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वॉटर सोल्यूबल विटामिन्स

ये ऐसे विटामिन्स हैं, जो न शरीर में बनते हैं और न ही शरीर में जमा होते हैं, इसलिए इन्हें डायट और सप्लीमेंट के ज़रिए ही लिया जा सकता है.

कौन-से हैं विटामिन्स?

– विटामिन सी और ज़्यादातर विटामिन बी टाइप्स वॉटर सोल्यूबल हैं.

विटामिन बी: बी 1 (थियामिन), बी 2 (राइबोफ्लेविन), बी 3 (नियासिन), बी 5
(पैंटोथेनिक एसिड), विटामिन बी 6, बी 7 (बायोटिन), बी 9 (फॉलिक एसिड) और बी 12 इस गु्रप के विटामिन्स हैं. ये आपके मेटाबॉलिज़्म को बेहतर बनाते हैं, रक्तसंचार को संतुलित रखते हैं और शरीर में ऊर्जा का संचार बनाए रखते हैं.

विटामिन सी: इसे ‘एस्कॉर्बिक एसिड’ भी कहते हैं. विटामिन सी में एंटीऑक्सीडेंट प्रॉपर्टीज़ भी होती हैं. यह हड्डियों के
साथ-साथ कार्टिलेज, दांतों, मसल्स, ब्लड वेसल्स आदि को भी स्ट्रॉन्ग बनाए रखता है. साथ ही यह मसूड़ों और मांसपेशियों की सुरक्षा करता है और घावों को तेज़ी से भरने में मदद करता है.

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कब और कैसे लें?

– वॉटर सोल्यूबल विटामिन्स खाली पेट शरीर में ज़्यादा अच्छी तरह एब्ज़ॉर्ब होते हैं, इसलिए सुबह-सुबह लेना ज़्यादा फ़ायदेमंद होगा.

– कुछ भी खाने के आधे घंटे पहले इसे लें या फिर खाने के 2 घंटे बाद लें.

– विटामिन सी और बी 12 कभी एक साथ न लें, वरना बी 12 अच्छी तरह एब्ज़ॉर्ब नहीं हो पाएगा. अगर आप दोनों सप्लीमेंट्स ले रहे हैं, तो दोनों के बीच 2 घंटे का गैप रखें.

– विटामिन बी कॉम्पलेक्स के साथ विटामिन डी ले सकते हैं.

फैट सोल्यूबल विटामिन्स

इनकी बहुत कम मात्रा में शरीर को ज़रूरत होती है. ज़रूरत से ज़्यादा होने पर ये टॉक्सिक लेवल पर पहुंच जाते हैं, जो आपके लिए हानिकारक हो सकता है.

कौन-से हैं विटामिन्स?

– विटामिन ए, विटामिन डी, विटामिन ई और विटामिन के फैट सोल्यूबल विटामिन्स हैं. ये हमारे लिवर और फैटी टिश्यूज़ में जमा होते रहते हैं, इसलिए इनकी ज़रूरत उतनी नहीं होती, जितनी वॉटर सोल्यूबल फैट्स की. ज़रूरत से ज़्यादा इनका इस्तेमाल आपके लिए नुक़सानदेह हो सकता है. एक्सपर्ट्स कहते हैं कि अगर आप रोज़ाना पोषण से भरपूर संतुलित भोजन ले रहे हैं, तो आपको सप्लीमेंट्स लेने की ज़रूरत नहीं है, लेकिन आज हमारी लाइफस्टाइल जिस तरह बदल गई है, ऐसे में ख़ासतौर से शहरी महिलाओं में विटामिन डी की कमी पाई जा रही है, जिसकी पूर्ति उन्हें सप्लीमेंट्स लेकर करनी पड़ रही है.

विटामिन ए: यह बोन ग्रोथ, रिप्रोडक्शन और इम्यून सिस्टम को मज़बूत बनाए रखने में
महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. यह बैक्टीरिया और जर्म्स से लड़ने की ताक़त देता है और साथ ही  हेल्दी व़िज़न, स्किन, बोन्स और बॉडी टिश्यूज़ को मेंटेन  रखता है.

कब और कैसे लें?

– विटामिन ए कभी भी सुबह-सुबह खाली पेट न लें. इससे आपको अपच या हार्टबर्न की समस्या हो सकती है.

– क्योंकि यह फैट सोल्यूबल विटामिन है, इसलिए इसे हमेशा फैटवाले खाने के
साथ लें.

– इसे आप दूध, दही, लिवर, ऑलिव ऑयल, साल्मन फिश, एवोकैडो आदि के साथ ले सकते हैं.

– विटामिन ए को एब्ज़ॉर्ब करने के लिए अपने डायट में पर्याप्त ज़िंक शामिल करें. इसके लिए आप काजू, बादाम, चिकन, काबुली चना, किडनी बीन्स आदि लें.

– वेट लॉस के लिए अगर कोई सप्लीमेंट ले रहे हैं, तो अवॉइड करें, वरना लो फैट के कारण विटामिन ए का पूरा फ़ायदा आपको नहीं मिलेगा.

