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मॉरल पुलिसिंग के नाम पर शर्मसार करते तथ्य (Moral Policing: Good Or Bad… Right Or Wrong?)

Moral Policing

हम अपने देश, अपनी संस्कृति व संस्कारों का न स़िर्फ सम्मान करते हैं, बल्कि हमें उस पर गर्व है. हम ही क्यों, सभी देशवासी अपने देश से प्यार करते हैं. लेकिन जब उनकी देशभक्ति को परखने के अजीबोग़रीब पैमाने कुछ अंजान लोग तय करते हैं, तब कोफ़्त होती है. जब ये पैमाने किसी की निजी ज़िंदगी में हस्तक्षेप करने लगें, जब संस्कृति को बचाने के नाम पर कोई वहशीपन पर उतर आए, तब सवाल उठने लाज़मी हैं कि किसने हक़ दिया है किसी को भी इस तरह से संस्कृति की रक्षा को कवच बनाकर अपनी गुंडागर्दी की दुकानें चलाने का?

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मॉरल पुलिसिंग के नाम पर शर्मसार करते तथ्य (Moral Policing: Good Or Bad… Right Or Wrong?)
  • मॉरल पुलिसिंग आज भी सवालों के घेरे में है और भारत में इसकी आड़ में ख़ूब गुंडागर्दी भी होती है और राजनीति भी.
    प 90 के दशक में जम्मू-कश्मीर में एक ग्रुप था, जो महिलाओं को जबरन चेहरा ढंकने का आदेश देता था, साथ यह धमकी भी कि यदि ऐसा नहीं किया गया, तो उन पर एसिड अटैक किया जाएगा.
  • अपनी सक्रियता के इस दौर में इस ग्रुप ने कई सिनेमाघरों, होटल्स, बार, ब्यूटीपार्लर्स आदि पर अटैक किया था.
  •  साल 1996 में मिस वर्ल्ड का भारत के बैंगलुरू (उस समय बैंगलोर) में आयोजन हुआ था, जिसका कई गुटों द्वारा विरोध
    हुआ था.
  • वर्ष 2005 में साउथ की एक बड़ी एक्ट्रेस ने प्री मैरिटल सेक्स को लेकर बयान दिया था, जिसमें सेफ सेक्स पर ज़ोर दिया गया था. उसके बाद इस बयान को देश की संस्कृति पर आघात बताते हुए एक्ट्रेस के ख़िलाफ़ कई केस दर्ज कर दिए गए.
  •  वर्ष 2012 में मैंगलोर के घर में चल रही पार्टी की घटना भी सबके ज़ेहन में आज भी ताज़ा है, जहां शांति से घर पर पार्टी कर रहे युवाओं पर अटैक किया गया था. इसमें 5 लड़कियां भी थीं, जिनके चेहरे पर कालिख पोत दी गई थी.
  • इसी तरह से अक्सर आज भी कहीं किसी पब पर, तो कहीं किसी गार्डन में समय बिताने आए कपल्स या युवाओं पर मॉरल पुलिसिंग के नाम पर हमले होते रहते हैं.
  • असम के एक लोकल न्यूज़ चैनल ने एक वीडियो बनाकर दिखाया था कि किस तरह से गुवहाटी में आजकल लड़कियां शॉर्ट्स पहनकर घूमती हैं और किस तरह से यह हमारे नैतिक पतन का संकेत है.
  •  ऐसे में सवाल उठना लाज़मी है कि संस्कार व संस्कृति का हवाला देकर युवाओं के साथ बदसलूकी व गुंडागर्दी का हक़ किसने किसको दिया है?
  •  न तो समाज ने, न ही क़ानून ने और न ही प्रशासन ने इस तरह की गुंडागर्दी को जगह दी है, लेकिन फिर भी कुछ गुट व समूह ख़ुद ही यह तय कर लेते हैं कि उनकी नज़र में क्या सही है, क्या ग़लत… और वो यह चाहते हैं कि लोग उनकी सोच व इच्छानुसार अपनी
    ज़िंदगी जीएं.
  •  ख़ुद को समाज के ठेकेदार और क़ानून से ऊपर समझनेवाले ये चंद लोग सरेआम लड़कियों से मारपीट करके अपने अहम् को तुष्ट करते हैं.

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क्यों होती है मॉरल पुलिसिंग?

