before marriage

शादी एक ज़िम्मेदारी है और उससे जुड़ी बहुत-सी ज़िम्मेदारियां शादी के बाद अपने आप जुड़ती चली जाती हैं, इसलिए शादी के रिश्ते की गंभीरता को समझकर उससे जुड़े हर पहलू पर विचार किया जाना बेहद ज़रूरी है, ताकि रिश्ते में आगे चलकर समस्या न हो.

शादी से पहले
कुछ विषय ऐसे होते हैं, जिन पर शादी से पहले ही बात कर ली जाए, तो बेहतर होता है, ताकि आगे चलकर कोई विवाद न हो. 

अपने और होनेवाले पार्टनर का बेसिक नेचर: हर इंसान की सोच और नेचर अलग होता है, लेकिन क्या आप दोनों एक-दूसरे की सोच के साथ निबाह सकते हैं? कहीं आप दोनों में से कोई एक या दोनों ही बहुत ज़्यादा ईगोइस्ट, ग़ुस्सैल या ज़िद्दी तो नहीं, कहीं बहुत पिछड़े या पुराने विचारों का तो नहीं, कहीं बहुत ख़र्चीला या बहुत कंजूस तो नहीं, बहुत शककरनेवाला तो नहीं… कुल मिलाकर आपको एक-दूसरे के मूल स्वभाव को समझने की ज़रूरत है ताकि यह जाना जा सके कि आपसी सामंजस्य हो पाएगा या नहीं.

करियर: आप दोनों व आप दोनों के घरवाले भी करियर को लेकर क्या सोचते हैं, शादी के बाद करियर को आगे बढ़ाने केबारे में क्या राय है, एक-दूसरे से किस तरह का सहयोग चाहते हैं, इन बातों को पहले ही तय कर लें ताकि आगे चलकरकोई विवाद ना हो.

आर्थिक ज़िम्मेदारियां और फाइनेंशियल प्लानिंग: आपकी किस तरह की आर्थिक ज़िम्मेदारियां हैं, कोई लोन है, घर के सदस्यों की आर्थिक ज़िम्मेदारियां हैं इन पर खुलकर बात करें, वर्ना आगे चलकर परेशानी हो सकती है. इसके अलावा आपके जॉइंट अकाउंट्स, इंडिपेंडेंट अकाउंट्स, घर के ख़र्च व ज़िम्मेदारियां किस तरह से पूरी करनी हैं, किसके हिस्से कौन-सी ड्यूटी आएगी, किसको कितना ख़र्च करना होगा आदि बातों पर चर्चा करना बेहतर होगा.

कंट्रासेप्शन और फैमिली प्लानिंग: इन बातों पर चर्चा न करने का नतीजा ही होता है- एक्सिडेंटल प्रेग्नेंसी यानी अनचाहा गर्भ. ऐसा होने पर आपकी आगे की बहुत-सी प्लानिंग बदल जाती है, जिसमें फाइनेंस से लेकर करियर तक शामिल है. ऐसे में फैमली प्लानिंग से लेकर कंट्रासेप्शन यानी किस तरह का कंट्रासेप्शन यूज़ और किसे और कब तक यूज़ करना है इस पर चर्चा ज़रूर कर लें.

शादी का ख़र्च व लेन-देन: शादी सिंपल करनी है या कितना ख़र्च करना है और दोनों तरफ़ से कौन कितना ख़र्च करेगा इस पर सहमति ज़रूरी है. ऐसा न हो कि होनेवाला पार्टनर या उसकी फैमिली कुछ ज़्यादा ही उम्मीद लगाकर बैठी हो. बेहतर होगा कि लड़का और लड़की ख़ुद अपनी आर्थिक स्थिति की सही तस्वीर पेश करें. 

किसी भी तरह की लत, कमज़ोरी, आदतें, शौक, शारीरिक व मानसिक समस्या: शादी से पहले लोग सामनेवाले के बारे में कई जगहों से व रिश्तेदारों से पता करते ही हैं, तो किसी और से ग़लत बातें व ग़लत तरी़के से कोई बात पहुंचे उससे अच्छा होगा कि आप ख़ुद अपनी कमज़ोरियों, लत, आदतों व समस्याओं के विषय में बात कर लें. 
इसके अलावा आपके शौक़ और स्पेंडिंग हैबिट्स के बारे में भी चर्चा कर लें, ताकि बाद में कोई यह न कह सके कि पहले पता होता तो शादी ही न करता/करती.