विटामिन ई: ग्लोइंग स्किन और शाइनी हेयर के लिए विटामिन ई बेहद ज़रूरी है. यह एंटीऑक्सीडेंट्स से भरपूर है. साथ ही फ्री रैडिकल्स से हमारी सुरक्षा भी करता है.

कब और कैसे लें?

– विटामिन ए की तरह इसे भी खाने के साथ लें.

– आप चाहें, तो लंच या डिनर के साथ इसे ले सकते हैं.

– इसे खाली पेट कभी न लें.

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Vitamins

विटामिन डी: यह ‘सनशाइन विटामिन’ भी कहलाता है, क्योंकि यह हमें सूरज की रोशनी से मिलता है. यह हार्ट डिसीज़ जैसी गंभीर बीमारियों से हमें बचाता है. साथ ही हमारे डिप्रेशन को कम करके वेट लॉस में भी मदद करता है.

कब लें?

– एक्सपर्ट्स की मानें, तो विटामिन डी ऐसा सप्लीमेंट है, जिसे आप खाली पेट, खाने के साथ, सुबह, दोपहर या रात- कभी भी ले सकते हैं.

– हालांकि रात के व़क्त विटामिन डी लेने से कुछ लोग नींद की समस्या की शिकायत करते हैं, अगर आपके साथ भी ऐसा हो रहा है, तो आप उसे सुबह के व़क्त लें.

– फैट सोल्यूबल होने के नाते इसे खाने के साथ लेना ज़्यादा फ़ायदेमंद माना जाता है.

– इसे विटामिन के 2 के साथ लेने से हड्डियां मज़बूत बनती हैं.

विटामिन के: हेल्दी हार्ट, हेल्दी बोन्स, बोन डेन्सिटी में, मेंस्ट्रुअल साइकल में ब्लीडिंग को कम करने में और कैंसर से बचाव में यह काफ़ी मदद करता है. यह ब्लड क्लॉटिंग में फ़ायदेमंद है. हालांकि अक्सर इसे अनदेखा किया जाता है, इसलिए इसे ‘फॉरगॉटेन विटामिन’ भी कहा जाता है.

कब लें?

– फैटयुक्त भोजन के साथ लें.

– इसे विटामिन डी, कैल्शियम, विटामिन सी के साथ लेना ़ज़्यादा फ़ायदेमंद होता है.

– प्रेग्नेंट या ब्रेस्टफीडिंग करानेवाली महिलाएं बिना डॉक्टर के प्रिस्क्रिप्शन के इसे न लें.

प्रीनैटल विटामिन्स

महिलाओं के लिए प्रीनैटल विटामिन्स काफ़ी फ़ायदेमंद साबित होते हैं, इसलिए इनके सेवन, इफेक्ट्स और साइड इफेक्ट्स के बारे में सभी को पता होना चाहिए. कहने को इन्हें विटामिन्स कहते हैं, पर इनमें मिनरल्स भी शामिल हैं.

डॉक्टर्स के मुताबिक़, जो महिलाएं कंसीव करना चाहती हैं, उन्हें प्रेग्नेंसी के एक साल पहले से ही फॉलिक एसिड लेते रहना चाहिए. प्रेग्नेंसी के दौरान भी रोज़ाना उन्हें प्रीनैटल विटामिन्स लेते रहना चाहिए. कभी भी प्रीनैटल विटामिन्स की डबल डोज़ न लें. वैसे तो प्रेग्नेंसी के दौरान डॉक्टर्स ख़ुद ही बताते हैं कि कौन-सा विटामिन कब लें, फिर भी प्रेग्नेंसी के दौरान विटामिन्स लेने से पहले डॉक्टर को इन बातों के बारे में बताएं-

– मॉर्निंग सिकनेस है या नहीं.

– उल्टी स़िर्फ सुबह हो रही है या पूरे दिन.

– दिनभर चक्कर आता है या स़िर्फ किसी एक समय पर आदि.

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Correct Vitamins
कौन-से हैं विटामिन्स?

फॉलिक एसिड (विटामिन बी 9), आयरन और कैल्शियम.

फॉलिक एसिड: इसे ‘विटामिन बी 9’ या ‘फोलेट’ भी कहते हैं. जहां यह महिलाओं को बर्थ डिफेक्ट से बचाता है, वहीं गर्भावस्था के दौरान गर्भ के ब्रेन डेवलपमेंट, सेल्स डेवलपमेंट और टिश्यू ग्रोथ में भी मदद करता है. यह रेड सेल्स को बढ़ाने में मदद करता है और साथ ही अल्ज़ाइमर, कैंसर, डायबिटीज़, हार्ट प्रॉब्लम्स जैसी गंभीर बीमारियों से बचाव में मदद करता है.

कब और कैसे लें?

– सारे प्रीनैटल विटामिन्स खाली पेट लेने चाहिए यानी खाना खाने के 1 घंटा पहले या फिर खाना खाने के 2 घंटे बाद.

