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जब मेडिकल लापरवाही के हों शिकार, तो कहां करें शिकायत? (Medical Negligence: Consumer Rights And The Law)

Medical Consumer Rights

जब मेडिकल लापरवाही के हों शिकार, तो कहां करें शिकायत? (Medical Negligence: Consumer Rights And The Law)

एबी पॉज़िटिव मरीज़ को एबी निगेटिव का खून चढ़ाना, दाएं पैर की बजाय बाएं पैर की सर्जरी करना, मलेरिया के मरीज़ को डेंगू की दवाइयां देना, दवाइयों का इतना ओवरडोज़ कि मरीज़ की जान पर बन आए… आए दिन हमें मेडिकल लापरवाही की ऐसी ख़बरें

देखने-सुनने को मिलती हैं. क्या हो, अगर उनकी जगह हमारे परिवार का कोई सदस्य या हम ख़ुद हों? ऐसी लापरवाही किसी के साथ भी हो सकती है, इसलिए ज़रूरी है कि आप अपने अधिकारों के प्रति जागरूक रहें, ताकि सही समय पर सही कार्रवाई कर सकें.

अपनी भलाई के लिए हम डॉक्टर की हर बात पर आंख मूंदकर भरोसा कर लेते हैं, जबकि हमें अपनी आंखें और कान हमेशा खुले रखने चाहिए. किसी ज़माने में नोबल प्रोफेशन माना जानेवाला मेडिकल प्रोफेशन आज प्रॉफिट मेकिंग बिज़नेस बन गया है. ऐसे में बहुत ज़रूरी है कि हम अपने अधिकारों के प्रति जागरूक रहें और किसी भी तरह की मेडिकल लापरवाही होने पर सही जगह उसकी शिकायत करें.

क्या है मेडिकल लापरवाही?

यह डॉक्टर की नैतिक ज़िम्मेदारी है कि वह अपने पास आनेवाले सभी मरीज़ों का सही तरी़के से इलाज या कंस्लटेशन करे. अपने कर्त्तव्यों को ईमानदारीपूर्वक निभाए, लेकिन जब डॉक्टर अपने कर्त्तव्यों को सही तरी़के से न निभाए और उसकी लापरवाही से मरीज़ को शारीरिक क्षति पहुंचे या जान चली जाए, तो यह मेडिकल लापरवाही होगी.

किन मामलों में कर सकते हैं शिकायत?

किसी भी सर्जरी से पहले डॉक्टर्स कुछ पेपर्स पर आपके सिग्नेचर लेते हैं, ताकि कुछ गड़बड़ होने पर वो ज़िम्मेदार न ठहराए जाएं. लेकिन वो इससे पूरी तरह बच नहीं सकते. आइए देखें, कौन-से हैं वो मामले, जो मेडिकल लापरवाही की श्रेणी में आते हैं.

–   लापरवाही के कारण ग़लत दवा देना.

–    सही तरी़के से इलाज न करना.

–    मरीज़ को ऐसी जगह रखना, जिससे उसे संक्रामक रोग हो जाए.

–    अस्पताल में स्टाफ की कमी के कारण मरीज़ की सही तरी़के से देखभाल न हो पाना.

–    मरीज़ की परेशानियों को अनसुना करना.

–    बीमारी के लक्षणों को पहचानने में ग़लती करना.

–    ग़लत लक्षण के कारण बेवजह सर्जरी कर देना.

–    लक्षणों को पहचानने में बहुत ज़्यादा देर करना, जिससे मरीज़ की जान पर बन आए.

–    सर्जरी के दौरान किसी और अंग को नुक़सान पहुंचाना.

–    सर्जरी के दौरान ग़लती करना, जिससे किसी तरह का इंफेक्शन हो जाए या फिर इम्यून सिस्टम फेल हो जाए.

–    सर्जरी के दौरान किसी चीज़ का अंदर छूट जाना, सर्जरी के कारण बहुत ज़्यादा खून बहना, ग़लत बॉडी पार्ट की सर्जरी कर देना.

–    एनेस्थीसिया देने में ग़लती करना.

–    बच्चे के जन्म के दौरान किसी तरह की ग़लती से बच्चे का नर्व डैमेज होना या फिर जान पर बन आना आदि.

भले ही डॉक्टर ने लापरवाहियां ग़लती से कर दी हों, फिर भी वह दोषी माना जाएगा.

 

क्या है टाइम लिमिट?

यह जानना बहुत ज़रूरी है कि आपको मेडिकल लापरवाही के तीन साल के भीतर शिकायत दर्ज करनी है, वरना उसके बाद भले ही आपका केस कितना भी मज़बूत क्यों न हो, आपको एक पैसा नहीं मिलेगा.

