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यौन शोषण: लड़के भी हैं उतने ही अनसेफ… (Child Abuse: Myths And Facts About Sexual Abuse Of Boys)

Child Abuse

यौन शोषण: लड़के भी हैं उतने ही अनसेफ… (Child Abuse: Myths And Facts About Sexual Abuse Of Boys)

एक सर्वे के मुताबिक़ लगभग 71% पुरुषों ने यह स्वीकारा है कि बचपन में वे यौन शोषण के शिकार हो चुके हैं.

71%, जी हां, आप सही पढ़ रहे हैं… यह आंकड़ा ज़ेहन को हिला देनेवाला है. अविश्‍वसनीय लग रहा है न, लेकिन यह सच है.

लड़कों (Boys) का बलात्कार (Rape) नहीं हो सकता… हमारे देश में ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में कुछ ऐसी ही सोच थी कुछ समय पहले तक… दरअसल, यह एक माइंडसेट है, जो समय के साथ भी अब तक बदला नहीं है. हमें लगता है यौन शोषण (Sexual Abuse) स़िर्फ लड़कियों (Girls) का ही होता है, क्योंकि हम यह मानने को तैयार ही नहीं कि लड़के भी होते हैं शोषण के शिकार.

भारत में अब भी है चुप्पी!

–  हमारे देश में वैसे भी सेक्स, बलात्कार, शोषण आदि विषयों पर बात नहीं होती, तो लड़कों के यौन शोषण पर विचार करने तक की बात यहां कोई कैसे सोच सकता है?

–   लेकिन चूंकि अब इस विषय पर भी बात होने लगी है, तो भारत में भी कुछ वर्ग इस पर बात करने से हिचकिचाते नहीं हैं और यह ज़रूरी भी है.

–   भारत सरकार द्वारा जो रिसर्च किया गया था, उसमें भी चौंकानेवाला आंकड़ा ही सामने आया था कि 53.2% बच्चों ने सेक्सुअल एब्यूज़ की बात बताई थी, जिनमें से 52.9% लड़के थे.

–   चाइल्ड एब्यूज़ दरसअल जेंडर न्यूट्रल है. यह बात मेनका गांधी (महिला-बाल कल्याण मंत्री) ने कही थी और यह सच भी है.

–   दरअसल, चाइल्ड एब्यूज़ के शिकार लड़कों पर कभी कोई स्टडी हुई ही नहीं, क्योंकि न तो इस तरफ़ किसी का ध्यान गया और न ही किसी ने इसकी ज़रूरत समझी.

–   जो 71% पुरुष यौन शोषण के शिकार हुए थे, उनमें से 84.9% ने इस बारे में कभी भी किसी को कुछ नहीं बताया. क्योंकि इसकी मुख्य वजह थी- शर्म. इसके अलावा डर, कंफ्यूज़न और अपराधबोध की भावना भी उनके मन में थी.

–   दरअसल, हमारे समाज में यह मान्यता है कि लड़कों का रेप नहीं हो सकता. यही वजह है कि लड़के अपने यौन शोषण के बारे में कभी बात ही नहीं करते, क्योंकि उनका भरोसा कौन करेगा?

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व्यक्तित्व पर असर डालता है यह शोषण!

–   बचपन में इस तरह के शारीरिक शोषण का असर पूरे मन-मस्तिष्क पर पड़ता है.

–   सबसे पहले तो बच्चा यही सोचता है कि इससे उसे अकेले ही जूझना है.

–  चूंकि वो पुरुष है, तो उसे स्ट्रॉन्ग बनना है, इसलिए उसे अपने शोषण को स्वीकारना होगा.

–   इसका असर उनके इमोशनल व्यवहार पर भी पड़ता है.

–   वो जल्दी से किसी पर भरोसा नहीं करते. एक डर की भावना मन में बैठ जाती है. कॉन्फिडेंस पर असर पड़ता है.