– कोशिश करें कि फॉलिक एसिड रोज़ाना निर्धारित एक ही समय पर लें. इसके लिए चाहें तो रिमाइंडर लगा लें.

– कोशिश करें कि फॉलिक एसिड लेने के 2 घंटे पहले और 2 घंटे बाद तक कोई एंटासिड्स या एंटीबायोटिक्स न लें.

आयरन: यह रेड ब्लड सेल्स के निर्माण में मदद करता है, जिससे आप एनीमिया की समस्या से बच जाते हैं. यह आपके इम्यून सिस्टम को मज़बूत बनाता है, जिससे आप जल्दी बीमार नहीं पड़ते. आयरन कई गंभीर बीमारियों से भी आपकी रक्षा करता है. ख़ासतौर से महिलाओं के लिए आयरन बहुत ज़रूरी है, क्योंकि पीरियड्स और प्रेग्नेंसी के दौरान उन्हें ज़्यादा ब्लड की ज़रूरत होती है, इसलिए उनकी डायट आयरन से भरपूर होनी चाहिए.

कब और कैसे लें?

– आयरन सुबह ब्रेकफास्ट के साथ लेना ज़्यादा फ़ायदेमंद होता है, पर किसी और की बजाय इसे विटामिन सी के साथ लेने से यह पूरी तरह एब्ज़ॉर्ब हो जाता है, इसलिए इसे आप ऑरेंज जूस के साथ लें.

– आयरन-कैल्शियम कभी भी एक साथ न लें, वरना कैल्शियम आयरन को एब्ज़ॉर्ब नहीं होने देगा.

– इसे लेने के दो घंटे पहले और दो घंटे बाद तक कोई डेयरी प्रोडक्ट न लें.

कैल्शियम: हर कोई जानता है कि हड्डियों की मज़बूती के लिए कैल्शियम कितना ज़रूरी है, पर यह स़िर्फ यही काम नहीं करता. कैल्शियम आपके हार्ट, मसल्स और नर्व्स की सही फंक्शनिंग में भी मदद करता है. कुछ स्टडीज़ के मुताबिक कैल्शियम और विटामिन डी साथ में लेने से  कैंसर, डायबिटीज़ और हाई ब्लड प्रेशर की संभावना कम हो जाती है. महिलाओं को पीएमएस की तकलीफ़ों में राहत दिलाने के साथ-साथ ये उन्हें स्लिम-ट्रिम बनाए रखता है.

कब और कैसे लें?

– कैल्शियम मार्केट में दो तरह से मिलता है- कैल्शियम सिट्रेट और कैल्शियम कार्बोनेट. कैल्शियम कार्बोनेट सबसे सस्ता होता है, जिसे खाने के साथ लेना चाहिए.

– कैल्शियम सिट्रेट महंगा आता है, जिसे खाली पेट या खाने के साथ भी ले सकते हैं.

– आमतौर पर कैल्शियम से कब्ज़ की शिकायत नहीं होती, लेकिन अगर आपको हो रही है, तो कैल्शियम सिट्रेट आपके लिए बेहतर विकल्प होगा.

– एक दिन में 500 एमजी कैल्शियम किसी के लिए भी उपयुक्त है, पर अगर डॉक्टर ने 1000 एमजी प्रिस्क्राइब किया है, तो उसे दो बार में सुबह-शाम लें.

– अगर आयरन-कैल्शियम दोनों एक साथ ले रहे हैं, तो आयरन ब्रेकफास्ट में और कैल्शियम लंच या डिनर के साथ लें.

– कैफीन लेने के 3 घंटे बाद ही कैल्शियम लें.

– अनीता सिंह

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मॉडर्न लाइफ़स्टाइल के चलते हमारी फूड हैबिट्स काफ़ी बदल गई है. हम पौष्टिक चीज़ें खाने की बजाय स्वाद को अधिक प्राथमिकता देने लगे हैं, जैसे- जंक फूड्स, तली-भुनी चीज़ें, कोल्ड ड्रिंक्स, चॉकलेट, आइस्क्रीम आदि. खानपान में गड़बड़ी के चलते शरीर में कैल्शियम की कमी एक आम समस्या हो गई है, जो आगे चलकर स्वास्थ्य को प्रभावित करती है.

Why do we need Calcium

शरीर के स्वस्थ और संतुलित विकास के लिए हर उम्र में कैल्शियम की आवश्यकता होती है. बढ़ते बच्चों के शरीर, दांतों के आकार और हड्डियों को मज़बूत बनाने के लिए भी कैल्शियम ज़रूरी है. जहां तक महिलाओं का प्रश्‍न है, हमारे देश की अधिकांश महिलाओं में कैल्शियम की कमी पाई जाती है. उनमें इसकी कमी टीनएज से ही रहने लगती है, जो ताउम्र बनी रहती है. चूंकि महिलाएं मासिक धर्म, मेनोपॉज़ जैसी प्रक्रियाओं से गुज़रती हैं, साथ ही गर्भधारण और स्तनपान कराती हैं, इसलिए उन्हें ख़ासतौर पर कैल्शियम की आवश्यकता होती हैै.