–    यहां यह ध्यान देने की ज़रूरत है कि लापरवाही के बारे में आपको पता कब चला, क्योंकि ऐसे कई मामले होते हैं, जहां कई सालों बाद इसके बारे में पता चलता है. उदाहरण के लिए अगर कैंसर ट्रीटमेंट के दौरान बहुत ज़्यादा रेडिएशन का इस्तेमाल किया गया हो, तो उसका असर कुछ सालों बाद दिखेगा और जब असर दिखने लगे, तब से लेकर तीन साल के भीतर आप शिकायत कर सकते हैं.

कौन कर सकता है शिकायत?

मरीज़ या मरीज़ के परिवारवालों के अलावा कोई रजिस्टडर्र् ग़ैरसरकारी  संस्था  भी मरीज़ की तरफ़ से शिकायत दर्ज कर सकती है. मेडिकल लापरवाही को साबित करने की ज़िम्मेदारी पीड़ित पर होती है, इसलिए आपको सभी पेपर्स संभालकर रखने चाहिए.

शिकायत से पहले ध्यान में रखें ये बातें

–    अगर आपको संदेह है कि डॉक्टर सही इलाज नहीं कर रहा है, तो किसी और डॉक्टर से सलाह लें और मरीज़ को किसी अच्छे अस्पताल में भर्ती कराएं. उसके ठीक होने के बाद ही इस मामले को उठाएं. मरीज़ को प्राथमिकता दें.

–    सबसे पहले इस बात की पुष्टि के लिए कि मेडिकल लापरवाही हुई है, आपको किसी सरकारी अस्पताल के डॉक्टर या उसी फील्ड के एक्सपर्ट से एक रिपोर्ट लेनी होगी, जिसमें वो इस बात की पुष्टि करे कि मेडिकल लापरवाही हुई है.

–    आप चाहें, तो कंज़्यूमर कोर्ट में भी गुहार लगा सकते हैं कि वो अपनी तरफ़ से मेडिकल बोर्ड को जांच के आदेश दे, ताकि आपको रिपोर्ट मिल जाए.

–    शिकायत करने के लिए सबसे ज़रूरी है डॉक्यूमेंट्स. इलाज से जुड़े सभी एडमिशन पेपर्स से लेकर रिपोर्ट्स, दवाई के बिल्स वगैरह सभी जमा करके रखें.

–    अगर अस्पताल आपको मेडिकल रिकॉर्ड्स नहीं दे रहा, तो आप कोर्ट में जा सकते हैं. कोर्ट के आदेश पर उन्हें मेडिकल रिकॉर्ड्स देने ही पड़ेंगे.

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कहां करें शिकायत?

मेडिकल लापरवाही के मामले में आपको सही कड़ी का इस्तेमाल करना चाहिए. सबसे पहले अस्पताल से ही शुरुआत करें, अगर वहां आपकी सुनवाई नहीं होती, तो न्याय मांगने के लिए कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाने से न हिचकिचाएं.

मेडिकल सुप्रिटेंडेंट

–    डॉक्टर की लापरवाही हो या फिर स्टाफ की ग़ैरज़िम्मेदारी, उसकी शिकायत तुरंत अस्पताल के मेडिकल सुप्रिटेंडेंट से करें.

–    आप उनसे उचित कार्रवाई के साथ हर्जाने की मांग भी कर सकते हैं.

स्टेट मेडिकल काउंसिल

–   डॉक्टर या अस्पताल से जुड़ी किसी भी तरह की शिकायत आपको पहले मेडिकल काउंसिल में करनी चाहिए. वो अपने लेवल पर जांच करके उचित कार्रवाई करते हैं.

–   अगर काउंसिल की जांच में डॉक्टर्स दोषी पाए जाते हैं, तो काउंसिल उनका लाइसेंस तक रद्द कर सकती है.

–    अगर आपको लगता है कि मामले को जान-बूझकर टाला जा रहा है, तो आप अपनी शिकायत नेशनल मेडिकल काउंसिल में भी कर सकते हैं. ये दोनों ही गवर्निंग बॉडीज़ हैं, जो दोषी पाए जाने पर उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई करते हैं.

कंज़्यूमर कोर्ट

जब आप किसी डॉक्टर या अस्पताल में जाकर इलाज करवाते हैं और उनकी सेवा के बदले उन्हें फीस देते हैं, तो आप उनके ग्राहक माने जाते हैं और क्योंकि आप ग्राहक हैं, तो आप मेडिकल लापरवाही के ख़िलाफ़ अपनी शिकायत कंज़्यूमर कोर्ट में कर सकते हैं.

