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गब्बर सिंह की दिलचस्प दास्तान… (Amjad Khan’s Birth Anniversary: The Interesting Story of Gabbar Singh…)

शोले फिल्म में गब्बर सिंह के क़िरदार को इतने दशकों के बाद भी कोई भूल नहीं पाया है. आज गब्बर सिंह यानी अमजद ख़ान का जन्मदिन है. उनसे जुड़ी कई कही-अनकही बातों के बारे में जानते हैं. ख़ासकर किस तरह उन्हें गब्बर का रोल मिला और अमिताभ बच्चन के साथ उनका याराना…

Amjad Khan’s Birth Anniversary

शोले फिल्म के दौरान अमिताभ बच्चन के साथ अमजद ख़ान की अच्छी दोस्ती हो गई थी. अमिताभ ने उनसे जुड़े कई मज़ेदार क़िस्से बताए.

* अमिताभ के अनुसार अमजद चाय के बेहद शौकीन थे. दिनभर में कभी-कभी वे बीस कप तक चाय पी जाते थे.

* एक बार कैंटीन में दूध ख़त्म हो गया और अपनी चाय की तलब की ख़ातिर अमजद साहब ने भैंस ही लाकर कैंटीन में बांध दी थी.

* वे काफ़ी मज़ाकिया भी थे. उन्हें बात-बात पर मज़ाक करने की आदत थी. वे अपनी मौत को लेकर भी अक्सर हंसी-मज़ाक किया करते थे.

* उनका कहना था कि वे पांच मिनट के अंदर ही इस दुनिया से विदा ले लेंगे और ऐसा हुआ भी. उनकी पत्नी के अनुसार, शाम सात बजे उन्हें किसी से मिलना था और वे तैयार हो रहे थे, तभी उनका बेटा दौड़ता हुआ आया और कहा कि पापा के हाथ-पैर ठंडे हो रहे हैं. पांच मिनट के अंदर ही वे इस दुनिया से रुख़सत हो गए. ऐसे में मुकद्दर का सिकंदर का वो गाना कितना सार्थक बैठता है कि ज़िंदगी तो बेवफ़ा है साथ छोड़ जाएगी, मौत तो महबूबा है अपनी साथ ले के जाएगी… मर के जीने की अदा को दुनिया को दिखलाएगा…

* अमिताभ व अमजद की ऑन स्क्रीन नायक व ख़लनायकवाली जोड़ी को दर्शकों ने ख़ूब पसंद किया, जैसे- शोले, याराना, नास्तिक, मुकद्दर का सिकंदर, महान, सत्ते पे सत्ता, बरसात की एक रात आदि.

* रमेश सिप्पी की गब्बर के रोल के लिए पहली पसंद डैनी डैन्जोंगपा थे, पर कई कारणों से वे यह फिल्म नहीं कर सके.

* गब्बर के रोल के लिए जब किसी ने निर्माता-निर्देशक रमेश सिप्पी को अमजद ख़ान का नाम सुझाया, तब पहली बार मिलने पर ही उन्होंने उन्हें रिजेक्ट कर दिया.

* उस समय अमजद काफ़ी दुबले-पतले थे. लेकिन अपने काम के धुन के पक्पके अमजद ने सिप्पीजी से एक महीने का समय मांगा और न केवल अपना वज़न बढ़ाया, बल्कि अपने लुक को भी बदला और वे चुन लिए गए.

* बहुत कम लोगों को पता है कि संजीव कुमार, अमिताभ बच्चन व धर्मेंद्र तीनों ही गब्बर सिंह का रोल करना चाहते थे. लेकिन रमेश सिप्पी ने तीनों के क़िरदार जैसे जय-वीरू व ठाकुर फाइनल कर लिए थे. उनका यह मानना था कि ये तीनों ही इन क़िरदारों के साथ न्याय कर पाएंगे और यह सच भी साबित हुआ.

* गौर करनेवाली बात है कि गब्बर सिंह के क़िरदार पर अब तक कम से कम छह-सात फिल्में बन चुकी हैं. इसी से अंदाज़ा लगाया जा सकता है हिंंदी फिल्म के इतिहास में यह क़िरदार कितना प्रभावशाली था.

* अमजद ख़ान ने अपने फिल्मी करियर में हर तरह की भूमिकाएं निभाई यानी नायक, खलनायक, सहायक कलाकार और हर भूमिका में जंचे और अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया. उनकी दादा, याराना कुछ ऐसी ही फिल्में थीं.

* आज वे हमारे बीच नहीं हैं, पर उनकी बहुआयामी भूमिकाएं, दमदार संवाद, लाजवाब अभिनय सदा दिलों में ज़िंदा रहेगी.

Amjad KhanAmjad Khan Amjad Khan Amjad Khan

विशेष: आज एक और मशहूर व प्रभावशाली विलेन रंजीतजी का भी जन्मदिन है, उन्हें ढेर सारी शुभकामनाएं.

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राष्ट्रीय एकता दिवस: सरदार वल्लभभाई पटेल जयंती- प्रधानमंत्री मोदीजी व देश ने उन्हें याद किया..(Rashtriya Ekta Diwas 2019: Sardar Vallabhbhai Patel Jayanti- Prime Minister Modiji And The Nation Remembered Him…)

आज सरदार वल्लभ भाई पटेल के जन्म दिवस को राष्ट्रीय एकता दिवस के रूप में देशभर में मनाया जा रहा है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदीजी ने गुजरात के केवडिया में पटेलजी की प्रतिमा स्टैच्यू ऑफ यूनिटी के यहां उन्हें सादर नमन करते हुए राष्ट्रीय एकता की शपथ भी दिलवाई. देश के पहले उप-प्रधानमंत्री व गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेलजी को शत् शत् नमन! आज के दिन हमें उनके विचारों व दृढ़ता से प्रेरणा व सीख लेते हुए जीवन में उसे अपनाने की पुरज़ोर कोशिश करते रहना चाहिए.

Rashtriya Ekta Diwas 2019

दिल्ली में राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद व गृहमंत्री अमित शाह ने पटेलजी को उनकी जयंती पर श्रद्धा सुमन अर्पित करने के साथ मैराथन रन को हरी झंडी दिखाई. देशभर में रन फॉर यूनिटी का आयोजन हो रहा है.

