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मज़ाक में ही सही, पर अक्सर राज अपनी पत्नी अनीता के उसके मोटे शरीर को लेकर कोई-न-कोई टिप्पणी पास कर ही देता था. जैसे- “जो भी हो पर लगती तुम खाते-पीते घर की हो…” अपने दोस्त और रिश्तेदारों के सामने भी वह अनीता के मोटे शरीर को लेकर कुछ-न-कुछ बोल देता, जिससे वह आहत हो उठती थी. उसके सारे गुणों को अनदेखा कर राज बस उसके मोटे शरीर को ही लेकर ही उठता-बैठता रहता और जतलाता कि उसे तो पतली-छरहरी लड़की चाहिए थी, मगर उसकी क़िस्मत में मोटी लड़की ही लिखी थी, तो क्या किया जाए. मगर उसकी ऐसी बातों से अनीता के दिल पर क्या बीतती थी इससे वह अंजान था.
पति-पत्नी के रिश्ते में एक-दूसरे का सम्मान करना सबसे ज़्यादा अहमियत रखता है. लेकिन कई बार पुराने से पुराने रिश्ते में भी खटास तब पड़ने लगती है, जब किसी गैर के सामने पार्टनर एक-दूसरे का मज़ाक बनाने लगते हैं. पत्नी का बढ़ता मोटापा, उसे ओल्ड फैशन बोलकर उसका मज़ाक बनाना कहां तक उचित है? लोग नहीं समझते कि उनका बोला गया इस तरह के शब्द कैसे सामनेवाले पर गहरा प्रभाव डालता है.
जब भी आप लंबे समय बाद अपने किसी रिश्तेदार से मिलते हैं, तो वे कुछ-न-कुछ कमेंट्स पास ज़रूर करते हैं, जैसे- “अरे, कितनी मोटी हो गई तू! कुछ एक्सरसाइज़ किया कर…”
“तुम्हारा चेहरा कितना डल लग रहा है. क्या हुआ सब ठीक तो है? बहुत दुबले हो गए हो भाई. ज़रा घी-मक्खन खाया करो…” उनकी ऐसी बातों से मिलने का जो उत्साह होता है, ख़त्म हो जाता है. लगता है इनसे मिले ही क्यों? ना मिलते तो अच्छा होता.
किसी के कम-ज़्यादा वज़न पर जजमेंट पास करना दुनिया का सबसे आसान काम है. मज़ा आता है लोगों को दूसरों पर हंस कर. कोई रिश्तेदार या पड़ोसी जब हमें बिना मांगे सलाह देने लगते हैं कि हमें अपना वज़न थोड़ा कम करना चाहिए और इसके लिए हमें सुबह उठकर दौड़ लगानी चाहिए, खाने में तली-भूनी चीज़ों से परहेज़ करनी चाहिए. तो बड़ा ग़ुस्सा आता है. दोस्त जब ‘ये मोटी’ कहकर बुलाते हैं या हम जब अपने लिए ड्रेस का चुनाव करने लगते है और दुकानदार यह बोल देता हैं कि आपके नाप का कपड़ा यहां नहीं मिलेगा, तो हम अपने आप में ही लज्जित हो जाते हैं जैसे हमने कितना बड़ा गुनाह किया हो. बॉडी शेमिंग हर रोज़ की बातचीत में मस्ती-मज़ाक, चुटुकुला, निंदा का हिस्सा बन गया है.
सोशल मीडिया पर भी बॉडी शेमिंग के ऐसे कई मामले देखने को मिलते हैं. आलम यह है कि सिर्फ़ आम आदमी ही नहीं, बल्कि सेलिब्रिटी भी इससे बच नहीं पाए हैं. विद्या बालन, दीपिका पादुकोण, ऐश्वर्या राय, भूमि पेडनेकर, हुमा कुरैशी, शिल्पा शिंदे तक बॉडी शेमिंग का शिकार हुई हैं और सोशल मीडिया पर ट्रोल भी हो चुकी हैं. हालांकि इन लोगों ने इसका सामना किया और बोलनेवालों को करारा जवाब भी दिया, लेकिन फिर भी बोलनेवाले बाज नहीं आते हैं. जाने क्या मजा मिलता है इन्हें बॉडी शेमिंग करने में.
हर लड़की को अपनी ज़िंदगी में एक बार बॉडी शेमिंग का शिकार ज़रूर होना पड़ता है. और अगर बात सेलिब्रिटी की हो, तो चीज़ें और बिगड़ जाती है.

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एक इंटरव्यू के दौरान प्रियंका चोपड़ा ने क्रिटिसाइज़ किए जानेवाले सवाल पर अपने अनुभव शेयर किए. उन्होंने बताया कि बॉडी शेमिंग का शिकार हर कोई होता है. ख़ासकर फिल्म और मनोरंजन जगत में जहां हमेशा सभी पर बेहतर दिखने और शानदार लगने का दबाव बना रहता है. लोग ये कहकर प्रेशर डालते हैं कि पिछले महीने तो तुम्हें ये ड्रेस फिट हुआ था और अब नहीं हो रही ? सिर्फ़ एक्ट्रेस ही नहीं, बल्कि हर लड़की को एक ख़ास तरह से दिखना होता है, इसलिए वो भी इसका शिकार हुई हैं. लड़कियों को मैसेज देते हुए प्रियंका कहती हैं कि लड़कियों को अपनी ताकत पहचाननी चाहिए. लड़कियों को उन चीज़ों पर फोकस करनी चाहिए, जो उनके लिए अच्छी है. लोगों की बातों पर ध्यान न दें. उनका काम सिर्फ़ कहना है.

टीवी एक्ट्रेस वाहजिब का कहना है कि जब आप मोटे होते हैं तो लोग आपको कई तरह के नाम दे देते हैं. ऐसे निगेटिव नामों से आपका आत्मविश्वास कम होता है. कई बार ऐसा हुआ जब मैं ऐसे कमेंट्स सुनकर परेशान हो जाती थी और अपना आत्मविश्वास खो देती थी. लेकिन अब मैं अपने आप से ख़ुश हूं. रोज़ाना जिम जाती हूं.

अपनी छोटी सी उम्र से ही लंबी यात्रा तय करनेवाली एकता कपूर को भी बॉडी शेमिंग का शिकार होना पड़ा था. उनके वज़न और पहनावे को लेकर टीका-टिप्पणी हुई. लेकिन वे उन बातों की परवाह न कर अपने पथ पर आगे बढ़ती रही और समय आने पर अपनी प्रतिभा से सबको जवाब भी दे दिया. उनका कहना है कि एक स्त्री कैसी दिखती है या उसका पहनावा क्या है. इस पर ध्यान देने की बजाय आपको उसकी प्रतिभा पर ध्यान देना चाहिए.

परफेक्ट बॉडी किसी के पास नहीं होती, यह बात आपको स्वीकार करनी ही पड़ेगी और सबसे बड़ी बात कि सुंदरता कुछ दिनों की मेहमान होती है. तो ये किसी के जीवन को कैसे प्रभावित कर सकती है? यदि इसे गहराई से समझना है तो हमें चेन्नई की रूबी ब्यूटी से शिक्षा लेनी चाहिए. आज भले ही रूबी किसी परिचय की मोहताज नहीं हैं, मगर उनके जीवन में जो घटा और जिस तरह से उन्होंने लड़कर पूरी दुनिया में ख़ुद को साबित किया वह क़ाबिल-ए-तारीफ़ तो है ही, लोगों के लिए एक प्रेरणा भी है.

