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30 बातें जहां महिलाएं पुरुषों से बेहतर हैं (30 things women do better than men)

better than women

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पुरुष भले ही ये साबित करें कि वे महिलाओं से श्रेष्ठ हैं, लेकिन कई बातों में महिलाएं पुरुषों से कहीं बेहतर हैं और ये हम नहीं कहते, हमारी रिसर्च रिपोर्ट्स कहती हैं.

1. महिलाएं रिश्तों के प्रति वफ़ादार और ईमानदार होती हैं, जबकि अक्सर पुरुष इस कसौटी पर खरे नहीं उतरते. एक बार महिलाएं किसी से रिश्ते में बंध गईं, तो अपना 100% देने की कोशिश करती हैं. वे रिश्तों को लेकर बेहद संवेदनशील भी होती हैं.

2. पूरी दुनिया में हुए शोध बताते हैं कि महिलाओं का आईक्यू लेवल पुरुषों की तुलना में कहीं ज़्यादा अच्छा होता है.

3. हाइजीन और साफ़-सफ़ाई के मामले में भी महिलाएं पुरुषों से आगे हैं. चाहे घर में वॉर्डरोब, बेड या डाइनिंग टेबल की बात हो या ऑफिस डेस्क की-  सफ़ाई के मामले में पुरुष महिलाओं से पीछे ही रहते हैं.

4. महिलाएं मल्टीटास्किंग होती हैं. वे एक साथ कई काम कर सकती हैं, खाना बनाना, सफ़ाई, बच्चे का होमवर्क, मोबाइल पर बातें- कई काम एक  साथ वे उतने ही परफेक्शन के साथ कर सकती हैं, जबकि पुरुष ऐसा नहीं कर पाते. दरअसल, महिलाओं का मस्तिष्क ज़्यादा सक्रिय होता है, जिसकी  वजह से वे एक साथ कई कार्य कर पाती हैं.

5. यूके की एक स्टडी के मुताबिक महिलाएं अच्छी ड्राइवर भले ही न हों, पर सुरक्षित ड्राइविंग के मामले में वे पुरुषों से काफ़ी आगे हैं. रिपोर्ट के  अनुसार महिलाओं द्वारा होनेवाले एक्सीडेंट की दर पुरुषों के मुक़ाबले बहुत कम है. इसके अलावा ट्रैफिक रूल्स फॉलो करने में भी वे पुरुषों से बेहतर हैं.

6. दर्द झेलने और बोरिंग काम करने की क्षमता भी स्त्रियों में पुरुषों से अधिक होती है. पुरुष घंटों बेमतलब के टीवी कार्यक्रम देख सकते हैं, यूं ही खाली  बैठे रह सकते हैं, जबकि स्त्रियां ऐसा नहीं कर सकतीं.

7. चेहरे की भाव-भंगिमा पढ़ने में महिलाएं मास्टर होती हैं. एडिनबर्ग यूनिवर्सिटी में हुए एक रिसर्च में ये बात सामने आई है. रिसर्च से यह भी पता  चला है कि कोई सामाजिक निर्णय लेना हो, तो पुरुष मस्तिष्क को इसके लिए ज़्यादा काम करना पड़ता है, जबकि महिलाएं ऐसे निर्णय चुटकियों में  ले लेती हैं.

8. महिलाएं लोगों को बेहतर समझ पाती हैं. किसी के व्यक्तित्व, उसके बॉडी लैंग्वेज को वे पुरुषों के मुक़ाबले बेहतर और जल्दी समझ पाती हैं.

9. रिश्ते जोड़नेे में भी महिलाएं माहिर होती हैं. वे लोगों से बहुत जल्दी कनेक्ट हो जाती हैं और रिश्ते भी जल्दी बना लेती हैं. अपने मन की बात भी वे  लोगों से शेयर कर लेती हैं, जबकि पुरुष ऐसा नहीं कर पाते.

10. जॉर्जिया और कोलंबिया यूनिवर्सिटी की एक स्टडी रिपोर्ट के अनुसार, महिलाएं अच्छी लर्नर होती हैं यानी वे बहुत जल्दी सीख-समझ जाती हैं.  रिसर्च के अनुसार वे अलर्ट, फ्लेक्सिबल और ऑर्गेनाइज़्ड होती हैं और किसी भी टास्क को पुरुषों के मुक़ाबले जल्दी समझ जाती हैं.