–   उनमें एक तरह का अपराधबोध भी घर कर जाता है कि उन्होंने कुछ ग़लत किया है, ख़ासतौर से तब जब वो शोषण के दौरान इजैक्यूलेट करते हैं.

–   उन्हें यह भी लगता है कि लोग उनकी बातों पर भरोसा नहीं करेंगे यदि उन्होंने किसी से शेयर किया भी तो.

–   वो दोस्तों से कतराने लगते हैं. अकेलापन उन्हें बेहतर लगता है.

–   उन जगहों पर जाने से डरते हैं, जहां शोषण की यादें जुड़ी हों.

पैरेंट्स को रहना होगा अलर्ट

–   बच्चे के व्यवहार में कुछ अलग-सा नज़र आने लगे, तो उससे बात करें.

–   यदि बच्चा न बताए, तो दूसरे तरीक़ों से जानने की कोशिश करें, क्योंकि हो सकता है आपका बच्चा उन तकलीफ़ों से जूझ रहा हो, जिसकी आप कल्पना तक नहीं कर सकते.

–   कई स्कूलों में लड़कों के यौन शोषण की घटनाएं बीते सालों में प्रकाश में आ चुकी हैं. ऐसे में पैरेंट्स को सतर्क रहना चाहिए.

–   बेटी के साथ-साथ बेटे की पूरी सुरक्षा की ओर भी ध्यान देना होगा.

–   उन्हें सेक्स एजुकेशन दें और उनमें यह कॉन्फिडेंस जगाएं कि वो खुलकर आपसे हर बात शेयर कर सकें.

–   उन्हें सही-ग़लत, सेफ-अनसेफ टच के बारे में बताएं.

–   लड़का है, इसलिए उसकी कुछ बातों को इग्नोर न करें.

–  उनके छोटे-छोटे इशारों को समझने का प्रयास करें. हो सकता है उनके पीछे कोई बड़ी बात हो.

कैसे हैंडल करें शोषण के शिकार बच्चों को?

–   बेहतर होगा उनसे बहुत ज़्यादा डिटेल्स न पूछें कि कब, कहां, कैसे हुआ…

–   उन्हें डांटें नहीं कि तुमने पहले क्यों नहीं बताया, बता देते तो तुम्हें बचा लेते… ऐसी बातों से उनके मन में गिल्ट आएगा.

–   उन्हें सपोर्ट करें, लेकिन ओवर पॉज़िटिव वाक्य न बोलें, जैसे- समय के साथ-साथ बेहतर हो जाएगा सब कुछ और ऐसा होता है ज़िंदगी में… या फिर इसके बारे में तुम्हें बुरा महसूस करने या अपराधी महसूस करने की कोई ज़रूरत नहीं है, क्योंकि इस तरह के वाक्य उन्हें यह महसूस करवाएंगे कि उनके साथ बहुत ज़्यादा बुरा हुआ है.

–  बेहतर होगा आप सिंपल तरी़के से कहें कि हमें तुम पर पूरा भरोसा है और हम हैं तुम्हारे साथ हमेशा… यह उन्हें कॉन्फिडेंस देगा.

–   काउंसलर की मदद भी ज़रूर लें और उन्हें एक सामान्य माहौल देने की कोशिश करें.

– कोशिश हमारी यही होनी चाहिए कि शुरुआत में ही हमें पता चल जाए या फिर बच्चों को यह सब झेलना ही न पड़े, इसके लिए बच्चों को ही ट्रेनिंग देनी होगी, जो हर स्कूल में अनिवार्य होनी चाहिए.

– साथ ही बच्चों पर भरोसा करना होगा कि वो अगर कुछ कह रहे हैं, तो उसके पीछे कोई वजह ज़रूर होगी. बेहतर होगा उनकी बातों को भी गंभीरता से लिया जाए और लड़कों को यौन शोषण का डर नहीं, यह सोचकर उनकी अनदेखी या उनकी ओर से लापरवाह रहना छोड़ना होगा.

