breast cancer

ब्रेस्ट कैंसर यानी स्तन कैंसर भारतीय महिलाओं में कैंसर के कारण होनेवाली मौतों के मुख्य कारणों में से एक है. यह महिलाओं को प्रभावित करनेवाला मुख्य कैंसर भी हैं. आइए, इसके बारे में विस्तार से जानें.

एक अध्ययन के मुताबिक़ साल 2016 में देश में तक़रीबन 1,18,000 मामले पाए गए और 5,20,000 से अधिक मामले पहले से ही दर्ज थे. प्रतिष्ठित पत्रिका नेचर्स में प्रकाशित परिणाम इसकी वास्तविकता पर रोशनी डालते हैं. ग्लोबोकन 2018 आंकड़ों के मुताबिक़ भारत में दोनों लिंगों में कैंसर के कुल 11,57,294 नए मामले थे, जबकि स्तन कैंसर के मामलों के लिए पांच साल की प्रसार दर 4,05,456 थी. आसान भाषा में कहें, तो स्तन कैंसर भारतीय महिलाओं में कैंसर का सबसे बड़ा प्रकार है. हालांकि इस कैंसर का इलाज संभव है, लेकिन इसके बावजूद हर साल इससे बड़ी संख्या में मौतें होती हैं. हर साल अक्टूबर माह स्तन कैंसर जागरूकता माह के रूप में मनाया जाता है. इसके बारे में एसआरएल डायग्नोस्टिक्स की डॉ. सिमी भाटिया ने महत्वपूर्ण जानकारियां दीं.

Breast Cancer

स्तन कैंसर के लक्षण
स्तन कैंसर तब होता है, जब स्तनों के भीतर कोशिकाएं अनियंत्रित रूप से बढ़ने लगती हैं. ऐसा आमतौर पर दूध बनानेवाली ग्लैण्ड्स यानी लोब्यूल्स या डक्ट में होता है, जो निप्पल तक दूध लेकर जाती हैं. रक्त या लिम्फ के ज़रिए कैंसर स्तनों के बाहर भी फैल सकता है.
अक्सर लंबे समय तक इसका पता नहीं चलता, ख़ासतौर पर भारत में जहां महिलाएं इसके बारे में खुलकर बात नहीं कर पातीं. स्तन कैंसर में स्तनों में गांठ बन जाती है या स्तन के शेप या साइज़ में बदलाव आ जाता है. कुछ अन्य लक्षण हैं, स्तन या बगल में नई गांठ बनना, साइज़ बढ़ना या सूजन, खुजली, स्तनों की त्वचा की परतें उतरना, स्तन के किसी हिस्से ख़ासतौर पर निप्पल में दर्द.

ख़ुद जांच करें
भारत में महिलाएं अक्सर अपने स्तनों में होनेवाली गांठ, इनके शेप या साइज़ के बारे में बात नहीं करना चाहती. इस बारे में वे अपने पति या यहां तक कि परिवार की अन्य महिलाओं से भी बात नहीं कर पातीं. यहां तक कि समाज के ज़्यादातर वर्गों की महिलाएं अपने स्तनों में होनेवाले बदलाव को समझ हीं नहीं पातीं. इसलिए यह बेहद ज़रूरी है कि महिलाएं अपने स्तनों की ख़ुद जांच करना सीखें और कम-से-कम महीने में एक बार ऐसा नियमित रूप से करें.

  • माहवारी की उम्र में महिलाएं पीरियड्स के कुछ दिनों बाद अपने स्तनों की जांच कर सकती हैं. जब स्तन अपनी सही शेप में होते हैं. जिन महिलाओं के पीरियड्स बंद हो चुके हैं, वे महीने का एक दिन इसके लिए चुन सकती हैं.
  • यह जानना ज़रूरी है कि स्तनों का क्षेत्र आपके बगलों के पास से लेकर पसलियों तक फैला होता है. निप्पल के आसपास, बगलों के आसपास किसी भी तरह की गांठ की जांच करें. देखें कि कोई असामान्य गांठ तो नहीं बन रही है.
  • अपनी जांच का रिकाॅर्ड रखें. इससे अगर आपके स्तन के किसी हिस्से में बदलाव आता है, तो आप समझ पाएंगी.

जागरुकता ज़रूरी
अगर आपको स्तनों में कोई बदलाव या गांठ महसूस हो, तो याद रखें कि हर गांठ कैंसर की नहीं होती. वास्तव में दस में से आठ गांठें कैंसर की नहीं होती हैं. हालांकि गांठ कैंसर की है या नहीं, इसका पता लगाने के लिए डाॅक्टर को बायोप्सी करनी होती है. स्तन कैंसर के बढ़ते मामलों और इसके कारण बढ़ती मृत्यु दर को देखते हुए स्तन कैंसर के बारे में जागरुकता फैलाना बेहद ज़रूरी है. पुरुषों और महिलाओं दोनों को इसे समझना चाहिए, ताकि समय पर निदान कर उपचार किया जा सके.

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समय पर डायग्नोसिस
स्तन कैंसर को पहचानने में उसके लक्षण महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. इस बीमारी का इलाज पूरी तरह संभव है, लेकिन इसके डायग्नोसिस में देरी से मृत्यु की संभावना बढ़ जाती है, इसलिए जैसे ही आपको शक हो, तुरंत डाॅक्टर से संपर्क करें.
डायग्नोसिस का एक तरीक़ा है मैमोग्राफी, जिसमें कम स्तर की एक्स-रे की मदद से स्तनों के टिश्यूज़ में होनेवाले बदलावों को देखा जाता है. अगर मैमोग्राफी में कुछ असामान्यता दिखाई दे, तो स्तन कैंसर की जांच की जाती है, जिसमें विभिन्न कोणों से एक्स-रे लिए जाते हैं और इसके बाद अल्ट्रासाउंड किया जाता है. महिलाओं को 40 साल की उम्र के बाद हर साल मैमोग्राफी कराने की सलाह दी जाती है, चाहे उनमें स्तनों से संबंधित कोई लक्षण दिखाई दे या न दें.

जांच के अन्य तरीक़े
स्तनों में कैंसर के ट्यूमर की जांच का एक और तरीक़ा है फाइन नीडल एस्पीरेशन सायटोलोजी. इस प्रक्रिया में गांठ में नीडल डाली जाती है और एस्पीरेट ड्रेन किया जाता है. इसके बाद सेल्स को स्लाइड पर ट्रांसफर किया जाता है और माइक्रोस्कोप से जांच की जाती है.
हिस्टोपैथोलोजी स्लाइड की जांच के लिए उच्चस्तरीय विशेषज्ञता की आवश्यकता होती है. यह प्रक्रिया बेहद जटिल होती है. कई बड़ी डायग्नाॅस्टिक्स चेन्स आईटी के दिग्गजों के साथ साझेदारी कर रही हैं, ताकि आर्टीफिशियल इंटेलीजेन्स एवं अन्य डिजिटल तकनीकों की मदद से सटीक एवं तीव्र निदान किया जा सके. उदाहरण के लिए डिजिटल पैथोलॉजी में बदलाव लाना माइक्रोसाॅफ्ट एआई फाॅर हेल्थ प्रोग्राम का उद्देश्य है. वर्तमान में यह अपने दूसरे चरण में है. अगर ट्यूमर मैलिग्नेन्ट हो, तो स्तन कैंसर की पुष्टि हो जाती है.