कौन है रूबी ब्यूटी?
किसी ज़माने में अपने मोटापे के कारण अपने पति के आंखों की किरकिरी बनी, रूबी ब्यूटी आज देश की जानी-मानी बॉडी बिल्डर है. रूबी देश के लिए लगातार गोल्ड जीतनेवाली वह महिला है, जिसे उसके पति ने सिर्फ़ उसके मोटापे के चलते उसे छोड़ दिया था. अपना दुख बयां करते हुए उन्होंने बताया कि शादी के बाद उनका वज़न लगातार बढ़ता रहा और एक दिन उसके पति ने उसे साफ़ कह दिया कि उसके वज़न के कारण अब उसे रूबी में कोई रुचि नहीं रही. लेकिन 6 साल के बेटे की मां रूबी के लिए इस समस्या से निकलना आसान नहीं था. लेकिन रूबी ने हार नहीं मानी और अपना वज़न कम करने के लिए बॉडी बिल्डिंग का रास्ता चुना. आज हालत ये है कि समाज में बहुत-सी ऐसी लड़कियां हैं, जो रूबी की तरह ही बनना चाहती है.
आम तर्क है कि वज़न, लुक्स, स्ट्रेच मार्क्स आदि को लेकर टिप्पणी की जाए, तो लोग उस ओर ध्यान देने लगते हैं, लेकिन यह सरासर ग़लत है. एक स्टडी में भी साबित हो चुका है कि वज़न के इस पूर्वाग्रह से जुड़े तर्क वास्तव में ख़राब स्वास्थ्य की ओर ले जाता है. रिसर्च के मुताबिक़, वज़न आपके बायोलोजिकल, जेनिटिक, एंवायरलमेंटल और अन्य कारकों के एक कॉम्प्लेक्स सेट से निर्धारित होता है और यह केवल इस पर नहीं टिका होता है कि आपने कितना खाया और पीया है. केवल दुबले होने का मतलब होना ही हेल्दी रहने की गारंटी नहीं है और न ही फैट का मतलब ख़राब स्वास्थ्य से है.

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लोग अपने वज़न को लेकर शर्मिंदगी महसूस करते हैं, उनमें आत्मसम्मान की कमी आ जाती है. कोई-कोई तो अवसाद से घिर जाते हैं. इसके कारण उनमें कई तरह की बीमारियां पनपने लगती है. किसी के शरीर को लेकर मज़ाक बनना उसे अंदर तक आहत कर देता है. लेकिन मज़ाक उड़ानेवाले उस इंसान के बारे में नहीं सोचते कि उस के दिल पर क्या बीत रही है.
यह एक कड़वा सच है कि जिस तरह के समाज में हम रहते हैं वहां अगर आपकी बॉडी टाइप यानी शरीर की बनावट थोड़ी भिन्न है, तो लोग आपको अलग नज़र से देखने लगते हैं. हमें आकर्षक मैगजीन कवर, बॉलीवुड या टीवी सेलिब्रिटी के माध्यम से यह मानने के लिए बाध्य किया जाता है कि यही आदर्श शरीर यानी फिट और आइडियल बॉडी होती है. इतना ही नहीं सब इस बात को धीरे-धीरे स्वीकार भी कर लेते हैं और वैसी ही बिल्कुल फिट बॉडी पाने की ख़्वाहिश करने लगते हैं.

40 साल की रेणु का कहना है कि वह बचपन से ही मोटी रही हैं. अक्सर अपने मोटापे को लेकर वह शर्मिंदा होती रही. याद है, जब भी उसके घर कोई मेहमान आते थे वह अपने कमरे में बंद हो जाती थी. क्योंकि कहीं उसके मोटे शरीर को लेकर कोई कुछ बोल न दे. स्कूल में भी लगता उसके दोस्त उसके मोटे शरीर को लेकर ही बातें कर रहे होंगे. बहुत रोती वह, सोचती बस किसी तरह दुबली हो जाऊं. इसके लिए उसने खाना कम कर दिया. लेकिन एक दिन उसके पापा ने समझाया कि क्या फर्क़ पड़ता है जो तुम मोटी हो? मायने यह रखता है कि तुम स्वस्थ हो और अपने जीवन में आगे बढ़ रही हो. लोगों का क्या है वो तो कुछ भी बोलेंगे. और फिर जब तुम्हें कोई समस्या नहीं है अपने शरीर से, तो फिर लोगों की बातें मत सुनो. और फिर धीरे-धीरे रेणु में पाॅज़िटिविटी आने लगी. फिर क्या था, बोलनेवालों को वह ऐसा करारा जवाब देती कि फिर उनकी हिम्मत नहीं पड़ती कुछ बोलने की.
सालों पहले महिलाओं को 36-28-36 साइज़ को ही परफेक्ट बताया गया है. यही नहीं महिलाओं के मन में इस बात को गहरे से बिठा दिया गया है कि अगर ये साइज़ आपका नहीं है, तो आप कुरूप या कोई फूहड़ की श्रेणी में आती हैं. समय के साथ-साथ ख़ूबसूरती के इस लिस्ट में कई नए सिरे आ गए हैं, जैसे- बिकनी बॉडी, जांघों के बीच का अंतर और पतले होने के कई ऐसे ट्रेंड को हमारे आसपास ऐसे डाल दिया गया है जैसे कि यही लड़की की ज़िंदगी हों. लेकिन अब लोगों की सोच बदल रही है.
सोशल मीडिया पर अब महिलाएं अपने निकले हुए पेट को दिखाने में हिचक महसूस नहीं कर रही हैं. ऐसा तब करता है इंसान जब उसमें आत्मविश्वास भर जाता है. पॉज़िटिव सोच होने लगती है.

क्या है बॉडी पाॅज़िटिविटी?
बॉडी पाॅज़िटिविटी यानी की सकारात्मक, जैसे कि नाम से ही ज़ाहिर है. अपने शरीर को पूरी पाॅज़िटिविटी के साथ स्वीकार करना ही बॉडी पाॅज़िटिविटी है. फिर चाहे वो हमारा शरीर हो या फिर किसी और का. सभी बेहद ख़ूबसूरत हैं. इस सोच से कोसों दूर कि सिर्फ़ सेलिब्रिटी का बॉडी शेप ही परफेक्ट होता है, बल्कि हर तरह का बॉडी टाइप तारीफ़ें क़ाबिल है. मायने यह रखता है कि आप आत्मविश्वासी और स्वस्थ हैं, न की आपकी बॉडी टाइप या फिर बॉडी शेप कैसा है. हमारे लिए यह समझना बहुत ज़रूरी है कि हम अपने आप से और अपने बॉडी से कितना प्यार करते हैं. फिर चाहे वह कैसा भी क्यों न हो. लोगों की बातों, उनके कमेंट्स, उनकी टोका-टाकी का हमारे ऊपर कोई निगेटिव असर नहीं होना चाहिए.
शरीर की बनावट को लेकर कमेंट्स सिर्फ़ लड़कियों को नहीं सुननी पड़ती है, बल्कि लड़के भी इसमें शामिल हैं. उन्हें भी अपने बॉडी शेप को लेकर लोगों के कमेट्स सुनने पड़ते हैं. जैसे कि मटके जैसा पेट निकला होना, मोटा होना आदि. हर जेंडर के लोगों को बॉडी पाॅज़िटिव होना बेहद ज़रूरी है, इसीलिए बॉडी पाॅज़िटिव किसी एक जेंडर तक सीमित नहीं है.
इंदौर की काउंसलिंग साइकोलाॅजिस्ट नेहा मूलचंदानी बताती हैं कि कई बार आपको नहीं पता होता है कि आप ख़ुद बॉडी शेमिंग का शिकार हो गई हैं.

