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क्या आप भी जून बेबी हैं ? (Are You A June Baby?)

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अगर आपका जन्म जून में हुआ है, तो जानें अपनी खूबियों को…

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  • अगर आप हैं जून बेबी तो आप बातूनी, खुशमिज़ाज और स्टाइलिश भी हैं.
  • इसके अलावा आप रोमांस में भी पीछे नहीं.
  • आप बड़े दिलवाले हैं और दयालु भी.
  • तो अपनी इन खूबियों पर नाज़ करें और खुद पर प्राउड करें क्योंकि आप किसी से कम नहीं.

 

अफसर बन ग़ुलामी करने की बजाय नेताजी ने बनाई आज़ाद हिंद फौज (120th Birth anniversary of netaji subhash chandra bose)

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आज़ाद हिंद फौज बनाकर पूरी दुनिया को अपनी साहस और बल का परिचय देनेवाले नेताजी सुभाष चंद्र बोस को उनकी जयंती पर मेरी सहेली की ओर से शत-शत नमन! पिता चाहते थे कि बेटा अफसर बने, लेकिन नेताजी को अंगे्रज़ों की ग़ुलामी करना मंज़ूर नहीं था, इसीलिए बना ली अपनी ही सेना और नाम रखा आज़ाद हिंद फौज.

नेताजी सुभाष चंद्र बोस के पिता बेटे को आईसीएस (भारतीय सिविल सेवा) का अफसर बनाना चाहते थे. इसकी तैयारी के लिए सुभाष लंदन चले गए. 1920 में सुभाष ने आईसीएस की परीक्षा में चौथा स्थान प्राप्त किया, लेकिन अंग्रेज़ों की ग़ुलामी करना उन्हें मंज़ूर नहीं था और उन्होंने आज़ाद हिंद फौज का गठन कर अंग्रेज़ों से लोहा लेने की ठान ली.

स्वतंत्रता संग्राम के अग्रणी नेता सुभाष का जन्म 23 जनवरी, 1897 को ओडिशा के कटक में जानकीनाथ बोस और प्रभावती देवी के यहां हुआ था. उन्होंने तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा का नारा दिया, जो भारतीय युवाओं में एक नया जोश भर गया. सुभाष के पिता प्रतिष्ठित सरकारी वकील थे. वह बंगाल विधानसभा के सदस्य भी रह चुके हैं और ब्रिटिश सरकार ने उन्हें रायबहादुर के किताब से भी नवाज़ा था.

अंग्रेज़ी सरकार के ख़िलाफ़ आंदोलन चलाने के कारण सुभाष को कुल 11 बार जेल जाना पड़ा. सबसे पहले उन्हें 16 जुलाई, 1921 को छह महीने जेल में रहने की सज़ा सुनाई गई थी. 1930 में जब सुभाष ने जेल से ही चुनाव लड़ा और वह कोलकाता के महापौर चुने गए, जिसके चलते अंग्रेज़ों को उन्हें जेल से रिहा करना पड़ा.

द्वितीय विश्‍वयुद्ध के दौरान जापान की हार के बाद सुभाष ने रूस से सहायता मांगने का विचार किया. 18 अगस्त 1945 को जब वह मंचूरिया की ओर जा रहे थे, तभी उनका विमान लापता हो गया और वह फिर कभी नजर नहीं आए. 23 अगस्त, 1945 को टोकियो रेडियो ने बताया कि सैगोन आते व़क्त 18 अगस्त, 1945 को एक विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया, जिसमें नेताजी गंभीर रूप से जल गए और ताइहोकू सैन्य अस्पताल में उन्होेंने दम तोड़ दिया. हालांकि इस घटना की पूरी तरह से कभी पुष्टि नहीं हो पाई और उसका रहस्य अभी तक बरकरार है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नेताजी को ट्विटर पर श्रद्धांजलि दी.

रवि शंकर प्रसाद ने भी ट्विटर पर सुभाष जी को नमन किया.

चंद्र बाबू नायडू ने भी नेताजी को ट्विटर पर श्रद्धांजलि दी.

नेताजी अमर हैं, उनकी कीर्ति अमर है. उन्होेंने देश के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया. ऐसे महान देशभक्त को शत-शत नमन!