क्यों ज़रूरी है कैल्शियम?

शरीर की प्रत्येक कोशिका को कैल्शियम की ज़रूरत इसलिए होती है, क्योंकि हमारे शरीर में त्वचा, नाख़ून, बाल और मल के ज़रिए रोज़ ही कैल्शियम की कुछ मात्रा नष्ट होती रहती है. इसलिए कैल्शियम का संतुलन बनाए रखने के लिए इसकी रोज़ ही पूर्ति कर ली जाए, तो अच्छा रहता है. यदि ऐसा नहीं होगा, तो हमारा शरीर हड्डियों से कैल्शियम लेने लगेगा. नतीजा बाहर से भले ही हम कमज़ोर न लगें, लेकिन अंदर ही अंदर हड्डियां खोखली हो जाएंगी और शरीर कमज़ोर. और कमज़ोर हड्डियां कई तरह की परेशानियां पैदा करती हैं, जैसे- ज़रा-सी चोट लगने पर ही फ्रैक्चर हो सकता है. यही नहीं, कैल्शियम हृदय, मांसपेशियों, ब्लड क्लॉटिंग के लिए भी बेहद ज़रूरी होता है.
इसके अलावा कैल्शियम मांसपेशियों के कई काम में मदद करता है, जैसे-
– लिखना, टहलना, बैठना और किसी गेंद को फेंकना आदि.
– कैल्शियम नर्वस सिस्टम के संदेश मस्तिष्क तक पहुंचानेे में सहायक है, जैसे- यदि आपने किसी गरम वस्तु को छू लिया है, तो मस्तिष्क तुरंत एक संदेश भेजेगा, जिससे आपके मुंह से ङ्गआह!… आउच!फ की आवाज़ आएगी और आप अपने हाथ को जल्दी से दूर हटा लेंगे.
– इसके अलावा ये चोट, घाव, खरोंच आदि के भी जल्दी ठीक होने में मदद करता है.
लेकिन यदि शरीर में कैल्शियम की कमी हो जाए, तो इसके दुष्प्रभाव होते हैं, जो हमें बीमार कर सकते हैं. इन बीमारियों के लक्षण धीरे-धीरे सामने आते हैं.

कैल्शियम की कमी के लक्षण

– ब्लड प्रेशर का बढ़ना
– दांतों का समय से पहले गिरना
– शरीर का विकास रुकना
– हड्डियों में टेढ़ापन
– शरीर के विभिन्न अंगों मेंऐंठन या कंपन
– जोड़ों का दर्द
– मांसपेशियों में निष्क्रियता
– ज़रा-सा टकराने पर हड्डियों का टूटना
– मस्तिष्क का सही ढंग से काम न करना
– भू्रण के विकास पर प्रभाव पड़ना
– हड्डियों का खोखला होना, उनका कमज़ोर होकर टूटना, बार-बार फ्रैक्चर होना
– कमर का झुकना व दर्द होना
– हाथ-पैरों में झुनझुनाहट व कमज़ोरी
– बुज़ुर्गों को ऑस्टियोपोरोसिस हो सकता है यानी फ्रैक्चर व हड्डियों में दर्द.
कैल्शियम की कमी की पूर्ति कैसे करें, इस बारे में डॉ. अनिल शर्मा का कहना है कि बीमारी कोई भी हो शरीर के लिए दुखदायी होती है, इसलिए उसका तुरंत उपचार करना भी ज़रूरी होता है, वरना उसके साथ-साथ शरीर में और भी कई बीमारियां घर कर लेती हैं. यदि हम अपने खानपान का ध्यान रखें, तो बीमारियों को दूर भगा सकते हैं. आइए, जानें कि कैल्शियम हमें किन चीज़ों से मिल सकता है, जिन्हें अपने डायट में शामिल कर हम स्वस्थ रह सकते हैं-
अनाज- गेंहू, बाजरा, मूंग, मोठ, चना, राजमा और सोयाबीन.
सब्ज़ियां- गाजर, भिंडी, टमाटर, ककड़ी, अरबी, मूली, मेथी, करेला और चुकंदर.
फल- नारियल, आम, संतरा और अनन्नास.
डेयरी उत्पाद- दूध व दूध से बनी चीज़ों को कैल्शियम का प्रमुख स्रोत माना जाता है. हर रोज़ दूध का सेवन शरीर में कैल्शियम की मात्रा बनाए रखने में मददगार होता है.
मां का दूध- मां का दूध नवजात शिशु के लिए कैल्शियम का सर्वोत्तम स्रोत है, जो उनमें कैल्शियम की पूर्ति करता है और स्वस्थ रखता है.
ये सभी प्राकृतिक रूप से कैल्शियम प्रदान करनेवाले तत्व हैं. ये पदार्थ तुरंत शरीर के द्वारा अवशोषित कर लिए जाते हैं, इन्हें अपनी रोज़मर्रा की डायट में शामिल कर हम कैल्शियम की कमी से होनेवाले नुक़सानों से बच सकते हैं.