कैसे पहचानें की आप बॉडी शेमिंग का शिकार हो रही हैं?
• अगर आप लोंगो के सामने जाने से कतराती हैं. आपको लगता है लोग आपके वज़न को लेकर कुछ-न-कुछ बोल देंगे, इसलिए आप लोगों का सामना नहीं करना चाहती है, तो यह है बॉडी शेमिंग.
• जब अपनी तुलना दूसरों के शरीर से करने लगती हैं यानी की दूसरों के कमर और कंधों को देखकर यह सोचने लगती हैं कि आपके इतने मोटे क्यों हैं? उनके जैसा क्यों नहीं है? तो ये हैं बॉडी शेमिंग.
• आपको अपनी सहेली के बॉयफ्रेंड को देखकर जलन की भावना पैदा होती है. आपको लगता है कि आपके बेडौल शरीर के कारण ही आज तक आप सिंगल हैं और भविष्य में भी आपको कोई बॉयफ्रेंड नहीं मिलने वाला तो ये है बॉडी शेमिंग.
• दूसरी लड़कियों के ड्रेस फिटिंग और आकर्षित कर देनेवाली ड्रेस को देखकर अगर आपको लगता है कि आप ऐसी ड्रेस नहीं पहन सकती, क्योंकि आप मोटी हैं तो ये है बॉडी शेमिंग.

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बॉडी शेमिंग से कैसे बचें?
• अपनी तारीफ़ ख़ुद करने की आदत डालिए. आपकी तारीफ़ आपके घरवाले, दोस्त, रिश्तेदार, पड़ोसी भले ही न करें, पर आप ख़ुद अपने गुणों की बखान ज़रूर करें. ख़ुद से प्यार करना सीखिए.
• लोग कह रहे हैं, इसलिए मुझे अपना वज़न कम करना चाहिए, ग़लत है. आप ख़ुद क्या चाहती हैं इस पर गौर करिए.
• वो कहते हैं न हाथी चले बाज़ार कुत्ता भूंके हज़ार… इसलिए आपकी फिटनेस को लेकर लोगों की कमेंट्स पर बिल्कुल भी ध्यान मत दीजिए, क्योंकि आपके गुण एक दिन लोगों के मुंह अवश्य ही बंद कर देंगे.
• कभी भी अपनी तुलना किसी और से मत करिए, क्योंकि गुण-अवगुण दुनिया के हर एक इंसान में मौजूद होती है और आपके अंदर जो कमी है उसे आप बहुत जल्द ही दूर कर लेगी यह विश्‍वास रखें.
• एक लक्ष्य बनाइए कि आप इतने दिनों में अपना वज़न कम कर लेंगी, लेकिन जो भी लक्ष्य बनाएं उस पर गंभीरता से अमल करें.
• दूसरों से प्यार करना सीखें. जब हम चारों ओर नफ़रत और निगेटिविटी फैलाते हैं, तो इसे अपनी ओर आकर्षित कर लेते हैं. लेकिन जब हम ख़ुद में सुंदरता देखना शुरू कर देते हैं, तो हम ऐसे अपने आसपास भी देखना शुरू कर सकते हैं. इसलिए बॉडी पाॅज़िटिविटी के साथ ख़ुद से प्यार करना सीखिए. दुनिया अपने आप ख़ूबसूरत लगने लगेगी. याद रखिए, जब तक आप अपने आपसे प्यार करना नहीं सीखेंगे, दूसरे भी आपको प्यार की नज़र से नहीं देखेंगे.
• हमारे समाज में लड़कियों को कैसा दिखना चाहिए, उसके शरीर का बनावट कैसा होना चाहिए, उसे किस तरह से बात करनी चाहिए संबंधित कई ग़लत धारणाएं हैं. ख़ासतौर पर जब आप फिल्म लाइन में होते हैं, तो लोग आपको ज़्यादा ही जज करने लगते हैं. आपके एक-एक चीज़ पर लोगों की नज़र टिकी होती है और आप बॉडी शेमिंग का शिकार हो जाते हैं. वक़्त के साथ हरेक इंसान के शरीर में कई उतार-चढ़ाव आते ही हैं और लोगों को इस बात से कोई प्रॉब्लम नहीं होनी चाहिए.

– मिनी सिंह

Body Shaming
Tips For Parenting

बच्चे तो सभी प्यारे होते हैं, पर कुछ ख़ास मासूम भी होते हैं, जिन्हें विशेष देखभाल की ज़रूरत होती है. ऐसे ही होते हैं ऑटिज्म ग्रस्त बच्चे भी. आज अंतर्राष्ट्रीय विकलांगता व्यक्ति दिवस (International day of disabled persons) पर ऑटिज्म कंसल्टेंट गोपिका कपूर ने इस तरह के बच्चों की देखभाल से जुड़ी कई महत्वपूर्ण बातें संक्षेप में बताई.
इससे उन अभिभावकों को काफ़ी मदद मिलेगी, जिनके बच्चे ऑटिज्म ग्रस्त हैं. आइए जानते हैं गोपिकाजी से ऑटिज्म के बारे में. उनका कहना है-

न्यूरोडेवलपमेंट कंडीशन…
मेरे राय में ऑटिज्म एक विश्वभर में बढ़ता हुआ कंडीशन है. रिसर्च दिखाता है कि ऑटिज्म के स्टैटिसटिक्स या नंबर जो है, वह 54 में एक बच्चे को ऑटिज्म होता है. यह एक न्यूरोडेवलपमेंट कंडीशन है. न्यूरो यानी यह दिमाग़ पर असर करता है और डेवलपमेंटल का मतलब है कि यह बच्चों के विकास पर असर करता है.

चिंतित माता-पिता…
जब माता-पिता को पता चलता है कि उनके बच्चे को ऑटिज्म है, तब मैंने देखा है कि ज़्यादातर पैरेंट्स बहुत ही उदास-परेशान हो जाते हैं. उन्हें चिंता रहती है कि हम बच्चे के साथ क्या करेंगे, कैसे सिखाएंगे, क्या वह स्कूल जाएगा, क्या वह बड़ा होकर नौकरी कर पाएगा… ये तमाम चिंताएं उनके दिमाग़ में आती है. जिन माता-पिता को उनके परिवार का साथ मिलता है और जो माता-पिता अपने आपको संभाल पाते हैं, उनके बच्चे ज़्यादातर विकास करते हैं. इसका मतलब यह है कि माता-पिता की मानसिक स्थिति पर ध्यान देना बहुत ही ज़रूरी है. ऑटिज्म एक ऐसा कंडीशन है, जिसका असर सिर्फ़ बच्चे पर नहीं, बल्कि परिवार पर भी होता है. इसलिए हमें यह ध्यान देना चाहिए कि सिर्फ़ बच्चा ही नहीं सीख रहा है, बल्कि पूरे परिवार का विकास हो रहा है. उनका शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य अच्छा होना चाहिए.

Child With Autism

प्रोत्साहित करें…
जब हम ऑटिस्टिक बच्चों के साथ काम करते हैं, तब हमें सबसे पहले यह ध्यान में रखना चाहिए कि उनसे वह अपेक्षाएं नहीं रखनी चाहिए, जो हम एक न्यूरोटिपिकल बच्चे के साथ रखते हैं. अगर हम किसी व्यक्ति के साथ काम कर रहे हैं, जो देख नहीं पाते हैं, तो हम उनसे यह अपेक्षा थोड़ी रखते हैं कि एक दिन वह देख पाएंगे? इसी तरह से हमें उनके साथ यह अपेक्षाएं नहीं रखनी चाहिए कि वह न्यूरोटिपिकल बन जाएंगे. साथ ही हमें यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि बच्चों को क्या पसंद है. इन बच्चों में मोटिवेशन बहुत ही कम होता है. इसलिए जो भी चीज़ उनको पसंद है, भले ही वह दूसरे बच्चों को जो पसंद है वह नहीं हो, उस चीज़ के साथ हमें उनके साथ काम करना है. उनके लगातार प्रोत्साहित करते रहना है. इससे उनका मोटिवेशन बढ़ेगा और वह काम करना पसंद करेंगे.