11. महिलाएं फाइनेंस भी पुरुषों से बेहतर ढंग से हैंडल करती हैं. चाहे सेविंग की बात हो, शॉपिंग की या इन्वेस्टमेंट की, महिलाएं पैसे को बहुत अच्छी  तरह से मैनेज करती हैं, जबकि पुरुष ऐसा नहीं कर पाते.

12. बच्चों को संभालना, फिर चाहे नवजात शिशु हो या बड़े बच्चे- पुरुषों के वश की बात नहीं. न वे रोते बच्चे को चुप करा पाते हैं, न उसका डायपर  बदल सकते हैं, न उनकी ज़िद को हैंडल कर सकते हैं और न ही उन्हें बहला-फुसला सकते हैं, जबकि महिलाएं ये काम पूरी ज़िम्मेदारी व ईमानदारी के
साथ करती हैं.

13. महिलाएं पुरुषों की तुलना में ज़्यादा स्ट्रॉन्ग होती हैं. अगर उनके हाथ-पैर में कहीं चोट लग जाए, तो वेे जानती हैं कि उसे कैसे ठीक किया जाए,  जबकि पुरुष छोटी-सी चोट से भी घबरा जाते हैं. हल्का-सा बुखार भी आ जाए, तो उन्हें कमज़ोरी महसूस होने लगती है और आराम करने का बहाना  मिल जाता है, जबकि महिलाएं बड़ी-बड़ी तकलीफ़ होने पर भी अपना काम और ज़िम्मेदारियां उसी तेज़ी और ख़ूबी से निभाती हैं.

14. महिलाएं पुरुषों से बेहतर इसलिए भी हैं, क्योंकि कई क़ानून ख़ासकर महिलाओं के हितों को ध्यान में रखकर बनाए गए हैं, उन्हें कई सुविधाएं
प्राप्त  हैं.

15. महिलाओं की रोगप्रतिरोधक क्षमता भी पुरुषों से मज़बूत होती है. कनाडा में हुए एक शोध के अनुसार फीमेल सेक्स हार्मोन एस्ट्रोजन महिलाओं  की रोगप्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है और उन्हें इंफेक्शन से लड़ने की बेहतर क्षमता प्रदान करता है.

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16. ग्रैजुएशन करने में भी महिलाएं पुरुषों से आगे हैं. डिपार्टमेंट ऑफ एजुकेशन के आंकड़ों के अनुसार पुरुष स्नातक की डिग्री लेने में महिलाओं से पीछे हैं. इतना ही नहीं, स्नातक की डिग्री हासिल करने में पुरुषों को 5 वर्ष से अधिक समय लगता है, जबकि महिलाएं 5 वर्ष में ही  स्नातक की डिग्री हासिल कर लेती हैं.

17. महिलाएं पुरुषों की तुलना में हेल्दी डायट लेती हैं. पुरुष जहां दिनभर ऊल-जुलूल खाते हैं, ड्रिंक व स्मोकिंग करते हैं, वहीं महिलाएं हेल्दी फूड पसंद करती हैं. महिलाओं के बैग में आपको सलाद, फ्रूट, ड्रायफ्रूट्स, बिस्किट जैसे हेल्दी ऑप्शन मिल  जाएंगे, जबकि पुरुषों के बैग से ये सब मिसिंग होते हैं.

18. महिलाएं पुरुषों की तुलना में 5 से 10 वर्ष अधिक जीती हैं यानी आयु के मामले में भी बाज़ी महिलाओं ने ही मारी है. इतना ही नहीं, महिलाएं पुरुषों  के मुक़ाबले बेहतर जीवन जीती हैं यानी जीवन को ज़्यादा एंजॉय करती हैं.

19. पुरुषों के मुक़ाबले महिलाएं स्टाफ को ज़्यादा बेहतर ढंग से हैंडल कर पाती हैं.

20. महिलाएं अनुशासित और समय की पाबंद होती हैं. लेटलतीफ़ी उन्हें पसंद नहीं.

21. महिला लीडर्स सहायता के लिए हमेशा उपलब्ध होती हैं और किसी प्रॉब्लम की स्थिति में जल्दी रिस्पॉन्ड भी करती हैं.

22. पर्सनल ग्रूमिंग के मामले में भी वे पुरुषों से बेहतर हैं. हम उनके अपीयरेंस, उनके मेकअप, ड्रेस की बात नहीं कर रहे हैं, बल्कि पर्सनल हाइजीन की  बात कर रहे हैं. आप महिलाओं और पुरुषों के नाखून देख लें, आप ख़ुद ही समझ जाएंगे कि हम क्या कहना चाहते हैं.