–    आप अपनी शिकायत डिस्ट्रिक्ट फोरम में कर सकते हैं.

–    यहां आपको एक बात ध्यान में रखनी होगी किकंज़्यूमर कोर्ट में आपको स़िर्फ मुआवज़ा मिलेगा.

–    यहां आप डॉक्टर के ख़िलाफ़ किसी तरह की क्रिमिनल कार्रवाई की मांग नहीं कर सकते.

–    हाल ही में लोकसभा में कंज़्यूमर प्रोटेक्शन बिल 2018 पास हुआ है, जिसमें कई नए बदलाव किए गए हैं, ताकि ग्राहकों की शिकायत पर जल्द सुनवाई हो सके. इस बिल के क़ानून बन जाने से मेडिकल लापरवाही के मामलों को और आसानी से सुलझाया जा सकेगा.

सज़ा का प्रावधान

इंडियन पीनल कोड की धारा 304ए के तहत लापरवाही के कारण होनेवाली मौत के लिए दो  साल की जेल और जुर्माना या फिर दोनों का प्रावधान है.

ख़राब है देश में मेडिकल कंडीशन

–    मेडिकल लापरवाही में ह्यूमन एरर के कारण हर साल हमारे देश में लगभग 52 लाख लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ती है, जबकि अमेरिका में यह आंकड़ा 44 हज़ार से 98 हज़ार का है.

–    साल 2016 में हुई एक स्टडी के मुताबिक़ हर साल इंडिया में मेडिकल लापरवाही के मामले तेज़ी से बढ़ रहे हैं. आंकड़ों में बात की जाए, तो हर साल इन मामलों में 110% बढ़ोतरी हो रही है.

–    हमारे देश में मेडिकल बजट हमारे पड़ोसी देश नेपाल और श्रीलंका से भी बहुत कम है. देश के जीडीपी का महज़ 1% मेडिकल बजट के लिए दिया जाता है.

– अनीता सिंह

 

वर्ल्ड थायरॉइड डे: क्या आप भी हैं थायरॉइड से परेशान? (Are you Suffering From Thyroid?)