आज सरदार पटेलजी के 144 वीं जयंती पर भारतभर में तमाम कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं. इनमें एकता की दौड़, परेड के साथ-साथ विचार-विमर्श से जुड़े भी कई कार्यक्रम हैं.

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प्रधानमंत्री मोदीजी ने पटेलजी को याद करते हुए कहा कि सरदार वल्लभ भाई पटेल के विचारों में देश की एकता को हर शख़्स महसूस कर सकता है. आज हम उनकी आवाज़ को सबसे बड़ी प्रतिमा के नीचे सुन रहे हैं. आज यहां पर आकर मुझे काफ़ी शांति मिली है…

मोदीजी ने राष्ट्रीय एकता की शपथ भी दिलवाई, जो इस प्रकार थी-

मैं सत्य निष्ठा से शपथ लेता हूं कि मैं राष्ट्र की एकता, अखंडता व सुरक्षा को बनाए रखने के लिए स्वयं को समर्पित करूंगा और अपने देशवासियों के बीच यह संदेश फैलाने का प्रयत्न करुंगा. मैं यह शपथ अपने देश की एकता की भावना से ले रहा हूं, जिसे सरदार वल्लभभाई पटेल, उनकी दूरदर्शिता व कार्यों द्वारा संभव बनाया जा सका. मैं अपने देश की आंतरिक सुरक्षा सुरक्षित करने के लिए अपना योगदान करने का भी सत्य निष्ठा से संकल्प करता हूं… भारत माता की जय!..

 

Sardar Vallabhbhai Patel Jayanti

लौह पुरुष…

* सरदार वल्लभभाई पटेल का जन्म 31 अक्टूबर 1875 में गुजरात के नडियाद में हुआ था.

* उनका पूरा नाम वल्लभभाई झावेरभाई पटेल था, पर वे सरदार पटेल के नाम से विख्यात हुए.

* उन्हें लौह पुरुष व आयरन मैन के रूप में जाना जाता है.

* उनकी पत्नी का नाम झावेरबा पटेल था.

* पटेलजी अपने साहसिक निर्णय के लिए जाने जाते थे.

* इसमें कोई दो राय नहीं कि वे एक कुशल राजनीतिज्ञ और बेहतरीन व्यक्ति थे.

* उनके विचार आज के संदर्भ में भी उतने ही सार्थक व तर्कपूर्ण हैं.

* तमाम विरोधों व अवरोधों के बावजूद वे सत्य पर अडिग रहे और देश की एकता व अखंडता से कभी भी समझौता नहीं किया. इसी कारण उनकी लौह पुरुष की छवि बनीं.

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विशेष: आज ही के दिन लद्दाख व जम्मू-कश्मीर नए केंद्र शासित प्रदेश बन गए हैं.

– ऊषा गुप्ता

जन्मदिन पर विशेष: विनोद खन्ना- बेहद सरल व आकर्षक अभिनेता (Birth Anniversary: Vinod Khanna- Very Handsome And Attractive Star)

हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में सत्तर-अस्सी के दशक में अपने अभिनय, स्टाइल, हैंडसम पर्सनैलिटी से जिस कलाकार ने सबसे अधिक आकर्षित किया, वो थे विनोद खन्ना. उनके एक्शन, इमोशन, कॉमेडी में ग़ज़ब का तालमेल था. उनका खलनायक से शुरू हुआ सफ़र नायक के शिखर तक पहुंचा. फिर अध्यात्म की तरफ़ झुकाव, संन्यास, ओशो आश्रम जाना, दोबारा फिल्मों में आना, राजनीति, छोटे पर्दे पर आना… वे अपनी ज़िंदगी में हर दौर में न जाने कितने पड़ाव से गुज़रे, पर हर जगह अपनी क़ाबिलियत से हर किसी को प्रभावित किया. आज उनके जन्मदिन पर उनसे जुड़ी कई कही-अनकही बातों को जानने की कोशिश करते हैं.

Vinod Khanna

* विनोद खन्ना के पिता का टेक्सटाइल, केमिकल का बिज़नेस था. जब विनोदजी ने अभिनय करने की इच्छा ज़ाहिर की, तो उन्होंने उनकी तरफ़ बंदूक तान दिया था. लेकिन पत्नी के समझाने पर शांत हुए और विनोद को दो साल तक का समय दिया फिल्मों में ख़ुद को स्थापित करने के लिए. यदि वे असफल होते हैं, तो फिर उन्हें पिता के बिज़नेस में हाथ बंटाना होगा.

* विनोद पांच भाई-बहन थे, जिनमें तीन बहन और दो भाई थे. देश के बंटवारे के समय उनके पिता पेशावर से हिंदुस्तान आकर मुंबई में बस गए थे.

* विनोद खन्ना को पहली पत्नी गीतांजली से दो बेटे अक्षय व राहुल हैं और दूसरी बीवी से दो बच्चे साक्षी व श्रद्धा हैं.

* बचपन में विनोद काफ़ी शर्मीले स्वभाव के थे. एक बार उनके शिक्षक ने उन्हें नाटक में ज़बर्दस्ती काम करवाया, तब से अभिनय के प्रति उनका रुझान बढ़ने लगा.

* जब वे बोर्डिंग स्कूल में पढ़ते थे, तब वे सोलवां साल और मुग़ल-ए-आज़म फिल्म से काफ़ी प्रभावित हुए और उन्होंने फिल्म में करियर बनाने का सोचा.

Vinod KhannaVinod KhannaVinod Khanna

* सुनील दत्त की फिल्म मन का मीत से खलनायक के तौर पर अभिनय के सफ़र की शुरुआत हुई और विलेन के रोल में दर्शकों ने उन्हें पसंद भी किया.

* इसके बाद आन मिलो सजना, पूरब और पश्‍चिम, मेरा गांव मेरा देश जैसी फिल्मों में अपनी खलनायकी के जलवे उन्होंने दिखाए, पर नायक के तौर पर ब्रेक गुलज़ार साहब ने दिया.

