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बर्थ एनीवर्सरी: सत्यजीत रे ने दी थी दिल छू लेने वाले पल को फिल्म में लेने की सलाह- अपर्णा सेन (Remembering Satyajit Ray On His 96th Birth Anniversary)

सत्यजीत रे

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अभिनेत्री अपर्णा सेन 36 चौरंगी लेन के साथ निर्देशन में कदम रखने वाली थीं और तब उन्हें निर्देशन की सबसे मूल्यवान सलाह मिली थी. भारतीय फिल्म के मील के पत्थर माने जाने वाले सत्यजीत रे ने अपर्णा से कहा था, “इस फिल्म में दर्शकों के दिल को छू लेने वाला कोई पल निर्मित कर पाई हो या नहीं.”

यह वाक्य अपर्णा को नई राह दिखाने वाला साबित हुआ. महान फिल्मकार रे के ये वाक्य अपर्णा के लिए किसी ख़ज़ाने से कम नहीं थे इतना ही नहीं रे ने अपर्णा को लीक से हटकर भारत में अंग्रेजी में फिल्में बनाने के लिए प्रोत्साहित किया.

राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार विजेता अपर्णा सेन ने सत्यजीत रे की पुरानी यादें ताज़ा करते हुए कहा, “मुझे नहीं लगता कि उनके बिना मेरी पहली फिल्म बन पाती. उन्होंने जब मेरी पहली फिल्म 36 चौरंगी लेन की कहानी पढ़ी तो बोले बहुत अच्छा, इसमें दिल को छू लेने वाली बात है. इसे ज़रूर बनाओ.” जब मैंने उनसे पूछा कि कैसे बनाऊं तो उन्होंने कहा था “सबसे पहले, फिल्म बनाने के लिए एक निर्माता खोजो.” अपर्णा ने बताया कि रे ने ही उन्हें निर्माता के लिए उस समय के जाने-माने अभिनेता शशि कपूर से मिलने के लिए कहा था.

अपर्णा ने बताया, “जब मैंने अपनी फिल्म की कहानी के अंग्रेजी में होने को लेकर संशय जाहिर किया तो उन्होंने (रे) मुझे आश्वस्त किया था कि अब भारत में अंग्रेजी में फिल्में बनाने का समय आ गया है. जब मैंने फिल्म पूरी कर ली तब उन्होंने पूछा था कि फिल्म कैसी बनी है? मैंने संदेह के साथ कहा कि इसमें कई गलतियां हैं. लेकिन उन्होंने मुझे बीच में रोककर अपनी दमदार आवाज में कहा निश्चित तौर पर इसमें गलतियां होंगी. अपनी पहली ही फिल्म से तुम क्या उम्मीद करती हो?”

अपर्णा ने बताया कि तब रे ने उनसे पूछा था कि तुम इसमें दर्शकों के दिल को छू लेने वाला कोई पल गढ़ पाई हो या नहीं? अपर्णा ने बताया कि उस दिन मुझे एक सीख मिली. कोई फिल्म तकनीकी रूप से नायाब शॉट की श्रृंखला भर नहीं होती, बल्कि फिल्म उन ख़ास पलों के इर्द-गिर्द सिमटी होती है, जो दर्शकों को छू ले और फिल्म ख़त्म होने के बाद भी याद रह जाए. अपर्णा के लिए रे एक मार्गदर्शक और बाद के दिनों में करीबी मित्र रहे. अपर्णा के पिता चिदानंद दासगुप्ता जाने माने फिल्म समीक्षक थे और रे के दोस्त थे.

अपर्णा ने सत्यजीत रे की फिल्म तीन कन्या के एक हिस्से समाप्ति से 14 वर्ष की आयु में अभिनय की शुरुआत की थी. इस फिल्म से जुड़ी यादें ताज़ा करते हुए अपर्णा बताती हैं, “मुझे याद है रे फिल्म में मेरे किरदार मृन्मोयी के आखिरी दृश्य की शूटिंग कर रहे थे, जिसमें मृन्मोई इस संतोष और विश्वास में दिखती है कि उसका पति उससे प्रेम करता है. रे ने मुझसे अंग्रेजी में कहा अपने अंगूठे का सिरा मुंह में रखो और प्रेम भरी बेहतरीन चीज़ों के बारे में सोचो. यह महान फिल्मकार के एक 14 वर्षीय बच्ची से अभिनय करा लेने का बेहतरीन नमूना था, क्योंकि इतनी छोटी अवस्था में मैं रोमांस और प्रेम के विचार से ही असहज और संकोच से भर जाती या मुझे इस तरह के प्रेम की कल्पना ही नहीं होती.”