23. महिलाएं समस्याओं को जल्दी भांप लेती हैं और उसका समाधान भी जल्दी निकाल लेती हैं.

24. महिलाओं की कम्युनिकेशन स्किल भी बेहतर होती है. भले ही वे ज़्यादा बोलती हों, लेकिन अपने विचारों को खुलकर व्यक्त करती हैं. विवाद-बहस आदि की स्थिति में भी महिलाएं बोलना बंद नहीं करतीं, न ही न सुनने का बहाना बनाती हैं. शोधों से साबित हो  चुका है कि महिलाओं का मस्तिष्क कई सारे शब्द, भावनाओं और एहसासात को प्रोसेस कर सकता है, जबकि पुरुष मस्तिष्क ऐसा नहीं कर सकता.

25. महिलाएं फ्युचर प्लानिंग व रिलेशनशिप को बेहतर ढंग से मैनेज करती हैं.

26. ख़तरों को जल्दी भांप लेती हैं और सुरक्षा को लेकर भी ज़्यादा सतर्क रहती हैं. कहीं जाना हो तो घर की सुरक्षा, सेफ्टी सिस्टम पर अधिक ध्यान  देती हैं.

27. महिलाएं सामनेवाले के चरित्र को तुरंत ही पहचान जाती हैं. उनका सिक्स्थ सेंस इतना स्ट्रॉन्ग होता है कि सामनेवाले के मन में क्या चल रहा है, वे  देखते ही समझ जाती हैं.

28. महिलाएं जीवन में संतुलन को बेहतर ढंग से मेंटेन करती हैं. महिलाओं के शरीर में सेरोटोनिन का लेवल पुरुषों की तुलना में हाई होता है.  सेरोटोनिन इमोशन्स को कंट्रोल में रखता है, जिससे महिलाओं को लाइफ को बैलेंस करने में आसानी होती है.

29. महिलाएं तनाव को पुरुषों के मुक़ाबले बेहतर ढंग से हैंडल करती हैं. हां, ये सच है कि तनाव व मुश्किल परिस्थिति में महिलाएं जल्दी रो देती हैं, लेकिन एक बार दिल का गुबार आंसू बनकर निकल गया, तो उनकी सोच एकदम स्पष्ट हो जाती है और वे एकदम सटीक निर्णय लेने में सक्षम हो  जाती हैं. अमेरिका में पुरुष और महिलाओं पर हुए एक शोध से ये बात सामने आई कि तनाव दोनों को उतना ही प्रभावित करता है, लेकिन तनाव की  स्थिति में भी महिलाओं का परफॉर्मेंस बेहतर था, जबकि पुरुष इसमें चूक गए.

30. महिलाओं की याद्दाश्त भी पुरुषों से तेज़ होती है. महिलाएं कोई फिल्म देखती हैं, तो कॉस्ट्यूम, मेकअप, फिल्म के सेट से लेकर हर चीज़ उन्हें याद   रहती है. ऐसा इसलिए नहीं है कि वे अपीयरेंस पर ज़्यादा ध्यान देती हैं, बल्कि उनका इनबिल्ट सिस्टम ऐसा होता है कि देखी हुई चीज़ें उन्हें याद
रहती  हैं.

– प्रतिभा तिवारी

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महंगी दवाओं का बेहतर विकल्प- जेनेरिक मेडिसिन्स

जिस देश में किसी की जान और स्वास्थ्य की क़ीमत उसकी आर्थिक स्थिति पर निर्भर करती हो, उसके विकास और विकास की दिशा का अंदाज़ा ख़ुद लगाया जा सकता है. पैसों के अभाव में इलाज और आवश्यक दवाएं तक लोगों को नसीब नहीं होतीं और ऐसे में कई मासूम ज़िंदगियां दम तोड़ देती हैं. हम सभी चाहते हैं कि यह स्थिति बदले, लेकिन हमारे देश में सरकार और प्रशासन हेल्थ केयर सेक्टर को सबसे निचले स्तर पर रखता है, जबकि अन्य देशों में यह प्राथमिकता की सूची में सबसे ऊपर है. यही वजह है कि यहां सस्ती दवाओं और इलाज के अभाव में बहुत-सी जानें जाती हैं.
ऐसे में सस्ता इलाज और जेनेरिक दवाएं यदि आसानी से सब जगह उपलब्ध हों, तो तस्वीर थोड़ी बेहतर हो सकती है.