– गीता शर्मा

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रिश्तों में तय करें बेटों की भी ज़िम्मेदारियां (How To Make Your Son More Responsible)

ज़िम्मेदारियां

बेहिसाब ख़ामोशियां… चंद तन्हाइयां… कुछ दबी सिसकियां, तो कुछ थकी-हारी परछाइयां… बहुत कुछ कहने को था, पर लबों में ताक़त नहीं थी… मगर अब व़क्त ने लफ़्ज़ों को अपने दायरे तोड़ने की इजाज़त जो दी, तो कुछ वर्जनाएं टूटने लगीं… दबी सिसकियों को बोल मिले, तो ख़ामोशियां बोल उठीं, तन्हाइयां काफ़ूर हुईं, तो परछाइयां खुले आसमान में उड़ने का शौक़ भी रखने लगीं… बराबरी का हक़ अब कुछ-कुछ मिलने लगा है… बराबरी का एहसास अब दिल में भी पलने लगा है…

ज़िम्मेदारियां

हम भले ही लिंग के आधार पर भेदभाव को नकारने की बातें करते हैं, लेकिन हमारे व्यवहार में, घरों में और रिश्तों में वो भेदभाव अब भी बना हुआ है. यही वजह है कि रिश्तों में हम बेटियों की ज़िम्मेदारियां तो तय कर देते हैं, लेकिन बेटों को उनकी हदें और ज़िम्मेदारियां कभी बताते ही नहीं. चूंकि अब समाज बदल रहा है, तो बेहतर होगा कि हम भी अपनी सोच का दायरा बढ़ा लें और रिश्तों में बेटों को भी ज़िम्मेदारी का एहसास कराएं.

घर के काम की ज़िम्मेदारियां
– अक्सर भारतीय परिवारों में घरेलू काम की ज़िम्मेदारियां स़िर्फ बेटियों पर ही डाली जाती हैं. बचपन से ङ्गपराये घर जाना हैफ की सोच के दायरे में ही बेटियों की परवरिश की जाती है.
– यही वजह है कि घर के काम बेटों को सिखाए ही नहीं जाते और उनका यह ज़ेहन ही नहीं बन पाता कि उन्हें भी घरेलू काम आने चाहिए.
– चाहे बेटी हो या बेटा- दोनों को ही हर काम की ज़िम्मेदारी दें.
– बच्चों के मन में लिंग के आधार पर काम के भेद की भावना कभी न जगाएं, वरना अक्सर हम देखते हैं कि घर में भले ही भाई अपनी बहन से छोटा हो या बड़ा- वो बहन से अपने भी काम उसी रुआब से करवाता है, जैसा आप अपनी बेटी से करवाते हैं.
– पानी लेना, चाय बनाना, अपने खाने की प्लेट ख़ुद उठाकर रखना, अपना सामान समेटकर सली़के से रखना आदि काम बेटों को भी ज़रूर सिखाएं.

बड़ों का आदर-सम्मान करना
– कोई रिश्तेदार या दोस्त घर पर आ जाए, तो बेटी के साथ-साथ बेटे को भी यह ज़रूर बताएं कि बड़ों के सामने सलीक़ा कितना
ज़रूरी है.
– चाहे बात करने का तरीक़ा हो या हंसने-बोलने का, दूसरों के सामने बच्चे ही पैरेंट्स की परवरिश का प्रतिबिंब होते हैं. ऐसे में बहुत ज़रूरी है कि बेटों को भी वही संस्कार दें, जो बेटियों को हर बात पर दिए जाते हैं.
– लड़कियों से कैसे बात करनी चाहिए, किस तरह से उनकी ज़िम्मेदारी लेनी चाहिए, उन्हें किस तरह से सम्मान देना चाहिए… आदि बातों की भी शिक्षा ज़रूरी है.
– घर व बाहर भी बुज़ुर्गों से कैसे पेश आना चाहिए, अगर उनके पास कोई भारी सामान वगैरह है, तो आगे बढ़कर उठा लेना चाहिए, उनके साथ व़क्त बिताना, उनसे बातें शेयर करना, उनका हाथ थामकर सहारा देना आदि व्यवहार बेटों को संवेदनशील बनाने में सहायता करेगा और वो अपनी ज़िम्मेदारियां बेहतर तरी़के से समझ व निभा पाएंगे.