सेक्स और वर्स्ट नाइट से जुड़े डर: यह बहुत ही अहम् विषय है, क्योंकि आपकी शादीशुदा ज़िदगी की ख़ुशियां बहुत हद तक इस पर ही टिकी होती हैं. बेहतर होगा इस पर भी बात करने से हिचकिचाएं नहीं. 

शादी के बाद
शादी तो हो गई, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि अब आप दोनों के कम्यूनिकेट करने की ज़रूरत ही नहीं. बल्कि अब तो और ज़्यादा ज़रूरत है, क्योंकि शेयरिंग ही आपके रिश्ते को अधिक केयरिंग बनाएगी. तो कुछ बातों पर ज़रूर बात करें. 

अपनी असहजता: आप दोनों ही नए रिश्ते में बंधे हो, तो ज़ाहिर है कि असहजता कहीं न कहीं होगी है, ऐसे में बिना एक-दूसरे को बताए कंफ्यूज़न पैदा होगा, क्योंकि आप दोनों ही एक-दूसरे से उम्मीदें लगाकर बैठे हो और जब वो पूरी होती नहीं दिखेंगी, तो लगेगा कि कुछ तो ग़लत है. आपको घर का माहौल या घरवालों का व्यवहार या फिर पार्टनर का ही व्यवहार अगर असहज कर रहा हो, तो बात करें और पार्टनर को बताएं, पता चला कि बात छोटी-सी है लेकिन उस पर चर्चा न करके वो बड़ी नज़र आने लगी. 

घर का काम और ज़िम्मेदारियों को बंटवारा: ऐसा नहीं होना चाहिए कि नई दुल्हन पर ही सारे काम का बोझ आ जाए और ऐसा भी नहीं होना चाहिए कि नई-नवेली होने का फ़ायदा उठाकर काम को हाथ ही न लगाया जाए. कोशिश करें कि साथ-साथ काम करते-करते ही सभी को अपनी ज़िम्मेदारियों का अंदाज़ा आप करा दें और स्वयं अपनी भी ज़िम्मेदारियों को आप समझें. यहां तक कि अपने पति को भी उनके हिस्से का काम व ज़िम्मेदारी सौंपें, क्योंकि आप दोनों वर्किंग हैं, तो घर का काम भी मिल-जुलकर करना ज़रूरी है.

शादी की गंभीरता को समझना: बैचलर लाइफ अलग होती है और शादी के बाद बहुत कुछ बदल जाता है. आप दोनों की ही ज़िम्मेदारियां बदलती व बढ़ती हैं, ऐसे में लापरवाही छोड़कर गंभीर और ज़िम्मेदार होना पड़ता है. हो सकता है अपनी आदतें व शौक़ भी बदलने पड़ें, ऐसे में मुंह फुलाने की बजाय या दुखी होने की बजाय आपसी सहयोग से काम लें. इन बातों पर आपस में बैठकर चर्चा करें और समझें कि अब हम अकेले नहीं बल्कि एक परिवार हो गए हैं, ऐसे में यह बदलाव होने लाज़िमी हैं, तो दुख कैसा. दोस्तों व सहेलियों के साथ अधिक टाइम बिताने से अच्छा है आपस में एक-दूसरे के साथ समय बिताएं और अगर एक पार्टनर यह न समझ रहा हो, तो दूसरा उसे समझाए. 

बचत और फ्यूचर प्लानिंग: भविष्य के लिए और बेहतर भविष्य के लिए बचत बेहद ज़रूरी है. माना नई-नई शादी हुई है, तो इसका यह मतलब नहीं कि बस घूमो-फिरो, मूवीज़ देखो, पार्टीज़ करो. हनीमून के बाद ख़्वाबों के आसमान से ज़मीन पर आ जाना ही बेहतर होता है. आप दोनों को इस पर खुलकर न स़िर्फ बात करनी होगी, बल्कि प्लानिंग भी मिलकर करनी होगी कि कहां और कैसे सेविंग्स हों. 