* उनकी मेरे अपने फिल्म ने विनोद खन्ना को हीरो के तौर पर पहचान दी. गुलज़ार-विनोद की जुगलबंदी ने फिर तो कई फिल्में कीं, जिसमें अचानक, इम्तिहान, रिहाई, लेकिन, मीरा जैसी लाजवाब फिल्में रहीं.

* मीडिया द्वारा अमिताभ बच्चन और विनोद खन्ना को एक-दूसरे का प्रबल प्रतिद्वंदी माना जाता था, जबकि हक़ीक़त में ऐसा कुछ भी नहीं था. यह और बात है कि बिग बी अमिताभ को सुपरस्टार विनोद खन्ना ने अमर अकबर एंथोनी, परवरिश, ख़ून-पसीना, हेरा फेरी, मुकद्दर का सिकंदर जैसी तमाम फिल्मों में जमकर टक्कर दी. और ये सभी फिल्म बॉक्स ऑफिस पर सुपर-डुपर हिट साबित हुईं.

* बहुत कम लोग जानते है कि अमिताभ बच्चन ने कुर्बानी फिल्म करने से मना कर दिया था, तब विनोद खन्ना को अप्रोच किया गया और फिरोज खन्ना की यह फिल्म उस दौर की सबसे कामयाब फिल्मों में से एक रही. इसके गीत-संगीत का जादू आज भी लोगों के दिलों को गुदगुदाता है, ख़ासकर- गाना लैला मैं लैला…

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* विनोद खन्ना कम मूडी नहीं थे. अपने अभिनय सफ़र के शिखर पर रहते हुए उन्होंने सब कुछ यानी फिल्मेें, पत्नी, दोनों बच्चे अक्षय व राहुल को छोड़छाड़ कर अमेरिका में ओशो रजनीश के आश्रम चले गए.

* वहां पर उन्हें स्वामी विनोद भारती, द मॉन्क हू सोल्ड हिज़ मर्सीडीज़, हैंडसम संन्यासी जैसे नामों से पुकारा जाता था. ग्लैमर वर्ल्ड को दरकिनार कर वे वहां पर साफ़-सफ़ाई करना, खाना बनाना, बागवानी करना जैसे तमाम काम करते थे.

* लेकिन वहां पर ध्यान-ज्ञान, काम सब कुछ करते हुए भी उनका मन स्थिर न रह पाया और उन्होंने दोबारा फिल्मों की तरफ़ रुख किया.

* उनकी फिल्मों में सेकंड एंट्री भी धमाकेदार रही. लोगों ने उन्हें हाथोंहाथ लिया. इंसाफ़, सत्यमेव जयते, दयावान, ज़ुर्म, रिहाई जैसी बेहतरीन उम्दा फिल्में कीं.

* उन्होंने राजनीति में भारतीय जनता पार्टी की तरफ़ से गुरदासपुर से चार बार चुनाव लड़ा और विजयी रहे. इस बार वहां से सनी देओल चुनाव लड़े थे और भारी बहुमत से जीत भी हासिल की थी.

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* फिल्मों में विनोद खन्ना के उल्लेखनीय योगदान के लिए उन्हें कई अवॉर्डस के अलावा फिल्मफेयर लाइफटाइम अचीवमेंट, दादासाहेब फाल्के पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया.

आज वे हमारे बीच नहीं है, पर अपने दमदार अभिनय, मस्ताने अंदाज़ से आज भी वे सभी की यादों में ज़िंदा है.

जब भी उनके जीवन में उतार-चढ़ाव आया, तब उन्होंने अपनी ही फिल्म के गाने से प्रेरणा ली- रुक जाना नहीं. तू कहीं हार के.. कांटों पे चलकर मिलेंगे साये बहार प्यार के, ओ रही, ओ रही…

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Vinod Khanna

Vinod Khanna

Vinod Khanna's Family

Vinod Khanna

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जन्मदिन पर विशेषः जगजीत सिंह के बेहतरीन ५ नग़में, क्या आपके कलेक्शन में हैं ये गाने? (5 Classic Ghazals By Jagjit Singh On His Birthday)

Jagjit singh

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8 फरवरी 1941 को राजस्थान के श्रीगंगानगर में जन्में जगजीत सिंह नें क़रीब 4 दशकों तक लोगों को अपनी मखमली आवाज़ से मंत्रमुग्ध किया. बेहद साधारण परिवार में जन्में जगजीत सिंह को ग़ज़ल की दुनिया में ख़ुद को स्थापित करने के लिए काफ़ी संघर्ष करना पड़ा, लेकिन अपनी जादुई मखमली आवाज़ की बदौलत उन्होंने ग़ज़ल गायिकी में वो मुक़ाम हासिल कर लिया कि उन्हें ग़ज़ल सम्राट की उपाधी दे दी गई. अपने करियर के शुरुआती दौर में जगजीत सिंह को विज्ञापन फिल्मों के लिए जिंगल गाने का अवसर मिला था. इसी दौरान उनकी मुलाकात चित्रा दत्ता से हुई. 1969 में जगजीत सिंह ने चित्रा से शादी कर ली. इसके बाद जगजीत-चित्रा की जोड़ी ने कई एलबमों में अपनी खनकती आवाज़ का जादू दिखाया.

साल 2003 में जगजीत सिंह को भारत सरकार की ओर से पद्मभूषण से सम्मानित किया गया. 10 अक्टूबर 2011 को इस दुनिया को अलविदा कहने वाले इस महान फनकार के सुपरहिट गानों की लिस्ट बहुत लंबी है. आज उनकी बर्थ एनिवर्सरी पर आप भी सुनिए उनके कुछ दिल को छू लेने वाले नग़में.

 


मेरी सहेली (Meri Saheli) की ओर से जगजीत साहब को उनकी बर्थ एनिवर्सरी पर नमन!