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क्या होती हैं जेनेरिक दवाएं?

– ये महंगी और ब्रांडेड दवाओं का सस्ता विकल्प हैं, जिनका इस्तेमाल, प्रभाव, असर और साइड इफेक्ट्स भी उन्हीं ब्रांडेड दवाओं जैसा ही होता है.

– इनका कंपोज़िशन भी वही होता है, लेकिन ये दवाएं इतनी सस्ती इसीलिए होती हैं, क्योंकि इनके उत्पादक नई दवाओं की मार्केटिंग और निर्माण पर बड़ी कंपनियों व बड़े ब्रॉन्ड्स की तरह पैसा ख़र्च नहीं करते.

– एक तथ्य यह भी है कि इन दवाओं का असर और गुणवत्ता उतनी ही बेहतर होती है, जितनी कि नामी-गिरामी कंपनी व ब्रांडेड दवाओं की होती है. अक्सर लोगों को लगता है कि महंगी दवाओं का प्रभाव उनकी जेनेरिक दवाओं के मुक़ाबले अधिक होता है और उनकी गुणवत्ता भी अच्छी होती है.

– लेकिन सच्चाई यही है कि जेनेरिक दवाओं पर भी एफडीए के वही कड़े क़ायदे व नियम लागू होते हैं, जो बाक़ी दवाओं पर होते हैं.

– कई बड़ी कंपनियां तो ब्रांडेड और जेनेरिक दोनों ही प्रकार की दवाओं का निर्माण करती हैं.

 

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क्या है भारत की स्थिति?

भारत जेनेरिक दवाओं का बड़ा उत्पादक है. पिछले कई सालों से भारत लगभग हर चिकित्सकीय श्रेणी में जेनेरिक दवाओं के बड़े उत्पादक के रूप में उभरा है. हालांकि अन्य देशों के मुक़ाबले भारत में दवाएं काफ़ी सस्ती हैं, लेकिन भारत का एक बड़ा तबका है, जो ब्रांडेड दवाएं ख़रीदने में सक्षम नहीं है. ऐसे में जेनेरिक दवाओं की बढ़ती ज़रूरत को देखते हुए इसे बढ़ावा देने का प्रयास किया जा रहा है.

– हमारे देश में ड्रग प्राइस कंट्रोल ऑर्डर (डीपीसीओ) के तहत एनपीपीए यानी नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथोरिटी द्वारा रिटेल मार्केट की शेड्यूल्ड दवाओं की क़ीमतें तय और नियंत्रित की जाती हैं. इसके अलावा एनपीपीए उन दवाओं की क़ीमतों पर भी नज़र रखता है, जो डीपीसीओ की लिस्ट में नहीं हैं, ताकि इन दवाओं की क़ीमत साल में 10% से अधिक न बढ़ने पाए.

– सरकार ने दवाओं की क़ीमतों को कम और नियंत्रित रखने के लिए वैट भी कम रखा है- मात्र 4%.  लेकिन इन सबके बावजूद सच्चाई यही है कि देश में दवाएं ख़रीदने में असमर्थ होने की वजह से ग़रीबों की जान जा रही है.

– अमेरिकी जेनेरिक ड्रग्स में 40% भारतीय कंपनियों का शेयर है यानी भारत सबसे बड़ा सप्लायर है वहां. भारत से लगभग 45 हज़ार करोड़ रुपए की जेनेरिक दवाएं विदेशों में भेजते हैं, लेकिन अपने ही देश में सस्ती दवाओं के अभाव में ग़रीबों की जान जा रही है.

– डब्लूएचओ के अनुसार भारत में आज भी 65% आबादी आवश्यक दवाओं से वंचित रह जाती है, मात्र पैसों की तंगी के कारण दवा न ख़रीद पाने की वजह से ऐसा होता है. दवाओं की वास्तविक क़ीमतें बेहद कम होती हैं, लेकिन दवाओं को उनकी वास्तविक क़ीमत से 5 गुना से लेकर 20-50 गुना तक बढ़ाकर बेचा जाता है. इसकी मुख्य वजह है हमारा सिस्टम, जिसमें हर कोई कमीशन खाता है.

– कमीशन की चाह में डॉक्टर्स भी ब्रांडेड दवाएं ही लिखते हैं. उन पर बड़ी-बड़ी कंपनियां दबाव डालती हैं, अधिक कमीशन का लालच देती हैं और अपनी गुणवत्ता की दुहाई देकर उन्हें तैयार कर लेती हैं. दूसरी तरफ़ ड्रग कंपनीज़ पर कानूनी तौर पर कोई रोक नहीं है कि वो कमीशन क्यों ऑफर करती हैं डॉक्टर्स को.