बच्चे: माना फैमिली प्लानिंग कर ली, लेकिन हालातों के मद्देनज़र उसे बदलना भी पड़ सकता है, तो आप दोनों में से किसी एक को भी लग रहा हो कि इसमें बदलाव की ज़रूरत है, तो मन ही मन कुढ़ने की बजाय चर्चा करें और दूसरे पार्टनर को भी यह समझना होगा कि पहले जो प्लानिंग पर हो चुकी वो पत्थर की लकीर नहीं है, अगर इसमें बदलाव करने से आपका रिश्ते व भविष्य बेहतर हो सकता है, तो क्यों नहीं?
एक्सीडेंटल प्रेग्नेंसी: यह किसी के भी साथ हो सकता है, तमाम प्रयासों के बाद भी अगर यह हो जाता है, तो एक-दूसरे पर दोषारोपण या ग़ुस्सा करने की बजाय बात करें, क्योंकि बातचीत ही एकमात्र विकल्प है. एक-दूसरे का संभालें और समझाएं कि यह समान्य सी बात है और ऐसा हो जाता है. तनाव लेने से समस्या का समाधान नहीं होता.

बैकअप प्लान और इमर्जेंसी फंड्स: यह कभी भी काम आ सकता है, क्योंकि इमर्जेंसी भी कभी भी हो सकती है. कभी कोई दुर्घटना या बीमारी या फिर किसी भी तरह की समस्या आने पर आपके पास बैकअप प्लान होना चाहिए, तो वो प्लान क्या हो, किस रूप में हो और उस पर किस तरह से अमल हो इस पर बात और प्लानिंग ज़रूरी है. यह भी ज़रूरी नहीं कि इमर्जेंसी फंड्स स़िर्फ बीमारी या समस्या पर ही काम आए, अगर घर में, रिश्तेदारी में कोई शादी प्लान हो गई या बच्चे की किसी हॉबी क्लास के लिए पैसों की ज़रूरत हुई, तो उन्हें वहां भी यूज़ किया जा सकता है. लेकिन यह सब कुछ बातों के ज़रिए ही संभव है, क्योंकि बात होगी, तो ही तो प्लानिंग हो पाएगी. 

एंटरटेनमेंट को इग्नोर न करें: रिफ्रेश फील करने के लिए कभी बाहर खाना, हॉलिडे प्लान करना भी ज़रूरी है. अगर हॉलिडे प्लान करना है, तो सालभर मूवीज़ व बाहर डिनर डेट और गैरज़रूरी शॉपिंग पर थोड़ा ब्रेक लगा लें और अगर इस साल हॉलिडे नहीं जाना, तो अपने फंड्स को किसी अन्य काम पर खर्च करें.  

बेहतर होगा कि अपने आइडियाज़, अपने डर, अपनी ख़ुशियां, अपने ग़म आपस में साझा करें, क्योंकि बिना बात के बात नहीं बनेगी और बात होगी, तभी तो बात बनेगी.

– गणपति  

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Sex Education Sex Before Marriage

शादी से पहले हर बात की हिदायत, तो सेक्स एजुकेशन से परहेज़ क्यों? (Sex Education: Why We Should Talk About Sex Before Marriage)

ससुराल में जाकर सबका मन जीत लेना… धीरे-धीरे मीठी आवाज़ में सबसे बात करना… ज़ोर से मत हंसना और न ही ऊंची आवाज़ में बात करना… घर के कामकाज में हाथ बंटाना… इस तरह की तमाम हिदायतें उस लड़की को ज़रूर दी जाती हैं, जिसकी शादी होनेवाली होती है… यह हर घर में आम है, लेकिन क्या कभी इस बात पर हम ग़ौर करते हैं कि इतनी हिदायतों के बीच सेक्स को लेकर हम बेटी को या बेटे को कितना एजुकेट करते हैं? नहीं न? क्योंकि इस स्तर पर बात करना तो दूर, हम सोचते भी नहीं. हमें यह ज़रूरी ही नहीं लगता. वैसे भी सेक्स (Sex) को लेकर आज भी हम उतना खुलकर बात नहीं करते. हमारे समाज में आज भी सेक्स को गंदा या ग़लत ही माना जाता है, लेकिन बात जब शादी-ब्याह की हो, तब भी हम इसे ज़रूरी क्यों नहीं मानते? 