दरअसल, हमारा समाज बहुत जल्दी बदलावों को स्वीकार नहीं कर पाता. इसके अलावा हमारी धारणा यही है कि हमारी परंपराओं से हटकर अन्य परंपराएं संस्कारों के विरुद्ध हैं, पश्‍चिमी संस्कृति से जुड़ी हर चीज़, हर बात ग़लत ही है, इससे हमारे समाज व संस्कृति को नुक़सान पहुंच सकता है आदि इस तरह की सोच कुछ लोगों को इतना अधिक उकसाती है कि वे बिना सोचे-समझे गुंडागर्दी पर उतारू हो जाते हैं. ख़ुद अपनी नज़र में वे सही होते हैं, उन्हें लगता है कि वे तो अपने संस्कारों व देश की संस्कृति की रक्षा कर रहे हैं, लेकिन दरअसल वो अराजकता फैलाकर डर व दहशत का माहौल बना रहे होते हैं और इस तरह का व्यवहार भी तो हमारी सभ्यता के विरुद्ध
ही है.
दूसरी ओर इनमें से अधिकतर गुटों को राजनीतिक संरक्षण भी प्राप्त होता है और वो अपना दबदबा कायम रखने के लिए इस तरह की वारदातों को अंजाम देते रहते हैं, ताकि उस इलाके के लोगों में उनका डर बना रहे.

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किन बातों को लेकर होती है यह मॉरल पुलिसिंग?
  • अधिकतर तो ये घटनाएं वैलेंटाइन्स डे, पार्टीज़, पब्स, गार्डन्स में लड़के-लड़कियों के मिलने से संबंधित होती हैं.
  • लेकिन अति तब हो जाती है, जब लड़कियों के जींस पहनने पर कोई कॉलेज पाबंदी लगाता है, तो कभी कोई नेता लड़कियों के छोटे कपड़ों को ही उनके बलात्कार व छेड़छाड़ का कारण बताता है.
  • यही वजह है कि संस्कृति को बचाने के नाम पर अपनी गुंडागर्दी की दुकान चलानेवालों को बढ़ावा मिलता है और वो ख़ुद लड़कियों से छेड़छाड़ करते पाए जाते हैं.
  • कभी धर्म के नाम पर लोगों को उकसाया जाता है. ऐसी ही एक घटना में मैंगलोर के एक लड़के की पिटाई कर दी गई थी, जहां उसका कुसूर इतना ही था कि उसने अन्य धर्म की अपनी स्कूल फ्रेंड्स के साथ फोटो क्लिक करवाई थी.
  • कभी स्पोर्ट्स से जुड़ी लड़कियों के ख़िलाफ़ स्कर्ट पहनकर खेलने पर फतवा जारी कर दिया जाता है, तो कभी किसी बच्ची के सिंगिंग कॉन्टेस्ट में पार्टिसिपेशन को रोकने का प्रयास किया जाता है.

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क्या है सही तरीक़ा?
  •  यदि वाकई में कुछ ग़लत नज़र आ रहा है, तो ख़ुद क़ानून हाथ में लेकर लोगों को सज़ा देने से बेहतर है कि उनकी
    शिकायत करें.
  •  क़ानून के साथ मिलकर बुराई को मिटाने का प्रयास करें. धैर्यपूर्वक स्थिति को सुनें व समझें और सामनेवालों के पक्ष का भी सम्मान करें.
  • यही सही तरीक़ा है और यही हमारी संस्कृति भी.
  • दूसरे को ग़लत साबित करने से पहले ख़ुद को भी जांचें-परखें कि अगर आपका परिवार वहां होता, तो भी क्या आप इसी तरह से अपनी सो कॉल्ड न्याय प्रक्रिया उन पर लागू करते?
  • अगर सामनेवाला ग़लत भी है, तब भी किसी भी तरह की गुंडागर्दी आपको सही साबित नहीं करेगी. आपकी सोच अलग हो सकती है, इसका यह अर्थ नहीं कि सारी दुनिया को आपकी ही सोच के अनुसार चलना चाहिए.