बर्थ एनिवर्सरी- बचपन से ही आसमान की सैर करना चाहती थीं कल्पना चावला (Birth Anniversary: Remembering Kalpana Chawla)

Birth Anniversary, Remembering Kalpana Chawla

Birth Anniversary, Remembering Kalpana Chawla

अंतरिक्ष में जानेवाली भारतीय मूल की पहली महिला बनने का गौरव हासिल करनेवाली कल्पना चावला का जीवन भले ही बहुत छोटा था, मगर इस छोटी सी ज़िंदगी में उन्होंने वो कर दिखाया जो लाखों लड़कियों के लिए प्रेरणास्रोत बन गया. कल्पना चावला की बर्थ एनिवर्सरी के मौ़के पर आइए, आपको बताते हैं उनसे जुड़ी कुछ ख़ास बातें.

* कल्पना चावला का जन्म 17 मार्च 1962 में करनाल में हुआ था.

* करनाल के टैगोर स्कूल से शुरुआती पढ़ाई के बाद कल्पना ने 1982 में चंडीगढ़ इंजीनियरिंग कॉलेज से एरोनॉटिकल इंजीनियरिंग की डिग्री और 1984 से टेक्सास यूनिवर्सिटी से एयरोस्पेस इंजीनियरिंग की डिग्री ली.

* कल्पना जेआरडी टाटा (जो पायलट होने के साथ ही नामी बिज़नेसमेन भी थे) से बहुत प्रभावित और प्रेरित थीं.

* 1988 में उन्होंने नासा के लिए काम करना शुरू किया और यही उनकी ज़िंदगी का टर्निंग पॉइंट था.

* अंतरिक्ष की सैर का उनका सपना पूरा हुआ 1997 में, जब कल्पना चावला ने स्पेस शटल कोलम्बिया से पहली अंतरिक्ष यात्रा की.

* अंतरिक्ष की पहली यात्रा के दौरान उन्होंने अंतरिक्ष मे 372 घंटे बिताए और पृथ्वी की 252 परिक्रमाएं पूरी की.

* कल्पना ने स्पेस के लिए दूसरी उड़ान 2003 में कोलंबिया शटल से भरी और ये उनकी ज़िंदगी की आख़िरी उड़ान साबित हुई. 01 फरवरी 2003 को  कोलम्बिया स्पेस शटल लैंडिंग से पहले ही दुर्घटनाग्रस्त हो गया और कल्पना के साथ बाकी सभी 6 अंतरिक्ष यात्रियों की मृत्यु हो गई.

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स्वामी विवेकानंद जयंती: एक युवा, जिसने साधु बनकर दुनिया को असली भारत की पहचान कराई (Swami Vivekanand Jayanti: Power Of Youth)

Swami Vivekanand Jayanti, Power Of Youth

Swami Vivekanand Jayanti, Power Of Youth

भारत में हर साल 12 जनवरी को स्वामी विवेकानंद (Swami Vivekanand) जयंती के अवसर पर राष्ट्रीय युवा दिवस मनाया जाता है.

12 जनवरी 1863 में जन्मे स्वामी जी का नाम नरेंद्र नाथ दत्त था. उनके पिताजी प्रख्यात वकील थे. कॉन्वेंट में पढ़े स्वामी जी बचपन से ही काफ़ी जिज्ञासु थे और उनकी इसी जिज्ञासा ने उन्हें ईश्‍वर को समझने व सनातन धर्म को जानने की दिशा में आगे बढ़ाया.

शिकागो में दिया उनका भाषण आज भी सबके बीच प्रसिद्ध है, जहां उन्होंने भारत व सनातन धर्म का इतनी संवेदनशीलता व गहराई से प्रतिनिधित्व किया था कि हम सब आज भी गौरवांवित महसूस करते हैं.

स्वामीजी ने ही दुनिया को बताया था कि असली भारत, यहां की संस्कृति और सभ्यता दरअसल क्या है.

रामकृष्ण परमहंस के इस प्रिय शिष्य ने हमें धर्म को देखने का एक नया व वैज्ञानिक नज़रिया दे दिया. यही वजह है कि उनका नाम आते ही हम एक अलग ही अनुभूति से गुज़रते हैं.

उनके जन्मदिवस को युवा दिवस के तौर पर मनाया जाता है.

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स्वामी विवेकानंद के विचार

  • उठो, जागो और तब तक नहीं रुको जब तक लक्ष्य ना प्राप्त हो जाये.
  • ब्रह्माण्ड की सारी शक्तियां पहले से हमारी हैं. वो हम ही हैं जो अपनी आंखों पर हाथ रख लेते हैं और फिर रोते हैं कि कितना अन्धकार है!
  • अगर धन दूसरों की भलाई करने में मदद करे, तो इसका कुछ मूल्य है, अन्यथा ये सिर्फ बुराई का एक ढेर है और इससे जितना जल्दी छुटकारा मिल जाये उतना बेहतर है.
  • उठो मेरे शेरो, इस भ्रम को मिटा दो कि तुम निर्बल हो, तुम एक अमर आत्मा हो, स्वच्छंद जीव हो, धन्य हो, सनातन हो, तुम तत्व नहीं हो, ना ही शरीर हो, तत्व तुम्हारा सेवक है तुम तत्व के सेवक नहीं हो.
  • खुद को कमज़ोर समझना सबसे बड़ा पाप है.
  • कभी मत सोचिये कि आत्मा के लिए कुछ असंभव है. ऐसा सोचना सबसे बड़ा विधर्म है. अगर कोई पाप है, तो वो ये कहना कि तुम निर्बल हो या अन्य निर्बल हैं.
  • उस व्यक्ति ने अमरत्व प्राप्त कर लिया है, जो किसी सांसारिक वस्तु से व्याकुल नहीं होता.
  • एक शब्द में, यह आदर्श है कि तुम परमात्मा हो.