स्तन कैंसर की पांच अवस्थाएं
स्तन कैंसर के बढ़ने के आधार पर इसे पांच अवस्थाओं में बांटा जाता है.
शून्य अवस्था- जब स्तन कैंसर नाॅन-इनवेसिव होता है, इस बात के कोई प्रमाण नहीं कि इस अवस्था में कैंसर आसपास के टिश्यूज़ में फैल सकता है या नहीं.
पहली अवस्था- इसमें कैंसर इनवेसिव हो जाता है, किंतु स्तनों के क्षेत्र में ही सीमित रहता है. आमतौर पर इस समय ट्यूमर का आकार 2 सेंटीमीटर से कम होता है.
दूसरी अवस्था- इसमें दो उप श्रेणियां होती हैं और निम्न फीचर्स होते हैं. पहली श्रेणी में ट्यूमर का अधिकतम आकार 2 सेंटीमीटर हो जाता है और यह बगल में लिम्फ नोड में फैल जाता है या ट्यूमर का आकार 2 से 5 सेंटीमीटर के बीच होता है और यह लिम्फ नोड तक नहीं फैलता. दूसरी श्रेणी में ट्यूमर का आकार 5 सेंटीमीटर से बढ़ जाता है या 2 से 5 सेंटीमीटर तक रहता है और लिम्फ नोड्स तक फैल जाता है.
तीसरी अवस्था- यह कैंसर की स्थानिक एडवान्स्ड अवस्था होती है, जिसे तीन श्रेणियों में बांटा गया है. पहली श्रेणी में ट्यूमर का आकार 5 सेंटीमीटर से कम होता है और लिम्फ नोड में फैल जाता है. इसके बाद बढ़ते हुए क्लम्प बनाने लगता है. दूसरी श्रेणी में ट्यूमर किसी भी आकार का हो सकता है, किंतु छाती की दीवार या स्तनों की त्वचा में फैल जाता है. इसमें त्वचा में गांठें बनने लगती हैं और स्तनों में सूजन आ जाती है. तीसरी श्रेणी में ट्यूमर किसी भी आकार का हो सकता है, किंतु लिम्फ नोड तक फैल जाता है और स्तनों की त्वचा एवं छाती की दीवार के आसपास फैल सकता है.
चौथी अवस्था- वास्तव में एडवान्स्ड अवस्था होती है, जिसमें कैंसर स्तनों से शरीर के अन्य अंगों में फैल जाता है.

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इलाज
स्तन कैंसर का इलाज कई तरह से किया जाता है. यह अक्सर कैंसर की अवस्था और इस बात पर निर्भर करता है कि स्तनों में कैंसर के उतकों का विकास कितना गंभीर है. आम तकनीकों में सर्जरी, कीमो थेरेपी, रेडिएशन थेरेपी और हार्मोन थेरेपी शामिल है. मामले की गंभीरता के आधार पर सर्जिकल विकल्प जैसे लम्पेक्टोमी (गांठ को निकालना) या मास्टेक्टोमी (पूरे स्तनों को निकालना) को भी चुना जा सकता है. इसलिए ज़रूरी है कि दूसरी अवस्था से पहले ही मरीज़ का निदान हो जाए.

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हेल्थ अलर्ट
किसी भी बीमारी में रोकथाम करना उपचार से बेहतर विकल्प होता है. हालांकि स्तन कैंसर के प्रत्यक्ष कारण ज्ञात नहीं हैं, किंतु पाया गया है कि सेहतमंद जीवनशैली जीनेवाली महिलाओं में इसकी संभावना कम होती है. स्तन कैंसर की संभावना को कम करने के लिए निम्न बातों पर ध्यान दें.

  • अल्कोहल का सेवन करने से जोख़िम बढ़ता है, इसलिए इसका सेवन ना करें.
  • इस बात के वैज्ञानिक प्रमाण हैं कि धूम्रपान से स्तन कैंसर की संभावना बढ़ती है, ऐसा ख़ासतौर पर मेनोपाॅज़ से पहले की स्थिति में देखा गया है. अतः इससे दूर रहना ही बेहतर है.
  • मोटापा या सामान्य से अधिक वज़न से स्तन कैंसर की संभावना बढ़ जाती है. बड़ों के लिए ज़रूरी है कि वे शारीरिक रूप से सक्रिय रहें. कम-से-कम दो-ढाई घंटे हल्का एरोबिक या पौने घंटे हेवी एक्सरसाइज़ करें.
  • पौष्टिकता से भरपूर भोजन लें.
  • स्तनपान यानी ब्रेस्ट फीडिंग कराने से कैंसर को रोका जा सकता है. साथ ही लंबे समय तक शिशु को स्तनपान कराने से भी अधिक फ़ायदा होता है.
  • उच्च स्तरीय रेडिएशन और पर्यावरणी प्रदूषण से बचें.

स्तन कैंसर का उपचार शत-प्रतिशत संभव है, अगर समय पर निदान कर जल्द-से-जल्द उपचार शुरू कर दिया जाए. हालांकि महिलाओं को सलाह दी जाती है कि सेहतमंद जीवनशैली अपनाएं, नियमित रूप से अपनी जांच करें, अगर कोई भी संदेह हो, तो तुरंत डाॅक्टर से संपर्क करें. पुरुषों को भी चाहिए कि वे महिलाओं की नियमित जांच, निदान एवं उपचार में सहयोग दें. हालांकि स्तन कैंसर ज़्यादातर महिलाओं को ही होता है, लेकिन पुरुषों को भी हो सकता है. इसलिए इस बीमारी को गंभीरता से लें और यथासंभव एक-दूसरे को सहयोग भी दें.

ऊषा गुप्ता


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मैं 27 वर्षीया कामकाजी महिला हूं. 4 महीने पहले मेरी मां की ब्रेस्ट कैंसर (Breast Cancer) के कारण सर्जरी (Surgery) हुई है. पिछले कुछ हफ़्तों से मेरी बाईं छाती में गांठ जैसी महसूस हो रही है, जिसे छूने पर दर्द होता है. क्या मुझे गायनाकोलॉजिस्ट (Gynecologist) को मिलना चाहिए?
– गहना उपाध्याय, हावड़ा.

अगर आपको गांठ महसूस हो रही है, तो आपको तुरंत किसी गायनाकोलॉजिस्ट को मिलना चाहिए. आमतौर पर कैंसरयुक्त गांठ में दर्द नहीं होता, पर क्योंकि हाल ही में आपकी मां ब्रेस्ट कैंसर से पीड़ित थीं, इसलिए आपके लिए रिस्क बढ़ जाता है. मैमोग्राफी या सोनोमैमोग्राफी के ज़रिए डॉक्टर आपकी गांठ की जांच कर सकते हैं. इसके अलावा हर महिला को माहवारी के 8वें दिन सेल्फ ब्रेस्ट एक्ज़ामिनेशन करना चाहिए. इसके लिए आइने के सामने खड़े होकर अपने हाथों को पुट्ठों पर रखकर दोनों ब्रेस्ट्स का आकार देखें. निप्पल्स से किसी प्रकार का स्राव तो नहीं हो रहा. उसके बाद उंगलियों से दबाकर देखें कि कहीं कोई गांठ तो नहीं. 40 साल के बाद सभी महिलाओं को हर साल मैमोग्राफी करानी चाहिए.