 

कितना कैल्शियम ज़रूरी है?

– सामान्य महिलाओं के लिए प्रतिदिन 1000 मिलीग्राम कैल्शियम की आवश्यकता होती है.
– गर्भवती महिलाओं व स्तनपान करानेवाली महिलाओं के लिए प्रतिदिन 1500 मिलीग्राम.
– 6 माह के छोटे बच्चों के लिए 400 मिलीग्राम.
– 1 साल से 10 साल तक के बच्चों के लिए 800 मिलीग्राम.
– 10 साल से 18 साल और उससे अधिक आयु वर्ग के लिए 1300 मिलीग्राम.

 

– शिखा जैन

हमारे शारीरिक व मानसिक विकास के लिए पोषण बहुत ज़रूरी है, पर क्या हमें हमारे रोज़ के आहार से ज़रूरी पोषण मिल रहा है या कहीं कोई कमी है, जो हमें इतनी बीमारियां दे रही है. लोगों की रोगप्रतिरोधक क्षमता कम हो रही है और वे आसानी से बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं. आख़िर इसका कारण क्या है?

Benefits of health supplements

क्या है ज़मीनी हक़ीक़त?

– आजकल फल व सब्ज़ियों को पकने या तैयार होने से पहले ही तोड़ लिया जाता है, जिससे उनके पोषक तत्व 80% ही रह जाते हैं. मार्केट से घर तक
पहुंचते-पहुंचते उनके पोेषक तत्वों की संख्या और भी कम हो जाती है.
-सब्ज़ियों की गुणवत्ता घटकर 50% से भी कम रह गई है. न अब सब्ज़ियां उतनी ताज़ी मिलती हैं और न ही उनमें वो क्वालिटी रह गई है. रही-सही कसर कीटनाशकों ने पूरी कर दी है.
– बढ़ते प्रदूषण और तनाव से शरीर में टॉक्सिन का लेवल भी बढ़ रहा है, जिससे बचने के लिए शरीर के लिए
एंटीऑक्सीडेंट्स जैसे पोषक तत्वों की ज़रूरत भी बढ़ गई है, जबकि भोजन में इसकी मात्रा घटकर आधी रह गई है.
– पहले जहां ब्लड प्रेशर, डायबिटीज़ और हार्ट प्रॉब्लम्स बड़ी उम्र की बीमारियां मानी जाती थीं, वहीं आज ये कम उम्र के लोगों को अपने चपेट में ले रही हैं.
– संतुलित आहार लेना उतना आसान नहीं, जितना हमें लगता है. डॉक्टर्स के मुताबिक़ सेहतमंद रहने के लिए हर किसी को रोज़ाना फल व सब्ज़ियों की 9 सर्विंग्स लेनी चाहिए, जो हमारे लिए मुश्किल है. ऐसे में इस कमी को पूरा करने के लिए हमें खाने के अलावा सप्लीमेंट्स की ज़रूरत पड़ रही है.
– उदाहरण के लिए विटामिन सी की रोज़ाना की ज़रूरत को पूरा करने के लिए हमें 20 संतरे खाने चाहिए, जो किसी के लिए भी मुमकिन नहीं. ऐसे में विटामिन सी
की कमी से उससे जुड़ी बीमारियां होने लगती हैं.

 

मिलावटी सप्लीमेंट्स का बढ़ता बाज़ार

आजकल मार्केट में हेल्थ सप्लीमेंट्स और डायटरी सप्लीमेंट्स की बाढ़ आई हुई है, पर किसी पर भी आंख मूंदकर विश्‍वास करना हमारे लिए ही घातक साबित हो सकता है, क्योंकि यहां भी मिलावट का बहुत बड़ा बाज़ार है.
– सप्लीमेंट्स के लिए ज़्यादातर कॉन्संट्रेटेड प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल किया जाता है. ज़्यादातर मैन्यूफैक्चरर्स सस्ते व
लोअर ग्रेड के कॉन्संट्रेटेड प्रोडक्ट्स इस्तेमाल कर ज़्यादा पैसे बचाने की कोशिश करते हैं.
– आमतौर पर सभी विटामिन्स सिंथेटिक होते हैं और पेट्रोलियम बेस्ड केमिकल्स से बने होते हैं. सिंथेटिक विटामिन्स में प्राकृतिक तत्वों की कमी होती है, जिससे वे अच्छी तरह शरीर में नहीं घुलते.
– कॉर्न, दूध, गेहूं, सोया जैसे स्रोतों से बनाए गए सप्लीमेंट्स से एलर्जी की संभावना ज़्यादा होती है, क्योंकि इन तत्वों में एलर्जेंस के अंश पाए जाते हैं. नतीजतन
बहुत-से लोगों को इनके उपयोग से एलर्जिक रिएक्शन्स हो जाते हैं.
– आमतौर पर लगभग सभी विटामिन पिल्स में ल्युब्रिकेंट, फिलर्स, आर्टीफिशियल कलर्स और फ्लेवर्स मिलाए जाते हैं. कॉर्न स्टार्च जैसे फिलर्स मिलाकर पिल्स को बड़ा व अट्रैक्टिव दिखाने की कोशिश की जाती है.
– सप्लीमेंट्स में 50% से ज़्यादा इस्तेमाल किए गए केमिकल्स के नाम लेबल पर दिए ही नहीं जाते.
– ज़्यादातर सप्लीमेंट्स में इस्तेमाल किए गए न्यूट्रिएंट्स की मात्रा असंतुलित होती है, जो सही नहीं है. हमारे शरीर में पहले से ही तत्वों का असंतुलन होता है, ऐसे में असंतुलित मात्रा वाले सप्लीमेंट्स स्थिति को और भी बिगाड़ देते हैं.
– ग्राहकों को लुभाने के लिए बहुत-से सप्लीमेंट्स के लेबल पर 15-20 तत्वों के नाम लिखे होते हैं, पर इनकी डोज़ पर्याप्त मात्रा में नहीं रहती, जिससे ये कुछ ख़ास फ़ायदेमंद साबित नहीं होते.