एक संवेदनशील निर्देशक के रूप में रे के विकसित होने की व्याख्या करते हुए अपर्णा उन आलोचनाओं को सिरे से खारिज कर देती हैं, जिसमें कहा जाता है कि रे ने विदेशों में भारत की गरीबी को बेचने का काम किया. अपर्णा कहती हैं, “रे एक शहरी शिक्षित मध्यम वर्गीय परिवार से थे, इसके बावजूद उन्होंने अपनी पहली फिल्म पाथेर पांचाली के लिए ग्रामीण इलाके के गरीब परिवार की कहानी को चुना. फिल्म ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर 11 पुरस्कार जीते.
अपर्णा ने कहा, “रे पर भारत की गरीबी को विदेशों में बेचने का आरोप लगा. इसके उलट उन्होंने देश में गरीब तबके को एक पहचान दिलाई और उन्हें पूरे सम्मान के साथ अपनी फिल्मों में जगह दी. अपने दर्शकों के सामने गरीबों को बराबरी के साथ पेश किया और उन्हें अपने ही देश के इन दुर्भाग्यशाली लोगों से परिचित कराया और उनके दुखों और ख़ुशियों के प्रति एहसास जगाया.”

गुरु नानक जयंती: गुरु नानक देव के 5 उपदेश, जो बदल देंगे जीवन (Birth Anniversary Of Guru Nanak )

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सिखों के प्रथम गुरु नानक देव का जन्म पंजाब (अब पाकिस्तान) में हुआ था. इनके अनुयायी इन्हें प्यार से गुरु नानक, नानक देवजी, नानकशाह और बाबा नानक के नाम से भी पुकारते हैं. नानक जब 8 साल के थे तभी स्कूल छोड़ दिया था, क्योंकि इनका पढ़ने में मन नहीं लगता था. संसार से विमुक्ति और ईश्‍वर में रुचि ने इन्हें अध्यात्म की ओर मोड़ दिया. आगे चलकर नानक ने सिख धर्म की स्थापना की और नानक से गुरु नानक देव बन गए.

गुरु नानक देव के 5 उपदेश

* गुरु नानक देव ने ही इक ओंकार का नारा दिया. जिसका अर्थ है, ईश्‍वर एक है. वह सभी जगह मौजूद है. हम सबका पिता वही है, इसलिए सबके साथ प्रेमपूर्वक रहना चाहिए.

* किसी भी तरह के लोभ को त्यागकर अपने हाथों से मेहनत कर और न्यायोचित तरीक़ों से धन का अर्जन करना चाहिए.

* कभी भी किसी का हक नहीं छीनना चाहिए, बल्कि मेहनत और ईमानदारी की कमाई में से ज़रूरतमंदों की भी मदद करनी चाहिए.

* स्त्री-जाति का आदर करना चाहिए.

* संसार को जीतने से पहले स्वयं अपने विकारों और बुराइयों पर विजय पाना अति आवश्यक है.

बर्थ एनीवर्सरी: जेमिनी के रंगों को गूगल ने भी सजाया! ( Jamini Roy: Google Placed An Image As Doodle To Honour His Work On His Birth Anniversary)

Jamini Roy

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बर्थ एनीवर्सरी: जेमिनी के रंगों को गूगल ने भी सजाया! (Jamini Roy: Google Placed An Image As Doodle To Honour His Work On His Birth Anniversary)

  • कुछ ख़ास ही होते हैं वो लोग जिनकी भावनाओं के रंग जब कल्पना में सजकर ब्रश का आकार लेकर कैनवास पर उतर आते हैं, तो उनकी हर कृति नायाब ही बनती हैं.
  • ऐसे ही एक शख़्स रहे हैं जेमिनी रॉय, जो अपनी उत्कृष्ट पेंटिंग्स व लेखन के लिए भी काफ़ी मशहूर रह चुके हैं.
  • 11 अप्रैल 1887 को बंगाल में जन्मे जेमिनी 1954 में पद्म भूषण से नवाज़े जा चुके हैं और उनकी मज़बूत शख़्सियत का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि उनकी बर्थ एनीवर्सरी पर गूगल (Google) ने भी अपने डूडल (Doodle) को उनकी यादों के रंगों से सजाकर उन्हें समर्पित किया है.
  • जेमिनी की ख़ासियत यह रही कि उन्होंने भारतीय संस्कृति व परंपराओं को अपनी पेंटिंग में जगह दी.