ये किस तरह का समाज है?
  • क्या यह समाज का दोगलापन नहीं है कि हमारे यहां शादी को सबसे अधिक महत्व दिया जाता है और शादी का जो सबसे महत्वपूर्ण आधार है, उस पर ही बात करने से परहेज़ भी किया जाता है.
  • शादी के बाद गुड न्यूज़ की सबको जल्दी रहती है, लेकिन उससे पहले सेक्स से जुड़ी ज़रूरी बातें बताना किसी को ज़रूरी नहीं लगता.
  • जनसंख्या तेज़ी से बढ़ रही है यानी सेक्स करने से किसी को परहेज़ नहीं, लेकिन इस पर एजुकेट करना बेहद शर्मनाक माना जाता है.
  • टीवी कमर्शियल्स में कंडोम, कॉन्ट्रासेप्शन या फिर इससे जुड़ी चीज़ें दिखाए जाने पर परिवार के लोग इस कदर शर्मिंदगी महसूस करते हैं, जैसे यह कोई आपराधिक या शर्मनाक बात हो.
क्या होते हैं दुष्परिणाम?
  • सेक्स एजुकेशन की कमी के चलते सेक्स को लेकर कोई जागरूकता हमारे समाज में नहीं है.
  • नए शादीशुदा जोड़े भी उतना ही जान पाते हैं, जितना उनके यार-दोस्त उन्हें बताते-समझाते हैं.
  • किस तरह से सेक्सुअली ट्रांसमिटेड डिसीज़ से बचाव करना चाहिए, किस तरह से फैमिली प्लानिंग और कॉन्ट्रासेप्शन का इस्तेमाल करना चाहिए, पर्सनल हाइजीन का क्या महत्व है… इस तरह की तमाम बातों पर किसी का ध्यान नहीं जाता है.
  • यही वजह है कि अधिकांश लड़कियां सेक्स को लेकर एक फैंटसी में जीती हैं और सुहागरात को किसी फिल्मी सीन की तरह देखती हैं. लेकिन जब उनका सामना हक़ीक़त से होता है, तो उनके सपने बिखर जाते हैं.
  • बात स़िर्फ लड़कियों की ही नहीं, लड़कों को भी यह सीख नहीं दी जाती कि पहली रात को सेक्स करना ज़रूरी नहीं. सबसे ज़रूरी होता है एक-दूसरे को कंफर्टेबल महसूस कराना, क्योंकि सेक्स एक क्रिया नहीं, भावना है और आपके रिश्ते की नींव का महत्वपूर्ण आधार भी.
  • हमारे यहां दोस्तों की बातें या फिर पोर्नोग्राफी ही सेक्स एजुकेशन का सबसे बड़ा आधार व ज़रिया होती है, जिससे बहुत ही ग़लत जानकारियां हासिल कर कपल्स अपनी-अपनी सोच के साथ एक-दूसरे के क़रीब आते हैं.
  • इसके अलावा अधिकांश लड़कियों को बचपन से यही सिखाया जाता है कि सेक्स बेहद शर्मनाक और गंदी चीज़ होती है, जिससे वो शादी के बाद भी स़िर्फ पति की इच्छा मानकर इस क्रिया को अंजाम देती हैं. वो न तो अपनी चाहतें बयां कर पाती हैं और न ही अपनी सोच. यहां तक कि वो पति को सहयोग भी नहीं दे पातीं, क्योंकि यहां उनके चरित्र से जोड़कर इसे देखा-परखा जाता है.