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मिर्ज़ा ग़ालिब… एक ख़्याल! गूगल ने भी बनाया डूडल (Remembering Mirza Ghalib)

Remembering Mirza Ghalib
…चंद तस्वीर-ऐ-बुतां, चंद हसीनों के खतूत बाद मरने के मेरे घर से यह सामान निकला

  • मिर्ज़ा ग़ालिब एक ऐसा नाम है, जिनके लिए शायर या महान जैसे शब्द भी छोटे लगते हैं…
  • उनके 220 वें जन्मदिन पर हमारी तरफ से नमन
  • गूगल ने भी उनकी याद में ख़ास डूडल बनाया है.
  • उनका जन्म 27 दिसम्बर 1796 को आगरा में हुआ था और 15 फरवरी 1869 को वो दुनिया को अलविदा कह गए.
  • ग़ालिब मुग़ल काल के आख़िरी शासक बहादुर शाह ज़फ़र के दरबारी कवि भी रहे थे.
  • ग़ालिब को मुख्यतः उनकी उर्दू ग़ज़लों को लिए याद किया जाता है.
  • आप भी पढ़ें उनकी शायरी

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हम रहें यूँ तश्ना-ऐ-लब पैगाम के
खत लिखेंगे गरचे मतलब कुछ न हो
हम तो आशिक़ हैं तुम्हारे नाम के
इश्क़ ने ग़ालिब निकम्मा कर दिया
वरना हम भी आदमी थे काम के

मैं नादान था जो वफ़ा को तलाश करता रहा ग़ालिब
यह न सोचा के एक दिन अपनी साँस भी बेवफा हो जाएगी

बे-वजह नहीं रोता इश्क़ में कोई ग़ालिब
जिसे खुद से बढ़ कर चाहो वो रूलाता ज़रूर है

तेरी दुआओं में असर हो तो मस्जिद को हिला के दिखा
नहीं तो दो घूँट पी और मस्जिद को हिलता देख

लफ़्ज़ों की तरतीब मुझे बांधनी नहीं आती “ग़ालिब”
हम तुम को याद करते हैं सीधी सी बात है

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बर्थ एनीवर्सरी: बाल गंगाधर तिलक… एक नेता से लोकनायक तक का सफ़र! (Remembering Bal Gangadhar Tilak: Unknown Facts About Him)

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  • Birth Anniversary: बाल गंगाधर तिलक… एक नेता से लोकनायक तक का सफ़र! (Remembering Bal Gangadhar Tilak: Unknown Facts About Him)
  • भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में पहले लोकप्रिय नेता बाल गंगाधर तिलक को मेरी सहेली की ओर से नमन!
  • 23 जुलाई 1856 में जन्मे केशव गंगाधर तिलक न स़िर्फ स्वतंत्रता सेनानी थे, वे एक बेहतरीन वकील, विचारक, शिक्षक, विद्वान व समाज सुधारक भी थे.
  • उनका जन्म महाराष्ट्र के रत्नागिरी के एक गांव में हुआ था. आधुनिक शिक्षा पाने के बाद इन्होंने लोगों को जगाने का काम किया.
  • शुरुआती दौर में ये शिक्षक के रूप में कार्य करते रहे, लेकिन समाज व देशक के प्रति इनके लगाव ने इन्हें जल्द ही जनता का सबसे बड़ा नायक बना दिया.
  • ये अंग्रेज़ी शिक्षा के विरोधी थे, क्योंकि इनका मानना था कि यह भारतीय संस्कृति के प्रति हमें अनादर सिखाती है और हम में अपने ही देश व लोगों के प्रति मन में घृणा व हीन भावना भरती है.
  • उनकी लोकप्रियता का आलम यह था कि उन्हें लोकमान्य की उपाधि मिल गई, जिसका अर्थ है लोगों द्वारा नायक के रूप में स्वीकृत यानी लोकनायक के रूप में सभी ने उन्हें स्वीकारा.
  • उनके काम व व्यक्तित्व के क़द के आगे ब्रिटिश शासन भी उनसे घबराता था. उनका प्रसिद्ध नारा, जो मूल रूप से मराठी में दिया गया था, “स्वराज्य हा माझा जन्मसिद्ध हक्क आहे आणि तो मी मिळवणारच” यानी स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूंगा, काफ़ी लोगों के दिलों को छू गया था और उनके मन में आज़ादी की लौ जगा गया था.
  • आज़ादी की लड़ाई में ये नरम दल के विरोधी थे, इसलिए लाला लाजपत राय और बिपिन चंद्र पाल के साथ ये गरम दल का हिस्सा थे. इन तीनों को ही लाल-बाल-पाल के नाम से जाना जाता था.
  • अंग्रेज़ इन्हें ‘भारतीय अशांति के पिता’ कहा करते थे और इन्हें हिंदू राष्ट्रवाद का पिता भी कहा जाता है.
  • जनजागृति के लिए इन्होंने कई अख़बार व पत्र-पत्रिकाएं भी प्रकाशित कीं और कई शिक्षण संस्थान भी खोले.
  • तिलक ने अनेक पुस्तकें लिखीं, लेकिन श्रीमद्भगवद्गीता की व्याख्या को लेकर मांडले जेल में लिखी गई गीता-रहस्य सर्वोत्कृष्ट है, जिसका कई भाषाओं में अनुवाद भी हुआ है.
  • जनता को एकता के सूत्र में बांधनेवाले तिलक ने ही गणेशोत्सव और शिवाजी समारोह जैसे सामाजिक कार्यक्रमों की शुरुआत की थी. तिलक ने अंग्रेज़ों की नींद हराम कर रखी थी और अपनी आख़िरी सांस तक वो देश की आज़ादी के लिए लड़ते रहे.
  • 1 अगस्त 1920 को उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया.
  • ऐसे प्रखर नेता को उनकी बर्थ एनीवर्सरी पर हम याद व नमन करते हैं.

Birth Anniversary: संजीदा संजीव के चुलबुले अंदाज़! (Remembering Sanjeev Kumar: A Versatile Hero And An Effortless Actor)