Jamini Roy

  • वो कालीघाट पेंटिंग्स से काफ़ी प्रभावित थे और उन्होंने पश्‍चिम की जगह देश की स्थानीय परंपराओं और जनजातियों को अपनी पेंटिग्स की प्रेरणा बनाया.
  • उन्हें अपनी पेंटिंग्स के लिए कई इनाम मिले और भारत सरकार ने भी उन्हें पद्म भूषण से नवाज़ा.
  • 24 अप्रैल 1972 को उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया था, लेकिन अपने पीछे वो अपनी यादों के कई उत्कृष्ट रंग छोड़ गए थे, जिन्हें देखकर आज भी मन उन रंगों में खोकर मंत्रमुग्ध हो जाता है.
  • उनकी बर्थ एनीवर्सरी पर उन्हें नमन करते हैं.

बर्थ एनिवर्सरी: फारुख़ शेख़ की 6 दिलचस्प बातें, जो नहीं जानती दुनिया (Birth Anniversary: 6 Interesting Things About farooq sheikh)

फारुख़ शेख़

 

फारुख़ शेख़

चेहरे पर सादगी, आंखों में मासूमियत और लबों पर भोली-सी मुस्कान… एक सीधा-सादा शख़्स, लेकिन व्यक्तित्व उतना ही आकर्षक और अदाकारी का अंदाज़ दिल ही नहीं, रूह को छू जानेवाला. जी हां, ज़िंदगी को ज़िंदादिली से जीना फारुख़ शेख़ को बेहतर तरी़के से आता था. फिल्म नूरी का एक अल्हड़-सा रोमांटिक नौजवान हो या फिर फिल्म ये जवानी है दिवानी का इमोशनल व परिपक्व पिता… उमराव जान फिल्म में निभाया नवाबी अंदाज़ हो या फिल्म साथ-साथ का राह से भटका इंसान… हर रोल में परफेक्ट थे फारुख़ शेख़. इंडस्ट्री में भले ही कम काम किया, लेकिन जो भी किया, उसे आज भी लोग याद करते हैं. गमन से लेकर फिल्म बाज़ार तक के उनके तमाम रोल काबिले तारीफ़ थे. अगर बात फिल्मों से हटकर उनकी शख़्सियत की करें, तो फारुख़ शेख़ उन ख़ुशमिज़ाज इंसानों में से थे, जो अपनी ख़ुशी के साथ-साथ आसपास के माहौल को भी ख़ुश रखने की कोशिश करते थे. फिल्म के सेट से लेकर अपने पड़ोसियों तक के दिल-ओ-जान में फारुख़ साहब कुछ इस क़दर बस गए कि इस दुनिया से रुख़सत होने के बाद भी उन्हें लोग याद करते हैं. फिल्म इंडस्ट्री के इस असाधारण अभिनेता की आज बर्थ एनिवर्सरी है. इस मौ़के पर आइए, जानते हैं फारुख़ साहब से जुड़ी कुछ दिलचस्प बातें.

♣ फारुख़ शेख़ को आदत थी कि वो अपना लंच बॉक्स साथ में लेकर जाते थे. स़िर्फ अपना ही नहीं, कभी-कभी तो वो पूरे क्रू मेंबर्स के लिए घर से बिरयानी बनाकर ले जाते थे. उनकी ये दिलदारी आज भी सबको याद है.

♣ फारुख़ शेख़ ने लॉ की पढ़ाई की थी.

♣ फारुख़ के पिता ख़ुद एक वकील थे और वो चाहते थे कि फारुख़ भी वकील ही बनें.

♣ फारुख़ शेख़ की पहली कमाई 750 रु थी.

♣ फारुख़ शेख़ की आख़िरी फिल्म यंगिस्तान थी.