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नो सेक्स एजुकेशन का मतलब नो सेक्स नहीं है…
  • यह तो हम सभी जानते हैं कि सेक्स एजुकेशन नहीं मिलने का मतलब यह नहीं कि व्यक्ति सेक्स नहीं करेगा, लेकिन इसका यह मतलब ज़रूर है कि वो सेक्स को लेकर कम संवेदनशील होगा, कम जानकार होगा और सेक्स के प्रति उसमें भ्रांतियां अधिक होंगी.
  • सेक्स एजुकेशन न होने का मतलब यह भी है कि यौन शोषण के मामले अधिक होंगे.
  • यह मान लेते हैं और शोध भी इसी ओर इशारा करते हैं कि लगभग 70-80% पैरेंट्स सेक्स एजुकेशन के लिहाज़ से भी बच्चों से सेक्स पर बात ही नहीं करते, लेकिन एडल्ट होने के बाद, शादी से पहले तो कम से कम उन्हें इस विषय पर ज़रूर बात करनी चाहिए, ताकि उनकी शादी की नींव मज़बूत हो.
  • बच्ची को यह तो सिखाया जाता है कि पति को ख़ुश रखना ही तेरा फ़र्ज़ है, लेकिन उसे यह नहीं बताया जाता कि अपनी सेक्सुअल हेल्थ के प्रति सतर्कता बरतना भी ज़रूरी है.
  • कॉन्ट्रासेप्शन क्यों और कितना ज़रूरी है, मेडिकल टेस्ट्स कितने ज़रूरी हैं, इस विषय पर पति से बात करना कितना ज़रूरी है… ये तमाम बातें कभी किसी नई-नवेली दुल्हन को नहीं सिखाई जातीं और न ही दूल्हे को भी इस संदर्भ में एजुकेट किया जाता है.
  • उन्हें इस विषय पर बात करने से भी डर लगता है कि कहीं उन्हें चरित्रहीन न समझ लिया जाए या उनके बारे में कोई राय न कायम कर ली जाए.
  • यही वजह है कि सेक्सुअल हाइजीन को लेकर देश की शहरी महिलाएं तक बहुत पिछड़ी हुई हैं.
  • नई-नवेली दुल्हन के वर्जिनिटी टेस्ट को लेकर जितनी जागरूकता हमारा समाज दिखाता है, क्या उतनी ही जागरूकता लड़के की सेक्सुअल एक्टिविटीज़, सेक्सुअल हेल्थ और सेक्सुअल जानकारी के प्रति दर्शाई जाती है?

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प्रोफेशनल की लें मदद
  • यदि पैरेंट्स से सेक्स एजुकेशन नहीं मिली, तो कपल्स को चाहिए प्रोफेशनल की मदद लें.
  • काउंसलर के पास जाएं. प मन में छिपे डर, भ्रांतियों और आशंकाओं पर खुलकर आपस में बात करें.
  • पैरेंट्स की मानें, तो उनका यही तर्क होता है कि हमें तो किसी ने नहीं दी सेक्स एजुकेशन, फिर भी हमारी ज़िंदगी बेहतर है, लेकिन समय के साथ-साथ बहुत कुछ बदला है, आज एक्सपोज़र ज़्यादा है, सेक्स को लेकर सवाल ज़्यादा हैं, डर ज़्यादा हैं, भ्रांतियां ज़्यादा हैं.
  • समय के साथ बदलाव होना ज़रूरी है, हमारी सोच में भी और हमारे तरीक़ों में भी.
  • कपल्स शादी से पहले ख़ुद भी बात कर सकते हैं और उन्हें जो सही लगे, वो ऐक्शन ले सकते हैं, ताकि उनकी शादीशुदा ज़िंदगी बेहतर हो और उनका जीवन ख़ुशहाल. प पैरेंट्स भी यह ख़्याल रखें कि संस्कारों के साथ-साथ सेक्स एजुकेशन भी उतनी ही ज़रूरी है, ताकि आपकी बेटी का जीवन बेहतर हो.
  • दूसरी ओर ससुरालपक्ष को भी जानना ज़रूरी है कि नई दुल्हन से उम्मीदें, अपेक्षाएं करना, उसे ज़िम्मेदरियां देना, उसके कर्त्तव्यों की जानकारी देना तो ठीक है, साथ ही अपने बेटे को बेडरूम एटीकेट्स और सेक्स एटीकेट्स की जानकारी देनी भी उतनी ही ज़रूरी है, क्योंकि यह आख़िर उसकी बेहतरी के लिए ही है.

 

– गीता शर्मा