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मैं 32 वर्षीया महिला हूं. मेरा एक साल का बेटा भी है. मेरे पति विदेश में रहते थे, इसलिए मैंने कभी कोई फैमिली प्लानिंग (Family Planning) नहीं की थी, लेकिन पिछले महीने मेरे पति विदेश से लौटे, तो मैंने कंसीव कर लिया था, पर चूंकि मेरा बेटा बहुत छोटा है, इसलिए मैंने एबॉर्शन करा लिया. अभी मैं एक साल और कंसीव नहीं करना चाहती. कृपया, मुझे फैमिली प्लानिंग की सही सलाह दें.
– कविता गुप्ता, इंदौर.

 

एबॉर्शन के 10-12 दिनों बाद ही महिलाओं में फर्टिलिटी लौट आती है, इसलिए आपको कोई गर्भनिरोधक विकल्प ज़रूर अपनाना चाहिए. आज मार्केट में कई प्रकार के गर्भनिरोधक मिलते हैं. आपकी मेडिकल हिस्ट्री, सेक्सुअली ट्रांसमिटेड डिसीज़ की हिस्ट्री आदि देखने के बाद ही आपका डॉक्टर आपको सही सलाह दे पाएगा. इसलिए तुरंत अपने डॉक्टर से संपर्क करें और अपनी सुविधानुसार सही विकल्प चुनें.

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Dr. Rajshree Kumar
डॉ. राजश्री कुमार
स्त्रीरोग व कैंसर विशेषज्ञ
[email protected]

 

 

 

 

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मेरी कई सहेलियां गर्भनिरोधक गोलियों का इस्तेमाल करती हैं, पर उनके अनुसार इसके ज़्यादा सेवन से ब्रेस्ट कैंसर होने की संभावना बढ़ जाती है. क्या यह सच है?
– रश्मि भूषण, रोहतक.

स्टडीज़ में यह बात साबित हो चुकी है कि जो महिलाएं गर्भनिरोधक गोलियों का इस्तेमाल करती हैं, उनमें बाकी महिलाओं के मुक़ाबले बे्रस्ट कैंसर, लिवर व सर्वाइकल कैंसर की संभावना थोड़ी ज़्यादा बढ़ जाती है. वैसे कई और कारण हैं, जो ब्रेस्ट कैंसर के रिस्क को बढ़ा देते हैं, जैसे- कम उम्र में पीरियड्स की शुरुआत, हार्मोनल कारण, देरी से मेनोपॉज़ होना, पहली प्रेग्नेंसी ज़्यादा उम्र में होना, बच्चे न होना आदि.

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 Contraceptive Pills, Risk Of Breast Cancer
मैं 41 वर्षीया महिला हूं और कमरदर्द से परेशान हूं. पेनकिलर्स लेने पर आराम हो जाता है, पर फिर स्थिति वही हो जाती है. डॉक्टर ने मुझे विटामिन डी3 लेवल चेक कराने की सलाह दी है. क्या यह ज़रूरी है?
– ज्योति पांडे, भोपाल.

विटामिन डी दो प्रकार के होते हैं, डी2 और डी3. जहां डी2 भोजन और सप्लीमेंट से प्राप्त होता है, वहीं डी3 भोजन के अलावा सूरज की रोशनी से भी मिलता है. कैल्शियम मेटाबॉलिज़्म और बोन रिमॉडलिंग में इसका इस्तेमाल होता है. विटामिन डी हमारे इम्यून सिस्टम को मज़बूत बनाने के साथ-साथ, बे्रन को डेवलप करने और हार्ट को हेल्दी बनाने का काम करता है. हड्डियों की मज़बूती के लिए यह बहुत ज़रूरी है, इसलिए अपना डी3 लेवल चेक कराएं, ताकि पता चल सके कि कहीं आपमें इसकी कमी तो नहीं.

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डॉ. राजश्री कुमार
स्त्रीरोग व कैंसर विशेषज्ञ
[email protected]

 

 

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Breast Cancer, Urban Women

कैंसर एक ऐसी बीमारी है जिसका नाम सुनकर आज भी लोग सिहर उठते हैं. तमाम जागरुकता अभियानों के बावजूद कैंसर पेशेंट को आज भी सामाजिक स्वीकार्यता नहीं मिली है. यही कारण है कि शिक्षित महिलाएं भी इस बात को जल्दी स्वीकार नहीं कर पातीं कि वो कैंसर की शिकार हो चुकी हैं. हमारे देश में हर साल लगभग ब्रेस्ट कैंसर के एक से सवा लाख नए केस सामने आ रहे हैं और ज़्यादातर मामलों में शर्म व संकोचवश महिलाएं डॉक्टर के पास नहीं जाती. यदि समय रहते कैंसर का पता चल जाए, तो इलाज संभव है. गांव व कस्बों की तुलना में शहरी महिलाओं में ब्रेस्ट कैंसर का ख़तरा बढ़ रहा है. आख़िर क्या है इसकी वजह जानने के लिए हमने बात की कैंसर स्पेशलिस्ट व गायनाक्लोजिस्ट डॉ. राजश्री कुमार से.

ख़ुद करें जांच
अपने शरीर को आपसे अच्छी तरह भला और कौन जान सकता है, अगर आप कैंसर के ख़तरे से बचना चाहती हैं, तो सेल्फ एग्ज़ामिनेशन (ख़ुद अपनी जांच) करें.
* सीधा लेटकर या नहाते समय हाथ ऊपर करके ब्रेस्ट पर हाथ घुमाकर महसूस करें कि कहीं कोई गांठ तो नहीं है. कई बार ये गांठ बहुत छोटी भी होती है, इसलिए थोड़ा भी शक़ होने पर बिना देर किए डॉक्टर के पास जाएं.
* यदि आपको महसूस हो रहा है कि स्तनों का आकार असामान्य तरी़के से बढ़ रहा है या बगल में सूजन है, तो इसे नज़रअंदाज़ न करें और तुरंत जांच करवाएं.
* निप्पल का आकार बिगड़ने लगे, लाल होने लगे या उसमें से ख़ून आने लगे तो ये ख़तरनाक हो सकता है.

12 से 14 साल की उम्र में बच्चे
को एचपीवी (ह्यूमन पैपीलोमा वायरस)
वैक्सीन दिलाएं. ये भविष्य में सर्वाइकल
कैंसर से बचाव करता है.

क्या हैं कारण?
ब्रेस्ट कैंसर होने की कोई एक वजह नहीं है, इसके लिए कई कारण ज़िम्मेदार हो सकते हैं.
* कई बार ये अनुवांशिकता के कारण होता है. यदि परिवार में नज़दीकी रिश्तेदारों (मम्मी, चाची, दादी, नानी) को ये हुआ है, तो आपका इसका शिकार होने की संभावना बढ़ जाती है.
* ब्रेस्टफीड न कराना और बच्चे न होना भी इसकी एक बड़ी वजह हो है. शहरों में कामकाजी महिलाएं देर से शादी करती हैं, जो बच्चे में लेट होते हैं और ज़्यादातर महिलाएं फिगर ख़राब होने या नौकरी की वजह से बच्चों को ज़्यादा समय तक ब्रेस्टफीड नहीं करा पातीं.
* ग़लत लाइफस्टाइल यानी ज़्यादा फैटी फूड, एक्सरसाइज़ न करना आदि से भी ये हो सकता है.
* ज़रूरत से ज़्यादा मोटापा, शराब, सिगरेट आदि का अधिक सेवन भी इसकी वजह हो सकता है.