– गीता शर्मा

बैड ब्यूटी हैबिट्स (Makeup Trend: Bad Beauty Habits)

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ख़ूूबसूरत दिखना और खूबसूरती को मेंटेन करना, दोनों में बड़ा फ़र्क़ होता है. मेकअप करके आप अपनी ख़ूबसूरती को निखार तो सकती हैं, लेकिन ग़लत मेकअप हैबिट्स से आप अपने चेहरे के नूर को ख़त्म भी कर सकती हैं. आइए, हम आपको बताते हैं कुछ ऐसे ही बैड ब्यूटी हैबिट्स, जिन्हें इग्नोर करके आप हमेशा ख़ूबसूरत नज़र आ सकती हैं.

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मेकअप रिमूव न करना

रोज़ाना रात को सोने से पहले मेकअप रिमूव करना बहुत ज़रूरी है, अगर आप आलस के कारण मेकअप रिमूव नहीं करतीं, तो रातभर आपकी त्वचा सांस नहीं ले पाती. मेकअप रोमछिद्रों के ज़रिए त्वचा के अंदर चला जाता है, जिससे आंखों के नीचे कालापन और मुंहासों जैसी समस्याएं हो सकती हैं. इसलिए रोज़ाना रात को सोने से पहले चेहरे को क्लींज़ करके मॉइश्‍चराइज़ ज़रूर करें.

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चेहरे को बार-बार छूना

आदत से मजबूर कुछ लड़कियां बार-बार अपने चेहरे को छूती रहती हैं. उन्हें नहीं पता कि हमारे हाथ न जाने कितने बैक्टीरिया वाली जगहों व चीज़ों को छूते हैं. हाथों में चिपके बैक्टीरिया, धूल-मिट्टी, तेल और पसीने को आप अनजाने में ही अपने चेहरे तक पहुंचा देती हैं और फिर शुरू होती हैं त्वचा संबंधी समस्याएं. इस आदत को सुधारकर आप अपनी कई स्किन प्रॉब्लम्स को ख़ुद ख़त्म कर सकती हैं.

मुंहासों को फोड़ना

मुंहासों को फोड़ने से प्रॉब्लम और बढ़ सकती है. दरअसल, ऐसा करने से उसमें मौजूद बैक्टीरिया त्वचा के और भीतर चले जाते हैं, जिससे चेहरे पर दाग़-धब्बे पड़ जाते हैं. दाग़-धब्बों रहित त्वचा चाहती हैं, तो प्यूरिफाइंग फेस मास्क लगाएं. रात को सोते समय मुंहासों पर टूथपेस्ट लगाकर भी आप इनसे जल्द छुटकारा पा सकती हैं.

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पुराने मेकअप ब्रश इस्तेमाल करना

अक्सर बहुत-सी लड़कियों का ध्यान इस ओर जाता ही नहीं कि पिछले कुछ समय से वो जो मेकअप ब्रश इस्तेमाल कर रही हैं, उन्हें न तो कभी साफ़ किया है, न ही बदला है. दरअसल, उन्हें मालूम ही नहीं कि लगातार इस्तेमाल से ब्रश में मेकअप प्रोडक्ट्स की परत जम जाती है, जिससे वहां बैक्टीरिया व फंफूदी पनपने लगते हैं. ऐसे ब्रशेज़ के इस्तेमाल से आप इंफेक्शन या डर्मटाइटिस की शिकार हो सकती हैं. इसके अलावा गंदे ब्रशेज़ से मेकअप करने पर फ्लॉलेस फिनिश भी नहीं मिलती और न ही त्वचा हेल्दी रहती है. इसलिए सप्ताह में एक बार अपने मेकअप ब्रश को ज़रूर साफ़ करें.

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सनस्क्रीन लोशन न लगाना

आज भी ज़्यादातर लड़कियां घर से बाहर निकलते समय सनस्क्रीन लोशन नहीं लगातीं, जो ग़लत है. रोज़ाना सनस्क्रीन लोशन को नज़रअंदाज़ करके आप सनटैन और झुर्रियों को न्योता देती हैं, जो आपकी त्वचा के लिए बिल्कुल भी ठीक नहीं है. हर रोज़ घर से बाहर निकलने से पहले अच्छा एसपीएफयुक्त सनस्क्रीन लोशन ज़रूर लगाएं. साथ ही आप एसपीएफ युक्त मॉइश्‍चराइज़र भी इस्तेमाल कर सकती हैं.