संजीदा संजीव के चुलबुले अंदाज़

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Birth Anniversary: संजीदा संजीव के चुलबुले अंदाज़! (Remembering Sanjeev Kumar: A Versatile Hero And An Effortless Actor)
  • आंखों में संजीदगी, पर होंठों पर कभी मासूम, तो कभी शरारती मुस्कान… कुछ ऐसा ही अंदाज़ था संजीव कुमार का. बात अदाकारी की करें, तो लगता है जैसे ये लफ़्ज़ ही उनके लिए बना हो.
  • हर क़िरदार में ख़ुद को इस तरह ढाल लेना कि देखनेवाला मंत्रमुग्ध हो जाए. संजीव यानी हरिभाई जरीवाला का जन्म 9 जुलाई 1938 को गुजरात के मध्यम वर्गीय परिवार में हुआ था.
  • संजीव की बचपन से ही अभिनय में रुचि थी, यही शौक उन्हें पहले थिएटर की तरफ़ और फिर मायानगरी मुंबई तक ले आया.
  • शुरुआत में उन्हें हम हिंदुस्तानी फिल्म में एक छोटा-सा रोल करने का अवसर मिला और संजीव जैसे उम्दा कलाकार ने इस अवसर को ही अपनी पहचान बना ली, क्योंकि इसके बाद उन्होंने जो भी फिल्में बतौर सहयोगी कलाकार या लीड रोल भी कीं, तो उनसे उनका क़द बढ़ता ही चला गया.
  • संघर्ष जैसी फिल्म ने उन्हें एक पायदान और ऊपर पहुंचा दिया, क्योंकि यहां उनके सामने थे दिलीप कुमार, लेकिन संजीव (Sanjeev Kumar) के सहज अभिनय को देखकर वो भी उनके फैन हुए बिना नहीं रह सके.
  • आंधी, मौसम और खिलौना जैसी फिल्मों ने उन्हें एक संजीदा कलाकार के रूप में दर्शकों के दिलों में ख़ास जगह दिलाई, तो वहीं सीता और गीता, मनचली और अंगूर जैसी फिल्मों में उनकी कॉमिक टाइमिंग और चुलबुले अंदाज़ ने सबको अपना दीवाना बना दिया.
  • शोले के ठाकुर का बदला हो या फिर जानी दुश्मन का वो बेबस पिता, जिसमें एक बुरी आत्मा का कब्ज़ा होता है, त्रिशूल की निगेटिव भूमिका हो या पति पत्नी और वो का बेवफ़ा पति- सबमें ख़ूब जंचे संजीव!
  • खिलौना में एक पागल शायर का रोल, कोशिश में गूंगे-बहरे पति की भूमिका, अनामिका में एक धोखा खाए प्रेमी व लेखक या फिर सिलसिला में एक सीधे-सादे डॉक्टर, जो अपनी पत्नी की बेवफ़ाई को भी आसानी से माफ़ कर देता है- इस तरह के तमाम रोल्स से न्याय संजीव कुमार के अलावा शायद ही कोई कर पाता.
  • लेकिन उनकी सबसे यादगार फिल्म रही नया दिन, नई रात, जिसने उन्हें देश के सबसे बेहतरीन अभिनेताओं की फेहरिस्त में खड़ा कर दिया.
  • रोमांस का बादशाह कहें या कॉमेडी किंग, ट्रेजेडी का मास्टर कहें या इमोशन्स का पैकेज- संजीव कुमार वाकई एक कंप्लीट एक्टर थे.
  • 6 नवंबर 1985 को संजीव ने दुनिया को अलविदा कह दिया था. उनकी बर्थ एनीवर्सरी पर हम उन्हें नम आंखों से याद करते हैं.
देखिए उनके अलग अंदाज़ इन गानों के माध्यम से-

फिल्म: आंधी, गाना- तेरे बिना ज़िंदगी से कोई शिकवा तो नहीं…

फिल्म: मौसम, गाना- छड़ी से छड़ी कैसी गले में पड़ी

फिल्म: मनचली, गाना- मनचली कहां चली…

फिल्म: सीता और गीता, गाना- हवा के साथ-साथ, घटा के संग-संग

फिल्म: मौसम, दिल ढूंढ़ता है फिर वही फुर्सत के रात-दिन…

बर्थ एनीवर्सरी: गुरु दत्त… एक सोच, एक ख़्याल… एक मिसाल, एक सवाल- जानें अनकही बातें! (Birth Anniversary: Facts You Should Not Miss About Guru Dutt)

बर्थ एनीवर्सरी: गुरु दत्त

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हैप्पी बर्थ एनीवर्सरी- गुरु दत्त: एक सोच, एक ख़्याल… एक मिसाल, एक सवाल- जानें अनकही बातें! Birth Anniversary: Facts You Should Not Miss About Guru Dutt
  • गुरु दत्त (Guru Dutt) अपने आप में एक मिसाल का नाम है. जी हां, वो न स़िर्फ एक मंजे हुए अभिनेता (Actor) थे, बल्कि एक बेहतरीन निर्देशक (Director) भी थे.
  • कला को पहचानने की उनमें ग़ज़ब की क्षमता थी.
  • अपने ख़्यालों को, अपनी सोच को किस तरह से रूपहले पर्दे पर जीवंत होते देखा जा सकता है, इसे परखने की उनकी कला के सभी कायल थे.
  • यही वजह है कि आज भी इस अभिनेता का नाम आते ही मन में सम्मान और आंखों में कुछ सवाल भी उभर आते हैं.
  • सम्मान उनके कौशल के लिए और सवाल उनकी निजी ज़िंदगी के लिए… जी हां, आज भी गुरु दत्त सबके लिए एक पहेली या एक सवाल बने हुए हैं.

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  • उनकी निजी ज़िंदगी के बारे में बहुत कुछ कहा, लिखा गया, लेकिन आज भी वो सवाल बरक़रार हैं कि आख़िर क्यों इतना टैलेंटेड एक्टर, इतना युवा निर्माता-निर्देशक दुनिया को इस तरह से छोड़ गया था.
  • उनकी बर्थ एनीवर्सरी पर आज हम उन्हें एक मिसाल के रूप में याद करेंगे.
  • बोलती आंखों और गहरी सोचवाले गुरु दत्त का जन्म 9 जुलाई 1925 को बैंगलोर (आज बैंगलुरू) में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था. बहुत कम लोग जानते हैं कि उनका असली नाम वसंत कुमार शिवशंकर पादुकोण था.
  • उनका बचपन कलकत्ता (अभी कोलकाता) में गुज़रा था, यही वजह है कि उनकी निजी जीवन पर भी वहां की संस्कृति का काफ़ी प्रभाव पड़ा था, यही वजह है कि उनकी फिल्मों में भी वहां की छाप नज़र आती है.