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हमारे गले में मौजूद थायरॉइड ग्लांड्स थायरॉइड हार्मोंस का निर्माण करते हैं. थायरॉइड हार्मोंस के अधिक निर्माण (ओवरप्रोडक्शन) या कम निर्माण (अंडरप्रोडक्शन) की वजह से थायरॉइड की समस्या होती है. थायरॉइड हार्मोंस हमारे शरीर के तापमान, मेटाबॉलिज़्म और हार्टबीट को नियंत्रित करते हैं.
थॉयरॉइड के असंतुलन का निश्‍चित कारण का तो पता नहीं, लेकिन तनाव, पोषण की कमी, अनुवांशिकता, ऑटोइम्यून अटैक, प्रेग्नेंसी, वातावरण में मौजूद टॉक्सिन्स आदि इसकी वजह हो सकते हैं. वर्ल्ड थायरॉइड डे के मौक़े पर आइए, जानते हैं इस बीमारी के बारे में विस्तार से.
लक्षण
चूंकि ये हार्मोंस बड़े स्तर पर काम करते हैं, तो इसका पता लगाना थोड़ा मुश्किल होता है, लेकिन इन लक्षणों के आधार पर पता लगाया जा सकता है-
थकान: अगर आप दिनभर थकान महसूस करते हैं और रातभर अच्छी नींद लेने के बाद भी सुबह ख़ुद को थका हुआ महसूस करते हैं, तो हो सकता है आपके थायरॉइड ग्लांड्स हार्मोंस का कम निर्माण कर रहे हों.
डिप्रेशन: यह भी हाइपोथायरॉइडिज़्म यानी हार्मोंस के कम स्तर का संकेत हो सकता है, क्योंकि थायरॉइड हार्मोंस का संबंध मस्तिष्क के सेरोटोनिन नामक तत्व (मोनोअमाइन न्यूरोट्रांसमीटर) से होता है. सेरोटोनिन एक बायोकेमिकल है, जो हमें अच्छा महसूस कराता है और ख़ुश रखने में सहायता करता है. थायरॉइड के कम निर्माण से सेरोटोनिन के स्तर पर भी प्रभाव पड़ता है, जिससे हम डिप्रेशन में जा सकते हैं.
चिंता: बहुत अधिक चिंतित रहना या अजीब-सी घबराहट महसूस होना हाइपरथायरॉइडिज़्म (अधिक निर्माण) से संबंधित हो सकता है. थायरॉइड हार्मोंस का स्तर जब बहुत अधिक बढ़ जाता है, तब आप रिलैक्स महसूस न करके हाइपर रहते हैं, क्योंकि आपके मेटाबॉलिज़्म को इसी तरह के सिग्नल्स मिलते हैं.
भूख, स्वाद और वज़न में परिवर्तन: हाइपरथायरॉइडिज़्म से बहुत अधिक भूख लगने लगती है, लेकिन वज़न बढ़ने की बजाय कम होता जाता है. जबकि हाइपोथायरॉइडिज़्म से स्वाद और गंध में बदलाव आता है और वज़न बढ़ सकता है.
मस्तिष्क पर प्रभाव: थायरॉइड के अधिक होने से एकाग्रता की कमी हो सकती है और इसके कम होने से याददाश्त पर विपरीत प्रभाव पड़ता है यानी आप भूलने की समस्या से परेशान हो सकते हैं और मस्तिष्क में एक रुकावट व असमंजस की स्थिति बनी रहती है. अक्सर थायरॉइड के इलाज के बाद मरीज़ काफ़ी हैरान हो जाते हैं कि पहले की अपेक्षा उनका मस्तिष्क कितना तेज़ हो गया है, क्योंकि उन्हें यह अंदाज़ा ही नहीं होता कि थायरॉइड की वजह से भी ऐसा हो सकता है.
सेक्स लाइफ: थायरॉइड हार्मोंस के कम होने पर सेक्स में दिलचस्पी कम होने लगती है, लेकिन एक्सपर्ट्स का मानना है कि इसका सीधा संबंध थायरॉइड से न होकर इसकी वजह से हो रही थकान, बढ़ता वज़न, ऊर्जा की कमी व शरीर में दर्द आदि से हो सकता है.
स्पंदन महसूस होना: हार्ट पल्पिटेशन यानी धड़कनें आप अपने गले व सीने में महसूस कर सकते हो. दिल या तो ज़ोर-ज़ोर से धड़कता हो या बीट्स मिस हो रही हो, तो यह थायरॉइड के कारण हो सकता है.
त्वचा में बदलाव: थायरॉइड के कम होने पर त्वचा ड्राई व त्वचा में खुजली भी हो सकती है. हार्मोंस की कमी से मेटाबॉलिज़्म धीमा हो सकता है, जिससे त्वचा पर भी प्रभाव पड़ता है. पसीना कम आता है, जिसकी वजह से त्वचा का मॉइश्‍चर कम हो जाता है.
कब्ज़: मेटाबॉलिज़्म प्रभावित होने से कब्ज़ की शिकायत भी हो सकती है. जबकि थायरॉइड के बढ़ जाने से दस्त की शिकायत हो सकती है.
महिलाओं में पीरियड्स की अनियमितता: थायरॉइड की कमी से पीरिड्स के बीच का अंतर बढ़ जाता है, दर्द अधिक होता है और हैवी ब्लीडिंग भी होती है. जबकि थायरॉइड की अधिकता से पीरियड्स जल्दी-जल्दी होने लगते हैं व हैवी ब्लीडिंग होती है.
मसल्स में दर्द: हाथ-पैरों में दर्द और सुन्नता थायरॉइड की कमी के कारण हो सकता है.
हाई ब्लडप्रेशर: जिन्हें थायरॉइड (कम या ज़्यादा) की समस्या है, उन्हें ब्लडप्रेशर की संभावना अपेक्षाकृत अधिक होती है. थायरॉइड की कमी से ब्लडप्रेशर बढ़ने की संभावना और भी अधिक हो जाती है.
बहुत ठंड या गर्मी लगना: बहुत अधिक ठंड लगना, जल्दी सर्दी होना थायरॉइड की कमी की निशानी भी हो सकते हैं. जबकि थायरॉइड की अधिकता से गर्मी व पसीने की समस्या हो सकती है.
आवाज़ में बदलाव: थायरॉइड में सूजन की वजह से आवाज़ में बदलाव आ सकता है.
नींद में बदलाव: हमेशा नींद आना थायरॉइड की कमी का संकेत हो सकता है, जबकि नींद न आना इसकी अधिकता की निशानी हो सकती है.
कंसीव करने में समस्या: प्रग्नेंसी में समस्या हो रही है, तो थायरॉइड भी इसकी वजह हो सकती है, क्योंकि थायरॉइड का असंतुलन ओव्यूलेशन को प्रभावित करता है.
बालों का झड़ना: न स़िर्फ सिर के बाल बल्कि आईब्रो व अन्य हिस्सों के बाल भी थायरॉइड की कमी से कम हो सकते हैं. जबकि थायरॉइड की अधिकता स़िर्फ सिर के बालों के प्रभावित करती है.
हृदय रोग व हाई कोलेस्ट्रॉल: थायरॉइड की कमी से बैड कोलेस्ट्रॉल बढ़ सकता है और हृदय रोग भी हो सकता है.
इलाज
हाइपरथायरॉइडिज़्म: थायरॉइड की अधिकता होने पर रेडियोआयोडीन ट्रीटमेंट (रेडियोथेरेपी का एक प्रकार), एंटी थायरॉइड मेडिकेशन और सर्जरी की जा सकती है. रेडियोआयोडीन ट्रीटमेंट में डॉक्टर आपको टैबलेट या लिक्विड दे सकते हैं, जिसमें रेडियोएक्टिव आयोडीन की भरपूर मात्रा होगी. यह टैबलेट (या लिक्विड) थायरॉइड ग्लांड्स के सेल्स को नष्ट करके और हार्मोंस के निर्माण की क्रिया को कम करके थायरॉड को नियंत्रित करती है.
कभी-कभी एक से अधिक ट्रीटमेंट की भी ज़रूरत पड़ती है. रेडियोआयोडीन ट्रीटमेंट गर्भवती व फीड करा रही महिलाओं को नहीं करवाना चाहिए. जो लोग यह ट्रीटमेंट लेते हैं, उनमें भी महिलाओं को इलाज के बाद अगले छह महीनों के लिए कंसीव नहीं करना चाहिए और पुरुषों को भी चार महीने तक इससे बचना चाहिए. कई मरीज़ इस ट्रीटमेंट के बाद हाइपोथायरॉइडिज़्म (थायरॉइड की कमी) का शिकार हो जाते हैं, इसलिए बेहतर होगा कि सतक रहें और अपना थायरॉइड टेस्ट समय-समय पर करवाते रहें.
इस ट्रीटमेंट के वैसे कोई गंभीर साइड इफेक्ट्स नहीं होते, लेकिन एक साइड इफेक्ट बेहद गंभीर होता है, जिसमें व्हाइट ब्लड सेल्स का बोनमैरो निर्माण कम हो जाता है. इसका एक लक्षण होता है गले में सूजन. यदि आपको भी इलाज के बाद यह लक्षण नज़र आए, तो बेहतर है डॉक्टरी सलाह लेकर अपना व्हाइट ब्लड सेल्स चेक करवाएं.
सर्जरी की सलाह 45 वर्ष से कम आयुवाले ऐसे लोगों को दी जाती है, जहां उनका हाइपरथायरॉइडिज़्म टॉक्सिक ट्यूमर (एडेनोमाज़- इन्हें हॉट नॉड्यूल्स भी कहते हैं) के कारण होता है. ये नॉड्यूल्स रेडियोआयोडीन ट्रीटमेंट से ठीक नहीं होते, इसलिए सर्जरी का सहारा लिया जाता है. सर्जरी के कुछ ही हफ़्तों बाद हार्मोंस का स्तर सामान्य हो जाता है, लेकिन यहां भी हार्मोंस का स्तर सामान्य से भी कम हो जाने की संभावना रहती है, तो नियमित टेस्ट ज़रूरी है.
कभी-कभी अस्थायी तौर पर भी थायरॉइड हो जाता है, जो बिना दवा के या पेनकिल्लर्स से ठीक हो जाता है.
हाइपोथायरॉइडिज़्म: थायरॉइड की कमी में थायरॉइड हार्मोन रिप्लेसमेंट द्वारा इलाज किया जाता है. हालांकि एनिमल एक्स्ट्रक्ट से हार्मोंस उपलब्द्ध होते हैं, लेकिन डॉक्टर्स सामान्यत: सिंथेटिक थायरॉइड हार्मोंस को अधिक महत्ता देते हैं. इसके साइडइफेक्ट् न के बराबर हैं, लेकिन कुछ लोग घबराहट और सीने में दर्द का अनुभव कर सकते हैं.