शहरी महिलाओं में जहां ब्रेस्ट कैंसर का ख़तरा बढ़ रहा है, वहीं गांव/कस्बों में सर्वाइकल कैंसर की तादाद बढ़ रही है. हमारे देश में महिलाओं में सर्वाइकल कैंसर के बढ़ने की दर 2.4 प्रतिशत है. इसका कारण गांवों की महिलाओं में जागरूकता की कमी, स्वास्थ्य के प्रति लापरवाही, हाइजीन का ख़्याल न रखना आदि है. ज़्यादा बच्चे होने, सेक्सुअल एक्टिविटी के दौरान कंडोम का इस्तेमाल न करने से भी सर्वाइकल कैंसर का ख़तरा रहता है. यदि सही समय पर इसका पता चल जाए तो इलाज संभव है, मगर ज़्यादातर मामलों में एडवांस स्टेज पर पहुंचने पर ही मरीज़ को बीमारी का पता चल पाता. इसके लक्षणों को समझना मुश्किल है. अतः चेकअप करवाना ही सबसे बेहतर उपाय है. 30 की उम्र के बाद पैप स्मीयर टेस्ट करवाएं. यदि सब सामान्य है तो हर 5 साल में एक बार चेकअप करवाएं.

कैसे बचें?
* शराब और सिगरेट से तौबा कर लेें.
* वज़न नियंत्रित रखने के लिए नियमित रूप से एक्सरसाइज़ करें.
* भोजन में फैटी फूड की मात्रा कम कर दें. हेल्दी फूड खाएं.
* जितना ज़्यादा हो सके बच्चे को ब्रेस्टफीड कराएं.
* यदि परिवार में ब्रेस्ट कैंसर की हिस्ट्री है, तो नियमित रूप से चेकअप ज़रूर करवाएं.
* यदि उम्र 35 से कम है, तो सोनोग्राफी करती रहें.
* यदि आपकी उम्र 35 से ज़्यादा है, तो मेमोग्राफी की जाती है.
* 40 साल की उम्र में 1 बार और फिर हर 2 साल में मेमोग्राफी करवानी चाहिए ताकि शुरुआती स्टेज में ही कैंसर का पता चल जाए.

पिछले क़रीब 25 साल में ब्रेस्ट कैंसर के मामलों में दुगुनी बढ़ोतरी हुई है.

यदि शुरुआती स्तर पर ही कैंसर का पता चल जाए तो इसके ठीक होने की संभावना ज़्यादा रहती है, मगर हमारे देश में क़रीब 30 प्रतिशत मामले एडवांस स्टेज पर पहुंचने के बाद सामने आते हैं, जिससे मरीज़ को बचा पाना मुश्किल हो जाता है.

 

Breast Care According To Age

बदलती लाइफस्टाइल के कारण आजकल कम उम्र में ही महिलाएं ब्रेस्ट कैंसर की चपेट में आ रही हैं. इस ख़तरनाक बीमारी से बचाव के लिए हर उम्र में ब्रेस्ट की सही देखभाल कैसे की जानी चाहिए? जानने के लिए हमने बात की लीलावती हॉस्पिटल की स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. रंजना धानू से.

20 की उम्र में 
क्या पहनें?
इस उम्र में ब्रेस्ट का आकार आकर्षक होता है. इसमें कसाव भी अधिक होता है. दिन में ब्रेस्ट सपोर्टिव ब्रा एवं एक्सरसाइज़ करते समय स्पोर्ट्स ब्रा पहनें.

30 की उम्र में 
प्रेग्नेंसी में ब्रेस्ट का साइज़ बढ़ जाता है एवं स्ट्रेच मार्क्स भी आ जाते हैं. प्रेग्नेंसी के बाद एक्सरसाइज़ करके वेट मेंटेन करें. जब तक स्तनपान करा रही हैं तब तक मैटरनिटी ब्रा पहनें, बाद में सपोर्टिव ब्रा पहनें.

40 की उम्र में 
उम्र बढने के साथ साथ ब्रेस्ट के लोब्युल्स और मिल्क ग्लैंडस सिकुड़ने लगती है, जिससे स्तन शिथिल होकर लटक जाते हैं. पुशअप ब्रा पहने इससे ब्रेस्ट में कसाव दिखेगा. यदि स्थायी इलाज चाहती हैं तो सर्जिकल ब्रेस्ट लिफ्ट कराएं.

सूजन/लंप क्या है?
13% महिलाओं में इस तरह का लंप दिखाई देता है जो 1 या 2 से.मी. का होता है. इसे दबाने पर यह इधर उधर सरकता है. लगभग 50% महिलाओं में यह मेनोपॉज़ के दौरान अपने आप गायब हो जाता है.

स्तनपान कराने वाली हर तीसरी महिला को ब्रेस्ट में लाल लंप (सूजन) हो जाते हैं और दर्दनाक पीड़ा होती है. एंटीबायोटिक्स से इसका समाधान हो जाता है, परंतु कई बार सर्जिकल ड्रेनेज करवाना ज़रूरी होता है.

इस उम्र में शरीर मेनोपॉज के लिए तैयार हो रहा होता है. इसमें ओव्युलेशन के पहले काफ़ी मात्रा में एस्ट्रोजन हार्मोन बनता है. यही 1-2 इंच चौड़े तरल पदार्थ भरी सिस्ट के रूप में ब्रेस्ट में दिखाई देता है. कई मामलों में डॉक्टर इस तरल पदार्थ को निकाल देते हैं.

Breast Care

कैसे टेस्ट करें?
पीरियड्स के बाद स्वयं ब्रेस्ट परीक्षण करें. साल में 1 बार स्त्री रोग विशेषज्ञ से परीक्षण करवाएं.

महीने में 1 बार ख़ुद ब्रेस्ट परीक्षण करें. स्त्री रोग विशेषज्ञ से साल में एक बार जांच अवश्य करवाएं. यदि आपकी मां या बहन को ब्रेस्ट कैंसर था तो 35 वर्ष की उम्र में मेमोग्राम ज़रूर करवाएं.

महीने में 1 बार स्वयं व साल में 1 बार स्त्री रोग विशेषज्ञ से परीक्षण करवाएं. 40 साल की उम्र में पहला मेमोग्राम करवाएं. इसके बाद हर दूसरे साल इसे करवाएं.

ब्रेस्ट कैंसर रिस्क
100 में से 4
100 में से 6
100 में से 28

ब्रेस्ट का आकार

एसिमेट्रिक ब्रेस्ट
– अक्सर देखा गया है कि एक ब्रेस्ट दूसरे ब्रेस्ट की अपेक्षा आकार में बड़ा होता है, परंतु ऐसा होना सामान्य बात है. शरीर के अन्य अंगों की तरह दोनों ब्रेस्ट भी अलग-अलग अंगों की तरह विकसित होते हैं. दोनों ब्रेस्ट विभिन्न हार्मोन्स के साथ अलग-अलग तरह से प्रतिक्रिया देते हैं. जिससे दोनों ब्रेस्ट में टिशूज़ और फैट की मात्रा भी अलग होती है. इसलिए एक ब्रेस्ट दूसरे से बड़ा हो सकता है.

– यदि अचानक ही एक ब्रेस्ट आकार में दूसरे से बड़ा होने लगे तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें, क्योंकि यह इंफेक्शन (संक्रमण) या प्यूमर का लक्षण हो सकता है.