मानसिक स्तिथि…
ऑटिस्टिक बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य को सही रखने के लिए सबसे महत्वपूर्ण यह है कि कभी भी हमें उन्हें यह महसूस नहीं होने देना है कि वह हम से कम हैं. वह अलग ज़रूर हो सकते हैं, लेकिन कम नहीं है. उनमें कोई कमी का एहसास उन्हें हमें कभी महसूस नहीं होने देना चाहिए. इससे उनका मानसिक स्वास्थ्य सही रहेगा. उनको जो अच्छा लगता है, उसी को ध्यान में रखकर उनके साथ काम करना चाहिए. उनकी जो रूचि है, उसे बढ़ानी चाहिए. कई इस तरह के बच्चे हैं, जिन्होंने उनकी रुचि को लेकर करियर बनाया. कई बच्चे बहुत सफल भी हुए, इसलिए उन्हें प्रोत्साहित करना चाहिए. उनकी मानसिक स्थिति को बनाए रखना चाहिए. उन्हें यह कभी महसूस नहीं करने देना चाहिए कि उनमें कोई कमी है. इसकी बजाय उनके जो अच्छे पॉइंट है, उस पर ध्यान देना चाहिए. उन्हें उनके बारे में बताना चाहिए और उनकी मुश्किलों पर काम करना चाहिए, पर बहुत ज्यादा ध्यान नहीं देना चाहिए. इसी तरह से हम उनकी मानसिक स्थिति को बनाए रख सकते हैं.

Child With Autism

अभिभावकों का नज़रिया…
हमारे घर में जो वातावरण है वह बहुत ही ख़ुशनुमा वातावरण है. हम सब हंसते-खेलते हैं, बहुत ही ख़ुश हैं. हां पहले-पहले बच्चे की अवस्था को लेकर तनाव होता रहता था, हम बहुत परेशान होते रहते थे. लेकिन धीरे-धीरे हमने सब संभाल लिया. अब हमारे घर का वातावरण ख़ुशनुमा है.

पैरेंटिंग गाइड…
दूसरे बच्चों के माता-पिता को मैं यही कहूंगी कि अगर आप हर वक़्त उदास रहेंगे, हर समय तनाव में रहेंगे, तो यह एंग्जाइटी आपके बच्चों पर आएगी. वह अच्छी तरह से सीख नहीं पाएंगे. आपका तनाव उनके ऊपर आ जाएगा. तो इसकी बजाय आप अपने पास जो बच्चा है, उसे लेकर ख़ुश रहना सीखें. उसके साथ काम करना सीखें. धीरे-धीरे आप देखेंगे कि आपका बच्चा ना केवल अच्छी तरह से सीख पाएगा, बल्कि वह बहुत ख़ुश भी रहेगा. यही तो सभी पैरेंट्स अपने बच्चों के लिए चाहते हैं.

– ऊषा गुप्ता


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Medical Consumer Rights

जब मेडिकल लापरवाही के हों शिकार, तो कहां करें शिकायत? (Medical Negligence: Consumer Rights And The Law)

एबी पॉज़िटिव मरीज़ को एबी निगेटिव का खून चढ़ाना, दाएं पैर की बजाय बाएं पैर की सर्जरी करना, मलेरिया के मरीज़ को डेंगू की दवाइयां देना, दवाइयों का इतना ओवरडोज़ कि मरीज़ की जान पर बन आए… आए दिन हमें मेडिकल लापरवाही की ऐसी ख़बरें

देखने-सुनने को मिलती हैं. क्या हो, अगर उनकी जगह हमारे परिवार का कोई सदस्य या हम ख़ुद हों? ऐसी लापरवाही किसी के साथ भी हो सकती है, इसलिए ज़रूरी है कि आप अपने अधिकारों के प्रति जागरूक रहें, ताकि सही समय पर सही कार्रवाई कर सकें.

अपनी भलाई के लिए हम डॉक्टर की हर बात पर आंख मूंदकर भरोसा कर लेते हैं, जबकि हमें अपनी आंखें और कान हमेशा खुले रखने चाहिए. किसी ज़माने में नोबल प्रोफेशन माना जानेवाला मेडिकल प्रोफेशन आज प्रॉफिट मेकिंग बिज़नेस बन गया है. ऐसे में बहुत ज़रूरी है कि हम अपने अधिकारों के प्रति जागरूक रहें और किसी भी तरह की मेडिकल लापरवाही होने पर सही जगह उसकी शिकायत करें.

क्या है मेडिकल लापरवाही?

यह डॉक्टर की नैतिक ज़िम्मेदारी है कि वह अपने पास आनेवाले सभी मरीज़ों का सही तरी़के से इलाज या कंस्लटेशन करे. अपने कर्त्तव्यों को ईमानदारीपूर्वक निभाए, लेकिन जब डॉक्टर अपने कर्त्तव्यों को सही तरी़के से न निभाए और उसकी लापरवाही से मरीज़ को शारीरिक क्षति पहुंचे या जान चली जाए, तो यह मेडिकल लापरवाही होगी.

किन मामलों में कर सकते हैं शिकायत?

किसी भी सर्जरी से पहले डॉक्टर्स कुछ पेपर्स पर आपके सिग्नेचर लेते हैं, ताकि कुछ गड़बड़ होने पर वो ज़िम्मेदार न ठहराए जाएं. लेकिन वो इससे पूरी तरह बच नहीं सकते. आइए देखें, कौन-से हैं वो मामले, जो मेडिकल लापरवाही की श्रेणी में आते हैं.

–   लापरवाही के कारण ग़लत दवा देना.

–    सही तरी़के से इलाज न करना.

–    मरीज़ को ऐसी जगह रखना, जिससे उसे संक्रामक रोग हो जाए.

–    अस्पताल में स्टाफ की कमी के कारण मरीज़ की सही तरी़के से देखभाल न हो पाना.

–    मरीज़ की परेशानियों को अनसुना करना.

–    बीमारी के लक्षणों को पहचानने में ग़लती करना.

–    ग़लत लक्षण के कारण बेवजह सर्जरी कर देना.

–    लक्षणों को पहचानने में बहुत ज़्यादा देर करना, जिससे मरीज़ की जान पर बन आए.

–    सर्जरी के दौरान किसी और अंग को नुक़सान पहुंचाना.

–    सर्जरी के दौरान ग़लती करना, जिससे किसी तरह का इंफेक्शन हो जाए या फिर इम्यून सिस्टम फेल हो जाए.

–    सर्जरी के दौरान किसी चीज़ का अंदर छूट जाना, सर्जरी के कारण बहुत ज़्यादा खून बहना, ग़लत बॉडी पार्ट की सर्जरी कर देना.

–    एनेस्थीसिया देने में ग़लती करना.

–    बच्चे के जन्म के दौरान किसी तरह की ग़लती से बच्चे का नर्व डैमेज होना या फिर जान पर बन आना आदि.

भले ही डॉक्टर ने लापरवाहियां ग़लती से कर दी हों, फिर भी वह दोषी माना जाएगा.

 

क्या है टाइम लिमिट?

यह जानना बहुत ज़रूरी है कि आपको मेडिकल लापरवाही के तीन साल के भीतर शिकायत दर्ज करनी है, वरना उसके बाद भले ही आपका केस कितना भी मज़बूत क्यों न हो, आपको एक पैसा नहीं मिलेगा.

–    यहां यह ध्यान देने की ज़रूरत है कि लापरवाही के बारे में आपको पता कब चला, क्योंकि ऐसे कई मामले होते हैं, जहां कई सालों बाद इसके बारे में पता चलता है. उदाहरण के लिए अगर कैंसर ट्रीटमेंट के दौरान बहुत ज़्यादा रेडिएशन का इस्तेमाल किया गया हो, तो उसका असर कुछ सालों बाद दिखेगा और जब असर दिखने लगे, तब से लेकर तीन साल के भीतर आप शिकायत कर सकते हैं.