महाश्वेता देवी: जिन्हें पाकर कलम भी धन्य हो गई (Birth Anniversary: mahasweta Devi was great writer and a social worker)

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14 जनवरी 1926 में अविभाजित भारत के ढाका में एक बच्ची का जन्म हुआ. तब किसे पता था कि आगे चलकर वो नन्हीं परी महाश्‍वेता देवी बन जाएगी, जिनकी रचनाएं समाज के लिए आईने का काम करेंगी. इस महान लेखिका और समाज सेविका को मेरी सहेली की ओर से शत-शत नमन. महाश्‍वेता देवी पहले एक स्कूल में पढ़ाती थीं, लेकिन उन्हें लगा कि इससे काम नहीं चलेगा, इसलिए आगे चलकर उन्होंने पढ़ाना छोड़ दिया और अपना पूरा टाइम लेखन और समाज सेवा में लगा दिया.

महाश्वेता देवी की कलम की बेबाकी ने उन्हें समाज के एक ऐसे हिस्से का मसीहा बना दिया, जिनका अस्तित्व न के बराबर रहा. अपनी कलम से उन्होंने ग़रीबों के स्थिति का रेखाचित्र खींचा और बड़े तबके तक पहुंचाया. महाश्‍वेता को लोग मां कहकर बुलाते थे. उनकी कई ऐसी रचनाएं थीं, जिन्होंने समाज को ये सोचने पर मजबूर कर दिया. अपने अंतिम दिनों में महाश्‍वेता कई बीमारियों से परेशान थीं और अंत में जुलाई के महीने में साल 2016 में उन्होंने इस संसार को अलविदा कह दिया. भले ही वो अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनकी कृतियां पग-पग पर लोगों को राह दिखाती रहेंगी.

इनकी कई रचनाओं पर फ़िल्म भी बनाई गई. इनके उपन्यास रुदाली पर कल्पना लाज़मी ने रुदाली तथा हज़ार चौरासी की मां पर इसी नाम से 1998 में फिल्मकार गोविन्द निहलानी ने फ़िल्म बनाई.

महाश्वेता देवी ने आदिवासियों के लिए बहुत काम किया. इसमें बिहार, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और गुजरात के आदिवासी आते थे. उन्होंने किसानों की ज़मीन को बड़े लोगों के हाथ बेचने का विरोध किया. कलम के साथ-साथ वो ख़ुद भी समाज के हर तपके लिए काम करती रहीं.

महाश्वेता देवी को 1979 में साहित्य अकादमी पुरस्कार, 1986 में पद्मश्री, 1997 में ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया. ज्ञानपीठ पुरस्कार इन्हें नेल्सन मंडेला के हाथों दिया गया. इस पुरस्कार में मिले 5 लाख रुपये इन्होंने बंगाल के पुरुलिया आदिवासी समिति को दे दिया था. उनकी यही आदत उन्हें लोगों में अमर कर गई.

श्वेता सिंह 

बर्थ एनिवर्सरी- महज़ 21 साल में तैमूर के दादा मंसूर बने थे टीम के कैप्टन (Birth Anniversary of Mansoor Ali Khan Pataudi)

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क्रिकेट के नवाब मंसूर अली ख़ान पटौदी आज के दिन भोपाल मेें जन्मे थे. भारतीय क्रिकेट में जब तक खेले, बड़ा मुकाम हासिल किया. नवाब के ख़ून में ही क्रिकेट था. क्रिकेट उन्हें अपने पिता से विरासत में मिला. इस ख़ास मौ़के पर आइए, जानते हैं पटौदी से जुड़ी कुछ दिलचस्प बातें.

* पटौदी के नाम सबसे युवा कप्तान होने का रिकॉर्ड है.

* महज़ 21 साल की उम्र में वो भारतीय टीम के कप्तान बन गए थे.

* भारत की ओर से वो 46 टेस्ट मैच खेले, जिसमें से 40 में वो कप्तान थे.

* जब पटौदी अपना 11वां जन्मदिन मना रहे थे, उसी दिन उनके पिता की मृत्यु हो गई थी.

* 1967 में पटौदी की कप्तानी में भारत ने न्यूज़ीलैंड के ख़िलाफ़ एशिया के बाहर अपना पहला टेस्ट मैच जीता था.

* 1 जुलाई 1961 को एक कार एक्सीडेंट में नवाब पटौदी की राइट आंख ख़राब हो गई.

* आंख ख़राब होने के बाद अपना पहला मैच खेलते हुए पटौदी ने अपनी टीम के लिए सबसे ज़्यादा 70 रन बनाए थे.

* उन्हें टाइगर के नाम से भी बुलाया जाता था.

श्वेता सिंह