♣ हर फ्राइडे को फारुख़ साहब काम करने से बचते थे. इसका एक कारण था शुक्रवार की नमाज़ अदा करना. वो बहुत ही धार्मिक प्रवृत्ति के थे.

बर्थ एनिवर्सरी- बचपन से ही आसमान की सैर करना चाहती थीं कल्पना चावला (55th Birth Anniversary of kalpana Chawla)

कल्पना चावला

कल्पना चावला

अंतरिक्ष में जानेवाली भारतीय मूल की पहली महिला बनने का गौरव हासिल करनेवाली कल्पना चावला का जीवन भले ही बहुत छोटा था, मगर इस छोटी सी ज़िंदगी में उन्होंने वो कर दिखाया जो लाखों लड़कियों के लिए प्रेरणास्रोत बन गया. कल्पना चावला की बर्थ एनिवर्सरी के मौ़के पर आइए, आपको बताते हैं उनसे जुड़ी कुछ ख़ास बातें.

* कल्पना चावला का जन्म 17 मार्च 1962 में करनाल में हुआ था.

* करनाल के टैगोर स्कूल से शुरुआती पढ़ाई के बाद कल्पना ने 1982 में चंडीगढ़ इंजीनियरिंग कॉलेज से एरोनॉटिकल इंजीनियरिंग की डिग्री और 1984 से टेक्सास यूनिवर्सिटी से एयरोस्पेस इंजीनियरिंग की डिग्री ली.

* कल्पना जेआरडी टाटा (जो पायलट होने के साथ ही नामी बिज़नेसमेन भी थे) से बहुत प्रभावित और प्रेरित थीं.

* 1988 में उन्होंने नासा के लिए काम करना शुरू किया और यही उनकी ज़िंदगी का टर्निंग पॉइंट था.

* अंतरिक्ष की सैर का उनका सपना पूरा हुआ 1997 में, जब कल्पना चावला ने स्पेस शटल कोलम्बिया से पहली अंतरिक्ष यात्रा की.

* अंतरिक्ष की पहली यात्रा के दौरान उन्होंने अंतरिक्ष मे 372 घंटे बिताए और पृथ्वी की 252 परिक्रमाएं पूरी की.

* कल्पना ने स्पेस के लिए दूसरी उड़ान 2003 में कोलंबिया शटल से भरी और ये उनकी ज़िंदगी की आख़िरी उड़ान साबित हुई. 01 फरवरी 2003 को  कोलम्बिया स्पेस शटल लैंडिंग से पहले ही दुर्घटनाग्रस्त हो गया और कल्पना के साथ बाकी सभी 6 अंतरिक्ष यात्रियों की मृत्यु हो गई.

बर्थ एनीवर्सरी: चुलबुली दिव्या भारती की मौत आज भी है एक रहस्य (Remembering Divya Bharti on her 43rd birth anniversary)

Divya Bharti

Divya Bharti

मासूम चेहरा, चुलबुली अदाएं जी हां, बात हो रही है दिव्या भारती की. केवल 14 हिंदी फिल्मों में अभिनय करके बॉलीवुड और फैंस को अपना दीवाना बनाने वाली दिव्या 19 साल की छोटी-सी उम्र में सभी को अलविदा कह गईं. आज भी जब दिव्या का ज़िक्र होता है, तो उऩका मुस्कुराता हुआ चेहरा सामने आ जाता है. आज दिव्या भारती की 43वीं बर्थ एनीवर्सरी है. दिव्या की मौत कैसे हुई, क्यों हुई ये सवाल आज भी सवाल ही बने हुए हैं. आइए, जानते हैं उनके बारे में कुछ बातें.