कैसे चुनें क्वालिटी सप्लीमेंट्स?

– क्वालिटी हेल्थ सप्लीमेंट्स प्राकृतिक स्रोतों से बनाए जाते हैं, इसलिए सबसे पहले ध्यान दें कि वो ऑर्गेनिक हों, न कि सिंथेटिक.
– सप्लीमेंट्स के लेबल में यह ज़रूर देखें कि ये पिल्स किन प्राकृतिक तत्वों से बनाए गए हैं और उनकी मात्रा क्या है.
– सिंथेटिक पिल्स पर ऐसी कोई जानकारी नहीं होती, जिससे साफ़ पता चल जाता है कि वे आपकी सेहत के लिए सही नहीं हैं.
– महज़ किसी विज्ञापन में देखकर कभी किसी हेल्थ सप्लीमेंट का चुनाव न करें. अगर आपको कोई समस्या है, तो अपने डॉक्टर को बताएं, वो आपको सही सलाह देंगे कि आपको सप्लीमेंट की ज़रूरत है या नहीं?
– मार्केट में रोज़-रोज़ नए सप्लीमेंट ब्रांड्स आ रहे हैं, ऐसे में सालों से जांचे-परखे मैन्यूफैक्चरर्स पर ही विश्‍वास करें.
– सस्ते के चक्कर में कोई भी सप्लीमेंट ट्राई न करें, वरना ये आपको महंगा पड़ सकता है.
– ख़ासतौर पर बुज़ुर्गों, बीमार व्यक्तियों और गर्भवती महिलाओं को हेल्थ सप्लीमेंट्स की ज़रूरत होती है, जो उनके डॉक्टर ज़रूरत के मुताबिक़ लेने की सलाह
देते हैं.

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ज़रूरी विटामिन-मिनरल्स व उनके स्रोत

इन विटामिन्स और मिनरल्स की ज़रूरत हमें रोज़ाना पड़ती है, इसीलिए इनके सप्लीमेंट्स मार्केट में सबसे ज़्यादा बिकते हैं. यहां हम जानने की कोशिश करेंगे कि शरीर में इनकी कमी के क्या परिणाम हो सकते हैं और इनके प्राकृतिक स्रोतों के भंडार कौन-से हैं?

विटामिन सी

यह एक शक्तिशाली एंटीऑक्सीडेंट, एंटीइंफ्लेमेटरी, एंटीवायरल, एंटीबायोटिक और एंटीकैंसर कम्पाउंड है. शरीर के विकास के लिए यह बहुत ज़रूरी है. हड्डियों व दांतों की बनावट, त्वचा के पोषण, घाव भरने और शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने में मददगार साबित होता है.
कमी के लक्षण
थकान, चिड़चिड़ापन, वज़न कम होना, जोड़ों व मांसपेशियों में दर्द, दांतों व मसूड़ों की समस्याएं, बार-बार इंफेक्शन, रूखी त्वचा व रूखे बाल आदि.
प्राकृतिक स्रोत
संतरा, पेर, अनन्नास, प्लम, जामुन, चेरी, तरबूज़, स्ट्रॉबेरी, अमरूद, कीवी, एप्रिकॉट, ब्रोकोली, मोसंबी, नींबू, इमली, मूली, पालक, टमाटर, आलू, प्याज़, पत्तागोभी आदि विटामिन सी के गुणों से भरपूर फल व सब्जियां हैं.

विटामिन ई

एंटीऑक्सीडेंट युक्त यह विटामिन शरीर की रोगप्रतिरोधक क्षमता को मज़बूत बनाने, त्वचा व बालों को पोषण देने के साथ-साथ कोलेस्ट्रॉल को कम करके हार्ट प्रॉब्लम्स व कैंसर से बचाता है.
कमी के लक्षण
एनीमिया, मांसपेशियों में कमज़ोरी, कम या धुंधला दिखाई देना आदि.
प्राकृतिक स्रोत
बादाम, सूरजमुखी के बीज, एवोकैडो, पालक, आम, टमाटर, पपीता, ऑलिव, एप्रिकॉट, कीवी, शकरकंद, ब्रोकोली, कद्दू, अंकुरित गेहूं, दूध, अंडे आदि.