ऑड (असंगत) ब्रेस्ट
– ब्रेस्ट का आकार नुकीला, गोलाकार चपटा या अजीब तरह का है तो इसमें घबराने की बात नहीं है. दरअसल, ब्रेस्ट का आकार महिलाओं के बॉडी टाइप और अनुवांशिकता पर निर्भर करता है.

– एक बात ध्यान रखें कि कोई भी ब्रेस्ट पूरी तरह नरम, मृदु व कोमल नहीं होता. इसमें लम्प्स पाए जाते हैं. कुछ ब्रेस्ट टाइप को फाइब्रो सिस्टक ब्रेस्ट कहते हैं. इसमें काफ़ी लम्प होते हैं, लेकिन यह नॉर्मल माना जाता है.

निपल का आकार
कई महिलाओं में निपल अंदर की ओर दबे हुए तो कुछ में बाहर ओर निकले हुए होते हैं. इनका आकार भी अनुवांशिक होता है. 5% महिलाओं के निपल इनवर्टेड होते हैं. यदि आपको ऐसा लगे कि निपल के आकार में अचानक परिवर्तन हो गया है तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें.

 

सुषमा श्रीराव

 

हार्मोन्स संतुलित रखने के 20 आसान तरीक़े ( 20 Ways To Maintain Hormonal Balance Naturally)

 

महिलाओं के पांच हेल्थ दुश्मन- हृदय रोग,ऑस्टियोपोरोसिस, ब्रेस्ट कैंसर- सर्वाइकल कैंसर, डिप्रेशन और पॉलीसिस्टिक ओवेरियन सिंड्रोम उन्हें कब चपेट में ले लेते हैं, उन्हें ख़ुद पता नहीं चलता. इसलिए ज़रूरी है समय रहते ध्यान देना और किसी भी संकेत की अनदेखी न करना.

women’s health problems

1. हृदय रोग

दुनियाभर के विभिन्न शोधों में यह बात सामने आई है कि पूरी दुनिया में 53.1% महिलाओं की मौत हृदय रोग के कारण होती है. पिछले कुछ सालों में कम उम्र की महिलाओं में भी हृदय रोग के कई मामले सामने आए हैं. इसका कारण वर्कलोड, तनाव, ़फैमिली हिस्ट्री, खान-पान की ग़लत आदतें आदि हैं. ज़्यादातर महिलाएं पहले डायबिटीज़, मोटापा आदि से पीड़ित होती हैं और फिर उन्हें हृदय रोग की समस्या हो जाती है. हायपरटेंशन और हाई कोलेस्ट्रॉल भी इसके प्रमुख कारण हैं

.
हृदय रोग में आम शिकायतें

* नींद न आने की समस्या.
* सांस लेने में तकलीफ़.
* कमरदर्द, गर्दन या ठुड्डी में दर्द.
* अपच के कारण उबकाई आना या
उल्टी आना.
* चक्कर आना और थकान.
हृदय रोग से लड़ाई
* अगर आपको हाई ब्लड प्रेशर या हाई कोलेस्ट्रॉल है, तो अपने डॉक्टर की दी हुई दवाओं का नियमित सेवन करें. अगर आप डायबिटीज़ से जूझ रही हैं, तो अपने ब्लड शुगर को नियंत्रण में रखें.
* हेल्दी डायट लें. खाने में सब्ज़ियां, फल, साबूत अनाज, फाइबरयुक्त भोजन, प्रोटीन से भरपूर आहार व मछली
शामिल करें.
* डेली रूटीन में एक्सरसाइज़ को शामिल करें और अपना वज़न नियंत्रित रखें.
* सिगरेट और शराब से दूर रहें.
* तनाव को दूर कर स्वस्थ जीवनशैली अपनाएं.

2. ऑस्टियोपोरोसिस

ऑस्टियोपोरोसिस एक ऐसी बीमारी है, जो हड्डियों को कमज़ोर कर देती है और हड्डियों के फ्रैक्चर होने का ख़तरा बढ़ जाता है. इसकी संभावना महिलाओं में पुरुषों से पांच गुना ज़्यादा होती है. पचास वर्ष से अधिक उम्र की क़रीब 50% महिलाओं में ऑस्टियोपोरोसिस पाया जाता है. ये एक ऐसी बीमारी है, जिसे रोका तो नहीं जा सकता, लेकिन इसके प्रभाव को कम ज़रूर किया जा सकता है. कमरदर्द, झुकी हुई कमर, शरीर दर्द और कमज़ोरी- ये सारे लक्षण इसी ओर इशारा कर रहे हैं कि अब आप को संभलने की ज़रूरत है. कहीं आपका कमरदर्द आपके जीवन का दर्द न बन जाए.

ऑस्टियोपोरोसिस के रिस्क फैक्टर्स
* मेनोपॉज़ के दौरान ओवरीज़ (अंडाशय) में बननेवाले एस्ट्रोजन हार्मोन की मात्रा में कमी आ जाती है, जिसके कारण
हड्डियां कमज़ोर हो जाती हैं और ऑस्टियोपोरोसिस का रिस्क बढ़ जाता है.
* सर्जरी के द्वारा ओवरी निकलवाने से हड्डियां बहुत तेज़ी से कमज़ोर होती हैं.
* कैल्शियम और विटामिन ङ्गडीफ हमारी हड्डियों की मज़बूती में अहम् भूमिका निभाते हैं. ऐसे में इनकी कमी इस बीमारी का एक प्रमुख कारण बनती है.
* ग़लत खानपान और जीवनशैली भी ऑस्टियोपोरोसिस के रिस्क ़फैक्टर्स में से एक है.
* जिन महिलाओं के परिवार में पहले किसी को ऑस्टियोपोरोसिस हो चुका है और जो धुम्रपान और शराब का सेवन करती हैं, उनमें इसका ख़तरा ज़्यादा बढ़ जाता है.

कम करें रिस्क फैक्टर्स
* आपकी हड्डियों के लिए विटामिन ङ्गडीफ बहुत ज़रूरी है. इसके लिए आपको ज़्यादा कुछ नहीं करना है, बस रोज़ाना 10 मिनट की धूप आपको भरपूर मात्रा में विटामिन ङ्गडीफ देती है. इसके अलावा खाने में अंडे की जर्दी और मछली का तेल इसकी कमी को पूरा करते हैं.
* कैल्शियम को अकेले लेने की बजाय विटामिन ङ्गडीफ के साथ लेना ज़्यादा फ़ायदेमंद होता है.
* कैल्शियम से भरपूर भोजन दूध, दही, चीज़, हरी सब्ज़ियां, टोफू, मछली व साबूत अनाज का सेवन करें.
* एक्सरसाइज़ और जॉगिंग से अपने आप को एक्टिव रखें.