ज़िम्मेदारियां

अनुशासन ज़रूरी है
– तुम सुबह जल्दी उठने की आदत डालो, तुम्हें शादी के बाद देर तक सोने को नहीं मिलेगा… टीवी देखना कम करो और खाना बनाने में मदद करो, कुछ अच्छा सीखोगी, तो ससुराल में काम ही आएगा… शाम को देर तक घर से बाहर रहना लड़कियों के लिए ठीक नहीं… आदि… इस तरह की बातें अक्सर मांएं अपनी बेटियों को सिखाती रहती हैं, लेकिन क्या कभी बेटों को अनुशासन सिखाने पर इतना ज़ोर दिया जाता है?
– घर से बाहर रात को कितने बजे तक रहना है या सुबह सोकर कितनी जल्दी उठना है, ये तमाम बातें अनुशासन के दायरे में आती हैं और अनुशासन सबके लिए समान ही होना चाहिए.
– खाना बनाना हो या घर की साफ़-सफ़ाई, बेटों को कभी भी इन कामों के दायरे में लाया ही नहीं जाता, लेकिन यदि कभी ऐसी नौबत आ जाए कि उन्हें अकेले रहना पड़े या अपना काम ख़ुद करना पड़े, तो बेहतर होगा कि उन्हें इस मामले में भी बेटियों की तरह ही आत्मनिर्भर बनाया जाए. बेसिक घरेलू काम घर में सभी को आने चाहिए, इसमें बेटा या बेटी को आधार बनाकर एक को सारे काम सिखा देना और दूसरे को पूरी छूट दे देना ग़लत है.

ज़िम्मेदारियां

शादी से पहले की सीख
– शादी से पहले बेटियों को बहुत-सी हिदायतों के साथ विदा किया जाता है, लेकिन क्या कभी बेटों को भी हिदायतें दी जाती हैं कि शादी के बाद उसे कैसा व्यवहार करना चाहिए? यक़ीनन नहीं.
– बेहतर होगा कि बेटों को भी एडजेस्टमेंट करना सिखाया जाए.
– नए रिश्तों से जुड़ने के बाद की ज़िम्मेदारियां समझाई जाएं.
– किस तरह से नई-नवेली दुल्हन को सपोर्ट करना है, उसके परिवार से किस तरह से जुड़ना है आदि बातें बेटों को भी ज़रूर बताई जानी चाहिए.
– हालांकि भारतीय पैरेंट्स से इस तरह की उम्मीद न के बराबर ही होती है कि वो इस तरह से अपने बेटे को समझाएं, लेकिन आज समय बदल रहा है, तो लोगों की सोच में भी कुछ बदलाव आया है.
– आज की जनरेशन काफ़ी बदल गई है. फिर भी यदि पैरेंट्स नहीं समझा सकते, तो प्री मैरिज काउंसलिंग के लिए ज़रूर काउंसलर के पास जाना चाहिए.