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बार-बार साबुन से चेहरा धोना

नर्म-मुलायम व सुंदर त्वचा की चाहत में बहुत-सी लड़कियां बार-बार साबुन से चेहरा धोने की ग़लती करती हैं. दरअसल, बार-बार साबुन से चेहरा धोने से त्वचा को प्राकृतिक रूप से सुरक्षा प्रदान करनेवाला तत्व सीबम निकलने लगता है, जिससे आप सनबर्न, ड्राई स्किन या असमय एजिंग की शुरुआत जैसी समस्याओं से परेशान हो सकती हैं. अपनी स्किन टाइप के अनुसार क्लींज़र चुनें और दिन में दो बार से ज़्यादा चेेहरा न धोएं.

बहुत ज़्यादा एक्सफोलिएट करना

एक्सफोलिएशन आपकी त्वचा से डेड सेल्स निकालकर उसे सॉफ्ट-स्मूद व हेल्दी बनाते हैैं, पर बहुत ज़्यादा स्क्रबिंग भी ठीक नहीं. यह आपको ओवर-सेंसिटिव और रेडिश स्किन के साथ-साथ त्वचा की गहराई में छोटे-छोटे व्हाइट हेड्स भी दे सकती है. इसलिए हफ़्ते में 1 या 2 बार ही एक्सफोलिएट करें और हेल्दी व ग्लोइंग त्वचा पाएं.

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अक्सर बालों को आयरन या स्टाइल करना

आजकल मार्केट में कई हेयर स्टाइलिंग प्रोडक्ट्स मिलते हैं, जिनकी मदद से आप अपने बालों को बेहद आकर्षक व स्टाइलिश लुक दे सकती हैं. पर यह कभी-कभार किसी फंक्शन या पार्टी के लिए बढ़िया है, लेकिन अगर आप हर दूसरे दिन अपने बालों को हॉट ब्लो करेंगी या आयरन करेंगी, तो वो डैमेज होकर रूखे व बेजान होने लगेंगे. इसलिए ज़रूरत व ओकेज़न के अनुसार ही इनका इस्तेमाल करें.

नाकाम शादी क्यों निभाती हैं महिलाएं? (Why Women Stay In Bad Marriages?)

Why Women Stay In Bad Marriages

हमारे देश में शादी को एक सामाजिक (Why Women Stay In Bad Marriages) पर्व के रूप में देखा जाता है. ऐसे में भारत में शादी के महत्व को स्वत: ही समझा जा सकता है. अगर आप भारत में हैं और 30 वर्ष की उम्र तक शादी के बंधन में नहीं बंधते, तो लोग आपसे सवाल करना और आपको शादी करने की सलाह देना अपना हक़ समझते हैं.

Why Women Stay In Bad Marriages

शादी की कामयाबी और असफलता कई बातों पर निर्भर करती है. लेकिन सच्चाई यही है कि आज भी अधिकांश महिलाएं अपनी नाकाम, असफल शादियों को ताउम्र झेलती रहती हैं. पर सबसे बड़ा सवाल यही है कि आख़िर क्यों वे इस तरह की शादियों में बनी रहती हैं? क्यों कोई ठोस निर्णय लेकर अलग होने की हिम्मत नहीं कर पातीं? क्यों सारी उम्र ज़िल्लत सहना अपना नसीब मान लेती हैं?
ऐसे ही तमाम सवालों के जवाब के लिए हमने बात की दिल्ली में प्रैक्टिस कर रहे सायकियाट्रिस्ट डॉ. विकास सैनी से-

पालन-पोषण: भले ही हम कितनी ही विकास की बातें कर लें, लेकिन आज भी अधिकतर घरों में लड़कियों का पालन-पोषण यही सोचकर किया जाता है कि उसे पराये घर जाना है यानी उसे हर बात को सहन करना, शांत रहना, ग़ुस्सा न करना आदि गुणों से लैस करवाने की प्रैक्टिस बचपन से ही करवाई जाती है. ऐसे में वो आत्मनिर्भर नहीं हो पातीं. शादी के बाद उन्हें लगता है कि जिस तरह अब तक वो अपने पैरेंट्स पर निर्भर थीं, अब पति पर ही उनकी सारी ज़िम्मेदारी है.

माइंडसेट: हमारे समाज की सोच यानी माइंडसेट ही ऐसा है कि शादी यदि हो गई, तो अब उससे निकलना संभव नहीं है, फिर भले ही उस रिश्ते में आप घुट रहे हों, लेकिन लड़कियों को यही सिखाया जाता है कि शादी का मतलब होता है ज़िंदगीभर का साथ. तलाक़ का ऑप्शन या अलग होने के रास्तों को एक तरह से परिवार व लड़की की इज़्ज़त से जोड़ दिया जाता है. ऐसे में ख़ुद महिलाएं भी अलग होने का रास्ता चुन नहीं पातीं.