कौन कर सकता है शिकायत?

मरीज़ या मरीज़ के परिवारवालों के अलावा कोई रजिस्टडर्र् ग़ैरसरकारी  संस्था  भी मरीज़ की तरफ़ से शिकायत दर्ज कर सकती है. मेडिकल लापरवाही को साबित करने की ज़िम्मेदारी पीड़ित पर होती है, इसलिए आपको सभी पेपर्स संभालकर रखने चाहिए.

शिकायत से पहले ध्यान में रखें ये बातें

–    अगर आपको संदेह है कि डॉक्टर सही इलाज नहीं कर रहा है, तो किसी और डॉक्टर से सलाह लें और मरीज़ को किसी अच्छे अस्पताल में भर्ती कराएं. उसके ठीक होने के बाद ही इस मामले को उठाएं. मरीज़ को प्राथमिकता दें.

–    सबसे पहले इस बात की पुष्टि के लिए कि मेडिकल लापरवाही हुई है, आपको किसी सरकारी अस्पताल के डॉक्टर या उसी फील्ड के एक्सपर्ट से एक रिपोर्ट लेनी होगी, जिसमें वो इस बात की पुष्टि करे कि मेडिकल लापरवाही हुई है.

–    आप चाहें, तो कंज़्यूमर कोर्ट में भी गुहार लगा सकते हैं कि वो अपनी तरफ़ से मेडिकल बोर्ड को जांच के आदेश दे, ताकि आपको रिपोर्ट मिल जाए.

–    शिकायत करने के लिए सबसे ज़रूरी है डॉक्यूमेंट्स. इलाज से जुड़े सभी एडमिशन पेपर्स से लेकर रिपोर्ट्स, दवाई के बिल्स वगैरह सभी जमा करके रखें.

–    अगर अस्पताल आपको मेडिकल रिकॉर्ड्स नहीं दे रहा, तो आप कोर्ट में जा सकते हैं. कोर्ट के आदेश पर उन्हें मेडिकल रिकॉर्ड्स देने ही पड़ेंगे.

Consumer Rights

कहां करें शिकायत?

मेडिकल लापरवाही के मामले में आपको सही कड़ी का इस्तेमाल करना चाहिए. सबसे पहले अस्पताल से ही शुरुआत करें, अगर वहां आपकी सुनवाई नहीं होती, तो न्याय मांगने के लिए कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाने से न हिचकिचाएं.

मेडिकल सुप्रिटेंडेंट

–    डॉक्टर की लापरवाही हो या फिर स्टाफ की ग़ैरज़िम्मेदारी, उसकी शिकायत तुरंत अस्पताल के मेडिकल सुप्रिटेंडेंट से करें.

–    आप उनसे उचित कार्रवाई के साथ हर्जाने की मांग भी कर सकते हैं.

स्टेट मेडिकल काउंसिल

–   डॉक्टर या अस्पताल से जुड़ी किसी भी तरह की शिकायत आपको पहले मेडिकल काउंसिल में करनी चाहिए. वो अपने लेवल पर जांच करके उचित कार्रवाई करते हैं.

–   अगर काउंसिल की जांच में डॉक्टर्स दोषी पाए जाते हैं, तो काउंसिल उनका लाइसेंस तक रद्द कर सकती है.

–    अगर आपको लगता है कि मामले को जान-बूझकर टाला जा रहा है, तो आप अपनी शिकायत नेशनल मेडिकल काउंसिल में भी कर सकते हैं. ये दोनों ही गवर्निंग बॉडीज़ हैं, जो दोषी पाए जाने पर उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई करते हैं.

कंज़्यूमर कोर्ट

जब आप किसी डॉक्टर या अस्पताल में जाकर इलाज करवाते हैं और उनकी सेवा के बदले उन्हें फीस देते हैं, तो आप उनके ग्राहक माने जाते हैं और क्योंकि आप ग्राहक हैं, तो आप मेडिकल लापरवाही के ख़िलाफ़ अपनी शिकायत कंज़्यूमर कोर्ट में कर सकते हैं.

–    आप अपनी शिकायत डिस्ट्रिक्ट फोरम में कर सकते हैं.

–    यहां आपको एक बात ध्यान में रखनी होगी किकंज़्यूमर कोर्ट में आपको स़िर्फ मुआवज़ा मिलेगा.

–    यहां आप डॉक्टर के ख़िलाफ़ किसी तरह की क्रिमिनल कार्रवाई की मांग नहीं कर सकते.

–    हाल ही में लोकसभा में कंज़्यूमर प्रोटेक्शन बिल 2018 पास हुआ है, जिसमें कई नए बदलाव किए गए हैं, ताकि ग्राहकों की शिकायत पर जल्द सुनवाई हो सके. इस बिल के क़ानून बन जाने से मेडिकल लापरवाही के मामलों को और आसानी से सुलझाया जा सकेगा.

सज़ा का प्रावधान

इंडियन पीनल कोड की धारा 304ए के तहत लापरवाही के कारण होनेवाली मौत के लिए दो  साल की जेल और जुर्माना या फिर दोनों का प्रावधान है.

ख़राब है देश में मेडिकल कंडीशन

–    मेडिकल लापरवाही में ह्यूमन एरर के कारण हर साल हमारे देश में लगभग 52 लाख लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ती है, जबकि अमेरिका में यह आंकड़ा 44 हज़ार से 98 हज़ार का है.

–    साल 2016 में हुई एक स्टडी के मुताबिक़ हर साल इंडिया में मेडिकल लापरवाही के मामले तेज़ी से बढ़ रहे हैं. आंकड़ों में बात की जाए, तो हर साल इन मामलों में 110% बढ़ोतरी हो रही है.

–    हमारे देश में मेडिकल बजट हमारे पड़ोसी देश नेपाल और श्रीलंका से भी बहुत कम है. देश के जीडीपी का महज़ 1% मेडिकल बजट के लिए दिया जाता है.

– अनीता सिंह

 