शादी के बाद
– अक्सर शादी के बाद बहुओं को हर कोई नई-नई सीख व सलाहेें देता पाया गया है, लेकिन बेटों को शायद ही कभी कोई ज़िम्मेदारियों की बातें समझाता होगा.
– शादी स़िर्फ लड़की ने लड़के से नहीं की होती, बल्कि यह दोनों तरफ़ का रिश्ता होता है, तो ज़िम्मेदारियां भी समान होनी चाहिए.
– बेटों को यह महसूस कराना ज़रूरी है कि स़िर्फ बहू ही नए माहौल में एडजेस्ट नहीं करेगी, बल्कि उन्हें भी पत्नी के अनुसार ख़ुद को ढालने का प्रयत्न करना होगा, पत्नी को हर काम में सहयोग करना होगा और पत्नी की हर संभव सहायता करनी होगी, ताकि वो बेहतर महसूस कर सके.
– इसके अलावा जितने भी रीति-रिवाज़ व परंपराएं हैं, उन्हें निभाने की ज़िम्मेदारी भी दोनों की होनी चाहिए.
– अक्सर शादी के बाद ससुरालपक्ष और मायके, दोनों को निभाने की ज़िम्मेदारी लड़की पर ही छोड़ दी जाती है. जबकि कोई भी मौक़ा या अवसर हो, तो ज़रूरी है लड़के भी उसमें उतनी ही ज़िम्मेदारी के साथ शामिल हों, जितना लड़कियों से उम्मीद की जाती है.
– इसके लिए बेहतर होगा कि जब भी घर में या किसी रिश्तेदार के यहां भी कोई अवसर पड़े, जैसे- किसी का बर्थडे या शादी, तो बेटों को उनके काम व ज़िम्मेदारी की लिस्ट थमा दी जानी चाहिए कि ये काम तुम्हारे ही ज़िम्मे हैं. इसी तरह घर के हर सदस्य को उसका काम बांट देना चाहिए. इससे वो ज़िम्मेदारी से न तो पीछा छुड़ा पाएंगे और न ही भाग पाएंगे.

ज़िम्मेदारियां

बच्चों की ज़िम्मेदारियां
– बच्चा दोनों की ही ज़िम्मेदारी होता है, लेकिन इसे निभाने का ज़िम्मा अनकहे ही मांओं पर आ जाता है.
– बच्चे से जुड़ी हर छोटी-बड़ी चीज़ के लिए घर के सदस्यों से लेकर ख़ुद पति भी अपनी पत्नी से ही जवाब मांगते हैं.
– लेकिन अब बेटों को यह एहसास कराना ज़रूरी है कि बच्चों के प्रति वो भी उतने ही जवाबदेह हैं, जितना वो अपनी पत्नी को समझते हैं.
– पैरेंट्स मीटिंग हो या बच्चों को होमवर्क करवाना हो, माता-पिता को ज़िम्मेदारी बांटनी होगी. लेकिन अक्सर हमारे परिवारों में बेटे शुरू से अपने घरों में अपनी मम्मी को ये तमाम काम करते देखते आए हैं, लेकिन आज के जो पैरेंट्स हैं, वो अपने परिवार से इसकी शुरुआत कर सकते हैं, ताकि उनके बेटों को आगे चलकर रिश्तों में ज़िम्मेदारियों का एहसास हो सके.

करियर की ज़िम्मेदारी
– आजकल वर्किंग कपल्स का कल्चर बढ़ता जा रहा है, लेकिन जब भी कॉम्प्रोमाइज़ करने की बारी आती है, तो यह समझ लिया जाता है कि पत्नी ही करेगी, क्योंकि बेटों को तो कॉम्प्रोमाइज़ करना कभी सिखाया ही नहीं जाता.
– आप ऐसा न करें. बेहतर होगा कि मिल-बांटकर ज़िम्मेदारी निभाना सिखाएं. बांटने, शेयर करने व सपोर्ट करने का जज़्बा बेटों में भी पैदा करें. बचपन में अपनी बहन के लिए वे ये सब करेंगे, तो आगे चलकर महिलाओं के प्रति सम्मान का भाव बढ़ेगा और वो बेहतर पति साबित होंगे.
– घर में बहन न भी हो, तो भी महिलाओं के प्रति सम्मान व समान भाव रखने की भावना उनमें ज़रूर होनी चाहिए और ऐसा तभी होगा, जब उनकी परवरिश इस तरह से की जाएगी.
– अगर दोनों ही थके-हारे घर आते हैं, तो काम भी मिलकर करना होगा, वरना पत्नी आते ही घर के काम में जुट जाती है और पति महाशय फ्रेश होकर टीवी के सामने चाय की चुस्कियां लेते हुए पसर जाते हैं.

– गीता शर्मा