सोशल स्टिग्मा: घर की बात घर में ही रहनी चाहिए… अगर तुम अलग हुई, तो तुम्हारे भाई-बहनों से कौन शादी करेगा… उनके भविष्य के लिए तुम्हें सहना ही पड़ेगा… समाज में बदनामी होगी… हम लोगों को क्या मुंह दिखाएंगे… आदि… इत्यादि बातें जन्मघुट्टी की तरह लड़कियों को पिला दी जाती हैं. ऐसे में पति भले ही कितना ही बुरा बर्ताव करे, शादी का बंधन भले ही कितना ही दर्द दे रहा हो, लड़कियां सबसे पहले अपने परिवार और फिर समाज के बारे में ही सोचती हैं.

आर्थिक मजबूरी: आज की तारीख़ में महिलाएं आत्मनिर्भर हो तो रही हैं, लेकिन अब भी बहुत-सी महिलाएं अपनी आर्थिक ज़रूरतों के लिए पहले पैरेंट्स पर और बाद में पति पर निर्भर होती हैं. यह भी एक बड़ी वजह है कि वो अक्सर चाहकर भी नाकाम शादियों से बाहर नहीं निकल सकतीं. कहां जाएंगी? क्या करेंगी? क्या माता-पिता पर फिर से बोझ बनेंगी? इस तरह के सवाल उनके पैरों में बेड़ियां डाल देते हैं. पति का घर छोड़ने के बाद भी उन्हें मायके से यही सीख दी जाती है कि अब वही तेरा घर है. दूसरी ओर उसे मायके में और समाज में भी सम्मान की दृष्टि से नहीं देखा जाता. ऐसे में बेहद कठिन हो जाता है कि वो अपनी शादी को तोड़कर आगे क़दम बढ़ाए.

बच्चे: किसी भी नाकाम शादी में बने रहने की सबसे बड़ी वजह बच्चे ही होते हैं. बच्चों को दोनों की ज़रूरत होती है, ऐसे में पति से अलग होकर उनका क्या भविष्य होगा, यही सोचकर अधिकांश महिलाएं इस तरह की शादियों में बनी रहती हैं.

समाज: आज भी हमारा समाज तलाक़शुदा महिलाओं को सम्मान की नज़र से नहीं देखता. चाहे नाते-रिश्तेदार हों या फिर आस-पड़ोस के लोग, वो यही सोच रखते हैं कि ज़रूर लड़की में ही कमी होगी, इसीलिए शादी टूट गई. एक तलाक़शुदा महिला को बहुत-सी ऐसी बातें सुननी व सहनी पड़ती हैं, जो उसके दर्द को और बढ़ा देती हैं. यह भी वजह है कि शादी को बनाए रखने के लिए कोई भी महिला अंत तक अपना सब कुछ देने को तैयार रहती है.

पैरेंट्स: ढलती उम्र में अपने माता-पिता को यह दिन दिखाएं, इतनी हिम्मत हमारे समाज की बेटियां नहीं कर पातीं. फिर भले ही वो ख़ुद अपनी ज़िंदगी का सबसे क़ीमती समय एक ख़राब और नाकाम शादी को दे दें.
ये तमाम पहलू हैं, जो किसी भी महिला को एक नाकाम शादी से निकलकर बेहतर जीवन की ओर बढ़ने से रोकते हैं, क्योंकि हम यही मानते हैं कि बिना शादी के जीवन बेहतर हो ही नहीं सकता. हमारे समाज में शादी को ‘सेटल’ होना कहा जाता है… और तलाक़ को जीवन का सबसे बड़ा अभिशाप समझा जाता है. जब तक हम इन सामान्य क्रियाओं को सामान्य नज़र से नहीं देखने लगेंगे, तब तक स्थिति में अधिक बदलाव नहीं आएगा.

यह भी पढें: पति की इन 7 आदतों से जानें कितना प्यार करते हैं वो आपको

कुछ बदलाव तो आए हैं
डॉ. विकास सैनी के अनुसार समाज में काफ़ी बदलाव आ रहा है, लेकिन इन बदलावों से होते हुए हमें संतुलन की ओर बढ़ना होगा, जहां तक पहुंचने में व़क्त लगेगा.