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  • गुरु दत्त ने कलकत्ता में टेलीफोन ऑपरेट की नौकरी से शुरुआत की थी, लेकिन उनका कलाप्रेमी मन मशीनों में उलझकर नहीं रहना चाहता था, यही वजह है कि उन्होंने जल्द ही मुंबई का रुख़ कर लिया और जल्द ही बॉलीवुड में एक मुकाम हासिल किया.
  • उनकी फ़िल्में- प्यासा, साहिब बीबी और गुलाम, काग़ज़ के फूल, चौदहवीं का चांद आज भी एक बेंचमार्क हैं.
  • यही वजह है कि प्यासा और काग़ज़ के फूल को टाइम पत्रिका (Time Magazine) की 100 सर्वश्रेष्ठ फिल्मों की सूचि में शामिल किया गया और साइट एंड साउंड आलोचकों और निर्देशकों के सर्वेक्षण में गुरु दत्त को सबसे बड़े निर्देशकों में जगह मिली.
  • वर्ष 2010 में सीएनएन (CNN) के ऑल टाइम 25 सर्वश्रेष्ठ एशियाई अभिनेताओं में गुरु दत्त भी शामिल हुए.
  • उनके हुनर के चलते ही उन्हें भारत का ऑर्सन वेल्स (Orson Welles) भी हा जाता था.
  • बहुत कम लोग ही जानते हैं कि गुरु दत्त कोरियोग्राफी का भी हुनर जानते थे और ख़ुद बहुत अच्छे कोरियोग्राफर भी थे.

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  • बात उनकी निजी ज़िंदगी की करें, तो गीता दत्त से उनकी शादी हुई, लेकिन कहा जाता है कि शादी, प्यार और भावनाओं की कश्मकश ही उनकी आत्महत्या का कारण बनी.
  • वहीदा रहमान (Waheeda Rehman) जैसी अदाकारा को उन्होंने ने ही बॉलीवुड में एंट्री दिलाई और वो उनकी कला से इतने प्रभावित थे कि वहीदा के लाख मना करने के बाद भी उन्होंने उन्हें फिल्मों में काम करने के लिए तैयार कर लिया.
  • वहीदा के अलावा जॉनी वॉकर भी गुरु दत्त की ही खोज माने जाते हैं. अपने करियर की शुरुआत में देवानंद (Dev Anand) और रहमान से उनकी जो दोस्ती हुई, वो दोस्ती और भी गहरी हुई और ताउम्र वो दोनों उनके अच्छे दोस्तों में गिने जाते रहे.
  • देवानंद से दोस्ती के चलते ही उन्हें नवकेतन (Navketan) की फिल्म बाज़ी (Bazi) के निर्देशन का मौका मिला, जहां सभी ने उनकी हुनर को पहचाना.
  • देवानंद ने ही एक बार उनके बारे में कहा था कि गुरु दत्त असफलता को पचा नहीं पाते.
  • इसी तरह उनकी पड़ोसी रह चुकी नादिरा ने भी कहा था कि वो हमेशा एक डिप्रेशन में रहते थे, क्योंकि वो यह महसूस करते थे कि अपने रिश्तों और फिल्मों को वो इतना नहीं दे पा रहे, जितना वो देना चाहते हैं.

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  • 10 अक्टूबर 1964 को गुरु दत्त ने ज़िंदगी को छोड़ मौत का दामन थाम लिया और हमने एक होनहार कलाकार बहुत जल्द खो दिया. उनकी बर्थ एनीवर्सरी पर उन्हें दिल से नमन करते हैं.
देखते हैं गुरु दत्त की उत्कृष्ट फिल्मों के दिल को छू लेने वाले गीत…

फिल्म: प्यासा, गाना: जाने वो कैसे लोग थे जिनके प्यार को प्यार मिला…

फिल्म: चौदहवीं का चांद, गाना: चौदहवीं का चांद हो या आफताब हो…

फिल्म: प्यासा, गाना: ये महलों ये तख्तों ये ताजों की दुनिया… ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है…

फिल्म: प्यासा, गाना: हम आपकी आंखों में इस दिल को सजा दें तो…

फिल्म: साहिब बीबी और गुलाम, गाना: भंवरा बड़ा नादान हाय…

बर्थ एनीवर्सरी: आर.डी.बर्मन से ‘पंचम दा’ बनने का सफ़र रहा यादगार, देखें पंचम दा के 10 बेहतरीन गानें (Happy Birthday Pancham Da)

RD Burman Songs, birthday, panchamda

rd-burman_759_express-archive-photo (1)संगीत के जादूगर पंचम दा को आज भी म्यूज़िक इंडस्ट्री का गुरु माना जाता है. म्यूज़िक के साथ जो एक्सपेरिमेंट्स उन्होंने किए हैं, वो शायद ही किसे ने किए होंगे. संगीतकार एस. डी बर्मन के बेटे आर.डी.बर्मन यानी पंचम दा संगीत की दुनिया में तब क्रांति ले आए, जब उन्होंने गानों में अलग तरह की आवाज़ें, म्यूज़िकल इंस्ट्रूमेंट्स से अलग-अलग तरह की धुनें बनाने लगे. पंचम दा ने ऐसा संगीत बनाया, जिसकी कल्पना किसेे ने नहीं की थी. महज़ नौ साल की उम्र में अपना पहला गाना कंपोज़ करने वाले पंचम दा ने कैबरे को भी अपने गाने के ज़रिए एक नई पहचान दी. उन्होंने अपने 33 साल के करियर में हर तरह का संगीत बनाया और आज की जेनेरेशन के लिए एक मिसाल कायम कर गए. बॉलीवुड में पंचम दा के नाम से मशहूर आर.डी.बर्मन को यह नाम दिया अशोक कुमार ने, जब उन्होंने बर्मन साहब को संगीत के पांचों सुर सा रे गा मा पा… गाते हुए सुना. उनकी आख़िरी फिल्म रही 1942 ए लव स्टोरी, जिसके गानों ने सबके दिलों को एक बार फिर छू लिया था. 4 जनवरी 1994 को उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया, लेकिन उनके गाने हमेशा उनकी याद दिलाते रहेंगे.

आज पंचम दा की बर्थ एनीवर्सरी है. आइए, उन्हें याद करते हुए उनके कुछ बेहतरीन गाने देखते हैं.