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हमारे गले में मौजूद थायरॉइड ग्लांड्स थायरॉइड हार्मोंस का निर्माण करते हैं. थायरॉइड हार्मोंस के अधिक निर्माण (ओवरप्रोडक्शन) या कम निर्माण (अंडरप्रोडक्शन) की वजह से थायरॉइड की समस्या होती है. थायरॉइड हार्मोंस हमारे शरीर के तापमान, मेटाबॉलिज़्म और हार्टबीट को नियंत्रित करते हैं.
थॉयरॉइड के असंतुलन का निश्‍चित कारण का तो पता नहीं, लेकिन तनाव, पोषण की कमी, अनुवांशिकता, ऑटोइम्यून अटैक, प्रेग्नेंसी, वातावरण में मौजूद टॉक्सिन्स आदि इसकी वजह हो सकते हैं. वर्ल्ड थायरॉइड डे के मौक़े पर आइए, जानते हैं इस बीमारी के बारे में विस्तार से.
लक्षण
चूंकि ये हार्मोंस बड़े स्तर पर काम करते हैं, तो इसका पता लगाना थोड़ा मुश्किल होता है, लेकिन इन लक्षणों के आधार पर पता लगाया जा सकता है-
थकान: अगर आप दिनभर थकान महसूस करते हैं और रातभर अच्छी नींद लेने के बाद भी सुबह ख़ुद को थका हुआ महसूस करते हैं, तो हो सकता है आपके थायरॉइड ग्लांड्स हार्मोंस का कम निर्माण कर रहे हों.
डिप्रेशन: यह भी हाइपोथायरॉइडिज़्म यानी हार्मोंस के कम स्तर का संकेत हो सकता है, क्योंकि थायरॉइड हार्मोंस का संबंध मस्तिष्क के सेरोटोनिन नामक तत्व (मोनोअमाइन न्यूरोट्रांसमीटर) से होता है. सेरोटोनिन एक बायोकेमिकल है, जो हमें अच्छा महसूस कराता है और ख़ुश रखने में सहायता करता है. थायरॉइड के कम निर्माण से सेरोटोनिन के स्तर पर भी प्रभाव पड़ता है, जिससे हम डिप्रेशन में जा सकते हैं.
चिंता: बहुत अधिक चिंतित रहना या अजीब-सी घबराहट महसूस होना हाइपरथायरॉइडिज़्म (अधिक निर्माण) से संबंधित हो सकता है. थायरॉइड हार्मोंस का स्तर जब बहुत अधिक बढ़ जाता है, तब आप रिलैक्स महसूस न करके हाइपर रहते हैं, क्योंकि आपके मेटाबॉलिज़्म को इसी तरह के सिग्नल्स मिलते हैं.
भूख, स्वाद और वज़न में परिवर्तन: हाइपरथायरॉइडिज़्म से बहुत अधिक भूख लगने लगती है, लेकिन वज़न बढ़ने की बजाय कम होता जाता है. जबकि हाइपोथायरॉइडिज़्म से स्वाद और गंध में बदलाव आता है और वज़न बढ़ सकता है.
मस्तिष्क पर प्रभाव: थायरॉइड के अधिक होने से एकाग्रता की कमी हो सकती है और इसके कम होने से याददाश्त पर विपरीत प्रभाव पड़ता है यानी आप भूलने की समस्या से परेशान हो सकते हैं और मस्तिष्क में एक रुकावट व असमंजस की स्थिति बनी रहती है. अक्सर थायरॉइड के इलाज के बाद मरीज़ काफ़ी हैरान हो जाते हैं कि पहले की अपेक्षा उनका मस्तिष्क कितना तेज़ हो गया है, क्योंकि उन्हें यह अंदाज़ा ही नहीं होता कि थायरॉइड की वजह से भी ऐसा हो सकता है.
सेक्स लाइफ: थायरॉइड हार्मोंस के कम होने पर सेक्स में दिलचस्पी कम होने लगती है, लेकिन एक्सपर्ट्स का मानना है कि इसका सीधा संबंध थायरॉइड से न होकर इसकी वजह से हो रही थकान, बढ़ता वज़न, ऊर्जा की कमी व शरीर में दर्द आदि से हो सकता है.
स्पंदन महसूस होना: हार्ट पल्पिटेशन यानी धड़कनें आप अपने गले व सीने में महसूस कर सकते हो. दिल या तो ज़ोर-ज़ोर से धड़कता हो या बीट्स मिस हो रही हो, तो यह थायरॉइड के कारण हो सकता है.
त्वचा में बदलाव: थायरॉइड के कम होने पर त्वचा ड्राई व त्वचा में खुजली भी हो सकती है. हार्मोंस की कमी से मेटाबॉलिज़्म धीमा हो सकता है, जिससे त्वचा पर भी प्रभाव पड़ता है. पसीना कम आता है, जिसकी वजह से त्वचा का मॉइश्‍चर कम हो जाता है.
कब्ज़: मेटाबॉलिज़्म प्रभावित होने से कब्ज़ की शिकायत भी हो सकती है. जबकि थायरॉइड के बढ़ जाने से दस्त की शिकायत हो सकती है.
महिलाओं में पीरियड्स की अनियमितता: थायरॉइड की कमी से पीरिड्स के बीच का अंतर बढ़ जाता है, दर्द अधिक होता है और हैवी ब्लीडिंग भी होती है. जबकि थायरॉइड की अधिकता से पीरियड्स जल्दी-जल्दी होने लगते हैं व हैवी ब्लीडिंग होती है.
मसल्स में दर्द: हाथ-पैरों में दर्द और सुन्नता थायरॉइड की कमी के कारण हो सकता है.
हाई ब्लडप्रेशर: जिन्हें थायरॉइड (कम या ज़्यादा) की समस्या है, उन्हें ब्लडप्रेशर की संभावना अपेक्षाकृत अधिक होती है. थायरॉइड की कमी से ब्लडप्रेशर बढ़ने की संभावना और भी अधिक हो जाती है.
बहुत ठंड या गर्मी लगना: बहुत अधिक ठंड लगना, जल्दी सर्दी होना थायरॉइड की कमी की निशानी भी हो सकते हैं. जबकि थायरॉइड की अधिकता से गर्मी व पसीने की समस्या हो सकती है.
आवाज़ में बदलाव: थायरॉइड में सूजन की वजह से आवाज़ में बदलाव आ सकता है.
नींद में बदलाव: हमेशा नींद आना थायरॉइड की कमी का संकेत हो सकता है, जबकि नींद न आना इसकी अधिकता की निशानी हो सकती है.
कंसीव करने में समस्या: प्रग्नेंसी में समस्या हो रही है, तो थायरॉइड भी इसकी वजह हो सकती है, क्योंकि थायरॉइड का असंतुलन ओव्यूलेशन को प्रभावित करता है.
बालों का झड़ना: न स़िर्फ सिर के बाल बल्कि आईब्रो व अन्य हिस्सों के बाल भी थायरॉइड की कमी से कम हो सकते हैं. जबकि थायरॉइड की अधिकता स़िर्फ सिर के बालों के प्रभावित करती है.
हृदय रोग व हाई कोलेस्ट्रॉल: थायरॉइड की कमी से बैड कोलेस्ट्रॉल बढ़ सकता है और हृदय रोग भी हो सकता है.
इलाज
हाइपरथायरॉइडिज़्म: थायरॉइड की अधिकता होने पर रेडियोआयोडीन ट्रीटमेंट (रेडियोथेरेपी का एक प्रकार), एंटी थायरॉइड मेडिकेशन और सर्जरी की जा सकती है. रेडियोआयोडीन ट्रीटमेंट में डॉक्टर आपको टैबलेट या लिक्विड दे सकते हैं, जिसमें रेडियोएक्टिव आयोडीन की भरपूर मात्रा होगी. यह टैबलेट (या लिक्विड) थायरॉइड ग्लांड्स के सेल्स को नष्ट करके और हार्मोंस के निर्माण की क्रिया को कम करके थायरॉड को नियंत्रित करती है.
कभी-कभी एक से अधिक ट्रीटमेंट की भी ज़रूरत पड़ती है. रेडियोआयोडीन ट्रीटमेंट गर्भवती व फीड करा रही महिलाओं को नहीं करवाना चाहिए. जो लोग यह ट्रीटमेंट लेते हैं, उनमें भी महिलाओं को इलाज के बाद अगले छह महीनों के लिए कंसीव नहीं करना चाहिए और पुरुषों को भी चार महीने तक इससे बचना चाहिए. कई मरीज़ इस ट्रीटमेंट के बाद हाइपोथायरॉइडिज़्म (थायरॉइड की कमी) का शिकार हो जाते हैं, इसलिए बेहतर होगा कि सतक रहें और अपना थायरॉइड टेस्ट समय-समय पर करवाते रहें.
इस ट्रीटमेंट के वैसे कोई गंभीर साइड इफेक्ट्स नहीं होते, लेकिन एक साइड इफेक्ट बेहद गंभीर होता है, जिसमें व्हाइट ब्लड सेल्स का बोनमैरो निर्माण कम हो जाता है. इसका एक लक्षण होता है गले में सूजन. यदि आपको भी इलाज के बाद यह लक्षण नज़र आए, तो बेहतर है डॉक्टरी सलाह लेकर अपना व्हाइट ब्लड सेल्स चेक करवाएं.
सर्जरी की सलाह 45 वर्ष से कम आयुवाले ऐसे लोगों को दी जाती है, जहां उनका हाइपरथायरॉइडिज़्म टॉक्सिक ट्यूमर (एडेनोमाज़- इन्हें हॉट नॉड्यूल्स भी कहते हैं) के कारण होता है. ये नॉड्यूल्स रेडियोआयोडीन ट्रीटमेंट से ठीक नहीं होते, इसलिए सर्जरी का सहारा लिया जाता है. सर्जरी के कुछ ही हफ़्तों बाद हार्मोंस का स्तर सामान्य हो जाता है, लेकिन यहां भी हार्मोंस का स्तर सामान्य से भी कम हो जाने की संभावना रहती है, तो नियमित टेस्ट ज़रूरी है.
कभी-कभी अस्थायी तौर पर भी थायरॉइड हो जाता है, जो बिना दवा के या पेनकिल्लर्स से ठीक हो जाता है.
हाइपोथायरॉइडिज़्म: थायरॉइड की कमी में थायरॉइड हार्मोन रिप्लेसमेंट द्वारा इलाज किया जाता है. हालांकि एनिमल एक्स्ट्रक्ट से हार्मोंस उपलब्द्ध होते हैं, लेकिन डॉक्टर्स सामान्यत: सिंथेटिक थायरॉइड हार्मोंस को अधिक महत्ता देते हैं. इसके साइडइफेक्ट् न के बराबर हैं, लेकिन कुछ लोग घबराहट और सीने में दर्द का अनुभव कर सकते हैं.