घरेलू उपाय
हाइपरथायरॉइडिज़्म के लिए
– ब्रोकोली में गॉइट्रोजेन्स और आइसोथायोसाइनेट्स नामक तत्व होते हैं, जो थायरॉइड के निर्माण पर अंकुश लगाते हैं. अपने थायरॉइड हर्मोंस को नियंत्रित रखने के लिए जितना अधिक हो सके सलाद के रूप में ब्रोकोली का कच्चा ही सेवन करें.
– सोया प्रोडक्ट्स भी फ़ायदेमंद है, क्योंकि यह प्रोटीन से भरपूर होते हैं. प्रोटीन थायरॉइड हार्मोंस को दूसरे बॉडी टिश्यूज़ में ट्रांसपोर्ट कर देते हैं.
– अगर आपको सोया प्रोडक्ट्स पसंद नहीं, तो नट्स, अंडे और फलियों को डायट में शामिल करें.
– ओमेगा-3 फैटी एसिड्स ज़रूरी है. यदि आपके शरीर को यह नहीं मिल रहा, तो हार्मोंस में असंतुलन होगा. आप फ्लैक्स सीड्स, अखरोट और मछलियों के सेवन से इसे प्राप्त कर सकते हैं.
– पत्तागोभी में भी भरपूर मात्रा में गॉइट्रोजेन्स होते हैं. पत्तागोभी का सलाद यानी पत्तागोभी को कच्चा खाने से अधिक लाभ मिलेगा.
– बेरीज़ को अपने डायट में शामिल करें, क्योंकि सभी प्रकार की बेरीज़- ब्लू बेरीज़, स्ट्रॉ बेरीज़, ब्लैक बेरीज़ और चेरी आदि थायरॉइड ग्लांड्स को हेल्दी रखती हैं.
– आंवला थायरॉइड को कंट्रोल करने में बेहद कारगर है. आंवला पाउडर में शहद मिलाकर रोज़ सुबह नाश्ते से पहले लें.
– प्रीज़र्वेटिव्स युक्त, अधिक शक्कर व मैदा से बने पदार्थ न खाएं, जैसे- पास्ता, व्हाइट ब्रेड