3. कैंसर

कैंसर एक ऐसी बीमारी है, जिसमें बॉडी सेल्स ठीक से काम नहीं करते. सेल्स बहुत तेज़ी से बंटते हैं और एक्स्ट्रा सेल्स ट्यूमर बन जाते हैं. भारत में अन्य देशों के मुक़ाबले कैंसर पीड़ितों की संख्या बहुत ज़्यादा है. महिलाओं में ब्रेस्ट कैंसर और सर्वाइकल कैंसर की संभावना सबसे ज़्यादा होती है.
ब्रेस्ट कैंसर
हमारे देश में ब्रेस्ट कैंसर से पीड़ित महिलाओं की संख्या में लगातार इज़ाफ़ा हो रहा है. इसका कारण जागरूकता में कमी और बदलती जीवनशैली है. हाल ही में हुए एक शोध के अनुसार, हर 22 में से एक महिला ब्रेस्ट कैंसर का शिकार होती है. देर से शादी होना, बच्चे होना और फिर बच्चों को ब्रेस्टफीडिंग न कराना, रेडियोएक्टिव व केमिकल्स का एक्सपोज़र, ़फैमिली हिस्ट्री, हार्मोन रिप्लेसमेंट थेरेपी आदि इस समस्या के प्रमुख कारण हैं. बदलती जीवनशैली के कारण जल्दी पीरियड्स आना और देर से मेनोपॉज़ होने के कारण शरीर के हार्मोंस में काफ़ी बदलाव आते हैं, जिसके कारण ब्रेस्ट कैंसर का ख़तरा बढ़ जाता है. भारत की क़रीब 22-25% महिलाएं ब्रेस्ट कैंसर से जूझ रही हैं.
ब्रेस्ट की जांच ज़रूरी
ब्रेस्ट की जांच समय-समय पर करती रहें, ताकि समय रहते इन लक्षणों की पहचान कर इससे छुटकारा पाया जा सके. निप्पल डिस्चार्ज, निप्पल या ब्रेस्ट में दर्द, ब्रेस्ट में गांठ या सूजन, अंडरआर्म्स में गांठ या
सूजन, ब्रेस्ट के आकार में बदलाव, निप्पल का अंदर धंसना आदि इसके प्रमुख लक्षण हैं.
अपनाएं हेल्दी हैबिट्स
* वज़न नियंत्रित रखें.
* जितना ज़्यादा हो सके, फल और
सब्ज़ियां खाएं.
* एक्सरसाइज़ करें और एक्टिव रहें.
* ब्रेस्ट फीडिंग काफ़ी हद तक आपको सुरक्षित रखता है, इसलिए अपने बच्चे को ब्रेस्ट फीडिंग कराएं.
* शराब से दूर ही रहें.
* तनाव से दूर रहें और सकारात्मक सोच रखें.
सर्वाइकल कैंसर
सर्वाइकल कैंसर सर्विक्स, जो यूटेरस (गर्भाशय) के निचले हिस्से में होता है, में होनेवाला एक कैंसर है. जब सर्विक्स के सेल्स कैंसर सेल्स में बदल जाते हैं, तब सर्वाइकल कैंसर होता है. ज़्यादातर मामलों में सर्वाइकल कैंसर ह्यूमन पैपिलोमा वायरस (एचपीवी) के कारण होता है, जो एक पार्टनर से दूसरे पार्टनर तक शारीरिक संबंध के ज़रिए फैलता है.
रिस्क फैक्टर्स
* कम उम्र में सेक्स.
* एक से ज़्यादा सेक्स पार्टनर्स.
* धूम्रपान, एचआईवी, कमज़ोर रोग
प्रतिरोधक क्षमता और अनियमित पैप टेस्ट. पैप टेस्ट के ज़रिए सर्विक्स के सेल्स में होनेवाले गंभीर बदलावों का पता लगाया जाता है.
रिस्क फैक्टर्स को कम करें
* सर्वेरिक्स और गार्डसिल ऐसे दो वैक्सिन्स या टीके हैं, जिनके इस्तेमाल से लड़कियों और महिलाओं को एचपीवी से सुरक्षित रखा जा सकता है, ताकि वे सर्वाइकल कैंसर की शिकार न हो सकें.
* सेक्सुअली ट्रांसमिटेड इं़फेक्शन से बचने के लिए इस दौरान सेक्स न करें.
* अपने पार्टनर के प्रति वफ़ादार रहें.
* कंडोम का इस्तेमाल करें.

4. डिप्रेशन

तनाव और अवसाद के बीच मामूली-सा फ़र्क़ है. महिलाएं अक्सर अवसाद का शिकार इसलिए हो जाती हैं, क्योंकि वे जल्दी तनावग्रस्त हो जाती हैं. महिलाएं एक साथ कई भूमिकाएं निभाती हैं. जहां एक ओर गृहस्थी संभालती हैं, वहीं दूसरी ओर ऑफ़िस का कामकाज भी संभालती हैं. घर और ऑफ़िस से जुड़ी ऐसी कई समस्याएं होती हैं, जिन्हें किसी और से शेयर न करके ख़ुद सुलझाना चाहती हैं. ऐसे में कई बार वे तनाव और फिर अवसाद का शिकार हो जाती हैं.
डिप्रेशन के रिस्क फैक्टर्स
एक्सपर्ट्स का मानना है कि डिप्रेशन न स़िर्फ बायोलॉजिकल (जैविक), बल्कि मनोवैज्ञानिक और सामाजिक तत्वों के कारण भी होता है यानी आपके रिश्ते-नाते, आपकी जीवनशैली और आपकी सहनशक्ति भी काफ़ी मायने रखती है.
* अकेलापन, सोशल सपोर्ट की कमी, तनावभरी ज़िंदगी, डिप्रेशन की ़फैमिली हिस्ट्री, वैवाहिक जीवन में तनाव, आर्थिक तंगी, बचपन की कड़वी यादें, शराब या ड्रग्स का इस्तेमाल, बेरोज़गारी या बेकारी और शारीरिक समस्याएं.
हेल्दी लाइफ़स्टाइल अपनाएं
* अच्छे दोस्त बनाएं.
* अच्छी नींद लें और एक्सरसाइज़ करें.
* हेल्दी खाएं और मूड अच्छा रखें.
* जितना हो सके, तनाव को नियंत्रित करें.
* संगीत सुनें और ख़ुद को रिलैक्स रखें.
* नकारात्मक ख़्यालों से लड़ें. इसके लिए आप काउंसलर की मदद भी ले सकती हैं.
* कोई भी समस्या जो आपको परेशान कर रही हो, अपने क़रीबी दोस्तों या रिश्तेदारों से शेयर करें.
* पॉज़िटिव लाइफ़स्टाइल अपनाए, ख़ुद की मदद करें और इमोशनली स्ट्रॉन्ग बनें.

5. पॉलीसिस्टिक ओवेरियन सिंड्रोम

पॉलीसिस्टिक ओवेरियन सिंड्रोम (पीसीओएस) एक हार्मोनल समस्या है. इसमें ओवरी में कई सिस्ट हो जाते हैं, जिसके कारण महिलाओं को इंफ़र्टिलिटी की समस्या से दो चार होना पड़ता है. यह 5-10% महिलाओं में पाया जाता है. कई बार ये समस्या किशोरावस्था में ही शुरू हो जाती है, लेकिन शादी के बाद ही इसका पता चल पाता है.
पीसीओएस में आम शिकायतें
* अनियमित माहवारी या माहवारी के समय अधिक रक्तस्राव.
* एंड्रोजन हार्मोंस के घटते-बढ़ते स्तर के कारण मुंहासे, अचानक से चेहरे और शरीर के विभिन्न अंगों में बालों का बढ़ना.
* थकान और डिप्रेशन.
* अचानक बालों का झड़ना.
* सिरदर्द और नींद न आना.
* याद्दाश्त पर असर.
* बार-बार प्यास लगना.
* वज़न बढ़ने के कारण मोटापा.
पॉलीसिस्टिक ओवेरियन सिंड्रोम का ट्रीटमेंट
* इससे छुटकारा पाने में रोज़ाना
एक्सरसाइज़ काफ़ी कारगर है. यह न स़िर्फ ब्लड प्रेशर और कोलेस्ट्रॉल कंट्रोल करता है, बल्कि वज़न भी कम करके शारीरिक समस्याओं को दूर रखता है.
* हेल्दी डायट में फल, सब्ज़ियां, बींस, मेवे और साबूत अनाज ज़रूर शामिल करें.
* डॉक्टर आपको कुछ बर्थ कंट्रोल पिल्स या फ़र्टिलिटी मेडिसिन या डायबिटीज़ मेडिसिन दे सकते हैं, जिससे आपके पीरियड्स रेग्युलर हो जाएंगे.