विटामिन बी12

यह प्रोटीन्स, फैट और कार्बोहाइड्रेट्स को इस्तेमाल करने में मदद करता है. रेड ब्लड सेल्स और नर्व टिश्यूज़ के फॉर्मेशन में मदद करता है. बच्चों के विकास में ख़ास भूमिका निभाता है.
कमी के लक्षण
एनीमिया, थकान, जीभ में जलन, चलने में तकलीफ़, याद्दाश्त कमज़ोर होना, चिड़चिड़ापन, मांसपेशियों में कमज़ोरी आदि.
प्राकृतिक स्रोत
दूध व दूध से बनी चीज़ें, मीट, अंडे, शेलफिश आदि.

विटामिन डी

हमें सेहतमंद रखने में विटामिन डी अहम् भूमिका निभाता है. यह हमें ऑस्टियोपोरोसिस, कैंसर, इंफेक्शन्स, अल्ज़ाइमर, ऑटोइम्यून डिसीज़ से बचाने के साथ-साथ ब्लड शुगर व ब्लड प्रेशर को रेग्युलेट करने में मदद करता है.
कमी के लक्षण
हड्डियों व जोड़ों में दर्द होना, ऑस्टियोपोरोसिस, आंतों की समस्याएं आदि.
प्राकृतिक स्रोत
सूरज की रोशनी सबसे बढ़िया स्रोत है. इसके अलावा दूध, अंडे, मछली, लिवर, मशरूम आदि में भी पाया जाता है.

आयरन

यह एक ज़रूरी मिनरल है, जो पूरे शरीर में ऑक्सीजन को पहुंचाने का काम करता है. इसकी कमी का सबसे बड़ा लक्षण है- थकान. यह ब्रेन और मसल फंक्शन को बेहतर बनाने में मदद करता है.
कमी के लक्षण
थकान, याद्दाश्त कमज़ोर होना, शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमज़ोर होना, हैवी पीरियड्स आदि.
प्राकृतिक स्रोत
चिकन, मछली, हरी सब्ज़ियां, बीन्स, ड्रायफ्रूट्स आदि.

कैल्शियम

यह हार्ट, मसल्स, नर्वस सिस्टम आदि को बेहतर करने में सहयोग देता है.
कमी के लक्षण
हाई ब्लड प्रेशर, कोलोन कैंसर, प्रीमेंस्ट्रुअल सिंड्रोम, पॉयज़निंग का बढ़ना आदि.
प्राकृतिक स्रोत
दूध, दही, चीज़, हरी सब्ज़ियां, सोया, सी फूड आदि.

– अनीता सिंह

Calcium Health Benefits
मॉडर्न लाइफ़स्टाइल के चलते हमारी फूड हैबिट्स काफ़ी बदल गई है. हम पौष्टिक चीज़ें खाने की बजाय स्वाद को अधिक प्राथमिकता देने लगे हैं, जैसे- जंक फूड्स, तली-भुनी चीज़ें, कोल्ड ड्रिंक्स, चॉकलेट, आइस्क्रीम आदि. खानपान में गड़बड़ी के चलते शरीर में कैल्शियम की कमी एक आम समस्या हो गई है, जो आगे चलकर स्वास्थ्य को प्रभावित करती है.

शरीर के स्वस्थ और संतुलित विकास के लिए हर उम्र में कैल्शियम की आवश्यकता होती है. बढ़ते बच्चों के शरीर, दांतों के आकार और हड्डियों को मज़बूत बनाने के लिए भी कैल्शियम ज़रूरी है. जहां तक महिलाओं का प्रश्‍न है, हमारे देश की अधिकांश महिलाओं में कैल्शियम की कमी पाई जाती है. उनमें इसकी कमी टीनएज से ही रहने लगती है, जो ताउम्र बनी रहती है. चूंकि महिलाएं मासिक धर्म, मेनोपॉज़ जैसी प्रक्रियाओं से गुज़रती हैं, साथ ही गर्भधारण और स्तनपान कराती हैं, इसलिए उन्हें ख़ासतौर पर कैल्शियम की आवश्यकता होती है.