हाइपोथायरॉइडिज़्म के लिए
– कोकोनट ऑयल थायरॉइड ग्लांड्स को क्रियाशील करके हर्मोंस के स्तर को बनाए रखने में मदद करता है. खाना पकाने के लिए एक्स्ट्रा वर्जिन ऑर्गैनिक कोकोनट ऑयल का इस्तेमाल करें.
– रोज़ नाश्ता करते समय दूध में 2 टेबलस्पून कोकोनट ऑयल मिक्स करके पीएं.
– एप्पल साइडर विनेगर भी थायरॉइड के असंतुलन को पूरा करने में सहायक है. यह डीटॉक्सीफाइ करता है, एसिड-एल्कलाइन बैलेंस को बनाए रखता है, हार्मोंस को संतुलित करके मैटाबॉलिज़्म को बेहतर बनाता है, वज़न नियंत्रण में रखता है.
– 2 टेबलस्पून ऑर्गैनिक एप्पल साइडर विनेगर को एक ग्लास गर्म पानी में मिलाएं. थोड़ा शहद भी मिला लें. नियमित रूप से इसका सेवन करें.
– फिश ऑयल भी थायरॉइड हार्मोंस के निर्माण में सहायक होता है.
– विटामिन डी की कमी से ऑटोइम्यून डिसीज़ हो सकती हैं, जिनमें थायरॉइड भी एक है. रोज़ सुबह 15 मिनट तक धूप का सेवन करें.
– अदरक ज़िंक, मैग्नीशियम और पोटैशियम से भरपूर होता है. यह थायरॉइड ग्लांड्स की कार्यशैली को बेहतर बनाता है. अपने खाने में या सूप में अदरक के टुकड़े डालकर इसे अपने डायट में शामिल करें या फिर अदरक को पानी में उबालकर गर्म जिंजर टी का सेवन करें. इसमें आप शहद भी मिला सकते हैं.
– विटामिन बी थायरॉइड ग्लांड्स को हेल्दी रखता है. शोधों में अक्सर पाया गया है कि जो लोग हाइपोथायरॉइडिज़्म से ग्रसित हैं, उनमें विटामिन बी12 की कमी भी पाई जाती है.
– योग व प्राणायाम से थायरॉइड हार्मोंस का स्तर सामान्य बना रहता है. हाइपर व हाइपो दोनों ही थायरॉइड में योग का फ़ायदा है, लेकिन दोनों के लिए पोज़ अलग-अलग हो सकते हैं, इसलिए किसी योग गुरू से पूछकर उनकी देखरेख में ही यह करें.
– हाइपरथायरॉइडिज़्म के लिए सेतुबंधासन, शिशु आसन, शवासन, मार्जरीआसन और सूर्य नमस्कार फ़ायदेमंद हैं
– हाइपोथायरॉइडिज़्म के लिए प्राणायाम- शीतली प्राणायाम, उज्जयी और नाड़ी शोधन, हर तरह की ब्रीदिंग एक्सरसाइज़, योग निद्रा व ध्यान लाभदायक है.
– लेकिन किसी भी तरह के थायरॉइड में योग व एक्सरसाइज़ बिना डॉक्टरी सलाह व बिना एक्सपर्ट की देखरेख के शुरू न करें.