  1. – अनीता सिंह

 

किडनी को नुकसान पहुंचाती हैं ये 10 आदतें (10 Habits Which Are Harmful For Your Kidney)

मैं 37 वर्षीया महिला हूं. मेरा 9 साल का बेटा भी है. कुछ महीने पहले ही मैंने बाएं ब्रेस्ट में एक गांठ महसूस की. डॉक्टर ने बायोप्सी करके बताया कि वो कैंसर की गांठ नहीं है, पर मैं बहुत डरी हुई हूं. क्या मुझे बार-बार मैमोग्राफी (Mammography) करानी पड़ेगी?
– रश्मि कुंद्रा, नोएडा.

अगर आपकी बायोप्सी की रिपोर्ट यह कहती है कि वह गांठ कैंसर की नहीं है, तो आपको डरने की कोई ज़रूरत नहीं. आपको पता करना होगा कि आपकी मां, मौसी या नानी में से किसी को ब्रेस्ट कैंसर तो नहीं था, क्योंकि कुछ ब्रेस्ट कैंसर फैमिली हिस्ट्री के कारण ही होते हैं, ऐसे में आपको ध्यान रखना होगा. सबसे ज़रूरी बात, नियमित रूप से हर महीने आपको ब्रेस्ट्स का सेल्फ एक्ज़ामिनेशन करना होगा, ताकि किसी तरह की गांठ के बारे में आपको समय से पता चल सके. मैमोग्राफी (Mammography) हमेशा डॉक्टर की सलाह पर ही कराएं. डॉक्टर को ज़रूरत महसूस होगी, तभी वो इसकी सलाह देंगे.

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Breast Mammography
मैं 24 वर्षीया कॉलेज स्टूडेंट हूं. हर महीने पीरियड्स के एक-दो दिन पहले से ही मेरे ब्रेस्ट्स में बहुत दर्द होता है, पर मुझे डॉक्टर के पास जाने में बहुत डर भी लग रहा है. मैं क्या करूं? कृपया, मेरी मदद करें.
– आराध्या वासवानी, बनारस.

इसमें डरने की कोई बात नहीं है. आप ऐसी अकेली नहीं हैं, जिसके साथ यह हो रहा है, ऐसीबहुत-सी लड़कियां व महिलाएं हैं, जिन्हें पीरियड्स से पहले ब्रेस्ट्स में दर्द होता है. दर्द से राहत पाने के लिए पीरियड्स के दौरान अच्छी फिटिंगवाली ब्रा पहनें और पेनकिलर ले लें. ज्यादातर मामलों में इससे फ़र्क़ पड़ता है, लेकिन अगर आपको इससे राहत न मिले, तो किसी गायनाकोलॉजिस्ट को ज़रूर दिखाएं. वो आपको सही दवाइयां देंगे, ताकि आपको दर्द से राहत मिले.

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ब्रेस्ट कैंसर शहरी महिलाओं में मौत का प्रमुख कारण

हाल ही में जारी आंकड़ों पर नज़र डालें, तो पता चलेगा कि ब्रेस्ट कैंसर शहरी महिलाओं की मौत का प्रमुख कारण बनता जा रहा है. ऐसे में इसके प्रति जागरूकता बहुत ज़रूरी है. हर महीने पीरियड्स के बाद अपने ब्रेस्ट्स को सेल्फ एक्ज़ामिन करें. यह आप लेटकर या शावर लेते समय भी कर सकती हैं. इसके कारण समय रहते महिलाओं को गांठ या सूजन का पता चल जाता है, जिससे सही समय पर इलाज हो जाता है. मैमोग्राफी एक ख़ास एक्स-रे है, जिसकी मदद से ब्रेस्ट की जांच होती है, पर यह हमेशा डॉक्टर की सलाह पर ही करवाएं. अगर ब्रेस्ट कैंसर की फैमिली हिस्ट्री है, तो नियमित रूप से ब्रेस्ट्स का सेल्फ एक्ज़ामिनेशन करें.

rajeshree kumarडॉ. राजश्री कुमार
स्त्रीरोग व कैंसर विशेषज्ञ
[email protected] 

 

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मेरी चचेरी बहन 28 साल की है. वह प्रेग्नेंट है. शुरुआती जांच में डॉक्टर को आशंका है कि उसे ब्रेस्ट कैंसर (breast cancer) है. प्रेग्नेंसी के व़क्त ब्रेस्ट कैंसर और वो भी इतनी कम उम्र में? क्या यह मुमकिन है?
– नेहा देसाई, सोलापुर.
प्रेग्नेंसी के दौरान बे्रस्ट कैंसर (breast cancer) काफ़ी असामान्य है, पर जिनके घर में फैमिली हिस्ट्री हो, उन महिलाओं के लिए इसकी संभावना अन्य महिलाओं के मुक़ाबले 5-10% बढ़ जाती है. आमतौर पर प्रीनैटल चेकअप के दौरान डॉक्टर ब्रेस्ट्स भी चेक करते हैं, पर सभी महिलाओं को नियमित रूप से क्लीनिकली अपने ब्रेस्ट्स चेक करवाने चाहिए यानी डॉक्टर की सलाह पर समय-समय पर मैमोग्राफी कराते रहना चाहिए. ज़्यादातर मामलों में यह देखा गया है कि गांवों के मुक़ाबले शहरी महिलाएं इससे अधिक प्रभावित होती हैं.

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breast cancer during pregnancy
मैं 40 वर्षीया महिला हूं और पिछले एक साल से यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन से पीड़ित हूं. पिछले एक साल में यह क़रीब पांच-छह बार हो चुका है. गायनाकोलॉजिस्ट ने सारे चेकअप्स के बाद सब नॉर्मल बताया, पर फिर भी इंफेक्शन बार-बार हो रहा है. मैं फिर से एंटीबायोटिक्स नहीं खाना चाहती. कृपया, उचित सलाह दें.
– पुनीता शुक्ला, मेरठ.
कभी-कभी अगर इंफेक्शन पूरी तरह ठीक न हो, तो वह फिर से हो सकता है. वहीं कुछ लोग थोड़ा आराम मिलते ही एंटीबायोटिक लेना बंद कर देते हैं, जिससे कोर्स पूरा नहीं होता और इंफेक्शन वापस से आ जाता है. चूंकि आप इस समस्या से काफ़ी दिनों से परेशान हैं, तो आपको यूरोलॉजिस्ट को दिखाना चाहिए. सिस्टोस्कोपी के ज़रिए वो आपका ब्लैडर आदि चेक करेंगे, जिससे इंफेक्शन के बार-बार होनेे का कारण पता चल जाएगा.