  • दिव्या भारती का जन्म 25 फरवरी 1974 में हुआ था. दिव्या भले ही टॉप की एक्ट्रेस रही हों, लेकिन वह खुद कभी भी हिरोइन नहीं बनना चाहती थीं, दिव्या फिल्म इंडस्ट्री में सिर्फ पढ़ाई से बचने के लिए आई थीं। उन्हें तो उस दौर के निर्देशकों के नाम तक नहीं पता थे। शुरुआत में दिव्या को कई फिल्मों में साइन किया गया और ऐन मौके पर निकाल भी दिया गया।
  • 14 साल की उम्र से ही दिव्या को फिल्मों के ऑफर मिलने लगे थे
  • साल 1990 में उन्होंने अपने फिल्मी करियर की शुरुआत की तेलुगु फिल्म बोब्बिली राजा से.
  • बॉलीवुड में फिल्म विश्वात्मा से उन्होंने कदम रखा और अपनी पहली ही फिल्म से वो दर्शकों की फेवरेट बन गईं.
  • 18 साल की उम्र में दिव्या ने निर्देशक और प्रोड्यूसर साजिद नाडियाडवाला से शादी कर ली थी. दोनों की मुलाकात शोला और शबनम के सेट पर हुई थी. शादी के बाद दिव्या ने अपना नाम बदलकर सना नाडियाडवाला रख लिया था.
  • दिव्या के साजिद से शादी के फैसले से दिव्या के पिता ख़ुश नहीं थे. दिव्या ने बिना किसी को बताए कोर्ट में जाकर 10 मई 1992 को साजिद से शादी कर ली थी.
  • पूरा देश तब सन्न रह गया, जब 5 अप्रैल 1993 के दिन रात के 11 बजे के आसपास ये ख़बर आई कि दिव्या भारती की मौत हो गई है. बताया गया था कि दिव्या की मौत उनके फ्लैट की खिड़की से गिर कर हुई थी. इस मामले को दुर्घटना बताकर फाइल बंद कर दी गई.
  • दिव्या की मौत की वजह से कई फिल्में, जिनमें वो काम कर रही थीं, वो अटक गईं. उन्हीं में से एक फिल्म थी लाडला, जिसके कई सीन्स दिव्या के साथ शूट किए जा चुके थे. बाद में इस फिल्म में श्रीदेवी ने काम किया.
  • दिव्या की दो फिल्में रंग और शतरंज उनकी मौत के बाद रिलीज़ हुई थीं.

बर्थ एनिवर्सरीः टेनिस प्लेयर बनना चाहते थें जॉय मुखर्जी (Birth Anniversary of joy mukherjee)

Joy Mukherjee

Joy Mukherjee

सुपरहिट फिल्म लव इन टोक्यो से हिंदी फिल्मों में अपनी अलग छवि बनाने वाले मशहूर अभिनेता जॉय मुखर्जी की बर्थ एनिवर्सरी के मौ़के पर आइए, आपको बताते हैं उनसे जुड़ी कुछ ख़ास बातें.

* मशहूर फिल्मी ख़ानदान से ताल्लुक रखने वाले जॉय मुखर्जी मशहूर निर्माता सशधर मुखर्जी के बेटे थे. अशोक कुमार और किशोर कुमार उनके मामा थे.

* जॉय का इरादा टेनिस खिलाड़ी बनकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्धि पाने का था, लेकिन जब वह बी.ए. की पढ़ाई कर रहे थे तभीे एक दिन उनके पिता ने पूछ लिया कि वह ज़िदगी में करना क्या चाहते हैं? इस सवाल के साथ ही उन्होंने जॉय के सामने फिल्म हम हिंदुस्तानी का कॉन्ट्रैक्ट रख दिया.

* जॉय ने ये सोचकर फिल्म साइन कर ली कि चलो अच्छी पॉकेटमनी मिल जाएगी, मगर जब फिल्म का ट्रायल शो हुआ, तो प्रिव्यू थियेटर से वो भागकर घर आ गए. स्क्रीन पर वो अपनी एक्टिंग और लुक को बर्दाशत नहीं कर पाएं.

* इस फिल्म के बाद उन्हें कई और फिल्मों के ऑफर मिलने लगे. बस फिर क्या था उनका टेनिस प्लेयर बनने का सपना तो धरा का धरा रह ही गया, बी.ए. में भी वो थर्ड क्लास पास हुए.

* धीरे-धीरे फिल्मी दुनिया उन्हें रास आने लगी. उनकी दूसरी फिल्म लव इन शिमला सुपरहिट रही. इस फिल्म में साधना उनकी हीरोइन थी. इस फिल्म की सफ़लता के साथ ही वो सुपरस्टार बन गए और लोगों के बीच साधना का हेयरस्टाइल पॉप्युलर हो गया. साधना की ये पहली हिंदी फिल्म थी.