– सरकारों को जेनेरिक दवाओं को अधिक से अधिक आम लोगों तक, ख़ासकर ग़रीब तबके तक पहुंचाने का प्रयास करना चाहिए, ताकि कम से कम आज़ादी के 65 वर्षों बाद इलाज व दवा न ख़रीद पाने के कारण मौत के मुंह से लोगों को बचाया जा सके.

– लो कॉस्ट इंश्योरेंस स्कीम्स शुरू की जानी चाहिए, जो देश के कुछ राज्यों में काफ़ी सफलता से चल रही हैं, लेकिन जानकारों का कहना है कि दरअसल हेल्थ केयर सेक्टर एक बिज़नेस बन चुका है और जब तक यह स्थिति नहीं बदलेगी, तस्वीर नहीं बदलेगी.

– हैरानी की बात यह है कि डॉक्टरी पेशा अब मिशन या सेवा न रहकर बिज़नेस बन गया है. देश में जहां अधिक से अधिक सरकारी मेडिकल कॉलेज खुलने चाहिए थे, वहीं प्राइवेट कॉलेजेस अधिक खुलते हैं, जो भारी डोनेशन पर ही एडमिशन देते हैं और अच्छी-ख़ासी फीस भी वसूलते हैं. ज़ाहिर-सी बात है पढ़ाई पूरी होने के बाद जो युवा डॉक्टर्स अपनी प्रैक्टिस शुरू करते हैं, उनके दिमाग़ में यही बात होती है कि हमने जो पैसा लगाया है, उसे जल्द से जल्द वापस कमाना है.

– कुल मिलाकर यही कहा जा सकता है कि सिस्टम में ही ख़ामियां हैं, तो सुधार तब तक नहीं आएगा, जब तक सिस्टम नहीं सुधरेगा. पिछले कुछ वर्षों में मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया जब ख़ुद गड़बड़ियों के आरोपों में घिर चुकी है, तो परिवर्तन कैसे लाया जाए यह भी बड़ा सवाल है. बहरहाल, कोशिशें जारी हैं, बदलाव भी आएगा. सरकार के अलावा इस दिशा में बहुत-सी एनजीओ और समाजसेवा में दिलचस्पी रखनेवाले डॉक्टर्स भी अपने-अपने स्तर पर काफ़ी अच्छा व सराहनीय काम कर रहे हैं, जिससे मेडिकल सेक्टर में सकारात्मक बदलाव आए और लोगों को सस्ती दवाएं आसानी से उपलब्ध करा पाएं.

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सरकारी प्रयास

– बीपीपीआई यानी ब्यूरो ऑफ फार्मा पीएसयूज़ (पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग्स) ऑफ इंडिया की स्थापना करके भारत सरकार ने जन औषधि स्टोर्स के ज़रिए जेनेरिक दवाओं को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाने का प्रयास शुरू किया है.

– ब्यूरो का काम है कि जनऔषधि स्टोर्स की मार्केटिंग और कोऑर्डिनेशन के ज़रिए ज़्यादातर लोगों तक इसका लाभ पहुंचाया जाए.

– अपने प्लांट्स से दवाएं अस्पतालों, राज्यों तक व प्राइवेट सेक्टर में भी पहुंचाई जाएं. इससे संबंधित सभी ज़रूरी क़दम उठाना भी ब्यूरो का काम है.

– सभी जन औषधि स्टोर्स ठीक तरह से काम कर रहे हैं या नहीं, इसकी निगरानी रखना.

– बेहतर होगा कि अधिक जानकारी के लिए आप इस वेबसाइट पर जाएं- http://janaushadhi.gov.in

– यहां आपको तमाम राज्यों/शहरों में मौजूद जन औषधि स्टोर्स के नाम और पते मिल जाएंगे.

– इसके अलावा आपको यहां सभी जेनेरिक दवाओं के नाम और दाम की सूची भी मिल जाएगी.

– इस वेबसाइट पर नेशनल टोल फ्री हेल्पलाइन नंबर भी है, जिससे आप सहायता ले सकते हैं. ऐसे में यदि आप स्वयं या अपने आसपास किसी ग़रीब की भी सहायता करना चाहें, तो काफ़ी जानकारी इस वेबसाइट से जुटा सकते हैं.

– गीता शर्मा