– गीता शर्मा

ब्लड डोनेट करें, हेल्दी रहें

आमतौर पर लोगों की सोच होती है कि रक्तदान यानी ब्लड डोनेट करने से उन्हें कमज़ोरी आ जाएगी या उनकी सेहत पर इसका बुरा असर होगा, इसलिए वे ब्लड डोनेट करने से कतराते हैं, लेकिन ऐसा बिल्कुल भी नहीं है. ब्लड डोनेट करने से ब्लड डोनर को किसी का जीवन बचाने या किसी की मदद करने की आत्मसंतुष्टि तो  मिलती ही है, साथ ही ये उनके हेल्थ के लिए भी फ़ायदेमंद है.

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हमारे देश में समय पर खून न मिलने के कारण हर साल 15 लाख मरीज़ अपनी जान गंवा बैठते हैं. इनमें उन बच्चों की तादाद अधिक होती है, जिन्हें थेलेसिमिया के कारण बार-बार ब्लड की ज़रूरत होती है. दुर्घटना के शिकार, मलेरिया के मरीज़ों, कुपोषणग्रस्त बच्चों के अलावा प्रेग्नेंट वुमन को भी कई कारणों से ब्लड की ज़रूरत होती है. ब्लड डोनेशन से जुड़े अहम् पहलुओं पर डॉ. मनोज जैन ने हमें कई उपयोगी जानकारियां दीं.

यदि सभी लोग साल में एक बार भी ब्लड डोनेट करें, तो कई ज़िंदगियां बचाई जा सकती हैं. एक सामान्य मनुष्य में 5 से 6 लीटर ब्लड होता है और उसके शरीर के वज़न में 7 % वज़न ब्लड का होता है. मेडिकली एक हेल्दी व्यक्ति हर तीन महीने में एक बार ब्लड डोनेट कर सकता है. यदि देश का हर हेल्दी व्यक्ति ब्लड डोनेट करता रहे, तो ब्लड की कमी से कभी किसी की मृत्यु नहीं हो सकती. हमारे यहां सबसे अधिक पाया जानेवाला ब्लड ग्रुप ‘ओ’ और सबसे कम ‘एबी निगेटिव’ है.

दान भी, सेहत भी…
अधिकतर लोगों का मानना है कि ब्लड डोनेट करने से कमज़ोरी आती है. ऐसा बिल्कुल भी नहीं है. ब्लड डोनेट करते समय जितना ब्लड निकलता है, उसकी भरपाई हमारे शरीर में 2-3 दिन के अंदर हो जाती है. इसलिए ब्लड डोनेट करना न केवल एक अच्छा काम है, बल्कि ये आपको स्वस्थ भी रखता है. कैसे? आइए, जानते हैं.

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ब्लड डोनेट करने से शरीर को नुक़सान की बजाय कई फ़ायदे होते हैं, जैसे-

  • ब्लड प्यूरिफाई हो जाता है. ब्लड डोनेशन के दौरान मात्र 300 मि.ली. ब्लड लिया जाता है और शरीर इस ब्लड की पूर्ति 24 से 48 घंटे में कर लेता है.
  • इससे शरीर की रक्त कोशिकाएं तेज़ी से बनने लगती हैं.
  • रेड ब्लड सेल्स भी रिडेवलप होते हैं, जिससे शरीर में ऑक्सीजन की मात्रा अधिक रहती है. यानी रक्तदान के तुरंत बाद ही नई लाल कोशिकाएं बनने से शरीर में स्फूर्ति पैदा होती है.
  • ब्लड डोनेट करते रहने से हार्ट डिसीज़ में 5% की कमी आ जाती है.
  • ब्लड डोनेट करते रहने से बोनमैरो (अस्थिमज्जा) लगातार क्रियाशील बना रहता है.
  • रक्त द्वारा संक्रमित होनेवाली बीमारियों की भी अपने आप जांच हो जाती है.

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कुछ अन्य फ़ायदे भी

  • ज़रूरत होने पर ब्लड डोनर को डोनर कार्ड के बदले ब्लड बैंक से ब्लड मिल जाता है.
  • शायद बहुत कम लोगों को मालूम है कि ब्लड के 1 यूनिट से 3 ज़िंदगियां बचाई जा सकती हैं. यानी डोनेट किया हुआ आधा लीटर
    ब्लड कम से कम 3 मरीज़ों का जीवन बचा सकता है.
  • ओ निगेटिव ब्लड ग्रुप वाले यूनिवर्सल डोनर हैैं यानी वे अपना ब्लड किसी को भी दे सकते हैं.