* इस फिल्म के हिट होने के बाद जॉय को जो भी फिल्में मिली अधिकाश लव स्टोरीज़ ही थीं.

* लव इन शिमला के बाद उन्होंने लव इन टोकियो, शागिर्द, एक मुसाफिर एक हसीना और एक बार मुस्करा दो जैसी कई लव स्टोरी वाली फिल्में की.

* परदे पर अपनी लवर बॉय वाली इमेज से परेशान होकर जॉय मुखर्जी ने डायेरक्शन में हाथ आज़माया, मगर सफ़ल न हो सकें.

* जॉय को फिल्म इंडस्ट्री का ग्लैमर पसंद नहीं आता था, फैन से मिलना, हाथ मिलाना उन्हें ज़रा भी अच्छा नहीं लगता था.

* अपनी को-स्टार के साथ उनके संबंध हमेशा अच्छे रहें. वैजयंतीमाला का वो बहुत आदर करते थे, लेकिन उनके सबसे रिश्ते बहुत प्रोफशनल थे. उनकी दोस्ती फिल्म की शूटिंग शुरू होने से लेकर द एंड तक बनी रहती, मगर इसके कहीं कोई धुआं नहीं उठता था.

* 2012 में 73 साल की उम्र में उनका निधन हो गया.

– कंचन सिंह

Birth Anniversary- देश की पहली महिला शिक्षिका सावित्रीबाई फुले (Birth Anniversary: Savitribai phule india’s first lady teacher)

savitribai phule

भारत की पहली महिला शिक्षिका, समाज सुधारक और मराठी कवयित्री सावित्रीबाई फुले को उनके जन्मदिन पर भावभीनी श्रद्धांजलि.

 

* सावित्रीबाई फुले का जन्म 3 जनवरी 1831 को महाराष्ट्र के सतारा जिले के नायगांव में हुआ था.

* उस समय महिलाओं को पढ़ने की आजादी नहीं थी, लेकिन फुले ने हिम्मत दिखाते हुए न स़िर्फ अपनी पढ़ाई पूरी की, बल्कि 1848 में पहला महिला  स्कूल पुणे में खोला था.

* कहा जाता है कि जब वह स्कूल जाती थीं तो महिला शिक्षा के विरोधी लोग पत्थर मारते थे, उन पर गंदगी फेंक देते थे. महिलाओं का पढ़ना उस  समय पाप माना जाता था. सावित्रीबाई एक साड़ी अपने थैले में लेकर जाती थीं ताकि स्कूल पहुंचकर अपनी गंदी साड़ी बदल सके.

* 9 साल की छोटी उम्र में ही उनकी शादी ज्योतिबा फुले से हो गई.

* उन्होंने अपने पति क्रांतिकारी नेता ज्योतिबा फुले के साथ मिलकर लड़कियों के लिए 18 स्कूल खोले.

* उन्होंने 28 जनवरी 1853 को गर्भवती बलात्कार पीड़ितों के लिए बाल हत्या प्रतिबंधक गृह की स्थापना की.

* सावित्रीबाई ने उन्नीसवीं सदी में छुआ-छूत, सतीप्रथा, बाल-विवाह और विधवा विवाह निषेध जैसी कुरीतियां के विरुद्ध अपने पति के साथ मिलकर    काम किया.

* 10 मार्च 1897 को प्लेग के मरीज़ों की देखभाल करने के दौरान उनकी मृत्यु हो गई.

महान शायर मिर्ज़ा ग़ालिब की बर्थ एनिवर्सरी पर पढ़ें उनकी लाजवाब शायरी… (Remembering Mirza Ghalib)

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महान शायर मिर्ज़ा ग़ालिब (mirza ghalib) की बर्थ एनिवर्सरी पर पढ़ें उनकी लाजवाब शायरी…

mirza ghalib
27 दिसंबर 1796 को आगरा में जन्मे मिर्ज़ा ग़ालिब महान शायर के रूप में आज भी हम सबके बीच अपना एक अलग मुक़ाम बनाए हुए हैं. 19वीं शताब्दी के वो सबसे बड़े शायर माने जाते थे. उन्हें न स़िर्फ उर्दू का एक महान शायर माना जाता है, बल्कि फारसी कविता को भारत में लोकप्रिय करवाने का श्रेय भी उन्हीं को जाता है. 15 फरवरी 1869 को उनका निधन हो गया था. उनके जन्मदिवस पर पढ़ते हैं उनकी कुछ लाजवाब शायरी…

हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है
तुम ही कहो कि ये अंदाज़-ए-गुफ़्तगू क्या है

इश्क़ ने ग़ालिब निकम्मा कर दिया
वरना आदमी तो हम भी बड़े काम के थे

इस सादगी पे कौन न मर जाए ए ख़ुदा
लड़ते हैं और हाथ में तलवार भी नहीं

आया है बे-कसी-ए-इश्क पे रोना ग़ालिब, किसके घर जायेगा सैलाब-ए-बला मेरे बाद

हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले
बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले

इश्क़ पर ज़ोर नहीं ये वो आतिश है ग़ालिब
जो लगाए न लगे और बुझाए न बुझे

दिल-ए-नादां तुझे हुआ क्या है
आख़िर इस दर्द की दवा क्या है

हम को मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन
दिल के ख़ुश रखने को ’ग़ालिब’ ये ख़्याल अच्छा है

इशरत-ए-क़तरा है दरिया में फ़ना हो जाना
दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना

मोहब्बत में नहीं है फ़र्क़ जीने और मरने का
उसी को देख कर जीते हैं जिस काफ़िर पे दम निकले

‘मिसाइल मैन’ कलाम साहब के जन्मदिन पर उनके टॉप 10 सुविचार (TOP 10 Quotes of Abdul Kalam on his Birth Anniversary)

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‘मिसाइल मैन’ के नाम से प्रसिद्ध देश के पूर्व राष्ट्रपति और महान वैज्ञानिक डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम देश के युवाओं के लिए एक प्रेरणास्रोत हैं. सादा जीवन, उच्च विचार को अपनाकर उन्होंने ताउम्र सभी को मेहनत, लगन और आत्मविश्‍वास के साथ आगे बढ़ने का सशक्त संदेश दिया है. सभी के लिए आदर्श कलामजी का जन्म 15 अक्टूबर, 1931 को धनुषकोडी, रामेश्‍वरम, तमिलनाडु में हुआ था.  उनके जन्मदिन पर उन्हें याद करते हुए हम लेकर आए हैं, उनके टॉप 10 सुविचार. मेरी सहेली की तरफ़ से उन्हें कोटि-कोटि नमन!

 

  1. इससे पहले कि सपने सच हों, आपको सपने देखने होंगे.
  2. अगर आप सूर्य की तरह चमकना चाहते हैं, तो पहले आपको सूर्य की तरह जलना भी होगा.
  3. किसी को हरा देना बेहद आसान है, लेकिन किसी को जीतना बेहद मुश्किल.
  4. सफलता की कहानियां मत पढ़ो, उससे आपको केवल एक संदेेश मिलेगा. असफलता की कहानियां पढ़ो, उससे आपको सफल होने के आइडियाज़ मिलेंगे.
  5. आप अपना भविष्य नहीं बदल सकते, पर आप अपनी आदतें बदल सकते हैं और निश्‍चित रूप से आपकी आदतें आपका भविष्य
    बदल देंगी.
    -Kalam (new
  6. मेरे लिए स़िर्फ दो तरह के लोग होते हैं- जवान और अनुभवी लोग.
  7. काला रंग भावनात्मक रूप से बुरा होता है, लेकिन हर ब्लैक बोर्ड विद्यार्थियों का जीवन रौशन करता है.
  8. अपनी पहली सफलता के बाद विश्राम मत करो, क्योंकि अगर आप दूसरी बार असफल हो गए तो बहुत से होंठ यह कहने के इंतज़ार में होंगे कि आपकी पहली सफलता केवल एक तुक्का थी.
  9. जीवन में कठिनाइयां हमें बर्बाद करने नहीं आती हैं, बल्कि ये हमारे छुपे हुए सामर्थ्य और शक्तियों को बाहर निकालने में हमारी मदद करती हैं. कठिनाइयों को यह जान लेने दो कि आप उससे भी ज़्यादा कठिन हो.
  10. सभी लोगों में समान योग्यता नहीं होती, पर सभी लोगों को अपनी योग्यता को विकसित करने का समान अवसर ज़रूर मिलता है.

– अनीता सिंह