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5 स्टेप्स में करें सेल्फ ब्रेस्ट एक्ज़ामिनेशन

स्टेप 1: बिना कपड़ों के आईने के सामने खड़ी हो जाएं और हाथों को कूल्हे पर रखें. ध्यान से दोनों ब्रेस्ट्स को देखें कि कहीं उनके कलर और शेप में कोई फ़र्क़ तो नहीं आया है.
स्टेप 2: अब दोनों हाथों को ऊपर उठाकर देखें, कहीं कोई बदलाव तो नज़र नहीं आ रहा.
स्टेप 3: निप्पल्स को ध्यान से देखें, वो अंदर की तरफ़ धंसे हुए तो नहीं या उनसे किसी तरह का द्रव तो नहीं निकल रहा.
स्टेप 4: बेड पर लेटकर दाएं हाथ की उंगलियों से बाएं ब्रेस्ट को और बाएं हाथ की उंगलियों से दाएं ब्रेस्ट को सर्कुलर मोशन में चेक करें कि कहीं कोई गांठ तो नहीं.
स्टेप 5: अब बैठकर या खड़े होकर बिल्कुल स्टेप 4 के अनुसार ब्रेस्ट एक्ज़ामिन करें.
डॉ. राजश्री कुमार
स्त्रीरोग व कैंसर विशेषज्ञ
[email protected] 

 

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ब्रेस्ट कैंसर (Breast Cancer) से पीड़ित महिलाओं की संख्या लगातार बढ़ रही है. जागरूकता की कमी और बदलती लाइफस्टाइल इसका मुख्य कारण है. महिलाओं में ब्रेस्ट कैंसर के प्रति जागरूकता लाने के लिए अक्टूबर माह को पूरी दुनिया में ब्रेस्ट कैंसर अवेयरनेस मंथ के रूप में मनाया जाता है. ब्रेस्ट कैंसर के प्रति जागरूक करने की एक कोशिश हमारी भी.

 Fight Breast Cancer

हमारे देश में ब्रेस्ट कैंसर से पीड़ित महिलाओं की संख्या लगातार बढ़ रही है. भारत में तो करीब 22-25 % महिलाएं ब्रेस्ट कैंसर से पीड़ित हैं. जागरूकता की कमी और बदलती लाइफस्टाइल इसके मुख्य कारण हैं, लेकिन अगर थोड़ी सावधानी बरती जाए तो इससे बचा जा सकता है.

 

क्या हैं कारण?

 

– ग़लत लाइफस्टाइल
– देर से शादी और लेट प्रेंग्नेंसी
– बच्चों को ब्रेस्ट फीडिंग न कराना
– रेडियाएक्टिव व केमिकल्स का एक्सपोज़र
– फैमिली हिस्ट्री
– ओबेसिटी
– हार्मोन रिप्लेसमेंट थेरेपी
– अर्ली पीरियड्स और देरी से मेनोपॉज. जिन महिलाओं को पीरियड्स जल्दी शुरू हो जाता है और मेनोपॉज़ लेट होता है, उन्हें ब्रेस्ट कैंसर होने की संभावना ज़्यादा होती है.
– बढती उम्र भी ब्रेस्ट कैंसर की बड़ी वजह है. ब्रेस्ट कैंसर के 80% मामले 50+ की उम्र की महिलाओं में देखे जाते हैं.
– जिन महिलाओं का कद लंबा होता है, उन्हें भी ब्रेस्ट कैंसर का रिस्क ज़्यादा होता है.
– अल्कोहल पीने और स्मोकिंग करनेवाली महिलाएं भी रिस्क जोन में होती हैं.
– नाइट शिफ्ट में काम करनेवाली महिलाओं को भी ख़तरा ज़्यादा होता है.

 

क्या हो सकते हैं लक्षण

– ब्रेस्ट में गांठ या सूजन
– अंडरआर्म्स में गांठ, सूजन या दर्द.
– ब्रेस्ट की त्वचा का लाल हो जाना
– निप्पल से डिस्चार्ज
– ब्रेस्ट के आकार में बदलाव
– निप्पल का अंदर धंस जाना
– निप्पल या ब्रेस्ट की त्वचा का निकलना
अगर उपरोक्त लक्षण दिखाई दें तो फौरन डॉक्टर को कंसल्ट करें और ज़रूरी जांच जाएं.
ब्रेस्ट चेकअप ज़रूरी
– समय-समय पर ब्रेस्ट की जांच करती रहें, ताकि समय रहते इनके लक्षणों को पहचानकर इलाज किया जा सके.
– सेल्फ ब्रेस्ट एक्ज़ामिनेशन करें.
– अपने गायनेकोलॉजिस्ट से चेकअप करवाएं और ज़रूरी हो तो मेमोग्राफी भी करवाएं.
– इसके अलावा डॉक्टर आपको ब्रेस्ट की सोनाग्राफी. 2 डी या 3 डी मेमोग्राम, ब्रेस्ट एमआरआई, बायोप्सी करवाने की सलाह भी दे सकते हैं.

अगर आपको ब्रेस्ट कैंसर का पता चल जाए तो डरें नहीं. एक बात ध्यान रखें, कैंसर लाइलाज नहीं है. जितना जल्दी कैंसर के बारे में पता चलेगा, जितनी जल्दी आप ट्रीटमेंट शुरू करेंगी, इलाज उतना ही आसान हो जाएगा. कैंसर का टाइप, स्टेज, मरीज़ की हेल्थ कंडीशन, उसकी उम्र आदि को ध्यान में रखते हुए डॉक्टर इलाज की प्रक्रिया तय करते हैं.

 

सावधानियांः अपनाएं हेल्दी हैबिट्स

– वज़न को कंट्रोल रखें.
– जितना ज़्यादा हो सके, फल और सब्ज़ियां खाएं.
– एक्सरसाइज़ करें व एक्टिव रहें.
– ब्रेस्ट फीडिंग ब्रेस्ट कैंसर से प्रोटेक्ट करता है. इसलिए अपने बच्चे को ब्रेस्ट फीड ज़रूर कराएं.
– शराब और सिगरेट से दूर रहें.
– स्ट्रेस से दूर रहें. पॉज़िटिव सोच रखें.

 

 

एक नज़र आंकड़ों पर

 

 

इंडियन काउंसिल फॉर मेडीकल रिसर्च (आईसीएमआर) के मुताबिक़ भारत में महिलाओं में औसतन 23 फीसदी कैंसर स्तन कैंसर होते हैं. कैंसर से होने वाली कुल मौंतों में 50 फीसदी का कारण स्तन कैंसर है. हर साल स्तन कैंसर के एक लाख पंद्रह हज़ार (1,15,000) नए मरीज़ सामने आते हैं, जिनमें 53 हज़ार की मौत हो जाती है. यानी हर दो नए स्तन कैंसर मरीज़ में एक की मौत हो जाती है. आईसीएमआर के मुताबिक़ स्तन कैंसर रोगियों की तादाद ढाई लाख के ऊपर है. स्तन कैंसर के सबसे ज़्यादा मामले 45 से 55 की उम्र के बीच होते हैं. क़रीब 70 फीसदी मामलों में स्तन कैंसर के मरीज़ के अस्पताल पहुंचने के समय ट्यूमर का आकार पांच सेंटीमीटर से ज़्यादा यानी मरीज़ थर्ड स्टेज में होता है. पहले स्टेज के पांच फ़ीसदी मरीज़ अस्पताल पहुंच पाते हैं.