घरेलू उपाय
हाइपरथायरॉइडिज़्म के लिए
– ब्रोकोली में गॉइट्रोजेन्स और आइसोथायोसाइनेट्स नामक तत्व होते हैं, जो थायरॉइड के निर्माण पर अंकुश लगाते हैं. अपने थायरॉइड हर्मोंस को नियंत्रित रखने के लिए जितना अधिक हो सके सलाद के रूप में ब्रोकोली का कच्चा ही सेवन करें.
– सोया प्रोडक्ट्स भी फ़ायदेमंद है, क्योंकि यह प्रोटीन से भरपूर होते हैं. प्रोटीन थायरॉइड हार्मोंस को दूसरे बॉडी टिश्यूज़ में ट्रांसपोर्ट कर देते हैं.
– अगर आपको सोया प्रोडक्ट्स पसंद नहीं, तो नट्स, अंडे और फलियों को डायट में शामिल करें.
– ओमेगा-3 फैटी एसिड्स ज़रूरी है. यदि आपके शरीर को यह नहीं मिल रहा, तो हार्मोंस में असंतुलन होगा. आप फ्लैक्स सीड्स, अखरोट और मछलियों के सेवन से इसे प्राप्त कर सकते हैं.
– पत्तागोभी में भी भरपूर मात्रा में गॉइट्रोजेन्स होते हैं. पत्तागोभी का सलाद यानी पत्तागोभी को कच्चा खाने से अधिक लाभ मिलेगा.
– बेरीज़ को अपने डायट में शामिल करें, क्योंकि सभी प्रकार की बेरीज़- ब्लू बेरीज़, स्ट्रॉ बेरीज़, ब्लैक बेरीज़ और चेरी आदि थायरॉइड ग्लांड्स को हेल्दी रखती हैं.
– आंवला थायरॉइड को कंट्रोल करने में बेहद कारगर है. आंवला पाउडर में शहद मिलाकर रोज़ सुबह नाश्ते से पहले लें.
– प्रीज़र्वेटिव्स युक्त, अधिक शक्कर व मैदा से बने पदार्थ न खाएं, जैसे- पास्ता, व्हाइट ब्रेड

हाइपोथायरॉइडिज़्म के लिए
– कोकोनट ऑयल थायरॉइड ग्लांड्स को क्रियाशील करके हर्मोंस के स्तर को बनाए रखने में मदद करता है. खाना पकाने के लिए एक्स्ट्रा वर्जिन ऑर्गैनिक कोकोनट ऑयल का इस्तेमाल करें.
– रोज़ नाश्ता करते समय दूध में 2 टेबलस्पून कोकोनट ऑयल मिक्स करके पीएं.
– एप्पल साइडर विनेगर भी थायरॉइड के असंतुलन को पूरा करने में सहायक है. यह डीटॉक्सीफाइ करता है, एसिड-एल्कलाइन बैलेंस को बनाए रखता है, हार्मोंस को संतुलित करके मैटाबॉलिज़्म को बेहतर बनाता है, वज़न नियंत्रण में रखता है.
– 2 टेबलस्पून ऑर्गैनिक एप्पल साइडर विनेगर को एक ग्लास गर्म पानी में मिलाएं. थोड़ा शहद भी मिला लें. नियमित रूप से इसका सेवन करें.
– फिश ऑयल भी थायरॉइड हार्मोंस के निर्माण में सहायक होता है.
– विटामिन डी की कमी से ऑटोइम्यून डिसीज़ हो सकती हैं, जिनमें थायरॉइड भी एक है. रोज़ सुबह 15 मिनट तक धूप का सेवन करें.
– अदरक ज़िंक, मैग्नीशियम और पोटैशियम से भरपूर होता है. यह थायरॉइड ग्लांड्स की कार्यशैली को बेहतर बनाता है. अपने खाने में या सूप में अदरक के टुकड़े डालकर इसे अपने डायट में शामिल करें या फिर अदरक को पानी में उबालकर गर्म जिंजर टी का सेवन करें. इसमें आप शहद भी मिला सकते हैं.
– विटामिन बी थायरॉइड ग्लांड्स को हेल्दी रखता है. शोधों में अक्सर पाया गया है कि जो लोग हाइपोथायरॉइडिज़्म से ग्रसित हैं, उनमें विटामिन बी12 की कमी भी पाई जाती है.
– योग व प्राणायाम से थायरॉइड हार्मोंस का स्तर सामान्य बना रहता है. हाइपर व हाइपो दोनों ही थायरॉइड में योग का फ़ायदा है, लेकिन दोनों के लिए पोज़ अलग-अलग हो सकते हैं, इसलिए किसी योग गुरू से पूछकर उनकी देखरेख में ही यह करें.
– हाइपरथायरॉइडिज़्म के लिए सेतुबंधासन, शिशु आसन, शवासन, मार्जरीआसन और सूर्य नमस्कार फ़ायदेमंद हैं
– हाइपोथायरॉइडिज़्म के लिए प्राणायाम- शीतली प्राणायाम, उज्जयी और नाड़ी शोधन, हर तरह की ब्रीदिंग एक्सरसाइज़, योग निद्रा व ध्यान लाभदायक है.
– लेकिन किसी भी तरह के थायरॉइड में योग व एक्सरसाइज़ बिना डॉक्टरी सलाह व बिना एक्सपर्ट की देखरेख के शुरू न करें.

– गीता शर्मा

आमतौर पर लोगों की सोच होती है कि रक्तदान यानी ब्लड डोनेट करने से उन्हें कमज़ोरी आ जाएगी या उनकी सेहत पर इसका बुरा असर होगा, इसलिए वे ब्लड डोनेट करने से कतराते हैं, लेकिन ऐसा बिल्कुल भी नहीं है. ब्लड डोनेट करने से ब्लड डोनर को किसी का जीवन बचाने या किसी की मदद करने की आत्मसंतुष्टि तो  मिलती ही है, साथ ही ये उनके हेल्थ के लिए भी फ़ायदेमंद है.

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हमारे देश में समय पर खून न मिलने के कारण हर साल 15 लाख मरीज़ अपनी जान गंवा बैठते हैं. इनमें उन बच्चों की तादाद अधिक होती है, जिन्हें थेलेसिमिया के कारण बार-बार ब्लड की ज़रूरत होती है. दुर्घटना के शिकार, मलेरिया के मरीज़ों, कुपोषणग्रस्त बच्चों के अलावा प्रेग्नेंट वुमन को भी कई कारणों से ब्लड की ज़रूरत होती है. ब्लड डोनेशन से जुड़े अहम् पहलुओं पर डॉ. मनोज जैन ने हमें कई उपयोगी जानकारियां दीं.