ब्लड डोनेट कर सकते हैं?

  • कोई भी हेल्दी व्यक्ति, जिसकी उम्र 18 से 68 साल के बीच हो.
  • जिसका वज़न 45 किलो या उससे अधिक हो.
  • जिसके ख़ून में हीमोग्लोबिन 12% से अधिक हो.
  • ब्लड डोनेट करते समय कोई एंटीबॉयोटिक न ले रहा हो.
  • पिछले तीन वर्षों में जॉन्डिस या कोई बड़ा ऑपरेशन न हुआ हो.
  • एक ब्लड डोनर सालभर में कम से कम चार बार और तीन-तीन महीने के गैप पर ब्लड डोनेट कर सकता है.

कौन नहीं कर सकता ब्लड डोनेट?

  • जो महिला पीरियड में हो.
  • जो महिला अपने बच्चे को ब्रेस्ट फीडिंग करा रही हो.
  • जो किसी गंभीर बीमारी से ग्रस्त हो.

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देशभर में ब्लड बैंक की स्थिति
देश में नामी और सही तौर पर मात्र पांच सौ ब्लड बैंक हैं, जहां हर साल दस हज़ार यूनिट्स से अधिक ब्लड जमा होता है. साथ ही क़रीब छह सौ ऐसे ब्लड बैंक भी हैं, जो हर साल 600 यूनिट्स ही इकट्ठा कर पाते हैं. इनके अलावा 2433 ब्लड बैंक्स ऐसे हैं, जो तीन से पांच हज़ार यूनिट्स हर साल इकट्ठा कर लेते हैं.
देश में क़रीब 25 लाख लोग अपनी इच्छा से ब्लड डोनेट करते हैं. सबसे अधिक ब्लड बैंक महाराष्ट्र में 270, तमिलनाडु में 240 और आंध्र प्रदेश में 222 हैं.
जबकि उत्तर-पूर्व के सातों राज्यों में कुल मिलाकर 29 ऑथोराइज़्ड ब्लड बैंक्स हैं.

क्या आप जानते हैं?

  • 1998 में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर देश में प्रोफेशनल ब्लड डोनर पर पूरी तरह बैन लगाया गया था.
  • सन् 2007 में वैज्ञानिकों ने एंज़ाइम्स के प्रयोग से ब्लड गु्रप ए, बी, एबी को ओ में बदलने मेें सफलता प्राप्त कर ली थी, लेकिन अब तक इंसानों पर प्रयोग होना बाकी है.
  • विकासशील व ग़रीब देशों में ब्लड डोनेट के बाद भी डोनेट किए हुए ब्लड का 45% ही स्टोर हो पाता है.
  • यदि किसी देश की जनसंख्या के मात्र 1 से 3% लोग भी ब्लड डोनेट करते हैं, तो उस देश की ज़रूरत पूरी हो सकती है, लेकिन दुनियाभर में तक़रीबन 73 देशों में जनसंख्या के 1% से भी कम लोग ब्लड डोनेट करते हैं.
  • वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइज़ेशन के अनुसार, ब्लड बैंक से ब्लड ख़रीदने की बजाय इच्छुक ब्लड डोनर से ़ज़रूरत के समय ब्लड लेना अधिक लाभदायक रहता है.
  • आंकड़ों के अनुसार, स्वैच्छिक ब्लड डोनर द्वारा दिया गया ब्लड न केवल मरीज़ों पर अच्छा असर करता है, बल्कि इसमें एचआईवी और हेपेटाइटिस वायरस के होने की आशंका भी कम रहती है.

ब्लड डोनेट करके जहां हम एक नेक कार्य करते हैं, वहीं अपने शरीर के ब्लड को भी क्लीन करते हैं, जो हमारे सेहत के लिए ज़रूरी भी है. रक्तदान को बढ़ावा देने के लिए हम सभी कुछ ऐसा भी कर सकते हैं, जैसे जो लोग ब्लड डोनेट करने के इच्छुक हैं, वे अपने दोस्तों का एक ग्रुप बना सकते हैं. और जब कभी जान-पहचान वाले या किसी को भी ब्लड की ज़रूरत पड़े, तब वे एक-दूसरे को मैसेज देकर ब्लड की ज़रूरत को पूरा कर सकते हैं. और यदि इस गु्रप में रेयर ब्लड ग्रुपवाले लोग भी हों, तो और भी अधिक ज़रूरतमंदों की मदद की जा सकेगी.

– ऊषा गुप्ता

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