क्यों ज़रूरी है कैल्शियम?
शरीर की प्रत्येक कोशिका को कैल्शियम की ज़रूरत इसलिए होती है, क्योंकि हमारे शरीर में त्वचा, नाख़ून, बाल और मल के ज़रिए रोज़ ही कैल्शियम की कुछ मात्रा नष्ट होती रहती है. इसलिए कैल्शियम का संतुलन बनाए रखने के लिए इसकी रोज़ ही पूर्ति कर ली जाए, तो अच्छा रहता है. यदि ऐसा नहीं होगा, तो हमारा शरीर हड्डियों से कैल्शियम लेने लगेगा. नतीजा बाहर से भले ही हम कमज़ोर न लगें, लेकिन अंदर ही अंदर हड्डियां खोखली हो जाएंगी और शरीर कमज़ोर. और कमज़ोर हड्डियां कई तरह की परेशानियां पैदा करती हैं, जैसे- ज़रा-सी चोट लगने पर ही फ्रैक्चर हो सकता है. यही नहीं, कैल्शियम हृदय, मांसपेशियों, ब्लड क्लॉटिंग के लिए भी बेहद ज़रूरी होता है.
इसके अलावा कैल्शियम मांसपेशियों के कई काम में मदद करता है, जैसे-
– लिखना, टहलना, बैठना और किसी गेंद को फेंकना आदि.
– कैल्शियम नर्वस सिस्टम के संदेश मस्तिष्क तक पहुंचाने में सहायक है, जैसे- यदि आपने किसी गरम वस्तु को छू लिया है, तो मस्तिष्क तुरंत एक संदेश भेजेगा, जिससे आपके मुंह से ‘आह!… आउच!’ की आवाज़ आएगी और आप अपने हाथ को जल्दी से दूर हटा लेंगे.
– इसके अलावा ये चोट, घाव, खरोंच आदि को भी जल्दी ठीक करने में मदद करता है.
– लेकिन यदि शरीर में कैल्शियम की कमी हो जाए, तो इसके दुष्प्रभाव होते हैं, जो हमें बीमार कर सकते हैं. इन बीमारियों के लक्षण धीरे-धीरे सामने आते हैं.

Calcium Health Benefits

कैल्शियम की कमी के लक्षण
– ब्लड प्रेशर का बढ़ना
– दांतों का समय से पहले गिरना
– शरीर का विकास रुकना
– हड्डियों में टेढ़ापन
– शरीर के विभिन्न अंगों मेंऐंठन या कंपन
– जोड़ों का दर्द
– मांसपेशियों में निष्क्रियता
– ज़रा-सा टकराने पर हड्डियों का टूटना
– मस्तिष्क का सही ढंग से काम न करना
– भू्रण के विकास पर प्रभाव पड़ना
– हड्डियों का खोखला होना, उनका कमज़ोर होकर टूटना, बार-बार फ्रैक्चर होना
– कमर का झुकना व दर्द होना
– हाथ-पैरों में झुनझुनाहट व कमज़ोरी
– बुज़ुर्गों को ऑस्टियोपोरोसिस हो सकता है यानी फ्रैक्चर व हड्डियों में दर्द.

कितना कैल्शियम है ज़रूरी?
– सामान्य महिलाओं के लिए प्रतिदिन 1000 मिलीग्राम कैल्शियम की आवश्यकता होती है.
– गर्भवती महिलाओं व स्तनपान करानेवाली महिलाओं के लिए प्रतिदिन 1500 मिलीग्राम.
– 6 माह के छोटे बच्चों के लिए 400 मिलीग्राम.
– 1 साल से 10 साल तक के बच्चों के लिए 800 मिलीग्राम.
– 10 साल से 18 साल और उससे अधिक आयु वर्ग के लिए 1300 मिलीग्राम.

Calcium Health Benefits

कैल्शियम की कमी की पूर्ति कैसे करें?
इस बारे में डॉ. अनिल शर्मा का कहना है कि बीमारी कोई भी हो, शरीर के लिए दुखदायी होती है, इसलिए उसका तुरंत उपचार करना भी ज़रूरी होता है, वरना उसके साथ-साथ शरीर में और भी कई बीमारियां घर कर लेती हैं. यदि हम अपने खानपान का ध्यान रखें, तो बीमारियों को दूर भगा सकते हैं. आइए, जानें कि कैल्शियम हमें किन चीज़ों से मिल सकता है, जिन्हें अपने डायट में शामिल कर हम स्वस्थ रह सकते हैं-
अनाज- गेहूं, बाजरा, मूंग, मोठ, चना, राजमा और सोयाबीन.
सब्ज़ियां- गाजर, भिंडी, टमाटर, ककड़ी, अरबी, मूली, मेथी, करेला और चुकंदर.
फल- नारियल, आम, संतरा और अनन्नास.
डेयरी उत्पाद- दूध व दूध से बनी चीज़ों को कैल्शियम का प्रमुख स्रोत माना जाता है. हर रोज़ दूध का सेवन शरीर में कैल्शियम की मात्रा बनाए रखने में मददगार होता है.
– मां का दूध नवजात शिशु के लिए कैल्शियम का सर्वोत्तम स्रोत है, जो उनमें कैल्शियम की पूर्ति करता है और स्वस्थ रखता है.
– ये सभी प्राकृतिक रूप से कैल्शियम प्रदान करनेवाले तत्व हैं. ये पदार्थ तुरंत शरीर के द्वारा अवशोषित कर लिए जाते हैं, इन्हें अपनी रोज़मर्रा की डायट में शामिल कर हम कैल्शियम की कमी से होनेवाले नुक़सानों से बच सकते हैं.