-पीढ़ी अधिक बोल्ड है. वो निर्णय लेने से डरती नहीं. यही कारण है कि  जैसे-जैसे लड़कियां आत्मनिर्भर हो रही हैं, वो ज़्यादती बर्दाश्त नहीं कर रही हैं.

-यह ज़रूरी भी है कि पुरुष प्रधान समाज का ईगो इसी तरह से तोड़ा जाए, ताकि पुरुष ख़ुद को लड़कियों की जगह रखकर सोचें.

हालांकि इसका दूसरा पहलू यह भी है कि अब लड़के-लड़कियां थोड़ा-सा भी एडजेस्ट करने को तैयार नहीं होते, जिससे रिश्ते को जितना व़क्त व धैर्य की ज़रूरत होती है, वो नहीं देते. यही आज बढ़ते तलाक़ के मामलों की बड़ी वजह बन रहे हैं.

कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि हम दोनों ही मामलों में एक्स्ट्रीम लेवल पर हैं. एक तरफ़ मिडल एज जेनरेशन है, जहां महिलाएं निर्णय ले ही नहीं पातीं और यदि कोई निर्णय लेती भी हैं, तो तब जब रिश्तों में सब कुछ आउट ऑफ कंट्रोल हो जाता है और इस पर भी तलाक़ जैसा क़दम वही उठा पाती हैं, जिन्हें पैरेंट्स का सपोर्ट होता है.

दूसरी ओर आज की युवापीढ़ी है, जो निर्णय लेने में बहुत जल्दबाज़ी करती है. मामूली से झगड़े, वाद-विवाद को भी रिश्ते तोड़ने की वजह मान लेती है. जबकि ज़रूरत है बीच के रास्ते की, लेकिन वहां तक पहुंचने में अब भी काफ़ी समय लगेगा.

 रियल लाइफ स्टोरीज़

“मैं अपने पति से बेइंतहा प्यार करती हूं और उनके बिना अपने जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकती.” जी हां, यह कहना है मुंबई की एक महिला का, जो न बच्चों के कारण और न ही आर्थिक मजबूरी के चलते अपनी ख़राब शादी में रह रही है. पति के एक्स्ट्रा मेरिटल अफेयर को जानते हुए भी वो अपनी शादी नहीं तोड़ना चाहती. यह शायद बेहद भावनात्मक निर्णय है, लेकिन इस तरह की सोच भी होती है कुछ महिलाओं की.

“मैंने अपने पति को सबक सिखाया.” मुंबई की ही एक 38 वर्षीया महिला ने अपनी नाकाम शादी को किस तरह से कामयाब बना दिया, इस विषय में बताया… “मेरे पति न कमाते थे, न ही किसी तरह से भावनात्मक सहारा था उनका. दिन-रात नशे में धुत्त रहते. एक दिन उनके लिए घर का दरवाज़ा नहीं खोला, तो वो छत से कूदकर जान देने की बात कहने लगे. मैंने पुलिस को बुलाकर उन्हें अरेस्ट करवा दिया. कुछ समय बाद ज़मानत पर रिहा होकर जब वे दोबारा मुझे परेशान करने लगे, तो दोबारा पुलिस को बुलाया और तलाक़ की बात कही मैंने. इसके बाद कुछ समय तक वो ग़ायब रहे, फिर एक दिन अचानक आकर बोले कि घर से अपना सामान लेकर दूर जाना चाहते हैं, लेकिन घर में आने के बाद उन्होंने अपने किए की माफ़ी मांगी और अपनी ग़लतियों को सुधारने का एक मौक़ा भी, जो मैंने दिया. आज वो सचमुच आदर्श पति की तरह अपने कर्तव्य पूरे कर रहे हैं. मैं स़िर्फ यह कहना चाहती हूं कि शादी जैसे रिश्ते में आपको अपनी लड़ाई ख़ुद लड़नी है. आप किस तरह की परेशानियों का सामना कर रही हैं, यह आप ही बेहतर समझ सकती हैं, फिर क्यों किसी मदद के लिए समाज या माता-पिता, भाई-बहन के मुंह की ओर ताकें? हिम्मत जुटाओ, परिस्थितियां ख़ुद ब ख़ुद बदल जाएंगी.”

– गीता शर्मा 

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