यदि सभी लोग साल में एक बार भी ब्लड डोनेट करें, तो कई ज़िंदगियां बचाई जा सकती हैं. एक सामान्य मनुष्य में 5 से 6 लीटर ब्लड होता है और उसके शरीर के वज़न में 7 % वज़न ब्लड का होता है. मेडिकली एक हेल्दी व्यक्ति हर तीन महीने में एक बार ब्लड डोनेट कर सकता है. यदि देश का हर हेल्दी व्यक्ति ब्लड डोनेट करता रहे, तो ब्लड की कमी से कभी किसी की मृत्यु नहीं हो सकती. हमारे यहां सबसे अधिक पाया जानेवाला ब्लड ग्रुप ‘ओ’ और सबसे कम ‘एबी निगेटिव’ है.

दान भी, सेहत भी…
अधिकतर लोगों का मानना है कि ब्लड डोनेट करने से कमज़ोरी आती है. ऐसा बिल्कुल भी नहीं है. ब्लड डोनेट करते समय जितना ब्लड निकलता है, उसकी भरपाई हमारे शरीर में 2-3 दिन के अंदर हो जाती है. इसलिए ब्लड डोनेट करना न केवल एक अच्छा काम है, बल्कि ये आपको स्वस्थ भी रखता है. कैसे? आइए, जानते हैं.

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ब्लड डोनेट करने से शरीर को नुक़सान की बजाय कई फ़ायदे होते हैं, जैसे-

  • ब्लड प्यूरिफाई हो जाता है. ब्लड डोनेशन के दौरान मात्र 300 मि.ली. ब्लड लिया जाता है और शरीर इस ब्लड की पूर्ति 24 से 48 घंटे में कर लेता है.
  • इससे शरीर की रक्त कोशिकाएं तेज़ी से बनने लगती हैं.
  • रेड ब्लड सेल्स भी रिडेवलप होते हैं, जिससे शरीर में ऑक्सीजन की मात्रा अधिक रहती है. यानी रक्तदान के तुरंत बाद ही नई लाल कोशिकाएं बनने से शरीर में स्फूर्ति पैदा होती है.
  • ब्लड डोनेट करते रहने से हार्ट डिसीज़ में 5% की कमी आ जाती है.
  • ब्लड डोनेट करते रहने से बोनमैरो (अस्थिमज्जा) लगातार क्रियाशील बना रहता है.
  • रक्त द्वारा संक्रमित होनेवाली बीमारियों की भी अपने आप जांच हो जाती है.

कुछ अन्य फ़ायदे भी

  • ज़रूरत होने पर ब्लड डोनर को डोनर कार्ड के बदले ब्लड बैंक से ब्लड मिल जाता है.
  • शायद बहुत कम लोगों को मालूम है कि ब्लड के 1 यूनिट से 3 ज़िंदगियां बचाई जा सकती हैं. यानी डोनेट किया हुआ आधा लीटर
    ब्लड कम से कम 3 मरीज़ों का जीवन बचा सकता है.
  • ओ निगेटिव ब्लड ग्रुप वाले यूनिवर्सल डोनर हैैं यानी वे अपना ब्लड किसी को भी दे सकते हैं.

ब्लड डोनेट कर सकते हैं?

  • कोई भी हेल्दी व्यक्ति, जिसकी उम्र 18 से 68 साल के बीच हो.
  • जिसका वज़न 45 किलो या उससे अधिक हो.
  • जिसके ख़ून में हीमोग्लोबिन 12% से अधिक हो.
  • ब्लड डोनेट करते समय कोई एंटीबॉयोटिक न ले रहा हो.
  • पिछले तीन वर्षों में जॉन्डिस या कोई बड़ा ऑपरेशन न हुआ हो.
  • एक ब्लड डोनर सालभर में कम से कम चार बार और तीन-तीन महीने के गैप पर ब्लड डोनेट कर सकता है.

कौन नहीं कर सकता ब्लड डोनेट?

  • जो महिला पीरियड में हो.
  • जो महिला अपने बच्चे को ब्रेस्ट फीडिंग करा रही हो.
  • जो किसी गंभीर बीमारी से ग्रस्त हो.

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देशभर में ब्लड बैंक की स्थिति
देश में नामी और सही तौर पर मात्र पांच सौ ब्लड बैंक हैं, जहां हर साल दस हज़ार यूनिट्स से अधिक ब्लड जमा होता है. साथ ही क़रीब छह सौ ऐसे ब्लड बैंक भी हैं, जो हर साल 600 यूनिट्स ही इकट्ठा कर पाते हैं. इनके अलावा 2433 ब्लड बैंक्स ऐसे हैं, जो तीन से पांच हज़ार यूनिट्स हर साल इकट्ठा कर लेते हैं.
देश में क़रीब 25 लाख लोग अपनी इच्छा से ब्लड डोनेट करते हैं. सबसे अधिक ब्लड बैंक महाराष्ट्र में 270, तमिलनाडु में 240 और आंध्र प्रदेश में 222 हैं.
जबकि उत्तर-पूर्व के सातों राज्यों में कुल मिलाकर 29 ऑथोराइज़्ड ब्लड बैंक्स हैं.

क्या आप जानते हैं?

  • 1998 में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर देश में प्रोफेशनल ब्लड डोनर पर पूरी तरह बैन लगाया गया था.
  • सन् 2007 में वैज्ञानिकों ने एंज़ाइम्स के प्रयोग से ब्लड गु्रप ए, बी, एबी को ओ में बदलने मेें सफलता प्राप्त कर ली थी, लेकिन अब तक इंसानों पर प्रयोग होना बाकी है.
  • विकासशील व ग़रीब देशों में ब्लड डोनेट के बाद भी डोनेट किए हुए ब्लड का 45% ही स्टोर हो पाता है.
  • यदि किसी देश की जनसंख्या के मात्र 1 से 3% लोग भी ब्लड डोनेट करते हैं, तो उस देश की ज़रूरत पूरी हो सकती है, लेकिन दुनियाभर में तक़रीबन 73 देशों में जनसंख्या के 1% से भी कम लोग ब्लड डोनेट करते हैं.
  • वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइज़ेशन के अनुसार, ब्लड बैंक से ब्लड ख़रीदने की बजाय इच्छुक ब्लड डोनर से ़ज़रूरत के समय ब्लड लेना अधिक लाभदायक रहता है.
  • आंकड़ों के अनुसार, स्वैच्छिक ब्लड डोनर द्वारा दिया गया ब्लड न केवल मरीज़ों पर अच्छा असर करता है, बल्कि इसमें एचआईवी और हेपेटाइटिस वायरस के होने की आशंका भी कम रहती है.

ब्लड डोनेट करके जहां हम एक नेक कार्य करते हैं, वहीं अपने शरीर के ब्लड को भी क्लीन करते हैं, जो हमारे सेहत के लिए ज़रूरी भी है. रक्तदान को बढ़ावा देने के लिए हम सभी कुछ ऐसा भी कर सकते हैं, जैसे जो लोग ब्लड डोनेट करने के इच्छुक हैं, वे अपने दोस्तों का एक ग्रुप बना सकते हैं. और जब कभी जान-पहचान वाले या किसी को भी ब्लड की ज़रूरत पड़े, तब वे एक-दूसरे को मैसेज देकर ब्लड की ज़रूरत को पूरा कर सकते हैं. और यदि इस गु्रप में रेयर ब्लड ग्रुपवाले लोग भी हों, तो और भी अधिक ज़रूरतमंदों की मदद की जा सकेगी.

– ऊषा गुप्ता

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