी आ सकता है, लेकिन सही समय पर, सही मक़सद के लिए सही तरी़के से ग़ुस्सा करना हर किसी के वश की बात नहीं होती. यूनानी दार्शनिक अरस्तू की कही ये बात सौ फ़ीसदी सच लगती है, “हम में से शायद ही कोई ऐसा हो जिसे कभी ग़ुस्सा न आता हो, लेकिन अपने ग़ुस्से को कंट्रोल करना और सही जगह पर इस्तेमाल करने की कला बहुत कम लोगों में होती है.” बात-बात पर ग़ुस्सा करना सही नहीं है, लेकिन हमेशा ग़ुस्से को दबाए रखना भी सेहत के लिए नुक़सानदायक है.
साइकोलॉजिस्ट मिलिंद कहते हैं, “ग़ुस्से को दबाना नहीं चाहिए, उसे ज़ाहिर करना ज़रूरी है. ग़ुस्सा ज़ाहिर करने के कई तरी़के हैं, जैसे- आप यदि किसी सामाजिक मुद्दे को लेकर आंदोलन के ज़रिए ग़ुस्सा ज़ाहिर करते हैं, तो वो सामाजिक रूप से स्वीकार्य होगा, लेकिन अपना ग़ुस्सा उतारने के लिए यदि किसी को थप्पड़ जड़ देते हैं, तो इसे कोई बर्दाश्त नहीं कर पाएगा.”
यदि कहीं कुछ ग़लत हो रहा है, तो अपना विरोध जताना ज़रूरी है. घर और ऑफिस में हर कोई आपका नाजायज़ फ़ायदा उठा रहा है, ज़िम्मेदारी के बहाने आप पर काम का बोझ लादे जा रहा है, ऐसे में यदि आप चुपचाप सब सहते रहते हैं, तो ये सिलसिला कभी ख़त्म नहीं होगा. अतः ऐसी स्थिति में आपका विरोध प्रकट करना ज़रूरी है.

अन्य भावनाओं की तरह ग़ुस्सा भी एक भावना है, लेकिन इसे हमेशा नकारात्मक रूप में ही लिया जाता है. दरअसल, हमें बचपन से ही ये बताया जाता है कि ग़ुस्सा करना ग़लत है, लेकिन कोई ये नहीं बताता कि हम अपनी इस भावना को ज़ाहिर कैसे करें?

– नीमिषा रस्तोगी, साइकोलॉजिस्ट

रिसर्च
हाल ही में ब्रिटेन में हुई एक रिसर्च के अनुसार, एक आदमी महीने में औसतन 28 बार और साल में 336 बार ग़ुस्सा करता है. ग़ुस्से की मुख्य वजह नींद की कमी और आर्थिक चिंता है. इसके अलावा भूख, रूखा व्यवहार और झूठ बोलना भी ग़ुस्से की वजहों में शामिल हैं. अध्ययनकर्ताओं ने क़रीब 2000 लोगों पर शोध किया. नतीजों के मुताबिक, 10 में से 6 लोग रोज़मर्रा की बेहद मामूली-सी बात को लेकर भी ग़ुस्सा हो जाते हैं.

– कंचन सिंह