फिल्म- इजाज़त

फिल्म- अलग-अलग

फिल्म- हरे रामा हरे कृष्णा

फिल्म- कटी पतंग

फिल्म- अमर प्रेम

फिल्म- आंधी

फिल्म- हम किसी से कम नहीं

फिल्म- कारवां

फिल्म- शोले

फिल्म- आप की कसम

 

बर्थ एनीवर्सरी: सत्यजीत रे ने दी थी दिल छू लेने वाले पल को फिल्म में लेने की सलाह- अपर्णा सेन (Remembering Satyajit Ray On His 96th Birth Anniversary)

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अभिनेत्री अपर्णा सेन 36 चौरंगी लेन के साथ निर्देशन में कदम रखने वाली थीं और तब उन्हें निर्देशन की सबसे मूल्यवान सलाह मिली थी. भारतीय फिल्म के मील के पत्थर माने जाने वाले सत्यजीत रे ने अपर्णा से कहा था, “इस फिल्म में दर्शकों के दिल को छू लेने वाला कोई पल निर्मित कर पाई हो या नहीं.”

यह वाक्य अपर्णा को नई राह दिखाने वाला साबित हुआ. महान फिल्मकार रे के ये वाक्य अपर्णा के लिए किसी ख़ज़ाने से कम नहीं थे इतना ही नहीं रे ने अपर्णा को लीक से हटकर भारत में अंग्रेजी में फिल्में बनाने के लिए प्रोत्साहित किया.

राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार विजेता अपर्णा सेन ने सत्यजीत रे की पुरानी यादें ताज़ा करते हुए कहा, “मुझे नहीं लगता कि उनके बिना मेरी पहली फिल्म बन पाती. उन्होंने जब मेरी पहली फिल्म 36 चौरंगी लेन की कहानी पढ़ी तो बोले बहुत अच्छा, इसमें दिल को छू लेने वाली बात है. इसे ज़रूर बनाओ.” जब मैंने उनसे पूछा कि कैसे बनाऊं तो उन्होंने कहा था “सबसे पहले, फिल्म बनाने के लिए एक निर्माता खोजो.” अपर्णा ने बताया कि रे ने ही उन्हें निर्माता के लिए उस समय के जाने-माने अभिनेता शशि कपूर से मिलने के लिए कहा था.

अपर्णा ने बताया, “जब मैंने अपनी फिल्म की कहानी के अंग्रेजी में होने को लेकर संशय जाहिर किया तो उन्होंने (रे) मुझे आश्वस्त किया था कि अब भारत में अंग्रेजी में फिल्में बनाने का समय आ गया है. जब मैंने फिल्म पूरी कर ली तब उन्होंने पूछा था कि फिल्म कैसी बनी है? मैंने संदेह के साथ कहा कि इसमें कई गलतियां हैं. लेकिन उन्होंने मुझे बीच में रोककर अपनी दमदार आवाज में कहा निश्चित तौर पर इसमें गलतियां होंगी. अपनी पहली ही फिल्म से तुम क्या उम्मीद करती हो?”

अपर्णा ने बताया कि तब रे ने उनसे पूछा था कि तुम इसमें दर्शकों के दिल को छू लेने वाला कोई पल गढ़ पाई हो या नहीं? अपर्णा ने बताया कि उस दिन मुझे एक सीख मिली. कोई फिल्म तकनीकी रूप से नायाब शॉट की श्रृंखला भर नहीं होती, बल्कि फिल्म उन ख़ास पलों के इर्द-गिर्द सिमटी होती है, जो दर्शकों को छू ले और फिल्म ख़त्म होने के बाद भी याद रह जाए. अपर्णा के लिए रे एक मार्गदर्शक और बाद के दिनों में करीबी मित्र रहे. अपर्णा के पिता चिदानंद दासगुप्ता जाने माने फिल्म समीक्षक थे और रे के दोस्त थे.

अपर्णा ने सत्यजीत रे की फिल्म तीन कन्या के एक हिस्से समाप्ति से 14 वर्ष की आयु में अभिनय की शुरुआत की थी. इस फिल्म से जुड़ी यादें ताज़ा करते हुए अपर्णा बताती हैं, “मुझे याद है रे फिल्म में मेरे किरदार मृन्मोयी के आखिरी दृश्य की शूटिंग कर रहे थे, जिसमें मृन्मोई इस संतोष और विश्वास में दिखती है कि उसका पति उससे प्रेम करता है. रे ने मुझसे अंग्रेजी में कहा अपने अंगूठे का सिरा मुंह में रखो और प्रेम भरी बेहतरीन चीज़ों के बारे में सोचो. यह महान फिल्मकार के एक 14 वर्षीय बच्ची से अभिनय करा लेने का बेहतरीन नमूना था, क्योंकि इतनी छोटी अवस्था में मैं रोमांस और प्रेम के विचार से ही असहज और संकोच से भर जाती या मुझे इस तरह के प्रेम की कल्पना ही नहीं होती.”

एक संवेदनशील निर्देशक के रूप में रे के विकसित होने की व्याख्या करते हुए अपर्णा उन आलोचनाओं को सिरे से खारिज कर देती हैं, जिसमें कहा जाता है कि रे ने विदेशों में भारत की गरीबी को बेचने का काम किया. अपर्णा कहती हैं, “रे एक शहरी शिक्षित मध्यम वर्गीय परिवार से थे, इसके बावजूद उन्होंने अपनी पहली फिल्म पाथेर पांचाली के लिए ग्रामीण इलाके के गरीब परिवार की कहानी को चुना. फिल्म ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर 11 पुरस्कार जीते.
अपर्णा ने कहा, “रे पर भारत की गरीबी को विदेशों में बेचने का आरोप लगा. इसके उलट उन्होंने देश में गरीब तबके को एक पहचान दिलाई और उन्हें पूरे सम्मान के साथ अपनी फिल्मों में जगह दी. अपने दर्शकों के सामने गरीबों को बराबरी के साथ पेश किया और उन्हें अपने ही देश के इन दुर्भाग्यशाली लोगों से परिचित कराया और उनके दुखों और ख़ुशियों के प्रति एहसास जगाया.”